Archive for the month “March, 2018”

हिंदी साहित्यिक की विकट जीवटता: उस्मान ख़ान

विश्व-साहित्य की अवधारणा अभी हिन्दी में चर्चित नहीं है। इंग्लिश के विश्व-भाषा बनते जाने, पुस्तकों, पत्रिकाओं के ‘सॉफ्ट’ रूप आ जाने, इंटरनेट के विकास आदि ने विश्व-स्तर पर साहित्य-उत्पादन में वृद्धि की है। विश्व-साहित्य ने समीक्षकों का ध्यान फिर से आकर्षित किया है। हिन्दी-क्षेत्र में भी साहित्य-महोत्सव, रंग-महोत्सव, संगीत-महोत्सव, सिनेमा-महोत्सव आदि का चलन हो गया है। सुस्त और निराश हिन्दी साहित्यिकों के लिए इवेंट क्रिएट किए जाते हैं। ऐसे लोग हैं, जो शहरों में इश्तेहार लिए फिरते हैं – ‘निराश साहित्यिक मिलें’। थोड़ा खर्चा करना पड़ता है, पर उत्साह पैदा हो सकता है। हिन्दी का साहित्य-उत्पादक ठेके पर काम करता है, दिहाड़ी भी कर लेता है, अनियमित और मुक्त साहित्यिकों की भी कमी नहीं। कुछ ही को आराम है। हिन्दी कवि त्रिलोचन ने यूँ ही नहीं कहा – ‘हिन्दी की कविता उनकी कविता है जिनकी साँसों को आराम नहीं था’। #लेखक 

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विश्व-साहित्य और हिंदीयत

By उस्मान ख़ान

विश्व-साहित्य की अवधारणा १९वीं सदी के जर्मन साहित्यिक, राजनेता और विज्ञान-अनुसंधानी जोहान वोल्फ़्गेन फोन गेटे के लेखन में पहली बार प्रकट होती है। विश्व-साहित्य तब एक संभावना की बात थी। जर्मनी के ही क्रांतिकारी, समीक्षक, मज़दूर-नेता कार्ल मार्क्स और फ्रेडेरिक एंगेल्स ने साम्यवादी घोषणापत्र में आने वाले समय में असंख्य देशज और स्थानीय साहित्य से विश्व-साहित्य के उदय की संभावना जताई थी। २०वीं सदी में प्रिंटिंग-प्रेस और अनुवाद-कला के उत्तरोत्तर विकास ने विश्व-साहित्य के निर्माण को तेज़ किया। २१वीं सदी में मुक्त-बाज़ार और इंटरनेट के विश्व-व्यापी प्रभाव में विश्व-साहित्य के निर्माण और वैश्विक-सौंदर्य-मूल्यों के निर्माण की ओर साहित्यिकों और समीक्षकों का ध्यान तेज़ी से जा रहा है।

आज विश्व के कई देशों में तुलनात्मक साहित्य और विश्व-साहित्य विश्व-विद्यालयों, अध्ययन-केन्द्रों आदि के पाठ्यक्रमों में शामिल किया जा रहा है। अभी इस प्रश्न को हल नहीं किया जा सकता है कि विश्व-साहित्य में किन किताबों को शामिल किया जाना चाहिए! साहित्य के विभिन्न माध्यमों में विस्तार को देखते हुए यह काम और भी कठिन होता जा रहा है। लेकिन भविष्य में रास्ता अधिक साफ़ होगा। स्थानीयता का रूप भी अधिक स्पष्ट होगा। हिंदीयत क्या है? यह भी अधिक स्पष्ट होगा।

विश्व-साहित्य-समीक्षा अपने प्रारम्भ में यानी साम्राज्यवाद के विस्तार के समय यूरोप-केन्द्रित थी, आज साम्राज्यवाद की स्थिति भी बदल गई है और ग़ैर-यूरोपीय देशों और भाषाओं में भी विश्व-साहित्य-समीक्षा का प्रयास हो रहा है। डॉलर की सत्ता को वेनेजुएला और चीन जैसे देशों ने चुनौती दी है। पूंजीवाद-साम्राज्यवाद एक-रंगी विश्व-संस्कृति को प्रसारित करता है, एक-सा जीने, सोचने और खाने-पीने-पहनने पर ज़ोर देता है। विकासाधीन देशों में एक समय की प्रगतिशील कही जाने वाली पहलकदमी ने अपनी भूमिका खो दी है।

आज का समय लोकतन्त्र और विज्ञान की ओर बढ़ने का रास्ता छोड़ ३०-४० के दशक में पश्चिम-यूरोप के देशों द्वारा सुझाए फासीवाद की ओर बढ़ गया है। उत्पादन-पुनरुत्पादन की नीरस ज़िंदगी से अधिक वह अब और कुछ नहीं दे सकता। इसी कारण हिंसा-उन्माद-विकृति को ही ख़ुशी और अच्छाई मानने का प्रचार किया जाता है। बहू-रंगी संस्कृति से निर्मित विश्व-संस्कृति को वह स्वीकार नहीं कर पाता। रोज़गार और युद्ध के कारण बढ़ता पलायन विभिन्न संस्कृतियों के संयोजन का प्रमुख कारण है।

यह बहु-रंगी सांस्कृतिक स्थिति जीवन को रसपूर्ण बनाने में अभी असमर्थ है। यह कोलाहल किसी सरस गीत को जन्म देगा। विभिन्न संस्कृतियों का यह संयोजन पूंजीवाद-साम्राज्यवाद के सांस्कृतिक प्रभाव को कैसे कम या खत्म करेगा, यह इस पर निर्भर करता है कि निम्न-वर्गीय संस्कृतिकर्मी की क्या स्थिति है, क्या योजनाएँ हैं, वह कितना साहसी और सृजनशील है। विश्व की बदलती राजनैतिक-आर्थिक स्थितियों से विश्व-साहित्य के निर्माण में तेज़ी आई है। आज संस्कृतिकर्मी मुक्त-बाज़ार में फासीवाद और समाजवाद के संघर्ष की नई मंज़िल पर खड़ी है। मार्क्स और एंगेल्स ने आभिजात्य-वर्ग के साहित्यिक-उत्पादन के कॉस्मोपोलिटन या सर्वदेशीय चरित्र की बात कही है, आज निम्न-वर्गीय साहित्यिकों की भी ऐसी लंबी सूची बन चुकी है, जिनके साहित्य को कॉस्मोपोलिटन साहित्य कहा जा सकता है। सर्वदेशीय साहित्य या विश्व-साहित्य की अवधारणा ग़ैर-यूरोपीय देशों में प्रायः मार्क्सवादी विचारों के प्रचार-प्रसार के साथ ही पहुँचीं। विश्व की एकता पूंजीवादी-साम्राज्यवाद के पक्ष-विपक्ष में देखी जाने लगी। साम्यवादी घोषणापत्र को विश्व-साहित्य की पहली कृति कहा जाना अतिशयोक्ति नहीं है।

कम्युनिस्ट घोषणा पत्र का हिन्दी में अनुवाद क्रांतिकारी अयोध्या प्रसाद ने जेल में रहते हुए १९३३ में किया। उर्दू में इसके पहले घोषणापत्र के दो अध्याय मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के साप्ताहिक अल-हिलाल में १९२७ में प्रकाशित हुए थे, लेकिन उर्दू में इसका पूर्ण अनुवाद १९४६ में ही संभव हो सका। बोलियों में अब तक इसका अनुवाद उपलब्ध नहीं है। सर्वदेशीय साहित्य बाज़ार और अनुवाद-कला के विशेष विकास की माँग करता है। सामंतकाल में भी ऐसे बाज़ार थे, अनुवाद भी होते थे, तब भी विश्व-स्तर पर एक से बाज़ार नहीं थे, बग़दाद हो या बनारस, अमेरिका के अस्तित्त्व से भी विद्वान तब अपरिचित थे।

पूंजीवादी-साम्राज्यवाद के प्रसार के साथ ही ऐसे शहरों, बाज़ारों और साहित्य का आविर्भाव संभव हो सका, जिन्हें सर्वदेशीय कहा जा सके। तब भी आज स्थिति और बदल गई है। भारतेन्दु, महावीर प्रसाद द्विवेदी और प्रेमचंद के नाम पर आधुनिक साहित्य के युगों का नाम कर देने के बाद भी ये साहित्यिक सर्वदेशीय प्रवृत्ति के उचित परिचायक नहीं हैं। अकबर इलाहाबादी, इक़बाल, प्रेमचंद आदि का लेखन हिन्दी-उर्दू में सर्वदेशीय साहित्य का आधार बनाता है। सर्वदेशीय साहित्य के उत्पादन में १९४० का दशक विशेष महत्त्व रखता है। ब्रिटिश-शासन का विरोध, व्यंग्य और उपन्यास का लिखा जाना आधुनिकता के लक्षण हैं, तब भी आधुनिक जीवन-स्थितियों के विकास के बिना आधुनिक साहित्य अपने उत्कृष्ट रूप में प्रकट नहीं हो सकता था। हिन्दी क्षेत्र में यह स्थिति १९४० के दशक में ही बन पाई। प्रगतिशील-लेखक-संघ का उदय (१९३६, लखनऊ अधिवेशन) सर्वदेशीय-साहित्य के निर्माण की वास्तविक भूमिका बना। ‘तार-सप्तक’ (१९४२) का प्रकाशन हिन्दी-कविता में आधुनिकता का वास्तविक प्रवेश है। हिन्दी-क्षेत्र में प्रेमचंद पहले हैं जो निम्न-वर्गीय सर्वदेशीय-साहित्य के निर्माण की ओर बढ़ते हैं। उन्हें प्रगतिशील-लेखक-संघ के पहले अधिवेशन का अध्यक्ष बनाया जाना अचरज की बात नहीं है। उनका साहित्य उस समय के लेखकों के लिए भी प्रेरणा-स्रोत था। ‘महाजनी सभ्यता’ को, धर्म और जाति के नाम पर चल रहे अन्याय-अत्याचार को सामने रखने का साहस और किसमे था? तब भी यशपाल, भुवनेश्वर, मंटो और मुक्तिबोध जैसे साहित्यिक ही हिन्दी-उर्दू भाषा में कॉस्मोपोलिटन साहित्य के उत्कृष्ट उत्पादक कहे जा सकते हैं। इन सभी का साहित्य लगभग एक ही समय में सामने आने लगता है, तब भी रूप-संयोजन और भाव-विचार की विविधता बनी रहती है। राहुल सांकृत्यायन का साहित्य भी इसी समय तेज़ी से सामने आता है। भारत में मुंबई और कोलकाता प्रारम्भिक कॉस्मोपोलिटन हैं। हिन्दी-क्षेत्र में ऐसे शहर १९वीं सदी के अंतिम दशकों में उभरने लगे थे। इनके समुचित विकास के बाद ही हिन्दी क्षेत्र में सर्वदेशीय साहित्यिक तेज़ी से उभरते हैं। हिंदीयत का विश्व-साहित्य से पहला सही मुक़ाबला १९४० के दशक से शुरू होता है। हजारीप्रसाद द्विवेदी, रांगेय राघव, अज्ञेय, मज़ाज, फैज, फ़िराक़, शमशेर, इस्मत चुगताई, कृशनचंदर समवेत हिंदीयत की एक पहचान बनती जाती है। विश्व-साहित्य और हिंदीयत का निर्माण एक-दूसरे के पूरक हैं। विश्व-साहित्य और हिंदीयत की अवधारणा को आज के साहित्यिक के ध्यानार्थ सामने रखना ही इस पर्चे का उद्देश्य है। दुनिया भर में पूंजीवाद-साम्राज्यवाद के विस्तार के क्रम में विश्व-साहित्य का निर्माण हुआ है, हिन्दी में भी अभिजात्य-वर्गीय और निम्न-वर्गीय साहित्य-धाराएँ इसी विस्तार में स्पष्ट होती चली गई हैं। मंटो ने चचा सेम को तब ही ख़त लिख डाले थे। अफ़सोस, आज हिन्दी-उर्दू के साहित्यिक उन खतों को भूल गए।

हिन्दी का साहित्यिक विकट जीव है – उसे एक साथ हिन्दी-उर्दू-इंग्लिश और हिन्दी-क्षेत्र की बोलियों को साधना पड़ता है। यही अच्छा है कि अब संस्कृत और फ़ारसी का दबाव जाता रहा है। फिर भी हिन्दी के निम्न-वर्गीय साहित्यिक को बाज़ार में भी ठीक भाव नहीं मिल पाता। इतनी साधना, और फायदा कोड़ी का भी नहीं। तब भी निम्न-वर्गीय साहित्यिक का उत्पादन किसी को भी हैरान कर सकता है। अनगढ़ ही सही, उसकी मेहनत और आशा-उत्साह से इनकार नहीं किया जा सकता। आज ऐसे निम्न-वर्गीय साहित्यिकों की संख्या हज़ारों-लाखों में हैं, जो विश्व-साहित्य का हिस्सा बनते जा रहे हैं। पारंपरिक महत्व प्राप्त साहित्य को भी फिर से जाँचा जा रहा है। विभिन्न देशों और भाषाओं के साहित्य का ‘सामान्य सौन्दर्यशास्त्र’ निर्मित करने का प्रयास किया जा रहा है। विश्व-स्तर पर साहित्यिक रूपों – यथा उपन्यास, सिनेमा आदि – के उद्भव, विकास और प्रकार्य का अध्ययन किया जा रहा है। विश्व साहित्य समीक्षा मानवीय और साहित्यिक मूल्यों को विश्व-स्तर पर जाँचकर देखने की कोशिश करती है। आज ऐसे समीक्षकों की कमी नहीं है, जो कई देशों और भाषाओं के साहित्य के गंभीर अध्ययन का अपने लेखन में उपयोग करते हैं। हिन्दी-साहित्य-समीक्षा भी इस स्थिति से लाभान्वित हो रही है। साहित्य के आंतरिक-पठन के साथ ही बाह्य-पठन का संश्लेषण इन समीक्षकों की विशेषता है।

विनोद कुमार शुक्ल ने लिखा है कि ‘मैं छत्तीसगढ़ी में वैश्विक हूँ’। ठीक बात, लेकिन यह छत्तीसगढ़ के समाज और लोगों के आंतरिक विरोध को छुपाकर नहीं, उजागर कर ही हो सकता है कि कोई छत्तीसगढ़ी में ही वैश्विक हो जाए। निम्न-वर्ग का प्रश्न हर कवि से सीधा है – साहित्यिक ने निम्न-वर्ग के लिए क्या किया? एक उत्पादक के रूप में निम्न-वर्ग की मुक्ति के लिए वह सचेत सक्रिय प्रतिबद्धता कैसे प्रदर्शित करता है? करता भी है या नहीं? मुक्तिबोध कविता में पुछते हैं – ‘बताओ तो किस-किस के लिए तुम दौड़ गए?’ स्थानीयता देशज शब्दों या प्राचीन और सामंतकालीन कथा-रूपों के प्रयोग से नहीं, बल्कि स्थानीय राजनीति में सक्रिय सहयोग से उत्पन्न होती है। इसमें साहित्यिकों के अपने समूह हो सकते हैं, सहमतियाँ-असहमतियाँ हो सकती हैं, लेकिन राजनीति को समझे बिना स्थानीयता को समझना नामुमकिन है। क्या अचरज अगर आज हबीब जालिब और विद्रोही जैसे कवि हिन्दी-क्षेत्र में प्रसिद्धि पा रहे हैं। स्थानीयता का निर्माण विशेष सामाजिक-पारस्परिकता में होता है। आभिजात्य-वर्ग और निम्न-वर्ग के संघर्ष और संवाद में स्थानीयता जन्म लेती है। ब्रिटिश-साम्राज्यवाद के अंतर्गत हमारी ज़ंजीरें साफ़ दिखाई देती थी, सुनाई देती थी, छुई जा सकती थी – आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। आज साहित्यिक के जीवन-मूल्य भी उपभोक्तावाद, एकरंगी संस्कृति के प्रभाव में है। हिन्दी साहित्यिक प्रायः निम्न-वर्गीय पक्षधरता से दूर है। जन-अलगाव से ग्रसित है। उसके सामने साम्राज्यवाद का बदला रूप स्पष्ट नहीं है। आभिजात्य-वर्ग और निम्न-वर्ग का संघर्ष और संवाद नए स्तर पर पहुँच गया है। निम्न-वर्ग की साधना वैश्विक होने की है, आभिजात्य-वर्ग की स्थानीय होने की।

विश्व में दो ही साहित्यिक-वर्ग रहे हैं – पूँजीपति और सर्वहारा, मालिक और नौकर, आभिजात्य और निम्न-वर्ग। हिन्दी का साहित्यिक भी इसका अपवाद नहीं। हिंदीयत छत्तीसगढ़ी या देहलवी होने से अलग चीज़ है। हिंदीयत हैदराबाद और मुंबई का भी अंश है। लाहौर और इस्लामाबाद का भी। जयपुर और पटना का भी। जबकि इनमें से हर जगह की अपनी स्थानीयता है। बनारसी भोजपुरी होकर भी बनारसी है। साहित्य की विविधता और विस्तार से भयभीत, मुक्त-बाज़ार से बढ़ी रोज़गार की अनिश्चितता से शंकित हिन्दी-समीक्षक विश्व-साहित्य और हिंदीयत के संबंध को समझने में प्रायः असमर्थ है। वह स्थानीयता के नाम पर देशज शब्द या शहरी चालू फिकरे या जगहों के नाम ही समझ पाते हैं। स्थान की अपनी वैश्विक बनावट को समझने की ओर वे झुक ही नहीं पाते हैं।

हिंदीयत भारतीयता से भी अलग है, विशेष है। हिंदीयत हिन्दी, उर्दू, इंग्लिश और बोलियों के लोगों से मिलकर तैयार होती है तथा हिन्दी-क्षेत्र में सर्वदेशीय नगरों के निर्माण से पहले इसका आस्तित्त्व नहीं था। पूंजीवाद-साम्राज्यवाद के विरोध में हिंदीयत का भी निर्माण हुआ और सर्वदेशीय साहित्य का भी। विभिन्न विचारधाराओं और व्यक्तित्वों के संघर्ष में हिंदीयत की अवधारणा का निर्माण होता आ रहा है। उसके उद्भव, विकास और प्रकार्य को समझने का काम अभी अधूरा है। प्रारम्भ में हिंदीयत की अवधारणा भी बड़े शहरों से संबद्ध थी, आज वह छोटे शहरों, कस्बों और गाँव तक प्रसारित हो चुकी है। विभिन्न धर्मों, जातियों-जनजातियों, समुदायों के लोग, विभिन्न राजनैतिक और सामाजिक संगठन, आभिजात्य-वर्ग और निम्न-वर्ग मिलकर हिंदीयत का निर्माण करते हैं। विभिन्न विचारधाराओं के समीक्षकों ने हिंदीयत की अलग-अलग व्याख्या की है। कभी इसे भारतीय कहा गया, कभी देशज तो कभी स्थानीय। हिंदीयत एक बहु-संस्कृतिपूर्ण क्षेत्र-भावना है। आज का साहित्यिक और समीक्षक भी बदली हुई स्थितियों में भारतीय, देशज या स्थानीय होने का अर्थ खोज रहा है। हिंदीयत का नया रूप विश्व-साहित्य की पूर्णता में प्रकट होगा। हिंदीयत की पहचान बनने के लिए आभिजात्य-वर्ग और निम्न-वर्ग निरंतर संघर्षरत हैं। दोनों अपनी-अपनी तरह की हिंदीयत के हामी हैं।

२१वीं सदी का हिन्दी साहित्यिक विश्व-साहित्य के संपर्क में है, हिंदीयत की पहचान भी उसे है। लेकिन आज हिन्दी के दोनों संघर्षरत वर्गों के साहित्यिक अपने वर्गीय उपचेतन को प्रकट करने में, उसका निस्संकोच, साहसिकता से चित्रण करने में प्रायः असमर्थ हैं। उनके मन में शंका है, डर है। दोनों ही अपने उपचेतन में नहीं उतरना चाहते – जहाँ हिंसा-उन्माद-विकृति का कोहराम मचा है। निम्न-वर्ग की आर्थिक-स्थिति से उसके साहित्यिकों का विश्व-साहित्य के संपर्क में न आ पाना समझा जा सकता है, वह अभी भी इंटरनेट पर उपलब्ध साहित्य के संपर्क में नहीं है, उसकी जेब प्रायः खाली है, विश्व-साहित्य की उसकी समझ का अभी निर्माण होना है, पर आभिजात्य-वर्ग की समस्या कुछ और है – सुस्ती और निराशा, शंका और भय, बाह्याडंबर और वाक्जाल से लगाव आदि। इस संबंध में दलित-साहित्य ही उल्लेखनीय है, जहाँ भारतीय उप-महाद्वीप के निम्न-वर्ग के उपचेतन का सुंदर चित्रण हुआ है। हिन्दी-साहित्यिक भी इस कार्य में पीछे नहीं रहे हैं। आज भारत का दलित-साहित्य अपने निजी अनुभवों का प्रायः उपभोग कर चुका है। अब उसे निम्न-वर्ग के अन्य-अनुभवों से खुद का संबंध बनाना होगा, अन्यथा वह भी नीरस जीवन का अंश बनकर रह जाएगा। दलित-साहित्य में भी आभिजात्य-वर्गीय-प्रेरणाएँ प्रकट होती रही हैं, जो दलित-साहित्य-विरोधी है। निम्न-वर्गीय स्त्री-साहित्य की संख्या पर अभी मुझे शोध करने की आवश्यकता है।

नई सदी की स्त्री साहित्यिकों में साहस और विचारधारात्मक प्रतिबद्धता का विकास आशापूर्ण है। वास्तव में वर्ग-संघर्ष और वर्गीय चेतन और उपचेतन स्तरों के अंतर्संबंधों की पूर्णता को देख पाने में आज का हिन्दी साहित्यिक प्रायः असमर्थ है। हिंदीयत की खोज का प्रारम्भ आधुनिक धार्मिक आंदोलनकारियों की छत्र-छाया में हुआ था, उसकी हिंसक-धर्मवादी व्याख्याएँ नई नहीं हैं। फ़ासीवाद की प्रेरणा हिन्दी-साहित्यिकों में गहरी पैठ बना चुकी है। हिन्दी का अभिजात्य-वर्ग संस्कृति और सभ्यता का जानकार और रक्षक होने का दावा करता है, यह वर्ग हिंसक-धर्मवादी व्याख्याओं को निर्मित और प्रचारित करता आया है। मुक्तिबोध ‘दिमाग़ी गुहान्धकार का औरांग-ऊटांग’ कविता में इस वर्ग के उपचेतन में उतरते हैं, वे पुछते हैं – ‘किसके लिए हैं बाघ-नख ये?’। उत्तर साफ़ है – निम्न-वर्ग के लिए। आज हिन्दी के लोकप्रिय साहित्य और कला पर उपभोक्तावाद और उससे जन्मे हिंसक-धर्मवाद का प्रभाव और भी स्पष्ट है। इन व्याख्याओं और हिंसा-उन्माद की कार्यवाहियों के बीच हिंदीयत की निम्न-वर्गीय प्रेरणाएँ निरंतर कुचली जा रही हैं। निम्न-वर्ग के साहित्यिकों पर भी इन व्याख्याओं का दबाव और दमन तथा बहिष्कार का भय व्याप्त है। हिन्दी के निम्न-वर्गीय साहित्यिक की वर्ग-चेतस-सक्रियता से ही इस स्थिति में बदलाव आ सकता है। हिन्दी के निम्न-वर्गीय साहित्यिकों के लिए आज जरूरी है कि वे विश्व-साहित्य को, हिंदीयत को समझें, पूंजीवाद-साम्राज्यवाद के विरुद्ध एकजुट हों, अपने उपचेतन को समझें, निम्न-वर्गीय-एकजुटता बनाएँ, नए सौंदर्यशास्त्र का निर्माण करें और विश्व-साहित्य के निर्माण में सक्रिय सहयोग दें!
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उस्मान ख़ान समकालीन हिंदी साहित्य के अलहदा युवा कवि-कथाकार हैंचर्चाओं और पुरस्कारों की भीड़ से अलहदा… छपाऊ मानसिकता से भी अलहदा... जे.एन.यूके हिंदी विभाग से मालवा के लोकसाहित्य पर पीएचडीइनसे usmanjnu@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

 

 

गीता प्रेस के कैलेंडर जैसा है केदारजी का ‘बनारस’: कृष्ण कल्पित

छवियों से मोहग्रस्त कवि कब ख़ुद एक छवि बन जाता है और ‘पाठकों’ से भरा-पूरा रहने वाला हिंदी समाज कैसे ख़ुद मोहग्रस्त हो जाता है, यह हिंदी की एक समकालीन घटना है.

छवि-निर्माण के इस सायास-अनायास प्रयास को तोड़ने का यह पहला प्रयास हिंदी में (सुविधानुसार, अगर आप इसे तात्कालिक भी कहना चाहें तब भी) कृष्ण कल्पित के कारण संभव हुआ.

रामविलास शर्मा को ‘फ़ासिस्ट’ क़रार देने का जैसा संगठित प्रयास नामवर-नेतृत्व में ‘आलोचना’ द्वारा हुआ था. साहित्य संसार की उस समय की चुप्पी याद आती है, लेकिन केदारनाथ सिंह प्रसंग में आलोचना के कुछ बिंदुओं को उभारना भर कृष्ण कल्पित को कोप-भाजन का शिकार बना देता है.

केदार-संदर्भ में उन्होंने कोई नयी बात की है, ऐसा भी नहीं है, बल्कि उन्होंने तो हिंदी-बौद्धिकों का कान पकड़ उन्हें हिंदी-आलोचना की परंपरा की ओर मुखातिब करने का काम ही किया है.

कृष्ण कल्पित के हस्तक्षप दूरगामी होते हैं. पहले वह एक कंकड़ फेंकते हैं, हलचल होती है और फिर जाल सहित नदी में कूदते हैं. कृष्ण कल्पित को कभी नदी किनारे जाल सुखाते नहीं देखा गया है. वैसे भी रेगिस्तान के एक कवि को नदी मिल जाए और वह किनारे बैठे जाल सुखाएगा, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती.

केदारनाथ सिंह कृत ‘बनारस’ कविता पर कृष्ण कल्पित का यह लेख एक शोध-प्रस्ताव (synopsis) है, या कह सकते हैं कि abstract है. नयी समीक्षा और एफ़.आर. लीविस के स्क्रूटिनी ग्रुप की आलोचना को भी देखें तो वे शोध-प्रबंध नहीं होकर abstract लगते हैं, नामवर सिंह की कहानी-कविता आलोचना का एक बड़ा हिस्सा इसे दायरे का ही है.

कृष्ण कल्पित केदारनाथ सिंह की कविता के संदर्भ में ‘काव्य-बिम्ब की प्रासंगिकता और सार्थकता’ का सवाल उठा रहे हैं, यह सवाल भी नया नहीं है. नामवर सिंह ने कहीं लिखते हुए केदारनाथ सिंह के ‘सप्तक रूप’ को ऐसे याद करते हैं, “ बिम्बों की लड़ी देखकर लगता है कि यह चरखे से निकले सूत की तरह चाहे जितनी लम्बी हो सकती थी. इसका आकस्मिक अंत अनिवार्य नहीं, बल्कि सुविधाजन्य है… कविता में अंतर्निहित कोई तर्क नहीं, बल्कि और अधिक चमत्कारपूर्ण बिम्बों को ढूंढ़ने के प्रयास से उपराम ही प्रतीत होता है. यदि बिम्ब-विधायक वस्तुओं की प्रकृति का विश्लेषण करें तो वास्तविक और काल्पनिक, भयावह और प्रीतिकर गुण-धर्मों का अद्भुत संयोग दिखाई पड़ता है. निस्संदेह इसके अनागत के भय-आशा—मिश्रित रूप की व्यंजना होती है. किंतु यह मिश्रण इतना अनिश्चित और अस्पष्ट है कि अभीष्ट से अधिक अनायासलभ्य प्रतीत होता है. कहना न होगा कि ये बिम्बधर्मी असंगतियां कविता के मूल कथ्य की असंगतियां हैं, जो अंततः कवि-कर्म की कमजोरी प्रकट करती हैं.”

नामवर तो शुरुआती केदार के बारे में ऐसी बातें कह रहे थे, लेकिन कृष्ण कल्पित इसे केदार के समूचे काव्य-व्यक्तित्व की सच्चाई मानते हैं.

दुःख है कि जो काम हिंदी-आलोचना और आलोचकों का है, वह भार भी एक कवि ढो रहा है. और यह मानने में शायद ही गुरेज होना चाहिए कि कृष्ण कल्पित का यह abstract ‘बनारस’ के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण प्रस्थान साबित होगा. #तिरछी spelling 

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Photo By Marcin Ryczek

केदार जी का बनारस: अर्धक अस्ति अर्धक नास्ति

By कृष्ण कल्पित

केदारनाथ सिंह की कविता बनारस  रिपोर्ताज़ (Riportage) शैली में लिखी गई कविता है, जो मोहक बिम्बों (Romantic imagery) से लदी हुई है।

फ़ारसी के महाकवि हाफ़िज़ का कहना था कि जब भी रेगिस्तान पर लिखो तो इस बात का ध्यान रहे कि उसमें ऊँट न आये। अगर केदारजी की ‘बनारस’ कविता को रेगिस्तान समझा जाये तो यहाँ ऊँट ही ऊँट नज़र आते हैं।

बनारस के जितने भी प्रतीक हैं, वे यहाँ अपनी पूरी सज-धज के साथ मौज़ूद हैं – जल, नाव, घाट, शँख, गंगा, शव, खाली कटोरा, सूर्य, अर्घ्य, मडुआडीह इत्यादि। केदारजी इस कविता में आज के बनारस को नहीं बल्कि कालातीत बनारस की खोज करते हैं।

एक बार केदारजी अमेरिका में कविता-पाठ के लिए गये तो उन्होंने बनारस  कविता का पाठ किया। यह कविता सुनकर एक वृद्ध महिला रोने लगी। इस घटना का केदारजी के शिष्य किसी चमत्कार की तरह वर्णन करते हैं। जैसे कि मंगलेश डबराल अपने एक साक्षात्कार में इस बात की पुष्टि करते हैं कि उनकी कविता पढ़कर गुजरात के किसी व्यक्ति ने आत्महत्या का इरादा बदल लिया।

यह सही है कि भारतदेश में किसी चमत्कार के बिना किसी को बड़ा कवि नहीं समझा जाता। मध्यकाल के सभी बड़े कवियों के साथ किसी न किसी चमत्कार की कथा जुड़ी हुई है। लेकिन इस घटना के बारे में ख़ुद केदारजी ने लिखा है कि मैंने तो सिर्फ़ शीर्षक ही पढ़ा था – बनारस – कि वह बुज़ुर्ग महिला रोने लगी। ज़ाहिर है कि वह महिला कविता सुनकर नहीं बल्कि बनारस शहर की प्राचीनता, रहस्यमयता और आध्यात्मिकता को याद करके रोने लगी थी।

बनारस  कविता का उत्कर्ष (Climax) यह है कि यह आधा जल में है, आधा मंत्र में है और आधा है और आधा नहीं। क्या ये पंक्तियां आपको किसी संस्कृत श्लोक का भावानुवाद नहीं लगतीं? यह भी सम्भव है कि यह मंत्र ख़ुद केदारजी ने रचा हो क्योंकि बिना किसी श्लोक के बनारस पर विश्वसनीय कविता लिखना असम्भव है।

बनारस एक रहस्यमय नगर है। पुराने से भी पुराना। दो पुराने से भी पुराना। इसकी प्राचीनता और रहस्यमयता प्राचीनकाल से आज तक रचनाकारों के लिये आकर्षण का केंद्र रही है। मिर्ज़ा ग़ालिब भी इस आकर्षण से बच नहीं सके, जो इसे आदि से अंत तक मस्त-मलंगों की राजधानी कहते हैं।

आधुनिक हिंदी साहित्य में बनारस को लेकर जिन उल्लेखनीय रचनाओं का सृजन हुआ है उनमें शिवप्रसाद मिश्र ‘रुद्र’ की ‘बहती गंगा’, जयशंकर प्रसाद की कहानी ‘गुंडा’, शिवप्रसाद सिंह की उपन्यास त्रयी, जिसमें सिर्फ़ ‘गली आगे मुड़ती है’ ही पठनीय है। काशीनाथ सिंह का बहुचर्चित उपन्यास या रिपोर्ताज़ ‘काशी का अस्सी’, जहाँ भदेस ही कथ्य है। इन तमाम गद्य कृतियों में रुद्र काशिकेय की ‘बहती गंगा’ सर्वश्रेष्ठ है – एक मॉडर्न क्लासिक।

आधुनिक हिंदी कविता में धूमिल के यहाँ बनारस के चमकते हुये घाट दिखाई पड़ते हैं, जहाँ स्त्रियाँ योनि की सफलता के बाद गीत गा रही हैं। ज्ञानेन्द्रपति भी पिछले तीस बरसों से अपनी कविताओं में बनारस की अक्कासी कर रहे हैं। ज्ञानेन्द्रपति प्राचीन बनारस की तरफ़ देखते भी नहीं। वे पटना क़लम के कलाकार की तरह साधारण मनुष्यों और बनारस के जनजीवन के चित्र उकेर रहे हैं। केदारजी की संस्तुति पर जब ज्ञानरंजन ने ज्ञानेन्द्रपति को ‘पहल’ सम्मान देते हुये कहा था – अभी ज्ञानेन्द्रपति बनारस में और धँसेंगे। देखिये!

बनारस पर केदारजी की सिर्फ़ यही एक कविता है, जो श्लोकों, प्रतीकों, बिंबों और मिथकों से जड़ित है। इस कविता में कोई आंतरिक प्रवाह नहीं है, कोई दीर्घ-आलाप नहीं। यहाँ सब कुछ जड़ित है। ‘बनारस’ कविता में केदारजी कवि कम और एक कुशल शिल्पी दिखाई पड़ते हैं।

बनारस  की तरह केदारजी की कविता में केवल एक मुसलमान है – नूर मियाँ। नूर मियाँ केदारजी का सिकन्दर बख़्त है।

बनारस जैसे प्राचीन नगर से टकराकर आधुनिक हिंदी कविता में कोई बड़ी रचना सम्भव हुई है तो वह श्रीकांत वर्मा की ‘मगध’ है। सुनते हैं कि ‘मगध’ की रचना से पूर्व श्रीकांत वर्मा तीन महीनों तक अपनी पहचान छुपाकर बनारस की गलियों में भटकते रहे थे। ‘मगध’ निसन्देह एक क्लासिक रचना है जहाँ प्राचीन जनपदों, नगरों, प्रतीकों के जरिये आधुनिक सभ्यता के हाहाकार को बहुत मार्मिक ढंग से व्यक्त किया गया है।

इसके बरक्स केदारजी का बनारस  कालातीत बनारस है, जो शताब्दियों से अपनी एक टांग पर खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य दे रहा है। केदारजी लगता है बनारस पर कविता नहीं लिख रहे बल्कि कोई पेंटिंग बना रहे हैं और इस चक्कर में वे इतनी सारी चीज़ें कैनवास पर अंकित कर देते हैं कि उसका प्रभाव बिखर जाता है।

कोई करुणा, कोई वेदना, कोई विडम्बना, कोई केंद्रीय कथ्य ‘बनारस’ कविता में नज़र नहीं आता।

न यह सत्यजित रे का बनारस है, न मक़बूल फ़िदा हुसेन का, न रामकुमार का, न एलन गिन्सबर्ग का। यह केदारजी का बनारस है – गीता प्रेस गोरखपुर के यथार्थवादी कैलेंडर जैसा।

इस कविता की शुरुआत में जब मडुआडीह की तरफ़ से बनारस की तरफ़ जो धूल का जो बवंडर आता है और बनारस कंठ किरकिराने लगता है तो पाठक की आशा जगती है लेकिन अंत तक आते-आते शताब्दियों से एक टांग पर खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देता बनारस कविता को मटियामेट कर देता है ।

केदारजी कहते हैं कि बनारस में सब कुछ धीरे-धीरे होता है। मुझे लगता है कि धीरे-धीरे केदारजी के इस अति प्रशंसित (Over rated) आधुनिक शाहकार को भुला दिया जायेगा!

यह ऐसा ही है कि पेरिस पर लिखी कविता का अंत एफिल टॉवर से किया जाये । किसी शहर पर कैसे कविता लिखी जाती है वह हम फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की पेरिस पर लिखी कविता पढ़कर जान सकते हैं ।

बनारस  कविता केदारजी की बाघ सीरीज़ की तरह महत्वाकांक्षी पर असफल कविता है ।

 

कृष्ण कल्पित

अपने तरह का अकेला-बेबाक और विवादित कवि । कृष्ण कल्पित का जन्म 30 अक्टूबर, 1957 को रेगिस्तान के एक कस्बे फतेहपुर शेखावटी में हुआ। अब तक कविता की तीन किताबें और मीडिया पर समीक्षा की एक किताब छप चुकी है। एक शराबी की सूक्तियां  के लिए खासे चर्चित। ऋत्विक घटक के जीवन पर एक पेड की कहानी नाम से एक वृत्तचित्र भी बना चुके हैं।  अभी  हाल ही में बाग़-ए-बेदिल नाम से  एक विलक्षण  और विशाल  काव्य-संकलन  के साथ-साथ ‘कविता-रहस्य ‘ नामक पुस्तक प्रकाशित । 

एक साम्यवादी के साहित्यिक पर्चे: उस्मान ख़ान

कथा-साहित्य के एक विधा के रूप में ‘व्यंग्य’ को व्याख्यायित करने का पहला गंभीर प्रयास हिंदी में सुरेंद्र चौधरी द्वारा संपन्न हुआ है. वे व्यंग्य को ‘आत्मतंत्र-स्वतंत्र’ विधा के रूप में चिन्हित करते हैं. चौधरी जी मानना है कि व्यंग्य के लिए माकूल संयोजन सर्वप्रथम मध्यवर्गीय जीवन और दूसरी, संक्रमणशील परिस्थितियाँ  द्वारा संपन्न होता है. वे कहते हैं, “मध्यवर्ग की जीवनदृष्टि में जो समझौता परस्ती है वह व्यंग्य के लिए गुंजाइश पैदा कर देती है. व्यापक रूप से मध्यवर्ग का जीवन ही व्यंग्य का विषय रहा है.” संक्रमणशील परिस्थितियाँ यही है कि पुराना युग ख़त्म हो रहा है, नया युग आ रहा है। पारंपरिक और रूढ़िवादी मान्यताएँ टूट रही हैं और आधुनिक जीवन शैली आ रही है। धार्मिक जीवन मूल्यों का  ह्रास और सेक्युलर जीवन-मूल्यों की संभावना का उभार आदि संक्रमणशील परिस्थितियों के कुछ उदाहरण हैं। लेकिन, पुराने और नए में टकराहट, सामंजस्य और नहीं तो एक अजीब तरह की खिचड़ी, सामने नज़र  आती है। सुरेंद्र चौधरी इसी ‘खिचड़ी’ का एक उदाहरण प्रेमचंद की कहानी ‘आँसुओं की होली’ से देते हैं- ” बेचारे  सिलबिल सचमुच सिलबिल थे। दफ्रतर जा रहे हैं, मगर पायजामे का इजारबंद नीचे लटक रहा है, सिर पर पफेल्ट कैप है मगर लंबी-सी चुटिया पीछे झाँक रही हैं…।” 

व्यंग्य पर विचार करते हुए जो चीज़ परेशान कर रही है, वह है समकालीन कहानियों से व्यंग्य की भंगिमा का ही गायब हो जाना। सुरेंद्र चौधरी ने  था – “मात्र चमत्कारिक और आश्चर्य प्रदान करने के झटके व्यंग्य की कोटि में आज नहीं आ सकते। दूसरी चीज़ यह है कि आज हमने बहुत हद तक अंतर्विरोधों से समझौता कर लिया है और मानने लगे हैं कि मानव-जीवन में अंतर्विरोध कोई पाप नहीं है। यदि कोई इस अंतर्विरोध को अपने व्यक्तित्व का संप्रसार; (व्हिट्मैन  – आई एम वास्ट, आई कंटेन मल्टिट्यूड्स) मान लेता है तो फिर उस पर व्यंग्य करने का प्रश्न ही कहाँ उठता है।”

फ़िलहाल परसाई, व्यंग्य और लेखकों के राजनीतिक कार्यभार से संबंधित उस्मान खान का यह लेख पढ़ें! #तिरछीspelling 

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‘आवारा भीड़ के ख़तरे’ और संकट की निरंतरता

By उस्मान खान 

अधिकांश आधुनिक सामाजिक क्रांतियों में साहित्यिक नेतृत्वकारी भूमिका में रहे हैं। आज भी ऐसे साहित्यिक हैं, जो समाज की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। मशीनों और तकनीक के उत्तरोत्तर विकास, मुनाफ़े की अंधी दौड़ और अतिउत्पादन ने साहित्य और साहित्यिक का समाजीकरण किया। आज हर कोई कवि है, लेखक है। साहित्य का ऐसा उत्पात भारत में कभी नहीं हुआ था। इन बदलावों ने साहित्य के समाज का विस्तार तो किया ही, साथ ही उसकी प्राचीनकाल से बनी रही पवित्रता को भी नष्ट कर दिया। सामंतकालिन भारत में साहित्य मनोरंजन का साधन था, शिक्षा का माध्यम था, साथ ही साथ पवित्र भी। उपनिवेशी-पूंजीवाद के मजबूत होने के साथ भारत में साहित्यिक की स्थिति में बदलाव हुआ। वे राजनीति में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने लगे। इस प्रक्रिया में नए ढंग का साहित्य निर्मित होने लगा। उपन्यास जैसी पूंजीवादी युग में जन्मी विधा ने हिन्दी-साहित्यिकों को भी अपने प्रभाव में ले लिया।

हिन्दी-साहित्य के इतिहास में सामंतकाल में भी साहित्यिकों और राजनीति के अंतर्संबंध देखे जा सकते हैं, लेकिन पूंजीवादी युग के प्रारम्भ के साथ ही नई राजनीति का भी जन्म होता है, यह लोकतन्त्र की राजनीति थी, इसीने दक्षिणपंथ और वामपंथ जैसी आधुनिक राजनैतिक धाराओं का विकास किया। हिन्दी के साहित्यिक भी इन दो खेमों में बंटते चले गए।

यहाँ यह नहीं भूलना चाहिए कि राजनीति कला के तीनों स्तरों – शास्त्रीय, लोकप्रिय और लोक – पर अपना असर डालती है। साहित्य के भी तीनों स्तरों पर राजनीति ने अपना प्रभाव डाला है। पूंजीवादी युग का साहित्य राजनीति को समझे बिना नहीं समझा जा सकता। राजनीति पूंजीवादी युग के साहित्य का प्रमुख संदर्भ है। प्रेमचंद इस संदर्भ को समझते थे, साथ ही साहित्य का मूल्य उनके लिए राजनीति की दिशा तय करने में था। साहित्य पर ऐसा विश्वास कम लोगों का होता है।

हरीशंकर परसाई प्रेमचंद और वामपंथ की परंपरा के साहित्यिक हैं। वे राजनीति को साहित्य के लिए अपवित्र क्षेत्र नहीं मानते। और उनके साहित्य पर प्रमुख आक्षेप भी यही है कि वे राजनीति के संदर्भ का अत्यधिक प्रयोग करते हैं, इसी कारण वे तात्कालिक लेखन करते हैं, उनका लेखन कालजयी नहीं है। बल्कि वे साहित्यिक ही नहीं हैं। वास्तव में, कुछ समीक्षक साहित्य के अनंत क्षेत्र-विस्तार से डरते हैं। वे यह नहीं मान पाते कि साहित्य निरंतर अपना क्षेत्र-विस्तार करता जाता है। यही साहित्य का स्वभाव है। क्या कबीर को कवि मानने में समीक्षक लंबे समय तक बाधा नहीं बनते रहे?

पूंजीवादी युग ने साहित्य के क्षेत्र-विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इंटरनेट-मोबाईल, रोबोट और अत्यधिक भारी मशीनें, बुलेट-ट्रेन और पॉर्न… साहित्य अपना क्षेत्र-विस्तार करता जा रहा है। इसे स्वीकार ना करना ख़ुद को धोखा देना है।

व्यंग्य एक विधा की तरह पूंजीवादी युग में ही विकसित हुआ। कविता, निबंध, लेख, कथा, उपन्यास आदि विधाओं से अंतर्संबंध स्थापित कर व्यंग्य विधा विकसित होती रही है। हिन्दी-साहित्य में व्यंग्य विधा के प्रमुख निर्माताओं में हरीशंकर परसाई का नाम लिया जाता है, यह निश्चित ही उन समीक्षकों के कारण नहीं, जो परसाई को लेखक ही नहीं मानते। परसाई ने उन समीक्षकों की उपेक्षा कर बुरा नहीं किया।

व्यंग्य-विधा के विकास में राजनीति की भूमिका और भी स्पष्ट हो जाती है। व्यंग्य का प्रधान विषय अफसरशाही, भ्रष्टाचार और बाह्याडंबर रहे हैं। आश्चर्य है कि स्वस्थ हास्य-व्यंग्यकारों ने वामपंथी धारा को ही मज़बूत किया। दक्षिणपंथी राजनीति के पैरोकार हास्य-व्यंग्य से परहेज़ करते हैं। परसाई ने ‘वनमानुष नहीं हँसता’ में इस ओर संकेत किया है। इस संग्रह में अक्तूबर १९८८ से नवंबर १९९४ तक की रचनाएँ शामिल हैं। १० अगस्त १९९५ को उनकी मृत्यु हो गई। इस संग्रह में शामिल रचनाएँ उनकी प्रौढ़तम रचनाएँ हैं।

इस संग्रह के लेखों के लिखे जाने का समय भारत में आर्थिक नीतियों, सामाजिक-सम्बन्धों और राजनीति के क्षेत्र में तेज़ बदलावों का समय था। इसे संक्रमण-काल कहा जा सकता है। इसने वर्तमान भारत के निर्माण को निश्चित किया। भारतीय समाज और साहित्य में तब से अब तक निरंतर बने रहने वाले संकट को परसाई ने अपनी इन रचनाओं में विश्लेषित करने की कोशिश की है। सभ्यता का संकट सदी या साल देखकर शुरू नहीं होता। वर्तमान साहित्य के संकट की जड़ें इसी संक्रमण-काल में हैं।

संग्रह का पहला लेख ‘आवारा भीड़ के ख़तरे’ है, इसे संग्रह का सबसे उत्तेजक लेख कहा जा सकता है। यह लेख यूँ शुरू होता है – “एक अंतरंग गोष्ठी-सी हो रही थी युवा असंतोष पर। इलाहाबाद के लक्ष्मीकांत वर्मा ने बताया – पिछली दीपावली पर एक साड़ी की दुकान पर काँच के केस में सुंदर साड़ी से सजी एक सुंदर मॉडल खड़ी थी। एक युवक ने एकाएक पत्थर उठाकर उस पर दे मारा। काँच टूट गया। आसपास के लोगों ने पूछा कि तुमने ऐसा क्यूँ किया? उसने तमतमाए चेहरे से जवाब दिया – हरामजादी बहुत खूबसूरत है।

हम ४-५ लेखक चर्चा करते रहे कि लड़के के इस कृत्य का क्या कारण है? क्या अर्थ है? यह कैसी मानसिकता है? यह मानसिकता क्यों बनी? बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में ये सवाल दुनिया भर में युवाओं के बारे में उठ रहे हैं – पश्चिम के सम्पन्न देशों में भी और तीसरी दुनिया के गरीब देशों में भी।

“क्या यही मानसिकता आज हत्या और बलात्कार के विडियो बनाने तक नहीं ले आई है? परसाई इसके लिए युवाओं को दोष नहीं देते, उनके अनुसार बड़े-बूढ़ों की कथनी-करनी में अंतर देखकर युवा भ्रमित होते हैं, निराश होते हैं, और इस तरह के कदम उठाते हैं। पूंजीवादी सभ्यता के विस्तार और प्रभाव को युवाओं के संदर्भ में समझने का प्रयास करते हुए वे पिता, गुरु, समाज के नेता और फासीवाद के अंतर्संबंधों को भी स्पष्ट करते जाते हैं। वे इसे युवाओं में आस्था का संकट भी कहते हैं क्यूंकी “सब बड़े उनके सामने नंगे हैं।“

यह लेख एक अपील की तरह है। समाज और राजनीति के विद्रुप को उजागर करते हुए परसाई युवाओं से विचारधारा, संकल्पशीलता, सकारात्मक उत्साह, संगठित संघर्ष की आशा करते हैं। साथ ही वे यह तथ्य भी दर्शा देते हैं – “पर मैं देख रहा हूँ, एक नई पीढ़ी अपने से ऊपर की पीढ़ी से अधिक जड़ और दक़ियानूसी हो गई है।“ युवाओं की हताश-नकारवादी स्थिति का प्रमुख कारण बेरोज़गारी है। ये बेरोज़गार युवा धार्मिक उन्मादियों के पीछे चलने लगते हैं। फासीवादी राज्य के निर्माण की प्रबल शक्ति ये बेरोज़गार हैं।

अब आप सोचिए कि बढ़ता हुआ शहर है, शहर में बाज़ार है, बाज़ार में भीड़ है, भीड़ में साहित्यिक भी है, वह एक व्यक्ति को खुले में पेशाब करने से रोकता है, वह व्यक्ति साहित्यिक की पिटाई कर देता है। उस व्यक्ति ने साहित्यिक की पिटाई क्यूँ की? वह चाहता तो अपने इस काम पर शर्मिंदा हो सकता था, चाहता तो आगे ऐसा न करने की बात कह सकता था, चाहता तो कह सकता था, ‘अपना काम देखो भाईसाब!’। मैं कहता हूँ, अगर कवि में लड़ने की क्षमता नहीं थी, तो कवि विरोध करने क्यूँ गया? हमारा कवि सिर्फ बातों से क्यूँ लड़ना चाहता है, हाथों से क्यूँ नहीं? यह २०१७ की घटना है। परसाई की बताई घटना और हमारी बताई घटना के बीच हिंसा-उन्माद की हज़ारों नहीं लाखों घटनाएँ भारत में घट चुकी हैं। क्या संक्रमण-काल इतना लंबा होता है?

हिन्दी का साहित्यिक भारत-विभाजन के समय भड़की सांप्रदायिक-हिंसा और फ़साद में लगभग उदासीन बना रहा था, लेकिन ८० के दशक में शुरू हुए जाति-धर्म आधारित मानव-संहारों से वह उदासीन नहीं रह सका। उसने सभ्यता के संकट को, मानव-गरीमा को नए सिरे से पहचानना शुरू किया। इसका प्रारम्भ आवारा भीड़ के ख़तरे पहचानने से हुआ। यह भीड़ किसी तानाशाही शक्ति से सम्मोहित होती है। अंध-विश्वास इस भीड़ की विचारधारा है। यह भीड़ लोकतांत्रिक और वैज्ञानिक मूल्यों के विध्वंस से जन्म लेती है। तानाशाह एक ऐसा व्यक्ति दिखाई देता है, जो जादूगर है, वह छड़ी घुमाएगा और सारी समस्याएँ हल हो जाएँगी। वह ईश्वर है, ईश्वर का वारिस है, भीड़ में पैदा किए गए काल्पनिक भय का भंजक, अतीत के आभासी अपमानों का बदला लेने वाला – सर्वाधिक हिंसक।

दक्षिणपंथ और वामपंथ के अपने-अपने मूल्य हैं। जहाँ दक्षिणपंथ तानाशाही और अंध-विश्वास को अपना जीवन-मूल्य मानता है, वहीं वामपंथ लोकतन्त्र और विज्ञान को। जिस समय परसाई ये लेख लिख रहे थे, वामपंथ कमज़ोर होता जा रहा था और दक्षिणपंथ मज़बूत। दुनिया-भर में समाजवाद के अंत की बात की जा रही थी। वैज्ञानिक सोच पर प्रश्न-चिन्ह लगाए जा रहे थे। इतिहास का अंत, विचारधारा का अंत, कला का अंत आदि धारनाएँ प्रचलित हो चली थी। लेनिनवाद, सामाजिक-जनतंत्र, कल्याणकारी राज्य आदि के संकट की चर्चाएँ होने लगी थीं। इस स्थिति को अमेरिका और यूरोप के बौद्धिकों ने उत्तर-आधुनिकता कहा, इसे फ़्रेडरिक जेमसन ने ‘प्रौढ़ पूंजीवाद का सांस्कृतिक तर्क’ कहा। अमेरिका और यूरोप में इसकी शुरुआत ५०वें और ६०वें दशक से मानी जाती है, पर इस स्थिति के प्रभावी होने का समय ८० और ९० का दशक है। भारत में ९० के दशक में इस स्थिति के साथ ही उत्तर-उपनिवेश, अस्मितावाद-समुदायवाद, निम्न-वर्गीय इतिहास आदि धारनाएँ भी प्रचलित होने लगी थी। हिन्दी का साहित्यिक इन संकटों और धारणाओं के मध्य लिख रहा था।

भारत में इन संकटों का समाधान दक्षिणपंथी जीवन-मूल्यों के हावी होने के साथ हुआ। भारत पूंजीवादी विकास की नई मंज़िल पर पहुँच गया। परसाई इंटरनेट-मोबाइल का ज़माना नहीं देख सके, लेकिन टेलीविज़न, मीडिया आदि के बढ़ते प्रभाव को वे देख पा रहे थे। उन्होने लिखा, ‘टेलीविज़न का निजी यथार्थ होता है’। आज हम ‘ब्लू-व्हेल’ जैसे खेलों से परिचित हैं। आभासी दुनिया और वास्तविक दुनिया में अंतर समाप्त होता जा रहा है। कृत्रिम बुद्धि, क्लोन और रोबोट समाज को एक नई मंज़िल पर ले जाने के लिए खड़े हैं। परसाई तकनीकी विकास के विरोधी नहीं हैं। उन्हें टेलीविज़न से शिकायत है, क्यूंकी कोलाहल बढ़ता है। हमें मीडिया से शिकायत है, क्यूंकी वह झूठ और अफ़वाह का कारोबार करती है। दक्षिणपंथ के पौधे के लिए झूठ और अफ़वाह खाद और पानी की तरह है।

सोवियत समाजवाद के बिखरने के साथ ही संकटों का यह नया दौर शुरू होता है। साहित्य और साहित्यिकों के लिए इन स्थितियों ने नए संकट पैदा किए। आज साहित्य का मूल्य और साहित्यिक की प्रतिबद्धता प्रकाशन-व्यापार पर आश्रित है, न कि जनता की पसंद-नापसंद पर। कला के अन्य क्षेत्रों में भी यही स्थिति देखी जा सकती है। परसाई जैसे लेखक जो जनता के भरोसे लिखते थे, लगातार कम होते चले गए। जैसे परसाई के साथ हिन्दी का व्यंग्य-लेखन शुरू हुआ, वैसे ही परसाई के साथ ख़तम भी हो गया। हिन्दी में व्यंग्यकार कम ही हुए। हास्य-व्यंग्य को प्रायः निचले दर्जे की रचना माना जाता है। आमतौर पर गंभीर आलोचक ऐसी रचनाओं की उपेक्षा करते हैं। वास्तव में हास्य-व्यंग्य साहित्य की सर्वाधिक कठिन विधा है। यही कारण है कि हिन्दी में ही नहीं, दुनिया भर में हास्य-व्यंग्य की रचना कम ही हुई है। शास्त्रीय साहित्य गंभीरता की माँग करता है, वह उदात्त को साहित्य मानता है। लोकप्रिय साहित्य इस क्षेत्र में आगे है। विकृति या भोंडापन वहाँ हो सकता है, लेकिन हँसने की क्षमता को बचाए रखने की कोशिश वहीं दिखाई देती है।

शिक्षा और आनंद का संतुलन साहित्य का चरित्र है। वास्तव में, परसाई की इन रचनाओं का समाज और आज का समाज भी शिक्षात्मक मनोरंजन के अभाव से ग्रसित है। अनिश्चित भविष्य और मानसिक-विकृतियाँ गूँथी हुई हैं। हास्य-व्यंग्य का अभाव समाज की बीमारी का लक्षण है। हिन्दी का साहित्यिक समाज भी बीमार है। वह भी लोकतन्त्र और विज्ञान का शत्रु है।

कुछ दिनों पहले त्रिपुरा में लेनिन की मूर्ति गिराए जाने के साथ ही भारत में भी लेनिनवाद का संकट और तीखे रूप में सामने आ गया। वास्तव में ८० और ९० के दशक के साहित्य का मुख्य संकट भी लेनिनवाद ही था। दुख की बात यह है कि लेनिनवाद के समर्थक भी नई स्थितियों में लेनिनवाद को देखने से भय खाते हैं। वे संकट को बनाए रखना चाहते हैं। हरीशंकर परसाई इस समस्या का हल ‘अध्यात्म’, ‘धर्म’, ‘मानवता’, ‘आत्मा’ आदि की वामपंथी पुनःव्याख्या करने में समझते हैं। लेनिनवाद का संकट उनके सामने स्पष्ट नहीं था। यद्यपि भारत के वामपंथी-आंदोलन में यह संकट ६० के दशक में ही स्पष्ट हो गया था।

सोवियत रूस में धार्मिक-पुनरुत्थान ने उनके मन में संशय पैदा कर दिया था, भारत में हिंसात्मक-धर्मवाद की स्थापना होते वे देख रहे थे। ऐसी स्थिति में उनका मुख्य ध्यान धर्म में उपस्थित मानवता की ओर जाना अचरज की बात नहीं थी। यूँ भी उग्र-वामपंथ के समर्थक वे कभी नहीं रहे थे। लेकिन इस संग्रह में उनकी उग्रता भी देखने योग्य है। उनका संशय और उग्रता से ग्रसित मस्तिष्क व्यंग्य के माध्यम से अपनी ही स्थिति पर रोता है। त्रासदी व्यंग्यात्मक होती है और व्यंग्य भी कभी त्रासदी बन जाता है। ‘आवारा भीड़ के ख़तरे’ भारत में लोकतन्त्र और समाजवाद की त्रासदी है, पर व्यंग्य का भेस धारण किए हुए।

इस संग्रह को आज पढ़ते हुए लगता है कि लेनिनवाद के संकट का समाधान किए बिना आज के वामपंथी-साहित्यिक की मुक्ति भी संभव नहीं। लेनिनवाद का संकट ऊपर बताए संकटों से स्वतंत्र नहीं है। उपभोक्तावाद, उत्तर-आधुनिकतावाद, अस्मितावाद, समुदायवाद, फासीवाद, लोकतन्त्र और समाजवाद इन सभी से लेनिनवाद जुड़ा हुआ है।

साहित्य के इस लेनिनवादी संकट का समाधान दक्षिण-अमेरिका के कुछ साहित्यिकों ने प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। आज हिन्दी के साहित्यिकों के बीच भी इन नए समाधानों पर चर्चा है। दक्षिण-अमेरिकी साहित्यिकों का अनुवाद हो रहा है। उन्हें पसंद किया जा रहा है। एक नई दुनिया और नए मनुष्य के निर्माण के लिए प्रतिबद्ध दक्षिण-अमेरिका के साहित्यिक हिन्दी-साहित्यिकों के लिए भी आदर्श बन रहे हैं। गरीब और पिछड़े देशों के इन साहित्यकारों ने हिन्दी-साहित्यिकों के सामने नए सिद्धान्त और जीवन जीने का ढंग प्रस्तुत किया है। परसाई की मृत्यु होने तक हिन्दी के साहित्यिक के लिए विकल्प का यह पक्ष इतना स्पष्ट नहीं था। परसाई के संशय और साधारण समाधान सुझाने से भी पता चलता है कि सोवियत समाजवाद कितने लंबे समय तक भारत की वामपंथी धारा पर हावी रहा था। पूंजीवाद-विरोधी सामाजिक-शक्तियों की पहचान, संगठन के नए तरीके, मीडिया का अपने पक्ष में इस्तेमाल, राजनीति के निर्णयों में जन-भागीदारी की उपेक्षा ने भारत में वामपंथी धारा को पुनः मज़बूत होने से रोका हुआ है। दक्षिण-अमेरिकी साहित्यिकों ने स्थानीयता के महत्त्व को, साम्राज्यवाद-विरोध को कभी कमज़ोर नहीं होने दिया। हिन्दी का साहित्यिक इस मामले में कमज़ोर निकला। हिन्दी-साहित्यिक की यूरोप-केन्द्रित मानसिकता आज भी उसे नए को अपनाने से रोके हुए है। भारत के वामपंथियों को रूस और चीन की क्रांति और प्रतिक्रांति से सबक लेना चाहिए, साथ ही दक्षिण-अमेरिका या अफ्रीका या अन्य किसी भी जगह के आंदोलनों और क्रांतियों को अपने विशेष संदर्भ में जाँच-परख कर ही व्याख्या करनी चाहिए, और आवश्यकता होने पर अपनाने से भी नहीं हिचकना चाहिए, वर्ना लेनिनवाद का संकट बना रहेगा। लेनिन स्वयं क्रांति करने का कोई फॉर्मूला नहीं बताते। उनके लेखन में रूस की विशेष स्थिति सर्वत्र दिखाई देती है। मार्क्सवाद के सामान्य क्रांतिकारी सिद्धांतों को वे रूस में सामाजिक परिवर्तन के लिए उपयोगी बनाते हैं। भारत के वामपंथी प्रायः इस संघर्ष में नहीं पड़ना चाहते। मार्क्स, लेनिन, माओ, चे, शावेज़ – वे अपनी हार का ठीकरा दूसरे के सर फोड़ना चाहते हैं। वामपंथी नेतृत्व विश्लेषण करने और योजना बनाने में असमर्थ है। उन्हें फॉर्मूला चाहिए। और इसी कारण वामपंथी संगठन क्षीण से क्षीणतर होते जा रहे हैं। परसाई ने जिस संकट को पाठकों के सामने रखा था, हिन्दी-साहित्यिकों के लिए वह संकट आज भी बना हुआ है।

ऐसे में यह लगता है कि सभ्यता का यह संकट अभी दशकों बने रहना है। आवारा भीड़ के ख़तरों के मध्य जीने और मरने के लिए तैयार रहना है। यह संकट कब ख़त्म होगा नहीं कहा जा सकता। परसाई ने भी शुभ-कामना की है, भविष्यवाणी नहीं। वे वास्तविकता को सामने रखना अपना कर्तव्य समझते हैं, लेकिन संकट का कोई बना-बनाया समाधान नहीं है, इसे भी वे जानते हैं। परसाई के इन लेखों के बाद से आज तक विश्व में कई बड़े आर्थिक और राजनैतिक बदलाव हो चुके हैं। इन लेखों में वे जिस भविष्य की आशंका से चिन्तित दिखाई देते हैं, वह भविष्य आज वर्तमान है। निश्चित ही, हर संकट समाप्त होता है। पूंजीवाद-साम्राज्यवाद का विनाश ही इस संकट का अंत करेगा। हिन्दी-साहित्य की भूमिका भी नई दुनिया में नए मनुष्य द्वारा फिर से लिखी जाएगी।

 

usman khan

 

उस्मान ख़ान समकालीन हिंदी साहित्य के अलहदा युवा कवि-कथाकार हैंचर्चाओं और पुरस्कारों की भीड़ से अलहदा… छपाऊ मानसिकता से भी अलहदा... जे.एन.यूके हिंदी विभाग से मालवा के लोकसाहित्य पर पीएचडीइनसे usmanjnu@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

प्लाथ की कवितायें, स्त्री व्यक्तित्व के दुहरे आत्मनिर्वासन की सच्चाई: मार्तंड प्रगल्भ

सिल्विया प्लाथ अमेरिका की लेखिका थीं. ऑस्ट्रियन मूल की पर दो पीढ़ी पहले से अमेरिकी हुए परिवार से प्लाथ की मां आयीं थी और पिता जर्मन थे. १९३२ में जन्मी सिल्विया प्लाथ ने काफी कम उम्र से ही लेखन को गंभीरता से लेना शुरू कर दिया था. पिता यूनिवर्सिटी में जीवविज्ञान के प्रोफेसर और प्रसिद्ध कीटविज्ञानी थे और प्लाथ के जीवनीकार बताते हैं की प्लाथ का उनसे रिश्ता तनाओं भरा था. तीस साल की उम्र में जब प्लाथ का त्रासद अंत हुआ प्लाथ का प्रकाशित-अप्रकाशित विपुल लेखन अस्तित्व में आ चुका था. कवि टेड ह्युग्स के साथ प्लाथ को प्रेम हुआ,उससे शादी हुई और वह दो बच्चों की मां भी बनी. अंत के दिनों में उनका संबंद्ध- विच्छेद हो गया था पर उसका कानूनी साक्ष्य नहीं है. प्लाथ के मित्रों में ज़्यादातर अमेरिकी और इंग्लिश लेखक थे. पहले अमेरिका के स्मिथ कॉलेज में प्लाथ ने अकादमिक एक्सलेंस के साथ दोस्तोवस्की के उपन्यासों में द्विधाविभक्त चरित्रों के ऊपर अपना अंडरग्रेजुएट थीसिस जमा किया, बाद में वजीफे के साथ कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी चली आई. आमतौर पर आलोचकों ने प्लाथ की रचनाओं को ‘आत्म-स्वीकारात्मक कविता’ (कन्फेसनल पोएट्री) को आगे बढ़ाने वाला माना है. अपने छोटे जीवन-काल में प्लाथ को भयानक अवसाद के दौर से भी गुजरना पड़ा था. वह अंतिम दिनों में अनिद्रा और गंभीर अवसाद से जूझ रही थी. प्लाथ ने तीन बार आत्महत्या की कोशिश की. अंतिम बार उसने यह कोशिश ११ फरवरी १९६३ को की. #लेखक

Sylvia Plath

Sylvia Plath

 

व्यक्ति स्वातंत्र्य की त्रासदी और सिल्विया प्लाथ की कविताएँ

By मार्तंड प्रगल्भ

प्लाथ की आरंभिक कविताओं में उसके पसंदीदा कवियों की छाप दिखती है. परन्तु इन कविताओं में भी सिल्विया प्लाथ की एकान्तिक काव्य यात्रा के निशान मिलते हैं. किसी पेंटिंग या प्राकृतिक दृश्य के प्रभाव से या रोज़मर्रा के अन्य जीवनानुभव और उनके संदर्भों से शुरू होने वाली कविताओं में एक धूसर-काली मनोदशा आकार ग्रहण करती है. ये मनोदशाएँ विकृत मानवीय सम्बन्धों के बीच अपने अस्तित्व की तलाश के क्रम में बनने वाली मनोदशाएँ हैं. इन मनोदशाओं में अस्तित्व की सार्थकता अपनी आत्म-पहचान की खोज में बदलती जाती है. दोस्तोवस्की के उपन्यासों में ‘डबल’ या आत्मा की दुई के बारे में प्लाथ का अध्ययन आत्म और उसकी पहचान की ज्ञानात्मक संवेदना के सैद्धांतिक आयाम का पता देती हैं. स्वतंत्र मनुष्य का रूप कैसा होगा, यह प्रश्न नाज़ी होलोकास्ट और द्वितीय विश्वयुद्ध की छाया से आक्रान्त था. स्वतंत्र मनुष्य के बने बनाए मॉडल के ध्वंस के बीच बन रही ये मनोदशाएँ अपनी अभिव्यक्ति का रास्ता तलाशती हुई मिथकीय सन्दर्भों से जुड़ती चली जाती है. ये मिथकीय सन्दर्भ ज़्यादातर प्रेम, मृत्यु और पुनर्जीवन के हैं. धीरे-धीरे मिथकीय चेतना का अनवरत दुहराव प्लाथ के लिए एक बंद घेरे में बदलता गया. एक बंद घेरे वाली एकांतिकता का निर्माण वहां होता है जहाँ अनुभव प्रसूत काव्य संवेदनाएं आत्म की दो विरोधी गतियों से संघर्ष करती हुई इन विरोधी गतियों के अतिक्रमण के लिए स्वयं मिथकीय संवेदना में रूपांतरित होती जाती है. रचनाकार इस चक्र से निकलने के लिए आवेगमय प्रतिक्रियाएं करती है. इन प्रतिक्रियाओं की परिणति जीवन में और रचना के भीतर निर्णय लेने में होती है. प्लाथ की रचनाओं में हम इन निर्णयों को आसानी से पहचान सकते हैं. उसकी काव्य-नायिकाओं की आत्महंता आस्था मृत्यु के निर्णय में परिणत होती है.

फ़ासिस्म की मिथकीय चेतना से संघर्षरत प्लाथ के काव्य की मिथकीयता वस्तुतः एक दूसरे की पूरक बन गयी है. चेतना की इन दो विरोधी धाराओं में मृत्यु के दृश्याभास या स्पेक्टेक्ल का साझा है. ध्वंसावशेष के रूप में वर्तमान व्यक्ति-मुक्ति के बुर्जुआ स्वप्नों का भी ध्वंसावशेष था. व्यक्ति रचनाकार का अंतर्मन मुक्ति के स्वप्नों के पूरा होने से पहले ही उन स्वप्नों के ध्वंसावशेष को अपने सामने यथार्थ पाता है. स्त्री-पुरुष सम्बन्धों में यह ध्वंसावशेष प्रेम के स्वप्न का ध्वंसावशेष है. प्रेम का निर्णय और व्यक्ति-स्वातंत्र्य की आवेगमय कामना दोनों विध्वंस के दुहराव में उलझ जाती है. प्लाथ की काव्य-नायिकाएं इस ध्वंस की त्रासद मनोदशा से संघर्ष करती हैं, निर्णय लेती हैं और बार-बार पराजित होती हैं. प्लाथ के एक आरंभिक सोनेट से इस मनोदशा के निर्माण का कुछ पता मिलता है. इस सानेट की प्रेरणा प्लाथ को इटैलियन चित्रकार ज्योर्जिओ दे सिरीको की एक पेंटिंग से मिली. पेंटिंग का शीर्षक ही कविता का भी शीर्षक है: ‘ध्वंसावशेषों की आपसी बातचीत’. पेंटिंग में दूर-दूर तक फैले पथरीले बियाबान में बिना छत बिना दीवारों का एक कमरा है. कमरे के खम्भे टूट गए हैं. दरवाजा है जिसकी केवल चौखट ही बची है. दरवाजे के दोनों पल्ले समानांतर खुले हैं. दरवाजे की तरफ मुंह किये एक संभ्रांत महिला शास्त्रीय परिधानों में सजी धजी बैठी है. उसकी गर्दन बायीं ओर हलकी सी मुड़ी है और वह एक सूटेड-बूटेड पुरुष की आँखों में देख रही है. पुरुष के ठीक पीछे एक अलमारी है और उससे लगा एक टूटा हुआ खम्भा जिससपर किसी यूनानी हीरो की तस्वीर है जो हुबहू पुरुष की तरह दिखता है और चित्र में उसी मुद्रा में कुछ देख रहा है जिस मुद्रा में वह पुरुष उस संभ्रांत महिला को देख रहा था. प्लाथ की कविता में इस चित्र के निर्माण की फैंटेसी बनती है. चित्र की संभ्रांत महिला प्लाथ की काव्य-नायिका में बदल जाती है. वह स्वयं उस चित्र के ट्रैजिडी का इतिहास पुरुष को बता रही है. दरवाजे के सामने बैठी वह पुरुष को अपने वैनेले आवेश के साथ अपने भव्य घर की पोर्टिको से ‘रौबदार’ गुजरते देख रही थी. वह गुजरता जाता था:

… छिन्न भिन्न करते जाल को

शिष्टाचार के सारे नियमों के जो बवंडर को पीछे

थामे रखते हैं

और बवंडर उसके पीछे विध्वंस करता आ रहा था. शानदार तम्बूरे और मोर नष्ट हो गए, फलों के बाग़ उजाड़ हो गए और अब भव्य दीवारें ढह गयीं हैं. भयानक खंडहरों के ऊपर कौए शोर करते हैं और तुम्हारी तूफानी आँखों की उजाड़ दृष्टि का जादू वैसे ही उड़ान भरता है जैसे पहली किरण के साथ कोई चुड़ैल महल से उड़ जाती है. चट्टानी बियाबान टूटे खम्भों के फ्रेम में जड़ है और


जब तुम कोट और टाई में धीरोदात्त खड़ो हो, मैं बैठी

ग्रेसियन ट्यूनिक और साइकी-नॉट में सजी-धजी

तुम्हारी काली आँखों में जड़वत, नाटक त्रासद हो गया:

हमारी उजाड़ रियासत पर ऐसे कठोर तुषारापात के बीच

शब्दों का कैसा उत्सव इस विनाश को ढँक सकता है?

अन्दर बाहर के इस भयावह बियाबान में प्लाथ की काव्य-नायिकाएं वृहत्तर दुःख और पीड़ा को स्वानूभुत कर उसकी सच्चाई को अपनी पहचान में पक्का करना चाहती हैं. इस पीड़ा या दुःख की चरम परिणति मृत्यु के अनुभव की प्रबल होती आकांक्षा है. जो जिंदा है किसी न किसी तरह से दुःख का कारक भी है. व्यक्ति-अनुभूत पीड़ा और पीड़ित का द्वैध इन काव्य-नायिकाओं की आत्मा में दुई पैदा करती है. जहाँ एक ओर उत्पीड़क संरचना यथार्थ है वहीँ दूसरी ओर व्यक्ति-केंद्रित सच्ची अनुभूति की खोज एकान्तिक उत्पीड़कों/उत्पीड़ितों की पहचान के द्वंद्व में उलझ जाती है. ऐसी स्थिति में पीड़ित के अनुभवों की ईमानदारी और पीड़ित का विरोध ये दोनों ही मृत्यु संदर्भित हो जाते हैं. अंग्रेज़ी दुनिया में अमेरिकी उदार व्यक्तिवाद अपनी सार्थकता के लिए होलोकास्ट की मृतक छाया से व्यक्ति-मुक्ति के वास्तविक प्रश्नों को ढँक देती थी. यह संभव होता था मृत्यु को स्पेक्टेकल बना कर पेश करने से. प्लाथ की काव्य-नायिकाएं इस अमेरिकी जीवन-पद्धति के आक्रामक स्वरुप से भी विद्रोह करती हैं. यह विद्रोह देह-विद्रोह में रूपांतरित होता है. इन नायिकाओं के लिए व्यक्ति स्वातंत्र्य की उदारता उत्पीड़ितों को न केवल आत्मसमर्पण के लिए बाध्य करती है वरन उसे सुखी जीवन का आदर्श मॉडल भी साबित करती है. यह उदारता उन काव्य-नायिकाओं के लिए फासिस्ट हिंसा का ही दूसरा पहलू है. इनका द्विधा-विभक्त आत्म जिस गिरह से बंधा है वह हिंसा की ही गिरह है. सभ्यता के गर्भ में छिपी हिंसा से जुड़ कर वह प्रासंगिक हो उठी है. प्रेम, मातृत्व और घर की ओर वापसी जैसे उनके निर्णय हमेशा द्विधा-विभक्त अनिर्णय के साथ आने से कविता में अतिरिक्त आवेगमय शक्ति के रूप में प्रकट हुए हैं. ‘द स्नोमन ऑन द मूर’ कविता की काव्य-नायिका अपने प्रेमी से निरंतर युद्ध्मान स्थितियों के एक क्षण में विजय की अपनी तीव्र आकांक्षा के साथ विच्छेद को स्वीकार करती है. वह तमतमाई हुई जब कमरे से बाहर बियाबान में निकलती है तो उसका अंतिम क्रोध भरा ताना है- ‘आओ मुझे खोज लो’. उसे विश्वास है कि बाहर के बर्फीले-उजाड़-बियाबान से गुजरते हुए भी वह जीतेगी और एक दिन वह घुटनों के बल उसके सामने बैठा होगा. दुनिया के सफ़ेद किनारे पर खड़ी वह सारे नरक को बुलावा देती है उस उद्दंड आदमी की सत्ता की घेरे-बंदी के लिए. और दूर सामने से आता एक शैतान दीखता है उसे. कोई आग उगलने वाला, क्रोधोन्मत्त और गर्वोन्नत राक्षस नहीं बल्कि संयमी, हृष्ट-पुष्ट, गंभीर और डरावनी कद काठी का वह शैतान लाश की तरह सफ़ेद दिखाई पड़ा. प्रेमविहीन आँखों वाले इस शैतान के क़दमों की धाक से दर्जनों पखेरूओं की लाश हवा में बिखर जाती थी. पर इससे भी बुरी बात यह थी कि उसने


… काँटों जड़ी पट्टी पर झूलते देखा

औरतों की नाचती खोपड़ियाँ

शोक से सूखी जीभों से कलकलाती अपने अपराध:

‘हमारी बुद्धि ने मूर्ख बनाया

राजाओं को, राजाओं के दुर्बल बेटों को: हमारी प्रतिभाओं ने

दरबारों का दिल बहलाया:

उसी शेखी के लिए , हम इन लौह जंघाओं से नथे हैं.’

राज सिंहासन पर विराजमान धंसा हुआ

एक बर्फीले तूफ़ान में, अपने चमकते विजय-चिह्नों के साथ वह शैतान दहाड़ उठा.

कुल्हाड़ी की मार के आवेग से

वह लजा कर पीछे हट गयी: एक सफ़ेद सनसनी! और वह शैतान, चलते हुए

धुंध में खो गया.

विनीत तब, और रोती हुई,

वह लड़की घर की ओर मुड़ गयी, लबालब भरी हुई भली बातों

और नम्र अनुपालन से.

प्लाथ की काव्य-नायिकाओं के लिए घर से संबंद्ध-विच्छेद मृत्यु की स्वीकारोक्ति भी है. पर ये जानती हैं कि यह सब कुछ सच नहीं है. यह सब नैसर्गिक नहीं है. एक गहन संदेह के खिलाफ इन्हें तलाश है किसी विश्वास की, जो दिया हुआ कहीं नहीं है. उसे शुद्ध मस्तिष्क रच नहीं सकता. उसके खिलाफ देह विद्रोह होगा और उसकी सत्ता मिट जायेगी. ‘नैसर्गिक इतिहास’ कविता में यह विश्वास अपने वृहत्तर ऐतिहासिक परिपेक्ष्य में व्यक्त हुआ है. ‘उन्मत्त सम्राट, दिमाग एक उजाड़ देश पर राज करता. मलमल पर सोने वाला और कबाब में धंसे हुए उस सूअर का प्रेम केवल शुद्ध दर्शन में लीन होना था. जब उसकी प्रजा भूखी और नंगी थी वह तारों और फरिश्तों के संग बातें कर रहा था. पर ऐसा वह जारी नहीं रख सकता:


…अपने राजा की दुष्ट दैवीय वायु से तंग ,

धरती से जन्मे वे सामान्य जन एक शरीर में

उठ खड़े हुए और शाही धमनियों को बंद कर दिया…

स्वयं में सर्व शक्तिमान की सत्ता टिक नहीं सकती. सामान्य जन का शरीर उसे एक करेगा और वह विद्रोह करेगा. देहविद्रोह की सत्यता नैसर्गिक है. यहाँ दिमाग शुद्धात्मवादी का प्रतीक भी है. शुद्धात्मवादी दिमाग खुद को ब्रह्म समझने लगता है. उसे लगता है कि बाह्य यथार्थ सारा का सारा उसी के कारण है. ‘एक शुद्धात्मवादी का आत्मवक्तव्य’ शीर्षक कविता का ‘मैं’ शुद्ध नियंत्रण मात्र है. इसकी घोषणा है. यह शुद्ध शक्ति की सर्वव्याप्ति का प्रतीक है. पुरुषसत्ता और उसके अनन्तर फासीवाद की वैयक्तिक सत्ता की आत्म-मुग्धता का उद्घोष है:


मैं

घरों को सिकुड़ने देती हूँ

और पेड़ों को गायब होने

दूर जाते हुए; मेरी नज़रों की लगाम

कठपुतली-जनों को झुलाते हैं

उनको, जो नहीं जानते कि कैसे झूलते हैं,

हंसते हैं, चूमते हैं, और शराब पीते हैं

परन्तु इस निर्णय से अनुभवों की मुक्ति नैसर्गिक है. इतिहास सम्मत है. पर वह कहीं वास्तव में प्राप्य नहीं. ऐसी स्थिति में प्लाथ की कवितायें प्रेम की ओर, उसके विश्वास की ओर लौट आती हैं. इन कविताओं में प्रेम की अवश्यम्भावी विजय का उद्घोष बार-बार होता है. यह रूमानी प्रेम का आवेग, यह भाव जगत का विद्रोह झूठा नहीं है. प्लाथ की कवितायें इस सच की ‘संवाददाता’ हैं:


पत्ती की तश्तरी पर बैठे घोंघे का शब्द?

यह मेरा नहीं है. इसे स्वीकार मत करो.

एक सील्ड डिब्बे में एसिटिक एसिड ?

इसे स्वीकार मत करो. यह सच्चा नहीं है.

अपने सीने में सूरज को धारण किये सोने का छल्ला ?

कई झूठ. कई झूठ और एक विषाद.

…….

आइनों में एक विक्षोभ,

अपने धूसर को चकनाचूर करता सागर-

प्रेम करो, प्रेम करो मेरी ऋतु.

जितना प्रेम पर यह विश्वास सच्चा है उतने ही सच हैं प्रेम के खंडहर. एक मन यह भी विश्वास करता है कि बार-बार अनुभव-जगत का एक सर्वसत्ता के सामने समर्पण एक झूठ है और ‘मृत्यु’ के अनुभव की सच्ची अभिव्यक्ति के बिना प्रेम में आस्था को पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता. सर्वथा स्वतंत्र व्यक्तिगत अनुभवों की तलाश में ये नायिकाएं मिथकीय और धार्मिक अनुभव संसार में विश्वास के लिए जाती हैं. समस्या तब और भी गहरी हो जाती है जब स्वतंत्रता की यह तलाश मिथकीय संवेदना में भी तुष्ट नहीं होती. अतिरेकवादी पूर्णता के दोनों छोर हिंसा के सिवा कुछ भी साझा नहीं रखते. असफलता के बारम्बार अनुभव से आक्रोशित आत्म अपने चरम विरोध से ही प्रेम करने को बाध्य होता है. ‘डैडी’ कविता की काव्य-नायिका कहती है:


हर महिला पूजती है एक फासिस्ट,

चेहरे पर बूट, निर्मम

निर्मम हृदय तुम्हारे जैसे किसी क्रूर का.

इस चरम विरोध से अतिक्रम के लिए, स्त्रीत्व से अतिक्रमण के लिए ये काव्य-नायिकाएं एक बेघर-बार मूल अनुभव की ओर आकर्षित होती हैं. वह बार-बार मरती हैं केवल अपने चरम-विरोधी आत्म से सारा मामला निबटा लेने को. यहाँ भी विरोधी आत्म-युग्म जर्मन-यहूदी आत्म-युग्म से जुड़ कर सभ्यता मूलक हो गया है.


एक इंजिन, एक इंजिन

हवा में एक यहूदी की तरह मुझे उड़ाते हुए.

एक यहूदी को दशाऊ, ऑश्वित्ज़, बेलमेन.

मैंने यहूदी की तरह बात करना शुरू कर दिया.

मैं सोचती हूँ यहूदी होती तो कहीं अच्छा था.

टायरोल की बर्फ, वियना की साफ़ बीयर

बहुत शुद्ध और सच्चे नहीं हैं.

अपनी जिप्सी पुरखिनियों और अपने उजड्ड भाग्य के साथ

और साथ में मेरा टारोक पैक और मेरा टारोक पैक

मैं तनिक तो यहूदी होती.

इस मूल बेघर-बार को पाने के लिए वह बार-बार मरती है. मूल विरोधी/विद्रोही/पीड़ित आत्म को पाने के लिए वह सारी मध्यस्थताओं को निरर्थक साबित करना चाहतीं हैं. वह बार-बार लौट कर अपने मूल में ही उसका विनाश करना चाहती हैं.


मैं दस की थी जब उन्होंने तुम्हें दफनाया.

बीस में मैंने मरने की कोशिश की

और तुम्हारे पास, वापस, तुम्हारे पास वापस लौटने की .

यहाँ तक कि हड्डियाँ भी ऐसा करेंगी मैंने सोचा.

विरोधी/विद्रोही मूल आत्म के खरे रूप में प्राप्त करने की यह तीव्र लालसा ‘लेडी लजारस’ नामक कविता में सबसे स्पष्ट है. लाजरस ईसा की चमत्कारपूर्ण कहानियों में मिलने वाला एक मिथकीय चरित्र है. यहाँ मृत्यु की पृष्ठभूमि में पुनर्जन्म एक स्पेक्टेकल में बदल जाता है. लजारस की बहनों ने लजारस की बीमारी की खबर ईसा को पहुंचाई थी. ईसा ने जान-बूझ कर जाने में देरी की. जब तक पहुंचे तब तक लाजरस को मरे चार दिन बीत चुके थे. ईसा ने उसे पुनर्जीवित कर दिया. इस चमत्कार से यहूदियों का विश्वास ईसा में इतना बढ़ गया की धर्माधिकारिओं ने इस विश्वास को मारने के लिए लजारस को फिर से मृत्युदंड दिया. प्लाथ की काव्य नायिका खुद को स्त्री लाजरस के रूप में पुनर्रचित करती है और उस पुनर्जीवन के चमत्कार से अपने आत्म को मुक्त करने का विश्वास व्यक्त करती है. व्यक्ति स्वातंत्र्य की आत्मगत पहचान की यह कामना बुर्जुआ स्वप्नों की भयानक त्रासदी की अभिव्यक्ति है. यह बुर्जुआ मानवीय सम्बन्धों के ‘वैम्पायर’ को मारने के लिए खुद को मार कर स्वन्त्रत होने की त्रासदी है


क बार फिर मैंने यह किया.

प्रत्येक दस में से एक साल

मैं ऐसा करती हूँ-

जैसे एक चलायमान चमत्कार, मेरा शरीर

एक नाजी लैम्पशेड सा उज्ज्वल

मेरा दाहिना पैर

एक पेपरवेट,

मेरा चेहरा एक लक्षणहीन, महीन

यहूदी लिनेने.

……..

मरना

एक कला है, जैसे बाकी सब.

मैं इसे बखूबी करती हूँ.

मैं इसे करती हूँ इसलिए यह नरक की तरह महसूस होता है.

मैं इसे करती हूँ इसलिए सच महसूस होता है

मेरा अंदाजा है तुम इसे मेरी प्रकृत नियति कहोगे.

……

श्रीमान ईश्वर, श्रीमान लूसिफर

खबरदार

खबरदार.

राख से

मैं अपने लाल केशों के साथ उठती हूँ

और मैं आदमियों को हवा की तरह खाती हूँ.

प्लाथ की कवितायें स्त्री व्यक्तित्व के दुहरे आत्मनिर्वासन की सच्चाई है. एक अप्राप्य, असंभव आत्मिक एकांतिकता का आवेगमय और रोमांटिक दुस्स्वप्न!

मार्तण्ड  प्रगल्भ

मार्तण्ड प्रगल्भ

छात्र राजनीति और संस्कृति-कर्म में व्यस्त रहने वाले मार्तण्ड प्रगल्भ जे.एन.यू. के भारतीय भाषा केंद्र से पी.एच.डी. हैं। उनसे mpragalbha1@gmail.com पर संपर्क संभव है।

दस्तर-ख़्वान पर हरामख़ोरी: जॉन एलिया

हालात ये हैं कि जॉन एलिया एक फ़िनोमनल पोएट का ओहदा हासिल कर चुके हैं. ट्रेडिशन में तुलना का आलम या ‘आलमगीरों’ के बीच उनकी माकूल जगह तय कर देने का जज़्बा इस क़दर है कि वे मीर के बाद सिर्फ़ जॉन पर ही ठहरते हैं. कुछ लोग फ़िरदौसी तक के सफ़र पर निकल चुके हैं.

हम सब ख़ुशक़िस्मत हैं कि क्लासिकल अंदाज़  में किसी अदीब के मक़बूलियत के गवाह बन रहे हैं. जॉन साहब की मक़बूलियत के रास्तों, सोर्सेज़, वक्तों की बात को जाने भी दें तो उनके यहां दो-तीन चीज़ें साफ़-साफ़ नज़र आती हैं, रिवायत का रियाज़ (लोक की आवाज़ के रूप में नज़ीर अकबराबादी के यहाँ और अपने क्लासिकल अंदाज़ में वह मीर के यहां जाते हैं ), रोमांटिसिज़्म और इन सबसे आगे एक ख़ास क़िस्म की मॉडर्निटी, जो इतनी धारदार है कि ख़ुद जॉन के रोमांटिसिज़्म के ख़िलाफ़ खड़ी नज़र आती है.

जॉन शायरी के बेताज उस्ताद तो हैं ही, उनका नस्र (प्रोज़) भी उनकी क़ाबिलियत को बयां करता है. कुछ स्कॉलर्स तो यहां तक मानते हैं कि उनका नस्र उनकी नज़्मों से ज्यादा उम्दा है.

किसी भी मॉडर्न शायर की एक ऊपरी पड़ताल तस्सवुरात के हवाले से नस्र हुई उसकी बातों से की जा सकती है. साल  2012 में उनके नस्र के काम की एक किताब ‘फ़रनूद’ नाम से शाया हुई है, उसी किताब से एक हिस्सा यहाँ भी शाया किया जा रहा है. #tirchhispelling

जॉन एलिया

जॉन एलिया, साभार: यूट्यूब

जॉन एलिया की फ़रनूद से

मैं तारीख़ को बाइक़्तिदार  इन्सान दुश्मनों का स्याह आमालनामः क़रार देता हूँ।

अब अगर दानिश है तो मग़रिब की है, इक़्तिदार हैं तो मगरिब की हैं, फनून हैं तो मगरिब के हैं, तहजीब है तो मगरिब की है, मयार हैं तो मगरिब के हैं और फैसला है तो मगरिब का है, क्या हम इस हक़ीक़त से इनकार कर सकते हैं? क्या मशरिक़ का कोई बड़े से बड़ा वकील और कोई शदीद जज़्बाती मशरिक़-परस्त इस हक़ीक़त से इनकार कर सकता है? अफ़सोस सद-अफ़सोस के नहीं।

अच्छाई और बुराई में एक अजीब मुआमलत हुई है और वह यह कि उन्होंने अपने नामों का आपस में तबादला कर लिया है। अब हर चीज़ अपनी ज़िद-नतर आती है। इल्म, जहल पर रीझ गया था और जहल, इल्म के खि़ताब पर बुरी तरह लोट-पोट था। सो दोनों ही ने ईसार से काम लिया।

फौज के बारे में शुरू ही से मैंने वो राय रखी है जो तारीख़ के सबसे शरीफ़ और दानिशमंद लोगों की राय रही है यानी सबसे अच्छा ज़माना वो होगा जब फौज का लफ़्ज़ सिर्फ लुग़त में रह जाएगा और उसका वजूद वक़्त के सेल में बह जाएगा।

तुम शायद सिर्फ़ मेरा नाम जानते हो, मुझे नहीं जानते, मैं न भारत का आदमी हूँ न पाकिस्तान का। एक ज़माना था जब मैं हिन्दोस्तान का आदमी था यानी बर्र-ए-सग़ीर का आदमी। इसके बाद मैंने अज़-ख़ुद सारी दुनिया की क़ौमियत इख़्तियार की और फिर मैं कहीं का नहीं रहा।

इल्म इस दुनिया में नौ-वारिद है, रही जहालत तो उसको बिला-शुबः तवालत सन और क़दामत का क़ाबिल-ए-रशक इम्तियाज़ हासिल है। वो अपनी क़दीम जागीर में किसी दूसरे का तसर्रुफ़ आसानी से गवारा नहीं कर सकती।

हमें तो अब ख़ुद अपने होने पर यक़ीन नहीं आता, क्या हम वाक़ई हैं? आप होंगे मगर मैं तो शायद नहीं हूँ। जो अपनी सच्ची हालतों के साथ नहीं पाया जाता, वो नहीं है, सो मैं नहीं हूँ।

सारे रिश्ते लफ़्ज़ से हैं, लफ़्ज़ के हैं और लफ़्ज़ में हैं, जो ख़्याल भी है तसव्वुर भी और म’आनी भी हम और तुम और वो सब जो हमारी बातें सुन रहे हैं लफ़्ज़ में सोचते हैं लफ़्ज़ की लज़्ज़त में जीते हैं और लफ़्ज़ की अज़िय्यत में मरते हैं। हम लफ़्ज़ों ही में मिलते और लफ़्ज़ों ही में बिछड़ते हैं लफ़्ज़ ही अपनाते हैं और लफ़्ज़ ही गँवाते हैं।

हमारे यहाँ बीसवीं सदी आई ही नहीं बल्कि वक़्त हमारे बाल खींच कर, झिंझोड़ कर हमें बीसवीं सदी में ख़्वामख़्वाः ले जा रहा था वर्ना हम तो ग्यारहवीं-बारहवीं सदी ईसवी के लोग थे।

धात के बदन और गोश्त-पोस्त और हड्डियों के क़ामत दौड़ रहे हैं। चाहे उनमें से कुछ दौड़ते दिखाई ना देते हों पर वो सब दौड़ ही तो रहे हैं चाहे अपने बाहर दौड़ रहे हों या अपने अंदर।

तामीर-ओ-तरक़्क़ी की बातें उसी क़ौम को जे़ब देती हैं जो मआशी इस्तेहकाम और तालीमी तरक़्क़ी के एक ख़ास नुक़्ते पर पहुंच चुकी हो। इससे पहले तामीर-ओ-तरक़्क़ी के इमकानात पर ग़ौर करना दिमाग़ी अय्याशी और ज़हनी बदकारी के इलावा और कुछ नहीं।

अगर इस दुनिया में किसी जन्नत का वजूद में आना मुमकिन नहीं है तो ये कोई मुँह बिसूरने की बात नहीं, अगर इस दुनिया में शहद और शीर की नहरें नहीं बह सकतीं तो शफ़्फ़ाफ़ और शीरीं पानी की नहरें तो बह सकती हैं। क्या जौहड़ों का पानी पीने वालों के लिए शफ़़्फ़़ाफ़़ और शीरीं पानी की नहरें शहद और शीर की नहरों से कुछ कम हैं?।

पछतावा बहकावे की देन है।

इल्म के सामने ज़लील होना जहालत का मुक़द्दर है।

जो लोग अपने और अपनी नौअ’ के दूसरे लोगों के लिए ख़्वाब नहीं देखते वो नीम इन्सान होते हैं। ख़्वाब देखना अपने आप में अपने आपसे आगे होता है। जो शख़्स या मुआशरा ख़्वाब देखने की सलाहियत नहीं रखता वो अपने आप में अपने से पीछे होता है या कम-अज़-कम वहीं होता है जहां होता है और वहीं का हो रहता है और अल्लाह को प्यारा हो जाता है।

अगर दीवारें ज़ी-रूह होतीं तो वो अपने सीनों पर लिखे हुए ज़हरीले नारों के असर से हलाक हो जातीं।

जिसने कहा मैं कभी अपने बहकावे में नहीं आया, उसने अपने आपको बड़ा ही बुरा बहकाया और जिसने अपने नज़दीक अपने बारे में कोई धोका नहीं खाया, उसने बहुत भयानक धोका खाया।

अक़्ल का ग़लत फ़ैसला भी जज़्बात के सही फ़ैसले से बेहतर होता है।

हमें इस बात का एहसास क्यों नहीं होता कि हम एक हज़ार बरस से तारीख़ के दस्तर-ख़्वान पर हरामख़ोरी के सिवा और कुछ नहीं कर रहे?।

पाकिस्तान को मुम्लिकत ख़ुदादाद कहा जाता है, अगर सियासी, लिसानी, और मज़हबी जमातों की दहशतगर्दी और फ़तवेबाज़ मौलवियों की बदमाशी के बावजूद ये मुम्लिकत क़ायम है तो ये वाक़ई मुमलिक ख़ुदादाद है।

हमने हिक्मत को हवसनाकी बनते देखा और दलील को दलाली, क़यादत ने कज़्ज़ाक़ी का पेशा इख़्तियार किया और क़ानून ने नक़ब-ज़नी शिआ’र की।

तुम्हारे ख़ुश-हाफ़िज़ा मुअल्लिमों और तेज़ कलाम मुकर्रिरों ने तुमसे इस क़दर झूट बोला है कि अगर तुम जान लो तो यक़ीनन तुम्हें नुत्क़-ओ-कलाम से नफ़रत हो जाएगी, कभी वो बातें भी सुनना चाहो जो गिरां गुज़रीं क्या मालूम के रास्ती उस ही लहजे का रस हो जो तुम्हें कड़वा लगता है।

तारीख़ के हस्सास इन्सानों ने अपनी ज़िंदगी का ज़्यादा हिस्सा उदास रह कर गुज़ारा है। जिंदगी में ख़ुश रहने के लिए बहुत ज़्यादा हिम्मत बल्कि बहुत ज़्यादा बे-हिसी चाहिए।

अगर आप कामयाब इश्क़ करना चाहते हैं तो आपको एक ग़ैर आशिक़ और आक़िल क़िस्म का शख़्स होना चाहिए और इस के साथ ही एक बहुत घटिया और अय्यार शख़्स भी, आप सोच रहे होंगे कि मैं ये ‘इश्क़’ के साथ ‘करना’ का लफ़्ज़ क्यों इस्तेमाल किया है। इश्क़ तो हो जाता है, किया नहीं जाता। भाइयो ये एक बहस तलब बात है। मेरा ये ख़्याल है कि इश्क़ होता नहीं किया जाता है और चूँकि मैं एक शायर हूँ और इश्क़ के मौज़ू पर सबसे बड़ी सनद शायर होते हैं इसलिए आपको मेरी बात मानना पड़ेगी, अगर इश्क़ के मौज़ू पर मुझे यानी एक शायर को सनद नहीं माना जाएगा तो क्या किसी आईजी, डिप्टी कमिश्नर और उनसे ऊपर जा कर किसी कमांडर-इन-चीफ, वज़ीर-ए-आज़म या किसी सदर-ए-मुम्लिकत के क़ौल को सनद माना जाएगा। ये लोग तो यकसर ना-बजा तौर पर वो ख़ुशनसीब तरीन और आम लोग क़िस्म के लोग होते हैं जो ना इश्क़ करते हैं और जिन्हें ना इश्क़ होता है। उनसे तो, उन ज़ालिमों और क़ातिलों से तो इश्क़ लड़ाया जाता है, हर बदज़ौक़, बेशऊर, बद-बातिन और दुनियादार हसीना उन्हीं लोगों को पटाने की फ़िक्र में रहती है। मैंने हसीं औरतों को आम तौर पर बे-ज़मीर और लालची पाया है, कम-अज़-कम मुझे तो किसी बा-ज़मीर और बेग़रज़ हसीना से मिलने का आज तक मौक़ा नहीं मिला। मैंने कोई और कारनामा अंजाम दिया हो या ना दिया हो मगर एक कारनामा ज़रूर अंजाम दिया है और वो ये है कि मैंने उन हसीन लड़कियों को बुरी तरह ज़लील किया है, इसलिए कि मुझे उनसे मीर तक़ी मीर और अपने मासूम तरीं भाई हज़रत अबदुल अज़ीज़ ख़ालिद का इंतिक़ाम लेना था। मुझे उम्मीद है कि मेरा ‘‘ख़़ुदा ग़यूर’’ मुझे उसका अज्र देगा

 

लिप्यन्तरण: संतोष झा
संतोष झा, हिरावल, पटना से सम्बद्ध मशहूर संस्कृति कर्मी, नाट्यकर्मी और अद्भुत संगीतकार हैं, साहित्य में रूचिवश उन्होंने यह अनुवाद किया है. इनसे आप hirawal@gmail.com के द्वारा संपर्क कर सकते हैं.

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