Archive for the month “July, 2013”

कम्युनिज़्म: प्रेमचंद

(जिन प्रतिक्रियावादी ताकतों के खिलाफ एक लम्बे संघर्ष के बाद निराला और प्रेमचंद जैसे पायनियर साहित्यकारों ने हिंदी साहित्य को एक प्रगतिशील पहचान दी थी, उसी पहचान को दक्षिणपंथी प्रतिक्रियावादी जमातों की तरफ से फिर से चुनौती दी जा रही है. अंतर सिर्फ यह है कि उनका अंदाज-ए-बयां बदल गया है. उस समय वे इन साहित्यकारों को खारिज कर देते थे और अभी उनकी मौलिक/प्रगतिशील पहचान को धूमिल करके स्वीकारना चाहते हैं. लेकिन दक्षिणपंथी राजनीति का सचेत साहित्यिक प्रतिनिधि इस बात से वाकिफ है कि वे लाख सिर पटक लें लेकिन अपने दक्षिणपंथी साहित्यिक एजेंडे के लिए  कभी भी प्रेमचंद का इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं. इसीलिए दक्षिणपंथ का विद्वत जमात हमेशा प्रेमचंद को लेकर उदासीन रहता है. लेकिन हिंदी के साहित्यिक हलकों में मूर्खताओं से लबालब वाचालों की आमद इधर कुछ ज्यादा ही बढ़ गयी है जो बिना कुछ समझे-बुझे लगातार लफ्फाजों की तरह  सनसनीखेज फतबा बांटता फिरता है कि प्रेमचंद का प्रगतिशील लेखक संघ से कोई सम्बन्ध नहीं था, यह कम्युनिस्टों की साजिश है, प्रेमचंद तो कम्युनिस्ट विरोधी थे इत्यादि-इत्यादि। भारतीय उपमहाद्वीप में प्रेमचंद शायद अकेले ऐसे साहित्यकार हुए हैं जिनका विचारधारात्मक विकास एक इमानदार क्रमिक गति का द्योतक रहा है. और, इसी गति को यहाँ का शासक वर्ग और राज्य-पोषित बुद्धिजीवी तबका इनकार करने की कोशिश करता है. यह अकारण नहीं है कि भारतीय उपमहाद्वीप के लेखक के बतौर टैगोर को प्रतिष्ठित करना शासक वर्ग और राज्यपोषित बुद्धिजीवियों को अपने वर्ग की अनदेखी करना नहीं था. राजनीति में भगत सिंह और साहित्य में प्रेमचंद, यह सर्वहारा की राजनीति के आइकॉन हैं लेकिन इसे स्वीकार करने के बदले भारतीय राज्य और इसके टहलुये बुद्धिजीवियों ने पूरे उपमहाद्वीप पर थोपा- गाँधी जी और टैगोर.

प्रेमचंद हिंदी के स्तंभों में सबसे अद्यतन साहित्यकार थे. अंतर्राष्ट्रीय राजनीति पर इतनी बारीक और आलोचनात्मक नज़र बहुत कम साहित्यकारों को नसीब हुआ है. दुनिया भर के कम्युनिस्ट-आन्दोलन पर प्रेमचंद की जैसी नज़र थी दूसरों में ढूँढना मुश्किल है. जनता के संघर्षों का ऐसा हिमायती साहित्यकार बहुत मुश्किल से मिलता है. विश्व राजनीति को प्रेमचंद कैसे देखते थे यह शोधार्थियों के लिए अच्छा विषय हो सकता। प्रेमचंद के यहाँ इसके दो पक्ष बहुत ही स्पष्ट हैं. दुनिया भर में चल रहे जनता के संघर्षों का समर्थन और फासिस्ट ताकतों का पूरजोर विरोध. और, वे  इसी क्रम में जनता के संघर्षोपरांत बने सोवियत संघ को देखते थे. प्रेमचंद ने अकेले सोवियत संघ पर जितने लेख लिखे हिंदी साहित्य के स्तम्भ साहित्यकारों में से किसी दुसरे ने नहीं लिखा. उनके लगभग १५ लेख-टिप्पणियाँ  सोवियत संघ और कम्युनिज्म से सम्बंधित हैं. और, ऐसा नहीं है कि प्रेमचंद इन सारे लेखों में कुछ सुनी-सुनायी बातें करते हैं बल्कि दक्षिणपंथी मीडिया में जो सोवियत संघ /कम्युनिज्म -विरोधी बातें मास-स्केल पर प्रचारित की जाती थीं, प्रेमचंद उसका आलोचनात्मक प्रतिरोध तैयार कर रहे थे. आज प्रेमचंद जयंती पर प्रेमचंद की इन बातों को याद करना इसलिए भी जरुरी है कि आज दुबारा शासक वर्ग की विचारधारा से संचालित मीडिया में दक्षिणपंथी/सांप्रदायिक बुद्धिजीवियों ने फिर से वही पुराना राग अलापना शुरू कर दिया है. प्रेमचंद तक को इस्तेमाल करते समय उनकी उंगलियाँ नहीं कांपती हैं. किसी ने सही ही कहा है कि दक्षिणपंथ सिर्फ   सांप्रदायिक और जनविरोधी ही नहीं बल्कि सबसे निर्लज्ज विचारधारा भी है.)

प्रेमचंद

प्रेमचंद

By  प्रेमचंद 

हवा का रुख़: कम्युनिज्म

किसी पत्र के इंग्लैंड के एक संवाददाता ने लिखा है कि पचीस साल पहले केम्ब्रिज में साहित्य और कविता ही छात्रों के विचार-विनिमय का विषय था, राजनीति से किसी को जरा सी दिलचस्पी न थी. उसी केम्ब्रिज में आज कम्युनिज्म का सबसे ज्यादा असर है. मगर वह महाशय यह भूल गए हैं कि पचीस वर्ष पहले कम्युनिज्म की सूरत ही किसने देखी थी. विज्ञान ने मशीन गन और बेतार बनाए, तो क्या राजनीति ज्यों-की-त्यों बैठी रहती. उदार और परम्परावादी दलों में युवकों के आदर्शवाद के लिये क्या आकर्षण हो सकता है. कम्युनिज्म अर्थात साम्यवाद का विरोध वही तो करता है, जो दूसरों से ज्यादा सुख भोगना चाहता है, जो दूसरों को अपने अधीन रखना चाहता है. जो अपने को भी दूसरों के बराबर ही समझता है, जो अपने में कोई सुरखाब का पर लगा हुआ नहीं देखता, जो समदर्शी है उसे साम्यवाद से क्यों विरोध होने लगा. फिर युवक तो आदर्शवादी होते ही हैं. भारत में ही देखिये। बाप तो साम्प्रदायीकता के उपासक हैं,  और बेटे उसके कट्टर विरोधी. युवक क्या नहीं देखते कि वर्तमान सामजिक और राजनैतिक संगठन ही उनकी उदार, ऊँची और पवित्र भावनाओं को कुचल कर उन्हें स्वार्थी और संकीर्ण और हृदयशून्य बना देती है. फिर वे क्यों न उस व्यवस्था के दुश्मन हो जायँ, जो उसकी मानवता को पीसे डाल रही है और उनमें प्रेम की जगह संघर्ष के भाव जगा रही है. उसी संवाददाता के शब्दों में- “ऐसा मुश्किल से कोई समझदार आदमी मिलेगा, जिसमें जरा सी भी विचार शक्ति है, जो वर्तमान परिस्थिति का साम्यवादी विश्लेषण न स्वीकार करता हो.”

जागरण, २९ जनवरी १९३४

स्टेलिन: रूस का भाग्य विधाता

लेनिन की मृत्यु के पश्चात उसके कितने ही साथियों ने, जिनमें ट्राटस्की, जिनोवीफ, कार्मेनीफ, बुखारिन आदि जैसे प्रतिभाशील और सुयोग्य व्यक्ति थे, रूस की बागडोर अपने हाथ में लेने की चेष्टा की, पर एक ऐसे अपरिचित व्यक्ति के कारण जिसका नाम उस समय तक सुनने में भी नहीं आया था, उन सब को एक-एक करके निकाल बाहर किया और स्वयं इसका भाग्य-विधाता बन गया. इस व्यक्ति का नाम स्टेलिन है और इसके सम्बन्ध में विभिन्न देशों के पत्रों में तरह-तरह की बातें छापा करती हैं. कुछ दिन पहले उसके एक भूतपूर्व सेक्रेटरी ने पेरिस से निकलनेवाले एक बोलेशेविक-विरोध-पत्र में उसका वर्णनात्मक परिचय प्रकाशित कराया था. यद्यपि उसे पढने से तुरंत ही प्रतीत हो जाता है कि यह लेख किस ऐसे का लिखा है, जिसके स्वार्थ को स्टेलिन के कारण धक्का पहुंचा है, तो भी उससे स्टेलिन की ऐसी कितनी ही विशेषताओं का पता लगता है, जो लेखक की दृष्टि में यद्यपि असभ्यता और अशिक्षित होने की सूचक हैं, पर भारतवासियों की दृष्टि में वे एक सच्चे तपस्वी के गुण समझी जाती हैं. लेखक ने स्टेलिन और उसके साथियों को अधिकाँश विषयों में अयोग्य बतलाया है. पर उसके प्रबंध से उसकी जो अनुपम उन्नति हो रही है, उसे देखते हुए उन बातों में कुछ सच्चाई नहीं जान पड़ती। नीचे हम उस लेख का कुछ अंश देते हैं जिससे पाठक स्वयं इस सम्बन्ध में निर्णय कर सकेंगे.

‘ स्टेलिन ऐसा व्यक्ति है, जिसने समस्त मानवीय आकांक्षाओं को हद दर्जे तक घटा दिया है. एकमात्र प्रधानता की असीम प्यास ने उसका पीछा नहीं छोड़ा है. वह एक त्यागी की भाँती क्रेमलिन के दो छोटे-छोटे कमरों में, जिनमें जार के समय महल के नौकर रहा करते थे, रहता है. यह प्रसिद्ध है कि वह शायद ही कभी किसी प्रकार का आमोद-प्रमोद करता है. कभी किसी प्रकार की फिजूल खर्ची नहीं करता, कभी सरकारी रकम से एक पैसा भी अपने लिए नहीं लेता. उसके लिए खेलों और दिल-बहलाव का अस्तित्व ही नहीं है. अपनी स्त्री के सिवाय वह संसार की किसी स्त्री की तरफ आँख नहीं उठाता.

जब कोई व्यक्ति प्रथम बार उससे मिलता है, तो प्रतीत होता है कि वह सीधा-सादा, अपने ऊपर कब्जा रखनेवाला, मितभाषी और बहुत चतुर व्यक्ति है. पर जब उसका विशेष परिचय प्राप्त होता है, तो पता लगता है कि वह बिलकुल संस्कृतिविहिन व्यक्ति है. जैसे-जैसे उससे आपकी घनिष्ठता बढती जायगी, आपका आश्चर्य बढ़ता जायगा। उसमें राजनितिक समस्याओं को समझ सकने की बुद्धि नहीं है, उसे अर्थशास्त्र और आय-व्यय का कुछ भी ज्ञान नहीं। वह हंसी-मजाक करना नहीं जानता. अपने अधीनस्थ कर्मचारियों और कुटुंबवालों के साथ वह बड़ी निरंकुशता और उजड्डता का व्यवहार करता है. वह अपने भेद को छिपा कर रखता है और बड़ा चालाक तथा प्रतिहिंसा का भाव रखनेवाला मनुष्य है. वह अपनी गुप्त योजनाओं को किसी पर प्रकट नहीं करता।  दरअसल वह बिना आवश्यकता के बोलता ही नहीं और प्रायः मौन रहा करता है.’

जागरण,  ३१ अक्टूबर १९३२

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सहमतिया संप्रदाय: हिन्दी पब्लिक स्फीयर वाया फेसबूक

By उदय शंकर 

‘हिन्दी पब्लिक स्फीयर’ के बारे में शोध करने वालों का तांता लगा हुआ है। वे उस समय के बारे में ज्यादा उन्मुख हैं, जब हिन्दी साहित्य और संवाद की भाषा बन रही थी। किसी भी देश-काल-भाषा के पब्लिक स्फीयर को परिभाषित करने में सबसे बड़ी बाधा या चुनौती उन्हें साहित्य से मिलती है। क्योंकि लेखक अपनी कहानियों/कविताओं/आलोचनाओं के जरिये प्रत्यक्षतः कोई संकेत नहीं छोड़ता है या साफ शब्दों में कहें तो वह कोई उपदेशक या रिपोर्टर नहीं होता है, न रात का और न दिन का। वह समाज के या मम के मर्म का द्रष्टा होता है इसीलिए उसके सहारे समाज की परिधि में नहीं बल्कि हृदय में पहुंचा जाता है। लेकिन, इसे पाने के लिए शोधार्थी की योग्यता में सब्र, सहिष्णुता, तीक्ष्णता और संवेदनशीलता जैसे गुणों का रहना लगभग अपरिहार्य है। यह अकारण नहीं है कि उस हिन्दी पब्लिक स्फीयर को अगर किसी एक मात्र आलोचक ने पकड़ने की कोशिश की है तो वह हैं श्री रामविलास शर्मा। लेकिन इतना श्रमसाध्य (मानस के साथ) अभ्यास कोई काहे को करेगा। इसलिए चालू शोधार्थी  अक्सर कुछ उत्तेजक/विवादोन्मुख चिट्ठी-पत्री के जुगाड़ में लगा रहता है। जैसे ही वह उसके हाथ में आती है, उसकी कलम यूरेका-यूरेका बहने लगती है। हिन्दी पब्लिक स्फीयर की चर्चित-अनूदित पुस्तकें इसी यूरेका-यूरेका की गूँज से गुंजयमान हैं।

धन्यवाद गूगल जी

धन्यवाद गूगल जी

यह तो एक भूमिका थी। मैं सोच रहा था कि आज से 100 साल बाद यदि कोई शोधार्थी इस समय के हिन्दी पब्लिक स्फीयर पर बात करेगा तो, वो सबसे पहले क्या ढूंढेगा (उम्मीद है कि उस समय भी रामविलास शर्मा जैसे एक-दो ही होंगें, इसलिए ऐसे लोगों की साहित्योन्मुख अभिरुचियों को छोड़ ही दिया जाय)! मुझे लगता है जो अनूदित-चर्चित किताबें होंगी उनमें हिन्दी लेखकों के फेसबूक स्टेटस की बहुत चर्चा होगी(क्योंकि यह सीआईए के आर्काइव में सुरक्षित होगा)। फेसबूक प्रोफ़ाइलस को हासिल करने के लिए शोधार्थी सीआईए में जुगाड़ बैठाएगा, घंटों एक-एक प्रोफ़ाइल को गंभीरता से सालों तक पढ़ता रहेगा और फिर कुछ निष्कर्षों या समस्या-समाधानों के साथ अपना शोध सम्पन्न करेगा। किताब पहले अङ्ग्रेज़ी में छपेगी जिसे सबसे पहले कोई बाबू मुशाय अमेरिका या इंग्लैंड में पढ़ लेगा। फिर वह अनूदित होकर हिन्दी में आएगी। उसमें मुख्य बातें क्या होंगी, वे बिन्दुवार निम्न हैं:

  • हिन्दी में पाँच से दस हजार की संख्या में जागरूक लोग थे।
  • प्रत्येक हिन्दी लेखक के पास एक बंधुआ फोटोग्राफर होता था क्योंकि वे अक्सर फोटो खिंचवाते थे। वे अपनी विदेश यात्राओं की तस्वीरों को शब्दों से ज्यादा महत्वपूर्ण समझते थे, क्योंकि उनके हिसाब से इनमें शब्दों से ज्यादा गूढ रहस्य होते थे। वे विदेश-यात्राओं की तस्वीरों को ही यात्रा संस्मरण समझते थे।
  • हिन्दी लेखक घरेलू किस्म के लोग होते थे, क्योंकि वे फेसबूक पर अक्सर अपनी बीबी, बच्चों और रिशतेदारों की चर्चा करते थे। उनकी लिखी कविताओं, विचारों को प्रमुखता से शेयर करते थे, बात-बात में उन्हें टैग करते थे। वे चाहते थे कि उन्हें जो लोकप्रियता और सामर्थ्य हासिल हुआ है वे उनके परिवार को भी हो।
  • हिन्दी लेखक अंग्रेजी भी जानते थे क्योंकि वे अपने लिखे को या अपने पर लिखे को छोड़कर बाकी सबकुछ  अंग्रेजी में शेयर करते थे। वे साहित्य की भी बातें करते थे इससे पता चलता है कि वे कभी साहित्य भी लिखा करते थे। लेकिन फेसबूक साक्ष्य बताता है कि वे सिर्फ विदेशियों के लिखे साहित्य, जो या तो मूल अँग्रेजी में होता था या अँग्रेजी में अनूदित होता था, को ही पढ़ने लायक और शेयर करने लायक समझते थे। उनके फेसबूक से यह भी पता चलता है कि हिन्दी साहित्य-समाज के बारे में लेखक के अलावा जो आधिकारिक ज्ञाता था वो कोई अमेरीकन/ब्रिटिश या हिंदीतर अंगेजीदां था।
  • किसी एक लेखक के सहारे पता नहीं चलता है कि कोई दूसरा भी लेखक हुआ था, क्योंकि एक लेखक के पास कोई दूसरा लेखक नहीं दिखता है, 4099 या इससे अधिक की संख्या में सिर्फ इनके फ़ालोवर होते थे जो सिर्फ ‘सहमत-सहमत’ नामक एक पारिभाषिक टर्म  का इस्तेमाल करते थे जिसका शाब्दिक अर्थ ‘साथ हूँ’ होता है। इसीलिए कई-एक लेखकों के फ़ेसबूक के तुलनात्मक अध्ययन का सहारा लेना पड़ता है। तीन-चार लेखकों की बानगी लेने के बाद पता चलता है उस समय  ‘सहमतिया’ संप्रदाय बहुत ही लोकप्रिय था क्योंकि 3000 या इससे अधिक सहमतिया लोग हर लेखक के फ़ालोवर थे। इका-दुका लोगों की प्रोफ़ाइल ऐसी दिखी जिनके सहमत कहने का अर्थ ‘सहमतिया’ संप्रदाय के अर्थ से मेल नहीं खाता है।
  • हिन्दी लेखक दुनिया के अन्य भाषाओं के लेखकों की अपेक्षा ज्यादा यौन-संवेदिक हुआ करता था क्योंकि जितनी गंभीरता और संवेदनशीलता से साथ वह महिला फ़ालोवर्स की पोस्ट लाइक करता था या उन पर कमेंट करता था उस संवेदनशीलता को हासिल करने के लिए पुरुष फ़ालोवर अक्सर लीला रूप धारण करते थे ऐसा द्रष्टव्य होता है।
  • प्रत्येक हिंदी लेखक के पास प्रशंसकों की पूँजी होती थी. प्रथमतया वे प्रशंसक कम दलाल ज्यादा दीखते हैं क्योंकि ‘गरीब लेखकों’ के प्रशंसक न के बराबर दीखते हैं. ये सारे दलाल से दिखने वाले प्रशंसक अपने अध्ययन-कार्य क्षेत्र के असफल लोग लगते हैं, क्योंकि इनमें से अधिकांश का स्वाभाविक कर्म-क्षेत्र या अध्ययन-क्षेत्र हिंदी साहित्य नहीं दिखता है. लेकिन इन्हें दलाल कहना इसलिए पुष्ट नहीं होता है क्योंकि लेखक गण इन्हें बहुत ही आदर-सत्कार से स्मरण करते थे. अमेरीकी अनुभव के आधार पर यह भी अनुमान लगाया जा सकता है ये लोग वेतनभोगी प्रचारकर्ता थे. लेकिन यह हिंदी साहित्य की बात है इसीलिए लेखक का वक्तव्य सर्वोपरि माना जाना चाहिये. इससे यह अनुमित होता है कि हिंदी साहित्य का प्रचार साहित्येत्तर और गैर हिंदी जमातों तक सुनिश्चित हो रहा था.

जारी….

 उदय शंकर

उदय शंकर

 

जेएनयू से पीएचडी के लिए शोधरत। तीन खंडों में आलोचक सुरेंद्र चौधरी के रचना संचयन का संपादन। सांस्‍कृतिक आंदोलनों से जुड़ाव। उनसे udayshankar151@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

 

वेलरियन ब्रौव्चेक: प्रगीत विधा का जीनियस फ़िल्मकार

By उदय शंकर 

(यहाँ फ़िल्मकार का कोई मूल्यांकन करने या या उसके फिल्मों को विश्लेषित करने की कोशिश नहीं की गई है। बल्कि एक ऐसे फ़िल्मकार को जिसे भारी उपेक्षा और एक स्तर की बदनामी झेलनी पड़ी उसको याद करने भर की कोशिश है। अभी उसकी फिल्मों को ठीक से पुनर्संयोजित भी नहीं किया जा सका है। अधिकांश फिल्में प्रोड्यूसर के गोदाम में पड़ी बर्बाद हो रही हैं। इधर कुछ जागरूकता बढ़ी है और लोगों ने खोज-खबर लेनी शुरू की है। देखते हैं कितना कुछ बचाया जा सकता है।  लेकिम एक ‘फतवा ‘तो दिया ही जा सकता है कि वेलरियन ब्रौव्चेक जैसा ‘हुनरमंद ‘यूरोपीय सिनेमा के इतिहास में न के बराबर हुये हैं। निम्नलिखित टेक्स्ट के बाद उसकी  शॉर्ट फिल्मों के  कुछ लिंक भी दिये जा रहे हैं। )

walerian Borowczyk

walerian Borowczyk

 एक जीनियस फ़िल्मकार कैसे ताउम्र एक ‘पोर्नोग्राफर’ फ़िल्मकार का खिताब ढोता रहा, उसका एक अद्भुत उदाहरण है- वेलरियन ब्रौव्चेक। वह इस तमगे से कैसे पीड़ित रहा होगा, हम इसकी सिर्फ कल्पना कर सकते हैं क्योंकि इस बावत उसका कोई रक्षात्मक बयान भी सामने नहीं आता है। हालांकि उसके बड़े कैनवास की फिल्मों को ही लोग सिर्फ देखते रहे और आलोचित करते रहे। लेकिन इसमें भी सच्चाई नहीं है। जिस न्यूडिटी को बर्गमैन जैसे फिलकार एक आध्यात्मिक दिव्यता के साथ प्रस्तुत करते हैं, उसी दिव्य-दृष्टि की ‘हिंसक अन्तर्रात्मा’ को पूरी नग्नता के साथ बेलौस होकर वेलरियन ब्रौव्चेक अपनी फिल्मों में प्रस्तुत करता है। यूरोपीय सिनेमा (सोवियत ब्लॉक) का अतिप्रचारित बहुलांश ईसाइत से अनुप्राणित आध्यात्मिक संवेगो से चालित चालाक राजनीतिक फिल्में हैं। इन फिल्मकारों की कम से कम तीन बिंदुओं के आस-पास सहमति थी। मैंने कहीं और भी लिखा था, उसे यहाँ भी दुहराना आवश्यक है-

  • उनमें एक सोवियत विरोधी टोन हमेशा मौजूद है।
  • ईसाइयत-घटाटोप से लैस एक तरह की आध्यात्मिकता भी अधिकांश में आभासित होती रहती है।
  • इनमें म्यूजिक-कंपोजर की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण है, जिनके ऊपर पश्चिमी -संगीत का व्यापक असर है क्योंकि ‘अभिजात’ अवसाद बिना इलेक्ट्रॉनिक म्यूजिक और सिंथेसाइज़र के भरा-पूरा नहीं लगता है।

इन विशेषताओं को एक-एक फिल्मकारों के लिए हम सामान्यकृत भले नहीं कर पाएं लेकिन इनके कारण जो एक भरा-पूरा माहौल बनता है उसकी सामान्य विशेषताओं में मैं इन्हें जरुर पाता हूँ।

इस मायने में वेलरियन ब्रौव्चेक एक सीधा-साधा और नीडर फ़िल्मकार था। राजनीति उसे उतनी ही आती थी जितना किसी भी सामान्य प्रगतिशील इंसान को आती है। उसकी राजनीति के दो बिंदुओं को कोई भी बहुत ही स्पष्टता से पकड़ सकता है-

  • कैथॉलिक चर्च द्वारा सामाजिक जीवन को प्रभावित करने की जो धार्मिक राजनीति थी, उसका वह आजीवन घोर विरोधी रहा। कैथॉलिक चर्च का उतना बड़ा आलोचक यूरोपीय सिनेमा ने दूसरा कोई और नहीं दिया। उसकी फिल्मों में नग्नता का बहुलांश इसी विषय के इर्द-गिर्द वाली फिल्मों में दृष्टिगोचर होता है। क्योंकि आर्थिक संसाधनों पर जब से पूंजीवादी राज्य-शासन-प्रणाली का कब्जा हुआ है तब चर्च जैसी धार्मिक संस्थाएं सांस्कृतिक कार्यव्यवहारों तक सीमित हुयी हैं और उनके इस सांस्कृतिक पूंजी पर सबसे बड़ा हमला अक्सर प्रगतिशील/प्रेमिका महिलाएं करती रही हैं।
  • युद्ध की विभीषकाएँ, परमाणु बम का हमला और किसी भी तरह की सैनिक कार्यवाहियों का एक रचनात्मक विरोध उसकी फिल्मों की बड़ी विशेषता रही है।

  लेकिन जब इस राजनीति के इर्द-गिर्द वह रंग भरता था और उसको गति देता था तो कृष मार्कर जैसे बौद्धिक फ़िल्मकार को भी वह चकित कर देता था, खासकर छोटी फिल्मों में जहां उसकी कला अपने चरम को छू जाती है। उसकी फिल्मों से बौद्धिक उत्तेजना कितनी मिलती है यह बताना पेशेवर बौद्धिकों का काम है। लेकिन हम इतना जरूर कह सकते हैं कि भावना की तारों को  झनझनाने वाले फ़िल्मकार रेयर ही हुये हैं और उसमें वेलरियन ब्रौव्चेक का नाम सबसे पहले सम्मान के साथ लिया जाना चाहिए। कृष मार्कर जैसे बौद्धिक फ़िल्मकार के साथ उसकी दोस्ती मूलतः बुद्धि और भावना का ही योग है। अकारण नहीं है कि पोलैंड से फ्रांस आ जाने के बाद उसने पहली फिल्म Les Astronautes(1959) कृष मार्कर के साथ बनायी। वेलरियन ब्रौव्चेक के प्रति सोवियत संघ कोई उदार था, यह नहीं कह सकते हैंक्योंकि उसकी फिल्म Goto – Island of Love(1968) कम्युनिस्ट पोलैंड में प्रतिबंधित हो चुकी थीं। लेकिन, अभी तक के अवलोकन से मुझे नहीं लगता है कि उसकी फिल्मों का टोन सोवियत विरोधी रहा है। जैसा की मैंने पहले भी कहा कि वह सीधा-साधा कलाकार था और  लेफ्ट बैंक के फ़िल्मकार कृष मार्कर की अपेक्षा बहुत ही कम राजनीतिक था फिर भी उसका मित्र था। लेफ्ट बैंक की फिल्मों को प्रोड्यूस करने वाले ARGO ने उसकी फिल्मों को प्रोड्यूस किया। वह पेंटिंग, लिथोग्राफी, पोस्टर मेकिंग, कॉमिक्स-राइटिंग में निष्णात था। इसलिए वह छोटे कैनवास की फिल्मों का उस्ताद था। जैसे कृष मार्कर की बौद्धिक डाक्यूमेंट्री फिल्मों की विधा को निबंध/लेख कहा जाता है, वैसे ही वेलरियन ब्रौव्चेक की छोटी फिल्मों को प्रगीत की संज्ञा दी जा सकती है, सुगठित और अपनी मारक-क्षमता में अचूक, लिरिकल फिल्में।

The Astronauts (1959) का एक दृश्य

The Astronauts (1959) का एक दृश्य

Once Upon a Time (1957)

Dom(1958)

School (1959)

The Astronauts (1959)

Renaissance(1963)

Games of Angles (1964)

Theater of Mr and Mrs Kabal(1967)

Une Collection Particuliere (973)

  जारी…..

 उदय शंकर

उदय शंकर

जेएनयू से पीएचडी के लिए शोधरत। तीन खंडों में आलोचक सुरेंद्र चौधरी के रचना संचयन का संपादन। सांस्‍कृतिक आंदोलनों से जुड़ाव। उनसे udayshankar151@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

 

 

 

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