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निमित्त: उस्मान ख़ान

एक भविष्य-दृष्टि के साथ देखें या मौजूदा वक्त की निगाह से देखें या बहुत दूर नहीं गए व्यतीत के साये में देखें… कैसे भी देखें यह कहते हुए अफसोस होता है कि हिंदी कहानी बहुत देर से खुद को संदेहास्पद बनाने के आयोजन में मुब्तिला है। कहानी एक सुंदर विधा है और अगर उसे एक स्त्री मानें तब यह कह सकते हैं कि वह इन दिनों अपने रचयिता की जबरदस्ती से आजिज है। यहां मौजूद कवि उस्मान खान का गद्य इस औरत को उसकी आजिजी से आजाद कराने की एक इंकलाबी कोशिश है। गद्य इसे यूं कहा जा रहा है क्योंकि कहानी के मानकों पर यह कहानी पूरी नहीं उतरती। इसकी जिंदगी इसके उन्वान को सही नहीं ठहराती। ‘निमित्त’ का मतलब शब्दकोशों में ‘कारण’, ‘लक्ष्य’, ‘मकसद’ वगैरह बतलाया गया है। इस गद्य में जो घट रहा है, उसका निमित्त जाहिर तौर पर इस गद्य में नहीं मिलेगा। यहां गद्यकार के पास वक्त बहुत कम है और घटनाएं बहुत ज्यादा। जैसे एक छोटे से सफर में कोई हमसफर जब पूरी जिंदगी का सफर जानना चाहता है, तब बयान करने वाली कोशिश ‘क्या घटनाएं हुईं’ यह बताने की होती है, यह बताने की नहीं कि ‘घटनाएं क्यों हुईं’। इस प्रक्रिया में वाग्जाल और विस्तार कम होता है। सुनने वाला इसे संदेह से नहीं देखता, उसे सोचने का रोजगार मिल चुका होता है। संदेहास्पद कहानियों के दौर में ‘निमित्त’ एक ऐसी ही कहानी है— सोचने का रोजगार सौंपती हुई। इसने वह शिल्प नहीं चुना है जो मानकों को पूरा करने के लिए अपनी असलियत से अलग हो जाता है। यह कहानी उन कहानियों की तरह नहीं है, एक पैराग्राफ तक चलकर पढ़ने वाले जिनकी उंगली छोड़ देते हैं। #अविनाश मिश्र 

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Snap Shot from Titas Ekti Nodir Naam (1973)


निमित्त

 By उस्मान ख़ान

‘जी नहीं, आपके कहने से मैं इश्वर या धर्म पर विश्वास नहीं कर सकता! आपका ख़ुदा कैसा जीव है! न सुनता है, न देखता है, न बोलता है। उसे कुछ महसूस नहीं होता। वह खुश नहीं होता, नाराज़ नहीं होता। न्याय-अन्याय से उसे कुछ लेना-देना नहीं। फ़िर भी आपने अपनी ख़ुशी के लिए एक कल्पना-लोक बनाया है, जिसमें आप जो चाहें, हो सकता है। आपको अपनी कमज़ोरियों और कमअक़्ली को छुपाने के लिए एक खोल चाहिए, आपने अपने बाहर एक शक्ति को मान लिया, जो आपकी कमज़ोरी और कमअक़्ली को दूर कर सकती है, आप उसकी शरण में जाते हैं, उससे गुहार करते हैं, उसकी मनुहार करते हैं, वह नहीं सुनता, नहीं ही सुनता। वह हो तो सुने!’

इतना सुनने की देर थी कि बाबा ने मुझे धक्का मारकर घर से बाहर किया। ‘बदतमीज़! हरामख़ोर! भगवान को गाली देता है!’। मैं भी चुपचाप निकल गया। बाबा खुद भी जानता है कि उसने रो-रोकर, गिड़गिड़ाकर भगवान से अपनी पहली बीबी की जान की भीख माँगी थी, और भगवान ने उसकी अनसुनी कर दी थी। बाबा जब भी पहली माँ की बात करता है, भगवान को एक-दो गाली ज़रूर देता है। लेकिन मैं कैसे गाली दे सकता हूँ? भगवान का ठेका तो बाबा का है। बाबा भी ढकोसलेबाज़ है।

मुँह-अँधेरे मैं घर की दीवार से चिपककर सिर झुकाए ऐसे गली पार करता हूँ जैसे कोई उल्का-पिण्ड। तुरंत। मेरे पैर इतनी तेज़ी से उठते हैं जैसे रेल चल रही हो। मैं पूरी कोशिश करता हूँ कि घर में किसी के भी जागने से पहले घर से निकल जाऊँ। पहली बार जब आई ने दरवाज़ा खुला देखा था, तो क्या सोचा होगा! उसने मुझे कुछ कहा नहीं। मुझे पता है, मेरे बाद वही जागती है और सबसे पहला काम दरवाज़ा बंद करने का करती है। रात को भी वह दरवाज़ा अटकाकर सोती है, मैं जब चाहूँ घर आ सकता हूँ!

घर में सब लोग इस बारे में जानते हैं। कोई कुछ कहता नहीं। सबने मेरे इस रूप को स्वीकार कर लिया है। पहले-पहल बाबा कुछ कहते थे, बाद में उन्हें भी कोई फर्क नहीं रह गया। बाबा कभी-कभी मुझे परेशान करने के लिए दरवाज़ा बंद कर देते हैं, मैं भी दरवाज़ा नहीं बजाता। चुपचाप लौट जाता हूँ।

लौट जाता हूँ! कहाँ लौट जाता हूँ? कहीं भी! घर मेरे लिए मजबूरी है, जैसे सोना। मुझे नींद आने लगती है, तो मैं घर आ जाता हूँ। सोता हूँ और फिर निकल जाता हूँ। कहाँ? कहीं भी!

असल में, घर मेरे लिए एक सराय का काम देता है। जश्न हमारे घर में वैसे भी नहीं मनाया जाता और कभी कुछ हँसी-खुशी का मौका होता है, तो मैं अपनी तथाकथित मनहूस सूरत नहीं दिखाता। त्यौहारों पर भी यही स्थिति होती है। सब मुझे भूल गए हैं, ऐसा भी नहीं। पर कोई मुझे याद करना चाहता है, ऐसा भी नहीं। मैं उन्हें कुछ दे नहीं पाया। यानी अपने परिवार को। आई हैं, बाबा है, भैया है, भाभी हैं और उनसे जुड़े तमाम रिश्तेदार हैं। रिश्तेदार अक्सर आते-रहते हैं और अक्सर ही मैं इधर-उधर भटकता अपनी नींद को बहलाता रहता हूँ। भैया की स्थिति भी ऐसी ही है, वह भी घर से भागा फिरता है, जबकि वह कमाता है और कमाना अपने-आप में एक जादू है, जो लोगों को आपकी ओर आकर्षित करता है, आप जितना कमाते हैं, लोग उतना ही आपकी तरफ खींचते चले आते हैं और जहाँ आपने कमाना बंद किया लोगों को आपसे चिढ़ होने लगती है, आई भी जली-कटी सुना देती है, फिर और किसी का क्या कहूँ। हालाँकि मैं भिड़ जाता हूँ, ख़ासतौर पर रिश्तेदारों के साथ, उनसे मुझे और भी कुछ लेना-देना नहीं रहता। मैं उन्हें खरी-खोटी सुनाता हूँ। उनके मुँह पर उनके काले धंधे और धुर्तताओं की बात करता हूँ। वे मुझसे ख़ार खाते हैं। मैं उनसे मज़ा पाता हूँ।

आप सोच रहे होंगे मैं कोई काम क्यों नहीं करता। दरअसल, मैं कोई काम करना नहीं चाहता। काम करने से क्या होता है? काम करने से आज तक किसी को कोई फायदा हुआ है! कुल मिलाकर रुपया कमाने के अलावा काम करने का कोई और मकसद मुझे नज़र नहीं आता। और मैं रुपया कमाना नहीं चाहता। जी नहीं! ऐसा नहीं कि मैं निठल्ला हूँ। मैं पूरा दिन और कभी-कभी पूरी रात भी घुमता रहता हूँ। इस गली से उस गली, इस मुहल्ले से उस मुहल्ले, इस चौक से उस चौक। मैं दिन-भर चलता रहता हूँ। इस शहर का एक-एक हिस्सा मैं माप चुका हूँ। अब यह तो कोई काम नहीं है, और इस काम का कोई रुपया भी नहीं देता। और अगर देता भी, तो मैं लेता नहीं।

फिर आप कहेंगे मैं खाता-पीता कहाँ से हूँ? मैं कुछ छोटे-मोटे काम करता हूँ। फ्री-लांसिंग समझिए! तब भी मुझे घर से लगाव है। पता नहीं मेरा मन यहाँ अटका रहता है। सोने को तो मैं कहीं भी सो सकता हूँ। पर कहीं भी सोने पर बाबा घर ले आते हैं। कभी मुझे समझ नहीं आता कि ये लोग मुझसे चाहते क्या हैं? रुपया! बस यही एक चीज! क्या रुपये के बाहर आदमी का कोई काम नहीं! भैया बोलता है कि मैं अव्यवहारिक हूँ। मैं ध्यान नहीं रखता किसके सामने क्या बोलना चाहिए। मैं मूढ़मगज हूँ। ऐसा भैया का कहना है। मेरा मानना है वह एक हाफ-फ्राई ऑमलेट है, जिसे वास्कोडिगामा ने बनाया था और अब फफूँदा चुका है। वह इन्सान नहीं है। रुपये का भक्त है। एक-एक रुपये का नफ़ा-नुकसान जोड़ता रहता है। उसने अपनी एक दुकान डाल ली है। उसी पर ऐंठता है। और कुछ नहीं। बाबा जानता है कि भैया मकान के चक्कर में उसकी देख-रेख कर रहा है। अगर आज वो मकान भैया के नाम करा दे, तो भैया कल ही उसे घर से निकाल दे। या कम से कम ऊपरवाली कोठरी में डाल दे, जिसमें अभी मैं डला हुआ हूँ!

बाबा मुझे ठीकाने से लगाना चाहता है, लेकिन हार चुका है, एक वह समझ चुका है कि मुझे नहीं समझाया जा सकता। भाभी अब भी समझती है कि मुझे दुनियादारी के काम में लगा सकती है, पर मेरा ख़याल है वह ग़लत समझती है, बल्कि मेरा मानना है कि वह मुझे समझती ही नहीं। उसे मेरी शादी के अलावा कुछ नहीं सूझता। उसे लगता है शादी ही मेरे मर्ज़ का ईलाज है। वैसे मेरा मर्ज़ है क्या?

मैंने कहा कि मैं रुपया नहीं कमाता, इधर-उधर घुमता रहता हूँ, कभी कोई काम मिल जाए तो कर लेता हूँ, वह भी मनमाफिक, मन नहीं हो तो कोई मुझसे काम नहीं करवा सकता, कोई कितना ही बड़ा तीसमारख़ाँ क्यों न हो, कितनी ही नौकरियाँ मैंने ऐसे ही गँवाई है। बाबा ने अब किसी से मेरी नौकरी के बारे में बात करना भी बंद कर दिया है। कभी-कभी अच्छा लगता है कि सभी लोगों ने मेरे इस रूप को स्वीकार कर लिया है।

खै़र! जब मैं सुबह दीवार से चिपककर तेज़कदम गली पार करता हूँ, तो मेरा मकसद सीधे बस-अड्डे की तरफ जाना होता है। बस-अड्डे पर भाई लोग खड़े रहते हैं। इनमें से अधिकतर लड़के अख़बार का इंतज़ार कर रहे होते हैं। अलग-अलग बसों में अख़बारों के बंडल रख दिए जाते हैं और फिर भाई लोग फ्री हो जाते हैं। वे सब मुझे जानते हैं। मैं कभी-कभी उनके साथ भी बैठता हूँ, ख़ासकर ठंड के वक़्त, जब वे लोग टायर जलाकर हाथ तापते हैं। ज़्यादातर लड़के कॉलेज में हैं, एक-दो अनपढ़ हैं और दो, जिन्हें मैं पहले जुड़वा भाई समझता था, पिछले पाँच साल से दसवीं पास करने की कोशिश कर रहे हैं। यही आठ-दस लड़कों का झूंड हर सुबह यहाँ पहुँचता है। ये लोग शोर-गुल मचाते हैं। बसों में सवारियाँ बैठाते हैं, सामान लादते हैं, ग़रज़ कि दिन-भर बस-अड्डे पर अपना टाईम काटते हैं और रुपया कमाते हैं। मुझे पढ़ा-लिखा और सीधा-सादा आदमी समझते हैं, सोचते हैं मुझे दुनिया की ज़्यादा ही फिक्र है। लेकिन जैसा कि उस दिन महेश कह रहा था, मैं कुछ नहीं कर सकता। सोचने से कुछ नहीं होता। शायद उस दिन वह किसी से नाराज़ होगा, और अपना गुस्सा मुझ पर निकाल रहा होगा। वर्ना वह ऐसा क्यों कहता!

मैं हर सुबह दो घंटे इसी बस-अड्डे पर बिताता हूँ। अब ये लोग मुझे हर रोज़ देखने के आदी हो गए हैं। जब शुरू में मैं यहाँ आता था, तो ये लोग मुझे हैरत और शक की नज़र से देखते थे। धीरे-धीरे मुझे जानने लगे, और मुझे अहानीकारक जानकर मेरी उपेक्षा करने लगे। मुझे उनकी उपेक्षा से कोई फर्क नहीं पड़ता।

बसों की आवाज़, लोगों के शोर-गुल के बीच यहाँ सुबह होती है। अलग-अलग दिशाओं में जाने वाले लोग इकट्ठा होने लगते हैं। कुछ लोग रोज़ के मुसाफ़िर हैं, उन्हें भी मैं पहचानता हूँ। फिर भी एक अनजानापन सबके चेहरे पर दिखाई देता है। वे लड़के भी मुझे नहीं जानते, दुकानवाले भी नहीं, मुसाफ़िर भी नहीं। वे सब असल में मुझे सनकी समझते हैं।

वैसे मैं मृदुभाषी हूँ। लेकिन मैं उनकी हाँ में हाँ नहीं मिला सकता। ख़ासतौर पर बुढ़ों में मैं यह बीमारी पाता हूँ। वे चाहते हैं कि मैं उनकी बातें सिर हिलाकर स्वीकार करता जाऊँ, लेकिन ये मुझसे नहीं होता। मैं कैसे काले को सफेद मान सकता हूँ, फिर चाहे कोई महात्मा ही यह बात मुझे क्यों न कहे! पर लोग जब अपने से ही जुदा हैं, तो फिर मुझसे कैसे मिलेंगे! हो ही सकता है, ऐसा मैं सोचता हूँ, क्योंकि कभी-कभी मुझे यह भी लगता है कि यह मेरी हताशा है, जो मुझे ऐसा सोचने पर मजबूर करती है, वर्ना ये लोग तो खुश हैं। अपना काम करते हैं, रुपया कमाते हैं, घर-परिवार देखते हैं, मान-सम्मान पाते हैं। इन्हें बेवजह दुःखी क्यों माना जाए!

हर रोज़ सूरज उस कचरे के ढेर के पीछे से उगता है। कुत्ते उस ढेर पर लोटते रहते हैं। सुअर चरने के लिए आते हैं। ढेर से कचरा निकालकर ठंड में लड़के जलाते हैं।

इस दीवार की टेक लगाए मैं हर रोज़ की योजना तैयार करता हूँ, यानी आज मुझे कहाँ जाना है? किधर घुमना है? मैं झूठ नहीं बोलूँगा, कभी-कभी अपनी धुन में मैं शहर से बाहर भी निकल जाता हूँ। आस-पास के देहातों में चक्कर मारता हूँ। मैंने चाय पी, पोहा खाया और त्रिवेणी की तरफ़ चल दिया। आज का दिन उधर ही गुज़ारने का विचार था। त्रिवेणी उस जगह का नाम क्यों है? मेरी जानकारी में इसीलिए कि कभी वहाँ तीन नालों का संगम होता था, पर समय के कचरे-गंदगी ने उन नालों में बहते प्रसाद जल को काला-बदबूदार बना दिया था और दो नालों पर बस्तियाँ बन चुकी थी। एक नाला बचता था, जो अब भी वहीं स्थिर है, काला-बदबूदार जल बहाता हुआ। पर तब जब ये नाले साफ़ पानी से भरे रहते थे कुछ जोगियों ने अपना मठ इनके किनारे बनाया। आज वह मठ बस्ती के बीच आ गया है। लेकिन मठ की बावड़ी बस्ती से थोड़ी दूर है। मठ के पास काफ़ी जगह है। जिसमें कुछ खेत हैं, दुकाने हैं और एक बाग़ीचा और एक बड़ी बावड़ी है। असल में, त्रिवेणी की तरफ जाने का मतलब इस बावड़ी की तरफ जाना ही है। गर्मियों में बावड़ी के आस-पास इतनी शीतलता रहती है कि सो जाने को मन करता है, पर पूजारी या कभी दुकानवाले आकर उठा देते हैं। और फिर उनसे कौन चिक-चिक करे! पर वे भी मुझे जानते हैं, और अक्सर टोकते नहीं, पर जानते हैं कि मेरी जेब में माताजी के दान-पात्र में डालने के लिए कुछ भी नहीं रहता है; बल्कि भोग वगैरह के वक़्त मैं अक्सर उपस्थित रहता हूँ। शायद इसीलिए उनके मन में मेरे लिए कुछ कलुष है! पर मैं वहाँ पहुँच ही गया।

अभी आठ ही बजे थे। एक माशूक-आशिक पहले ही बरगद के नीचे बैठे थे। मुझे देखकर थोड़ा संभल गए। किताब लेकर ऐसे देखने लगे, जैसे इतिहास या विज्ञान की सबसे गंभीर समस्या पर चिंतामग्न हों। मैंने उनकी उपेक्षा की, और आगे बढ़ गया। देखता क्या हूँ, दूसरे बरगद के नीचे एक और जोड़ा बैठा है। उफ़! इन तोता-मैनाओं ने हर दृश्य ख़राब कर रखा है। कभी-कभी सोचता हूँ नौजवानों की उस मुहिम से जुड़ जाऊँ, जिसमें ऐसे जोड़ों को देखते ही उनके घर फोन कर दिया जाता है, और हीर-राँझे की अच्छी-ख़ासी बेइज़्ज़ती की जाती है। पर, यह क्रूर आनंद मैं मन ही मन लेता रहा। मुझे इन लड़कियों में रुचि नहीं। इन लड़कियों में जान नहीं होती। ये अपने कहे पर टिकी भी नहीं रह सकतीं। मुझे तो लगता है, मौज-मस्ती के लिए ही ये लोग यहाँ आते हैं, या किसी भी ऐसी शांत जगह पर जाते हैं, जहाँ इनकी चहचहाहट कोई न सुने। फिल्मों ने इनके दिमाग़ का सत्यानाश कर दिया है। हर कोई अपने को फिल्मी नायिका या नायक समझता है। वैसे ही चलते-फिरते हैं। बैठते-उठते हैं। हँसते-रोते हैं। कपड़े पहनते हैं। गाने गाते हैं। इन्हें देश-समाज से कुछ लेना-देना नहीं है। एक-दूसरे को छूने-चूमने-भोगने के अलावा इनके पास कोई विषय नहीं है। टॉकिज के बच्चे!

मैं आगे बढ़ता गया। दूसरे के बाद तीसरा जोड़ा मिला। खै़र हुई चौथा जोड़ा नहीं मिला, फिर भी दो और बरगद छोड़कर मैं सातवें बरगद तक पहुँचा। यह बाग़ीचे का आख़री बरगद है। इसके बाद खेतों का सिलसिला शुरू हो जाता है। इस बरगद के बाद, कुछ जगह छोड़कर, जामून और अमरूद के पेड़ लगे हैं, और साथ में ही मिर्च, धनिया और बैंगन-टमाटर, पुदीना-जैसे पौधे-पत्ते लगे रहते हैं। बाग़ीचे का यह कोना ही मुझे सर्वाधिक पसंद है। इधर तक कोई नहीं आता। मैंने थोड़ी देर में तीनों जोड़ों की सुध लेने की सोची। समाज में बेहयाई मुझे पसंद नहीं। जो करना है विधि-विधान से करो। यह क्या कि आज इसका हाथ पकड़े घुम रहे हैं, कल उसका मुँह चूम रहे हैं! यह सब मुझे लफंगई लगती है। लड़का करे या लड़की। मैंने देखा तीनों यथावत् प्रेम-क्रीड़ा में संलग्न हैं। वे मुझे भूल चुके। एक लड़की की खीं-खीं मेरे तन-बदन में आग लगा गई। झुँझलाकर मैंने एक पत्थर उठाया, और पहले बरगद की ओर फेंका। मुझे अचानक इन लोगों पर गुस्सा आने लगा था। पत्थर सीधे लड़की के सिर पर लगा था। लड़की खून-झार हो गई। लड़का दौड़कर मेरी तरफ़ आने लगा। मैं शांत मूरत बनकर बैठा रहा। एक पल के लिए लड़का रुका, फिर पीछे दौड़कर गया। लड़की को देखने लगा। फिर दौड़कर मेरी तरफ़ आया। लड़की की चीख़ सुनकर बीचवाले दोनों जोड़े भाग गए थे। लड़का मेरे पास पहुँचा, ‘भैया, देखिए न दीदी को किसी ने पत्थर मार दिया है!’। मेरी जान में जान आई, मुझे समझ आया कि उसे मुझ पर नहीं किसी और पर शुब्हा है। मैं उसके साथ दौड़कर उस तरफ़ गया। देखा लड़की प्राण त्याग चुकी थी। उसकी सफ़ेद चुनरी लाल हो गई थी। एकबारगी मेरे शरीर में झुनझुनी दौड़ गई। मैंने बोला, ‘यह तो गई!’। लड़का वहाँ से भाग खड़ा हुआ। मैं चिल्लाता रहा, ‘अबे! कहाँ भाग रहा है? क्या कर दिया लड़की का?’ मैंने देखा अब वहाँ कोई नहीं था। मैंने लड़की का चेहरा ग़ौर से देखा। वह मेरी भाभी थी। अब मैं लड़के का चेहरा याद करने लगा, लेकिन मुझे याद नहीं आ रहा था।

मैं धीरे-धीरे उस जगह से दूर निकल गया। मन फिर शांत होने लगा। मुझे नहीं पता कि मैंने इतनी आसानी से यह फैसला कैसे ले लिया! मुझे अपनी आज की योजना में फेर-बदल करना पड़ा। मैं अब शहर के दूसरे कोने की ओर जाना चाहता था। लेकिन, शहर के अंदर से होकर नहीं। मैंने सोचा था कि एक बजे तक गंगानगर पहुँच जाऊँगा। वहीं कुछ खाऊँगा, और फिर शाम वहीं काटूँगा। गंगानगर शहर का बाहरी ईलाक़ा है। यह नगर अभी बस रहा है। जब सरकार ने ग़रीबों के लिए घर बनाने की सोची, तो शहर के बाहर इस कुड़ेदान को चुना। इसके आगे खेत शुरू हो जाते हैं और फिर उबड़-खाबड़ ज़मीन जो जंगल में बदलती जाती है। गंगानगर भी एक बस-अड्डा है। यह एक छोटा बस-अड्डा है। यहाँ से गाँवों की तरफ़ जाने वाली बसें मिलती हैं। बस-अड्डे से थोड़ी दूर सड़क के किनारे एक दुकान है, जहाँ दिन में आपको खाना मिल सकता है। मैं खाना खाकर झरने तक घूमने भी जाऊँगा, और अगर मन हुआ, तो नहा भी लूँगा।

दुकान तक पहुँचते हुए एक बार मेरे पैर लड़खड़ाए, जैसे मुझे चक्कर आ गया हो। मैंने खुद को संभाला और दुकान के बाहर लगी बेंच पर बैठ गया। दुकानवाला मेरा मुँह ताक रहा था। फिर मेरी ओर देखकर मुस्कुराने लगा। मैंने एक दर्दभरी मुस्कान दी। वह मेरे पास आकर बोला, ‘क्या हुआ?’

मैंने कहा, ‘चक्कर आ गया!’ वह फिर मुस्कुराने लगा। ‘अभी तो गर्मी शुरू भी नहीं हुई, अभी से चक्कर खाकर गिरने लग गए!’ अब मैं मुस्कुराया। मैंने खाना खाया और एक लस्सी पी। जान में जान आई। पर, एक फाँस-सी गले में लग रही थी। बार-बार प्यास लग रही थी। आखिर मैं उठकर झरने की तरफ चल दिया।

इस पगडंडी से मैं कई बार झरने की तरफ गया हूँ। मैं देख रहा था, आसमान एकदम साफ़ था। नील। कुछ एकदम सफ़ेद-झक बादलों के टुकड़े थे, जो इधर-उधर खिसक रहे थे, ऐसा लग रहा था जैसे नीले दवात पर रुई के फाहे इधर-उधर तैर रहे हों। अब इस पगडंडी पर मैं अकेला चला जा रहा हूँ। धीरे-धीरे शहर की सब निशानियाँ गुम होती जा रही हैं। तालखेड़ी आ गया। गाँव के किनारे होते हुए मैं आगे बढ़ता जा रहा हूँ। देखता हूँ, पगडंडी पर कुछ लोग अर्थी लिए जा रहे हैं। मैं धीरे चलने लगता हूँ, ताकि उन लोगों से एक निश्चित दूरी बनाए रख सकूँ। पर, कदम अपनी गति पकड़ लेते हैं। मैं उनके करीब पहुँच गया हूँ। उलझन में हूँ, उन लोगों से आगे निकलना ठीक नहीं जान पड़ रहा, पता नहीं क्या सोचने लगें! कहीं कोई झगड़ा न करने लगे! आखिर, मैं उनके पीछे-पीछे चलने लगा। एक-दो लोगों ने मुझे पलटकर देखा, और फिर अपनी गति से चलने लगे। कुछ देर में वे लोग पगडंडी छोड़कर खेत के रास्ते आगे बढ़ गए। मैं झरने की तरफ बढ़ने लगा। झरने के पास जाकर बैठ गया।

शाम हो चुकी थी। दूर-दूर तक पंछियों के झुंड दिखाई दे रहे थे। झरने के पास कुछ पक्षी-दल उतरते, और दाना-पानी करके आगे बढ़ जाते। कुछ ही मिनटों में वह जगह पंछियों के कलरव से भर गई। झरने की आवाज़ पंछियों के शोर-गुल में दब गई। इन पंछियों को मेरे आस-पास भटकने से डर नहीं लग रहा था। मैं मूर्ति की तरह अचल बैठा था। मेरे कंधे, सिर, गोद सब पर पंछी बैठे थे। मैं आँखें बंदकर उनके नाखुनों और चोंच के वार सह रहा था। मुझे इस काम में अद्भूत आनंद मिल रहा था। जैसे, शरीर और दिमाग़ दोनों एक साथ हलके होते जा रहे थे। जीवन का कौन-सा सुकून था, जो इस रास्ते मिलना था! मेरा मन शांति से सराबोर था। इस तरह ताज़ा महसूस हो रहा था, जैसे शरीर श्मशान का धूँआ खाने के बाद नहाने पर करता है। मेरा रोम-रोम धूल रहा था कि एक आदमी ने हाँका लगाया। वह दौड़कर मेरे पास आ गया। मैंने चौंककर उसे देखा। वह हाँफ रहा था। अचरज से मेरी ओर देखते हुए बोला, ‘क्या हो रहा है?’

मैंने पहले अपनी तरफ़ देखा, मेरे शरीर पर जगह-जगह घाव हो गए थे, पर मुझे दर्द नहीं हो रहा था। मेरा शरीर जैसे सुन्न था। दिमाग़ भी कुछ ग्रहण नहीं कर रहा था। मैं उस आदमी को देखता रहा। उसके पीछे नीला आकाश था। मुझे चक्कर-सा आने लगा।

जब जागा तो देखता हूँ, अपने घर में हूँ, मेरी झाड़-फूँक हो रही है। मेरे शरीर के घाव कसक रहे हैं। मैं आई को आवाज़ देता हूँ। आई मेरे पास आकर बैठ जाती है। मेरी नज़र भाभी की माला चढ़ी तस्वीर पर पड़ती है। मैं रोने लगता हूँ। आई मेरे सिर पर हाथ रखती है, और कहती है, ‘सब ठीक हो जाएगा!’ लेकिन मेरी आँखों से आँसू बहे जा रहे हैं, और मैं लगातार कहे जा रहा हूँ, ‘मैं अब रुपया कमाऊँगा!’। एक साधू मेरे पास आकर खड़ा हो जाता है। मैं अपनी बात दोहराए जा रहा हूँ। वह मेरे सिर पर भभूत मलता है। मुझे पसीना आने लगता है। मैं अपनी बात दोहराए जा रहा हूँ। बाबा मेरे पास आकर खड़ा होता है। थोड़ी देर मुझे देखता रहता है, फिर एक ज़ोरदार तमाचा जमाता है, और मैं चुप हो जाता हूँ, उसका मुँह देखने लगता हूँ।

वह एक ऐसा दिन था, जिसने मेरी ज़िन्दगी बदल दी। मैंने भैया के सामने भाभी के साथ हुई दुर्घटना पर दुःख जताया, और अपनी सफ़ाई में यही कहा कि मुझे पता ही नहीं! किसी आवाज़ के पीछे-पीछे मैं झरने तक चला गया था! और, फिर आगे क्या हुआ, मुझे पता नहीं! बात यही थी कि तालखेड़ी का ही कोई आदमी मुझे झरने के पास से उठाकर लाया था, बाद में, गंगानगरवाले दुकानदार से बात करके पता चला कि उसने ही मेरे मामा को सूचित किया था। वह मेरे मामा का पुराना दोस्त है। फिर, मैं एक दिन अस्पताल में भी बेहोश रहा। घर पर भी एक-दो दिन बदहवासी की हालत में रहा।

धीरे-धीरे मेरे घाव भर गए। कई बार सोचा कि भैया या आई को बता दूँ कि भाभी को पत्थर मैंने ही मारा था। पर इससे बात उलझ जाएगी। वे लोग समझ नहीं पाएँगे, और मैं भी समझा नहीं पाऊँगा। अब मैं बस-अड्डे या त्रिवेणी या गंगानगर या शहर-सराय की तरफ नहीं जाता। इधर-उधर भटकना भी मैंने बंद कर दिया है। मन में एक कचोट रहती है, पर कोई तरीका नहीं सूझता, क्या करूँ? जो मैंने किया है, उसका कोई दोष अपने ऊपर नहीं मानता। आखिर, मैंने जान-बूझकर कुछ नहीं किया। मुझे क्या पता था कि पत्थर सीधा जाकर उसको लगेगा! और, वह मेरी भाभी होगी, और, वह भी इतनी कमज़ोर कि एक पत्थर की चोंट भी नहीं झेल पाएगी! भैया दूसरी शादी के लिए गोटी सेट कर रहे हैं। उनकी एक मुहब्बत थी। पिछले ही साल उसके भी पति का देहावसान हो गया। वह भी गली में ही रहती है। आई ने उसकी मौसी से बात की है। हो सकता है, अगले साल मेरे पास फिर से भाभी हो! आई मेरी भी शादी कराना चाहती है। मैंने भी इनकार नहीं किया। जिन रिश्तेदारों को मैं गाली दिया करता था, उनके साथ भी अब तमीज़ से पेश आता हूँ। भगवान को उलटा-सीधा बकना भी मैंने बंद कर दिया है। सब्ज़ी-मंडी में हिसाब देखने का काम पकड़ा है। काम अच्छा है। सुबह-सबेरे सब्ज़ी-मंडी पहुँच जाता हूँ, दिन-भर वहीं फलों और सब्ज़ियों की गंध में कटता है। शाम को सीधे घर पहुँचता हूँ। टी.वी. देखता हूँ। कभी चौक तक घुम आता हूँ। फिर सो जाता हूँ।

भाभी मेरी शादी करवाना चाहती थी। अगर ज़िंदा रहती, तो कितनी खुश होती कि मैं काम-धंधे से लग गया हूँ, और लड़की देखने के लिए उत्सुक हूँ। पर कौन जाने, तब ऐसा होता भी!

आखिर वह दिन भी आया, मेरी शादी हो गई। मैंने जब करुणा का घूँघट उठाया, मेरा दिल धक् करके रह गया। एकबारगी लगा, भाभी है। मैंने खट् से घूँघट छोड़ दिया। दूसरी बार घूँघट उठाने की मेरी हिम्मत नहीं हुई। आखिर करुणा ने ही घूँघट उठा दिया। मैं उसका चेहरा देखकर फुला नहीं समाया। मेरा वहम था, और कुछ नहीं। मैंने करुणा के कंधों को चूमा।

मेरी शादी हो गई थी, पर मैं करुणा से एक दूरी बनाए रहता था। उसके साथ अकेले रहने में मुझे शंकाएँ घेरने लगती थी। वह मेरे अतीत के बारे में कुछ नहीं जानती! मैंने कहाँ-कहाँ खाक छानी है? कैसे-कैसे पापड़ बेले हैं? वह कुछ नहीं जानती! वह मुझसे कुछ जानना भी नहीं चाहती। वह अपने में खुश है। बस उसे एक बच्चा चाहिए, फिर वह और खुश हो जाएगी। मुझे लगता है, उसकी ज़िंदगी में बस खुश होना ही लिखा है। वह हमेशा प्रसन्नचित्त रहती है। मैं भी उसे देखकर खुश होता हूँ। वह चपल है। चंचल है। जीवन से भरी हुई है। फिर भी, कभी-कभी मुझे डरा देती है। रात को जब वह पानी पीने उठती है, मैं उस पर नज़र रखता हूँ। अगर वह गु़सलख़ाने में जाए और ज़्यादा देर लगाए, मुझे आतुरता होने लगती है कि वह क्या कर रही है?

मेरी शंका ठोस होने लगी जब एक दिन मैंने करुणा को कमरे में अकेले कुछ बुदबुदाते सुना। मैं ऐसी बुदबुद अक्सर सुनता रहता था, पर पहली बार मैंने साफ़-साफ़ सुना। यह करुणा की ही बुदबुदाहट थी। मैंने गुसलख़ाने के दरवाज़े पर कान टिका दिए। वह कुछ मंत्र-सा बुदबुदा रही थी। बीच-बीच में मेरा नाम ले रही थी। गुसलख़ाने से अगरबत्ती की गंध आ रही थी। उसकी बुदबुदाहट तेज़ हो रही थी। मेरे मुँह से आवाज़ नहीं निकल रही थी कि एक हल्की-सी आवाज़ निकली, ‘करुणा!’। अंदर से बुदबुद की आवाज़ बंद हो गई। मेरी साँस में साँस आई कि देखता हूँ करुणा बालकनी से झाडू़ निकालती हुई कमरे में खिसकती आ रही है। वह मेरी ओर देखकर हल्के-से मुस्कुराती है, और अपने काम में मगन हो जाती है। मैं गुसलख़ाने का दरवाज़ा खोलता हूँ, अंदर बाल्टी में बूँद-बूँद पानी चू रहा है। मेरा हलक़ सूख रहा था, मैं गु़सलख़ाने का नल कसके बंद कर रसोई की ओर चला गया। आई और भैया रसोई में बैठे भैया की शादी में लगने वाले सामान की लिस्ट तैयार कर रहे थे। मैंने पानी पीया और आई के घुटने पर सिर रख रोने लगा। आई बोली, ‘क्या हुआ?’। मैं कुछ कह न सका। रोना बंदकर चुपचाप आई की गोद में लेट गया।

मैं सोचता हूँ कि अब समय इस बोझ को बढ़ाता ही जाएगा। मैं कभी यह स्वीकार नहीं कर सकूँगा कि मैंने ही भाभी को मारा है, अनजाने में ही सही। उन दिनों की उदासी और खीझ याद करके अब भी मेरा मन भर आता है। पता नहीं, उन दिनों क्या धुन रहती थी। कहीं मन नहीं लगता था। और अब, मन बीच-बीच में बेवजह हड़बड़ाने लगता है। साँस फूलने लगती है।

भैया की शादी हो गई। मेरे और करुणा के पास एक लड़की है। पता नहीं क्यों, आई ने उसका नाम महिमा रख दिया है! महिमा भैया की पहली पत्नी का नाम था। मेरे जीवन में और एक शाश्वत दुःख इस नाम के साथ आ गया। मैं आई को समझा भी नहीं पाया कि क्यों यह नाम नहीं रखना चाहिए! उल्टा मैंने देखा, आई ने जब मुझसे पूछा कि इसका नाम महिमा रख दें, तो मैंने ऐसे सहर्ष स्वीकृति दी, जैसे मैं ख़ुद यही नाम रखने वाला था।

पर इन दो वर्षों ने मुझे पूरी तरह बदल दिया। मेरे बाल सफेद हो गए हैं। चेहरा झुलसा हुआ लगता है। शरीर के पुराने घाव फिर उभर आए हैं। क्या बीमारी है, कुछ पता नहीं चलता! शरीर से मवाद निकलता रहता है। दर्द होता है। हगन-मूतने से भी मोहताज हो गया हूँ। करुणा दिन-रात मेरी देख-भाल में लगी रहती है। महिमा से ज़्यादा बच्चा मैं हो गया हूँ। देखता हूँ, सबको मेरी फिक्र लगी रहती है। भैया जैसा रुपयों का दास, मेरे ईलाज पर अपना सबकुछ लुटा चुका है। पर, मेरा शरीर छीजता जा रहा है। घावों के आस-पास लगता है माँस खींचा रहा है, जैसे घाव का छेद और बढ़ने वाला है। तेज़ दर्द होता है। मैं चीखता रहता हूँ। महिमा का कमरा अलग कर दिया गया है। उसे आई के कमरे में सुला दिया जाता है। नई भाभी मुझसे घृणा-सी करती है। उसका चेहरा देखकर मुझे अपने जीवन से और निराशा हो जाती है। लगता है, मैं मर ही जाऊँगा!

अब सोचने की क्षमता भी जवाब दे रही है। मैं कुछ बुदबुदाता रहता हूँ। कोई समझ नहीं पाता। करुणा भी रुखी और उदास होती जा रही है। बात-बात पर भाभी से झगड़ पड़ती है। कभी मुझे एक-दो दिन आराम भी रहता है। पर, यह आराम शारीरिक होता है। घाव जैसे टीसना कम कर देते हैं। वह भी आखिर थक जाते हैं। लेकिन, दिमाग़ में ख़यालों का अंबार लग जाता है। करुणा का क्या होगा? महिमा का क्या होगा?

कभी एक लाल चुनरी हवा में लहराती दिखती है।

धीरे-धीरे मैं ख़तम हो रहा हूँ।

एक दिन करुणा महिमा का झूला मेरे पलंग के पास डालकर खाना बनाने रसोई चली गई। महिमा थोड़ी देर हँसती रही, फिर चुप हो गई। मैंने पलंग पर लेटे-लेटे ही महिमा को संबोधित कर अपनी बात शुरू की…मैं नहीं जानता, उस दिन मुझे क्या हुआ था। पर न जाने क्यों, मैं अब भी, खुद को गुनाहगार नहीं मान पाता हूँ! आख़िर, वह एक पल का बहाव था। होनी कौन जानता था?…आदमी किन-किन चीज़ों के वश में नहीं होता! वह सोचता कुछ है, कहता कुछ है, करता कुछ है, और, होता कुछ और है! किसका मनचाहा हुआ है दुनिया में!…हाँ, ठीक है, मैं सच्चे मन से मानता हूँ कि मैंने ही भाभी को मारा है। बस!…मुझे लगा मेरे मन से एक बोझ हट गया।

धीरे-धीरे रात घिर आई। दो साल में मेरा हाल यह हो गया था कि अगर कोई मुझे पहली बार देखता, तो बाबा का भाई ही मानता। मेरे सारे बाल पक गए थे। दवाईयाँ खा-खाकर मुँह का स्वाद बिगड़ गया था। हमेशा थूकते रहने की इच्छा होती थी। धीरे-धीरे चारों ओर सन्नाटा पसर गया था। पूरा शहर इस वक़्त सो रहा है। नहीं, पूरा शहर कभी नहीं सोता! लेकिन, जितना सो रहा है, उतनों के सपने हैं, हाँ, ठीक है, सब लोग सपने भी नहीं देख रहे हैं, लेकिन आज रात जो लोग सपने देख रहे हैं, वे सब सुन लें, ‘मैंने ही अपनी भाभी की जान ली है!’।

हमेशा मैं ऐसा नहीं करता, पर आज मैंने दवाई नहीं ली। मैं चुपचाप लेटा था। कभी नींद का बगुला पलकों पर बैठ जाता था और कभी पंख फड़फड़ाकर उड़ जाता था। मेरी नींदे हराम थीं। इसीलिए मुझे दवाई खाकर सोना पड़ता था, पर कभी-कभी, मैं उसे टाल भी देता था। यानी, खिड़की से बाहर फेंक देता था। यह काम सफाई से करना होता था, वर्ना आई, करुणा सब लोग मुझे पचास बातें समझाने लगते, जिनसे मन और कमज़ोर हो जाता है। चाँदनी का एक टुकड़ा खिड़की से कमरे के अंदर गिरा हुआ था। मैं उसी को देख रहा था। करुणा वहीं लेटी थी। करुणा की देह अब भी आकर्षक है। आखिर वह 23 साल की है। कसी हुई। एक बच्चे की माँ होकर भी वह अभी ढिलमढल्ला नहीं हुई है। उसका हँसना कम हो गया है, लेकिन वह आनंद की मूर्ति है। उसे देखकर मन प्रफुल्ल हो जाता है। अचानक चाँदनी के टुकड़े पर एक साया दिखाई दिया। उसने करुणा को हल्के से हिलाया। करुणा जागी, हड़बड़ाई, और पलंग की ओर देखने लगी। मैंने एक पल के लिए आँखें बंद कर लीं, और फिर पलकों की कोर से देखने लगा। करुणा उठकर मेरे पास आई। दो पल मुझे देखा, और फिर मुझे हल्के से हिलाया। मैं ऐसे पड़ा रहा, जैसे बेहोश हूँ। वह आदमी वहीं चाँदनी के टुकड़े पर लेटा हुआ था। करुणा भी उसके पास जाकर लेट गई। मैं उनकी काम-लीला देखता रहा। पता नहीं, मेरे मन को क्या सुख मिल रहा था! मेरी आत्मा तृप्त हो रही थी। मुझे लग रहा था, जैसे मेरे मन पर बरसों से रखा कोई बोझ हट रहा है। थोड़ी देर में देखा चाँदनी के टुकड़े पर अकेली करुणा रह गई थी। लेकिन अब, उसकी देह देखकर मुझे घिन आ रही थी। सारा आकर्षण मुलम्मे की तरह उतर रहा था। मेरे मन में ईर्ष्या पैदा हुई। बदले की भावना। अब मैं करुणा से बदला लेना चाहता था। आखिर उसने मुझे धोखा दिया है। भाभी भी तो धोखा दे रही थी, अनजाने ही उसे सज़ा मिल गई।

मैं अपने घावों के ठीक होने की दुआ करने लगा। मैं चुप था। करुणा मेरी रोज़ की तरह सेवा कर रही थी। जैसे कुछ हुआ ही नहीं। पर अब, उसके हर स्पर्श में मुझे अजीब झनझनाहट महसूस होती थी, जैसे उसका बदन कोई ग़लीज़ चीज़ हो। कभी-कभी मैं उसके हाथ से अपने को बचाने की कोशिश करता था। मुझे लगता है, करुणा को कुछ भान हुआ था। मैं भी सचेत रहने लगा।

धीरे-धीरे मैं ठीक होने लगा। बाल तो सफेद ही रहे, लेकिन घाव भर गए। करुणा का हँसता चेहरा धीरे-धीरे उदास होने लगा। अब उसके खाट पकड़ने की बारी थी। आई ने कहा, ‘तेरी सेवा ने ही उसे थका दिया है। अब तू उसकी तीमारदारी कर!’ मैंने भी उसकी सेवा का बीड़ा उठा लिया। उसे बुखार आ गया था। काम का बोझ तो उस पर बढ़ा ही था। महिमा को जन्म दिया, और फिर मेरी उपचार-व्यवस्था करती रही। फिर घर के काम-काज अलग! और फिर वह आदमी। मेरे मन ने ईर्ष्यामयी क्रूर अट्ठहास किया। वह भी तो मेहनत का काम है!

मुझे महिमा के अपनी बच्ची होने पर शक होना लाज़मी था। मैं दिन-भर उसके चेहरे से अपना और करुणा का चेहरा मिलाता रहता था। मुझे विश्वास हो गया कि वह मेरी लड़की नहीं है। महीनों बाद मैं बाज़ार गया। जब लौटकर आया तो रात गहरा चुकी थी। घर पर सब लोग सो गए थे। दरवाज़ा अटका हुआ था। मैं दरवाज़ा बंद करके अपने कमरे की ओर चल दिया। कमरे में चाँदनी का टुकड़ा वैसे ही पड़ा था। करुणा सो रही थी और महिमा भी। मैंने पास जाकर दोनों को ग़ौर से देखा। मेरे दिमाग़ में उस रात का दृश्य चलने लगा। धीरे-धीरे दिमाग़ पर एक धुन सवार हुई। मैं गुसलख़ाने में गया और वहाँ से कपड़े पीटने की मोगरी ले आया, और माँ-बेटी दोनों को दुनिया से पार कर दिया। मेरे मन में न हैरानी थी, न डर। मैं चाँदनी का टुकड़ा देख रहा था और दो साए।

इस बार भी मुझे सज़ा नहीं हुई। एक आदमी पकड़ा गया, जिसका नाम मनीष था। मैंने सोचा, मुझे अपना जुर्म क़बूल कर लेना चाहिए। पर मेरा मन फिर एक क्रूर अट्ठहास कर उठा। यह आदमी करुणा का प्रेमी था। मैं अपना काम करके कमरे से निकला, और कुछ देर में वो कमरे में घूसा। कमरे की हालत देखकर उसकी चीख़ निकल गई। सारे लोग दौड़े आए। देखा, तो वह आदमी था, और करुणा और महिमा की लाश थी। उसे पकड़कर पुलिस के हवाले कर दिया गया। उसने भी अपना जुर्म क़बूल कर लिया। तब मैंने सोचा, मैं क्यों दूसरे के फटे में पाँव डालूँ! आख़िर, यह सब उसीका किया-धरा था। अगर वह उस रात न आता, तो मैं एक-दो दिन में मर ही जाता। पर, उसी की मेहरबानी कि मैं ज़िंदा हूँ, और दो बच्चों का बाप हूँ। अब मुझे ईश्वर पर दृढ़ विश्वास है। ईश्वर-विरोधी मुझे फूटी आँख नहीं सुहाते। सोचता हूँ, अगर ईश्वर नहीं है, तो इतनी बड़ी दुनिया का नियंता कौन है? कोई शक्ति, कोई बल तो है, जो मुझसे परे है, जो मेरे माध्यम से अपना काम करता है। मेरी आत्मा भी तो उस परम-आत्मा का ही अंश है। मेरे मुँह से जो शब्द निकलते हैं, वह भी तो उस परमपिता के हैं। मेरे हाथों जो कुछ होता है, वही करवाता है। मैं तो निमित्त मात्र हूँ। कर्ता कोई और है! उसकी लीला अपरम्पार है। वह जैसा सोचता है, वैसा ही होता है। उसकी मर्ज़ी के बिना एक पत्ता भी हिलता हो, तो कोई मुझे बता दे! वह सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ है। मैं उसका दास हूँ। जो वह चाहता है, मुझसे करवाता है। मैं निर्बल हूँ। प्रार्थना के अलावा मैं कर ही क्या सकता हूँ!

हे परमपिता, परमेश्वर, परमात्मा! विकल-पीड़ित आत्माओं को शांति दे, शांति दे, शांति दे!!

usman khanउस्मान ख़ान समकालीन हिंदी साहित्य के अलहदा युवा कवि-कथाकार हैं. चर्चाओं और पुरस्कारों की भीड़ से अलहदा… छपाऊ मानसिकता से भी अलहदा... जे.एन.यू. के हिंदी विभाग से मालवा के लोकसाहित्य पर पीएचडी. इनसे usmanjnu@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

साभार- हंस, मई , 2016

दंगा भेजियो मौला! उर्फ़ भारतीय मुसलमानों की नियति: संजीव कुमार

कोई तो वजह रही होगी कि अनिल यादव के संकलन ‘नगरवधुएं अख़बार नहीं पढ़तीं’ (2011, अंतिका प्रकाशन, ग़ाजि़याबाद) से पहली बार गुज़रते हुए ‘दंगा भेजियो मौला!’ कहानी पढ़ने से रह गयी! जहां तक याद आता है, कहानी का पहला पृष्ठ पढ़ने के बाद उसे छोड़ दिया था। संभव है, ‘लोककवि का बिरहा’ और ‘नगरवधुएं अख़बार नहीं पढ़तीं’ जैसी चर्चित कहानियों ने, जिनका नाम पहले से सुना हुआ था, पूरा ध्यान अपनी ओर खींच लिया हो और इपंले (इन पंक्तियों के लेखक) को आश्वस्त कर दिया हो कि जब हमें पढ़ ही लिया तो और क्या रक्खा है?

लेकिन यही कुल वजह नहीं रही होगी। पहला पृष्ठ पढ़ने के बाद कहानी छोड़ी गयी, इससे लगता है कि मुख्य कारण कहीं और है। पाठक-पंछी आया तो… पर फंसा नहीं! वह पास आता ही नहीं तो बात और थी। इससे क्या यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि दाने बिखेरने और जाल बिछाने में कहानीकार की ओर से कहीं चूक रह गयी?… जी हां, बहुत घटिया रूपक है।[1] पर आप भी समझते हैं, यहां आशय बस इतना है कि कहानी अगर अपनी शुरुआत से ही पाठक को बांध नहीं लेती तो यह कहानीकार के सामर्थ्य की न्यूनता का प्रमाण है! वह कहानी ही क्या जो पढ़ते चले जाने को बाध्य न कर दे!..

यक़ीन मानिए, कुछ समय पहले तक इपंले ऐसा ही मानता था, पर ‘दंगा भेजियो मौला!’ जैसी कहानियों ने बताया कि ऐसा मानने में कितनी समस्याएं हैं। इपंले जब पाठक को पंछी और पाठ की शुरुआत को दाना बताता है तो वह इस हक़ीक़त पर पर्दा डाल देता है कि पाठकीय योग्यता भी अलग-अलग तरह की होती है। जब वह कहता है कि ‘अपनी शुरुआत से ही जो पाठक को बांध न ले…’ वगैरह, तो वह निहित रूप में स्वयं को एक आदर्श पाठक बता रहा होता है, जिसकी कसौटी पर कहानी की सम्मोहन-क्षमता को कस कर उसके बारे में वस्तुनिष्ठता का दावा करनेवाला एक फ़ैसला सुनाया जा सकता है। जबकि सचाई यह है कि वह ख़ास तरह की शक्तियों और सीमाओं से युक्त पाठक है और कहानी के साथ न बंध पाना, उसे छोड़ कर आगे बढ़ जाना, हो सकता है, कहानी की नहीं, बतौर पाठक खुद उसकी सीमाओं का निदर्शन हो। शब्द जिन भावों/अनुभवों/स्मृतियों को कुरेदना चाहते हैं, हो सकता है, वे इस ‘ख़ास’ पाठक के भीतर नगण्य वा नदारद हों। फिर कुरेदने की कला कितनी भी समर्थ हो, इस पाठक के पक्ष में उससे निकलेगा क्या? इस तरह जो अयोग्यता पाठक की है, उसे उलट कर कहानी और कहानीकार की अयोग्यता बता दिया जाता है। इसे कहते हैं, नाच न जाने, आंगन टेढ़ा! #लेखक

Snapshot from Goodnight Mommy (2015)

Snapshot from Goodnight Mommy (2015)

 

दंगे में आएंगे

By संजीव कुमार

‘दंगा भेजियो मौला!’ कहानी एक दृश्य से शुरू होती है। यह ऐसा दृश्य है जिसकी अपने मन के पटल पर पुनर्रचना कर पाना सीमित अनुभव वाले इपंले सरीखे एक मध्यवर्गीय के लिए थोड़ा मुश्किल है। सिनेमा तो है नहीं कि दृश्य बना-बनाया मिल जाए! कहानी के पाठक को शब्दों से निकाल कर दृश्य की पुनर्रचना करनी होती है और इस काम में उसके अपने अनुभव और स्मृतियों का योगदान होता है। इसीलिए बहुत चित्रात्मक और बिंबधर्मी वर्णन-विवरण भी अलग-अलग पाठक के मन में अलग-अलग बिंब निर्मित करते हैं। साहित्यिक कृतियों के फि़ल्मांतरण के खि़लाफ़ यह एक मज़बूत तर्क रहा है कि इससे अनंत संभावनाओं का निशेध होकर कृति एक निश्चित दृश्यावली में रूढ़/फि़क्स हो जाती है। इस तर्क से बहस हो सकती है, पर वह अभी छेड़नी नहीं है। कहना बस इतना है कि जब हम कहानी के दृश्य की बात करते हैं तो वहां पाठक भी सक्रिय भूमिका में होता है – उसके मन में दृश्य का उभरना जितना शब्दों को बरतने के कहानीकार के कौशल पर निर्भर करता है, उतना ही उसके अपने अनुभव-स्मृतियों की थाती तथा उसी से जुड़ी, शब्दों को दृश्यांतरित करने की योग्यता पर भी।

लगता है, पहली बार ‘दंगा भेजियो मौला!’ पढ़ते हुए इसी थाती और योग्यता पर मामला अटक गया था। इपंले दृश्य को अपने अंदर क़ायदे से रच नहीं पाया, इसीलिए तल्लीनता बनी नहीं और कहानी छूट गयी।

तो ऐसा क्या है इस दृश्य में?

असल में, वह जो भी है, सिर्फ़ इस दृश्य में नहीं, पूरी कहानी में है। ऐसी नारकीय स्थिति और देश तथा समाज के घूरे पर फेंक दिये जाने की नियति, जिसकी कल्पना भी सीमित मध्यवर्गीय अनुभव वाले व्यक्ति के लिए कठिन है। अभी, इस कहानी को पूरा पढ़ चुके होने के बाद भी, मैं उस मुहल्ले की एक आधी-अधूरी तस्वीर ही अपने मन में बना पाता हूं जो पूरे शहर के बरसाती पानी और सीवर लाइनों के उफन कर उल्टी दिशा में बहने से निकले मल-मूत्र की झील बना हुआ है और लंबे समय आधी-आधी मंजि़ल तक इस पानी में डूबे रहनेवाले मकान अक्सर ईंटों के बीच की मिट्टी के गल जाने से भहरा कर गिर पड़ते हैं और उनकी छतों पर खेलते बच्चों की लाशें थोड़ी देर बाद फूल कर उस बजबजाती झील की सतह पर उतरा जाती हैं। मेरे कोश में ऐसे स्मृति-चित्र ही बहुत कम हैं जिन्हें कहानीकार के शब्द कुरेद सकें और जिनकी मदद से मैं ‘अनायास’ अपने अन्दर इस दृश्य को रच सकूं। नहीं हैं, ऐसा तो नहीं कहा जा सकता, पर निस्संदेह कम और कमज़ोर हैं। इसीलिए शब्दों को अपने भीतर दृश्यांतरित करना नामुमकिन नहीं, पर मुश्किल है। मुश्किल से हर पाठक भागता है। सो इपंले भी पहली बार भाग खड़ा हुआ।

पर अच्छी रचना की यह विषेशता होती है कि अगर आप उसके साथ थोड़ी मुश्किल उठाने को तैयार हो जाएं तो वह आपको देश-दुनिया, समाज और राजनीति, मन और भावलोक के किसी ऐसे अज्ञात-अल्पज्ञात हिस्से में ले जाती है जहां से आप अधिक अनुभवी, अधिक परिपक्व होकर लौटते हैं। पाठानुभव जीवनानुभव की कमी को पूरा करने लगता है। ‘दंगा भेजियो मौला!’ ऐसी ही रचना है।

कहानी आपको मुसलमान बुनकरों के एक मुहल्ले में ले जाती है जो नदी के किनारे शहर के निचले हिस्से में बसा है – एक ‘लो लैंड’ जो हर साल महीने-डेढ़ महीने के लिए शहर भर के बरसाती पानी और सीवर से निकले गू-मूत की सड़ती झील में तब्दील हो जाता है और उसके हटने के बाद हैजा, डायरिया जैसी बीमारियां हमला कर देती हैं। हर साल कई महीने इन मुसीबतों से लड़ने के बाद ही वहां सामान्य जि़ंदगी बहाल हो पाती है। महान भारतीय राष्ट्र-राज्य के भीतर एक पराये राष्ट्र की तरह बरता जानेवाला यह मुहल्ला, मोमिनपुरा, अपनी बदहाली के लिए सिर्फ़ घृणा, उपेक्षा और उपहास का विषय है। राज्यतंत्र भी उसकी बदहाली को कम करने के लिए आगे नहीं आता, अलबत्ता बढ़ाने के लिए आता है। ‘हाथ में जल लेकर गंगा-जमुनी तहज़ीब का हवाला देने के दिन कब के लद चुके’ हैं। मोमिनपुरा के बाशिंदे दंगापीडि़त नहीं हैं, पर उनके साथ जो हो रहा है, वह किसी दंगे से कम नहीं:

दंगा तो हो ही रहा है।… सरकार ने अफ़सरों को इधर आने से मना कर दिया है। डॉक्टरों ने इलाज से मुंह फेर लिया है। जो पंप यहां लगने चाहिए, उन्हें नदी में लगाकर पानी इधर फेंका जा रहा है। करघे सड़ चुके हैं, घर ढह रहे हैं, बच्चे चूहों की तरह डूब कर मर रहे हैं। सबको इसी तरह बिना एक भी गोली-छुरा चलाए मार डाला जाएगा। जो बेघर-बेरोज़गार बचेंगे, वे बीमार होकर लाईलाज मरेंगे।’

यों तो मोमिनपुरा का हर साल यही हाल होता है, पर इस साल यह सड़ती झील हटने का नाम नहीं ले रही। पाकिस्तान और डल झील जैसे नामों से नवाज़े जानेवाले इस इलाक़े में ‘म्यूनिसिपैलिटी ने इस साल पानी निकासी के लिए एक भी पंप नहीं लगाया। अफ़सरों ने लिख कर दे दिया, सारे पंप ख़राब हैं, मरम्मत के लिए पैसा नहीं है, सरकार पैसा भेजेगी तो पानी निकाला जाएगा। लोक निर्माण विभाग ने घोषित कर दिया कि हाईवे की पुलिया से हर साल की तरह अगर पानी की निकासी की गई तो जर्जर सड़क टूट सकती है और शहर का संपर्क बाक़ी जगहों से कट सकता है। आपदा राहत विभाग ने ऐलान कर दिया कि यह बाढ़ नहीं, मामूली जलभराव है, इसलिए कुछ करने का प्रश्न ही नहीं पैदा होता।… अस्पतालों ने मोमिनपुरा के मरीजों की भर्ती करने से मना कर दिया कि जगह नहीं है और संक्रमण से पूरे शहर में महामारी का ख़तरा है। पावरलूम की मशीनें और मकानों का मलबा ख़रीदने के लिए कबाड़ी फेरे लगाने लगे। पानी में डूबे मकानों का तय-तोड़ होने लगा। रियल इस्टेट के दलाल समझा रहे थे कि हर साल तबाही लाने वाली ज़मीन से मुसलमान औने-पौने में जितनी जल्दी पिंड छुड़ा लें उतना अच्छा।…

यही है वह मुसलसल, बिना असलहे और बिना शोर-शराबे के चलता दंगा जो शासन-प्रशासन से लेकर शहर की जनता तक एक महामारी की शक्ल में फैले सांप्रदायिक मिज़ाज की अभिव्यक्ति है। अपने मुहल्ले की बदहाली को कम करने की जद्दोजहद में लगे मोमिनपुरा की क्रिकेट टीम के लड़के जब अपनी हर तरह की कोशिश से बेज़ार हो जाते हैं, तब यह ज़हरबुझा सच उनकी रगों में दौड़ जाता है कि न सिर्फ़ एक दंगा लगातार जारी है, बल्कि वह आमने-सामने वाले दंगे से ज़्यादा क्रूर और ख़तरनाक है, क्योंकि आमने-सामने की मारकाट वाले दंगे में कम-से-कम शासन-प्रशासन को इधर का रुख करना पड़ता है। दंगा इस बदहाली से बेहतर इस मायने में ठहरता है कि तब हाकिमों की ओर से, नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं की ओर से थोड़ी मदद मिल जाती है। थके-हारे, हताश और मायूस ये ग्यारह खिलाड़ी एक जुमे को फ़जर की नमाज़ के वक़्त सिज़दा कर एक ही दुआ मांगते हैं: ‘दंगा भेजियो मोरे मौला, वरना हम सब इस नर्क में सड़ कर मर जाएंगे। गू-मूत में लिथड़ कर मरने की जि़ल्लत से बेहतर है कि ख़ून में डूब कर मरें।’ और ‘दो दिन बाद मोमिनपुरा में भरते पानी के दबाव से हाई-वे की पुलिया टूट गई। काली झील कई जगहों से सड़क तोड़ कर उफनाती हुई पास के मोहल्लों और गांवों के खेतों में बह चली। घंटे-घडि़याल-शंखों का समवेत शोर बर्दाश्त के बाहर हो गया।… प्रभातफेरी करनेवालों की अगुवाई में शहर और गांवों से निकले जत्थे मोमिनपुरा पर चढ़ दौड़े। सीवर के बजबजाते पानी में हिंदू और मुसलमान गुत्थमगुत्था हो गये। अल्लाह ने हताश लड़कों की दुआ कबूल कर ली थी।’

इतना विचलित कर देनेवाली और इतने बड़े फलक पर अपनी रौशनी फेंकनेवाली कहानियां पिछले सालों में गिनती की लिखी गई होंगी। भारत के उदारीकरण के साथ-साथ राज्य की मशीनरी से लेकर जनता के एक बड़े हिस्से तक का जो सांप्रदायीकरण हुआ है, या कहें कि इन सभी ठिकानों पर दबे पड़े बहुसंख्यावादी सांप्रदायिक विष-बीज को जिस तरह पनपने, फूलने-फलने का मौक़ा मिला है- जिसके आलोक में ही नरेंद्र मोदी और भाजपा के उभार जैसी परिघटना की व्याख्या हो सकती है – उसकी यह प्रतिनिधि कहानी है। प्रभात पटनायक इसे आज़ादी की लड़ाई से विरासत में मिले साम्राज्यवादविरोधी समावेशी राष्ट्रवाद से बूर्जुआ राष्ट्रवाद की ओर संक्रमण का नतीजा मानते हैं जो कि नवउदारवादी दौर की लाक्षणिक विषेशता है (देखें, ‘विश्वीकरण का दौर और राष्ट्रवाद की दो अवधारणाएं’, लोकलहर, 15-21 जून 2015)। उनके अनुसार, राष्ट्रवाद के इन दो रूपों में अंतर करना इसलिए ज़रूरी है कि इसके बग़ैर हम एक युगांतकारी संक्रमण को समझ नहीं सकते। पहले वाले के लिए मुक्ति की धारणा अहम थी और वह तीसरी दुनिया के अन्य मुक्ति आंदोलनों के साथ एकजुटता पर बल देता था, जबकि दूसरा वाला देश की अंतरराष्ट्रीय ताक़त और औक़ात को बढ़ाने पर बल देता है। पहला वाला जनता को ग़रीबी, भूख, कंगाली से उबारने का लक्ष्य निर्धारित करता था, जबकि दूसरा वाला जीडीपी की देवमूर्ति बनाकर उसे पूजता है और उसके लिए किसानों को बेदख़ल करना, मज़दूरों के अधिकारों में कटौती करना, ग़रीबों के कल्याण की योजनाओं को ख़त्म करना – ऐसी किसी भी चीज़ को जायज़ ठहराता है। लेकिन नवउदारवादी प्रतिज्ञाओं पर खरा उतरनेवाला, राष्ट्रवाद के पहले से दूसरे रूप की ओर यह संक्रमण, जैसा कि प्रभात पटनायक लिखते हैं-

आसान नहीं था। इसलिए भारत जैसे देश में पूंजीवादी राष्ट्रवाद के अपने संपूर्ण रूप में उभरने की एक ज़रूरी शर्त यह है कि वह कोई अतिरिक्त सहारा पकड़ ले। सांप्रदायिक फ़ासीवाद उसका ऐसा ही सहारा है। एक ऐसे समाज में जिसने साम्राज्यवादविरोधी राष्ट्रवाद की मज़बूत उपस्थिति को देखा हो, यूरोपीय ढंग का उत्तर-वेस्टफेलियाई राष्ट्रवाद गढ़ा जाए, इसके लिए एक ख़ास ‘प्रतिक्रांति’ की ज़रूरत होती है, जिसे सबसे अच्छी तरह से ऐसी ताक़तें ही ला सकती हैं जो शुरू से ही साम्राज्यवादविरोधी राष्ट्रवाद के खि़लाफ़ रही हों यानी ‘सांप्रदायिकता’ की, ‘सांप्रदायिक फ़ासीवाद’ की ताक़तें। इसलिए साम्राज्यवादविरोधी राष्ट्रवाद की राख पर बूर्जआ राष्ट्रवाद के फलने-फूलने के लिए विडंबनापूर्ण तरीक़े से सांप्रदायिक फ़ासीवादी ताक़तों का हस्तक्षेप ज़रूरी है। यही भारत में हो रहा है।

यह लेख इसी साल के जून महीने का है और यह मूलतः केंद्र में एक सांप्रदायिक फ़ासीवादी सरकार के आने की व्याख्या करता है, पर यह स्पष्ट है कि यहां जिस प्रक्रिया की बात की गयी है, उसका आग़ाज़ इस मुल्क में उदारीकरण की शुरुआत के साथ हुआ था। 2003 में छपी ‘दंगा भेजियो मौला!’ इसी प्रक्रिया की एक विचलित कर देनेवाली सामाजिक अभिव्यक्ति का चित्र है। मोमिनपुरा स्वर्ग तो कभी न था, पर अब उसे मुकम्मल नर्क बनाने और बनाये रखने में जैसे सारी ताक़तें लगी हुई हैं। बहुसंख्यक सांप्रदायिकता बेहद मुखर और कारगर हो चली है। कहानी इसके कई-कई ब्यौरे देती है, जिनकी विषेशता है कि वे चीज़ों को एक स्थिति के रूप में नहीं, एक घटना-विकास के रूप में, बनते-बढ़ते रुझान के रूप में पेश करते हैं, और उनका निचोड़ इस मार्मिक वाक्य में सिमट जाता हैः

आचमन करने और हाथ में जल लेकर गंगा-जमुनी तहज़ीब का हवाला देने के दिन कब के लद चुके थे। यह शहर अब इस पानी और बस्ती दोनों से छुटकारा पाना चाहता था।

कहानी को पढ़ कर ख़त्म करते हुए आप महसूस करते हैं कि आपने किसी एक शहर के मुसलमानों की नहीं, समग्रता में भारतीय मुसलमान की गति और नियति का साक्षात्कार किया है। मोमिनपुरा या ऐसी किसी भी बस्ती को ‘पाकिस्तान’, ‘मिनी पाकिस्तान’ कहना तो एक क्रूर सांप्रदायिक मज़ाक है, पर मोमिनपुरा जिस शहर का हिस्सा है, वह ‘मिनी हिंदुस्तान’ ज़रूर है – पूरे मुल्क का एक स्याह रूपक – जहां ‘नियम और अनुशासन के साथ हर सुबह और गगनभेदी होती जा रही घंटे-घडि़याल और शंख की ध्वनियों’ के बीच एक मुसलमान बस्ती ‘पवित्र शहर का कमोड’ बने रहने को अभिशप्त है और पूरा शहर उससे छुटकारा पा लेने को आतुर, जिसके लिए ज़रूरी है कि उसके अभिशाप को और गाढ़ा किया जाए। धीमे ज़हर की मौत मरता यह भारतीय मुसलमान किसी भी कोने से मदद की उम्मीद नहीं कर सकता। राज्य और तमाम दूसरी एजेंसियों की थोड़ी भी नज़रे इनायत वह तभी हासिल कर सकता है जब इस धीमे ज़हर की जगह एक विस्फोटक तरीक़े से क़ानून और व्यवस्था की समस्या उठ खड़ी हो। इसीलिए विडंबनापूर्ण ढंग से वह दंगे की कामना करता है।

यहां ऐजाज़ अहमद का एक प्रकाशित व्याख्यान, ‘कम्यूनलिज़्म: चेंजिंग फॉर्मस् ऐंड फार्च्यूनस्’ (दि माक्र्सिस्ट, अप्रैल-जून 2013), याद आता है जहां वे यह बताते हुए, कि पूंजीवाद का हिंस्र लुटेरापन भारत में जाति संरचनाओं और सांप्रदायिक टकरावों के चलते हमेशा से पर्याप्त मुखर रहा है, कहते हैं: ‘ऐसी प्रवृत्तियां नवउदारवादी अतिवाद की शुरुआत से पहले थोड़े नियंत्रण में थीं; अब ऐसे अधिकतर नियंत्रणों को तिलांजलि दे दी गयी है और राज्य, कमोबेश अनिच्छापूर्वक, तभी हस्तक्षेप करता है जब कोई सांप्रदायिक दंगा हो जिसे कि सारतः एक क़ानून और व्यवस्था संबंधी समस्या के रूप में देखा जाता है।’ ‘दंगा भेजियो मौला!’ में मोमिनपुरा की क्रिकेट टीम के लड़के मदद की गुहार लगाने हर जगह जाते हैं, कोई सीधे मुंह बात नहीं करता और तब उन्हें भी समझ आ जाता है कि ये तभी आएंगे जब दंगा होगाः

देर रात गए जब वे अपनी साईकिलें नाव पर लाद कर घरों की ओर लौटते, अंधेरी छतों से आवाज़ें आतीं, ‘‘क्या यासीन मियां, वे लोग कब आएंगे?’’

अंधेरे में लड़के एक-दूसरे को लाचारी से ताकते रहते और नाव चुपचाप आगे बढ़ती रहती। टीम के लड़के दौड़ते रहे, लोग टरकाते रहे और बस्ती पूछती रही। एक रात बढि़याते पानी ने घर लौटते लड़कों से कहा, ‘‘बेटा, अब वे लोग नहीं आएंगे।’’

‘‘काहे?’’ यासीन ने पूछा।

‘‘तजुरबे की बात है, उस दुनिया के लोग यहां सिर्फ़ दो बखत आते हैं। या दंगे में या इलेक्शन में। ग़लतफ़हमी में न रहना कि वे यहां आकर तुम्हारे बदन से गू-मूत पोंछ कर तुम लोगों को दूल्हा बना देंगे।’’

अगले दिन यासीन ने दांत भींचकर हर रात सैकड़ों आवाज़ों में पूछे जानेवाले उस एक सवाल का जवाब नाव पर सफ़ेद पेंट से लिख दिया, ‘‘दंगे में आएंगे।’’ ताकि हर बार जवाब देना न पड़े।

ऐजाज़ अहमद की बात से यहां एक फर्क है। ऐजाज़ नवउदारवादी दौर में राज्य के चरित्र के बदलाव की ही बात करते हैं, पर ‘दंगा भेजियो मौला!’ कई दूसरी एजेंसियों को भी समेटती हुई एक अधिक जटिल तस्वीर सामने रखती है। मदद मांगने निकले लड़के ‘पहले उन नेताओं, समाज सेवियों और अख़बार वालों के पास गये जो दो बरस पहले हुए दंगे के दौरान बस्ती में आए थे और उन्होंने उनके बुजुर्गों को पुरसा दिया था। वे सभी गरदनें हिलाते रहे लेकिन झांकने नहीं आए। फिर वे सभी पार्टियों के नेताजियों, सरकारी अफ़सरों, स्वयंसेवी संगठनों के भाइजियों और मीडिया के भाईजानों के पास गए।’ सबने उन्हें टरका दिया। यहां मामला सिर्फ़ सामाजिक सरोकारों को बलाए-ताक़ रख चुके, जातिवाद और सांप्रदायिकता को नियंत्रित करने की ओर से उदासीन-अनिच्छुक नवउदारवादी राज्य का नहीं है; मामला एक ऐसे सर्वव्यापी नकारात्मक बदलाव का है जिसमें उम्मीद के सभी ठिकाने ध्वस्त हो गये हैं।

ऐसा पहले नहीं था। परिस्थितियां विपरीत थीं, पर इस क़दर नहीं। इसीलिए मोमिनपुरा के लोग शुरू में उम्मीद लगाए रहते हैं। वे समझ नहीं पाते कि आखि़र इस बार पानी का दायरा फैलता ही क्यों जा रहा है और क्यों उनकी मदद से हर किसी ने हाथ खींच लिये हैं। बढ़ता पानी अपनी ‘डभ्भक-डभ्भाक’ आवाज़ में उनसे कुछ कहता है, पर वे समझते नहीं। यह बदले हुए समय को पहचानने में हुई चूक है। उम्मीद के तिनके को कौन छोड़ना चाहता है? आखि़रकार क्रिकेट टीम के लड़के धीरे-धीरे पानी की बात समझने लगते हैं। क्रिकेट टीम के लड़के ही क्यों? क्योंकि वे ही हैं जिन्होंने मल्लाहों के नाव देने से मना कर देने के बाद कहीं से एक नाव का जुगाड़ किया है और मुहल्ले की हाड़ी-बीमारी-मौत जैसी हर मुसीबत में आपात सेवा देने से लेकर मदद की गुहार लगाने की दौड़-धूप तक का सारा काम करते हुए एक बड़े कैनवास पर चीज़ों को रखने-देखने-आंकने की स्थिति में हैं। पानी के साथ उनकी बातचीत को कहानीकार ने एक युक्ति के रूप में इस्तेमाल किया है। यह, दरअसल, गहरी हताशा के क्षणों में सच तक ले जानेवाला आत्मालाप और आत्ममंथन है। इसी मंथन से गुज़रते हुए बिखरे-बिखरे सारे तथ्य एक साथ इकट्ठा होते हैं और उनके बीच से सत्य सहसा फूट पड़ता है, जैसे जिग्सॉ पज़ल के सारे टुकड़े सही ठिकानों पर जुड़ गये हों। पानी की बात समझ कर, यानी तमाम टुकड़ों के जुड़ने से बनी मुकम्मल तस्वीर को देख कर, लड़के ‘दंगा भेजियो मोरे मौला’ की दुआ मांगते हैं और उनकी दुआ कबूल होती है।

‘अल्लाह ने लड़कों की दुआ कबूल कर ली थी’ – कहानी के इस आखि़री वाक्य से लगता है कि लड़के निष्क्रिय याचक भर हैं, पर इससे ठीक पहले के वाक्यों में कहानी सांकेतिक रूप से उनकी सक्रियता की ओर इशारा करती है। ‘दो दिन बाद मोमिनपुरा में भरते पानी के दबाव से हाई-वे की पुलिया टूट गयी।’ भरते पानी का दबाव मोमिनपुरा के वाशिंदों के बढ़ते असंतोष के दबाव का संकेत बन कर आया है। इसका मतलब, पुलिया टूटी नहीं, तोड़ी गयी। यह पुलिया ही थी जिससे होकर हर साल पानी को निकास मिलता था, पर इस साल प्रशासन ने किसी-न-किसी बहाने से इस काम को रोक रखा है। गू-मूत में लिथड़ कर मरते ये घिरे हुए लोग अंततः घिराव को तोड़ देते हैं। ‘घंटे-घडि़याल-शंखों का समवेत शोर बर्दाश्त के बाहर हो गया’ – यह वाक्य पुलिया टूटने की सूचना के बाद का है, पर यह कथाकाल में भी बाद का माना जाए, यह ज़रूरी नहीं। इसे पुलिया तोड़ दिये जाने की पृष्ठभूमि के रूप में भी पढ़ सकते हैं। बर्दाश्त के बाहर हो जाना इस शोर के एकाएक बहुत बढ़ जाने का अर्थ भी देता है – अपने अभिशाप से लड़ते मुसलमानों के खि़लाफ़ साम्प्रदायिक हिंदुओं की जंग का ऐलान – और मोमिनपुरा के बर्दाश्त की सीमा टूटने का अर्थ भी देता है, यानी दूसरी तरफ़ के बढ़ते हुए शक्ति-प्रदर्शन के खि़लाफ़ मुसलमानों की ओर से एक बड़ा इंकार।

ऐसी सांकेतिकता और मितकथन इस कहानी की बड़ी ताक़त है। अनिल यादव के पास बहुत लंबी-लंबी कहानियां भी हैं, जिनके मुक़ाबले ‘दंगा भेजियो मौला!’ बिल्कुल शास्त्रीय अर्थों में ‘शॉर्ट स्टोरी’ है। डिमाई आकार के लगभग छह पृष्ठ। इस मझोले आकार में एक बड़ी बात को रखने की कला जैसी इस कहानी में है, वैसी खुद अनिल अपनी दूसरी कहानियों में अर्जित नहीं कर पाए हैं। पढ़ते हुए आप महसूस करते हैं कि वाचक ज़रूरी ब्यौरे देने में कोई कटौती नहीं कर रहा, लेकिन अपने वर्णनों-विवरणों में कहीं रमने को राज़ी नहीं है; जिस स्याह यथार्थ को वह उकेर रहा है, उसमें रमना एक अपराध है। वेदना में व्यक्ति या तो प्रलाप करता है, या बहुत कम बोल कर काम चलाता है। ‘दंगा भेजियो मौला!’ कम बोलनेवाली कहानी है। लगभग स्तब्ध अभिव्यक्ति जैसा ढब, भाषा की ख़पत में कोई शाहख़र्ची और इत्मीनान नहीं, एकदम ज़रूरत और भावनाओं के गहरे दबाव से निकले शब्द, और उतना ही कहकर आगे बढ़ जाना जितना कहकर लगा कि बात पूरी हो गयी। ऐसा अनुपात-बोध इधर की कहानियों में विरल है। कहानीकार कहीं भी विमर्श को वाचाल ढंग से पेश करने या आरोपित करने को समुत्सुक नहीं है। विरले ही कहीं ‘अभिमत’ के रूप में कोई बात कही गयी है; प्रस्तुति का अधिकांश ‘तथ्य-कथन’ की शक्ल में है। ‘तथ्य’ के पीछे ‘अभिमत’ का बल होता है, या कहें कि तथ्यों के चयन-संयोजन में अभिमत व्यंजित होता है, यह बात अलग है।

कहानी अपनी पूरी संरचना में सुसंगत है। यहां कुछ भी अलग नहीं छिटकता – न दृश्य, न ब्यौरे, न भाषा, न कथा-युक्तियां। इनमें से कोई अपने लिए नहीं है, सभी एक-दूसरे के लिए हैं। भारतीय मुसलमान की जिस अंधकारपूर्ण नियति को कहानीकार सामने रखना चाहता है, वह इस सुसंगत संरचना के कारण एक समग्र प्रभाव के रूप में उभरती है। कहानीकार की ख़ासियत है कि वह अपने सघन गद्य के बीच एकाएक कोई बहुत काव्यात्मक बिंब या उक्ति ला सकता है और बिना उसके आकर्षण में फंसे आगे निकल सकता है। ‘नाव दिन भर बस्ती के दुख ढोती रही’, ‘पानी में डूबे घरों में उन बच्चों की मांओं की सिसकियों की तरह कुप्पियां भभक रही थीं’, ‘…जीवन अचानक शहर की बुनकर बस्ती की खड़कताल से बिदक कर बाढ़ में डूबे, अंधियारे कछारी गांव की चाल चलने लगता’ – ऐसी काव्यात्मक उक्तियां उसके यहां कब आकर बिना कोई अतिरिक्त अवधान पाए निकल जाती हैं, पता भी नहीं चलता। वे गद्य की लय में एकरस हैं। इसीलिए वे अपना अलग वजूद जतलाने की बजाय पिघल कर एक पूरी मनःस्थिति की निर्मिति में शामिल हो जाती हैं। इसी मनःस्थिति के सघन रचाव का परिणाम है कि पानी से बातचीत जैसी ग़ैर-यथार्थवादी युक्ति भी बहुत चुपके से आकर कहानी में घुलमिल जाती है और आपको उसके अनोखेपन का अलग से अहसास नहीं होता। प्रकृति के साथ मनुष्य की बातचीत निविड़ अकेलेपन और गहरी वेदना का चिरपरिचित साक्ष्य रहा है। ‘मेघदूत’ के यक्ष और सूरदास की गोपियों को याद कीजिए। ‘दंगा भेजियो मौला!’ में यह एक समुदाय का अकेलापन है, जिसमें प्रकृति से कुछ कहना-सुनना एक सहज व्यापार की तरह लगता है। पर यह यक्ष और गोपियों के जैसा नहीं है, जिसमें अपने भीतर इकट्ठा भावनाओं का गुबार बाहर निकाल देने के लिए एक संबोध्य ढूंढ़ लिया गया है। कहानी पढ़ते हुए आप अनुभव कर सकते हैं कि यह कहा-सुनी उन पात्रों के भीतर की है और इसी मंथन से किसी विकट सत्य को प्रकट होना है। मोमिनपुरा क्रिकेट क्लब के कुछ लड़के हमेशा नाव पर ही रहने लगे हैं, ताकि रात में गिरनेवाले मकान में फंसे लोगों की जान बचाने के लिए हमेशा तैयार मिलें। ‘दिन बीतने के साथ बदबूदार हवा के झोंकों से नाव झील पर डोलती रही, तीन तरफ़ से बस्ती को घेरे कालोनियों की रोशनियां काले पानी पर नाचती रहीं, हर रात बढ़ते पानी के साथ बादलों से झांकते तारों समेत आसमान और क़रीब आता रहा। सावन बीता, भादों की फुहार में भींगते शहर से घिरे दंड-द्वीप पर अकेली नाव में रहते काफ़ी दिन बीत गए और तब लड़कों के आगे रहस्य खुलने लगे।… पानी, हवा, घंटे-घडि़याल, मर कर उतराते जानवर, गिरते मकान, रोशनियों का नाच, सितारे और चींडियों के झुंड – सभी कुछ न कुछ कह रहे थे। एक रात जब पूरी टीम बादलों भरे आसमान में आंखें गड़ाए प्रभात-फेरी का इंतज़ार कर रही थी, पानी बहुत धीमे से बुदबुदाया, ‘‘दंगा तो हो ही रहा है।’’

एक समूह/समुदाय का भयावह अकेलापन, उस अकेलेपन में चलनेवाला आत्ममंथन और उस आत्ममंथन से उपजा एक सच जो आसपास की हर शै के परस्पर संबंध से निकलनेवाला अर्थ है – इसे इतने संयम और सांकेतिक लाघव के साथ व्यक्त कर पाना हर कहानीकार के बस की बात नहीं हैं।

पीछे संरचना की सुसंगतता की बात की गयी। वह घटकों के अचूक संष्लेश में ही नहीं, कहानी की शुरुआत और अंत की सधी हुई योजना में भी है। कहानी एक दृश्य से शुरू होती है और एक दृश्य के साथ ख़त्म होती है; बीच का लगभग पूरा हिस्सा परिदृश्य का विस्तार है। जिस जगह जाकर वह ख़त्म होती है, वहां आप कहानी का बाक़ायदा अंत होना महसूस करते हैं। यह उन कहानियां की तरह नहीं है जो अपनी तमाम खूबियों के बावजूद अंत की ओर अधर में लटक जाती हैं। उनके उदाहरण फिर कभी। कोई कहानी अपनी पूरी बनावट से अंत संबंधी कैसी अपेक्षाएं जगाती है, और किस तरह की कहानियों में कोई ‘अंत’ ज़रूरी होता है, किनमें नहीं, इस पर भी फिर कभी। फिलहाल इतना ही कि ‘दंगा भेजियो मौला!’ को पढ़ते हुए आप एक बाक़ायदा अंत की अपेक्षा करते हैं और कहानी इस अपेक्षा को पूरा करती है। अनिल यादव की ही ‘लोककवि का बिरहा’ या ‘आर जे साहब का रेडियो’ जैसी कहानियों को पढ़ें तो स्पष्ट हो जाएगा कि कहानी की पूरी उठान से जगनेवाली अपेक्षा के मुक़ाबले कमज़ोर अंत का क्या मतलब होता है; जैसे अपनी दौड़ शानदार ढंग से पूरा करता कोई धावक फि़निश लाइन से ठीक पहले लड़खड़ा कर बैठ जाए!

पता नहीं, इपंले कह पाया या नहीं, पर वह कहना यही चाहता था कि अगर शुरुआत से ही कोई कहानी आपको गिरफ़्त में नहीं ले लेती, तो यह पाठक के रूप में आपकी अयोग्यता की निशानी भी हो सकती है और अगर आप थोड़ी मुश्किल उठाने को तैयार हो जाएं, तो अपनी इस अयोग्यता से उबरा भी जा सकता है।

[1] यों तो हर रूपक में बात को भटका कर अनजान दिशाओं की ओर ले जाने का दुर्गुण होता है, पर यह तो और भी दुष्ट है। दुष्ट माने दोषपूर्ण, जैसे शास्त्रों में वर्णित ‘दुष्ट काव्य’। पाठक अगर पंछी है और कहानीकार बहेलिया, तो पठन का सुख पाठ की गिरफ़्त में आने से पहले तक ही समझना चाहिए। गिरफ़्त में आने के बाद सुख का क्या मतलब? यानी इस रूपक की मानें तो पढ़ना एक सज़ा है (और वह असंगति अलंकार भी यहां कारगर नहीं कि ‘मज़ा इसमें इतना मगर किसलिए है’)! इसीलिए कहा, बहुत घटिया रूपक है। इसे थोड़ा ज़्यादा बोलने की इजाज़त दें तो कमबख़्त अनाप-शनाप बकने लगेगा।

संजीव कुमार

संजीव कुमार

संजीव कुमार। युवा आलोचक और कहानीकार। ‘जैनेन्द्र और अज्ञेयः सृजन का सैद्धांतिक नेपथ्य’ पुस्तक के लिए देवीशंकर अवस्थी सम्मान। दिल्ली विश्विद्यालय के देशबंधु कॉलेज में  प्राध्यापक। इनसे sanjusanjeev67@gmail.com पर संपर्क सम्भव है।

साभार- हंस, सितम्बर, 2015

शराबघर: कृष्‍ण कल्पित

तिरछिस्पेल्लिंग कविता-कहानियां या रचनात्मक गद्य प्रकाशित नहीं करता है और न ही कभी कुछ आमंत्रित करता है. लेकिन यहाँ कुछ कवितायें और एकाध कहानियाँ प्रकशित जरुर हुयी हैं. उनका प्रकाशन इस विशवास के साथ ही हुआ है कि वे एक एक्सक्लूसिव मिज़ाज का प्रतिनिधित्व करती हैं. कृष्ण कल्पित की यह कहानी ‘शराबघर’ इसी एक्सक्लूसिवनेस के कारण यहाँ दी जा रही है. कृष्ण कल्पित हिंदी पब्लिक स्फीयर के एक अनोखे रचनाकार हैं, जिनसे हम प्यार करते हैं, जिन्हें संजोना चाहते हैं. उनके अक्खड़पन का राज कहीं और है. वे हिंदी के एक रेयर आधुनिकतावादी (Modernist)लेखक हैं जिन्हें परंपरा के पगों का स्पर्श प्राप्त है. बाग़-ए-बेदिल, कविता रहस्य और उनकी कवितायें बाकी जो भी होंगी बाद में होंगी, सबसे पहले वे यह बताती हैं कि उनका कवि काव्य-परंपरा के भिन्न-भिन्न पड़ावों को चखने का आदि रहा है. कृष्ण कल्पित आचार्य कवि हैं. लेकिन यह कहना उनके कवि-व्यक्तित्व को कहीं से कम करना नहीं है. ‘शराबी की सूक्तियां’ इसीलिए उपर्युक्त सूचि से बचा ली गई थी. ‘शराबी की सूक्तियां’ का मूल्यांकन या आकलन अभी तक हिंदी समाज नहीं कर पाया है, जबकि यही समाज ‘मधुशाला’ की तुकबंदियों को हर बेतुके अवसरों पर दुहरा दिया करता है. ‘शराबी की सूक्तियां’ का महत्व अगर समझना हो तो थोड़ा-सा भारतीयेत्तर साहित्य की कुछ बानगियों को देखना पड़ेगा. यहाँ सिर्फ दो नाम लेकर आगे बढ़ जाउंगा, एक हैं पोलिश रचनाकार येजी पिल्ह, जिनकी पुस्तक ‘द माइटी एंजेल’ लोकप्रिय पोलिश पुस्तकों में शुमार है और जिस पर प्रसिद्द पोलिश फिल्मकार  वोइचेह स्मजोव्स्कि ने इसी नाम से फिल्म बनायी है; दूसरे हैं अतिलोकप्रिय अमेरिकन कवि/गद्यकार चार्ल्स बुकोव्स्की, जो आवारगी, शराब, अकथ की कथनी करने वाले के रूप में प्रसिद्ध हैं और इनके और इनकी रचनायों के ऊपर कम से कम चार-पांच फिल्में जरुर बन चुकी हैं. यह सब सिर्फ इसलिए कहा गया है कि शराबी की रचनात्मकता को शराब के बोतल का जिन्न मात्र न समझ लिया जाय और दुनिया में हिंदी के अलावा ऐसा बहुत कम जगह समझा गया है.

परम्परागत काव्य, काव्यशात्र और काव्य-परंपरा का धनी होना ही क्या कृष्ण कल्पित की प्रासंगिकता है? अगर इतना भर होता तो वे एक भाष्यकार मात्र बन कर रह जाते. कल्पित की प्रासंगिकता वहाँ है जब वे परंपरा प्रदत्त सूत्रों का प्रासंगिक भाष्य कर डालते हैं लेकिन उनकी इस प्रासंगिकता का सूत्र/सन्दर्भ क्या है? कभी एक बंगाली मित्र, जो कि दर्शन का शोधार्थी था, को शराबी की सूक्तियां सुनाई थी, उसने सुनकर जो पहली पंक्ति उचारी थी वह यह कि कवि मॉडर्निस्ट है. मैं भी यही सोचा करता था लेकिन कभी बोलने की हिम्मत नहीं हुयी थी. इस धारणा के प्रति अभी तक पूरी तरह से सहमत भी नहीं हुआ था. लेकिन जैसे ही उनकी कहानी ‘शराबघर’ पढ़ी, लोहा मान लिया. ‘शराबघर’ कहानी की चर्चा पहले क्यों नहीं हुयी या  क्यों नहीं सुनी इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है. कल्पित बहुत ही सहज और प्रवाहपूर्ण गद्य के भी धनी हैं, यह अब तक अनछुआ था. कल्पित सार्त्र के इतने नजदीक सिर्फ ध्वनित नहीं होते हैं बल्कि रचनात्मक रूप से वहीं कहीं स्थित हैं, ‘शराबघर’ कहानी से इसकी तस्दीक की जा सकती है. ‘शराबघर’ की आत्मा हिंदी में किसी और के यहाँ अगर मिलती है तो वे हैं ज्ञानरंजन और उनकी कहानी ‘घंटा’.

कृष्ण कल्पित के ‘शराबघर’ को ‘विमर्श’ के दायरे की कहानी मानता हूँ, जिस पर चर्चा होनी चाहिए. इसी लिए हमने हिंदी के अप्रतिम गद्यकार अनिल यादव से आग्रह किया कि वे इसकी एक भूमिका लिखें. तिरछीस्पेल्लिंग कृष्ण कल्पित और अनिल यादव दोनों का आभारी है. @तिरछिस्पेल्लिंग

कंपनीराज की देन बार, क्लब और पब सदा की नकली जगहें हैं जहां ऐसे लोग बहुतायत में आते हैं जो जीने नहीं जीते दिखने को जिंदगी मानते हैं. इस नकल का नतीजा है कि वहां शराब पीकर की जाने वाली बातों से लेकर टॉयलेट में पेशाब की झार तक एक जैसी होती है. उनके मुकाबिल देसी के ठेके, हौलियां और कलारियां लगभग मायालोक हैं. अव्वल तो वहां देस दिखता है. मैने बहुत थोड़े वक्त के लिए ही सही ऐसे ठेके जिये हैं जहां कारोबार शुरू करने के पहले कालीमाई को माला और दारू चढ़ाई जाती है, बोतलों के बीच तार पर गंवई दुकानदार का लंगोट सूख रहा होता है, कोई बच्चा पढ़ रहा होता है और वह जस्ते की थाली में बेंट की जगह सुतली बंधे चाकू से हमाहमीं के साथ शराबियों से दुआ सलाम करता हुआ तरकारी काट रहा होता है. देस भी कुछ चीज नहीं, वहां न जाने कितनी सभ्यताओं के नुमाइंदों के रूप में साले-बहनोई, घीसू-माधव, मौलवी-शागिर्द, मौसिया, फूफू, भांजे, दूल्हा भाई, आशिक और माशूका के बाप एक साथ बैठे मिलते हैं. हरेक का अपना मौलिक लबोलहजा यहां तक कि सिसकारी और भींगी मूंछे निथारने की अदा होती है, उनके भीतर कोई पुरातन जगह होती है जहां से वे बोलते हैं, उस जगह को पहचानने की तमीज हो तभी पता चलता है कि वे किस इतिहास से हंकाले जाने के बाद यहां आन पहुंचे हैं. वहां शोर के रोएंदार सीने में एक इत्मीनान का बड़ा सा दायरा होता है जिसमें नई जिंदगी के खाके बनते हैं, जहां बरसों से कोई हर शाम दो कुल्हड़ रख के पीता है, कोई अपने आंसुओं और रातरानी की महक में नहाकर पवित्र लौटता है, कोई दोस्त को दो निवाले खिलाने के लिए कसमें देते हुए मां हुआ जाता है, कोई एक ही मुड़े तुड़े कागज को बरसों पढ़ता है, कोई ध्यानस्थ होकर दुनिया की सतह से बहुत ऊपर चला जाता है और नहीं लौटता. मुझे अपने दौर सबसे जहीन, प्रतिभाशाली लोग वहीं मिले हैं, हमेशा की तरह उनमें से ज्यादातर की अदा बरबाद होना थी और उन्हें इसकी खास फिक्र भी नहीं थी.

इसे शराब का कसीदा न समझा जाए लेकिन उसमें कुछ ऐसा होता जरूर है जो जिंदगी की आग को कुरेद देता है बशर्ते आपमें कभी जरा सी आग रही हो. इसे घटिया पियक्कड़ों की सताई औरतें नहीं समझेंगी, वे शरीफ लोग तो कतई नहीं जिन्होंने चखी नहीं लेकिन नैतिकता और पाखंड के नशे में धुत्त रहते हैं. कृष्ण कल्पित की इस कहानी में एक ऐसे ही शराबघर के सहन में डोलती उसकी आत्मा के पैरों की आवाज सुनाई पड़ती है. कोई दो राय नहीं कि शराबी की सुक्तियां उनकी कमाई चीज है. @अनिल यादव

Snap shot from O-Bi, O-Ba: The End of Civilization

Snap shot from O-Bi, O-Ba: The End of Civilization

By कृष्‍ण कल्पित

शराबघर

वह एक सस्‍ता शराबघर था. शहर के बीचों बीच – थोड़ा अंदर धंसकर. वहां देशी से लेकर विदेशी तक हर किस्‍म की शराब मिलती थी और कहा जाता था कि यह शराबघर चौबीसों घंटे खुला रहता है. य‍ह ठीक भी था, क्‍योंकि एक दिन सवेरे चार बजे तक पीते रहने के बाद हम वहीं ‘लुढ़क’ गए थे और आंख खुलने पर देखा कि शहर की नालियां साफ करने वाले सफाई मजदूर देसी शराब की गुटकियां ले रहे थे. सुबह के पांच साढे पांच बजे होंगे, जब बांसों पर लटकाई हुई झाड़ूओं से छनकर आती रोशनी हमारे चेहरों पर पड़ी.

शर्माजी अभी ‘जागे’ नहीं थे. मैंने उन्‍हें झिंझोड़कर उठाने की कोशिश की. वे हड़बड़ाकर उठे और जेब में पड़े चश्‍मे को टटोलने लगे. शराबघर की दीवार के परली तरफ वाले रास्‍ते पर सामाजिक कार्यकर्ताओं का एक जत्‍था ‘उठ जाग मुसाफिर भोर भई, अब रैन कहां जो सोबत है’ गाते हुए गुजर रहा था. इस गाने को सुनकर या जाने किसी और बात पर एक सफाई मजदूर बेतरह हंसने लगा. मैंने, चौंक कर उसकी तरफ देखा, उसने हमारी तरफ भरपूर नजरों से देखा और कहने लगा, ‘जागो, मालिक, अब तो जागो .’

मैं खिसिया दिया. शर्माजी ने सिगरेट सुलगाते हुए ‘मालिक’ शब्‍द का व्‍यंग्य मिश्रित उच्‍चारण किया और हंसने लगे. हम धीरे-धीरे ‘जाग’ रहे थे हालांकि रात को पी गई शराब का खुमार अब भी हमारी आंखों की जड़ों तक पहुंच रहा था.

हम शराबघर से बाहर निकल रहे थे और चुप थे. चलते हुए हमारी चुप्‍पी इतनी शांति प्रदायिनी थी कि बोलते हुए तकलीफ हो रही थी. वैसे भी पिछली रात हम इतना बोल चुके थे कि बड़ी आसानी से दो-तीन दिन चुप रह सकते थे. हम बहुत धीमे-धीमे चल रहे थे. थोड़ा दूर आकर, गली के नुक्‍कड़ के पास शर्माजी ने पूछा, ‘वह तो रात को ही चला गया होगा.’

‘’हां उसे घर पहुंचना जरूरी था. वैसे मेरे इस उत्‍तर की कोई खास जरूरत नहीं थी, क्‍योंकि शर्माजी को पता था कि वह रात को ही चला गया है. फिर भी यह निरर्थक बातचीत हमारे बीच संवाद का रास्‍ता खोल रही थी, जिसे मैं अभी जानबूझकर टाले रखना चाह रहा था.

हम साल भर से इस शराबघर में आ रहे थे. लेकिन सवेरे की रोशनी में यह परिचित रास्‍ता कुछ बदला हुआ सा लग रहा था. मैं धुंधली पड़ चुकी लंबी गुलाबी दीवार पर बने बुर्ज को देर तक देखता रहा. लाल भक्‍क सूरज को बुर्ज में उलझा हुआ देखकर मैं अभिभूत हो गया. कुछ-कुछ ऐसा लग रहा था जैसे इस धरती पर पहली बार सवेरा हुआ हो. ऐसा शायद इसलिए कि एक तो पिछले कई बरसों से सबेरे जल्‍दी उठने की आदत नहीं रही थी और दूसरे नशा अभी पूरी तरह उतरा नहीं था.’ ‘अद्भुत’ मैं मन ही मन बुदबुदाया और बाहर से साइकिल पर गुजर रहे हॉकर से पूछा, ‘क्‍या खबर हैॽ’ हॉकर ने एक बार मेरी तरफ देखा और बिना जवाब दिए पैंडल मारता आगे बढ़ गया.

शर्माजी मुझसे आगे चल रहे थे. मैं पीछे चल रहा था और प्रसन्‍न था. असल में प्रसन्‍नता हमारे शरीरों के अंदरूनी और निचले हिस्‍से में थोड़ी बहुत बची रह गई थी जो कभी-कभार अल्‍कोहल के धक्‍के से ऊपर आ जाती थी. हम नवाब तो थे नहीं, गरीब और मध्‍यवर्ग के लड़के थे, जो गांवों-कस्‍बों में अपने ढहते हुए घरों और दुखी माताओं को छोड़कर इस बड़े शहर में आये थे. एक दिन हमने सिर्फ जीते रहने की धुन पर थिरकने से इनकार कर दिया तो हमें खदेड़ा जाने लगा. इस तरह हमें समाज की ‘मुख्‍यधारा’ से बाहर कर दिया गया. तब हमारी आंखों में कुछ स्‍वप्‍न बचे हुए थे. हम सोचते थे कि हम एक दिन इस दुनिया को बदल देंगे. यह तो अब आकर पता चला कि हम समाज का कुछ भी नहीं हिला पाए. बल्कि हमारे ही हुलिए बदल गए. हम चाहते तो लौट भी सकते थे और अपनी मां की गोद में बैठकर सुबक सकते थे. लेकिन उससे क्‍या होता? न हममें लौटने की इच्‍छा बची थी न शक्ति. हमारे कुछ मित्र बीच से लौट भी गए थे, पर हम इस जोखिम भरे रास्‍ते पर बहुत आगे बढ़ आये थे, जहां रोमांच तो था ही कुछ ‘खोजने’ का आनंद भी था. लगता था जैसे हम कहीं पहुंच रहे थे. यह शायद हमारा भ्रम था. हम कहीं नहीं पहुंचते थे, सिर्फ हर शाम बिना नागा इस सस्‍ते शराब घर में पहुंच जाते थे.

यह शराबघर किसी बंदरगाह की तरह था, जहां हमें हार-थककर अपने अपने ‘बेड़े’ डालने थे. शराबघर क्‍या था, एक बहुत पुराना मकान था. दरवाजे के बाहर एक नीम का पेड़ था. अंदर आने पर एक चौक, दो-तीन कोठरियां, जो शराब रखने का गोदाम बन चुकी थीं और आंगन के बीचों बीच एक गहरा कुआं था, जिसमें बहुत नीचे जाकर पानी चमकता था. इस शराबघर का मालिक एक रिटायर्ड फौजी था, जो बिना लाइसेंस अपने बूते पर शराबघर को चलाता था. शराबबंदी के मुश्किल समय में भी इस बूढ़े फौजी ने शहर की इस ‘आखिरी रोशनी’ को बूझने नहीं दिया था. ऐसा लगता था जैसे इस बूढ़े फौजी के लिए यह शराबघर चलाना व्‍यापार कम और ‘मिशन’ अधिक हो. पूरे शहर में यह शराबघर फौजी के अड्डे के नाम से मशहूर था.

हम काफी भटक-भटका कर इस अड्डे तक पहुंचे थे. पहले-पहल शायद शर्माजी ही मुझे इस अड्डे तक लेकर आए थे. कोई सालेक भर पहले की बात होगी. मैं कॉफी हाउस के आखिरी कोने में बैठा बची हुई आखिरी अठन्‍नी उछाल रहा था और बीच-बीच में केबिन में बैठी उस लड़की की तरफ देख रहा था, जो अपने बगल में बैठे लड़के से अपने थके हुए शरीर को सटाए दे रही थी. इस चक्‍कर में अठन्‍नी बार-बार हथेली की बजाए टेबल पर गिर रही थी. तभी कॉफी हाउस का दरवाजा खोलकर सोम अंदर घुसा– उसने घुसते ही कोने में बैठ मुझे देख लिया था. वह सीधा मेरे पास आया. बीच में, और बाहर कई लोगों ने उसे ‘सोम सोम’ कहकर पुकारा, लेकिन उसने किसी की आवाज पर कान नहीं दिया. वह जब से शहर के एक प्रमुख अखबार का सिटी रिपोर्टर बना है, उसकी पूछ बढ़ गई है. इस बात को सोम जानता था, इसी से वह अभी तक बचा हुआ था. वह जानता था कि उसे कोई नहीं पूछता, सब साले उस अखबार के आगे पूंछ हिला रहे हैं जो सवेरे-सवेरे इस शहर पर कनात की तरह तन जाता है. सोम तो छह महीने पहले भी था, इसी शहर में, इसी कॉफी हाउस में, इसी नरक में. तब किसी चिड़िया के पूत ने नहीं पुकारा– ‘सोम –सोम’. आगे सोफे पर बैठा वह तुंदियल खादी का कुरता, सोम के सामने ही-ही करते जिसके दांत नहीं थकते, आज वही दार्शनिक भाव से चलकर आया था. यहीं कोने में. पिछली सर्दियों में. सोम सिगरेट खाली करके गांजे को हथेली पर रगड़ रहा था. खादी के कुरते ने टेलीविजन के उद्घोषक की तरह आते ही सोम से कहा था, ‘सोम, तुम धीरे-धीरे अपनी मृत्‍यु की तरफ बढ़ रहे हो… .

‘तुम कौन से तक्षशिला की ओर बढ़ रहे हो, कुत्‍ते. चले जाओं यहां से.’ ‘कुत्‍ता’ संबोधन सुनकर वह हक्‍का-बक्‍का रह गया था. चुपचाप वापस लौट गया था. कुत्‍ते, मच्‍छर, कीड़े आदि सोम के प्रिय सम्‍बोधन थे, जिन्‍हें वह किसी भी लाट-साहब के लिए कहीं भी काम में ले सकता था. इधर अखबार में काम करने के बाद वह ‘बास्‍टर्ड’ शब्‍द का इस्‍तेमाल ज्‍यादा करने लगा है.

वह आते ही मुझ से लगभग लिपट गया. मैंने महसूस किया उसके लिपटने में वही पुराने वाला ताप अभी है. बाहर से भले ही आदमी बदल जाए, भीतर से बदलने में समय लगता है.

‘आओे, प्‍यारे.’ सोम ने कहा. मैं उसके पीछे पीछे कॉफी हाउस के बाहर चला आया था.

बाहर सूरज ढल रहा था. ढलते सूरज की किरणें शहर की पुरानी इमारतों से टकराकर सोने की तरह चमक रही थी. वह मेरा प्रिय दृश्‍य था. मैं आंखों के ऊपर हथेली टिकाकर उस सोनिया धूप को आंखों में भरता रहा. सूरज ! अपनी सोनिया किरणों पर इतराओ मत, हमारे यहां की तो रेत भी सोना है. सूरज ने मेरी बात नहीं सुनी. मैंने सामने देखा, सोम निराश होकर लौट रहा था. उसने कहा, ‘आज पगार का दिन है, शहर की तमाम दुकानें बंद हैं और आजकल पुलिस कुछ ज्‍यादा ही ध्‍यान दे रही है… फिर भी रूको, मैं सोचता हूं– क्‍या किया जा सकता है.’

तभी सामने रेलिंग के पास से शर्माजी आते दिखे. शर्माजी हमारे बीच उस पुरोधा की तरह थे, जिन्हें सब संकटों का हल पता हो. शर्माजी हमसे उम्र में काफी बड़े थे और हमारे लिए घने छायादार पेड़ की तरह थे, जिसकी छांव में हम सुस्‍ताया करते थे. वे इस शहर से थोड़ा दूर एक कस्‍बे के कॉलेज में अंग्रेजी पढ़ाते थे. पिछले डेढ़ साल से इसी शहर में थे और विश्‍वविद्यालय में अंग्रेजी के ब्‍लैक लिटरेचर पर कोई शोध कर रहे थे. मेरी जानकारी में पिछले डेढ़ वर्ष से शर्माजी ने अपने शोध का एक पन्‍ना भी नहीं लिखा था. वे लिखने से परे थे. साहित्‍य से उनका गहरा लगाव था. पीने के बाद वे जब कोई ब्‍लैक कहानी या कविता सुनाते तो उनकी आंखे भीग जाती थी. थोड़ा ज्‍यादा पीने के बाद वे ब्‍लैक लिटरेचर भूल जाते और कबीर, तुलसी और मीरा की कविताएं सुनाते. कबीर का ‘कौन ठगवा नजरिया लूटल हो’ पद सुनाते हुए उनकी आंखों से जार-जार आंसू बहते थे. फिर किन्‍हीं अज्ञात लोगों को संबोधित करके वे कहते थे, ‘वे स्साले हंसते हैं कि मैं रोता हूं. रोना पाप है क्‍या, हां मैं रोता हूं … क्‍योंकि मेरी आंखों में आंसू है….’ ऐसे ही एक लंबे एकालाप के बाद उनका एक तकिया कलाम था, ‘जिनकी आंखों का पानी मर गया, वे क्‍या खाक लिक्‍खेंगेॽ’ इसके बाद एक सांस खींचकर एक लंबा मौन और फिर शर्माजी का हंसना. सीधे हृदय से निकली हुई हंसी.

उस दिन पहली बार शर्माजी मुझे और सोम को फौजी के अड्डे पर लाए थे. वह दिन और आज का दिन, शायद ही कोई दिन बीता हो जब हम इस अड्डे पर न आये हों. सोम जरूर बीच-बीच में गच्‍चा दे जाता था, लेकिन अब तक कॉफी हाउस के कई और लोगों को हमारे अड्डे का पता चल चुका था और वे सूंघते-सूंघते यहां तक आने लगे थे, जिनका उद्देश्‍य सिर्फ शराब पीना था, उनसे हम बचना चाहते थे और उनसे बचना मुश्किल था. वे दिन भर गिद्ध की तरह शहर पर मंडराते हैं और शाम होते ही किसी ठौर उतर लेते हैं. वे बुरे नहीं थे, लेकिन इतने भले थे कि हर समय उनके भीतर मनुष्‍यता फुफकारती रहती थी.

वहां इतने सारे लोगों को एक साथ बैठकर पीते हुए देखने से एक घटना प्रधान संसार के चलते रहने की अनुभूति होती थी. मजदूर, रिक्‍शा चलाने वाले, ठेले वाले, छोटे-मोटे व्‍यापारी, रंगरेज, अध्‍यापक, सिनेमा के पोस्‍टर बनाने वाले चित्रकार, मोची, बढ़ई और बहुत संभव है कि उठाइगीर, चोर, मवाली और हत्‍यारे भी इनमें हों. उस पुराने मकान के आंगन में जिसे जहां जगह मिली वहीं पर बैठकर पी रहे हैं. कोठरी के बाहर एक मरियल लट्टू जल रहा था और चांदनी रात का भूरा मैला आलोक उस शराब घर पर बरस रहा था. आधे-अधूरे अस्‍पष्‍ट शब्‍द, फुसफुसाती आवाजें, और बीच-बीच में फुसफुसाहट को बेधती हुई तीखी और कर्कश आवाजें. इससे पहले जीवन के इतने बीचों बीच बैठकर मैंने शराब नहीं पी थी. इतना सारा जीवन. मेरी आंखें आश्‍चर्य से फटी जा रही थी. उस दिन ही मैंने असलियत में जाना कि इस शहर में करने के लिए इतने सारे धंधे हैं और जीने के लिए इतनी सारी जगहें.

उस दिन जब हम उस शराबघर से बाहर निकले तो मेरी चाल में किसी सम्राट की सी लचक थी, आंखों में किसी संत की सी तरलता और हृदय में अथाह प्‍यार. बाहर आकर लगा यह शहर हमारे लिए ही जगमगा रहा है. दूर पहाड़ी पर बने किले की रोशनियां खास हमारे लिए हैं. उस दिन बरसों बाद मैंने एक पुरानी फिल्‍म का गाना पूरा गाया.

असल में पिछले एक अरसे से हम थोड़े से लोगों की संगत में सड़ रहे थे. विश्‍वविद्यालय और कॉफी हाउस. हमारे पास सिर्फ ये दो जगहें बची थीं. थोड़े से अध्‍यापक, शोध-छात्र, पत्रकार और कॉफी हाउस के वही चिर-परिचित पुराने चेहरे. कोई ऐसा कोण नहीं बचा था, जिधर से हमने इन चेहरों को नहीं पहचाना हो. वे सब इतने जाने-पहचाने चेहरे थे कि पूरी तरह बेजान थे. निराशा हमारे शरीर में धंसने लगी थी और अब हमारा स्थाई भाव बन चुका था. एक चिड़चिड़ापन चेहरे पर हर समय चिपका रहता था. सफलता हमें डराने लगी थी और विफलता भीतर ही भीतर कुतर रही थी. हम न रोजों में रोने लायक बचे थे न गीतों में गाने लायक.

मुझे एमए किए तीन बरस बीत चुके थे. पिछले तीन बरसों से मैं अवैध रूप से विश्‍वविद्यालय के होस्‍टल में रह रहा था. अभी कुछ दिन हुए एक दिन जब मैं देर रात को हॉस्‍टल पहुंचा तो देखा मेरा सामान, किताबें और बिस्‍तर कमरे के बाहर फेंक दिये गए हैं और कमरे पर हॉस्‍टल का एक मोटा ताला लटक रहा है. रात मैं वहीं बरामदे में पड़ी एक टूटी खाट पर सोया था सवेरे एक रिक्‍शे पर अपना सामान लादकर सीधा शर्माजी के कमरे पर पहुंच गया. शर्माजी ने मेरा बिस्‍तर अपने कमरे के एक कोने में बिछा दिया. तब से मैं शर्माजी के कमरे में ही रह रहा था. इन दिनों मैं घोर निराशा में डूबा हुआ था. कोई भी रास्‍ता नहीं दिखलाई पड़ रहा था. मैं जीवन से पूरी तरह खाली हो चुका था.

शर्माजी ने मुझे आश्रय दिया, सहारा दिया, दिलासा भी दी. लेकिन मेरे मन पर पड़ा हुआ निराशा का भारी पत्‍थर हट नहीं रहा था.

उन दिनों मृत्‍यु को लेकर बहुत सारी कविताएं भी मैंने लिखीं. यह साल सवा साल पहले की बात है. शर्माजी सवेरे निकल जाते थे और मैं सारा दिन कमरे में अकेला पड़ा हुआ मृत्‍यु चिंतन में लीन रहता. शराब पीने के बाद मरने की इच्‍छा अधिक प्रबल हो उठती थी. एक दिन मैंने अपनी मृत्‍यु संबंधी सारी कविताओं को एक डायरी में उतारा और डायरी के पहले पृ्ष्‍ठ पर लिखा– ‘मैं मरना चाहता हूं.’ इसके बाद मैंने लिखा– ‘अब मुझसे जीने के लिए कहना किसी सम्राट से मूंगफली बेचने के लिए कहना है.’ यह एक जापानी उपन्‍यासकार के पत्र का अंश था, जो उसने आत्‍महत्‍या करने से पहले अपनी बहन को लिखा था. मैंने इसके नीचे अपने हस्‍ताक्षर किए और डायरी सिरहाने रखकर सो गया .

दूसरे दिन आंख खुलने पर जब मैंने इस डायरी को पढ़ा तो बड़ा अटपटा सा लगा. फिर मुझे हंसी आ गई. बाहर दरवाजे पर दूध वाला घंटी बजा रहा था. हॉकर ने नीचे से अखबार फेंका जो मेरे सर से आकर टकराया. मैंने अपनी उस डायरी को कमरे के ऊपरी कोने में बनी ताख पर फेंक दिया और खिड़की के पास आया. बाहर रास्‍ते में एक दस बारह साल का चरवाहा हाथ में एक बेंत लेकर बकरियों के रेवड़ को हांकता हुआ पहाडि़यों की तरफ ले जा रहा था. शर्माजी अभी सोए हुए थे. मैं जल्‍दी-जल्‍दी तैयार हुआ और बाहर निकल आया. यह उसी दिन की बात है, जब मैं कॉफी हाउस से उठन्‍नी उछाल रहा था और जिस दिन पहली बार उस सस्‍ते शराबघर में गया था. उसी दिन वहां से बाहर निकलकर मैंने कहा था, ‘मैं अभी जीना चाहता हूं.’

मैं तेज तेज कदमों से चलकर शर्माजी के पास तक आ गया. हम एक चाय की थड़ी पर बाहर पड़े मूढ़ों पर बैठ गए. शर्माजी ने पूछा, ‘रात को बाबू खां पेंटर तुमसे क्‍या कह रहा था?

‘बाबू खां ने मुझे काम के लिए बुलाया है. उसने कहा है कि मैं उसके होर्डिंग रंग दिया करूं.’ मैंने कहा .

शर्माजी यह तो जानते ही थे कि मैं पिछले छह महीने से जिस प्रेस में जाकर प्रुफ पढ़ता हूं, वह काम मुझे रामदयाल फोरमेन ने दिलवाया था. रामदयाल से भी मेरी मुलाकात यहीं हुई थी. शर्माजी यह भी जानते थे कि आजकल सफेद बालों वाला बूढ़ा शराबी घर से हर रोज टिफिन लाता है और मुझे कॉफी हाउस में प्रेस में ढूंढता रहता है और धमकाकर पूछता है, ‘खाना खाया या नहीं?’

और तुम उस बढ़ई से क्‍या पूछ रहे थे ॽ’ शर्माजी रात को सचमुच ज्‍यादा पी गए थे और उन्‍हें रात की कोई बात याद नहीं.

मैं उससे पूछ रहा था कि एक डबल बेड का क्‍या खर्चा बैठता है?’ मैंने उत्‍तर दिया.

शर्माजी एक रहस्‍यभरी दृष्टि से मेरी तरफ देखकर चाय की चुस्कियां लेने लगे. मैंने सामने देखा, सफाई मजदूर अपने कंधों पर बांसझाड़ू लटकाए शहर की तरफ बढ़ रहे थे. वे अब शहर की गंदगी साफ करेंगे. देशी दारू का एक तेज भभका हवा में तैर गया.

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कृष्ण कल्पित. यह तब के आस-पास की ही तस्वीर है जब उन्होंने यह कहानी लिखी होगी. उनसे मोबाइल-9968312514 और ईमेल- krishnakalpit@gmail.com पर संपर्क संभव है.

भीष्म साहनी की कहानी-(अ)कला: संजीव कुमार

हिंदी कहानी के आन्दोलन ने जहाँ एक और पुरानी जड़ता को तोड़कर नयी ज़मीन तैयार की, वहीँ उसमें कभी मूर्खतापूर्ण और कभी षड्यंत्रपूर्ण चयनवाद भी उभरा. हिंदी के कई महत्वपूर्ण कहानी लेखक इस चयनवाद के शिकार हुए. ऐसे आन्दोलनों के शिकार भीष्म साहनी  भी हुए. यह चयनवादी आलोचना उनकी भी थी जो अपने को प्रगतिशील और जनवादी सिद्ध करने के लिए कुछ भी कर रहे थे.  इस चयनवाद के शिकार भीष्म साहनी जी अकेले नहीं हुए. कई दूसरे महत्वपूर्ण हिंदी कथा लेखक और कवि या तो पीढ़ियों के अंतराल के नाम पर आधुनिक न रहे या फिर उनके सामाजिक संघर्ष को क्रांतिकारी  तत्त्वों में शामिल न किया गया. यह अवश्य ही दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थिति थी जिसके विरुद्ध आज भी संघर्ष करने की आवश्यकता बनी हुयी है. खासकर तब; जबकि क्रांतिकारिता की व्याख्या सामाजिक परिवर्तन के दूसरे छोर पर जा रही है…. फिट्गेराल्ड ने कभी कहा था, ‘मैं अपने समकालीनों के साथ नहीं होना चाहता, क्योंकि मेरी नियति भविष्य के कूड़ेदान में नहीं होगी.’ भीष्म साहनी अपने समय के साथ हो सकते हैं, अपने समकालीन लेखकों के साथ नहीं…. ऐसा नहीं है कि भीष्म साहनी जी अपनी कहानियों के कलात्मक रूपगठन के प्रति असचेष्ट हों. वे इस दिशा में यशपाल की उस शैली का थोड़ा अभ्यास किया मालूम पड़ते हैं जो प्रतिमुखता का एक नाटकीय चरम बिंदु पूरे घटनाक्रम के भीतर से खड़ा कर लेती है और हमें अभिभूत करती है… आधुनिकतावादी लेखकों ने कथानक को प्रायः व्यर्थ बना दिया है. हिंदी में प्रेमचंद-यशपाल से लेकर भीष्म साहनी और अमरकांत-रेणु ने उनकी पुनः प्रतिष्ठा के लिए संघर्ष किया है. भीष्म जी की तमाम कहानियों की रूप-रचना में एक कथानक होता है, एक भरी-पूरी कहानी होती है, जिसमें अकेला चरित्र अपनी भीतरी परिस्थितियों में कम होता है. एक पूरा व्यापाररत समुदाय उनके साथ दिखता है. ..कहानीपन की रक्षा का संघर्ष कहानी की रचनात्मक पहचान के लिए आवश्यक हो गया है. आज की अधिकांश कहानियों में हलचल तो बहुत होती है, पर अंतर्वस्तु में एक रिक्तता-सी लगती है.  # सुरेन्द्र चौधरी (‘हिंदी कहानी : रचना  और परिस्थिति ‘ में संकलित  ‘भीष्म  साहनी : नए  राष्ट्रीय बोध के अन्वेषक ‘ लेख से )  

फोटो- त्रिभुवन तिवारी, आउटलुक से साभार

फोटो- त्रिभुवन तिवारी, आउटलुक से साभार

   

By संजीव कुमार

यह थोड़ा अजीब तो है, पर क्या करें, कि कहानीकार भीष्म साहनी के बारे में सोचते हुए बरबस ‘मोहन जोशी हाजि़र हों’ और ‘तमस’ वाले अभिनेता भीष्म साहनी याद आ जाते हैं। दोनों जगह उनका किरदार ऐसा था जिसमें आविष्ट नाटकीयता वाले क्षणों की पर्याप्त गुंजाइश थी, पर भीष्म जी के अभिनय ने उन क्षणों को असाधारण तरीक़े से उभारने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखायी। उसे किसी चिह्नित की जाने योग्य नाटकीयता के हवालेे नहीं किया। बस, जीवन के सहज प्रवाह का थोड़ा असहज हो जाना ही चिह्नित हो पाया। लगा, हम सामान्य दिनचर्या में आए हुए कुछ व्यतिक्रमों से रू-ब-रू हैं, उन व्यतिक्रमों के प्रति अतिरिक्त रूप से संवेदनशील बनानेवाली अभिनय-कला से नहीं। मानो हम बिना किसी नाटकीयता के प्रत्यक्ष जीवन की सादगी का साक्षात्कार कर रहे हों, उस जीवन की कलात्मक पुनर्रचना का नहीं।

कहानीकार भीष्म साहनी भी ऐसे ही हैं। उनकी कहानियां कथा-स्थितियों और पाठक के बीच किसी कहानीकार की मध्यस्थता का अहसास नहीं होने देतीं। बेहद सीधे-सादे तरीक़े से वे कहानी कहते चले जाते हैं। कहीं कोई चमकता हुआ वाक्य नहीं, कोई ऐसी साहित्यिक हिकमत नहीं जिसे देखकर आप ‘वाह’ कह उठें, कहीं किसी प्रसंग को थम-ठहर कर अलग से उभारने का जतन नहीं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल होते तो शायद कहते कि इन्हें जीवन के मार्मिक स्थलों की पहचान नहीं है, इसलिए उन जगहों पर ठहर कर धैर्य से रमते नहीं हैं। पर मार्मिक स्थलों की पहचान का यह सूत्र तुलसीदास पर, या पुरानी/प्रचलित कथा को उपजीव्य बनानेवाले किसी भी रचनाकार पर तो लागू हो सकता है, भीष्म जी पर लागू नहीं हो सकता। तुलसी के पास कथा पहले से थी, विमर्श और वक्रता ही अपनी थी। उन्हेें एक पूर्वप्रचलित कथा में धैर्यपूर्ण ट्रीटमेंट की मांग करनेवाले मार्मिक स्थलों की पहचान करनी थी। भीष्म जी के पास कथा – यानी घटनाओं का कंकाल – और विमर्श, दोनों अपना है। उन्हें किसी पहले की कथा में ख़ास अपनी वक्रता पैदा नहीं करनी है। उनका कौशल उपजीव्य कथा की घटना-शृंखला में मार्मिक स्थलों की पहचान कर उसका सधे हाथों से ट्रीटमेंट करने में नहीं, स्वयं ऐसे स्थलों की कल्पना-उद्भावना करने में निहित है – ऐसी कथा-स्थितियों की उद्भावना जहां पात्र और परिस्थितियों के घात-प्रतिघात से जीवन का कोई मार्मिक पक्ष, कोई दबा हुआ आशय, कोई पहचाना किंतु अनपहचाना-सा सत्य बेसाख़्ता उभर आये।… और इस काम में भीष्म साहनी माहिर हैं। शायद इसी महारत केे चलते उनमें सीधेे-सादे ढंग से कहानी कह जानेे का दुर्लभ-सा आत्मविष्वास है।

भीष्म जी की इस विशेषता को नामवर सिंह ने अचूक ढंग सेे पहचाना था। ‘कहानी नयी कहानी’ में कहानी की संरचना को लेकर जगह-जगह अनेक सूत्र देते हुए जिस सूत्र के उदाहरण के रूप में उन्होंने भीष्म साहनी का उल्लेख किया है, उसे याद कीजिए। सजीव बिंब, सांकेतिकता, ‘आधारभूत विचार का द्रवीभूत होकर संपूर्ण कहानी के शरीर में भर उठना’, वातावरण-निर्माण, टेक्स्चर – इन सबकी चर्चा करते हुए भीष्म साहनी की कहानियां उदाहरण नहीं बनी हैं। वे उदाहरण बनी हैं इस सूत्र का: ‘‘कहानी जीवन के टुकड़े में निहित ‘अंतर्विरोध’, ‘द्वंद्व’, ‘संक्रांति’ अथवा ‘क्राइसिस’ को पकड़ने की कोशिश करती है और ठीक ढंग से पकड़ में आ जाने पर यह खंडगत अंतर्विरोध ही वृहद् अंतर्विरोध के किसी-न-किसी पहलू का आभास दे जाता है।… यह एक विरोधाभास है कि कहानी जैसा एकान्वित शिल्प अंतर्विरोध पर निर्भर होता है। नये कहानीकारों में भीष्म साहनी में एक ही साथ इन दोनों विशेषताओं का सर्वोत्तम सामंजस्य मिलता है। इस दृष्टि से भीष्म साहनी सबसे सफल कहानीकार हैं।’’ इसके बाद वे ‘चीफ़ की दावत’ का सधा हुआ विश्लेषण करते हैं और बताते हैं कि किस तरह कहानी की मां केवल एक चरित्र नहीं रह जाती, संपूर्ण प्राचीन का प्रतीक बन जाती है। और किस प्रकार ‘एक समर्थ कहानीकार जीवन की छोटी-से-छोटी घटना में अर्थ के स्तर-स्तर उद्घाटित करता हुआ उसकी व्याप्ति को मानवीय सत्य की सीमा तक पहुंचा देता है।’

यह अकारण नहीं है कि जीवन के टुकड़े में निहित अंतर्विरोध, द्वंद्व, क्राइसिस आदि को पकड़ने के उदाहरण के रूप में ही भीष्म जी याद आये, सजीव बिंब या वातावरण-निर्माण या ‘संगीत का-सा प्रभाव उत्पन्न करने’ का सामथ्र्य आदि के उदाहरण के रूप में नहीं। प्रतीक की बात ज़रूर की गई है (‘संपूर्ण प्राचीन का प्रतीक’), पर यह सायास नियोजित प्रतीक के अर्थ में नहीं है, जैसा राजेंद्र यादव या मोहन राकेश के यहां मिलता है। मोहन राकेश की ‘एक और जि़ंदगी’ में कोर्टरूम के भीतर पंखे से कटकर नीचे गिरे पक्षी का प्रतीक एक सजग सहित्यिक युक्ति है जो तलाक लेते पति-पत्नी के बच्चे की लहूलुहान आत्मा का प्रतीकार्थ व्यक्त करने के लिए प्रयुक्त हुई है। ‘चीफ़ की दावत’ की मां को ऐसी साहित्यिक युक्ति केे अर्थ में प्रतीक नहीं कहा गया है। इसीलिए मां प्रतीक ‘है’ नहीं, प्रतीक ‘बन जाती है’। प्रतीक ‘बन जाना’, दरअसल, पठन के स्तर पर उपलब्ध की गई व्यंजना या ध्वनि है, जो इसीलिए संभव हुई है कि कहानीकार ने एक अंतर्विरोध से जुड़ी विडंबना को सफ़ाई से पकड़नेवाली कथा-स्थिति निर्मित की है। कोई आष्चर्य नहीं कि मां के प्रतीक बन जाने की बात कहते हुए नामवर सिंह को काव्यशास्त्र में वर्णित व्यंजना की याद आई: ‘‘काव्यशास्त्र के आचार्यों ने मुख्यार्थ के भीतर से जो अर्थ की व्यंजना कराई है, वह भी इसी का रूप है। जीवन का सत्य इसी तरह खंड के भीतर से, किंतु उसे खंडित करता हुआ पूर्ण की ओर संकेेत करता है; खंड की सीमा को तोड़कर पूर्ण में मिलता है, मुख्यार्थ को बाधित करके रसमय अर्थ को व्यंजित करता है…।’’

मुख्यार्थ से आगे जाकर व्यंजित होनेवाला अर्थ (मुख्यार्थ कोे बाधित करके नहीं, मुख्यार्थ-बाध लक्षणा का लक्षण है; इस बात पर नामवर जी के नंबर कट सकते हैं), खंड की सीमा को तोड़कर पूर्ण में मिलता जीवन-सत्य – भीष्म जी की कहानियों की यह विशेषता उन्हें सीधा-सादा नहीं रहने देती, अंदाज़े-बयां में वे जितनी भी सीधी-सादी लगें। इसीलिए कहा है, दिल को देखो, चेहरा न देखो…। वस्तुतः अंदाज़े-बयां की सादगी और कहानी विधा की अपनी आकारिक सीमाओं के साथ भीष्म जी जितनी बड़ी वास्तविकताओं की ओर संकेत कर पाते हैं, वही उनके महत्व का आधार है। उनकी यादगार कहानियां – ‘चीफ़ की दावत’, ‘वाड्.चू’, ‘ओ हरामज़ादेे’, ‘अमृतसर आ गया है’, ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ आदि – इसीलिए यादगार हैं। ‘वाड्.चू’ का उदाहरण लें। किसी भावुक कर देनेवाले संस्मरण की तरह प्रतीत होती यह कहानी आपको अचूक ढंग से यह अहसास कराती है कि व्यक्तिगत स्तर पर अपने दौर से विदाई ले लेना किसी के लिए संभव नहीं। आपका दौर आपका पीछा नहीं छोड़ता। वाड्.चू पुरानी पोथियों में ही घुसा रहता है, महाप्राण बुद्ध के प्रति एक भावुक लगाव में सिमटा। उसे न नेहरू से मतलब है, न चाउ एन लाई से। उसके अंदर मातृभूमि को लेकर कोई नाॅस्टैल्जिक भाव नहीं है, भले ही कहानी के प्रथम पुरुष वाचक को यह लगता रहा हो कि एक बार अपनी ज़मीन पर लौटने के बाद दुबारा भारत आना उसके लिए भावनात्मक कारणों से संभव नहीं होगा। वाड्.चू के साथ ऐसा कुछ नहीं होता। वह चीन जाता है और दुबारा अतीत की उन्हीं पोथियों में शरण पाने के लिए भारत लौट आता है। लेकिन दोनों जगह वह राज्यतंत्र की निगाह में संदिग्ध है। कोई यह मानने को तैयार नहीं कि वह किसी राज्यतंत्र के लिए हानिरहित एक अतीतजीवी प्राणी है। उसका दौर उसका पीछा करता रहता है और जब पीछा करना छोड़ता है, तब तक वाड्.चू का सर्वस्व लुट चुका होता है। अपने आसपास जितना अतीत उसने इकट्ठा कर रखा था, पांडुलिपियों और नोट्स की शक्ल में, जो उसकी दृष्टि में अत्यंत मूल्यवान था, छिन्न-भिन्न हो जाता है। वाड्.चू का जीवन सारहीन, बेमानी-सा हो जाता है और कुछ समय बाद उसकी मृत्यु हो जाती है। मानो एक ख़ास तरह के पर्यावरण में ही जी पानेवाले प्राणी से उसका पर्यावरण छीन लिया गया हो।

क्या वाड्.चू की त्रासदी को एक व्यक्ति की बदकि़स्मती के रूप में पढ़ा जा सकता है? निस्संदेह, पढ़ा तो जा ही सकता है, पर यह भी निष्चित है कि एक चरित्र और उसके साथ परिस्थितियों के इस घात-प्रतिघात की योजना भीष्म जी ने इतने संकरे पठन के लिए नहीं की है। अनैतिहासिक और समय-निरपेक्ष होकर जिया नहीं जा सकता, यह कठोर सचाई वाड्.चू की त्रासदी में व्यंजित होती है और यह व्यंजना व्यक्तियों से आगे वर्गों, समुदायों और राष्ट्रों पर भी लागू होती है। ‘खंड की सीमा को तोड़कर पूर्ण में मिलता जीवन-सत्य’ यही है जिसको साधने में यह सीधी-सादी कहानी कामयाब है। और इसे साधने के लिए भीष्म जी किसी ऐसी हिकमत का प्रयोग नहीं करते जिसे मैं थोड़े मज़ाकिया लहज़े में ‘सफऱ्ेस टेंशन’ कहना पसंद करता हूं। वे कोई ऐसा वाक्य नहीं लिखते जो आपको अर्थ की किसी विशेष दिशा की ओर ढुलकाने का ज़रिया बन जाए। बावजूद इसके अभिधा से आगे व्यंग्यार्थ की ओर आपकी यात्रा अनिवार्य हो जाती है, क्योंकि कहानी अपने वाक्यों से नहीं, वाक़यों से वह ध्वनि पैदा करने में समर्थ है।

इस रूप में गहरी अर्थ-व्यंजनाओं से भरी कथा-स्थितियों की कल्पना करना ही कहानीकार के तौर पर भीष्म साहनी का स्व-भाव है। शैली-शिल्प में नयापन या अतिरिक्त आकर्षण पैदा करना उनका स्व-भाव नहीं है, इसीलिए जहां वे इसकी कोशिश करते भी हैं, वहां उन्हें कोई सफलता नहीं मिलती। ‘वाड्.चू’ में ही देखें तो पहले वाक्य के साथ भीष्म जी ने एक चैंकाऊ कि़स्म की शुरुआत करने की कोशिश की है: ‘तभी वाड्.चू आता दिखाई पड़ा।’ लेकिन यह ‘तभी’ बिल्कुल जमता नहीं, क्योंकि वह अपना औचित्य सिद्ध नहीं कर पाता। शैली का चैंकाऊपन कतई प्रति-उत्पादक हो जाता है। इसी तरह ‘चीलें’ कहानी में वे चील का जो प्रतीक खड़ा करने की कोशिश करते हैं, वह ख़ासा निष्प्रभावी है। दरअसल, कहानियां उनके भीतर इस तरह के वातावरणधर्मी प्रयोगों के रूप में जन्म नहीं लेती हैं। नयी कहानी में स्त्री-पुरुष-संबंधों वाले कथ्य और प्रतीकात्मक-सांकेतिक शैली-शिल्प-विधान को जो महत्व मिला था, उसने शायद धक्का देकर भीष्म जी को ऐसी कहानी लिखने के लिए प्रेरित किया। वे अपनी प्रकृति से मूड/मनःस्थिति को आधार बनानेवाले कहानीकार हैं नहीं, जैसे कि वे ‘चीलें’ में दिखना चाहते हैं।

पर इसका यह भी मतलब नहीं कि मनोविज्ञान पर उनकी पकड़ मूड/मनःस्थिति को आधार बनानेवालों के मुक़ाबले कहीं भी कमतर है। यह कहते हुए मुझे ‘चीफ़ की दावत’ समेत भीष्म जी की कितनी ही कहानियां याद आ रही हैं, पर जि़क्र सिर्फ़ ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ का करूंगा जिसका पाठ अभी मेरी मेज़ पर नहीं है और जिसे पढ़े हुए भी लगभग तीस साल गुज़र चुके हैं। उसका मुख्य पात्र अंग्रेज़ीयत से बहुत प्रभावित है। उसे अंग्रेज़ों की सभी चीज़ें बड़ी अच्छी लगती हैं। एक बार वह कहानी के ‘मैं’ से कहता है कि देखो, अहम् ब्रह्मास्मि का जो अंग्रेज़ी अनुवाद है, वह कितना सुंदर है, ‘आई ऐम द डिवाइन फ़्लेम’। और ऐसा कहते हुए उसके चेहरे पर एक अजीब तरह का दिव्य भाव उभर आता है। फिर कहानी में एक प्रसंग आता है जिसमें एक सिनेमा हाॅल के यूरिनर से अंग्रेज़ उसे धक्के मारकर हटा देते हैं, क्योंकि वह – एक काला देसी आदमी – उन्हें इंतज़ार करवा रहा है। इस घटना के बाद जब कहानी का प्रथम पुरुष वाचक उसके घर पहुंचता है तो कमरे में न पाकर उसे ढूंढ़ता हुआ छत पर जाता है। वहां देखता है कि वह आंखें मूंदे हुए ध्यानस्थ बैठा है और बुदबुदा रहा है, ‘आई ऐम द डिवाइन फ़्लेम… आई ऐम द डिवाइन फ़्लेम’। वाचक को लगता है कि वह मंत्र बुदबुदाता हुआ सतह से दो इंच ऊपर उठ गया है।

यह कथा-सार मैं तीस साल पहले, अपनी किशोेरावस्था मेें पढ़े हुए पाठ केे आधार पर बता रहा हूं। मुमकिन है, इसमें मेरा कुछ अपना भी जुड़ गया हो। पर कहानी की मुख्य विडंबना निभ्र्रांत है। और कहने की ज़रूरत नहीं कि वह हीनता-ग्रंथि की गहरी मनोवैज्ञानिक पकड़ पर टिकी है। मनोवैज्ञानिक पकड़ के इसी अर्थ में ‘अमृतसर आ गया है’ या ‘ओ हरामज़ादे’ भी मुख्यतः मनोविज्ञान की कहानियां हैं, भले ही कहानीकार घटनाओं की जगह मनःस्थितियों के रचाव में दिलचस्पी लेता न दिखाई दे।

कुल मिलाकर, भीष्म साहनी की अनेक कहानियां कहानी विधा की शक्ति का उदाहरण हैं। जिन लोगों को यह लगता था कि इस छोटे आकार की विधा में बड़ी बात को समेटने का माद्दा ही नहीं है, उन्हें खरा उत्तर देनेवाली कहानियों में भीष्म जी की कई कहानियां शामिल हैं। सबसे बड़ी बात कि यह माद्दा कथा-कथन की सादगी और भरपूर पठनीयता को बनाये रखते हुए हासिल किया गया है। कहानीकार बनने के इच्छुक किसी नये लेखक को अगर यह आत्मविश्वास अर्जित करना हो कि वह भी कहानियां लिख सकता/सकती है तो उसे भीष्म जी की कहानियां अवश्य पढ़नी चाहिए।

संजीव कुमार

संजीव कुमार

संजीव कुमार। युवा आलोचक और कहानीकार। ‘जैनेन्द्र और अज्ञेयः सृजन का सैद्धांतिक नेपथ्य’ पुस्तक के लिए देवीशंकर अवस्थी सम्मान। दिल्ली विश्विद्यालय के देशबंधु कॉलेज में  प्राध्यापक। इनसे sanjusanjeev67@gmail.com पर संपर्क सम्भव है।

सहमत (सफ़दर हाशमी मेमोरियल ट्रस्ट) द्वारा प्रकाशित भीष्म साहनी पर केंद्रित पुस्तिका से साभार

अमरकांत की कहानी ‘हत्यारे’ और आज का समय: मार्तण्ड प्रगल्भ

 बात तो करनी है ‘अमरकांत की कहानी ‘हत्यारे’ और आज का समय’ पर और इसी कहानी पर विचार करके मैं आया था। लेकिन कल की कुछ चर्चाएं जो खासतौर से यथार्थवाद के सम्बन्ध में या सत्य के सम्बन्ध में या यथार्थ और रचना के सम्बन्ध में हुई थीं उनके बारे में भी मैं इस कहानी के संदर्भ से कुछ सोच रहा था. जिसे मैं आगे स्पष्ट करूँगा. चर्चा का प्रस्तुत विषय गंभीर तो है ही मनोरंजक भी है। गंभीर क्यूं है इस पर थोड़ा बाद में चर्चा की जाएगी। पहले, मनोरंजक क्यूं है इसकी थोड़ी चर्चा कर ली जाए। आज का जो विषय है, इस विषय के साथ दिक्कत यह है कि आप जहां चाहे इस विषय को फिट कर सकते हैं। समाजशास्त्र का कोई सेमिनार हो, (तो) उसमें भी यह विषय आ जाएगा। दरअसल हुआ क्या है कि आलोचना की जो समाजशास्त्रीय पद्धति है उसने विषयों का टोटा खत्म कर दिया है और इस तरह के शीर्षक की आवाजाही बेरोकटोक चलती रहती है। जैसे, बहुत सारे शोधार्थी इसी तरह के शोध विषय चुन लेते हैं; कोई रचना ले ली और उसमें आज का समय या रचना का समय जोड़ दिया और पूरा एक शोध प्रबंध तैयार हो गया! इसके चलते, इस तरह के विषयों की पुनरावृत्ति बढ़ी है जिससे विषय की गंभीरता एक यांत्रिक पुनरुत्पादन में नष्ट हो जाती है और कई बार हम चीजों को ठेठ समाजशास्त्रीय व्याख्या तक सीमित कर लेते हैं। मानो किसी समय का जो अर्थशास्त्र है उसके बारे में जान लेना (ही विषय को समझने के लिए पर्याप्त) है , कि नेहरू युग के अवसान के समय क्या स्थितियां थीं उसकी थोड़ी चर्चा कर ली जाए और (रचना तथा उन स्थितियों) दोनों में ऐतिहासिक सम्बन्ध जोड़ लिया जाए और इस प्रकार आज के समय में हत्यारे कहानी की सार्थकता सिद्ध हो जाती है। इस पद्धति के चलते जो गंभीर और सारगर्भित सवाल हैं वो ढंक दिए जाते हैं।  # लेखक 

अमरकांत

अमरकांत

रचना और आलोचना के प्रश्न जीवन के प्रश्न होंगे कि नहीं!

By मार्तण्ड प्रगल्भ

हर सचेत और क्रियावान मनुष्य अपने समय की जटिलता को समझना चाहता है। उस समय को समझना चाहता है जिससे उसके अंग-प्रत्यंग-अनुषंग परिस्थिति विशेष में निर्मित हो रहे हैं। मनुष्य के वर्तमान की वर्तमानता (प्रजेन्स ऑफ प्रजेन्ट) क्या है? इस प्रश्न को लेकर वह कई जगह भटकता फिरता है. और ऐसे ही संकट के समय कोई कहानी या कविता या कोई अन्य कलारूप अपने भीतर के अदम्य आकर्षण से उसे अपनी ओर खींच लेते हैं। महान रचनाएं वक्त-बेवक्त ऐसा ही अदम्य आकर्षण पैदा करती हैं। तो सवाल यह है कि ‘हत्यारे’ कहानी का हम कथा आलोचकों-कथाकारों की सभा में क्या महत्त्व है। या हम सरीखों के लिए ‘हत्यारे’ की उपयोगिता क्या है? क्षमा करेंगे, यहां उपयोगिता किसी उपयोगवाद के अर्थ में नहीं है बल्कि मार्क्स जिसे उपयोग-मूल्य कहते हैं उसके अर्थ में है। दरअसल यह कहानी-कला और कथा आलोचना दोनों के लिए गंभीर सवाल है।

कल की चर्चा में समकालीनता और आज के समय के बारे में हमारे समय के महत्त्वपूर्ण आलोचक (रविभूषण) अपनी बात रखते हुए कल कह रहे थे कि 1944 से हमें अपना समय मानना चाहिए। उस साल एक किताब आयी थी- रोड टू सर्फडम; वहां से एक नए ऐतिहासिक युग ‘बाजारवाद की केंद्रीयता’ की शुरुआत होती है और उसको एक विभाजक रेखा माननी चाहिए। चूंकि वे अध्यक्ष हैं, इसलिए मैं क्षमा मांगते हुए कहना चाहता हूं कि यह काल निर्धारण की हेगेलियन पद्धति है, जहां विचार की प्रमुखता से इतिहास का मूल्यांकन किया जाता है। अब 1944 में किताब आयी और वहां से नए समय की शुरुआत हो तब तो उदारतावाद की शुरुआत लास्की आदि से ही हो जाएगी। अगर इतिहास विचारों की क्रमबद्धता, गत्यात्मकता और द्वन्द्वात्मकता में निहित है तो यह हेगेलियन पद्धति है। 44 में शेखर एक जीवनी का दूसरा खण्ड आता है। प्रयोगवाद, तारसप्तक ऐसी बहुत सारी चर्चाएं शुरु होती हैं। उनमें से किसको अपने समय का आधार बनाया जाए यह एक प्रश्न है। दूसरा प्रश्न, क्या अर्थशास्त्र के अनुशासन से चलकर साहित्य के लिए काल निर्धारण सम्भव है? अगर अर्थशास्त्र से इतिहास में परिवर्तन के चरणों को समझना है तो प्रभात पटनायक इसके लिए ज्यादा मुफीद होंगे। साहित्य के आलोचक के लिए ये प्रश्न महत्त्वपूर्ण क्यों हैं और फिर इतिहास निर्माण की जो वास्तविक शक्तियां हैं, जिनके प्रति हम अपनी प्रतिबद्धता भी व्यक्त करते हैं, वे इतिहास के निर्धारक बिंदु होंगे या कोई शिकागो स्कूल निर्धारक बिंदु होगा! कहने का तात्पर्य यह कि जैसे हमारा नया समय हमारी परिस्थितियों के अनुरूप भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन का भी एक नया समय था और वह नक्सलबाड़ी के आंदोलन से शुरु होता है तो इसे भी कोई कह सकता है कि यह हमारा अपना समय है। दृष्टि भेद का अंतर है। बहरहाल, सवाल है- आज का समय से मतलब क्या है? क्या आज की कहानी और कथा आलोचना का समय आज का समय है! और यदि यह सवाल है तो सवाल फिर रचना-प्रक्रिया का होगा अर्थात् प्रश्न आज के कलाकार की रचना-प्रक्रिया का है। यहां रचना-प्रक्रिया से तात्पर्य आज की कहानी की रचना-प्रक्रिया से है। सीधे शब्दों में कहें तो हत्यारे की रचना-प्रक्रिया हम सरीखों के लिए क्यों महत्त्वपूर्ण है। कहानीकार की तरफ से भी, पाठक की तरफ से भी और (ध्यातव्य है कि) आलोचक भी सबसे पहले एक पाठक ही होता है। इस रचना-प्रक्रिया को प्रारम्भिक रूप से आलोचक पाठक की ही हैसियत से समझेगा. कथाकार की तरफ से यह प्रक्रिया थोड़ी भिन्न होगी। इस भिन्नता की प्राथमिक पहचान कथाकार को होगी। लेकिन शीघ्र ही आलोचक पाठक की हैसियत से तटस्थ होगा और कथाकार लेखक की हैसियत से। यह तटस्थता कथाकार और आलोचक दोनों को कहानी के एक वस्तुनिष्ठ आकलन और मूल्यांकन की ओर प्रेरित करेगा। आकलन और मूल्यांकन के इसी क्रम में हत्यारे कहानी और आज के समय के जटिल अंतरसंबंधों की पहचान हम लोग शायद कर पाएं।

बहरहाल, कहानी पाठ की जो सबसे आम पद्धति है- वह समाजशास्त्रीय पद्धति है। जिसमें आप रचना से समाज, समाज से रचना में बराबर आवाजाही करते हैं और यह अच्छी बात भी है। कहानी के ‘आडियन्स’ की भिन्नता से इस तरह की समझ को विकसित करने का और इस समझ के चलते आडियन्स को, पाठक को विकसित करने की प्रक्रिया चलनी चाहिए। जैसे, सन् ’62 में अमरकांत की कहानी ‘हत्यारे’ आती है। यह नेहरू युग के अवसान और उसके मोह भंग का संधिकाल है और अगर हम ध्यान दें तो यह नई कहानी और अकहानी के संधिकाल की भी कहानी है और इस लिहाज खुद यह कहानी अमरकांत की कहानी यात्रा में एक ‘ब्रेक’ की तरह है। दो नायक हैं या खलनायक हैं। खलनायकत्व नायकत्व प्राप्त कर रहा है। दोनों नायकों को यदि गौर से देखें तो एक गोरा है, ऊंचा है। दूसरा सांवला है, ठिगना है। दोनों एक ही तरह की वेशभूषा में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के आस-पास किसी बाजार में टहल रहे होते हैं और उनकी बातचीत जब शुरु होती है तो ठेठ लहज़े में, ‘हलो, सन!..इतना लेट क्यों, बेटे?’ इस तरह की एक बातचीत शुरू होती है। हमारे विमर्शों का जो दबाव है उसकी तरफ से अगर हम इस कहानी में एक संभावना की बात करें तो जो सांवला है वह भिन्न वर्ग का है, कहानी की संभावना है क्योंकि कहानी में कहीं-कहीं स्टेटमेंट्स (बयान) भी ऐसे आते हैं कि ‘तुमको सेक्रेटेरियट का भंगी बनाऊंगा!’ गोरा गुरु है। सांवला चेला है। गुरु उसको शिक्षित करता है। ठीक उसी प्रक्रिया में जैसे घीसू माधव को शिक्षित करता है. हत्यारे कहानी में जब गिलास में दोनों शराब बांटते हैं तो सांवला चुपके से अपनी शराब गोरे के गिलास में डाल देता है। (इस पर गोरा कहता है) ‘लेकिन जब तुम इतनी पी नहीं सकते तो अवसर आने पर घूस कैसे लोगे. जालसाजी कैसे करोगे, झूठ कैसे बोलोगे? फिर देश की सेवा क्या करोगे, खाक!’ सांवला अभी सीख रहा है। औरत के पास जाना अभी तक सीखा नहीं है. और फिर गोरा कहता है, ‘आज तो कुछ रचनात्मक कार्य होना चाहिए!’ तो रचनात्मक लीडरशिप क्या है? रिक्शा मजदूरों की बस्ती की तरफ चलता है। बस्ती के शुरु में ही पान की छोटी सी दुकान है। जिस पर पान-सिगरेट तो मिलती ही है रोजमर्रा की और सारी चीजें भी मिलती हैं, और वे दोनों मजदूरों की बस्ती आरम्भ होते ही जो पहली झोपड़ी है उसमें  घुस जाते हैं। एक महिला चूल्हे पर खाना बना रही होती है। उसके देखते ही गोरा मुस्कुराकर बोला, ‘ये विश्व लोफर संघ के अध्यक्ष हैं। इनको हर तरह से तुम्हें खुश करना है.’ दोनों औरत के साथ सम्बन्ध बनाते हैं। पैसा नहीं देते हैं और जब औरत कहती है, ‘लाइए मैं (पैसे का खुदरा करवा कर) ले आती हूं.’ तो गोरा बोलता है, ‘तुम तो पूंजीपति हो! तुमको किस बात की कमी है।…अरे, तुम देश की महान कार्यकत्री हो, तुम कहाँ कष्ट करोगी?’ और आगे बढ़ता है कहता है, ‘साले जूते निकालकर हाथ में लेलो! सांवला बोला ‘क्यों?’…(गोरा कहता है) ‘भाग साले! आर्थिक और सामाजिक क्रांति करने का समय आ गया है!’ दोनों भागना शुरु करते हैं। औरत बाहर निकल कर कहती है- ‘अरे, लूट लिया हरामी के बच्चों ने!’ मजदूरों की बस्ती से कुछ लोग उसके पीछे दौड़ पड़ते हैं। दोनों अरबी घोड़े की तरह सरपट भागे जा रहे हैं। कभी बाएं घूम जाते हैं। कभी दाएं घूम जाते हैं। इतने में मजदूरों का एक लड़का फुर्ती से सांवले की तरफ तीर की तरह बढ़ता चला जाता है और लगता है उसको पकड़ ही लेगा। ऐसे में गुरु गोरा रुक जाता है। जेब से चाकू निकालकर खोल लेता है और पीछा करते हुए आ रहे मजदूर के पेट में घोंप देता है और फिर भाग जाता है। कोलतारी सड़क पर आगे की स्ट्रीट लाइट में दोनों के सुंदर और पुष्ट शरीर पर पसीने की बूंदें छरछरा रही हैं; यह युद्ध का सिम्बल है ‘सिम्बलाइजेशन ऑफ पॉवर’ है, और वे फिर न जाने कहां अंधेरे में गुम हो जाते हैं. यह पूरी कहानी है। ध्यान दें कि जो नेहरूवियन आदर्शवाद है उसकी खोल के भीतर से जो फासिज्म पैदा हो रहा है यूथ के बीच में, वह उसी आदर्श की भाषा में ही पैदा हो रहा है. फासिज्म के साथ दिक्कत यही है, उसको आना तो हमारी ही भाषा में पड़ेगा। सामाजिक, आर्थिक क्रांति की भाषा में, लेकिन वो रूपवाद है। उसका यथार्थ फासिज्म है। आदर्श के उस रूपवाद का यथार्थ फासीवाद है और इसी फासीवादी टेन्डेन्सी की कहानी ‘हत्यारे’ है। और यह फासीवादी टेन्डेन्सी यूथ में व्याप्त हो रही है, जबकि हमारा देश सबसे नौजवान है, मोदी युवाओं को लेकर बड़े प्रसन्नचित हैं; एक युवा देश के भीतर, खुद युवा वर्ग के भीतर तरह-तरह के विभाजन हैं। इसको अगर ध्यान में न रखा जाएगा तो दिक्कत की बात होगी और अमरकांत की खासियत यही है। उनकी चिंता हमेशा ही परिवर्तनकारी शक्तियों के पहचान में आने वाले संकट को कहानी में रखने की है। बहरहाल, चूंकि मजदूरों की बस्ती में जा करके वह हत्या करता है। इसलिए वहां जा कर कहानी एलीगरी में बदलती है और यह मूल्य-निर्णय शामिल होता है कि फासीवादी चरित्र हमेशा ही वर्किंग क्लास (मजदूर वर्ग) के विरोध में होगा।

 बहरहाल, ये तो कहानी का एक सिंपल पाठ है। लेकिन क्या इसीलिए हत्यारे कहानी हमारे लिए महत्त्वपूर्ण है। फासीवाद के इस नए दौर के चरित्र के बारे में, उपभोक्ता समाज के बनने की प्रक्रिया के बारे में, बहुत सारी बातें इस कहानी को पढ़े बिना ही हम समझ भी रहे थे। क्या जरूरत थी कि इसको पढ़ा जाए! एक सचेत बुद्धिजीवी, एक एक्टीविस्ट जो सचमुच में परिवर्तन लाना चाहता है। जो परिवर्तन चाहता है। यथार्थ में परिवर्तन की गति को पहचानना चाहता है। उनके लिए केवल  कहानी का सामान्य पाठ ही होगा तो यह महत्त्वपूर्ण नहीं होगा।

यहाँ मैं संक्षेप में हिंदी के चार आलोचकों की चर्चा करना चाहूंगा, जिन्होंने ‘हत्यारे’ कहानी के बारे में लिखा है या अमरकांत के बारे में लिखा है। विश्वनाथ त्रिपाठी समाजशास्त्रीय, राजनीति के अपराधीकरण से लेकर अपराध के राजनीतीकरण और स्टूडेन्ट पॉलिटिक्स की वह पूरी प्रक्रिया जो जेपी मूवमेंट के भीतर से निकली है उसके ‘रिप्रजेन्टेशन’ के बतौर हत्यारे कहानी की अच्छी व्याख्या करते हैं। लेकिन वह एक सवाल उठाते हैं कि अमरकांत के पात्र कहीं भी संघर्ष क्यों नहीं करते हैं? अगर समाज में संघर्ष है तो अमरकांत के पात्र संघर्ष करते हुए क्यों नहीं दिखते। अजीब बात यह है कि ठीक यही आलोचना राजेन्द्र यादव भी अमरकांत के बारे में करते हैं कि अमरकांत की कहानी का कोई भी पात्र संघर्ष नहीं करता है। वहां आस्तित्व की समस्या महत्त्वपूर्ण है, आस्था का प्रश्न महत्त्वपूर्ण नहीं है। लेखकीय आस्था एक ओढ़ी हुई चीज है. मनुष्य के अस्तित्व की लड़ाई ज्यादा महत्त्वपूर्ण है और इसलिए अमरकांत अस्तित्ववादी कथाकार हैं। अब विश्वनाथ त्रिपाठी तो यह नहीं कहेंगे कि वे अस्तित्ववादी कथाकार हैं लेकिन हाँ, यह कहेंगे कि संघर्ष करता हुआ पात्र नहीं दिखता है। संघर्ष करते हुए पात्रों को दिखाना चाहिए। समाजवादी यथार्थवादी की जो अपेक्षा है वह अमरकांत के ऊपर विश्वनाथ त्रिपाठी की तरफ से (लागू की जाती है) और राजेन्द्र यादव हत्यारे को अस्तित्ववाद की कहानी मान लेते हैं। ‘हत्यारे’ नाम से सार्त्र की भी एक कहानी है और अगर समय हो तो संक्षेप में सार्त्र की ‘हत्यारे’ कहानी के अस्तित्ववाद का अमरकांत से क्या अंतर है इसे मैं देखना चाहूंगा और वह अंतर अपने अंतिम रूप में किसका अंतर होगा। बहरहाल, द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद का समय है। ब्रिटेन की एक कोर्ट में एक ऐसे केस की सुनवाई होनी है, जिसका जीतना तय है और वह बात यह है कि एक टी.बी. का डाक्टर है। एक दिन उसके पास बहुत अमीर आदमी आता है। लेकिन वह टी.बी. से बुरी तरह ग्रस्त है। बहुत बूढ़ा हो गया है। चल-फिर नहीं पा रहा है। दोनों फेफड़े उसके खराब हो चुके हैं और वह डाक्टर के पास बैठता है। डॉक्टर कहता है अब कोई उपाय नहीं है। तो मरीज बहुत विनती करता है। डॉक्टर कहता है, लगता है बड़े पैसे वाले हो। मरीज स्वीकार करता है तो डाक्टर उसे सलाह देता है कि तुम आज से कुछ खाओ-पीओ मत और अब सिर्फ पानी का सेवन करो और दूर कहीं चले जाओ। छः महीने गुजर जाते हैं। एक दिन अचानक वह आदमी हट्टा-कट्टा, सूटेड-बूटेड डॉक्टर के क्लीनिक में प्रवेश करता है। डॉक्टर पहचान नहीं पाता है। तब मरीज पूरी बात डॉक्टर को फिर से बताता है और डॉक्टर को बहुत सारा पैसा देने की बात कहता है। डॉक्टर चिंतित हो जाता है। वह मेज की दराज में रिवाल्वर निकाल कर अमीर आदमी को गोली मार देता है और उसका फेफड़ा निकाल कर टेबल रख कर पर निरीक्षण करने लगता है और कहता है कि इससे मनुष्य का विज्ञान पर से विश्वास ही उठ जाएगा। इसलिए मनुष्य समाज के कल्याण में उसकी हत्या कर देनी पड़ी और यह केस कोर्ट में गया है और लोग मान रहे हैं कि डॉक्टर जीत जाएगा। यह अस्तित्ववाद की कहानी है। अस्तित्व की समस्या का जो दर्शन फैलाया गया, इतिहास मुक्त व्यक्ति के स्वतंत्र अस्तित्व का प्रश्न, वह सार्त्र की कहानी में है। अमरकांत की कहानी में वह नहीं है।

यहां अमरकांत की कहानी के संदर्भ में संक्षेप में सुरेंद्र चौधरी और नामवर सिंह के पाठों के अंतर के बारे में एक बात करना चाहूंगा। सुरेंद्र चौधरी ने कहा कि हत्यारे कहानी में हत्या नहीं हुई होती तो यह बहुत महत्त्वपूर्ण कहानी होती। क्यों? क्योंकि हत्या वहां अतिनाटकीयता का प्रयोग मात्र है. जिससे कहानी में एक मादक भंगिका तो पैदा हुई है लेकिन वह कुछ कहानी में नया नहीं जोड़ती है और यह अच्छा हुआ कि अमरकांत ने आगे ऐसा प्रयोग नहीं किया। उन्होंने कहा जो परिवर्तनकारी प्रक्रिया है उसमें जो प्रच्छन्न खतरे छुपे हुए हैं वह अमरकांत की कहानी में ज्यादा बेहतर आता अगर वह हत्या नहीं हुई होती। यानि एक नपुंसक, बड़बोली, ऐय्याश युवा पीढ़ी का ज्यादा सही चित्रण हुआ होता अगर ये हत्या नहीं हुई होती। नामवर सिंह ने कहा अगर इस कहानी में हत्या नहीं हुई होती तो यह कहानी इतनी महत्त्वपूर्ण नहीं होती। उन्होंने कहा कि कहानी में हत्यारे के द्वारा की गई हत्या कहानीकार का या रचना का मूल्य-निर्णय है। एक वैल्यू जजमेंट है। अगर रचना की प्रक्रिया में यह वैल्यू जजमेंट (मूल्य-निर्णय) नहीं है, यह मैं अपनी भाषा में बोल रहा हूं एक इंटरव्यू में नामवर सिंह ने चलते हुए यह बात कही थी, तो रचना जो फासिस्ट टेन्डेन्सी दिखाना चाह रही है, जो आज एक अजीब तरह की प्रवृत्ति पैदा हो रही है ,उसे दिखाया नहीं जा सकता. युवाओं के आदर्श का अतीत में स्वतंत्रता आंदोलन का एक पूरा दौर है. पर वह आदर्श दूसरे थे। यह आदर्श दूसरे हैं। इन आदर्शों के रेहटारिक में जो कंटेंट है उसके प्रति मूल्य-निर्णय कीजिएगा कि नहीं यह एक रचना-प्रक्रिया का सवाल है। सुरेंद्र चौधरी के लिए कहानी में हत्या कहानी को अतिनाटकीय बना देती है, दूसरी ओर नामवर सिंह के लिए महत्त्वपूर्ण। दो मार्क्सवादी ओलोचकों की दृष्टि में यह भेद क्यों है? क्या यह यथार्थवाद की दो भिन्न दृष्टियां हैं? क्या यथार्थवाद बीसवीं सदी के साथ गुजरी हुई बात हो गई है! इसका हम सरीखों के लिए क्या कोई महत्त्व नहीं है? यह हमारे लिए भिन्न चर्चा का बिंदु है। यहां मैं अभी तफ्सील नहीं करना चाहूंगा, वक्त कम है। परंतु हमारे समय के एक प्रमुख चिंतक फ्रेडरिक जेम्सन के लिए यह बीती बात नहीं है। इसी साल उनकी एक पूरी किताब यथार्थवाद पर आयी है। यह किताब यथार्थवाद के साथ एक प्रयोग के लिए आमंत्रित करती है और खुद यथार्थवाद के भीतर विकसित होती आयी विरोधी प्रविधियों के द्वन्द्वात्मक चिंतन को विकसित करने का प्रयास करती है। मैं अंग्रेजी में जेम्सन को थोड़ा पढ़ना चाहूंगा अगर आप चाहें तो.

बीसवीं सदीं के इतिहास की आंतरिकता को कैसे समझा जाए इसी क्रम में जेम्सन लिखते हैं, ‘My experiment here claims to come at realism dialectically, not only by taking as its object of study the very antinomies themselves into which every constitution of this or that realism seems to resolve: but above all by grasping realism as a historical and even evolutionary process in which the negative and the positive are inextricably combined, and whose emergence and development at one and the same time constitute its own inevitable undoing, its own decay and dissolution. The stronger it gets, the weaker it gets; winner loses; its success is its failure. And this is meant, not in the spirit of the life cycle (“ripeness is all”), or of evolution or of entropy or historical rises and falls: it is to be grasped as a paradox and an anomaly, and the thinking of it as a contradiction or an aporia. Yet as Derrida observed, the aporia is not so much “an absence of path, a paralysis before roadblocks” so much as the promise of “the thinking of the path.” For me, however, aporetic thinking is precisely the dialectic itself; and the following exercise will therefore be for better or for worse a dialectical experiment.’

(मेरा प्रयोग यथार्थवाद तक द्वंद्वात्मक तरीके से पहुँचने का है. यह प्रयोग यथार्थवाद के इस या उस विरोधाभासी युग्मों के अध्ययन तक ही अपने को सीमित नहीं करता है, वरन् यथार्थवाद को एक ऐतिहासिक और विकासमान प्रक्रिया के रूप में देखने का हिमायती है. इस प्रक्रिया में यथार्थवाद के नकारात्मक और सकारात्मक पक्ष साथ-साथ अंतर्गुम्फित रहते आये हैं। अपने उदय और विकास की इस प्रक्रिया में ही वह अपना क्षय और अपनी मृत्यु भी रचता चलता है। ज्यों-ज्यों वह मजबूत होता है त्यों-त्यों वह कमज़ोर होता चलता है। विजेता पराजित हो जाता है। इसकी जीत में ही इसकी हार शामिल है। जीवन-चक्र के अर्थ में नहीं, उद्विकास के अर्थ में नहीं, किसी एन्ट्रापी के अर्थ में नहीं न ही किसी ऐतिहासिक उत्थान पतन की दास्तान के अर्थ में. बल्कि एक विरोधाभास की तरह अंतर्विरोध के अर्थ में इसे सोचने का प्रयोग. एक द्वंद्वात्मक प्रयोग।)

इस विचारोत्तेजक प्रयोग में हम सब यदि शामिल हों तो हमारी कहानी आलोचना के लिए और शायद उनके लिए भी अच्छा होगा जो आज यथार्थवाद के पीछे डण्डा लिए दौड़ रहे हैं। जी, मेरा इशारा हिंदी कहानी के पिछले 25 सालों के विकास पर बात करने वाले आलोचना के कुछ नए राजकुमारों की तरफ भी है। बहरहाल, यह कहानी फिर कभी।

हत्यारे कहानी में जो मूल्य-निर्णय है वह हत्या की घटना में है। जरूरी नहीं कि हर कहानी में यह मूल्य-निर्णय आये ही। लेखकीय मूल्य-निर्णय कोई अनिवार्यता नहीं है। परंतु अपराध की इस मनोवृत्ति के बारे में, इस फासीवादी प्रवृत्ति के बारे में अगर कहानी के भीतर उसके मजदूर वर्ग का विरोधी होने का निर्णय नहीं होता तो यह कहानी इतनी मूल्यवान नहीं होती। वह पेटी बुर्जुआ की जो एक खास प्रवृत्ति है- नपुंसक, बड़बोली, ऐय्याश युवा पीढ़ी का चरित्र-चित्रण मात्र बन कर रह जाती। ऐसे चरित्रों के भावी विकास का, गहरे खलनायकत्व का उद्घाटन वहां नहीं हो पाता। यह पीड़ा भरी प्रतीक्षा के प्रतिक्रियावादी रूपांतरण की कहानी है। विद्रूप विडंबनाओं के नायक घीसू और माधव लुम्पेन सर्वहारा हैं और हत्यारे कहानी के नायक या खलनायक, यदि कहने की अनुमति दें, तो लुम्पेन पेटी बुर्जुआ हैं। कहानी के भीतर का यह मूल्य-निर्णय दरअसल रचना-प्रक्रिया का एक अहम हिस्सा है।

 हमारे आज के कथालोचक यह दावा कर रहे हैं कि जन-जीवन में जब कोई यूनिंगफाइंग फैक्टर नहीं है तो कहानी के भीतर वह कहां से होगा। किसी यूनिंगफाइंग फैक्टर के बिना कहानी की रचना-प्रक्रिया में कोई मूल्य-निर्णय तो आ ही नहीं सकता। फिर क्या किया जाए! यूनीफाइंग फैक्टर मतलब -विश्वदृष्टि या जीवन दृष्टि। लेकिन यथार्थ के असम्बद्ध होने की चर्चा पहली बार तो नहीं हो रही है। और हम अपने अनुभव से जानते हैं कि समाज के संक्रमण काल में हमेशा ही ऐसी बातें होती रही हैं। ऐसी बातों में हमारे समय के एक प्रमुख चरित्र की ईमानदार स्वीकारोक्ति भी होती है। याद करें कि आधुनिकतावाद की धारा के एक आदि नायक टी.एस. इलियट ‘डीसोसिएशन ऑफ सेंसबिलटी’ की चर्चा किया करते थे। पिछले 20-25 सालों के तीव्र परिवर्तन ने हमारी संवेदनाओं में एक असम्बद्धता तो पैदा की ही है। जैसे इलियट के समय में भी हुई थी। आज हम तेजी से उपभोक्तावादी समाज में बदलते जा रहे हैं। हमारी पिछली पीढ़ी के महान सिनेमाकार और राजनीतिक कार्यकर्ता पियरे पाउलो पासोलिनी ने फासीवाद के नए स्वरूप को उपभोक्तावाद में बदलते देखा था। देख लिया था, इसलिए उनकी हत्या कर दी गई. और फासीवाद के इस आसन्न संकट के काल में पुराने और नए के संधिकाल में हमारी भी चेतना आक्रांत है. इसलिए मानव विरोधी विचारधाराओं के द्वारा चेतना पर छायी इस धुंध को और अधिक मिस्टीफाई (रहस्यात्मक) करने का षडयंत्र रचा जा रहा है। खण्ड-खण्ड पाखण्ड की दृष्टि एक ऐसी ही मानव विरोधी विचारधारा है। ताज्जुब नहीं, इस विचारधारा का पहला हमला यथार्थवाद पर है। ऐसा क्यूं है कि मानव विरोधी विचारधाराओं का पहला हमला समय-समय पर यथार्थवाद के खिलाफ होता है! क्योंकि यथार्थवाद और चाहे जो हो उसके मूल में है मानव-विरोधी मिस्टीफिकेशन को, उसके धुंध को साफ कर देना। डी-मिस्टीफिकेशन यथार्थवाद की एक प्राथमिक शर्त है। जहां से बुर्जुआ सोसायटी के लिए अपने-आप यह शैली खतरनाक सिद्ध हुई है। बहरहाल, उसके अलग-अलग ट्रेडीशन हैं, अंग्रेजी ट्रेडीशन, फ्रेंच ट्रेडीशन खैर! लेकिन सीधे डी-मिस्टीफिकेशन एक महत्त्वपूर्ण काम है। मूल्य-निर्णय का सम्बन्ध क्या इस डी-मिस्टीफिकेशन से है? डी-मिस्टीफिकेशन की यह प्रक्रिया बदलाव की नई ताकतों के प्रति रचना-प्रक्रिया में मूल्यबोध की तरह आती है। लेखक की प्राथमिक संवेदना से लेकर पाठ की प्रक्रिया तक इसका निरंतर विकास होता है। ब्रेख्त के लिए रचना-प्रक्रिया के साथ चलने वाला यह डी-मिस्टीफिकेशन एक क्रियावान, उत्कंठापूर्ण और प्रयोगात्मक भी है. या दुसरे शब्दों में कहें तो सामाजिक संस्थाओं और भौतिक दुनिया के प्रति वैज्ञानिक दृष्टि का उन्मेष है। यथार्थवाद इसी वैज्ञानिक दृष्टि को प्रोत्साहित करता है, प्रयोग के स्तर पर भी। और यह प्रक्रिया त्रिस्तरीय है। पहली, रचना में पात्रों और उसकी काल्पनिक दुनिया के बीच। दूसरी, रचना और पाठक के बीच। तीसरी, रचना-रचनाकार का अपने कच्चे माल और टेक्निक के बीच। यथार्थवाद का यह त्रिआयामी व्यवहार (प्रैक्सिस) परंपरागत अनुकरणों और उनके शुद्ध प्रतिनिधिमूलक केटेगरी को ध्वस्त कर देता है. जिसके प्रभाव में आजकल का अधिकांश दलित लेखन है। फिर बकौल जेम्सन ‘रीडिंग इज ए सिम्बोलिक एक्ट’। इस ‘सिम्बोलिक एक्ट’ के प्रति सजग होना, आत्म सजग होना जरूरी है। यह सजगता एक सचेतन क्रिया है। इस क्रिया में अपने राजनीतिक अवचेतन की संरचना के प्रति सजगता भी शामिल है। दिक्कत यह है कि क्या हमारा लेखन और हमारी आलोचना खुद आत्म सजग है! ‘हत्यारे’ कहानी का पाठ आज के समय में यही चुनौती हमारे समक्ष रखता है। बात सिर्फ रचना के क्लास मोटिफ को उद्घाटित करने या अलग-अलग विमर्शों के  लिहाज से उसकी व्याख्या का नहीं है . अर्थात् रचना के बाहर की दुनिया का प्रतिबिम्ब और उसकी व्याख्या का नहीं है। बल्कि रचना की विकासमान सम्पूर्णता का है। इसीलिए उसकी हिस्टोरीसिटी का है। विषय से विचार तक की यात्रा का खतरा दरअसल हिस्टोरीसिटी के अन्वेषण का खतरा है। अमरकांत की कहानी में यह हिस्टोरीसिटी उसके मूल्य-निर्णय की प्रक्रिया में आयी है। यह हिस्टोरीसिटी न केवल समकालीनता का यूनीफाइंग फैक्टर है वरन् हमारे और रचना के कालांतर का भी एक यूनीफाइंग फैक्टर है। यह रचना से पाठक तक लगातार जारी है. इस अर्थ में यह हिस्टोरीसिटी विद्आउट हिस्ट्री है .और इसी अर्थ में यह वर्तमान की वर्तमानता है। इसी अर्थ में हत्यारे कहानी खुद अमरकांत की कहानी-कला की आलोचना है। उसमें एक ब्रेक है. अमरकांत के कहानी संसार में एक घटना की तरह। हत्यारे कहानी का अंत कुछ इस तरह होता है, ‘झोपड़ियों से कुछ व्यक्ति निकलकर युवकों के पीछे दौड़े। तारकोल की सड़कें जन-शून्य थी। दोनों युवक अरबी घोड़ों की तरह दौड़ रहे थे। वे कभी बाएं घूम जाते, कभी दाएं। पीछा करने वालों में एक फुर्तीबाज व्यक्ति तीर की तरह उनकी ओर बढ़ रहा था।…जो व्यक्ति ‘हाय मार डाला’ कहके लड़खड़ा कर गिर पड़ा। इसके बाद दोनों पुनः तेजी से भाग चले। तब बिजली का खम्भा आया तो रोशनी में उनके पसीने से लथपथ ताकतवर शरीर बहुत सुंदर दिखाई देने लगे। फिर वे न मालूम किधर अंधेरे में खो गए!’ जिस अंधेरे में दोनों न जाने कहां गुम हो गए यह वही अंधेरा है जो मुक्तिबोध के ‘अंधेरे में’ है। जहां वे डोमा जी उस्ताद को देख लेते हैं। हम अपने अंधेरे में क्या देख रहे हैं! यह क्या हमारे मूल्य-निर्णय से तय नहीं होता!

दो अवांतर प्रसंग छोटे-छोटे- एक, हमारा एक कलाकार मित्र अनुपम मूवमेंट में पेंटिंग्स करता है। उसकी एक समस्या है। हालांकि यह कहानी के बाहर का प्रसंग है लेकिन कला का महत्त्वपूर्ण प्रश्न है और यथार्थवाद का भी एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न है। वह कहता है कि हम जिस शैली में अब तक पेंटिंग्स बनाते आए हैं अब यथार्थ उसी शैली में बद्ध होकर हमारे सामने आ रहा है। याद कीजिए मुक्तिबोध की भी यही समस्या थी। वह कहता है कि मैं अपने ही शिल्प में बंधने के चलते यथार्थ को नहीं देख पा रहा हूं- यह जो परिवर्तनशील यथार्थ है। वह अपना एक अनुभव बताता है कि वह एक बार एक स्त्री के जीवन की किसी परिस्थिति पर बड़े भावावेग से एक चित्र बना रहा होता है। पेंटिंग्स पूर्ण नहीं हो पा रही है। वह परेशान है। अचानक इस परेशानी में वह अपना शरीर काटकर खून से पेंटिंग का एक हिस्सा बना देता है और अपने बाल नोचकर पेंटिंग्स में जहां-तहां चिपका देता है और कहता है कि मुझे बहुत शांति मिली है। कलाकार रचना में अपने बॉडीली प्रजेन्स (शरीरी उपस्थिति) को खोजना चाह रहा है। पेंटर पेंटिंग्स में अपनी उपस्थिति खोजने की कोशिश में है। यह बॉडली प्रजेन्स का क्राइसिस कला का एक वास्तविक अनुभव तो है, लेकिन यह मिसप्लेस्ड क्वेश्चन है। यह प्राब्लम मिसप्लेस्ड है क्योंकि पॉलिटिक्स में जैसे वह अपनी प्रजेन्स को आंदोलन के भीतर देख रहा है; रचना, जो प्रोटेस्ट के भीतर से निकलने वाली रचना है इसलिए महत्त्वपूर्ण भी है, के भीतर भी अपना बॉडली प्रजेन्स ढूंढ़ रहा है। राजनीति की दुनिया का कला की दुनिया से जो सम्बन्ध होगा, वह क्या होगा? क्या रचना-प्रक्रिया में जिसको मुक्तिबोध कहते हैं, जब तक तटस्थता नहीं होगी तब तक तदाकारिता सम्भव नहीं है। प्रश्न वहां अटैच होकर के बॉडली प्रजेन्स का, स्वानुभूति का नहीं है प्रश्न डिटैचमेंट का है। यह डिटैचमेंट लग सकता है कि कोई आधुनिकवादी तर्क हो, उपभोक्तावादी सर्जक मन का। खैर, इस पर चर्चा कहीं और।

दूसरा प्रसंग, नामवर सिंह ने हाल-फिलहाल पप्पू यादव की किताब का लोकार्पण किया। पप्पू यादव हत्यारे कहानी के नायक भी हैं। प्रश्न है, उन्होंने हत्यारे कहानी के बारे में कहा कि वहां मूल्य-निर्णय महत्त्वपूर्ण है. यह बात तो सही है कि दुनिया भर में अपराधियों की डायरियां आदि काफी लोकप्रिय हुई है;  उस पर विचार करना एक अलग बात है. लेकिन उसकी किताब का लोकार्पण करना एक राजनीतिक काम है। इसमें आपका मूल्य-निर्णय होगा कि नहीं! यानि रचना और आलोचना के प्रश्न जीवन के प्रश्न होंगे कि नहीं! यह एक महत्त्वपूर्ण सवाल है। शायद इसी अर्थ में प्रेमचंद कहते थे कि हर कोई चाहता है कि मेरा जीवन एक कहानी बन जाए।

मार्तण्ड प्रगल्भ

मार्तण्ड प्रगल्भ

छात्र राजनीति और संस्कृति-कर्म में व्यस्त रहने वाले मार्तण्ड प्रगल्भ जे.एन.यू. के भारतीय भाषा केंद्र में पी.एच.डी. के लिए शोधरत  हैं। उनसे mpragalbha1@gmail.com पर संपर्क संभव है

(जन संस्कृति मंच के कथा समूह के प्रथम आयोजन ‘कथा मंच’ के तृतीय सत्र में कथाकार मार्तण्ड द्वारा ‘अमरकांत की कहानी हत्यारे और आज का समय’ पर इलाहाबाद में दिनांक 22 दिसंबर, 2013 को प्रस्तुत व्याख्यान। लिप्यावतरण- श्रीकांत पाण्डेय।)

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