दस्तर-ख़्वान पर हरामख़ोरी: जॉन एलिया

हालात ये हैं कि जॉन एलिया एक फ़िनोमनल पोएट का ओहदा हासिल कर चुके हैं. ट्रेडिशन में तुलना का आलम या ‘आलमगीरों’ के बीच उनकी माकूल जगह तय कर देने का जज़्बा इस क़दर है कि वे मीर के बाद सिर्फ़ जॉन पर ही ठहरते हैं. कुछ लोग फ़िरदौसी तक के सफ़र पर निकल चुके हैं.

हम सब ख़ुशक़िस्मत हैं कि क्लासिकल अंदाज़  में किसी अदीब के मक़बूलियत के गवाह बन रहे हैं. जॉन साहब की मक़बूलियत के रास्तों, सोर्सेज़, वक्तों की बात को जाने भी दें तो उनके यहां दो-तीन चीज़ें साफ़-साफ़ नज़र आती हैं, रिवायत का रियाज़ (लोक की आवाज़ के रूप में नज़ीर अकबराबादी के यहाँ और अपने क्लासिकल अंदाज़ में वह मीर के यहां जाते हैं ), रोमांटिसिज़्म और इन सबसे आगे एक ख़ास क़िस्म की मॉडर्निटी, जो इतनी धारदार है कि ख़ुद जॉन के रोमांटिसिज़्म के ख़िलाफ़ खड़ी नज़र आती है.

जॉन शायरी के बेताज उस्ताद तो हैं ही, उनका नस्र (प्रोज़) भी उनकी क़ाबिलियत को बयां करता है. कुछ स्कॉलर्स तो यहां तक मानते हैं कि उनका नस्र उनकी नज़्मों से ज्यादा उम्दा है.

किसी भी मॉडर्न शायर की एक ऊपरी पड़ताल तस्सवुरात के हवाले से नस्र हुई उसकी बातों से की जा सकती है. साल  2012 में उनके नस्र के काम की एक किताब ‘फ़रनूद’ नाम से शाया हुई है, उसी किताब से एक हिस्सा यहाँ भी शाया किया जा रहा है. #tirchhispelling

जॉन एलिया

जॉन एलिया, साभार: यूट्यूब

जॉन एलिया की फ़रनूद से

मैं तारीख़ को बाइक़्तिदार  इन्सान दुश्मनों का स्याह आमालनामः क़रार देता हूँ।

अब अगर दानिश है तो मग़रिब की है, इक़्तिदार हैं तो मगरिब की हैं, फनून हैं तो मगरिब के हैं, तहजीब है तो मगरिब की है, मयार हैं तो मगरिब के हैं और फैसला है तो मगरिब का है, क्या हम इस हक़ीक़त से इनकार कर सकते हैं? क्या मशरिक़ का कोई बड़े से बड़ा वकील और कोई शदीद जज़्बाती मशरिक़-परस्त इस हक़ीक़त से इनकार कर सकता है? अफ़सोस सद-अफ़सोस के नहीं।

अच्छाई और बुराई में एक अजीब मुआमलत हुई है और वह यह कि उन्होंने अपने नामों का आपस में तबादला कर लिया है। अब हर चीज़ अपनी ज़िद-नतर आती है। इल्म, जहल पर रीझ गया था और जहल, इल्म के खि़ताब पर बुरी तरह लोट-पोट था। सो दोनों ही ने ईसार से काम लिया।

फौज के बारे में शुरू ही से मैंने वो राय रखी है जो तारीख़ के सबसे शरीफ़ और दानिशमंद लोगों की राय रही है यानी सबसे अच्छा ज़माना वो होगा जब फौज का लफ़्ज़ सिर्फ लुग़त में रह जाएगा और उसका वजूद वक़्त के सेल में बह जाएगा।

तुम शायद सिर्फ़ मेरा नाम जानते हो, मुझे नहीं जानते, मैं न भारत का आदमी हूँ न पाकिस्तान का। एक ज़माना था जब मैं हिन्दोस्तान का आदमी था यानी बर्र-ए-सग़ीर का आदमी। इसके बाद मैंने अज़-ख़ुद सारी दुनिया की क़ौमियत इख़्तियार की और फिर मैं कहीं का नहीं रहा।

इल्म इस दुनिया में नौ-वारिद है, रही जहालत तो उसको बिला-शुबः तवालत सन और क़दामत का क़ाबिल-ए-रशक इम्तियाज़ हासिल है। वो अपनी क़दीम जागीर में किसी दूसरे का तसर्रुफ़ आसानी से गवारा नहीं कर सकती।

हमें तो अब ख़ुद अपने होने पर यक़ीन नहीं आता, क्या हम वाक़ई हैं? आप होंगे मगर मैं तो शायद नहीं हूँ। जो अपनी सच्ची हालतों के साथ नहीं पाया जाता, वो नहीं है, सो मैं नहीं हूँ।

सारे रिश्ते लफ़्ज़ से हैं, लफ़्ज़ के हैं और लफ़्ज़ में हैं, जो ख़्याल भी है तसव्वुर भी और म’आनी भी हम और तुम और वो सब जो हमारी बातें सुन रहे हैं लफ़्ज़ में सोचते हैं लफ़्ज़ की लज़्ज़त में जीते हैं और लफ़्ज़ की अज़िय्यत में मरते हैं। हम लफ़्ज़ों ही में मिलते और लफ़्ज़ों ही में बिछड़ते हैं लफ़्ज़ ही अपनाते हैं और लफ़्ज़ ही गँवाते हैं।

हमारे यहाँ बीसवीं सदी आई ही नहीं बल्कि वक़्त हमारे बाल खींच कर, झिंझोड़ कर हमें बीसवीं सदी में ख़्वामख़्वाः ले जा रहा था वर्ना हम तो ग्यारहवीं-बारहवीं सदी ईसवी के लोग थे।

धात के बदन और गोश्त-पोस्त और हड्डियों के क़ामत दौड़ रहे हैं। चाहे उनमें से कुछ दौड़ते दिखाई ना देते हों पर वो सब दौड़ ही तो रहे हैं चाहे अपने बाहर दौड़ रहे हों या अपने अंदर।

तामीर-ओ-तरक़्क़ी की बातें उसी क़ौम को जे़ब देती हैं जो मआशी इस्तेहकाम और तालीमी तरक़्क़ी के एक ख़ास नुक़्ते पर पहुंच चुकी हो। इससे पहले तामीर-ओ-तरक़्क़ी के इमकानात पर ग़ौर करना दिमाग़ी अय्याशी और ज़हनी बदकारी के इलावा और कुछ नहीं।

अगर इस दुनिया में किसी जन्नत का वजूद में आना मुमकिन नहीं है तो ये कोई मुँह बिसूरने की बात नहीं, अगर इस दुनिया में शहद और शीर की नहरें नहीं बह सकतीं तो शफ़्फ़ाफ़ और शीरीं पानी की नहरें तो बह सकती हैं। क्या जौहड़ों का पानी पीने वालों के लिए शफ़़्फ़़ाफ़़ और शीरीं पानी की नहरें शहद और शीर की नहरों से कुछ कम हैं?।

पछतावा बहकावे की देन है।

इल्म के सामने ज़लील होना जहालत का मुक़द्दर है।

जो लोग अपने और अपनी नौअ’ के दूसरे लोगों के लिए ख़्वाब नहीं देखते वो नीम इन्सान होते हैं। ख़्वाब देखना अपने आप में अपने आपसे आगे होता है। जो शख़्स या मुआशरा ख़्वाब देखने की सलाहियत नहीं रखता वो अपने आप में अपने से पीछे होता है या कम-अज़-कम वहीं होता है जहां होता है और वहीं का हो रहता है और अल्लाह को प्यारा हो जाता है।

अगर दीवारें ज़ी-रूह होतीं तो वो अपने सीनों पर लिखे हुए ज़हरीले नारों के असर से हलाक हो जातीं।

जिसने कहा मैं कभी अपने बहकावे में नहीं आया, उसने अपने आपको बड़ा ही बुरा बहकाया और जिसने अपने नज़दीक अपने बारे में कोई धोका नहीं खाया, उसने बहुत भयानक धोका खाया।

अक़्ल का ग़लत फ़ैसला भी जज़्बात के सही फ़ैसले से बेहतर होता है।

हमें इस बात का एहसास क्यों नहीं होता कि हम एक हज़ार बरस से तारीख़ के दस्तर-ख़्वान पर हरामख़ोरी के सिवा और कुछ नहीं कर रहे?।

पाकिस्तान को मुम्लिकत ख़ुदादाद कहा जाता है, अगर सियासी, लिसानी, और मज़हबी जमातों की दहशतगर्दी और फ़तवेबाज़ मौलवियों की बदमाशी के बावजूद ये मुम्लिकत क़ायम है तो ये वाक़ई मुमलिक ख़ुदादाद है।

हमने हिक्मत को हवसनाकी बनते देखा और दलील को दलाली, क़यादत ने कज़्ज़ाक़ी का पेशा इख़्तियार किया और क़ानून ने नक़ब-ज़नी शिआ’र की।

तुम्हारे ख़ुश-हाफ़िज़ा मुअल्लिमों और तेज़ कलाम मुकर्रिरों ने तुमसे इस क़दर झूट बोला है कि अगर तुम जान लो तो यक़ीनन तुम्हें नुत्क़-ओ-कलाम से नफ़रत हो जाएगी, कभी वो बातें भी सुनना चाहो जो गिरां गुज़रीं क्या मालूम के रास्ती उस ही लहजे का रस हो जो तुम्हें कड़वा लगता है।

तारीख़ के हस्सास इन्सानों ने अपनी ज़िंदगी का ज़्यादा हिस्सा उदास रह कर गुज़ारा है। जिंदगी में ख़ुश रहने के लिए बहुत ज़्यादा हिम्मत बल्कि बहुत ज़्यादा बे-हिसी चाहिए।

अगर आप कामयाब इश्क़ करना चाहते हैं तो आपको एक ग़ैर आशिक़ और आक़िल क़िस्म का शख़्स होना चाहिए और इस के साथ ही एक बहुत घटिया और अय्यार शख़्स भी, आप सोच रहे होंगे कि मैं ये ‘इश्क़’ के साथ ‘करना’ का लफ़्ज़ क्यों इस्तेमाल किया है। इश्क़ तो हो जाता है, किया नहीं जाता। भाइयो ये एक बहस तलब बात है। मेरा ये ख़्याल है कि इश्क़ होता नहीं किया जाता है और चूँकि मैं एक शायर हूँ और इश्क़ के मौज़ू पर सबसे बड़ी सनद शायर होते हैं इसलिए आपको मेरी बात मानना पड़ेगी, अगर इश्क़ के मौज़ू पर मुझे यानी एक शायर को सनद नहीं माना जाएगा तो क्या किसी आईजी, डिप्टी कमिश्नर और उनसे ऊपर जा कर किसी कमांडर-इन-चीफ, वज़ीर-ए-आज़म या किसी सदर-ए-मुम्लिकत के क़ौल को सनद माना जाएगा। ये लोग तो यकसर ना-बजा तौर पर वो ख़ुशनसीब तरीन और आम लोग क़िस्म के लोग होते हैं जो ना इश्क़ करते हैं और जिन्हें ना इश्क़ होता है। उनसे तो, उन ज़ालिमों और क़ातिलों से तो इश्क़ लड़ाया जाता है, हर बदज़ौक़, बेशऊर, बद-बातिन और दुनियादार हसीना उन्हीं लोगों को पटाने की फ़िक्र में रहती है। मैंने हसीं औरतों को आम तौर पर बे-ज़मीर और लालची पाया है, कम-अज़-कम मुझे तो किसी बा-ज़मीर और बेग़रज़ हसीना से मिलने का आज तक मौक़ा नहीं मिला। मैंने कोई और कारनामा अंजाम दिया हो या ना दिया हो मगर एक कारनामा ज़रूर अंजाम दिया है और वो ये है कि मैंने उन हसीन लड़कियों को बुरी तरह ज़लील किया है, इसलिए कि मुझे उनसे मीर तक़ी मीर और अपने मासूम तरीं भाई हज़रत अबदुल अज़ीज़ ख़ालिद का इंतिक़ाम लेना था। मुझे उम्मीद है कि मेरा ‘‘ख़़ुदा ग़यूर’’ मुझे उसका अज्र देगा

 

लिप्यन्तरण: संतोष झा
संतोष झा, हिरावल, पटना से सम्बद्ध मशहूर संस्कृति कर्मी, नाट्यकर्मी और अद्भुत संगीतकार हैं, साहित्य में रूचिवश उन्होंने यह अनुवाद किया है. इनसे आप hirawal@gmail.com के द्वारा संपर्क कर सकते हैं.

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