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रोहित वेमुला की घटना और वेलीवाड़ा: मार्तंड प्रगल्भ

मुक्तिकामी शिक्षा की एक नितांत भिन्न छवि को संजोये किसी आदर्शवादी नौजवान को वर्तमान विश्वविद्यालयों के भीतर भी उसी सर्वग्रासी अवमूल्यन को जन्म देने वाली अलगाव और जड़ता की पारिस्थितकी के पीड़ादायी अनुभवों से गुजरने को बाध्य होना पड़ता है. दलित समाज के लिए ये अनुभव उनकी चेतना की व्यवस्था में ऐतिहासिक रूप से पुरुत्पादित होते आये हैं. यह अकारण नहीं कि ‘रोहित वेमुला’ की घटना के बाद उभरा आन्दोलन विश्वविद्यालय में वेलीवाड़ा को पुनर्न्वेषित करता है. विद्रोह के लिए ज़रूरी स्पेस के रूप में वेलीवाड़ा न केवल विश्वविद्यालय की सीमाओं को स्पष्ट करता है वरन् समाज में हर जगह व्याप्त वेलीवाड़ा के व्यापक संघर्ष का हिस्सा बन जाता है. #लेखक 

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A sculpture at University of Hyderabad . Credit: Javed Iqbal, via The Wire

रोहित वेमुला की घटना और वेलीवाड़ा

By मार्तंड प्रगल्भ

रोहित वेमुला के पहले और आखिरी पत्र[1] को पढ़ते वक़्त एक आदर्शवादी नौजवान की छवि उभर आती है. वह अपने जीवन-अनुभवों से जानता है कि हमारी ह्रासग्रस्त मानवीय सम्बन्धों से बनने वाली पूरी पारिस्थितिकी बनावटी, झूठी, कृत्रिम और भयोत्पादक हो गयी है. “ हमारा प्रेम बनावटी है, हमारी मान्यताएं झूठी हैं, हमारी मौलिकता वैध है बस कृत्रिम कला के ज़रिये, यह बेहद कठिन हो गया है कि हम प्रेम करें और दुखी न हों.” मनुष्य होने की हर संभव कोशिश और उत्साह रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में शामिल गहरे अवमूल्यन से मुठभेड़ करती है. मनुष्यों के मूल्यांकन की उनकी परिभाषाओं की एक दूसरी दुनिया का स्वप्न अपने आसपास के अवमूल्यित मूल्यों से विद्रोह करने को बाध्य है. एक ऐसी दुनिया के लिए जहाँ प्रेम दुःख न पैदा करे. आज की दुनिया में मनुष्यों का मूल्य,“ इंसान की उपयोगिता उसकी तत्कालीन पहचान तक सिमट कर रह गयी है और उसकी नजदीकी संभावना तक ही सीमित कर दिया गया है … एक आंकड़ा है मनुष्य- महज एक वस्तु … आदमी को कभी भी उसके दिमाग के हिसाब से नहीं आंका गया. एक ऐसी चीज़ जो स्टारडस्ट से बनी थी, हर क्षेत्र में, अध्ययन में, गलियों में, राजनीति में, मरने में और जीने में.” दिमाग जो स्वप्न देख सकता है. विज्ञान का स्वप्न. केवल तात्कालिक संभावना के विरुद्ध भविष्य के दिक्-काल की असीम संभावनाओं का स्वप्न. वास्तविक मनुष्य को वस्तुवत करने की मूल्यव्यवस्था के खिलाफ मनुष्य होने की अनंत संभावना को जीवन मूल्य के रूप में जीने वाले लोगों के लिए अनिवार है कि वे आपस में मिलकर जीवन की पारिस्थतिकी के आमूलचूल परिवर्तन में जुड़ जाएँ. स्वयं को उस परिवर्तन के हथियार के रूप में रूपांतरित करें. अलगाव और जड़ता की सर्वग्रासी सभ्यता जीवन के बीजों को नष्ट करने का कारखाना बन चुकी है. मनुष्यता का विद्रोह और नए के निर्माण का संकल्प प्रत्येक क्षण इस झूठ को महसूस करने में इसके अंत को जीता है. “मैं मृत्यु के बाद की कहानियों पर विश्वास नहीं करता, भूत और आत्मा. अगर कुछ है जिस पर मैं भरोसा करता हूँ, वह है कि मैं सितारों की सैर करूँगा और दूसरी दुनिया के बारे में जानूंगा”.

मुक्तिकामी शिक्षा की एक नितांत भिन्न छवि को संजोये किसी आदर्शवादी नौजवान को वर्तमान विश्वविद्यालयों के भीतर भी उसी सर्वग्रासी अवमूल्यन को जन्म देने वाली अलगाव और जड़ता की पारिस्थितकी के पीड़ादायी अनुभवों से गुजरने को बाध्य होना पड़ता है. दलित समाज के लिए ये अनुभव उनकी चेतना की व्यवस्था में ऐतिहासिक रूप से पुरुत्पादित होते आये हैं. यह अकारण नहीं कि ‘रोहित वेमुला’ की घटना के बाद उभरा आन्दोलन विश्वविद्यालय में वेलीवाड़ा को पुनर्न्वेषित करता है. विद्रोह के लिए ज़रूरी स्पेस के रूप में वेलीवाड़ा न केवल विश्वविद्यालय की सीमायों को स्पष्ट करता है वरन् समाज में हर जगह व्याप्त वेलीवाड़ा के व्यापक संघर्ष का हिस्सा बन जाता है. समाज के अदृश्य और अस्पृश्य का विश्वविद्यालय के भीतर दृश्य और भौतिक होना न केवल समाज के पुनर्संयोजन की दृष्टि देता है वरन् शिक्षा के नए सैद्धांतिक व्यवहारों की प्रेरणा भी प्रदान करता है. ऐतिहासिक रूप से संतों के सामाजिक-सांस्कृतिक प्रयासों और अम्बेडकर के राजनीतिक व्यवहारों में दलितवाड़ा या वेलीवाड़ा के सामाजिक स्पेस को सामाजिक क्रान्ति के आधार क्षेत्र के रूप में रूपांतरित होता हुआ हम देखते हैं. इस अर्थ में ‘वेलीवाड़ा’ दलित मुक्ति के ऐतिहासिक प्रयोगों की परम्परा में है. यह कोई फिक्स मॉडल नहीं वरन् एक आन्दोलन है जिसका उद्देश्य है जातियों का नाश और श्रम-विभाजन को श्रमिकों के विभाजन से मुक्त करना. दूसरे शब्दों में वेलीवाड़ा समानता और न्याय के वास्तव को समाज में स्थापित करते जाने वाला आन्दोलन है. यह नए गणराज्य की इकाई नहीं वरन् गणराज्य को चुनौती है.

पिछले कुछ सालों से देश भर की उच्च शिक्षण संस्थाएं हमारी संसदीय सरकारों के निशाने पर हैं. निशाने पर हैं और बहुत संस्थागत रूप से उच्च शिक्षा के लोकतांत्रिक आदर्श को नष्ट करने की शक्तियों के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं. किसी न किसी तरीके से विश्वविद्यालय की सम्पूर्ण पारिस्थितिकी को बचाने की जद्दो-जहद भी तेज हो रही है. कुछ गिने-चुने विश्वविद्यालय या शोध की उच्च शिक्षण संस्थाएं बची हैं जो आज भी नए भारत के स्वप्न को बचाने की कोशिश कर रही हैं. नए भारत के निर्माण और शिक्षा के व्यवहार के विमर्श में नए समाज के निर्माण का आदर्श भी जिंदा है. नवउदारवाद के हिंसक और हमलावर दौर में इन विश्वविद्यालयों का लोकतांत्रिक व्यवहारों और शिक्षा के वैश्विक प्रयोगों के सहिष्णु विमर्श की जगह के रूप में खुद को बचाए रखने की राजनीति अपवाद चिह्नित हो रही है. पिछले तीस-चालीस सालों में सम्पूर्ण शिक्षा-व्यवस्था का पुनर्संयोजन होता गया है. गाँव, कस्बों और छोटे-बड़े शहरों में यह पुनर्संयोजन स्वीकार्य बना दिया गया. इसलिए आज जब जवाहरलाल नेहरु या हैदराबाद विश्वविद्यालय पर प्रायोजित हमले हो रहे हैं ऐसे में उनकी पारिस्थितिकी असुरक्षित महसूस कर रही है. यह असुरक्षा देशभर की शैक्षणिक पारिस्थितिकी में संपन्न मूलगामी दरार के खिलाफ शिक्षा की नयी व्यवस्था की लड़ाई में सहभागिता-निर्माण के संकट के चलते है. संघर्ष के अपने अपवाद चरित्र के कारण ‘save या बचाओ’ का नारा निर्माण की कार्य-नीति के लिए जरूरी हो उठा है.

उच्च शिक्षा की स्थानीय पारिस्थितिकी का एक ऐसा मॉडल जो स्वतः और संतुलित संचालन का भी मॉडल हो अब संभव नहीं रह गया है. मार्क्स पूँजीवाद के विकासक्रम में पैदा होने वाले सम्पूर्ण मानवीय सामाजिक-चयापचय(सोशल मेटाबोलिज्म) के रिफ्ट की चर्चा करते हैं. मनुष्य जीवन की सम्पूर्ण पारिस्थितिकी में उत्पन्न यह भ्रंश (रिफ्ट) अलगाव और जड़ता को ऐसी अपूरणीय क्षति में बदल देता है जहाँ से पुनर्वापसी संभव नहीं रह जाती. यह भ्रंश अनिवार्यतः और सतत वैश्विक संकट है. इसलिए विश्विद्यालय की पारिस्थितिकी-भ्रंश के खिलाफ संघर्ष अपनी चौहद्दी में असंभव नए प्रयोगों से मुकर नहीं सकता. रोहित वेमुला की घटना के बाद यह संघर्ष विश्वविद्यालयों की पारिस्थितिकी में दलित जीवन के संकट को समझने और व्यापक संकट के खिलाफ क्रांतिकारी नव-निर्माण के व्यवहारों में सहभागी आन्दोलनों का रूप ग्रहण करने की चेष्टा कर रहा है. सहभागी स्थानीय आन्दोलनों के भीतर व्यवहारों के लोकतांत्रिक स्वरूप को लेकर बहस पहले से कहीं तेज हो उठी है. वास्तविक समानता या जिसे अंग्रेजी में sabstantive eqality कहा जाता है उसके स्थानीय प्रयोग लोकतंत्र के आंदोलनात्मक चरित्र को व्यावहारिक बनाने का प्रयास कर रही है. इन प्रयासों को भी अम्बेडकर के राजनीतिक व्यवहारों से प्रेरणा मिलती है. लोकतंत्र उनके लिए सरकार की एक व्यवस्था मात्र नहीं थी. लोकतांत्रिक समाज एक गतिशील समाज है. स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे के मूल्यों को आचरण में उतारने के लिए ज़रूरी समाज. यहाँ साहचर्य या संगठन के अन्य रूपों से संवाद संभव है. भाईचारा हर व्यक्ति या विचार को मूल्यवान मानने में है, अगर वह व्यक्ति और विचार वास्तविक जीवन में समानता का आचरण करता है या उसकी प्रेरणा देता है. “ दूसरे शब्दों में, समाज के भीतर संपर्क का सर्वत्र प्रसार होना चाहिए. इसी को भाईचारा कहा जाता है और यह प्रजातंत्र का दूसरा नाम है. प्रजातंत्र सरकार का एक स्वरुप मात्र नहीं है. यह वस्तुतः साहचर्य की स्थिति में रहने का एक तरीका है, जिसमें सार्वजनिक अनुभव का समवेत रूप से सम्प्रेषण होता है.”[2] आरक्षण-केन्द्रित सुधारवादी प्रयोगों ने साहचर्य और भागीदारी के लोकतंत्र को कुछ एक व्यक्तियों के इर्द-गिर्द सीमित कर दिया . ‘सार्वजनिक अनुभव का समवेत रूप से सम्प्रेषण’ जीवन के अन्य क्षेत्रों की तरह विश्वविद्यालयों के भीतर भी असंभव होता गया है. छात्र राजनीति से निकले प्रगतिशील मूल्यों वाला लोकतांत्रिक मॉडल भी साहचर्य में वास्तविक समानता के सामाजिक परिवर्तन को सत्ता प्राप्ति की होड़ के हवाले कर देता है. दलित राजनीति अपने समय के सभी सामाजिक सुधारवादी माडलों के अन्दर समानता और भाईचारे के आचरण का अभाव महसूस करती है. इसका अर्थ है कि छात्र राजनीति के परम्परागत संगठनात्मक अनुभवों में जाति के नाश की किसी ईमानदार कोशिश का अभाव है. इसलिए जब कैम्पस-लोकतंत्र को बचाने की बात की जाती है तो यह दलित राजनीति के सामने ‘किस लोकतंत्र’ को बचाने का सवाल बन जाता है. विश्वविद्यालय की पारिस्थितिकी को बनाने वाले छात्रों, शिक्षकों, कर्मचारियों, कामगारों के रोज़मर्रा के जीवन में समानता और भाईचारे के नाम पर केवल उंच-नीच का व्यवहार है. दलित राजनीति उंच-नीच की इस उत्पीड़क व्यवस्था का वास्तव में नाश चाहती है. यही कारण है कि लोकतांत्रिक मॉडलों के नाम पर चलने वाली उत्पीड़क व्यवस्था से संघर्ष साहचर्य और सामाजिक संगठन के ज्यादा समतामूलक रूपों की तलाश भी है.

जातिगत शोषण दलित जीवन का यथार्थ है. ऐतिहासिक रूप से जाति की व्यवस्था ने समाज को न केवल विद्रूपित किया है बल्कि इसने सभ्यतामूलक बर्बरता को समाज व्यवस्था की केन्द्रीय शक्ति बना दिया है. इस सभ्यतामूलक बर्बरता के खिलाफ समतापरक समाज के आदर्श वाली दलित राजनीति के भीतर वाम छात्र-आंदोलनों के लोकतांत्रिक-सांस्थानिक व्यवहारों के प्रति एक स्वाभाविक अस्वीकार है. अस्वीकार की यह स्वीकृति केवल विचारधारा के लिए ही ज़रूरी नहीं है बल्कि इस अस्वीकार की रौशनी में नए विश्वविद्यालय तक अपना सफ़र तय करना हमारी आवश्यकता भी है. दलित राजनीति यह वाजिब सवाल उठाती है कि प्रगतिशील छात्र आंदोलनों ने विश्वविद्यालय के पारितंत्र में दलित जीवन को सम्यक ढंग से संबोधित क्यों नहीं किया? या ऐसा वो क्यों नहीं कर पाए? बचाने से परिरक्षण और पुनर्निर्माण क्योंकर होगा? और यह सवाल एक बारगी मुक्तिकामी राजनीति की सम्पूर्ण परम्परा को चुनौती है. चुनौती के इसी व्यवहार में दलित और प्रगतिशील सहभागिता विकसित हो सकती है. रोहित वेमुला का अस्वीकार दलित और प्रगतिशील ताकतों की सहभागी परम्परा को चुनौती देने वाला अस्वीकार है. उच्च शिक्षण-संस्थाएं संघर्ष, ज्ञान और संगठन के जिन स्वप्न-आदर्शों को संबोधित करती हैं उनके टूटने का अस्वीकार और नवनिर्माण की चेतना है रोहित वेमुला. अम्बेडकर की उन्मूलनपरक दृष्टि और शिक्षा के मुक्तिदायक रूपों पर जोर आज ‘रोहित वेमुला’ के स्वप्न-आदर्शों में नए अर्थग्रहण कर रहा है. यह अर्थ-ग्रहण क्रमिक मोह-भंगों के खिलाफ होने वाले वास्तविक आन्दोलनों से पृथक पहचाना नहीं जा सकता.

वेलीवाड़ा और साहचर्य

कबीरा यह घर प्रेम का खाला का घर नाहीं / शीश उतारे भूईं धरे तब पैसे घर माहीं”

वेलीवाड़ा के संदर्भ में कबीर का घर याद आना अनायास नहीं है. इस घर में प्रेम के नियम को छोड़ कर कोई अन्य सामाजिक नियम लागू नहीं है. प्रेम भी कोई नैतिक विधि-शास्त्र से संचालित अलंकरण नहीं बल्कि साहचर्य की रचना-प्रक्रिया. इस घर में प्रवेश के लिए ज़रूरी है तत्कालिक पहचान से मुक्त होना. एक ऐसा सामाजिक स्पेस जो निश्चित हदों के बदले अनहद हो. लोकतंत्र का ऐसा अनहद चरित्र ही वेलीवाड़ा है. यह अनहद ‘सार्वजनिक अनुभवों का समवेत सम्प्रेषण’ है. यह सम्प्रेषण सामाजिक सुधार के सतही प्रयासों के लिए अस्वीकार्य है. इस अस्वीकार्यता के चलते यह मूलगामी राजनीति का संयोजक हो उठता है. वेलीवाड़ा सामूहिक स्वामित्व और सामूहिक अभिव्यक्ति ( ओनरशिप और ऑथरशिप) दोनों है. अम्बेडकर के राजनीतिक प्रयासों से दो उदाहरण इसकी ऐतिहासिक परम्परा को स्पष्ट करते हैं. देवदासियां मंदिरों से निकल कर मुंबई के कामतीपूर में सेक्स-मजदूरी करने लगीं. शहर उन्हें आत्म-मर्यादा नहीं दे पाया. वह अपनी अस्पृश्यता और अपने अपमान से मुक्त नहीं हुई. उनका प्रेम, मातृत्व, कामना और अपने सम्पूर्ण जीवन पर अधिकार न पहले था और न सेक्स-मजदूर बनने के बाद. अम्बेडकर इनसे बात-चीत करने गए एक नए घर का स्वप्न ले कर. शहर की मलिन बस्तियों के भीतर एक सर्वथा भिन्न पारिस्थितिकी का स्वप्न लेकर. गोपाल गुरु ने ध्यान दिलाया है कि अम्बेडकर के लिए श्रम-शक्ति ही देहों में मूर्त होती है. यह श्रम-शक्ति बलात् मजे की वस्तु होने से इनकार करती है. “ अम्बेडकर इसलिए सलाह देते हैं कि आत्म-मर्यादा मूलतः उस प्रक्रिया से निकलती है जिसमें ये अस्पृश्य महिलायें अपने श्रम को भौतिक गुणों जैसे प्रकृति, भूमि या उद्योग से घुला मिला सकें.”[3]  आत्म-मर्यादा केवल एक विचारधारा नहीं बल्कि एक भौतिक प्रक्रिया है. शादी अम्बेडकर के लिए मुक्त साहचर्य की ऐसी प्रक्रिया थी जहां सामूहिक श्रम-शक्ति अपनी भौतिक दुनिया के साथ घुल-मिल कर सामूहिक भलाई की स्वतंत्र इकाई हो जाए. श्रम-शक्ति की स्वतंत्र और ठोस अभिव्यक्ति के लिए ज़रूरी है कि भौतिक गुण सार्वजनीन हों. निजी संपत्ति को बचाए रखने की व्यवस्था श्रम-शक्ति का बलात् दोहन करती है. अस्पृश्यों के आत्मसम्मान और आत्म-मुक्ति के लिए ज़रूरी प्रक्रिया है प्रकृति और समाज के ऊपर किसी भी तरीके के निजी संपत्ति का क्षरण. स्त्रियाँ तो श्रम-शक्ति का उत्पादन भी करती हैं. ऐसी स्थिति में दलित और मलिन बस्तियों की अस्पृश्य महिलायें सामाजिक पुनुरुत्पादन की दूसरी रीति के लिए संघर्ष में ही आत्म-मर्यादा भी हासिल कर सकती हैं. साहचर्य यहाँ व्यक्तिगत उत्पादकों के स्वतंत्र साहचर्य के लिए ज़रूरी संघर्ष की एकता में है. अम्बेडकर ने इस संघर्ष को जारी रखने वाले आत्मबल के लिए दलित गृहस्थ की एक नयी कल्पना सामने रखी. बहुत कुछ कबीर के घर की तरह.

कबीर की तरह अम्बेडकर भी जानते थे कि जो अपना पुराना घर नहीं जला सकता वह इस नए साहचर्य में शामिल नहीं हो सकता. ‘जात-पात तोड़क मंडल’ का हिन्दू सुधारवादी प्रयास अम्बेडकर को अपने घर में अध्यक्ष बना कर पंजाब के दलितों का अभिभावक बनना चाहता था. यह प्रतिनिधित्व को प्रतीकात्मक बनाना था. पंजाब का दलित जन-गण अम्बेडकर के जाति-विनाश या उन्मूलन की दृष्टि को पहचानना चाहती थी. आत्म-परिचय की यह सामूहिक चेतना स्वाभाविक रूप से मंडल को बाध्य कर रही थी कि वह लाहौर में अपने सभा की वार्षिक कांफ्रेंस का अध्यक्ष बम्बई के एक उन्मूलनवादी डॉक्टर साहेब को बनाये. सवर्ण सुधारकों का वैष्णव घर ऐसे अस्पृश्य को बिना किसी शुद्धि के प्रवेश नहीं दे सकता था. अम्बेडकर ने मंडल के साथ अपने पत्राचार में लगातार शुद्धि के वैष्णव आग्रहों को अस्वीकार किया. अपने पर्चे के किसी अभी अंश या विचार से उन्होंने समझौता नहीं किया. अम्बेडकर जानते थे कि ऐसे सुधारवादी बिना अपने वैष्णव घर को जलाए उनके सहचर नहीं बन सकते. मंडल की सामाजिक संरचना की आलोचना करते हुए अम्बेडकर गुरु और अंत्यज के अंतर्विरोध को बहुत तीव्र कर देते हैं. गुरु के रूप में एक अस्पृश्य को स्वीकार करने का अर्थ था समानता के आदर्श को आचरण में उतारना. यह आचरण नए सामाजिक सम्बन्धों की स्वीकृति है. साहचर्य के लिए जातिप्रथा का ज़रूरी ध्वंस स्वीकार करने में मंडल असमर्थ था. हिन्दू-धर्म और जातिव्यवस्था की प्रभुत्वशाली दुनिया में अम्बेडकर हमेशा बहिष्कृत थे. अपने बलात् बहिष्कार के हिंसात्मक-अहिंसात्मक अनुभवों के सहारे ही वह जाति-उन्मूलन की अपनी नयी सैद्धांतिकी भी रचते हैं. यह सैद्धांतिक व्यवहार स्वयं राजनैतिक हो उठता है. कबीर आदि संतों को भी ज्ञानी और गुरु के रूप में स्वीकार करना वैष्णव मन के खिलाफ था. इनकी आलोचना इतनी प्रखर थी कि वे किसी भी तरीके से वैष्णव विश्वदृष्टि में समंजित नहीं हो सकते थे. वह एक नयी विश्वदृष्टि का उन्मेष था. कबीर कभी किसी शिष्य को संबोधित नहीं करते. या तो अपने धुर विरोधी पांडे-मौलवियों का मजा लेते या फिर साधना पथ के सहयात्रियों साधू-असाधु, अवधू आदि को संबोधित करते है. साहचर्य के बाहर सद्गुरु का कोई अर्थ नहीं. यह सद्गुरु साथी कामगार है. वह प्रेम और सबद की साधना का सहचर-मित्र है.

मंडल के अस्वीकार के लिए अम्बेडकर पहले से ही तैयार थे. वह देख रहे थे कि संत रामदास की वाणी असत्य नहीं हो सकती. संत कवियों के सत्य को वह अपने राजनीतिक जीवन में पुनर्न्वेषित करते हैं. गुरु और अंत्यज के सम्बन्धों की सभी हिन्दू या वैष्णव कल्पनाओं और परिकल्पनाओं की आलोचना करते हुए वह समाज में शिक्षक की भूमिका पर भी विचार कर रहे थे. बौद्ध-मठों और विश्वविद्यालयों के इतिहास में उनकी अंतर्दृष्टि आवयविक या सहज बुद्धिजीवियों के संगठनात्मक व्यवहार की परम्परा का अन्वेषण करती है. सहज या आवयविक बुद्धिजीवी उनके लिए बौद्ध-भिक्षुओं का तात्कालिक या आधुनिकतम रूपांतरण थे[4]. बौद्ध संघों और विश्वविद्यालयों से विद्रोह करने वाले सरहपा आदि सिद्धों की परम्परा कबीर आदि संतों के यहाँ नवीन जीवन-दृष्टि का उन्मेष बन जाती है. महाराष्ट्र की संत-परम्परा अम्बेडकर की अंतर्दृष्टि में स्वाभाविक थी. उन्होंने अपने पर्चे में लिखा था कि अगर उन्हें अपने वर्तमान सामजिक संरचना वाले मंडल के सम्मलेन में  अध्यक्षीय वक्तव्य का मौक़ा मिल जाता तो संत रामदास की वाणी असत्य हो जाती. अम्बेडकर ‘सार्वजनिक अनुभवों के समवेत सम्प्रेषण’ को राजनीति का आधार बना रहे थे. मंडल के अस्वीकार ने अम्बेडकर को सहज या आवयविक बुद्धिजीवी के रूप में पुनः रेखांकित किया. दलितवाड़ा या वेलीवाड़ा की पारिस्थितिकी से आवयविक या सहज जुड़ाव उत्पादकों की तरह ही संभव है. ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद की संश्लिष्ट उत्पादन-प्रक्रिया से बनने वाले सामाजिक सम्बन्धों के भीतर वेलीवाड़ा एक रिक्त स्थान है. यह उत्पादकों के नितांत भिन्न सामाजिक संगठन होने की प्रक्रिया है. वह प्रभुत्वशाली सामाजिक सम्बन्धों द्वारा अप्रोप्रिएशन की हर संभव चेष्टा की कांट-छांट में सक्षम है. इसी अर्थ में वह एक गतिशील लोकतांत्रिक समाज है. यह बहिष्कृतों और अस्पृश्यों का लोकतंत्र है.

वेलीवाड़ा और व्यवहार का दर्शन

सहज बुद्धिजीवी के संगठन पर विचार करने वाले ग्राम्शी से अम्बेडकर के प्रयासों की फौरी एकता भी शिक्षाप्रद है. अम्बेडकर और ग्राम्शी दोनों ही अपने सामाजिक-धार्मिक आन्दोलनों के इतिहास की जांच करते हुए आवयविक बुद्धिजीवी की संकल्पना तक पहुँच रहे थे. अपने राष्ट्रीय इतिहासों में दलित और सबाल्टर्न की तार्किक इयत्ता बहुत भिन्न नहीं है. संत कवियों का अनुभव-सम्मत विवेकवाद एक नयी विश्वदृष्टि की प्रस्तावना करती है जिसे ग्राम्शी के शब्दों में व्यवहार का दर्शन कह सकते हैं. यह दर्शन सम्पूर्ण प्रभुत्वशाली धार्मिक विश्वदृष्टि का विकल्प देती है. उत्पादकों के अनुभव की एकता जब अपनी अभिव्यक्ति के संकट से गुज़र रही होती है तब यह निश्चित है कि सम्पूर्ण सामाजिक सम्बन्ध एक बड़े परिवर्तन की पीड़ा से गुज़र रहा है. ऐसे समय में प्रभुत्वशाली विश्वदृष्टि अपने सामाजिक आधार को विचारधारा के सीमेंट और गारे से जोड़े रखने में अक्षम हो जाती है. संकट के इस काल में उत्पादकों के अनुभवों की एकता दो नितांत विरोधी विश्वदृष्टि में बंट जाती है. इन विरुद्धों का सामंजस्य धार्मिक विचारधारा को पुनर्जीवित करने जुड़ जाता है. जबकि विरुद्धों के संघर्ष की तार्किक परिणति धर्म मात्र का विनाश हो जाती है. संतों का सच धर्म का सच नहीं है जिसका प्रचार सामंजस्य की वैष्णव विचारधारा करती है. वैष्णव विचारधारा उत्पादन को गुणों के अधीन करती है जबकि कबीर आदि संत उत्पादन को गुणातीत बताते हैं.

सरहपाद जैसे सिद्धों का नालंदा विश्वविद्यालय के प्रति विद्रोह और फिर से सिद्धांत और व्यवहार की एकता का प्रयास यह बताता है कि उस समय के संस्थानिक बौद्धिकों की दूरी जन साधारण से कितनी बढ़ गयी थी. संस्थानों को भी आतंरिक विच्छेद के भय से गुजरना पड़ रहा था. सिद्धों या संतों को अपने समय के सामान्य-बोध की आलोचना करनी पड़ी थी. यह आलोचना उन्होंने सामान्य-बोध की जगह पर ही खड़े होकर की थी. जनसमूह के सामान्य-बोध में जो साधु-बोध का ‘स्वस्थ-केन्द्रक’ था, ये संत उसे संबोधित करते थे. कबीर आदि संतों ने सामान्य-बोध की जगह से सामान्य-बोध की आलोचना करते हुए लोगों को विश्वास दिलाने की कोशिश की कि कोई भी ‘ज्ञानी’ हो सकता है. या ग्राम्शी के शब्दों में कहें तो “हर कोई दार्शनिक” है. इसे स्पष्ट करने के लिए ही आरम्भ में सामान्य-बोध की जगह से ही ऐसी आलोचना आवश्यक है. आरम्भ में यह प्रक्रिया व्यक्ति केन्द्रित ही होती है. अलग-अलग व्यक्ति ही इसे अपने स्तर पर आरम्भ करते हैं. कह सकते हैं कि यह आरम्भ में वैयक्तिक साधना के रूप में विकसित होती है. ऐसी स्थिति में प्रभुत्वशाली संस्था या धर्म मत या शास्त्रों के सामने ‘सहज’ या ग्राम्शी जिसे ‘सिम्पल’ कहते हैं उसका संकट पैदा हो जाता है. प्रभुत्वशाली परंपरा कोशिश करती है कि बौद्धिकों पर कठोर नियंत्रण बनाये रखा जाए, ताकि वे अपनी सीमा का अतिक्रमण न करने पायें. इस अतिक्रमण से अखंडता में पड़ी दरार विस्फोटक और विनाशकारी हो सकती है. दूसरी ओर यह भी संभव नहीं कि ‘सहज’ को ही बौद्धिक घोषित कर इस दरार को पाट दें.

कबीर आदि संत ‘सहज’ को उनके आरंभिक दार्शनिक ‘सामान्य-बोध’ के स्तर पर ही नहीं छोड़ते. वह ‘सहज’ को एक उच्च जीवन-विवेक बनाने की साधना करते हैं. ये सहज और बौद्धिक के बीच एकता इसलिए नहीं बना रहे थे कि विवेकवान क्रियाओं की साधना का एक घेरा बना कर अलग पंथ निकाल लें और जनता के बीच ‘सहज’ के नाम पर एक क्षीण एकता बनी रहे. वह चाहते थे कि एक ‘नैतिक और बौद्धिक ब्लाक’ बनाया जाये, ताकि जनता का बौद्धिक विकास संभव हो न कि केवल बौद्धिकों के छोटे से हिस्से का आतंक कायम हो. कबीर के शब्दों में कहें तो ‘सहज’ की पहचान इसी अर्थ में कठिन साधना की पहचान थी. ज्ञान के हाथी पर कबीर इसी सहज का दुलीचा डाल कर चढ़ने कहते थे. निम्नवर्गीय सामाजिक समूहों के ठोस ब्लाक के निर्माण के प्रयास के कारण संतों की साधना वैष्णव प्रभुत्व की विरोधी प्रक्रिया थी. इस अर्थ में ये न केवल व्यवहार का नया दर्शन बनाने की कोशिश कर रहे थे वरन् दर्शन का नया व्यवहार भी सामने रख रहे थे. दोनों ही अर्थों में यह दर्शन और व्यवहार की पुरानी सारी परंपराओं के साथ-साथ वैष्णव भक्ति के रूप में सिद्धांत और व्यवहार की नई प्रभुत्वशाली धारा की आलोचना भी कर रहे थे. सामान्य-बोध की यथार्थ दृष्टि की आलोचना के क्रम में संतों ने एक नई यथार्थ दृष्टि का उन्मेष किया था. यह यथार्थ की आलोचकीय दृष्टि थी.

ग्राम्शी लिखते हैं कि आलोचकीय आत्मचेतस् प्रयासों द्वारा राजनीतिक और ऐतिहासिक रूप से बौद्धिकों का एक अभिजात्य (elite)[5]भी निर्मित होता जाता है. यहाँ ‘अभिजात्य’ शब्द को उसके प्रतिक्रियावादी अर्थ में नहीं प्रयोग किया गया है. यह ग्राम्शी के यहाँ हिरावल के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है. ग्राम्शी लिखते हैं : “कोई मानव जनसमूह व्यापक अर्थों में खुद को संगठित किये बिना खुद को ‘पृथक्’ नहीं कर सकता, अपनी जगह पर स्वतंत्र नहीं हो सकता; और कोई संगठन बिना संगठनकर्ता या नेतृत्व के यानी बिना बौद्धिकों के संभव नहीं; दूसरे शब्दों में कहें तो सिद्धांत या व्यवहार के सम्बन्ध (नेक्सस) के सैद्धांतिक पक्ष का पृथक् जनसमूह जो विचारों की अवधारणात्मक या दार्शनिक व्याख्या में ‘प्रवीण’ हो उसके वास्तविक अस्तित्व के बिना.”[6]

इस प्रकार सहज साधना कवि-बौद्धिकों के रूप में संतों के लिए एक द्वंद्वात्मक रचना प्रक्रिया थी. बौद्धिकों और जनता के बीच बनते रहने वाली सहज साधना. यह वेलीवाड़ा की आतंरिक गतिशीलता है. कबीर आदि संत इस प्रक्रिया को बनाने वाले और खुद उससे बनने वाले थे. इस प्रक्रिया में लगातार उन क्षणों की पुनरावृत्ति होती रहती है जहाँ जनता और बौद्धिकों के बीच की दूरी बढ़ने लगती है. इस संबंध के पतन से यह धारणा घर करने लगती है कि सिद्धांत अनावश्यक, गैर ज़रूरी और महज व्यवहार का पूरक है. वह व्यवहार के अधीन है. सिद्धांत और व्यवहार को न केवल भिन्न माना जाने लगता है वरन् उन्हें अलगाकर दो भिन्न अवयवों में तोड़ दिया जाता है. व्यवहार रूढ़ियों के पालन में बंद कर दिया जाता है. इस यांत्रिकता की बार-बार पुनरावृत्ति का मतलब है “कि कोई अपेक्षाकृत आदिम ऐतिहासिक अवस्था से गुजर रहा है.”[7] सिद्धांत और व्यवहार की इस विलगता के बीच ही कबीर आदि के प्रयासों पर प्रभुत्व की वैष्णव दृष्टि का प्रवेश होता जाता है. दूसरी ओर उनके व्यवहार के सिद्धांत में अन्तर्निहित समानता के आदर्श के साथ नए उभरते वणिक समुदाय की संवेदना और पैसे के व्यावहारिक सिद्धांत और दर्शन का घालमेल करने की कोशिशें होने लगती है. कबीर निर्गुण राम के सगुण वैष्णव अवतार बन जाते हैं और मठों को बनियों और मध्यवर्ती जातियों का संरक्षण मिलने लगता है. यहाँ ध्यान रखना चाहिए कि यांत्रिक, निर्धारणवादी या भाग्यवादी अवयवों का सबल होना व्यवहार के दर्शनों की आन्तरिकता रही है. ग्राम्शी लिखते हैं कि किसी सामाजिक श्रेणी के “सबाल्टर्न” चरित्र की यह आवश्यक और इतिहास सम्मत विशेषता बनी रही है.[8]

कबीर आदि संतों का अनुभवसम्मत विवेकवाद ‘सिद्धांत और व्यवहार’ की एकता के प्रयास में है. ग्राम्शी कहते हैं कि यांत्रिक विश्वदृष्टि ही निम्नवर्गों का धर्म हो जाता है. कबीर आदि संत इन अर्थों में ही धर्म बनने के पहले के सिद्धांतकार हैं और इसी अर्थ में ठेठ राजनीतिक भी हैं. यांत्रिक दुहराव की प्रक्रिया दरअस्ल इतिहास की आदिमता की ओर लौटना है. व्यवहार के दर्शन के आरंभिक बौद्धिकों के रूप में कबीर आदि संत राजनीतिक अर्थों में ही प्राक्-धार्मिक हैं . कबीर के यहाँ काम की एकता की कौंध वह आधारभूमि है जिसे वह ‘निर्गुण राम’ कहते हैं. काम का विभाजन उनके गुणों के आधार पर नहीं हो सकता. वह निर्गुण हो कर भी विश्व को लगातार नए-नए रूपों में सृजित करता रहता है. विश्व को बदलता रहता है. निर्गुण सर्जना की वैश्विकता प्रभुत्व की विचारधारा द्वारा थोपे गए सारे भेद परक प्रवर्गों को चुनौती देती है. कबीर की ‘आँखिन देखि’ का ‘अनभै सच’ काम की यही सार्वजनीनता है.

वेलीवाड़ा और अनुभववाद की सैद्धांतिक सीमाएं

मूलगामी अनुभववाद आज एक विचारधारात्मक शक्ति बन गया है. इस विचारधारा के अनुसार पूँजी का धार्मिक और जातिवादी चरित्र जिस इतिहास से बनता है दलित एकता उस प्रभुत्वशाली इतिहास से सर्वथा भिन्न इतिहास दृष्टि रखती है. वह पूँजी के इतिहास की शुरुआत से ठीक पहले है और इसलिए अपने अनुभव की संरचना में प्राक्-धार्मिक भी है. यह अनुभववाद आधुनिकतावाद की मूलगामी आलोचना करती है. वह आधुनिकतावाद को ब्राह्मणवादी- हिंदूवादी और ज्ञानमीमांसात्मक साम्राज्यवाद की विचारधारा के रूप में आलोचित करती है. भारत में समाज-विज्ञानों का चरित्र आज एक आतंरिक प्राच्यवाद से ग्रसित है और समानता के व्यवहार को यहाँ वास्तव करने के लिए दलित अनुभवों के सैद्धांतिक अप्रोप्रियेसन से लड़ना ज़रूरी है. इस उद्देश्य का एक नैतिक आग्रह भी है. यह नैतिक आग्रह दलित अनुभवों की अपनी सैद्धांतिकी विकसित होने के लिए ज़रूरी है. मिलिंद वाकाणकर[9] डा. धर्मवीर के प्रबल अनुभववाद को रेखांकित करते हैं. डा. धर्मवीर अपने प्रबल अनुभववाद के कारण ही कबीर के सम्बन्ध में हजारीप्रसाद द्विवेदी की मूलगामी आलोचना में समर्थ हुए. परन्तु उनका मूलगामी अनुभवाद धार्मिक विचारधारा का विकल्प नहीं दे पाया. कबीर स्वयं एक नए धर्म के प्रवर्तक बन उठे. यह उनकी सैद्धांतिक सीमा है. वाकणकर कबीर और दलित जनमन के रिश्तों के ऐतिहासिक पुनुरुत्पादन का एक प्रतिइतिहास लिखने की कोशिश करते हैं.

वाकणकर कहते हैं कि कबीर से आज के दलित आन्दोलन को दो चीजें उपहार में मिली हैं. एक चमत्कार और दूसरी हिंसा. वाकणकर कबीर के नाम के सहारे लगातार बनते रहने वाली कविताओं का सामाजिक इतिहास लिखने का प्रयास करते हैं. ‘कहत कबीर’ किस प्रकार कबीर से अपना रिश्ता प्रकट करने वाली एक टेकनीक बन गयी थी और मठों के भीतर या बाहर भी लगातार दलित सामूहिकता को संगठित करती रही थी, उसे समझने की कोशिश. दूसरे शब्दों में कहें तो मठों के भीतर कबीरपंथियों में और दलित आन्दोलन में काम करने वाली धार्मिक भावनाओं की राजनीतिक परीक्षा उनका उद्देश्य है. वाकणकर ऐतिहासिक धर्मों की प्रभुत्वशाली इतिहासदृष्टि या कहें कि वैष्णव कबीर के रूप में कबीर को देखने की इतिहासदृष्टि की उल्टी धारा में जाकर यह देखने का प्रयास करते हैं कि ऐतिहासिक धर्मों में कबीर का एप्रोप्रिएशन या पुनर्प्रस्तुति के ठीक पहले वह क्या था जिसने किसी दलित को इतना सशक्त बनाया कि वह ‘कहत कबीर’ के नाम से अपनी कविता करता है. वाकणकर वर्तमान सभी धर्मों को ऐतिहासिक धर्म ही मानते हैं. कबीर के सहारे वह इन ऐतिहासिक धर्मों का एक प्राक् इतिहास लिखने की कोशिश कर रहे हैं जहाँ ईश्वर के जन्म से पहले अर्थात् ऐतिहासिक धर्म बनने के ठीक पहले ‘ईश्वर के आने की ख़बर’ में छुपी चमत्कार की तात्कालिकता एक निम्नवर्गीय सामूहिकता को संगठित कर लेती है. वाकणकर दलित आन्दोलन में सक्रिय अम्बेडकरवादी विचारधारा की दो प्रवृत्तियों की आलोचना करते हैं. एक प्रवृत्ति दलित धर्म की तलाश करती है जो कभी बौद्ध धर्म में तो कभी कबीर धर्म में प्रकट होती है. दूसरी ओर कैसे दलित आन्दोलनों के अन्दर से उभरी प्रतिनिधित्व या रिप्रेजेंटेशन की राजनीति वस्तुतः चुनावी जोड़ तोड़ की राजनीति में बदल जाती है. वाकणकर के अनुसार ऐतिहासिक धर्मों का इतिहास जिन घटनाओं के इर्द गिर्द शुरू होता है, उस घटना को संभव करने वाली निम्नवर्गीय चेतना के भीतर शामिल स्वतः स्फूर्त क्षमता को दमित करके आगे बढ़ता है. वह धर्मों का एक संपूर्ण इतिहास है जबकि विधर्मी या अपधर्मी परंपरा के इतिहास को कभी भी ऐतिहासिक धर्म की पूर्णता के मॉडल में देखना संभव नहीं है. भक्ति को धार्मिक विचारधारा कहने से हम केवल प्रभुत्वशाली वैष्णव धारा का ही इतिहास समझ सकते हैं. परन्तु जिस ‘घटना’ के आलोक में वैष्णव धर्म लोकप्रिय धार्मिक विचारधारा में रूपांतरित होता है अर्थात् निम्नवर्गीय दलित सामूहिकता की जिस विधर्मी परंपरा में नया क्षण कबीर लेकर आते हैं, उस धुंधले क्षण का इतिहास वाकणकर लिखने की कोशिश करते हैं. मूल कवि और उसके अनुयायी दलित कवि अर्थात् ‘हस्ताक्षर’ और ‘प्रतिहस्ताक्षर’ के द्वारा कबीर कैसे नया सन्दर्भ ग्रहण करते चलते हैं, उसका इतिहास. दूसरे शब्दों में, मूल कवि के प्रति सच्ची श्रद्धा और कृतज्ञतावश जब कोई दलित कवि अपनी कविता पर कबीर की मुहर लगाता है तो लगभग वही कर रहा होता है जिसे हम ‘भक्ति’ कहते हैं. पर वाकणकर इसे ऐतिहासिक धर्मों की तरह नहीं मानते जहाँ कबीर भगवान् हो जाते हैं. डा. धर्मवीर के ‘कबीर भगवान्’ और ‘दलित धर्म’ की चर्चा के सन्दर्भ में वाकणकर उसी प्रक्रिया का दुहराव देखते हैं. दलित अपधर्मी परंपरा वस्तुतः जब ‘दलित सशक्तिकरण’ के रूप में पुनर्प्रस्तुत होती है तो वह प्रभुत्वशाली परंपरा ही हो जाती है. डा. धर्मवीर के भीतर जो अपधर्मी, निम्नवर्गीय स्वाभाविकता है, उसे तो वाकणकर स्वीकार करते हैं परंतु ऐतिहासिक धर्म के मॉडल से बाहर न निकल पाने की आलोचना भी करते हैं. इसलिए वाकणकर के अनुसार डा. धर्मवीर द्विवेदी जी के ‘ब्राह्मणवादी’ मॉडल की आलोचना करते हुए भी ऐतिहासिक धर्मों की प्रभुत्वशाली परंपरा में ही अंतर्भुक्त हो गए. ठीक उसी तरह, जब दलित आन्दोलन अम्बेडकरवादी इतिहासदृष्टि में अंतर्भुक्त हो जाता है तो आन्दोलन में अन्तर्निहित दलित सामूहिकता या ‘दलित, मुस्लिम, आदिवासी’ सामूहिकता प्रतिनिधिमूलक राजनीति में विकृत होकर स्वयं प्रभुत्वशाली परंपरा बन जाती है. वाकणकर कहते है कि ‘दलित, आदिवासी, मुस्लिम’ जीवन में रोजमर्रा की हिंसा और मृत्यु की अनवरत उपस्थिति ने उनकी स्मृतियों में सामाजिकता की एक पूर्णतः भिन्न छवि संजोये रखी है. यह किसी आन्दोलन की आकस्मिकता के बीच अचानक से पुनर्संयोजित होकर आन्दोलन के सामाजिक चरित्र का निर्माण करती है. दिक्कत उसको प्रतिनिधित्व देने वाली प्रक्रिया में आती है जहाँ पहले से ही प्रभुत्वशाली धार्मिक या राष्ट्रीय या कोई अन्य विचारधारा एप्रोप्रिएशन के लिए तैयार है. इस प्रक्रिया को वाकणकर ‘राजनीतिक समाज’ (पोलिटिकल सोसाइटी) के निर्माण की प्रक्रिया कहते हैं. ‘नागरिक समाज’ की मध्यस्थता के चलते दलित समुदायों और राज्य के बीच सीधा राजनीतिक संवाद नहीं बन पाता है. उनका कहना है कि पार्था चटर्जी आदि के द्वारा प्रस्तावित इस ‘राजनीतिक समाज’ के लिए जरूरी है कि दलित आन्दोलन को इस प्राक् इतिहास में अन्तर्निहित सम्भावना की ओर लगातार ध्यान दिलाते रहा जाये.

गोपाल गुरु के लिए यह प्रबल अनुभववाद जिस बाह्य और प्राक् का सिद्धांत देता है उस सिद्धांत की वस्तु दलित जनमन को प्रतीकात्मक बना देती है. यह यथार्थ के संश्लिष्ट अनुभवों के द्वंद्वात्मक विश्लेषण में असमर्थ है. साहित्यिक उत्पादनों को आधार बना कर जब सिद्धांत निर्माण होता है तो वह दलित अनुभवों को महज सौंदर्यशास्त्र की वस्तु बना देता है. गुरु कहते हैं- “लेकिन कविता सिद्धांत का स्थानापन्न नहीं हो सकती…[लेकिन] कविता के पास विशिष्ट को सामान्य और सामान्य को विशिष्ट करने वाली संकल्पनात्मक क्षमता नहीं है. इसमें द्वंद्वात्मक शक्ति नहीं है.” अनुभववाद की आलोचना में गुरु की यह प्लेटोनिक भंगिमा ध्यान देने लायक है. सत्य के धारण की द्वंद्वात्मक क्षमता को कविता के बाहर का क्षेत्र घोषित किया गया. यह दलित सैद्धांतिकी को तात्कालिक प्रदर्शन की प्रवृत्ति से मुक्त करने वाली भंगिमा है. साहित्यक आलोचना से समाज विज्ञान के अनुशासन को स्वायत्त करने के लिए यह कतई आवश्यक नहीं था कि कविता मात्र को द्वंद्वात्मक शक्ति से रहित मान लिया जाय. अनुभव प्रसूत रचना-प्रक्रिया के दो रूपों के बीच मूल्यगत अंतर को स्थापित करके स्वायत्ता और समानता का आग्रह अनुभव की अवधारणा में उलझने को बाध्य है. इस उलझन को सुलझाने के क्रम में ही अनुभव सिद्धांत-निर्माण का एथिक्स बन जाता है. गुरु अनुभव की मौलिकता को स्वीकार करते हैं पर सिद्धांत को आवश्यक मानते हैं. दलित सिद्धान्तकारों की स्वायत्ता एक नैतिक अर्थशास्त्र की प्रस्तावना करती है. यह नैतिक अर्थशास्त्र एक मनुष्य एक मूल्य वाली व्यवस्था है जहाँ कोई नैतिक अधिशेष मूल्य का शोषण संभव नहीं[10]. पर वास्तव में गुरु अनुभव की आरम्भिक और स्वाभाविक ऊर्जा को ज्ञानमीमांसक व्यवस्था के अंतर्भुक्त करते हैं. सत्य के दावे का यह ज्ञानात्मक एकाधिकार अनुभवों का अभिग्रहण एक ख़ास विश्वदृष्टि से करने लगता है. साहित्यिक और सैद्धांतिक उत्पादकों की भिन्नता का यह नैतिक आग्रह सत्य के प्रति साहित्य के दावे को निर्मूल करता है. यह एक किस्म के यांत्रिक यथार्थवाद को जन्म देती है. यह यांत्रिक यथार्थवाद साहित्य और कला की राजनीति को अद्वान्द्वात्मक और तात्कालिक मानता है. सिद्धांत निर्माण के लिए हद से हद इसकी उपयोगिता महज संवेदनात्मक होने में है. गुरु दलित साहित्य या साहित्य मात्र को विशिष्ट अनुभवों पर आधारित सौन्दर्यबोध की दृष्टि मानते हैं जिसका उपयोग सिद्धांत निर्माण के लिए ज़रूरी सार्वभौमिक का निर्देशात्मक स्तर होने की संभावना तक सीमित है.[11] इस प्रकार कलाकार सहज और आवयविक बुद्धिजीवी के सैद्धांतिक उत्पादन से बाहर हो जाता है.

वेलीवाड़ा रचना-प्रक्रिया की इस श्रेणीबद्धता के खिलाफ है. रोहित वेमुला की घटना के आलोक में स्पष्ट है कि न तो वाकणकर के अर्थों में मृत्युशोकगीत की सामूहिकता वेलीवाड़ा है और न गुरु के अर्थों में समाज-वैज्ञानिक मात्र सत्य के गणराज्य का आवयविक बुद्धिजीवी है. वेलीवाड़ा नैतिक को राजनैतिक का विकल्प नहीं देखता. वहां राजनीति की नैतिकता से बनने वाला उत्पादकों का संगठन है. सांस्कृतिक श्रेणी-क्रम को चुनौती देने के लिए ज़रूरी है कि सम्पूर्ण सांकृतिक उद्योग के तर्क का निषेध संभव हो. वेलीवाड़ा सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक क्रान्ति का त्रिविमीय चरित्र है. अनुभवप्रसूत यह वेलीवाड़ा जितना तार्किक है उतना ही वास्तविक भी.

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मार्तण्ड  प्रगल्भ

मार्तण्ड प्रगल्भ

छात्र राजनीति और संस्कृति-कर्म में व्यस्त रहने वाले मार्तण्ड प्रगल्भ जे.एन.यू. के भारतीय भाषा केंद्र से पी.एच.डी. हैं. फ़िलहाल  रेडिकल नोट्स कलेक्टिव  के साथ कार्यरत हैं. उनसे mpragalbha1@gmail.com पर संपर्क संभव है

 

 

 

सन्दर्भ:

[1]  रोहित वेमुला का पत्र (१८-१०-२०१७ को ब्राउज़)

[2] डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वांङ्मय, खंड-१, पृष्ठ: ७८. डॉ. अम्बेडकर प्रतिष्ठान, नई दिल्ली- २०१३.

[3] गोपाल गुरु, गोपाल गुरु-सुन्दर सरुकई; क्रैक्ड मिरर: अन इंडियन डिबेट ऑन एक्सपीरियंस एंड थ्योरी ; पृष्ठ ९९; ओयूपी, दिल्ली- २०१२.

[4] देखें, मई १९५० वैशाख अंक, महाबोधि सोसाइटी जर्नल. अम्बेडकर ‘बुद्धा एंड द फ्यूचर ऑफ़ हिज रिलिजन’. बौद्ध धर्म विषयक उनके अन्य लेखन में भी उक्त विचारों को देखा जा सकता है.

[5] ‘elite’ शब्द पर टिप्पणी करते हुए ‘जेल नोटबुक’ के संपादक ने नोट किया है:- “élite.” As is made clear later in the text, Gramsci uses this word (in French in the original) in a sense very different from that of the reactionary post-Pareto theorists of “political élites”. The élite in Gramsci is the revolutionary vanguard of a social class in constant contact with its political and intellectual base. पृष्ठ- ३३४, पाद टिप्पणी-१८, अंतोनियो ग्राम्शी, सेलेक्सन्स फ्रॉम द प्रिज़न नोटबुक्स. (सं. और अनु.) क़ुइन्तिन होअरे और ज्योफ्रे नोवेल स्मिथ. ओरिएंट ब्लैकस्वान, दिल्ली- १९९६.

[6] वही

[7] वही. पृष्ठ-३३५

[8] “It should be noted how the deterministic, fatalistic and mechanistic element has been a direct ideological “aroma” emanating from the philosophy of praxis, rather like religion or drugs (in their stupefying effect). It has been made necessary and justified historically by the “subaltern”character of certain social strata.” पृष्ठ-३३६.

[9] देखें: मिलिंद वाकणकर, सबॉलटर्निटी एंड रिलिजन : प्रीहिस्ट्री ऑफ़ दलित एम्पावरमेंट इन साउथ एशिया. रूटलेज: लन्दन, २०१०. मिलिंद वाकाणकर के विचारों की विस्तृत समीक्षा के लिए देखें:  (मार्तंड प्रगल्भ, दलित आधुनिकता और कबीर की सहज साधना पर कुछ विचार , रैडिकल नोट्स. ) २०-१०-२०१७ को ब्राउज़.

[10] गोपाल गुरु, गोपाल गुरु-सुन्दर सरुकई; क्रैक्ड मिरर: अन इंडियन डिबेट ऑन एक्सपीरियंस एंड थ्योरी ; पृष्ठ- २०६; ओयूपी, दिल्ली- २०१२

[11] वही, पृष्ठ २३.

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तुलसी के हनुमान् अका फ़ादर कामिल बुल्के: मार्तंड प्रगल्भ

बुल्के के लिए नैतिकता पूरी तरह धार्मिक थी। वह राज्य के विकास के साथ इसी धार्मिकता को स्वर्ग के राज्य में रूपांतरित देखना चाहते थे। अंबेडकर की तरह यहाँ भी नैतिकता और धार्मिकता में कोई फर्क नहीं था। धर्म स्वयं में पवित्र और सार्वजनीन नैतिकता है। विश्वबंधुत्व स्वयं नैतिकता है। विश्वबंधुत्व की इस पवित्र नैतिकता के दर्शन बुल्के को तुलसी के मानस में होता है। वह बुद्ध के बदले उत्तरभारत की जनता के बीच इस पवित्र सामान आचार-संहिता की पूर्व-उपस्थिति और उसके सर्वोत्तम विकास का पूर्व-स्वप्न तुलसीदास के यहाँ देखते हैं। उनके लिए तुलसी स्वयं एक आश्चर्य थे। वैसे ही जैसे इवोर ब्राउन के लिए शेक्सपियर. #लेखक 

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Camille Bulcke

बुल्के की रामकथा : आकर्षण और इतिहास

By मार्तंड प्रगल्भ

फ़ादर कामिल बुल्के को केदारनाथ सिंह तुलसी के हनुमान् की संज्ञा देते हैं। यह एक अद्भुत बिम्ब है। आखिर क्या सोचकर कवि केदारनाथ ऐसा कहते हैं? भक्ति के आदर्श हनुमान्! तुलसीदास से पहले भक्त के रूप में हनुमान् की कोई विशेष छवि नहीं थी। महाकवि तुलसी का ही प्रताप था कि उन्होंने प्रतापी हनुमान् को भक्त शिरोमणि में बदल दिया! खुद राम के चरित में “अग्या सम न सुसाहिब सेवा” के भक्ति आदर्श को चरितार्थ करने वाले हनुमान्! आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले हनुमान्! माता सीता के भी परम सेवक और हृदय में युगल भगवान् की छवि हमेशा धारण करने वाले हनुमान् खुद भी उस चित्र में शामिल हो गए थे। भक्त से स्वयं लोकमानस के भगवान् में बदल जाने वाले हनुमान्। चिर सानिध्य के आदर्श। यह स्वयं तुलसी की आत्म छवि थी। तुलसीदास को स्वयं के आदर्श पर कितना विश्वास था इसका पता हमें ‘विनयपत्रिका’ या ‘हनुमन‍्‍बाहुक’ जैसी रचनाओं से चलता है। भक्त की यह आत्म छवि तुलसीदास के द्वारा उत्तर भारत की हिंदी पट्टी को दिया गया अनुपम और अद्वितीय उपहार था। शुक्लजी ने भक्ति के इसी आदर्श को सैद्धांतिक रूप दिया था। जिस सेना की सहायता से अन्धकार पर विजय पानी थी उस सेना के सबसे मधुर चरित्र हनुमान् थे। भरत भले ही राजा के आदर्श थे पर साधारण मनुष्यों के तो हनुमान् ही थे। जो सेना भक्ति के धागे से बंधी होगी वही चिरविजयी होगी! सच्चाई का धर्मचक्र हमेशा गतिशील रहेगा अगर शासक भरत जैसा भक्त हो और जनता के हृदय में हमेशा भरत मिलाप का दृश्य। भक्ति के लिए आत्मदैन्य का चरमबोध और एक मिशनरी व्यक्तित्व दोनों जरूरी हैं। शुक्ल जिसे भक्ति का सैद्धांतिक आधार प्रदान कर रहे थे उसे बुल्के ने जीवन में उतार लिया था। परन्तु दोनों भिन्न दिशाओं से चलकर इस आदर्श तक पहुंचे थे। शुक्ल भारतीय आत्म की खोज करते हुए और बुल्के ईसाई आत्म की तलाश में चलते हुए। दोनों ही नैतिकता और सार्वभौमिकता का स्वयं में एक अनिवार्य संबंध मानते थे। व्यावहार की नैतिकता स्वभावतः सार्वभौमिक मूल्यों की तरफ ले जाने वाली होनी चाहिए। ऐसा नहीं कि दोनों में फर्क नहीं है। शुक्ल होते तो बुल्के की आलोचना करुणा और दुःख के अतिवाद के सन्दर्भ में करते। जबकि बुल्के शुक्ल के रसवाद की हरसंभव आलोचना में रत थे। दोनों के अवतारवाद के आदर्श में अंतर था। बुल्के के लिए ईश्वर मनुष्य के रूप में था, केवल लीला या अभिनय का पात्र नहीं। शुक्ल के लिए बाहरी विश्व का प्रपंच रसों की व्यवस्था ही है, जहाँ स्वयं रस स्वरूप ईश्वर है। बुल्के ईश्वर की इस रसवादी व्याख्या से संतुष्ट नहीं थे। उनका विश्वास था कि सांसारिक व्यावहार में एक ऐसी समाज व्यवस्था संभव है जहाँ करुणा और प्रेम के सहारे ईश्वर का राज्य वास्तविक हो। बुल्के की आस्था में एक ‘सांप्रदायिक गंध’ थी, जिसे शुक्लजी हमेशा की तरह अपनी आलोचना का निशाना बनाते। परन्तु बुल्के ने जितनी सेवा चर्च के लिए की थी, उतनी ही भक्ति रामकथा, तुलसी और हिंदी की भी की थी। बुल्के के लिए इन दोनों में कोई अंतर्विरोध नहीं था। शुक्ल इस चरित्र की आलोचना कैसे करते यह सोचना ज्यादा कठिन नहीं है। शुक्लजी का विश्वास आधुनिक- पूर्व के सामाजिक सम्बंधों की सामूहिकता और उसकी बनी बनाई व्यवस्था की क्रियाशीलता में था। सर्वथा नई व्यवस्था शुक्ल को वास्तविक और व्यावहारिक नहीं लगती थी। हमने देखा था कि विल्सन, मोनिर विलियम्स या ग्रियर्सन के यहाँ भी करुणा, नैतिकता और संघबद्ध धर्म की समरूपता के चलते बौद्ध और ईसाई धर्मों का एक नैकट्य निरुपित किया गया था। सामान्यतः भक्ति बौद्ध ज्ञानवाद में करुणामय ईश्वर का संयोग था जिसका वास्तविक मनुष्य रूप ईसामसीह में उन्हें दिखाई देता था। ग्रियर्सन, शुक्ल जी और बुल्के तीनों वैष्णव भक्ति और तुलसीदास की सर्वोच्चता के प्रति एकमत से सहमत हैं। सबसे श्रेष्ठ भाव के रूप में करुणा को नकारना किसी के लिए संभव नहीं था। ईश्वर के अनंत करुणानिधान तुलसी और भवभूति दोनों का आदर्श था। शुक्ल व्यवहार में अद्वैत को स्वीकार्य नहीं मानते थे। शुक्लजी के लिए अद्वैत प्रक्रिया का निष्कर्ष है स्वयं प्रक्रिया में अद्वैत नहीं हो सकता। शुक्ल रस निष्पत्ति में आलाम्बनत्व धर्म की सार्वभौमिकता को स्वीकार करते थे और इसलिए साधारणीकरण के किसी सम्प्रदायवाद के खिलाफ थे। क्योंकि वहां आश्रय के तादात्म से साधारणीकरण संभव माना जाता है। प्रक्रिया पर जोर देने से शुक्ल जी के यहाँ आश्रय और पाठक या सहृदय के ध्रुवीकरण से तो रस सिद्धांत को मुक्ति तो मिली लेकिन वहां से वास्तविक मनुष्य गायब हो गया। वास्तविक, क्रियाशील, व्यावहारिक मनुष्य केवल भावों की रस निष्पत्ति से संतुष्ट नहीं हो सकता था, उसे वास्तविक मुक्ति भी चाहिए थी। यह मुक्ति शुक्लजी के लिए नैतिकता और धर्म नियमों के क्षेत्र में ही संभव थी। राजनीतिक जीवन और साहित्य का क्षेत्र इन दोनों के बीच संबंध शुक्लजी के लिए केवल पैशन का था, यह हमने पीछे देखा है। बुल्के के लिए जीवन, धर्म और कर्म तीनों की एकता उन्हें वास्तविक जीवन में अनंत करुणानिधान का सन्देश लगती थी। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में संत कवि की भूमिका में गीदो गैज़ेल की कविताएँ और उनका संत जीवन चरित फ्लेमिश-डच सांस्कृतिक और राष्ट्रवादी आंदोलन में बहुत प्रभावशाली भूमिका निभाता था। कामिल बुल्के का युवा जीवन इस सांस्कृतिक नेतृत्व से अभिभूत था।

गीदो गैज़ेल प्रगीत और प्रकृति के कवि थे। नवरोमानवाद और आध्यात्मिकता के साथ-साथ बीसवीं शताब्दी के अंवागार्द कवियों पर भी उनका काफी प्रभाव था। सूक्ष्म से सूक्ष्म भावों में अर्थ की तलाश, एक ‘पूज्य बुद्धि’ और मननशील मन की मांग करती है। गीदो की कविताएँ इन दोनों का समन्वय करती थीं। मध्यवर्गीय परिवार में पले-बढ़े गीदो के पिता एक कुशल माली थे। ईसाई परिवेश और कृषक जीवन का मधुर सौन्दर्य इन दोनों के बीच गीदो की आरंभिक अनुभूतियों का निर्माण हुआ था। परिवार को लेकर और खासकर अपनी माता को लेकर गीदो अनन्य प्रेम और श्रद्धा रखते थे। फ्लेमिश आन्दोलन से जुड़ने के क्रम में ही गीदो के छात्र जीवन में उच्च आदर्शों के क्रियान्वयन के लिए जीवन के कठोर निर्णय का वक़्त भी उनके सामने आया। पिता के निर्देश में उन्हें ईश्वर का निर्देश मिला और उन्होंने पुरोहित का जीवन अपने लिए चुन लिया। कविता, साहित्य और मातृभाषा के सम्मान की लड़ाई तथा पुरोहित कर्म की एकता उन्हें ईश्वर का संकेत मालूम पड़ती थी। गीदो हमेशा पुरोहित-कवि-फ्लेमिश के रूप में नौजवान कवियों, देशप्रेमियों और पुरोहितों के बीच लोकप्रिय रहे थे। उनके लिए कला, ‘कला नहीं बल्कि ईश्वर की भेंट’ थी। यंत्रणाओं और दुखों के बीच कला गीदो के लिए एक फलदायी क्रिया थी। करुण, शांत और आस्थावान फ्लेमिश-डच कृषक जीवन के प्रगीत लोगों में प्रेरणा और सुख का संचार करती थी। कविता के अलावा गैज़ेल ने पत्रकारिता, अनुवाद और लोकगीतों के संग्रह का काम भी किया था। उनकी तुलना कई बार अंगेज कवि हॉपकिंस के साथ भी होती है। हॉपकिंस के साथ गैज़ेल के व्यक्तित्व का मेल केवल प्रगीतकार और पुरोहिती का ही नहीं बल्कि यौन भावनाओं के संकट का भी है। दोनों ही एक सारसंग्रही प्रयोगकर्ता भी थे। गैज़ेल की विश्वदृष्टि में एक सर्ववादी चेतना और प्रयोग का साहस देख चर्च के उच्च पुरोहित वर्ग में एक विरोध भी था। प्रथम विश्वयुद्ध के अनंतर फ्लेमिश राष्ट्रवादी आन्दोलन और अवांगर्द कविता आन्दोलन के प्रेरणास्रोत के रूप में गैज़ेल जितना स्थानीयता से जुड़े थे उतने वैश्विक भी थे। गीदो की दो कविताएँ उनके काव्य संसार का कुछ कुछ परिचय दे सकती हैं :

“मैं था/ नहीं तब/ और, “तुम हो,/ मेरे बच्चे”/ ईश्वर ने कहा,/ और वह देखो!/ मैं हूँ!” दूसरा उदाहरण –

सरल है बहुत, वादा करना/ और बोना देश के बाहर खूबसूरत शब्द/ जैसे, खूब सवेरे बोलना/ मुर्गों का, ओह ! कितना अच्छा लगता/ महज शब्द के उच्चारित करने से नहीं/ फ़ायदा होगा अपने फ्लैंडर्स का ;/ जो चाहता है मदद करना हमारे लोगों की/ उसे प्रजनन का दुःख उठाना होगा।[1]

गीदों के इस व्यक्तित्व का बुल्के के अपने जीवन पर तुलसी से कम प्रभाव नहीं था। ऐसा भी कहा जा सकता है कि बुल्के के लिए गीदों प्रेम और तुलसी प्रेम अलग- अलग नहीं थे। कृषक जीवन और ईसाई आस्था के बीच पले-बढ़े बुल्के को गीदो की कविताओं में स्वयं की भावनाएं ही प्रतिबिंबित दिखती थीं। बुल्के अपने आरम्भिक जीवन को याद करते हुए हमेशा कहते थे कि “पिता से मुझे मिला जीवन की गुरुता का विशिष्ट बोध, वत्सल माता से मिली प्रफुल्लित व्यावहारगत स्वप्निलता”। गरीब और असहायों के प्रति असीम करुणा का बोध उनको मध्यवर्गीय कृषक जीवन के यथार्थ के करीब ले जाता था। उनके लिए पूरा गाँव एक संयुक्त परिवार की तरह ही था, बाद में एक वृहत्तर फ्लेमिश संस्कृति भी उन्हें एक बड़े संयुक्त परिवार की संस्कृति की तरह  दिखती थी। अपने गाँव के संस्मरण में बुल्के अपने ‘मसीहाई लोगों’ को लक्ष्य करते हुए लिखते हैं : “वे दुःख को चुपचाप सहते हैं क्योंकि मसीह का क्रॉस उनके लिए जीवंत वास्तविकता है। उनके जीवन के सब दिन ईश्वर के सान्निध्य में व्यतीत होते हैं और उनकी कठिनाइयाँ ईश्वर में लीन हो जाती हैं… वे कतई रहस्यवादी नहीं हैं… उनमें जीवन  के प्रति उदासीनता नहीं है। … सृष्टि से प्यार करने के चलते उनका जीवन सहज हो जाता है और वे सृष्टि के रहस्य समझ जाते हैं।”[2] इन ‘मसीही लोगों’ में बुल्के मध्यकाल की झलक देखते हैं। बालोचित भोलेपन की यह जीवनदृष्टि ऐसी है जिसमें ‘ईश्वर और जगत, प्रकृति और भगवत् कृपा में कोई द्वंद्व नहीं’ है। विद्यार्थी जीवन के आरम्भ से ही संत पौलुस के पत्रों में उनकी असीम रूचि थी। भारत आने के पहले उन्होंने आइन्स्टीन के सापेक्षतावाद और उच्च गणित का भी विशेष अध्ययन किया था। जर्मन भाषा के किसी ग्रन्थ में मानस के कुछ उद्धृत अंशों को पढ़कर उन्हें एक अद्वितीय अनुभव हुआ और भारत के विषय में सबकुछ जान लेने की इच्छा जाग गयी। “जब से मैंने जर्मन भाषा में अनूदित हिन्दुओं के धर्मग्रन्थ रामचरितमानस से उद्धृत अंश पढ़े हैं, तब से मैं भारत के विषय में सबकुछ जान लेना चाहता हूँ। अरे हाँ, उन अंशों का सारांश था- पृथ्वी पर उसी व्यक्ति का जीवन धन्य है जिसको देखकर उनका पिता हर्षित हो। पिता पुत्र के सबंध की इतनी मर्मिक गहन अनुभूति अन्य किसी साहित्य में नहीं देखी है।”[3]

सन् १९३५ में जब बुल्के भारत आये उस समय भारत में भी भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन का ज़ोर था। बुल्के ने राष्ट्रीय सम्मान के संघर्ष को और भारतीयों की घोर दुर्दशा, दोनों का साक्षात्कार किया। अपने देश की राजनीतिक स्थिति से तुलना करते हुए बुल्के लिखते हैं, “मुझे विश्वास हो चला है कि भारतीयों ने अंग्रेज आकाओं को प्रसन्न रखने के प्रयोजन से अंग्रेजी पहनावा, भाषा और तौर तरीके भी अपना लिए हैं। बिलकुल मेरे देश के बुर्जुआ वर्ग की तरह।”[4] बुल्के शुरू से ही प्रखर सामाजिक चेतना, विद्या और आस्था के भीतर कोई अंतर्विरोध नहीं देखते थे। उनके अनुसार धार्मिक विश्वास केवल तर्क- वितर्क की चीज नहीं है। “मैं समझता हूँ कि भौतिकवाद मानव जीवन की समस्या हल करने में असमर्थ है। मैं यह भी मानता हूँ कि धार्मिक विश्वास तर्क-वितर्क का विषय नहीं है इतना ही निवेदन है कि मुझे ईसा की शिक्षा से प्रेरणा और सुख शांति मिलती है।”[5] यह बात बुल्के उनसे बार-बार पूछे जाने वाले इस सवाल के जवाब में कहते थे कि धर्म और ईश्वर तथा आधुनिक विवेकवाद का अविरोध वह कैसे देखते हैं। बुल्के के लिए परम दयालु ईश्वर में आस्था से बढ़कर जीवन में ‘आशावाद’ का कोई स्रोत नहीं था। बुल्के अपनी जीवन साधना के तीन घटक ईसा, हिंदी और तुलसीदास को मानते थे। वह इनके बीच कोई विरोध नहीं बल्कि एक गहरा अंतर्संबंध देखते थे। यह अंतर्संबंध उन्हें स्वयं ईश्वर का संकेत मालूम पड़ता था। भारत में आने की इच्छा को तुलसीदास की कविता में छिपे ईश्वरीय संकेत की तरह ही बुल्के ने ग्रहण किया था। रामकथा पर शोध के लिए प्रेरित करने वाले जिन तीन तत्वों का उल्लेख बुल्के करते हैं वे हैं, हिंदी प्रेम, तुलसी के प्रति श्रद्धा और डा. धीरेन्द्र वर्मा की उदारता। रामचरित मानस और तुलसी के बारे में जानकारी के लिए बुल्के रामचंद्र शुक्ल से भी विचार विमर्श कर आये थे। परन्तु ऐसा लगता है कि उन्हें बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के बदले इलाहाबाद का वातावरण ज्यादा पसंद आया था। हिंदी के साहित्यकारों के बीच बुल्के जल्द ही घुल- मिल गए थे। मैथिलीशरण गुप्त से जाकर उनके गाँव में ही मिल आये थे। महादेवी वर्मा से उनका इतना गहरा संबंध बन गया था कि वे उन्हें दीदी कहकर पुकारने लगे थे। इलाहबाद शहर के वातावरण में एक आधुनिक सार्वजनीनता बुल्के को पसंद थी। धीरेन्द्र वर्मा और माताप्रसाद जैसे शिक्षकों का उन्हें सान्निध्य मिला था। परिमल की बैठकों में भी बुल्के की शिरकत रहती थी। दूसरे शब्दों में कहें तो हिंदी की साहित्यिक दुनिया और हिंदी के विभागों के बीच बुल्के  की एक सक्रिय उपस्थिति थी। रांची के सेंट जेवियर कॉलेज में हिंदी के विभागाध्यक्ष रहते हुए कॉलेज को और अपने ‘मनरेसा हाउस’ के निजी पुस्तकालय को बुल्के ने देश विदेश के लिए आकर्षण का केंद्र बना दिया। बुल्के की स्नेहिल, आशीषमयी और प्रखर विद्वता की छवि के इर्द गिर्द हिंदी शोधार्थियों और अध्यापकों की एक मंडली ही बन गयी थी।

 हिंदी और तुलसीसेवा के काम का ही एक विस्तार बुल्के की लम्बी साइकिल यात्राएँ भी थी। रांची के आसपास के आदिवासी इलाकों में बुल्के अपने साइकिल के साथ निकल जाते, जहाँ वे ईसा और तुलसी के सन्देश सुनाते और उनकी रोजमर्रा की समस्याओं और कष्टों के समाधान का प्रयास करते। तथाकथित भोले-भाले, निरीह, सौम्य, सहज प्राकृतिक जीवन में रचे-बसे इन आदिवासियों में बुल्के को अपने गाँव के लोगों की छवि दिखती थी और वह स्वयं उनसे प्रेरणा ग्रहण करते थे। धीरे-धीरे झारखण्ड की कई बोलियों और भाषाओं के अध्ययन के साथ- साथ आदिवासी संस्कृति के अध्ययन के लिए बुल्के स्वयं एक शोध संस्था में बदलते गए। ये सारे काम उन्हें अपने पुरोहिती, धार्मिक कामों से अलग नहीं लगते थे। संघ भी बुल्के की इच्छाओं का कभी अनादर नहीं करता था। मूल ग्रीक से बाइबिल के ओल्ड और न्यू टेस्टामेंट का अनुवाद बुल्के ने अपनी आत्मा का पूरा जोर लगाकर किया था। अपने अनुवादों को संघ के बाकी पुरोहितों या भाइयों को वह सुनाते और उनकी प्रतिक्रिया के बिना आगे नहीं बढ़ते थे। बाइबिल के हिंदी अनुवादों का इतिहास कम से कम डेढ़ सौ साल पुराना तो था ही। परन्तु उन अनुवादों में बाइबिल के उच्च साहित्यिक गुणों का पूरा निदर्शन नहीं होता था। उनमें ज्यादातर कामचलाऊ प्रयास थे। बुल्के के लिए बाइबिल की आस्था उसके उच्च कलात्मक मूल्यों की आस्था भी थी। उन्हें विश्वास था कि मसीह का सन्देश व्यावहारिक रूप से भी प्रेम और करुणा से इतना भरा है कि एक बार उन भावों का सम्प्रेषण हो जाये तो कोई भी उसे अपने हृदय से नहीं निकाल सकता। बुल्के को अलग-अलग शहरों के संघ बंधुओं से बाइबिल के अनुवाद की श्रेष्ठता और उसकी सहज संप्रेषणीयता का सन्देश लगातार मिलता रहता था। आगे चलकर बुल्के की मृत्यु के बाद उनके स्मृति ग्रन्थ के लिए शमशेर बहादुर सिंह ने दिनेश्वर प्रसाद को संबोधित करते हुए ‘एक पत्र’ लिखा था। दिनेश्वर प्रसाद इसे ‘संस्मरणात्मक- आशंसात्मक’ पत्र की तरह याद करते हैं। शमशेर और बुल्के का परिचय इलाहबाद में ही शायद डा. रघुवंश के कारण हुआ था। शमशेर के अनुसार बुल्के, रघुवंश के बहुत ‘घनिष्ठ और हार्दिक विद्वान् मित्र’ थे। शमशेर लिखते हैं कि हिंदी के विद्वान मित्रों का संपर्क और स्वयं की “उनकी अपनी (एडवांस्ड) साहित्यिक सुरुचि, लगन और अनथक श्रम ने उन्हें (बुल्के) हिंदी साहित्य में दीक्षित किया था, विशेषकर भक्ति साहित्य और रामचरितमानस के अनेक गूढ़ तत्वों में। अगर मैं यह कहूँ कि भारतीय परिवेश में रामचरितमानस उनके लिए बाइबिल के न्यू टेस्टामेंट का दर्पण बन गया था, तो मैं शायद बहुत गलत न हूँगा।”[6] शमशेर बुल्के के ‘एडवांस्ड साहित्यिक सुरुचि’ से बखूबी परिचित थे। स्वयं शमशेर बाइबिल कई हिस्सों का साहित्यिक अनुवाद करना चाहते थे। “एक बार यूनानी भाषा सीखने का बाल प्रयास करते हुए एक पाठ में बाइबिल के उद्धृत अंश पढ़कर तीव्र इच्छा हुई थी कि इस आध्यात्मिक ग्रन्थ का आस्वादन तो मूल में ही किया जाये, तभी संतोष हो सकता है।”[7] शमशेर की यह आकांक्षा तो पूरी नहीं हो पाई पर बुल्के के अनुवाद से उन्हें लगभग मूल को पढ़ने जैसा ‘सुख और संतोष’ मिलता था।

निश्चित रूप से शमशेर को यह ‘सुख और संतोष’ स्वयं बाइबिल के पवित्र और महान् होने के बदले उसकी ‘प्रवाहमयता, सरसता और हृदय को छूने वाली’ साहित्यिक विशेषताओं के कारण मिलता था, शमशेर का ‘मन तृप्त हो जाता’ था। वह इसी पत्र में लिखते हैं कि उन्होंने कई बार बुल्के के अनुवाद पढ़े हैं और बार-बार पढ़ने की इच्छा होती है। इन अनुवादों से, “ईसामसीह का पूरा शहीदी चरित्र आँखों के सामने साकार हो उठता है। कैसी घोर विरोधी परिस्थितियों में कठमुल्ला, ढोंगी, पाखंडी तथाकथित धर्माचारियों के समक्ष मसीह की खरी शुद्ध आत्मा सूर्य के प्रकाश की तरह चमकती है। हिंदी में यह सब एक सफल अनुवाद के कारण ही संभव हुआ है।”[8] यह बाइबिल की साहित्यिक श्रेष्ठता के प्रति एक साहित्यिक आस्था थी। साहित्य के रूप में धर्मग्रन्थ के संपूर्ण इहलौकीकरण का यह प्रयास स्वयं आधुनिकतावाद की एक प्रमुख विशेषता थी। शमशेर और मुक्तिबोध दोनों ही मानस के उच्च साहित्यिक गुणों से परिचित थे। मुक्तिबोध के लिए मानस का सर्वश्रेष्ठ हिस्सा वह है जहाँ वह सामंती समाज की सीमाओं के भीतर मनुष्यता का विकास दिखाते हैं। मुक्तिबोध लिखते हैं, “तत्कालीन मानव संबंध, विश्वदृष्टि तथा जीवन मूल्यों के सर्वोच्च प्रतीक राम की मानवता हमें प्रभावित करती है। तुलसीदासजी तथा रामचंद्रजी की वह सचेष्ट आन्तरिकता (जो तत्कालीन आदर्शों से बनी हुई थी) हम पर छा जाती है। वे नियम-विधान, वे आचार-विचार, अब आज त्याज्य हो चुके हैं; किन्तु उनके भीतर जो तत्कालीन मानव-संबंध हैं उनको कहीं भी भंग न करते हुए, राम ने निषाद और गुह से भी आलिंगन किया, शबरी के बेर खाये, केवट से दोस्ती की, वनवासी असभ्यों को गले लगाया- तत्कालीन मानव- संबंधों का वास्तविक निर्वाह उन्होंने अपने इन्हीं आदर्श- क्षणों में किया। उनसे वे मानव संबंध अधिक घनीभूत ही हुए। निषाद निषाद ही रहा, गुह गुह ही, और राम का रामत्व अपने संपूर्ण सामंती मानवादर्शों में जगमगा उठा। तत्कालीन मानव-संबंधों के घेरे के भीतर मानवता की जितनी भी सर्वोच्चता संभव थी, उतनी तुलसीदास के राम में समा गयी। इसलिए तत्कालीन समाज के आदर्श चरित्र राम हैं। राम की इस आदर्शमयी आन्तरिकता के चित्र = उनकी भीतरी मानवता के शिखर- हमें आज भी द्रवीभूत करते हैं।”[9]

शुक्लजी के यहाँ साहित्यिकता और धार्मिकता की पृथकता और समानांतरता एक ही आचार- संहिता के दो पक्ष थे। जब धार्मिक ग्रन्थ के रूप में मानस पर गलत नैतिकता के समर्थन का आरोप लगता तो वह साहित्यिकता की बात करते थे और जब साहित्यिकता के आधार पर किसी को ख़ारिज करना होता तो नैतिक आचार-संहिता की बात करते थे। इन दोनों आचार संहिताओं की एकता कबीर की आलोचना में सबसे स्पष्ट थी। बुल्के के यहाँ दो भिन्न आचार संहिताओं का प्रशन नहीं था। वहां ‘कला नहीं ईश्वर की देन’ ही महत्वपूर्ण थी। कला और साहित्य की एडवांस्ड रुचियों में मानवतावादी विचारों की यह समकालीनता हिंदी में आधुनिकतावाद और पश्चिमी मार्क्सवाद की मानवतावादी धारा के साथ जुड़ी भी थी। यह न केवल स्व-भाव था और न केवल प्र-भाव। यह स्वाभाव और प्रभाव की वैश्विकता भी थी। बुल्के के परिमल प्रेम को इसी सन्दर्भ में देखा जा सकता है। बुल्के शुद्ध आत्मा के प्रकाश की वास्तविकता मसीह के सांसारिक राज्य में देखते थे। तुलसी की युगीन सीमा और श्रेष्ठता दोनों ही बुल्के के लिए इसी बात में थी कि तुलसी के साहित्य के भीतर वह सबकुछ मौजूद था जो स्वाभाविक रूप से मसीह को प्राप्त करने वाला है। तुलसी के यहाँ मसीह के यथार्थ का स्वप्न था। बुल्के के लिए यह यथार्थ स्वप्न से भी ज्यादा वैभवशाली और कारुणिक है। बुल्के के उच्च मूल्य वाले साहित्यिक अनुवादों में यही आस्था थी।

फ़िलहाल हम उनके शोध प्रबंध की ओर वापस लौटते हैं। हमने देखा था कि रामकथा को लेकर बुल्के की प्रेरणा तीन तत्वों से बनी थी- हिंदी प्रेम, तुलसी के प्रति श्रद्धा और डा. धीरेन्द्र वर्मा की उदारता। संघ से शोध की अनुमति मिलते ही बुल्के इलाहाबाद विश्वविद्यालय पहुंचे। शोध के विषय के रूप में डा. धीरेन्द्र वर्मा ने उन्हें मध्यकालीन ब्रजभाषा साहित्य पर काम करने का सुझाव दिया। बुल्के इस सुझाव को सुनकर चुप रह गए। धीरेन्द्र वर्म समझ गए थे कि यह विषय बुल्के की आत्मा के अनुरूप न था। उन्हें पता था कि बुल्के तुलसी से प्रेम करते हैं। इसलिए उन्होंने तुरंत ही दूसरा विषय सुझाया और कहा कि आप मानस की रामकथा पर काम कीजिये। माताप्रसाद गुप्त के निर्देशन में काम आरम्भ करने के बाद बुल्के ने रामकथा सम्बन्धी इतनी सामग्री जुटा ली कि ‘भूमिका’ को ही पूर्ण शोध बनाना पड़ा। इस प्रकार ‘रामकथा : उत्पत्ति और विकास’ के रूप में हिंदी में लिखा पहला शोध प्रबंध सामने आया।

‘रामकथा : उत्पति और विकास’ लगातार संशोधित और परिवर्धित होता रहा। सन् १९४९ में शोध प्रबंध जमा करने के बाद भी बुल्के रामकथा और रामभक्ति संबंधी सामने आने वाली हर नई जानकारी या उसके इतिहास को लेकर किसी नई प्रस्तावना का वैज्ञानिक विश्लेषण भी नए संस्करणों में जोड़ते चले गए। रामकथा के विकास को इतिहास और भूगोल के इतने बड़े फलक पर शोध की वैज्ञानिक वस्तुनिष्ठता और साहित्यिकता की पहचान के साथ विश्लेषण बुल्के से पहले किसी ने नहीं किया था। कृष्ण चरित और कृष्णभक्ति को लेकर प्राच्यविद्याविदों के बीच जितनी बहस हुई थी और उसके इतिहास निरूपण का जितना प्रयास हुआ था, उस हिसाब से रामकथा और रामभक्ति के विकास का निरूपण नहीं हुआ था। अकारण नहीं कि धीरेन्द्र वर्मा इसे ‘रामकथा का विश्वकोश’ कहते थे। शोध में बुल्के ने रामकथा के ऐतिहासिक विकासक्रम के निरूपण और मूल रामकथा संबंधी कई पुराने पूर्वग्रहपूर्ण निष्कर्षों से अपनी असहमति व्यक्त की है। बुल्के लिखते हैं कि रामकथा के मूलस्रोत संबंधी मतों में मूल का पता लगाने के लिए प्रायः विद्वानों द्वारा ‘दो या तीन स्वतंत्र वृत्तांतों’ की कल्पना कर ली जाती है। बुल्के के अनुसार इस प्रवृत्ति के मूल में दशरथ जातक संबंधी डा. वेबर का मत था। पुराने मतों का उल्लेख करते हुए बुल्के लिखते हैं : “रामकथा का मूल रूप बौद्ध दशरथ- जातक के गद्य में सुरक्षित है; इस जातक में सीता हरण और युद्ध वर्णन का अभाव है। अतः इन दोनों का आधार संभवतः होमर के काव्य में ढूंढना चाहिए, यह डा. वेबर का विचार है। श्री दिनेशचन्द्र सेन की धारणा है कि वाल्मीकि ने पहले पहल (दशरथ, रावण तथा हनुमान् संबंधी) तीन नितांत स्वतंत्र वृत्तांत मिलाकर रामकथा की सृष्टि की है। डा. यकोबी के अनुसार रामायण की कथावस्तु के स्पष्टतया दो स्वतंत्र भाग हैं- प्रथम भाग अयोध्या से संबंध रखता है और ऐतिहासिक घटनाओं पर निर्भर है; द्वितीय भाग की आधिकारिक कथावस्तु (सीताहरण तथा रावणवध) का मूल रूप वैदिक साहित्य में विद्यमान है। सीता, राम तथा रावण का व्यक्तित्व क्रमशः वैदिक सीता (कृषि की अधिष्ठात्री देवी), इंद्र तथा वृत्रासुर से विकसित हुआ है। सीताहरण का मूल स्रोत प्राणियों द्वारा गायों का अपहरण है तथा रावणवध वृत्तासुर- वध का विकसित रूप मात्र है।”[10]

बुल्के इन दो या तीन स्वतंत्र वृत्तांतों के सिद्धांत के बदले रामकथा की समस्त आधिकारिक कथावस्तु, न केवल राम का निष्कासन वरन् सीताहरण और रावणवध का भी एक ‘मूल ऐतिहासिक आधार’ मानना स्वाभाविक बताते हैं। इस प्रकार बुल्के के लिए एक मूल ऐतिहासिक घटना के आख्यान चरित काव्यों के आधार पर वाल्मीकि ने अपनी रचना की थी। बौद्ध त्रिपिटकों की ‘एकाध गाथाएं’ और महाभारत में द्रोण तथा शांतिपर्व की अत्यंत संक्षिप्त रामकथाएं उनके अनुसार वाल्मीकि-पूर्व प्रचलित रामकथा संबंधी आख्यान काव्य पर आधारित हैं। इनमें से स्वयं कोई भी मूल कथावस्तु नहीं है। ‘मूल ऐतिहासिक घटना’ से विकसित होते राम के चरित्र पर बाद में बौद्ध और भागवत धर्मों का प्रभाव पड़ा था। बौद्ध रामकथाओं में ‘दशरथ जातक की समस्या’ पर बुल्के ने विशेष ध्यान दिया है। उनके अनुसार ‘दशरथ जातक की रामकथा न केवल ब्राह्मण रामकथा का विकृत रूप है, वरन् उसका रचनाकाल वाल्मीकि के बहुत सी शताब्दियों बाद माना जाना चाहिए।”[11] बुल्के वाल्मीकि पूर्व रामकथा आख्यान को मूलतः ब्राह्मणीय रामकथा मानते हैं। इस मूल की विकृति दशरथ जातक की रामकथा है। संक्षिप्त और गद्यात्मक होने के चलते बुल्के इसपर वाल्मीकिकृत रामायण की कोई छाप नहीं देख पाते। इस आधार पर उन्होंने ये अनुमान लगाया कि यह वाल्मीकि रामायण पर नहीं बल्कि उसके पूर्व के रामाख्यान काव्य पर आधारित हो सकता है। इस प्रकार मूल प्राचीन ऐतिहासिक घटना से निकला मूल ब्राह्मण आख्यान काव्य और उसे महाकाव्यात्मक संगठन देने वाले हुए आदिकवि वाल्मीकि : बुल्के ने रामकथा की उत्पत्ति का निरूपण इसी क्रम में किया है। मूल ऐतिहासिक घटना संबंधी उनकी मान्यता इतनी प्रबल थी और उसमें उन्हें इतना विश्वास था कि वह अयोध्या की खुदाई से इसके निश्चित प्रमाण मिलने की आशा रखते थे। ‘मानस कौमुदी’ में बुल्के लिखते हैं “राम संबंधी प्राचीन गाथा साहित्य का आरम्भ ऐतिहासिक घटनाओं के आधार पर हुआ होगा…। यदि प्राचीन अयोध्या की खुदाई की जाए, तो यह सिद्ध हो जाएगा कि नवीं शताब्दी ईस्वी पूर्व में वहां एक नगर था। हाल में अपने देश के विख्यात पुरातत्त्वज्ञ डा. हंसमुख धीरज सांकलिया ने ‘रामायण : मिथ ऑर रियलिटी’ नामक पुस्तक में यह विचार प्रकट किया है कि कम से कम आठ सौ ई.पू. तक अयोध्या बसायी जा चुकी थी।”[12]

हम स्पष्टतः देखते हैं कि ऐतिहासिक चरितकाव्यों की ऐतिहासिकता के निरूपण का प्रयास देशी भाषा साहित्यों के इतिहास से होते हुए एक ठेठ ऐतिहासिक घटना के अनुमान तक पहुँच चुका था। मध्यकाल के ऐतिहासिक चरितकाव्यों के आधार पर इतिहास की वास्तविक घटनाओं तक पहुँचने के इस मार्ग की आलोचना उसी समय ‘हिंदी साहित्य का आदिकाल’ में द्विवेदीजी कर रहे थे। जहाँ द्विवेदी कथा की संरचना और मोटिव के सहारे आख्यान काव्यों से इतिहास की पुनर्रचना के बदले आख्यान काव्यों की ऐतिहासिक पुनर्रचना का प्रश्न सामने रखते हैं। बुल्के के सामने समस्या यह थी कि रामकथा के इतिहास में वाल्मीकि के रामायण की कथा का मूलस्रोत न तो वेदों में दिख रहा था, न जातक कथाओं में और न ही किसी ज्ञात ऐतिहासिक घटना में। प्राचीन इतिहास के इस धुंधलके के भीतर उन्होंने यही अनुमान स्थिर किया कि वाल्मीकि के रामायण का जो ढांचा प्राचीन और अर्वाचीन, देशी विदेशी रामायणों की मूलभूत एकता बनाने वाला है, वह किसी वास्तविक मूल ऐतिहासिक घटना पर आधारित है और जिसे वाल्मीकि ने अपने पूर्व प्रचलित लोक आख्यान काव्य से ग्रहण किया है। बुल्के के लिए यह सर्वाधिक विज्ञानसम्मत अनुमान था। एक वास्तविक ऐतिहासिक घटना का अनुमान जहाँ राम को अयोध्या से निकाला जाना, सीताहरण और रावण विजय मूलतः ऐतिहासिक घटनाएँ थीं। ठीक उसी तरह जैसे पृथ्वीराजरासो की मूल ऐतिहासिक घटनाओं की तलाश वैज्ञानिक पाठ निर्धारणों के ज़रिये किया जा रहा था। ‘मूल ऐतिहासिकता’ की रक्षा के लिए हनुमान् के आदिवासी या मूल निवासी उद्गम की कल्पना बुल्के के लिए असंगत नहीं थी। ‘आर्य-अनार्य’ युद्ध के रूपक के रूप में राम कथा की व्याख्या पहले से ही हो रही थी, वैसे ही जैसे पृथ्वीराजरासो का संबंध ‘हिन्दू-मुसलमान’ संघर्ष का अनिवार्य रूपक मान लिया गया था। हनुमान् ‘वानर गोत्रीय’ आदिवासी थे जिन्हें आगे चलकर रामकथा के अन्य आदिवासियों के साथ सचमुच का वानर मान लिया गया था। प्रचलित रामायणों में हनुमान् के ‘वानरत्व- विषयक विशेषणों’ का बाहुल्य देखकर वह इस अनुमान पर पहुंचे थे कि हनुमान् संबंधी यह धारणा वाल्मीकि के समय के पूर्व ही मान्यता पा चुकी थी।[13] उनके अनुसार प्रारंभ में हनुमान् को जो वायुपुत्र कहा गया वही उसकी कथा का आधार है। बुल्के वायुपुत्र शब्द के अनार्य मूल की ओर ध्यान दिलाते हैं जहाँ इसका अर्थ ऐन्द्रजालिक अथवा विद्याधर है। सुमग्ग जातक में वायुस्स पुत्त नामक विद्याधर का उल्लेख है जो वास्तव में जादूगर है। अन्यत्र भी इसका अर्थ जादूगर है जो हनुमान् के तीव्र बुद्धि संपन्न होने का एक प्रतीक भी है।[14] बुल्के के अनुसार हनुमान् के जन्म की कोई ऐसी कथा नहीं मिलती जो वाल्मीकि रामायण की कथा से बहुत स्वतंत्र और अलग रूप से निर्मित हुई हो। ‘वानर गोत्रीय’ का अर्थ यह है कि जिस मध्य भारतीय आदिवासी समाज के हनुमान् थे, उनका टोटेम ‘वानर’ था। झारखण्ड के उरांव, मुंडा आदि आदिवासी समाजों में ‘हेलेमान’ या ‘गाड़ी’ जैसे टोटेम से उन्हें अपनी धारणा को बल मिलता था। वाल्मीकि कृत रामायण से विकसित हनुमान् के चरित्र का विकासक्रम कुछ यूँ है-  वाल्मीकि कृत आदिरामायण में सुग्रीव के पराक्रमी तथा बुद्धिमान मंत्री (बुद्धिमत्ता और पराक्रम के मूल रूप में ) उसके बाद ‘चिरंजीवत्व’ (वरदानों में सबसे प्राचीन हनुमान् की कीर्ति से सम्बंधित), ब्रह्मचर्य (प्राचीनतम उल्लेख स्कन्द पुराण में ), शैव अवतार से होते हुए मध्यकालीन भक्ति में रामभक्त के रूप में पूर्ण विकसित चरित्र। इन विशेषणों का मूल स्रोत भी बुल्के के अनुसार आदिरामायण ही है परन्तु परवर्ती साहित्य में बढ़ते क्रम में है। हनुमान् की अंतिम विशेषता उनका देवत्व है। बुल्के दिखाते है कि ईसा की आठवीं शताब्दी के अनंतर हनुमान् को रुद्रावतार माना जाने लगा था। इसी के साथ ‘हनुमन् भक्ति’ की भावना का भी विकास शुरू हुआ जिसके प्रारंभिक साक्ष्य शैव ग्रंथों में ही उपलब्ध हैं। दसवीं से पंद्रहवीं शताब्दी के बीच हनुमन् भक्ति का पूर्ण विकास हुआ। पंद्रहवीं शताब्दी के बाद हनुमान् का ‘संकटमोचन’ रूप सबसे लोकप्रिय हुआ। अर्वाचीन साहित्य में उनकी महिमा क्रमशः बढ़ती गयी और उन्हें ‘पापमोचक, मुक्तिदाता भगवान्’ की उपाधि मिलती गयी। बुल्के इसमें तुलसी के महत्वपूर्ण योगदान को रेखांकित करते हैं (संकट सोच विमोचनी मूरती)। संकटमोचक, मुक्तिदाता, मंत्रदाता रूप का संबंध बुल्के प्राचीन ‘यक्षपूजा’ से जोड़ते हैं। बुल्के के लिए अत्यंत प्राचीन और गाँव- गाँव प्रचलित ‘यक्षपूजा’ की लोकप्रियता के साथ हनुमान् की लोकप्रियता का बनना स्वाभाविक था। बुल्के लिखते हैं “इस अत्यंत  प्राचीन पूजा पद्धति  से संबंध हो जाने पर हनुमान् की लोकप्रियता बहुत ही बढ़ गयी। और उस समय तक जिस उद्देश्य से और जिस रूप में यक्षों की पूजा होती रही अब उसी उद्देश्य और उसी रूप में महावीर हनुमान् की भी पूजा होने लगी। हनुमान् के संकटमोचन और द्वारपाल वाला रूप वीरपूजा से संबंध रखता है। प्राचीन वीरपूजा और हनुमत्पूजा के उद्देश्यों में जो सादृश्य है वह उपर्युक्त विकास की वास्तविकता को प्रमाणित करता है।”[15]

बुल्के के अनुसार हनुमान् के चरित्र के विकास में भक्ति और लोकपूजा रूपों का यह अद्भुत मेल जो पंद्रहवीं शताब्दी के बाद हुआ इन सब के मूल में वाल्मीकिकृत रामायण के कुछ मूल तत्त्व हैं। इसी प्रकार रामायण के अन्य चरित्रों और घटनाओं का भी विकास, विस्तार और विकृति के मूल तत्वों की एकता उन्होंने वाल्मीकि रामायण से ही निर्धारित की है। हनुमान् के मामले में रामकथा से पृथक किसी और कथा परंपरा का वाल्मीकि-पूर्व रूप के निर्धारण को बुल्के आवश्यक मानते हैं। और इस प्रकार हनुमान् भी एक ऐतिहासिक चरित्र ठहरते हैं।

बुल्के के पास एक आधुनिक और वैज्ञानिक शोध पद्धति थी। इस पद्धति के सहारे वह धर्म-मतों और कथाओं की विविधता को स्वीकार करते हुए उस विविधता के भीतर एकत्व स्थापित करने वाले एक मूल ढांचे की खोज करते हैं। मूल ढांचे की यह खोज इसके इहलौकिक कारण की तलाश थी। रामकथा की व्यापकता और भारतीय उपमहाद्वीप के साथ-साथ दक्षिण पूर्व के एशियाई देशों में मिलने वाली इसकी प्रचुर विविधता को नकारना किसी के लिए भी संभव न था। रामकथा के आधार पर विकसित रामकथा का ठोस वस्तुगत आधार इतिहास में जरूर होना चाहिए। बुल्के इतिहास के इसी प्रश्न के साथ शोध में प्रवृत्त हुए थे। शोध की ओर प्रवृत्त करने वाले तीन तत्त्वों में तुलसी के प्रति अगाध श्रद्धा शायद सबसे महत्वपूर्ण थी और उन्होंने शोध भी शुरू किया था मानस की रामकथा पर ही। पर भूमिका के लिए इकट्ठी की गयी सामग्री ने उनके शोध प्रश्न को नए प्रकाश से आलोकित कर दिया। रामकथा की उत्पत्ति और विकास का यह दीर्घ इतिहास उसकी दीर्घकालीन लोकप्रियता और व्यापकता का स्वयं प्रमाण थी। बौद्ध जातकों आदि में जो स्वीकार्य ऐतिहासिक आख्यान के मूल तत्त्वों से विकृति थी उसी कारण उनकी लोकप्रियता धीरे धीरे कम होती गयी, बुल्के को अपने इस अनुमान की निरर्थकता का बोध शायद था। इसलिए अपने अनुमान की पुष्टि के लिए उन्होंने अलोकप्रियता के दो और कारण गिनाये। एक उनकी भाषा (पाली, चीनी आदि) दूसरी इनकी विधा (पद्य)! सारतः यह प्रमाणित हुआ कि मूलकथा ब्राह्मणीय कथा थी, जैसे जैसे ब्राह्मणीय धर्म स्वयं लोकप्रिय वैष्णव धर्म में बदलता गया वैसे वैसे रामकथा से रामभक्ति कथा के रूप में वह विकसित होता गया। बुल्के का हिंदी प्रेम उनके संस्कृत प्रेम से अलग नहीं था। उन्हें भारतीय संस्कृति और संस्कृत भाषा के आपसी ‘एकत्व’ का अहसास था। हिंदी को वह संस्कृत की पुत्री ही मानते थे। संस्कृत केन्द्रित भारतीयता बुल्के को कल्पित प्रतीत नहीं हुई। विविधताएँ उनके लिए एक संस्कृत केंद्र से संकेंद्रित वृत्तों के रूप में विकसित होती गयी थी। शोधकार्य की सामग्री जो अधिकांशतः संस्कृत में ही उपलब्ध थी, उनके सामने बुल्के को पाली या चीनी की अलोकप्रियता भी एकदम स्वाभाविक लगती थी। वाल्मीकि रामायण के राम के चरित्र में बुद्ध के प्रभाव को बुल्के अस्वीकार नहीं करते परन्तु वह प्रभाव वाल्मीकि की साहित्यिक प्रतिभा में निहित था जिसने बुद्ध के लोकप्रिय करुण रूप को राम के चरित्र में समाहित कर लिया था। महाभारत के ‘बुद्ध राम संवाद’ की तरह वाल्मीकि रामायण में कहीं भी बुद्ध का कोई चरित्र नहीं है। केवल एक बार बुद्ध का उल्लेख हुआ है ‘जाबालि’ वृत्तान्त के अंतर्गत जहाँ राम बुद्ध को चोर और नास्तिक कहते हैं।[16] इसके अलावा बुद्ध संबंधी श्लोक न तो गौड़ीय पाठ में मिलता है और न ही पश्चिमोत्तरीय पाठ में। “अतः आदि रामायण में न तो बुद्ध का कोई उल्लेख हुआ था और न बौद्ध धर्म के प्रत्यक्ष प्रभाव का कहीं भी असंदिग्ध निर्देश मिलता है।”[17] परोक्ष प्रभाव के प्रश्न का निराकरण उन्होंने दो अनुमानों के आधार पर किया। महाभारत में रामायण की अपेक्षा जो कहीं अधिक ‘कटुभाव, उग्र रणोत्सुकता, घोर युद्ध, अदमनीय विद्वेष’ आदि दिखाई देते हैं उसका कारण बौद्ध धर्म का प्रभाव नहीं वरन् उसकी भौगौलिक विशिष्ट अवस्थिति है। महाभारत की घटना पश्चिम में हुई थी जबकि रामायण की कौशल प्रदेश में, ‘जहाँ सभ्यता और संस्कृति का विकास आगे बढ़ चुका था’। इस तरह करुणा और अहिंसा जो कि सभ्यता और संस्कृति के आगे बढ़े हुए भाव हैं, वे आदिकवि को बौद्धों के प्रभाव के चलते नहीं वरन् स्वाभाविक रूप से प्राप्त था! दूसरा अनुमान और भी महत्त्वपूर्ण है। बुल्के कहते हैं कि रामायण के रचनाकाल में कौशल में बौद्ध धर्म का पर्याप्त प्रचार हो गया था। वह लिखते हैं: “अतः यह असंभव नहीं कि वाल्मीकि ब्राह्मण धर्म के प्रभाव में रहते हुए भी परोक्ष रूप से बौद्ध आदर्श से प्रभावित हुए थे। सीता का हिंसा के विरुद्ध भाषण (रौद्रं पर प्राणाभि हिंसनम् आदि ), जो बौद्ध अहिंसा का स्मरण दिलाता है, प्रक्षिप्त माना जा सकता है। लेकिन राम का अत्यंत शांत और कोमल स्वाभाव, उनकी सौम्यता आदि ध्यान में रखकर स्वीकार करना पड़ता है कि वे मुनि पहले हैं, क्षत्रिय बाद में। अतः इनके चरित्र चित्रण में किंचित बौद्ध प्रभाव देखना निर्मूल कल्पना नहीं प्रतीत होती है।”[18]इस प्रकार बुल्के राम के चरित्र पर ‘किंचित् बौद्ध प्रभाव’ स्वीकार करते हुए दशरथ जातक की समस्या का जो समाधान प्रस्तुत करते हैं, वह बुल्के के आतंरिक अंतर्विरोधों को भी स्पष्ट करता है। भारत के लोकप्रिय धार्मिक रूपों के बीच बौद्ध धर्म को ‘मूल भारतीयता’ के प्रश्न से जोड़ने वाली एकदम विपरीत प्रवृत्ति का पता हमें अम्बेडकर के यहाँ मिलता है। इस विषय पर थोड़ी और चर्चा हम आगे करेंगे।

वाल्मीकि कृत आदि रामायण से विकसित होती रामकथा का सर्वोच्च रूप रामभक्ति और तुलसीदास में बुल्के दिखाते हैं। अनेक रामायण उस एक रामायण का विकास है जो स्वयं लोक आख्यान के रूप में एक ऐतिहासिक घटना के सुदृढ़ आधार पर विकसित हुआ था। एक प्रकार से यह महाकाव्यात्मक एकता थी। इस एकता के वाहक बुल्के के अनुसार ‘काव्योपजीवी कुशीलव’ होते थे। इन कुशीलवों का काम होता था कि वे आदि रामायण की कथा समस्त देश में घूम घूमकर प्रचारित करें और इसी के सहारे जीविकोपार्जन करें। आधुनिक विद्वान् इसे संस्कृत शास्त्रीय काव्य की सार्वदेशिक संस्कृति से जोड़कर देखते हैं।[19] शेल्डन पोलॉक संस्कृत की सार्वदेशिक संस्कृति को राज्य और काव्य के संबंधों के माध्यम से देखने की कोशिश करते हैं। संस्कृत काव्य और राज्य की सार्वदेशिक संस्कृति के साथ साथ प्राकृत और अपभ्रंश की अर्द्ध सार्वदेशिक संस्कृतियों का प्रभाव हज़ार ईस्वी के आसपास देशी भाषाओं की ‘स्थानीयता और सार्वदेशिकता’ की आत्माभिव्यक्ति के दबाव के चलते समाप्त हो गया। पोलॉक इसे महाकाव्यों की स्थानीयता के साथ बनने वाली देशी भाषाओं की सहस्त्राब्दी के रूप में व्याख्यायित करते हैं। बुल्के ने भी ध्यान दिलाया था कि आधुनिक भारतीय भाषाओं के पहले पहल लिखे गए काव्यों में रामकथा या रामायण ही थी। बुल्के की अपेक्षा पोलॉक अपने तथ्यों को ज्यादा ठोस और वस्तुनिष्ठ बताते हैं, जहाँ वे काव्य के साथ साथ दक्षिण पूर्व एशिया में विस्तृत शिलालेखों और अभिलेखों का साक्ष्य भी प्रस्तुत करते हैं। इस प्रकार काव्य और राज्य के सम्मिलित इतिहास के लिए पोलॉक के पास ज्यादा ठोस आधार है, जिसके सहारे वह धर्म के इतिहास से मुक्त इतिहास दृष्टि का विकास करना चाहते हैं। बुल्के ने आधुनिक भारतीय भाषाओं में रामकथा की व्यापकता का कारण भक्ति के विकास को बताया था। बुल्के की रामकथा के विकास का द्वितीय सोपान वह था जहाँ रामकथा का आदर्श, क्षत्रिय चरित्र मात्र न रहकर विष्णु की अवतारलीला के रूप में परिणत हो गया था। बौद्धों और जैनियों के साहित्य को छोड़कर बुल्के राम के इस रूप को सर्वस्वीकृत मानते थे। परन्तु इस द्वितीय सोपान में जनता की धार्मिक चेतना के भीतर राम के लिए कोई विशेष आग्रह न था। न ही इस समय तक रामभक्ति का अविर्भाव हुआ था। धार्मिक साहित्य की अपेक्षा इस दूसरे सोपान में तत्कालीन ललित साहित्य के भीतर ही रामकथा की व्यापकता और लोकप्रियता मिलती है। ललित साहित्य अधिकाशतः ‘शास्त्रीय संस्कृत काव्य’ की परंपरा थी। यहाँ राम का चरित्र साहित्यिक था, धार्मिक नहीं। बुल्के ध्यान दिलाते हैं कि “रामभक्ति के आविर्भाव के पूर्व रामकथा का यह साहित्यिक रूप विदेश में फैल गया और उसपर बाद में रामभक्ति का प्रभाव नहीं पड़ा, इसलिए समस्त विदेशी रामकथा साहित्य में रामभक्ति का प्रायः अभाव है।”[20] इस तरह विदेशों में रामकथा का प्रसार धार्मिक कम साहित्यिक ज्यादा था।

रामकथा के विस्तार को कुछ विद्वान एक ही कथा का अलग-अलग संस्कृतियों में इम्प्रोवाईजेशन होना बताते हैं, जिसमे राजनीतिक सत्ता और लोक संस्कृति दोनों की भूमिका थी। कुशीलवों के कव्योपजीवी वर्ग के साथ पांडुलिपियों की नक़ल की तकनीक, राज्य निर्मित शिलालेखों- अभोलेखों का परम्परित आदर्श मॉडल आदि मिलकर कथाओं का एक सुनिश्चित तंत्र बनाती थी। लोकमानस के बीच अगर कथा के धार्मिक रूपों का अभाव था भी तब भी यह नहीं कहा जा सकता कि साहित्य नितांत अधार्मिक था। कथाओं का सुनिश्चित तंत्र लोकमानस, सत्ता और काव्य के रिश्तों को बनाने वाले एक सक्रिय काव्योपजीवी वर्ग पर निर्भर करता था। इस वर्ग का जीविकोपार्जन मुख्यतः राज्यसत्ता या धर्म संस्था पर निर्भर करता था और कहना न होगा कि बदले में इन सत्ता संस्थाओं को अपनी जनस्वीकृति और लोकप्रियता के लिए इन वर्गों पर निर्भर होना पड़ता था। इसलिए राज्य और धर्म संस्था के अपने हितों से भी ये कथाएं अछूती नहीं थीं, उनमें प्रक्षेप और परिवर्तन होता रहता था और कहीं-कहीं एकदम नए रूपों का निर्माण हो गया था।

रामकथा की लोकप्रियता आरम्भ से ही इतनी थी कि उसे विष्णु का अवतार, बौद्ध धर्म में बोधिसत्व तथा जैन धर्म में आठवें बलदेव की तरह स्वीकार किया गया था। संस्कृत शास्त्रीय ललित-साहित्य के भीतर वाल्मीकि की कथा का साहित्यिक रूपांतरण और उसका विदेशों में विस्तार और अंत में भक्ति के साथ जुड़कर लोकप्रिय धार्मिकता के सर्वोच्च रूप में विकसित होना। संक्षेप में रामकथा की उत्पत्ति और विस्तार की कहानी यही थी। इस विकास की मौलिक एकता के दोनों ध्रुवों पर, रामकथा के विकास, प्रसार और विविधता को आतंरिक एकता और संगति प्रदान करने वाले दो महाकवि थे। यह नेहरू युगीन अनेकता में एकता के मॉडल से अभिन्न है। अकारण नहीं कि बुल्के हिंदी भाषा का एक ठोस संस्कृत आधारित मानक बनाने के प्रबल पक्षधर थे।

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हुसैन की रचना

हिन्दू धर्म और अवतारवाद

बुल्के बराबर कहा करते थे कि वर्षों तक संस्कृत और हिंदी साहित्य पढ़ते-पढ़ते उनका मन पूरी तरह भारतीय हो गया है। लोगों की नजरों में बुल्के आधुनिक संत की तरह थे। आधुनिक भारत के निर्माण का उद्देश्य बुल्के के अनुसार प्राचीन और नवीन का समन्वय होना चाहिए। यह बात उन्होंने ‘हिंदी के प्रति हिंदी भाषियों का कर्तव्य’ बतलाते हुए कही थी। भाषा आन्दोलनों की उग्रता को लक्ष्य करते हुए उन्होंने कहा कि यह उग्रता निरे अंग्रेजी विरोध के कारण है। भाषा का सम्मान और मानसिक सांस्कृतिक जागरण एक दूसरे से अलग नहीं हो सकते। उन्होंने कहा कि अहिंसक सत्याग्रह हमारा कर्तव्य है। हिंदी भाषा उनके लिए एक ‘संगठित शक्ति’ थी। उत्तर भारत के विभिन्न बोलियों के सम्मान की लड़ाई को बुल्के वहीं तक स्वीकार करते थे जहाँ तक यह लड़ाई हिंदी भाषा की ‘संगठित शक्ति’ को बढ़ाने में मददगार हो। उन्होंने कहा कि हिंदी की ‘संगठित शक्ति’ अगर बोलियों में बिखर जाये तो उसका परिणाम उत्तर भारत के लिए बहुत घातक होगा। हिंदी भाषा और साहित्य के पिछले चार सौ सालों के इतिहास में इस ‘संगठित शक्ति’ का इतिहास भी वह देखते थे। फ्लेमिश जातीयता की तरह विकसित होती एक हिंदी जातीयता ! नए पुराने के समन्वय का निर्णय उनके लिए कभी उग्र नहीं हो सकता था। उन्होंने कहा कि भारत में इतिहास कभी भी जड़ नहीं था और न ही कभी किसी रूढ़िगत जड़ता की जगह ही भारतीय इतिहास में रही है। बुल्के के लिए नये पुराने के निर्णय का आधार कालिदास के इन शब्दों में था- ‘पुराणमित्येव न साधु सर्वं न चापि काव्यं नवमित्यवद्यम्। संत परीक्ष्य अंतरद् भंजते मूढ़ पर प्रत्ययनेवबुद्धः’, अर्थात् पुराना हो जाने से ही न तो कोई काव्य अच्छा हो जाता है और न ही नया होने से ही बुरा हो जाता है। समझदार लोग दोनों को परखकर किसी एक को अपनाते हैं। जो मूर्ख है वही दूसरों के कहने पर चलता है। इस तरह प्राचीन की परीक्षा और आधुनिकता के बीच वह कोई विरोध नहीं मानते थे। अतीत के भंडार से “किसी काल विशेष के कुछ ही सिद्धांत निकालकर उन्हें भारतीयता की एकमात्र प्रतिनिधि उपलब्धि ठहराना, भारत की शताब्दियों तक निरंतर आगे बढ़ती हुई उदार संस्कृति के प्रति घोर अन्याय ही है।”[21] संस्कृति के प्रति इसी उदार दृष्टि से ही उन्होंने रामकथा की उत्पत्ति और विकास का निरूपण किया था। जातीयता की संगठक शक्ति के रूप में रामकथा का इतिहास भारतीय संस्कृति की एक उदार विश्व दृष्टि का भी विकास था। भारतीय संस्कृति की इस उदार विश्वदृष्टि में स्वयं को नवीन करते चलने की अपार क्षमता है। प्रेमचंद के बारे में बुल्के ने कहा कि उनकी कहानी कला का मूल स्रोत तो विदेशी है किन्तु उन्होंने उसे अपनी मौलिक प्रतिभा के सांचे में ढालकर एक स्वाभाविक भारतीय रूप प्रदान किया है। प्रेमचन्द की इस कहानी कला के मूल स्रोत अर्थात् यथार्थवादी कहानी कला को सम्बोधत करते हुए उन्होंने लिखा कि बहुत से यथार्थवादी उपन्यासों में जीवन की क्रूरता, देश की कुंठा और मनुष्य की पाशविक वृत्तियों का चित्रण मात्र किया जाता है। इसे वह उद्देश्यहीन यथार्थवाद कहते हैं और “इस प्रकार का उद्देश्यहीन यथार्थवाद भारत की साहित्यिक परंपरा से मेल नहीं खाता। यथार्थ को दिशा देना, कुंठा के अंधकार से निकलने का मार्ग दिखाना, मनुष्य को पशुतुल्य धरातल से ऊपर उठाना, यह भारतीय दृष्टिकोण के अनुसार साहित्य का उद्देश्य है।”[22]  बुल्के के लिए सोद्देश्य यथार्थवाद की भारतीय परंपरा थी ‘कीरति भनिति भूति भली सोई..’। भारतीय साहित्य के इस स्वाभाविक विकास की गति अर्थात् सोद्देश्य यथार्थवाद की उदार विश्वदृष्टि को ही वह  प्रेमचंद में नवीन होता देख रहे थे।

साहित्य की तरह संस्कृति और धर्म के प्रति बुल्के की उदार विश्वदृष्टि को भी हम उन्हीं के शब्दों में ‘सोद्देश्य यथार्थवाद’ की दृष्टि कह सकते हैं। अपनी इसी दृष्टि से बुल्के अवतारवाद की भारतीय विचारधारा को समझने का प्रयास करते थे। अवतार का भी एक निश्चित उद्देश्य था। वह उद्देश्य था धर्म की स्थापना। धर्म की स्थापना के उद्देश्य से अवतारों की इच्छा को बुल्के ने भारतीय जनता की वास्तविक इच्छाओं का स्वप्न कहा था। इस तरह बुल्के के लिए राम की भक्ति ‘निर्बलों की आह’ को संगठित करने वाली धार्मिक विचारधारा का प्रतिनिधित्व करती है, क्योंकि इस भक्ति में एक सोद्देश्य यथार्थवाद है। निस्संदेह बुल्के के लिए यह सोद्देश्य यथार्थवाद प्रेमचंद के ठीक विपरीत एक धार्मिक व्यावहारिक विचारधारा थी। बुल्के ने हिंदी विभागों से भगवतीचरण वर्मा के उपन्यास ‘चित्रलेखा’ को इसीलिए हटाने का अनुरोध किया था, क्योंकि वहां कुमारगिरी जैसे योगी का चित्रलेखा के सामने झुक जाना उन्हें अच्छा नहीं लगता था। बुल्के के लिए ब्रह्मचर्य का आदर्श एक उच्च आदर्श था और स्त्री सौन्दर्य के सामने उसकी पराजय उनके अनुसार बीए के छात्रों को गलत सन्देश देती थी, इसलिए पाठ्यक्रम से उसे हटाना जरूरी था! अवतारवाद की विचारधारा के विकास में कृष्णभक्ति के योगदान को बुल्के-सीधे सीधे नकार नहीं सकते थे। राधा कृष्ण की रासलीलाओं और अवतारवाद की नैतिकता के बीच का अंतर्विरोध बुल्के के लिए ठीक वैसी ही उलझन पैदा करने वाला था जैसी ग्रियर्सन या शुक्ल जी के यहाँ। सामान्यतः हिन्दू धर्म के बारे में बुल्के का विचार डा. राधाकृष्ण के विचारों से अभिन्न है। वह ईसाई धर्म की तरह ही हिन्दू धर्म को भी एक विशेष जीवन व्यवहार की दृष्टि मानते थे। अंतर केवल उसकी परिणति का है। बुल्के हिन्दूओं के जीवन व्यवहार को स्वभावतः ईसाई धर्म में पर्यवसित होता हुआ देखते थे।

पिछले तीन हज़ार सालों से निरंतर विकसित होते हिन्दू धर्म को, वह यहाँ के लाखों हिन्दुओं की निरंतर विकसित होती धार्मिकता की तलाश की तरह देखते हैं। इस दीर्घ इतिहास में उन्हें किसी ऐसी केंद्रीय सत्ता (अथॉरिटी) का अभाव मिलता है जो नई प्रवृत्तियों और व्यवहारों की जाँच कर सके। जबतक कोई नया धर्मगुरु खुलकर वेदों को नहीं नकारता तब तक वह मोक्ष के नए मार्ग और उस नए मार्ग के अपने अनुयायियों के साथ हिन्दू धर्म के भीतर जगह पा जाता था। बुल्के कहते हैं कि समन्वय की इसी क्षमता के सहारे वेदों का खुलकर विरोध करने वाले बौद्ध और जैन धर्म भी आजकल हिन्दूवाद की शाखा मात्र में बदल गए हैं। इस प्रकार यह हिन्दू धर्म असंख्य मतों और पंथों और धार्मिक व्यवहारों से युक्त एक जटिल व्यवस्था के रूप में प्रकट होती है। बुल्के देखते थे कि पढ़े लिखे हिन्दुओं के बीच भी हिन्दू धर्म की पहचान को लेकर कोई मतैक्य नहीं था। एक लोकप्रिय राष्ट्रीय पत्रिका के पत्राचार कॉलम की एक बहस का हवाला बुल्के देते हैं, जहाँ हिन्दू धर्म के बारे में व्यक्तिगत विचारों पर एक लम्बी बहस हुई थी। उस लम्बी बहस का अंतिम निर्णय था : हिन्दू एक ऐसा व्यक्ति है जिसका जन्म हिन्दू परिवार में हुआ है और जिसने कभी खुलकर अपने धर्म का परित्याग नहीं किया है।[23] उनके यहाँ हिन्दू धर्म की इस अपरिभाषेय संश्लिष्टता का इतिहास पहले के प्राच्यविद्याविदों के वर्णन से बहुत भिन्न नहीं थी। ई.पू. की तीसरी और दूसरी सस्त्राब्दियों में आर्यों का भारत आगमन हुआ। इन आर्यों ने अपने साथ ‘प्रकृति-पूजक’ धर्म भी साथ लाया। आर्यों की जो शाखा यूरोप पहुंची थी उनका धर्म भी मुख्यतः ‘प्रकृति पूजा’ ही था। आरंभिक ऋग्वेद की सुन्दर ऋचाओं से होते हुए बाद के तीनों वेद मिल कर हिन्दुओं के दूसरे पवित्र ग्रंथों का आधार बनते हैं। बुल्के का सुझाव है कि बाद के तीनों वेदों की प्रकृति को बेहतर ढंग से समझने के लिए हमें उत्तर भारत में आर्य और अनार्य आबादियों की आपसदारी के परिणाम के रूप में उन्हें देखना चाहिए।

बुल्के लिखते हैं कि आरंभिक आर्यों में मुख्यतः तीन श्रेणियां थीं: पुजारियों की, आधिकारिक योद्धाओं की और सामान्य कबीलीयाई मनुष्यों की। उत्तर भारत में पहले से रह रही जनता के संपर्क और उनपर विजय के दौरान धीरे-धीरे ये श्रेणियां कठोर होती गयीं और उन्हें धार्मिक मान्यता भी मिलती गयी। ब्राह्मणीय कर्मकांडों के आसपास पुरोहित वर्ग ने एक विशेषाधिकार संपन्न स्थिति हासिल कर लिया। इन कर्मकांडों के विधि-निर्देशों और धार्मिक अर्थों के निर्देश के लिए ब्राह्मण ग्रन्थ लिखे गए। यहाँ पहली बार हिन्दू धर्म की आरंभिक गाथाओं का संकलन मिलता है। पुरोहितों के अलावा क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र जातियों के कठोर बन्धन निर्धारित हुए। शूद्र अधिकांशतः अनार्य जनता थी जो सेवा कार्यों के निमित्त सामाजिक संरचना में शामिल कर लिए गए थे। इनमें में अनेक ऐसे थे जिन्हें जाति बाह्य भी समझा जाता था।[24] जाति का नियम शादी के नियमों से बंधा था। इसके अलावा खान-पान और व्यवसाय के कठोर नियम थे। अपनी जाति के बाहर शादी और व्यवसाय का स्वप्न देखना, हिन्दू व्यवस्था के भीतर संभव नहीं था और जाति बाह्य होने के डर से धर्मान्तरण हमेशा से मुश्किल रहा है। बुल्के लिखते हैं कि सामाजिक व्यवस्था में जातिवाद इतनी गहराई तक व्याप्त है कि इसे बदलने में अभी बहुत वक़्त लगेगा।

जन्म-जन्मान्तर तक व्याप्त कर्म-बंधन का सिद्धांत ब्राह्मण ग्रंथों के पुनर्जन्म की मान्यता से विकसित होता गया था। उनके अनुसार कर्म-बंधन का यह सिद्धांत व्यावहारिक रूप से लगभग हर हिन्दू मानता है। कर्म-बंधन का यह सिद्धांत कहता है कि किसी का वर्तमान अस्तित्व अपने सभी सुखों और दुखों के साथ पूर्वजन्म के कर्मों का फल है और भविष्य के जन्म का आधार। असंख्य आत्माएं पुनर्जन्म के इस बंधन में भटक रही हैं और इसकी न तो कोई शुरुआत है और न ही कोई अंत। परन्तु कुछ लोग हमेशा ही इस भवचक्र से मुक्ति पाते रहेंगे। बुल्के लिखते हैं कि इस प्रकार यह सिद्धांत संपूर्ण ब्रह्मांड को एक नैतिक सिद्धांत के अधीन करता है जहाँ हर अच्छे काम को पुरस्कृत और बुरे काम को दण्डित होना पड़ता है। इस ब्रह्मांडीय नियम के अन्दर देवता भी शामिल हैं। दर्शनों में इस कर्म बंधन पर अंतहीन बहसें हुई हैं। पर लगभग सभी इस बात पर सहमत हैं कि आत्मानुशासन या ईश्वर के आशीर्वाद से प्राप्त आत्मज्ञान से मुक्ति संभव है। बुल्के ने महसूस किया था कि पुनर्जन्म के इस बंधन का सिद्धांत बहुत हताशाजनक है। उन्होंने हिन्दू विश्वविद्यालय के अपने एक विद्यार्थी का एक संस्मरण सुनाया जिसने बुल्के के सामने द्रवित हृदय से अपने पापों का ज़िक्र किया और अंत में कहा कि उसने अपना यह जन्म गँवा दिया है, और अब इसकी भरपाई इस जन्म में संभव नहीं। हताशाजनक इस सिद्धांत के कारण वर्तमान जन्म ही अंतिम जन्म है, इसकी कल्पना से ही लोग डरते हैं। अपने पापों के प्रति इतने सचेत लेकिन पश्चाताप की कोई आशा नहीं। इस प्रकार हिन्दुओं की जीवन दृष्टि में एक चरम निराशावाद की झलक दिखती है।

बुल्के ने लिखा कि असंख्य देवी-देवताओं के बीच एक ही परमात्मा पर विश्वास केवल शिक्षित हिन्दुओं के बीच मान्य है। पर इन शिक्षितों के बीच बहुत कम ऐसे हैं जो शंकर को समझने का दावा कर सकते हैं, परन्तु शंकर की तरह ही वे एक निर्वैयक्तिक परमात्मा पर विश्वास करते हैं। अलग-अलग ईश्वर उस एक ही ब्रह्म के निरूपण हैं। भक्त कवियों के आधिभौतिक सार को वह इन शब्दों में रखते हैं : “जब वे अटकल लगते हैं तो उनका झुकाव अद्वैतवाद की तरफ होता है, लेकिन उनकी तीव्र धार्मिक अन्तःप्रज्ञा हमेशा एक वैयक्तिक ईश्वर की ओर उन्हें खींच लेती है।”[25] ईसा पूर्व छठी शताब्दी में उठे आस्तिक आन्दोलन के परिणामस्वरूप भगवद्गीता का जन्म होता है जिसे वे हिन्दुओं की सबसे पवित्र और लोकप्रिय पुस्तक मानते हैं। उनके अनुसार भगवद्गीता की अद्वैतवादी व्याख्याओं से हटकर जब हम उसका पूर्वग्रहहीन पाठ करते हैं, तो पाते हैं कि वहां कृष्ण के प्रति वैयक्तिक भक्ति और आत्मसमर्पण है, जो पूर्वजन्म के चक्र से मुक्ति का मार्ग दिखाता है। पुराणों की अपेक्षा भगवद्गीता में उच्च नैतिक मूल्यों की केन्द्रीयता है। बुल्के लिखते हैं कि एक गंभीर हिन्दू ने उन्हें कभी कहा था कि भारत में कृष्ण को इतना सम्मान और इतनी भक्ति कभी नहीं मिलती अगर वह पहली बार अपनी गोपाल लीलाओं के द्वारा जाना जाता। दक्षिण भारत के शैव संतों की शिव आराधनाओं में भी भगवद्गीता की तरह गंभीर और सच्ची आध्यात्मिकता के दर्शन होते हैं। बाद में यह सच्ची धार्मिकता रामभक्ति में ही सबसे सुन्दर और हृदयग्राही रूप ग्रहण करती है। इन सबके अलावा हिन्दू धर्म का मतलब हजारों की संख्या में घूमने वाले साधु-संन्यासियों, हजारों मंदिरों, सैकड़ों तीर्थों और लाखों भक्त हिन्दू स्त्रियों के दैनिक व्रतों और उपवासों के ज़िक्र के बिना अधूरा है। हजारों की संख्या में घूमने वाले और आम लोगों के दान पर निर्भर रहने वाले साधु आधुनिक हिन्दू धर्म की एक दुखद प्रवृत्ति को व्यक्त करते हैं। बुल्के के अनुसार भारत में एक ‘शिक्षित हिन्दू पुरोहित वर्ग’ का अभाव बहुत खटकने वाली बात है।

निष्कर्षतः बुल्के मानते हैं कि ईश्वर की खोज का जैसा भावावेगपूर्ण इतिहास हिंदुस्तान में मिलता है। उतना शायद विश्व के किसी देश में नहीं। परन्तु दूसरी ओर भारत के ऋषियों और ज्ञानियों ने हमेशा इस बात पर जोर दिया कि परमात्मा की प्रकृति को पूरी तरह जानने में मनुष्य की बुद्धि अक्षम है। महाभारत में कहा गया है कि शास्त्र और परंपरा हमें कई परस्पर विरुद्ध कथनों के सामने ला खड़ा करते हैं, हर ऋषि के पास अपना कोई भिन्न सिद्धांत है और धर्म का रहस्य गुहा में छिपा है। हिन्दू धर्म के इस संशयवाद को बुल्के आधुनिक हिन्दुओं में भी पैठा हुआ देखते हैं। भारत में व्याप्त धार्मिक तटस्थतावाद के लिए बुल्के आंशिक रूप से इस संशयवाद को जिम्मेदार ठहराते हैं। सभी धर्म समान रूप से अच्छे हैं, सारी नदियाँ समुद्र में मिल जाती हैं आदि निष्कर्ष इसी धार्मिक संशयवाद का परिणाम है।[26]

अवतारवाद और रामभक्ति दो ऐसी चीजें हैं जो उनके अनुसार आधुनिक हिन्दू धर्म को एक करती है। अवतारवाद की भावना बुल्के के लिए एक वैयक्तिक ईश्वर की चाह की भावना थी। दूसरे शब्दों में एक सच्चे एकेश्वरवादी धर्म की आन्तरिकता का इतिहास अवतारवाद का इतिहास है। हमने पीछे देखा कि शुक्ल जी के व्यावहारिक उभयस्वरूप ब्रह्म के सिद्धांत से उन्हें तोष नहीं था। भक्ति कविता में उन्होंने भक्तों की इस प्रबल आकांक्षा की ओर ध्यान दिलाया था। अवतार की इसी प्रबल आकांक्षा के कारण तुलसीदास पिछले कवियों से अलग थे। अनुमान और दर्शन में भले ही तुलसी ‘सगुनहि अगुनहि नहिं कछु भेदा’ कहते हों लेकिन वहां वैयक्तिक राम का आग्रह इतना प्रबल है कि कभी-कभी राम अपना परब्रह्म रूप छोड़कर मनुष्यों की तरह वास्तविक सुख-दुःख का अनुभव करने लगते हैं। यह महज लीला का आनंद नहीं है। वरन् वास्तविक मनुष्य में वास्तव होने की वेदना है। रामकथा सच्चे अवतार का पूर्वस्वप्न है। यह भारतीय ईसाइयत का आतंरिक इतिहास था जो वास्तव में तुलसीदास का हाथ पकड़कर ईसाइयत की वैश्विकता पा लेगा। बुल्के अवतारवाद के विकास में कृष्णभक्ति की प्रकृति पर विस्तार से चर्चा करते हैं। कृष्णभक्ति की अनैतिकता अन्य प्राच्यविद्याविदों और शुक्ल जी के साथ-साथ बुल्के की आलोचना का केंद्र बनी रही। इन नैतिक मूल्यों का संबंध समाज में यौनिकता के गहरे स्तरों से था, जिसे  हमने द्विवेदी जी की चर्चा के दौरान पीछे देखा है। बुल्के एकदम शुक्ल जी की तरह ही रामभक्ति पर कृष्णभक्ति के प्रभावों की आलोचना करते हैं। राम-सीता की माधुर्य भक्ति में राम और सीता के चरित्र की विकृति बुल्के के अनुसार खुद हिन्दू अवतारवाद की अवधारणा में अन्तर्निहित है। दूसरी ओर दार्शनिक व्याख्याओं के लिए जितने शास्त्र उपलब्ध हैं, वे सभी कृष्णभक्ति पर केन्द्रित हैं। कृष्णभक्ति से जुड़े इन दार्शनिक ग्रंथों में अवतारवाद को लीलावाद में बदल दिया है। शुक्ल इसी को ‘लोकमंगल की सिद्धावस्था’ कहते थे। बुल्के के अनुसार कृष्णभक्ति की दार्शनिक व्याख्याओं में नैतिकता की रक्षा का ऐसा प्रयास पहले भी हुआ था, लेकिन वह कभी भी प्रभावी नहीं हो सका। इसका कारण है कि भारतीय अवतारवाद की धारणा में नैतिकता और धार्मिकता के बीच हमेशा ही एक जरूरी पार्थक्य बनाये रखा गया है। ईश्वर का सत्-चित्-आनंद रूप जब धार्मिक व्यावहार के लिए प्रयुक्त होता है तब उसमें विकृति आती है। यहाँ नैतिक-अनैतिक के निर्णय का कोई प्रश्न ही नहीं रह जाता, क्योंकि सच्चिदानंद स्वरूप ईश्वर नैतिक-अनैतिक निर्णय से बाहर है। कहा जा सकता है कि व्यावहारिक सत्य के रूप में बुल्के के लिए मसीह का चरित्र सत्-चित्-आनंद स्वरूप नहीं बल्कि ‘सत्-चित्-वेदना’ के स्वरूप में वास्तविक होता है।

अवतार के जिम्मे कई अनैतिक कार्यों का ज़िक्र स्वयं महाभारत में था। कृष्ण का चरित्र वहां पूरी तरह नैतिक नहीं बना रहता। गीता में अवतार के दो उद्देश्य बताये गए हैं। पहला ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण, दूसरा भक्त की मुक्ति। बाद की कृष्णाश्रयी धाराओं में पहली को छोड़ केवल दूसरी पर ध्यान दिया गया। जबकि बुल्के कहते हैं कि ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण ही मुक्ति का रास्ता है। इसे छोड़ कर मोक्ष पर ध्यान लगाना नैतिकता और धार्मिकता के अलगाव को जन्म देना। दूसरे शब्दों में कहें तो पूर्ण समर्पण की नैतिकता मूल और आरंभिक है, उसे छोड़ कर सीधे मोक्ष पर ध्यान लगाने से विकृति आती है। मोक्ष एक प्रक्रिया है जिसकी पहली शर्त है पूर्ण समर्पण। यह पूर्ण समर्पण एक उच्च नैतिक मूल्यों वाले शहीदी चरित्र में मसीह ने वास्तव किया था।

वेदना और करुणा की कथाओं में मसीह के चरित्र का सार है। बुल्के पुनर्जागरण या पुनरुथान के मसीही शहादत को गोस्पेल की कथाओं में अभिव्यक्त मानते थे। इसलिए वहां दैनिक व्यावहारिक नैतिकता पर जोर था। हमने देखा था कि कृषक जीवन और औद्योगिक जीवन की विकृतियों के बीच वह मसीही करुणा का प्रचार ज़रूरी मानते थे। कारीगरी (आर्टीजनशिप) वाले सामाजिक सम्बन्धों से बनने वाली सामूहिकता में वह जीवन का आदर्श देखते हैं। गोस्पेल की कथाओं की कारुणिकता में अवतारवाद का सार देखना, जेसुइटपंथियों की अपनी मान्यता थी। वे जेसुइट सम्प्रदाय से थे और बाइबिल या न्यूटेस्टामेंट की साहित्यिकता के महत्त्व को जानते थे। कहने का अर्थ यह है कि बुल्के मसीही अवतारवाद की एक भिन्न परम्परा से आते थे। सामूहिक परिवार सामुदायिक जीवन की पहली पाठशाला मानी जाती है और इस जीवन के रोज़मर्रा के दृश्यों में करुणा की असंख्य अभिव्यक्तियाँ होती हैं। इस जीवन में मसीही करुणा सीमेंट की तरह काम करती है। बुल्के साहित्यिकता का उद्देश्य इस जीवन में मसीही करुणा के प्रचार प्रसार में देखते थे। मसीही अवतारवाद की इसी वैश्विकता के प्रचार के लिए बुल्के स्वयं मिशनरी कार्यों का एक आदर्श स्थापित कर रहे थे।[27] बुल्के का मानस उनके शब्दों में पूर्ण भारतीय हो गया था। इसी भारतीय मानस से वह भारतीय अवतारवाद की आलोचना करते हैं। परहित और विश्वमानवतावाद की विचारधारा चालीस और पचास के दशक में जोर-शोर से प्रचारित हुई थी। १९५६ के बाद रूसी कम्युनिस्ट पार्टी की आत्मालोचनाओं से भी इस विचारधारा को काफी बल मिला था। जीवन-जगत में हिंसा के विकृत और बर्बर रूपों को सामने कर सामाजिक व्यवस्था के रूप में औद्योगिक सभ्यता या पूंजीवादी सभ्यता से मुक्ति के सारे प्रयासों को निरर्थक घोषित किया जाने लगा था। पूँजी के भीतर एक बेहतर दुनिया की संभावना के लिए जेसुइट मिशनरी भी अपनी मसीहाई करुणा को लेकर बहुत सक्रिय थी। मसीही अवतारवाद के करुण पक्ष को लेकर संघों में समर्पित पुजारियों का एक नया दल उत्साहित होकर लग गया था। यह ईसाई धर्म की व्यावहारिकता और ईश्वर के राज्य के विकल्प का प्रचार करने में सबसे आगे था। ये मिशनरी उच्च नैतिक मूल्यों को सामने रख समाज में शान्ति और सुख की वास्तविकता के स्वप्न को यथार्थ करने की कोशिश कर रहे थे। इस मानवतावादी धार्मिक विचारधारा का प्रचार मार्क्सवाद को भी प्रभावित कर रहा था। ऐसे ही वक़्त में आरंभिक मार्क्स की रचनाओं को आधार बना कर पश्चिमी मार्क्सवाद की एक प्रवृत्ति के रूप में, मानवतावादी मार्क्सवाद का भी जन्म हुआ था। करुणा की सार्वभौमिकता का आधार श्रम के अपने अलगाव में निहित था। ‘आर्थिक और दार्शनिक पांडुलिपियों’ में मार्क्स ने पहली बार अमूर्त मनुष्य के बदले जीते-जागते श्रमशील मनुष्य की पूर्णता को दर्शन के केंद्र में लाया था। मनुष्य का अपने प्रजातीय सत्ता से अलगाव की व्याख्याओं में मनुष्य के आदिम अलगाव की व्याख्या देख, ईसाई धार्मिक विचारधारा ने मार्क्स की व्याख्याओं में अन्तर्निहित नैतिकता को ईसाई नैतिकता से एक कर दिया। इस वैचारिक परिदृश्य में ही एक करुण और अहिंसक मार्क्सवाद की कल्पना के लिए भी अवकाश मिल गया था। बुल्के व्यक्तिवाद या मसीह की वैक्तिकता की धारणा में हिंसा का पूर्ण निषेध देखते थे। पूंजीवादी व्यक्तिवादी विचारधारों की आलोचना के साथ-साथ वह दैवीय हिंसा की धारणा के भी आलोचक थे। बुल्के संघ के उद्देश्यों को यथार्थवादी मानते थे। संघ के भीतर व्यक्तिवाद की रक्षा को वह सत्य से जोड़ कर ही देखते थे। मसीह के करुण सन्देश की वास्तविकता का प्रचार-प्रसार कभी भी उन्हें व्यक्तिस्वातंत्र्य के आड़े आने वाला प्रतीत नहीं हुआ। बल्कि उन्हें लगता था कि संघ के भीतर ही व्यक्तिस्वातंत्र्य का सर्वोत्तम रूप सामने आता है। यहाँ स्वतंत्र सत्य के बल से संगठित होती है और अन्दर-बाहर का द्वैत पूर्णतः मिट जाता है। धार्मिकता और नैतिकता का यह संयोग उन्हें ईसाई नैतिकता की स्वाभाविक वैश्विकता प्रतीत होती थी। फ्लेमिश और भारतीय बुर्जुआजी के चरित्र की एकता में बुल्के को जनता के कष्टों के बीज दिखाई देते थे। जनता के कष्टों से निजात के लिए साधन और साध्य दोनों की पवित्रता आवशयक थी। हिंसा को नैतिक रूप से स्वीकार करना बुल्के के लिए असंभव था। साधन और साध्य दोनों की पवित्रता में वह धार्मिकता और नैतिकता की एकता देखते थे।

हिन्दू अवतारवाद में साध्य की पवित्रता से साधन की नैतिकता तय होती है। बुल्के ‘अंत भला तो सब भला’ के विचार को नहीं स्वीकार करते। साधन की अपवित्रता से साध्य भी अपवित्र हो जाता है। साध्य तभी न्यायसंगत हो सकता है जब साधन भी न्यायसंगत हो। साधन और साध्य की इस प्राकृत-कानूनवादी व्याख्या को बुल्के मसीही अवतारवाद की मौलिकता मानते थे। तुलसी के यहाँ हिंसा और युद्ध के बदले आत्मसमर्पण की केन्द्रीयता थी। बुल्के ने कई ऐसे प्रसंगों का ज़िक्र किया है जहाँ तुलसी हिंसा को आत्मसमर्पण की नैतिक सीमा में मोक्ष का कारण बना देते हैं। हिंसा को मुक्ति का कारण बताकर उसे नैतिक बनाने के इस प्रयास में बुल्के भारतीय अवतारवाद की सीमा देखते थे। बुल्के ने भारतीय अवतारवाद और ईसाई मसीही अवतारवाद (इनकार्नेशन) के बीच पांच समानताएं गिनाई हैं:-[28]

  • मसीही और भारतीय दोनों अवतारों का मतलब है- धरती पर ईश्वर का मुक्त प्रवेश।
  • दोनों तंत्र यह बताते हैं कि इस मुक्त प्रवेश से ईश्वर अपना पारब्रह्म चरित्र नहीं खोता। अर्थात् उसकी पारलौकिकता या सर्वभूतात्मकता का लोप नहीं हो जाता। उसका ईश्वरत्व अविकृत रहता है।
  • दोनों तंत्र अवतार के उद्देश्यों में अभिन्न हैं- ‘धर्मसंस्थाप्नाय’। दोनों तंत्रों में ईश्वर के परमप्रेमनिधान और अनंतकरुणानिधान रूप को बहुत महत्त्व दिया गया है। वह मनुष्य की मुक्ति के लिए अवतरित होते हैं और मुक्ति को सरल बना देते हैं। भगवान् मनुष्य का सुखदाता, सखा और सहचर हो जाता है।
  • परमदयालु करुणानिधान के प्रति पूर्ण समर्पण और अवतार के प्रति प्रेममयी श्रद्धा या भक्ति दोनों तंत्रों में है।
  • मोक्ष का अर्थ दोनों जगह अनंतकाल तक भगवान् के साथ आनन्दमय सान्निध्य में है। (बुल्के के अनुसार यह शंकर की वही बात है जहां ‘आत्मचेतना’ लुप्त हो जाती है।)

दोनों तंत्रों के बीच मौलिक अंतर इस प्रकार है:-

नर प्रकृति के यथार्थ को लेकर:

भारतीय अवतार की परम्परा को वह ईसाई धर्म में ‘ईशदर्शन’ (थेईफैनी) की परम्परा की तरह देखते हैं। मसीह पूर्ण ईश्वर और पूर्ण मनुष्य दोनों है; पवित्र त्रित्व का दूसरा व्यक्ति जो ईश्वर और नर प्रकृति को अवधारणा में एक करता है। नर प्रकृति बनती है वास्तविक आत्मा और शरीर से, उसे दुःख या पीड़ा की वास्तविक अनुभूति होती है। वह सीमित और ससीम है। भारतीय अवतार नर प्रकृति के क्षेत्र में कभी वास्तविक नहीं होता। उसका शरीर, जब वह नर रूप में आता है, तब भी वास्तविक हाड़-मांस से बना शरीर नहीं होता बल्कि शुद्ध आध्यात्मिक पदार्थ का बना होता है। इसलिए वह प्रकृति के नियमों से बाहर होता है। वह वास्तविक मनुष्य नहीं होता। इसलिए उसकी सारी पीड़ा, सारे सुख और उसके सारे नैतिक-अनैतिक कर्म सब अभिनय में बदल जाते हैं। अवतार वहां लीला मात्र है। तुलसीदास के यहाँ भी अक्सर इस बात पर जोर दिया गया है कि राम स्वयं कष्ट नहीं भोग रहे बल्कि मंच के अभिनेता की तरह अनुभूतियों का प्रदर्शन मात्र कर रहे हैं और शब्द कह रहे हैं। बुल्के तुलसी को उद्धृत करते हैं:-

भगत हेतु भगवान् प्रभु, राम धरेउ तनु-भूप।

किये चरित पावन परम प्राकृत नर अनुरूप।।

जथा अनेक वेश धरि नृत्य करइ कर करेई ।

सोई सोई भाव देखावाइ, आपुन होइ न सोइ।।

पर बुल्के के अनुसार लोकप्रिय विश्वास में यही चला आया है कि राम का वास्तव में जन्म हुआ था। वह मनुष्यों के बीच जिंदा थे और उन्हीं के बीच उनकी मृत्यु हुई। एक मौके पर तो तुलसी भी अपना दर्शन भूल गए और कहा कि भगतों के हित राम ने अनेक कष्ट झेले हैं:-

राम भगत हित नर तनु धारी।

सहि संकट किए साधु सुखारी।।

हिन्दू दर्शन में यह सर्वस्वीकृत है कि ईश्वर कभी वास्तविक मनुष्य नहीं हो सकता। उसकी प्रकृति कभी नर प्रकृति नहीं हो सकती। अपने इस निष्कर्ष के समर्थन में उन्होंने हिन्दू दर्शन के विख्यात विद्वान् राधाकृष्णन को उद्धृत किया: “एक कष्ट भोगता ईश्वर, काँटों के ताज का देवता कभी धार्मिक आत्मा को संतोष प्रदान नहीं कर सकता।” बुल्के इस मत से पूरी तरह असहमत हैं और कहते हैं कि पिछली बीस सदियों का इतिहास गवाह है कि एक कष्ट भोगता ईश्वर धार्मिक आत्मा को शांति दे सकता है।

बुल्के आगे लिखते हैं कि “क्रिसमस की कहानियां मनुष्यों के हृदय को ज्यादा आसानी से पकड़ लेती हैं बनिस्पत पुनरुथान के आख्यान के; गुड़ फ्राइडे का भावेग मनुष्य हृदय पर अपनी छाप कहीं गहरे छोड़ता है, बनिस्पत ईस्टर सन्डे की महिमा के; ईसाई श्रद्धा सलीब से ज्यादा प्रेरित होती है बनिस्पत मसीह के चमत्कारों से; महान् परीक्षाओं के वक़्त हमें शान्ति स्वर्ग के विचारों से नहीं बल्कि कलवारी के सलीब से मिलती है; सलीब हमें आंसू बहाने पर मजबूर करता है न केवल प्रेम के बल्कि सहानुभूति और करुणा के भी।”[29] जेसुइट मत के साथ-साथ यह बुल्के का अपना अनुभूतिगम्य ईसाई धर्म है। यहाँ चमत्कार या पुनरुत्थान के बदले सहानुभूति और करुणा का जीवन मसीही अवतार के केंद्र में है। ईश्वरीय प्रेम पूरी तरह मसीही अवतार में ही प्रकट होता है। वहां मनुष्य के लिए मनुष्य की तरह मसीह खुद पीड़ा सहता हुआ मनुष्य के जीवन के साथ है। उस मनुष्य के लिए जिसे उसने ‘कुछ नहीं’ से पैदा किया। कृष्ण के चरित्र में ऐसा कुछ नहीं है। आत्मविसर्जन वाला भारतीय प्रेम का आदर्श भी ईसा में ही है।

मोक्ष या उद्धार की प्रकृति:

  •  ईसा ने नरप्रकृति धारण किया और सलीब पर अपने बलिदान द्वारा पाप और मृत्यु से इसे मुक्ति प्रदान किया। इससे मनुष्यों की आत्मा और उसका शरीर दोनों उच्चतर भूमि तक उठ गए और वह दैवीय जीवन में भागीदारी के योग्य हो गए। दैवीय जीवन में भागीदारी को बुल्के ईश्वर के चिर सान्निध्य की तरह देखते हैं। भारतीय अवतार तंत्र में नर प्रकृति के उद्धार की जगह नहीं है और न ही वहां शरीर के पुनरुत्थान की महिमा है। “जैसे ईश्वर मनुष्य नहीं हो सकते वैसे ही मनुष्य (यानी कि मानव प्रकृति) भी कभी ईश्वरत्व नहीं पा सकती।
  •  ईसा ने एक बार विश्व का उद्धार कर हमेशा के लिए उसका उद्धार कर दिया और अंत में सब कुछ ईसा में वापस स्थित हो जाएगा। वह मनुष्य इतिहास का संहार है। दूसरी ओर हिन्दू अवतार तंत्र में विश्व अनादि और अनंत है। वहां अवतारों की ज़रूरत हमेशा बनी रहेगी। अनंत काल तक उसका हर कल्प में आविर्भाव होता रहेगा और हर बार कुछ आत्माएं पुनर्जन्म के बंधन से मुक्ति पाते रहेंगे। भवबंधन में पड़े असंख्य जीवों के साथ यह प्रक्रिया चलती रहेगी।

नैतिक और धार्मिक चरित्र:

  •  नीतिशास्त्र: स्वयं नर प्रकृति में ईसा का जीवन नैतिक जीवन का आदर्श है। इस अर्थ में कर्तव्य के नियमों के पालन का वह जीता जागता उदाहरण है। क्योंकि वह ईश्वर का अवतार था इसलिए पापी नहीं हो सकता था। इस प्रकार वह प्रकृति और चुनाव दोनों ही स्थितियों में पाप-मुक्त था। “आखिर कौन मुझ पर पाप का आरोप लगाएगा?” भारतीय अवतार तंत्र में ईश्वर स्वयं धर्म के अनुपालन से स्वतंत्र है। वह पाप-पुण्य से परे है। वह स्वयं नैतिक मानदंडो से ऊपर और स्वतंत्र है। बुल्के उदाहरण देते हैं- परशुराम ने क्षत्रियों से बदला लेने के लिए २१ बार उनकी हत्या की, वाल्मीकि की कविता में राम का चरित्र उदात्त है पर बाद के प्रक्षेपों और अन्तःक्षेपों में कई बातें उसके चरित्र से जुड़ गयी जो न्यायसांगत नहीं है, जैसे बालि-वध, सीता की अग्नि-परीक्षा आदि। बाद के भक्ति सम्प्रदायों में उन्हें कृष्ण का अनुकरणकर्ता दिखाया गया। कृष्ण का गोपियों के साथ रास कहीं से भी नैतिक नहीं। बुद्ध अवतार तो गलत शिक्षाओं के प्रचार के लिए ही माना गया है। बुल्के लिखते हैं कि धर्म और नीतिशास्त्र का अलगाव भारतीय अवतारवाद का ‘खतरनाक सिद्धांत’ है। भक्ति संप्रदाय के सिद्धान्त में भी इस अलगाव की व्याख्या मिलती है। इस पृथकता के कारण ही कई सारे भक्ति संप्रदाय भ्रष्टाचार के गढ़ बनते गए। इसकी स्वीकृति स्वयं रामानुज के यहाँ है। रामानुज ने कहा था कि यह सही है विष्णु को बारिश से बचने के लिए अपने सहयोगियों के साथ शिव-मंदिर में शरण लेनी पड़ी थी, पर इसका यह मतलब नहीं कि भक्त भी शैवों की मदद ले। रामानुज ने कहा अगर राजा अपनी किसी गणिका के साथ सम्भोग करता है, तो इसका यह मतलब नहीं कि राजा की पतिव्रता स्त्री भी अपने किसी सभासद से सम्भोग कर सकती है। गोविन्दाचार्य ने इसका मतलब बताते हुए कहा कि राजा या भगवान् कोई काम करते हैं तो इसका मतलब यह नहीं कि भक्त भी वैसा ही काम करने को स्वतंत्र है। भक्त हर काम में भगवान् का अनुकरण नहीं कर सकता। बुल्के रामानुज सम्प्रदाय की उस अद्भुत मान्यता का उल्लेख करते है, जहाँ भक्त भगवान् या उनके भक्त को प्रसन्न करने के लिए पाप करता है। रामानुज के अनुरंजन के लिए एक महिला अपना शरीर भी बेचने को तैयार हो जाती है। उसका तर्क था कि “रामानुज जैसे अतिथि के सम्मान के लिए मैं व्याभिचार को भी प्रस्स्तुत हूँ… मैं अपना शरीर बीच कर उस शरीर से उनकी भक्ति करुँगी। क्योंकि स्वयं भगवान् ने कहा है कि- मेरे लिए किये जाने वाले तुम्हारे पाप भी पुण्य हो जाते हैं, जबकि मेरे सन्दर्भ से हीन तुम्हारे सरे गुण भी व्याभिचार मात्र हो जाते हैं।” पतिव्रत और स्त्रीधर्म के इस दुहरे चरित्र को भारतीय भक्ति में और इस प्रकार हिन्दू अवतार तंत्र में जगह प्राप्त है। भारतीय अवतार तंत्र में हर जगह इस धार्मिक और नैतिक द्वैत का पता मिलता है।
  •  धार्मिकता: वास्तविक मनुष्य की तरह ईसा के पास स्वयं की एक अपनी धार्मिकता है। वह पापमुक्त है फिर भी ईश्वर की प्रार्थना करता है। वह सभी वस्तुओं में स्वयं को ईश्वर के प्रति समर्पित करता है। “मैं पिता से आया हूँ”, “मैं पिता में हूँ”, “मैं पिता के पास जाता हूँ”। भारतीय अवतार तंत्र में अवतार के लिए स्वयं साधना की जगह नहीं है। इसलिए वह मनुष्यों की साधना या उसके आध्यात्मिक जीवन की वास्तविक प्रेरणा नहीं हो सकता। न ही धार्मिक और न ही नैतिक आचरण में।

ऐतिहासिकता:

ईसा एक ठेठ ऐतिहासिक चरित्र है और गोस्पेल की कहानियों में उसके जीवन के ऐतिहासिक तथ्यों का पता मिलता है। बुल्के कहते हैं कि ईसा के चरित्र को मिथ बनाने का प्रयास धर्म के दुश्मनों का है ताकि ईसायत को धर्म के नाम पर बुरा-भला कहा जा सके। दूसरी ओर भारतीय अवतार तंत्र में अवतार की सारी कहानियाँ मिथ हैं। बुल्के राम, परशुराम या कृष्ण की ऐतिहासिकता को अस्वीकार न करते हुए भी इनकी कथाओं को बाद की कल्पना और विकास बताया है। इन चरित्रों ने खुद को कभी दैवीय नहीं कहा। रामकथा के ऐतिहासिक विकास का निरूपण कर उन्होंने स्वयं इन कहानियों के विकास समझने की कोशिश की थी। इन कहानियों के बदलाव या फेर-फार के पीछे बुल्के किसी ठोस ऐतिहासिक चेतना का अभाव पाते हैं। अर्थात् इन कहानियों में ऐतिहासिकता की रक्षा के लिए किसी ठोस केन्द्रीय सत्ता का आभाव है।

बुल्के भारतीय अवतारों की कल्पना में एक सच्ची धार्मिक अन्तःप्रेरणा देखते हैं। एक शुद्ध और सहज मानवीय आकांक्षा, जहाँ ईश्वर मनुष्यों के पापमय, दुखमय, कष्टमय जीवन के उद्धार के निमित्त ही धरा-धाम पर अवतरित होता है। यद्यपि यह सही है कि अवतार की कहानियाँ मिथकीय हैं और उनमें ऐतिहासिकता का अभाव है परन्तु “यह वासना, यह अन्तःप्रेरणा, ईश्वर के प्रति यह विश्वास, यह आस्था गलत नहीं है, ईश्वर के अवतार की आकांक्षा में वे सही थे। यहाँ तक कि उनके मिथ भी पूरी तरह गलत नहीं हैं; वे सभी ईसा मसीह में वास्तव हुई हैं। उनके (भारतीयों के) सबसे सुन्दर स्वप्न की अपेक्षा यह यथार्थ कहीं ज्यादा उदात्त है- ईश्वर पूर्ण रूप से मनुष्य बन कर सारी पीड़ा को वास्तव में भोगता हुआ अपनी मृत्यु के बाद सभी मनुष्यों का उद्धार संभव करता है। यह हम पर निर्भर है कि हम अगाध श्रद्धा और सच्ची सहानुभूति के सहारे दिखा पायें कि उनके स्वप्नों का यथार्थ ही हमारा ईसा मसीह है।”[30]

अवतारवाद और अवतार की भक्ति के बारे में ये सारी बातें बुल्के अपने जेसुइट संघ बंधुओं के लिए कर रहे थे। निश्चित रूप से धर्म के प्रचार के लिए सच्ची प्रेरणा ज़रूरी थी, और बुल्के ईसाई धर्म और अपनी जेसुइट व्याख्या का निचोड़ भारतीय और ईसाई अवतार के सिद्धांतों में अंतर करते वक़्त सामने रख रहे थे। दो चीजें जिस पर बुल्के का सबसे ज्यादा जोर है, वह है हिन्दू धर्म में नैतिकता और धर्म का अलगाव तथा अवतार का अवास्तविक या अनैतिहासिक स्वरूप, जिससे प्रेम या भक्ति का वास्तविक इहलौकिक आधार संभव नहीं हो पाता। दूसरे शब्दों में कहें तो रोज़मर्रा के जीवन में शामिल आचार-संहिता का अभाव जो एक ही साथ व्यक्तिगत और सार्वभौमिक दोनों हो। पूर्ण पवित्र आचार-संहिता के इस अभाव के कारण हिन्दू समाज में जाति और वर्णव्यवस्था की जगह बची हुई है, इसे बुल्के और जेसुइट संघ के दूसरे सदस्य बखूबी जानते थे। मिशनरी का काम मुख्यतः समाज के निचले तबकों और जनजाति-आदिवासी जनसंख्या के बीच था। उनके अनुभव में भारतीय वर्णव्यवस्था का चरित्र स्पष्ट था। धर्म और नीतिशास्त्र के पृथकता की चर्चा, हिन्दू धर्म की आलोचना करते समय पीछे भी यूरोपीय प्राच्याविद्याविद और ईसाई मिशनरियां करती आई थीं। यहाँ तक कि शुक्ल जी भी धर्म की चर्चा मुख्यतः नीतिशास्त्र के संबंध में ही करते हैं। उच्च नैतिक मूल्यों के मामले में बौद्ध धर्म का महत्त्व भी यूरोपीय विद्वानों ने स्वीकार किया था। पर बौद्ध धर्म के प्रति शुरूआती आकर्षण धीरे-धीरे मध्यकालीन वैष्णव भक्ति के आकर्षण में बदल गया था। बुल्के जिस समय जेसुइट संघ के आदर्श प्रचारक के रूप में धर्म का उच्च आदर्श सामने रख रहे थे, उसी वक़्त अंबेडकर बौद्ध संघ के पुनरुत्थान और संघ के मिशनरी स्वरूप का आदर्श बताते समय जेसुइट कार्यकर्ताओं का उदाहरण दे रहे थे।[31] बुल्के ने हिन्दू धर्म में सुयोग्य पुरोहित-तंत्र का अभाव देखा था। अंबेडकर भी भिक्षु संघ के पुनरुत्थान के लिए जेसुइट मिशनरी की तरह एक सुयोग्य पुरोहित तंत्र की ज़रूरत महसूस करते थे। विद्वता, सामजिक सेवा, और उच्च नैतिक जीवन के संयोग के बिना भिक्षु संघ की पुरानी महिमा का नवोत्थान अंबेडकर असंभव मानते थे। बौद्ध धर्म के प्रति आस्था के प्रचार के लिए संघ के सदस्यों को जिस निःस्वार्थ सेवा और वैज्ञानिक चेतना को साधना ज़रूरी था, अंबेडकर उसका प्रत्यक्ष उदाहरण एशिया में ईसाई धर्म के प्रचार और उनमें जेसुइट पादरियों या संघ के सदस्यों के योगदान में देखते हैं। ऐसी ही तुलना वह पुराने नालंदा और तक्षशिला के उदाहरणों को सामने रख कर भी करते हैं।

अंबेडकर के लिए धर्म और धम्म के बीच सबसे बड़ा फर्क नैतिकता को लेकर ही था। हिन्दुवाद में धर्म और नैतिकता का अलगाव था जबकि धम्म और कुछ नहीं नैतिकता थी। बौद्ध धर्म नैतिकता की सार्वभौमिकता और भिक्षु-संघ के रूप में नए समाज का निर्माण, इन दोनों को साथ-साथ लेकर चलता है। अंबेडकर धम्म या बुद्धवाद को ‘प्रज्ञा और करुणा’ पर आधारित समानता की वैश्विक संस्कृति का वास्तविक इहलौकीकरण मानते हैं। वहां कोई ईश्वर या अवतार नहीं है। वह शुद्ध विश्वबंधुत्व है जो कि नैतिकता है और वही धम्म है। अंबेडकर भक्ति को राजनीतिक जीवन में ‘व्यक्ति-पूजा’ की प्रवृत्ति की तरह देखते हैं जिसका अंतिम रूप तानाशाही है। उनके अनुसार किसी के प्रति हमारी अगाध श्रद्धा एक चीज़ है लेकिन उसकी आज्ञा का पालन बिलकुल दूसरी चीज़। श्रद्धा किसी उच्च आदर्श के शरीर रूप के प्रति होती है और यह महत्वपूर्ण चीज़ है, जबकि उसका आज्ञापालक होना दासत्व है।[32] हमने पीछे देखा था कि बौद्ध धर्म में हृदय के आभाव और उसके शुष्क बुद्धिवाद को कारण बता कर उसकी लोकप्रियता के ह्रास को समझा गया था। अंबेडकर को बौद्ध पुनरुत्थान के लिए लोकप्रियता एक बड़ी चुनौती लगती थी। बौद्ध भिक्खु संघ के आदर्श विकास के लिए क्या ज़रूरी था और क्यों ज़रूरी था, इसे अंबेडकर स्पष्ट करते हुए सबसे पहली और सबसे महत्वपूर्ण चीज़ बताते हैं- एक बौद्ध बाइबिल का लिखा जाना। दूसरी चीज़ है भिक्खु संघ के उद्देश्य, संगठन और उद्देश्यों को बदलना और तीसरी एक विश्व बौद्ध मिशन की स्थापना। ये सब बातें वह भिक्खु संघ के सदस्यों को संबोधित करते हुए कह रहे थे। अंबेडकर कहते हैं कि हर महान् धर्म आस्था या विश्वास पर टिका है। लेकिन आस्था केवल शुद्ध विमर्श या अमूर्त्त डॉग्मा पर नहीं टिक सकती। शुष्क सिद्धांत कथनों से आस्था पैदा नहीं होती और बिना आस्था के धर्म का प्रचार संभव नहीं होता। कल्पना को टिकने के लिए कुछ न कुछ चाहिए- मसलन कोई मिथक, कोई महाकाव्य या गोस्पेल (जीवनचरित या लीलाचारित)। ‘जिसे पत्रकारिता की भाषा में कहानी कहते हैं’। अमूर्त्त विश्वासों को मूर्त्त किये बिना या किसी रसमय साहित्यिक अभिव्यक्ति के बिना आस्था का टिकना मुश्किल है। इसलिए अंबेडकर को पुराने धम्मपद के बदले एक सरस, प्रवाहमयी, हृदयग्राही और एक ‘सम्मोहिनी शक्ति’ से युक्त, हर जगह अपने साथ रखने सकने योग्य, सुवह्य ‘बुद्ध चरित’ की सख्त ज़रूरत महसूस हो रही थी। वह एक ऐसे ‘बुद्ध-चरित’ में चार चीजें आवश्यक मानते थे। :- १.बुद्ध का संक्षिप्त जीवन परिचय, २. चीनी धम्मपद,३. बुद्ध के कुछ प्रमुख संवाद, ४. बौद्ध उत्सव, जन्म-मृत्यु, विवाह आदि के संस्कार। बाइबिल के गोस्पेल के उच्च साहित्यिक गुणों के बारे में हमने पीछे चर्चा की थी और आस्था के महत्त्व को भी रेखांकित किया था। साहित्यिक आस्था एक चीज़ है और धार्मिक एकदम दूसरी। अंबेडकर धर्म के प्रचार के लिए आस्था और आस्था के लिए साहित्यिकता की भूमिका दोनों महत्वपूर्ण मानते थे। साहित्यिकता धार्मिक आस्था के सन्दर्भ में यहाँ वैसे ही है जैसे बुल्के के लिए। दूसरे शब्दों में, अंबेडकर को भी ‘धर्म की रसात्मक अभिव्यक्ति’ की ज़रूरत महसूस हो रही थी। इस अर्थ में यह भक्ति साहित्य था, और धर्म का प्रचार भक्ति के बिना असम्भव था। भक्ति एक ‘सम्मोहिनी शक्ति’ थी, जो खुद धर्म के वशीभूत थी। बाइबिल का यह रूप बुद्ध को लगभग अवतार बनाता है। ऐतिहासिक तो बुद्ध थे ही।

भिक्खु संन्यासी या साधु की तरह संसार से विरक्त रहने वाला व्यक्ति नहीं होता बल्कि इसी जीवन के भीतर संघर्षरत होता है। इस जीवन के अतिरिक्त उसे किसी पारलौकिकता की कामना नहीं होती। बुल्के जिस अर्थ में कर्मबन्धन और पुनर्जन्म के विश्वास के कारण कर्म की निष्कामता को हिंन्दु धर्म और अवतारवाद का दोष मानते थे, अंबेडकर भी उन्हीं अर्थों में ‘मुक्ति की इहलौकिकता’ के लिए एक ही जीवन और उसी जीवन में मुक्ति के बौद्ध-मत को संघ के भिक्खु का आदर्श बताते हैं। मुक्ति के लिए केवल पैशन नहीं बल्कि धर्म के संगठित प्रचार की सक्रियता ज़रूरी थी। वास्तव में एक नए समाज का निर्माण उनका उद्देश्य था। बुद्ध को इन्हीं अर्थों में संघ की ज़रूरत महसूस हुई थी। अंबेडकर कहते हैं कि साधारण मनुष्य केवल आस्था के सहारे मुक्ति नहीं पा सकता। उसे वास्तविक सामाजिकता में बदलने के लिए ही संघ की स्थापना की गयी है। एक ऐसा मॉडल समाज जससे सामान्य जन प्रेरणा पा सके, शिक्षा पा सकें और धम्म की वास्तविकता में उनकी आस्था दृढ़ होती जाये। दूसरे शब्दों में कहें, तो बौद्ध धर्म का इहलौकिक समाजीकरण संभव हो पाए। यह संपूर्ण धर्मान्तरित सक्रिय समाज का आदर्श बन सके। इसी आवश्यकता के चलते बुद्ध ने संघ की स्थापना की और उसे विनय के नियमों से बाँध दिया। विनय के नियम संघ के सामाजिक जीवन की नैतिक आचार-संहिता थी।

अंबेडकर कहते हैं कि इसके अलावा भी संघ का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य था। वह संघ को बौद्धिकों का एक ऐसा संगठन बनाना चाहते थे जो साधारण जनों का सच्चा और निष्पक्ष निर्देशन कर सके। संघ सक्रिय बौद्धिकों का संगठन था। इन बौद्धिकों का काम शुद्ध मनन-चिंतन करना नहीं बल्कि समाज सेवा और धम्म की सच्ची शिक्षा का प्रचार करना है। ये दोनों काम अलग-अलग संभव नहीं हैं। उसी प्रकार वैज्ञानिक चेतना के प्रसार के बिना धम्म की रक्षा और उसका प्रसार असम्भव है। भिक्खु अपने समय के ज्ञान-विज्ञान के अधुनातन निष्कर्षों का और उसकी प्रामाणिकता और सत्यता का प्रचार कर, मिथ्या विचारधाराओं के धुंध को जनता के चित्त से दूर करता है। उनका कहना था कि इस महती उद्देश्य के लिए बुद्ध भिक्खुओं के लिए संपत्ति का निषेध करते हैं। बुद्ध जानते थे कि स्वतंत्र चिंतन और निष्पक्ष विचारों के लिए सबसे बड़ी बाधा संपत्ति थी। जनता की स्वतंत्र सेवा के लिए संपत्ति का त्याग बहुत ज़रूरी था। बुद्ध भिक्खुओं को शादी न करने और आजीवन ब्रह्मचर्य के पालन का निर्देश भी इसी सेवा के लिए देते थे। हालाँकि संघ में स्त्री और पुरुष की समानता का सिद्धांत था। अंबेडकर ब्रह्मचर्य के उच्च आदर्श और स्त्री-पुरुष समानता के सिद्धांत के बीच कोई अंतर्विरोध नहीं देखते थे। वैसे भी बुद्ध के समय तक स्त्रियों को भी संपत्ति माना जाने लगा था!

 बौद्धिकों के सक्रिय संगठन के मॉडल के लिए ही वह जेसुइट संघ से सीखने की सलाह दे रहे थे। अंबेडकर लिखते हैं कि पीड़ित मानवता की सेवा के लिए अगर आज कोई कुछ करना चाहता है तो उसके सामने ‘राम कृष्ण मिशन’ को छोड़ कर और कोई रास्ता नहीं मिलता। ऐसे में संघ की आवश्यकता समाज के अंदर महसूस भी हो रही है लेकिन कोई और उदाहरण समाज के सामने नहीं है। ईसाई मिशनरियों के वह खिलाफ थे क्योंकि वहां भी ईश्वर मौजूद था। धम्म के सिवा विश्वमानवता के सामने कोई और रास्ता संभव नहीं दिख रहा था। इसलिए अंबेडकर हजारों श्रद्धालुओं के बदले थोड़े लेकिन आस्थावान-विद्वान्-सक्रिय भिक्खुओं की परम आवश्यकता को सामने रह रहे थे। उच्च शिक्षित ऐसे भिक्खुओं की एक छवि हम बुल्के में भी देखते हैं जिसकी तरफ अंबेडकर इशारा कर रहे थे। क्या यह केवल संयोग है कि केदारनाथ सिंह के भक्त हनुमान् और अंबेडकर के उच्च शिक्षित भिक्षु दोनों रूपों में बुल्के की छवि हमारे सामने प्रकट होती है !

 बुल्के के लिए नैतिकता पूरी तरह धार्मिक थी। वह राज्य के विकास के साथ इसी धार्मिकता को स्वर्ग के राज्य में रूपांतरित देखना चाहते थे। अंबेडकर की तरह यहाँ भी नैतिकता और धार्मिकता में कोई फर्क नहीं था। धर्म स्वयं में पवित्र और सार्वजनीन नैतिकता है। विश्वबंधुत्व स्वयं नैतिकता है। विश्वबंधुत्व की इस पवित्र नैतिकता के दर्शन बुल्के को तुलसी के मानस में होता है। वह बुद्ध के बदले उत्तरभारत की जनता के बीच इस पवित्र सामान आचार-संहिता की पूर्व-उपस्थिति और उसके सर्वोत्तम विकास का पूर्व-स्वप्न तुलसीदास के यहाँ देखते हैं। उनके लिए तुलसी स्वयं एक आश्चर्य थे। वैसे ही जैसे इवोर ब्राउन के लिए शेक्सपियर।[33]

सन्दर्भ :

[1] फ़ादर क्विराइन, गीदो गैज़ेल, डा. बुल्के स्मृति ग्रन्थ (सं. दिनेश्वर प्रसाद और श्रवण कुमार गोस्वामी), पृष्ट २१२-२१३, डा. बुल्के स्मृति ग्रन्थ समिति, रांची, १९८७

[2] फ़ादर कामिल बुल्के : भारतीय संस्कृति के अन्वेषक, शैल सक्सेना, पृष्ठ १७, प्रिय साहित्य सदन, दिल्ली, २०१४

[3] वही, पृष्ठ ३४

[4] वही, पृष्ठ ३७

[5] बुल्के, ‘एक ईसाई की आस्था, हिंदी प्रेम और तुलसी’, हिंदी चेतना, अंक- जुलाई-अगस्त २००९, पृष्ठ- ३३

[6] बुल्के स्मृति ग्रन्थ, पृष्ट ४३८

[7] वही.

[8] वही, पृष्ठ ४४०

[9] समाज और साहित्य, मुक्तिबोध रचनावली, खंड पांच, पृष्ठ ५४-५५

[10] रामकथा, कामिल बुल्के, पृष्ठ ५७९; हिंदी परिषद् प्रकाशन, इलाहबाद विश्वविद्यालय, इलाहबाद– २०१२

[11] वही, पृष्ठ ५८१

[12] मानस कौमुदी, डा. कामिल बुल्के, डा. दिनेश्वर प्रसाद; पृष्ठ ४-५, अनुपम प्रकाशन, पटना – १९८४

[13] रामकथा, पृष्ठ ५३४

[14] हनुमान् की जन्मकथा, बुल्के, हिंदी अनुशीलन, वर्ष ३, अंक ३, २००७ विक्रमी

[15] रामकथा, पृष्ठ ५४९

[16] वही, पृष्ठ ७८

[17] वही

[18] वही

[19] देखें शेल्डन पोलॉक, द लैंग्वेज ऑफ़ द गॉड्स इन द वर्ल्ड ऑफ़ मेन, विशेष रूप से अध्याय पांच, यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफोर्निया प्रेस, लन्दन २००६

[20] रामकथा, पृष्ठ ५९१

[21] बुल्के, हिंदी के प्रति हिंदी भाषियों का कर्तव्य, पृष्ठ ४०

[22] वही

[23] रामकथा एंड अदर एसेज, कामिल बुल्के, (सं.) डा. दिनेश्वर प्रसाद, पृष्ठ १५८, वाणी प्रकाशन, दिल्ली २०१०

[24] बुल्के लिखते हैं कि इन जाति बाह्य वर्गों के आधुनिक उत्तराधिकारी करीब पचास मिलियन की आबादी वाले हैं. बीस मिलियन से अधिक आबादी उन जनजातियों की है जिन्हें आर्य जीत नहीं पाए और जो आने वाली अनेक सदियों तक खुद क आर्यों के संपर्क से दूर जंगलों में अपने आप को बचाती और रहती आ रही हैं. जनजातियों या आदिवासियों की इतिहास विहीन छवि बुल्के के लिए भी मान्य थी. इसके हिसाब से ही वह आदिवासियों की समस्याओं पर विचार करते हैं. देखें, वही, पृष्ठ-१५७

[25] वही, पृष्ठ- १६०

[26] “I have often tried to make them realise their resposibility towards the truth by saying; “You believe in rebirth, I believe that there is no rebirth, one of us is wrong.” When they hear this they are shocked, shake their head and answer: “It is not as simple as all that.”” pp 162

[27] यह बात ध्यान देने लायक है कि ग्राम्शी जेसुइट ईसायत को लोकप्रिय जनता के लिए शुद्ध नार्कोटिक कहते हैं. देखें: प्रिज़न नोटबुक्स. पृष्ठ-३३८.

[28] अवतार एंड इनकार्नेशन, रामकथा एंड अदर एसेज, कामिल बुल्के, (सं.) डा. दिनेश्वर प्रसाद, पृष्ठ -१६८-१९४. वाणी प्रकाशन, दिल्ली २०१०

[29] वही- १७८.

[30] वही.

[31] “We want fewer Bhikkhus and we want Bhikkhus highly educated, Bhikkhu Sangha must borrow some of the features of the Christian priest-hood particularly the Jesuists. Christianity has spread in Asia through service-educational and medical. This is possible because the Christian priest is not merely versed in religious lore but because he is also versed in Arts and Science.”  B.R. Ambedkar in Buddha and Future of His Religion.Published inMay 1950 Vaishaka issue of the Maha Bodhi Society journal. (http://www.clearviewproject.org/engagedbuddhistwriting/buddhaandthefutureof.html)

[33] रामकथा एंड अदर एसेस. पृष्ठ-१४४.

मार्तण्ड  प्रगल्भ

मार्तण्ड प्रगल्भ

छात्र राजनीति और संस्कृति-कर्म में व्यस्त रहने वाले मार्तण्ड प्रगल्भ जे.एन.यू. के भारतीय भाषा केंद्र से पी.एच.डी. हैं. फ़िलहाल  रेडिकल नोट्स कलेक्टिव  के साथ कार्यरत हैं. उनसे mpragalbha1@gmail.com पर संपर्क संभव है.

प्लाथ की कवितायें, स्त्री व्यक्तित्व के दुहरे आत्मनिर्वासन की सच्चाई: मार्तंड प्रगल्भ

सिल्विया प्लाथ अमेरिका की लेखिका थीं. ऑस्ट्रियन मूल की पर दो पीढ़ी पहले से अमेरिकी हुए परिवार से प्लाथ की मां आयीं थी और पिता जर्मन थे. १९३२ में जन्मी सिल्विया प्लाथ ने काफी कम उम्र से ही लेखन को गंभीरता से लेना शुरू कर दिया था. पिता यूनिवर्सिटी में जीवविज्ञान के प्रोफेसर और प्रसिद्ध कीटविज्ञानी थे और प्लाथ के जीवनीकार बताते हैं की प्लाथ का उनसे रिश्ता तनाओं भरा था. तीस साल की उम्र में जब प्लाथ का त्रासद अंत हुआ प्लाथ का प्रकाशित-अप्रकाशित विपुल लेखन अस्तित्व में आ चुका था. कवि टेड ह्युग्स के साथ प्लाथ को प्रेम हुआ,उससे शादी हुई और वह दो बच्चों की मां भी बनी. अंत के दिनों में उनका संबंद्ध- विच्छेद हो गया था पर उसका कानूनी साक्ष्य नहीं है. प्लाथ के मित्रों में ज़्यादातर अमेरिकी और इंग्लिश लेखक थे. पहले अमेरिका के स्मिथ कॉलेज में प्लाथ ने अकादमिक एक्सलेंस के साथ दोस्तोवस्की के उपन्यासों में द्विधाविभक्त चरित्रों के ऊपर अपना अंडरग्रेजुएट थीसिस जमा किया, बाद में वजीफे के साथ कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी चली आई. आमतौर पर आलोचकों ने प्लाथ की रचनाओं को ‘आत्म-स्वीकारात्मक कविता’ (कन्फेसनल पोएट्री) को आगे बढ़ाने वाला माना है. अपने छोटे जीवन-काल में प्लाथ को भयानक अवसाद के दौर से भी गुजरना पड़ा था. वह अंतिम दिनों में अनिद्रा और गंभीर अवसाद से जूझ रही थी. प्लाथ ने तीन बार आत्महत्या की कोशिश की. अंतिम बार उसने यह कोशिश ११ फरवरी १९६३ को की. #लेखक

Sylvia Plath

Sylvia Plath

 

व्यक्ति स्वातंत्र्य की त्रासदी और सिल्विया प्लाथ की कविताएँ

By मार्तंड प्रगल्भ

प्लाथ की आरंभिक कविताओं में उसके पसंदीदा कवियों की छाप दिखती है. परन्तु इन कविताओं में भी सिल्विया प्लाथ की एकान्तिक काव्य यात्रा के निशान मिलते हैं. किसी पेंटिंग या प्राकृतिक दृश्य के प्रभाव से या रोज़मर्रा के अन्य जीवनानुभव और उनके संदर्भों से शुरू होने वाली कविताओं में एक धूसर-काली मनोदशा आकार ग्रहण करती है. ये मनोदशाएँ विकृत मानवीय सम्बन्धों के बीच अपने अस्तित्व की तलाश के क्रम में बनने वाली मनोदशाएँ हैं. इन मनोदशाओं में अस्तित्व की सार्थकता अपनी आत्म-पहचान की खोज में बदलती जाती है. दोस्तोवस्की के उपन्यासों में ‘डबल’ या आत्मा की दुई के बारे में प्लाथ का अध्ययन आत्म और उसकी पहचान की ज्ञानात्मक संवेदना के सैद्धांतिक आयाम का पता देती हैं. स्वतंत्र मनुष्य का रूप कैसा होगा, यह प्रश्न नाज़ी होलोकास्ट और द्वितीय विश्वयुद्ध की छाया से आक्रान्त था. स्वतंत्र मनुष्य के बने बनाए मॉडल के ध्वंस के बीच बन रही ये मनोदशाएँ अपनी अभिव्यक्ति का रास्ता तलाशती हुई मिथकीय सन्दर्भों से जुड़ती चली जाती है. ये मिथकीय सन्दर्भ ज़्यादातर प्रेम, मृत्यु और पुनर्जीवन के हैं. धीरे-धीरे मिथकीय चेतना का अनवरत दुहराव प्लाथ के लिए एक बंद घेरे में बदलता गया. एक बंद घेरे वाली एकांतिकता का निर्माण वहां होता है जहाँ अनुभव प्रसूत काव्य संवेदनाएं आत्म की दो विरोधी गतियों से संघर्ष करती हुई इन विरोधी गतियों के अतिक्रमण के लिए स्वयं मिथकीय संवेदना में रूपांतरित होती जाती है. रचनाकार इस चक्र से निकलने के लिए आवेगमय प्रतिक्रियाएं करती है. इन प्रतिक्रियाओं की परिणति जीवन में और रचना के भीतर निर्णय लेने में होती है. प्लाथ की रचनाओं में हम इन निर्णयों को आसानी से पहचान सकते हैं. उसकी काव्य-नायिकाओं की आत्महंता आस्था मृत्यु के निर्णय में परिणत होती है.

फ़ासिस्म की मिथकीय चेतना से संघर्षरत प्लाथ के काव्य की मिथकीयता वस्तुतः एक दूसरे की पूरक बन गयी है. चेतना की इन दो विरोधी धाराओं में मृत्यु के दृश्याभास या स्पेक्टेक्ल का साझा है. ध्वंसावशेष के रूप में वर्तमान व्यक्ति-मुक्ति के बुर्जुआ स्वप्नों का भी ध्वंसावशेष था. व्यक्ति रचनाकार का अंतर्मन मुक्ति के स्वप्नों के पूरा होने से पहले ही उन स्वप्नों के ध्वंसावशेष को अपने सामने यथार्थ पाता है. स्त्री-पुरुष सम्बन्धों में यह ध्वंसावशेष प्रेम के स्वप्न का ध्वंसावशेष है. प्रेम का निर्णय और व्यक्ति-स्वातंत्र्य की आवेगमय कामना दोनों विध्वंस के दुहराव में उलझ जाती है. प्लाथ की काव्य-नायिकाएं इस ध्वंस की त्रासद मनोदशा से संघर्ष करती हैं, निर्णय लेती हैं और बार-बार पराजित होती हैं. प्लाथ के एक आरंभिक सोनेट से इस मनोदशा के निर्माण का कुछ पता मिलता है. इस सानेट की प्रेरणा प्लाथ को इटैलियन चित्रकार ज्योर्जिओ दे सिरीको की एक पेंटिंग से मिली. पेंटिंग का शीर्षक ही कविता का भी शीर्षक है: ‘ध्वंसावशेषों की आपसी बातचीत’. पेंटिंग में दूर-दूर तक फैले पथरीले बियाबान में बिना छत बिना दीवारों का एक कमरा है. कमरे के खम्भे टूट गए हैं. दरवाजा है जिसकी केवल चौखट ही बची है. दरवाजे के दोनों पल्ले समानांतर खुले हैं. दरवाजे की तरफ मुंह किये एक संभ्रांत महिला शास्त्रीय परिधानों में सजी धजी बैठी है. उसकी गर्दन बायीं ओर हलकी सी मुड़ी है और वह एक सूटेड-बूटेड पुरुष की आँखों में देख रही है. पुरुष के ठीक पीछे एक अलमारी है और उससे लगा एक टूटा हुआ खम्भा जिससपर किसी यूनानी हीरो की तस्वीर है जो हुबहू पुरुष की तरह दिखता है और चित्र में उसी मुद्रा में कुछ देख रहा है जिस मुद्रा में वह पुरुष उस संभ्रांत महिला को देख रहा था. प्लाथ की कविता में इस चित्र के निर्माण की फैंटेसी बनती है. चित्र की संभ्रांत महिला प्लाथ की काव्य-नायिका में बदल जाती है. वह स्वयं उस चित्र के ट्रैजिडी का इतिहास पुरुष को बता रही है. दरवाजे के सामने बैठी वह पुरुष को अपने वैनेले आवेश के साथ अपने भव्य घर की पोर्टिको से ‘रौबदार’ गुजरते देख रही थी. वह गुजरता जाता था:

… छिन्न भिन्न करते जाल को

शिष्टाचार के सारे नियमों के जो बवंडर को पीछे

थामे रखते हैं

और बवंडर उसके पीछे विध्वंस करता आ रहा था. शानदार तम्बूरे और मोर नष्ट हो गए, फलों के बाग़ उजाड़ हो गए और अब भव्य दीवारें ढह गयीं हैं. भयानक खंडहरों के ऊपर कौए शोर करते हैं और तुम्हारी तूफानी आँखों की उजाड़ दृष्टि का जादू वैसे ही उड़ान भरता है जैसे पहली किरण के साथ कोई चुड़ैल महल से उड़ जाती है. चट्टानी बियाबान टूटे खम्भों के फ्रेम में जड़ है और


जब तुम कोट और टाई में धीरोदात्त खड़ो हो, मैं बैठी

ग्रेसियन ट्यूनिक और साइकी-नॉट में सजी-धजी

तुम्हारी काली आँखों में जड़वत, नाटक त्रासद हो गया:

हमारी उजाड़ रियासत पर ऐसे कठोर तुषारापात के बीच

शब्दों का कैसा उत्सव इस विनाश को ढँक सकता है?

अन्दर बाहर के इस भयावह बियाबान में प्लाथ की काव्य-नायिकाएं वृहत्तर दुःख और पीड़ा को स्वानूभुत कर उसकी सच्चाई को अपनी पहचान में पक्का करना चाहती हैं. इस पीड़ा या दुःख की चरम परिणति मृत्यु के अनुभव की प्रबल होती आकांक्षा है. जो जिंदा है किसी न किसी तरह से दुःख का कारक भी है. व्यक्ति-अनुभूत पीड़ा और पीड़ित का द्वैध इन काव्य-नायिकाओं की आत्मा में दुई पैदा करती है. जहाँ एक ओर उत्पीड़क संरचना यथार्थ है वहीँ दूसरी ओर व्यक्ति-केंद्रित सच्ची अनुभूति की खोज एकान्तिक उत्पीड़कों/उत्पीड़ितों की पहचान के द्वंद्व में उलझ जाती है. ऐसी स्थिति में पीड़ित के अनुभवों की ईमानदारी और पीड़ित का विरोध ये दोनों ही मृत्यु संदर्भित हो जाते हैं. अंग्रेज़ी दुनिया में अमेरिकी उदार व्यक्तिवाद अपनी सार्थकता के लिए होलोकास्ट की मृतक छाया से व्यक्ति-मुक्ति के वास्तविक प्रश्नों को ढँक देती थी. यह संभव होता था मृत्यु को स्पेक्टेकल बना कर पेश करने से. प्लाथ की काव्य-नायिकाएं इस अमेरिकी जीवन-पद्धति के आक्रामक स्वरुप से भी विद्रोह करती हैं. यह विद्रोह देह-विद्रोह में रूपांतरित होता है. इन नायिकाओं के लिए व्यक्ति स्वातंत्र्य की उदारता उत्पीड़ितों को न केवल आत्मसमर्पण के लिए बाध्य करती है वरन उसे सुखी जीवन का आदर्श मॉडल भी साबित करती है. यह उदारता उन काव्य-नायिकाओं के लिए फासिस्ट हिंसा का ही दूसरा पहलू है. इनका द्विधा-विभक्त आत्म जिस गिरह से बंधा है वह हिंसा की ही गिरह है. सभ्यता के गर्भ में छिपी हिंसा से जुड़ कर वह प्रासंगिक हो उठी है. प्रेम, मातृत्व और घर की ओर वापसी जैसे उनके निर्णय हमेशा द्विधा-विभक्त अनिर्णय के साथ आने से कविता में अतिरिक्त आवेगमय शक्ति के रूप में प्रकट हुए हैं. ‘द स्नोमन ऑन द मूर’ कविता की काव्य-नायिका अपने प्रेमी से निरंतर युद्ध्मान स्थितियों के एक क्षण में विजय की अपनी तीव्र आकांक्षा के साथ विच्छेद को स्वीकार करती है. वह तमतमाई हुई जब कमरे से बाहर बियाबान में निकलती है तो उसका अंतिम क्रोध भरा ताना है- ‘आओ मुझे खोज लो’. उसे विश्वास है कि बाहर के बर्फीले-उजाड़-बियाबान से गुजरते हुए भी वह जीतेगी और एक दिन वह घुटनों के बल उसके सामने बैठा होगा. दुनिया के सफ़ेद किनारे पर खड़ी वह सारे नरक को बुलावा देती है उस उद्दंड आदमी की सत्ता की घेरे-बंदी के लिए. और दूर सामने से आता एक शैतान दीखता है उसे. कोई आग उगलने वाला, क्रोधोन्मत्त और गर्वोन्नत राक्षस नहीं बल्कि संयमी, हृष्ट-पुष्ट, गंभीर और डरावनी कद काठी का वह शैतान लाश की तरह सफ़ेद दिखाई पड़ा. प्रेमविहीन आँखों वाले इस शैतान के क़दमों की धाक से दर्जनों पखेरूओं की लाश हवा में बिखर जाती थी. पर इससे भी बुरी बात यह थी कि उसने


… काँटों जड़ी पट्टी पर झूलते देखा

औरतों की नाचती खोपड़ियाँ

शोक से सूखी जीभों से कलकलाती अपने अपराध:

‘हमारी बुद्धि ने मूर्ख बनाया

राजाओं को, राजाओं के दुर्बल बेटों को: हमारी प्रतिभाओं ने

दरबारों का दिल बहलाया:

उसी शेखी के लिए , हम इन लौह जंघाओं से नथे हैं.’

राज सिंहासन पर विराजमान धंसा हुआ

एक बर्फीले तूफ़ान में, अपने चमकते विजय-चिह्नों के साथ वह शैतान दहाड़ उठा.

कुल्हाड़ी की मार के आवेग से

वह लजा कर पीछे हट गयी: एक सफ़ेद सनसनी! और वह शैतान, चलते हुए

धुंध में खो गया.

विनीत तब, और रोती हुई,

वह लड़की घर की ओर मुड़ गयी, लबालब भरी हुई भली बातों

और नम्र अनुपालन से.

प्लाथ की काव्य-नायिकाओं के लिए घर से संबंद्ध-विच्छेद मृत्यु की स्वीकारोक्ति भी है. पर ये जानती हैं कि यह सब कुछ सच नहीं है. यह सब नैसर्गिक नहीं है. एक गहन संदेह के खिलाफ इन्हें तलाश है किसी विश्वास की, जो दिया हुआ कहीं नहीं है. उसे शुद्ध मस्तिष्क रच नहीं सकता. उसके खिलाफ देह विद्रोह होगा और उसकी सत्ता मिट जायेगी. ‘नैसर्गिक इतिहास’ कविता में यह विश्वास अपने वृहत्तर ऐतिहासिक परिपेक्ष्य में व्यक्त हुआ है. ‘उन्मत्त सम्राट, दिमाग एक उजाड़ देश पर राज करता. मलमल पर सोने वाला और कबाब में धंसे हुए उस सूअर का प्रेम केवल शुद्ध दर्शन में लीन होना था. जब उसकी प्रजा भूखी और नंगी थी वह तारों और फरिश्तों के संग बातें कर रहा था. पर ऐसा वह जारी नहीं रख सकता:


…अपने राजा की दुष्ट दैवीय वायु से तंग ,

धरती से जन्मे वे सामान्य जन एक शरीर में

उठ खड़े हुए और शाही धमनियों को बंद कर दिया…

स्वयं में सर्व शक्तिमान की सत्ता टिक नहीं सकती. सामान्य जन का शरीर उसे एक करेगा और वह विद्रोह करेगा. देहविद्रोह की सत्यता नैसर्गिक है. यहाँ दिमाग शुद्धात्मवादी का प्रतीक भी है. शुद्धात्मवादी दिमाग खुद को ब्रह्म समझने लगता है. उसे लगता है कि बाह्य यथार्थ सारा का सारा उसी के कारण है. ‘एक शुद्धात्मवादी का आत्मवक्तव्य’ शीर्षक कविता का ‘मैं’ शुद्ध नियंत्रण मात्र है. इसकी घोषणा है. यह शुद्ध शक्ति की सर्वव्याप्ति का प्रतीक है. पुरुषसत्ता और उसके अनन्तर फासीवाद की वैयक्तिक सत्ता की आत्म-मुग्धता का उद्घोष है:


मैं

घरों को सिकुड़ने देती हूँ

और पेड़ों को गायब होने

दूर जाते हुए; मेरी नज़रों की लगाम

कठपुतली-जनों को झुलाते हैं

उनको, जो नहीं जानते कि कैसे झूलते हैं,

हंसते हैं, चूमते हैं, और शराब पीते हैं

परन्तु इस निर्णय से अनुभवों की मुक्ति नैसर्गिक है. इतिहास सम्मत है. पर वह कहीं वास्तव में प्राप्य नहीं. ऐसी स्थिति में प्लाथ की कवितायें प्रेम की ओर, उसके विश्वास की ओर लौट आती हैं. इन कविताओं में प्रेम की अवश्यम्भावी विजय का उद्घोष बार-बार होता है. यह रूमानी प्रेम का आवेग, यह भाव जगत का विद्रोह झूठा नहीं है. प्लाथ की कवितायें इस सच की ‘संवाददाता’ हैं:


पत्ती की तश्तरी पर बैठे घोंघे का शब्द?

यह मेरा नहीं है. इसे स्वीकार मत करो.

एक सील्ड डिब्बे में एसिटिक एसिड ?

इसे स्वीकार मत करो. यह सच्चा नहीं है.

अपने सीने में सूरज को धारण किये सोने का छल्ला ?

कई झूठ. कई झूठ और एक विषाद.

…….

आइनों में एक विक्षोभ,

अपने धूसर को चकनाचूर करता सागर-

प्रेम करो, प्रेम करो मेरी ऋतु.

जितना प्रेम पर यह विश्वास सच्चा है उतने ही सच हैं प्रेम के खंडहर. एक मन यह भी विश्वास करता है कि बार-बार अनुभव-जगत का एक सर्वसत्ता के सामने समर्पण एक झूठ है और ‘मृत्यु’ के अनुभव की सच्ची अभिव्यक्ति के बिना प्रेम में आस्था को पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता. सर्वथा स्वतंत्र व्यक्तिगत अनुभवों की तलाश में ये नायिकाएं मिथकीय और धार्मिक अनुभव संसार में विश्वास के लिए जाती हैं. समस्या तब और भी गहरी हो जाती है जब स्वतंत्रता की यह तलाश मिथकीय संवेदना में भी तुष्ट नहीं होती. अतिरेकवादी पूर्णता के दोनों छोर हिंसा के सिवा कुछ भी साझा नहीं रखते. असफलता के बारम्बार अनुभव से आक्रोशित आत्म अपने चरम विरोध से ही प्रेम करने को बाध्य होता है. ‘डैडी’ कविता की काव्य-नायिका कहती है:


हर महिला पूजती है एक फासिस्ट,

चेहरे पर बूट, निर्मम

निर्मम हृदय तुम्हारे जैसे किसी क्रूर का.

इस चरम विरोध से अतिक्रम के लिए, स्त्रीत्व से अतिक्रमण के लिए ये काव्य-नायिकाएं एक बेघर-बार मूल अनुभव की ओर आकर्षित होती हैं. वह बार-बार मरती हैं केवल अपने चरम-विरोधी आत्म से सारा मामला निबटा लेने को. यहाँ भी विरोधी आत्म-युग्म जर्मन-यहूदी आत्म-युग्म से जुड़ कर सभ्यता मूलक हो गया है.


एक इंजिन, एक इंजिन

हवा में एक यहूदी की तरह मुझे उड़ाते हुए.

एक यहूदी को दशाऊ, ऑश्वित्ज़, बेलमेन.

मैंने यहूदी की तरह बात करना शुरू कर दिया.

मैं सोचती हूँ यहूदी होती तो कहीं अच्छा था.

टायरोल की बर्फ, वियना की साफ़ बीयर

बहुत शुद्ध और सच्चे नहीं हैं.

अपनी जिप्सी पुरखिनियों और अपने उजड्ड भाग्य के साथ

और साथ में मेरा टारोक पैक और मेरा टारोक पैक

मैं तनिक तो यहूदी होती.

इस मूल बेघर-बार को पाने के लिए वह बार-बार मरती है. मूल विरोधी/विद्रोही/पीड़ित आत्म को पाने के लिए वह सारी मध्यस्थताओं को निरर्थक साबित करना चाहतीं हैं. वह बार-बार लौट कर अपने मूल में ही उसका विनाश करना चाहती हैं.


मैं दस की थी जब उन्होंने तुम्हें दफनाया.

बीस में मैंने मरने की कोशिश की

और तुम्हारे पास, वापस, तुम्हारे पास वापस लौटने की .

यहाँ तक कि हड्डियाँ भी ऐसा करेंगी मैंने सोचा.

विरोधी/विद्रोही मूल आत्म के खरे रूप में प्राप्त करने की यह तीव्र लालसा ‘लेडी लजारस’ नामक कविता में सबसे स्पष्ट है. लाजरस ईसा की चमत्कारपूर्ण कहानियों में मिलने वाला एक मिथकीय चरित्र है. यहाँ मृत्यु की पृष्ठभूमि में पुनर्जन्म एक स्पेक्टेकल में बदल जाता है. लजारस की बहनों ने लजारस की बीमारी की खबर ईसा को पहुंचाई थी. ईसा ने जान-बूझ कर जाने में देरी की. जब तक पहुंचे तब तक लाजरस को मरे चार दिन बीत चुके थे. ईसा ने उसे पुनर्जीवित कर दिया. इस चमत्कार से यहूदियों का विश्वास ईसा में इतना बढ़ गया की धर्माधिकारिओं ने इस विश्वास को मारने के लिए लजारस को फिर से मृत्युदंड दिया. प्लाथ की काव्य नायिका खुद को स्त्री लाजरस के रूप में पुनर्रचित करती है और उस पुनर्जीवन के चमत्कार से अपने आत्म को मुक्त करने का विश्वास व्यक्त करती है. व्यक्ति स्वातंत्र्य की आत्मगत पहचान की यह कामना बुर्जुआ स्वप्नों की भयानक त्रासदी की अभिव्यक्ति है. यह बुर्जुआ मानवीय सम्बन्धों के ‘वैम्पायर’ को मारने के लिए खुद को मार कर स्वन्त्रत होने की त्रासदी है


क बार फिर मैंने यह किया.

प्रत्येक दस में से एक साल

मैं ऐसा करती हूँ-

जैसे एक चलायमान चमत्कार, मेरा शरीर

एक नाजी लैम्पशेड सा उज्ज्वल

मेरा दाहिना पैर

एक पेपरवेट,

मेरा चेहरा एक लक्षणहीन, महीन

यहूदी लिनेने.

……..

मरना

एक कला है, जैसे बाकी सब.

मैं इसे बखूबी करती हूँ.

मैं इसे करती हूँ इसलिए यह नरक की तरह महसूस होता है.

मैं इसे करती हूँ इसलिए सच महसूस होता है

मेरा अंदाजा है तुम इसे मेरी प्रकृत नियति कहोगे.

……

श्रीमान ईश्वर, श्रीमान लूसिफर

खबरदार

खबरदार.

राख से

मैं अपने लाल केशों के साथ उठती हूँ

और मैं आदमियों को हवा की तरह खाती हूँ.

प्लाथ की कवितायें स्त्री व्यक्तित्व के दुहरे आत्मनिर्वासन की सच्चाई है. एक अप्राप्य, असंभव आत्मिक एकांतिकता का आवेगमय और रोमांटिक दुस्स्वप्न!

मार्तण्ड  प्रगल्भ

मार्तण्ड प्रगल्भ

छात्र राजनीति और संस्कृति-कर्म में व्यस्त रहने वाले मार्तण्ड प्रगल्भ जे.एन.यू. के भारतीय भाषा केंद्र से पी.एच.डी. हैं। उनसे mpragalbha1@gmail.com पर संपर्क संभव है।

लोकप्रियतावाद और सेंसरशिप बनाम कलाभिव्यक्ति और सहिष्णुता. वक्रतुंड महाकाय…

By मार्तंड प्रगल्भ

बहस-मुहाबसों और वाम-राजनीति के लिए जाने जाने वाले जे.एन.यु  परिसर की एक सांस्कृतिक-संध्या आज-कल चर्चा का विषय बनी हुई है. इस चर्चा ने कुछ महत्वपूर्ण और मौजूं सवालों को केंद्र में लाया है. उन सवालों से उलझने के पहले हम उस खास सांस्कृतिक-संध्या और और उस खास घटना का ज़िक्र करना चाहेंगे जिसने मौजूदा विवाद को जन्म दिया है.

          बात पहली मई की है. पहली मई यानी मजदूर-दिवस की है. इस मजदूर दिवस के दिन जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय छात्र-संघ की ओर से पाकिस्तान के वामपंथी सांस्कृतिक संगठन ‘लाल बैंड’ को आमंत्रित किया गया था, जिसने इस खास कार्यक्रम के लिए ही अपनी भारत-यात्रा को मई की दूसरी तारीख तक बढ़ा दिया था.वरना वो तो पहले ही पाकिस्तान लौट गए होते. साथ में जनसंस्कृति मंच के सांस्कृतिक संगठन ‘हिरावल’ को भी पटना से खास तौर पर बुलाया गया था और जिसने फैज़ अहमद फैज़ की मशहूर नज़्म ‘इन्तिसाब’ से इस शाम का आगाज़ करना था.  तयशुदा ढंग से ही कार्यक्रम शुरू हुआ. और इन्तिसाब के बाद मुक्तिबोध की ‘अँधेरे में’ का एक हिस्सा ‘ओ मेरे आदर्शवादी मन’ ,वीरेन डंगवाल की ‘हमारा समाज’ और ‘विश्व के बाज़ार की खिल्ली उडाता’ ,गोरख के नवगीत को समर्पित दिनेश कुमार शुक्ल की ‘जाग मेरे मनमछंदर’ तक आते आते ‘हिरावल’ ने संगीत की एक प्रतिसंस्कृति में श्रोताओं को गहरे उतार दिया. और ऎसी स्थिति में यह एकदम स्वाभाविक था कि श्रोताओं की मांग पर  छात्र-संघ को ‘हिरावल’ से गोरख के गीत ‘जनता की आवे पलटनिया’ गाने की अपील करनी पडी. जिन लोगों को जे.एन.यु. की छात्र राजनीति से थोडा भी साबका है वो जानते हैं कि यह गीत जे.एन.यु में कितना ‘लोकप्रिय’ है और इसकी लोकप्रियता में आन्दोलनों के दौरान गीत के सामूहिक गायन और ‘हिरावल’ का उस गायन की प्रेरणा में कितना योगदान है.  ‘जनता की आवे पलटनिया’ के साथ ‘हिरावल’ मंच से विदा लेता है और ‘लाल’ के तैमूर रहमान एक छोटे से परिचय के बाद त्रिथा को मंच पर आमंत्रित करते हैं. कोई नहीं जानता था ये त्रिथा कौन है और न ही कार्यक्रम के पहले लाल ने ‘छात्र-संघ’ को इसके बारे में कोई सूचना ही दी थी. जबकी खुद तैमूर शाम के दो घंटे उस मुक्ताकाशी मंच पर पहले ही साउंड वैगेरह की जांच कर के गए थे. इस औचक आमंत्रण से दर्शकों को एक झटका तो लगा ही था. उस गायिका के बारे में खुद तैमूर भी कुछ नहीं जानते थे सिवाय इसके कि उसके बैंड ने उन्हें दिल्ली में हुए इस शो के लिए साजो सामान मुहैय्या किया था. बहरहाल ये जे.एन.यु था जिसने इस अचकचाहट से निकल कर उस गायिका की सधी आवाज़ और रागों के उसके प्रयोग को सुना. शुद्ध रागों के प्रयोग तक श्रोताओं ने उसकी तालियाँ बजा कर सराहना भी की. लेकिन बात तब बिगड गयी जब अपने तीसरे नम्बर के रूप में उसने ‘गणेश वन्दना’ आरम्भ किया. इस गाने के साथ श्रोताओं की ओर से इसे न सुनाने और लाल को आने की  मांग शुरू हो गयी. तत्काल छात्र-संघ ने तैमूर से संपर्क किया और बताया कि यह एक धार्मिक वन्दना है और इस मंच के लिए अनुपयुक्त है. मंच के पीछे से तैमूर और छात्र-संघ अध्यक्षा ने गाने को रोकने का संकेत भी किया लेकिन  शायद त्रिथा इधर देख नहीं पायी और मजबूरन अध्यक्षा को मंच पे जा के त्रिथा से गाना रोकने की अपील करनी पडी. तुरंत तैमूर ने भी इसे गंभीर मानते हुए मंच पर जाकर बहुत हलके ढंग से शुरू किया… ‘आइये अब कुछ समाजवादी दुनिया के बारे में बात करें’!

बहस के केंद्र में यही अंतिम घटना है. इस घटना की आलोचना करते हुए अपूर्वानंद ने और साथी मीरा ने इसे क्रमशः ‘कलाभिव्यक्ति की हत्या’ और  ‘अविश्वसनीय असहिष्णुता’ एवं ‘लोकप्रियता और उपेक्षा के मेलजोल से लगने वाला सेंसरशिप’ कहा है. अपूर्वानंद की आलोचना और उसकी भाषा निहायत ही गैरजिम्मेदाराना और जे.एन.यु. की वाम राजनीति की और प्रकांतर से दुनिया भर के मेहनतकशों के पक्ष में खड़े होने वाली कला की उपेक्षा करने वाली थी. छात्र-संघ के  इस आयोजन और उस आयोजन में शामिल श्रोताओं के बारे में अपूर्वानंद की टिप्पणी और उसकी भाषा पर गौर करें- “निश्चय ही त्रिथा को यह प्रसंग या तो पता न होगा या वे इसे भूल गईं जब मई दिवस पर जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में  एक वामपंथी छात्र संगठन द्वारा आयोजित एक संगीत संध्या में मंच पर वे  अनामंत्रित गाने चली गईं. एक तो वे स्वयं अनपेक्षित , अतः किंचित अस्वस्तिकर उपस्थिति थीं , दूसरे आयोजकों और श्रोताओं  को, जो मई दिवस पर संघर्ष और क्रान्ति के जुझारू गीत सुन कर अपने शरीर के भीतर जोश  भरने आये थे इसकी आशंका थी कि वे इस पवित्र अवसर पर जाने  क्या गा देंगी.” ऐसा लगता है कि बाकी लोग जो वहाँ पहुंचे थे वो क्रान्ति के जुझारू गीतों से शरीर में जोश भरने आये थे और अपूर्वानंद गणेश वन्दना या हनुमान चालीसा या महादेव मन्त्र या दुर्गा मन्त्र सुनने!! और ताज्जुब नहीं कि गणेश से लेकर देवी और महादेव के मिथक किसी समय गैरब्राह्मणीय और जनजातीय या ‘अनार्य’(!)व्युत्पत्ति वाले ही हैं! आगे उन्होंने हिरावल के सादे ढंग से पेश किये गए गीतों के बारे में लिखा “ अपने सादा अंदाज में उन्होंने जो सुनाया ,वह वहां इकट्ठा जन समुदाय की इच्छाओं के मुताबिक़ ही था”. क्या थी वहाँ इकट्ठे जनसमुदाय की इच्छा? हिरावल के गीतों में व्यक्त होती चेतना अगर सर्वहारा चेतना के साथ थी और उसे समृद्ध करने वाली थी तो यह तो तय है कि वहाँ उपस्थित जनसमुदाय मई दिवस के दिन जिस संगीत के लिए एकत्रित हुआ था वह कला और संस्कृति के वर्गीय सौंदर्यबोध और उसकी सापेक्ष स्वायत्तता से वाकिफ था. और यही कारण है कि त्रिथा के पहले दो नंबरों को उचित सम्मान भी मिला. आखिर ‘वक्रतुंड महाकाय’ के गाते ही यह जनसमुदाय क्यों विरोध करने लगा? विरोध करने लगा क्योंकि वर्ग-विभाजित समाज में समाज की अभिव्यक्ति जब कला और संस्कृति में होती है तो वह भी वर्गीय प्रभुत्व के दायरे से मुक्त नहीं होती. वर्चस्वशील संस्कृति की अभिव्यक्ति का नकार क्या कला-अभिव्यक्ति की हत्या है? फिर कलाभिव्यक्ति या कला की स्वतन्त्रता का क्या अभिप्राय है? क्या कला की स्वतन्त्रता से लेकर व्यक्ति-स्वातंत्र्य के नारे हमें शीतयुद्धकालीन अमेरिकी विचारधारा की याद नहीं दिलाते. और तब क्या इस कलाभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का अर्थ हमें ज्यादा करीब से समझ नहीं आने लगता. और इसी बात को अपूर्वानंद बड़े नैतिक ताकत के साथ आज व्यक्त कर रहे हैं. क्या यह इतिहास के दुहराव का प्रहसन है! और हद तो तब है जब इसकी तुलना वह मकबूल फ़िदा हुसैन और रामानुजम की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रा के प्रसंग से करते हैं!

          कलाभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के पैरोकारों को कलाभिव्यक्ति और कला में निहित प्रगतिशील तत्त्वों को नज़रंदाज़ नहीं करना चाहिए. खुद कला के भीतर नवोन्मेष कला को नवीन बनाता है. और इस नवोन्मेष में उस समय और समाज की सच्चाई को ज्यादा बेहतर अभिव्यक्ति मिलती है. और हमें इस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए आखिरी लम्हे तक लड़ना चाहिए. परन्तु क्या ‘वक्रतुंड महाकाय’ का वह गायन इनमें से कोई भी काम कर रहा था? और अगर नहीं तो सचेतन जनसमुदाय की इच्छा को छात्र-संघ, जो खुद ही उस चेतना की भौतिक अभिव्यक्ति है, को अगर पूरा करता है तो इसको स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति की ‘सामूहिक हत्या’ जैसे चालबाजी भरे शब्दों से संबोधित करना क्या कहा जाएगा!

          बुर्जुआ उदारवादी पदावली में सोचने वाले अपूर्वानंद जैसे गैरावयाविक बुद्धिजीवी कैसे खुद उसी उदारवादी प्रोपगैंडा के शिकार हो जाते हैं , यह उसका सटीक प्रमाण है. यह बुर्जुआ-उदारवादी ‘स्वतन्त्रता’ कितनी आवाजों की खामोशी को ढंकने की साजिश है इसे विस्तार से बताने की ज़रूरत नहीं है. इस स्वतन्त्रता को पुष्ट करने के लिए ऐसे बुद्धिजीवी इतिहास की गैरैतिहासिक व्याख्याओं का भी सहारा लेते हैं. और गणपति गायन की तुलना सूफी और संत गीतों से करते हैं. क्या कबीर और फरीद के जिन गीतों को हम सराहते हैं उसमे और गणपति गायन में कोई फर्क नहीं? क्या ‘गणपति वन्दना’ जैसी वन्दनाओं के मूल्यों के खिलाफ ही कबीर खड़े नहीं थे? और यह भी नहीं है कि सूफियों और संतों के धार्मिक और रहस्यवादी पदों का विरोध नहीं किया जाए. हम तो सर्वहारा की मुक्ति चेतना को इससे नहीं आंकते. लेकिन अगर आज भी कबीरादि के पद प्रासंगिक हैं तो इसलिए कि वह सर्वहारा के मुक्ति के पक्ष में अपना योगदान दे रहे हैं. क्या गणेश-वन्दना की भी प्रासंगिकता ऎसी ही है?

          इस बूर्ज्वा उदारवादी चिंतन ने मार्क्स को भी अपने तई उपयोग किया है. और इसका भी गैरसंदर्भित प्रयास अपूर्वानंद के यहाँ मिलता है जब बिलावजह अपने तर्कों में जोर लाने के लिए ई.प.एम(१८४४ की आर्थिक और दार्शनिक पांडुलिपि) को उद्धृत करते हैं. उनका मानना है कि पूँजीवाद में श्रम और श्रम के अलगाव को जे.एन यु. के छात्र न तो महसूस करते हैं और न ही वो श्रमिक वर्ग की विचारधारा को समझते हैं. असल में जैसा वो खुद हैं वैसा ही दूसरों को भी मानते हैं. एक गैर आवाविक बुद्धिजीवी जो फिलहाल कम्युनिस्ट विरोधी है. मैं नहीं मानता कि जे.एन.यु के सभी छात्र श्रमिक वर्ग की विचारधारा को आभ्यंत्रीकृत कर चुके हैं . लेकिन अगर वर्त्तमान छात्र-संघ उनकी संभावित चेतना का मूर्त रूप है और जिसे हम गर्व से कहते हैं, तो कम्युनिस्ट छात्र-आंदोलन के इस ‘हिरावल’ को बदनाम करने की कोशिश क्या कही जाएगी! और इस बदनामी में वो सब लोग भी निशाने पर हैं जो इस दिल्ली शहर के भीतर एक सही कम्युनिस्ट राजनीति के लिए समर्पित हैं. और जो अपूर्वानंद की तरह कला की जनवादिता को केवल जनता की रची कला मानने के संकीर्णतावाद को नहीं मानते. तब  बेचारे ‘मुक्तिबोधों’ का क्या होगा! और तो और श्रमिक वर्ग को भी अपूर्वानंद की खास काट की दृष्टि औद्योगिक क्रांति के वक्त पश्चिम में बनते नए श्रमिक वर्ग के चरित्र में थिर करती जान पड़ती हैं. उनके लिए न तो विश्विद्यालय के छात्र श्रमिक वर्ग से खुद को जोड़ सकते हैं  और न वैश्विक बाज़ार की मार से विलगित आत्म वाली किसी बैंड की गायिका.और दरअसल उस गीत का रोका जाना एक खास मौके पर था, एक खास समझदारी से था और यह मानते हुए था कि कला के उत्पादन में रत कोई कलाकार जब प्रभुत्वशाली वर्गों की कला को अनजाने ही व्यक्त करने लगे तो उसको रोका जाए.

          साथी मीरा का आलेख एक वाजिब चिंता के साथ विस्थापित(dislocated) विमर्श की भाषा में फंस गया है. यह एक वाजिब चिंता का बुर्जुआ विमर्श की भाषा के हाथों मिली चुनौती के सामने असहाय महसूस करना है. और इससे उबरने का एक मात्र रास्ता कला और राजनीति के रिश्तों की सही मार्क्सवादी-लेनिनवादी व्याख्या में ही है. उसका मानना है कि गीत को रोके जाने की यह घटना कला की उपेक्षा और लोकप्रियतावाद के सहारे सेंसरशिप का पक्ष लेती है. दरअसल बुर्जुआ लोकतंत्र के भीतर हम कम्युनिस्ट जब सेंसरशिप का विरोध करते हैं और ऐसा लगातार करना होता है, तब हम यह भूल जाते हैं कि किसी सेंसरशिप का हम विरोध क्यूँ करते हैं. हम दरअसल उस बहुसंख्यक आबादी की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पक्ष लेते हुए बुर्जुआ उदारवादी लोकतंत्र का विरोध करते होते हैं. और अगर ऐसा नहीं है तो फिर हम क्यूँ जे.एन.यु. के भीतर इंदिरा गांधी ,मनमोहन सिंह और रिचर्ड बाउचेर से लेकर योगी आदित्यनाथ की अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता की हत्या करते! उस वक्त भी दक्षिणपंथी तर्क इसे  ‘सेंसरशिप’ ही  कहता है. और लोकप्रियता(poupularism) क्या सिर्फ पूंजी और बाज़ार का तर्क है? क्या हिटलर के फासिस्म के खिलाफ लोकप्रिय-मोर्चा कायम करने की मांग एक खास किस्म का पोपुलरिस्म था? उसी तरह सहिष्णुता की संवैधानिक और बुर्जुआ व्याख्याएं हमें इसे और ऐसे ही अन्य शब्दों को समझने की आलोचकीय क्षमता से महरूम करता है. क्या सहिष्णुता वर्ग-विभाजित समाज में, जाति विभाजित समाज में , लिंग विभाजित समाज में प्रभुत्व की स्वीकृति का माध्यम नहीं बन जाता. और हम कम्युनिस्ट जब सहिष्णुता की बात करते हैं तो इस बुर्जुआ लोकतंत्र को उसी की भाषा में चुनौती देते हैं , उन्हीं के नैतिक मूल्यों की बात करते हुए उन्हें बेनकाब करते हैं. और यह भी जानते हैं कि इतिहास के किसी क्षण में यह बुर्जुआ शब्द और मूल्य भी प्रगतिशील था. पर शब्द जब स्थान और काल का भेद भूल जाते हैं तो उसका क्रांतिकारी सार प्रभुत्व की विचारधारा का वाहक हो जाता है.

हमने ऊपर देखा कि उस खास जनसमुदाय की चेतना को गणेश वन्दना के गायन के गैरालोचकीय नकार के रूप में देखना दुखद है. और दुखद है कि इस घटना के कारण यह मानना कि देश भर के भीतर निरोधक कानूनों और दमनकारी कारवाईयों के विरोध करने की जे.एन.यु.एस.यु. की ऑथरिटी को धक्का लगेगा. क्या जे.एन.यु.एस.यु. अपनी संघर्ष और अपने विरोध की ऑथरिटी बुर्जुआ उदारवाद के निरपेक्ष मान लिए गए मूल्यों से ग्रहण करता है? नहीं हम विरोध की ऑथरिटी देश और दुनियाभर के शोषित और चुप करा दिये गए जनता से ग्रहण करते हैं. और इसी ऑथरिटी के सहारे उस दिन ऎसी घटना हुई थी.

          साथी मीरा के इतिहास की समझदारी की हम बहुत इज्जत करते हैं और इसलिए उस वक़्त हमें बड़ा झटका लगा जब इतिहास में मिथकों की व्युत्पत्ति और उनके वर्तमान राजनीतिक अर्थों के सन्दर्भ को उसने गलत तरीके से व्याख्यायित किया. यह सच है कि गणेश और बहुत सारे मिथकों की व्युत्त्पत्ति किसी कबीले या गण या आदिवासी समूहों से सम्बंधित हैं. वृन्दावन विहारी के रसिक गोपाल का मिथ भी तो गैर ब्राह्मणीय परम्परा से ही आया है. और अगर हजारी प्रसाद द्विवेदी की माने तो आज का हमारा सौंदर्यबोध जिन मूल्यों से बना है  उनमें अधिकाँश आर्येतर या गैर ब्राह्मणीय है. तो क्या हम उन सब को कला में आज भी वैसे ही स्वीकार करते जाएँ? क्या गणपति के चरित्र से महाराष्ट्र के मनसे और बाल ठाकरे की विचारधारा का कोई लेना देना नहीं है? या इस चरित्र का उपयोग करके जिन शोषणों को अंजाम दिया गया है उसे भूल जाएँ? और क्या आदिवासी और लोक से आने मात्र के कारण कोई मिथ या मूल्य स्वं ही प्रगतिशील हो जाता है? क्या लोक और आदिवासी समूहों के बारे में एक खास किस्म की शुद्धतावादी और प्रगतिशील रूमानियत का विरोध ज़रूरी नहीं? क्या गणेश वन्दना आदिवासी व्युत्पत्ति मात्र से प्रगतिशील हो जाती है? क्या आदिवासी व्युत्पत्ति परक मिथकों की पूजा करके दलित राजनीति का एक हिस्सा सचमुच मुक्ति की लड़ाई में प्रगतिशील भूमिका अदा कर रहा है? क्या व्युत्पति के कारणों की पड़ताल करने वाला इतिहास ज़रूरी है कि इतिहासवादी(historicists) हो जाए? और इसे संस्कृत भाषा के गैरज़रूरी नुक्ते से भी जोडने की कोई ज़रूरत नहीं है. और ना ही भगत सिंह या चे के प्रतीकों के पूंजीवादी दक्षिणपंथी अप्प्रोप्रियेशन की तुलना धार्मिक मिथकों से की जानी चाहिए. और मई दिवस के मौके पर जे.एन.यु  जैसी जगह पर धार्मिक प्रतीक और मिथकों की व्युत्पत्ति परक व्याख्यायों को समझते हुए इसका विरोध ज़रूरी है. और ज़रूरी है एक ऐसे स्पेस को ज्यादा क्रान्तिधर्मी बनाना जिसे वर्षों के अथक प्रयास से छात्र राजनीति ने जे.एन.यु. में हासिल किया है.

          मान लीजिए त्रिथा के गायन के विषय के बारे में पहले से पता होता तो क्या उस मंच पे उसे आने दिया जाता? क्या जे.एन.यु.एस.यु के मंच से कोई अनजान नौजवान रामचरितमानस का पाठ करने की इच्छा व्यक्त करे तो हम उसे मौक़ा देंगे? क्या कला की अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के नाम पर राहुल गांधी या नरेन्द्र मोदी को भाषण देने की स्वतन्त्रता उस मंच से देंगे? क्या राष्ट्रीय स्वम्सेवक संघ के किसी सदस्य को हम आने देंगे ? और क्या ऐसा जिस दिन होगा हम इस छात्र संघ को सचमुच समर्थन देंगे? साथी मीरा खुद इस छात्र-संघ में थीं और सचमुच उन्होंने ऐसा फैसला नहीं लिया था कभी. उनको भी पता है कि छात्र-संघ का ये मंच कैसे धीरे-धीरे और भी ज्यादा व्यापक जनसमुदाय की वास्तविक मुक्ति से खुद को जोडता जा रहा है या जोडने की कोशिश कर रहा है. हम मुक्ति का स्वप्न देखते हैं. बुर्जुआ स्वतन्त्रताओं से आगे स्वतन्त्रता का, मुक्ति का. मार्क्स के शब्दों में कहें तो हमें सिर्फ बहुवचन में ही अच्छी लगने वाली “स्वतन्त्रता” पसंद नहीं…सीमित ‘स्वतंत्रताओं’ के क्षितिज ‘स्वतन्त्रता’ के लिए कितने खतरनाक हैं, यह बड़े ऐतिहासिक दायरे में साबित हो गया है.(कार्ल मार्क्स , “प्रेस की स्वतन्त्रता पर विवाद”, संकलित रचनाएँ वोल.१ मोस्को १९७५, पृष्ठ-१७८) और स्वंत्रता का मतलब है सर्वहारा की स्वंत्रता, जिसके सहारे ही सम्पूर्ण मुक्ति संभव है. और इस बार मई दिवस इसी मुक्ति के संगीत के लिए था.

 मार्तंड प्रगल्भ जे.एन.यू. के भारतीय भाषा केंद्र में पी.एच.डी. के लिए शोधरत    हैं.

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