रोहित वेमुला की घटना और वेलीवाड़ा: मार्तंड प्रगल्भ

मुक्तिकामी शिक्षा की एक नितांत भिन्न छवि को संजोये किसी आदर्शवादी नौजवान को वर्तमान विश्वविद्यालयों के भीतर भी उसी सर्वग्रासी अवमूल्यन को जन्म देने वाली अलगाव और जड़ता की पारिस्थितकी के पीड़ादायी अनुभवों से गुजरने को बाध्य होना पड़ता है. दलित समाज के लिए ये अनुभव उनकी चेतना की व्यवस्था में ऐतिहासिक रूप से पुरुत्पादित होते आये हैं. यह अकारण नहीं कि ‘रोहित वेमुला’ की घटना के बाद उभरा आन्दोलन विश्वविद्यालय में वेलीवाड़ा को पुनर्न्वेषित करता है. विद्रोह के लिए ज़रूरी स्पेस के रूप में वेलीवाड़ा न केवल विश्वविद्यालय की सीमाओं को स्पष्ट करता है वरन् समाज में हर जगह व्याप्त वेलीवाड़ा के व्यापक संघर्ष का हिस्सा बन जाता है. #लेखक 

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A sculpture at University of Hyderabad . Credit: Javed Iqbal, via The Wire

रोहित वेमुला की घटना और वेलीवाड़ा

By मार्तंड प्रगल्भ

रोहित वेमुला के पहले और आखिरी पत्र[1] को पढ़ते वक़्त एक आदर्शवादी नौजवान की छवि उभर आती है. वह अपने जीवन-अनुभवों से जानता है कि हमारी ह्रासग्रस्त मानवीय सम्बन्धों से बनने वाली पूरी पारिस्थितिकी बनावटी, झूठी, कृत्रिम और भयोत्पादक हो गयी है. “ हमारा प्रेम बनावटी है, हमारी मान्यताएं झूठी हैं, हमारी मौलिकता वैध है बस कृत्रिम कला के ज़रिये, यह बेहद कठिन हो गया है कि हम प्रेम करें और दुखी न हों.” मनुष्य होने की हर संभव कोशिश और उत्साह रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में शामिल गहरे अवमूल्यन से मुठभेड़ करती है. मनुष्यों के मूल्यांकन की उनकी परिभाषाओं की एक दूसरी दुनिया का स्वप्न अपने आसपास के अवमूल्यित मूल्यों से विद्रोह करने को बाध्य है. एक ऐसी दुनिया के लिए जहाँ प्रेम दुःख न पैदा करे. आज की दुनिया में मनुष्यों का मूल्य,“ इंसान की उपयोगिता उसकी तत्कालीन पहचान तक सिमट कर रह गयी है और उसकी नजदीकी संभावना तक ही सीमित कर दिया गया है … एक आंकड़ा है मनुष्य- महज एक वस्तु … आदमी को कभी भी उसके दिमाग के हिसाब से नहीं आंका गया. एक ऐसी चीज़ जो स्टारडस्ट से बनी थी, हर क्षेत्र में, अध्ययन में, गलियों में, राजनीति में, मरने में और जीने में.” दिमाग जो स्वप्न देख सकता है. विज्ञान का स्वप्न. केवल तात्कालिक संभावना के विरुद्ध भविष्य के दिक्-काल की असीम संभावनाओं का स्वप्न. वास्तविक मनुष्य को वस्तुवत करने की मूल्यव्यवस्था के खिलाफ मनुष्य होने की अनंत संभावना को जीवन मूल्य के रूप में जीने वाले लोगों के लिए अनिवार है कि वे आपस में मिलकर जीवन की पारिस्थतिकी के आमूलचूल परिवर्तन में जुड़ जाएँ. स्वयं को उस परिवर्तन के हथियार के रूप में रूपांतरित करें. अलगाव और जड़ता की सर्वग्रासी सभ्यता जीवन के बीजों को नष्ट करने का कारखाना बन चुकी है. मनुष्यता का विद्रोह और नए के निर्माण का संकल्प प्रत्येक क्षण इस झूठ को महसूस करने में इसके अंत को जीता है. “मैं मृत्यु के बाद की कहानियों पर विश्वास नहीं करता, भूत और आत्मा. अगर कुछ है जिस पर मैं भरोसा करता हूँ, वह है कि मैं सितारों की सैर करूँगा और दूसरी दुनिया के बारे में जानूंगा”.

मुक्तिकामी शिक्षा की एक नितांत भिन्न छवि को संजोये किसी आदर्शवादी नौजवान को वर्तमान विश्वविद्यालयों के भीतर भी उसी सर्वग्रासी अवमूल्यन को जन्म देने वाली अलगाव और जड़ता की पारिस्थितकी के पीड़ादायी अनुभवों से गुजरने को बाध्य होना पड़ता है. दलित समाज के लिए ये अनुभव उनकी चेतना की व्यवस्था में ऐतिहासिक रूप से पुरुत्पादित होते आये हैं. यह अकारण नहीं कि ‘रोहित वेमुला’ की घटना के बाद उभरा आन्दोलन विश्वविद्यालय में वेलीवाड़ा को पुनर्न्वेषित करता है. विद्रोह के लिए ज़रूरी स्पेस के रूप में वेलीवाड़ा न केवल विश्वविद्यालय की सीमायों को स्पष्ट करता है वरन् समाज में हर जगह व्याप्त वेलीवाड़ा के व्यापक संघर्ष का हिस्सा बन जाता है. समाज के अदृश्य और अस्पृश्य का विश्वविद्यालय के भीतर दृश्य और भौतिक होना न केवल समाज के पुनर्संयोजन की दृष्टि देता है वरन् शिक्षा के नए सैद्धांतिक व्यवहारों की प्रेरणा भी प्रदान करता है. ऐतिहासिक रूप से संतों के सामाजिक-सांस्कृतिक प्रयासों और अम्बेडकर के राजनीतिक व्यवहारों में दलितवाड़ा या वेलीवाड़ा के सामाजिक स्पेस को सामाजिक क्रान्ति के आधार क्षेत्र के रूप में रूपांतरित होता हुआ हम देखते हैं. इस अर्थ में ‘वेलीवाड़ा’ दलित मुक्ति के ऐतिहासिक प्रयोगों की परम्परा में है. यह कोई फिक्स मॉडल नहीं वरन् एक आन्दोलन है जिसका उद्देश्य है जातियों का नाश और श्रम-विभाजन को श्रमिकों के विभाजन से मुक्त करना. दूसरे शब्दों में वेलीवाड़ा समानता और न्याय के वास्तव को समाज में स्थापित करते जाने वाला आन्दोलन है. यह नए गणराज्य की इकाई नहीं वरन् गणराज्य को चुनौती है.

पिछले कुछ सालों से देश भर की उच्च शिक्षण संस्थाएं हमारी संसदीय सरकारों के निशाने पर हैं. निशाने पर हैं और बहुत संस्थागत रूप से उच्च शिक्षा के लोकतांत्रिक आदर्श को नष्ट करने की शक्तियों के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं. किसी न किसी तरीके से विश्वविद्यालय की सम्पूर्ण पारिस्थितिकी को बचाने की जद्दो-जहद भी तेज हो रही है. कुछ गिने-चुने विश्वविद्यालय या शोध की उच्च शिक्षण संस्थाएं बची हैं जो आज भी नए भारत के स्वप्न को बचाने की कोशिश कर रही हैं. नए भारत के निर्माण और शिक्षा के व्यवहार के विमर्श में नए समाज के निर्माण का आदर्श भी जिंदा है. नवउदारवाद के हिंसक और हमलावर दौर में इन विश्वविद्यालयों का लोकतांत्रिक व्यवहारों और शिक्षा के वैश्विक प्रयोगों के सहिष्णु विमर्श की जगह के रूप में खुद को बचाए रखने की राजनीति अपवाद चिह्नित हो रही है. पिछले तीस-चालीस सालों में सम्पूर्ण शिक्षा-व्यवस्था का पुनर्संयोजन होता गया है. गाँव, कस्बों और छोटे-बड़े शहरों में यह पुनर्संयोजन स्वीकार्य बना दिया गया. इसलिए आज जब जवाहरलाल नेहरु या हैदराबाद विश्वविद्यालय पर प्रायोजित हमले हो रहे हैं ऐसे में उनकी पारिस्थितिकी असुरक्षित महसूस कर रही है. यह असुरक्षा देशभर की शैक्षणिक पारिस्थितिकी में संपन्न मूलगामी दरार के खिलाफ शिक्षा की नयी व्यवस्था की लड़ाई में सहभागिता-निर्माण के संकट के चलते है. संघर्ष के अपने अपवाद चरित्र के कारण ‘save या बचाओ’ का नारा निर्माण की कार्य-नीति के लिए जरूरी हो उठा है.

उच्च शिक्षा की स्थानीय पारिस्थितिकी का एक ऐसा मॉडल जो स्वतः और संतुलित संचालन का भी मॉडल हो अब संभव नहीं रह गया है. मार्क्स पूँजीवाद के विकासक्रम में पैदा होने वाले सम्पूर्ण मानवीय सामाजिक-चयापचय(सोशल मेटाबोलिज्म) के रिफ्ट की चर्चा करते हैं. मनुष्य जीवन की सम्पूर्ण पारिस्थितिकी में उत्पन्न यह भ्रंश (रिफ्ट) अलगाव और जड़ता को ऐसी अपूरणीय क्षति में बदल देता है जहाँ से पुनर्वापसी संभव नहीं रह जाती. यह भ्रंश अनिवार्यतः और सतत वैश्विक संकट है. इसलिए विश्विद्यालय की पारिस्थितिकी-भ्रंश के खिलाफ संघर्ष अपनी चौहद्दी में असंभव नए प्रयोगों से मुकर नहीं सकता. रोहित वेमुला की घटना के बाद यह संघर्ष विश्वविद्यालयों की पारिस्थितिकी में दलित जीवन के संकट को समझने और व्यापक संकट के खिलाफ क्रांतिकारी नव-निर्माण के व्यवहारों में सहभागी आन्दोलनों का रूप ग्रहण करने की चेष्टा कर रहा है. सहभागी स्थानीय आन्दोलनों के भीतर व्यवहारों के लोकतांत्रिक स्वरूप को लेकर बहस पहले से कहीं तेज हो उठी है. वास्तविक समानता या जिसे अंग्रेजी में sabstantive eqality कहा जाता है उसके स्थानीय प्रयोग लोकतंत्र के आंदोलनात्मक चरित्र को व्यावहारिक बनाने का प्रयास कर रही है. इन प्रयासों को भी अम्बेडकर के राजनीतिक व्यवहारों से प्रेरणा मिलती है. लोकतंत्र उनके लिए सरकार की एक व्यवस्था मात्र नहीं थी. लोकतांत्रिक समाज एक गतिशील समाज है. स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे के मूल्यों को आचरण में उतारने के लिए ज़रूरी समाज. यहाँ साहचर्य या संगठन के अन्य रूपों से संवाद संभव है. भाईचारा हर व्यक्ति या विचार को मूल्यवान मानने में है, अगर वह व्यक्ति और विचार वास्तविक जीवन में समानता का आचरण करता है या उसकी प्रेरणा देता है. “ दूसरे शब्दों में, समाज के भीतर संपर्क का सर्वत्र प्रसार होना चाहिए. इसी को भाईचारा कहा जाता है और यह प्रजातंत्र का दूसरा नाम है. प्रजातंत्र सरकार का एक स्वरुप मात्र नहीं है. यह वस्तुतः साहचर्य की स्थिति में रहने का एक तरीका है, जिसमें सार्वजनिक अनुभव का समवेत रूप से सम्प्रेषण होता है.”[2] आरक्षण-केन्द्रित सुधारवादी प्रयोगों ने साहचर्य और भागीदारी के लोकतंत्र को कुछ एक व्यक्तियों के इर्द-गिर्द सीमित कर दिया . ‘सार्वजनिक अनुभव का समवेत रूप से सम्प्रेषण’ जीवन के अन्य क्षेत्रों की तरह विश्वविद्यालयों के भीतर भी असंभव होता गया है. छात्र राजनीति से निकले प्रगतिशील मूल्यों वाला लोकतांत्रिक मॉडल भी साहचर्य में वास्तविक समानता के सामाजिक परिवर्तन को सत्ता प्राप्ति की होड़ के हवाले कर देता है. दलित राजनीति अपने समय के सभी सामाजिक सुधारवादी माडलों के अन्दर समानता और भाईचारे के आचरण का अभाव महसूस करती है. इसका अर्थ है कि छात्र राजनीति के परम्परागत संगठनात्मक अनुभवों में जाति के नाश की किसी ईमानदार कोशिश का अभाव है. इसलिए जब कैम्पस-लोकतंत्र को बचाने की बात की जाती है तो यह दलित राजनीति के सामने ‘किस लोकतंत्र’ को बचाने का सवाल बन जाता है. विश्वविद्यालय की पारिस्थितिकी को बनाने वाले छात्रों, शिक्षकों, कर्मचारियों, कामगारों के रोज़मर्रा के जीवन में समानता और भाईचारे के नाम पर केवल उंच-नीच का व्यवहार है. दलित राजनीति उंच-नीच की इस उत्पीड़क व्यवस्था का वास्तव में नाश चाहती है. यही कारण है कि लोकतांत्रिक मॉडलों के नाम पर चलने वाली उत्पीड़क व्यवस्था से संघर्ष साहचर्य और सामाजिक संगठन के ज्यादा समतामूलक रूपों की तलाश भी है.

जातिगत शोषण दलित जीवन का यथार्थ है. ऐतिहासिक रूप से जाति की व्यवस्था ने समाज को न केवल विद्रूपित किया है बल्कि इसने सभ्यतामूलक बर्बरता को समाज व्यवस्था की केन्द्रीय शक्ति बना दिया है. इस सभ्यतामूलक बर्बरता के खिलाफ समतापरक समाज के आदर्श वाली दलित राजनीति के भीतर वाम छात्र-आंदोलनों के लोकतांत्रिक-सांस्थानिक व्यवहारों के प्रति एक स्वाभाविक अस्वीकार है. अस्वीकार की यह स्वीकृति केवल विचारधारा के लिए ही ज़रूरी नहीं है बल्कि इस अस्वीकार की रौशनी में नए विश्वविद्यालय तक अपना सफ़र तय करना हमारी आवश्यकता भी है. दलित राजनीति यह वाजिब सवाल उठाती है कि प्रगतिशील छात्र आंदोलनों ने विश्वविद्यालय के पारितंत्र में दलित जीवन को सम्यक ढंग से संबोधित क्यों नहीं किया? या ऐसा वो क्यों नहीं कर पाए? बचाने से परिरक्षण और पुनर्निर्माण क्योंकर होगा? और यह सवाल एक बारगी मुक्तिकामी राजनीति की सम्पूर्ण परम्परा को चुनौती है. चुनौती के इसी व्यवहार में दलित और प्रगतिशील सहभागिता विकसित हो सकती है. रोहित वेमुला का अस्वीकार दलित और प्रगतिशील ताकतों की सहभागी परम्परा को चुनौती देने वाला अस्वीकार है. उच्च शिक्षण-संस्थाएं संघर्ष, ज्ञान और संगठन के जिन स्वप्न-आदर्शों को संबोधित करती हैं उनके टूटने का अस्वीकार और नवनिर्माण की चेतना है रोहित वेमुला. अम्बेडकर की उन्मूलनपरक दृष्टि और शिक्षा के मुक्तिदायक रूपों पर जोर आज ‘रोहित वेमुला’ के स्वप्न-आदर्शों में नए अर्थग्रहण कर रहा है. यह अर्थ-ग्रहण क्रमिक मोह-भंगों के खिलाफ होने वाले वास्तविक आन्दोलनों से पृथक पहचाना नहीं जा सकता.

वेलीवाड़ा और साहचर्य

कबीरा यह घर प्रेम का खाला का घर नाहीं / शीश उतारे भूईं धरे तब पैसे घर माहीं”

वेलीवाड़ा के संदर्भ में कबीर का घर याद आना अनायास नहीं है. इस घर में प्रेम के नियम को छोड़ कर कोई अन्य सामाजिक नियम लागू नहीं है. प्रेम भी कोई नैतिक विधि-शास्त्र से संचालित अलंकरण नहीं बल्कि साहचर्य की रचना-प्रक्रिया. इस घर में प्रवेश के लिए ज़रूरी है तत्कालिक पहचान से मुक्त होना. एक ऐसा सामाजिक स्पेस जो निश्चित हदों के बदले अनहद हो. लोकतंत्र का ऐसा अनहद चरित्र ही वेलीवाड़ा है. यह अनहद ‘सार्वजनिक अनुभवों का समवेत सम्प्रेषण’ है. यह सम्प्रेषण सामाजिक सुधार के सतही प्रयासों के लिए अस्वीकार्य है. इस अस्वीकार्यता के चलते यह मूलगामी राजनीति का संयोजक हो उठता है. वेलीवाड़ा सामूहिक स्वामित्व और सामूहिक अभिव्यक्ति ( ओनरशिप और ऑथरशिप) दोनों है. अम्बेडकर के राजनीतिक प्रयासों से दो उदाहरण इसकी ऐतिहासिक परम्परा को स्पष्ट करते हैं. देवदासियां मंदिरों से निकल कर मुंबई के कामतीपूर में सेक्स-मजदूरी करने लगीं. शहर उन्हें आत्म-मर्यादा नहीं दे पाया. वह अपनी अस्पृश्यता और अपने अपमान से मुक्त नहीं हुई. उनका प्रेम, मातृत्व, कामना और अपने सम्पूर्ण जीवन पर अधिकार न पहले था और न सेक्स-मजदूर बनने के बाद. अम्बेडकर इनसे बात-चीत करने गए एक नए घर का स्वप्न ले कर. शहर की मलिन बस्तियों के भीतर एक सर्वथा भिन्न पारिस्थितिकी का स्वप्न लेकर. गोपाल गुरु ने ध्यान दिलाया है कि अम्बेडकर के लिए श्रम-शक्ति ही देहों में मूर्त होती है. यह श्रम-शक्ति बलात् मजे की वस्तु होने से इनकार करती है. “ अम्बेडकर इसलिए सलाह देते हैं कि आत्म-मर्यादा मूलतः उस प्रक्रिया से निकलती है जिसमें ये अस्पृश्य महिलायें अपने श्रम को भौतिक गुणों जैसे प्रकृति, भूमि या उद्योग से घुला मिला सकें.”[3]  आत्म-मर्यादा केवल एक विचारधारा नहीं बल्कि एक भौतिक प्रक्रिया है. शादी अम्बेडकर के लिए मुक्त साहचर्य की ऐसी प्रक्रिया थी जहां सामूहिक श्रम-शक्ति अपनी भौतिक दुनिया के साथ घुल-मिल कर सामूहिक भलाई की स्वतंत्र इकाई हो जाए. श्रम-शक्ति की स्वतंत्र और ठोस अभिव्यक्ति के लिए ज़रूरी है कि भौतिक गुण सार्वजनीन हों. निजी संपत्ति को बचाए रखने की व्यवस्था श्रम-शक्ति का बलात् दोहन करती है. अस्पृश्यों के आत्मसम्मान और आत्म-मुक्ति के लिए ज़रूरी प्रक्रिया है प्रकृति और समाज के ऊपर किसी भी तरीके के निजी संपत्ति का क्षरण. स्त्रियाँ तो श्रम-शक्ति का उत्पादन भी करती हैं. ऐसी स्थिति में दलित और मलिन बस्तियों की अस्पृश्य महिलायें सामाजिक पुनुरुत्पादन की दूसरी रीति के लिए संघर्ष में ही आत्म-मर्यादा भी हासिल कर सकती हैं. साहचर्य यहाँ व्यक्तिगत उत्पादकों के स्वतंत्र साहचर्य के लिए ज़रूरी संघर्ष की एकता में है. अम्बेडकर ने इस संघर्ष को जारी रखने वाले आत्मबल के लिए दलित गृहस्थ की एक नयी कल्पना सामने रखी. बहुत कुछ कबीर के घर की तरह.

कबीर की तरह अम्बेडकर भी जानते थे कि जो अपना पुराना घर नहीं जला सकता वह इस नए साहचर्य में शामिल नहीं हो सकता. ‘जात-पात तोड़क मंडल’ का हिन्दू सुधारवादी प्रयास अम्बेडकर को अपने घर में अध्यक्ष बना कर पंजाब के दलितों का अभिभावक बनना चाहता था. यह प्रतिनिधित्व को प्रतीकात्मक बनाना था. पंजाब का दलित जन-गण अम्बेडकर के जाति-विनाश या उन्मूलन की दृष्टि को पहचानना चाहती थी. आत्म-परिचय की यह सामूहिक चेतना स्वाभाविक रूप से मंडल को बाध्य कर रही थी कि वह लाहौर में अपने सभा की वार्षिक कांफ्रेंस का अध्यक्ष बम्बई के एक उन्मूलनवादी डॉक्टर साहेब को बनाये. सवर्ण सुधारकों का वैष्णव घर ऐसे अस्पृश्य को बिना किसी शुद्धि के प्रवेश नहीं दे सकता था. अम्बेडकर ने मंडल के साथ अपने पत्राचार में लगातार शुद्धि के वैष्णव आग्रहों को अस्वीकार किया. अपने पर्चे के किसी अभी अंश या विचार से उन्होंने समझौता नहीं किया. अम्बेडकर जानते थे कि ऐसे सुधारवादी बिना अपने वैष्णव घर को जलाए उनके सहचर नहीं बन सकते. मंडल की सामाजिक संरचना की आलोचना करते हुए अम्बेडकर गुरु और अंत्यज के अंतर्विरोध को बहुत तीव्र कर देते हैं. गुरु के रूप में एक अस्पृश्य को स्वीकार करने का अर्थ था समानता के आदर्श को आचरण में उतारना. यह आचरण नए सामाजिक सम्बन्धों की स्वीकृति है. साहचर्य के लिए जातिप्रथा का ज़रूरी ध्वंस स्वीकार करने में मंडल असमर्थ था. हिन्दू-धर्म और जातिव्यवस्था की प्रभुत्वशाली दुनिया में अम्बेडकर हमेशा बहिष्कृत थे. अपने बलात् बहिष्कार के हिंसात्मक-अहिंसात्मक अनुभवों के सहारे ही वह जाति-उन्मूलन की अपनी नयी सैद्धांतिकी भी रचते हैं. यह सैद्धांतिक व्यवहार स्वयं राजनैतिक हो उठता है. कबीर आदि संतों को भी ज्ञानी और गुरु के रूप में स्वीकार करना वैष्णव मन के खिलाफ था. इनकी आलोचना इतनी प्रखर थी कि वे किसी भी तरीके से वैष्णव विश्वदृष्टि में समंजित नहीं हो सकते थे. वह एक नयी विश्वदृष्टि का उन्मेष था. कबीर कभी किसी शिष्य को संबोधित नहीं करते. या तो अपने धुर विरोधी पांडे-मौलवियों का मजा लेते या फिर साधना पथ के सहयात्रियों साधू-असाधु, अवधू आदि को संबोधित करते है. साहचर्य के बाहर सद्गुरु का कोई अर्थ नहीं. यह सद्गुरु साथी कामगार है. वह प्रेम और सबद की साधना का सहचर-मित्र है.

मंडल के अस्वीकार के लिए अम्बेडकर पहले से ही तैयार थे. वह देख रहे थे कि संत रामदास की वाणी असत्य नहीं हो सकती. संत कवियों के सत्य को वह अपने राजनीतिक जीवन में पुनर्न्वेषित करते हैं. गुरु और अंत्यज के सम्बन्धों की सभी हिन्दू या वैष्णव कल्पनाओं और परिकल्पनाओं की आलोचना करते हुए वह समाज में शिक्षक की भूमिका पर भी विचार कर रहे थे. बौद्ध-मठों और विश्वविद्यालयों के इतिहास में उनकी अंतर्दृष्टि आवयविक या सहज बुद्धिजीवियों के संगठनात्मक व्यवहार की परम्परा का अन्वेषण करती है. सहज या आवयविक बुद्धिजीवी उनके लिए बौद्ध-भिक्षुओं का तात्कालिक या आधुनिकतम रूपांतरण थे[4]. बौद्ध संघों और विश्वविद्यालयों से विद्रोह करने वाले सरहपा आदि सिद्धों की परम्परा कबीर आदि संतों के यहाँ नवीन जीवन-दृष्टि का उन्मेष बन जाती है. महाराष्ट्र की संत-परम्परा अम्बेडकर की अंतर्दृष्टि में स्वाभाविक थी. उन्होंने अपने पर्चे में लिखा था कि अगर उन्हें अपने वर्तमान सामजिक संरचना वाले मंडल के सम्मलेन में  अध्यक्षीय वक्तव्य का मौक़ा मिल जाता तो संत रामदास की वाणी असत्य हो जाती. अम्बेडकर ‘सार्वजनिक अनुभवों के समवेत सम्प्रेषण’ को राजनीति का आधार बना रहे थे. मंडल के अस्वीकार ने अम्बेडकर को सहज या आवयविक बुद्धिजीवी के रूप में पुनः रेखांकित किया. दलितवाड़ा या वेलीवाड़ा की पारिस्थितिकी से आवयविक या सहज जुड़ाव उत्पादकों की तरह ही संभव है. ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद की संश्लिष्ट उत्पादन-प्रक्रिया से बनने वाले सामाजिक सम्बन्धों के भीतर वेलीवाड़ा एक रिक्त स्थान है. यह उत्पादकों के नितांत भिन्न सामाजिक संगठन होने की प्रक्रिया है. वह प्रभुत्वशाली सामाजिक सम्बन्धों द्वारा अप्रोप्रिएशन की हर संभव चेष्टा की कांट-छांट में सक्षम है. इसी अर्थ में वह एक गतिशील लोकतांत्रिक समाज है. यह बहिष्कृतों और अस्पृश्यों का लोकतंत्र है.

वेलीवाड़ा और व्यवहार का दर्शन

सहज बुद्धिजीवी के संगठन पर विचार करने वाले ग्राम्शी से अम्बेडकर के प्रयासों की फौरी एकता भी शिक्षाप्रद है. अम्बेडकर और ग्राम्शी दोनों ही अपने सामाजिक-धार्मिक आन्दोलनों के इतिहास की जांच करते हुए आवयविक बुद्धिजीवी की संकल्पना तक पहुँच रहे थे. अपने राष्ट्रीय इतिहासों में दलित और सबाल्टर्न की तार्किक इयत्ता बहुत भिन्न नहीं है. संत कवियों का अनुभव-सम्मत विवेकवाद एक नयी विश्वदृष्टि की प्रस्तावना करती है जिसे ग्राम्शी के शब्दों में व्यवहार का दर्शन कह सकते हैं. यह दर्शन सम्पूर्ण प्रभुत्वशाली धार्मिक विश्वदृष्टि का विकल्प देती है. उत्पादकों के अनुभव की एकता जब अपनी अभिव्यक्ति के संकट से गुज़र रही होती है तब यह निश्चित है कि सम्पूर्ण सामाजिक सम्बन्ध एक बड़े परिवर्तन की पीड़ा से गुज़र रहा है. ऐसे समय में प्रभुत्वशाली विश्वदृष्टि अपने सामाजिक आधार को विचारधारा के सीमेंट और गारे से जोड़े रखने में अक्षम हो जाती है. संकट के इस काल में उत्पादकों के अनुभवों की एकता दो नितांत विरोधी विश्वदृष्टि में बंट जाती है. इन विरुद्धों का सामंजस्य धार्मिक विचारधारा को पुनर्जीवित करने जुड़ जाता है. जबकि विरुद्धों के संघर्ष की तार्किक परिणति धर्म मात्र का विनाश हो जाती है. संतों का सच धर्म का सच नहीं है जिसका प्रचार सामंजस्य की वैष्णव विचारधारा करती है. वैष्णव विचारधारा उत्पादन को गुणों के अधीन करती है जबकि कबीर आदि संत उत्पादन को गुणातीत बताते हैं.

सरहपाद जैसे सिद्धों का नालंदा विश्वविद्यालय के प्रति विद्रोह और फिर से सिद्धांत और व्यवहार की एकता का प्रयास यह बताता है कि उस समय के संस्थानिक बौद्धिकों की दूरी जन साधारण से कितनी बढ़ गयी थी. संस्थानों को भी आतंरिक विच्छेद के भय से गुजरना पड़ रहा था. सिद्धों या संतों को अपने समय के सामान्य-बोध की आलोचना करनी पड़ी थी. यह आलोचना उन्होंने सामान्य-बोध की जगह पर ही खड़े होकर की थी. जनसमूह के सामान्य-बोध में जो साधु-बोध का ‘स्वस्थ-केन्द्रक’ था, ये संत उसे संबोधित करते थे. कबीर आदि संतों ने सामान्य-बोध की जगह से सामान्य-बोध की आलोचना करते हुए लोगों को विश्वास दिलाने की कोशिश की कि कोई भी ‘ज्ञानी’ हो सकता है. या ग्राम्शी के शब्दों में कहें तो “हर कोई दार्शनिक” है. इसे स्पष्ट करने के लिए ही आरम्भ में सामान्य-बोध की जगह से ही ऐसी आलोचना आवश्यक है. आरम्भ में यह प्रक्रिया व्यक्ति केन्द्रित ही होती है. अलग-अलग व्यक्ति ही इसे अपने स्तर पर आरम्भ करते हैं. कह सकते हैं कि यह आरम्भ में वैयक्तिक साधना के रूप में विकसित होती है. ऐसी स्थिति में प्रभुत्वशाली संस्था या धर्म मत या शास्त्रों के सामने ‘सहज’ या ग्राम्शी जिसे ‘सिम्पल’ कहते हैं उसका संकट पैदा हो जाता है. प्रभुत्वशाली परंपरा कोशिश करती है कि बौद्धिकों पर कठोर नियंत्रण बनाये रखा जाए, ताकि वे अपनी सीमा का अतिक्रमण न करने पायें. इस अतिक्रमण से अखंडता में पड़ी दरार विस्फोटक और विनाशकारी हो सकती है. दूसरी ओर यह भी संभव नहीं कि ‘सहज’ को ही बौद्धिक घोषित कर इस दरार को पाट दें.

कबीर आदि संत ‘सहज’ को उनके आरंभिक दार्शनिक ‘सामान्य-बोध’ के स्तर पर ही नहीं छोड़ते. वह ‘सहज’ को एक उच्च जीवन-विवेक बनाने की साधना करते हैं. ये सहज और बौद्धिक के बीच एकता इसलिए नहीं बना रहे थे कि विवेकवान क्रियाओं की साधना का एक घेरा बना कर अलग पंथ निकाल लें और जनता के बीच ‘सहज’ के नाम पर एक क्षीण एकता बनी रहे. वह चाहते थे कि एक ‘नैतिक और बौद्धिक ब्लाक’ बनाया जाये, ताकि जनता का बौद्धिक विकास संभव हो न कि केवल बौद्धिकों के छोटे से हिस्से का आतंक कायम हो. कबीर के शब्दों में कहें तो ‘सहज’ की पहचान इसी अर्थ में कठिन साधना की पहचान थी. ज्ञान के हाथी पर कबीर इसी सहज का दुलीचा डाल कर चढ़ने कहते थे. निम्नवर्गीय सामाजिक समूहों के ठोस ब्लाक के निर्माण के प्रयास के कारण संतों की साधना वैष्णव प्रभुत्व की विरोधी प्रक्रिया थी. इस अर्थ में ये न केवल व्यवहार का नया दर्शन बनाने की कोशिश कर रहे थे वरन् दर्शन का नया व्यवहार भी सामने रख रहे थे. दोनों ही अर्थों में यह दर्शन और व्यवहार की पुरानी सारी परंपराओं के साथ-साथ वैष्णव भक्ति के रूप में सिद्धांत और व्यवहार की नई प्रभुत्वशाली धारा की आलोचना भी कर रहे थे. सामान्य-बोध की यथार्थ दृष्टि की आलोचना के क्रम में संतों ने एक नई यथार्थ दृष्टि का उन्मेष किया था. यह यथार्थ की आलोचकीय दृष्टि थी.

ग्राम्शी लिखते हैं कि आलोचकीय आत्मचेतस् प्रयासों द्वारा राजनीतिक और ऐतिहासिक रूप से बौद्धिकों का एक अभिजात्य (elite)[5]भी निर्मित होता जाता है. यहाँ ‘अभिजात्य’ शब्द को उसके प्रतिक्रियावादी अर्थ में नहीं प्रयोग किया गया है. यह ग्राम्शी के यहाँ हिरावल के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है. ग्राम्शी लिखते हैं : “कोई मानव जनसमूह व्यापक अर्थों में खुद को संगठित किये बिना खुद को ‘पृथक्’ नहीं कर सकता, अपनी जगह पर स्वतंत्र नहीं हो सकता; और कोई संगठन बिना संगठनकर्ता या नेतृत्व के यानी बिना बौद्धिकों के संभव नहीं; दूसरे शब्दों में कहें तो सिद्धांत या व्यवहार के सम्बन्ध (नेक्सस) के सैद्धांतिक पक्ष का पृथक् जनसमूह जो विचारों की अवधारणात्मक या दार्शनिक व्याख्या में ‘प्रवीण’ हो उसके वास्तविक अस्तित्व के बिना.”[6]

इस प्रकार सहज साधना कवि-बौद्धिकों के रूप में संतों के लिए एक द्वंद्वात्मक रचना प्रक्रिया थी. बौद्धिकों और जनता के बीच बनते रहने वाली सहज साधना. यह वेलीवाड़ा की आतंरिक गतिशीलता है. कबीर आदि संत इस प्रक्रिया को बनाने वाले और खुद उससे बनने वाले थे. इस प्रक्रिया में लगातार उन क्षणों की पुनरावृत्ति होती रहती है जहाँ जनता और बौद्धिकों के बीच की दूरी बढ़ने लगती है. इस संबंध के पतन से यह धारणा घर करने लगती है कि सिद्धांत अनावश्यक, गैर ज़रूरी और महज व्यवहार का पूरक है. वह व्यवहार के अधीन है. सिद्धांत और व्यवहार को न केवल भिन्न माना जाने लगता है वरन् उन्हें अलगाकर दो भिन्न अवयवों में तोड़ दिया जाता है. व्यवहार रूढ़ियों के पालन में बंद कर दिया जाता है. इस यांत्रिकता की बार-बार पुनरावृत्ति का मतलब है “कि कोई अपेक्षाकृत आदिम ऐतिहासिक अवस्था से गुजर रहा है.”[7] सिद्धांत और व्यवहार की इस विलगता के बीच ही कबीर आदि के प्रयासों पर प्रभुत्व की वैष्णव दृष्टि का प्रवेश होता जाता है. दूसरी ओर उनके व्यवहार के सिद्धांत में अन्तर्निहित समानता के आदर्श के साथ नए उभरते वणिक समुदाय की संवेदना और पैसे के व्यावहारिक सिद्धांत और दर्शन का घालमेल करने की कोशिशें होने लगती है. कबीर निर्गुण राम के सगुण वैष्णव अवतार बन जाते हैं और मठों को बनियों और मध्यवर्ती जातियों का संरक्षण मिलने लगता है. यहाँ ध्यान रखना चाहिए कि यांत्रिक, निर्धारणवादी या भाग्यवादी अवयवों का सबल होना व्यवहार के दर्शनों की आन्तरिकता रही है. ग्राम्शी लिखते हैं कि किसी सामाजिक श्रेणी के “सबाल्टर्न” चरित्र की यह आवश्यक और इतिहास सम्मत विशेषता बनी रही है.[8]

कबीर आदि संतों का अनुभवसम्मत विवेकवाद ‘सिद्धांत और व्यवहार’ की एकता के प्रयास में है. ग्राम्शी कहते हैं कि यांत्रिक विश्वदृष्टि ही निम्नवर्गों का धर्म हो जाता है. कबीर आदि संत इन अर्थों में ही धर्म बनने के पहले के सिद्धांतकार हैं और इसी अर्थ में ठेठ राजनीतिक भी हैं. यांत्रिक दुहराव की प्रक्रिया दरअस्ल इतिहास की आदिमता की ओर लौटना है. व्यवहार के दर्शन के आरंभिक बौद्धिकों के रूप में कबीर आदि संत राजनीतिक अर्थों में ही प्राक्-धार्मिक हैं . कबीर के यहाँ काम की एकता की कौंध वह आधारभूमि है जिसे वह ‘निर्गुण राम’ कहते हैं. काम का विभाजन उनके गुणों के आधार पर नहीं हो सकता. वह निर्गुण हो कर भी विश्व को लगातार नए-नए रूपों में सृजित करता रहता है. विश्व को बदलता रहता है. निर्गुण सर्जना की वैश्विकता प्रभुत्व की विचारधारा द्वारा थोपे गए सारे भेद परक प्रवर्गों को चुनौती देती है. कबीर की ‘आँखिन देखि’ का ‘अनभै सच’ काम की यही सार्वजनीनता है.

वेलीवाड़ा और अनुभववाद की सैद्धांतिक सीमाएं

मूलगामी अनुभववाद आज एक विचारधारात्मक शक्ति बन गया है. इस विचारधारा के अनुसार पूँजी का धार्मिक और जातिवादी चरित्र जिस इतिहास से बनता है दलित एकता उस प्रभुत्वशाली इतिहास से सर्वथा भिन्न इतिहास दृष्टि रखती है. वह पूँजी के इतिहास की शुरुआत से ठीक पहले है और इसलिए अपने अनुभव की संरचना में प्राक्-धार्मिक भी है. यह अनुभववाद आधुनिकतावाद की मूलगामी आलोचना करती है. वह आधुनिकतावाद को ब्राह्मणवादी- हिंदूवादी और ज्ञानमीमांसात्मक साम्राज्यवाद की विचारधारा के रूप में आलोचित करती है. भारत में समाज-विज्ञानों का चरित्र आज एक आतंरिक प्राच्यवाद से ग्रसित है और समानता के व्यवहार को यहाँ वास्तव करने के लिए दलित अनुभवों के सैद्धांतिक अप्रोप्रियेसन से लड़ना ज़रूरी है. इस उद्देश्य का एक नैतिक आग्रह भी है. यह नैतिक आग्रह दलित अनुभवों की अपनी सैद्धांतिकी विकसित होने के लिए ज़रूरी है. मिलिंद वाकाणकर[9] डा. धर्मवीर के प्रबल अनुभववाद को रेखांकित करते हैं. डा. धर्मवीर अपने प्रबल अनुभववाद के कारण ही कबीर के सम्बन्ध में हजारीप्रसाद द्विवेदी की मूलगामी आलोचना में समर्थ हुए. परन्तु उनका मूलगामी अनुभवाद धार्मिक विचारधारा का विकल्प नहीं दे पाया. कबीर स्वयं एक नए धर्म के प्रवर्तक बन उठे. यह उनकी सैद्धांतिक सीमा है. वाकणकर कबीर और दलित जनमन के रिश्तों के ऐतिहासिक पुनुरुत्पादन का एक प्रतिइतिहास लिखने की कोशिश करते हैं.

वाकणकर कहते हैं कि कबीर से आज के दलित आन्दोलन को दो चीजें उपहार में मिली हैं. एक चमत्कार और दूसरी हिंसा. वाकणकर कबीर के नाम के सहारे लगातार बनते रहने वाली कविताओं का सामाजिक इतिहास लिखने का प्रयास करते हैं. ‘कहत कबीर’ किस प्रकार कबीर से अपना रिश्ता प्रकट करने वाली एक टेकनीक बन गयी थी और मठों के भीतर या बाहर भी लगातार दलित सामूहिकता को संगठित करती रही थी, उसे समझने की कोशिश. दूसरे शब्दों में कहें तो मठों के भीतर कबीरपंथियों में और दलित आन्दोलन में काम करने वाली धार्मिक भावनाओं की राजनीतिक परीक्षा उनका उद्देश्य है. वाकणकर ऐतिहासिक धर्मों की प्रभुत्वशाली इतिहासदृष्टि या कहें कि वैष्णव कबीर के रूप में कबीर को देखने की इतिहासदृष्टि की उल्टी धारा में जाकर यह देखने का प्रयास करते हैं कि ऐतिहासिक धर्मों में कबीर का एप्रोप्रिएशन या पुनर्प्रस्तुति के ठीक पहले वह क्या था जिसने किसी दलित को इतना सशक्त बनाया कि वह ‘कहत कबीर’ के नाम से अपनी कविता करता है. वाकणकर वर्तमान सभी धर्मों को ऐतिहासिक धर्म ही मानते हैं. कबीर के सहारे वह इन ऐतिहासिक धर्मों का एक प्राक् इतिहास लिखने की कोशिश कर रहे हैं जहाँ ईश्वर के जन्म से पहले अर्थात् ऐतिहासिक धर्म बनने के ठीक पहले ‘ईश्वर के आने की ख़बर’ में छुपी चमत्कार की तात्कालिकता एक निम्नवर्गीय सामूहिकता को संगठित कर लेती है. वाकणकर दलित आन्दोलन में सक्रिय अम्बेडकरवादी विचारधारा की दो प्रवृत्तियों की आलोचना करते हैं. एक प्रवृत्ति दलित धर्म की तलाश करती है जो कभी बौद्ध धर्म में तो कभी कबीर धर्म में प्रकट होती है. दूसरी ओर कैसे दलित आन्दोलनों के अन्दर से उभरी प्रतिनिधित्व या रिप्रेजेंटेशन की राजनीति वस्तुतः चुनावी जोड़ तोड़ की राजनीति में बदल जाती है. वाकणकर के अनुसार ऐतिहासिक धर्मों का इतिहास जिन घटनाओं के इर्द गिर्द शुरू होता है, उस घटना को संभव करने वाली निम्नवर्गीय चेतना के भीतर शामिल स्वतः स्फूर्त क्षमता को दमित करके आगे बढ़ता है. वह धर्मों का एक संपूर्ण इतिहास है जबकि विधर्मी या अपधर्मी परंपरा के इतिहास को कभी भी ऐतिहासिक धर्म की पूर्णता के मॉडल में देखना संभव नहीं है. भक्ति को धार्मिक विचारधारा कहने से हम केवल प्रभुत्वशाली वैष्णव धारा का ही इतिहास समझ सकते हैं. परन्तु जिस ‘घटना’ के आलोक में वैष्णव धर्म लोकप्रिय धार्मिक विचारधारा में रूपांतरित होता है अर्थात् निम्नवर्गीय दलित सामूहिकता की जिस विधर्मी परंपरा में नया क्षण कबीर लेकर आते हैं, उस धुंधले क्षण का इतिहास वाकणकर लिखने की कोशिश करते हैं. मूल कवि और उसके अनुयायी दलित कवि अर्थात् ‘हस्ताक्षर’ और ‘प्रतिहस्ताक्षर’ के द्वारा कबीर कैसे नया सन्दर्भ ग्रहण करते चलते हैं, उसका इतिहास. दूसरे शब्दों में, मूल कवि के प्रति सच्ची श्रद्धा और कृतज्ञतावश जब कोई दलित कवि अपनी कविता पर कबीर की मुहर लगाता है तो लगभग वही कर रहा होता है जिसे हम ‘भक्ति’ कहते हैं. पर वाकणकर इसे ऐतिहासिक धर्मों की तरह नहीं मानते जहाँ कबीर भगवान् हो जाते हैं. डा. धर्मवीर के ‘कबीर भगवान्’ और ‘दलित धर्म’ की चर्चा के सन्दर्भ में वाकणकर उसी प्रक्रिया का दुहराव देखते हैं. दलित अपधर्मी परंपरा वस्तुतः जब ‘दलित सशक्तिकरण’ के रूप में पुनर्प्रस्तुत होती है तो वह प्रभुत्वशाली परंपरा ही हो जाती है. डा. धर्मवीर के भीतर जो अपधर्मी, निम्नवर्गीय स्वाभाविकता है, उसे तो वाकणकर स्वीकार करते हैं परंतु ऐतिहासिक धर्म के मॉडल से बाहर न निकल पाने की आलोचना भी करते हैं. इसलिए वाकणकर के अनुसार डा. धर्मवीर द्विवेदी जी के ‘ब्राह्मणवादी’ मॉडल की आलोचना करते हुए भी ऐतिहासिक धर्मों की प्रभुत्वशाली परंपरा में ही अंतर्भुक्त हो गए. ठीक उसी तरह, जब दलित आन्दोलन अम्बेडकरवादी इतिहासदृष्टि में अंतर्भुक्त हो जाता है तो आन्दोलन में अन्तर्निहित दलित सामूहिकता या ‘दलित, मुस्लिम, आदिवासी’ सामूहिकता प्रतिनिधिमूलक राजनीति में विकृत होकर स्वयं प्रभुत्वशाली परंपरा बन जाती है. वाकणकर कहते है कि ‘दलित, आदिवासी, मुस्लिम’ जीवन में रोजमर्रा की हिंसा और मृत्यु की अनवरत उपस्थिति ने उनकी स्मृतियों में सामाजिकता की एक पूर्णतः भिन्न छवि संजोये रखी है. यह किसी आन्दोलन की आकस्मिकता के बीच अचानक से पुनर्संयोजित होकर आन्दोलन के सामाजिक चरित्र का निर्माण करती है. दिक्कत उसको प्रतिनिधित्व देने वाली प्रक्रिया में आती है जहाँ पहले से ही प्रभुत्वशाली धार्मिक या राष्ट्रीय या कोई अन्य विचारधारा एप्रोप्रिएशन के लिए तैयार है. इस प्रक्रिया को वाकणकर ‘राजनीतिक समाज’ (पोलिटिकल सोसाइटी) के निर्माण की प्रक्रिया कहते हैं. ‘नागरिक समाज’ की मध्यस्थता के चलते दलित समुदायों और राज्य के बीच सीधा राजनीतिक संवाद नहीं बन पाता है. उनका कहना है कि पार्था चटर्जी आदि के द्वारा प्रस्तावित इस ‘राजनीतिक समाज’ के लिए जरूरी है कि दलित आन्दोलन को इस प्राक् इतिहास में अन्तर्निहित सम्भावना की ओर लगातार ध्यान दिलाते रहा जाये.

गोपाल गुरु के लिए यह प्रबल अनुभववाद जिस बाह्य और प्राक् का सिद्धांत देता है उस सिद्धांत की वस्तु दलित जनमन को प्रतीकात्मक बना देती है. यह यथार्थ के संश्लिष्ट अनुभवों के द्वंद्वात्मक विश्लेषण में असमर्थ है. साहित्यिक उत्पादनों को आधार बना कर जब सिद्धांत निर्माण होता है तो वह दलित अनुभवों को महज सौंदर्यशास्त्र की वस्तु बना देता है. गुरु कहते हैं- “लेकिन कविता सिद्धांत का स्थानापन्न नहीं हो सकती…[लेकिन] कविता के पास विशिष्ट को सामान्य और सामान्य को विशिष्ट करने वाली संकल्पनात्मक क्षमता नहीं है. इसमें द्वंद्वात्मक शक्ति नहीं है.” अनुभववाद की आलोचना में गुरु की यह प्लेटोनिक भंगिमा ध्यान देने लायक है. सत्य के धारण की द्वंद्वात्मक क्षमता को कविता के बाहर का क्षेत्र घोषित किया गया. यह दलित सैद्धांतिकी को तात्कालिक प्रदर्शन की प्रवृत्ति से मुक्त करने वाली भंगिमा है. साहित्यक आलोचना से समाज विज्ञान के अनुशासन को स्वायत्त करने के लिए यह कतई आवश्यक नहीं था कि कविता मात्र को द्वंद्वात्मक शक्ति से रहित मान लिया जाय. अनुभव प्रसूत रचना-प्रक्रिया के दो रूपों के बीच मूल्यगत अंतर को स्थापित करके स्वायत्ता और समानता का आग्रह अनुभव की अवधारणा में उलझने को बाध्य है. इस उलझन को सुलझाने के क्रम में ही अनुभव सिद्धांत-निर्माण का एथिक्स बन जाता है. गुरु अनुभव की मौलिकता को स्वीकार करते हैं पर सिद्धांत को आवश्यक मानते हैं. दलित सिद्धान्तकारों की स्वायत्ता एक नैतिक अर्थशास्त्र की प्रस्तावना करती है. यह नैतिक अर्थशास्त्र एक मनुष्य एक मूल्य वाली व्यवस्था है जहाँ कोई नैतिक अधिशेष मूल्य का शोषण संभव नहीं[10]. पर वास्तव में गुरु अनुभव की आरम्भिक और स्वाभाविक ऊर्जा को ज्ञानमीमांसक व्यवस्था के अंतर्भुक्त करते हैं. सत्य के दावे का यह ज्ञानात्मक एकाधिकार अनुभवों का अभिग्रहण एक ख़ास विश्वदृष्टि से करने लगता है. साहित्यिक और सैद्धांतिक उत्पादकों की भिन्नता का यह नैतिक आग्रह सत्य के प्रति साहित्य के दावे को निर्मूल करता है. यह एक किस्म के यांत्रिक यथार्थवाद को जन्म देती है. यह यांत्रिक यथार्थवाद साहित्य और कला की राजनीति को अद्वान्द्वात्मक और तात्कालिक मानता है. सिद्धांत निर्माण के लिए हद से हद इसकी उपयोगिता महज संवेदनात्मक होने में है. गुरु दलित साहित्य या साहित्य मात्र को विशिष्ट अनुभवों पर आधारित सौन्दर्यबोध की दृष्टि मानते हैं जिसका उपयोग सिद्धांत निर्माण के लिए ज़रूरी सार्वभौमिक का निर्देशात्मक स्तर होने की संभावना तक सीमित है.[11] इस प्रकार कलाकार सहज और आवयविक बुद्धिजीवी के सैद्धांतिक उत्पादन से बाहर हो जाता है.

वेलीवाड़ा रचना-प्रक्रिया की इस श्रेणीबद्धता के खिलाफ है. रोहित वेमुला की घटना के आलोक में स्पष्ट है कि न तो वाकणकर के अर्थों में मृत्युशोकगीत की सामूहिकता वेलीवाड़ा है और न गुरु के अर्थों में समाज-वैज्ञानिक मात्र सत्य के गणराज्य का आवयविक बुद्धिजीवी है. वेलीवाड़ा नैतिक को राजनैतिक का विकल्प नहीं देखता. वहां राजनीति की नैतिकता से बनने वाला उत्पादकों का संगठन है. सांस्कृतिक श्रेणी-क्रम को चुनौती देने के लिए ज़रूरी है कि सम्पूर्ण सांकृतिक उद्योग के तर्क का निषेध संभव हो. वेलीवाड़ा सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक क्रान्ति का त्रिविमीय चरित्र है. अनुभवप्रसूत यह वेलीवाड़ा जितना तार्किक है उतना ही वास्तविक भी.

***

मार्तण्ड  प्रगल्भ

मार्तण्ड प्रगल्भ

छात्र राजनीति और संस्कृति-कर्म में व्यस्त रहने वाले मार्तण्ड प्रगल्भ जे.एन.यू. के भारतीय भाषा केंद्र से पी.एच.डी. हैं. फ़िलहाल  रेडिकल नोट्स कलेक्टिव  के साथ कार्यरत हैं. उनसे mpragalbha1@gmail.com पर संपर्क संभव है

 

 

 

सन्दर्भ:

[1]  रोहित वेमुला का पत्र (१८-१०-२०१७ को ब्राउज़)

[2] डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वांङ्मय, खंड-१, पृष्ठ: ७८. डॉ. अम्बेडकर प्रतिष्ठान, नई दिल्ली- २०१३.

[3] गोपाल गुरु, गोपाल गुरु-सुन्दर सरुकई; क्रैक्ड मिरर: अन इंडियन डिबेट ऑन एक्सपीरियंस एंड थ्योरी ; पृष्ठ ९९; ओयूपी, दिल्ली- २०१२.

[4] देखें, मई १९५० वैशाख अंक, महाबोधि सोसाइटी जर्नल. अम्बेडकर ‘बुद्धा एंड द फ्यूचर ऑफ़ हिज रिलिजन’. बौद्ध धर्म विषयक उनके अन्य लेखन में भी उक्त विचारों को देखा जा सकता है.

[5] ‘elite’ शब्द पर टिप्पणी करते हुए ‘जेल नोटबुक’ के संपादक ने नोट किया है:- “élite.” As is made clear later in the text, Gramsci uses this word (in French in the original) in a sense very different from that of the reactionary post-Pareto theorists of “political élites”. The élite in Gramsci is the revolutionary vanguard of a social class in constant contact with its political and intellectual base. पृष्ठ- ३३४, पाद टिप्पणी-१८, अंतोनियो ग्राम्शी, सेलेक्सन्स फ्रॉम द प्रिज़न नोटबुक्स. (सं. और अनु.) क़ुइन्तिन होअरे और ज्योफ्रे नोवेल स्मिथ. ओरिएंट ब्लैकस्वान, दिल्ली- १९९६.

[6] वही

[7] वही. पृष्ठ-३३५

[8] “It should be noted how the deterministic, fatalistic and mechanistic element has been a direct ideological “aroma” emanating from the philosophy of praxis, rather like religion or drugs (in their stupefying effect). It has been made necessary and justified historically by the “subaltern”character of certain social strata.” पृष्ठ-३३६.

[9] देखें: मिलिंद वाकणकर, सबॉलटर्निटी एंड रिलिजन : प्रीहिस्ट्री ऑफ़ दलित एम्पावरमेंट इन साउथ एशिया. रूटलेज: लन्दन, २०१०. मिलिंद वाकाणकर के विचारों की विस्तृत समीक्षा के लिए देखें:  (मार्तंड प्रगल्भ, दलित आधुनिकता और कबीर की सहज साधना पर कुछ विचार , रैडिकल नोट्स. ) २०-१०-२०१७ को ब्राउज़.

[10] गोपाल गुरु, गोपाल गुरु-सुन्दर सरुकई; क्रैक्ड मिरर: अन इंडियन डिबेट ऑन एक्सपीरियंस एंड थ्योरी ; पृष्ठ- २०६; ओयूपी, दिल्ली- २०१२

[11] वही, पृष्ठ २३.

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