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धर्म-दर्शनवादी और उदारवादी राजनीतिक चेतना के कवि केदारनाथ सिंह: उस्मान खान

हिन्दी-साहित्य के इतिहास में केदारनाथ सिंह की स्थिति पर सोचता रहा हूँ। हिन्दी-साहित्य-जगत में उन्होने अपनी अलग पहचान बनाई। वे मुझे विचार-मुक्त कवि लगते रहे हैं। उनके साहित्य की अंतर्धारा – बिम्ब, कल्पना, कथा, स्मृति, परंपरा आदि- किस दिशा में बह रही है, इस पर दोबारा मनन किया तो एक विचारधारा निकल आई, कोई भी साहित्यिक अकेला नहीं होता। केदारनाथ सिंह की भी परंपरा है, घराना है। शायद लोग मेरे इस प्रयास को दूर की कौड़ी मारने का प्रयास समझें, पर कौड़ी खेलने वाले जानते हैं कि कभी-कभी दूर की कौड़ी भी लग जाती है। केदारनाथ सिंह की पहली पुस्तक जो मैंने पढ़ी, वह थी – ‘हिन्दी-कविता में बिम्ब-विधान’। फिर केदारनाथ सिंह की प्रतिनिधि कविताएं पढ़ीं, और उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के बारे में सुनता-पढ़ता रहा। अब उनकी मृत्युपरांत पत्र-पत्रिकाओं, ब्लॉग, इंटरनेट पर टिप्पणियाँ और विचार पढ़ रहा हूँ। पर उन पर कभी लिखूंगा ऐसा सोचा नहीं था। संपादक-मित्र उदय शंकर ने सुझाया या बरगलाया; मैं सोचने लगा… #लेखक

kedarnath singh

साभार : साहित्य  अकादमी  आर्काइव्ज  वाया  यूट्यूब

केदारनाथ सिंह की मृत्यु पर….

By उस्मान खान

हिन्दी-साहित्य-जगत में केदारनाथ सिंह किसी परिचय के मोहताज नहीं। उन्हें १९८९ में साहित्य अकादमी सम्मान और २०१३ में भारतीय ज्ञानपीठ सम्मान मिला। केदारनाथ सिंह का मान है, सम्मान है, घराना है, परंपरा है, पर ऐसे व्यक्ति की मृत्यु पर भी छींटाकशी करने वाले कहाँ चूकते हैं। इंटरनेट के इस दौर में भावभीनी विदाई देने वाले बहुत दिखे – पता चला वे कईयों के प्रिय कवि थे। पाठक-समीक्षक अक्सर ही अपने प्रिय कवियों की सूची बनाते चलते हैं।

भावुक समर्थकों ने उनकी महानता और काव्य-वैभव पर वैसे ही लिखना शुरू कर दिया, जैसा कुँवर नारायण की मृत्यु पर लोगों ने लिखा था या जैसा मुक्तिबोध की जन्म-शताब्दी पर लोग लिख रहे हैं। पाठक-समीक्षक में कुछ लिखने-कहने का भावनात्मक-उन्माद पैदा होना अचरज नहीं, अपने प्रिय कवि की मृत्यु या जन्म-मृत्यु-शताब्दी वगैरह ऐसे अवसरों को बढ़ा देती हैं। पर वहीं केदारनाथ सिंह पर छींटाकशी भी होने लगी। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व का विश्लेषण तेज़ हुआ, तर्क-वितर्क चलने लगा। युवा कवि-समीक्षक अविनाश मिश्र का लिखा पढ़ा, फिर कवि-समीक्षक कृष्ण कल्पित का लिखा पढ़ा। दोनों ने ही अपने मन की गुत्थी ही सामने रखी है। केदारनाथ सिंह के व्यक्तित्व के बारे में अलग जानकारी इस लिखे में मिल सकती है, लेकिन उनके कृतित्व की उपेक्षा की गई है।

कृष्ण कल्पित ने बनारस कविता को केंद्र में रखकर अपनी बात कही है, उन्हें कविता शायद इसलिए पसंद नहीं कि वे बनारस पर और भी अच्छी रचनाएँ पढ़ चुके हैं, उन्होंने बनारस पर अपना पसंदीदा साहित्य भी बताया है। उनके लिखे का मूल यह है कि केदारनाथ सिंह की कविता में वर्णित बनारस गीता प्रेस के कैलेंडर की तरह है। बात ताने की तरह लगती है, लेकिन फ़िलहाल इसे ही उनकी कविताओं में घुसने का प्रारम्भ-बिन्दु बनाते हैं।

साहित्य में बिम्ब एक भाव-विचार या चरित्र या दृश्य होता है, साथ ही यह भाव-विचार या चरित्र या दृश्य गतिशील होता है। प्रत्येक बिम्ब भाव-विचार-श्रंखला या दृश्यावली होता है। बिम्ब से अर्थ उस कला-उत्पाद से है, जो विशेष दृश्य-बोध को प्रस्तुत करता है। केदारनाथ सिंह की कविताओं में ‘बिम्ब की अवधारणा’ का केंद्रीय महत्त्व है, बिम्ब-विधान पर उन्होंने लिखा भी है, लेकिन उनकी अधिकांश कविताओं में कोई बिम्ब-विधान दिखाई ही नहीं देता, शायद एक समय के बाद वे भाषा-शैली और कथाओं पर अधिक ध्यान देने लगे थे, बिम्ब-विधान के निर्माण का प्रयास वे करते रहे, उन्होने लंबी कविताएं भी साधीं, लेकिन तब भी बहुत कम कविताओं में वे कोई नया बिम्ब-विधान प्रस्तुत कर पाए हैं। कविता में कथा कह देना एक बात है और बिंबों के माध्यम से कथा कहना दूसरी बात। केदारनाथ सिंह ने ‘मंच और मचान’ में एक कथा प्रस्तुत की है, यह कथा स्वयं में एक बिम्ब हो सकती है, लेकिन यह बिंबों से रची कविता नहीं है। उनकी कविताओं में बिम्ब अलबत्ता हैं, पर छिन्न-भिन्न या ढीले-ढाले ढंग से जुड़े हुए। उन्हें अगर मजबूती से जोड़ा जाए, तो एक धारा प्रवाहित होती दिखती है। अगर आप उन्हें जोड़ने में असमर्थ रहे तो आप उनकी धर्म-दर्शनवादी उदारवादी राजनीतिक चेतना को नहीं जान पाएँगे न ही यह देख पाएँगे कि वे बिम्ब-निर्माण में कुशल नहीं थे।

अपनी विशेष भाषा-शैली के निर्माण में भी वे असमर्थ रहे। आधुनिक बिम्ब-विधान भाव-विचार के तनाव पर स्थिर रहता है। एक दृश्य, जिसमें विचार और प्रति-विचार का खिंचाव स्थिर हो जाता है। केदारनाथ सिंह के बिंबों में चित्रित भाव-विचार लचर हैं, लाचार हैं – व्यवस्था और शक्ति वहाँ नहीं। आधुनिक अंग्रेजी कविता को एजरा पाउंड और टी. एस. इलियट ने जैसे शक्तिशाली बिम्ब दिए या जिस तरह मुक्तिबोध, शमशेर और राजकमल चौधरी ने हिन्दी-कविता को पूंजीवादी भारत की शहरी सभ्यता के ठोस बिंबों से समृद्ध किया, वहीँ केदारनाथ सिंह जीवन भर बिम्ब-साधना करते हुए भी नए बनते भारत को कविता में प्रस्तुत करने में असमर्थ रहे। उनकी कविता प्राक-पूंजीवादी युग में ही शरण ढूंढती रही, मामला तुलसीदास का हो या कबीरदास का। वे आधुनिक युग की जीवन-स्थितियों से कतराते रहे। साहित्य में बिम्ब-निर्माण नया नहीं है, साहित्य भाव-विचार या चरित्र या दृश्य निरूपण का कार्य ही तो करता आ रहा है। सवाल है इन बिंबों की गति का, संकरी ही सही, पर इनकी धारा का, इन बिंबों में व्याप्त विविधरंगी फूलों की माला तैयार करने का।

बनारस कविता भी अस्त-व्यस्त बिंब ही प्रस्तुत करती है। मैंने गीता प्रेस का कैलेंडर नहीं देखा, उसमें भी बनारस होगा, पर केदारनाथ सिंह की कविता का बनारस, बनारस के टूटे-फूटे दृश्य दिखाता है। किसी दृश्य में कोई आंतरिक संघर्ष नहीं, हर दृश्य जैसे जड़ है, लेकिन प्रत्येक दृश्य अगले दृश्य से जुड़ जाता है, इन दृश्यों या दृश्यावली का कोई आंतरिक संघर्ष नहीं दिखता, संबंध ज़रूर दिखता है। बनारस कविता इस लिहाज से अच्छी है कि इन टूटे-फूटे दृश्यों को तार्किकता से जोड़ने पर एक विचार-श्रंखला, एक दृश्यावली प्रस्तुत होती है, जो केदारनाथ सिंह के समूचे साहित्य को अपने में समेट लेती है। वह बात जो अनकही रह गई। इस कविता में केदारनाथ सिंह के साहित्य की अंतर्धारा, उनकी साहित्य-परंपरा आसानी से दिखाई देती है। इस कविता का बनारस पूंजीवादी शहरीकरण की चपेट से बाहर खड़ा है, वह यथार्थ है, लेकिन ऐसा यथार्थ जिसे ‘तुलसीदास’, ‘धीरे-धीरे’, ‘आधा’, ‘स्तम्भ’, ‘अर्घ्य’ के बिंबों, स्मृतियों से रचा गया है। प्रेमचंद भी बनारस से अनजान नहीं थे, लेकिन उनके उपन्यासों में शहर का नक़्शा कुछ और है। रंगभूमि में वे लिखते हैं–

शहर अमीरों के रहने और क्रय-विक्रय का स्थान है। उसके बाहर की भूमि उनके मनोरंजन और विनोद की जगह है। उसके मध्य भाग में उनके लड़कों की पाठशालाएँ और उनके मुक़दमेबाज़ी के अखाड़े होते हैं, जहाँ न्याय के बहाने गरीबों का गला घोंटा जाता है। शहर के आस-पास गरीबों की बस्तियाँ होती हैं।[i]

हो सकता है प्रेमचंद एक आदर्श पूंजीवादी नगर की बात कर रहे हों, लेकिन बनारस भी शहर है, जो आधुनिक-काल में निरंतर विस्तार पाता गया है, प्रेस और विश्वविद्यालय हों या नए कटते प्लॉट और कॉलोनियाँ; और उसका एक हिस्सा पुराना होने के नाते कई स्मृतियाँ अपने में सँजोए है। हिन्दी-क्षेत्र का एक प्रमुख साहित्यिक केंद्र बनारस रहा है। मामला स्मृतियों का नहीं, स्मृतियों को छांटने का है, चुनने का है। स्मृतियों के आपसी संघर्ष का है। केदारनाथ सिंह स्मृति के बिम्ब तैयार करते जाते हैं, लेकिन यह स्मृति विशेष है। इसमें उनका चुनाव है। केदारनाथ सिंह के लिए बनारस का धार्मिक महत्त्व अधिक है। बनारस एक नहीं कई सभ्यताओं का केंद्र रहा है, ढोंग और पाखंड की सभ्यता के भव्य-बिम्ब वे तैयार करते हैं, लेकिन बाह्याडंबर और अन्याय के विरोध की सभ्यता का कोई बिम्ब इस कविता में नहीं। तुलसीदास के साहित्य का महत्त्व अपनी जगह, पर क्या बनारस में तुलसीदास से बहुत पहले कबीर नाम का जुलाहा नहीं था और उसी समय का एक रैदास नाम का ‘खालिस चमार’ नहीं था। इन्हें उनकी कविता छूती भी नहीं। क्या इस शहर में विशेष धर्म-दर्शन का संगम ही इन बिंबों का विधान है, अगर है, तो क्या केदारनाथ सिंह रूमानी-यथार्थवादी धारा में नहीं हैं?

रूमानी-यथार्थवाद रूमानवाद और आधुनिकतावाद के साथ यथार्थवाद के वाद-विवाद-संवाद में जन्मा था, और अंततः हिटलर के प्रचार-प्रमुख गोएबेल ने उसका आदर्श रूप प्रस्तुत किया था। उसने रेडियो और सिनेमा को फासीवादी राजनीति के प्रचार का माध्यम बनाया। यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि उसने वर्ष १९२१ में अपनी पीएच.डी. रूमानवादी नाटककार क्रिश्चियन विल्हेल्म फॉन शुत्स पर की थी। तब तक रूमानवाद का साहित्यिक धारा के रूप में अंत हो चुका था और आधुनिकतावाद के नाम पर धर्मशास्त्रों का आधुनिक-साहित्यिक पुनर्पाठ चालू हो चुका था। रूमानवाद और आधुनिकतावाद की धार्मिक-दर्शनवादी धारा का संयोजन फासीवादी रूमानी-यथार्थवाद के रूप में सामने आया था।

रूमानवादी साहित्य-धारा १८००-१८५० तक प्रभावी रही, इसके बाद १८५० से यथार्थवादी साहित्य-धारा का पदार्पण हुआ, इसने रूमानवादी साहित्य-धारा के विरोध में अपने कई सिद्धान्त तैयार किए थे, १९०० से आधुनिकतावादी साहित्य-धारा का प्रवेश होता है। इन तीनों ही धाराओं को यूरोप के पूंजीवादी शहरों के प्रति-साहित्य के रूप में देखा जा सकता है। पूंजीवादी-व्यवस्था का विरोध तीनों धाराओं में है। लेकिन इस व्यवस्था के अंत और नए समाज के निर्माण का संकल्प प्रायः मार्क्सवादी साहित्यिकों में ही देखा जा सकता है। केवल मार्क्सवादी साहित्यिक ही ऐसे कहे जा सकते हैं, जिनहोने इन शहरों में नई आशा और भविष्य-स्वप्न देखा।

रूमानवादी साहित्यिक आधुनिकता-विरोधी थे, उद्योगिकरण और आधुनिक शहर उसके लिए अभिशाप थे, प्रकृति और लोक-जीवन उसके पूज्य थे और कल्पना (बिम्ब, फेंटेसी, आख्यान आदि इसमें सम्मिलित होते चले गए) वरदान। वे नई जीवन-स्थितियों से भागते थे। यथार्थवादी साहित्य रूमानवाद के विरोध में खड़ा था। यथार्थवादी साहित्यिक समाज का ‘वास्तविक’ चित्रण करने पर ज़ोर देते थे। वर्ग-स्थिति और वर्ग-व्यवहार का निरूपण उसका प्रमुख कार्य था। नई जीवन-स्थितियों ने उसके पुराने बंधन खोल दिए थे। एक तरफ़ भाव-विचार-अनुभव की कल्पना थी, तो दूसरी तरफ़ भाव-विचार-अनुभव की मांसलता। रूमानवाद के प्रचारक प्रायः धर्म-दर्शन शास्त्री थे, यथार्थवाद के प्रायः मार्क्सवादी। यथार्थवाद के प्रभावी होने के साथ ही, रुमानवादी धारा का एक तरह से अंत हुआ और आधुनिकतावादी-साहित्य के भी बीज पड़े।

२०वीं सदी के प्रारम्भ में एज़रा पाउंड और टी.एस. इलियट आधुनिकतावादी-साहित्य के प्रमुख प्रचारक के रूप में उभरते हैं। बिम्ब की अवधारणा साहित्य-चर्चा के केंद्र में उपस्थित होती है, साथ ही धर्मशास्त्र और पुराणों का आधुनिक स्थितियों के अनुकूल पाठ करने का प्रयास शुरू होता है, फोकलोर में विशेष दार्शनिक संकल्पनाएँ खोजी जाने लगती हैं। कल्पना और फंतासी, परंपरा और प्रतिभा, प्रकृति और लोक-जीवन पर चर्चा को नई दिशा मिलती है। आधुनिकतावाद का यथार्थवाद से संघर्ष शुरू होता है, इस संघर्ष ने दुनिया भर के साहित्यिकों को दो खेमों में बाँट दिया था– ‘काफ्का या थॉमस मान’। लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि २०वीं सदी में आधुनिकतावाद भी दो प्रबल धाराओं में विभक्त होता चला गया– धर्म-दर्शनवादी और मार्क्सवादी। आधुनिकतावादी धर्म-दर्शनवादी कवि प्राक-पूंजीवादी युग में अपना आदर्श खोजता है, आधुनिकतावादी मार्क्सवादी कवि वैज्ञानिक समाजवाद में। विचार दोनों के यथार्थवादी हैं। जहाँ आधुनिकतावादी-साहित्य अपने यथार्थवादी-मूल से उखड़ जाता है, वह रुमानवादी साहित्य बन जाता है, या कभी प्राक-पूंजीवादी साहित्य में तब्दील हो जाता है। आधुनिकतावादी-साहित्यिक यथार्थ को नकारता नहीं, वरन उसकी विशेष कल्पना करता है। व्यक्ति और समाज का उपचेतन स्तर उसकी फैन्टेसी का मुख्य विषय है। वास्तव में, यथार्थ की कल्पना कैसी हो? इस प्रश्न पर ही आधुनिकतावादी साहित्य में भेद पैदा होता है। धर्म-दर्शनवादी कल्पना और मार्क्सवादी कल्पना पूंजीवादी शहरों के यथार्थ का एक-सा रूप प्रस्तुत नहीं करती।

इस संबंध में लुकाच-ब्रेख्त-चर्चा उल्लेखनीय है। लुकाच आधुनिकतावादियों के धर्मदर्शनवादी उपचेतन पर ज़ोर देते हैं, तो ब्रेख्त उनकी तकनीकों के मार्क्सवादी प्रयोग की संभावना पर। जहाँ यथार्थवादी-साहित्य में बाह्य-स्थितियों या वस्तु-जगत के वर्णन पर अधिक ध्यान होता था, वहीं आधुनिकतावादी-साहित्य ने मन:स्थितियों को साहित्य-उत्पादन के केंद्र में ला खड़ा किया। औद्योगिक शहरों के निर्माण और पूंजीवादी विकास से उभरे भय और संताप ने, धर्म-हानि के प्रचार ने आधुनिकतावादी-साहित्य के निर्माण की भूमिका बनाई। मानव-अस्तित्त्व का नई सभ्यता से सामना ‘ईश्वर की मृत्यु’, ‘सभ्यता का पतन’ जैसे फ़िकरों को पैदा करने लगा। लेकिन कुछ ही समय में इन नई स्थितियों से जन्मी आशा और उत्साह ने भी साहित्य में स्थान पाया। ‘नई सभ्यता’ और ‘नए मनुष्य’ की चर्चा होने लगी। यांत्रिक पुनरुत्पादन की व्यवस्था और उपभोक्तावादी सभ्यता के उदय ने प्राचीन-साहित्य की दुर्लभता को नष्ट किया और इस प्रक्रिया में उसकी पवित्रता को भी। प्राचीन का पतन और नए का उदय साहित्यिकों को सभ्यता-समीक्षा की ओर ले गया, अभिव्यक्ति के नए तरीकों और आधुनिक ‘सौंदर्य-मूल्यों’ की खोज की ओर। यह स्थिति १९वीं सदी के अंतिम दशकों और २०वीं सदी के प्रारम्भिक दशकों के यूरोप की थी। हिन्दी-कविता में आधुनिकतावादी-धर्म-दर्शनवादी-साहित्य-धारा और आधुनिकतावादी-मार्क्सवादी-साहित्य-धारा का संघर्ष ४० के दशक में शुरू होता है। ‘तार-सप्तक’ इसका प्रारम्भ-बिन्दु है।

साहित्य में यथार्थ का वर्णन एक विशेष स्थिति में क्रांतिकारी था, जब यूरोप १९वीं सदी के उत्तरार्द्ध में था। २०वीं सदी के प्रारम्भ में आधुनिक शहरों में बदलते सामाजिक-संबंध साहित्यिक को भी नए भाव-विचारों, बिंबों के संपर्क में ले आए। दुनिया भर में नई इमारतों, मशीनों और लोकतान्त्रिक तथा वैज्ञानिक सोच के विकास ने एक ऐसे समाज को जन्म दिया, जो पहले कभी नहीं था। यह पूंजीवादी सभ्यता के संपर्क में आने पर पूरी पृथ्वी पर हुआ। निश्चित ही २१वीं सदी में भी यह परिवर्तन जारी है, भारत के करीबी नेपाल में राजशाही का अंत २१वीं सदी में जाकर ही हो पाया है, कुर्दिस्तान के लोग अब भी एक नए वि-राज्य की संकल्पना के लिए लड़ रहे हैं। १९वीं और २०वीं सदी में भी इन नए भाव-विचारों और बिंबों ने नई कल्पना और भाषा की खोज की थी। आज भी नए भाव-विचार साहित्यिकों को नई कल्पना और भाषा की खोज में लगाए हुए हैं। सवाल तब भी यथार्थ का था, आज भी यथार्थ का है – साहित्य में यथार्थ के पुनर्प्रस्तुतिकरण का है।

यथार्थ को स्वीकारते हुए भी, अद्भुत, अकल्पनीय और शक्तिशाली रचना आधुनिकतावादियों की विशेष पहचान बनी। इसने साहित्य-रचना की नई समझ तैयार की। आधुनिकतावादी-धर्म-दर्शनवादी-साहित्य मानव-मूल्यों के पतन के दृश्य निरूपित कर, सर्वशक्तिशाली-पुरुष में आस्था की ओर ले जाता है। वह पूंजीवादी-सभ्यता के सामने असहाय खड़े व्यक्ति की सर्व-शक्तिमान-पुरुष के सामने की गई प्रार्थनाएँ हैं। इससे अलग आधुनिकतावादी मार्क्सवादियों का ध्यान इस पर रहता था कि कल्पना, पुराण, स्मृति आदि के प्रयोग से वर्णन में रुचि पैदा हो, साहित्य सरस बना रहे साथ ही वर्गीय-वास्तविकता और साहित्य की परिवर्तनकारी शक्ति का ह्रास न हो। उनको आशा थी कि नई जीवन-स्थितियों से उभरा, नई और प्रभावशाली तकनीकों से निर्मित साहित्य वर्ग-संघर्ष को तेज़ करने में अधिक सहयोगी होगा। उनका मत था कि साहित्य राजनीति के रण-क्षेत्र में प्रवेश करे, लेकिन अपनी सेना के साथ। साहित्य में राजनीति का सहयोग करने की शक्ति होनी चाहिए। साहित्य में प्रभावित करने की क्षमता होनी चाहिए, लेकिन प्रभाव के लिए यथार्थ का रहस्यीकरण करना साहित्यिक को धर्म-दर्शनवादी धारा में ला खड़ा करता है। समीक्षक की भी यही स्थिति होती है, यदि वह जड़-सौंदर्यबोध से ग्रसित है। समस्या रूमानियत या यथार्थ से नहीं, बल्कि विशेष राजनैतिक दृष्टि से होती है, जो मानव-मूल्यों के ह्रास से जन्म लेती है, हिंसा और उपभोग की संस्कृति के प्रभावी होने से सामने आती है। समस्या आधुनिकता से नहीं, पूंजीवादी आधुनिकता से है, शहरों से नहीं पूंजीवादी शहरों से है, धर्म-दर्शन से नहीं, धर्म-दर्शन के अफ़ीम से है।

यहाँ यह नहीं भूलना चाहिए की उपरोक्त साहित्यिक वाद और आंदोलन शहरों में साहित्यिकों के संगठित होने के कारण पैदा हुए थे, कई साहित्यिक अपने को वाद और आंदोलन से मुक्त कहते रहे, पर आधुनिक शहरों में जीवन-यापन करना और उनमें पैदा हो रही नई स्थितियों और सौंदर्य-मूल्यों से मुक्त रहकर साहित्य-उत्पादन करना असंभव था। केदारनाथ सिंह भी विचार-मुक्त कवि लगते हैं, लेकिन यह असंभव था कि उनका साहित्य नई उत्पादन-स्थितियों से भी बचकर निकल जाता। उस पर भी विभिन्न वादों और आंदोलनों का प्रभाव है। उपरोक्त तीनों प्रमुख वाद साहित्य के अतिरिक्त अन्य कला-माध्यमों में भी प्रारम्भ और प्रभावी हुए। १९वीं और २०वीं सदी में विश्व-भर में रूमानवाद, यथार्थवाद और आधुनिकतावाद के वाद-विवाद-संवाद में प्रचुर साहित्य-उत्पादन हुआ। हिन्दी का आधुनिक-साहित्य भी इसका अपवाद नहीं। यह वाद-विवाद-संवाद  सर्रियलिज़्म, फ्यूचरिज़्म और एंटी-पोएट्री से लेकर सिचूएशनिस्ट, जादुई यथार्थवाद और उत्तर-आधुनिकतवाद तक विभिन्न नई साहित्य-धाराओं के निर्माण में सहयोगी बनी, हिन्दी में भी नई कविता, अकविता, जादुई प्रभाववादी, अस्मितावादी आदि साहित्य-धाराओं के निर्माण में इस संघर्ष ने सहयोग किया।

आधुनिक-साहित्य के अंतर्गत यथार्थ का रहस्यीकरण और यथार्थ का पुनर्प्रस्तुतिकरण दोनों कार्य हुए। जबकि ये दोनों एकदम भिन्न प्रक्रियाएँ हैं। यथार्थ के वर्णन में, कल्पना और भाषा-शैली का महत्त्व नकार देने पर साहित्य अपनी साहित्यिकता खो देता है, लेकिन यह याद रखना चाहिए कि आधुनिक-साहित्य का मूल विषय पूंजीवादी-सामाजिक-संबंध हैं, उससे अलग होते ही वह प्राचीन साहित्य की नकल भर रह जाता है। पुराण का साहित्यिक-प्रयोग पुराण रचने से अलग है। लू शुन ने इस प्रक्रिया पर लिखा है। उन्होने चीन की पौराणिक कहानियों का आधुनिक पुनर्प्रस्तुतिकरण भी किया है।

केदारनाथ सिंह २०वीं सदी के उत्तरार्द्ध के प्रारम्भ से प्रायः अब तक साहित्य-उत्पादन करते रहे थे। उन पर इन विभिन्न वादों और आंदोलनों का असर पड़ना आश्चर्य की बात नहीं। उनकी पुस्तक ‘हिन्दी-कविता में बिम्ब-विधान’ जब प्रकाशित हुई, तब तक हिन्दी-साहित्य में बिम्ब, फेंटेसी, कल्पना, परंपरा, पुराण, स्मृति, भविष्य-कल्पना आदि यूरोपीय आधुनिकतावादी-साहित्यिक-अवधारणाएँ चर्चा का विषय बन चुकी थी। केदारनाथ सिंह ने ‘तीसरा सप्तक’ के अपने वक्तव्य में ज़ोर देकर कहा कि कविता में मैं सबसे अधिक ध्यान देता हूँ बिम्ब-विधान पर, लेकिन न तो ‘तीसरा सप्तक’ में न ही बाद में वे अपनी बात पर खरे उतरते हैं। बिंबों की शिथिलता उनके साहित्य में जीवन भर बनी रही। वे कोई बिम्ब-विधान नहीं रच पाए। ‘बाघ’ कविता में भी बिंबों और वक्तव्यों का बिखराव ही लक्षित होता है। कोई विधान है क्या वहाँ? और अगर है, तो क्या वह रूमानी-यथार्थवादी विधान ही नहीं है? बुद्ध-कथा पढ़कर कोई भी समझ सकता है कि विद्वान-प्राध्यापक-कवि किस युग में जी रहा है। बुद्ध-संबंधी उसकी कल्पना क्या है? वह आज से भय खाकर कल के वीर को देखते हैं। बुद्ध उन्हें ठीक ही दिखाई देते हैं, लेकिन वे गर्दन झुकाकर निकल जाते हैं, आश्चर्य! ये कौन-से बुद्ध हैं? बुद्ध हैं या कोई आधुनिक आरामतलब साहित्यिक, जो ख़तरा देखते ही दुम दबाने लगता है? माना कि बुद्ध-संबंधी साहित्य का अध्ययन-मनन २०वीं सदी में जाकर ही ठीक से शुरू हुआ, लेकिन जब तक केदारनाथ सिंह ‘बाघ’ लिखते, बुद्ध-साहित्य का पर्याप्त अध्ययन-मनन हिन्दी में भी उपलब्ध हो चुका था, दिल्ली में तो और आसानी से उपलब्ध हो जाता होगा। देखने वालों को तो ‘मुँह नज़र आते हैं दीवारों के बीच’।

थे या नहीं, मैं नहीं जानता, लेकिन उनके साहित्य का बहुलांश उसी धारा को समृद्ध करता है। वे यथार्थवादी स्थितियों में रूमानी भाव-विचार तैयार करते हैं। कल्पना-भावना, स्मृति-परंपरा के नाम पर यथार्थ का रहस्यीकरण करते हैं। केदारनाथ सिंह ऐसा क्यों करते हैं? क्या नाम, सम्मान, परंपरा, घराने के लिए? अपनी परंपरा की खोज में उनकी कविताएं बनारस और दिल्ली के आभिजात्य-वर्ग की स्मृति से अधिक कुछ और नहीं निर्मित करती। उन्हें जो चुनना था, उन्होने चुना और उनकी कविताओं पर इसका असर पड़ा, उनकी कवितायें रूमानी यथार्थवाद की शिकार होती चली गईं। मैं यह नहीं कहता कि वे सड़क पर भूखों मरते या मार्क्सवादी होते तो उनकी कविताएं महान हो जातीं, या वे मेरे प्रिय कवि हो जाते। पर क्या कारण है कि ८३ वर्ष के जीवन में लिखा गया उनका अधिकांश साहित्य एक-सा है? केदारनाथ सिंह की प्रतिबद्धता बिम्ब के प्रति है, लेकिन एक साहित्य-उत्पादक के रूप में वे रूमान और यथार्थ के तनाव के बिम्ब ही निर्मित कर पाते हैं और दया और भीरुता के भाव-विचार। वे कभी-कभी ही अपनी बात स्पष्ट करते हैं, वह भी कथा या स्मृति के बिम्ब खींचते वक़्त। यह कहने का एक ढंग हो सकता है, लेकिन वह जो कहते हैं, उसमें एक दिशा निर्मित होती जाती है। और वह दिशा मानव-मूल्यों के ह्रास की उपेक्षा की है, मानव-मूल्यों की उच्चता से सहम जाने की है। साहस और सृजनशीलता के बिना साहित्यिक भय और जड़ता से ग्रस्त हो जाता है। भय और जड़ता उसके समक्ष अतीत-गौरव-गान और प्रकृति-वर्णन के अतिरिक्त कोई रास्ता नहीं छोडते। उनकी प्रतिबद्धता वर्तमान समाज या राजनीति के प्रति क्यों नहीं है? क्या साहित्य और समाज के सम्बन्धों को वे नहीं जानते? या जान-बुझकर उपेक्षित करते हैं? उनकी रचनाओं में समाज और साहित्य का संबंध अगर है तो अवैध है, अपवित्र है। ऐसे अवैध सम्बन्धों से जन्मे बिम्ब देखकर उनकी कविताओं का डी.एन.ए. टेस्ट न करें, वे उन्हीं की संतान हैं लेकिन अवांछित। यथार्थ रूमान के आवरण में क्या बाघ कविता जैसा नहीं लगता?

साहित्यिक जब तक जीवित होता है, वह विश्व में अपनी भूमिका और साहित्य-रचना के विषय और रूप में बदलाव कर सकता है। बदलाव की यह संभावना या आशंका मृत साहित्यिक खो देता है। साहित्यिक की मृत्यु उसके किए और कहे-लिखे पर पुनर्विचार के लिए प्रेरित करती है। साहित्यिक अपने जीवन में भी बदलता है। उसके भाव-विचार, कल्पना-क्षमता, भाषा-शैली आदि बदलते हैं। मृत्यु साहित्यिक के व्यक्तित्व और कृतित्व में बदलाव को रोक देता है। लेकिन कुछ साहित्यिक जीवन में ही अपने साहित्यिक विकास को रोक देते हैं, उनके लिखने-सोचने का एक ढर्रा बन जाता है। इसे उनकी मृत्यु भी कहा जा सकता है। इससे लिखने का काम आसान हो जाता है, साथ ही विशेष लेखन में कुशलता हासिल हो जाती है, लेकिन इससे विषय और रूप की एकतानता निर्मित होती जाती है, साहित्यिक प्रयोग सीमित होता जाता है। लेखन की यह खास प्रक्रिया रूढ़िवाद कही जा सकती है, इसे साहित्यिक-हठ भी कहा जा सकता है। केदारनाथ सिंह भी साहित्यिक-हठी हैं। साहित्य का यह संकीर्ण घेरा साहित्यिक के लिए एक सुरक्षा-कवच की तरह होता है। वह इसे जीत की गारंटी समझने लगता है। वह जहाँ प्रसिद्धि पाता है, एक-सा, वैसा ही जैसा प्रसिद्ध हुआ, लिखता जाता है। विषय-संकीर्णता और प्रयोग से भय साहित्यिक में जड़ सौंदर्यबोध का निर्माण करते हैं। जीते-जी मरना और क्या है कि अब आप अपनी सृजन-क्षमता का विस्तार नहीं कर सकते, यांत्रिक पुनरुत्पादन के अतिरिक्त और कुछ नहीं कर सकते। नए को रचने की शक्ति आप में नहीं। नए को समझने का सामर्थ्य आपमें नहीं है। ज़रूरी तो नहीं कि कवि हो गए, तो अब ज़िंदगी भर कवि ही बने रहना है, ‘राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा’। पर साहित्यिक ऐसी स्थितियों में भी फँस जाता है। अपने काव्य को माँजने में वह ऐसा रूप प्राप्त करता है, जो दूसरों के लिए असाध्य है, वह अनन्य साहित्य की रचना करता है, इस अनन्य रूप को पुनरुत्पादित करने में ही वह काव्य-कौशल समझने लगता है। यहीं उसकी मौत है, अपनी ही साहित्य की फैक्टरी में।

साहित्य प्रांसगिक होना चाहता है। प्रासंगिक होकर ही साहित्य जीवित रह सकता है। लेकिन प्रासंगिकता युग-सापेक्ष होती है। कल का प्रासंगिक आज अप्रासंगिक लग सकता है और आज का प्रासंगिक कल अप्रासंगिक हो सकता है। केदारनाथ सिंह का साहित्य भी अपनी गति को प्राप्त होगा। मेरी दृष्टि में केदारनाथ सिंह की कविताओं में शिथिल बिंबों की भरमार है, धर्म, प्रकृति और लोक-जीवन के बिम्ब अधिक है, अन्याय-अत्याचार, अंधविश्वास की मुखालफत के बिम्ब कम। उनकी कविताओं में उदारवादी राजनीतिक-दिशा है, प्रयोगशीलता की निरंतर उपेक्षा है। हिन्दी-साहित्य के गुणात्मक विकास में उनकी कविताओं का कोई महत्त्व नहीं। वे नई बनती जीवन-स्थितियों के प्रति अचेत हैं, परिणामस्वरूप नई कल्पना और भाषा-शैली के निर्माण के प्रति भी जागरूक नहीं हैं। केदारनाथ सिंह की कविताओं में प्रस्तुत बिंबों का प्रमुख विचार और प्रतिविचार रूमान और यथार्थ है। रूमानी यथार्थवाद उनकी कविता का अंधेरा पक्ष है। उनके साहित्यिक का राजनैतिक उपचेतन है। ज्ञान-विज्ञान की उपेक्षा, अध्ययन-मनन का आलस्य और नए को स्वीकारने की असमर्थता केदारनाथ सिंह की कविताओं की विशेषता है। वे १९४७ यानी भारत-पाकिस्तान-विभाजन को एक रूमानी स्मृति में तब्दील कर देते हैं, उनका प्रश्न कि ‘क्यों चले गए थे नूर मियाँ’ ऐसे उभर कर आता है जैसे उनका नौकर शहर छोडकर चला गया हो और अब खाना कौन बनाएगा, घर कौन साफ करेगा! नूर मियाँ का इससे अधिक क्या महत्त्व है कि वे सुरमा बेचते थे? पाकिस्तान में पत्ते कैसे गिरते हैं! यह विस्मय नासिर काजमी के लिए उचित था, केदारनाथ सिंह जब आधी सदी गुज़र जाने के बाद वैसे ही विस्मित होते हैं, वही सवाल दोहराते हैं, तो वह रूमानी स्मृति से अधिक कुछ नहीं लगता। केदारनाथ सिंह का गणित तो कमज़ोर नहीं, लेकिन इतिहास में वे उत्तीर्ण नहीं हो पाते। ८० के दशक का उत्तरार्द्ध दक्षिणपंथी राजनीति के भारत और विश्व-भर में प्रभावी होने का समय है। ऐसे समय में भारत-पाकिस्तान विभाजन को एक भावुक स्मृति बनाकर पेश करना केदारनाथ सिंह द्वारा यथार्थ का रुमानीकरण, वस्तु-जगत का रहस्यीकरण नहीं तो और क्या है! यह एक खास राजनैतिक दृष्टि नहीं तो और क्या है? यह नहीं भुलना चाहिए कि जब केदारनाथ सिंह ४७ के बारे में लिख रहे थे, हिन्दी-साहित्यिकों का बहुलांश जाति-धर्म आधारित दंगों, हिंसा-उन्माद का तीखा विरोध कर रहा था। यह भारत में फासीवादी शक्तियों के प्रभावी होने का समय है, साथ ही अस्मितावादी-समुदायवादी बहुरंगी-प्रतिवादी शक्तियों के तैयार होने का भी, आश्चर्य नहीं केदारनाथ सिंह के साहित्यिक का अंतर्संघर्ष भी तेज़ हो जाता है। मण्डल-कमंडल और बाबरी-मस्जिद के ठोस-बिम्ब केदारनाथ सिंह देख नहीं पाए, या देखते ही पीछे भागे, तो उन्हें नूर मियाँ दिखाई दे गए, थोड़ा और पीछे जाते तो कोई ‘डोम’ या कोई ‘मुंडा’ भी दिख सकता था। क्या उनकी स्मृति एक जगह जाकर रुक नहीं जाती? क्या वे यथार्थ का एक खास नक्शा नहीं बनाते? बाहर की कोमलता अंदर की कठोरता पर बहुत मोटी चढ़ी हुई है। केदारनाथ सिंह ईश्वर को बार-बार धन्यवाद देते रहे हैं। शायद हिन्दी-भाषा को भी ईश्वर का वरदान मानते रहे थे। क्या ‘देव-भाषा’ का आधुनिक रूप ही हिन्दी है, और इसीलिए हिन्दी भाषा ईश्वरीय कृपा है? तो फिर बुद्ध की करुणा का क्या होगा? अल्लाह की रहमत का क्या होगा? और जीसस की दया का? और फिर कबीर और नानक का क्या होगा? हिन्दी-कवि के लिए कई परम्पराएँ खुली हैं, केदारनाथ सिंह ने अपनी मति से चुनाव किया। उन्होने कुछ अपनी सुमति और कुछ भगवान भरोसे ही जीवन काटा और साहित्य-उत्पादन किया। जानने वाले जानते हैं कि सर्रियलिस्ट फ़िल्मकार लुई बुनुएल ने भी ईश्वर को धन्यवाद दिया है, वे अपने अंदाज़ में, जैसे पूछने वाले पर ही व्यंग्य करते हुए, कहते हैं – “ईश्वर का धन्यवाद कि मैं नास्तिक हूँ!” धन्यवाद के पात्र केदारनाथ सिंह भी हैं कि उन्होने अपनी कुछ कविताओं में अपनी परंपरा और उपचेतन को स्पष्ट रूप से सामने रख दिया है। उनके साहित्य की अंतर्धारा की दिशा यहाँ साफ है। ‘मुक्ति’, ‘मेरी भाषा के लोग’, ‘नए कवि का दुख’ ऐसी कई कविताएं हैं। पर मैं केवल उनकी एक कविता की ओर ध्यान दिलाना चाहूँगा, ‘बनारस’ में जिस बात के लिए बिंबों को जोड़ना पड़ता है, वह मशक़्क़त यहाँ नहीं, अपनी बात को बच्चों सी सरल ज़बान में तैयार बिंबों के माध्यम से उन्होंने रखा है –

जब ट्रेन चढ़ता हूँ

तो विज्ञान को धन्यवाद देता हूँ

वैज्ञानिक को भी

 

जब उतरता हूँ वायुयान से

तो ढेरों धन्यवाद देता हूँ विज्ञान को

और थोड़ा सा ईश्वर को भी

 

पर जब बिस्तर पर जाता हूँ

और रोशनी में नहीं आती नींद

तो बत्ती बुझाता हूँ

और सो जाता हूँ

 

विज्ञान के अंधेरे में

अच्छी नींद आती है। (विज्ञान और नींद)

यहाँ विरोध स्पष्ट है, कुछ अनकहा नहीं। विचार और प्रति-विचार आमने-सामने हैं। पर अब भी सोच में सवाल नाच रहे हैं। केदारनाथ सिंह की यथार्थ की कल्पना कैसी है? क्या वे रूमानी यथार्थवादी धारा के कवि हैं? आज उनकी क्या प्रासंगिकता है, जबकि इसी साल उन्होने अपनी आखरी साँसे लीं? इन प्रश्नों को पाठक-समीक्षक के ध्यानार्थ रखता हूँ। केदारनाथ सिंह के साहित्य का मूल्यांकन होना अभी शुरू ही हुआ है, आशा है उनकी रचनावली प्रकाशित होगी, और बेहतर मूल्यांकन किया जाएगा। उनके साहित्य की अंतर्धारा और हिन्दी-साहित्य में उनकी परंपरा भी अधिक स्पष्ट होगी। तब शायद अधिक स्पष्ट होगा कि केदारनाथ सिंह की राजनीति क्या रही? मुझे विश्वास है हिन्दी-साहित्य-समीक्षक अधिक गंभीरता से केदारनाथ सिंह के व्यक्तित्व और कृतित्व पर सोचेंगे। ‘विज्ञान के अंधेरे में’ सोए उनके उपचेतन को टटोलेंगे। वे भी मशक़्क़त से भागेंगे तो हिन्दी-साहित्य का क्या होगा! यूँ आराम-तलब बौद्धिक-साहित्यिक हिन्दी-साहित्य-चर्चा का नया विषय तो नहीं है। इस पर बात होती आई है। चलती चर्चा चलती चले…

***

[i] प्रेमचंद, ‘रंगभूमि’, हंस प्रकाशन, इलाहाबाद, १९९९, पृ.-९

usman khan

उस्मान ख़ान समकालीन हिंदी साहित्य के अलहदा युवा कवि-कथाकार हैंचर्चाओं और पुरस्कारों की भीड़ से अलहदा… छपाऊ मानसिकता से भी अलहदा... जे.एन.यूके हिंदी विभाग से मालवा के लोकसाहित्य पर पीएचडीइनसे usmanjnu@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

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मुक्तिबोध की रचनात्मकता : प्रो.राजकुमार

मुक्तिबोध के बहाने प्रो. राजकुमार एक बहस की धारावाहिकता में गहरे विश्वास के साथ उतरे हैं. इस सीरिज का पहला , दूसरा लेख   और  तीसरा लेख  आप पढ़ चुके हैं,  चौथा  यहाँ  प्रस्तुत  है. #तिरछीस्पेल्लिंग 

यह बात सही है कि मुक्तिबोध नारीवादी रचनाकार या आलोचक नहीं हैं। यह भी सही है कि मुक्तिबोध कोई दलितवादी चिन्तक या रचनाकार नहीं हैं। इतना ही नहीं, मैं जो बात जोर देकर कहना चाहता हूँ वह यह है कि मुक्तिबोध यथार्थवादी रचनाकार भी नहीं हैं। लेकिन इससे मुक्तिबोध छोटे नहीं हो जाते, इससे मुक्तिबोध की तौहीन नहीं होती। इसके बावजूद मुक्तिबोध एक बड़े चिन्तक, विचारक और रचनाकार हैं। #लेखक

Muktibodh By Haripal Tyagi

Muktibodh By Haripal Tyagi

मुक्तिबोध की रचनात्मकता

 

By प्रो.राजकुमार

मुक्तिबोध ने जो बातें आलोचक या चिन्तक के रूप में लिखी हैं, वे बातें तो महत्त्वूपर्ण हैं ही, लेकिन जो बातें उनकी रचनाओं में आयी हैं, वे कई बार उनसे भी महत्त्वपूर्ण हैं, जो उन्होंने एक आलोचक के रूप में सचेत ढंग से लिखी हैं। मुक्तिबोध के आलोचनात्मक रूप को समझने के लिए सिर्फ उनके वैचारिक लेखन को न देखें, उनके रचनात्मक लेखन में जो विचार के स्फुरण हैं, वे भी बहुत महत्त्वपूर्ण हैं और कई बार वैचारिक लेखन से ज्यादा महत्त्वपूर्ण हैं। मुक्तिबोध ने स्वयं ‘संवेदनात्मक ज्ञान और ज्ञानात्मक संवेदना’ की बात की है। विचार और संवेदना तथा रचना और विचार को मुक्तिबोध अलग करके देखने के हिमायती नहीं हैं।

मुक्तिबोध ने प्रायः विधाओं की पारम्परिक सीमाओं को तोड़ा है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण ‘एक साहित्यिक की डायरी’ है। इसे क्या कहेंगे, डायरी, संस्मरण, नोटबुक, वैचारिक-चिन्तनपूर्ण लेखों को संजोने का उपक्रम; आखिर इसे क्या कहा जाए! इसी तरह मुक्तिबोध की जो कहानियाँ हैं, उनको भी हिन्दी में कहानी लिखने की पहले से चली आ रही परम्परा के परिदृश्य में देखने पर कई बार समस्या उत्पन्न होती है। यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि इन्हें कहानी माना जाए, निबंध माना जाए या फिर संस्मरण माना जाए। कहने का तात्पर्य यह है कि मुक्तिबोध ने जिस विधा में भी लिखा उस विधा को समस्याग्रस्त बनाया। उन्होंने उसकी पहले से चली आ रही संरचना को किसी न किसी रूप में बदला। इसलिए सिर्फ आलोचनात्मक लेखन में नहीं, बल्कि रचनात्मक लेखन में भी, मुक्तिबोध ने जो कुछ लिखा है, उस पर विचार करने की जरूरत है।

मुक्तिबोध के समूचे लेखन में प्रेमचंद के प्रति आदर का भाव है, लेकिन प्रेमचंद के बारे में मुक्तिबोध ने लगभग न के बराबर लिखा है। निराला के प्रति भी आदर का भाव है लेकिन मुक्तिबोध ने उनकेे बारे में भी कुछ नहीं लिखा। मुक्तिबोध ने सबसे ज्यादा जिस रचनाकार के बारे में लिखा है, वे जयशंकर प्रसाद हैं। सोचने वाली बात है कि मुक्तिबोध जयशंकर प्रसाद के बारे में इतना क्यों लिखते हैं? ‘कामायनी’ का जिस तरीके से उन्होंने मूल्यांकन किया है, उससे आप क्या वास्तव में समझ सकते हैं कि मुक्तिबोध ने प्रसाद से क्या लिया! मुझे लगता है कि ‘कामायनी एक पुनर्विचार’ पुस्तक में मुक्तिबोध ने प्रसाद के बारे में चाहे जो भी निर्णय दिए हों, लेकिन मुक्तिबोध जो चीजें प्रसाद से लेते हैं, वह भारतीय सभ्यता का गहरा, सूक्ष्म सांस्कृतिक बोध है। समूची हिन्दी काव्य परम्परा में, बहुत गहरे अर्थों में, एक सच्चे भारतीय कवि के रूप में मुक्तिबोध अपने आपको प्रस्तुत करते हैं। छायावादी कवियों में निराला की कविता की क्रांतिकारिता अपनी जगह है। निराला ने ‘तुलसीदास’ और ‘राम की शक्तिपूजा’ जैसी लम्बी कविताएँ लिखी हैं। लेकिन इसके बावजूद भारतीय सभ्यता का बहुत गहरा और सूक्ष्म सांस्कृतिक बोध जिस तरह प्रसाद के यहाँ है, वैसा और किसी के यहाँ नहीं है। मुझे लगता है कि यह शायद बड़ा कारण है, जिसकी वजह से मुक्तिबोध लगातार प्रसाद की कविताओं से उलझते हैं। भले ही, उन्होंने इस बात को सीधे-सीधे न लिखा हो। मुक्तिबोध का ‘कामायनी’ के बारे में जो मूल्यांकन है, वह बड़ा ही नकारात्मक लगता है, लेकिन उन्होंने प्रसाद से जो कुछ लिया है, वह बहुत महत्त्वपूर्ण है।

मुक्तिबोध ने प्रसाद की ‘कामायनी’ को ‘फैंटेसी’ के रूप में देखा। प्रसाद ने भी एक अन्योक्ति के रूप में उसकी भूमिका लिखी है। प्रसाद ने भी ऐसा कुछ नहीं कहा जिससे लगे कि ‘कामायनी’ एक यथार्थवादी रचना है। मुक्तिबोध का प्रसाद के साथ जो तादात्म्य है, उसके केन्द्र में उस शिल्प-विधान की भी भूमिका है जो मुक्तिबोध प्रसाद की ‘कामायनी’ से ग्रहण करते हैं और फिर जिसे अपने स्तर पर विकसित करते हैं। उन्होंने जैसे प्रसाद की ‘कामायनी’ को एक ‘फैंटेसी’ कहा है, वैसे ही, वह अपनी समूची रचनाओं को ‘फैंटेसी’ कहते हैं। उन्होंने यह माना है कि उनकी रचनाएँ ‘फैंटेसी’ के विधान में लिखी गयी हैं। इसलिए समस्या यह है कि जो रचना ‘फैंटेसी’ के विधान में लिखी गयी हो, जिसमें अन्तर्वाह्य, ‘स्वप्न’ और ‘यथार्थ’ का साफ-साफ अन्तर न किया गया हो, उसकी व्याख्या यथार्थवादी सैद्धान्तिकी के सहारे कैसे की जा सकती है।

उनकी कविता ‘अंधेरे में’ में यह प्रसंग आता है कि यह तो स्वप्न कथा है। ये सारी बातें स्वप्न में चल रही थी। यह जानबूझ कर मुक्तिबोध ने किया है। और यह उन्होंने इसलिए किया है क्योंकि ‘स्वप्न और यथार्थ’ के पहले से, यथार्थवादी दौर से, चले आ रहे विभाजन को वे तोड़ना चाहते थे; या उसको धुंधला करना चाहते थे। इसी तरह से क्या अन्दर है और क्या बाहर है, क्या आत्मगत है और क्या वस्तुगत है, इसका भी पारम्परिक विभाजन जो यथार्थवाद के रास्ते चला आ रहा था, मुक्तिबोध ने तोड़ दिया। उदाहरण के माध्यम से यह बात समझ सकते हैं। उनकी ‘भूल गलती’ कविता को लीजिए। वह ‘भूल गलती’ किसकी है? पहले यह भ्रम होता है कि किसी से कोई चूक-भूल हो गयी है, उसकी सजा मिलने वाली है। लेकिन फिर पता चलता है कि यह तो सत्ता का प्रतीक है। अन्दर क्या है, बाहर क्या है, इसका साफ-साफ विभाजन पहले से चला आ रहा था, मुक्तिबोध ने उसे तोड़ दिया। और आखिरी चीज इस प्रसंग में यह कि व्यक्ति की निश्चित-निर्धारित संभावनाओं को भी मुक्तिबोध ने समस्याग्रस्त बनाया। इस दृष्टि से आप विचार करें कि माक्र्सवाद की विधेययवादी/प्रत्यक्षवादी (Positivist) समझ उस दौर तक चली आयी थी जिसमें ज्यादातर चीजों के बारे में निश्चित रूप से कहने का दावा किया जाता था। मुक्तिबोध ने इस समझ को चुनौतीग्रस्त बनाया और व्यक्ति की संभावनाओं को कहीं न कहीं खुला छोड़ दिया। जैसे, ‘अंधेरे में’ कविता में ‘एक व्यक्ति अन्दर है और दूसरा उसकी साँकल खटखटा रहा है। कहने के लिए यह दो व्यक्ति हैं, लेकिन हम जानते हैं कि यह एक ही व्यक्ति की दो संभावनाएँ हैं। एक ही व्यक्ति दो रूपों में विकसित हो सकता है या कई रूपों में विकसित हो सकता है। अब वह समाज और देश-दुनिया कैसी है और वह कैसा प्रयास करता है, अपने को किधर जोड़ता है, इससे उसकी कौन-सी संभावनाएँ फलीभूत होंगी, यह निश्चित होगा।

व्यक्ति की पहचान नयी कविता के दौरान एक बड़ा मुद्दा था। व्यक्ति कैसे बनता है? व्यक्ति की अस्मिता को कैसे परिभाषित किया जाए? मुक्तिबोध ने इस बात को रेखांकित करने का प्रयास किया कि व्यक्ति की संभावनाएँ तो अनन्त हैं। वह कई रूपों में विकसित हो सकता है। व्यक्ति का कौन-सा रूप विकसित होगा यह इस बात पर निर्भर करता है कि समाज उसे कैसा असवर देता है और वह व्यक्ति कैसा प्रयास करता है। ये बातें यथार्थवाद की सैद्धान्तिकी के बाहर की बातें हैं। इसलिए यथार्थवाद के सहारे मुक्तिबोध या मुक्तिबोध की रचनाओं की व्याख्या नहीं कर सकते। यह अलग बात है कि कुछ लोगों को लगता है कि यथार्थवाद एक ऐसी ‘मास्टर की’ है, जिसके जरिये अतीत से लेकर वर्तमान तक और भविष्य में जो कुछ होगा, उसकी भी व्याख्या की जा सकती है। ऐसे लोगों को आप छोड़ दें, साहित्य और कला के विकास के बारे में जिनको थोड़ा बहुत मालूम है, वे जानते हैं कि यथार्थवाद के बाद पश्चिम में आधुनिकतावाद या जिसे अंग्रेजी में ‘मार्डनिज़्म’ कहते हैं, वह आता है। और मुक्तिबोध स्वयं उसके साथ जुड़े हुए हैं, मुक्तिबोध की एक किताब है, ‘नयी कविता का आत्मसंघर्ष’। मार्क्सवाद के साथ उनका चाहे जैसा भी संबंध रहा है, लेकिन मुक्तिबोध ने कभी यह नहीं कहा कि वे नयी कविता से बाहर के कवि हैं। नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल या और दूसरे मार्क्सवादी कवि हैं, जिन्होंने अपने को नयी कविता से बाहर रखा। नयी कविता से बाहर रहने वाले कवि के रूप में मुक्तिबोध ने स्वयं को कभी पेश नहीं किया, बल्कि उसी के अन्दर एक प्रगतिशील संभावना खोजने की कोशिश मुक्तिबोध ने की। नयी कविता या नयी कहानी वही है जिसको अंग्रेजी में मार्डनिज़्म कहा जाता है। उसी का भारतीय संस्करण हमारे यहाँ नयी कविता या नयी कहानी के दौरान आया। उसी के अन्दर मुक्तिबोध भी सक्रिय हैं। उसी के अन्दर नयी कविता के दौरान बहसें हुईं। नयी कविता की वैचारिकी से बहस करते हुए, उससे उलझते हुए, मुक्तिबोध मार्क्सवादी आलोचना की, प्रचलित समझ से अपना एक संबंध स्थापित करते हैं। नयी कविता के दौरान कविता या साहित्य को लेकर जो एक नये प्रकार का चिन्तन आ रहा था, उससे भी वे उलझते हैं।

यथार्थवाद के आधार पर मुक्तिबोध की रचनाओं की व्याख्या नहीं कर सकते या नहीं करनी चाहिए। यथार्थवाद के चौखटे में मुक्तिबोध कहीं से भी फिट नहीं होते। उनका रचना-विधान यथार्थवाद से बाहर का है, जिसको आप मोटे तौर पर आधुनिकतावाद के साथ जोड़कर देख सकते हैं। इस पर हमें जरूर विचार करना चाहिए कि मुक्तिबोध भारतीय साहित्य और कला की क्या किसी वैकल्पिक परम्परा की ओर संकेत करते हैं या उसकी संभावनाओं को तलाशने की कोशिश करते हैं। हिन्दी की जिस जातीय परम्परा की बात आधुनिक युग में की जाती है, जिसके पुरस्कर्ता के रूप में हिन्दी में रामविलास शर्मा का नाम लिया जाता है, वह जातीय परम्परा मोटे तौर पर यथार्थवाद की सैद्धान्तिकी पर आधारित है। यथार्थवाद की सैद्धान्तिकी से प्रेरित प्रभावित जो रचनाएँ उस दौर में लिखी गयीं, वह बहुत महत्त्वपूर्ण हैं और उनके महत्त्व से इन्कार नहीं किया जा सकता। उस यथार्थवाद की सैद्धान्तिकी से प्रेरित-प्रभावित रचनाओं के कारण भारत की साहित्यिक और सांस्कृतिक परम्परा का जो पहले से चला आ रहा सिलसिला था, उससे हमारा संबंध कहीं न कहीं टूटता और खण्डित भी होता है। यह अकारण नहीं है। चाहे लोक-परम्परा हो या चाहे लोकाख्यान हो या लोक जीवन से जुड़े हुए अन्य विविध रूप हों, यथार्थवाद से प्रेरित हिन्दी की जातीय साहित्य की परम्परा में उनकी लगभग उपेक्षा की गयी। इप्टा ने जिस प्रकार के नाटक खेले और कुछ लोकगीतों का प्रयोग किया, वहाँ भी पहले से प्रचलित और लोकप्रिय रूपों का इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति अधिक थी, लेकिन उनकी संवेदना और सैद्धान्तिकी से तदाकार होने का कोई प्रयास या उलझने का प्रयास वहाँ भी नहीं दिखता। इसलिए यथार्थवाद से प्रेरित रचनाओं की महत्ता को स्वीकार करने के बावजूद यह मानना पड़ेगा कि यथार्थवादी आग्रह के कारण कहीं न कहीं पूर्व प्रचलित परम्परा से विच्छेद भी दिखायी पड़ता है।

मुक्तिबोध को उस प्रसंग में रखकर देखना चाहिए, जहाँ रखकर विचार करने से उनका महत्त्व उद्घाटित होता है। आप जानते हैं कि मुक्तिबोध की कविताओं में और कहानियों में भी, जो आख्यान है, वह लगभग लोककथाओं जैसा है। लोककथाओं के स्ट्रक्चर में उनकी कविताएँ रची गयी हैं। उनकी कहानियों में भी यही चीज दिखायी पड़ेगी। यह दिलचस्प है कि मुक्तिबोध हिन्दी के पहले (अज्ञेय के साथ) पूरी तौर पर शहरी कवि हैं, जिनका गाँव से संबंध नहीं रहा है। इसके बावजूद उनके रचना-विधान में लोककथाओं से लेकर लोकजीवन की ‘बावड़ी’ तक अनेकों चीजें हैं। इनसे संबंधित बहुतेरे बिम्ब और प्रतीक हैं। यहाँ तक कि मुक्तिबोध के रंगबोध पर भी भारतीय लोकजीवन की गहरी छाप है।

मुक्तिबोध रूपक और प्रतीक के लिए जाने जाते हैं। लेकिन उससे ज्यादा खास चीज, जो मुझे बराबर आकृष्ट करती रही है कि कई बार भक्तिकालीन कवियों की पूरी की पूरी शब्दावली मुक्तिबोध के यहाँ मिल जाती है। इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना और अनेक शब्द मुक्तिबोध के यहाँ मिल जाते हैं, जिससे रामविलास जी को यह भ्रम होता है कि यह तो रहस्यवादी हो गए हैं। दरअसल, समूची भक्तिकालीन परम्परा के दौरान शब्दों की एक नयी समृद्धि आयी; उसको एक नए स्तर पर अर्जित करने और उसका नवोन्मेष करने का उद्यम मुक्तिबोध की कविता में दिखायी पड़ता है। मुक्तिबोध बहुत गहरे और सूक्ष्म अर्थों में भारतीय संस्कृति और सभ्यता के कवि हैं। भारतीय साहित्यिक परम्परा का जितना गहरा संस्कार मुक्तिबोध के यहाँ दिखायी पड़ता है, उनसे पहले प्रसाद के यहाँ है, और उसके बाद तो फिर किसी के यहाँ नहीं है।

यथार्थवाद से इतर जो गैर यथार्थवादी परम्परा है, वह कैसे भारतीय सभ्यता की पहले की विरासत – लोक परम्परा और शास्त्रीय परम्परा – से जुड़ने में हमारी मदद करती है और एक वृहत्तर भारतीय समाज के साथ भी हमारा संवाद स्थापित करने में सहायता करती है। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का नाटक है ‘अंधेर नगरी’। कहा जाता है कि यह एक लोककथा है और पारसी रंगमंच पर इस तरह का नाटक खेला भी जाता था। भारतेन्दु ने उसे अपने ढंग से समृद्ध किया। ‘अंधेर नगरी’ का पूरा रचना-विधान भारतीय लोक परम्परा के आख्यान के अनुरूप है या उसके नजदीक है। उसकी व्याख्या यथार्थवाद की तार्किक सैद्धान्तिकी के आधार पर नहीं कर सकते। शायद यह बड़ा कारण है कि यह छोटा सा नाटक इतना लोकप्रिय हुआ। उसकी लोकप्रियता सिर्फ विश्वविद्यालयों और हिन्दी विभाग की चौहद्दी तक सीमित नहीं रहती। यह नाटक इतना विस्तार पाता है कि आपातकाल के दौरान उसे प्रतिबंधित करना पड़ा। यह जो शक्ति है, वह गैर यथार्थवादी शिल्प-विधान की खासियत है, जो ‘अंधेर नगरी’ में दिखायी पड़ती है। यह शक्ति, यह खासियत फिर मुक्तिबोध में दिखायी पड़ती है, हबीब तनवीर में दिखायी पड़ती है और विजयदान देथा की कहानियों में दिखायी देती है। यही मुक्तिबोध के चिन्तन का प्राण है।

मुक्तिबोध ने गैर यथार्थवादी रचनात्मकता को, पहले से चली आ रही परम्परा को, पहचाना, उसके द्वार खोले, उसके महत्त्व को सामने लाने का काम किया। प्रेमचंद ने 1936 में प्रगतिशील साहित्य मंच के अध्यक्षता पद से दिये गये भाषण ‘साहित्य का उद्देश्य’ में पहले के समूचे साहित्य का सुलाने वाला साहित्य के रूप में जिक्र किया था। मैं यथार्थवाद की इसी विडम्बना की ओर संकेत करना चाहता था। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि आधुनिक युग से पहले की समूची विरासत को, उसकी उपलब्धियों को, चाहे वह शास्त्रीय परम्परा की हों या लोक परम्परा की, अस्वीकार कर दिया गया। इसी पृष्ठभूमि में मुक्तिबोध ने एक बड़ा काम किया। वह अध्याय फिर से खोला गया, उसके महत्त्व को नये सिरे से समझने और उससे सीखने के एहसास को हमारे अन्दर उत्पन्न किया गया। आश्चर्य होता है कि मुक्तिबोध यह काम तब कर रहे थे, जब दुनिया में जादुई यथार्थवाद नाम की कोई चीज कहीं थी ही नहीं।

जादुई यथार्थवाद को साहित्य में लाने वाले लातिन अमरीकी उपन्यासकार गैब्रियल गार्सिया मार्खेज़ का नाम विशेषरूप से लिया जाता है। जादुई यथार्थवाद की शैली में नए तरह का जो आख्यान है, वह कहीं न कहीं लातिन अमरीकी लोक जीवन को फिर से एक नये स्तर पर उपन्यास के शिल्प में लाने का उपक्रम है। यह संभव ही नहीं हो पाता, अगर बीच में आधुनिकतावाद न आता। अगर आधुनिकतावाद ने यथार्थवाद की सैद्धान्तिकी को चुनौती न दी होती तो कोई भी लेखक, चाहे वह लातिन अमरीकी हो या कोई और, वह मैजिकल रियलिज्म के ढंग की रचना नहीं कर सकता था। विद्वान जानते हैं कि मैजिकल रियलिज्म का विकास कैसे हुआ। उसमें आधुनिकतावाद का बहुत महत्त्वपूर्ण योगदान है।  इसीलिए मुक्तिबोध के योगदान के इस पक्ष को देखकर आश्चर्य होता है। जादुई यथार्थवाद कहीं आया ही नहीं था, और इसके बावजूद मुक्तिबोध इस तरह की कविताएँ लिखने का साहस कर रहे थे। इसी अर्थ में कई बार विचार के स्तर पर हम ज्यादा औपनिवेशिक होते हैं जबकि संवेदना और संस्कार के स्तर पर देशी होते हैं। संवेदना या संस्कार हमेशा प्रतिक्रियावादी ही नहीं होते, गलत ही नहीं होते, कई बार ज्यादा सच्चे और अच्छे होते हैं। मुक्तिबोध के यहाँ भी हम इस बात को लागू करके देख सकते हैं कि उनकी रचनात्मकता में इस तरह के बहुत सारे पक्ष हैं। कई बार अपने वैचारिक चिन्तन में वे इस पर ध्यान नहीं देते हैं या फिर उस पर ढंग से विचार नहीं करते।

नयी कविता में इस बात को लेकर बड़ी बहस हुई कि जीवनानुभूति और सौन्दर्यानुभूति में क्या संबंध है। नयी कविता के दौरान यथार्थ वाला नुस्खा नहीं आता है। अज्ञेय ने, जिन्हें टी॰एस॰ इलियट से प्रेरणा मिली थी, कहा कि जीवनानुभूति और सौन्दर्यानुभूति दोनों ही अलग या समानान्तर चलने वाली चीजें हैं। इनके बीच कोई सीधा संबंध नहीं है। यह एक समझ थी, जिसके हिन्दी में प्रवक्ता अज्ञेय थे। दूसरी समझ मार्क्सवादियों की थी कि जीवनानुभूति और सौन्दर्यानुभूति में कोई फर्क नहीं है। अगर आपके पास जीवन का अनुभव है तो वही पर्याप्त है और उससे अपने आप रचना बन जाएगी। रचना आपकी जीवनानुभूति का ‘बाइप्रोडक्ट’ है। इस संबंध में मुक्तिबोध ने न तो यह कहा कि ये दोनों बिल्कुल अलग हैं और न तो यह कि जीवन की अनुभूति और सौन्दर्य की अनुभूति दोनों एक हैं। उन्होंने कहा कि सैन्दर्यानुभूति जीवनानुभूति से गुणात्मक रूप से भिन्न है। इसका मतलब है कि रचना जीवन का ‘बाइप्रोडक्ट’ नहीं है। रचना एक कौशल और अनुशासन भी है। अगर वह कौशल और अनुशासन आपको नहीं आता, तो जीवन में आपने चाहे जितना संघर्ष किया हो, उसके बाद भी कोई अच्छी रचना या कविता लिख पाएंगे, ऐसा कोई दावा आप नहीं कर सकते। तीन क्षणों की चर्चा में मुक्तिबोध ने इसी बात को बहुत विस्तार से दिखाया है कि रचना का जब बीज पड़ता है और जब रचना अन्तिम रूप से बनती है तो उसमें बहुत बदलाव आ जाता है। मुक्तिबोध ने इस बात को अपने आखिरी दिनों के आस-पास महसूस किया था कि हर विधा का अपना एक स्वभाव या चरित्र होता है। कविता, कहानी या अन्य दूसरी विधाओं में भी उस विधागत स्वभाव या चरित्र को आप एक सीमा तक तो बदल सकते हैं, लेकिन एक सीमा के बाद आप उसे नहीं बदल सकते। बल्कि इसका उल्टा होता है कि वह विधा भी आपको बदलती है। अगर आपको कहानी लिखनी है तो कहानी लिखने के बारे में जैसे ही सोचेंगे, वैसे ही आप अपने अनुभव को कहानी की विधा में रूपान्तरित करने की कोशिश करने लगेंगे। किसी विधा में अनुभव को रूपान्तरित करने की जो कोशिश है, उसमें वह विधा भी आपको और आपके अनुभव को बदल देती है। वह विधा आपकी भाषा को भी बदल देती है। बहुत सारी चीजें आपके जीवननानुभव में जुड़ जाती हैं और बहुत सी चीजें घट जाती हैं। मुक्तिबोध ने ये सारी बातें उस समय लिखी है जब हेडेन ह्वाइट जैसा कोई समाजशास्त्रीय चिन्तक नहीं हुआ था। हेडेन ह्वाइट की एक बड़ी प्रसिद्ध पुस्तक है ‘कन्टेन्ट आॅफ फाॅर्म’। इसका हिन्दी अनुवाद किया जाए तो होगा ‘रूप की अन्तर्वस्तु’। चाहे संगीत का रूप हो या साहित्य की किसी विधा का रूप हो, उसका अपना एक स्वाभाव होता है। एक रूप एक खास तरह की चीजों को ग्रहण करेगा, दूसरी चीजों को वह ग्रहण नहीं करेगा, और अगर आप एक सीमा के बाद जबदस्ती करने की कोशिश करेंगे, तो वह रूप उसे धारण नहीं करेगा। आप लाख कहते रहें  कि आपने कविता लिख दी है, और चौबीस कैरेट यथार्थ उसमें डाल दिया है, लेकिन अगर वह विषय उस रूप के अन्दर ‘फिट’ नहीं हो पाया तो फिर उसे कविता नहीं कहा जाएगा। उपन्यास लिखना है तो आप उपन्यास को चाहे जितना भी बदलें, अन्ततः आपको उपन्यास ही लिखना है। कविता लिखनी है तो आप कविता को चाहे जितना भी बदलें, अन्ततः कविता ही लिखनी है। यह विवेक कहीं न कहीं होना चाहिए कि रूप विषय को किस हद तक धारण कर सकता है। सुई से तलवार का काम नहीं लिया जा सकता और तलवार से सुई का काम नहीं ले सकते, यह बात मुक्तिबोध के तीन क्षणों के विवेचन से निकलकर हमारे सामने आती है, और हमें बहुत कुछ सीखने के लिए विवश करती है। यह बात अलग है कि स्वयं मुक्तिबोध का समूचा रचनात्मक लेखन इस कसौटी पर हमेशा खरा नहीं उतरता। मुक्तिबोध के यहाँ सर्वत्र श्रेष्ठ कविता नहीं है। बहुत सारे अंश हैं, जहाँ बिखराव भी दिखायी पड़ेगा, जहाँ लगता है कि रूप ने इसको धारण नहीं किया है। खास तौर से ‘अंधेरे में’ का जो पूरा विन्यास है, जहाँ नाटक की संरचना में कविता रचने का प्रयास उन्होंने किया है, वहाँ आप इस बात को महसूस कर सकते हैं। जिस रूप की तलाश मुक्तिबोध को थी, जो कई दफा उन्हें कुछ अंशों में मिलता था, और कभी नहीं मिलता, शायद वह तलाश ‘अंधेरे में’ जाकर पूरी होती है। इस तरह की और भी कुछ रचनाओं का उल्लेख किया जा सकता है, लेकिन नाटक की संरचना के अंदर अपनी प्रगीतात्मक संवेदना को कैसे पिरोया जाए, यह रचनात्मक विधान मुक्तिबोध ने अपने आखिरी दौर में खोज लिया। वहाँ रूप ने संवेदना को धारण किया है। इस दौर में इस तरह की दो रचनाएँ मिलती हैं। दूसरे पक्ष से धर्मवीर भारती का ‘अंधायुग’ है, जो नाटक की संरचना में एक खास तरह की प्रगीतात्मकता को धारण करने की तकनीक विकसित करता है। दूसरी तरफ मुक्तिबोध की ‘अंधेरे में’ है जहाँ वे लोकनाट्य की संरचना में प्रगीतात्मक क्रांतिकारी संवेदना को धारण करने का एक तरीका विकसित करते हुए दिखायी पड़ते हैं। लेकिन इस विस्तार में जाने के लिए तो एक नया लेख लिखना होगा।

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प्रो॰राजकुमार शोर-शराबे से दूर अध्ययन-अध्यापन में मग्न रहने  वाले युवा-तुर्क हिन्दी आलोचक हैं। भक्ति साहित्य, हिन्दी नवजागरण, आधुनिकता, आधुनिक साहित्य, प्रेमचंद, हिन्दी कहानी इत्यादि पर लगातार लेखन। किताबों में जैसी रुचि इनकी  है,  वह अन्यत्र दुर्लभ ही हो गई है। फिलहाल, बी॰एच॰यू॰ के हिन्दी विभाग में प्राध्यापक।इनसे dr.kumar.raj@gmail.com पर संपर्क संभव।

मुक्तिबोध के बहाने रचना और आलोचना के अंतर्संबंधों की पड़ताल: प्रो.राजकुमार

मुक्तिबोध के बहाने प्रो. राजकुमार एक बहस की धारावाहिकता में गहरे विश्वास के साथ उतरे हैं. इस सीरिज का पहला  और दूसरा लेख  आप पढ़ चुके हैं, तीसरा यहाँ प्रस्तुत है.

दूसरा लेख इस मायने में विशेष रहा कि सोशल साइट्स पर  इससे संदर्भित  विषद  प्रतिक्रियाएं  देखने  को  मिलीं. लेकिन ज्यादातर प्रतिक्रयाएं  अवांतर प्रसंगों  में उलझी  रहीं. और लेख की  मूल  आत्मा से बहस को भटकाने की कोशिश की  गयी. प्रो.राजकुमार  की यह विशेषता  है कि  अवांतर प्रसंगों में उलझने  के बजाय  अपनी  निरंतरता / धारावाहिकता कायम रखते हैं.  उम्मीद  है कि  यह सीरिज लम्बी चलेगी. #तिरछीस्पेल्लिंग 

Muktibodh By Haripal Tyagi

Muktibodh By Haripal Tyagi

आलोचना और रचना

By प्रो.राजकुमार

हिन्दी में आलोचना को परजीवी कहने का चलन रहा है। इधर कुछ ‘सर्जनात्मक‘ किस्म के ‘आलोचकों’ ने आलोचना को परजीवी के कहने के बजाय प्राध्यापकीय कहना शुरू कर दिया है। आलोचना अच्छी या बुरी तो हो सकती है और होती भी है; जैसे रचना अच्छी या बुरी हो सकती है, होती है, लेकिन प्राध्यापकीय आलोचना किस बला का नाम है? ‘जिसे प्राध्यापक लिखे वह प्राध्यापकीय आलोचना’!

रामचन्द्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, रामविलास शर्मा और नामवर सिंह- हिन्दी के चार बड़े आलोचक और चारों के चारों प्राध्यापक! हिन्दी आलोचना के इतिहास की इनके बिना कल्पना ही नहीं की जा सकती। हिन्दी ही नहीं, समूची दुनिया में आलोचना, समाज विज्ञान और विज्ञान के इतिहास की कल्पना विश्वविद्यालय के बिना असंभव है। लेकिन ये सारा ज्ञान-विज्ञान और साहित्य-सिद्धान्त इन सर्जनात्मक आलोचकों की दृष्टि में प्राध्यापकीय होने के कारण त्याज्य है।

हिन्दी में यह धारणा बद्धमूल रही है कि आलोचना दोयम दर्जे का काम है। अस्ल चीज है रचना। रचना मौलिक सृजन है और आलोचना उस पर आश्रित परजीवी, जिसकी हैसियत लाल बुझक्कड़ से अधिक नहीं।

आधुनिक आलोचना की जिस ढब पर शुरुआत हुई, उससे इस धारणा को बल भी मिला। परजीवी की छवि से मुक्ति पाने की छटपटाहट में आलोचक का नया रूप सामने आया जिसे अंग्रेजी में ‘स्कॉलर क्रिटिक’ कहा गया है। स्कॉलर क्रिटिक की छवि अपने यहाँ हजारी प्रसाद द्विवेदी पर बहुत सटीक बैठती है। मध्यकालीन संस्कृति और बौद्धिक परम्परा के गम्भीर अध्येता जिन्होंने आधुनिक रचनात्मकता पर बहुत कम लिखा। स्कॉलर क्रिटिक की परम्परा का विकास आगे चलकर संस्कृति के आलोचक के रूप में हुआ। सांस्कृतिक आलोचक के अध्ययन का दायरा साहित्य तक सीमित नहीं रह गया। वह समूची संस्कृति का आलोचक बन गया। साहित्य संस्कृति का पर्याय नहीं है, संस्कृति का एक हिस्सा है। सांस्कृतिक आलोचना समग्र सांस्कृतिक गतिविधि के परिप्रेक्ष्य में ही संस्कृति के इस साहित्य वाले हिस्से का अध्ययन करती है। सांस्कृतिक आलोचना की सार्थकता का विश्लेषण करते हुए टेरी इगल्टन ने तो साहित्य के विभागों का नाम ही सांस्कृतिक-अध्ययन विभाग रख देने की सलाह दी थी। सांस्कृतिक आलोचना उस दौर की उपज थी, जब सिद्धान्त-निर्माण का बोलबाला था, हर छोटा-बड़ा आलोचक थियरी बनाने में लगा था। थियरी ज्ञान मीमांसा और सत्तामीमांसा के एक अंग के रूप में साहित्य और संस्कृति का अध्ययन करती थी। थियरी की बाढ़ अब उतर चुकी है और साहित्य की सापेक्ष स्वायत्तता और स्वकीयता को नये सिरे से समझने की कोशिश चल पड़ी है, किन्तु इस समूचे घटनाक्रम से यह अभिज्ञान तो हो ही गया कि साहित्य को ज्ञानमीमांसा और सत्तामीमांसा के परिप्रेक्ष्य में ही ठीक से समझा जा सकता है। मुक्तिबोध के शब्दों में कहें तो साहित्य-समीक्षा सभ्यता-समीक्षा भी है। सभ्यता-समीक्षा के दायित्व से सम्पृक्त होकर ही साहित्य-समीक्षा सार्थक हो सकती है। यह कहना ठीक नहीं होगा कि मुक्तिबोध से पहले साहित्य-समीक्षा के इस गुरुतर दायित्व का एहसास हिन्दी में किसी को था ही नहीं। किन्तु मुक्तिबोध को इस बात का श्रेय अवश्य दिया जाना चाहिए कि उन्होनें साहित्य-समीक्षा को सही मायने में सभ्यता-समीक्षा के रूप में विकसित और स्थापित किया। यह काम उन्होंने उस समय किया जब साहित्य में आधुनिकतावाद का बोलबाला था और उसकी स्वायत्तता का बढ़ चढ़कर बखान किया जा रहा था। यह वही समय था जब पुराने ढंग की ‘मार्क्सवादी आलोचना’ साहित्य की स्वायत्तता के तर्क का ठीक-ठीक जवाब नहीं दे पा रही थी। लेकिन मुक्तिबोध के आलोचनात्मक लेखन पर बात आगे बढ़ाने से पहले रचना और आलोचना के सम्बन्ध को लेकर जो चर्चा शुरू हुई थी, उस पर दोबारा लौटें।

उल्लेखनीय है कि सॉस्यूर के भाषा-विषयक चिन्तन से प्रेरित संरचनावाद ने साहित्यिक आलोचना को एक मुकम्मल शास्त्र में तब्दील करने की कोशिश की और इस प्रक्रिया में साहित्य के मूलभूत नियमों को खोज निकालने का दावा किया। आलोचना को परजीवीपन से ऊपर उठाकर विज्ञान के समकक्ष खड़ा कर देने की मुहिम से पहले नॉर्थाप फ्राई अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘एनॉटमी ऑफ़ क्रिटिसिज्म’ में ऐसा उद्यम कर चुके थे। फ्राई के विचार रचना और आलोचना के अंतर्संबंधों को समझने की दृष्टि से महत्वपूर्ण है, इसलिए उनकी संक्षेप में चर्चा अप्रासंगिक न होगी।

यह धारणा, कि रचनाकार ही रचना के साथ ‘न्याय‘ कर सकता है, मानकर चलती है कि आलोचक परजीवी है, जबकि सच्चाई यह है कि आलोचना एक स्वतंत्र विद्या है जो साहित्य का अध्ययन करती है, जैसे विज्ञान वस्तु जगत अध्ययन करता है। आलोचना के अपने नियम कायदे और सिद्धान्त हैं। फ्राई के अनुसार रचनाकर-आलोचक के लिए अपनी रचनात्मक अभिरूचि से ऊपर उठ पाना प्रायः असंभव होता है। छोटे-मोटे लोगों की तो बात ही क्या टी.एस. इलियट जैसे प्रतिभाशाली व्यक्तित्व का भी आलोचनात्मक विवेक काफी कुछ उनकी रचनात्मक अभिरूचि से निर्धारित दिखता है। रचनाकार का अपने और दूसरों के बारे में लेखन दिलचस्प तो हो सकता है लेकिन उसे अन्तिम और आधिकारिक लेखन नहीं कहा जा सकता। अक्सर रचनाकार अपने लेखन के भी ख़राब आलोचक साबित हुए हैं। प्रमाण स्वरूप अनेकों उदाहरण दिये जा सकते हैं। फ्राई के मुताबिक ‘जब रचनाकार आलोचक की तरह बोलने लगता है तब वह आलोचना नहीं, दस्तावेज़ निर्मित करता है। इस दस्तावेज़ का आलोचक द्वारा परीक्षण अपेक्षित होता है। सामान्य रूप से यह माना जाता है कि रचयिता के मुक़ाबले आलोचक रचना के महत्व का बेहतर निर्णायक होता है। यह धारणा चली आ रही है कि आलोचक को रचना का अन्तिम निर्णायक मानना हास्यास्पद है, जबकि व्यवहार में यह स्पष्ट है कि वही (आलोचक) रचना का अन्तिम निर्णायक होता है। इसका कारण निश्चयात्मक (Assertive) लेखन और साहित्यिक लेखन में विभेद न कर पाने की असमर्थता है। वर्णानात्मक-निश्चयात्मक लेखन की उत्पत्ति सक्रिय इच्छा-शक्ति और सचेत मस्तिष्क से होती है और ऐसा लेखन मुख्य रूप से कुछ ‘कहने‘ से ताल्लुक़ रखता है।

जैसा कि पहले कहा गया, फ्राई के बाद संरचनावाद आया। संरचनावाद ने साहित्य के मूलभूत सिद्धान्तों, रूढ़ियों, और परम्पराओं को खोज निकालने का दावा किया। आलोचना शास्त्र बन गई, बल्कि जोनाथन कूलर के शब्दों में कहें तो काव्यशास्त्र, संरचनावादी काव्यशास्त्र। और फिर आया उत्तर संरचनावाद, उसने इस तरह के शास्त्र-सिद्धान्त निर्माण की संभावना को सिरे से खारिज कर दिया, लेखन की परम्परागत कसौटियों और श्रेणी विभाजन को तोड़ दिया, और विधाओं की मर्यादा और स्वायत्तता को मानने से इन्कार कर दिया। साहित्य की साहित्यकता का बखान जिन गुणों के आधार पर किया जाता था, वे सभी गुण, विश्लेषण करने पर पता चला, गैर साहित्यिक लेखन में भी मौजूद हैं। निष्कर्ष यह निकला कि साहित्यिक लेखन में ऐसा कोई आभ्यन्तिरक गुण नहीं जो गैर साहित्यिक लेखन में मौजूद न हो। दोनों में फर्क सिर्फ प्रकार्य (Function) और रूढ़ि से पैदा होता है। तात्विक और आधारभूत भिन्नता वस्तुतः सांस्कृतिक निर्मिती है और उसे विखण्डित करने की ज़रूरत है। फिर क्या था स्त्री-पुरूष (प्रकृति-संस्कृति) की तरह रचना और आलोचना की द्विआधारी अवधारणा को भी खण्डित करने की आवश्यकता महसूस हुई। इहाब हसन ने अपनी पुस्तक ‘पैराक्रिट्सिज्म’ में इस जरूरत को पूरा कर दिया। हसन ने दिखाया कि रचना और आलोचना में कोई तात्विक और आधारभूत अन्तर नहीं है। जो अन्तर है वह सांस्कृतिक निर्मित है और उसे तोड़ देने में ही दोनों का भला है।

‘आलोचना भी रचना है कहने में रचना की श्रेष्ठता कायम रहती है, जैसे झाँसी की रानी को मर्दानी कहने में मर्द की श्रेष्ठता कायम रहती है। उत्तर संरचनावाद में श्रेष्ठता के इस तात्विक और बुनियादी आधार को विखण्डित कर अस्मिता और विधा की स्वायत्तता को ही समस्याग्रस्त बना देता है। यहाँ भिन्नता का महत्व है लेकिन यह भिन्नता तात्विक और बुनियादी किस्म की नहीं है। इस भिन्नता के आधार पर किसी को हीन या श्रेष्ठ नहीं ठहराया जा सकता है।

अब न तो व्यक्ति की स्वायत्तता का कोई पैरोकार बचा है और न ही कला और साहित्य का। ये सभी पाठ (Text) हैं और ये पाठ परस्पर सम्बद्ध (Intertextual) हैं। परस्पर सम्बद्धता का मतलब है कि कोई भी पाठ पूर्णतः मौलिक नहीं है, दूसरे पाठ से जुड़ा हुआ उस पर निर्भर है। इसका निहितार्थ यह भी है कि सभी पाठ बराबर हैं। लब्बोलुआब यह कि रचना और आलोचना के बीच खड़ी दीवार ढह चुकी है। रचना आलोचनात्मक हो गई है और आलोचना रचनात्मक।

यह एहसास भले ही नया हो किन्तु सच्चाई यही है कि श्रेष्ठ आलोचना और रचना में ऐसा आत्यान्तिक भेद कभी था ही नहीं। मुक्तिबोध एक ऐसे लेखक हैं जिनका लेखन रचना और आलोचना के बीच की पारस्परिक सीमाबद्धता को लगातार समस्याग्रस्त बनाता है। उनकी कविताएँ, कहानियाँ और लेख विधाओं के पारम्परिक चौखटे में फिट नहीं बैठते। कविता में वे थीसिस लिखते हैं और उनके लेखों में ऐसे टुकड़े ख़ूब मिल जायेंगे जिन्हे मज़े से कविता में खपाया जा सकता हैं। उनकी कहानियाँ ऐसी हैं जिनमें रेखाचित्र, लोक-नीति-कथा और निबन्ध के गुण घुले-मिले हैं। ‘एक साहित्यिक की डायरी’ को क्या कहेंगे? रचना या आलोचना? मुक्तिबोध पारम्परिक किस्म के आलोचक नहीं हैं। वस्तुतः आलोचना उनके सम्पूर्ण लेखन का अभिन्न हिस्सा है, कोई आपदधर्म नहीं। कुछ लोग सोचते हैं कि अपने विरोधियों और साहित्य के दरोगा अर्थात् आलोचकों को जवाब देने के लिए उन्होंने आलोचना को आपद् धर्म के रूप में चुना। इस बात में आंशिक सच्चाई हो सकती है किन्तु उन्हें ध्यान से पढे़ं तो यह बात समझ में आ जाती है कि उनका लगभग समूचा लेखन ही बहस मुबाहिसे से बना है। यह बहस विरोधियों से ही नहीं होती, विरोधियों से भी ज्यादा स्वयं से होती है। इसलिए आलोचना उनके लेखन का आपदधर्म नहीं स्वधर्म है। उनका रचनात्मक लेखन भी एक प्रकार की आलोचना है, सभ्यता-समीक्षा है। कविता में थीसिस लिखने की उनकी प्रतिश्रुति का मतलब हैः कविता में सभ्यता-समीक्षा लिखना।

इसलिए मेरा खयाल है कि मुक्तिबोध के आलोचनात्मक लेखन की चर्चा करते समय हमें सिर्फ उनके ‘आलोचनात्मक लेखन’ पर ध्यान नहीं देना चाहिए क्योंकि उनके ‘आलोचनात्मक चिन्तन’ के कई मोती उनकी रचनाओं में डूबे हुए हैं। मैं उनके आलोचनात्मक चिन्तन के कुछ ऐसे ही पक्षों का यहाँ उल्लेख करना चाहूँगा। मैं जानता हूँ कि यह काम आसान नहीं है फिर भी कुछेक प्रसंग आपके समक्ष रखता हूँ।

अक्सर कहा जाता है कि रचना का मर्म तो रचनाकार ही जानता है। इसलिए यदि रचना का ‘असली’ अर्थ जानना है तो रचनाकार से पूछो। आलोचक तो बाहरी व्यक्ति है वह रचना के साथ न्याय नहीं कर सकता। यह बात भी सिद्ध हो चुकी है कि लेखक अपनी रचना (कहानी, कविता, उपन्यास, आलोचना…) का अन्तिम और अधिकारिक व्याख्याकार नहीं हो सकता। क्योंकि, रचना केवल वही नहीं कहती जो लेखक कहलाना चाहता है, बहुत कुछ ऐसा भी कहती है जो वह नहीं कहलाना चाहता। यही नहीं, रचना का अर्थ पाठक और संदर्भ बदलने के साथ बदल जाता है। वस्तुतः रचना जन्म लेने के बाद रचनाकार से स्वतंत्र हो जाती है और सामाजिक जीवन का हिस्सा बन जाती है। सामाजिक जीवन को प्रभावित करती है और सामाजिक जीवन से प्रभावित होती है। कालजयी रचनाओं की जीवन-यात्रा लम्बी होती है। मामूली रचनाएं अपने रचयिता से विलग होने के बाद शीघ्र ही कालकवलित हो जाती हैं क्योंकि उनमें बदलते हुए संदर्भ में पुनर्नवता की संभावना नहीं होती। जिसे अपनी सामर्थ्य पर भरोसा नहीं होता वह रचना को सीने से चिपकाए ‘असली’ अर्थ न समझ पाने के लिए पाठकों-आलोचकों को कोसता रहता है। आलोचना को प्राध्यापकीय कहकर गरियाने वाले ज्यादातर स्वनामधन्य रचनाकार इसी कोटि में आते हैं। मुक्तिबोध को अपनी रचनात्मक सामर्थ्य पर भरोसा था। इसीलिए वे मानते हैं कि कविता पूर्ण हो जाने के बाद कवि से स्वतंत्र जीवन जीने लगती हैः

नहीं होती, कहीं भी ख़त्म कविता नही होती

कि वह आवेग त्वरित काल यात्री है।

व मैं उसका नहीं कर्ता,

पिता-धाता

कि वह कभी दुहिता नहीं होती,

परम स्वाधीन है वह विश्वशास्त्री है।

गहन-गम्भीर छाया आगमिष्यत् की

लिए, वह जनचरित्री है।

नये अनुभव व संवेदन

नये अध्याय-प्रकरण जुड़

तुम्हारे कारणों से जगमगाती है

व मेरे कारणों से सकुच जाती है।

कहने की आवश्यकता नहीं कि कविता (रचना) रचयिता से मुक्त होकर अपना भावी जीवन प्रारम्भ करती है और फिर उसमें नये अनुभव एवं संवेदन जुड़ते चले जाते हैं। जिस रचना में ऐसी सामर्थ्य होती है वही कालजयी कहलाती है; बाकी रचनाएं रचनाकार के साथ ही कालकवलित हो जाती है।

रचना जन्म के बाद रचनाकार से स्वाधीन हो जाती है, यह बात समझाने के लिए शायद ज़्यादा मशक्कत की जरूरत नही; लेकिन इसी से जुड़ा हुआ सवाल है, रचनाकार और रचना के सम्बन्ध का। यह सवाल ज़्यादा उलझा हुआ है और इसका संतोषजनक समाधान खोज निकालना आसान नहीं। उल्लेखनीय है कि मुक्तिबोध के समय में भी इस सवाल पर बहस हुई थी। अज्ञेय ने इलियट के वज़न पर भोक्तामन और सृष्टा-मन तथा जीवनाभूति और सौंदर्यानुभूति में विभेद किया था। मुक्तिबोध ने इस अवधारणा का ज़ोरदार खण्डन करते हुए भोक्ता-मन एवं स्रष्टा-मन के ऐक्य पर ज़ोर दिया था। ऐक्य का विशद विश्लेषण करते हुए उन्होंने सौन्दर्यानुभूति को जीवनानुभूति से गुणात्मक रूप से भिन्न माना। इस बात का निहितार्थ यह है कि रचना को जीवन का ‘बाइप्रोडक्ट’ नहीं कहा जा सकता। रचना और रचनाकार के बीच कोई प्रत्यक्ष, पारदर्शी और निष्क्रिय सम्बन्ध नहीं होता। रचना प्रक्रिया के मुक्तिबोध द्वारा किये गये विश्लेषण से इस बात की पुष्टि होती है। वस्तुतः रचना एक सचेत कर्म है और रचना के दौरान रचनाकार अपनी सोच के मुताबिक अनुभव को काटने-छाँटने एवं सम्पादित करने के लिए ‘स्वतंत्र’ होता है। किंतु यह स्वतंत्रता भी सापेक्षिक ही है। क्योंकि रचनाकार की स्वतंत्रता को सामाजिक स्थिति, अवचेतन, जड़ीभूत सौंदर्याभिरूचि जैसे कई कारण जाने-अनजाने प्रभावित करते हैं। फिलहाल इस तफ़सील में न जाकर सिर्फ़ भाषा चरित्र के बारे में बात करते हैं। औसत समझ के विपरीत भाषा आइने की तरह कोई पारदर्शी और निष्क्रिय माध्यम नहीं है जिसके आर-पार देखा जा सके। भाषा एक स्वायत्त संकेतप्रणाली है, जिसके अपने नियम-कायदे हैं। जीवन-जगत् का बोध भाषा में ही संभव होता है। इसका मतलब यह है कि भाषा सिर्फ़ साधन नही है, उसके बिना बाहर जीवन-जगत् का बोध संभव ही नही। जीवन-जगत् का बोध भाषा के रास्ते से गुज़रता है। और चूँकि भाषा दर्पण की तरह कोई निष्क्रिय पारदर्शी माध्यम नही है, भाषा अपना खेल दिखाती है। फ़ैज के शब्दों में कहें तो ‘बात बदल-बदल जाती है।’ कहना चाहते हैं कुछ और कह जाते हैं कुछ और।

भाषा का यह खेल जीवन-जगत् के बोध के समय ही नहीं, रचना-प्रक्रिया के दौरान भी चलता रहता है। यही नहीं जब रचना पूर्ण हो जाने पर पाठक से रूबरू होती है तब भी भाषा का यह खेल जारी रहता है। यही कारण है कि अलग-अलग देशकाल के पाठक/आलोचक एक ही रचना का अर्थ अलग-अलग ढंग से करते हैं। यदि ऊपर कही गयी बातें सही हैं तो फिर यह मानना पड़ेगा कि रचना रचनाकार के जीवन की प्रत्यक्ष और पारदर्शी अभिव्यक्ति नहीं है। मुक्तिबोध के शब्दों में सौन्दर्यानुभूति जीवनानुभूमति से गुणात्मक रूप से भिन्न चीज है; पूर्णतया पृथक न सही, किन्तु प्रतिरूप भी नहीं। सौन्दर्यानुभूति को जीवनानुभूति से गुणात्मक रूप से भिन्न बताने के बाद मुक्तिबोध को लगा कि कई दफा रचनाकार सिर्फ स्वाँग भरता है, वास्तव में वैसी अनुभूति उसके जीवन में होती नहीं। जैसे अभिनेता पात्रों का अभिनय करता है वैसे वह सिर्फ अभिनय कर रहा होता है। नयी कविता में ऐसा स्वाँग खूब दिखायी पड़ता है। मुक्तिबोध ने लिखा है कि महादेवी वर्मा की कविताओं में दुख की भरमार है लेकिन महादेवी ने स्वयं स्वीकार किया है कि उनका जीवन वैसा दुखमय नहीं था जैसा कि उनकी कविताएं पढ़ने पर प्रतीत होता है।

उल्लेखनीय है कि रोलां बार्थ भी लेखन को स्वांग ही मानते हैं, भले ही इस शब्द का इस्तेमाल न करते हों। उन्होंने ब्रेख्त के नाट्य-सिद्धान्त का उल्लेख करते हुए लिखा है कि जैसे ब्रेख्त के यहाँ अभिनेता, जिस पात्र का अभिनय करता है, उससे तादात्म्य स्थापित नहीं करता, वैसे ही ब्रेख्तियन अंदाज में अपने बारे में बोलता हूँ। यहाँ बोलने (लिखने वाले) ‘मैं’ और वास्तविक ‘मैं’ में दूरी बनी रहती है; ‘उसे जीने के बजाय दिखाता हूँ।’ लेखन इमेज सिस्टम का प्रदर्शन है। अपने काल्पनिक आत्म से दूरी बनाए रखते हुए और साथ ही अन्य के परिपे्रक्ष्य से उसका निरीक्षण करते हुए उसकी विभिन्न भूमिकाओं का डिमान्स्ट्रेशन या रिहर्सल है। जरूरत के मुताबिक लगाया गया मुखौटा है। जाहिर है कि मुक्तिबोध लेखन को स्वांग मानने के हिमायती नहीं, बल्कि लेखन और जीवन में एकता के पक्षधर थे। फिर भी वे किसी स्थायी, स्वायत्त, आत्मपूर्ण और सुसमन्वित व्यक्ति-अस्मिता की अवधारणा को भी स्वीकार नहीं करते। जबकि अज्ञेय ‘नदी का द्वीप’ में इसके ठीक विपरीत, एक स्वायत्त, आत्मपूर्ण एवं स्थायी व्यक्ति-अस्मिता की अवधारणा पेश करते हैं। उत्तर आधुनिक सिद्धान्तकार व्यक्ति-अस्मिता की ऐसी अवधारणा को तो मिथ या फिक्शन मानते ही हैं, फ्रेडरिक जेम्सन जैसा वामपंथी विचारक भी उनकी इस बात के लिए तारीफ़ करता है कि उन्होंने आत्म-पूर्ण समन्वित आत्म की अवधारणा को छिन्न-भिन्न कर दिया। मुक्तिबोध के यहाँ आत्म की अस्मिता स्वयं-सम्पूर्ण और स्थिर नहीं है, बल्कि बाहरी दबाव और भीतरी (परस्पर विरोधी) आग्रहों से लगातार संशय-ग्रस्त, अनिर्णीत, विरोधाभासी और परिवर्तनशील है। परम अभियक्ति या अरूण कमल की तलाश तो निरन्तर है, लेकिन झूठे समन्वय या शिलीभूत सामंजस्य के मर्म को भी वे बख़ूबी समझते हैं। मुक्तिबोध की कविता लगातार यह दिखाती है कि व्यक्ति की अस्मिता ‘नदी के द्वीप’ की तरह स्थिर नहीं होती। जैसे विचारधारा के भीतर से एक प्रच्छन्न विचारधारा झाँकती दिखाई पड़ती है, वैसे ही एक व्यक्ति के भीतर एक और व्यक्ति की मौजूदगी का एहसास होता रहता है। इन दोनों के बीच अनवरत संवाद चलता रहता है। यह संवाद अस्मिता के किसी स्वायत्त-आत्मपूर्ण (नदी का द्वीप जैसी) अवधारणा को नकारता है। मुक्तिबोध के यहाँ अस्मिता की अवधारणा जिस रूप में आती है, कई मायनों में वह जूलिया क्रिस्तेवा की ‘threshold’ की अवधारणा से मिलती जुलती है। उल्लेखनीय है कि क्रिस्तेवा के यहाँ चेतन और अवचेतन के बीच चौहद्दी लगातार बदलती रहती है, क्योंकि इनके बीच निरन्तर संवाद चलता रहता है। अस्मिता का कोई भी रूप अन्तिम और पूर्ण नहीं होता। पूर्णता स्वप्न में तो संभव है लेकिन यथार्थ में नहीं, मुक्तिबोध यह समझते थे।

यदि अस्मिता का कोई भी रूप पूर्ण और अन्तिम नहीं है तो उसमें सकारात्मक और नकारात्मक परिवर्तन भी संभव हैं। यही कारण है कि कल तक आग उगलने वाले मृत ज्वालामुखी बन जाते हैं और रावण के घर पानी भरने लगते हैं। कोई ज़रूरी नहीं कि रचनाकार अपने इस रूप को रचना में प्रस्तुत करे ही। अनुभव, संवेदना और कल्पना का सहारा लेकर वह स्वांग भी भर सकता है। मार्सेल प्रूस्त ने लिखा है कि पुस्तक में सामने आने वाला व्यक्तित्व और सामाजिक जीवन में दिखाई पड़ने वाला व्यक्तित्व अलग-अलग होते हैं। इलियट के कथन से हम वाकिफ़ ही हैं, उसे दोहराने की ज़रूरत नहीं। अब जबकि आत्मकथा को भी लेखक के जीवन की सीधी पुनर्प्रस्तुति मानने के बजाय लेखक के जीवन का सृजित गल्प माना जा रहा है, रचना को लेखक के जीवन का पर्याय मानने का कोई तुक नहीं। यह ठीक है कि कुछ रचनाकारों के जीवन और रचना में पर्याप्त समानता दिख सकती है, किंतु सर्वत्र ऐसा हो, यह ज़रूरी नहीं। लेखन एक विशिष्ट लीला कर्म हैं, रचनाकार के सम्पूर्ण व्यक्तिगत सामाजिक जीवन का लेखा-जोखा नहीं। लेखन और रचनाकार के जीवन में संगति की अपेक्षा एक आदर्श के रूप में ठीक है, लेकिन अक्सर ऐसी संगति होती नहीं है। आलोक धन्वा या वी.एस. नयपाल अपवाद नहीं है; बात सिर्फ़ यह है कि उनके जीवन की कुछ बातें सामने आ गयीं, और हम छाती पीटने लगे। चोरी तो ज़्यादातर लोग करते हैं लेकिन चोर वही कहलाता है जो चोरी करते पकड़ा जाय और जिसे सज़ा मिले। इसलिए बेहतर यही होगा कि रचनाकार की रचना और जीवन दोनों को देखा जाय। लेकिन मुसीबत यह है कि रचनाकार का जीवन, विशेष रूप से व्यक्तिगत जीवन, पाठक की पहुँच से बाहर है। वह तो उतना ही देख सकता है जितना दिखाने के लिए लेखक तैयार हो। वैसे इस मामले में वी.एस.नयपाल की दाद देनी पड़ेगी। उन्होंने माना है कि लेखक के जीवन की पड़ताल करने की चाहत बिल्कुल वैध है। उन्होंने कहा है कि लेखक के जीवन का व्योरा अन्ततः लेखक की पुस्तक से बेहतर साहित्यिक कृति साबित हो सकता और अपने समय के सांस्कृतिक ऐतिहासिक पक्ष को ज्यादा गहराई से आलोकित कर सकता है। इसलिए यदि मुक्तिबोध दिमागी गुहांधकार में झाँकने की कोशिश करते थे और बाह्य संघर्ष के साथ-साथ आत्म संघर्ष पर इतना जोर देते थे, तो क्या ग़लत करते थे, अब तक के अनुभव ने हमें यही सिखाया है कि मानव-मस्तिष्क बहुत जटिल है और तर्क-विवेक को अक्सर चकमा दे जाता है। वह सामाजिक-आर्थिक स्थितियों से निरपेक्ष नही है, लेकिन उसे सामाजिक-आर्थिक स्थितियों में निःशेष (Reduce) भी नहीं किया जा सकता।

देखिये बात कहाँ से कहाँ पहुँच गई। क्या लिखने चला था और क्या लिख गया! अभी तो लगता है कि सिर्फ़ भूमिका ही बनी है। जो बातें लिखना चाहता था वे तो रह ही गईं।

राजकुमार जी

प्रो॰राजकुमार

शोर-शराबे से दूर अध्ययन-अध्यापन में मग्न रहने  वाले युवा-तुर्क हिन्दी आलोचक। भक्ति साहित्य, हिन्दी नवजागरण, आधुनिकता, आधुनिक साहित्य, प्रेमचंद, हिन्दी कहानी इत्यादि पर लगातार लेखन। किताबों में जैसी रुचि इनकी  है,  वह अन्यत्र दुर्लभ ही हो गई है। फिलहाल, बी॰एच॰यू॰ के हिन्दी विभाग में प्राध्यापक।इनसे dr.kumar.raj@gmail.com पर संपर्क संभव।

 

मुक्तिबोध के बहाने ‘परंपरा के आहत नैरन्तर्य’ पर एक बहस: प्रो.राजकुमार

मुक्तिबोध के बहाने प्रो. राजकुमार एक बहस की धारावाहिकता में गहरे विश्वास के साथ उतरे हैं. इस सीरिज का पहला लेख आप पढ़ चुके हैं.

मुख्य शीर्षक में ‘परंपरा का आहत नैरन्तर्य’ पद हिंदी के विद्वान आलोचक सुरेन्द्र चौधरी के यहां से लिया गया है. अभी तक सुरेन्द्र चौधरी हिंदी के अंतिम आलोचक रहे हैं जिन्होंने परम्परा की निरंतरता में उत्पन्न हुए व्यवधान को व्यापक फलक पर विवेचित करने के प्रयास किए हैं. और, यह भी कम आश्चर्य की बात नहीं कि टूट की दोनों शिराओं के मध्य मुक्तिबोध को स्थित करने के प्रयास किए हैं. सुरेन्द्र चौधरी के बाद प्रो. राजकुमार के यहां वही चिंता फिर से सामने आती है. राजकुमार जी हिंदी के एकाध समकालीन आलोचकों में हैं जिनके यहां विमर्श की एक नितांत सुदृढ़ और स्पष्ट भाषा है. प्रो. राजकुमार साहित्य के ककहरा सिखाने वाले संदर्भों को छोड़ते चलते हैं और उथले उद्धरणों, भूमिकाओं से लदी-फदी फूहड़ आलोचना के बरअक्स सभ्यता, परंपरा, संस्कृति के व्यापक वितान की आलोचना-धरा पर नज़र आते हैं. स्याही इसी विश्वास से पन्ने पर झरती है कि लम्बी बहस की तैयारी है. यह विश्वास बहुत दिन बाद समकालीन हिंदी आलोचना में किसी के पास दिखा है. यह विश्वास रामविलास शर्मा के बाद सिर्फ सुरेन्द्र चौधरी के पास ही अभी तक सुरक्षित था. सुरेन्द्र चौधरी के दो उद्धरणों के साथ, प्रो. राजकुमार की इस बहस से खुद को साझा कीजिये, और उम्मीद है कि यह बहस यहां नहीं, तो कहीं भी लम्बी चलनी चाहिए. #तिरछीस्पेलिंग

…रचना और वातावरण की संगति ही केवल आहत होती हुई नहीं मालूम पड़ती, रचनात्मक परिस्थिति का नैरन्तर्य भी टूटता हुआ मालूम पड़ता है. …इस आहत नैरन्तर्य को, ‘discontinues को पहचाना मुक्तिबोध ने. अपनी रचनात्मक संवेदना में इसे मूर्त करते हुए उन्होंने ‘विपात्र’ और ‘क्लाड इथर्ली’ जैसी रचनायें लिखीं. #सुरेन्द्र चौधरी, 1971

पश्चिमी साहित्य में रूपक का उपयोग ऐतिहासिक समय का नाश करने और उसे ‘समय के रूपक’ से बदलने के लिए किया गया है. इसके विपरीत मुक्तिबोध ने रूपक की दूर-दृष्टि का, अन्यापदेश की दृष्टि का उपयोग  ऐतिहासिक  समय की जटिलता को मूर्त करने के लिए किया. # सुरेन्द्र चौधरी, 1980

Muktibodh By Haripal Tyagi

Muktibodh By Haripal Tyagi

जिसके आगे राह नहीं

By प्रो.राजकुमार 

जड़ीभूत सौन्दर्याभिरुचि की बात मुझे समकालीन कविता ही नहीं, समकालीन साहित्य और समकालीन सामाजिक विमर्शों पर नये सिरे से सोचने और विचारने के लिए प्रेरित करती हैं। मुझे जहाँ तक ध्यान आता है, मुक्तिबोध ने जड़ीभूत सौन्दर्याभिरुचि की बात की है। सभी जानते हैं कि मुक्तिबोध का संघर्ष, जिसको वे प्रायः आत्मसंघर्ष ही कहना पसन्द करते थे, दो तरफा था। जिसको हम यथार्थवादी-प्रगतिशील-मार्क्सवादी धारा कहते हैं, उससे मुक्तिबोध असंतुष्ट थे। उन्होंने अपने लेखन में बार-बार इसका उल्लेख किया है लेकिन साथ ही साथ, मुक्तिबोध का संघर्ष उस दूसरी परम्परा से भी था जिसके वाहक के रूप में हम लोग हिन्दी में, और किसी का नाम न भी लें, तो अज्ञेय का नाम लेते हैं। संक्षेप में, मुक्तिबोध आधुनिकतावादी साहित्यिक धारा या चिन्तन-परम्परा से भी संतुष्ट नहीं थे। सोचने वाली बात ये है, कि अगर मुक्तिबोध यथार्थवादी धारा और आधुनिकतावादी धारा दोनों से असंतुष्ट थे तो आखिर वो कर क्या रहे थे। मैं यह बात जोर देकर कहना चाहता हूँ कि मुक्तिबोध ने अपने वैचारिक लेखन में भले ही स्पष्ट रूप से यह बात न लिखी हो, लेकिन अपने रचनात्मक लेखन में, मेरा संकेत उनकी कहानियों और कविताओं की ओर है, वे एक तीसरी धारा निकालने की कोशिश करते हैं। इसे सुविधा की दृष्टि से मैं भारतीय परम्परा या सभ्यता की धारा कहना पसंद करूंगा।

यह दिलचस्प है कि भारतीयता की बात, भारतीय परम्परा की बात उस जमाने में वे लोग करते थे जिनको हम आधुनिकतावादी-प्रयोगवादी या नयी कवितावादी आलोचक/रचनाकार कहते हैं। ऐसे रचनाकारों में अज्ञेय का नाम तो आता ही है, बाद में निर्मल वर्मा का नाम भी जुड़ जाता है। आप याद करें, उस दौर में भारत की बात करना, भारतीय सभ्यता की बात करना, भारतीय परम्परा की बात करना एक अपराध जैसा था। बहुत आसानी से ऐसी बातें करने वाले को अतीतजीवी या साम्प्रदायिक घोषित कर दिया जाता था। उस दौर में मुक्तिबोध ने अपनी रचनाओं में भारतीय परम्परा को नये सिरे से पुर्ननवता देने की कोशिश की। इसीलिए मुझे लगता है कि मुक्तिबोध की चिन्ता यह थी कि साहित्य और कला की भारतीय परम्परा को आगे बढ़ाया जाय और उसमें हमारे औपनिवेशिक इतिहास की वजह से जो व्यवधान आया है, जो व्यतिक्रम आया है, जो टूटन पैदा हुई है, उसकी यथासंभव भरपाई की जाय। उस दौर में ऐसी कोशिश सम्भवतः सिर्फ मुक्तिबोध कर रहे थे। ये अजीब विडम्बना है कि भारतीयता की बात अज्ञेय ने बहुत की है, उसके बाद निर्मल वर्मा ने भी की है, लेकिन रचनात्मक स्तर पर न तो इनकी कहानियों में और न ही उपन्यासों में, भारतीय साहित्य-परम्परा से जुड़ने का गम्भीर प्रयास दिखाई पड़ता है। वैचारिक स्तर पर जरूर ये उसकी चर्चा करते हैं। वैसे ये भी अपने आप में छोटी बात नहीं है। लेकिन रचनात्मक स्तर पर अगर देखें तो सम्भवतःमुक्तिबोध उस दौर में अकेले हैं जो इन दोनों छोरों से जूझते हुए साहित्य और कला की भारतीय परम्परा से अपना सम्बन्ध जोड़ते हैं, और उसी के अनुरूप अपनी रचनात्मकता का विकास करते हैं। अस्सी के दशक में लैटिन अमेरिकन लेखकों के प्रभाव-विस्तार के साथ, और फिर ग्रैबियल गार्सिया मार्केज के उपन्यास को नोबल प्राइज मिलने के बाद इस प्रकार की रचनात्मकता की विस्तार से चर्चा होने लगी और नाम दिया गया कि ये जादुई यथार्थवाद है। मैं मुक्तिबोध के लेखन के संदर्भ में उस जादुई यथार्थवाद को लागू करने का कोई प्रस्ताव नहीं कर रहा हँू। लेकिन ये जरूर कहना चाहता हँू कि मुक्तिबोध ने, पूरे तौर से न सही, फिर भी साहित्य और कला की एक भारतीय दृष्टि विकसित करने का उस दौर में प्रयास किया था, जब दुनिया में जादुई यथार्थवाद जैसी कोई चीज नहीं थी।

आज के संदर्भ में जब हम जड़ रुचियों के दायरे और आज के साहित्य की बात करते हैं तो मुझे हैरत होती है कि बात सिर्फ जड़ अभिरुचियों तक क्यों सीमित रह जाती है। कविताओं का जो समकालीन स्वरूप है, उसके बारे में विचार करने के लिए हम क्यों तैयार नहीं होते। क्या आप ये मान कर चल रहे हैं कि रूचियाँ विकसित हो जायेंगी तो कविता का आयतन अपने आप विस्तृत हो जाएगा। कविता या साहित्य क्या आज की रुचियों का बाई प्रोडक्ट है? रुचियाँ ही सबकुछ हैं और कविता तो उसको भरने वाला झोला है! अगर साहित्य और कलाओं कि यही समझ है, तो मुझे लगता है कि यह गम्भीर चिन्ता का विषय है। साहित्य और कला के रूप ऐसे नहीं चलते हैं और न विकसित होते हैं। दुनिया में कहीं भी आप देख लीजिए साहित्य और कलाओं का रूप झोले की तरह नहीं है। साहित्य और कलाओं के रूप अलग-अलग सभ्यताएँ लम्बे समय में अर्जित, विकसित और समृद्ध करती हैं। एक तरह से साहित्य और कला के रूप शार्टहैण्ड या संस्कृतियों के मेमोरी बैंक के रूप में काम करते हैं। और इसीलिए न तो उनको इतनी आसानी से छोड़ा जा सकता है और न किसी दूसरी सभ्यता के साहित्य और कला-रूप को टेक्नोलाॅजी की तरह आयात किया जा सकता है। साहित्य और कलाओं का आदान-प्रदान टेक्नोलाॅजी और अर्थव्यवस्थाओं के आदान-प्रदान जैसा नहीं है। क्या हम इसके बारे में विचार करने के लिए तैयार हैं?

हमारे यहाँ साहित्य और कला के रूपों का जिस प्रकार से विकास हुआ, उस पर भी नये सिरे से विचार करने की जरूरत है। क्योंकि साहित्य और कलाएँ और इनके विकसित होने वाले रूप सिर्फ रूप नहीं होते हैं, वो कहीं न कहीं बहुत गहरे स्तर पर अपनी सभ्यता की बहुत बुनियादी स्मृतियों को भी संजोते और सरंक्षित करते हैं। इसी वजह से जब हम इन रूपों में रचना करते हैं तो बृहत्तर समाज के साथ तादात्म्य और सम्बन्ध आसानी से स्थापित हो जाता है। क्या हम यह मानना चाहेंगे कि आज के दौर में साहित्य की बहुत सारी विधाएँ और विशेष रूप से कविता, एक गहरे संकट के दौर से गुजर रही हैं। क्या ये सच नही है कि हिन्दी जगत से एक ईंट उठाते ही चार-पाँच उदीयमान कवि बिलबिलाते हुए निकल आतेे हैं! कवियों की भरमार है और आप ये न सोचें कि मैं उनके महत्व को नहीं समझ रहा। मैं इन कवियों के महत्व को स्वीकार करने वालों में सबसे आगे हूँ लेकिन मेरा प्रश्न ये है कि जिस रूप में आज कविता लिखी जा रही है, उसका इतिहास-भूगोल क्या है? वो कितने लोगों तक पहुँचती है? अगर मैं आपको चिढ़ाने के अंदाज में कहूँ  कि हिन्दी कविता के पाठक कम और कवि ज्यादा हैं, हो सकता है, आप आपत्ति करें। लेकिन शायद इसमें सच्चाई है। हिन्दी कविता की किताबें कितनी बिकती हैं? इस पर भी विचार करना चाहिये। हिन्दी के कितने प्रकाशक हिन्दी कविता की पुस्तकें छापने के लिए तैयार हैं और अगर नहीं तैयार हैं, तो क्या कारण हैं। वैसे तो ये बात सारे अनुशासनों पर लागू होती है, लेकिन हमारा सम्बन्ध मुख्य रूप से साहित्य से है, कविता से है; इसलिए हम इसी की चर्चा करेंगे। खासतौर से 19वींशताब्दी  के  बाद,  बीसवीं  शताब्दी  और इक्कीसवीं  शताब्दी  में  हिन्दी  कविता  का  जिसरूप में विकास हुआ, क्या उस पर हम नये सिरे से विचार करना चाहते हैं? या आजभी हम इतने आत्ममुग्ध हैं कि जैसे सब कुछ ठीक-ठाक है, कोई समस्या नहीं है, औरजो  समस्या  की  बात  करता  है,  करता रहे,  उसकी  बात  पर  ध्यान  नहीं  देना  चाहिए।आप याद कीजिए कि रामचन्द्र शुक्ल ने ठाकुर जगमोहन सिंह के उपन्यास के सम्बन्धमें लिखा था कि ये अंग्रेजी ढंग का नाॅवेल नहीं है। मुझे ये चीज बड़ी महत्वपूर्ण लगतीहै  और  इस  पर  मैं लम्बी बहस के  लिए तैयार  हूँ कवियों  से  या  किसी  से  भी।

उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम दशकों के उपरान्त, भारतेन्दु के बाद, हिन्दी में जितनी भी साहित्यिक विधाएँ हैं, उनका विकास अंग्रेजी ढंग पर ही हुआ है। ये बात सिर्फ उपन्यास पर लागू होती हो, ऐसा नहीं है। कविता से लेकर कहानी, निबन्ध सभी पर ये बात लागू होती है। ये अकारण नहीं है। उसका एक अपना संदर्भ है। आप जानते हैं कि आधुनिक हिन्दी साहित्य के रचयिता, श्रोता और पाठक ज्यादातर ऐसे लोग रहे हैं, जिनका अंग्रेजों द्वारा स्थापित विश्वविद्यालयों से सम्बन्ध रहा है। या तो वे विश्वविद्यालय में रहे हैं या उन्होंने विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की है। अंग्रेजों द्वारा स्थापित विश्वविद्यालयों में जिस ढंग के साहित्य को माॅडल के रूप में पेश किया गया और जिसके वजन पर हमारे यहाँ बाद में साहित्य लिखा गया, वो थोड़े बहुत हेर-फेर, बदलाव, के बावजूद अंग्रेजी ढंग का साहित्य है। रंगरोगन भले ही भारतीय लगे। क्या इक्कीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक में अंग्रेजी ढंग के इस साहित्य पर हमें नये सिरे से विचार नहीं करना चाहिये? जनता के नाम पर या मजदूर-किसान के नाम पर कविता लिखी जा रही है। आप जानते हैं कि वह कहाँ पहुंच रही है और कौन उसको समझ रहा है, उसका दायरा कितना है! मैं इसलिए यह कह रहा हूँ  कि अगर उससे पहले के साहित्यिक परिदृश्य पर आप विचार करें, कविता के इतिहास पर विचार करें तो बड़ा अलग परिदृश्य दिखाई देगा। कविता का अपने यहाँ संगीत से बहुत गहरा सम्बन्ध रहा है। संगीत से ही नहीं, उसका सम्बन्ध नृत्य और नाट्य से भी रहा है। कविता केवल पढ़ने की चीज अपने यहाँ नहीं थी। किन्तु अगर ‘आधुनिक’ हिन्दी कविता पर ध्यान दें तो नई कविता तक आते-आते आप छन्द भी छोड़ देते हैं। अगर ये अंग्रेजी ढंग की कविता नहीं है, तो क्या है? फ्री वर्स अगर पश्चिम में लिखा गया है तो आप भी फ्री वर्स में लिख रहे हैं।

कविता का पूरा का पूरा जो फार्म है, वो अपनी काव्य परम्परा से कुछ भी नहीं लेता है, जो लेता है, वो बहुत ही नगण्य है, वो सिर्फ एक तरह की औपचारिकता है।. दूसरा तरीका ये हो सकता था कि आप भारतीय परम्परा में पहले से चले आ रहे साहित्य और कला रूपों को विकसित करते और बदले हुए सन्दर्भ में जरूरत के हिसाब से पश्चिमी साहित्यिक-सांस्कृतिक परम्परा से भी कुछ बातों को अपना लेते। हिन्दी की जातीय परम्परा को विकसित करने का संभवतः यह ज्यादा बेहतर और अपनी परम्परा से जुड़ा हुआ तरीका होता। अगर आप सही मायने में समकालीन कविता की समस्या पर विचार कर रहे हैं तो आपको इस पहलू पर भी ध्यान देना चाहिये। उसकी तमाम उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हैं। मैं उन्हें जानता हूँ और नाम गिना सकता हूँ। कुछ अपवाद हैं, जिन्होंने इस ढाँचे को तोड़कर अलग ढंग से लिखने की कोशिश की है, लेकिन वो अपवाद ही हैं। मुख्य रूप से आज भी कविता का जो स्वरूप हमारे यहाँ चल रहा है, वो वही है जिसका निर्माण नई कविता के दौर में हुआ था। भंगिमाएँ अलग हो सकती है, कोई अपने को प्रगतिवादी कह सकता है, उसमें प्रगतिशीलता की छौंक लगा सकता है, कोई स्वयं को प्रयोगवादी कह सकता है। लेकिन नयी कविता के समय से चले आ रहे शिल्प-विधान से हटकर प्रयोग करने का साहस मुझे कहीं दिखाई नहीं पड़ता। एक बने बनाये फार्म में कविता लिख ली जाय, कविता बना ली जाय, यही अपने आप में लक्ष्य है। और जब तक यह ढंग चलता रहेगा, तब तक मुझे नहीं लगता कि उस दायरे का विस्तार होगा जिसे जड़ अभिरुचियों का दायरा कहा जा रहा है। चाहे जितना क्रान्तिकारी कन्टेन्ट आप उसमें भर दें, जब तक उसके फार्म में बदलाव नहीं लाते, तब तक उसका दायरा नहीं बढ़ने वाला। आप कहते रहिए अमुक के लिए है ये रचना, लेकिन आप जानते हैं कि वो उसको पढ़-समझ नहीं सकता।

मैं एक और बात कहना चाहता हूँ और उसे आधुनिकताप्रसूत दूसरे अनुशासनों पर भी आप लागू कर सकते हैं। 19वीं शताब्दी में भारतेन्दु के साथ हिन्दी साहित्य में एक बड़ा परिवर्तन होता है। वो परिवर्तन ये है कि साहित्य का एक सामाजिक उद्देश्य होना चाहिए। वही साहित्य श्रेष्ठ है जो उस समय के निर्धारित सामाजिक उद्देश्य के अनुरूप है उसका पूरक है, उसकी मदद करता है। छायावाद अपवाद है, किन्तु फिलहाल उस विस्तार में जाना जरूरी नहीं। आधुनिकता के आगमन के साथ साहित्य को किसी न किसी उद्देश्य के अधीन रखकर देखने की प्रवृत्ति चल पड़ी। साहित्य ‘इस’ उद्देश्य के अनुरूप है, तो ठीक है, लेकिन उससे विरुद्ध, या उससे अलग है तो फिर वह जड़ अभिरुचियों के अन्तर्गत आ जाएगा। जैसे एक समय तक प्रेम पर कविता लिखना उचित नहीं माना जाता था। जैसे एक जमाने में शतरंज खेलना सामन्ती व्यवस्था की पतनशीलता का पर्याय मान लिया गया था। क्या आज भी ऐसा सोच सकते हैं कि शतरंज खेलने में या सितार बजाने में यदि किसी को सुख मिलता है, भले ही दुनिया के तमाम छल-छद्म में शामिल न हो तो फिर वह पतनशील है, क्योंकि ‘समाज’ से विमुख है। क्या असामाजिक कहकर उसकी आलोचना होनी चाहिए! लेकिन आप जाानते हैं कि ये हुआ है। साहित्य को जब आप किसी विचार या विचारधारा के अधीन कर देते हैं, तब उसी के अनुरूप यह निर्धारित करने लगते हैं कि कौन सी रुचि जड़ है और कौन सी रुचि खुली हुई है, उन्मुक्त है। इसीलिए इस पर भी विचार करना चाहिए कि जड़ रुचियों से आशय क्या है? क्या आप साहित्य को किसी विचारधारा के प्रस्तोता के रूप में देखते हैं, जो विचारधारात्मक ज्ञान को एक तरह के कला माध्यम में डालकर पेश करता है? या आप उसकी कोई स्वतंत्र भूमिका भी देखते हैं, जहाँ वो अपने समय के ज्ञान को विचार के स्तर पर भी समृद्ध करता है, उसको चुनौती देता है या उसमें कुछ जोड़ता है। जड़ अभिरुचियों के सन्दर्भ में भी ये एक विचारणीय विषय है कि ये अभिरुचियाँ बनती कैसे हैं; कैसे तय होता है कि कौन सी अभिरुचियाँ जड़ हैं, कौन सी अभिरुचियाँ जड़ नहीं हैं। ध्यान रहे ंकि साहित्य, कला और ज्ञान की दुनिया ऐसी है, जहाँ सच और गलत का निर्धारण बहुमत से नहीं होता। अल्पमत यहाँ सही हो सकता है और बहुमत गलत।

मध्यकाल में साहित्य की भाषा बदल जाने के बावजूद अपनी पूर्व परम्परा से सम्बन्ध विच्छेद नहीं होता। जबकि ‘आधुनिक युग’ में हिन्दी की कथित जातीय परम्परा का विकास जिस रूप में हुआ, उसका सम्बन्ध ठिकाने से न तो शास्त्रीय परम्परा से कायम हुआ, न लोक परम्परा से। समूची मध्यकालीन कविता का संगीत से अभिन्न सम्बन्ध होता था और उसकी व्याप्ति का एक बड़ा कारण ये था कि उसका गायन/पाठ होता था। आधुनिक हिन्दी कविता की विडम्बना ये है कि उसका कोई जातीय संगीत विकसित नहीं हो सका, जबकि उसी की सहोदर उर्दू का ग़जल और कव्वाली के रूप में जातीय संगीत बन गया। इसी वजह से उर्दू कविता की लोकप्रियता सिर्फ उर्दू पढ़ने और लिखने वालों तक सीमित नहीं रही। यह अकारण नहीं है कि उर्दू के अच्छे से अच्छे कवि मुशायरों में शिरकत करते हैं और बड़ी संख्या में लोग उनको सुनने के लिए पहुँचते हैं। पूर्वी अंग की गायकी की बुनियाद पर क्या हिन्दी का जातीय संगीत विकसित किया जा सकता था? लोकप्रिय संस्कृति से जुड़े रूपों की पूरी तरह से उपेक्षा करके भी क्या किसी भाषा की कविता वृहत्तर समुदाय तक पहुंच सकती है?हिन्दी  में  तो  आलम  ये  रहा  है कि जिस  किसी की  कविता लोकप्रिय  हुई,  उसे  दोयमदर्जे  का  कवि  ठहरा  दिया  गया। दिनकर  और  बच्चन  जैसे कवियों  को हिन्दी में इसीलिए श्रेष्ठ कवियों की श्रेणी में नहीं रखा जाता। अंग्रेजी ढंग के साहित्य का भारतमें  जो  हाल है, सो है  ही, पश्चिम में  भी  इसके पाठक  और  श्रोता  बहुत  कम  बचे हैं। बाॅब  डिलन को गत वर्ष नोबेल  पुरस्कार  देकर कविता  के  लगातार  संकुचित  हो रहे दायरे को बढ़ाने की कोशिश की गयी। वे मूलतः ऐसे गीतकार और गायक है, जिनको सुनने और पसंद करने वालों की संख्या बहुत ज्यादा है। क्या हिन्दी जगत को भी लगातार कम होते जा रहे पाठक-श्रोता समुदाय के मद्देनजर साहित्यिक विधाओं के चले आ रहे स्वरूप के बारे में नये सिरे से नहीं सोचना चाहिए?

राजकुमार जी

प्रो॰राजकुमार

शोर-शराबे से दूर अध्ययन-अध्यापन में मग्न रहने  वाले युवा-तुर्क हिन्दी आलोचक। भक्ति साहित्य, हिन्दी नवजागरण, आधुनिकता, आधुनिक साहित्य, प्रेमचंद, हिन्दी कहानी इत्यादि पर लगातार लेखन। किताबों में जैसी रुचि इनकी  है,  वह अन्यत्र दुर्लभ ही हो गई है। फिलहाल, बी॰एच॰यू॰ के हिन्दी विभाग में प्राध्यापक।इनसे dr.kumar.raj@gmail.com पर संपर्क संभव। 

मुक्तिबोध के बहाने साहित्य-संस्कृति पर एक बहस: डॉ. राजकुमार

पश्चिमी विचारों के बढ़ते वर्चस्व के बावजूद उन्नीसवीं शताब्दी में ‘अन्धेर नगरी’ जैसे नाटकों, बीसवीं सदी में हबीब तनवीर के नाटकों, विजय तेन्दुलकर के ‘घासीराम कोतवाल’, गिरीश कर्नाड के ‘नागमण्डलम’ और ‘हयवदन’ जैसे नाटकों; विजयदान देथा की कहानियों और मुक्तिबोध की कहानियों और कविताओं में भारतीय परम्परा के सहज विकास के साक्ष्य मिल जाते हैं। ये सूची और भी लम्बी हो सकती है लेकिन ऊपर गिनाए गये नामों के सहारे हिन्दी की जातीय परम्परा ही नहीं, भारतीय साहित्य की जातीय परम्परा के विकास की वैकल्पिक अवधारणा प्रस्तुत की जा सकती है। कहने की आवश्यकता नहीं कि हिन्दी की जातीय परम्परा की वैकल्पिक अवधारणा विकसित करने में मुक्तिबोध के रचनात्मक और वैचारिक लेखन की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण हो सकती है। #लेखक 

Muktibodh By Haripal Tyagi

Muktibodh By Haripal Tyagi

रूप की संस्कृति और मुक्तिबोध

By डॉ. राजकुमार

1.

कोई भी कार्य ठीक से पूरा करने के लिए एक संस्कृति की आवश्यकता होती है। अंग्रेजी में इसे वर्क कल्चर कहते हैं और इसका काम चलाऊ अनुवाद कार्य-संस्कृति हो सकता है। कार्य-संस्कृति के अभाव में ठिकाने से कोई भी काम कर पाना मुश्किल हो जाता है। कार्य-संस्कृति सिर्फ कानून, कायदों के औपचारिक ज्ञान और उन्हें व्यवहार में लागू करने से नहीं बनती। जब तक किसी बाहरी दबाव या डर के बिना हम स्वतः अपने दायित्त्व का निर्वाह नहीं करने लगते, तब तक यह नहीं माना जा सकता कि सही मायने में हमने एक कार्यसंस्कृति विकसित कर ली है। असल में कार्य संस्कृति एक संस्कार की तरह हमारे व्यक्तित्व में व्याप्त हो जाती है, जिसका कई बार हमें, सचेत रूप में, अहसास भी नहीं होता। यदि समकालीन भारत में ज्यादातर लोग अपने दायित्त्व का निर्वाह नहीं करते या सिर्फ मजबूरी में या भयवश अपनी जिम्मेदारी पूरी करते हैं तो इसका मतलब ये है कि हम कार्य-संस्कृति विकसित करने में असफल रहे हैं। एक सार्थक कार्य-संस्कृति का विकास किसी भी समाज को बेहतर ढंग से संचालित करने के लिए जरूरी है।

कार्य-संस्कृति की तरह साहित्य और कलाओं की भी संस्कृति होती है। साहित्यिक संस्कृति के अभाव में अच्छे और बेहतर साहित्य का सृजन असम्भव नहीं तो मुश्किल जरूर हो जाता है। साहित्यिक संस्कृति का सम्बन्ध सिर्फ समकालीन साहित्यिक संस्कृति से नहीं होता; समकालीन साहित्यिक संस्कृति भी वास्तव में किसी सभ्यता के समूचे साहित्यिक इतिहास को आत्मसात् करने पर बनती है। सार्थक साहित्य के रूप में पहचान उसी लेखन की बनती है जिसे अपनी सभ्यता के सांस्कृतिक इतिहास से उत्तीर्ण होकर लिखा जाता है। साहित्यिक लेखन मूलतः सांस्कृतिक कर्म है। इस सांस्कृतिक कर्म का एक राजनीतिक सन्दर्भ भी बन जाता है। लेकिन इसे राजनीतिक कर्म में निःशेष नहीं किया जा सकता है। माक्र्सवादी विचारधारा के हिमायती होने के बावजूद मुक्तिबोध के साहित्यिक लेखन का गहरा सरोकार भारतीय सांस्कृतिक परम्परा से रहा है। इसीलिए निराला के बजाय उनका तादात्म्य जयशंकर प्रसाद से बनता है। ‘तुलसीदास’ और ‘राम की शक्ति पूजा’ जैसी कविताएँ लिखने के बावजूद निराला की रचनाओं में सांस्कृतिक-बोध प्रसाद की रचनाओं की तरह अनुस्यूत नहीं है।

कोई भी सभ्यता अपने सुदीर्घ सांस्कृतिक जीवन के दौरान साहित्य और कला के विविध रूपों या विधाओं का विकास करती है। इन विधाओं/रूपों की अपनी बुनियादी संरचना होती है। इस बुनियादी संरचना का एक व्याकरण होता है। उस विधा में जो भी सार्थक बदलाव आते हैं, वे इस व्याकरण के अधीन संभव होते हैं। विजातीय प्रभाव भी इस व्याकरण के अधीन रूपान्तरित होकर रचना में आते रहते हैं। आरम्भिक आधुनिक दौर में संगीत, साहित्य, नृत्य, स्थापत्य, चित्रकला आदि के क्षेत्र में जो भी बदलाव आये, वे इसी तरह आए। इसीलिए विजातीय तत्त्वों को आत्मसात कर लेने के बावजूद जातीय परम्परा की निरन्तरता बनी रही।

साहित्य और कला के जातीय रूप जड़ नहीं होते। पहले से चली आ रही परम्परा से ही उनका विकास होता है। कोई रूप स्थिर होने से पहले कई स्रोतों से बहुत सारी चीजें आत्मसात करता है। जैसे कत्थक नृत्य के जिस रूप से आज हम परिचित हैं, वह रूप एक दिन में नहीं, धीरे-धीरे अस्तित्त्व में आया। एक बार जब कोई रूप पूर्णता प्राप्त कर लेता है तो उसका स्वरूप स्थिर हो जाता है। वह स्वायत्तता अर्जित कर लेता है। उसकी एक बुनियादी संरचना निर्मित हो जाती है। ये संरचना एक प्रकार के व्याकरण के अधीन कार्य करने लगती है। फिर इस व्याकरण में कोई बुनियादी बदलाव करना मुश्किल हो जाता है। इस रूप/विधा या माध्यम में काम करने वाला रचनाकार तभी सफल होता है, जब उस विधा के व्याकरण को समझकर सक्रिय होता है। इसके बावजूद, किसी विधा के अन्दर ऐसी गुंजाइश रहती है कि उसमें कुछ नया उन्मेष किया जा सके। उदाहरण के लिए गजल विधा का प्रयोग प्रायः प्रेम सम्बन्धी अनुभूतियों की अभिव्यक्ति के लिए किया जाता रहा है। किन्तु गजल में प्रेम की केन्द्रीयता को स्वीकार करते हुए भी सार्थक नवोन्मेष सम्भव है। फ़ैज अहमद फ़ैज की गजलें इस बात का साक्ष्य प्रस्तुत करती हैं कि प्रेम की केन्द्रीयता को स्वीकार करने के बावजूद उसमें क्रान्तिकारी और प्रगतिशील तेवर पैदा किये जा सकते हैं। किन्तु यदि गजल की विधा में वीर रस या समाज सुधार सम्बन्धी बातें डालने की कोशिश की जाए तो ये स्वरूप उसे धारण नहीं कर पाएगा। एक अच्छा रचनाकार वो है जो अपने माध्यम के प्रति संवेदनशील है; जो ये जानता है कि सुई से तलवार का काम नहीं लिया जा सकता और न ही तलवार से सुई का।

ये सही है कि नये युग की अनुभूतियों को साकार करने और नये विषयों को साहित्य और कला के माध्यमों में रचने हेतु नई विधाओं या रूपों का विकास होता है, किन्तु नई विधाएँ या नये रूप भी अपनी पूर्व परम्परा से ही निकलते हैं। उनका व्याकरण पूर्व प्रचलित रूपों से थोड़ा अलग तो होता है, लेकिन उनसे निरपेक्ष नहीं होता। इसीलिए उसे जातीय परम्परा के विकास के रूप में देखा जाता है। जैसे ध्रुपद गायन परम्परा का विकास ख्याल गायकी के रूप में हुआ और फिर ख्याल गायकी की परम्परा से आगे पूर्वी गायकी का विकास हुआ। पूरबी अंग की गायकी में लोक परम्परा में पहले से मौजूद होरी, चैती, दादरा, कजरी इत्यादि रूपों का उपशास्त्रीय गायन के रूप में उन्नयन होता है। इसी तरह रवीन्द्र संगीत का विकास हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत परम्परा और बांग्ला की बाउल गायन की लोक परम्परा से जुड़कर हुआ। रवीन्द्र संगीत कोे पश्चिमी संगीत परम्परा के कुछ तत्त्वों का भी समावेश है। रवीन्द्र संगीत को इसीलिए संगीत की जातीय परम्परा के सहज विकास के रूप में देखा जाता है। इसके बावजूद उसका बुनियादी स्वभाव भारतीय संगीत परम्परा से निर्मित है। इसके विपरीत जहाँ पश्चिमी संगीत की नियामक भूमिका होगी, वहाँ भारतीय संगीत परम्परा से कुछ तत्व ले लेने के बावजूद भी उसका स्वभाव जातीय/भारतीय नहीं रहेगा। भले ही उसकी भाषा और रंग-रोगन भारतीय क्यों न हो। गाँधी ने कई बातें पश्चिमी परम्परा से लीं, फिर भी उनके चिन्तन का स्वभाव भारतीय बना रहा, क्योंकि उन्होंने पश्चिमी विचारों को भारतीय चिन्तन परम्परा के व्याकरण में आत्मसात कर लिया। इसके उल्टी बात उन विचारकों की है जिन्होंने भारतीय चिन्तन परम्परा को पश्चिमी परम्परा में आत्मसात करने की कोशिश की।

उन्नीसवीं सदी में औपनिवेशिक आधुनिकता के आगमन के साथ भारतीय नवजागरण की चर्चा आरम्भ होती है। भारतीय नवजागरण के दौरान ज्ञान, साहित्य और कला की पहले से चली आ रही बुनियादी संरचना को त्यागकर पश्चिमी संरचनाओं को अपना लिया जाता है। इसे पैराडाइम शिफ्ट कहा गया। पश्चिमी पैराडाइम के निकष पर भारतीय सभ्यता की साहित्यिक, सांस्कृतिक और ज्ञान सम्बन्धी परम्पराओं को नापा जाने लगा। पश्चिमी पैराडाइम को ही थोड़ा-बहुत बदलकर भारतीय यथार्थ को बोधगम्य बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा। पश्चिमी साहित्यिक तथा कलात्मक रूपों में भारतीय यथार्थ-बोध को ढालकर अभिव्यक्त किया जाने लगा। रामविलास शर्मा ने इसे हिन्दी की जातीय परम्परा के विकास के रूप में समादृत किया है। अंग्रेजी के विद्वान आलोचक होमी भाभा ने इसे ‘मिमिक्री’ और ‘हाइब्रिडिटी’ की संज्ञा दी है। किन्तु न तो इसे हिन्दी की जातीय परम्परा का विकास कहा जा सकता है और न ही इसकी व्याख्या ‘हाइब्रिडिटी’ के रूप में की जा सकती है। आरम्भिक आधुनिक दौर में हुए बदलाव की व्याख्या अवश्य हिन्दी की जातीय परम्परा के विकास के रूप में की जा सकती है क्योंकि उस दौर में पश्चिमी एशिया और अरब से आये प्रभाव को पहले से चले आ रहे साहित्यिक-सांस्कृतिक रूपों के व्याकरण के अधीन आत्मसात कर लिया गया। किन्तु उन्नीसवीं सदी में ऐसा नही हुआ। पहले से चले आ रहे साहित्यिक-सांस्कृतिक रूपों को त्यागकर पश्चिमी साहित्यिक-सांस्कृतिक रूपों को अपना लिया गया और फिर इन पश्चिमी साहित्यिक-सांस्कृतिक रूपों में ‘भारतीय यथार्थ’ ठँूसने की कोशिश की जाने लगी। साहित्यिक सांस्कृतिक विधाओं की परिकल्पना डिब्बे के रूप में किए बिना साहित्यिक सांस्कृतिक रूपों और अन्तर्वस्तु (यथार्थ) में पूर्ण पार्थक्य स्वीकार कर पाना संभव न था। साहित्यिक-सांस्कृतिक रूप वास्तव में ‘रूप’ नहीं होते। वे किसी संस्कृति को बोधगम्य बनाने वाले मंत्र की तरह होते हैं जिनके बिना उस संस्कृति का बोध ही असंभव हो जाता है। किसी सभ्यता की धड़कन उसके सुदीर्घ सांस्कृतिक इतिहास के दौरान विकसित साहित्यिक-सांस्कृतिक रूपों में अवतरित होती है। टेक्नाॅलजी का एक सभ्यता से दूसरी सभ्यता में स्थानान्तरण आसान होता है, किन्तु साहित्यिक-सांस्कृतिक रूपों को एक जगह से निकालकर दूसरी जगह रोपना आसान नहीं होता।

भाषा का स्वभाव किसी डिब्बे की तरह नही, जिसमें कुछ भी डाला जा सके। भाषा दर्पण की तरह भी नहीं, जो यथार्थ को प्रतिबिम्बित करे। भाषा कोई पारदर्शी माध्यम भी नहीं, जिसके आर-पार देखा जा सके। भाषा यथार्थ को प्रतिबिम्बित नही करती, बल्कि एक संसार रचती है। यह संसार यथार्थ से मिलता-जुलता हो सकता है और पूरी तरह काल्पनिक भी। संसार रचने की सामथ्र्य भाषा में है। इसका मतलब यह है कि भाषा अपने ढंग से, अपनी शर्तों पर एक संसार रचती है। आप भाषा में जो बतलाना चाहते हैं, वह बात भाषा में वैसे ही नहीं आती, जैसे आप चाहते हैं। बात बदल-बदल जाती है। मुक्तिबोध ने कला के तीन क्षण में इस प्रसंग की विस्तार से चर्चा की है। फ़ैज ने इसी बात को अपने अन्दाज में इस तरह कहा है:

                                दिल से तो हर मुआमला करके चले थे साफ हम।

                                कहने में उनके सामने बात बदल-बदल गयी।।

2.

 हिन्दी की जातीय परम्परा की सबसे ज्यादा चर्चा रामविलास शर्मा ने की। रामविलास शर्मा ने भारतेन्दु युग के साथ विकसित होने वाले समूचे आधुनिक हिन्दी साहित्य की व्याख्या हिन्दी की जातीय परम्परा के सहज विकास के रूप में की है। रामविलास शर्मा ने हिन्दी की जातीय परम्परा की जिस तरह व्याख्या की है, वह मुख्यतः अन्तर्वस्तु प्रधान है। अन्तर्वस्तु केन्द्रित समझ से सामाजिक परिवर्तन के कारणों की व्याख्या की जा सकती है। लेकिन साहित्य और कला के विभिन्न रूपों में घटित होने वाले परिवर्तन की सन्तोषजनक व्याख्या नहीं की जा सकती। क्योंकि साहित्यिक और कलात्मक रूपों की एक विशिष्ट संरचना होती है और उनमें जो भी बदलाव आते हैं, वे बदलाव प्रायः उस संरचना के अन्दर से निकलते हैं। ये मानना गलत है कि साहित्यिक या कलात्मक रूप सामाजिक परिवर्तनों को यथावत् प्रतिबिम्बित करते हैं। सामाजिक परिवर्तन का एहसास साहित्यिक-कलात्मक रचनाओं से होता जरूर है। लेकिन ये एहसास साहित्य और कला के विभिन्न माध्यम् अपनी शर्तों पर, माध्यम के स्वभाव के अनुरूप ही कराते हैं। इनका वैशिष्ट भी यही है। इसीलिए संगीत सुनने और कविता पढ़ने/सुनने से हमें जो अनुभूति होती है, वह अनुभूति समाज-विज्ञान पढ़ने से होने वाले अनुभूति से भिन्न होती है।

हिन्दी की जातीय परम्परा की कोई भी सार्थक चर्चा साहित्य या कला के ‘माध्यम’ को छोड़कर सम्भव नहीं। साहित्य और कलाओं के प्रभाव का निर्धारण भी मुख्य रूप से माध्यम विशेष में अर्जित की गयी दक्षता से होता है। ये प्रभाव सिर्फ अन्तर्वस्तु से निर्धारित/तय नहीं होता।

मुक्तिबोध सम्भवतः हिन्दी के उन विरल लेखकों में से हैं, जिनका सांस्कृतिक बोध बहुत ही गहरा है। सही मायने में सृजनात्मक सांस्कृतिक बोध स्थूल नहीं, बहुत सूक्ष्म होता है; और विचार नहीं, संस्कार की तरह रचनात्मकता के विभिन्न आयामों में रूपायित होता है।

मुक्तिबोध का रचना संसार हमें इसलिए प्रभावशाली लगता है क्योंकि उन्होंने भारतीय सभ्यता के सांस्कृतिक बोध को संवेदना के स्तर पर अनुभव किया और फिर अपनी कृतियों में इस अनुभूति को सृजित किया। विचारणीय प्रश्न ये है कि जब सर्वत्र यथार्थवाद का बोलबाला था, मुक्तिबोध ने अपनी रचनात्मकता अभिव्यक्ति के लिए ऐसे रूप की खोज की जिसका सम्बन्ध न तो यथार्थवाद से और न ही आधुनिकतावाद से बनता है। असल में मुक्तिबोध का जैसा रचनात्मक व्यक्तित्व था, उसकी अभिव्यक्ति यथार्थवादी शिल्प में सम्भव नहीं थी। उसकी अभिव्यक्ति आधुनिकतावादी शिल्प में भी संभव नहीं थी। ये बात अलग है कि मुक्तिबोध की रचनात्मक अभिव्यक्ति की संगति यथार्थवादी शिल्प के बजाय आधुनिकतावादी शिल्प से ज्यादा बनती है। फिर भी उसकी सन्तोषजनक व्याख्या आधुनिकतावादी सैद्धान्तिकी के सहारे सम्भव नहीं। मुक्तिबोध की रचनात्मकता का बहुत गहरा सम्बन्ध भारत की पूर्व औपनिवेशिक सांस्कृतिक परम्परा से है। उसी की बुनियाद पर वे आधुनिकतावादी और यथार्थवादी सैद्धान्तिकी का अतिक्रमण करते हैं। भले ही मुक्तिबोध ने बहुत सोच-समझकर ऐसा न किया हो, लेकिन उनकी कविताओं और कहानियों के विन्यास के आधार पर ऐसा अवश्य कहा जा सकता है कि उनकी रचनात्मकता न तो आधुनिकतावाद के साँचे में फिट होती है, न यथार्थवाद के साँचे में।

3.

अगर भारतेन्दु युग से आधुनिक हिन्दी की शुरूआत मानी जाए, तो फिर यह भी मानना पड़ेगा कि आधुनिक युग की शुरूआत के साथ ही रूप और अन्तर्वस्तु का पार्थक्य स्वीकार कर लिया गया। रूप और अन्तर्वस्तु का पार्थक्य स्वीकार करने से आशय यह है कि रूप की परिकल्पना एक तटस्थ अवधारणा के रूप में की जाने लगी, जिसमें सुविधानुसार कोई भी अन्तर्वस्तु डाली जा सकती है। इस बात को ज्यादा सरल तरीके से कहें तो रूप की परिकल्पना एक डिब्बे के रूप में की गयी, जिसमें जरूरत के हिसाब से कुछ भी डाला जा सकता है।

आधुनिकताजन्य चेतना के प्रचार-प्रसार के सम्बन्ध में भारतेन्दु ने लिखा है, ‘‘मैंने यह सोचा है कि जातीय संगीत की छोटी-छोटी पुस्तकें बनें और वे सारे देश, गाँव गाँव, में साधारण लोगों में प्रचार की जायँ। यह सब लोग जानते हैं कि जो बात साधारण लोगों में फैलेगी उसी का प्रचार सार्वदेशिक होगा और यह भी विदित है कि जितना ग्रामगीत शीघ्र फैलते हैं और जितना काव्य को संगीत द्वारा सुनकर चित्त पर प्रभाव होता है उतना साधारण शिक्षा से नहीं होता। इससे साधारण लोगों के चित्त पर भी इन बातों का अंकुर जमाने को इस प्रकार से जो संगीत फैलाया जाय तो बहुत कुछ संस्कार बदल जाने की आशा है। … इस हेतु ऐसे गीत बहुत छोटे छोटे छंदों में और साधारण भाषा में बनैं, वरंच गवाँरी भाषाओं में और स्त्रियों की भाषा में विशेष हों। कजली, ठुमरी, खेमटा, कँहरवा, अद्धा, चैती, होली, साँझी, लंबे, लावनी, जाँते के गीत, बिरहा, चनैनी, गजल इत्यादि ग्रामगीतों में इनका प्रचार हो और सब देश की भाषाओं में इसी अनुसार हो।’’

भारतेन्दु के उपर्युक्त कथन से इस बात की पुष्टि होती है कि रूप की परिकल्पना अन्तर्वस्तु निरपेक्ष सत्ता के रूप में की जाने लगी।

इससे पहले रूप और अन्तर्वस्तु की परिकल्पना परस्पर निरपेक्ष सत्ता के रूप में नहीं की जाती थी। जैसे हिन्दुस्तानी संगीत परम्परा में ये बताया गया है कि अमुक राग अमुक समय पर गाया जाना चाहिए। इसका मतलब यह है कि एक समय विशेष की संवेदना एक राग विशेष में ही रूपायित हो सकती है। अर्थात् राग के स्वभाव का सम्बन्ध प्रहर विशेष के अनुरूप बनता है। समय और राग के सम्बन्ध की पहचान का विस्तार षड्ऋतुवर्णन और फिर बारहमासा गायन की लोकपरम्परा में दिखायी देता है। यदि चैबीस घण्टे के चक्र में रागों का समय निर्धारित किया गया है, तो बारहमासे को साल के बारह महीनों के चक्र में स्थापित किया गया है। ये माना गया कि हर महीने का स्वभाव अलग है। किसी माह या ऋतु के स्वभाव के अनुरूप ही उस माह या ऋतु में गाये जाने वाले गीत की धुन विकसित की गयी। उदाहरण के तौर पर फागुन माह में गाये जाने वाले गीत ‘होरी’ की धुन और सावन महीने में गाये जाने वाले गीत कजरी की धुन अलग है। इसका मतलब ये है कि धुन सिर्फ रूप नहीं है, जिसमें कैसा भी गीत गाया जा सकता है। चैती की धुन में होरी नहीं गा सकते और होरी की धुन में चैती गाने पर अटपटा लगेगा। इस तरह धुन और गीत परस्पर इस तरह मिल जाते हैं कि इनमें से किसी को मात्र ‘रूप’ नहीं कहा जा सकता। धुन भी अंतर्वस्तु है और गीत भी अन्तर्वस्तु है। यह भी कहा जा सकता है कि रूप और अन्तर्वस्तु इस तरह एकाकार हो जाते हैं कि ये कहना न तो सम्भव है और न तो उचित है कि क्या रूप है और क्या अन्तर्वस्तु। कुन्तक ने इस स्थिति को ‘निरस्त सकल अवयव’ कहा है। कुन्तक का आशय यह है कि रचना में प्रयुक्त विभिन्न अवयवों की स्वतंत्र सत्ता समाप्त हो जाती है। ठीक इसी तरह गीत और धुन का स्वतंत्र अस्तित्व समाप्त हो जाता है। जो प्रभाव है वह इनके एक हो जाने से उत्पन्न होने वाला प्रभाव है।

ऊपर के विवेचन से ये बात समझने में मदद मिल सकती है कि रूप की परिकल्पना समय और विषयवस्तु से निरपेक्ष नहीं होती। एक रूप में जो चाहें, वो मनमाफिक नहीं भरा जा सकता। जैसे कजरी की धुन में परिवार नियोजन का महत्त्व गाया जाने लगे तो उसका प्रभाव बहुत संतोषजनक नहीं होगा। इसका एक निहितार्थ ये भी है कि रूप अपने स्वभाव के अनुरूप अन्तर्वस्तु को ही स्वीकार करता है। रूप के स्वभाव के विपरीत जब भी कुछ डालने की चेष्टा की जाती है, उसके सार्थक और टिकाऊ परिणाम नहीं निकलते। प्रसिद्ध चिन्तक हेडेन व्हाइट ने इसीलिए ‘कंटेंट आॅफ दि फार्म’ की चर्चा की है। ‘कंटेंट आफ दि फार्म’ से आशय यह है कि सामान्य समझ के विपरीत रूप यह निर्धारित करता है कि उसमें कैसी अन्तर्वस्तु रखी जा सकती है। रूप से अन्तर्वस्तु निर्धारित होती है। अन्तर्वस्तु से रूप नहीं।

पहचान/अस्मिता को रेखांकित करने वाली चीज रूप है, न कि अन्तर्वस्तु। पहले तो यही देखा जाएगा कि आप सुर में गा सकते हैं या नहीं। किसी गायक की पहचान इस बात से होगी कि उसे रागों का ज्ञान है या नहीं और वह राग में गा सकता है या नहीं। गायक राग में क्या गाता है, गीत के विषय या बोल क्या हैं, ये बातें काफी हद तक उस राग की प्रकृति से निर्धारित होंगी। ये बात साहित्य पर भी लागू होती है।

अभी तक कही गयी बातें अगर ठीक हैं, तो फिर रूप और अन्तर्वस्तु सम्बन्धी उस समझ पर नये सिरे से विचार करना चाहिए, जिसकी शुरूआत हिन्दी में भारतेन्दु के साथ होती है। यह सही है कि समूचे आधुनिक हिन्दी साहित्य में विषयवस्तु को केन्द्रीय मानकर रूप और अन्तर्वस्तु के सम्बन्ध पर चर्चा हुई। व्यवहार में भी इस पर इसी रूप में अमल किया गया। यहाँ तक कि प्रयोगवादी-आधुनिकतावादी रचनाकारों ने भी रूप के महत्त्व और उसके सांस्कृतिक संदर्भ को नजरअंदाज करने की गलती की। अंग्रेजी ढंग का नाॅवेल या कविता लिखने वालों में केवल यथार्थवादी-प्रगतिवादी रचनाकार ही नहीं आते, प्रयोगवादी-आधुनिकतावादी रचनाकारों ने भी अंग्रेजी ढंग के रूप-विन्यास में ही अपनी ज्यादातर रचनाएँ लिखी हैं। प्रयोगवादी-आधुनिकतावादी रचनाकार रूप की चिन्ता तो खूब करते हैं, लेकिन ये बात भुला देते हैं कि जिस रूप में वो रचना कर रहे हैं, उस रूप का सम्बन्ध पश्चिमी साहित्यिक-सांस्कृतिक परम्परा से है। पश्चिमी साहित्यिक-सांस्कृतिक परम्परा की कोख से जन्मे रूप में अव्वल तो भारतीय अन्तर्वस्तु आ नहीं सकती और अगर वो ठीक से उस ‘रूप’ में समा जा रही है तो उसे भारतीय अन्तर्वस्तु कहना ही संदेहास्पद होगा। ये जरूर कह सकते हैं कि रूप और अन्तर्वस्तु दोनों पश्चिमी हैं ! लेकिन फिर ये सवाल उठेगा कि गैर-पश्चिमी भाषा और साहित्यिक-सांस्कृतिक संदर्भ में ऐसी रचना की क्या संगति बनेगी, जिसका रूप और अंतर्वस्तु दोनों पश्चिमी है।

जैसाकि पहले कहा गया, इस प्रश्न का एक उत्तर होमी भाभा के यहाँ मिलता है, जहाँ वे इस स्थिति को वर्णसंकरता के रूप में व्याख्यायित करते हैं। ये न तो पूरी तरह पश्चिमी, और न पूरी तरह भारतीय रूप और संवेदना है, क्योंकि पश्चिम के सम्पर्क में आने के बाद समूचा साहित्यिक-सांस्कृतिक संदर्भ ही वर्णसंकर हो गया है। वास्तविकता तो ये है कि जिसे वर्णसंकरता की स्थिति कहा गया है, वो वास्तव में वर्णसंकरता की स्थिति है नहीं। यहाँ सब कुछ पश्चिम का ही है, सिर्फ रंगरोगन और भाषा भारतीय है। वर्ण संकरता की स्थिति तब उत्पन्न होती है, जब दोनों पक्षों की भूमिका बराबरी की होती है। ये अकारण नहीं है कि इस कथित वर्णसंकरता ने किसी बड़े वैचारिक एवं रचनात्मक उन्मेष को जन्म नहीं दिया। वर्णसंकरता की ये अवधारणा इससे पहले इतिहासकारों द्वारा प्रयुक्त भारतीय नवजागरण की अवधारणा की तरह ही बहुत उर्वर साबित नहीं हुई। क्योंकि पराधीनता के दौरान पश्चिम से जो भी संवाद हुआ, वो ग़ैर बराबरी के स्तर पर हुआ और इस संवाद में पश्चिम की हर क्षेत्र में नियामक और केन्द्रीय भूमिका स्वीकार करते हुए उसका भारतीय संस्करण गढ़ने की कोशिश की गयी। इसलिए इस स्थिति को वर्णसंकरता की अवधारणा के जरिये व्याख्यायित करने के बजाय ‘डिराइवेटिव डिस्कोर्स’ के रूप में व्याख्यायित करना ज्यादा सटीक होगा। डिराइवेटिव डिस्कोर्स की अवधारणा का इस्तेमाल पार्थ चटर्जी ने अपनी पुस्तक में राष्ट्रवादी चिन्तन को व्याख्यायित करने के संदर्भ में किया है। इस सोच में ये बात शामिल है कि मूल और नियामक चिन्तन तो पश्चिम का है, और राष्ट्रीय चिन्तन के रूप में जो कुछ लिखा-पढ़ा गया है, वो पश्चिमी चिन्तन से ही निकला है। इस विमर्श में भारतीय राष्ट्रीय चिन्तन की स्वायत्तता स्वीकार करने के बावजूद पश्चिमी चिन्तन की केन्द्रीयता बनी रहती है। क्या यही बात प्रयोगवादी-आधुनिकतावादी-यथार्थवादी रचनाकारों के साहित्यिक अवदान के बारे में भी कही जा सकती है! क्या उनके अवदान की व्याख्या डिराइवेटिव डिस्कोर्स के रूप में करना उचित नहीं होगा?

ये तो नही कहा जा सकता कि हिन्दी की जातीय परम्परा का उन्नीसवीं सदी के बाद विकास ही नहीं हुआ। लेकिन ये जरूर कहा जा सकता है कि हिन्दी की जातीय परम्परा के सहज विकास के रूप में समादृत किये जाने वाले बीसवीं शताब्दी के साहित्य का स्वरूप जातीय कम और पश्चिमी ज्यादा है। असल में, जैसे-जैसे जातीय परम्परा के संस्कार कमजोर कमजोर पड़ते गये, वैसे-वैसे पश्चिमी विचारों का प्रभाव बढ़ता गया। किन्तु पुराने संस्कार इतने आसानी से छूटते नहीं। पश्चिमी विचारों के बढ़ते वर्चस्व के बावजूद उन्नीसवीं शताब्दी में ‘अन्धेर नगरी’ जैसे नाटकों, बीसवीं सदी में हबीब तनवीर के नाटकों, विजय तेन्दुलकर के ‘घासीराम कोतवाल’, गिरीश कर्नाड के ‘नागमण्डलम’ और ‘हयवदन’ जैसे नाटकों; विजयदान देथा की कहानियों और मुक्तिबोध की कहानियों और कविताओं में भारतीय परम्परा के सहज विकास के साक्ष्य मिल जाते हैं। ये सूची और भी लम्बी हो सकती है लेकिन ऊपर गिनाए गये नामों के सहारे हिन्दी की जातीय परम्परा ही नहीं, भारतीय साहित्य की जातीय परम्परा के विकास की वैकल्पिक अवधारणा प्रस्तुत की जा सकती है। कहने की आवश्यकता नहीं कि हिन्दी की जातीय परम्परा की वैकल्पिक अवधारणा विकसित करने में मुक्तिबोध के रचनात्मक और वैचारिक लेखन की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण हो सकती है।

राजकुमार जी

प्रो॰राजकुमार

शोर-शराबे से दूर अध्ययन-अध्यापन में मग्न रहने  वाले युवा-तुर्क हिन्दी आलोचक। भक्ति साहित्य, हिन्दी नवजागरण, आधुनिकता, आधुनिक साहित्य, प्रेमचंद, हिन्दी कहानी इत्यादि पर लगातार लेखन। किताबों में जैसी रुचि इनकी  है,  वह अन्यत्र दुर्लभ ही हो गई है। फिलहाल, बी॰एच॰यू॰ के हिन्दी विभाग में प्राध्यापक।इनसे dr.kumar.raj@gmail.com पर संपर्क संभव। 

 

साभार – कथादेश 

जारी….

 

मास्टर स्टोरी राइटर थे अमरकांत: रविभूषण

 ‘हत्यारे’ और ‘बुड़ान’  इन दोनों कहानियों पर अत्यंत संक्षेप में मैं कहूं कि हत्यारे और बुड़ान के रचनाकाल में लगभग तीस वर्ष का अंतर है और बुड़ान 1991 या 1992 में लिखी गई थी। हत्यारे जब लिखी गई थी तब देश के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू थे। बुड़ान जब लिखी गई तब प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव थे और मनमोहन सिंह की नई अर्थनीति आ चुकी थी। और जब हम इन दोनों कहानियों पर बात कर रहे हैं तो हमारे देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह हैं। इन दोनों कहानियों में दो-दो पात्र हैं। हत्यारे में पात्र का कहीं कोई नाम नहीं है। अगर हम इसी बिंदु को केंद्र में रख कर बात करें कि दोनों पात्रों के नाम अमरकांत ने क्यों नहीं दिए, ये अनाम क्यों है; क्योंकि जब हम नाम दे देते हैं तो वह अपने वजूद में आ जाता है और यदि नाम नहीं देते हैं तो उसका भी एक वजूद होता है लेकिन वह विस्तृत होता है। ‘बुड़ान’ कहानी की दादी सरकार और सरपंच को सरापती है। हत्यारे कहानी में अमरकांत ने सरापा तो कहीं नहीं है लेकिन इतनी सारी चीजें हमारे सामने इकट्ठी रख दी हैं कि हमें लगता है कि कुछ भी छूटता नहीं है। दोनों कहानियां आकार में छोटी हैं और यह बतलाती हैं सब कुछ या बहुत कुछ डूब रहा है। यह ‘रामदास’ वाली कविता हमारे मित्र महेश कटारे जी ने पढ़ी। जो हत्यारे पर लिखी गई थी। अब आप देखिए एक कहानी में हत्या की संस्कृति है और दूसरी कहानी में विकास की संस्कृति है। तो ‘हत्या’ और ‘विकास’ के इस आपसी सम्बन्ध पर भी विचार करने की आवश्यकता है। हत्यारे के दोनों पात्र लुम्पेन हैं और बुड़ान के दोनों पात्रों में सम्भावनाएं हैं। ये बाद में चलकर प्रगतिशील भी हो सकते हैं और लुम्पेन भी हो सकते हैं और महेश कटारे जी ने ठीक ही कहा कि दोनों कहानियों की भाषा सहज और सम्प्रेषणीय है। कहानी-भाषा में एक प्रवाह है और एक जीवंतता है. जो  हत्यारे में कुछ अधिक है। हत्यारे पर मार्तण्ड ने बहुत गंभीर बातें कही हैं। कल बहुत कम समय में मैंने ‘रोड टू सर्फडम’ की चर्चा की थी, जिसका उल्लेख करते हुए उन्होंने प्रश्न किया कि क्या अर्थशास्त्र के डिस्पिलिन से साहित्य को समझना सम्भव है? इस पर मेरा कहना है कि नहीं, हम ऐसा नहीं मानते। कोई भी नहीं मानता। हम जब कल अपनी बात कह रहे थे तो आज के समय पर फोकस कर रहे थे और समयाभाव के कारण आज के समय को भी हमने सही ढंग से रेखांकित नहीं किया था। उसके बाद हम दूसरी चीजों पर आ गए। हमारा कहना केवल इतना ही था कि भारत का जो समय है और पूरे विश्व का जो समय है, इसकी शुरुआत हम वहीं से मानते हैं। संक्षेप में मैं यह कह दूं कि जब हायक ने ‘रोड टू सर्फडम’ (गुलामी का रास्ता) लिखी तब द्वितीय विश्वयुद्ध समाप्त हो रहा था। विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष का जन्म हो रहा था। अमेरिका को द्वितीय विश्वयुद्ध से कोई नुकसान नहीं पहुँचा था। उसके बाद विश्वबैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष की स्थापना के बाद और जब पचास के दशक में बहुत सारे देश स्वतंत्र होने लगे थे -क्या अफ्रीकी, क्या एशियाई और दूसरे देश- तब नई आर्थिक नीतियां चलने लगीं और अमेरिका पूरी तरह से अपने वजूद में आ गया। उसके साथ ही कोल्डवार को भी हम देखें। उसके साथ सत्तर के दशक में जब डालर को सोने से डी-लिंक्ड किया गया उसको देखें। हम उसके बाद सत्तर के दशक में मार्गरेट थैचर और रोनाल्ड रीगन को देखें जहां से थैचरिज्म और रीडनामिक्स शुरु होता है और थैचर ने यह कहा था कि समाज, समाज क्या है! समाज का कोई अस्तित्व नहीं है! और आप सब जानते हैं कि मार्गरेट थैचर के निधन के बाद इंग्लैंड में लोगों ने कहा कि डायन मर गई है। आप देखें कि ये राजनेता हायक और मिल्टन फ्रीडमैन जैसे अर्थशास्त्रियों को कितना सर पर उठाकर रखते थे। मार्गरेट थैचर के हाथ में किताब होती थी हायक की और उनके जो इंटरव्यू हैं, पत्राचार हैं उनमें रोनाल्ड रीगन किस तरह से मिल्टन फ्रीडमैन को महत्त्व दिया करते थे वह देखिए। यह देखने की कोशिश कीजिए कि शिकागो स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स अपने वजूद में कैसे आया और आज भारत के रिजर्व बैंक का जो गवर्नर है ‘रघुराम राजन’ उनके वाशिंगटन के दफ्तर में हायक और रोनाल्ड रीगन की तस्वीरें मौजूद हैं/थी। वह अमरीकी नागरिक हैं। आज भारत के रिजर्व बैंक के गवर्नर हैं। क्यों 1967 से ही इकोनॉमिक्स में नोबेल पुरस्कार दिया जाना आरम्भ हुआ। इस खेल को, तमाशे को, तिकड़मों को और साजिशों को द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद यदि हम देखने की कोशिश करते हैं। तो सवाल का जबाब मिल जाता है. और जैसा कि मशहूर अफ्रीकी उपन्यासकार चिनुआ चेबे ने कहा है कि ‘उपन्यासकार को एक अध्यापक के रूप में होना चाहिए।’ मेरा सवाल दूसरा है और वह सवाल यह है कि एक औपनिवेशिक देश में जिसको एक आधी-अधूरी ही राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त हो जाती है। उसके बाद उसके सामने किस प्रकार की सामाजिक समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं। न्युगी व थ्योंगो ने जो एक लेक्चर दिया था, जिसका समकालीन तीसरी दुनिया में एक अच्छा-खासा अनुवाद आनंद स्वरूप वर्मा ने किया है, उसको देखिए और तब ऐजुकेशन-यूनिवर्सिटी के फील्ड में और बौद्धिक जगत् में जो चीजें चलती हैं और हमारे मानस को जिस तरह अनुकूलित किया जा रहा है,  उसे देखने की कोशिश करें। यह इसलिए भी कि विकास की जो अवधारणा है वह पूरी तरह से आर्थिक विकास से जुड़ जाती है। इसलिए वह मनमोहन सिंह की इकोनॉमिक्स हो या नरेन्द्र मोदी की इकोनॉमिक्स हो, किसी से कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि सारा मामला पूरी तरह से कारपोरेट से ही जुड़ रहा है। इसलिए मैं केवल यह कह रहा था कि आज क्या भाषा, क्या कला, क्या साहित्य, क्या संस्कृति, क्या उत्तर-आधुनिकतावाद, क्या उत्तर संरचनावाद, ’70 के दशक के बाद से आने वाले नए-नए थ्योरीज- इन सारी चीजों पर हम यदि समग्रता में विचार करने की कोशिश करते हैं तो हमें यह पता चल जाता है कि जो अर्थनीति है और जो राजनीति है इनसे इनका जो लगाव, जुड़ाव या झुकाव है वह किस प्रकार है या नहीं है। हम चीजों को आज खण्डित रूप में नहीं देख सकते और इसके लिए हम कहानी में भी चलेंगे। # लेखक

अपनी पत्‍नी के साथ अमरकांत

अपनी पत्‍नी के साथ अमरकांत

BY  रविभूषण

‘हत्यारे’ कहानी पर मार्तण्ड ने बहुत अच्छे ढंग से हिंदी के चार कथालोचकों की चर्चा की और यह बतलाया कि विश्वनाथ त्रिपाठी ने कहा है कि अमरकांत कहानी हत्यारे में ये जो दो लुम्पेन पात्र हैं संघर्ष नहीं करते। आखिर ये लुम्पेन कैरेक्टर आते कहां से हैं। लुम्पेन इकोनॉमी पर जो सबसे अच्छी किताब लिखी है वह सुनीति कुमार घोष ने लिखी है और यह जो लुम्पेन बुर्जुआजी है, यह जो लुम्पेन इकोनॉमी चलती है इससे लुम्पेन पात्रों का कोई सम्बन्ध बनता है या नहीं बनता है। और नेहरू के समय में लुम्पेन पूंजी आज की तरह तो दौड़ नहीं रही थी लेकिन वह थी कि नहीं थी। वह फ्रीडम मूवमेन्ट में थी कि नहीं थी. सुनीति कुमार घोष ने पूरे फ्रीडम मूवमेन्ट के दौरान बीस-तीस से लेकर बाद के दशकों तक इस लुम्पेन कैपटिलिज्म पर बहुत अच्छे ढंग से विचार किया है। अब अगर अमरकांत के पात्र संघर्ष नहीं करते हैं तो क्यों नहीं करते? लुम्पेन हैं, लुम्पेन कैसे संघर्ष करेंगे! यह कथालोचक सोच रहा है। यह ठीक ही कहा गया कि (अमरकांत की कथायात्रा में) यह एक ब्रेक है। मार्तण्ड ने यह अच्छी बात कही कि जो अकहानी है और जो नई कहानी है उसके संधि स्थल पर यह कहानी पूरी तरह से खड़ी है और ’60 के दशक में ही जब अकविता, अकहानी वगैरह का जो दौर चला था और फैशन जब आया था इसमें (हत्यारे में) कुछ लोग उसकी शिनाख्त कर सकते हैं. हत्यारे कहानी में ऐसे कुछ शब्दों, ऐसे कुछ वाक्यों से संकेत निकाले जा सकते है और कह सकते हैं कि बाद में इसको विकसित करते हुए एक दूसरी दिशा में अकहानी के कथाकारों ने जाने की कोशिश की। हिंदी के किसी भी कथालोचक ने, मार्तण्ड ने अभी चार का उल्लेख किया, अमरकांत के संदर्भ में मुक्तिबोध का उल्लेख नहीं किया है। मार्तण्ड ने भी विजयमोहन सिंह का उल्लेख नहीं किया। विजयमोहन सिंह शायद हिंदी के पहले आलोचक हैं जिसने अमरकांत की कहानियों पर विचार करते हुए मुक्तिबोध का दो-तीन बार उल्लेख किया है। लेकिन विजयमोहन केवल उतना ही जिक्र करते हैं. विश्वनाथ त्रिपाठी इतना ही कहते हैं कि अमरकांत के पात्र संघर्ष नहीं करते और राजेन्द्र यादव कहते हैं मनुष्य के अस्तित्व की लड़ाई महत्त्वपूर्ण है; तो खुद राजेन्द्र यादव का जो कथा संसार है और उनका जो चिंतन जगत् है उसकी छायाएं उनकी आलोचनात्मक टिप्पणियों पर कैसे पड़ती हैं उसका मैं यहां जिक्र नहीं करूंगा। यह अलग से विचारणीय है। सुरेन्द्र चौधरी जब कहते हैं कि हत्या नहीं होती तो यह महत्त्वपूर्ण कहानी होती. इसमें अतिनाटकीयता है। परंतु नई कहानी के दौर के और बाद के समय के हिंदी के जितने भी कथालोचक हैं उन्होंने जब हत्यारे कहानी पर कहीं कम, कहीं अधिक जो  भी विचार किया है उन सब को हम ध्यान में रख करके देखें कि इसमें अति नाटकीयता की बात सुरेन्द्र चौधरी भी करते हैं। विजयमोहन भी करते हैं और नामवर यह ठीक ही कहते हैं कि हत्या नहीं होती तो कहानी महत्त्वपूर्ण नहीं होती। लेकिन हिंदी का कोई कथालोचक हत्यारे कहानी के रेशे-रेशे को अलगाते हुए और उसे एक दूसरे से जोड़ते हुए किसी नतीजे पर पहुँचता हुआ मुझे दिखाई नहीं पड़ा है। मार्तण्ड ने ठीक कहा कि खल’नायक लुम्पेन पेटी बुर्जुआ है। मेरा कहना यही है कि लुम्पेन पेटी बुर्जुआ को हम लुम्पेन कैपटिलिज्म से जोड़ सकते हैं या नहीं। हत्यारे कहानी में भले इसकी पूरी चर्चा नहीं हुई हो लेकिन आप यदि यह देखें हत्यारे कहानी में क्या नहीं है। एक मुकम्मल रचना है यह। हिंदी आलोचना के साथ एक सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि जब हम कहानी पर विचार करते हैं तो केवल कहानियां हमारी आंखों के सामने होती हैं। जब कविता पर विचार करते हैं तो कविता हमारे सामने होती है। जब उपन्यास या अन्य साहित्य रूपों पर विचार करते हैं तो वह साहित्य रूप ही हमारे समक्ष प्रमुख रूप से उपस्थित हो जाता है। हम रचनाओं से निकलते और बहते हुए समय को देखने की कोशिश नहीं करते और पचास के दशक के बाद की स्थितियों को देखें तो हम कहीं न कहीं ‘अंधेरे में’ और ‘हत्यारे’ को एक साथ रखकर पाठ करने की आवश्यकता समझते हैं।

हत्यारे कहानी में ये जो दो लुम्पेन पात्र हैं ये कहां खड़े हैं- पहले पान की दुकान पर उसके बाद सड़क पर चलते हुए। शहर तो है ही। बुक स्टॉल- जहां पर एक युवती मैगजीन खरीद रही है और ये भी मैगजीन के पन्ने उलट रहे हैं। बाजार, रेस्तरां ये सब स्थान अलग-अलग दिखाई पड़ेंगे लेकिन मेरा मानना है कि इन स्थानों की प्रकृति पर विचार होना चाहिए। किसी आलोचक ने इन पर ध्यान नहीं दिया है। यह कहानी ऊपर से भले ऐसी लगती हो कि यह हत्यारे की कहानी है। दो लुम्पेन की कहानी है। पर मुझे ऐसा लगता है कि देश उस समय जो था, उससे जुड़ी जो चिंताएं हैं यह उन चिंताओं की कहानी है। इसमें क्या नहीं है! हम कहेंगे बड़ी सावधानी के साथ या बड़ी चतुराई के साथ (यह कहानी लिखी गई है) क्योंकि कहानी की पृष्ठ संख्या अधिक नहीं है। अगर दो-तीन बार ही कोई पाठ कर ले तो इसमें सब कुछ प्रत्यक्ष हो जाता है। इसमें नेहरू हैं। देश के अन्य नेता हैं। गांधी हैं। मंत्री हैं। होम मिनस्टर की चर्चा है। ब्लाकों के सरकारी कर्मचारी हैं। पूंजीपति, मंत्रियों और अफसरों के षडयंत्र की चर्चा है। देश की प्राइम मिनिस्ट्री की बात है। देश से आगे बढ़ करके विश्वशांति की बात कही गई है। अमेरिका के प्रेसिडेंट कैनेडी की चर्चा है। अमेरिका-रूस के सम्बन्ध की चर्चा है। जिसमें हम कोल्डवार को देख सकते हैं, वर्ल्ड पॉलिटिक्स को देख सकते हैं। उस समय का जो द्विध्रुवीय विश्व (बाइपोलर वर्ल्ड) है उसको देख सकते हैं और अभी जब हम इस कहानी पर बात कर रहे हैं तो इस एक ध्रुवीय विश्व अर्थात् यूनीपोलर वर्ल्ड में हम इस कहानी पर बात कर रहे हैं। इसमें एक पात्र जब कहता है कि ‘कल मुझको भी अमेरिका के प्रेसिडेंट केनेडी का तार मिला था।…मुझको अमेरिका बुला रहा है।…मैंने भी क़ुबूल कर दिया है कि मैं राष्ट्रीय विचारों का युवक हूं मैं अभी नहीं आ सकता।’ क्या खिल्ली उड़ाई है अमरकांत ने। तीन पंचवर्षीय योजनाएं हो चुकी थीं इस कहानी के लेखन से पहले। केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी। हिंदी आलोचना तो ऐसा नहीं करती लेकिन उसे ऐसा करना चाहिए कि जो पंचवर्षीय योजनाएं हैं (चीजों को) उसके साथ भी रख करके विचार करना चाहिए क्योंकि केदारनाथ अग्रवाल ने और नागार्जुन जैसे बड़े कवियों ने भी पंचवर्षीय योजनाओं पर कविता की कुछ पंक्तियां दर्ज की हैं। आजादी के बाद आजादी में जो कुछ भी जैसा भी राष्ट्रप्रेम था उसकी पूरी कहानी खिल्ली उड़ाती हुई प्रतीत होती है। एक ओर खिल्ली है और दूसरी और पान की गिलौरी है। सिगरेट का धुआं है। इन दोनों पात्रों को अलग से देखने की जरूरत नहीं है। सड़क के दोनों ओर भव्य दुकानें हैं। बाजार की चहलकदमी है। नेहरू युग में कोई माल (शापिंग माल) नहीं था। ये दोनों वहां से गुजरते हैं। ‘वे अक्सर अपने दाएं और बाएं अत्यधिक नाराजगी से घूरते थे’- यह कहानी का वाक्य है। दाएं भी और बाएं भी। क्यों अंधायुग में प्रहरी दाएं और बाएं चलता है? मैं मानता हूं यह ‘राइट एण्ड लेफ्ट पॉलिटिक्स’ है। कहानी वही नहीं होती जो कहानी वर्णन करती हुई प्रतीत होती है। वह अपने भीतर बहुत सारे संकेतों को शामिल किए हुए होती है। यह पाठक के ऊपर निर्भर करता है, यह कथालोचक के ऊपर निर्भर करता है कि उन संकेतों को पकड़े। उन संकेतों को खोलने की कोशिश करे। तो यह जो पंक्ति है उसे आप देखिए, ‘वे अक्सर अपने दाएं और बाएं अत्यधिक नाराजगी से घूरते थे।’ इसमें एक-एक शब्द कसा हुआ है। चुस्त है कविता की तरह। हमें स्वतंत्र भारत में इसकी (राइट एण्ड लेफ्ट पॉलिटिक्स की) पड़ताल करनी होगी। तब इस कहानी का असली रूप हमारे सामने स्पष्ट हो सकेगा। आश्चर्य की बात है कि मार्तण्ड का भी ध्यान इधर नहीं गया और हिंदी के किसी कथालोचक का भी नहीं कि इसमें शिक्षा जगत्- यूनीवर्सिटी भी इसमें शामिल है। अंग्रेजी का हेड प्रोफेसर दीक्षित यहां मौजूद है। जो चंद्रा को फंसाने की कोशिश कर रहा है। वह बहुत साधारण छात्रा थी उसे उसने टॉप करा दिया। तो यहां पूरा एजुकेशन सिस्टम भी है। जिस समाज में एजुकेशन ऐसा होगा वहां लुम्पेन होंगे कि नहीं होंगे, भारतवर्ष के प्रत्येक विश्वविद्यालय शिनाख्त की जानी चाहिए कि वहां दो-चार ही सही लुम्पेन कैरेक्टर्स हमें नजर आते हैं या नहीं। मार्तण्ड ने बहुत अच्छी बात कही कि गोरा गुरु है सांवला शिष्य है। सांवले ने गोरे से कहा कि तुम ‘हरामी-उल-मुल्क’ के शहंशाह हो। ये जो गुस्सा है, ये जो क्रोध है अमरकांत के यहां जो व्यंग्य में झलकता है वह यहां कहीं-कहीं बेलौस ढंग से नजर आता है। इंग्लिश डिपार्टमेन्ट के हेड प्रोफेसर दीक्षित की बात हमने की। कहानी में यह उल्लेख है कि वह अफसरों और मंत्रियों की चापलूसी करता था। ’60 के दशक के आरम्भिक वर्षों में अफसरों और मंत्रियों की चापलूसी करने वाले कॉलेज और यूनीवर्सिटी के लेक्चरान, रीडरान और प्राफेसरान और आज के समय में उनकी संख्या कितनी बढ़ गई है यह सभी लोग जानते हैं। यहां अवश्य यूनीवर्सिटी के कुछ प्रोफेसरान और छात्र मौजूद होंगे। बड़ी बात यह है कि हम इन सबको अलग-अलग करके नहीं देख सकते। ये ऐजुकेशन सिस्टम, ये सोशल सिस्टम, ये पॉलिटिकल सिस्टम सारे सिस्टम एक दूसरे से जुड़े हुए हैं और हत्यारे कहानी उस समय की भारत वर्ष की व्यवस्था पर पूर्ण रूप से प्रहार करती है। और आज जब इतने वर्षों बाद, लगभग 50 वर्षों बाद इस कहानी का पाठ करते हैं तो हम क्या देखते हैं? हम कहां फंसे हैं? किस भंवर में फंसे हैं हम? इस कहानी में लास्की की चर्चा होती है। एक जमाने में लास्की की किताब, अभी भी कुछ लोग उलट लेते होंगे पॉलिटिकल साइन्स वाले, ‘ग्रामर आफ पॉलिटिक्स’ आदि की धूम मची हुई थी। क्यों होती है लास्की की किताब की चर्चा! अमरकांत ऐसे ही कर देते हैं! आप जो पॉलिटिकल थ्योरीज वहां से ला रहे हो- यह उस पर एक तरह से व्यंग्य है।…ये नामावली प्रस्तुत करना, ये बड़े-बड़े लोग जिन्होंने फूको की पांच किताबें नहीं पढ़ी हैं वे आज फूको, देरिदा वगैरह की बातें करते हैं। यह हिंदी की कहानी है और हिंदी का जो शिक्षित वर्ग है उसकी एकदम खिल्ली उड़ाता हुआ चलता है लेखक, इसलिए यहां लास्की भी मौजूद है। कहानी का आरम्भ होता है क्वार की एक शाम से। भाषा की दृष्टि से देखिए जहां तुलनाएं की गई हैं। एक-एक वाक्य इतना कसा हुआ, मुहावरे की शक्ल ले लेता है। हमारे साथी कैलास बनवासी अभी बोल रहे थे कि जो सरलता है यह छत्तीसगढ़वासियों की विशेषता है। एक अफ्रीकी कथाकार ने लिखा है वहां के लोगों को उद्धृत करते हुए कि गोरे हमारे यहां रात्रि भोजन के लिए आए। उन्होंने रात्रि का भोजन किया और वे हमारा सब कुछ ले गए। चिनुआ चेबे ने यू.आर. अनंतमूर्ति से बात करते हुए एक इंटरव्यू में यह कहा था कि अफ्रीकियों की जो सबसे बड़ी खासियत है वह उनकी सरलता ही है। वह उनकी सज्जनता ही है। यह सरलता और सज्जनता किसी काम की नहीं है। मुझे तो ऐसा लगता है कि जिस तरह कफन कहानी प्रेमचंद की कहानियों में एक अलग किस्म की कहानी है। उसी तरह से अमरकांत की हत्यारे कहानी एक अलग किस्म की कहानी है और यहां किसी ने बताया भी कफन के साथ में ऊपरी धरातल पर ही नहीं कुछ भीतरी धरातल पर इसकी बात की जानी चाहिए। तब हम 1936, 1964 और 2013 में इसको पकड़ सकते हैं। गोरा कहता है,‘मैं सिद्धांतों का आदमी हूं। नेहरू को ट्रंक काल करके आ रहा हूं।’ यह कहा जा सकता है कि ये पात्र कुछ मनोवैज्ञानिक ग्रंथियों से ग्रस्त हैं लेकिन ऐसी बात नहीं है। ये खिल्ली उड़ाते हैं- ‘नेहरू मेरा हाथ पकड़कर रोने लगा। बोला, आज देश भारी संकट से गुजर रहा है। सभी नेता और मंत्री बेईमान और संकीर्ण विचारों के हैं। जो ईमानदार हैं उनके पास अपना दिमाग नहीं है। मेरी लीडरशिप भी कमजोर है। मेरे अफसर मुझको धोखा देते हैं। जनता की भलाई के लिए मैंने पांच साला योजनाएं शुरु कीं, लेकिन ब्लाकों के सरकारी कर्मचारी अपने घरों को भरने में लगे हैं।’ यहां पांच साला योजना की जो चर्चा है वह पूरी तरह से इकोनामी पॉलिसी के तहत है। इतने घोटाले जो दो वर्ष पहले हमें देखने को मिले हैं ये अचानक नहीं हुए हैं। इसकी एक अनवरत श्रृंखला है जो नेहरूवियन पीरियड से हमें देखने को मिलती है। जो संसद में फिरोज गांधी के सवालों से लेकर के आज तक चली आई है। ‘लेकिन मैं उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर सकता!’ यह नेहरू बोलते हैं। नेहरू के समय की समस्त पॉलिसियों पर यह कहानी एक तरह से पुनर्विचार करने के लिए हमें आमंत्रित करती हैं। ‘उसने (नेहरू ने) अंत में कहा- देश को अब केवल आपका ही सहारा है।’ पूरा देश आज लुम्पेन से भरा हुआ है। शायद ही कोई ऐसी पार्टी हो जिसमें लुम्पेन नहीं हों। विचित्र स्थिति है। लुम्पेन कैपिटल जिस तरह से प्रवाहित हो रही है उसमें सब कुछ लुम्पेन हो गया है। सब कुछ उनके हाथ में है। तो क्या इण्डियन डेमोक्रेसी लुम्पेन डेमोक्रेसी है! अनेक सवाल हैं। जो इस कहानी को पढ़ते हुए स्वतंत्र भारत पर गंभीरतापूर्वक विचार करने को हमें आमंत्रित करते हैं। ‘मैं सिद्धांतों का आदमी हूं। नेहरू को ट्रंक काल करके आ रहा हूं।’ सिद्धांत गायब हो गए। नेहरू का जो भी समाजवादी सिद्धांत था वह 37-38 के बाद ही कमजोर होने लगा था और 40 के बाद एक तरह से समाप्त होने लगा था क्योंकि सिद्धांत जितना महत्त्वपूर्ण होता है उससे कहीं ज्यादा महत्त्वपूर्ण होता है- आचरण और व्यवहार। जब सिद्धांत हमारे आचरण में ढलता नहीं, सांसें नहीं लेता तब वह सिद्धांत किताबों में पूरी तरह से सोया हुआ रहता है। यह हमारे कर्म होते हैं जिनसे वह सिद्धांत जीवित होता है। इसलिए यहां पर एक सैद्धांतिक प्रश्न की ओर भी संकेत है. लुम्पेन कह रहा है, ‘मैं सिद्धांतों का आदमी हूं…देश की प्राइम मिस्टरी मुझे मंजूर नहीं। मेरे सामने तो बहुत बड़े-बड़े सवाल हैं। सबसे पहले तो मुझे विश्वशांति कायम करनी है।’ क्या यह कहानी शांति के पक्ष में है। ‘दोनों दांत खोल कर हंसने लगे।’ यहां क्रियाएं देखिए! गति देखिए! दोनों की चाल देखिए! कहानी  की भाषा में एक-एक वाक्य, उनके शब्द विन्यास को पकड़ने की भी यदि हम कोशिश करें (तब इस कहानी को हम सही ढंग से समझ सकते हैं)। ‘अमेरिका के प्रेसीडेंट कैनेडी का एक तार मिला था।’ क्यों अमेरिका के प्रेसिडेंट की चर्चा है इसमें। दूसरे किसी देश के प्रेसिडेंट की चर्चा क्यों नहीं है। यह ऊपरी तौर पर सभी जानते हैं कि नेहरू के समय में भारतवर्ष का जो फॉरेन रिलेशन था, ये कहानी उस फारेन रिलेशन पर हमें थोड़ा सोचने को मजबूर करती है। वह (भारत) सोवियत रूस के साथ था लेकिन अमरीका के साथ भी चीजें चल रही थी। 47-48 लेकर 62-64 तक और उसके बाद तक देखें कि सारी चीजें आरम्भ हो चुकी थीं। कहानी तत्कालीन अमेरिका-रूस संबंधों को लेकर कोल्डवार की भी चर्चा करती है। इन्हीं वजहों से यह कहानी बहुत व्यापक फलक लिए हुए है। साठ के दशक के उत्तरी कहानीकारों की जो चर्चा होती है; नयी कहानी के दौर के सारे कहानीकारों को आप सामने रख लें, उनकी कहानियों को देखें मुझे नहीं लगता कि इतने व्यापक विश्वफलक को लेकर के कहीं चर्चा हुई हो। यह तो हमको खोलना है कहानीकार तो डिटेल्स में जाएगा नहीं। उपन्यासकार डिटेल्स में जा सकता है, कहानीकार नहीं जा सकता। सांवला कहता है, ‘उसने (कैनेडी ने) लिखा है…आप आ जाएंगे तो अमेरिका निश्चित रूप से रूस को युद्ध में हरा देगा।… मैंने भी क़ुबूल कर दिया है कि मैं राष्ट्रीय विचारों का युवक हूं और इस घोर संकट के समय किसी भी हालत में अपने देश को छोड़कर किसी दूसरी जगह नहीं जा सकता!’ आज अपने देश को छोड़ करके हमारी औलादें, हमारी संताने किस प्रकार से चली गई हैं इसे हम देख सकते हैं। अमरकांत यह पहचान रहे थे और  आने वाले समय की भी पहचान इस कहानी में मौजूद है। पात्रों का जो पहनावा है वह, इनकी जो चाल-ढाल है वह, जूते हैं वह, इनके कमीज के ऊपर के खुले हुए जो दो बटन हैं वह, वहां से निकली हुई जो छातियां हैं वह- इस सारे दृश्य को देंखें…एक वाक्य देखिए, ‘उनकी आंखें सिकुड़ गईं, होठों में दृढ़ता आ गई और गर्दन तन गई।…फिर दोनों ने एक-एक सिगरेट सुलगाई और अंत में शंटिंग करने वाले रेल के इंजिन की तरह लापरवाही से धुंआ छोड़ते हुए वहां से चलते बने।’ ये छात्राओं की ओर घूरते हैं। इनसे किसी नैतिकता की उम्मीद नहीं की जा सकती। अब कुछ अनैतिक हो चुका है। स्वतंत्र भारत एक बड़े अर्थ में अनैतिक भारत बन रहा है। कहानीकार की चिंता यही है। गोरा एक लड़की के बारे में कहता है, ‘उस लौंडिया को पहचान रहे हो?’ और जो प्रोफेसर दीक्षित है उसने अपने छात्रों से किताबें लिखवाई हैं और अपने नाम से छपवायी हैं। इस कहानी को लेकर अलग से अगर एक विश्वविद्यालयी शिक्षा का पाठ किया जाए तो यह हम समझते हैं कि आज के समय में यह ज्यादा जरूरी होगा। ‘वह मामूली स्टूडेंट थी, लेकिन मैंने ही उसको टॉप कराया।’ यह कौन कह रहा है? यह प्रोफेसर दीक्षित कहानी के गोरे पात्र से कह रहा है। किससे कह रहा है किस चरित्र से कह रहा है यह यहां विचारणीय है। प्रोफेसर दीक्षित के संपर्क में कोई बुद्धिजीवी नहीं है और प्रोफ़ेसर दीक्षित का केवल यह उद्देश्य है कि वह चंद्रा जो है वह हमारी होनी चाहिए। ‘मैंने उससे कई बार कहा कि तुमको दो वर्ष में ही डॉक्टरेट दिला दूंगा।’ हिंदुस्तान की किसी भी यूनीवर्सिटी की पी.एच.डी. थीसिस लिख कर मिलने वाली डॉक्टरेट पर हम इससे विचार कर सकते हैं। प्रो. दीक्षित कहता है, ‘मैंने हर दर्जे के लिए पाठ्य-पुस्तकें और कुंजियां लिखकर जो लाखों रूपये कमाएं हैं, उनको चंद्रा के चरणों पर न्योछावर करने को तैयार हूं।’  और इसी क्रम में गोरा प्रोफ़ेसर से डरने के सवाल पर कहता है कि ‘सारा देश जिसकी पूजा करता है वह उस पिद्दी से डरेगा।’ सोचिए जरा, लुम्पेन की पूजा कर रहा है सारा देश। गोरा प्रोफ़ेसर से कहता है, ‘तुमने अनगिनत लड़कियों की जिन्दगी इसी तरह चौपट की है…मुझे बाध्य होकर देश की शिक्षा पद्धति में आमूल परिवर्तन करना पड़ेगा। अब आप देखिए कोठारी कमीशन कब आया। इस कहानी के बाद ही या शायद इसी कहानी के आस-पास कोठारी कमीशन आया था। कोठारी कमीशन ने जो प्रस्ताव रखा था या जो चीजें सामने रखी थी उस पर कितना विचार हुआ। (भारतीय शिक्षा आयोग या कोठारी आयोग का गठन 14 जुलाई,1964 में हुआ था. इसमें विश्वविद्यालयी स्वायत्तता पर बल दिया गया था और शिक्षा को सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक परिवर्तनों के लिए शक्तिशाली माध्यम के रूप में विकसित करने की अनुशंसा की गई थी।) इस तरह की बहुत बाते हैं इस कहानी में। शिक्षा पद्धति में आमूल परिवर्तन की बात लुम्पेन बोल रहा है। उसकी बात ऐसी है जो हंसी में उड़ा दी जा सकती है। लेकिन उसकी बात हंसी में उड़ाने के लिए नहीं है। गम्भीरतापूर्वक सोचने के लिए है और कहानीकार ने एक ऐसी भाषा का चयन किया है जिसमें लोगों को थोड़ा आनंद महसूस हो और उसके भीतर जो गंभीर चीजें मौजूद हैं वे भी स्पष्ट होती चलें। सत्य और अहिंसा, जिसकी बात इस देश में आज भी की जाती है, उसी जमाने में अमरकांत ने सामने रखा था- ‘मैं सत्य और अहिंसा के देश का रहने वाला हूं और मेरे सेवाएं सदा निःस्वार्थ होती हैं।’ झूठ, हिंदुस्तान में जितना भी झूठ चल रहा है। जितनी मक्कारी चल रही है और जितनी अधिक हिंसा चल रही है प्रत्येक स्तर पर राज्य के स्तर से लेकर अनेक स्तरों पर आज हम उसे देखें और यही आज का समय है। आज का समय कल के समय से विच्छिन्न नहीं है। आज का समय कल के समय का एक अगला चरण है। यह अगला चरण है, इसे विकसित चरण नहीं कहेंगे। यह जिस रूप में चल रहा था वही आज भी है और सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि एक नवऔपनिवेशिक देश में जो तमाम परतंत्रताओं घिरा हुआ है। जिसमें लूट धोखाधड़ी, झूठ, दंगा-फसाद सारी चीजें चल रही हैं उस नवऔपनिवेशिक देश में कथाकार की और उपन्यासकार की भूमिका क्या होती है- यह इस कहानी को देखा कर पता चलता है. हत्यारे कहानी में बाजार की चर्चा है, ‘उन्होंने बाजार के दो और चक्कर लगाए।…सभी दुकानें रंग-बिरंगी रोशनियों से जगमगा कर रहस्यमय स्वप्नलोक की तरह प्रतीत हो रही थीं।’ बाजार का यथार्थ से ही कोई सम्बन्ध नहीं है। इस कहानी में देश के चहुँमुखी विकास और विश्वशांति की स्थापना की भी बात है। कहानी का एक पात्र कहता है, ‘तुमको होम मिनिस्टर बना देंगे।’ किसी को कैसे मिनिस्टर बनाया जाता है यह उस पर टिप्पणी है। काबिलियत से कोई मिनिस्टर नहीं बनता। हिंदुस्तान में एक से एक शिक्षाविद् मौजूद हैं लेकिन शिक्षा मंत्रालय चाहे वह प्रांतीय सरकार का हो या केंद्र की सरकार का हो आप  वहां किसको देखेंगे। कहानी के अंत में दोनों पात्र एक कमजोर तबके की औरत के पास पहुँचते हैं। वहां उसका भोग करते हैं। उसे पैसा नहीं देते और वहां से भाग जाते हैं यह कहते हुए कि ‘आर्थिक और सामाजिक क्रांति करने का समय आ गया है।’ यह औरत कौन है! आपको यह इंडीविजुअल लग सकती है। पर हमें यह इंडीविजुअल नहीं लगती है। जैसे हमें बुधिया एक ‘इंडीविजुअल कैरेक्टर’ नहीं लगती कफन कहानी में। जिस तरह हमें गोदान की धनिया भी एक ‘इंडीविजुअल कैरेक्टर’ नहीं लगती है। यह सुन कर हो सकता है कि आप नाखुश हों कि इनमें (बुधिया और धनिया जैसे चरित्रों में) भारत माता की झलक मिलती है जब ये चरित्र पूरी तरह से एक देश की बहुत बड़ी जनसंख्या के एक सिंबल के रूप में उपस्थित होते हैं। जिसे कि आप भोग रहे हैं। यह भोगवाद आज बहुत विकृत रूप में बढ़ गया है। यहां केवल एक स्त्री नहीं है। इसका स्त्री पाठ नहीं किया जा सकता। इस स्त्री का एक सामाजिक पाठ (ही) किया जा सकता है। ये जो भोगने की आदत है, संस्कार है जो लुम्पेन में थी वह आज कहीं पढ़े-लिखों में भी है. कहानी में दोनों लुम्पेन युवकों का पीछा करने वालों में से एक फुर्तीबाज व्यक्ति तीर की तरह आता है और उसे चाकू मार दिया गया। उन दो लुम्पेन पात्रों को रोका नहीं जा सका। भारतवर्ष में लुम्पेन को रोका नहीं गया है। किसी सरकार ने लुम्पेन को नहीं रोका है। सबने समान रूप से बढ़ावा दिया है। उसे रोकने वाली जो शक्ति है, घायल होती है। उसे चाकू मार दिया जाता है। उसकी हत्या कर दी जाती है। तो ये कथा-कौशल है। कहानी-कला है जिसमें इतनी बारीकी के साथ, इतनी सघनता के साथ और इतनी कलात्मकता के साथ अमरकांत हमारे समक्ष अनेक अर्थ-छवियों को रखते हुए हमारे समक्ष प्रस्तुत करते हैं। यह उनकी कहानी-कला का विरल उन्मेष है। क्या कारण है कि हिंदी के कहानी आलोचक आज भी ‘दोपहर का भोजन’, ‘डिप्टी कलेक्टरी’ और ‘जिन्दगी और जोंक’ इस तरह की कहानी की चर्चा करते हैं और ‘हत्यारे’ की चर्चा नहीं करते; क्योंकि यहां एक पूरा सिस्टम है और हम सिस्टम पर निशाना नहीं लगाना चाहते। हम सिस्टम पर कुछ बोलना नहीं चाहते। क्योंकि हम सिस्टम पर बोलेंगे तो जाहिर है कि सिस्टम हमको तिरछी निगाह से देखेगा। अमरकांत इस सिस्टम को उस समय सही-सही देखने की कोशिश ही नहीं करते हैं, हमें भी बताते हैं और यह मास्टर स्टोरी राइटर का कमाल हुआ करता है कि उसके पात्र अगर संघर्षशील नहीं बताए जाते तो भी वह उन स्थितियों को, घटनाओं को, चरित्रों को कैसे अपने पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर देता है और पाठकों के मानस को स्वयं स्वतंत्र निर्णय लेने के लिए बाध्य कर देता है। विवश कर देता है क्योंकि हम यदि कहेंगे कि संघर्ष करो तो इस कहने मात्र से स्थितियां ठीक नहीं हो जाएंगी। एक रचनाकार ही दूसरे के मानस को रचनाशील बना देता है और तब ये सारी चीजें एक जगह इकट्ठा करके अमरकांत हमें सोचने विचारने का मौका देते हैं। अगर उन्होंने मौका नहीं दिया होता तो 2013 में ये कहानी चर्चा में क्यों आती।

(जन संस्कृति मंच के कथा समूह के प्रथम आयोजन ‘कथा मंच’ के तृतीय सत्र में आलोचक रविभूषण द्वारा ‘अमरकांत की कहानी हत्यारे और आज का समय तथा पूरन हार्डी की कहानी बुड़ान’ पर इलाहाबाद में दिनांक 22 दिसंबर, 2013 को दिया गया अध्यक्षीय वक्तव्य। लिप्यावतरण- श्रीकांत पाण्डेय।)

अमरकांत की कहानी ‘हत्यारे’ और आज का समय: मार्तण्ड प्रगल्भ

 बात तो करनी है ‘अमरकांत की कहानी ‘हत्यारे’ और आज का समय’ पर और इसी कहानी पर विचार करके मैं आया था। लेकिन कल की कुछ चर्चाएं जो खासतौर से यथार्थवाद के सम्बन्ध में या सत्य के सम्बन्ध में या यथार्थ और रचना के सम्बन्ध में हुई थीं उनके बारे में भी मैं इस कहानी के संदर्भ से कुछ सोच रहा था. जिसे मैं आगे स्पष्ट करूँगा. चर्चा का प्रस्तुत विषय गंभीर तो है ही मनोरंजक भी है। गंभीर क्यूं है इस पर थोड़ा बाद में चर्चा की जाएगी। पहले, मनोरंजक क्यूं है इसकी थोड़ी चर्चा कर ली जाए। आज का जो विषय है, इस विषय के साथ दिक्कत यह है कि आप जहां चाहे इस विषय को फिट कर सकते हैं। समाजशास्त्र का कोई सेमिनार हो, (तो) उसमें भी यह विषय आ जाएगा। दरअसल हुआ क्या है कि आलोचना की जो समाजशास्त्रीय पद्धति है उसने विषयों का टोटा खत्म कर दिया है और इस तरह के शीर्षक की आवाजाही बेरोकटोक चलती रहती है। जैसे, बहुत सारे शोधार्थी इसी तरह के शोध विषय चुन लेते हैं; कोई रचना ले ली और उसमें आज का समय या रचना का समय जोड़ दिया और पूरा एक शोध प्रबंध तैयार हो गया! इसके चलते, इस तरह के विषयों की पुनरावृत्ति बढ़ी है जिससे विषय की गंभीरता एक यांत्रिक पुनरुत्पादन में नष्ट हो जाती है और कई बार हम चीजों को ठेठ समाजशास्त्रीय व्याख्या तक सीमित कर लेते हैं। मानो किसी समय का जो अर्थशास्त्र है उसके बारे में जान लेना (ही विषय को समझने के लिए पर्याप्त) है , कि नेहरू युग के अवसान के समय क्या स्थितियां थीं उसकी थोड़ी चर्चा कर ली जाए और (रचना तथा उन स्थितियों) दोनों में ऐतिहासिक सम्बन्ध जोड़ लिया जाए और इस प्रकार आज के समय में हत्यारे कहानी की सार्थकता सिद्ध हो जाती है। इस पद्धति के चलते जो गंभीर और सारगर्भित सवाल हैं वो ढंक दिए जाते हैं।  # लेखक 

अमरकांत

अमरकांत

रचना और आलोचना के प्रश्न जीवन के प्रश्न होंगे कि नहीं!

By मार्तण्ड प्रगल्भ

हर सचेत और क्रियावान मनुष्य अपने समय की जटिलता को समझना चाहता है। उस समय को समझना चाहता है जिससे उसके अंग-प्रत्यंग-अनुषंग परिस्थिति विशेष में निर्मित हो रहे हैं। मनुष्य के वर्तमान की वर्तमानता (प्रजेन्स ऑफ प्रजेन्ट) क्या है? इस प्रश्न को लेकर वह कई जगह भटकता फिरता है. और ऐसे ही संकट के समय कोई कहानी या कविता या कोई अन्य कलारूप अपने भीतर के अदम्य आकर्षण से उसे अपनी ओर खींच लेते हैं। महान रचनाएं वक्त-बेवक्त ऐसा ही अदम्य आकर्षण पैदा करती हैं। तो सवाल यह है कि ‘हत्यारे’ कहानी का हम कथा आलोचकों-कथाकारों की सभा में क्या महत्त्व है। या हम सरीखों के लिए ‘हत्यारे’ की उपयोगिता क्या है? क्षमा करेंगे, यहां उपयोगिता किसी उपयोगवाद के अर्थ में नहीं है बल्कि मार्क्स जिसे उपयोग-मूल्य कहते हैं उसके अर्थ में है। दरअसल यह कहानी-कला और कथा आलोचना दोनों के लिए गंभीर सवाल है।

कल की चर्चा में समकालीनता और आज के समय के बारे में हमारे समय के महत्त्वपूर्ण आलोचक (रविभूषण) अपनी बात रखते हुए कल कह रहे थे कि 1944 से हमें अपना समय मानना चाहिए। उस साल एक किताब आयी थी- रोड टू सर्फडम; वहां से एक नए ऐतिहासिक युग ‘बाजारवाद की केंद्रीयता’ की शुरुआत होती है और उसको एक विभाजक रेखा माननी चाहिए। चूंकि वे अध्यक्ष हैं, इसलिए मैं क्षमा मांगते हुए कहना चाहता हूं कि यह काल निर्धारण की हेगेलियन पद्धति है, जहां विचार की प्रमुखता से इतिहास का मूल्यांकन किया जाता है। अब 1944 में किताब आयी और वहां से नए समय की शुरुआत हो तब तो उदारतावाद की शुरुआत लास्की आदि से ही हो जाएगी। अगर इतिहास विचारों की क्रमबद्धता, गत्यात्मकता और द्वन्द्वात्मकता में निहित है तो यह हेगेलियन पद्धति है। 44 में शेखर एक जीवनी का दूसरा खण्ड आता है। प्रयोगवाद, तारसप्तक ऐसी बहुत सारी चर्चाएं शुरु होती हैं। उनमें से किसको अपने समय का आधार बनाया जाए यह एक प्रश्न है। दूसरा प्रश्न, क्या अर्थशास्त्र के अनुशासन से चलकर साहित्य के लिए काल निर्धारण सम्भव है? अगर अर्थशास्त्र से इतिहास में परिवर्तन के चरणों को समझना है तो प्रभात पटनायक इसके लिए ज्यादा मुफीद होंगे। साहित्य के आलोचक के लिए ये प्रश्न महत्त्वपूर्ण क्यों हैं और फिर इतिहास निर्माण की जो वास्तविक शक्तियां हैं, जिनके प्रति हम अपनी प्रतिबद्धता भी व्यक्त करते हैं, वे इतिहास के निर्धारक बिंदु होंगे या कोई शिकागो स्कूल निर्धारक बिंदु होगा! कहने का तात्पर्य यह कि जैसे हमारा नया समय हमारी परिस्थितियों के अनुरूप भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन का भी एक नया समय था और वह नक्सलबाड़ी के आंदोलन से शुरु होता है तो इसे भी कोई कह सकता है कि यह हमारा अपना समय है। दृष्टि भेद का अंतर है। बहरहाल, सवाल है- आज का समय से मतलब क्या है? क्या आज की कहानी और कथा आलोचना का समय आज का समय है! और यदि यह सवाल है तो सवाल फिर रचना-प्रक्रिया का होगा अर्थात् प्रश्न आज के कलाकार की रचना-प्रक्रिया का है। यहां रचना-प्रक्रिया से तात्पर्य आज की कहानी की रचना-प्रक्रिया से है। सीधे शब्दों में कहें तो हत्यारे की रचना-प्रक्रिया हम सरीखों के लिए क्यों महत्त्वपूर्ण है। कहानीकार की तरफ से भी, पाठक की तरफ से भी और (ध्यातव्य है कि) आलोचक भी सबसे पहले एक पाठक ही होता है। इस रचना-प्रक्रिया को प्रारम्भिक रूप से आलोचक पाठक की ही हैसियत से समझेगा. कथाकार की तरफ से यह प्रक्रिया थोड़ी भिन्न होगी। इस भिन्नता की प्राथमिक पहचान कथाकार को होगी। लेकिन शीघ्र ही आलोचक पाठक की हैसियत से तटस्थ होगा और कथाकार लेखक की हैसियत से। यह तटस्थता कथाकार और आलोचक दोनों को कहानी के एक वस्तुनिष्ठ आकलन और मूल्यांकन की ओर प्रेरित करेगा। आकलन और मूल्यांकन के इसी क्रम में हत्यारे कहानी और आज के समय के जटिल अंतरसंबंधों की पहचान हम लोग शायद कर पाएं।

बहरहाल, कहानी पाठ की जो सबसे आम पद्धति है- वह समाजशास्त्रीय पद्धति है। जिसमें आप रचना से समाज, समाज से रचना में बराबर आवाजाही करते हैं और यह अच्छी बात भी है। कहानी के ‘आडियन्स’ की भिन्नता से इस तरह की समझ को विकसित करने का और इस समझ के चलते आडियन्स को, पाठक को विकसित करने की प्रक्रिया चलनी चाहिए। जैसे, सन् ’62 में अमरकांत की कहानी ‘हत्यारे’ आती है। यह नेहरू युग के अवसान और उसके मोह भंग का संधिकाल है और अगर हम ध्यान दें तो यह नई कहानी और अकहानी के संधिकाल की भी कहानी है और इस लिहाज खुद यह कहानी अमरकांत की कहानी यात्रा में एक ‘ब्रेक’ की तरह है। दो नायक हैं या खलनायक हैं। खलनायकत्व नायकत्व प्राप्त कर रहा है। दोनों नायकों को यदि गौर से देखें तो एक गोरा है, ऊंचा है। दूसरा सांवला है, ठिगना है। दोनों एक ही तरह की वेशभूषा में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के आस-पास किसी बाजार में टहल रहे होते हैं और उनकी बातचीत जब शुरु होती है तो ठेठ लहज़े में, ‘हलो, सन!..इतना लेट क्यों, बेटे?’ इस तरह की एक बातचीत शुरू होती है। हमारे विमर्शों का जो दबाव है उसकी तरफ से अगर हम इस कहानी में एक संभावना की बात करें तो जो सांवला है वह भिन्न वर्ग का है, कहानी की संभावना है क्योंकि कहानी में कहीं-कहीं स्टेटमेंट्स (बयान) भी ऐसे आते हैं कि ‘तुमको सेक्रेटेरियट का भंगी बनाऊंगा!’ गोरा गुरु है। सांवला चेला है। गुरु उसको शिक्षित करता है। ठीक उसी प्रक्रिया में जैसे घीसू माधव को शिक्षित करता है. हत्यारे कहानी में जब गिलास में दोनों शराब बांटते हैं तो सांवला चुपके से अपनी शराब गोरे के गिलास में डाल देता है। (इस पर गोरा कहता है) ‘लेकिन जब तुम इतनी पी नहीं सकते तो अवसर आने पर घूस कैसे लोगे. जालसाजी कैसे करोगे, झूठ कैसे बोलोगे? फिर देश की सेवा क्या करोगे, खाक!’ सांवला अभी सीख रहा है। औरत के पास जाना अभी तक सीखा नहीं है. और फिर गोरा कहता है, ‘आज तो कुछ रचनात्मक कार्य होना चाहिए!’ तो रचनात्मक लीडरशिप क्या है? रिक्शा मजदूरों की बस्ती की तरफ चलता है। बस्ती के शुरु में ही पान की छोटी सी दुकान है। जिस पर पान-सिगरेट तो मिलती ही है रोजमर्रा की और सारी चीजें भी मिलती हैं, और वे दोनों मजदूरों की बस्ती आरम्भ होते ही जो पहली झोपड़ी है उसमें  घुस जाते हैं। एक महिला चूल्हे पर खाना बना रही होती है। उसके देखते ही गोरा मुस्कुराकर बोला, ‘ये विश्व लोफर संघ के अध्यक्ष हैं। इनको हर तरह से तुम्हें खुश करना है.’ दोनों औरत के साथ सम्बन्ध बनाते हैं। पैसा नहीं देते हैं और जब औरत कहती है, ‘लाइए मैं (पैसे का खुदरा करवा कर) ले आती हूं.’ तो गोरा बोलता है, ‘तुम तो पूंजीपति हो! तुमको किस बात की कमी है।…अरे, तुम देश की महान कार्यकत्री हो, तुम कहाँ कष्ट करोगी?’ और आगे बढ़ता है कहता है, ‘साले जूते निकालकर हाथ में लेलो! सांवला बोला ‘क्यों?’…(गोरा कहता है) ‘भाग साले! आर्थिक और सामाजिक क्रांति करने का समय आ गया है!’ दोनों भागना शुरु करते हैं। औरत बाहर निकल कर कहती है- ‘अरे, लूट लिया हरामी के बच्चों ने!’ मजदूरों की बस्ती से कुछ लोग उसके पीछे दौड़ पड़ते हैं। दोनों अरबी घोड़े की तरह सरपट भागे जा रहे हैं। कभी बाएं घूम जाते हैं। कभी दाएं घूम जाते हैं। इतने में मजदूरों का एक लड़का फुर्ती से सांवले की तरफ तीर की तरह बढ़ता चला जाता है और लगता है उसको पकड़ ही लेगा। ऐसे में गुरु गोरा रुक जाता है। जेब से चाकू निकालकर खोल लेता है और पीछा करते हुए आ रहे मजदूर के पेट में घोंप देता है और फिर भाग जाता है। कोलतारी सड़क पर आगे की स्ट्रीट लाइट में दोनों के सुंदर और पुष्ट शरीर पर पसीने की बूंदें छरछरा रही हैं; यह युद्ध का सिम्बल है ‘सिम्बलाइजेशन ऑफ पॉवर’ है, और वे फिर न जाने कहां अंधेरे में गुम हो जाते हैं. यह पूरी कहानी है। ध्यान दें कि जो नेहरूवियन आदर्शवाद है उसकी खोल के भीतर से जो फासिज्म पैदा हो रहा है यूथ के बीच में, वह उसी आदर्श की भाषा में ही पैदा हो रहा है. फासिज्म के साथ दिक्कत यही है, उसको आना तो हमारी ही भाषा में पड़ेगा। सामाजिक, आर्थिक क्रांति की भाषा में, लेकिन वो रूपवाद है। उसका यथार्थ फासिज्म है। आदर्श के उस रूपवाद का यथार्थ फासीवाद है और इसी फासीवादी टेन्डेन्सी की कहानी ‘हत्यारे’ है। और यह फासीवादी टेन्डेन्सी यूथ में व्याप्त हो रही है, जबकि हमारा देश सबसे नौजवान है, मोदी युवाओं को लेकर बड़े प्रसन्नचित हैं; एक युवा देश के भीतर, खुद युवा वर्ग के भीतर तरह-तरह के विभाजन हैं। इसको अगर ध्यान में न रखा जाएगा तो दिक्कत की बात होगी और अमरकांत की खासियत यही है। उनकी चिंता हमेशा ही परिवर्तनकारी शक्तियों के पहचान में आने वाले संकट को कहानी में रखने की है। बहरहाल, चूंकि मजदूरों की बस्ती में जा करके वह हत्या करता है। इसलिए वहां जा कर कहानी एलीगरी में बदलती है और यह मूल्य-निर्णय शामिल होता है कि फासीवादी चरित्र हमेशा ही वर्किंग क्लास (मजदूर वर्ग) के विरोध में होगा।

 बहरहाल, ये तो कहानी का एक सिंपल पाठ है। लेकिन क्या इसीलिए हत्यारे कहानी हमारे लिए महत्त्वपूर्ण है। फासीवाद के इस नए दौर के चरित्र के बारे में, उपभोक्ता समाज के बनने की प्रक्रिया के बारे में, बहुत सारी बातें इस कहानी को पढ़े बिना ही हम समझ भी रहे थे। क्या जरूरत थी कि इसको पढ़ा जाए! एक सचेत बुद्धिजीवी, एक एक्टीविस्ट जो सचमुच में परिवर्तन लाना चाहता है। जो परिवर्तन चाहता है। यथार्थ में परिवर्तन की गति को पहचानना चाहता है। उनके लिए केवल  कहानी का सामान्य पाठ ही होगा तो यह महत्त्वपूर्ण नहीं होगा।

यहाँ मैं संक्षेप में हिंदी के चार आलोचकों की चर्चा करना चाहूंगा, जिन्होंने ‘हत्यारे’ कहानी के बारे में लिखा है या अमरकांत के बारे में लिखा है। विश्वनाथ त्रिपाठी समाजशास्त्रीय, राजनीति के अपराधीकरण से लेकर अपराध के राजनीतीकरण और स्टूडेन्ट पॉलिटिक्स की वह पूरी प्रक्रिया जो जेपी मूवमेंट के भीतर से निकली है उसके ‘रिप्रजेन्टेशन’ के बतौर हत्यारे कहानी की अच्छी व्याख्या करते हैं। लेकिन वह एक सवाल उठाते हैं कि अमरकांत के पात्र कहीं भी संघर्ष क्यों नहीं करते हैं? अगर समाज में संघर्ष है तो अमरकांत के पात्र संघर्ष करते हुए क्यों नहीं दिखते। अजीब बात यह है कि ठीक यही आलोचना राजेन्द्र यादव भी अमरकांत के बारे में करते हैं कि अमरकांत की कहानी का कोई भी पात्र संघर्ष नहीं करता है। वहां आस्तित्व की समस्या महत्त्वपूर्ण है, आस्था का प्रश्न महत्त्वपूर्ण नहीं है। लेखकीय आस्था एक ओढ़ी हुई चीज है. मनुष्य के अस्तित्व की लड़ाई ज्यादा महत्त्वपूर्ण है और इसलिए अमरकांत अस्तित्ववादी कथाकार हैं। अब विश्वनाथ त्रिपाठी तो यह नहीं कहेंगे कि वे अस्तित्ववादी कथाकार हैं लेकिन हाँ, यह कहेंगे कि संघर्ष करता हुआ पात्र नहीं दिखता है। संघर्ष करते हुए पात्रों को दिखाना चाहिए। समाजवादी यथार्थवादी की जो अपेक्षा है वह अमरकांत के ऊपर विश्वनाथ त्रिपाठी की तरफ से (लागू की जाती है) और राजेन्द्र यादव हत्यारे को अस्तित्ववाद की कहानी मान लेते हैं। ‘हत्यारे’ नाम से सार्त्र की भी एक कहानी है और अगर समय हो तो संक्षेप में सार्त्र की ‘हत्यारे’ कहानी के अस्तित्ववाद का अमरकांत से क्या अंतर है इसे मैं देखना चाहूंगा और वह अंतर अपने अंतिम रूप में किसका अंतर होगा। बहरहाल, द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद का समय है। ब्रिटेन की एक कोर्ट में एक ऐसे केस की सुनवाई होनी है, जिसका जीतना तय है और वह बात यह है कि एक टी.बी. का डाक्टर है। एक दिन उसके पास बहुत अमीर आदमी आता है। लेकिन वह टी.बी. से बुरी तरह ग्रस्त है। बहुत बूढ़ा हो गया है। चल-फिर नहीं पा रहा है। दोनों फेफड़े उसके खराब हो चुके हैं और वह डाक्टर के पास बैठता है। डॉक्टर कहता है अब कोई उपाय नहीं है। तो मरीज बहुत विनती करता है। डॉक्टर कहता है, लगता है बड़े पैसे वाले हो। मरीज स्वीकार करता है तो डाक्टर उसे सलाह देता है कि तुम आज से कुछ खाओ-पीओ मत और अब सिर्फ पानी का सेवन करो और दूर कहीं चले जाओ। छः महीने गुजर जाते हैं। एक दिन अचानक वह आदमी हट्टा-कट्टा, सूटेड-बूटेड डॉक्टर के क्लीनिक में प्रवेश करता है। डॉक्टर पहचान नहीं पाता है। तब मरीज पूरी बात डॉक्टर को फिर से बताता है और डॉक्टर को बहुत सारा पैसा देने की बात कहता है। डॉक्टर चिंतित हो जाता है। वह मेज की दराज में रिवाल्वर निकाल कर अमीर आदमी को गोली मार देता है और उसका फेफड़ा निकाल कर टेबल रख कर पर निरीक्षण करने लगता है और कहता है कि इससे मनुष्य का विज्ञान पर से विश्वास ही उठ जाएगा। इसलिए मनुष्य समाज के कल्याण में उसकी हत्या कर देनी पड़ी और यह केस कोर्ट में गया है और लोग मान रहे हैं कि डॉक्टर जीत जाएगा। यह अस्तित्ववाद की कहानी है। अस्तित्व की समस्या का जो दर्शन फैलाया गया, इतिहास मुक्त व्यक्ति के स्वतंत्र अस्तित्व का प्रश्न, वह सार्त्र की कहानी में है। अमरकांत की कहानी में वह नहीं है।

यहां अमरकांत की कहानी के संदर्भ में संक्षेप में सुरेंद्र चौधरी और नामवर सिंह के पाठों के अंतर के बारे में एक बात करना चाहूंगा। सुरेंद्र चौधरी ने कहा कि हत्यारे कहानी में हत्या नहीं हुई होती तो यह बहुत महत्त्वपूर्ण कहानी होती। क्यों? क्योंकि हत्या वहां अतिनाटकीयता का प्रयोग मात्र है. जिससे कहानी में एक मादक भंगिका तो पैदा हुई है लेकिन वह कुछ कहानी में नया नहीं जोड़ती है और यह अच्छा हुआ कि अमरकांत ने आगे ऐसा प्रयोग नहीं किया। उन्होंने कहा जो परिवर्तनकारी प्रक्रिया है उसमें जो प्रच्छन्न खतरे छुपे हुए हैं वह अमरकांत की कहानी में ज्यादा बेहतर आता अगर वह हत्या नहीं हुई होती। यानि एक नपुंसक, बड़बोली, ऐय्याश युवा पीढ़ी का ज्यादा सही चित्रण हुआ होता अगर ये हत्या नहीं हुई होती। नामवर सिंह ने कहा अगर इस कहानी में हत्या नहीं हुई होती तो यह कहानी इतनी महत्त्वपूर्ण नहीं होती। उन्होंने कहा कि कहानी में हत्यारे के द्वारा की गई हत्या कहानीकार का या रचना का मूल्य-निर्णय है। एक वैल्यू जजमेंट है। अगर रचना की प्रक्रिया में यह वैल्यू जजमेंट (मूल्य-निर्णय) नहीं है, यह मैं अपनी भाषा में बोल रहा हूं एक इंटरव्यू में नामवर सिंह ने चलते हुए यह बात कही थी, तो रचना जो फासिस्ट टेन्डेन्सी दिखाना चाह रही है, जो आज एक अजीब तरह की प्रवृत्ति पैदा हो रही है ,उसे दिखाया नहीं जा सकता. युवाओं के आदर्श का अतीत में स्वतंत्रता आंदोलन का एक पूरा दौर है. पर वह आदर्श दूसरे थे। यह आदर्श दूसरे हैं। इन आदर्शों के रेहटारिक में जो कंटेंट है उसके प्रति मूल्य-निर्णय कीजिएगा कि नहीं यह एक रचना-प्रक्रिया का सवाल है। सुरेंद्र चौधरी के लिए कहानी में हत्या कहानी को अतिनाटकीय बना देती है, दूसरी ओर नामवर सिंह के लिए महत्त्वपूर्ण। दो मार्क्सवादी ओलोचकों की दृष्टि में यह भेद क्यों है? क्या यह यथार्थवाद की दो भिन्न दृष्टियां हैं? क्या यथार्थवाद बीसवीं सदी के साथ गुजरी हुई बात हो गई है! इसका हम सरीखों के लिए क्या कोई महत्त्व नहीं है? यह हमारे लिए भिन्न चर्चा का बिंदु है। यहां मैं अभी तफ्सील नहीं करना चाहूंगा, वक्त कम है। परंतु हमारे समय के एक प्रमुख चिंतक फ्रेडरिक जेम्सन के लिए यह बीती बात नहीं है। इसी साल उनकी एक पूरी किताब यथार्थवाद पर आयी है। यह किताब यथार्थवाद के साथ एक प्रयोग के लिए आमंत्रित करती है और खुद यथार्थवाद के भीतर विकसित होती आयी विरोधी प्रविधियों के द्वन्द्वात्मक चिंतन को विकसित करने का प्रयास करती है। मैं अंग्रेजी में जेम्सन को थोड़ा पढ़ना चाहूंगा अगर आप चाहें तो.

बीसवीं सदीं के इतिहास की आंतरिकता को कैसे समझा जाए इसी क्रम में जेम्सन लिखते हैं, ‘My experiment here claims to come at realism dialectically, not only by taking as its object of study the very antinomies themselves into which every constitution of this or that realism seems to resolve: but above all by grasping realism as a historical and even evolutionary process in which the negative and the positive are inextricably combined, and whose emergence and development at one and the same time constitute its own inevitable undoing, its own decay and dissolution. The stronger it gets, the weaker it gets; winner loses; its success is its failure. And this is meant, not in the spirit of the life cycle (“ripeness is all”), or of evolution or of entropy or historical rises and falls: it is to be grasped as a paradox and an anomaly, and the thinking of it as a contradiction or an aporia. Yet as Derrida observed, the aporia is not so much “an absence of path, a paralysis before roadblocks” so much as the promise of “the thinking of the path.” For me, however, aporetic thinking is precisely the dialectic itself; and the following exercise will therefore be for better or for worse a dialectical experiment.’

(मेरा प्रयोग यथार्थवाद तक द्वंद्वात्मक तरीके से पहुँचने का है. यह प्रयोग यथार्थवाद के इस या उस विरोधाभासी युग्मों के अध्ययन तक ही अपने को सीमित नहीं करता है, वरन् यथार्थवाद को एक ऐतिहासिक और विकासमान प्रक्रिया के रूप में देखने का हिमायती है. इस प्रक्रिया में यथार्थवाद के नकारात्मक और सकारात्मक पक्ष साथ-साथ अंतर्गुम्फित रहते आये हैं। अपने उदय और विकास की इस प्रक्रिया में ही वह अपना क्षय और अपनी मृत्यु भी रचता चलता है। ज्यों-ज्यों वह मजबूत होता है त्यों-त्यों वह कमज़ोर होता चलता है। विजेता पराजित हो जाता है। इसकी जीत में ही इसकी हार शामिल है। जीवन-चक्र के अर्थ में नहीं, उद्विकास के अर्थ में नहीं, किसी एन्ट्रापी के अर्थ में नहीं न ही किसी ऐतिहासिक उत्थान पतन की दास्तान के अर्थ में. बल्कि एक विरोधाभास की तरह अंतर्विरोध के अर्थ में इसे सोचने का प्रयोग. एक द्वंद्वात्मक प्रयोग।)

इस विचारोत्तेजक प्रयोग में हम सब यदि शामिल हों तो हमारी कहानी आलोचना के लिए और शायद उनके लिए भी अच्छा होगा जो आज यथार्थवाद के पीछे डण्डा लिए दौड़ रहे हैं। जी, मेरा इशारा हिंदी कहानी के पिछले 25 सालों के विकास पर बात करने वाले आलोचना के कुछ नए राजकुमारों की तरफ भी है। बहरहाल, यह कहानी फिर कभी।

हत्यारे कहानी में जो मूल्य-निर्णय है वह हत्या की घटना में है। जरूरी नहीं कि हर कहानी में यह मूल्य-निर्णय आये ही। लेखकीय मूल्य-निर्णय कोई अनिवार्यता नहीं है। परंतु अपराध की इस मनोवृत्ति के बारे में, इस फासीवादी प्रवृत्ति के बारे में अगर कहानी के भीतर उसके मजदूर वर्ग का विरोधी होने का निर्णय नहीं होता तो यह कहानी इतनी मूल्यवान नहीं होती। वह पेटी बुर्जुआ की जो एक खास प्रवृत्ति है- नपुंसक, बड़बोली, ऐय्याश युवा पीढ़ी का चरित्र-चित्रण मात्र बन कर रह जाती। ऐसे चरित्रों के भावी विकास का, गहरे खलनायकत्व का उद्घाटन वहां नहीं हो पाता। यह पीड़ा भरी प्रतीक्षा के प्रतिक्रियावादी रूपांतरण की कहानी है। विद्रूप विडंबनाओं के नायक घीसू और माधव लुम्पेन सर्वहारा हैं और हत्यारे कहानी के नायक या खलनायक, यदि कहने की अनुमति दें, तो लुम्पेन पेटी बुर्जुआ हैं। कहानी के भीतर का यह मूल्य-निर्णय दरअसल रचना-प्रक्रिया का एक अहम हिस्सा है।

 हमारे आज के कथालोचक यह दावा कर रहे हैं कि जन-जीवन में जब कोई यूनिंगफाइंग फैक्टर नहीं है तो कहानी के भीतर वह कहां से होगा। किसी यूनिंगफाइंग फैक्टर के बिना कहानी की रचना-प्रक्रिया में कोई मूल्य-निर्णय तो आ ही नहीं सकता। फिर क्या किया जाए! यूनीफाइंग फैक्टर मतलब -विश्वदृष्टि या जीवन दृष्टि। लेकिन यथार्थ के असम्बद्ध होने की चर्चा पहली बार तो नहीं हो रही है। और हम अपने अनुभव से जानते हैं कि समाज के संक्रमण काल में हमेशा ही ऐसी बातें होती रही हैं। ऐसी बातों में हमारे समय के एक प्रमुख चरित्र की ईमानदार स्वीकारोक्ति भी होती है। याद करें कि आधुनिकतावाद की धारा के एक आदि नायक टी.एस. इलियट ‘डीसोसिएशन ऑफ सेंसबिलटी’ की चर्चा किया करते थे। पिछले 20-25 सालों के तीव्र परिवर्तन ने हमारी संवेदनाओं में एक असम्बद्धता तो पैदा की ही है। जैसे इलियट के समय में भी हुई थी। आज हम तेजी से उपभोक्तावादी समाज में बदलते जा रहे हैं। हमारी पिछली पीढ़ी के महान सिनेमाकार और राजनीतिक कार्यकर्ता पियरे पाउलो पासोलिनी ने फासीवाद के नए स्वरूप को उपभोक्तावाद में बदलते देखा था। देख लिया था, इसलिए उनकी हत्या कर दी गई. और फासीवाद के इस आसन्न संकट के काल में पुराने और नए के संधिकाल में हमारी भी चेतना आक्रांत है. इसलिए मानव विरोधी विचारधाराओं के द्वारा चेतना पर छायी इस धुंध को और अधिक मिस्टीफाई (रहस्यात्मक) करने का षडयंत्र रचा जा रहा है। खण्ड-खण्ड पाखण्ड की दृष्टि एक ऐसी ही मानव विरोधी विचारधारा है। ताज्जुब नहीं, इस विचारधारा का पहला हमला यथार्थवाद पर है। ऐसा क्यूं है कि मानव विरोधी विचारधाराओं का पहला हमला समय-समय पर यथार्थवाद के खिलाफ होता है! क्योंकि यथार्थवाद और चाहे जो हो उसके मूल में है मानव-विरोधी मिस्टीफिकेशन को, उसके धुंध को साफ कर देना। डी-मिस्टीफिकेशन यथार्थवाद की एक प्राथमिक शर्त है। जहां से बुर्जुआ सोसायटी के लिए अपने-आप यह शैली खतरनाक सिद्ध हुई है। बहरहाल, उसके अलग-अलग ट्रेडीशन हैं, अंग्रेजी ट्रेडीशन, फ्रेंच ट्रेडीशन खैर! लेकिन सीधे डी-मिस्टीफिकेशन एक महत्त्वपूर्ण काम है। मूल्य-निर्णय का सम्बन्ध क्या इस डी-मिस्टीफिकेशन से है? डी-मिस्टीफिकेशन की यह प्रक्रिया बदलाव की नई ताकतों के प्रति रचना-प्रक्रिया में मूल्यबोध की तरह आती है। लेखक की प्राथमिक संवेदना से लेकर पाठ की प्रक्रिया तक इसका निरंतर विकास होता है। ब्रेख्त के लिए रचना-प्रक्रिया के साथ चलने वाला यह डी-मिस्टीफिकेशन एक क्रियावान, उत्कंठापूर्ण और प्रयोगात्मक भी है. या दुसरे शब्दों में कहें तो सामाजिक संस्थाओं और भौतिक दुनिया के प्रति वैज्ञानिक दृष्टि का उन्मेष है। यथार्थवाद इसी वैज्ञानिक दृष्टि को प्रोत्साहित करता है, प्रयोग के स्तर पर भी। और यह प्रक्रिया त्रिस्तरीय है। पहली, रचना में पात्रों और उसकी काल्पनिक दुनिया के बीच। दूसरी, रचना और पाठक के बीच। तीसरी, रचना-रचनाकार का अपने कच्चे माल और टेक्निक के बीच। यथार्थवाद का यह त्रिआयामी व्यवहार (प्रैक्सिस) परंपरागत अनुकरणों और उनके शुद्ध प्रतिनिधिमूलक केटेगरी को ध्वस्त कर देता है. जिसके प्रभाव में आजकल का अधिकांश दलित लेखन है। फिर बकौल जेम्सन ‘रीडिंग इज ए सिम्बोलिक एक्ट’। इस ‘सिम्बोलिक एक्ट’ के प्रति सजग होना, आत्म सजग होना जरूरी है। यह सजगता एक सचेतन क्रिया है। इस क्रिया में अपने राजनीतिक अवचेतन की संरचना के प्रति सजगता भी शामिल है। दिक्कत यह है कि क्या हमारा लेखन और हमारी आलोचना खुद आत्म सजग है! ‘हत्यारे’ कहानी का पाठ आज के समय में यही चुनौती हमारे समक्ष रखता है। बात सिर्फ रचना के क्लास मोटिफ को उद्घाटित करने या अलग-अलग विमर्शों के  लिहाज से उसकी व्याख्या का नहीं है . अर्थात् रचना के बाहर की दुनिया का प्रतिबिम्ब और उसकी व्याख्या का नहीं है। बल्कि रचना की विकासमान सम्पूर्णता का है। इसीलिए उसकी हिस्टोरीसिटी का है। विषय से विचार तक की यात्रा का खतरा दरअसल हिस्टोरीसिटी के अन्वेषण का खतरा है। अमरकांत की कहानी में यह हिस्टोरीसिटी उसके मूल्य-निर्णय की प्रक्रिया में आयी है। यह हिस्टोरीसिटी न केवल समकालीनता का यूनीफाइंग फैक्टर है वरन् हमारे और रचना के कालांतर का भी एक यूनीफाइंग फैक्टर है। यह रचना से पाठक तक लगातार जारी है. इस अर्थ में यह हिस्टोरीसिटी विद्आउट हिस्ट्री है .और इसी अर्थ में यह वर्तमान की वर्तमानता है। इसी अर्थ में हत्यारे कहानी खुद अमरकांत की कहानी-कला की आलोचना है। उसमें एक ब्रेक है. अमरकांत के कहानी संसार में एक घटना की तरह। हत्यारे कहानी का अंत कुछ इस तरह होता है, ‘झोपड़ियों से कुछ व्यक्ति निकलकर युवकों के पीछे दौड़े। तारकोल की सड़कें जन-शून्य थी। दोनों युवक अरबी घोड़ों की तरह दौड़ रहे थे। वे कभी बाएं घूम जाते, कभी दाएं। पीछा करने वालों में एक फुर्तीबाज व्यक्ति तीर की तरह उनकी ओर बढ़ रहा था।…जो व्यक्ति ‘हाय मार डाला’ कहके लड़खड़ा कर गिर पड़ा। इसके बाद दोनों पुनः तेजी से भाग चले। तब बिजली का खम्भा आया तो रोशनी में उनके पसीने से लथपथ ताकतवर शरीर बहुत सुंदर दिखाई देने लगे। फिर वे न मालूम किधर अंधेरे में खो गए!’ जिस अंधेरे में दोनों न जाने कहां गुम हो गए यह वही अंधेरा है जो मुक्तिबोध के ‘अंधेरे में’ है। जहां वे डोमा जी उस्ताद को देख लेते हैं। हम अपने अंधेरे में क्या देख रहे हैं! यह क्या हमारे मूल्य-निर्णय से तय नहीं होता!

दो अवांतर प्रसंग छोटे-छोटे- एक, हमारा एक कलाकार मित्र अनुपम मूवमेंट में पेंटिंग्स करता है। उसकी एक समस्या है। हालांकि यह कहानी के बाहर का प्रसंग है लेकिन कला का महत्त्वपूर्ण प्रश्न है और यथार्थवाद का भी एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न है। वह कहता है कि हम जिस शैली में अब तक पेंटिंग्स बनाते आए हैं अब यथार्थ उसी शैली में बद्ध होकर हमारे सामने आ रहा है। याद कीजिए मुक्तिबोध की भी यही समस्या थी। वह कहता है कि मैं अपने ही शिल्प में बंधने के चलते यथार्थ को नहीं देख पा रहा हूं- यह जो परिवर्तनशील यथार्थ है। वह अपना एक अनुभव बताता है कि वह एक बार एक स्त्री के जीवन की किसी परिस्थिति पर बड़े भावावेग से एक चित्र बना रहा होता है। पेंटिंग्स पूर्ण नहीं हो पा रही है। वह परेशान है। अचानक इस परेशानी में वह अपना शरीर काटकर खून से पेंटिंग का एक हिस्सा बना देता है और अपने बाल नोचकर पेंटिंग्स में जहां-तहां चिपका देता है और कहता है कि मुझे बहुत शांति मिली है। कलाकार रचना में अपने बॉडीली प्रजेन्स (शरीरी उपस्थिति) को खोजना चाह रहा है। पेंटर पेंटिंग्स में अपनी उपस्थिति खोजने की कोशिश में है। यह बॉडली प्रजेन्स का क्राइसिस कला का एक वास्तविक अनुभव तो है, लेकिन यह मिसप्लेस्ड क्वेश्चन है। यह प्राब्लम मिसप्लेस्ड है क्योंकि पॉलिटिक्स में जैसे वह अपनी प्रजेन्स को आंदोलन के भीतर देख रहा है; रचना, जो प्रोटेस्ट के भीतर से निकलने वाली रचना है इसलिए महत्त्वपूर्ण भी है, के भीतर भी अपना बॉडली प्रजेन्स ढूंढ़ रहा है। राजनीति की दुनिया का कला की दुनिया से जो सम्बन्ध होगा, वह क्या होगा? क्या रचना-प्रक्रिया में जिसको मुक्तिबोध कहते हैं, जब तक तटस्थता नहीं होगी तब तक तदाकारिता सम्भव नहीं है। प्रश्न वहां अटैच होकर के बॉडली प्रजेन्स का, स्वानुभूति का नहीं है प्रश्न डिटैचमेंट का है। यह डिटैचमेंट लग सकता है कि कोई आधुनिकवादी तर्क हो, उपभोक्तावादी सर्जक मन का। खैर, इस पर चर्चा कहीं और।

दूसरा प्रसंग, नामवर सिंह ने हाल-फिलहाल पप्पू यादव की किताब का लोकार्पण किया। पप्पू यादव हत्यारे कहानी के नायक भी हैं। प्रश्न है, उन्होंने हत्यारे कहानी के बारे में कहा कि वहां मूल्य-निर्णय महत्त्वपूर्ण है. यह बात तो सही है कि दुनिया भर में अपराधियों की डायरियां आदि काफी लोकप्रिय हुई है;  उस पर विचार करना एक अलग बात है. लेकिन उसकी किताब का लोकार्पण करना एक राजनीतिक काम है। इसमें आपका मूल्य-निर्णय होगा कि नहीं! यानि रचना और आलोचना के प्रश्न जीवन के प्रश्न होंगे कि नहीं! यह एक महत्त्वपूर्ण सवाल है। शायद इसी अर्थ में प्रेमचंद कहते थे कि हर कोई चाहता है कि मेरा जीवन एक कहानी बन जाए।

मार्तण्ड प्रगल्भ

मार्तण्ड प्रगल्भ

छात्र राजनीति और संस्कृति-कर्म में व्यस्त रहने वाले मार्तण्ड प्रगल्भ जे.एन.यू. के भारतीय भाषा केंद्र में पी.एच.डी. के लिए शोधरत  हैं। उनसे mpragalbha1@gmail.com पर संपर्क संभव है

(जन संस्कृति मंच के कथा समूह के प्रथम आयोजन ‘कथा मंच’ के तृतीय सत्र में कथाकार मार्तण्ड द्वारा ‘अमरकांत की कहानी हत्यारे और आज का समय’ पर इलाहाबाद में दिनांक 22 दिसंबर, 2013 को प्रस्तुत व्याख्यान। लिप्यावतरण- श्रीकांत पाण्डेय।)

हिन्दी नवजागरण की परिकल्पना पर पुनर्विचार की जरूरत : राजकुमार

हिन्दी नवजागरण की अवधारणा ज्ञान के विशेष पैराडाइम के अन्तर्गत, जिसे सुविधा के लिए औपनिवेशिक आधुनिकता का पैराडाइम कह सकते हैं, गढ़ी गयी थी। आधुनिकता की ज्ञानमीमांसा के निकष पर ही समस्याएँ चिन्हित की गयीं और उसी के अनुरूप समाधान सुझाए गए। इक्कीसवीं सदी तक आते-आते ज्ञान का यह पैराडाइम बदल गया। पैराडाइम बदलते ही समस्याओं की पहचान और उनके समाधान के स्वरूप में भी बदलाव आ गया। उन्नीसवीं सदी में जन्मी विचारधाराओं को यथावत दुहराकर न तो आज की समस्याओं की सम्यक् पहचान संभव है और न ही उनका समाधान। इसलिए हिन्दी नवजागरण की परिकल्पना और उसके द्वारा सुझाए गए विकल्पों पर नये सिरे से विचार करने की जरूरत है। क्योंकि पुराने पैराडाइम के तहत दिये गये जो उत्तर पहले सही लगते थे, वे अब कारगर नहीं लगते। इसी परिप्रेक्ष्य में हिन्दी नवजागरण की अवधारणा और उससे जुड़ी समस्याओं को नये सिरे से समझने की शुरूआती कोशिश इस लेख में की गयी है।   # लेखक

सहमत से साभार-संपादित

सहमत से साभार-संपादित

By राजकुमार

1857 के विद्रोह में मध्यवर्ग और व्यवसायियों/उद्यमियों की भूमिका प्रायः नगण्य रही है। किन्तु विद्रोह के बाद घटित होने वाले नवजागरण और राष्ट्रीय आन्दोलन में इन्हीं दो वर्गों की केन्द्रीय भूमिका रही। नवजागरण और राष्ट्रीय आन्दोलन में नेतृत्व इन्हीं दो वर्गों के हाथ में रहा। 1857 के विद्रोह और परवर्ती नवजागरण के चरित्र में जो अन्तर दिखायी पड़ता है, उसकी व्याख्या इनके वर्ग-चरित्र में आये बदलाव के सहारे की जा सकती है। इसी कारण नवजागरण कालीन चिन्तकों के दृष्टिकोण में अंग्रेजी राज के प्रति एक खास तरह की दुविधा दिखायी पड़ती है। वे अंग्रेजी राज की तारीफ करते हैं किन्तु साथ ही कुछ मुद्दों पर उसकी आलोचना भी करते हैं। इस दुविधा को इतिहासकार सुधीर चन्द्र ने अपनी पुस्तक आप्रेसिव प्रेजेण्ट में ‘एम्बीवैलेन्स’ का नाम दिया है। ‘एम्बीवैलेन्स’ का हिन्दी में ‘आविकर्षण’ के रूप में अनुवाद किया गया है। नवजागरण कालीन चिन्तकों में राष्ट्रभक्ति-राजभक्ति, स्त्रियों की स्वाधीनता और मुसलमानों को लेकर दुविधा दिखायी पड़ती है। ऐसा आविकर्षण केवल हिन्दी नवजागरण तक सीमित नही है, दूसरी भाषाओं के नवजागरण में भी इन मुद्दों को लेकर ऐसा ही आविकर्षण मौजूद है।

इतिहासकार रंजीत गुहा ने अपनी पुस्तक ‘सम एलीमेंट्री ऐस्पेक्ट्स  ऑफ पीजेंट इनसर्जेन्सी इन कॉलोनियल इंडिया’ में लिखा है कि 57 के विद्रोहियों के दृष्टिकोण में अंग्रेजी राज के प्रति एक सचेत शत्रुता का भाव था। वे अंग्रेजी राज को उखाड़कर अपना शासन कायम करना चाहते थे और अंग्रेजी राज की किसी भी सकारात्मक भूमिका को स्वीकार नहीं करते थे। पुरुषोत्तम अग्रवाल ने अपने एक निबंध ‘1857 और हिन्दी नवजागरण’ में भारतेन्दु युगीन हिन्दी नवजागरण के चिन्तकों के दृष्टिकोण और 57 के विद्रोहियों के दृष्टिकोण में दिखायी देने वाले अन्तर की विस्तार से चर्चा की है। वे रामविलास शर्मा के इस तर्क से सहमत नहीं हो पाते कि भारतेन्दु युग हिन्दी नवजागरण का दूसरा चरण है। उल्लेखनीय है कि रामविलास शर्मा 1857 के विद्रोह को हिन्दी नवजागरण का प्रथम चरण मानते हैं और भारतेन्दु युग को उसकी निरन्तरता में दूसरा चरण। लेकिन जैसाकि ऊपर कहा गया, हिन्दी नवजागरण को 1857 के विद्रोह की निरन्तरता में देखना सही नहीं है। 1857 के विद्रोह और हिन्दी नवजागरण के बीच अंग्रेजी शासन के प्रति दृष्टिकोण में आये अन्तर के साक्ष्य पर 57 और भारतेन्दु युग के बीच निरन्तरता से ज्यादा विच्छिन्नता के तत्व परिलक्षित होते हैं।

भारतेन्दु युगीन हिन्दी नवजागरण की एक बड़ी समस्या यह है कि इसमें कथित उर्दू परम्परा में लिखे गये साहित्य की चर्चा ही सिरे से गायब है। हिन्दी नवजागरण की शुरूआत ही भारतेन्दु के इस कथन से मानी गयी है कि 1873 में हिन्दी नये चाल में ढली। उर्दू को आप हिन्दी की शैली मानें या उसकी परिकल्पना को ही अस्वीकार करें, लेकिन सच्चाई है कि हिन्दी के नये चाल में ढलने से पहले उर्दू में साहित्य लिखने का सिलसिला शुरू हो चुका था। इसलिए फारसी लिपि या उर्दू में फारसी-अरबी के शब्दों को जबर्दस्ती ठुँसने की आलोचना करने के बावजूद हिन्दी जाति के नवजागरण की चर्चा से उर्दू में लिखे गये साहित्य को आप बाहर नहीं कर सकते। ऐसा करने से  उसकी साम्प्रदायिक परिणति की सम्भावनाएँ बढ़ जाती हैं और अन्ततः वही हुआ भी। मुख्य बात यह है हिन्दी क्षेत्र की व्यापकता और भाषायी जटिलता के कारण यहाँ ऐसी स्थितियाँ उत्पन्न हुईं कि तेलगू, बांग्ला या मराठी की तरह हिन्दी का कोई एक रूप सुनिश्चित करना और बाकी रूपों को बाहर कर देना सभी को स्वीकार्य निर्णय नहीं बन पाया। फारसी और फिर उर्दू की परम्परा के विकास के कारण हिन्दी के ही कई रजिस्टर बन गये। कई बार तो एक ही समय में अलग-अलग परम्परा से जुड़े लोग इन रजिस्टरों का अलग-अलग ढंग से उपयोग करते दिखायी पड़ते हैं। समस्या तब उत्पन्न होती है जब हम इनमें से किसी एक रूप के आधार पर हिन्दी का स्वरूप स्थिर करने की कोशिश करते हैं। हिन्दी, हिन्दुस्तानी और उर्दू के बीच खींचतान के समूचे इतिहास को इसी परिप्रेक्ष्य में समझना चाहिए। भारतेन्दु युगीन हिन्दी नवजागरण की समस्या यह है कि उसने हिन्दी का एक सही रूप तय कर बाकी रूपों को प्रकारान्तर से अवैध घोषित कर दिया और उनके बारे में किसी भी प्रकार के चिन्तन-अध्ययन का ही निषेध कर दिया। उर्दू परम्परा में लिखे गये साहित्य को हिन्दी नवजागरण के दायरे से बाहर कर देने के बावजूद भारतेन्दु को इस बात का एहसास था कि उर्दू शायरी की परम्परा से भिन्न खड़ी बोली हिन्दी में कविता लिख पाना आसान नहीं होगा। विद्वानों को इस बात पर विचार करना चाहिए कि हिन्दी को उर्दू से अलगाने के बावजूद स्वयं भारतेन्दु उर्दू में रसा नाम से कविता क्यों लिखते थे। यही नहीं, इस बात पर भी नये सिरे से विचार किया जाना चाहिए कि नयी चाल की हिन्दी के समर्थक भारतेन्दु अपनी ज्यादातर कविताएँ ब्रज भाषा में क्यों लिखते हैं। खड़ी बोली में तो उन्होंने ‘अमीर खुसरों के वजन पर सिर्फ मुकरिया ही लिखी। एक खास तरह की हिन्दी की वकालत करने के बावजूद भारतेन्दु के लेखन में उर्दू और ब्रज भाषा की उपस्थिति बहुत ही महत्वपूर्ण है। यदि गम्भीरता से विचार किया जाये तो इससे हिन्दी क्षेत्र के भाषायी मानचित्र की जटिलता को समझने में मदद मिल सकती है।

असल में भारतेन्दु संक्रमण कालीन दौर के रचनाकार-चिन्तक हैं, जहाँ कई तरह के विचार और प्रभाव तो सक्रिय है लेकिन इनमें से किसी को निर्णायक बढ़त हासिल नहीं हुई है। भारतेन्दु के रचनात्मक व्यक्तित्व में कई धाराएँ-उपधाराएँ सक्रिय दिखायी पड़ती हैं। इसीलिए उर्दू और ब्रज भाषा की साहित्यिक परम्परा के प्रति कम से कम रचनात्मक स्तर पर उनके यहाँ कुछ गुंजाइश बची हुई है।

किन्तु द्विवेदी युग तक आते-आते अंग्रेजी शिक्षा के प्रचार-प्रसार के परिणामस्वरूप भारत के तत्कालीन चिन्तक इस नतीजे पर पहँुचे कि भारत की पराधीनता का मुख्य कारण ये है कि यहाँ पश्चिमी ढंग के राष्ट्रवाद का विकास नहीं हो पाया। भारत की मुक्ति और एक स्वाधीन राष्ट्र के रूप में उसके विकास के लिए उसे पश्चिमी राष्ट्रों के वजन पर पुनर्गठित करना होगा। अब इस बात का कोई विशेष महत्व नहीं रह गया कि भारतीय सभ्यता में स्वाभाविक रूप से विकसित होने वाली प्रवृत्तियों को केन्द्र में रखकर ‘आधुनिक’ भारत की परिकल्पना की जाए। इसके बजाय सारा जोर इस ओर चला गया कि भारतीय सभ्यता की उन विशेषताओं को चिन्हित किया जाए, जिन्हें खींच-खाँच कर पश्चिमी राष्ट्रवाद के साँचे में फिट किया जा सके।

द्विवेदी जी समेत उस समय के बुद्धिजीवियों को ये बात सालने लगी कि राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्रवाद की परिकल्पना कैसे संभव होगी। भारत पश्चिमी राष्ट्रों से इस मायने में भिन्न था कि यहाँ कई भाषाएँ बोली जाती थीं। किन्तु सबसे ज्यादा लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा के रूप में हिन्दी को खड़ा कर राष्ट्रभाषा बनने के उसके दावे को मजबूत करने के लिए ऐसी हिन्दी की परिकल्पना की गयी, जिसमें हिन्दी के विविध रूपों और तथाकथित जनपदीय भाषाओं/ बोलियों के लिए कोई जगह नहीं बची। इसका परिणाम ये हुआ कि भारतीय सभ्यता में भाषाओं के विकास और उनके पारस्परिक सम्बन्ध को या तो नजरअन्दाज कर दिया गया या उसको समझने का विवेक ही नहीं उत्पन्न हो पाया। यदि समूचे भारत के भाषायी मानचित्र की चर्चा न भी की जाय तो भी इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि हिन्दी प्रदेश में एक ही समय में अलग-अलग कार्यों के लिए और कभी-कभी एक ही कार्य के लिए हिन्दी के भिन्न-भिन्न ‘रजिस्टर’ का इस्तेमाल होता रहा है। हिन्दी प्रदेश का भाषायी स्वरूप हमेशा बहुभाषी रहा है। भाषायी स्वरूप को लेकर असहमतियाँ हो सकती हैं और होनी भी चाहिए, लेकिन उनके अस्तित्व को ही दरकिनार कर गढ़ी गई हिन्दी नवजागरण की कोई भी परिकल्पना, नेक इरादों के बावजूद, आत्मघाती और अन्ततः साम्प्रदायिक होने के लिए अभिशप्त है।

किसी एक भाषायी रजिस्टर पर केन्द्रित हिन्दी की परिकल्पना से जितनी समस्याएँ सुलझती हैं उससे ज्यादा समस्या पैदा हो जाती है। हिन्दी प्रदेश के भाषायी मानचित्र को जनपदीय बोलियों और राष्ट्रीय भाषा के द्वि-आधारी विरुद्धों में रखकर देखने से उत्तर भारतीय भाषाओं के अन्तर्सम्बन्ध को समझने-समझाने की अभी तक जो कोशिश होती आयी है, उस पर पुनर्विचार करने की जरूरत है। असल में उत्तर भारतीय भाषाओं को किसी अन्य प्रसंग में लिखे गए ए.के. रामानुजन के वक्तव्य को किंचित परिवर्तित करते हुए कहें तो, एक ही सातत्य या स्पेक्ट्रम के क्रमशः परिवर्तित होते हुए हिस्से के रूप में देखा जाना चाहिए। कई बार इसका एक छोर दूसरे छोर से काफी अलग लगता है, लेकिन है वो उसी स्पेक्ट्रम का हिस्सा। इस स्पेक्ट्रम में दिखायी पड़ने वाले भाषायी परिवर्तन को चोटियों और घाटियों के रूपक के जरिये व्याख्यायित कर सकते हैं। चोटियाँ इस स्पेक्ट्रम के वो बिन्दु हैं, जहाँ उनका अन्तर आत्यन्तिक रूप में दिखाई पड़ता है और घाटियाँ वह स्थल हैं, जहाँ ये तीक्ष्णता क्रमशः ढलान पर उतरते हुए एक दूसरी भाषायी चोटी की ओर चढ़ने लगती है। ये भाषायी घाटियाँ ऐसे  पाॅकेट हैं, जहाँ एक भाषा या बोली का रजिस्टर धीरे-धीरे दूसरी भाषा के रजिस्टर में तब्दील होने लगता है। मनुष्य के शरीर में फैली हुई नसों की तरह ये भाषाएँ परस्पर जुड़ जाती हैं। इनकी सीमाएँ धँुधली, अस्पष्ट और खुली हुई हैं। इसीलिए इन भाषाओं/बोलियों के रजिस्टर दूसरी बोली या भाषा से, आधुनिक युग से पहले तक, जुड़े हुए दिखायी पड़ते हैं। राजनीतिक-आर्थिक सांस्कृतिक कारणों से इनमें से किसी एक भाषायी रजिस्टर का दायरा बढ़ जाता है और उसे ही कुछ लोग भाषा या राष्ट्र की भाषा के रूप में पुरस्कृत करने लगते हैं। इसमें भी कोई हर्ज नहीं, लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब किसी भाषायी रजिस्टर विशेष को राष्ट्र की भाषा के रूप पुरस्कृत करने की प्रक्रिया में अन्य भाषायी रजिस्टरों को जनपदीय बोली के रूप में अवमूल्यित या तिरस्कृत कर दिया जाता है। यहाँ तक कि उन्हें साहित्य और कला की भाषा के रूप में भी आगे जारी रखने के औचित्य का निषेध कर दिया जाता है। यदि हम भाषा और बोली के युग्म में हिन्दी प्रदेश की भाषायी प्रकृति पर विचार करने के बजाय उनके अन्तर्सम्बन्ध के नैरूतर्य पर विचार करें तो हम उन गलतियों को दोहराने से बच सकते हैं, जिनका सामना हिन्दी जाति की एक भाषा खड़ी करने के यांत्रिक रवैये के कारण अभी तक हम करते रहे हैं। उत्तर भारत की भाषाओं/ बोलियों में नैरन्तर्य का एक बड़ा प्रमाण ये है कि क्रिया रूपों अथवा उच्चारण में कुछ अन्तर के बावजूद इनके शब्द भण्डार में कोई विशेष अन्तर नहीं है।

ये सही है कि अठारहवीं शताब्दी में हिन्दी के उस भाषायी रजिस्टर में जिसे आज उर्दू कहते हैं, बोल-चाल के शब्दों को निकालकर फारसी और अरबी के शब्दों की खूब भर्ती की गई। नतीजा ये हुआ कि इस परम्परा में लिखे गये साहित्य का दायरा अरबी-फारसी जानने वाले कुछ अभिजनों तक ही सीमित हो गया और यहाँ की लोक भाषाओं से उसका सम्बन्ध कमजोर पड़ गया। इस प्रवृत्ति की आलोचना करना तो ठीक था, लेकिन इस परम्परा में लिखे गए साहित्य की उपलब्धियों का सिरे से निषेध कर ‘नए चाल में ढली’ हिन्दी में साहित्य लिखने और उसे इस परम्परा से अलग दिखाने के लिए जैसा साहित्य लिखा गया, उसमें इस परम्परा की साहित्यिक उपलब्धियों से कुछ भी न ग्रहण करने का भाव ज्यादा था।

यदि भारतेन्दु युग में उर्दू की परम्परा से नई हिन्दी का सम्बन्ध-विच्छेद हुआ तो द्विवेदी युग की उपलब्धि ये है कि इस दौर में ब्रजभाषा की परम्परा से भी उसे काट दिया गया। रीति विरोधी अभियान चलाकर ये सिद्ध करने का प्रयास किया गया कि ब्रजभाषा में आधुनिक युग की संवेदना वहन करने की सामथ्र्य नहीं है। ब्रजभाषा में तो पतनशील सामंती मानसिकता की कामुक शंृगारिक कविताएँ ही लिखी जा सकती हैं। रीतिकालीन शृंगारिक कविताओं को ही नहीं, स्त्री लोकगीतों को भी विक्टोरियन नैतिकता के प्रभाव में अश्लील घोषित कर दिया गया जबकि इतिहास यह है कि आधुनिक योरोपीय भाषाओं में भी अपनी क्लासिक साहित्य और ज्ञान को आत्मसात कर कुछ-कुछ वैसा ही साहित्य लिखा गया था जैसा रीतिकालीन कविताओं में दिखाई पड़ता है इस बात को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया कि सूर, मीरा से लेकर न जाने कितने भक्त कवियों ने इसी भाषा में कविताएँ लिखी हैं। रीतिकालीन दौर में भी शंृगारिक कविताएँ लिखने वाले कवियों से ज्यादा ऐसे कवियों की संख्या है, जिन्होंने भक्ति-प्रधान कविताएँ लिखी हैं। यही नहीं, कथित रीतिकाल के दौर में ही 60 से भी अधिक संख्या में वीरकाव्य-लिखे गए हैं। दैनंदिन जीवन से सम्बन्धित समस्याओं पर लिखी गई कविताओं के साथ-साथ नीतिपरक कविताएँ भी इस दौर में कम नहीं लिखी गईं। स्वयं भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, नरोत्तमदास और जगन्नाथ दास ‘रत्नाकर’ जैसे आधुनिक दौर के कवियों के यहाँ भी वैसी कविताएँ नहीं मिलतीं, जिनका रीति-विरोधी अभियान के नाम पर विरोध किया गया। असल में उर्दू के दावे को खारिज करना तो आसान था, लेकिन उर्दू के दावे को खारिज करने के बाद ब्रजभाषा के दावे को खारिज करना बहुत मुश्किल था। साहित्यिक उपलब्धि की दृष्टि से तो खड़ी बोली कहीं से ब्रज भाषा के सामने खड़ी ही नहीं होती। उर्दू को दरकिनार करने के बाद साहित्य की भाषा के रूप में व्यापकता और विस्तार की दृष्टि से भी ब्रजभाषा का दायरा खड़ी बोली के मुकाबले बहुत विस्तृत था। गुजरात से लेकर बंगाल तक ब्रजभाषा में साहित्य लिखने की परम्परा दिखायी पड़ती है। खड़ी बोली के पक्ष में दूसरा तर्क ये दिया गया कि ब्रजभाषा में गद्य का पर्याप्त विकास नहीं हुआ, लेकिन यदि उर्दू परम्परा के विकास को हिन्दी से अलग कर दें, तो उस समय तक हिन्दी में ही गद्य का कौन सा विकास दिखाया जा सकता था। ये सही है कि फोर्ट विलियम काॅलेज, ईसाई मिशनरियों और अन्य लोगों के सहयोग से उन्नीसवीं शताब्दी में हिन्दी गद्य का तेजी से विकास हुआ। जो शोध हुए हैं, उनके आधार पर ये कहना भी पूरी तरह सही नहीं है कि ब्रजभाषा में गद्य का विकास ही नहीं हुआ। सबसे पुराने व्याकरण और शब्दकोश ब्रजभाषा के ही बनाये गये और अनेक संस्कृत ग्रन्थों का ब्रजभाषा-गद्य में अनुवाद किया गया। इन सारे तथ्यों पर ध्यान देने के बाद ये बात समझ में आती हैं कि रीतिविरोधी अभियान के नाम पर वास्तव में ब्रजभाषा के साहित्यिक-वैचारिक अवदान का निषेध किया जा रहा था।

चूँकि हिन्दी नवजागरण की अवधारणा किसी न किसी रूप में आधुनिकता के प्रोजेक्ट के साये में विकसित हो रही थी और इस प्रोजेक्ट के मुताबिक पहले से चली आ रही सांस्कृतिक और वैचारिक परम्पराएँ व्यर्थ और पिछड़ी हुई मान ली गई थीं, इसलिए आधुनिकता के प्रोजेक्ट को हिन्दी में उतारने के लिए हिन्दी का ऐसा रजिस्टर ज्यादा उपयुक्त लगा, जिस पर परम्परा का कोई बोझ ही नहीं था। खड़ी बोली में आधुनिक युग से पहले साहित्यिक-वैचारिक लेखन की कोई उल्लेखनीय परम्परा नहीं थी, इसलिए उसमें पूर्व परम्परा से सम्बन्ध-विच्छेद करने की कोई जरूरत ही नहीं थी। परम्परा की चिन्ता किये बिना, जो चाहें, जैसे चाहें, लिख सकते थे। उल्लेखनीय है कि मुगलकाल में उर्दू का विकास भी कुछ इसी तरह हुआ था। प्रसिद्ध इतिहासकार मुजफ्फर आलम ने अपने एक लेख में लिखा है कि उर्दू में लेखन के पीछे दो शर्तें लगाई गई थीं, पहली यह कि इसकी लिपि फारसी होगी, दूसरी यह कि बोल-चाल की भाषा में शब्द न उपलब्ध होने पर फारसी या अरबी से शब्द लिये जायेंगे। खड़ी बोली उर्दू में बिल्कुल नये सिरे से साहित्य लिखना ब्रज-भाषा की तुलना में इसलिए आसान था, क्योंकि ब्रजभाषा में साहित्य की एक पूर्व परम्परा थी, जबकि खड़ी बोली में साहित्य लिखने की कोई उल्लेखनीय परम्परा नहीं थी। खड़ी बोली उर्दू की तरह ही खड़ी बोली हिन्दी में जिस तरह के साहित्य-लेखन की शुरूआत हुई, उसका न तो उर्दू की परम्परा से, न ब्रजभाषा की परम्परा से कोई उल्लेखनीय सम्बन्ध दिखायी पड़ता है। लोकसाहित्य की परम्परा से सम्बन्ध स्थापित करने का तो खयाल भी नहीं आता। परम्परा से विच्छेद या परम्परा से मुक्ति के इन दोनों उदाहरणों की विशद चर्चा तो यहाँ संभव नहीं है, फिर भी खड़ी बोली हिन्दी में लिखे गए आधुनिक साहित्य पर दो चार बातें करना बेहद जरूरी है।

रामविलास शर्मा ने लिखा है कि हिन्दी नवजागरण में अंग्रेजी शिक्षा और पश्चिमी ज्ञान की कोई उल्लेखनीय भूमिका नहीं रही। थोड़ी रियायत देते हुए उन्होंने ये जरूर जोड़ दिया है कि अंग्रेजी साहित्य की मानवतावादी और प्रगतिशील परम्परा भी रही है और उससे सीखने में कोई हर्ज नहीं। लेकिन आधुनिक हिन्दी साहित्य की गम्भीरता से पड़ताल करने पर ये बात स्पष्ट हो जाती है कि उसकी मूल प्रेरणा और आदर्श अंग्रेजी साहित्य ही रहा है। ज्यादातर आधुनिक हिन्दी साहित्य पश्चिम से प्रेरणा लेते हुए और उसी के मानदण्ड पर लिखा गया है। कहने वाले चाहें तो कह सकते हैं कि ये अंग्रेजी साहित्य की नकल है। लेकिन अंग्रेजी के प्रसिद्ध उत्तर औपनिवेशिक चिंतक होमी भाभा ने नकल में भी अकल की बात करते हुए मिमिक्री और हाइब्रिडिटी (संकरता) के सिद्धान्तों के सहारे औपनिवेशिक देशों में लिखे गए साहित्य के महत्व का बहुत जोर-शोर से प्रतिपादन कहते हुए इस प्रकार के साहित्य की उपनिवेशवाद-विरोधी भूमिका को रेखांकित करने का गंभीर प्रयास किया है। होमी भाभा के इस तर्क को सामान्य रूप से आज भी दोहराया जा रहा है। लेकिन वास्तव में ये एक पैराडाइम शिफ्ट था। प्रसिद्ध इतिहासकार रणजीत गुहा के अनुसार पैराइाइम के इस युद्ध में पश्चिम की विजय हुई; अद्भुत पर अनुभूति की विजय हुई। विद्वानों ने रणजीत गुहा के इस तर्क की आलोचना करते हुए दिखाया है कि पश्चिम के विपरीत भारतीय यथार्थवादी उपन्यास विस्मय, फैन्टेसी और काव्यत्व से पूर्णतः विच्छिन्न नहीं थे। इसलिए ये कहना सही नहीं है कि इस पैराडाइम शिफ्ट के कारण पहले से चली आ रही भारतीय साहित्यिक परम्परा का पूरी तरह निषेध हो गया। ये तर्क सही है, पर असल बात ये है कि इस पैराडाइम शिफ्ट के बाद साहित्य, संस्कृति और ज्ञान-विज्ञान की बुनियाद आधुनिकता की ज्ञानमीमांसा पर टिक जाती है और भारतीय ज्ञानमीमांसा की परम्परा का इस्तेमाल सिर्फ खाली जगहों को भरने के लिए, एक ऐसा संस्करण तैयार करने के लिए किया जाता है, जिसकी पैकेजिंग भारत में की गई हो। इसे कुछ इस तरह समझना चाहिए, जैसे उत्पादन भले ही भारत में हो रहा हो लेकिन उसकी टेक्नाॅलजी पश्चिम से ली गई हो। इसी तर्क को आगे बढ़ाते हुए कहना चाहिए कि लिखा भले ही भारतीय भाषाओं में जा रहा है, लेकिन उसका विन्यास और उसकी अन्तर्दृष्टि पश्चिम से ली गई है। भारतीय भाषाओं में लिखने से कोई साहित्य भारतीय नहीं हो जाता और न ही भारतीय भाषाओं में चिन्तन करने से कोई चिन्तन भारतीय हो जाता है।

उत्तर औपनिवेशिक चिन्तकों द्वारा तैयार माॅडल के विकल्प के रूप में मैं एक दूसरे किस्म के माॅडल का प्रस्ताव करने की जुर्रत कर रहा हँू। थोड़ी देर के लिए कल्पना कीजिए कि भारतीय ज्ञानमीमांसा और साहित्यिक परम्परा की नियामक भूमिका को स्वीकार करते हुए आधुनिकता की ज्ञानमीमांसा से भी हमने कुछ तत्व लिये होते तो उसकी सूरत और सीरत कुछ और होती। राजनीतिक और सामाजिक चिन्तन के क्षेत्र में गाँधी ने और काव्य के क्षेत्र में कुछ ऐसी ही कोशिश रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने की थी। किन्तु ये इकलौती कोशिशें थीं और परवर्ती चिन्तकों और रचनाकारों ने इन्हें परम्परावादी, रहस्यवादी कहकर नकार दिया। परिणाम ये हुआ कि साहित्य, संस्कृति और ज्ञान के क्षेत्र में जो भी चिन्तन हुआ उसकी नियामक प्रेरणा पश्चिमी आधुनिकता की ज्ञानमीमांसा से तय होती रही। हिन्दी में तो सामान्य रूप से आज जैसी स्थिति है, वो और भी विडम्बनापूर्ण है। यहाँ तो उस ज्ञान को, जिसका विकास पश्चिम में 30-40 के दशक में हुआ था, आज भी भारतीय चिन्तन के रूप में पूरे भक्तिभाव से दोहराया जा रहा है। जबकि पश्चिम में भी इस ज्ञान को अब कोई तवज्जो नहीं दे रहा। इसीलिए आधुनिक युग में भारतीय भाषाओं में जो साहित्य लिखा गया है, उसमें ज्यादा ऐसा नहीं है, जिसे सही मायने में भारतीय साहित्य कहा जा सके। जो है, वह पश्चिमी आधुनिकता के सर्वव्यापी प्रभाव के बावजूद है।

यह अकारण नहीं है कि यद्यपि आधुनिक हिन्दी साहित्यिक चिन्तन में भक्ति आन्दोलन के महत्व का बढ़चढ़कर बखान किया जाता है, किन्तु विरली ही कोई ऐसी रचना होगी, जिसे पढ़कर लगे कि ये रचना भक्ति संवेदना से गुजकर लिखी गई है। परम्परा का किताबी ढंग से बखान तो खूब किया गया, लेकिन परम्परा से रचनात्मक स्तर पर कुछ भी सीखने और ग्रहण करने के चिन्ह कुछ ही रचनाओं में दिखाई पड़ते हैं। मतलब बिल्कुल साफ है, परम्परा का गुणगान कीजिए और कुछ भी लिखते समय उसे भूल जाइए। कुछ विद्वान गरीबी, भूखमरी, किसान, मजदूर जैसे विषयों पर लिखी गई रचनाओं के आधार पर ये सिद्ध करने की कोशिश करते हैं कि इसकी प्रेरणा भक्तिकालीन साहित्य से आई है। अब उन्हें कौन समझाए कि भक्ति काव्य-संवेदना से उसका कोई सम्बन्ध नहीं है। इस प्रकार के विषयों पर लिखी गई रचनाओं का प्रेरणास्रोत पश्चिमी चिन्तन और यथार्थवादी साहित्यिक परम्परा है। भक्ति आन्दोलन न भी होता तो भी इन विषयों पर इसी ढंग से लिखा जाता। दूसरे देशों में, जहाँ भक्ति साहित्य जैसी कोई परम्परा नहीं है, इन विषयों पर थोड़े-बहुत हेर-फेर के साथ इसी ढंग से लिखा गया है। इन विषयों पर लिखी गई रचनाओं को देखने से शायद ही कहीं ऐसी प्रतीति होती हो कि उन्हें भारतीय सांस्कृतिक एवं बौद्धिक परम्परा को आत्मसात करके लिखा गया है। परम्परा के मूल्यांकन से समृद्ध रचनाएँ हिन्दी में ज्यादा नहीं हैं। कुल मिलाकर भारतेन्दु की कुछ रचनाओं, प्रेमचन्द और रेणु के कथा-साहित्य, प्रसाद और मुक्तिबोध की कविताओं के अतिरिक्त कौन सी ऐसी रचनाएँ हैं, जिन्हें भारतीय परम्परा के बीच से निकली हुई रचनाओं के रूप में चिन्हित किया जा सके। विडम्बना ये है कि आधुनिक साहित्य में जहाँ भक्ति साहित्य का सचमुच असर दिखाई पड़ता है, उसे रहस्यवादी कह कर खारिज कर दिया जाता है। इसका सटीक उदाहरण है कि भक्ति काल का सबसे अधिक गुणगान करने वाले रामविलास शर्मा ने मुक्तिबोध की कविताओं को रहस्यवादी कहकर खारिज कर दिया। जबकि उनकी कविता के टेक्स्चर में संत साहित्य की संवेदना की गहरी छाप है। हबीब तनवीर और विजयदान देथा की रचनाओं के बारे में जरूर ऐसा कहा जा सकता है कि वे भारतीय साहित्यिक परम्परा से अनुस्यूत और उसे आगे बढ़ाने वाली रचनाएँ हैं, लेकिन उन पर विचार करने के लिए एक स्वतंत्र लेख की दरकार होगी।

उल्लेखनीय है कि प्रगतिशील लेखक संघ (1936) के पहले घोषणा-पत्र में भक्तिकालीन साहित्य को पलायन का साहित्य कह कर खारिज कर दिया गया था। प्रेमचन्द ने इस अधिवेशन के बहुप्रशंसित अध्यक्षीय भाषण में आधुनिक युग से पहले के समूचे साहित्य को मौजमस्ती और मनबहलाव का साहित्य करार दिया था। बाद में परम्परा के मूल्यांकन के प्रसंग में भले ही उस गलती को दुरुस्त कर लिया गया हो लेकिन रचनात्मक लेखन और वैचारिक चिन्तन के क्षेत्र में परम्परा के सकारात्मक मूल्यांकन से कुछ भी ग्रहण करने की जहमत उठाने के निशान विरले ही दिखाई पड़ते हैं।

पश्चिम में आधुनिकता के अभ्युदय के साथ साहित्य और कलाओं को आधुनिकता के प्रोजेक्ट के सहायक के रूप में देखने की प्रवृत्ति जोर पकड़ने लगी और उन्नीसवीं शताब्दी में यथार्थवाद के अभ्युदय के साथ अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच गई। उल्लेखनीय है कि पश्चिम में समाज विज्ञान का विकास विज्ञान की पद्धति की बुनियाद पर हुआ था और इसीलिए समाज का अध्ययन करने वाले शास्त्रों को ‘समाज विज्ञान’ के रूप में प्रतिष्ठित करने पर जोर दिया गया। एंगेल्स ने तो माक्र्स के चिन्तन का महत्व प्रतिपादित करते हुए स्पष्ट रूप से लिखा कि जैसे डार्विन ने प्रजातियों के विकास के नियम खोज निकाले वैसे ही माक्र्स ने समाज के विकास के नियम खोज लिये। यही कारण है कि लम्बे समय तक माक्र्सवाद को समाज के विकास के नियमों की पहचान कराने वाला विज्ञान कहा जाता रहा। फिलहाल इस बहस के विस्तार में जाने की जरूरत नहीं है, संप्रति विचारणीय मुद्दा ये है कि साहित्य और कलाओं को आधुनिकता के प्रोजेक्ट के अधीन कर देने की परिणति क्या हुई? प्रेमचन्द द्वारा प्रगतिशील लेखक संघ के पहले अध्यक्षीय भाषण ‘साहित्य का उद्देश्य’ की चर्चा हम पहले कर चुके हैं, इसी क्रम में प्रेमचन्द की उस प्रसिद्ध और बार-बार दोहराई जाने वाली उक्ति के उल्लेख के जरिये हम अपने तर्क को आगे बढ़ाना चाहेंगे। प्रेमचन्द ने कहा था, ‘साहित्य देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई नहीं, बल्कि उनके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई है।’ प्रेमचन्द के इस वक्तव्य पर थोड़ा रुककर विचार करें तो ये स्पष्ट हो जाएगा कि प्रेमचन्द यहाँ पर साहित्य के महत्व का जिस प्रकार प्रतिपादन कर रहे हैं, उससे राजनीतिक चिन्तन की केन्द्रीयता का निषेध नहीं होता। यहाँ राजनीतिक चिन्तन के सर्वोपरि महत्व को स्वीकार करते हुए उसी दायरे में और उसी कसौटी पर साहित्य के महत्व को राजनीतिक चिन्तन से भी आगे के कदम के रूप में रेखांकित किया गया है। प्रेमचन्द अक्सर कहते भी थे कि जो काम गाँधी राजनीति में कर रहे हैं, वही काम वो साहित्य के दायरे में कर रहे हैं। कहने की जरूरत नहीं होनी चाहिए कि यहाँ साहित्य के महत्व का प्रतिपादन राजनीतिक प्रोजेक्ट के अधीन ही है, भले ही उसे राजनीति के आगे-आगे चलने वाली मशाल ही क्यों न कहा गया हो। रामचन्द्र शुक्ल ने भी अपने प्रिय कवि तुलसीदास के साहित्य के मार्फत साधनावस्था के जिस साहित्य को सर्वोत्कृष्ट घोषित किया और जो पहली नजर में ठेठ भारतीय निकष जान पड़ता है, वास्तव में आधुनिकता के विमर्श से बहुत गहरे प्रभावित निकष है। इसलिए यह अकारण नहीं है कि आधुनिक साहित्य के मूल्यांकन के प्रसंग में वे ठाकुर जगमोहन सिंह के उपन्यास ‘श्यामास्वप्न’ के बजाय लाला श्रीनिवासदास के ‘परीक्षागुरु’ को तरजीह देते हैं, क्योंकि वह अंगे्रजी ढंग का नावेल है। इससे यह बात खुलकर सामने आ जाती है कि सब कुछ के बावजूद आधुनिक हिन्दी साहित्य अन्ततः अंग्रेजी ढंग का ही साहित्य है। यह बिल्कुल संभव है कि रामचन्द्र शुक्ल ने जानबूझकर और सचेत रूप से ऐसा न किया हो। लेकिन, जैसा कि कहा जाता है, जादू वही जो सिर चढ़कर बोले; ये आधुनिकता का जादू है, जो हिन्दी के लेखकों-आलोचकों के सिर चढ़कर बोल रहा है। फिर चाहे वो रामचन्द्र शुक्ल हों, महावीर प्रसाद द्विवेदी हों या प्रेमचन्द ही क्यों न हों। महावीर प्रसाद द्विवेदी ने तो साहित्य को ‘ज्ञानराशि का संचित कोश’ कह कर साहित्य को आधुनिकता के प्रोजेक्ट के अधीन करने की पहले से चली आ रही प्रक्रिया को जैसे उसकी तार्किक परिणति तक पहँुचा दिया। रामचन्द्र शुक्ल ने द्विवेदी जी के साहित्य-विवेक पर सही टिप्पणी की है: 1)‘कवि और कविता कैसा गम्भीर विषय है, कहने की आवश्यकता नहीं। पर इस विषय की बहुत मोटी-मोटी बातें बहुत मोटे तौर पर कही गयी हैं। ….2) द्विवेदी जी के लेखों को पढ़ने से ऐसा जान पड़ता है कि लेखक बहुत मोटी अक्ल के पाठकों के लिए लिख रहा है। एक-एक सीधी बात कुछ हेरफेर -कहीं-कहीं केवल शब्दों के ही- साथ पाँच-छह वाक्यों में कही हुई मिलती है।…3) इन पुस्तकों को एक मुहल्ले में फैली बातों से दूसरे मुहल्ले वालों को कुछ परिचित कराने के प्रयत्न के रूप में समझना चाहिए।’ साहित्य की बुनियादी भूमिका के इस अवमूल्यन का परिणाम ये हुआ कि वह आधुनिकता के विमर्श के इर्द-गिर्द घूमने लगा, कभी उसके पीछे-पीछे तो कभी, प्रेमचन्द के कथन के वजन पर कहें तो, उसके आगे-आगे।

मनुष्य के सामाजिक जीवन को नितान्त भौतिक समृद्धि के परिप्रेक्ष्य में परिभाषित करने का परिणाम ये हुआ कि जीवन के वे आयाम, जिनकी सिर्फ भौतिक सन्दर्भों में व्याख्या एक सीमा के बाद संभव नहीं है, लेकिन जो भौतिक उपलब्धि से कम महत्वपूर्ण नहीं हैं, हमारे चिन्तन की परिधि से ही बाहर चले गए। भावनाओं, संवेदनाओं और मानवीय जीवन की अस्तित्वमूलक चिन्ताएँ और मानवीय अस्तित्व की सार्थकता की वे परिकल्पनाएँ, जो भौतिक उपलब्धि से आगे जाती हैं, का भी इस राजनीतिक विमर्श में अवमूल्यन हो गया। यहाँ पर ये ध्यान दिलाने की जरूरत है कि भारतीय चिन्तन परम्परा में मानवीय जीवन के अस्तित्व की सार्थकता को कभी भी सिर्फ भौतिक उपलब्धियों के निकष पर तौलने की कोशिश नहीं की गई थी। बहुत पीछे न भी जाएँ तो भक्तिकालीन साहित्य की बुनियादी संवेदना के सहारे भी इसे समझा और समझाया जा सकता है। असल में साहित्य, संगीत और कलाएँ मनुष्य की संवेदना के उन आयामों को जागृत, उद्दीप्त और समृद्ध करती हैं, जहाँ तक आधुनिकता के ‘एक आयामी’ विमर्श से पैदा होने वाला समाज विज्ञान पहुँच ही नहीं सकता। साहित्य, संगीत और कलाएँ मानवीय अस्तित्व की सार्थकता के उन आयामों को रचती रही हैं, जिनकी चिन्ता आधुनिकता के विमर्श में कम ही दिखाई पड़ती हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे मानवीय अस्तित्व की सार्थकता को सिर्फ भौतिक उपलब्धि के निकष पर परिभाषित करने की प्रक्रिया का अतिक्रमण करती हैं। ऐसा नहीं है कि साहित्य और कलाएँ भौतिक समृद्धि, गैर-बराबरी और किसी भी प्रकार के भेदभाव और शोषण को पूरी तरह से नजर अंदाज करती हैं, लेकिन यह जरूर है कि वे भौतिक समृद्धि को मानवीय अस्तित्व की सार्थकता के एकमात्र निकष के रूप में देखने के विमर्श में ढलने से इनकार करती हैं। इसके बजाय वे मानवीय अस्तित्व की सार्थकता के उन आयामों (कल्पित या वास्तविक) को रचती हैं, जिनके सामने भौतिक समृद्धि का पैमाना फीका लगने लगता है।

इतिहासकार ज्ञानेन्द्र पाण्डेय ने अपने लेख ‘गैरियत का गद्य’ में लिखा है कि मनुष्य के आत्यन्तिक दुखों को इतिहास के दायरे में दर्ज कर पाना नामुनकिन है। सुख-दुख, हर्ष-विषाद की आत्यन्तिक मनःस्थितियों के आयाम जिस तरह साहित्य, संगीत तथा कलाओं में आते हैं, वे समाज विज्ञान के विषयों में उस तरह से आ ही नहीं सकते। विडम्बना ये है कि आधुनिकता के साथ पैदा होने वाले समाज विज्ञान के इर्द-गिर्द मंडराने वाला साहित्य अपनी उस बुनियादी भूमिका को चाहे-अनचाहे अप्रासंगिक मानकर छोड़ देता है, जहाँ तक समाज विज्ञान के किसी विषय के लिए पहुँच पाना ही मुश्किल है। उर्दू के कवि मोमिन की एक पंक्ति है, ‘तुम मेरे पास होते हो, गोया जब कोई दूसरा नहीं होता।’ इसी पंक्ति के वजन पर, चाहें तो, कह सकते हैं कि साहित्य और कलाएँ वहाँ भी मनुष्य के पास होती हैं, जहाँ ज्ञान-विज्ञान के दूसरे अनुशासन पहुँच  ही नहीं पाते।

यह अकारण नहीं है कि पहले स्वच्छन्दतावादी और फिर आधुनिकतावादी साहित्य और कलाओं में आधुनिकता के इस ‘एक आयामी’ विमर्श से बाहर निकलने की एक लहूलुहान जद्दोजहद दिखाई पड़ती है। ये सही है कि आधुनिकता के इस लौहपाश से बाहर निकलने में आधुनिक साहित्य और कलाएँ सफल नहीं हुईं, लेकिन इससे उनकी कोशिश का महत्व कम नहीं हो जाता।

महावीर प्रसाद द्विवेदी ने साहित्य को ज्ञानराशि का संचित कोश मानकर और कविता तथा गद्य के अन्तर को मिटाकर और चाहे-अनचाहे साहित्य को पूर्व औपनिवेशिक परम्परा से काटकर जिस प्रकार के साहित्यिक लेखन को पुरस्कृत किया, उसके आदर्श कवि मैथिली शरण गुप्त ही हो सकते थे। मैथिली शरण गुप्त की कविता को देखकर लगता है कि जैसे समूची भारतीय परम्परा में उनसे पहले कोई कवि ही नहीं हुआ और वे पहले व्यक्ति हैं, जिन्होंने कविता लिखने का बीड़ा उठाया है। संवेदनात्मक दृष्टि से कुछ नैतिक आग्रहों के पद्य में अनुवाद के अतिरिक्त शायद ही ऐसा कुछ हो, जिसके लिए उनकी कविता को पढ़ना जरूरी लगे। समूची भारतीय काव्य परम्परा में कविता की दुनिया कभी भी इतनी इकहरी और एकायामी नहीं रही, जितनी मैथिली शरण गुप्त की कविताओं में दिखाई पड़ती है। स्वाभाविक ही था कि छायावादी काव्य में इस एकायामी इतिवृत्तात्मकता से असंतोष फूट पड़ता। लेकिन जैसा पहले भी उल्लेख किया जा चुका है कि ज्यादातर आधुनिक साहित्य का विकास अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त व्यक्तियों द्वारा, अंग्रेजों द्वारा स्थापित शिक्षा केन्द्रों यानी विश्वविद्यालयों के परिसर में हुआ। इसीलिए छायावादी कविता में कृत्रिम कल्पनाशीलता तो खूब है, लेकिन वैसी कल्पनाशीलता बहुत कम है, जिनका जन्म एक गहरी बेचैनी से होता है और जिसके साक्ष्य कबीर, जायसी, सूर, मीरा और यहाँ तक कि तुलसीदास के साहित्य में दिखाई पड़ते हैं।

यह अकारण नहीं है कि समूचे प्रगतिवादी, यथार्थवादी और यहाँ तक कि आधुनिकतावादी साहित्य में भी गहरी सांस्कृतिक बेचैनी और उहापोह के ऐसे निशान कम ही दिखाई पड़ते, जिनसे ये प्रतीत हो कि ये समूचा साहित्य भारतीय सभ्यता की उस सुदीर्घ परम्परा में लिखा गया है, जिसमें सब कुछ बुरा ही नहीं है, बहुत कुछ अच्छा भी है।

अन्त में ये कहना अनुचित नहीं होगा कि सही मायने में भारतीय साहित्य में नवजागरण तो तब होगा जब हम आधुनिकता से पहले की साहित्यिक और ज्ञान परम्परा से तथा लोक परम्परा से, आधुनिकता के निकष को अन्तिम सच न मानते हुए, नए सिरे से संवाद स्थापित करेंगे।

प्रो॰राजकुमार

प्रो॰राजकुमार

प्रो॰ राजकुमार।  शोर-शराबे से दूर अध्ययन-अध्यापन में मग्न रहने  वाले युवा-तुर्क हिन्दी आलोचक। भक्ति साहित्य, हिन्दी नवजागरण, आधुनिकता, आधुनिक साहित्य, प्रेमचंद, हिन्दी कहानी इत्यादि पर लगातार लेखन।  किताबों में जैसी रुचि इनकी  है,  वह अन्यत्र दुर्लभ ही हो गई है। फिलहाल, बी॰एच॰यू॰ के हिन्दी विभाग में प्राध्यापक।इनसे dr.kumar.raj@gmail.com पर संपर्क संभव। 

साभार- नया ज्ञानोदय 

समकालीन कविता का आत्मसंघर्ष: सुधीर रंजन सिंह

By सुधीर रंजन सिंह 

(इस आलेख को भारत भवन में प्रस्तुत करने को लेकर मुझे एक अत्यंत आत्मीय और अग्रज कवि से तीखे विवाद और आत्मसंघर्ष से गुज़रना पड़ा है। मैं कभी किसी राजनीतिक संस्था या लेखक संगठन का सदस्य नहीं रहा। मैं कवि और आलोचक हूँ। कदाचित अस्वीकृत। स्वीकृति की शर्तें पूरी करने में मैं अपने को अयोग्य अनुभव करता हूँ। मंच और संस्थाओं से संवाद के स्तर पर मेरा सम्बन्ध रहा है। इसके लिए भी मैंने खुद होकर विशेष प्रयास नहीं किया। आलोचनात्मक लेखन प्रायः मैंने अपनी अकादमिक आवश्यकताओं  के अधीन किया है। आमंत्रण अथवा आग्रह पर कुछ ही लेखन किए हैं। अवसर ही कम थे। दूसरे स्तर पर, अपने लोगों से सीखने में मैं कभी पीछे नहीं रहा। यह प्रक्रिया है, जिसका लाभ मुझसे दूसरों ने भी लिया होगा। मेरा अनुभव है कि मेरी बातों का जिन लोगों ने लाभ लिया, मंच पर खड़े होने की दशा में उन्होंने मेरी तरफ पीठ कर ली।
मंचों की पीठ मेरी ओर अधिक रही। प्रतिबद्धता की पीठ भी मेरी ओर रही। विरोधियों का सामना करते हुए यह बात होती तो मैं इसे भी सह लेता। उनके साथ तो सामंजस्य के कीर्तिमान स्थापित किए गए। कॅरियर की दुनिया में, चाहे वह साहित्य से सम्बन्धित क्यों न हो, कोई सचमुच शत्रु नहीं होता और सच्चा मित्र भी शायद ही कोई होता है। सच यही है कि सत्ता संरचना से बाहर कोई नहीं है, और इसका पापबोध भी नहीं है। सामंजस्य को रणनीति की संज्ञा दी जाती है। लेकिन उनका यह सोचना कहाँ तक ठीक है कि दूसरे हमेशा  बिना हथियार और रणनीति के अपने पापबोध में अलग-थलग पड़े रहें?
मित्र की मर्जी के विरुद्ध मैंने यह आलेख प्रस्तुत किया, निश्चित  ही यह अपराध मुझसे हुआ है। इसे लेकर मैं यही अनुभव करता हूँ, भर्तृहरि का श्लोक है- ‘‘बौद्धरो मत्सरग्रस्ताः प्रभवः स्मयदूषिताः। अबोधोपहताष्चान्ये जीर्णमंङ्गे सुभाषितम्।।’’ इसकी अनुरचना मेरे द्वारा की गई है- ‘‘जाऊँ, किसे सुनाऊँ/ ठहरे जो विज्ञ विषारद/ रोग डाह का उन्हें लगा है/ कुबेर बड़े कि अधिकारी जो/ रहते ऐंठे-ऐंठे हैं/ जनगण है अपना/ समझ उतना पाए न वह/ छीज जातीं बातें अच्छी/ देह के भीतर।’’)

 लाँग नाइन्टीज़: अनेकान्त काल

विषय है मानवीय मूल्य और समकालीन हिन्दी कविता का आत्मसंघर्ष। यहाँ विशेषण के रूप में आया मानवीय स्वयं मूल्य है, और जहाँ तक मुझे ध्यान है कविता के सन्दर्भ में मानवीय मूल्य को आगे करके कोई बहस नहीं चली है। हिन्दी में नई कविता के सिद्धान्तकारों के द्वारा प्रचलित पद है- मानव मूल्य। यह बहस के लिए तब बड़ा विषय हुआ करता था और उसके पीछे एक उद्देश्य था। साहित्यिक बहसों के पीछे उद्देश्य प्रायः राजनीतिक ही हुआ करते हैं। मानव मूल्य पर विचार के साथ भी यह था। मुझे थोड़ी देर के लिए उस प्रसंग में जाने की इजाजत दें। उसके बाद मैं समकालीन कविता के आत्मसंघर्ष पर जिरह की इजाजत चाहूँगा। अन्त में यदि सम्भव हुआ तो मानवीय मूल्य पर अपनी बात समाप्त करूँगा।

धर्मवीर भारती की एक पुस्तक का नाम है- मानव मूल्य और साहित्य। भारती नई कविता के प्रमुख कवियों में से हैं, लेकिन नई कविता के प्रमुख सिद्धान्तकार थे लक्ष्मीकांत वर्मा और विजय देवनारायण साही। लक्ष्मीकांत वर्मा की पुस्तक नई कवित के प्रतिमान, जो बहस की दृष्टि से उस ज़माने में पर्याप्त महत्त्व की थी, में एक लेख है- मानव विशिष्टता और आत्मविश्वास के आधारमानव विशिष्टता से लक्ष्मीकांत वर्मा का आशय मानव मूल्य ही था। यह 1957 की पुस्तक है। इससे पहले 1948 से 1956 के बीच जयशंकर प्रसाद से पद उधार लेकर लघुमानव की धारणा को आगे किया गया था, जिसका विकास विजय देवनारायण साही के प्रसिद्ध विवादित लेख लघुमानव के बहाने हिन्दी कविता पर बातचीत में हुआ। उसमें लघुमानव को मानव मूल्य का सैद्धान्तिक आधार दिया गया और छायावाद से लेकर अज्ञेय तक की कविता पर विचारोत्तेजक टिप्पणी की गई। बाद में लक्ष्मीकांत वर्मा ने साही के प्रयास को नई कवितावादी सूत्र के रूप में सामने रखा मानव मूल्यों के सन्दर्भ में लघु-मानव की कल्पना नामक लेख में। इस प्रकार, ‘मानव मूल्य पद अथवा अवधारणा नई कविता द्वारा प्रचलित है। उसी की शब्दावली में कहें तो यह नई कविता के सहचिन्तन की उपलब्धि है। यह अच्छी बात है कि नई कविता में सामूहिक चिन्तन था, जो आज प्रायः दुर्लभ हो गया है। उस सामूहिक चिन्तन का दोष यह था, मुक्तिबोध की शब्दावली में कहें, उसने एक क्लोज्ड सिस्टम बना लिया था, जिससे संघर्ष की आवश्यकता थी, और जिसे मुक्तिबोध ने आत्मसंघर्ष की संज्ञा दी थी – नई कविता का आत्मसंघर्ष। आज हम समकालीन कविता के आत्मसंघर्ष पर बात कर रहे हैं तो उस आत्मसंघर्ष को भी याद किया जाना चाहिएजिसे मुक्तिबोध ने नई कविता के सन्दर्भ में आवश्यक समझा था। उनकी यह बात यहाँ याद करने योग्य है, ‘‘नई कविता में स्वयं कई भावधाराएँ हैं, एक भाव-धारा नहीं। इनमें से एक भाव-धारा में प्रगतिशील तत्त्व पर्याप्त है।  समीक्षा होना बहुत आवश्यक है। मेरा अपना मत है, आगे चलकर नई कविता में प्रगतिशील तत्त्व और भी बढ़ते जाएँगे, और वह मानवता के अधिकाधिक समीप आएगी।’’1

आगे चलकर नई कविता में प्रगतिशील तत्त्व तो नहीं बढ़े- नई कविता ही नहीं रही- लेकिन प्रगतिशील कविता का जो अगला विस्तार हुआ, उसमें नई कविता के तत्त्व अवश्य बढ़ गए। यह एक हद तक ज़रूरी भी था। नई कविता में नएपन पर जो जोर था, उसका मूल्य है। उसके कुछ दीग़र मूल्यों से असहमति की गुंजाइश है। मुक्तिबोध का आत्मसंघर्ष उसी गुंजाइश को दर्शाता है। उनके यहाँ मानवता का प्रयोग नई कविता के सहचिन्तन के परिणाम के रूप में आने वाला मानव मूल्य के अर्थ में नहीं हुआ है। नई कविता में मानव मूल्य को अर्थ दिया गया था- अनुभूति की प्रामाणिकता, ‘अनुभूति की ईमानदारी आदि। इस अर्थ में खोट नहीं है, खोट है इसकी ऐतिहासिक नियति में। नई कविता से पहले यूरोप में आवाँगार्द कला में प्रामाणिक अनुभव को पकड़ने का सराहनीय प्रयास हुआ था, लेकिन बाद में वही प्रामाणिक अनुभव शीतयुद्ध की राजनीति की विचारधारा बना, जिसका शिकार नई कविता भी हुई। उसके प्रति मुक्तिबोध ने सावधान किया था। उनके शब्द हैं, ‘नई कविता के बुर्ज से शीतयुद्ध की गोलन्दाजी हो रही है। यह आकस्मिक नहीं है कि मुक्तिबोध ने अनुभूति की प्रामाणिकता के वज़न पर जीवनानुभूति पद को आगे किया। जीवनानुभूति में मानवता का पक्ष प्रबल है। आज हम कह सकते हैं कि जीवनानुभूति की धारणा कविता के सन्दर्भ में पर्याप्त नहीं है, लेकिन उसकी ऐतिहासिक आवश्यकता से इनकार नहीं कर सकते हैं। उसमें शीतयुद्ध की गोलन्दाजी के विरुद्ध जीवनानुभूति के ज़रिए मानवता के अधिकाधिक समीप जाने की चेष्टा की गई है।

शीतयुद्ध 1986-’87 में समाप्त हो गया। आज यह बहस बेकार है कि शीतयुद्ध का खलनायक अमरीका था या अमरीका और रूस दोनों देश। सिर्फ़ यही कहा जा सकता था कि द्विधु्रवीय व्यवस्था से विश्वव्यापी संकट पैदा हो गया था। शीतयुद्ध की समाप्ति के पाँच साल बाद सोवियत-कम्यून भी समाप्त हो गये और  नई विश्व-व्यवस्था आई। इस बात को बीस साल हो गए हैं। आज इस गोष्ठी के माध्यम से कविता के सन्दर्भ में मानव मूल्य का प्रश्न उठाया गया है तो इसकी प्रासंगिकता को समझना हमारे लिए ज़रूरी है। नई कविता की वापसी तो सम्भव नहीं है, लेकिन मुझे लगता है कि नई कविता की जो राजनीति थी, जिससे मुक्तिबोध ने अगाह किया था, उसी तरह की समझ की वापसी हो रही है।

90 के बाद का समय हमारा जीवन काल है- हमारा यानी सामान्य रूप से स्वाधीनता के आसपास जनमे लोगों से लेकर युवतम पीढ़ी का। इनमें संवेदना अथवा चेतना के धरातल पर मैं बहुत भेद नहीं करना चाहता। समसामयिक होने के नाते लोगों के पूर्वग्रह काम कर सकते हैं। समकालीनता के साथ यह बात प्रायः होती ही है। वर्तमान मतभेद की भूमि न हो, तो वह कितनी बेजान चीज़ होगी, इसका अनुमान किया जा सकता है। इसके बावजूद, वर्तमान की वास्तविक विशिष्टताओं का शरसन्धान कठिन होता है। इसके लिए बहुत बड़ी बहस की आवश्यकता है। वर्तमान के अन्तर्विरोध आखिर हमारे ही अन्तर्विरोध होते हैं, जिन्हें समझने के लिए समसामयिक ऐतिहासिक यथार्थ को कठोर आत्मचेतना के स्तर पर पहचानने की आवश्यकता होती है।

समकालीनता पर कच्ची-पक्की बहसें हमेशा चलती रहती हैं। कविता के सन्दर्भ में कई उल्लेखनीय बहसें हुई हैं। अभी-अभी एकांत श्रीवास्तव ने वागर्थ का अंक निकाला है- हिन्दी कविता: 80 के बाद (लाँग नइान्टीज़)। उसमें दस लोगों ने बहस में भाग लिया है। लाँग नाइन्टीज़ की अवधारणा बद्रीनारायण की है। 2008 में देखने को मिली द लाँग नाइन्टीज़: समय को समझने का एक विनम्र प्रस्ताव शीर्षक से। उसी की कड़ी है फटी हुई जीभ की दास्तान नामक लेख जो 2009 में छपा था। वह विचारोत्तेजक मामला है, जिस पर मैंने थोड़ा-सा लिखा है जो आलोचना के नए अंक में छपा है। आज की बहस में भी मैं लाँग नाइन्टीज़ से जुड़ी कुछ बातें कहने की इजाजत चाहूँगा।

लाँग नाइन्टीज़ के पहले राजेश जोशी और विजय कुमार आलोचना के मंच से समकालीनता और कविता विषय को बहस के लिए आगे कर चुके थे। बाद में राजेश जोशी ने अपनी दूसरी नोटबुक वाली किताब का नाम ही रखा- समकालीनता और साहित्य। उसमें समकालीनता और कविता लेख में मेरी धारणा का उल्लेख किया गया है, जो मैंने एरिक हॉब्सबॉम की ‘शॉर्ट सेंचुरी के वज़न पर रखी थी- हमारे अपने सन्दर्भ में 19वीं शताब्दी की शुरूआत 1857 के विद्रोह से और 20वीं शताब्दी की शुरूआत 1947 में मिली आज़ादी से मानी जानी चाहिए। राजेश जोशी ने अपनी सुविधा के अनुसार मेरी उस बात को छोड़ दिया कि हमारे सन्दर्भ में 20वीं शताब्दी लगभग असमाप्त है। समाप्ति के कुछ चिह्न बाबरी मस्जिद के ध्वंस और उसके बाद की कुछ घटनाओं में अवश्य दिखते हैं। लेकिन हम 21वीं शताब्दी में आ गए हैं, कि इसे लेकर मेरे मन में दुविधा है। सूचना-प्रौद्योगिकी के विस्तार के लिहाज से यह आप कह सकते हैं कि हम लगभग 21वीं शताब्दी में आ गए हैं।

यह हमारा जीवन काल है। जब तक हम जि़न्दा हैं इसे समझने के लिए बार-बार नए सिरे से प्रयास की आवश्यकता होगी। और यह कोई प्रलय-काल नहीं है। वे बहुत-सी आशाएँ जो मनुष्य ने कल्पित की थीं, इस काल में फली-फूल रही हैं। एक स्वप्नहीनता के बावजूद। यह बात कविता में भी है। कविता का अर्थ होता है स्वप्नहीनता के विरुद्ध होना, भविष्य की ओर देखना। ब्रेख्त की मशहूर कविता है आने वाली पीढि़यों से, जो इस बेचैनी के साथ शुरू होती है- सचमुच, मैं एक अँधेरे वक्त़ में जी रहा हूँ!यह उस वक्त़ की कविता है जब द्वितीय विश्वयुद्ध का आग़ाज़ हो चुका था। मानवता भीषण ख़तरे में पड़ गई थी। यह कवि के लिए घोर आत्मसंघर्ष का दौर था, जिसमें वह अपनी कमियों को भी टटोलता है। सबने पढ़ी होगी यह कविता। कविता समाप्त होती है-

पर तुम, जब वह वक्त आए

आदमी आदमी का मददगार हो

याद करना हमें

कुछ समझदारी के साथ।

वह वक्त़ आए, कविता इसी के लिए लिखी जाती है। इसी बात में कवि की समकालीनता, आत्मसंघर्ष और भविष्य में उसका जीवन है। यही मानवीय मूल्य भी है। मानवीय मूल्य सत्य के अन्वेषण में है। सत्य वही नहीं जो हम देखते हैं, बड़ा सत्य वह है जो हम चाहते हैं। सवाल यह है कि हम चाहते क्या हैं और कितनी ताकत के साथ चाहते हैं। बहुत ऊर्जा चाहिए। बहुत ताकत चाहिए। बहुत सावधानी भी चाहिए। लेकिन विगत के उद्यमों, चाहे वे आसन्न विगत के क्या न हों, को झुठलाने और नकारने की आवश्यकता नहीं पड़नी चाहिए। पुराने के बीच से ही नया फूटता है। नए के भीतर से दूसरा नया फूटेगा। पुराना फ़ैशन की तरह कभी न लौटे, लेकिन उसका अद्भुत अपनी जगह ज़रूर बना रहेगा, और उसमें झाँकने की भी आवश्यकता बनी रहेगी।

समकालीन कवि वह है जो अपने को पूर्ववर्तियों की वैचारिक मान्यताओं की कड़ी के रूप में देखता है। वह केवल वास्तविकता की ओर उन्मुख नहीं है। वास्तविकता को वह आत्मचेतना के स्तर पर रचने का प्रयास करता है, जिसमें भविष्य और उसके रास्ते संकेतित होते हैं। यह काम चुपचाप चलता है, बहुत बोलकर नहीं। कविता की यही प्रकृति है। कवि के आत्मसंघर्ष की यह प्रकृति है। कवि वास्तविकता का हिस्सा मात्र नहीं होता। वह वास्तविकता के विरुद्ध एकांत की रचना करता है,और एकांत जिस चुप्पी की रचना करता है उसमें अनन्त का स्फोट होता है। दूसरे शब्दों में, भविष्य का स्फोट होता है।

प्रश्न है हमारा समय क्या है? हमारे समय की कविता कैसी है? बद्री हमारे समय को लाँग नाइन्टीज़ नाम देते हैं। लाँग नाइन्टीज़ यानी हॉब्सबॉम की ‘शॉर्ट सेंचुरी के बाद का समय, जिसमें पुराना समाप्त हो चुका, लेकिन नए का स्वप्न साफ नहीं है। लाँग नाइन्टीज़ पद में, इस तरह समाजवाद के भविष्य के प्रति निराशा दिखाई देती है। निराशा उचित है। लेकिन उस निराशा के उत्तर में इधर-उधर से लाए गए वैचारिक संस्रोतों में जो चमक और ऊर्जा देखी गई है, और जिस तरह पूर्व पीढ़ी के कृतित्व पर शरसन्धान किया गया है, वह आत्मश्लाघापूर्ण विच्छेद की ऊँचाई पर है। किसान, मजदूर और प्रोलेटेरियत आन्दोलनांे के बरक्स उपेक्षित एवं दलित, महिला एवं सबाल्टर्न प्रतिरोध बद्री के अनुसार ’90 के बाद की विशेषता है। (वागर्थ-209/34) इससे सहमत होने की गुंजाइश मेरी समझ से कम बनती है। ये बातें बहुत पहले पैदा हो गई थीं। हॉब्सबॉम की पुस्तक एज़ ऑफ एक्सट्रिम्स के शुरू में लोगों की नज़र में बीसवीं शताब्दी क्या है शीर्षक के अन्तर्गत कुछ टिप्पणियाँ शामिल की गईं हैं। नोबेल पुरस्कार से सम्मानित रीता लेवी मोंतेलसिनी की टिप्पणी है, ‘‘सभी बातों के बावजूद इस शताब्दी में अच्छे से अधिक अच्छे के लिए क्रांतियाँ हुई हैं… चैथी सत्ता का उदय और सदियों से दमित नारी का उत्थान।’’ यह बात यूरोप की तुलना में भारत में कम हुई थी, लेकिन हुई थी। कविता में भी ’90 से पहले यह दिखाई पड़ती है। रघुवीर सहाय में स्त्री प्रश्न खूब है। मंगलेश, अरुण कमल, राजेश जोशी और उदयप्रकाश में भी है। यह अलग बात है कि इन कवियों ने इसे अलगा कर दिखाने की कोशिश नहीं की, और पिछले दौर में कवयित्रियों का अभाव रहा। अच्छी बात है कि बद्री ने अपने पूर्व के कुछ कवियों को, जिसमें राजेश और अरुण हैं, सरलीकरण की प्रवृत्ति से बाहर रखकर देखा है, लेकिन इसके लिए उन्हें ’90 का ऋणी बना दिया है। बड़ी चीज़ नब्बे है; जैसे पहले छायावाद के विरुद्ध बड़ी चीज़ नई कविता थी। नयी कविता छायावादी संस्कार की शत्रु थी; ’90 परवर्ती प्रगतिशील संस्कार का किंचित शत्रु हुआ।

प्रगतिशील कविता, अपने सफल-असफल दावों में, मानवता के लिए संश्लिष्ट विश्वदृष्टि अर्जित करने का प्रयास करती है। विश्वदृष्टि का अर्थ विचारधारा अथवा माक्र्सवादी दृष्टि नहीं। विश्वदृष्टि का सम्बन्ध साहित्य से है, वह साहित्य से उद्भूत होने वाली चीज़ है। नई कविता भी विश्वदृष्टि अर्जित करने का प्रयास करती है। अज्ञेय के यहाँ यह बात है। प्रगतिशील कविता और नई कविता, दोनों आधारभूत विभिन्नताओं को टटोलने का प्रयास करती हैं। दोनों अपने-अपने स्तर पर एक जगह आकर मिलने का भी प्रयास करती हैं। शमशेर और मुक्तिबोध, दोनों इस बात के उदाहरण हैं। अच्छी बात थी कि इन कवियों में जीत की तमन्ना थी तो असफलता का इतिहास रचने का साहस था, जो बाद में कम दिखाई पड़ता है। आज सफलता के लिए जोड़-तोड़ कितना बढ़ा है, बद्रीनारायण को भी मालूम है।

बद्रीनारायण ने जितने समकालीन प्रतिरोध गिनाए हैं, उनमें से एक है सबाल्टर्न। यह भी ’90 की कोई संवृत्ति नहीं है। दूसरी बात, जैसे आवाँगार्द की कला में बाद में आकर्षण नहीं बचा था, वही बात सबाल्टर्न के साथ है। सबाल्टर्न लोग त्रासदी के प्रसन्न-चित्त आख्याता बन गए, सांस्कृतिक प्रभुत्व (कल्चरल हिगेमनी) तोड़ना उनके एजेंडे में नहीं रहा। आज जब मजदूरों, किसानों, निम्न बुर्जुआ का लोकप्रिय गठबंधन, जिसे जनता कहा जाता है, गायब हो रहा है, सबाल्टर्न पर फ्रेडरिक जैम्सन की उत्तर आधुनिकता के विमर्षों पर यह टिप्पणी सही बैठती है।

इसके लिए फ्रायड के स्वप्न विश्लेषण के रूपक का इस्तेमाल किया गया है। संभवतः सब बातों के बावजूद यह नई कहानी नहीं है। फ्रायड के उस आनन्द को याद करें जो उन्हें एक अस्पष्ट आदिवासी संस्कृति की खोज से प्राप्त हुआ था। स्वप्न विश्लेषण की अनेक परम्पराओं में से सिर्फ़ यह खोज उनकी अवधारणा के काम की थी कि सभी स्वप्नों के सेक्स सम्बन्धी छुपे अर्थ होते हैं- केवल सेक्स सम्बन्धी स्वप्नों के, जिसके कुछ और ही अर्थ होते हैं। यही बात उत्तर आधुनिक बहसों पर भी लागू होती है। जिस विराजनीतिक नौकरशाही से यह संवाद स्थापित करता है, वहाँ समस्त सांस्कृतिक लगने वाली बातें राजनीतिक नीतिशिक्षण का प्रतीकात्मक रूप निकालती हैं- सिवाय एकमात्र स्पष्ट राजनीतिक स्वर के जो पुनः राजनीति से संस्कृति में घुसपैठ का लक्ष्य रखता है।2

    बद्रीनारायण ने ’90 के दशक में उभरे कवियों में सामान्य सम्बन्ध-सूत्र की दृष्टि से स्थानीयता अथवा लोक को जो महत्त्व दिया है वह तब तक फ्रायडीय आनन्द से आगे की कहानी नहीं बन सकता, जब तक कि उसकी आधारभूत विभिन्नता किसी संश्लिष्ट और मूलगामी विश्वदृष्टि पर आकर नहीं मिलती। कम-से-कम दबाव पैदा करने की षक्ति तो उसमें होनी ही चाहिए। मैं यह नहीं कहता कि आज की कविता में यह बात एकदम नहीं है; लेकिन स्थानीयता अथवा लोक के नाम पर विराजनीतिक नौकरशाही से सामंजस्य बैठाने और सत्ता संरचना में अपने को खपा देने का भी काम कम नहीं हुआ है। संभव है कि इस कहानी के हम भी किरदार और पवित्र पापी हों। इस बात से कविता के आत्मसंघर्ष का गहरा सम्बन्ध है।

    फूको प्रतिपादित करते हैं सत्ता सर्वत्र है। कोई भी ऐसा स्थान नहीं है, जहाँ से प्रतिरोध को सत्ता से अलगाया जा सके। जो विरोध में खड़ा है वह वास्तव में दूसरे प्रकार की सत्ता है। साहित्य अथवा कविता प्रतिरोध की सत्ता के रूप में भी इसका अपवाद नहीं है। इसलिए पूर्व पीढ़ी को कोसना और अपनी पीठ थपथपाना ठीक नहीं है। इस रास्ते हम समकाल के ही बन्दी हो जाते हैं। ठीक काम यह है कि हम समसामयिक ऐतिहासिक यथार्थ और उसकी चुनौतियों से आत्मचेतना के स्तर पर टकराते रहें। इसे सच्ची रचनाशीलता कही जा सकती है। इससे नए रास्ते निकलेंगे, नई युगचेतना निर्मित होगी। परिवर्तनकारी समय (पद बद्री का) की रचना भी इसी रास्ते होगी। भारत माता ग्राम-वासिनी, जो लाँग नाइन्टीज़ के सम्पादकीय में एकांत श्रीवास्तव ने उत्साह में जो कहा है, भावना के स्तर पर मैं उनकी बात की इज्जत करता हूँ, लेकिन उसमें निहित नाॅस्टैलिजिया और रूमानियत से बात नहीं बनेगी। कई-कई विषय और भावधाराओं की ज़रूरत है। समकालीन कविता के आत्मसंघर्ष में केवल गाँव और कस्बा शामिल नहीं हैं। विगत की तुलना में उसके क्षेत्र में कई गुना विषय बढ़ गए हैं। काव्य-वस्तु के विकास के लिए भी संघर्ष करना है, जो इस सूचना प्रौद्योगिकी युग में कई गुना कठिन हो गया है। काव्य-विषय की दृष्टि से हमें भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। सूचना प्रौद्योगिकी की पहुँच कवि-चेतना को मात कर देती है। उससे सीखने और टकराने, दोनों की ज़रूरत है। हम सूचना और संचार प्रविधियों की अर्थव्यवस्था में आ चुके हैं। इसकी नई उत्पादन विधि, डी. फोरे की मानें तो, साॅफ्टवेयर के विकास को भी पार कर जाएगी, किस हद तक, उसे अभी समझा नहीं जा सकता है।3 इस तरह कवि-कर्म कठिन से कठिनतर होता जाएगा। ऐसे में, हमारी अन्तःप्रेरणाएँ ही सबसे अधिक काम आएँगी। दूसरी बात, सूचना प्रौद्योगिकी भी विषय है। बड़ा विषय है। जैसे पहले औद्योगिक क्रान्ति और मजदूरों के आन्दोलन बड़े विषय थे।

    हमारे समकालीन कवि दो प्रकार के हैं। एक वे हैं जो अपनी रचना और उसके विषयों को लेकर बहुत मुखर हैं। उन्हें अपने को मनवाने की चिन्ता अधिक रहती है। समझौताविहीन स्तर पर और बेहतरी की दिशा में या कहें प्रगति की मंशा से यदि किसी में यह है, उसे भी आत्मसंघर्ष के रूप में मंजूर किया जाना चाहिए। दूसरे वे हैं जो अपने कवि होने के प्रति संकोच का भाव रखते हैं। उनका आत्मसंघर्ष कठिन है। उनमें अन्तःप्रेरणाएँ अधिक सक्रिय रहती हैं, लेकिन उन्हें समझने में कवि अपने को असमर्थ महसूस करता है। जब कवि ही नहीं समझ पाता तो दूसरों के लिए समझना मुश्किल काम होगा ही। इस मुश्किल के भीतर कवि के आत्मसंघर्ष को समझने और इसी दृष्टि से उसे महत्त्व दिए जाने की आवश्यकता है। आज कवि बहुत हैं, लेकिन इस मुश्किल के भीतर ऊँचाई पाने वाले कवि बहुत कम हैं। जो हैं उन्हें आगे रखकर देखने की ज़रूरत है। आत्मसंघर्ष वाली बात ठीक-ठीक तभी समझ में आ सकती है।

    अन्तःप्रेरणा- जिसे पुराने लोग कारयित्री प्रतिभा कहते थे। यह उत्पाद्य प्रतिभा है। प्रतिभा कहने से भी काम चल सकता है। इसमें अनुभूति, जीवनानुभूति और कलात्मक अनुभूति, सभी बातें शामिल हो जाती हैं। यह सदैव बेहतरी अथवा अच्छाई की दिशा में सक्रिय रहती है। इसे मान लेने के बावजूद, जैसा कि मैं समझता हूँ, अन्तःप्रेरणा वह स्पेस है जहाँ अच्छाई और बुराई को बराबर का दर्जा प्राप्त होता है। अन्तःप्रेरणा में हम एक वस्तु को दूसरी वस्तु को विकल्प के रूप में नहीं देखते, उनसे चेतनागत सम्बन्ध अथवा विषेष प्रकार का तादात्म्य स्थापित करते हैं। सम्बन्ध की प्रकृति अथवा वह विषेष प्रकार क्या है, यह महत्त्वपूर्ण है। अन्तःप्रेरणा की क्रियाओं में अच्छा और बुरा दोनों समान महत्त्व रखते हैं। इस सम्बन्ध में फूको का एक कथन याद आता है, ‘‘मैं नहीं कहता कि सभी चीज़ें बुरी हैं, लेकिन वे सभी चीज़ें खतरनाक हैं जो ठीक-ठीक बुरी के समान नहीं हैं।’’4

    एक साक्षात्कार में यह बात आई है। और मैं जब यह पढ़ रहा था तो अचानक मुझे रामचरितमानस का अन्तिम दोहा याद आया-

कामहि नारि पिआरी जिमि लोभहि प्रिय जिमि दाम।

तिमि  रघुनाथ  निरंतर  प्रिय  लागहु  मोहि राम।

    मैंने शुरू में कहा था कि अंत में मानवीय मूल्य पर भी एकाध बात करूँगा। कामपिपासा और लोभ बुराई है, अमानवीय है। तुलसी ने अपनी भक्ति को उसके समकक्ष रखा। बुराई में जितनी शक्ति होती है, वह भक्ति को प्राप्त हो, भाव यह है। भक्ति को पाने के लिए उस पर बुराई को उत्प्रेक्षित करना पड़ा। मानवीय मूल्य तो ठीक है, लेकिन जो संसार है उसमें मानवीय-अमानवीय, अच्छा-बुरा, सब कुछ है- सुगुन छीर अवगुन जल ताता; मिलइ रचइ परपंच विधाता।

    अन्तःप्रेरणा के क्षेत्र में अन्तर्बाधा के लिए स्थान नहीं है। लेखक के नाते हम जानते हैं कि मूल्य अन्तिम नहीं होते। सात्र्र का यह कथन महत्त्वपूर्ण है, ‘‘मानवता को अभी निर्धारित होना बाकी है।’’ यही समझ हमें फासीवादी होने से बचाती है और आत्मसंघर्ष के लिए युक्ति प्रदान करती है।

    एक साथ कई विषयों से गुज़रना और उनसे जुड़े प्रश्नों पर बात करना कठिनाई पैदा करता है। यह दौर ही ऐसा है- अनेक विषयों और प्रश्नों से घिरा। इस अर्थ में मैं मानता हूँ कि नौवाँ दशक और उसके बाद का समय अलग से दिखाई देता है। लेकिन इसे लाँग नाइन्टीज़ ही कहा जाए, इसे लेकर मेरे मन में दुविधा है। बद्रीनारायण की इस बात से मैं सहमत हूँ कि नब्बे के दशक के पूर्व की कविता में जा वैचारिक संस्रोत काम कर रहे थे, वे बाद में कमजोर पड़ गए या अपर्याप्त साबित हुए। हमारे समय में अनेकान्त का महत्त्व है। हम किसी भी बुनियादी विषय पर एकमत होने की स्थिति में पहले की तुलना में बहुत कम हैं। दूसरी ओर, दूसरों की तरफ से प्रस्तावित विषय और विचार के प्रति हम पहले की तरह द्वेषी नहीं हैं। हम अकेला विकल्प हैं, यह बात अब नहीं रही। हमारा विवाद सबसे है और अपने आपसे भी है, जो जीवन और रचनाशीलता दोनों में मायने पैदा कर रहा है। लेकिन जिस दुनिया में हम जी रहे हैं उसमें ख़तरे भी कई गुना बढ़ गए हैं, उसमें हार जाने का डर विगत की तुलना में बढ़ गया है। यह एक ऐसा क्षण अथवा विन्दु है जो हमें इस समझ पर कायम होने के लिए विवश करता है कि पिछले दर्शन का महत्त्व है, लेकिन उसमें ज़रूरी संशोधन और नये अध्याय जोड़ने की ज़रूरत पड़ेगी। अभी तो हमें यही पता नहीं है कि हम कहाँ जा रहे हैं। यह अनेकान्त काल है। लेकिन रचनाशीलता के लिए, तमाम मुश्किलों के बावजूद, यही ऊर्वर काल है। हमें अपना काम करते हुए इस उम्मीद पर अपने को कायम रखने की ज़रूरत है, जो ब्रेख्त की उद्धृत पंक्तियों में है, ‘…जब वह वक्त आए/ आदमी-आदमी का मददगार हो/ याद रखना हमें/ कुछ समझदारी के साथ। जब वह वक्त़ आएगा तो बे्रख्त के साथ शायद हमें भी कुछ समझदारी के साथ थोड़ा याद रखा जाए। आमीन!

 सन्दर्भ:

(1) मुक्तिबोध रचनावली-5/334 (पे.बै.).

(2) फ्रेडरिक जैम्सन, पोस्ट मार्डनिज़्म ऑर द कल्चरल लॉजिक  ऑफ लेट कैपिटलिज़्म, पृ.-64.

(3) प्रसन्न कुमार चैधरी की पाण्डुलिपि अतिक्रमण की अन्तर्यात्रा से साभार.

(4) फूको रीडर, पॉल  रेबिनो (सम्पादक), पृ.-343.

 भारत भवन में 21.12.2012 को पढ़ा गया आलेख। कुछ अंश नहीं पढ़े गए। संशोधित।

sudhir ranjan singh

sudhir ranjan singh

हिन्दी के आलोचक। काव्य संकलन ‘और कुछ नहीं तो’ और आलोचना की पुस्तक ‘हिन्दी समुदाय और राष्ट्रवाद’ प्रकाशित। एक कविता संकलन और आलोचना की दो पुस्तकें शीद्घ्र प्रकाश्य। भोपाल के शासकीय महाविद्यालय में प्राध्यापन।

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