एक साम्यवादी के साहित्यिक पर्चे: उस्मान ख़ान

कथा-साहित्य के एक विधा के रूप में ‘व्यंग्य’ को व्याख्यायित करने का पहला गंभीर प्रयास हिंदी में सुरेंद्र चौधरी द्वारा संपन्न हुआ है. वे व्यंग्य को ‘आत्मतंत्र-स्वतंत्र’ विधा के रूप में चिन्हित करते हैं. चौधरी जी मानना है कि व्यंग्य के लिए माकूल संयोजन सर्वप्रथम मध्यवर्गीय जीवन और दूसरी, संक्रमणशील परिस्थितियाँ  द्वारा संपन्न होता है. वे कहते हैं, “मध्यवर्ग की जीवनदृष्टि में जो समझौता परस्ती है वह व्यंग्य के लिए गुंजाइश पैदा कर देती है. व्यापक रूप से मध्यवर्ग का जीवन ही व्यंग्य का विषय रहा है.” संक्रमणशील परिस्थितियाँ यही है कि पुराना युग ख़त्म हो रहा है, नया युग आ रहा है। पारंपरिक और रूढ़िवादी मान्यताएँ टूट रही हैं और आधुनिक जीवन शैली आ रही है। धार्मिक जीवन मूल्यों का  ह्रास और सेक्युलर जीवन-मूल्यों की संभावना का उभार आदि संक्रमणशील परिस्थितियों के कुछ उदाहरण हैं। लेकिन, पुराने और नए में टकराहट, सामंजस्य और नहीं तो एक अजीब तरह की खिचड़ी, सामने नज़र  आती है। सुरेंद्र चौधरी इसी ‘खिचड़ी’ का एक उदाहरण प्रेमचंद की कहानी ‘आँसुओं की होली’ से देते हैं- ” बेचारे  सिलबिल सचमुच सिलबिल थे। दफ्रतर जा रहे हैं, मगर पायजामे का इजारबंद नीचे लटक रहा है, सिर पर पफेल्ट कैप है मगर लंबी-सी चुटिया पीछे झाँक रही हैं…।” 

व्यंग्य पर विचार करते हुए जो चीज़ परेशान कर रही है, वह है समकालीन कहानियों से व्यंग्य की भंगिमा का ही गायब हो जाना। सुरेंद्र चौधरी ने  था – “मात्र चमत्कारिक और आश्चर्य प्रदान करने के झटके व्यंग्य की कोटि में आज नहीं आ सकते। दूसरी चीज़ यह है कि आज हमने बहुत हद तक अंतर्विरोधों से समझौता कर लिया है और मानने लगे हैं कि मानव-जीवन में अंतर्विरोध कोई पाप नहीं है। यदि कोई इस अंतर्विरोध को अपने व्यक्तित्व का संप्रसार; (व्हिट्मैन  – आई एम वास्ट, आई कंटेन मल्टिट्यूड्स) मान लेता है तो फिर उस पर व्यंग्य करने का प्रश्न ही कहाँ उठता है।”

फ़िलहाल परसाई, व्यंग्य और लेखकों के राजनीतिक कार्यभार से संबंधित उस्मान खान का यह लेख पढ़ें! #तिरछीspelling 

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‘आवारा भीड़ के ख़तरे’ और संकट की निरंतरता

By उस्मान खान 

अधिकांश आधुनिक सामाजिक क्रांतियों में साहित्यिक नेतृत्वकारी भूमिका में रहे हैं। आज भी ऐसे साहित्यिक हैं, जो समाज की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। मशीनों और तकनीक के उत्तरोत्तर विकास, मुनाफ़े की अंधी दौड़ और अतिउत्पादन ने साहित्य और साहित्यिक का समाजीकरण किया। आज हर कोई कवि है, लेखक है। साहित्य का ऐसा उत्पात भारत में कभी नहीं हुआ था। इन बदलावों ने साहित्य के समाज का विस्तार तो किया ही, साथ ही उसकी प्राचीनकाल से बनी रही पवित्रता को भी नष्ट कर दिया। सामंतकालिन भारत में साहित्य मनोरंजन का साधन था, शिक्षा का माध्यम था, साथ ही साथ पवित्र भी। उपनिवेशी-पूंजीवाद के मजबूत होने के साथ भारत में साहित्यिक की स्थिति में बदलाव हुआ। वे राजनीति में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने लगे। इस प्रक्रिया में नए ढंग का साहित्य निर्मित होने लगा। उपन्यास जैसी पूंजीवादी युग में जन्मी विधा ने हिन्दी-साहित्यिकों को भी अपने प्रभाव में ले लिया।

हिन्दी-साहित्य के इतिहास में सामंतकाल में भी साहित्यिकों और राजनीति के अंतर्संबंध देखे जा सकते हैं, लेकिन पूंजीवादी युग के प्रारम्भ के साथ ही नई राजनीति का भी जन्म होता है, यह लोकतन्त्र की राजनीति थी, इसीने दक्षिणपंथ और वामपंथ जैसी आधुनिक राजनैतिक धाराओं का विकास किया। हिन्दी के साहित्यिक भी इन दो खेमों में बंटते चले गए।

यहाँ यह नहीं भूलना चाहिए कि राजनीति कला के तीनों स्तरों – शास्त्रीय, लोकप्रिय और लोक – पर अपना असर डालती है। साहित्य के भी तीनों स्तरों पर राजनीति ने अपना प्रभाव डाला है। पूंजीवादी युग का साहित्य राजनीति को समझे बिना नहीं समझा जा सकता। राजनीति पूंजीवादी युग के साहित्य का प्रमुख संदर्भ है। प्रेमचंद इस संदर्भ को समझते थे, साथ ही साहित्य का मूल्य उनके लिए राजनीति की दिशा तय करने में था। साहित्य पर ऐसा विश्वास कम लोगों का होता है।

हरीशंकर परसाई प्रेमचंद और वामपंथ की परंपरा के साहित्यिक हैं। वे राजनीति को साहित्य के लिए अपवित्र क्षेत्र नहीं मानते। और उनके साहित्य पर प्रमुख आक्षेप भी यही है कि वे राजनीति के संदर्भ का अत्यधिक प्रयोग करते हैं, इसी कारण वे तात्कालिक लेखन करते हैं, उनका लेखन कालजयी नहीं है। बल्कि वे साहित्यिक ही नहीं हैं। वास्तव में, कुछ समीक्षक साहित्य के अनंत क्षेत्र-विस्तार से डरते हैं। वे यह नहीं मान पाते कि साहित्य निरंतर अपना क्षेत्र-विस्तार करता जाता है। यही साहित्य का स्वभाव है। क्या कबीर को कवि मानने में समीक्षक लंबे समय तक बाधा नहीं बनते रहे?

पूंजीवादी युग ने साहित्य के क्षेत्र-विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इंटरनेट-मोबाईल, रोबोट और अत्यधिक भारी मशीनें, बुलेट-ट्रेन और पॉर्न… साहित्य अपना क्षेत्र-विस्तार करता जा रहा है। इसे स्वीकार ना करना ख़ुद को धोखा देना है।

व्यंग्य एक विधा की तरह पूंजीवादी युग में ही विकसित हुआ। कविता, निबंध, लेख, कथा, उपन्यास आदि विधाओं से अंतर्संबंध स्थापित कर व्यंग्य विधा विकसित होती रही है। हिन्दी-साहित्य में व्यंग्य विधा के प्रमुख निर्माताओं में हरीशंकर परसाई का नाम लिया जाता है, यह निश्चित ही उन समीक्षकों के कारण नहीं, जो परसाई को लेखक ही नहीं मानते। परसाई ने उन समीक्षकों की उपेक्षा कर बुरा नहीं किया।

व्यंग्य-विधा के विकास में राजनीति की भूमिका और भी स्पष्ट हो जाती है। व्यंग्य का प्रधान विषय अफसरशाही, भ्रष्टाचार और बाह्याडंबर रहे हैं। आश्चर्य है कि स्वस्थ हास्य-व्यंग्यकारों ने वामपंथी धारा को ही मज़बूत किया। दक्षिणपंथी राजनीति के पैरोकार हास्य-व्यंग्य से परहेज़ करते हैं। परसाई ने ‘वनमानुष नहीं हँसता’ में इस ओर संकेत किया है। इस संग्रह में अक्तूबर १९८८ से नवंबर १९९४ तक की रचनाएँ शामिल हैं। १० अगस्त १९९५ को उनकी मृत्यु हो गई। इस संग्रह में शामिल रचनाएँ उनकी प्रौढ़तम रचनाएँ हैं।

इस संग्रह के लेखों के लिखे जाने का समय भारत में आर्थिक नीतियों, सामाजिक-सम्बन्धों और राजनीति के क्षेत्र में तेज़ बदलावों का समय था। इसे संक्रमण-काल कहा जा सकता है। इसने वर्तमान भारत के निर्माण को निश्चित किया। भारतीय समाज और साहित्य में तब से अब तक निरंतर बने रहने वाले संकट को परसाई ने अपनी इन रचनाओं में विश्लेषित करने की कोशिश की है। सभ्यता का संकट सदी या साल देखकर शुरू नहीं होता। वर्तमान साहित्य के संकट की जड़ें इसी संक्रमण-काल में हैं।

संग्रह का पहला लेख ‘आवारा भीड़ के ख़तरे’ है, इसे संग्रह का सबसे उत्तेजक लेख कहा जा सकता है। यह लेख यूँ शुरू होता है – “एक अंतरंग गोष्ठी-सी हो रही थी युवा असंतोष पर। इलाहाबाद के लक्ष्मीकांत वर्मा ने बताया – पिछली दीपावली पर एक साड़ी की दुकान पर काँच के केस में सुंदर साड़ी से सजी एक सुंदर मॉडल खड़ी थी। एक युवक ने एकाएक पत्थर उठाकर उस पर दे मारा। काँच टूट गया। आसपास के लोगों ने पूछा कि तुमने ऐसा क्यूँ किया? उसने तमतमाए चेहरे से जवाब दिया – हरामजादी बहुत खूबसूरत है।

हम ४-५ लेखक चर्चा करते रहे कि लड़के के इस कृत्य का क्या कारण है? क्या अर्थ है? यह कैसी मानसिकता है? यह मानसिकता क्यों बनी? बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में ये सवाल दुनिया भर में युवाओं के बारे में उठ रहे हैं – पश्चिम के सम्पन्न देशों में भी और तीसरी दुनिया के गरीब देशों में भी।

“क्या यही मानसिकता आज हत्या और बलात्कार के विडियो बनाने तक नहीं ले आई है? परसाई इसके लिए युवाओं को दोष नहीं देते, उनके अनुसार बड़े-बूढ़ों की कथनी-करनी में अंतर देखकर युवा भ्रमित होते हैं, निराश होते हैं, और इस तरह के कदम उठाते हैं। पूंजीवादी सभ्यता के विस्तार और प्रभाव को युवाओं के संदर्भ में समझने का प्रयास करते हुए वे पिता, गुरु, समाज के नेता और फासीवाद के अंतर्संबंधों को भी स्पष्ट करते जाते हैं। वे इसे युवाओं में आस्था का संकट भी कहते हैं क्यूंकी “सब बड़े उनके सामने नंगे हैं।“

यह लेख एक अपील की तरह है। समाज और राजनीति के विद्रुप को उजागर करते हुए परसाई युवाओं से विचारधारा, संकल्पशीलता, सकारात्मक उत्साह, संगठित संघर्ष की आशा करते हैं। साथ ही वे यह तथ्य भी दर्शा देते हैं – “पर मैं देख रहा हूँ, एक नई पीढ़ी अपने से ऊपर की पीढ़ी से अधिक जड़ और दक़ियानूसी हो गई है।“ युवाओं की हताश-नकारवादी स्थिति का प्रमुख कारण बेरोज़गारी है। ये बेरोज़गार युवा धार्मिक उन्मादियों के पीछे चलने लगते हैं। फासीवादी राज्य के निर्माण की प्रबल शक्ति ये बेरोज़गार हैं।

अब आप सोचिए कि बढ़ता हुआ शहर है, शहर में बाज़ार है, बाज़ार में भीड़ है, भीड़ में साहित्यिक भी है, वह एक व्यक्ति को खुले में पेशाब करने से रोकता है, वह व्यक्ति साहित्यिक की पिटाई कर देता है। उस व्यक्ति ने साहित्यिक की पिटाई क्यूँ की? वह चाहता तो अपने इस काम पर शर्मिंदा हो सकता था, चाहता तो आगे ऐसा न करने की बात कह सकता था, चाहता तो कह सकता था, ‘अपना काम देखो भाईसाब!’। मैं कहता हूँ, अगर कवि में लड़ने की क्षमता नहीं थी, तो कवि विरोध करने क्यूँ गया? हमारा कवि सिर्फ बातों से क्यूँ लड़ना चाहता है, हाथों से क्यूँ नहीं? यह २०१७ की घटना है। परसाई की बताई घटना और हमारी बताई घटना के बीच हिंसा-उन्माद की हज़ारों नहीं लाखों घटनाएँ भारत में घट चुकी हैं। क्या संक्रमण-काल इतना लंबा होता है?

हिन्दी का साहित्यिक भारत-विभाजन के समय भड़की सांप्रदायिक-हिंसा और फ़साद में लगभग उदासीन बना रहा था, लेकिन ८० के दशक में शुरू हुए जाति-धर्म आधारित मानव-संहारों से वह उदासीन नहीं रह सका। उसने सभ्यता के संकट को, मानव-गरीमा को नए सिरे से पहचानना शुरू किया। इसका प्रारम्भ आवारा भीड़ के ख़तरे पहचानने से हुआ। यह भीड़ किसी तानाशाही शक्ति से सम्मोहित होती है। अंध-विश्वास इस भीड़ की विचारधारा है। यह भीड़ लोकतांत्रिक और वैज्ञानिक मूल्यों के विध्वंस से जन्म लेती है। तानाशाह एक ऐसा व्यक्ति दिखाई देता है, जो जादूगर है, वह छड़ी घुमाएगा और सारी समस्याएँ हल हो जाएँगी। वह ईश्वर है, ईश्वर का वारिस है, भीड़ में पैदा किए गए काल्पनिक भय का भंजक, अतीत के आभासी अपमानों का बदला लेने वाला – सर्वाधिक हिंसक।

दक्षिणपंथ और वामपंथ के अपने-अपने मूल्य हैं। जहाँ दक्षिणपंथ तानाशाही और अंध-विश्वास को अपना जीवन-मूल्य मानता है, वहीं वामपंथ लोकतन्त्र और विज्ञान को। जिस समय परसाई ये लेख लिख रहे थे, वामपंथ कमज़ोर होता जा रहा था और दक्षिणपंथ मज़बूत। दुनिया-भर में समाजवाद के अंत की बात की जा रही थी। वैज्ञानिक सोच पर प्रश्न-चिन्ह लगाए जा रहे थे। इतिहास का अंत, विचारधारा का अंत, कला का अंत आदि धारनाएँ प्रचलित हो चली थी। लेनिनवाद, सामाजिक-जनतंत्र, कल्याणकारी राज्य आदि के संकट की चर्चाएँ होने लगी थीं। इस स्थिति को अमेरिका और यूरोप के बौद्धिकों ने उत्तर-आधुनिकता कहा, इसे फ़्रेडरिक जेमसन ने ‘प्रौढ़ पूंजीवाद का सांस्कृतिक तर्क’ कहा। अमेरिका और यूरोप में इसकी शुरुआत ५०वें और ६०वें दशक से मानी जाती है, पर इस स्थिति के प्रभावी होने का समय ८० और ९० का दशक है। भारत में ९० के दशक में इस स्थिति के साथ ही उत्तर-उपनिवेश, अस्मितावाद-समुदायवाद, निम्न-वर्गीय इतिहास आदि धारनाएँ भी प्रचलित होने लगी थी। हिन्दी का साहित्यिक इन संकटों और धारणाओं के मध्य लिख रहा था।

भारत में इन संकटों का समाधान दक्षिणपंथी जीवन-मूल्यों के हावी होने के साथ हुआ। भारत पूंजीवादी विकास की नई मंज़िल पर पहुँच गया। परसाई इंटरनेट-मोबाइल का ज़माना नहीं देख सके, लेकिन टेलीविज़न, मीडिया आदि के बढ़ते प्रभाव को वे देख पा रहे थे। उन्होने लिखा, ‘टेलीविज़न का निजी यथार्थ होता है’। आज हम ‘ब्लू-व्हेल’ जैसे खेलों से परिचित हैं। आभासी दुनिया और वास्तविक दुनिया में अंतर समाप्त होता जा रहा है। कृत्रिम बुद्धि, क्लोन और रोबोट समाज को एक नई मंज़िल पर ले जाने के लिए खड़े हैं। परसाई तकनीकी विकास के विरोधी नहीं हैं। उन्हें टेलीविज़न से शिकायत है, क्यूंकी कोलाहल बढ़ता है। हमें मीडिया से शिकायत है, क्यूंकी वह झूठ और अफ़वाह का कारोबार करती है। दक्षिणपंथ के पौधे के लिए झूठ और अफ़वाह खाद और पानी की तरह है।

सोवियत समाजवाद के बिखरने के साथ ही संकटों का यह नया दौर शुरू होता है। साहित्य और साहित्यिकों के लिए इन स्थितियों ने नए संकट पैदा किए। आज साहित्य का मूल्य और साहित्यिक की प्रतिबद्धता प्रकाशन-व्यापार पर आश्रित है, न कि जनता की पसंद-नापसंद पर। कला के अन्य क्षेत्रों में भी यही स्थिति देखी जा सकती है। परसाई जैसे लेखक जो जनता के भरोसे लिखते थे, लगातार कम होते चले गए। जैसे परसाई के साथ हिन्दी का व्यंग्य-लेखन शुरू हुआ, वैसे ही परसाई के साथ ख़तम भी हो गया। हिन्दी में व्यंग्यकार कम ही हुए। हास्य-व्यंग्य को प्रायः निचले दर्जे की रचना माना जाता है। आमतौर पर गंभीर आलोचक ऐसी रचनाओं की उपेक्षा करते हैं। वास्तव में हास्य-व्यंग्य साहित्य की सर्वाधिक कठिन विधा है। यही कारण है कि हिन्दी में ही नहीं, दुनिया भर में हास्य-व्यंग्य की रचना कम ही हुई है। शास्त्रीय साहित्य गंभीरता की माँग करता है, वह उदात्त को साहित्य मानता है। लोकप्रिय साहित्य इस क्षेत्र में आगे है। विकृति या भोंडापन वहाँ हो सकता है, लेकिन हँसने की क्षमता को बचाए रखने की कोशिश वहीं दिखाई देती है।

शिक्षा और आनंद का संतुलन साहित्य का चरित्र है। वास्तव में, परसाई की इन रचनाओं का समाज और आज का समाज भी शिक्षात्मक मनोरंजन के अभाव से ग्रसित है। अनिश्चित भविष्य और मानसिक-विकृतियाँ गूँथी हुई हैं। हास्य-व्यंग्य का अभाव समाज की बीमारी का लक्षण है। हिन्दी का साहित्यिक समाज भी बीमार है। वह भी लोकतन्त्र और विज्ञान का शत्रु है।

कुछ दिनों पहले त्रिपुरा में लेनिन की मूर्ति गिराए जाने के साथ ही भारत में भी लेनिनवाद का संकट और तीखे रूप में सामने आ गया। वास्तव में ८० और ९० के दशक के साहित्य का मुख्य संकट भी लेनिनवाद ही था। दुख की बात यह है कि लेनिनवाद के समर्थक भी नई स्थितियों में लेनिनवाद को देखने से भय खाते हैं। वे संकट को बनाए रखना चाहते हैं। हरीशंकर परसाई इस समस्या का हल ‘अध्यात्म’, ‘धर्म’, ‘मानवता’, ‘आत्मा’ आदि की वामपंथी पुनःव्याख्या करने में समझते हैं। लेनिनवाद का संकट उनके सामने स्पष्ट नहीं था। यद्यपि भारत के वामपंथी-आंदोलन में यह संकट ६० के दशक में ही स्पष्ट हो गया था।

सोवियत रूस में धार्मिक-पुनरुत्थान ने उनके मन में संशय पैदा कर दिया था, भारत में हिंसात्मक-धर्मवाद की स्थापना होते वे देख रहे थे। ऐसी स्थिति में उनका मुख्य ध्यान धर्म में उपस्थित मानवता की ओर जाना अचरज की बात नहीं थी। यूँ भी उग्र-वामपंथ के समर्थक वे कभी नहीं रहे थे। लेकिन इस संग्रह में उनकी उग्रता भी देखने योग्य है। उनका संशय और उग्रता से ग्रसित मस्तिष्क व्यंग्य के माध्यम से अपनी ही स्थिति पर रोता है। त्रासदी व्यंग्यात्मक होती है और व्यंग्य भी कभी त्रासदी बन जाता है। ‘आवारा भीड़ के ख़तरे’ भारत में लोकतन्त्र और समाजवाद की त्रासदी है, पर व्यंग्य का भेस धारण किए हुए।

इस संग्रह को आज पढ़ते हुए लगता है कि लेनिनवाद के संकट का समाधान किए बिना आज के वामपंथी-साहित्यिक की मुक्ति भी संभव नहीं। लेनिनवाद का संकट ऊपर बताए संकटों से स्वतंत्र नहीं है। उपभोक्तावाद, उत्तर-आधुनिकतावाद, अस्मितावाद, समुदायवाद, फासीवाद, लोकतन्त्र और समाजवाद इन सभी से लेनिनवाद जुड़ा हुआ है।

साहित्य के इस लेनिनवादी संकट का समाधान दक्षिण-अमेरिका के कुछ साहित्यिकों ने प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। आज हिन्दी के साहित्यिकों के बीच भी इन नए समाधानों पर चर्चा है। दक्षिण-अमेरिकी साहित्यिकों का अनुवाद हो रहा है। उन्हें पसंद किया जा रहा है। एक नई दुनिया और नए मनुष्य के निर्माण के लिए प्रतिबद्ध दक्षिण-अमेरिका के साहित्यिक हिन्दी-साहित्यिकों के लिए भी आदर्श बन रहे हैं। गरीब और पिछड़े देशों के इन साहित्यकारों ने हिन्दी-साहित्यिकों के सामने नए सिद्धान्त और जीवन जीने का ढंग प्रस्तुत किया है। परसाई की मृत्यु होने तक हिन्दी के साहित्यिक के लिए विकल्प का यह पक्ष इतना स्पष्ट नहीं था। परसाई के संशय और साधारण समाधान सुझाने से भी पता चलता है कि सोवियत समाजवाद कितने लंबे समय तक भारत की वामपंथी धारा पर हावी रहा था। पूंजीवाद-विरोधी सामाजिक-शक्तियों की पहचान, संगठन के नए तरीके, मीडिया का अपने पक्ष में इस्तेमाल, राजनीति के निर्णयों में जन-भागीदारी की उपेक्षा ने भारत में वामपंथी धारा को पुनः मज़बूत होने से रोका हुआ है। दक्षिण-अमेरिकी साहित्यिकों ने स्थानीयता के महत्त्व को, साम्राज्यवाद-विरोध को कभी कमज़ोर नहीं होने दिया। हिन्दी का साहित्यिक इस मामले में कमज़ोर निकला। हिन्दी-साहित्यिक की यूरोप-केन्द्रित मानसिकता आज भी उसे नए को अपनाने से रोके हुए है। भारत के वामपंथियों को रूस और चीन की क्रांति और प्रतिक्रांति से सबक लेना चाहिए, साथ ही दक्षिण-अमेरिका या अफ्रीका या अन्य किसी भी जगह के आंदोलनों और क्रांतियों को अपने विशेष संदर्भ में जाँच-परख कर ही व्याख्या करनी चाहिए, और आवश्यकता होने पर अपनाने से भी नहीं हिचकना चाहिए, वर्ना लेनिनवाद का संकट बना रहेगा। लेनिन स्वयं क्रांति करने का कोई फॉर्मूला नहीं बताते। उनके लेखन में रूस की विशेष स्थिति सर्वत्र दिखाई देती है। मार्क्सवाद के सामान्य क्रांतिकारी सिद्धांतों को वे रूस में सामाजिक परिवर्तन के लिए उपयोगी बनाते हैं। भारत के वामपंथी प्रायः इस संघर्ष में नहीं पड़ना चाहते। मार्क्स, लेनिन, माओ, चे, शावेज़ – वे अपनी हार का ठीकरा दूसरे के सर फोड़ना चाहते हैं। वामपंथी नेतृत्व विश्लेषण करने और योजना बनाने में असमर्थ है। उन्हें फॉर्मूला चाहिए। और इसी कारण वामपंथी संगठन क्षीण से क्षीणतर होते जा रहे हैं। परसाई ने जिस संकट को पाठकों के सामने रखा था, हिन्दी-साहित्यिकों के लिए वह संकट आज भी बना हुआ है।

ऐसे में यह लगता है कि सभ्यता का यह संकट अभी दशकों बने रहना है। आवारा भीड़ के ख़तरों के मध्य जीने और मरने के लिए तैयार रहना है। यह संकट कब ख़त्म होगा नहीं कहा जा सकता। परसाई ने भी शुभ-कामना की है, भविष्यवाणी नहीं। वे वास्तविकता को सामने रखना अपना कर्तव्य समझते हैं, लेकिन संकट का कोई बना-बनाया समाधान नहीं है, इसे भी वे जानते हैं। परसाई के इन लेखों के बाद से आज तक विश्व में कई बड़े आर्थिक और राजनैतिक बदलाव हो चुके हैं। इन लेखों में वे जिस भविष्य की आशंका से चिन्तित दिखाई देते हैं, वह भविष्य आज वर्तमान है। निश्चित ही, हर संकट समाप्त होता है। पूंजीवाद-साम्राज्यवाद का विनाश ही इस संकट का अंत करेगा। हिन्दी-साहित्य की भूमिका भी नई दुनिया में नए मनुष्य द्वारा फिर से लिखी जाएगी।

 

usman khan

 

उस्मान ख़ान समकालीन हिंदी साहित्य के अलहदा युवा कवि-कथाकार हैंचर्चाओं और पुरस्कारों की भीड़ से अलहदा… छपाऊ मानसिकता से भी अलहदा... जे.एन.यूके हिंदी विभाग से मालवा के लोकसाहित्य पर पीएचडीइनसे usmanjnu@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

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