Archive for the month “December, 2014”

बत्रा जी का शिक्षा बचाओ आंदोलन या ‘मस्तिष्क में सड़ांध’: संजीव कुमार

हिंदुत्ववादियों को अपनी बौद्धिक दरिद्रता के चलते (ये) ऊटपटांग बातें पूरी तरह दुरुस्त भी लगती हैं, साथ ही, उन्हें यह भी पता है कि उन्हें किन लोगों को संबोधित करते हुए उनके अज्ञान का लाभ उठाना है। शिक्षा, और उसमें भी इतिहास की शिक्षा, इसीलिए उनके निशाने पर रहती है कि इससे ऐसे लोगों की तादाद के बढ़ते जानेे का वास्तविक ख़तरा है जिन्हें उनकी बातें बेसिर-पैर की नज़र आएंगी। ग़ौरतलब है कि ये हिंदुत्ववादी विचारक (?!) कभी किसी बौद्धिक मंच पर बहसों में शामिल नहीं होते। वे उन जगहों पर जाते भी हैं तो तोड़-फोड़ या नारेबाज़ी की कार्रवाई को अंजाम देने। हां, टेलीविज़न चैनलों की बहसों में कई बार अवश्य शामिल होते हैं जहां उन्हें पता होता है कि तर्क-विवेक-सम्मत प्रतिपादन के लिए अपेक्षित धैर्य की गुंजाइश बहुत कम है और प्रदर्शनकारी कला के उपयोग की गुंजाइश बहुत ज़्यादा। ये मुख्यतः गाज-फेन उगलनेवाली बहसें होती हैं जिनमें बौद्धिक दरिद्रता को गाज-फेन के भीतर छिपा देने की सहूलियत पर्याप्त मात्रा में रहती है।  #लेखक 

This is the enemy

This is the enemy

किसकी मजाल है जो शिक्षा को बचा ले ‘शिक्षा बचाओ आंदोलन’ से

By संजीव कुमार

बातों के सिर-पैर प्राणियों के सिर-पैर की तरह नहीं होते कि उनका होना या न होना नंगी आंखों से दिख जाए।

अभी जब इपंले (इन पंक्तियों का लेखक) यह लेख लिखने बैठा है, उसके सामने विश्व हिंदू परिषद् के श्री जुगल किशोर का एक ताज़ातरीन साक्षात्कार है। श्री जुगल किशोर हिंदुओं की ‘घर वापसी’ की मुहिम के संयोजक हैं और उनका साक्षात्कार 15 दिसंबर 2014 के ‘द इकोनाॅमिक टाइम्स’ में छपा है। इसमें वे फ़रमाते हैं, ‘वेदों में मैला ढोने की प्रथा और लोगों के बहिष्कार (आशय अस्पृश्यता से है) का कोई उल्लेख नहीं है। अगर आप इन समुदायों को निकट से देखें तो उनके गोत्र सोलंकी, चौहान, सिसोदिया, राठौर आदि हैं। कारण यह कि वे पराजित राजपूत हैं जिन्हें इस्लाम न अपनाने के लिए दंडित किया गया। वे निम्न में भी निम्नतम बना दिये गये। दूसरे हिंदुओं को उनका सामाजिक बहिष्कार करने पर बाध्य किया गया। अब नरेंद्रभाई मैला ढोने की प्रथा को ख़त्म करने और मुग़ल परंपरा का अंत करने का प्रयास कर रहे हैं।’

वेदों के बाद सीधा मुग़ल काल में छलांग लगा देना, बीच में ‘गीता’ और ‘मनुस्मृति’ और इस तरह के दशाधिक पाठों तथा उनमें प्रतिबिंबित होती सामाजिक व्यवस्था को गोल कर देना, अस्पृश्यता को मुग़लों द्वारा स्थापित परंपरा बताना! – ज़ाहिर है, श्री जुगल किशोर की बातों का कोई सिर-पैर नहीं है। फिर इस तरह की बातें इतने आत्मविश्वास के साथ कैसे कही जाती हैं? दो ही कारण हो सकते हैंः या तो कहनेवाले को खुद ही यह दिखाई न दे कि उसकी बातें बेसिर-पैर की हैं, या फिर उसे यह भरोसा हो कि वह जिन लोगों तक अपनी बात पहुंचाना चाहता है, उनके पास सिर-पैैर की इस अनुपस्थिति को देखने वाली निगाह नहीं है।

इपंले को लगता है कि मामला ‘या तो, या फिर’ वाला नहीं है। दोनों कारण साथ-साथ काम कर रहे हैं। हिंदुत्ववादियों को अपनी बौद्धिक दरिद्रता के चलते ये ऊटपटांग बातें पूरी तरह दुरुस्त भी लगती हैं, साथ ही, उन्हें यह भी पता है कि उन्हें किन लोगों को संबोधित करते हुए उनके अज्ञान का लाभ उठाना है। शिक्षा, और उसमें भी इतिहास की शिक्षा, इसीलिए उनके निशाने पर रहती है कि इससे ऐसे लोगों की तादाद के बढ़ते जानेे का वास्तविक ख़तरा है जिन्हें उनकी बातें बेसिर-पैर की नज़र आएंगी। ग़ौरतलब है कि ये हिंदुत्ववादी विचारक (?!) कभी किसी बौद्धिक मंच पर बहसों में शामिल नहीं होते। वे उन जगहों पर जाते भी हैं तो तोड़-फोड़ या नारेबाज़ी की कार्रवाई को अंजाम देने। हां, टेलीविज़न चैनलों की बहसों में कई बार अवश्य शामिल होते हैं जहां उन्हें पता होता है कि तर्क-विवेक-सम्मत प्रतिपादन के लिए अपेक्षित धैर्य की गुंजाइश बहुत कम है और प्रदर्शनकारी कला के उपयोग की गुंजाइश बहुत ज़्यादा। ये मुख्यतः गाज-फेन उगलनेवाली बहसें होती हैं जिनमें बौद्धिक दरिद्रता को गाज-फेन के भीतर छिपा देने की सहूलियत पर्याप्त मात्रा में रहती है।

कोई चाहे तो कह सकता है कि बौद्धिक क्षमता की पहचान करानेवाले मानक दरअसल ऐसी निर्मितियां हैं जो आधुनिकता की पश्चिमी परियोजना द्वारा हमारे ऊपर थोप दी गयी हैं। यह बौद्धिक कर्म के आधुनिकता-निर्मित ढांचे का असर है जिसके चलते एक ख़ास प्रविधि का पालन करनेवाला, तार्किक-वैज्ञानिक चिंतन के मुहावरों में बंधा लेखन ही हमारे लिए उत्तम बौद्धिकता की निशानी होता है। जिन विचारकों में ग़ैरमिलावटी भारतीयता बची हुई है, उनके यहां यह निशानी न मिले, यह स्वाभाविक है। वस्तुतः उनके यहां ठेठ भारतीय कि़स्म की बौद्धिकता है जिसे पश्चिमी आधुनिकता ने, और इसीलिए हम जैसे जड़ों से कटे लोगों ने, बौद्धिकता मानने से इंकार कर दिया है।

यह उत्तरआधुनिक दलील प्रथमदृष्ट्या बहुत ग़लत नहीं लगती। पर शिक्षा-संस्कृति के मोर्चे पर संघ की अगुवाई करनेवालों को पढ़ें तो इस दलील की कमज़ोरी दयनीय ढंग से उजागर होने लगती है। वहां बौद्धिक कर्म के उन सदियों पुराने उसूलों का भी कोेई पालन नहीं मिलता जिनका स्वयं प्राचीन भारतीय पांडित्य-परंपरा में सख़्ती से पालन किया गया है। इसका एक अद्भुत नमूना है, दीनानाथ बत्रा की किताब ‘भारतीय शिक्षा का स्वरूप’। यह किताब अक्तूबर महीने की 29 तारीख़ को एक भव्य समारोह में वेंकैया नायडू के हाथों लोकार्पित हुई जिसमें श्री नायडू ने इस किताब की, और साथ ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से शिक्षा-संस्कृति के मोर्चे पर काम करनेवाले समर्पित प्रचारक बत्रा जी की भूरि-भूरि प्रशंसा की।

किताब पर आने से पहले आदरणीय दीनानाथ बत्रा के महत्व को रेखांकित करना ज़रूरी है। शिक्षा बचाओ आंदोलन की अगुवाई करते हुए 2014 में वेंडी डाॅनीगर की किताब ‘द हिंदूज़: ऐन आॅल्टरनेटिव हिस्ट्री’ को लुगदी करवाने में कामयाबी हासिल कर वे चर्चा में आये थे। वैसे वे काफ़ी समय से संघ के शिक्षा-नीति-निर्धारकों में रहे हैं और राजग-1 के दौरान 2001 में एन.सी.ई.आर.टी. के सलाहकार के तौर पर उन्होंने उस समिति का नेतृत्व किया था जिसने इतिहास की किताबों में से हिंदू राष्ट्रवादियों को ठेस पहुंचानेवाले हिस्सों को निकाल बाहर करने के काम को अंजाम दिया। शिक्षा के भारतीयकरण और उसमें मूल्य-शिक्षा के समावेश के उद्देश्य से बत्रा जी ने नौ पाठ्यपुस्तकें भी लिखीं, जिनका गुजराती में अनुवाद कर गुजरात सरकार ने अपने 42000 विद्यालयों में उन्हें पढ़ाना अनिवार्य किया है। इनमें ‘तेजोमय भारत’ और ‘प्रेरणादीप 1’ ‘प्रेरणादीप 2’ जैसी किताबें हैं जिनमें विद्यार्थियों के लिए परोसी गयी सामग्री काफ़ी चर्चा में रही है। मसलन, ‘तेजोमय भारत’ में महाभारत की कथा के आधार पर प्राचीन भारत में स्टेम सेल रिसर्च होने, टेलीविज़न के होने, अनश्व रथ के नाम से मोटरकार की मौजूदगी इत्यादि की जानकारी दी गयी है। ‘प्रेरणादीप’ के अलग-अलग भागों में स्पष्ट नस्लवादी मिज़ाज वाली ‘शिक्षाप्रद’ कहानियां हैं। गुजरात के निवर्तमान मुख्यमंत्री और देश के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं इन किताबों के महत्व पर प्रकाश डाला है और भारतीय शिक्षा के उद्धार की मुहिम में बत्रा जी के महती योगदान को एकाधिक अवसरों पर स्वीकार किया है।

इन बातों से समझा जा सकता है कि राजग-2 में शिक्षा के स्तर पर जो कुछ होने जा रहा है – और ज़ाहिर है कि बहुत कुछ होने जा रहा है – उसमें दीनानाथ बत्रा नेतृत्वकारी भूमिका में रहेंगे। ऐसे व्यक्ति के विचारों को सीधे उसकी पुस्तक से हासिल करने में किसकी दिलचस्पी नहीं होगी! लिहाज़, इपंले प्रभात प्रकाशन से साढ़े तीन सौ रुपये में उनकी किताब ख़रीद लाया और यद्यपि उसे पढ़ना असंभवप्राय था, उसने पढ़ने की कोशिश में कोई कसर नहीं रखी। इस कोशिश के दौरान जो अनुभव हुए, उनका सारांश आगे दिया जाता है।

अगर आप आजकल के बाबाओं को प्रामाणिक भारतीयता का सबसे ठोस उदाहरण मानते हों, तो बत्रा जी की यह किताब भारतीयता से ओतप्रोत है। इसकी अंतर्वस्तु और शैली, दोनों बाबाओं के प्रवचन जैसी है। इसमें न किसी उद्धरण का स्रोत बताने की ज़हमत उठाई गयी है, न किसी तथ्य को प्रमाणपुष्ट करने की। (वह सब बत्रा जी कह रहे हैं, यही क्या काफ़ी नहीं है!) उद्धृत किये गये लोगों का पूरा परिदृश्य इतना वैविध्यपूर्ण है कि आप दंग रह जाएंगे। यहां श्री मां, साईं बाबा, एकनाथ जी, स्वामी रंगनाथन, मां शारदा इत्यादि से लेकर विक्टर ह्यूगो, स्वामी विवेकानंद, रामकृष्ण परमहंस, महात्मा गांधी, बिनोवा भावे, गिजुभाई, दीनदयाल उपाध्याय, श्री गोलवलकर, डाॅ. कोठारी, डाॅ. राधाकृष्णन और पता नहीं कौन-कौन से विचारक मौजूद हैं और ऐसा लगता है कि इन सबने मिल कर कुछ एक जैसी ही बातें कही हैं। उद्धरणों के साथ कहीं भी संदर्भ नहीं बताया गया है, पर वह उतनी चिंताजनक बात नहीं। चिंताजनक यह है कि पढ़ कर कई बार संदेह होता है कि लेखक अपने ही शब्दों पर उद्धरण चिह्न ठोंक कर उन्हें किसी नामी-गिरामी के हवाले किये दे रहा है। पृष्ठ 177 पर स्वामी विवेकानंद का एक उद्धरण हैः ‘‘समझ के बिना कोरा ज्ञान मस्तिष्क में पड़ा सड़ांध पैदा करता है। प्रेम के ढाई अक्षर आत्मसात करने से जीवन सफल तथा धन्य हो जाता है।’’ फिर 186 पर विवेकानंद का उद्धरण हैः ‘‘शिक्षा जानकारियों का ढेर नहीं, जो मस्तिष्क में पड़ा रहकर सड़ांध पैदा करता है। ज्ञान के चार अक्षर भी यदि हम जीवन में आत्मसात कर लें तो हमारा जीवन सफल हो जाए।’’ चूंकि दोनों उद्धरणों का स्रोत नहीं बताया गया है, इसलिए प्रामाणिकता जांची नहीं जा सकती, पर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि ‘मस्तिष्क’, ‘सड़ांध’, ‘अक्षर’, ‘जीवन’, ‘आत्मसात’ और ‘सफल’ जैसे शब्दों को दुहराते हुए, और ‘प्रेम के ढाई अक्षर’ तथा ‘ज्ञान के चार अक्षर’ का अंतर बरत कर, दो जगह दो बातें स्वामी विवेकानंद ने नहीं कही होंगी। यह बत्रा जी की अपनी मेधा से निकले हुए सूत्र ही हो सकते हैं जिन्हें अधिक वज़न देने के लिए उन्होंने विवेकानंद के नाम कर दिया है। यह बात तब और पुष्ट होती है जब आप पाते हैं कि पृष्ठ 17 पर लेखक बिना किसी को उद्धृत किये यह बात कह रहा हैः ‘‘शिक्षा जानकारियों का ढेर नहीं है, जो मस्तिष्क में पड़ी रहकर सड़ांध पैदा करती है।’’ फिर पृ. 205 पर उसके अपने शब्दः ‘‘शिक्षा कोरा अक्षर-ज्ञान नहीं है, जो मस्तिष्क में पड़ा सड़ांध पैदा करता है।’’ और तो और, इसी पुस्तक में बत्रा जी की जो कविताएं संकलित हैं, उनमें भी यह रचनात्मक सूत्रीकरण मिलता है, जिससे यह अंतिम रूप से सिद्ध हो जाता है कि विवेकानंद को इसका श्रेय उन्होंने महज़ उदारतावश दे दिया था। कविता पंक्ति हैः ‘यदा-कदा मास्टरजी आते हैं, मस्तिष्क में ढूंसते हैं अक्षरज्ञान / वह वहां सदा सड़ांध पैदा करता है, नहीं है यह अनुभूत ज्ञान।’

ग़रज़ कि सड़ांध ने बत्रा जी के शिक्षा-चिंतन पर लगभग क़ब्ज़ा जमा लिया है। यह स्वामी विवेकानंद के चिंतन से आया हुआ शब्द है, ऐसा मानने को जी नहीं करता, पर जांच कैसे हो!

पृष्ठ 186 पर डाॅ. राधाकृष्णन को लेखक ने अंग्रेज़ी में उद्धृत किया हैः “Stagnation is death and motion is life”। यही वाक्य इसी तरह पृष्ठ 177 पर लेखक की अपनी बात के रूप में है। अब चूंकि राधाकृष्णन स्वयं बत्रा जी के जीवनकाल में रहे हैं, इसलिए यह भी नहीं कहा जा सकता कि बत्रा जी के रूप में उनका पुनर्जन्म हुआ है और दोनों एक ही व्यक्ति हैं!

किताब में आये सभी उद्धरणों का हाल ऐसा ही है। कुछ नमूने देखें:

पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने लिखा है-

जब हृदय में शुद्धता हो, तो चरित्र में सुंदरता आ जाती है,

यदि चरित्र सुंदर हो तो, परिवार में समरसता होती है। -पृ. 32

श्रीमां का कहना है- ‘‘जो व्यक्ति लक्ष्यविहीन है, वह सुखविहीन तथा श्रीविहीन है।’’ -पृ. 107

ऐसे व्यक्तियों के संबंध में स्वामी रामतीर्थ ने कहा है-

“He has the strength of ten, because his heart is pure. -पृ. 183

मैक्समूलर ने लिखा था- “We have conquered India once we shall conquer it again through Education.” (उद्धरण यथावत) -पृ. 218

यूसुफ अली की पुस्तक, जिसमें उसने महिलाओं/बालिकाओं की शिक्षा के संबंध में जो विचार लिखे हैं, वे विचार करने योग्य हैं। उसका कथन है कि जब तक लड़कियों की शिक्षा में सुधार नहीं होता, तब तक भारत की स्थिति में सुधार की संभावना बहुत ही कम है।  -पृ. 43

ऐसे उद्धरणों से पूरी किताब भरी पड़ी है। बात किसी भी स्तर की हो, उसे किसी-न-किसी के उद्धरण से पुष्ट किया गया है। लेखक को यह भले ही न पता हो कि संदर्भ-सहित उद्धरण किस तरह दिये जाते हैं, यह अवश्य पता है कि अपनी हर बात को किसी और के हवाले से पुष्ट करते चलना एक प्रतिष्ठाप्राप्त अकादमिक पद्धति है। इस पद्धति का उपयोग करने के लिए सचमुच जो श्रम करना पड़ता है, उसकी क्षमता और अवकाश न भी हो तो क्या फ़कऱ् पड़ता है? अपनी ओर से वाक्य बनाओ और उसे किसी के हवाले कर दो! जहां कोई बड़ा नाम ध्यान न आए, वहां ‘एक शिक्षाविद् का मत’ बताकर काम चला लो (पृ.23)। इसी पृष्ठ पर किन्हीं राडन और सर आपर्सीनन को भी उद्धृत किया गया है जिनके बारे में कुछ पूछते हुए भी इपंले को डर लगता है कि कहीं लोग पलटकर यह न कह बैठें कि अरे, इन्हें नहीं जानते, कैसे अनपढ़ हो? इसलिए इपंले यह क़यास लगाने की गुस्ताख़ी नहीं करेगा कि ये नाम काल्पनिक भी हो सकते हैं। हां, यह कहने की गुस्ताख़ी ज़रूर करेगा कि यह जो कोई विदेशी या ख्रिस्तान है राडन नाम का, उसने शिक्षा का ‘उद्देश्य व्यक्ति का परम्ब्रह्म में विलय प्राप्त करना’ तो नहीं ही बताया होगा, जैसा कि उसके नाम से उद्धृत कथन में बताया गया है। लिहाज़ा, या तो राडन का नाम काल्पनिक है या फिर उसका कथन। शायद इसीलिए अपनी कल्पना को और कष्ट न देकर बत्रा जी ने उसी पृष्ठ पर अन्यत्र ‘एक शिक्षाविद्’ से काम चला लिया है।

चूंकि इस तरह के उद्धरणों की प्रामाणिकता को जांचने का कोई तरीका नहीं है, इसलिए बत्रा जी यहां बाइज़्ज़त न सही, संदेह का लाभ पाकर निकल जाते हैं; फंसते वहां हैं जहां सचमुच किसी प्रसिद्ध कथन या काव्यांश को उद्धृत कर बैठते हैं। ‘कामायनी’ की पंक्तियों का उन्होंने क्या हाल किया है, देखिये:

‘‘ज्ञान भिन्न, क्रिया भिन्न,

और इच्छा क्यों पूरी हो मन की।

यदि एक-दूसरे से ना मिल सकें,

तो विडंबना है जीवन की।’’   -पृ.127

प्रसाद जी के साथ एक ही बार ऐसा बरताव करके वे संतुष्ट नहीं हुए। दुबारा-तिबारा भी किया। पृ. 186 और फिर पृ. 220 पर यह छंद इस रूप में उद्धृत है:

‘‘ज्ञान-भिन्न क्रिया कुछ और,

इच्छा क्यों पूरी हो मन की,

एक-दूसरे से न मिल सकें,

तो विडंबना है जीवन की।’’

इसी तरह एक छोटी-सी कहानी रचते हुए लेखक ने लक्ष्मण और उनकी पत्नी उर्मिला के बारे में लिखा है, ‘‘लक्ष्मण जब वनवास जाने लगे थे तो उन्होंने कहा था कि मैं श्रीराम के साथ जा रहा हूं, यह नहीं कहा कि मैं कब लौटूंगा। उर्मिला ने अपनी एक सखी से यह शिकायत की थी कि सखि, वे मुझसे कहके जाते।’’ (पृ. 269) याद कीजिए कि ‘सखि, वे मुझसे कह कर जाते’ मैथली शरण गुप्त की पंक्ति है जो उनकी कविता में गौतम बुद्ध की पत्नी यशोधरा का कथन है।

पश्चिमी विद्वत्ता की बराबरी में दिखने की ग़रज़ से बत्रा जी पूरी किताब में लगातार अंग्रेज़ी में कुछ-कुछ कहते चलते हैं। पढ़ते हुए काशीनाथ सिंह की कहानी ‘संकट’ याद आती है जिसमें फ़ौज से छुट्टी पर आया हुआ राधो अपने दोस्तों के साथ बातें करते हुए हास्यास्पद ढंग से अंग्रेज़ी का प्रयोग करता चलता है। कुछ नमूनेे देखिएः

Keep your mind on things that you want and off the things that you don’t want. (27)

Our mind is videographer and tape recorder. (27)

In the words of Swamiji The sutras apply to and cover each and every chapter of each and every branch of mathematics (Arithmetic’s) Algebra,Geometry, Trigonometry, astronomy, Calculus etc. (49) (उद्धरण यथावत)

We are the trustee of the wealth. (122)

Read, chew and digest. (176)

All for one and one for all is our song. (188)

ये वाक्य अचानक हिंदी के बीच टपक पड़े हैं और उद्धरणों के रूप में नहीं हैं। ऐसे उदाहरण अनगिनत हैं। प्रो. कपिल कपूर ने किताब का प्राक्कथन लिखते हुए ठीक ही कहा है, ‘सबसे पहले इस पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि हिंदी में पुस्तक रचना का श्री बत्राजी का फ़ैसला सिद्धांतों के आधार पर लिया गया है। आजकल शिक्षित भारतीयों के बीच अंग्रेज़ी के प्रति दासता की मनोवृत्ति मौजूद है। हर कोई इस उम्मीद में अंग्रेज़ी में लिखना चाहता है कि शिक्षित लोग पर उसका रोब पड़ेगा…।’ बत्रा जी को पढ़ते हुए समझा जा सकता है कि किस तरह उनका अद्भुत अंग्रेज़ी ज्ञान उन्हें बार-बार उस ज़बान की ओर धकेलता है, पर सिद्धांतों के आधार पर लिए गए फ़ैसले के चलते ही वे हिंदी में लिखते जाते हैं। कहीं-कहीं अंग्रेज़ी में कुछ कह भी जाते हैं, तो निश्चय ही ऐसा वे इस उम्मीद के साथ नहीं करते होंगे कि ‘शिक्षित लोगों पर उसका रोब पड़ेगा’। प्रो. कपिल कपूर का कहना बिल्कुल दुरुस्त है। अनुमान लगाया जा सकता है कि ऐसा वे, काशीनाथ सिंह के राधो की तरह, अशिक्षितों पर रोब ग़ालिब करने के उद्देश्य से करते होंगे।

ग़लत-सही उद्धरणों और अंग्रेज़ी वाक्यों वाली यह बाबासुलभ शैली भी क्षम्य होती, अगर कम-से-कम सुसंबद्ध तरीके से अपनी बात कहने का गुर ही बाबाओं से ले लिया गया होता। बत्रा जी की मुश्किल यह है कि प्रवचन और लेखन का यह बुनियादी सिद्धांत भी उनके यहां मात खा जाता है। वे अपनी जैसी-तैसी स्थापनाओं को बस जैसे-तैसे स्थापित करते चले जाते हैं। किताब के पहले ही अध्याय को देखें तो उसका शीर्षक है, ‘भारतीय शिक्षा का स्वरूप’, पर पूरे अध्याय में इस स्वरूप को लेकर शायद ही कोई बात कही गयी है। असंबद्ध अनुच्छेदों में तरह-तरह की बातें कहता हुआ लेखक शिक्षासंबंधी सरकारी तंत्र के ढांचे पर विचार व्यक्त करने लगता है और फिर अचानक, बिना किसी बुद्धिगम्य कारण के, ‘गांधी के शिक्षा संबंधी विचार’ उपशीर्षक के अंतर्गत अपनी समझ के अनुसार उनके विचारों को बिंदुवार रखने लगता है। इसी तरह एक जगह शिक्षा के अधिकार को लेकर नेशनल सैंपल सर्वे की कुछ बातों को बिंदुवार रखते हुए एक बिंदु यह भी दिया गया हैः ‘हम कहते हैं – सा विद्या या विमुक्तये, अब तो कहा जाता है – सा विद्या या नियुक्तये’ (पृ. 201)। पढ़ कर दिमाग़ चकरा जाता है कि आखि़र नेशनल सैंपल सर्वे वालों को क्या हो गया कि ‘30 प्रतिशत विद्यालयों के पास भवन नहीं हैं’ जैसी बातें बताते-बताते संस्कृत की शब्दक्रीड़ा में लग गए!

ऐसी असंबद्धता के उदाहरण किताब में शुरू से आखि़र तक मिलते हैं। वस्तुतः इसे पुस्तक का एक गुण नहीं, बल्कि अंगी गुण कहना चाहिए। विचार जैसे भी हों, उन्हें विचार के रूप में सिलसिलेवार रखने की एक लेखक से जो अपेक्षा की जाती है, बत्रा जी उसकी जमकर उपेक्षा करते हैं और शायद इसके अलावा उनके पास कोई चारा भी नहीं है।

असंबद्धता के इस अंगी गुण के बीच बत्रा जी के शिक्षा-चिंतन की जो कुछ मूल्यवान बातें पकड़ में आती हैं, उन्हें इस प्रकार सूत्रबद्ध किया जा सकता है:

  • शिक्षा का उद्देश्य है, ‘बुद्धि और हृदय का संतुलित समुत्कर्ष करना, फुरतीले शरीर में व्यवहारशील मस्तिष्क रखना तथा आवश्यक ज्ञान प्राप्त कर अपने व्यक्तिगत तथा पारिवारिक जीवन को सुख-संपन्न बनाकर मोक्ष को प्राप्त करना’ (पृ. 24)।
  • माक्र्स, मैकाले और मैक्समूलर – ‘इन तीन मक्कारों ने हमारी शिक्षा, संस्कृति और इतिहास को विकृत किया, इन्होंने हमारे गौरव को विदेशी कर्णधारों के नाम के साथ जोड़कर हमारे स्वर्ण पृष्ठों पर कालिख लगाने का काम किया’ (पृ. 50)।
  • ‘स्वतंत्र भारत में सबसे अधिक अन्याय जिस विषय के साथ हुआ है, वह है इतिहास। इतिहास-लेखन के लिए एनसीईआरटी द्वारा जो मार्गदर्शन के निर्देश दिए गए हैं, उससे इस विषय का विकृत स्वरूप हमारे सम्मुख आएगा। देश की एकता को प्रोत्साहन देने का यह अप्राकृतिक प्रयास सफल नहीं हो सकेगा।’ (पृ. 138)
  •  आदर्श बालक की संकल्पना को साकार करने के लिए नमस्कार मुद्रा, मौन, ओंकार उच्चारण, प्राणायाम, ब्रह्मनाद, गायत्री मंत्र एवं शांति पाठ का अभ्यास, यज्ञ-हवन, प्रातःस्मरण, योगाभ्यास, यम-नियम आदि का पालन, उन्हें गीता, रामायण का पाठ और भावार्थ बताना – ये सब आवश्यक कार्यक्रम हैं। (देेखिए, ‘आदर्श बालक की संकल्पना’ शीर्षक अध्याय)
  • ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति के संबंध में विचार करते हुए संस्कृति, राष्ट्र, संप्रदाय, धर्म, पंथनिरपेक्षता, शिक्षा, आचार्य, विद्यालय, पाठ्यक्रम, परीक्षा आदि शब्दों के ठीक अर्थ तथा इनसे जुड़े भावों को यदि देश की मिट्टी के साथ नहीं जोड़ा गया तो कोई भी शिक्षा योजना राष्ट्रीय नहीं हो सकती और इसका परिणाम होगा भारत में अभारत के चिह्न।’ (पृ. 205)
  • शिक्षा का अटूट संबंध संस्कृति और राष्ट्र से है। हमारे देश में कहा-सुना जाता है कि भारतीय संस्कृति मिलीजुली (कंपोजिट) है। वास्तविकता यह है कि संस्कृति अलग-अलग हिस्सों से नहीं बनती। संस्कृति गंगा की धारा के समान है। संस्कृति में नए तत्व आते हैं, परंतु उनका पृथक् कोई अस्तित्व नहीं रहता। भारत की संस्कृति कहने का अर्थ हिंदू संस्कृति लगाया जाता है और यह उचित भी है। संकोच या प्रयोजनवश इस तथ्य को स्वीकार न करने केे बड़े घातक परिणाम हुए हैं।’ (पृ. 204-5)
  •  ‘जाति, रंग, प्रदेश, धर्म अथवा भाषा के आधार पर किसी व्यक्ति तथा व्यक्ति समूह को विशेष सुविधाएं अथवा अधिकार देने की प्रथा बंद की जाए।’ (पृ. 206)

इन बातों की व्याख्या करने और इनकी शक्तियां-सीमाएं बताने की हिमाकत कौन करे! क्या यह बताने की ज़रूरत है कि ये सारी बातें मोहन भागवत की इस घोषणा, कि ‘इस देश में सभी हिंदू हैं’ और एक साध्वी के इस अविस्मरणीय वाक्य, कि जो रामज़ादे नहीं हैं वे ………..ज़ादे हैं, का शिक्षा के क्षेत्र में अनुवाद हैं?

बत्रा जी ने किताब के आखि़री हिस्से में शिक्षासंबंधी अपनी कुछ कविताएं और कहानियां भी संकलित कर दी हैं। प्राक्कथन-लेखक प्रो. कपिल कपूर का मानना है कि ये ‘सभी कविताएं मन को द्रवीभूत करती हैं तथा प्रभावशाली हैं।’ ऐसी प्रभावशाली कविता का एक नमूना देखिएः

‘जहां रहते वहां पड़ोसी तो हैं, पड़ोसीपन है कहां?

लड़ते-झगड़ते, गाली-गलौज, शांति रहती है कहां?

विद्यालय तो गली-गली में हैं, विद्या का आलय है कहां?

कक्षा में विद्यार्थी तो हैं, अध्यापक पता नहीं हैं कहां?

अफ़सोस कि जिस तरह भारतीय शिक्षा व्यवस्था बत्रा जी के बताये रास्ते पर नहीं चल रही, उसी तरह हिंदी कविता भी उनके जैसी काव्यकला के नमूने पेश नहीं कर पा रही। कहां हैं हिंदी के पास कथ्य और शिल्प में ऐसी अनोखी कविताएं?

याद रखें कि दीनानाथ बत्रा जी इस समय संघ परिवार के सबसे कद्दावर शिक्षा-चिंतक हैं। ‘शिक्षा बचाओ आंदोलन’ और ‘शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास’ उन्हीं के नेतृत्व में चल रहे हैं। अगर और किसी वजह से नहीं, तो सिर्फ़ बत्रा जी की इस किताब को देखकर ही कोई भी शिक्षित व्यक्ति समझ सकता है कि आज शिक्षा को सबसेे पहले इसी शिक्षा बचाओ आंदोलन सेे बचाने की ज़रूरत है।

संजीव कुमार

संजीव कुमार

संजीव कुमार। युवा आलोचक और कहानीकार। ‘जैनेन्द्र और अज्ञेयः सृजन का सैद्धांतिक नेपथ्य’ पुस्तक के लिए देवीशंकर अवस्थी सम्मान। दिल्ली विश्विद्यालय के देशबंधु कॉलेज में  प्राध्यापक। इनसे sanjusanjeev67@gmail.com पर संपर्क सम्भव है।

हंस, जनवरी, 2015 से साभार 

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चॉकलेटी समय में एक गुलमिर्च: चंदन श्रीवास्तव

दो दिन पहले ही किसी एक अनाम/रहस्मय कथाकार का एक पोस्ट लगाया था- एक मिट्टी दो पौधे: मेघना राव उर्फ गोदावरियम्मा और अमेरिका यादव. इस कथा-अंश को प्राप्त करने की प्रक्रिया के बारे में भी आपको अवगत कराया था. हिंदी का औसत बौद्धिक-समाज (क्रांतिकारी/गैर क्रांतिकारी तमाम) एक अवसरवादी समाज है ,  हमारी इस मान्यता को चन्दन श्रीवास्तव ने ध्वस्त किया है.  उन्होंने बिना इस बात की परवाह किये कि यह रचना किसकी है, किसकी हो सकती , एक बेवाक टिपण्णी भेजी है. हिंदी समाज अब कयास भी लगाने को तैयार नहीं है, उसे किसी का नाम चाहिए ताकि हमारा एक-एक शब्द-वाणी बिना सटीक निशाने के जाया न हो, बिना चापलूसी के तर हुए वापस न आये. हमारा मानना है कि चंदन श्रीवास्तव हिंदी बौद्धिक-वृत्त के उन कुछ चुनिंदा लोगों में से हैं, जिन्होंने अवसरवादी/चेला-चुहुलवादी चकल्लसों के विपरीत अपनी एक नियति तय की है. उनकी आंखें सही अर्थों में पुस्तक पगी हैं,  पुस्तकों से आँखों के पगने का मतलब धूर्त, यारबाजी से तरबतर बौद्धिक ऐय्यारियाँ नहीं होती हैं. चन्दन श्रीवास्तव का लेखन और व्यवहार अक्सर इसे साबित करता है. तिरछीस्पेल्लिंग उनके इस स्टैंड और बौद्धिक त्वरा को लेकर अक्सर आभारी रहेगा. 

ब्रूनो द्यूमों निर्देशित एक धारावाहिक का दृश्य

ब्रूनो द्यूमों निर्देशित एक धारावाहिक का दृश्य

By चंदन श्रीवास्तव 

हिन्दी में साहित्य के स्पेस को पत्रकारिता ने हथिया लिया है। पत्रकारों को कहा जाता है, ऐसी भाषा लिखो कि उसे चबाना नहीं पड़े, मुंह में पड़े और घुल जाये। साहित्यकार से कहा जाता है- पत्रकारों वाली भाषा लिखो क्योंकि पत्रकारिता बढ़ रही है, उस सरीखी भाषा लिखने से साहित्य भी बढ़ेगा, फले-फूलेगा। कुल मिलाकर साहित्य और पत्रकारिता नाम के भाषाई उपक्रम के लिए जोर मुंह में जाते ही घुल जाने वाली भाषा पर होता है..गोया भाषा ना हुई, चॉकलेट हुई!

साहित्य की भाषा पर पड़ते इस दबाव ने साहित्य से विचारशीलता को खत्म किया है.. चॉकलेट तैयार करने की कला खूब परवान चढ़ रही है..ब्लॉग और फेसबुक सरीखे मर्तबान आ गये हैं, चॉकलेट वहां रोज धरे और सजाये जा रहे हैं..इंटरनेट गजब का कारखाना है, चॉकलेट-कर्म में इसने कमाल का इजाफा किया है..

‘तिरछी’ पर लगा यह पोस्ट चॉकलेट चुभलाने की अभ्यस्त होती जा रही हिन्दी की जीभ पर गुलमिर्च रखती है..यह हिन्दी साहित्य के भीतर विचारशीलता की वापसी का उपक्रम है और मजा देखिए कि लेखक ने यह किया है पत्रकारिता(जिन्हें इस शब्द से परहेज है वे यहां मीडिया पढें) की भाषा में ही। सहारा लिया है ईमेल का और सजाया है उसे ब्लॉग के मर्तबान में ही..लेकिन घर में घुसकर, घरऊ बनकर पूरे घर को बदलने की कोशिश है यह…

पहली ही पंक्ति देखिए– “र्स्टेशन शहर के पिछवाड़े है जहां टैक्सी, आटो और रिक्शा स्टैंड है, गांव की तरफ एक छोटा सा बाजार है जहां मिठाई के मर्तबानों, यहां तक की तीखी पकौड़ियों और लोगों के सिरों तक पर गहरे कत्थई हड्डे मंडराते रहते हैं, उन्हें देखते हुए लगता है जैसे भुने हुए चने के दानों को पंख लग गए हों.”

फिलहाल इस एक वाक्य पर सोचें. पोस्ट किए गए कथा-अंश की बनावट में यह वाक्य क्यों महत्वपूर्ण है, इसपर यहां नहीं लिखकर फिलहाल इतना ही सोचना ठीक होगा कि यह एक वाक्य वाक्य चॉकलेटी वृतांतों के विरुद्ध कैसे विचारशीलता को खड़ा करता है, आत्ममुग्ध होने पर विवश करते मीडियाई उपकरणों के बरक्स कैसे आत्म के संघटन का प्रयत्न करता है..

यह वाक्य कुछ-कुछ वैसा ही जैसे कोई कैमरा लेकर चले और पूर्वापर क्रम से ठौर-ठिकानों का भूगोल दिखाये—- शहर..शहर के पिछवाड़े स्टेशन..टैक्सी ऑटो और रिक्शा-स्टैंड… फिर छोटा सा बाजार और बाजार के पार गांव..गांव के संकेत के रुप में बाजार का ठहराव एक दुकान पर..दुकान में मिठाई के मर्तबान..और फिर यहां रंगों का संयोजन— कत्थई हड्डा–भुने हुए चने के दानों को जैसे पंख लगे हों.. और हड्डे का अर्थ विस्तार कुछ ऐसे— ‘तीखी पकौड़ियों पर ही नहीं बल्कि लोगों के सर तक पर मंडराते हैं…’

सिर पर मंडराना एक मुहावरा है- आसन्न खतरे की सूचना..कायदे से हड्डे को मिठाई पर मंडराना था..वह तीखी पकौड़ियों पर ही नहीं बल्कि लोगों के सर पर भी मंडरा रहा है..उसकी शक्ल कैसी है? ऐसी कि जैसे भुने हुए चने को पंख लग गये हैं..एक बार फिर से मुहावरा..(गौर यह भी करें कि मुहावरे झमाके से नहीं, आहिस्ते से आ रहे हैं, बिना किसी पूर्व सूचना के और ऐसा खास मकसद से हो रहा है, लेकिन इस पर अभी नहीं..).

क्या यहां खड़ा हुआ यह पूरा चित्र गांव में समाती जा रही भूख की सूचना है, ग्रामवासिनी भारतमाता की संतानों के क्षुधातुर होते जाने की सूचना..? क्या यह पूरा चित्र इस बात की पेशबन्दी है कि भूख(विपन्नता) से बिलबिलाकर कुछ विप्लवी निकलेंगे(कथा में आया पीलिया का मारा छात्र अमेरिका यादव)?..क्या यह चित्र इस बात की सूचना है कि “रूरल मार्केट को विजिट कर लोगों को कंपनी के उत्पादों से परिचित” कराने का उद्देश्य पूरा करने के लिए “कम्पेन टीम के लड़के रेकी” करके लौट चुके हैं और दरअसल रेकी वाले लड़के और उनसे लगा-बंधा पूरा इंतजाम(प्रबंधन) ही वह हड्डा है जो पूरे रुरल को मार्केट बनाकर उसपर मंडरा रहा है? या, फिर यह चित्र कथा में आगे आने वाले एक और चित्र की सूचना है..इस बात की सूचना कि इदरीस की दुकान पर मेघना राव नाम की एक मिठाई बैठेगी..सौन्दर्य लोलुप पुरुषों का वहां नागिन डांस होगा..मेघना राव नाम की मिठाई पर अमेरिका यादव नाम का हड्डा मंडराएगा, हड्डे के डंक के रुप में एक गोली चलेगी ?

कैमरे से फिल्माने चलेंगे तो परस्पर संबद्ध ये बातें उसकी पकड़ से बाहर निकल जायेंगी..वह एक चित्र-परिवेश खड़ा करके इतनी बातों को बांध नहीं सकता..कुछ चीजों को सिर्फ कलम पकड़ सकती है। मतलब, पहला काम तो लेखक ने छपे हुए शब्द की स्वायत्तता के कोण से किया। चलंत-चित्र की भाषा के दबदबे के आगे झुका नहीं, छवियां बनायी जरुर मगर उतनी और वैसी ही जितनी और जैसे से वह अपना मनचीता अर्थ-आग्रह खड़ा कर सके.

छवि छुपाती है। एक ऐसे दौर में जब सारा कुछ HD फार्मेट में देखा जा रहा..जिस दौर की सबसे बड़ी समस्या चेहरे के पिम्पल्स हैं, जहां जोर ‘स्कॉर’ छुपाने और अपने भीतर के ‘स्टार’ को दिखाने पर है..(एक विज्ञापन में लड़की कहती है, प्लीज मेरे पिक्स अपलोड मत करना, लड़की हाई डिफिनिशन और मेगापिक्सल की ताकत जानती है) .. जब सबकुछ माइक्रोस्कोपिक डेप्थ और टेलिस्कोपिक लेंग्थ में दिखाया जा रहा है ताकि आपकी आंखों से छुपाने के लिए कुछ भी ना रहे( एक विज्ञापन की लाइन है—‘जब छुपाने के लिए कुछ भी नहीं’) , तब भी बहुत कुछ छुपा हुआ है, छुपाया जा रहा है और यह छुपाना अपने आप में आपराधिक है—- दूसरा काम लेखक ने यह खोजने- दिखाने का किया है। जो चीजें इतनी ज्यादा नजर आती हैं कि फिर उनके भीतर का चौंकाऊपन चूक जाता है और ठीक इसी कारण कारण दृश्य बनने की उनके भीतर योग्यता तक नहीं रह जाती, लेखक ने ऐसी चीजों को दृश्यमान किया है, उन्हें चौंकाऊ बनाया है, कह लें जिसे मुर्दा मान लिया गया था उसे जिन्दा किया है। ऐसी चीजों पर छपे निशानों को खोजा है लेखक ने।

यह काम कथा के पहले वाक्य से शुरु हो जाता है.और लगातार चलता है.(इसकी एक चुभती हुई मिसाल है वह पंक्ति जो ‘मिस नार्थ ऑफ फन रिपब्लिक’ प्रतियोगिता के बारे में एक पात्र के जबान से फिसलती है– “गलत है, सरे नौ से गलत भाईजान, इतनी दूर से ककड़ी की बतिया जैसी लड़कियों के रोएं दिखाई दे रहे हैं, वे ठीक से जवान नहीं हो पाई हैं, जरूर उनके वालिदैन ने उमर का गलत सर्टिफिकेट दिया होगा.”)

चीजों को गौर से देखिए, उसपर सिर्फ अपने समय की ही छाप नहीं होती बल्कि अपने समय के छाप के विरोध में भी एक छाप होती है. चीजें अपने स्वभाव के विरुद्ध होने से इनकार करती हैं. शायद यह बताने की कथा-युक्ति है यह।

लेकिन अभी इतना ही… क्योंकि शायद यह कथा किसी भावी उपन्यास का अंशमात्र है

(पुनश्च—सरसरी निगाह से पढ़ा तो भी यह अटका कि कुछ वाक्य विचार का बोझ नहीं संभाल पाये हैं, सो विचार-भार से उनका व्याकरण लचक रहा है. कहीं-कहीं अगले वाक्य में जाने की हड़बड़ी है. इस फेर में अर्थ का संघनन बाधित हो रहा है. मैं मानकर चल रहा हूं, कथाकार कथा कहने का उस्ताद है और पत्रकारिता के अदब में खूब गहरे पगा हुआ, सो, वह अपने इदरीस भाई की कैंची लेकर जरुरी कतर ब्यौंत करके फाइनल प्रिन्ट मंजर-ए-आम करेगा. रफ कट देखकर फिलहाल के चलन के हिसाब से यह फिल्मी गाना याद आ रहा– जब रात है ऐसी मतवाली तो सुब्ह का आलम क्या होगा)

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव,  मूलतया छपरा(बिहार) के निवासी, पिछले पंद्रह सालों से दिल्ली में। पहले आईआईएमसी और फिर जेएनयू में पढ़ाई। “उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हिन्दी लोकवृत्त का निर्माण” शीर्षक से पीएचडी के बाद दिल्ली के कॉलेजों में छिटपुट अध्यापन, फिर टीवी चैनल की नौकरी और अब विकासशील समाज अध्ययन पीठ(सीएसडीएस) की एक परियोजना इंक्लूसिव मीडिया फॉर चेंज से जुड़े हैं। इनसे  chandan@csds.in पर संपर्क संभव है। 

अब्बा (बांग्ला कहानी): नवारुण भट्टाचार्य, अनुवाद- मिता दास

नवारुण की इस कहानी को पढ़ते हुए स्पैनिश के महान साहित्यकार रोबर्टो बोलानो का एक कथन याद आता है.  किसी दोस्त ने उनके एक अप्रकाशित उपन्यास के बारे में पूछा – उसमें बच्चा मरता है कि नहीं! बोलानो का उत्तर था -किसी भी लेखक को अपनी किताब में बच्चों की हत्या नहीं करनी चाहिए. नवारुण की बेवाकी, गद्य के साथ बर्ताव, हाशिए की जिन्दगी से जो लगाव है, और यह सब जब एक सहजता के अनौपचारिक शिल्प में ढलता है तो रोबर्टो बोलानो का याद आना लाजिमी हो जाता है. खैर, पढ़िए यह कहानी.

By Banksy

By Banksy

By नवारुण भट्टाचार्य

जिन लोगों ने दंगा किया उनमें सदाशिव भी शामिल था यह कहना ठीक नहीं होगा, और नहीं था यह भी कैसे कह सकते हैं। ऑफिस के लोग, उनकी बीवियां भी, तो गाड़ी में चढ़कर दुकान लूटने गए थे। क्या पुलिस ने दंगा नहीं करवाया? और वहीं हो गया झमेला। किसने किया और किसने नहीं किया उनको ढूंढना-छांटना बड़ा ही दुश्कर हो उठा था। पर हां, दंगेबाजों में सदाशिव को पकड़ लिए जाने पर भी यह मानना ही पड़ेगा कि वह ऐवेंइ (यूं ही) है।

 कुछ माह पहले अन्य पड़ोसियों की देखा-देखी वह भी कहीं से एक त्रिशूल उठा लाया था घर, तब सदाशिव की मां ने कहा, क्या करेगा इसे लेकर? झगड़ा-झंझट होगा तो सभी लोग दल के संग मिलकर चूहा मारने जाएंगे। तो तू क्या करेगा? मैं भी जाऊंगा। सदाशिव की मां तब और भी कई बातें करना चाहती थी, बात जबान पर आ चुकी थी पर सदाशिव ने कितनी देशी पी रखी थी वह समझ ही नहीं पाई इस वजह से उसने बात आगे ही नहीं बढ़ाई।

सदाशिव की एक टांग जरा पतली और थोड़ी टेढ़ी थी। वैसे वह बहुत दुबला और ठिगना भी था। जैसा भी हो, उस शाम को रोटी और पानी पी कर सदाशिव सो गया था तब उसकी मां ने त्रिशूल को हिलाडुला कर देखा, तो देखती क्या है कि यह तो बिलकुल ही फालतू माल है। सोते हुए सदाशिव की जेब से मां ने एक सिगरेट का पैकेट निकला जिसमें कुछ कटोरियों के अलावा अधजली बीड़ी और दो साबुत बीड़ी मिली। एक बीड़ी सुलगा ली थी सदाशिव की मां ने।

सोने और न सोने के बीच सदाशिव की मां को दूर से एक आवाज लय में सुनाई देती। कहीं तो… इस घनी रात में मीटिंग हो रही है। चिल्ला-चिल्लाकर कोई तो भाषण दे रहा है। इतनी रात में भी भला कोई मीटिंग करता है? सुनने वाला कोई रहता है क्या भला? असल में वह कोई मीटिंग थी ही नहीं। चौरस्ते के मोड़ पर एक सफेद एम्बेसेडर कार खड़ी थी और उसके पिछले दरवाजे को खोल दो माइक के चोंगे बाहर निकल आए थे, और भाषण बज रहा था एक कैसेट में। और जो लोग इसे बजा रहे थे वे लोग नीची आवाज में आपस में बातें कर रहे थे और साथ-साथ पान मसाला खा रहे थे। उनमें से एक ने सफारी सूट पहना था बाकी के तीनों ने पजामा-कुरता पहन रखा था।

ड्राइवर फुटपाथ पर बैठा ऊंघ रहा था, इससे पहले भी उन्होंने तीन और मुहल्लों में गाड़ी रोककर भाषण बजाया था। सभी जगह आधे-आधे घंटे तक यही कैसेट बज रहा था। अभी और भी दो मुहल्लों में उसे यही भाषण आधे-आधे घंटे और बजाना है। कैसेट को एक स्टूडियो में तैयार किया गया था, एक दम पेशेवरों के कायदे सरीखा। कहीं-कहीं आवेग की खातिर वाद्य यंत्र भी बज उठता, कहीं-कहीं आर्तनाद और कभी-कभी विद्रूप का स्वर तीव्र हो उठता हंसी का एक शोर भी। जब यह भाषण चल रहा था एक पुलिस वैन चक्कर मार कर चली गई। सफारी सूट पहने व्यक्ति ने उस वक्त आकाश की तरफ मुंह उठाकर एक पान मसाले का पूरा पैकेट निगल लिया।

सदाशिव ने सोचा था शराब से काफी नशा चढ़ेगा, घर पर ही बैठकर आधी बोतल गटक गया था। सिर्फ पचास ही रुपए मां को पकड़ाए थे और बाकी के ढाई सौ अपने पास रख लिए थे। इनसे काफी दिन उसका काम चल ही जाएगा। इस बीच शंकर, कांजी, भाजो सभी दल-सा बना कर आए और सदाशिव को खींचकर बाहर निकाला। दल बनाकर सभी ट्रक पर चढ़ कर गए, डाई किया हुआ गैस सिलिंडर लेकर। उनके संग थी तलवार, रॉड, छुरी, सींक, एसिड और पेट्रोल बम। सदाशिव ने कमरे के कोने में टिकाया हुआ त्रिशूल उठा लिया। गंदे पजामे की डोर (नाड़ा) कसकर बांध ली और फिर उसे मोड़कर ऊपर उठा लिया एवं इस बीच सदाशिव कोई बात नहीं करता है बस सिर्फ धुनकी में अनर्थक चीत्कार कर उठता था।

यह मिजाज मगर काफी संक्रामक था। और भी अनेक जिनके बदन उसके जैसे ही पतले दुबले, उठाईगिरे की तरह जो किसी भी तरफ के नहीं होते बस चीख उठते हैं अकारण ही। सदाशिव जैसे सभी उस वक्त एक-एक जोश-मशीन थे। आंनदी मुखड़े वाला यह गैंग कुछ दूर जा दाएं ही मोड़ पर ठिठक गया था। मैला टी-शर्ट और बदरंग-सा ट्रैक सूट जिसे उलटकर पहने हुआ था। चेहरा सिनेमा के फटे पोस्टर के टुकड़े से ढंका हुआ और उस पर रख दी गई थी एक पूरी ईंट। इसलिए कि अगर जोर की हवा चले भी तो पोस्टर उड़कर उसके कुचले चेहरे को बेनकाब न कर दे। भाजो ने मृत देह की पेंट के जेब में हाथ डाल कर एक रुमाल जैसा ही कोई कपड़े का टुकड़ा निकाल कर फेंक दिया।

कुछ देर चुप रहने के बाद फिर वे चलने लगे, लंगड़ा होने के कारन सदाशिव पिछड़ रहा था, सामने से एक ट्रक आया। ड्राइवर की सीट की ऊपरी छत में जो लोग सर ऊंचा किए बैठे थे उनके हाथों में तलवार, बरछा लिए उन्मत्त नाचते और बदला लेने के स्लोगन सुर मिलकर गा रहे थे। ट्रक के भीतर अलमारी, रैक, सुलाकर रखा गया रेफ्रिजरेटर, टीवी, सूटकेस बर्तन-भांडे, परदे, स्कूटर, आईना, राॅड आइरन से बनी चेयर रखी थी। ट्रक को आते देख सदाशिव और अन्य लोग रास्ते के दोनों किनारे होकर उसके लिए जगह बना देते हैं। ट्रक गति बढ़ा देता है। सदाशिव का दल एक बार फिर जोर से जय जयकार कर उठा, और दौड़ने भी लगा। सदाशिव नहीं दौड़ता, इसलिए पीछे रह जाता। तब वह त्रिशूल अपनी लाठी बना लेता है। रास्ते में ढंग-ढंग की आवाजें आनी शुरू हो जाती हैं।

सदाशिव उनके पीछे-पीछे जब रीगल के गेट पर पहुंचा तो देखता है कि वे लोग बाहर ही खड़े हैं जिन्होंने आग लगाई थी, जिन्होंने खून किया था और बलात्कार भी उन्होंने ही किया था पर अब उन लुटेरे लोगों को घुसने ही नहीं दिया जा रहा है और बाउंड्री वाल के भीतर दो फ्लैट जल रहे हैं धू-धूकर। आग के लपटों के बीच टूटने-फूटने की आवाज, दरवाजों का टूटना। खिड़कियों का पल्ला खुलकर ग्रिल से अलग हो गया। सदाशिव कुछ देर खड़े रहकर देखता रहा आग का तांडव और धुएं का गोल-गोल हो ऊपर को उठना। अंदर एक गाड़ी में आग भी लगी हुई थी। इस अपार्टमेंट में वह एक बार ही आया था। पीछे की ओर थोड़ी-सी खुली जमीन है वहीं के झाड़-जंगल काटने का काम मिला था भाग्येश को और वह उसी के संग यहां आया था। पीछे एक गेट भी था, वहीं काम करने वालों के लिए एस्बेस्टस लगी छत वाले लगे-लगे तीन कमरे थे। लगता है वहां उतनी लूटपाट नहीं मची, पीछे के गेट से वहां जाने पर शायद कुछ मिल ही जाए?

भूल की थी सदाशिव ने, इधर मांस जलने की बू आ रही थी, तोड़-फोड़ भी हुई थी। पुराने टायर को जलाकर मृत देह में आग लगाई गई थी, चप्पल उलटी पड़ी थी। गेट भी खुला था। शायद कुछ लोग इस ओर से भाग खड़े हुए थे। भीतर आग जल रही थी और अधजला कैलेंडर भी दिख रहा था। दरवाजे से चेहरा घुसाकर देखा था सदाशिव ने, गरम लावे जैसा था भीतर। दरवाजा टूटकर गिर गया था और उसके नीचे से एक हाथ बाहर की ओर निकल आया था। भीतर घुस कर अगर कुछ हिलाया-डुलाया जाए तो शायद कुछ मिल भी सकता है पर साहस नहीं कर पाया सदाशिव।

उसी वक्त भीतर से डरकर सांस लेने की या सांस रोकने की कोशिश करने की अस्वाभाविक आवाज से डरकर पीछे पलट कर सदाशिव ने देखा था। नहीं, कोई भी नहीं है। कुछ नहीं सिर्फ दूरी पर घर जलने की अजब-सी आवाज भर थी। शाम का उजाला रोज ही की तरह कम हो रहा था। अब लगता है कुछ और जलने को बाकी नहीं बचा था। किन्तु सदाशिव ने जो आवाज सुनी थी क्या वह गलत थी? थोड़ा डर भी लग रहा था सदाशिव को। तभी सदाशिव त्रिशूल हाथ में लिए बोल उठा था- कौन?

कोई जवाब नहीं मिला।

…कोई है? इसका भी जवाब नहीं आता। शरीर थर-थर कांपने लगा सदाशिव का। त्रिशूल को वह अच्छी तरह से जकड़ लिया। सदाशिव एक बारगी सोच बैठा कि उसने वो आवाज गलत सुनी थी। किन्तु क्या वह गलत था! दरवाजे के नीचे से जो एक हाथ बाहर निकला दिखाई दे रहा था क्या वह जीवित है? कराह रहा है? पर दरवाजे को हटाना उसके बस की बात नहीं।

सावधान! मेरे हाथ में किन्तु त्रिशूल है, छेद डालूंगा!

इस पर भी कोई आवाज वापस नहीं आई। दिन के वक्त का उजाला खत्म होने को था और सदाशिव ने महसूस किया कि सब कुछ कैसे जीवंत हो उठा। अंधकार घिरने से पहले सब कुछ कैसे हिल-डुलकर स्पष्ट हो उठता है। कुछ ही दूरी पर जमीन के ही ऊंचाई का एक चहबच्चा (जमा पानी) था। सदाशिव ने त्रिशूल को बरछे की तरह ऊंचा उठा लिया और चहबच्चे की ओर बढ़ा, सिर्फ काई का ही दाग दिखा, पानी नहीं के बराबर। उसके अंदर एक कोने से पीठ टिकाए, कच्छा पहने हुए एक छोटा-सा लड़का, सर मुंडा हुआ और सर पर फोड़ा, बच्चा सदाशिव को देख कर उठ खड़ा हुआ। सदाशिव त्रिशूल को ऊंचाकर खड़ा हो गया जैसे वह त्रिशूल घोंप देगा अभी, बच्चा चुपचाप-सा खड़ा था।

सदाशिव को देख उसका मुंह खुला का खुला रह गया। एक लम्हे के गुजर जाने के बाद सदाशिव का खुद ब खुद त्रिशूल वाला हाथ नीचे हो गया। उजाला भी अब सिमट चुका था। वह समझ चुका था की सदाशिव उसे नहीं मारेगा। और अगर मारेगा भी तो इस वक्त तो बिलकुल भी नहीं। वह वापस बैठ गया, कच्छा फिर भीगने लगा। सदाशिव भी समझ गया कि वह अब बच्चे को नहीं मार पाएगा। नशा कब का हिरन हो चुका था। अबकी सदाशिव त्रिशूल रखकर पसर गया था। सदाशिव ने एक बीड़ी सुलगा ली। उसने सोच लिया की वह बीड़ी पीकर उठेगा और चला जाएगा। अगर बच्चे को नहीं मार पाया तो कम से कम चहबच्चे के पानी में ज्वलंत बीड़ी का आखरी टुकड़ा फेंक ही सकता है।

 पर सदाशिव ने देखा कि जितनी देर वह बीड़ी के कश ले रहा था और उस बच्चे के बारे में सोच रहा था। वह बच्चा अब धीरे-धीरे उसके भीतर घर करने लगा था। जरूरत क्या है… उसके बारे में सोचने की? कितने ही तो रोज मर रहे हैं? और उधर देखो दरवाजे के नीचे से किस तरह एक हाथ बाहर निकल आया है। शायद कोई जल रहा हो, और वे जो भाग खड़े हुए हैं शायद उन्हें भी यहीं- कहीं आस पास के रास्तों में ही पकड़ लिया गया हो।

 फिर से झमेले में फंस गया सदाशिव, पर बच्चे को मृत लोगों की कतार में नहीं रख पा रहा था। अगर वह लंगड़ाते हुए बाहर निकल कर चला भी जाए तो कोई कुछ कहने वाला भी नहीं। किन्तु सदाशिव के चले जाने के बाद और भी अंधेरा बढ़ जाएगा और वह बच्चा भीगी ईंटों के बीच चहबच्चे में गीला ही बैठा रहेगा। कब तक…? क्या उठ कर बाहर आएगा…? पता नहीं कर पाया सदाशिव, पर उसने एक बात अच्छी तरह से जान ली थी कि जो लोग बाहर इंतजार कर रहे हैं- उन्हें यह बच्चा नहीं मिलेगा। दिन का उजाला खत्म हो जाएगा। चहबच्चे के भीतर अंधेरा, तसले में सड़ा हुआ पानी और भीतर कोने में सिमट कर सर में फोड़े वाला बच्चा…।

-ऐ! उठकर आ! अंधकार कोई जवाब नहीं देता।

मैं कुछ नहीं करूंगा। डर मत! उठकर आ।

अंधकार में पानी कुछ हिल उठता है।

हाथ को पकड़! पकड़ कर बाहर आ।

छोटे से हाथ ने सदाशिव के हाथ को थाम लिया। सदाशिव ने बच्चे को हाथ पकड़ कर बाहर निकल लिया। और फिर उसके गले को, हड्डियों को, धुकधुक करते हृदय को, छाती, कमर, पैर सब को हाथों से झाड़ कर देखने लगा। पहने हुए कच्छे से पानी टपक रहा था पैरों से होकर, हवा लगने से बच्चे को ठंड लग रही थी, वह कांप रहा था। सदाशिव को छोटे-छोटे दांतों की किटकिट सुनाई देती है। वह बच्चे को सीने से लगा लेता है। खुद के हाथों से उसके बदन को सहलाते हुए सेंकता है। बच्चा उसकी छाती में अंधकार में अंधकार बन बैठा रहता है। धुकपुक-धुकपुक करता रहता है दिल। बच्चा जोर-जोर से सांस लेता है और फिर सिमट जाता है। सदाशिव जोर से उसे जकड़ लेता है। छोटी-छोटी उंगलियां, छोटे-छोटे नाखून सदाशिव महसूस करता है। वह उसे नोंचता है और फिर थककर अलग हो जाता है।

 सदाशिव का बायां पैर पतला-सा है और लंगघता भी है। वह अपने दाएं कंधे पर बच्चे को लादकर बाएं हाथ में त्रिशूल पकड़े हुए अंधेरे में ही पीछे के गेट से बाहर आ जाता है। अब एक ट्रक उसे लगा कि गेट पर आया हुआ है। वहीं सब भीड़ बनाकर खड़े हैं। लगता है और भी माल लादा जाएगा या फिर लाश। गले रेते हुए औरतें या नोंचकर या बींधकर मारे हुए पुरुष। शायद उन्होंने सदाशिव को ज्यादा तवज्जो नहीं दी। या फिर त्रिशूल ने ही उनकी नजर को बांध लिया था।

 घर में अंधेरा उतर आया था, पता नहीं कितना बजा होगा उस वक्त घर पर, आग बुझ चुकी थी। तभी बेसमेंट या किचन में या किसी कोने में प्रचंड आवाज के साथ विस्फोट हुआ और एक गैस सिलिण्डर फट गया। सब हड़बड़ा उठे, सदाशिव भी। बच्चा भी चैंक उठा। आग की झलक देख डर से ताक रहा था और चीखा सहमकर।बड़बड़ाया- अब्बा!

उन्होंने भी चीख सुनी थी।

साभार- समकालीन जनमत, दिसंबर, 2014 

एक मिट्टी दो पौधे: मेघना राव उर्फ गोदावरियम्मा और अमेरिका यादव

                                              

यह न तो बाणभट्ट की आत्मकथा है और न ही शराबी की सूक्तियां. टेक्स्ट के बनिस्पत कयासों का सहारा लें तो कह सकते हैं कि यह होमियोपैथ के किसी डॉक्टर का साहित्य वाचने की सनक है या हेयर कटिंग सैलून के किसी चलताऊ बार्बर के वाक्-कौशल का लिपिबद्ध पोथा. लेकिन टेक्स्ट भेजने की जो प्रक्रिया अपनाई गयी उससे ये सारे कयास संदिग्ध लगते हैं. इसे वर्ड फाइल में गूगल इनपुट टूल्स के सहारे हिंदी में टाइप किया गया है (जिसके प्रथम पृष्ठ के ऊपरी-बायें कोर में पहला शब्द ‘आगे से’ और अंतिम पृष्ठ के नीचे-दायीं तरफ आखिरी शब्द के रूप में- ‘जारी’ अंकित है) और जीमेल से Anonymous (डॉ लेखक वशिष्ठ) के नाम से भेजा गया है. स्पैम के अन्य मेल्स के साथ-साथ हमेशा के लिए डिलीट होने से यह डॉक्यूमेंट सिर्फ इसलिए बच पाया क्योंकि कोष्ठक में डॉ. लेखक वशिष्ठ लिखा था. ध्यानाकर्षण का पहला चरण पूरा होते ही नज़र सब्जेक्ट वाले हिस्से की ओर गयी, जहाँ देवनागरी लिपि में लिखा था- ‘एकोनाइट की डोज अकार्डिंग टू सिमिलिया सिमिलस करेंटर’. सन्देश वाला हिस्सा अंग्रेजी में था जिसका तर्जुमा इस प्रकार है-

प्रिय,

अधिकांश मेरे बारे में कुछ-कुछ जानते हैं लेकिन तुम कुछ भी नहीं जानते हो और यही तुम्हारी पात्रता है. इसका मतलब यह कतई नहीं है कि मैं उस शून्य को भरना चाहता हूँ, क्योंकि मैं क्या कोई भी उसे नहीं भर सकता. जिस दिन तुम्हारी यह रिक्तता अरिक्त या अतिरिक्त हो जायेगी तुम मर जाओगे और फिर मेरे लिए क्या किसी के लिए भी तुम वही नहीं रह जाओगे जो आज हो और जिसे मैं पात्रता कह रहा हूँ.

वैसे कहने को कह सकता हूँ कि मैं वर्षा वशिष्ठ का एक्स हूँ और तुम्हारे लिए जासूसी का एक नया कार्यभार या वॉयरिज्म की लत सौंप कर चटकारे लूँ. वैसे तुम यह मानने को स्वतंत्र हो कि मैं वर्षा वशिष्ठ का एक्स हूँ लेकिन कोई एक्स वर्तमान कैसे हो सकता है! इसे क्या ऐसे कहा जा सकता है कि मैं वर्षा वशिष्ठ से आजकल रिक्त हूँ; खैर यह तुम्हारी समस्या है, रिक्तता न तो मेरी खासियत है न ही पात्रता. लेकिन एक्स-प्रेजेंट-पास्ट के पार्श्व के बियॉन्ड यह सच्चाई जरुर है कि वर्षा वशिष्ठ को चाँद चाहिए था और मुझे पात्रता (एँ).  

तिरछी स्पेल्लिंग के कवर पेज में घोड़े को रगेदने और इस रगदाई को कैमरे में पकड़ने की जिद्द वाली छवि का मैं कायल हूँ इसीलिए एक फाइल अटैच्ड कर भेज रहा हूँ. लेकिन तुम्हारे कैमरे की जद में मुझे नहीं आना है यही कारण है कि Anonymous मेल कर रहा हूँ. मुझे यह भी पता है कि यह मेल तेरे स्पैम में जाएगा लेकिन इसके अलावा मेरे पास कोई और चारा नहीं है. अपनी तरफ से निश्चिन्त हूँ कि तुम मुझे ढूंढ नहीं पाओगे और अगर ढूंढ भी लिए तो एकोनाइट की ऐसी डोज दूंगा कि लोगों के लिए तुम्हारी खुफियागिरी में पागलपन वाले जुलाब से ज्यादा महत्व की मादकता नहीं रह जायेगी. अपने लिए मेरी प्रासंगिकता यही समझो कि जब तक मैं यह सब लिख रहा हूँ तभी तक मैं हूँ. सेंड करते ही मैं सफा हो जाऊँगा.
तुम्हारा
लेखक वशिष्ठ
 

Talent Show By Pawel Kuczynski

Talent Show By Pawel Kuczynski

 एकोनाइट की डोज अकार्डिंग टू सिमिलिया सिमिलस करेंटर

By लेखक वशिष्ठ   

स्टेशन शहर के पिछवाड़े है जहां टैक्सी, आटो और रिक्शा स्टैंड है, गांव की तरफ एक छोटा सा बाजार है जहां मिठाई के मर्तबानों, यहां तक की तीखी पकौड़ियों और लोगों के सिरों तक पर गहरे कत्थई हड्डे मंडराते रहते हैं, उन्हें देखते हुए लगता है जैसे भुने हुए चने के दानों को पंख लग गए हों. छप्परों, गुमटियों में चलने वाली दुकानें म्यूजियम हैं जिनके मर्तबानों में लुप्तप्राय गुड़ की जलेबियां, खाझा, खुर्मे, घुन लगी मठरियां हैं लेकिन सबसे ज्यादा भकोसी जाने वाली चीज शहर से आने वाले अखबार हैं जिनको निगलने के लिए चाय पीनी पड़ती है. ग्रेजुएट पान भंडार के बगल में इदरीस का कैंची से लेकर कैंलेडर तक हर चीज पर सात सौ छियासी के ठप्पे वाला हेयर कटिंग सैलून है, इस संख्या का कोई धार्मिक मतलब नहीं है, यह तो ग्राहकों के निजी स्पेस में घुसने की उसकी एक कदम आगे दो कदम पीछे की रणनीति का कोड है, वह कस्टमर की जिंदगी के रहस्यों में तेजी से खोंचा मारता है, आंखों में झांकता है, अवरोध पाकर दुगुनी फुर्ती से अल्ला का करम है सब अपना कमाते और अपना खाते हैं कहते हुए नए रास्ते की खोज शुरू कर देता है, हालांकि आजकल उसका सारा वाक्-कौशल लौंडों को घटिया केमिकल वाले फेशियल कराने के लिए फुसलाने में जाया हो जाता है. उसके सैलून पर झिझकते हुए बाल खींचने और मुंहासे फोड़ने वाले किशोरों की आवाजाही हमेशा रहती है. यह मुंहासे फोड़ना भी कमबख्त क्या शानदार काम है, बड़ी मुश्किल से एक मीठी कसक के साथ कोई एक फूटता है, खील से खाली हुई जगह में खुद से बढ़ती जाती अजनबियत भर जाती है.

दुकानों के बीच यहां देखने की चीजें गुजरती ट्रेनें और डा. परमानंद परमार की होम्योपैथिक डिस्पेंसरी हैं. हमेशा ऊंघते हुए मक्खियां हांकने में मशगूल इस बाजार के इकलौते कसाई से यूरोप में धाक वाले भारतीय सर्जनों को भी ईर्ष्या हो सकती है जिसकी ख्याति है कि वह मरणोपरांत हर बकरी का जेंडर इस तरह बदल देता है कि फिर कोई दोबारा नहीं बदल सकता. कसाई के बगल में यह डिस्पेंसरी है जिसकी टूटी फर्श पर बेंचों के नीचे घास उग आती है जिसे कोई गरीब मरीज पांचवे, सातवें महीने उखाड़ देता है, मटमैले लेबलों वाली बोतलों, शीशियों से खड़खड़ाती शीशे के टेढ़े पल्लों वाली दो आलमारियों के ऊपर नाइट सूट पहने एक यूरोपियन बूढ़े के गंजे सिर की गोलाई में उड़ते हुए लाल पेन्ट से लिखा है- रोग पहले मन को ग्रसता है फिर तन में प्रकट होता है.

डाक्टर एक बड़ी सी मेज के पीछे आम की लकड़ी की भारी कुर्सी पर बैठा हुआ हिंदी में अनूदित दो किताबों मैटेरिया मेडिका और ऑर्गेनान मेडिसिन को छानता रहता है, उसे याद नहीं कि ये किताबें किसी से उधार ली थीं या वह खरीद कर लाया था लेकिन उनसे उसने दो काम की चीजें सीखी हैं, एक तो यह कि होम्योपैथी लॉ आफ सिमिलिया के जरिए कांटे से कांटा निकालने की कला है और दूसरे किसी रोग के ऊपरी शारीरिक लक्षण व्यर्थ हैं, असली मतलब तो संवेदना, संदेह, डर, स्वपन, कामुकता, घृणा, उत्तेजना और क्रोध के कारणों का है जिनको सविस्तार जाने बिना दवाई देना चिकित्सा कला के साथ सरासर बेईमानी है. वह कपटी आहों के साथ मरीज के चेहरे पर धंसी आंखे स्थिर किए हुए हथेलियां रगड़ता, लंबी सांसे लेता हुआ दस कोस के बाशिंदों की आत्मा थाह लेता है और घरों के सबसे गुप्त रहस्य जान जाता है. यह डिस्पेंसरी इलाके की राजनीति का सबसे जागृत अड्डा है जहां डाक्टर हर तरह के मसले सुलझाता है. जब वह बोलता है तो लोकल एमएलए भी बच्चों की तरह सांस रोक कर सुनता है क्योंकि उसके बताए मुद्दे कभी फेल नहीं हुए, पार्लियामेंट से लेकर प्रधानी तक के चुनाव नतीजों की कोई भविष्यवाणी कभी गलत साबित नहीं हुई.

नौसिखिया नेताओं को वह राजनीति का शुरूआती पाठ यह पढ़ाता है कि पहले समस्या पैदा करो फिर निदान अपने आप हो जाएगा, वे नहीं समझ पाते कि अकेले कैसे नई समस्या पैदा की जा सकती है तब वह डा. फेडरिक सैमुअल हैनीमैन की महान खोज की कहानी सुनाता है. वह एक मोटी किताब खोलकर एक तस्वीर के आगे सिर झुकाते हुए लंबी सांस लेकर कहता है, डा. हैनिमैन कोई सवा दो सौ साल पहले स्काटलैंड के डाक्टर विलियम कलेन सलेन की किताब मैटेरिया मेडिका का अंग्रेजी से जर्मन में तर्जुमा कर रहे थे, एक जगह लिखा था सिनकोना की छाल की डोज देने से मलेरिया का रोगी चंगा हो जाया करता है. डा. हैनिमैन अपनी जवानी में एक नीली आंखों वाली बेहद खूबसूरत लड़की के इश्क में पड़कर हंगरी के दलदली इलाकों में भटकते फिरे थे, उस लड़की को मलेरिया हुआ, उन्होंने इलाज किया लेकिन नहीं बचा सके, वह मर गई. डा. हैनिमैन ने पुराने प्रेम की अकाल मृत्यु की टीस को कुछ कम करने के लिए एक दिन सिनकोना की छाल चबा डाली, आश्चर्य कि उन्हें मलेरिया हो गया. उन्होंने इस प्रयोग को अपनी बेटी एमिलिया और कई दोस्तों पर किया, उन सबमें भी मलेरिया के लक्षण प्रकट हो गए, फिर उन्होंने इन सबको फिर वही सिनकोना की ही सीमित डोज देकर चंगा किया. इस तरह एक महान चिकित्सा सिद्धांत सिमिलिया सिमिलिबस करेन्टर का जन्म हुआ, जो चीज एक स्वस्थ्य आदमी में किसी बीमारी के लक्षण पैदा कर सकती है वही उन लक्षणों वाले किसी बीमार आदमी का इलाज बन जाती है.

डा. हैनिमैन को सबसे गंभीर चुनौती लटकते बकरे पर से मक्खियां हांकते, बड़े बड़े सर्जनों के कान काटने वाले पड़ोसी कसाई से मिलती थी, वह उनींदी आवाज में वहीं से बड़बड़ाता, अब बुढ़ापे में बच्चे पैदा करने की तरकीब न सिखाइए बाबूसाहेब, फर्ज कीजिए हमको कोई जहर देकर मार दे, हमारे लड़के हमको सिपुर्दे खाक करने को ले जा रहे हों और आप हमारे जनाजे में आकर वही जहर हमारे मुंह में डाल दें तो क्या हम फिर से जिंदा हो जाएंगे!

नौसिखिया नेताओं की समझ में भले सिर्फ भ्रम आया हो लेकिन इस सिद्धांत का व्यावहारिक इस्तेमाल डाक्टर इस तरह करता था कि डिस्पेंसरी के सामने से गुजरने वाले बच्चों के मुंह प्यार से खुलवा कर एक शीशी से कुछ गोलियां टपका दिया करता था. कई तो खुद दौड़कर दिन में कई बार आते थे और मछलियों की तरह मुंह खोलकर शीशी के ऊपर हुक की तरह मुड़ी तर्जनी के उठने का इंतजार माथे में आंखे धंसाकर करते थे ताकि मीठी गोलियां टपक सकें. डाक्टर अलाय बलाय और छोटी मोटी बीमारियों से बचाने के नाम पर इन गोलियों का सबसे स्नेहिल इस्तेमाल बूढ़े कसाई के नाती पोतों पर करता था जिनमें से अधिकांश तपते, छींकते, खांसते अपनी मांओं के साथ जल्दी ही डिस्पेंसरी में दिखाई देते थे लेकिन इस बार फीस देनी पड़ती थी. लगातार दूसरी बार फीस उधार करने वाले मरीजों को डाक्टर ऑर्गेनान मेडिसिन का लाल स्याही से अंडरलाइन किया हुआ पैरा नंबर दो सौ सताइस सुनाता था, बीमारी मूर्ख लोगों को चतुर और बुद्धिमानों को मतिमंद बना देती है लेकिन होम्योपैथी के डाक्टर को किसी बीमारी को ठीक कर देने के बाद यह देखकर सदमा लगता है अब स्वस्थ्य हुए आदमी का भावनात्मक व्यवहार बदल गया है, उसके मन में मैल आ गया है, वह कृतघ्न हुआ है और अब उसे बात बात पर गुस्सा आने लगा है.

Poster of Bad Guy (2001)

Poster of Bad Guy (2001)

इस स्टेशन पर आकर मरने से बस एक घंटा तेइस मिनट पहले मॉडल, टीवी सीरियलों की पॉपुलर अभिनेत्री आंध्र प्रदेश की मेघना राव उर्फ गोदावरियम्मा पहली बार नार्थ इंडिया के युवाओं में अपना इस कदर क्रेज देख कर बेहद खुश थी. वह तन साल तक मुंबई में किराए के डेढ़ कमरों वाले छोटे से फ्लैट से कई स्टूडियोज के बीच चकरघन्नी रहने, नकचढ़े डाइरेक्टरों की बेवजह डांट खाने, प्रोड्यूसरों की अपराधबोध में गर्क कर देने वाली शर्तें सिर झुकाकर स्वीकार करने और मेहनताने के मिले चेकों में से दो तिहाई अपने पिता के खाते में ट्रांसफर करने के बाद पहली बार एक बड़ी मल्टीनेशल कंपनी के सौंदर्य प्रसाधनों के प्रमोशन टूर पर निकली थी. उसे पहली बार अपने उस अस्तित्व का पता चला था जो टीवी स्क्रीन से बाहर निकल कर न जाने कब दर्शकों के मन में चला गया था, वहां उनकी गुप्त कल्पनाओं, अतृप्त इच्छाओं के साथ मिलकर ऐसी ऐसी उत्तेजक, ऐसी ऐन्द्रिक आभा पा गया था जो किसी सचमुच की स्त्री में होना संभव नहीं है और विज्ञापनों के लिए हमेशा ऐसी ही छवि वाली स्त्रियों की दरकार होती है. अब तक वह ऐसी एक्ट्रेस थी जो हर दिन थक कर चूर हो जाने तक कैमरे के आगे असली जैसी नकली भावनाएं पैदा करने वाली मानसिक फैक्ट्री की मशीनें चलाती थी, रात में अक्सर कुछ भी खाकर सो जाती थी और छुट्टी के दिन केरल के एक बूढ़े आयुर्वेदाचार्य के घर जाती थी जो मेकअप के जहरीले रसायनों से बचाने के लिए उसकी देह का ट्रीटमेंट कर रहा था ताकि उसका कैरियर लंबा हो सके, लेकिन एक हफ्ते में ही वह अपनी देह के सभी अंगों, अदाओं, मुस्कानों और आहों का असली प्रभाव जान गई थी. लाखों आंखों की लालसा में खुद को टिमटिमाते देखना रोमांच था और वह खुद को जानने वालों के साथ फ्लर्ट करके उन्हें चाहने वालों में बदलने का कौशल सीख गई थी. कंपनी के साथ हुए कांट्रैक्ट के मुताबिक नार्थ इंडिया में उसे लोकल फ्रैंचाइजी के साथ मिलकर टार्गेट कस्टमर्स युवाओं और महिलाओं के बीच अपने अपियरेन्स, इंटरैक्शन का तरीका खुद चुनना था जिसमें उसने दक्षिण भारतीय उच्चारण तोड़ा तोड़ा इन्दी आता के साथ मासूम अदा से कमाल का असर पैदा किया था. कंपनी के सभी ब्रांड मैनेजर्स उस मिल रहे रिस्पांस से चहक रहे थे, दूसरी बड़ी कंपनियों के एजेंट उसे घेर रहे थे, उसे दिखाई देने लगा था कि वह विज्ञापन की दुनिया का एक बड़ा ब्रांड यानि कारपोरेट के लिए सोने का अंडा देने वाली मुर्गी बनने वाली है. उसने अपने प्राइमरी स्कूल के अध्यापक पिता को फोन पर कह दिया था कि वे अब जब चाहे अपनी मनपसंद कार खरीद सकते हैं और मैसूर में अपना फ्लैट बुक करा सकते हैं क्योंकि वह अब ईएमआई यानि लोन की किस्तें चुकता कर सकने की स्थिति में आ गई है.

शहर के सबसे बड़े माल फन रिपब्लिक के बीच के वातानुकूलित स्पेस में उत्तेजना के अतिरेक से भटकती आवाजें, तीखी सीटियां और मुक्त सिसकारियां थीं, उन खुशकिस्मत युवाओं की खचाखच भीड़ थी जो मेघना राव को देखने के लिए अंदर घुसने और इसी कारण फ्री स्नैक्स, कोक और कंपनी की गोरा बनाने वाली क्रीम का सबसे छोटा पाउच पाने में भी कामयाब हो गए थे. बाहर कई एलसीडी स्क्रीनों के आगे मिस नार्थ आफ फन रिपब्लिक का फाइनल राउंड जिसकी चीफ जूरी मेघना राव थी, देखने के लिए जुटी भीड़ के कारण पुलिस वालों की कोशिशों के बावजूद ट्रैफिक किसी तरह रेंग रहा था. बिल्डिंग के खंभे और बाहरी दीवारें तक गुब्बारों, चमकीले सितारों, मेघना राव के साथ स्विम सूट में खड़ी स्टैंडर्ड फिगर वाली लड़कियों के कटआउटों से सजाए गए थे, अंदर म्यूजिक और शोर इतना धमाकेदार था कि बहुमंजिला बिल्डिंग माचिस की डिबिया की तरह हिलती लग रही थी. अंदर स्टेज पर मायावी लोक रचती लेजर बीमों की बौछार में स्थानीय सुंदरियां कैटवॉक कर रही थीं जिनसे अधिक उनके मां बाप को परिणाम का इंतजार था जो अगली कतारों में बैठे हुए थे, अपनी खालिस देसी भावनाओं को अंग्रेजी फैशन में जताने के चक्कर में उनके चेहरे और देहभाषा दोनों उनका साथ छोड़ देते थे जिस कारण वे तुरंत पहचान में आकर जबान को द्विअर्थी तलवार की तरह इस्तेमाल करने में माहिर अनाउंसर के तंज के शिकार हो जाते थे. अनंत उस वक्त अपनी मां के साथ एक रिक्शे से मॉल के सामने से गुजरा था, वह मां को घुटनों के चेकअप के लिए डाक्टर के पास ले जा रहा था, उसे याद है रिक्शा चलाने वाले स्मार्ट लड़के ने अपनी बातों से उसे और मां को वहां पहुंचा दिया था जहां वे दोनों साथ जाने से हमेशा बचते रहे हैं, जाम में वह एक एलसीडी स्क्रीन के आगे थम गया था, उसने कैटवॉक करती लोकल लड़कियों को देखते हुए कहा, भाईजान, सड़क पर इनको इससे ज्यादा कपड़े में देखो और तारीफ करो तो बुरा मानती हैं, इस समय थोड़ा सा छोड़ कर बाकी पूरी नंगी हैं, लौंडे सीटी बजा रहे हैं और इसे टीवी पर जनता को दिखाया जा रहा है, कितनी अजीब बात है?

अनंत ने समझाने की कोशिश की, ये शरीर की नाप जोख का कंपटीशन है, यह देखा जाता है किसका फिगर कितना अच्छा है.

भाईजान अगर शरीर का मुआमला है तो हेल्दी बेबी कंपटीशन भी हमने देखा है लेकिन उसमें तो बच्चों को नंगा करके तो नहीं चलाया जाता.

इसमें शरीर के साथ जवानी भी दिखायी जाती है, उसके मुंह से निकल गया.

गलत है, सरे नौ से गलत भाईजान, इतनी दूर से ककड़ी की बतिया जैसी लड़कियों के रोएं दिखाई दे रहे हैं, वे ठीक से जवान नहीं हो पाई हैं, जरूर उनके वालिदैन ने उमर का गलत सर्टिफिकेट दिया होगा.

अनंत और उसकी मां दोनों ने रहस्यमय ढंग से मुस्करा एक दूसरे को देखा फिर ठठा कर हंस पड़े. उसने मुंह दूसरी तरफ घुमा लिया, मां ने झिड़का, सीधे डाक्टर के पास चलो, तुम तो रास्ते में ही डाक्टरी करने लगे.

हम तो चल ही रहे हैं लेकिन यह बीमारी हर बीमारी से बड़ी है और इसका इलाज किसी के पास नहीं.

कंधों से नीचे एक तरफ बिल्कुल नीचे तक खुले खूनी रंग का गाउन पहने स्टेज पर आई मेघना राव ने जब मिस नार्थ आफ फन रिपब्लिक के नाम की घोषणा करते हुए तीन लड़कियों को कागज के ताज पहनाए और उन्हें एक टीवी सीरियल में काम करने का आफिशियल ऑफर दिया तो तालियों और सीटियों के शोर से बिल्डिंग के सबसे उपेक्षित कोनों में सोए कबूतरों के बच्चे भी अंडे तोड़कर उड़ गए. मेघना राव ने ढाई घंटे के अंदर छिहत्तर लड़कियों को आटोग्राफ दिए और सताइस बार माइक से कहा, यह शहर उसके दिल में बसता है, यहां के युवा रोमांटिक और दिलेर हैं, उन्हें जिंदगी जीना आता है. माल के ऊपर बने एक पेंटहाउस में हुई प्रेस कांफ्रेंस में किससे चक्कर है, किससे केमिस्ट्री है, शादी कब करेंगी, आने वाले सीरियल और फिल्में कौन सी हैं जैसे सूखे सवालों के बेहद रसीले जवाब देने के बाद वह एक फाइव स्टार होटल में अपने कमरे में गई और आधे घंटे बाद वहां से सीधे स्टेशन की ओर रवाना हो गई क्योंकि कांट्रैक्ट के मुताबिक उसे उस दिन कम से कम एक रूरल मार्केट को विजिट कर लोगों को कंपनी के उत्पादों से परिचित कराना था. स्टेशन से सटे बाजार की रेकी करके लौटे कैम्पेन टीम के लड़कों ने उसे पहले ही बता दिया था कि वहां अपकंट्री एरिया की बारबर एसोसिएशन की ऑनरेरी सेक्रेट्री इदरीस का हेयर कटिंग सैलून ही एकमात्र ऐसी जगह है जहां वह बहुत थोड़ी देर के लिए रूक सकती है.

मेघना राव कैम्पेन की पूर्वनिर्धारित रणनीति के तहत एक काले रंग की लक्जरी कार से गॉगल लगाए, एक बड़ा सा हैंड बैग लिए अकेली उतरी, उसने जरा निराशा हुई कि पूरे तीस सेकेंड खड़े रहने के बाद भी उसे किसी ने नहीं पहचाना जबकि सामने की गुमटी पर उसकी फोटो के साथ मिस नार्थ आफ फन रिपब्लिक का पोस्टर चिपका हुआ था. अपना गाउन संभाल कर रास्ते में पहियों से बने गड्ढों में भरे कीचड़ से बचते हुए, कसाई की दुकान के बाहर गुटखे के पाउचों, बकरे के कान और पूंछ और कचरे पर चलते हुए इदरीस हेयर कटिंग सैलून की दो खाली कुर्सियों में से एक पर बैठ गई, फोकट बाल खींचते लौंडे हड़बड़ाकर बाहर निकले तो इदरीस का ध्यान गया जो जरा दूर पान की दुकान पर गप्पें मार रहा था, उसने चूना चाटते हुए हैरानी से कहा, ये कौन आ गई जन्नत की चिड़िया लेकिन अपनी जगह से नहीं हिला, वह पहले पक्का कर लेना चाहता था कि वो कौन है और क्यों आई है. कुर्सी पर बैठी औरत ने जब सामने रखे डिब्बों, शीशियों को जांच परख कर कैंची से हवा को काटते हुए आगे पीछे शीशों में उसे तलाशना शुरू किया तब उसने सैलून में घुसते हुए कहा, मैडम ये लेडीज नहीं जेंटुलमैन सैलून है.

मेघना राव ने चश्मे के उस पार से उसे भरपूर देखा, वह सहम गया, उसने मुस्कराते हुए कहा, आप इसे अच्चा से रन करेगी तो एक दिन लेडिस भी आएगी और आप बहुत बरा आदमी बन जाएगी.

इतनी देर में कुछ लड़कों ने उसे पहचान लिया था, खबर फैलने लगी थी, सैलून के आगे भीड़ जमा हो रही थी, रेलवे लाइनों के उस पार धान के खेतों में मेड़ों पर भागते हुए करीब के गांवों से लोग चले आ रहे थे. मेघना राव ने अपने बालों में पीछे छिपी एक क्लिप को निकाल कर सामने पटरे पर रखा, बैग से मिनरल वाटर की बोतल निकाल कर एक घूंट पिया, गॉगल उतारा और अपनी लंबी सुराहीदार गरदन को बहुत धीरे धीरे दाएं बाएं झटके देने लगी जिससे उसके लंबे बालों के छल्ले खुलकर कंधों से नीचे फैलने लगे. उसने इदरीस से कहा कि वह उसके सिर में पिचकारी मार दे ताकि वह अपने बाल संवार सके. इदरीस ने लंबी झिझक के बाद जबरदस्ती मुस्कराते हुए बोतल उठाकर पिस्टन को पंप किया लेकिन वॉशर कटा होने के कारण पानी नहीं निकला, झेंप कर उसने बोतल को एक पैर के घुटने पर रख कर पसली के साथ दबाया और मेघना राव की बड़ी काली आंखों में देखते हुए ताबड़तोड़ पंप करता हुआ संतुलन बनाए रखने के लिए दाएं बाएं लचकने लगा, उफ, यह एक सौंदर्य विह्वल पुरूष का नृत्य था, दोनों तरफ की शीशों में इसी तरह इतने पुरूष नाच रहे थे जिन्हें गिना नहीं जा सकता था, उन सबको वह मुस्कराते हुए देखती रही, अचानक पिचकारी का पिस्टन तिरछा होकर पटाक से टूट गया, इदरीस जमीन पर गिर पड़ा, बोतल टूटने से पानी और पानी के ही रंग के कांच के टुकड़े पूरी दुकान में छितर गए. उसके खुले मुंह को देखते हुए वह हाथ से मुंह छिपाते हुए खिलखिलाकर हंसी, हम तो मजाक किया था, अगर पानी निकल जाती तो तुम इस जगह को स्वीमिंग पूल बना देती और मुझको तैर के निकलने पड़ते. अब तक सैलून के बाहर शहर से कई गाड़ियों में पहुंचे एक बैंड ने धमाकेदार म्यूजिक शुरू कर दिया था, एक न्यूज चैनल की ओवी वैन आ पहुंची थी, फोटोग्राफरों के कैमरों के फ्लैश चमकने लगे थे, लाउडस्पीकर से बताया जा रहा था कि बारबर एसोसिएशन के ऑनरेरी सेक्रेट्री इदरीस की दुकान पर साल भर तक कंपनी के सभी सौंदर्य प्रसाधन डिस्प्ले किए जाएंगे, अगर वह लेडीज पार्लर खोलना चाहे तो उसकी आर्थिक मदद भी की जाएगी.

जैसा प्लान किया गया था वैसे कार्निवाल का समां बन चुका था, अब समय आ गया था जब मेघना राव को गंवई, उजड्ड, बर्बर पुरूषों की भीड़ बीच पहली बार एक सुंदरी के श्रृंगार का अभिनय करना था जिसे वह भरपूर मजा लेते हुए उन सबके लिए यादगार अनुभव बना देना चाहती थी. उसने अपने बैग से अलग अलग आकार के कई ब्रश, डिब्बे, लिपिस्टिक क्लिपें, शीशियां निकाल कर पटरे पर सजा दिए और दुकान के मुहाने से आते बीसियों कैमरों की फ्लैश में अपनी इंद्रियों की पहुंच के पार जा पहुंचे इदरीस को हर प्रोडक्ट के बारे में जानकारी देते हुए तन्मयता से श्रृंगार करने लगी. जिस भी कोण से उसे देख पाना संभव था हर उस खाली जगह, आसपास की दुकानों में घुसे और पेड़ों की डालियों पर बैठे लड़के सुधबुध खोकर मछली की तरह खुलते बंद उसके होठों का खुलना और बंद होना देख रहे थे, इस तमाशे से बौखलाए से कुत्ते लगातार भौंक रहे थे. जिस समय वह काजल लगा रही थी सामने कसाई की दुकान पर मंडराता कौआ सैलून के दरवाजे के ऊपर की खाली में गोता मारते हुए घुसा, शीशे में अभिनेत्री के प्रतिबिंब पर चोंच मार कर उसी रास्ते दक्खिन दिशा की ओर उड़ गया, वह कौए के भारी काले पंखों की कान के पास फड़फड़ाहट से डर कर चीख उठी. इदरीस उसे बताना चाहता था कि यह कौआ समझता है कि शीशे के भीतर कोई अजनबी कौआ है जिससे झगड़ा करने के लिए रोज इसी समय चला आता है, तभी फोटोग्राफरों की भीड़ को झटके से चीरते हुए मटमैली आसमानी कमीज और नीला पैंट पहने एक पतला सा गोरा लड़का सैलून के भीतर घुसा, उसने नाभि के नीचे खोंसा मोटी नाल वाला भारी तमंचा निकाला और ठीक सामने आकर अभिनेत्री के सीने पर फायर कर दिया. गोली चलने की आवाज के बाद पता नहीं उसने हाथ जोड़े या बचने के लिए तमंचे को पकड़ने के लिए दोनों हाथ बढ़ाए लेकिन वह कुर्सी समेत कंपकपाती हुई नीचे गिरी और मर गई. दांतों के नीचे अपना निचला जबड़ा भींचे लड़के ने पलटते हुए सबसे आगे खड़े एक बूढ़े फोटोग्राफर के मुंह पर तमंचे की मुठिया मारी, इससे पहले कि उसकी झुर्रीदार खाल से खून रिसना शुरू होता वह भीड़ के बीच अपने आप बनते जाते रास्ते पर चलता हुआ लापता हो गया.

अगले दिन जब शहर के एयरपोर्ट से मेघना राव की लाश लेकर एक जहाज हैदराबाद की ओर रवाना हुआ उसी समय के आसपास स्टेशन के उसी बाजार से हत्यारे को गिरफ्तार कर लिया गया, वह एक खाद की दुकान के पिछवाड़े के अहाते में, सफेद खादी की नई पैंट कमीज पहने, परीक्षा के रिपोर्ट कार्ड की तरह अखबारों का एक बंडल हाथों में सहेजे दो वकीलों से हाईकोर्ट में आत्मसमर्पण के लिए बात कर रहा था. देर तक चैनलों पर चमकने के बाद सुबह अधिकांश अखबारों के पहले पन्नों पर एक फोटो छपी थी जिसमें वह सैलून में ऊपर को हाथ उठाए जमीन गिरती मशहूर मॉडल, अभिनेत्री मेघना राव के विपरीत कोण पर स्कूली ड्रेस तमंचे को फोटोग्राफर के मुंह पर मारने के लिए तानता हुआ दिखाई दे रहा था, इस फोटो को देखते हुए न जाने क्यों यह ख्याल चला ही आता था कि एक मिट्टी से दो पौधे फूट रहे हैं. देहात के एक कालेज में ग्यारहवीं के छात्र, एनीमिया के पीलेपन के कारण गोरे होने का भ्रम देते साढ़े पांच फुट के हत्यारे का नाम अमेरिका यादव था, हत्या की सनसनी के साथ बीती रात के सन्नाटे में धीरे धीरे उसके रूतबे का जन्म हुआ था जो सुबह तक बाढ़ के पानी की तरह शहर और गांव में समान दूरी तक फैल गया था. खाद के बाहर उसका हाल जानने या मददगारों की लिस्ट में नाम दर्ज करवाने के लिए लोकल एमएलए के साथ कई ग्राम प्रधान, जिला पंचायत, बीडीसी मेम्बर, अध्यापक और ठेकेदार उसके बाहर निकलने का इंतजार कर रहे थे.

दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश के नाम वाले इस लड़के का सपना अप्रत्याशित आसानी से साकार हो चुका था लेकिन यह इतना आसान भी नहीं था क्योंकि उसका सपना ज्यादातर सपनों की परंपरा में गैरकानूनी था. गरीबी रेखा से नीचे पिछड़ी जाति का छात्र होने के नाते नवीं क्लास में मिली सरकारी छात्रवृत्ति के पैसों को जोड़कर उसने एक कंडम जीप की स्टियरिंग काटकर बनाया गया यह भरोसेमंद तमंचा खरीदा था, उसे मालूम था कि स्कूल की पढ़ाई किसी काम नहीं आती लेकिन यह देसी मशीन जिंदगी भर उसके काम आएगी, वह इसे स्टेशन की तरफ आने वाले शहरी छोकरों को किराए पर उठाने लगा जो किसी को धमकाने, पुलिस वालों के सामने कमर में खुंसा होने पर जो थ्रिल और भय सताता है उसे बार बार महसूस करने के लिए ले जाते थे, इस अनुभूति का वर्णन खालिस कविता हुआ करता है. एक बकबकिया लड़के की चुगली पर वह आर्म्स एक्ट में पंद्रह दिन के अंदर हुआ था लेकिन यह वरदान था, जल्दी ही उसके गिर्द देहात में बेरोजगार हुए पुश्तैनी लुहारों और नौसिखुआ अपराधियों का मोबाइल फोन से चलने वाला एक नेटवर्क तैयार हो चुका था जो असलहों और तेज रफ्तार गाड़ियों के बारे में अपनी प्रेमिकाओं की तरह बात करते थे. उसे इंटर के फाइनल इम्तहान में यदि मैं प्रधानमंत्री होता के बजाय यदि मैं माफिया होता विषय पर शुद्ध हिंदी में निबंध लिखने का मौका मिलता तो वह जिले में सबसे अधिक नंबर ला सकता था, प्रधानमंत्री उसे कल्पना से बाहर की चीज था जबकि सैकड़ो लड़के माफिया का ग्लैमर और रूतबा जीने की जी तोड़ कोशिश में लगे थे जिनमें से वह एक था.

अमेरिका तमंचे का इस्तेमाल लगभग जीवनयापन के लिए करना शुरू कर चुका था, उसे बस का किराया, इदरीस के सैलून पर बाल कटाने और कुछ दुकानों पर खाने पीने के लिए पैसे देने की जरूरत नहीं रह गई थी, उधार समझो या भूल जाओ का मीठा इशारा जानबूझ कर न समझने पर वह चुपचाप खड़े होकर तमंचे की नाल को सामने वाले की जांघ से सटा देता था, कागज की मुद्रा तो बहुत बाद में आई, भूमिगत व्यापार की स्पर्शमुद्रा का प्रचलन आदिम था जिसे आमतौर पर तुरंत स्वीकार कर लिया जाता था, मुद्रा नहीं स्वीकार होने पर हाथापाई होती थी जिसमें अक्सर वह पिट जाता था लेकिन गिरोहबंदी के बाद कोई न कोई कामचलाऊ समझौता हो ही जाता था, स्कूली लड़कों के गिरोहों से बीसियों बार पिटने के बावजूद उसके तमंचे ने अब तक सूरज की रोशनी नहीं देखी थी क्योंकि उसने उसके इस्तेमाल के एक लिए खास दिन निर्धारित कर रखा था और गांव के डीह को बकरे की मनौती मान रखी थी.

हाईस्कूल का इम्तहान देने के बाद उसने लोकल एमएलए के पैरों पर आतुर श्रद्धा से सिर रखकर प्रार्थना की थी कि वे उसे अपने काफिले की आखिरी खटारा जीप पर लटक कर साथ चलने की इजाजत दें, वह उनकी हिफाजत में अपनी जान लगा देगा, विधायक ने उसे स्नेह से पुचकारते हुए सांत्वना दी, तुम्हारा भी समय आएगा बेटा, अभी जाओ पढ़ो लिखो, कुदरत का कानून है, समय से पहले और किस्मत से ज्यादा किसी को कुछ नहीं मिलता. कमसिन होने के कारण अंगरक्षक के रूप में नकार दिए जाने से वह निराश नहीं हुआ, वह विधायक के नौकर की तरह राजधानी चला गया, रात में सबको खिला पिला कर विधायक निवास की दरी पर सोते हुए वह अक्सर किसी अंगरक्षक का हाथ अपने सीने या जांघ पर पाता तो उसका मन वहां से भागने का करने लगता, वे दिन में उसके हाथों के नाखूनों को हसरत से देखते, उंगलियों के पोरों को दबाते, भद्दे मजाक करते हुए बांह के कोमल रोयों पर उंगलियां फिराते, रात में नींद में सीने से लगाकर भींचने लगते, अपने मुंह पर घायल भैंसे जैसी उनकी सांसे झेलते हुए उबकाई आती और लगता कि वह माफिया बनने आया था लेकिन मेहरा बनने की ट्रेनिंग पा रहा है. अपराधबोध से बौखला कर वह राजधानी के चैनलों, अखबारों के चक्कर लगाते हुए पत्रकारों से विनती करने लगा कि वे जिसे कहें वह दिन, समय बताकर टपका सकता है, वे बस एक बार उसे हाईलाइट कर दें, जिंदगी बन जाएगी. पत्रकार उससे चम्पी करवाते, पैर दबवाते, चाय सिगरेट मंगवाते, कभी कभार पुलिस अफसरों के सामने समाज में अपराध के अतिरेक से विक्षिप्त हुए नमूना लौंडे के रूप में पेश करके उपहास उड़ाते, सिर्फ एक रिपोर्टर ऐसा था जिसने उसका मजाक नहीं उड़ाया बल्कि उसकी फोटो के साथ अखबार में स्टोरी छापी जिसकी हेडलाइन थी, माफिया बनना चाहता है अमेरिका. वह इसी अखबार के एक टुकड़े को अपनी कमाई की तरह साथ लिए गांव वापस लौट आया था.

उसने स्कूल से लौटते हुए जब मुंबई की हिरोइन को इदरीस के सैलून में बैठे देखा तो उसे पूर्वाभास हो गया था कि उसके जीवन का वह स्वर्णिम क्षण आ पहुंचा है जब वह फिल्म उद्योग, मल्टीप्लेक्स, बड़े व्यापारियों, नेताओं, पुलिस अफसरों और तमाम मालदार लोगों तक मैसेज भेज सकता है कि एक नये माफिया का जन्म हो चुका है, मीडिया एक खूबसूरत मॉडल की अधनंगी लाश पर रखकर यह संदेसा उन लोगों तक ले जाएगा जो अपनी गढ़ी कहानियों के जरिए इसे आतंक में बदल देंगे, आतंक से पैसा और पैसे से सारे रास्ते अपने आप खुल जाएंगे.

जब पुलिस वाले उसे गिरफ्तार करके स्टेशन के बाजार से ले जा रहे थे, उसने परिचित चेहरों पर बौखलाई जिज्ञासा को शांत करने के लिए अखबारों का बंडल सिर के ऊपर लहराते हुए अजीब आवाज में चिल्लाकर दो बातें कहीं, बेचारी को मरना ही था क्योंकि मैं माफिया बनना चाहता हूं. जो भी बहुत सुंदर होता है बहुत गड़बड़ होता है, स्विटजरलैंड बहुत सुंदर देश है लेकिन सारी दुनिया का काला पैसा वहीं पर है.

डा. परमानंद परमार सुबह से ही गहरी आंखों से सबकुछ देख रहे थे, यह उन्हें अपनी जमी हुई प्रैक्टिस को और मजबूती से जमाने का मौका लगा जिसे वे चूकना नहीं चाहते थे, जब वह पीछे छोटी सी भीड़ और पुलिस के दो सिपाहियों के साथ डिस्पेंसरी के सामने से गुजरा वह बाहर निकल कर बीच रास्ते में खड़े हो गए, उसकी पीठ पर हाथ रखकर साथ चलते हुए उन्होंने जोर से कहा, तुम्हें बचपन से ही एकोनाइट की डोज देना चाहता था, मेरी बात मान कर खा लिए होते तो आज यह दिन नहीं देखना पड़ता न.

अब खुद ही खा लो डॉक्टर, सिमिलिया सिमिलस करेंटर के फार्मूले से जेल पहुंच जाओगे, वहां दोनों साथ रहेंगे, अमेरिका ने आदर से उनकी तरफ झुक कर हंसते हुए कहा.

ब्रेख्त और लुकाच की ऐतिहासिक बहस: शाश्वती मजूमदार (अनुवाद- वैभव सिंह)

By  शाश्वती मजूमदार

जर्मन लेखक बर्तोल्त ब्रेख्त और हंगरी के दार्शनिक जार्ज लुकाच के बीच बहस कभी औपचारिक बहस के रूप में नहीं संपन्न हुई बल्कि वह दोनों पक्षों में इस मुद्दे पर जारी व्यापक चिंतन की विभिन्न कड़ियों के रूप में सामने आई कि समाजवाद की स्थापना के लिए प्रतिबद्ध क्रांतिकारी कला व साहित्य के मूल सृजनकारी तत्त्व कौन से होने चाहिए। इसे प्रायः अभिव्यंजनावादी (Expressionism) बहस या यथार्थवाद बनाम आधुनिकतावाद की बहस के रूप में भी देखा जाता है जिसमें लुकाच को कलात्मक सृजन के यथार्थवादी रूपों के पक्ष में खड़ा दिखाया जाता है। दूसरी ओर ब्रेख्त को अभिव्यंजनावादी व दूसरे आधुनिक कलाकारों द्वारा विकसित कला के प्रयोगशील रूपों का समर्थक बताया गया जो क्रांतिकारी कला की वर्तमान आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकते हैं। वास्तव में यह बहस मुख्यतः यथार्थवाद के बारे में बहस के रूप में देखी जानी चाहिए। ब्रेख्त व लुकाच, दोनों ने ही बड़े बलपूर्वक कहा कि पूरी बहस के केंद्र में यथार्थवाद ही प्रधान मुद्दा है।index

यह पूरी बहस 1930 के दशक में यूरोप में फासीवाद व जर्मनी में इसके ज्यादा बर्बर नाजीवादी विचारधारा के उदय की पृष्ठभूमि में संपन्न हुई। नाजीवाद-फासीवाद के श्रमिक वर्ग पर हमले तेज हो रहे थे और सोवियत संघ को नष्ट करने के लिए सैन्य अभियान जारी थे।  बहस मार्क्सवादी खेमे में जारी बहसों का ही हिस्सा थी जिसमें अर्नेस्ट ब्लाख, वाल्टर बेंजामिन, हैन्स आइजलर, थियोडोर अडोर्नो व मैक होर्कहेमर समेत कई लोग शामिल थे। बहस में विभिन्न तरह के संकटों के दौर में कला की सामाजिक भूमिका की अवधारणा निर्मित करने संबंधी विविध प्रकार के प्रयास व्यक्त हो रहे थे। ऐसे में इस बहस का पुनरावलोकन बीसवीं सदी के कला व दर्शन के दो महान व्यक्तियों के विचारों के पुनर्पाठ जैसा ही है।

यह बहस इस वजह से भी शुरू हुई क्योंकि ब्रेख्त मूलतः कलाकार थे जो कला व सृजन के व्यवहारिक पक्षों से जुड़े हुए थे, जबकि लुकाच मुख्य रूप से दार्शनिक थे जो पूंजीवादी समाज में सामाजिक अस्तित्व की प्रकृति के प्रश्नों से जूझ रहे थे। बहस का एक कारण यह भी था कि दोनों ही ऐसे समय में राजनीतिक संघर्ष व संघर्ष में कला की भूमिका के बारे में अलग दृष्टियां रखते थे जबकि विचारधारा के सवाल सीधे-सीधे जीवन तथा मौत से जुड़े हुए थे। बहस के दौरान आक्रामक विरोध व कभी-कभी पैदा हुई तीखी कटुताएं दोनों व्यक्तियों के निर्वासन में रहने तथा फासीवाद के खिलाफ निरंतर राजनीतिक, वैचारिक व सैन्य संघर्ष चलाने की सतत मांग के संदर्भ में समझी जा सकती हैं। संघर्ष में सौंदर्य के प्रश्न को दोनों पक्षों द्वारा काफी महत्त्वपूर्ण माना गया। उल्लेखनीय है कि बाद के शांतिकाल में, दूसरे महायुद्ध की समाप्ति व शांति की स्थापना के उपरांत, कलाकार व दर्शनशास्त्री के बीच संबंध काफी सामान्य हो गए और दोनों ने एक दूसरे के अवदानों को स्वीकार भी किया। तो भी दोनों के बीच के बुनियादी मतभेद इस बहस को रेखांकित करते हैं। तबसे लेकर आज तक कई परिवर्तन आ चुके हैं। पर वह बहस अभी भी केवल ऐतिहासिक महत्त्व तक सीमित नहीं है। दोनों पक्षों ने कई अहम सवाल खड़े किए जो पूंजीवाद की समाप्ति व समाजवादी भविष्य की स्थापना के लिए चलाए जा रहे राजनीतिक संघर्ष के अनुकूल प्रगतिशील कला व सांस्कृतिक कर्म से सरोकार रखने वालों से लिए काफी चुनौतीपूर्ण बने हुए हैं।

ब्रेख्त और लुकाच के बीच वैचारिक टकराव, जो कि लेखन के अभिव्यंजनावाद व आधुनिकतावादी रूपों पर केंद्रित था, दास वोर्ट (द वर्ड, मास्को से 1936-39 के दौरान मास्को से प्रकाशित पत्र) नामक पत्र में सामने आया। इस बहस में लुकाच समेत 15 लेखकों, कलाकारों व साहित्यिक सिद्धांतकारों, ने गर्मजोशी से हिस्सा लिया। उस समय ब्रेख्त हालांकि पत्र की तीन सदस्यीय संपादकीय टीम का हिस्सा थे और उन्होंने पूरी बहस पर गंभीरता से निगाह रखी, पर उन्होंने सार्वजनिक रूप से बड़े स्तर पर हस्तक्षेप नहीं किया क्योंकि उनके मस्तिष्क में फासीवाद के विरुद्ध साझे संघर्ष के व्यापक हितों की चिंता मौजूद थी। पर बहस के बारे में अपने विचारों को वे निरंतर विस्तार से लिखते रहे और वे 13 साल बाद साहित्य व कला के बारे में दो खंडों में प्रकाशित उनके ग्रंथों में संकलित हुए। बहस की राजनीतिक पृष्ठभूमि कोमिन्टर्न द्वारा 1935 में स्वीकृत लोकप्रिय मोर्चे (पापुलर फ्रंट) की नीतियों तथा बुर्जुआ राजनीति के फासीवाद विरोधी धड़े भी शामिल करने वाले फासीवाद विरोधी विशाल मोर्चे के निर्माण से भी संबंधित थी। लुकाच ने बहस में एक निबंध लिखकर हस्तक्षेप किया जिसका शीर्षक था- Es geht um den Realismus (जिसका अंग्रेजी में अनुवाद रियलिज्म इन द बैलेंस, या दांव पर यथार्थवाद के नाम से किया गया)। इस निबंध में उन्होंने समकालीन लेखन की तीन धाराओं को परिभाषित किया। पहली, पूंजीवादी समाज की पक्षधर यथार्थवाद विरोधी या छद्म यथार्थवादी धारा। दूसरी, यथार्थवाद से दूर होती अवांगार्द की साहित्य-धारा। तीसरी, यथार्थवादी लेखन की धारा जिसके रचनाकारों में उन्होंने गोर्की, थामस और हेनरिख मान और रोमां रोलां का नाम लिया। लुकाच के मतानुसार दूसरी धारा के लेखक अपने समस्त साहित्यिक प्रयोगों के बावजूद यथार्थ के ऊपरी रूप व अनुभवों के स्वतःस्फूर्तपन तक ही सीमित रह गए। वे यथार्थ के भीतरी सार को न छू सके और अपने अनुभवों व उन्हें उत्पन्न करने वाली वास्तविक सामाजिक शक्तियों को पहचान न सके। उन्होंने अनुभव किया कि ऐसे लेखक आत्मनिष्ठ व अमूर्तन में जीने वाले होते हैं, वे जिस प्रकार यथार्थ के विखंडन व विरोधी तत्वों के समन्वय से कला रूप तैयार करते हैं वह काफी एकायामी होता है और संसार की सत्यता व चीजों की संबद्धता, यानी पूंजीवादी समाज की समग्रता का बोध पैदा करने में असफल रहे। अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए उन्होंने अभिव्यंजनावादियों और दूसरे आधुनिकतावादी लेखकों की तुलना फूहड़ अर्थशास्त्रवादियों से की जो पूंजी के संचरण को स्वतंत्र तथा अमूर्त प्रक्रिया के रूप में देखते थे और महाजनी पूंजीवाद से इसके कार्यकारण संबंधों का विश्लेषण नहीं करते थे। इसलिए यथार्थ के संबंध में व्यक्तिनिष्ठ, सतही व अमूर्त धारणा के विपरीत, जो कि लुकाच के अनुसार काफी एकरस भी थी, लुकाच के अनुसार तीसरी धारा के यथार्थवादी लेखकों ने सामाजिक संबंधों को उसकी पूरा जीवंत समृद्धि व समग्रता में ज्यादा वस्तुगत रूप से प्रस्तुत किया। उनकी विविधता को भी चित्रित किया। इसके अतिरिक्त उन्होंने भविष्य में सामने आने वाली मानवीय व सामाजिक प्रवृत्तियों को दर्शाने वाले प्रातिनिधिक चरित्रों के सृजन के माध्यम से भी यथार्थ का ज्यादा विश्वसनीय रूप व्यक्त किया। लुकाच के अनुसार ये यथार्थवादी लेखक 19वीं सदी के बाल्जाक व ताल्सताय जैसे यथार्थवादियों की ही परंपरा के लेखक हैं और केवल उन्हें ही साहित्यिक अवांगार्द के रूप में देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार आधुनिकतावादी लेखकों द्वारा अपनाई गई प्रयोगात्मकता यथार्थवाद के पतन तथा बुर्जुआ कला के क्षरण को व्यक्त करती है।

लुकाच ने इस पर भी बल दिया कि आधुनिकतावादी लेखकों के प्रयोगशील कलारूपों और गोर्की या थामस मान द्वारा अपनाए परंपरागत रूपों का मूल्यांकन कैसे किया जाए, यह केवल साहित्यिक सवाल नहीं है बल्कि फासीवाद के खिलाफ एक व्यापक जनमोर्चा कैसे बनाया जाए, इससे भी गहराई से जुड़ा हुआ है। उन्होंने महसूस किया कि आधुनिकतावादियों द्वारा साहित्य-परंपरा तथा सांस्कृतिक विरासत का अस्वीकार लोकप्रिय समर्थन नहीं हासिल कर सकेगा। बल्कि सांस्कृतिक विरासत के सभी मूल्यवान पक्षों को आलोचनात्मक रूप में ही सही पर अपनाने व आत्मसात करने की जरूरत है जिससे आम जनों से संबंध और अधिक सुदृढ़ हो सकें। निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि अपने निबंध के केंद्रीय तर्क रूप में उन्होंने जीवन व समाज को पूरी समग्रता से चित्रित करने के महत्त्व को स्थापित किया।

फासीवाद विरोध संघर्ष में एक आम मोर्चा बनाने की राजनीतिक आवश्यकता को लेकर ब्रेख्त तथा लुकाच के बीच कोई मतभेद न था और न यथार्थवाद पर बल देने को लेकर। लेकिन ब्रेख्त यथार्थवाद की परिभाषा तथा 19वीं सदी के यथार्थवादी लेखकों द्वारा प्रयोग किए गए रूपों की प्रासंगिकता को लेकर लुकाच से असहमत थे। ब्रेख्त के अनुसार वे लेखक निस्संदेह महान थे पर उनकी दूसरी ही समस्याएं थीं। वे ऐसे समय में लिख रहे थे जब बुर्जुआ वर्ग तथा बुर्जुआ वैयक्तिकता का विकास हो रहा था। जबकि समकालीन लेखक इस दौर में बुर्जुआ व सर्वहारा के मध्य जारी अंतिम संघर्ष के बीच स्वयं को पाते हैं। बुर्जुआ व्यक्ति का विघटन हो रहा है, आम जनता आगे बढ़ रही है और प्रश्न यह है कि किस प्रकार इस नए यथार्थ को व्यक्त किया जाए। ब्रेख्त के मुताबिक वर्तमान नए यथार्थ की अभिव्यक्ति कैसे की जाए, इस समस्या से जूझ रहे समकालीन लेखकों के बारे में लुकाच ने ज्यादा चिंता नहीं की। ब्रेख्त ने कहा कि इस यथार्थ को केवल नैरेटिव के खास रूप के अनुकरण से नहीं व्यक्त किया जा सकता क्योंकि वे पहले काफी अधिक प्रयोग किए जा चुके हैं। ऐसा कोई भी रवैया अपनी प्रकृति में रूपवादी होगा। वह इसलिए क्योंकि यह नए परिवर्तनशील यथार्थ पर पुराने साहित्यिक रूपों को थोपने जैसा होगा। उनका मत था कि लेखकों को हर माध्यम, चाहे वह नया हो या पुराना, प्रयोग हुआ हो या नहीं, कला से निकला हो या किसी अन्य स्रोत से, अगर यथार्थ के संवहन में सहायता करता है तो उसका सहारा लेना चाहिए। यथार्थवाद का संबंध केवल रूप से नहीं है और जो चीजें पहले लोकप्रिय थीं वे कोई आवश्यक नहीं कि वर्तमान में भी लोकप्रिय हों क्योंकि लोगों का व्यक्तित्व व चरित्र भी बदलता रहता है। कई आधुनिकतावादी लेखकों के लेखन के व्यक्तिनिष्ठ व अमूर्तनवादी पक्ष के बारे में लुकाच के मत से ब्रेख्त सहमत थे पर उनका कहना था कि उनके द्वारा विकसित तकनीक जैसे कि चित्र-कल्पना समन्वय, अंतरालाप और अपरिचयीकरण तथा तटस्थता की तकनीक ने समकालीन यथार्थ की ठोस तथा वस्तुगत अभिव्यक्ति में ज्यादा उपयोग संसाधन उपलब्ध कराए, बनिस्पत 19वीं सदी के यथार्थवादी लेखकों की वर्णन शैली के। बुर्जुआ लेखक इन आधुनिक तकनीकों का प्रयोग अपनी निराशा की भावना की अभिव्यक्ति के लिए कर सकते हैं, समाजवादी लेखक इसका प्रयोग दूसरी तरह कर सकते हैं। ब्रेख्त ने खुद भी साहित्यिक परंपरा और सांस्कृतिक विरासत को खारिज नहीं किया बल्कि उन्होंने आरंभिक प्रबोधनकालीन लेखकों जैसे शेक्सपीयर, स्विफ्ट, रिबेलयस, वाल्तेयर और दिदेरां को काफी उत्सुकता से पढ़ा। इसके अलावा उन्होंने चीन व भारत समेत दुनिया के दूसरे हिस्सों के साथ-साथ लोकप्रिय व लोकवादी कला रूपों से भी विचार ग्रहण किए।

लुकाच की तरह ही ब्रेख्त भी पूंजीवादी समाज में सामाजिक संबंधों के वस्तुकरण (Reification) और कलाकार द्वारा ऊपरी सतह के नीचे छिपी सच्चाइयों को उजागर करने के सरोकार से जुड़े हुए थे। वह भी मानते थे कि सच्चे यथार्थवाद को वास्तविकता के भीतर तक धंसना होता है और जीवन को आकार देने वाले नियमों, सामाजिक शक्तियों के बीच के कार्य-कारण संबंधों को सामने लाना होगा। जैसे कि किसी फैक्ट्री की तस्वीर फैक्ट्री के सत्य को नहीं बता सकती। लेकिन वह यह भी नहीं मानते थे कि इस बारे में सत्य को केवल उस सत्य का साक्षात्कार करने वाले व्यक्ति की आंख या दिल को उधार लेकर व्यक्त किया जा सकता है। इसके लिए कलाकार को विशेष तरीकों से यथार्थ में हस्तक्षेप करना होगा ताकि यथार्थ के बारे में भ्रम खत्म हो और देखने वालों को यथार्थ को वह पक्ष भी दिख सके जो उस यथार्थ से सीधे जुड़े व्यक्ति को भी नहीं दिखता है। सामाजिक परिवर्तन के लिए प्रतिबद्ध कलाकार का काम केवल सौंदर्यबोधीय हस्तक्षेप के माध्यम से यथार्थ का ठंडा, तटस्थ अनुभव प्रदान करना नहीं है बल्कि अपने पाठक व दर्शक को सक्रिय हस्तक्षेप के जरिए यथार्थ को बदलने के लिए प्रोत्साहित करना है।

इन परस्पर विरोधी विचारों का नतीजा क्या निकलता है? ब्रेख्त और लुकाच, दोनों ही कला के बोधपरक कार्य और जीवन के प्रत्यक्ष रूपों के भीतर तक धंसी सच्चाइयों को पहचानने वाले सौंदर्यशास्त्र की आवश्यकता के बारे में सहमत थे। दोनों ने ही ऊपरी सतह के भीतर के सत्य को जानने तथा पूंजीवादी समाज के वर्ग चरित्र व उससे जुड़े विखंडन तथा वस्तुकरण को व्यक्त करने के लिए अमूर्तन व कला-माध्यम के महत्त्व पर बल दिया। दोनों ही कला को लोकप्रिय बनाने चाहते थे ताकि उसका जन-जन के संबंध बना रहे। दोनों यह भी मानते थे कि हिटलर के खिलाफ पापुलर फ्रंट में बुर्जुआ लेखकों और कलाकारों को शामिल करना होगा और उन्होंने इस नीति के पक्ष में काफी सक्रियता भी दिखाई। यानी पूंजीवादी समाज द्वारा किए जा रहे अमानवीयकरण के खिलाफ साहित्य-कला की सामाजिक संघर्ष संबंधी भूमिका से प्रेरित थे पर दोनों अलग-अलग दिशाओं में चल रहे थे।

एक दार्शनिक के रूप में लुकाच का मुख्य सरोकार पूंजीवाद के अंतर्गत होने वाले अलगाव, विखंडन तथा मानवीय संबंधों का वस्तुकरण (reification) था। उनके दर्शन में सौंदर्यशास्त्र का केंद्रीय वस्तु के रूप में मुख्य काम इन्हीं अनुभवों के नकारात्मक पहलुओं से उबारना था। बिखराव तथा विखंडन के मध्य ‘संपूर्णता’ (Whole) को खोजना था और इसमें प्रगतिशील अंतर्वस्तुओं को शामिल करना था। इस संपूर्णता या सामाजिक संबंधों की समग्रता को न केवल बोधगम्य बनाना होता है बल्कि उसकी कलात्मक अभिव्यक्ति भी ऐसी होनी चाहिए कि पाठक उसकी पूरी सच्ची जीवंतता का अनुभव कर सके। लुकाच ने इसे ऐसे असाधारण रूप से कठिन कार्य के रूप में देखा जिसमें लेखक का दोहरा श्रम लगता था। पहला, उसे इन संबंधों को बौद्धिक रूप से खोजना था और उसे कला में ढालना था। दूसरा, हालांकि दोनों प्रक्रियाएं परस्पर जुड़ी होती हैं, उसे अमूर्तन के माध्यम से उस खोजे गए संबंध को आवृत करना भी होता है। यह दोहरा श्रम एक नया कलारूप पैदा करता है। पहला, जिसमें सौंदर्य का गहरा प्रभाव होता है। इसमें हालांकि जीवन का बाह्य रूप काफी पारदर्शी होता है जिसके अंदर से जीवनसार झलकता रहता है (जोकि वास्तविक जीवन में नहीं होता है), तो भी यह काफी निकट का तात्कालिक अनुभव व्यक्त करता है, जीवन को वैसा ही दिखाता है जैसा वह होता है। इसके अतिरिक्त ऐसे लेखकों के लेखन में जीवन के पूरे बाह्य रूपों को उसके बुनियादी तत्त्वों के साथ ही पाते हैं, न कि अमूर्तन व अतिआवेग मय ढंग से निजी तौर पर अनुभव किए गए क्षण मात्र को जो कि समग्रता से अलग होता है। लुकाच के अनुसार हम रोजाना जीवन को टुकड़ों में जीते हैं जिसमें कला के स्थान पर नीरस सम्मोहकता ( fetischized ) रहती है। पर कला का सबसे महत्त्वपूर्ण काम होता है वह पूरी समग्रता के साथ यथार्थ का इंद्रियपरक तथा भावनात्मक अभिव्यक्ति वाला अनुभव प्रदान करती है। लुकाच के अनुसार कलाकार का काम यह है कि वह बाह्य जीवन के बहुस्तरीय मानव संबंधों को बौद्धिक रूप से खोजता है और फिर उन्हें पूरी समग्रता से व्यक्त करने के लिए उनपर कला का आवरण डालता है ताकि वह भावजगत व इंद्रियों को उत्तेजित कर सकें। लुकाच के विचारों से यह बात भी निकलती है कि सौंदर्यबोधीय अनुभव अपने में परिवर्तनकारी और मानवीयकरण करने वाली प्रक्रिया है जोकि विरेचन के माध्यम से कार्य करती है। यह प्रक्रिया किसी पाठक विशेष से जुड़ी होती है और ‘धीरे-धीरे, लंबे तथा जटिल रूप में’ घटित होती है।

ब्रेख्त, जोकि खुद भी कला सृजन के व्यावहारिक प्रश्नों से जुड़े हुए थे, उनके लिए भी यह मुख्य सवाल था कि बाह्य जीवनरूपों के भीतर छिपे सत्य को कैसे व्यक्त किया जाए। उन्होंने उन 5 समस्याओं का उल्लेख किया जिनका किसी लेखक को सामना करना होता है। उन्होंने लिखाः इन दिनों जो भी झूठ और अज्ञानता से लड़ना चाहता है और सच लिखना चाहता है, उसे कम से कम पांच मुश्किलों पर अवश्य विजय हासिल करनी चाहिए। उसमें ऐसे समय में सच लिखने का ‘साहस’(courage) होना चाहिए जब सच का हर तरफ विरोध हो रहा हो। उसमें सत्य को पहचानने की ‘उत्सुकता’ (keenness) होनी चाहिए, भले ही हर तरफ उसे ढंकने-छिपाने का प्रयास किया जा रहा हो। उसमें सत्य का हथियार की तरह प्रयोग करने का ‘गुण’ (skill) होना चाहिए। उसमें यह निर्णय (judgement) करने की क्षमता होनी चाहिए कि किसके हाथ में सत्य अधिक प्रभावशाली होगा। उसमें ऐसे योग्य लोगों के बीच सत्य का प्रचार करने की चतुराई (cunning) भी होनी चाहिए। फासीवाद के अधीन रह रहे लेखकों के लिए ये भारी मुश्किलें होती हैं, लेकिन ये उनके सामने भी होती हैं जो पलायन कर गए हैं या निर्वासन में हैं। ये मुश्किलें वहां भी हैं जहां लेखक ऐसे देश में रह रहे हैं जहां नागरिक स्वतंत्रता मिली हुई है। ब्रेख्त मानते थे कि अगर कला का उद्देश्य युयुत्स तथा प्रतिरोधी यथार्थवाद है तो वह केवल बुर्जुआ तथा सर्वहारा के मध्य के निर्णायक संघर्ष के दौरान ही अपनी सार्थक भूमिका का निर्वाह कर सकती है। यह ऐसे संघर्ष में हथियार की तरह है जो बुर्जुआ समाज के अंतिम भ्रामक रूपों को भी समाप्त कर देगा। इसके लिए केवल सत्य लिखना काफी नहीं है बल्कि एक विशेष पाठक वर्ग को ध्यान में रखकर सत्य को व्यक्त करना होगा। उनके लिए व्यक्त करना है जिन्हें इसकी सर्वाधिक आवश्कता है और पूंजीवाद की समाप्ति के संघर्ष में इसका सबसे अधिक प्रभावशाली इस्तेमाल कर सकते हैं। इसलिए ब्रेख्त के अनुसार, लोकप्रिय कला का अर्थ है उत्पादक वर्ग की कला जो शताब्दियों से राजनीति का शिकार (object) रहे हैं और अब वे राजनीति का स्वयं प्रयोग करने की स्थिति (subject) में हैं। समाजवादी कलाकारों का काम ऐसे लोगों की सहायता करना है ताकि वे ऐतिहासिक विकास प्रक्रिया में सक्रियता से हस्तक्षेप कर सकें, ‘उसे उलट सकें, उसकी गति बढ़ा सकें, उसकी दिशा निर्धारित कर सकें।’ अपने प्रतिरोधी यथार्थवाद की अवधारणा की भांति ही उन्होंने लोकप्रियता की प्रतिरोधी अवधारणा पर बल दिया। उनके समस्त कला-सृजन के पीछे का मुख्य विचार बदलते यथार्थ को दिखाना था या यह दिखाना था कि यथार्थ को बदला जा सकता है। समाजवादी कला का उद्देश्य ‘परिवर्तनशील यथार्थ में निहित आनंद को समझने की इच्छा को प्रेरित’ करना रहा है। कला-सृजन के व्यावहारिक प्रश्नों से ब्रेख्त का सरोकार दरअसल कला के व्यावहारिक प्रयोग से जुड़ा हुआ था।

ब्रेख्त और लुकाच, दोनों ही कलात्मक सृजन के सिद्धांतों के बारे में लिख रहे थे, पर इस मामले में कलाकार और दार्शनिक के बीच का अंतर उनके द्वारा साहित्यिक विधाओं के चयन से प्रकट होता था। जैसे कि लुकाच की पहली पसंद उपन्यास थे जहां वैयक्तिकता अधिक स्पष्टता से उभरती थी और सौंदर्यबोधीय अनुभव परोक्ष रूप में ग्रहण होता था। ब्रेख्त ने हालांकि उपन्यास और कविताएं भी काफी लिखी हैं, पर मुख्य रूप से उनका जुड़ाव रंगमंच से था जहां किसी पाठक विशेष के स्थान पर व्यापक जनसमूह से संपर्क कायम होता है। इसका यह मतलब नहीं कि उनके तर्क विधाओं की प्राथमिकता से तय हो रहे थे। पर इससे यह तो जाहिर होता है कि सौंदर्यशास्त्र के बारे में प्रस्तावित भिन्न धारणाएं कला की भिन्न-भिन्न जरूरतों को रेखांकित कर रही थीं और इसमें व्यक्तिगत स्तर पर एक-दूसरे को नकारने की कोई भावना नहीं थी।

Shaswati-Mazumdar

शाश्वती मजूमदार, दिल्ली विश्विद्यालय के जर्मनिक एंड रोमांस स्टडीज में जर्मन की प्रोफेसर हैं. जॉर्ज लुकाच और बर्तोल्त ब्रेख्त के लेखन और इनके विवादों से गहरे रूप से परिचित हैं. फासीवाद  से मार्क्सवादी साहित्य-आलोचना के टकराव पर भी उनकी नज़र रही है. 

वैभव सिंह हिंदी के युवा आलोचक हैं. इनकी शोधवृत्ति  भाषा,  नवजागरण, इतिहास, राष्ट्रवाद जैसे इलाकों तक फैली हुयी है.  अनुवाद एक तरह से उनकी हॉबी है,  इनके द्वारा अनुदित टेरी इगलटन की पुस्तक ‘मार्क्सवाद और साहित्य-आलोचना ‘  हिंदी अकादमिक जगत में सबसे ज्यादा बिकने और पढ़ी जाने  वाली पुस्तकों में शुमार है.   

पढ़ने वाले की आँख निकल कर पेपर पर गिर पड़ती है: पीयूष राज

‘वह भी कोई देश है महाराज’ की समीक्षा लिखते हुए स्तंभकार, पटकथा लेखक और अभिनेता मयंक तिवारी कहते हैं कि अनिल यादव का लिखते रहना हिंदी में एक नयी जान फूंक सकता है. बीबीसी के वरिष्ठ पत्रकार राजेश जोशी का भी यही मानना है. ज्ञानरंजन तो लगभग फतवे के अंदाज में कहते हैं कि अनिल किसी बने-बनाये पथ के अनुगामी नहीं हैं और उनका मन  इस किताब (वह भी कोई देश है महाराज) को तरह-तरह से प्रचारित करवाना-करना चाहते हैं. यह किताब सचमुच में  हिंदी की पैठ को गैर-हिंदी और साहित्येत्तर इलाकों में करवाती है. इसके क्या कारण हो सकते हैं? पीयूष राज ने सुरेन्द्र चौधरी के बहाने सच ही कहा है कि ‘इस किताब में व्यक्त यथार्थ बिल्कुल भिन्न तरह का  है , जो सत्ता और जनता के अंतर्विरोध के साथ-साथ जनता के आपसी अंतर्विरोधों की प्रस्तुति करता है . प्रख्यात आलोचक  सुरेन्द्र चौधरी के शब्दों में यह ‘समकालीन यथार्थवाद’ है ‘ यह पुस्तक सत्य और असत्य, पक्ष और विपक्ष जैसे पहले से अवस्थित रूढ़ प्रारूपों के कहीं बीच रास्ते  बनाती हुयी  निकल जाती है. 
सूचना है कि अनिल यादव इन दिनों एक उपन्यास लिखने में व्यस्त हैं, तिरछिस्पेल्लिंग की तरफ से उन्हें शुभकामनायें, और पाठकों के अधीर होने से पहले पूरा करने की गुजारिश भी है. 

'वह भी कोई देश है महाराज' के आवरण पृष्ठ

‘वह भी कोई देश है महाराज’ के आवरण पृष्ठ

मधुमक्खियों के डंक झर तो नहीं जाते

(‘वह भी कोई देश है महाराज’ की समीक्षा )

By पीयूष राज 

क्या आप साहित्यिक विमर्शों से चट चुके हैं ? वैचारिक आग्रहों के बोझ से लदे चमत्कारपूर्ण वाक्य-विन्यासों से आपका सिर दर्द हो रहा है? और हर रोज बाज़ार आ रही नई-नई किताबों की तूफान में भी आपका दम घुट रहा है ? ऐसी स्थिति में अनिल यादव की किताब ‘वह भी कोई देश है महाराज’ ऑक्सीजन की सिलेंडर की तरह तुरंत राहत प्रदान करेगी . ऐसा इसलिए नहीं कि यह पुस्तक किसी पुरानी साहित्यिक जमीन को तोड़ती है और कुछ असाधारण रच देने का भाव लिए हुए है . बल्कि यह साधारणत्व के सौन्दर्य का पुनः सृजन है . इस किताब का अनूठापन इसी में छिपा है . लेखक के कथनानुसार यह यात्रा-वृतांत है (अगर इस तथ्य को उजागर नहीं किया जाए तो यह पुस्तक किसी लम्बी कहानी या उपन्यास की तरह है) और पूर्वोत्तर भारत पर केंद्रित है . यह यात्रा लेखक ने पुस्तक रचना के क़रीब दस साल पूर्व छः महीने की अवधि में की थी .पुस्तक पढ़कर ही यह समझा जा सकता है कि छः महीने के अनुभवों को समेटने में दस वर्ष का अन्तराल क्यों है . मुक्तिबोध के शब्दों में कहा जाए तो यह अन्तराल ‘संवेदनात्मक ज्ञान’ के ‘ज्ञानात्मक संवेदना’ में परिणत होने में लगा अन्तराल है .यह पुस्तक भावों के ठोस और पके रूप का सुन्दर उदाहरण है . इसके बिना यह पुस्तक पूर्वोत्तर की  कोई सामान्य सी यात्रा-वृत्तान्त  होती, बिल्कुल आज कल  अखबारों और पत्रिकाओं में छपने वाले यात्रा-वृत्तांतों की तरह जो  रूमानियत भरी अखबारी  रिपोर्टिंग से अधिक नहीं होती . अपने देखे-सुने और अनुभव किये भावों अर्थात् ‘संवेदनात्मक ज्ञान’ को रचनात्मक रूप देना एक कठिन कार्य होता है और पुस्तक के लेखक ने दस वर्षों में इस कार्य को सफलतापूर्वक अंजाम दिया. लेखक की पूर्वोत्तर यात्रा का सीधा उद्देश्य वहाँ की रिपोर्टिंग करके अपने पत्रकार कैरियर की बेरोजगारी समाप्त करना था. लेकिन बहुधा ऐसा होता है कि अपने पूर्व ज्ञान के आधार पर आपने जो सोच रखा था या किसी खास भौतिक परिस्थिति के बारे में आपकी जो बनी बनायी धारणा थी , आप उससे भिन्न परिस्थितियों का सामना करते हैं . संचित और शास्त्रीय सत्य  से ‘आँखिन देखी’ सत्य  के कारण उत्पन्न ज्ञान-भंग एक रचनात्मक तटस्थता का निर्माण करती है . इसके कारण अवलोकन का प्रस्थान बिंदु पूर्व निर्मित चेतना, विचार या विचारधारा की जगह भौतिक परिस्थिति हो जाती है. पूर्वोत्तर की यात्रा में लेखक के साथ भी यही रचनात्मक प्रक्रिया घटित हुई . इस पुस्तक में पूर्वोत्तर का इतिहास, संस्कृति, राजनीति, भूगोल, पर्यावरण सब कुछ समाहित है लेकिन ये किसी विषय की तरह अपने उपस्थित होने का आभास तक नहीं देते. पुस्तक को पढ़ते समय आपने कब लेखक के साथ-साथ राजनीति से इतिहास और इतिहास से लोककथाओं , मिथकों  से गुजरते हुए पूरे पूर्वोत्तर भौगोलिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक यात्रा कर ली , इसका भान भी नहीं होता. किसी  त्रिविमीय फिल्म (थ्री डी मूवी) की तरह यहाँ पाठक भी यात्रा का सहभागी महसूस करता है .

           दरअसल  यह  पुस्तक का बहुकोणीय चित्रों की एक श्रृंखला का निर्माण करती है. हर चित्र अपने आप में संपूर्ण भी है और इसमें क्रमबद्धता भी है. उदाहरण के लिए पूर्वोत्तर के विभिन्न राज्यों और जगहों के वर्णन में उनकी अपनी अलग पहचान भी  है और एक अंतः संचरित एकता भी . यह पहचान और एकता पूर्वोत्तर के अपने विशिष्ट अंतर्विरोधों के कारण हैं . सामान्यतः यह माना जाता है कि पूर्वोत्तर के राज्यों का भारतीय शासन व्यवस्था से मुख्य अंतर्विरोध है . ‘पेट्रोल , डीजल , गैस , कोयला ,चाय देने वाले पूर्वोत्तर को हमारी सरकार बदले में वर्दीधारी फौजों की टुकड़ियाँ भेजती रही हैं’. इस तथ्य से किसी को इंकार नहीं है , परन्तु पूर्वोत्तर भारत का यह एक मात्र सत्य या अंतर्विरोध नहीं है . वहाँ की जनजातियों के आपसी अंतर्विरोध और भी गहरे हैं . एक जगह जो समुदाय शोषित-पीड़ित दिखता है दूसरी जगह वही  शोषक भी है . इस यथार्थ की खूबसूरत प्रस्तुति लेखक की रचनात्मक तटस्थता के कारण संभव हो पाई है. यह यथार्थवाद बिल्कुल भिन्न तरह का यथार्थवाद है , जो सत्ता और जनता के अंतर्विरोध के साथ-साथ जनता के आपसी अंतर्विरोधों की प्रस्तुति करता है .प्रख्यात आलोचक  सुरेन्द्र चौधरी के शब्दों में यह ‘समकालीन यथार्थवाद’ है . इस तरह के यथार्थ को रचनात्मक रूप देना लेखकीय तटस्थता से ही संभव है . विचारजन्य आत्मीयता की जगह परिस्थितिजन्य आत्मीयता से लेखक ने पूरे पूर्वोत्तर के दर्द को इतिहास, संस्कृति और भूगोल के माध्यम से पाठक के सामने मूर्त रूप दिया है . पूर्वोत्तर की बदलती संस्कृति ,नए-पुराने , भीतरी-बाहरी इस सब द्वंद्वों को पाठक भी महसूस करता है  .इस प्रक्रिया में  रस के सभी स्थायी भाव पाठक के ह्रदय में उद्बुद्ध होते हैं . उत्साह , क्रोध, जुगुप्सा , रति , विस्मय ,भय ,शोक , शांत जैसी भावनाओं का  निरंतर गतिशील प्रवाह पाठक के भीतर चलायमान रहता है . ऐसा वर्णन के लिए आत्मीय भाषा के प्रयोग से ही संभव हो सका है . एक पौराणिक कथावाचक या सूत्रधार की तरह लेखक आपके सामने प्रकट होता है और कथा का पात्र होते हुए भी परिदृश्य से गायब हो जाता है . शब्दों के माध्यम से लेखक पाठक का सीधा साक्षात्कार पूर्वोत्तर से करता है . पाठक को ऐसा भान होता है कि लेखक नहीं बल्कि वह स्वयं यात्रा पर है .

     इस पुस्तक की एक अन्य खासियत यह है कि बहुत दिनों बाद सामान्य बातचीत की भाषा की शक्ति का उपयोग साहित्यिक भाषा में किया गया है . उदाहरण के लिए ब्रहम्पुत्र मेल बाहरी आवरण के वर्णन को पढ़ने से उत्पन्न जुगुप्सा के बाद शायद ही आप उस ट्रेन से यात्रा करना पसंद करें –‘अँधेरे डिब्बों की टूटी खिड़कियों पर उल्टियों से बनी धारियाँ झिलमिला रही थीं जो सूख कर पपड़ी हो गईं थीं.’ लेखक द्वारा गौ मांस खाने का वर्णन भी अद्भुत है .यहाँ परम्परा-संस्कार टूटने की भावना को संवेदनपूर्ण शब्द प्रदान किया गया है . मनुष्य-मनुष्य के द्वंद्व को ही नहीं बल्कि प्रकृति और मनुष्य के द्वंद्व को भी लेखक ने उसी आत्मीयता से शब्द दिए हैं . माजुली, नामदाफ, चेरापूंजी और लोकटक को बिगाड़ने, बचाने और संवारने की कवायद की निरर्थकता को यह पुस्तक बहुत ही सामान्य भाषा में बयान करती है .इस पुस्तक की भाषा के बारे में अगर एक पंक्ति में कुछ कहना हो तो इसी पुस्तक का एक वाक्य सटीक है कि ‘पढ़ने वाले की आंख निकल कर पेपर पर गिर पड़ती है.’

यह पुस्तक राजनीति, इतिहास, वर्तमान ,भूगोल, परम्परा, संस्कृति , मिथक, लोकगाथा आदि का साहित्यिक अन्तर्गुम्फन है .पुस्तक पढ़ते समय आप कब कहाँ हैं , निश्चय नहीं कर पाएँगे . ‘सजल वैशाख’ के विस्मय से शुरू हुई यात्रा ‘रबर के बागानों की मधुमक्खियों के डंकों’ के विस्मय पर समाप्त  होती है , परन्तु विस्मय का अंत नहीं होता क्योंकि पूर्वोत्तर के बारे में हमारे संचित ज्ञान भंडार को यह पुस्तक विस्मृत कर देती है . इसके बाद पाठक सिर्फ यही कह सकता है –‘मारिए वह भी कोई देश है महाराज !’

पीयूष राज

पीयूष राज

पीयूष राज भारतीय भाषा केंद्र, जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के युवा शोधार्थी हैं, छात्र राजनीति से गहरे रूप से जुड़े हैं और छात्रसंघ के पदाधिकारी रह चुके हैं. उनसे , मोबाइल नंबर -09868030533 , ईमेल आईडी – piyushraj2007@ग्मैल.com पर संपर्क सम्भव है.   

 

पुस्तक परिचय – वह भी कोई देश है महाराज , लेखक- अनिल यादव , अंतिका प्रकाशन , गाजियाबाद , मूल्य-सजिल्द संस्करण 295/-

Walerian Borowczyk on Surrealism 

I saw in a basket thousands of live snails. Some, diverging from their number, crept along the edge. Terror staggered me: each was completely indistinguishable from another. William Rowney (1223-1264)

The Astronauts (1959) 's Snap Shot

The Astronauts (1959) ‘s Snap Shot

By Walerian Borowczyk 

Surrealism is a program of absolute non-conformity, in life and in poetry, that speaks equally to the cinema. I’m all for it.

 If I speak of surrealism, or if I intend to speak, I’m not thinking about Art. Art? This is the disciplines, constraints, the models, the artistic talents, psychology, theories, the schools. Art, that’s “the artistes”. Only creators are free.

In the domain of creation, all that exists without subscribing to a school always risks being dismissed as worthless.

It is not a genuinely surrealist film that’s determined by its script, the cinematic blueprint. That would require that a filmmaker could give birth to the camera, to the film and to the projector, so that the film would be the direct communication from his mind to that of another. For this diffusion of dreams not to bore, the sender would have to be unalike to the receiver.

One is unable to accurately reproduce one’s dreams from memory. Dissembling and rationalisation of their constituent parts is therefore inevitable. The definitive form of a work depends on the extent and control of this operation.

Inevitably, we arrive at the point at which we’re unable to avoid the application of aesthetic criteria.

In relation to sleep. I have invented and realised some of my films during the slumber of my producers and collaborators.

My criteria for evaluating a work of art, whether surrealist or marginal to that project, is the proportion of interest and tedium found within it.

A masterpiece is never tedious. What’s more, its interest is more durable than fashion.

I prefer those works which are the proof of an instinctive imagination, but not affectation or plagiarism. I admire humour, but never when its gratuitous or facile. I applaud rebellion, but not when its opposed to life.

In Dom, I gave a glass of milk to an orange, because it needed to quench its thirst.

I never work with recourse to the state of psychic automatism. But that’s not to say I’m incapable of employing a “modest apparatus of self-interrogation”.

The traditions of surrealism in past eras, heralded only now – the whole of that same involuntary surrealism – demonstrate that it is the beholder who is the source of surrealism. It is the virtue of these contemporary prospectors to be the creators of surrealism. The same subjectivity has allowed for the inventory of a number of passing impressions of involuntarily surrealist films. Rarely have these films been distinguished by their merits.

If we consider the cinematic apparatus, its luminous singularity, as a manifestation of surrealism, its not important what film is being projected to a surrealist.

The fact that cinema possesses the appropriate potential doesn’t constitute sufficient reason to really think that it is automatically predisposed to a place in the landscape of surrealist expression.

Extracts of a film, successive frames of a particular sequence – this tendency among surrealists – are like a film the complete print of which doesn’t exist. All film is a strip of celluloid, with images placed in the emulsion upon the surface of its length. Its not impossible to perceive, within a film, images that are good for their precision. Take your choice. That culminates in one composing anthologies.

“Nothing of nine!” exclaimed a woman after watching Renaissance. “Progress in reverse! Its taken 40 years for film to turn-about and go backwards!” And in 50 years, how many films have gone forwards? Nowadays, moreover, we exaggerate more and more (to the point of ridicule) form and technique. Neither one, nor the other possesses in other respects the primacy in film. It isn’t possible for any film to unspool in reverse. Film and action are shown today in fast forward (excluding projectionist error). The method of shooting (the means with which the author obtains the desired distortion) is of no importance. That’s a curiosity, merely a footnote.

I call for “Goyaesque scenes”, because they’ll provoke debate on scenes of war. Otherwise: “a film is surrealist because a gentleman walks upon the ceiling of a room”. The majority of film critics are the captives of a literary vision. They do not trouble with how, why; in what manner; for whom, is sufficient. It is not their duty to make a statement.

Translated by Jim Knox from the French. Originally published in Etudes Cinematographiques # 41/42 (1965) “Surrealisme et Cinema”; Yves Kovacs, editor.

Courtesy-  UBUWEB

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