Archive for the month “February, 2018”

मुक्तिबोध की रचनात्मकता : प्रो.राजकुमार

मुक्तिबोध के बहाने प्रो. राजकुमार एक बहस की धारावाहिकता में गहरे विश्वास के साथ उतरे हैं. इस सीरिज का पहला , दूसरा लेख   और  तीसरा लेख  आप पढ़ चुके हैं,  चौथा  यहाँ  प्रस्तुत  है. #तिरछीस्पेल्लिंग 

यह बात सही है कि मुक्तिबोध नारीवादी रचनाकार या आलोचक नहीं हैं। यह भी सही है कि मुक्तिबोध कोई दलितवादी चिन्तक या रचनाकार नहीं हैं। इतना ही नहीं, मैं जो बात जोर देकर कहना चाहता हूँ वह यह है कि मुक्तिबोध यथार्थवादी रचनाकार भी नहीं हैं। लेकिन इससे मुक्तिबोध छोटे नहीं हो जाते, इससे मुक्तिबोध की तौहीन नहीं होती। इसके बावजूद मुक्तिबोध एक बड़े चिन्तक, विचारक और रचनाकार हैं। #लेखक

Muktibodh By Haripal Tyagi

Muktibodh By Haripal Tyagi

मुक्तिबोध की रचनात्मकता

 

By प्रो.राजकुमार

मुक्तिबोध ने जो बातें आलोचक या चिन्तक के रूप में लिखी हैं, वे बातें तो महत्त्वूपर्ण हैं ही, लेकिन जो बातें उनकी रचनाओं में आयी हैं, वे कई बार उनसे भी महत्त्वपूर्ण हैं, जो उन्होंने एक आलोचक के रूप में सचेत ढंग से लिखी हैं। मुक्तिबोध के आलोचनात्मक रूप को समझने के लिए सिर्फ उनके वैचारिक लेखन को न देखें, उनके रचनात्मक लेखन में जो विचार के स्फुरण हैं, वे भी बहुत महत्त्वपूर्ण हैं और कई बार वैचारिक लेखन से ज्यादा महत्त्वपूर्ण हैं। मुक्तिबोध ने स्वयं ‘संवेदनात्मक ज्ञान और ज्ञानात्मक संवेदना’ की बात की है। विचार और संवेदना तथा रचना और विचार को मुक्तिबोध अलग करके देखने के हिमायती नहीं हैं।

मुक्तिबोध ने प्रायः विधाओं की पारम्परिक सीमाओं को तोड़ा है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण ‘एक साहित्यिक की डायरी’ है। इसे क्या कहेंगे, डायरी, संस्मरण, नोटबुक, वैचारिक-चिन्तनपूर्ण लेखों को संजोने का उपक्रम; आखिर इसे क्या कहा जाए! इसी तरह मुक्तिबोध की जो कहानियाँ हैं, उनको भी हिन्दी में कहानी लिखने की पहले से चली आ रही परम्परा के परिदृश्य में देखने पर कई बार समस्या उत्पन्न होती है। यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि इन्हें कहानी माना जाए, निबंध माना जाए या फिर संस्मरण माना जाए। कहने का तात्पर्य यह है कि मुक्तिबोध ने जिस विधा में भी लिखा उस विधा को समस्याग्रस्त बनाया। उन्होंने उसकी पहले से चली आ रही संरचना को किसी न किसी रूप में बदला। इसलिए सिर्फ आलोचनात्मक लेखन में नहीं, बल्कि रचनात्मक लेखन में भी, मुक्तिबोध ने जो कुछ लिखा है, उस पर विचार करने की जरूरत है।

मुक्तिबोध के समूचे लेखन में प्रेमचंद के प्रति आदर का भाव है, लेकिन प्रेमचंद के बारे में मुक्तिबोध ने लगभग न के बराबर लिखा है। निराला के प्रति भी आदर का भाव है लेकिन मुक्तिबोध ने उनकेे बारे में भी कुछ नहीं लिखा। मुक्तिबोध ने सबसे ज्यादा जिस रचनाकार के बारे में लिखा है, वे जयशंकर प्रसाद हैं। सोचने वाली बात है कि मुक्तिबोध जयशंकर प्रसाद के बारे में इतना क्यों लिखते हैं? ‘कामायनी’ का जिस तरीके से उन्होंने मूल्यांकन किया है, उससे आप क्या वास्तव में समझ सकते हैं कि मुक्तिबोध ने प्रसाद से क्या लिया! मुझे लगता है कि ‘कामायनी एक पुनर्विचार’ पुस्तक में मुक्तिबोध ने प्रसाद के बारे में चाहे जो भी निर्णय दिए हों, लेकिन मुक्तिबोध जो चीजें प्रसाद से लेते हैं, वह भारतीय सभ्यता का गहरा, सूक्ष्म सांस्कृतिक बोध है। समूची हिन्दी काव्य परम्परा में, बहुत गहरे अर्थों में, एक सच्चे भारतीय कवि के रूप में मुक्तिबोध अपने आपको प्रस्तुत करते हैं। छायावादी कवियों में निराला की कविता की क्रांतिकारिता अपनी जगह है। निराला ने ‘तुलसीदास’ और ‘राम की शक्तिपूजा’ जैसी लम्बी कविताएँ लिखी हैं। लेकिन इसके बावजूद भारतीय सभ्यता का बहुत गहरा और सूक्ष्म सांस्कृतिक बोध जिस तरह प्रसाद के यहाँ है, वैसा और किसी के यहाँ नहीं है। मुझे लगता है कि यह शायद बड़ा कारण है, जिसकी वजह से मुक्तिबोध लगातार प्रसाद की कविताओं से उलझते हैं। भले ही, उन्होंने इस बात को सीधे-सीधे न लिखा हो। मुक्तिबोध का ‘कामायनी’ के बारे में जो मूल्यांकन है, वह बड़ा ही नकारात्मक लगता है, लेकिन उन्होंने प्रसाद से जो कुछ लिया है, वह बहुत महत्त्वपूर्ण है।

मुक्तिबोध ने प्रसाद की ‘कामायनी’ को ‘फैंटेसी’ के रूप में देखा। प्रसाद ने भी एक अन्योक्ति के रूप में उसकी भूमिका लिखी है। प्रसाद ने भी ऐसा कुछ नहीं कहा जिससे लगे कि ‘कामायनी’ एक यथार्थवादी रचना है। मुक्तिबोध का प्रसाद के साथ जो तादात्म्य है, उसके केन्द्र में उस शिल्प-विधान की भी भूमिका है जो मुक्तिबोध प्रसाद की ‘कामायनी’ से ग्रहण करते हैं और फिर जिसे अपने स्तर पर विकसित करते हैं। उन्होंने जैसे प्रसाद की ‘कामायनी’ को एक ‘फैंटेसी’ कहा है, वैसे ही, वह अपनी समूची रचनाओं को ‘फैंटेसी’ कहते हैं। उन्होंने यह माना है कि उनकी रचनाएँ ‘फैंटेसी’ के विधान में लिखी गयी हैं। इसलिए समस्या यह है कि जो रचना ‘फैंटेसी’ के विधान में लिखी गयी हो, जिसमें अन्तर्वाह्य, ‘स्वप्न’ और ‘यथार्थ’ का साफ-साफ अन्तर न किया गया हो, उसकी व्याख्या यथार्थवादी सैद्धान्तिकी के सहारे कैसे की जा सकती है।

उनकी कविता ‘अंधेरे में’ में यह प्रसंग आता है कि यह तो स्वप्न कथा है। ये सारी बातें स्वप्न में चल रही थी। यह जानबूझ कर मुक्तिबोध ने किया है। और यह उन्होंने इसलिए किया है क्योंकि ‘स्वप्न और यथार्थ’ के पहले से, यथार्थवादी दौर से, चले आ रहे विभाजन को वे तोड़ना चाहते थे; या उसको धुंधला करना चाहते थे। इसी तरह से क्या अन्दर है और क्या बाहर है, क्या आत्मगत है और क्या वस्तुगत है, इसका भी पारम्परिक विभाजन जो यथार्थवाद के रास्ते चला आ रहा था, मुक्तिबोध ने तोड़ दिया। उदाहरण के माध्यम से यह बात समझ सकते हैं। उनकी ‘भूल गलती’ कविता को लीजिए। वह ‘भूल गलती’ किसकी है? पहले यह भ्रम होता है कि किसी से कोई चूक-भूल हो गयी है, उसकी सजा मिलने वाली है। लेकिन फिर पता चलता है कि यह तो सत्ता का प्रतीक है। अन्दर क्या है, बाहर क्या है, इसका साफ-साफ विभाजन पहले से चला आ रहा था, मुक्तिबोध ने उसे तोड़ दिया। और आखिरी चीज इस प्रसंग में यह कि व्यक्ति की निश्चित-निर्धारित संभावनाओं को भी मुक्तिबोध ने समस्याग्रस्त बनाया। इस दृष्टि से आप विचार करें कि माक्र्सवाद की विधेययवादी/प्रत्यक्षवादी (Positivist) समझ उस दौर तक चली आयी थी जिसमें ज्यादातर चीजों के बारे में निश्चित रूप से कहने का दावा किया जाता था। मुक्तिबोध ने इस समझ को चुनौतीग्रस्त बनाया और व्यक्ति की संभावनाओं को कहीं न कहीं खुला छोड़ दिया। जैसे, ‘अंधेरे में’ कविता में ‘एक व्यक्ति अन्दर है और दूसरा उसकी साँकल खटखटा रहा है। कहने के लिए यह दो व्यक्ति हैं, लेकिन हम जानते हैं कि यह एक ही व्यक्ति की दो संभावनाएँ हैं। एक ही व्यक्ति दो रूपों में विकसित हो सकता है या कई रूपों में विकसित हो सकता है। अब वह समाज और देश-दुनिया कैसी है और वह कैसा प्रयास करता है, अपने को किधर जोड़ता है, इससे उसकी कौन-सी संभावनाएँ फलीभूत होंगी, यह निश्चित होगा।

व्यक्ति की पहचान नयी कविता के दौरान एक बड़ा मुद्दा था। व्यक्ति कैसे बनता है? व्यक्ति की अस्मिता को कैसे परिभाषित किया जाए? मुक्तिबोध ने इस बात को रेखांकित करने का प्रयास किया कि व्यक्ति की संभावनाएँ तो अनन्त हैं। वह कई रूपों में विकसित हो सकता है। व्यक्ति का कौन-सा रूप विकसित होगा यह इस बात पर निर्भर करता है कि समाज उसे कैसा असवर देता है और वह व्यक्ति कैसा प्रयास करता है। ये बातें यथार्थवाद की सैद्धान्तिकी के बाहर की बातें हैं। इसलिए यथार्थवाद के सहारे मुक्तिबोध या मुक्तिबोध की रचनाओं की व्याख्या नहीं कर सकते। यह अलग बात है कि कुछ लोगों को लगता है कि यथार्थवाद एक ऐसी ‘मास्टर की’ है, जिसके जरिये अतीत से लेकर वर्तमान तक और भविष्य में जो कुछ होगा, उसकी भी व्याख्या की जा सकती है। ऐसे लोगों को आप छोड़ दें, साहित्य और कला के विकास के बारे में जिनको थोड़ा बहुत मालूम है, वे जानते हैं कि यथार्थवाद के बाद पश्चिम में आधुनिकतावाद या जिसे अंग्रेजी में ‘मार्डनिज़्म’ कहते हैं, वह आता है। और मुक्तिबोध स्वयं उसके साथ जुड़े हुए हैं, मुक्तिबोध की एक किताब है, ‘नयी कविता का आत्मसंघर्ष’। मार्क्सवाद के साथ उनका चाहे जैसा भी संबंध रहा है, लेकिन मुक्तिबोध ने कभी यह नहीं कहा कि वे नयी कविता से बाहर के कवि हैं। नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल या और दूसरे मार्क्सवादी कवि हैं, जिन्होंने अपने को नयी कविता से बाहर रखा। नयी कविता से बाहर रहने वाले कवि के रूप में मुक्तिबोध ने स्वयं को कभी पेश नहीं किया, बल्कि उसी के अन्दर एक प्रगतिशील संभावना खोजने की कोशिश मुक्तिबोध ने की। नयी कविता या नयी कहानी वही है जिसको अंग्रेजी में मार्डनिज़्म कहा जाता है। उसी का भारतीय संस्करण हमारे यहाँ नयी कविता या नयी कहानी के दौरान आया। उसी के अन्दर मुक्तिबोध भी सक्रिय हैं। उसी के अन्दर नयी कविता के दौरान बहसें हुईं। नयी कविता की वैचारिकी से बहस करते हुए, उससे उलझते हुए, मुक्तिबोध मार्क्सवादी आलोचना की, प्रचलित समझ से अपना एक संबंध स्थापित करते हैं। नयी कविता के दौरान कविता या साहित्य को लेकर जो एक नये प्रकार का चिन्तन आ रहा था, उससे भी वे उलझते हैं।

यथार्थवाद के आधार पर मुक्तिबोध की रचनाओं की व्याख्या नहीं कर सकते या नहीं करनी चाहिए। यथार्थवाद के चौखटे में मुक्तिबोध कहीं से भी फिट नहीं होते। उनका रचना-विधान यथार्थवाद से बाहर का है, जिसको आप मोटे तौर पर आधुनिकतावाद के साथ जोड़कर देख सकते हैं। इस पर हमें जरूर विचार करना चाहिए कि मुक्तिबोध भारतीय साहित्य और कला की क्या किसी वैकल्पिक परम्परा की ओर संकेत करते हैं या उसकी संभावनाओं को तलाशने की कोशिश करते हैं। हिन्दी की जिस जातीय परम्परा की बात आधुनिक युग में की जाती है, जिसके पुरस्कर्ता के रूप में हिन्दी में रामविलास शर्मा का नाम लिया जाता है, वह जातीय परम्परा मोटे तौर पर यथार्थवाद की सैद्धान्तिकी पर आधारित है। यथार्थवाद की सैद्धान्तिकी से प्रेरित प्रभावित जो रचनाएँ उस दौर में लिखी गयीं, वह बहुत महत्त्वपूर्ण हैं और उनके महत्त्व से इन्कार नहीं किया जा सकता। उस यथार्थवाद की सैद्धान्तिकी से प्रेरित-प्रभावित रचनाओं के कारण भारत की साहित्यिक और सांस्कृतिक परम्परा का जो पहले से चला आ रहा सिलसिला था, उससे हमारा संबंध कहीं न कहीं टूटता और खण्डित भी होता है। यह अकारण नहीं है। चाहे लोक-परम्परा हो या चाहे लोकाख्यान हो या लोक जीवन से जुड़े हुए अन्य विविध रूप हों, यथार्थवाद से प्रेरित हिन्दी की जातीय साहित्य की परम्परा में उनकी लगभग उपेक्षा की गयी। इप्टा ने जिस प्रकार के नाटक खेले और कुछ लोकगीतों का प्रयोग किया, वहाँ भी पहले से प्रचलित और लोकप्रिय रूपों का इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति अधिक थी, लेकिन उनकी संवेदना और सैद्धान्तिकी से तदाकार होने का कोई प्रयास या उलझने का प्रयास वहाँ भी नहीं दिखता। इसलिए यथार्थवाद से प्रेरित रचनाओं की महत्ता को स्वीकार करने के बावजूद यह मानना पड़ेगा कि यथार्थवादी आग्रह के कारण कहीं न कहीं पूर्व प्रचलित परम्परा से विच्छेद भी दिखायी पड़ता है।

मुक्तिबोध को उस प्रसंग में रखकर देखना चाहिए, जहाँ रखकर विचार करने से उनका महत्त्व उद्घाटित होता है। आप जानते हैं कि मुक्तिबोध की कविताओं में और कहानियों में भी, जो आख्यान है, वह लगभग लोककथाओं जैसा है। लोककथाओं के स्ट्रक्चर में उनकी कविताएँ रची गयी हैं। उनकी कहानियों में भी यही चीज दिखायी पड़ेगी। यह दिलचस्प है कि मुक्तिबोध हिन्दी के पहले (अज्ञेय के साथ) पूरी तौर पर शहरी कवि हैं, जिनका गाँव से संबंध नहीं रहा है। इसके बावजूद उनके रचना-विधान में लोककथाओं से लेकर लोकजीवन की ‘बावड़ी’ तक अनेकों चीजें हैं। इनसे संबंधित बहुतेरे बिम्ब और प्रतीक हैं। यहाँ तक कि मुक्तिबोध के रंगबोध पर भी भारतीय लोकजीवन की गहरी छाप है।

मुक्तिबोध रूपक और प्रतीक के लिए जाने जाते हैं। लेकिन उससे ज्यादा खास चीज, जो मुझे बराबर आकृष्ट करती रही है कि कई बार भक्तिकालीन कवियों की पूरी की पूरी शब्दावली मुक्तिबोध के यहाँ मिल जाती है। इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना और अनेक शब्द मुक्तिबोध के यहाँ मिल जाते हैं, जिससे रामविलास जी को यह भ्रम होता है कि यह तो रहस्यवादी हो गए हैं। दरअसल, समूची भक्तिकालीन परम्परा के दौरान शब्दों की एक नयी समृद्धि आयी; उसको एक नए स्तर पर अर्जित करने और उसका नवोन्मेष करने का उद्यम मुक्तिबोध की कविता में दिखायी पड़ता है। मुक्तिबोध बहुत गहरे और सूक्ष्म अर्थों में भारतीय संस्कृति और सभ्यता के कवि हैं। भारतीय साहित्यिक परम्परा का जितना गहरा संस्कार मुक्तिबोध के यहाँ दिखायी पड़ता है, उनसे पहले प्रसाद के यहाँ है, और उसके बाद तो फिर किसी के यहाँ नहीं है।

यथार्थवाद से इतर जो गैर यथार्थवादी परम्परा है, वह कैसे भारतीय सभ्यता की पहले की विरासत – लोक परम्परा और शास्त्रीय परम्परा – से जुड़ने में हमारी मदद करती है और एक वृहत्तर भारतीय समाज के साथ भी हमारा संवाद स्थापित करने में सहायता करती है। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का नाटक है ‘अंधेर नगरी’। कहा जाता है कि यह एक लोककथा है और पारसी रंगमंच पर इस तरह का नाटक खेला भी जाता था। भारतेन्दु ने उसे अपने ढंग से समृद्ध किया। ‘अंधेर नगरी’ का पूरा रचना-विधान भारतीय लोक परम्परा के आख्यान के अनुरूप है या उसके नजदीक है। उसकी व्याख्या यथार्थवाद की तार्किक सैद्धान्तिकी के आधार पर नहीं कर सकते। शायद यह बड़ा कारण है कि यह छोटा सा नाटक इतना लोकप्रिय हुआ। उसकी लोकप्रियता सिर्फ विश्वविद्यालयों और हिन्दी विभाग की चौहद्दी तक सीमित नहीं रहती। यह नाटक इतना विस्तार पाता है कि आपातकाल के दौरान उसे प्रतिबंधित करना पड़ा। यह जो शक्ति है, वह गैर यथार्थवादी शिल्प-विधान की खासियत है, जो ‘अंधेर नगरी’ में दिखायी पड़ती है। यह शक्ति, यह खासियत फिर मुक्तिबोध में दिखायी पड़ती है, हबीब तनवीर में दिखायी पड़ती है और विजयदान देथा की कहानियों में दिखायी देती है। यही मुक्तिबोध के चिन्तन का प्राण है।

मुक्तिबोध ने गैर यथार्थवादी रचनात्मकता को, पहले से चली आ रही परम्परा को, पहचाना, उसके द्वार खोले, उसके महत्त्व को सामने लाने का काम किया। प्रेमचंद ने 1936 में प्रगतिशील साहित्य मंच के अध्यक्षता पद से दिये गये भाषण ‘साहित्य का उद्देश्य’ में पहले के समूचे साहित्य का सुलाने वाला साहित्य के रूप में जिक्र किया था। मैं यथार्थवाद की इसी विडम्बना की ओर संकेत करना चाहता था। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि आधुनिक युग से पहले की समूची विरासत को, उसकी उपलब्धियों को, चाहे वह शास्त्रीय परम्परा की हों या लोक परम्परा की, अस्वीकार कर दिया गया। इसी पृष्ठभूमि में मुक्तिबोध ने एक बड़ा काम किया। वह अध्याय फिर से खोला गया, उसके महत्त्व को नये सिरे से समझने और उससे सीखने के एहसास को हमारे अन्दर उत्पन्न किया गया। आश्चर्य होता है कि मुक्तिबोध यह काम तब कर रहे थे, जब दुनिया में जादुई यथार्थवाद नाम की कोई चीज कहीं थी ही नहीं।

जादुई यथार्थवाद को साहित्य में लाने वाले लातिन अमरीकी उपन्यासकार गैब्रियल गार्सिया मार्खेज़ का नाम विशेषरूप से लिया जाता है। जादुई यथार्थवाद की शैली में नए तरह का जो आख्यान है, वह कहीं न कहीं लातिन अमरीकी लोक जीवन को फिर से एक नये स्तर पर उपन्यास के शिल्प में लाने का उपक्रम है। यह संभव ही नहीं हो पाता, अगर बीच में आधुनिकतावाद न आता। अगर आधुनिकतावाद ने यथार्थवाद की सैद्धान्तिकी को चुनौती न दी होती तो कोई भी लेखक, चाहे वह लातिन अमरीकी हो या कोई और, वह मैजिकल रियलिज्म के ढंग की रचना नहीं कर सकता था। विद्वान जानते हैं कि मैजिकल रियलिज्म का विकास कैसे हुआ। उसमें आधुनिकतावाद का बहुत महत्त्वपूर्ण योगदान है।  इसीलिए मुक्तिबोध के योगदान के इस पक्ष को देखकर आश्चर्य होता है। जादुई यथार्थवाद कहीं आया ही नहीं था, और इसके बावजूद मुक्तिबोध इस तरह की कविताएँ लिखने का साहस कर रहे थे। इसी अर्थ में कई बार विचार के स्तर पर हम ज्यादा औपनिवेशिक होते हैं जबकि संवेदना और संस्कार के स्तर पर देशी होते हैं। संवेदना या संस्कार हमेशा प्रतिक्रियावादी ही नहीं होते, गलत ही नहीं होते, कई बार ज्यादा सच्चे और अच्छे होते हैं। मुक्तिबोध के यहाँ भी हम इस बात को लागू करके देख सकते हैं कि उनकी रचनात्मकता में इस तरह के बहुत सारे पक्ष हैं। कई बार अपने वैचारिक चिन्तन में वे इस पर ध्यान नहीं देते हैं या फिर उस पर ढंग से विचार नहीं करते।

नयी कविता में इस बात को लेकर बड़ी बहस हुई कि जीवनानुभूति और सौन्दर्यानुभूति में क्या संबंध है। नयी कविता के दौरान यथार्थ वाला नुस्खा नहीं आता है। अज्ञेय ने, जिन्हें टी॰एस॰ इलियट से प्रेरणा मिली थी, कहा कि जीवनानुभूति और सौन्दर्यानुभूति दोनों ही अलग या समानान्तर चलने वाली चीजें हैं। इनके बीच कोई सीधा संबंध नहीं है। यह एक समझ थी, जिसके हिन्दी में प्रवक्ता अज्ञेय थे। दूसरी समझ मार्क्सवादियों की थी कि जीवनानुभूति और सौन्दर्यानुभूति में कोई फर्क नहीं है। अगर आपके पास जीवन का अनुभव है तो वही पर्याप्त है और उससे अपने आप रचना बन जाएगी। रचना आपकी जीवनानुभूति का ‘बाइप्रोडक्ट’ है। इस संबंध में मुक्तिबोध ने न तो यह कहा कि ये दोनों बिल्कुल अलग हैं और न तो यह कि जीवन की अनुभूति और सौन्दर्य की अनुभूति दोनों एक हैं। उन्होंने कहा कि सैन्दर्यानुभूति जीवनानुभूति से गुणात्मक रूप से भिन्न है। इसका मतलब है कि रचना जीवन का ‘बाइप्रोडक्ट’ नहीं है। रचना एक कौशल और अनुशासन भी है। अगर वह कौशल और अनुशासन आपको नहीं आता, तो जीवन में आपने चाहे जितना संघर्ष किया हो, उसके बाद भी कोई अच्छी रचना या कविता लिख पाएंगे, ऐसा कोई दावा आप नहीं कर सकते। तीन क्षणों की चर्चा में मुक्तिबोध ने इसी बात को बहुत विस्तार से दिखाया है कि रचना का जब बीज पड़ता है और जब रचना अन्तिम रूप से बनती है तो उसमें बहुत बदलाव आ जाता है। मुक्तिबोध ने इस बात को अपने आखिरी दिनों के आस-पास महसूस किया था कि हर विधा का अपना एक स्वभाव या चरित्र होता है। कविता, कहानी या अन्य दूसरी विधाओं में भी उस विधागत स्वभाव या चरित्र को आप एक सीमा तक तो बदल सकते हैं, लेकिन एक सीमा के बाद आप उसे नहीं बदल सकते। बल्कि इसका उल्टा होता है कि वह विधा भी आपको बदलती है। अगर आपको कहानी लिखनी है तो कहानी लिखने के बारे में जैसे ही सोचेंगे, वैसे ही आप अपने अनुभव को कहानी की विधा में रूपान्तरित करने की कोशिश करने लगेंगे। किसी विधा में अनुभव को रूपान्तरित करने की जो कोशिश है, उसमें वह विधा भी आपको और आपके अनुभव को बदल देती है। वह विधा आपकी भाषा को भी बदल देती है। बहुत सारी चीजें आपके जीवननानुभव में जुड़ जाती हैं और बहुत सी चीजें घट जाती हैं। मुक्तिबोध ने ये सारी बातें उस समय लिखी है जब हेडेन ह्वाइट जैसा कोई समाजशास्त्रीय चिन्तक नहीं हुआ था। हेडेन ह्वाइट की एक बड़ी प्रसिद्ध पुस्तक है ‘कन्टेन्ट आॅफ फाॅर्म’। इसका हिन्दी अनुवाद किया जाए तो होगा ‘रूप की अन्तर्वस्तु’। चाहे संगीत का रूप हो या साहित्य की किसी विधा का रूप हो, उसका अपना एक स्वाभाव होता है। एक रूप एक खास तरह की चीजों को ग्रहण करेगा, दूसरी चीजों को वह ग्रहण नहीं करेगा, और अगर आप एक सीमा के बाद जबदस्ती करने की कोशिश करेंगे, तो वह रूप उसे धारण नहीं करेगा। आप लाख कहते रहें  कि आपने कविता लिख दी है, और चौबीस कैरेट यथार्थ उसमें डाल दिया है, लेकिन अगर वह विषय उस रूप के अन्दर ‘फिट’ नहीं हो पाया तो फिर उसे कविता नहीं कहा जाएगा। उपन्यास लिखना है तो आप उपन्यास को चाहे जितना भी बदलें, अन्ततः आपको उपन्यास ही लिखना है। कविता लिखनी है तो आप कविता को चाहे जितना भी बदलें, अन्ततः कविता ही लिखनी है। यह विवेक कहीं न कहीं होना चाहिए कि रूप विषय को किस हद तक धारण कर सकता है। सुई से तलवार का काम नहीं लिया जा सकता और तलवार से सुई का काम नहीं ले सकते, यह बात मुक्तिबोध के तीन क्षणों के विवेचन से निकलकर हमारे सामने आती है, और हमें बहुत कुछ सीखने के लिए विवश करती है। यह बात अलग है कि स्वयं मुक्तिबोध का समूचा रचनात्मक लेखन इस कसौटी पर हमेशा खरा नहीं उतरता। मुक्तिबोध के यहाँ सर्वत्र श्रेष्ठ कविता नहीं है। बहुत सारे अंश हैं, जहाँ बिखराव भी दिखायी पड़ेगा, जहाँ लगता है कि रूप ने इसको धारण नहीं किया है। खास तौर से ‘अंधेरे में’ का जो पूरा विन्यास है, जहाँ नाटक की संरचना में कविता रचने का प्रयास उन्होंने किया है, वहाँ आप इस बात को महसूस कर सकते हैं। जिस रूप की तलाश मुक्तिबोध को थी, जो कई दफा उन्हें कुछ अंशों में मिलता था, और कभी नहीं मिलता, शायद वह तलाश ‘अंधेरे में’ जाकर पूरी होती है। इस तरह की और भी कुछ रचनाओं का उल्लेख किया जा सकता है, लेकिन नाटक की संरचना के अंदर अपनी प्रगीतात्मक संवेदना को कैसे पिरोया जाए, यह रचनात्मक विधान मुक्तिबोध ने अपने आखिरी दौर में खोज लिया। वहाँ रूप ने संवेदना को धारण किया है। इस दौर में इस तरह की दो रचनाएँ मिलती हैं। दूसरे पक्ष से धर्मवीर भारती का ‘अंधायुग’ है, जो नाटक की संरचना में एक खास तरह की प्रगीतात्मकता को धारण करने की तकनीक विकसित करता है। दूसरी तरफ मुक्तिबोध की ‘अंधेरे में’ है जहाँ वे लोकनाट्य की संरचना में प्रगीतात्मक क्रांतिकारी संवेदना को धारण करने का एक तरीका विकसित करते हुए दिखायी पड़ते हैं। लेकिन इस विस्तार में जाने के लिए तो एक नया लेख लिखना होगा।

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प्रो॰राजकुमार शोर-शराबे से दूर अध्ययन-अध्यापन में मग्न रहने  वाले युवा-तुर्क हिन्दी आलोचक हैं। भक्ति साहित्य, हिन्दी नवजागरण, आधुनिकता, आधुनिक साहित्य, प्रेमचंद, हिन्दी कहानी इत्यादि पर लगातार लेखन। किताबों में जैसी रुचि इनकी  है,  वह अन्यत्र दुर्लभ ही हो गई है। फिलहाल, बी॰एच॰यू॰ के हिन्दी विभाग में प्राध्यापक।इनसे dr.kumar.raj@gmail.com पर संपर्क संभव।

निकानोर पार्रा उर्फ़ ‘जनता के धैर्य की ऐसी की तैसी’: रॉबर्तो बोलान्यो

रॉबर्तो बोलान्यो, मार्खेज के बाद का सबसे बड़ा अफसानानिगार, और आज की तारीख में उतना ही लोकप्रिय है. कवि के सच्चे अर्थों में वह निकानोर पार्रा को स्पेनिश/लातिनी अमरीकी संसार का एक मात्र महान कवि मानता था. यह अद्भुत संयोग है कि दोनों नोबेल पुरस्कार को डिजर्व करते थे और दोनों को नहीं मिला. पार्रा जीते-जी (क्योंकि शायद ही कोई कवि इतना जी पाया) लीजेंड की छवि को प्राप्त कर लिए थे और इसके लिए उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा, अगर वह सामान्य उम्र पाते तब उसकी लीजेंड छवि बोलान्यो की तरह ही मरने के बाद उभरती. जब बोलान्यो मरा तब पार्रा ने लिखा, “रॉबर्तो हमें पछाड़ गया/ चिली के लिए अभूतपूर्व क्षति/ मेरे स्वयं के लिए अभूतपूर्व क्षति/ हर किसी के लिए अभूतपूर्व क्षति/ शेष मौन हैं/ एक महान ह्रदय विस्फ़ोट कर गया/ मेरे प्यारे राजकुमार, शुभरात्री/ परियों के गान  का समवेत स्वर तुझे लेने बाहर आ गया है.

2003 के पहले से ही रॉबर्तो बोलान्यो निकानोर पार्रा को अपना गुरु मानते हुए उन्हें याद किया करता था, उनके बारे में बोलता था, लिखता था. यहाँ प्रस्तुत बोलान्यो के इस लेख को निकानोर पार्रा के लिए श्रद्धांजली स्वरुप पेश बहुतेरे लेखों में सबसे महत्वपूर्ण मान सकते हैं. इसके हिन्दी अनुवाद के लिए संतोष झा और उदय शंकर के हम आभारी हैं. #तिरछीस्पेल्लिंग

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रॉबर्तो बोलान्यो और निकानोर पार्रा 

निकानोर पार्रा के साथ आठ सेकंड

By रॉबर्तो बोलान्यो

निकानोर पार्रा की कविता के बारे में, इस नई शताब्दी में, मैं निश्चित तौर पर कह सकता हूँ कि यह टिकाऊ होगी। ज़ाहिर है कि यह कहने का कोई ख़ास अर्थ नहीं है; और इस बात से सबसे ज्यादा वाकिफ खुद पार्रा ही हैं। हालांकि, पार्रा की कविताओं का यह टिकाउपन होर्खे लुईस बोर्खेस, फ़ेसर वायेहो, लुईस सरनोदा और कुछ अन्य लोगों की कविताओं के साथ बरकरार रहेगा। लेकिन, हमें यह कहना पड़ेगा कि इससे बहुत ज़्यादा फ़र्क़ नहीं पड़ता है।

पार्रा के दांव, भविष्य की ओर फेंके गए उसके अन्वेषण को यहां समझना काफी जटिल काम है। यह उतना ही ओझलपूर्ण भी है। यह ओझलता गति की ओझलता है। हालांकि बोलता हुआ, अपनी भंगिमाओं को साधता हुआ वह अभिनेता रंगपटल पर पूरी तरह से दृश्यमान है। उसकी खूबी, उसके परिधान, उसके साथ आने वाले प्रतीक, जैसे फोड़े में प्रवाहित विद्युत्-तरंग: वह एक कवि है, जो कुर्सी पर बैठे-बैठे सो जाता है, एक कमांडर, जो क़ब्रिस्तान में खो जाता है, सम्मेलन का एक वक्ता, जो अपने बालों को हाथ से झटकते-झटकते उन्हें खींचने लग जाता है, अपने घुटनों पर टिका एक बहादुर आदमी, जो मूतने की हिम्मत करता है, एक तपस्वी, जो समय को बरसों-बरस गुज़रते देखता है, एक अभिभूत सांख्यिकीविद्; ये सारी छवियाँ दृश्यमान हैं। पार्रा को पढ़ने से पहले इस सवाल पर सोचना ज्यादती नहीं होगी, वही सवाल जो विटिंग्सटाइन हमसे और स्वयं से भी पूछता हैः क्या यह हाथ, एक हाथ है या यह हाथ नहीं है? (किसी के हाथ को देखते हुए यह सवाल पूछना चाहिए।)

मैं खुद से पूछता हूं कि पार्रा की वह किताब कौन लिखेगा, जिसके बारे में उसने सोचा और कभी नहीं लिखाः यातनाशिविर-दर-यातनाशिविर, जंग-दर-जंग के विस्तृत आख्यान अथवा रुदाली से भरा द्वितीय विश्व युद्ध का इतिहास; एक कविता जो नेरुदा के कैंटो जनरल के ठीक विपरीत हो। नेरुदा के कैंटो जनरल के ठीक विपरीत वाली कविता की किताब से केवल एक हिस्सा ही पार्रा अपने नाम सुरक्षित कर सके और वह है, मॅनीफेस्टो। इसी मॅनीफेस्टो में वह अपने काव्यात्मक सौंदर्यबोध को प्रस्तुत करता है, हालांकि पार्रा को जब भी जरुरत महसूस हुयी उसने उस सौंदर्यबोध को ख़ुद ही अनदेखा किया। क्योंकि सौंदर्यबोध सच्चे लेखकों के गुहांधकार पर हल्की रौशनी डालता है और एक अस्पष्ट विचार बनाने में मदद करता है; और  अक्सरहां यह संभव भी नहीं हो पाता क्योंकि जोखिम और संकट की ठोस जमीन उभर आने के समय यह लगभग बेकार का अभ्यास बन जाता है।

युवाओं को पार्रा के अनुयायी बनने दीजिए। केवल युवा ही बहादुर होते हैं, उन्हीं की आत्माओं में पवित्रता है। इसके बावजूद, पार्रा जवानी के जोश या होश खोने की कविता नहीं लिखता है, वह पवित्रता के बारे में नहीं लिखता है। वह तो पीड़ा और एकांत के बारे में, निरर्थक और अनिवार्य चुनौतियों के बारे में, आदिवासियों की तरह बिखर जाने को अभिशप्त शब्दों के बारे में लिखता है। पार्रा ऐसे लिखता है जैसे वह कल बिजली के तार को पकड़कर झूलने जा रहा है। जहां तक मुझे याद है, मैक्सिकन कवि मारियो सैंटियागो ही एकमात्र व्यक्ति था जिसने पार्रा की रचनाओं का विषद अध्ययन किया था। हममें से बाक़़ी लोगों ने केवल एक स्याह पुच्छल तारे को देखा है। किसी उत्कृष्ट कृति की पहली अनिवार्यता है, किसी की नज़र की तपिश महसूस किये बिना गुज़र जाना।

एक कवि की यात्रा में ऐसे क्षण आते हैं, जब उसके पास खुद को सुधारते रहने के सिवा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वह कवि,  गोन्ज़़ालो दे बर्थ्यो को मुंहज़बानी सुनाने में सक्षम है या वह हेप्टा-सिलेबल्स और गार्थिलासो के 11-सिलेबल् छंदों को किसी के बनिस्पत ज़्यादा अच्छी तरह जानता है। इन सब के बावजूद जीवन में ऐसे क्षण आते हैं, जब केवल एक चीज करने को बचती है और वह यह कि ख़ुद को अतल खाई में झोंक देना है या चिली के संभ्रांत घरानों के सामने नंगे खड़े हो जाना है। बेशक, उसे यह पता होना चाहिए कि सामने आने वाले भयंकर नतीजों का सामना कैसे करें। किसी उत्कृष्ट कृति की पहली अनिवार्यता है, किसी की नज़र की तपिश महसूस किये बिना गुज़र जाना।

एक राजनीतिक टिपण्णी:

पार्रा ज़िन्दा बने रहने में सक्षम है। इसमें ऐसी कोई बड़ी या महान बात नहीं है, लेकिन बात तो है। दक्षिणपंथ की तरफ स्पष्ट झुकाव रखने वाला चिली का वामपंथ उसे हरा नहीं पाया, न ही नव-नाज़ी और चिली का भ्रामक दक्षिणपंथ ही उसका कुछ बिगाड़ पाया। हाल ही में अघोषित मिलीभगत से अंजाम दिए गए दमन और नरसंहार को अपवाद मान लें तो लातिन अमरीकी स्टालिनवाद भी उसे पराजित न कर सका, न ही वैश्वीकृत हो चुका लातिन अमरीकी दक्षिणपंथ। अमरीकी विश्वविद्यालय के कैंपसों के तुच्छ (मीडियाकर) लातिन अमरीकी प्रोफेसर उसे शिकस्त नहीं दे पाए, न ही सैंटियागो के गांवों में भटकने वाले जॉम्बिज़। यहां तक कि पार्रा के चेले भी पार्रा को मात देने में कामयाब नहीं हो सके। इन सबके बावजूद और अपने अति-उत्साह में ही सही मैं कहूँगा कि न सिर्फ पार्रा बल्कि उसके भाई-बहन, प्रसिद्धि की चरम पर विराजमान उसकी बहन वायलेता और उसके विद्रोही माता-पिता सभी ने कविता की सार्वकालिक सर्वश्रेष्ठ महत्वाकांक्षाओं में से एक को अपने-अपने व्यवहार में अपनाया है, और वह है, जनता के धैर्य की ऐसी की तैसी।

“सितारे (स्टार्स) कैंसर का इलाज करने में सक्षम हैं, यह एक ग़लतफ़हमी है”, “तुम बंदूक की बात करते हो, मैं याद दिलाना चाहता हूँ कि आत्मा अमर है” अव्यवस्थित ढंग से चुनी गईं ये काव्य-पंक्तियाँ पार्रा की हैं। वह एक फ़कीर की तरह सच्चा है, और हम, कौन जियेगा और कौन मर गया की परवाह किये बिना, चलते चले जा सकते हैं । पार्रा एक मूर्तिकार और विज़ुअल आर्टिस्ट भी है, इसके बावजूद मैं यह याद दिलाता चलूँ कि ऐसे स्पष्टीकरण निहायत बेहूदा हैं। पार्रा एक साहित्यिक आलोचक भी है। उसने चिली के पूरे साहित्यिक इतिहास को एक बार तीन छंदों में समेट दिया: “चिली के महान कवि चार/ तीन हैं:/ एलोन्सो दे अर्थिया और रुबेन दारियो।’’

जैसा कि कथा-साहित्य में हम पहले से ही देख रहे हैं, 21 वीं सदी के आरंभिक वर्षों की कविता एक हाइब्रिड कविता होगी। नए औपचारिक झटकों की ओर संभवतः हम बढ़ भी चुके हैं लेकिन भयावह सुस्ती से लैस। उस अनिश्चित भविष्य में हमारे बच्चे एक कवि, जो कि कुर्सी पर बैठे-बैठे सो जाता है, के ऑपरेटिंग टेबल पर हुए वैचारिक मुठभेड़ पर चिंतन करेंगे और, रेगिस्तान के उस काले पक्षी पर भी विचार करेंगे, जिसका चारा ऊंट की देह से खून चूसने वाला परजीवी हैं। अपने जीवन के अंतिम क्षणों में किसी समय ब्रेटन ने बताया था कि अवैध और गुप्त कारवाईयों के लिए सर्रियलिज़्म की कितनी आवश्यकता है, ताकि शहरों के नालों और पुस्तकालयों को शरणगाह बनाया जा सके। यह कह चुकने के बावजूद दुबारा इस विषय को उसने अपना शरण नहीं बनाया। यह किसने कहा इससे आज कोई फ़र्क नहीं पड़ता है: वह वक़्त कभी नहीं आएगा, जब आतिश-ए-लब ख़ामोश रहे।

 

यह लेख रॉबर्तो बोलान्यो के लेखों, निबंधों और भाषणों के संकलन की पुस्तक के अंग्रेजी अनुवाद Between Parentheses: Essays, Articles and Speeches, 1998-2003  से लिया गया है.

हिंदी अनुवाद: संतोष झा और उदय शंकर

संतोष झा, हिरावल, पटना से सम्बद्ध मशहूर संस्कृति कर्मी, नाट्यकर्मी और अद्भुत संगीतकार हैं, साहित्य में रूचिवश उन्होंने यह अनुवाद किया है. इनसे आप hirawal@gmail.com के द्वारा संपर्क कर सकते हैं.

उदय शंकर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय ,नयी दिल्ली से डॉक्टरेट हैं. हिंदी के शोधार्थी और आलोचक हैं. हिंदी के महत्वपूर्ण आलोचक  सुरेंद्र चौधरी की रचनाओं को तीन जिल्दों में संपादित किया है. इनसे  udayshankar151@gmail.com पर बात की जा सकती है.

निकानोर पार्रा- मक्खियों का देवता : सोलेदाद मरामबियो

चिली के कवि निकानोर पार्रा, जिनकी मृत्यु 23 जनवरी 2018 में हुई, को याद करते हुए सोलेदाद मरामबियो जो कि स्वयं एक लेखिका एवं अनुवादक हैं, ने यह लेख लिखा है. पार्रा दक्षिण चिली में 103 साल पहले पैदा हुए और स्पैनिश भाषा और साहित्य के सबसे सशक्त स्वर बने. वह अकविता के जनक के रूप में जाने जाते हैं, अकविता अपनी बात कहने का वह तरीका है जो स्थापित साहित्यिक मानकों को तोड़ता है साथ ही कविता को रोजमर्रा की जिंदगी, आम बोलचाल की भाषा ओर पॉप कल्चर से जोड़कर नए तरीके से परिभाषित भी करता है. पार्रा एक गणितज्ञ और भौतिकविज्ञानी भी थे.

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Nicanor Parra. Photo by Javier Ignacio Acuña Ditze, 2014. Courtesy of Wikimedia Commons.

निकानोर पार्रा: मक्खियों का देवता

By सोलेदाद मरामबियो 

पार्रा की रचनाओं में अपने समय की सड़ांध और मृत्यबोध को उकेरा गया है, लेकिन यह बाद की बात है. निकानोर पार्रा की पहली किताब बेनाम गाने की किताब (Cancionero sin nombre,1937), फेडरिको गार्सिया लोर्का की शैली से प्रभावित थी. पार्रा की शुरूआती कविताओं में इस स्पैनिश कवि का लय और ताल, साथ ही ग्रामीण परिवेश और दृश्यों की छाप दिखाई पड़ती है. लेकिन जिस ग्रामीण परिवेश का चित्रण लोर्का करता था वह पार्रा के परिवेश से कई मायनों में अलग था. लोर्का का संगीत भले ही उसकी रचनाओं में मौजूद था लेकिन पार्रा की रचनाएँ नितांत ‘चिली’ (चिलियन) थीं, संगीत में तैरने वाले उसके शब्द अलग थे. यह अंतर आप तभी समझ सकते हैं जब आपके पास पार्रा जैसी ही संवेदनशीलता हो, आप उसके ही जूते पहनकर, उसके जाने पहचाने रास्तों पर चहलकदमी किये हों. जल्द ही पार्रा को लोर्कायी लय और ताल से घुटन महसूस होने लगी और उसने इसे त्याग दिया. अतियथार्थवाद, व्हिटमैनियन छंदमुक्ति और काफ्का की अंतर्दृष्टियों को लेकर पार्रा ने अपने लेखन में प्रयोग जारी रखा. ये सारे प्रयोग 1954 में लिखी उसकी किताब कवितायें और अकवितायें (Poemas y Antipoemas)  में एक दूसरे से टकराते हुए दिखते हैं. इसी किताब में मृत्युबोध का संत्रास और सड़ांध उसके विषय बनते हैं.

पार्रा की कवितायें और अकवितायें के प्रकाशित होने के चार साल पहले, पाब्लो नेरुदा की कैंटो जनरल (Canto General) प्रकाशित हुई थी. दरअसल यह किताब अमेरिकी इतिहास का महाकाव्यीय गायन थी. चिली और लातिन-अमरीकी पाठकों के लिए यह महत्वपूर्ण क्षण था. इस समय तक पाब्लो नेरुदा का कद स्पैनिश साहित्यिक समाज में पितातुल्य हो चुका था. कैंटो जनरल में नेरुदा पारंपरिक कविता के छंद को तोड़ कर गद्य की भाषा के करीब आने और सरल भाषा का प्रयोग करने की कोशिश कर रहे थे. पार्रा की विरासत को आसानी से समझने के लिए, ज़रूरी है कि हम पहले नेरुदा को समझें. यह व्यक्तिगत प्रतिद्वंदिता की बात नहीं है क्योंकि नेरुदा पार्रा के अकविता के शुरूआती समर्थकों में से थे. बल्कि बात यह है कि कविता और उसके अवयवों के बारे में हम क्या समझते हैं. इन बिन्दुओं पर नेरुदा और पार्रा एक दूसरे की विपरीत दिशाओं में चलते हैं. यह कहा जा सकता है कि पार्रा इन विषयों पर ज्यादा स्पष्ट था.

नेरुदा ने सरल भाषा में लिखने की कोशिश की, लेकिन उसकी कैंटो जनरल  स्वयं आडम्बरपूर्ण थी. यह किताब लगभग पैगंबरी अंदाज़ में अमरीकी इतिहास (उत्तरी एवं दक्षिणी अमरीका) के पांच सौ सालों का ब्यौरा देती है, जहाँ वह लिखता है कि, “मैं यहाँ कहानी सुनाने आया हूँ|’’ नेरुदा की आवाज़ पैगंबरी भी थी और काव्यात्मक भी. उसके अनुसार उसकी आवाज, सबकी आवाज थी. पार्रा केवल पार्रा रहना चाहता था और आम लोगों से बात करना चाहता था. नेरुदा के कैंटो जनरल  में महाकाव्यात्मक दृश्यों की भरमार है जहाँ वह महाद्वीप के लोगों और उनके भीषण दुखों का वर्णन करता है. वहीं पार्रा अपनी बॉक्सर जैसी चपटी नाक, झड़ते बाल और उन कबूतरों के बारे में लिखता है जो मक्खियों को खा रहे हैं, इसके पहले कबूतरों का चित्रण कविताओं में अनंत की तरफ़ उड़ते हुए पक्षी के रूप में किया जाता रहा है. अपने लेखन द्वारा पार्रा ने कविता में भद्देपन, गंदगी, मटमैले जूतों को चित्रित किया. वह गरीबों की, भीड़ की अभिव्यक्ति नहीं बनना चाहता था बल्कि वह उनमें से ही एक बनना चाहता था. इसलिए उसके शब्द आम थे, उसके परिदृश्य और कथानक ऐसे थे जो आपको किसी भी रास्ते के चौराहे पर, पार्कों में, गंदी चादरों के बीच, रोजमर्रा की जिंदगी के तहों में मिल जायेंगे|

कविताएं और अकविताएं की कविता पाठकों को चेतावनी (Warning to the Reader) को पढ़कर हम पार्रा के रचनाकर्म को समग्रता में समझ सकते हैं. इस कविता में पार्रा पाठकों को सचेत करता है कि वह अपने लेखन से पैदा हुए असहजता का उत्तर नहीं देगा. वह यह भी बताता है कि उसकी कविता में पाठक ‘इन्द्रधनुष’ या ‘दर्द’ जैसे शब्द नहीं पायेंगे. ये शब्द अनुपस्थित हो सकते हैं, हालाँकि मैंने तथ्यात्मक जांच तो नहीं की, लेकिन उसकी रचनाओं में दर्द मौजूद है. ये दर्द उसके चुटकलों के बीच, आम बातचीत में तैरता रहता है. पार्रा का ‘दर्द’ रोजमर्रा की जिंदगी से उपजा हुआ दर्द है- थकान, ग़रीबी, इर्ष्या, अधूरा प्यार, सतही प्यार, मृत्यु और इन सब की विसंगति और असहजता. पार्रा को उन लोगों से उबासी महसूस होती है जो यह सोचते हैं कि कविता दरअसल बड़े-बड़े विषयों और बड़ी-बड़ी बातों के लिए होती है. उसने स्पैनिश भाषा की कविता को आधुनिक बनाने के साथ ही इसकी दुरुहता को दूर करते हुए अधिक व्यापक बनाया. वह लेखन में क्रांति लाना चाहता था, वह साहित्यिक समाज के पवित्र गायों (sacred cows) द्वारा पैदा किये गए मक्खन-काव्य (fat poetry) के खिलाफ़ था. विडंबना यह है कि आज पार्रा खुद एक पवित्र गाय (sacred cow) बन गया है, लेकिन हम उसे एक ऐसे गाय के रूप में देख सकते हैं जो अपने तबेले को छोड़कर पोलिश जंगलों में एक जंगली बाइसन के साथ रहने के लिए आ गया है. पार्रानुमा गाय जंगली रास्तों पर दूर निकल गया है, जिसका बहुतों ने अनुगमन किया.

संतियागो के प्रधान गिरिजाघर (कैथ्रेडल) में अंतिम संस्कार के समय पादरी (प्रिस्टस) उसकी आखिरी इच्छा पूरी नहीं करना चाहता था. पार्रा चाहता था कि चिली की शानदार लोक गायिका विओलेता, जो कि उसकी अपनी बहन थी, के गीतों के साथ उसकी विदाई की जाय. पादरी का कहना था कि वियोलेटा के गीत ऐसे पवित्र स्थल पर नहीं गाये जा सकते. उसी वक्त पार्रा की एक बेटी ने पादरी से माइक्रोफ़ोन को छीनते हुए वहां पर उपस्थित लोगों को यह बात बताई और कहा कि वियोलेता का गीत यदि नहीं होगा तो उनका परिवार पार्रा के पार्थिव शरीर को वहां से लेकर चला जायेगा. थोड़ी देर में ही चर्च के स्पीकरों से शुक्रिया जिन्दगी! (Gracias a la vida) का स्वर गूंजने लगा. इस गीत के बजने के साथ ही वहां का परिवेश कविता, नृत्य और आम जिंदगी के दृश्यों के साथ भर गया. पार्रा ने अपने लेखन द्वारा इस भनभनाहट को अंदर आने दिया, जिसके लिए हम उसके शुक्रगुजार हैं.

सोलेदाद मरामबियो चिली (संतियागो) की लेखिका एवं अनुवादक हैं. अगली डक्लिंग प्रेस से उनकी दो किताबें अभी हाल में ही दो भाषाओं में प्रकाशित हुई हैं. इनका काम समय-समय पर ग्रांटा, जम्प्स्टर जैसी पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहा है. 2016 तक ब्रूतस एवितोरस  (Brutas Editoras) की संपादक रह चुकी हैं. पिछले साल उनको अपने पहले उपन्यास को पूरा करने के लिए चिली के नेशनल कौंसिल फॉर द आर्ट्स एंड कल्चर की तरफ से अनुदान प्राप्त हुआ है.

इसके हिंदी अनुवाद के लिए तिरछीस्पेल्लिंग जेएनयू के शोधार्थी रविरंजन सिंह का आभारी है. रविरंजन मूलतः हिंदी नाटक और भक्ति काव्य संसार के दरम्यान सक्रीय रहते हैं.  raviranjansingh.pbh@gmail.com  के माध्यम से आप इन्हें संपर्क कर सकते हैं.

इस लेख का मूल वर्ड्स विदाउट बॉर्डर्स पर देख सकते हैं. वहीं से इसे साभार लिया गया है.

मुक्तिबोध के बहाने रचना और आलोचना के अंतर्संबंधों की पड़ताल: प्रो.राजकुमार

मुक्तिबोध के बहाने प्रो. राजकुमार एक बहस की धारावाहिकता में गहरे विश्वास के साथ उतरे हैं. इस सीरिज का पहला  और दूसरा लेख  आप पढ़ चुके हैं, तीसरा यहाँ प्रस्तुत है.

दूसरा लेख इस मायने में विशेष रहा कि सोशल साइट्स पर  इससे संदर्भित  विषद  प्रतिक्रियाएं  देखने  को  मिलीं. लेकिन ज्यादातर प्रतिक्रयाएं  अवांतर प्रसंगों  में उलझी  रहीं. और लेख की  मूल  आत्मा से बहस को भटकाने की कोशिश की  गयी. प्रो.राजकुमार  की यह विशेषता  है कि  अवांतर प्रसंगों में उलझने  के बजाय  अपनी  निरंतरता / धारावाहिकता कायम रखते हैं.  उम्मीद  है कि  यह सीरिज लम्बी चलेगी. #तिरछीस्पेल्लिंग 

Muktibodh By Haripal Tyagi

Muktibodh By Haripal Tyagi

आलोचना और रचना

By प्रो.राजकुमार

हिन्दी में आलोचना को परजीवी कहने का चलन रहा है। इधर कुछ ‘सर्जनात्मक‘ किस्म के ‘आलोचकों’ ने आलोचना को परजीवी के कहने के बजाय प्राध्यापकीय कहना शुरू कर दिया है। आलोचना अच्छी या बुरी तो हो सकती है और होती भी है; जैसे रचना अच्छी या बुरी हो सकती है, होती है, लेकिन प्राध्यापकीय आलोचना किस बला का नाम है? ‘जिसे प्राध्यापक लिखे वह प्राध्यापकीय आलोचना’!

रामचन्द्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, रामविलास शर्मा और नामवर सिंह- हिन्दी के चार बड़े आलोचक और चारों के चारों प्राध्यापक! हिन्दी आलोचना के इतिहास की इनके बिना कल्पना ही नहीं की जा सकती। हिन्दी ही नहीं, समूची दुनिया में आलोचना, समाज विज्ञान और विज्ञान के इतिहास की कल्पना विश्वविद्यालय के बिना असंभव है। लेकिन ये सारा ज्ञान-विज्ञान और साहित्य-सिद्धान्त इन सर्जनात्मक आलोचकों की दृष्टि में प्राध्यापकीय होने के कारण त्याज्य है।

हिन्दी में यह धारणा बद्धमूल रही है कि आलोचना दोयम दर्जे का काम है। अस्ल चीज है रचना। रचना मौलिक सृजन है और आलोचना उस पर आश्रित परजीवी, जिसकी हैसियत लाल बुझक्कड़ से अधिक नहीं।

आधुनिक आलोचना की जिस ढब पर शुरुआत हुई, उससे इस धारणा को बल भी मिला। परजीवी की छवि से मुक्ति पाने की छटपटाहट में आलोचक का नया रूप सामने आया जिसे अंग्रेजी में ‘स्कॉलर क्रिटिक’ कहा गया है। स्कॉलर क्रिटिक की छवि अपने यहाँ हजारी प्रसाद द्विवेदी पर बहुत सटीक बैठती है। मध्यकालीन संस्कृति और बौद्धिक परम्परा के गम्भीर अध्येता जिन्होंने आधुनिक रचनात्मकता पर बहुत कम लिखा। स्कॉलर क्रिटिक की परम्परा का विकास आगे चलकर संस्कृति के आलोचक के रूप में हुआ। सांस्कृतिक आलोचक के अध्ययन का दायरा साहित्य तक सीमित नहीं रह गया। वह समूची संस्कृति का आलोचक बन गया। साहित्य संस्कृति का पर्याय नहीं है, संस्कृति का एक हिस्सा है। सांस्कृतिक आलोचना समग्र सांस्कृतिक गतिविधि के परिप्रेक्ष्य में ही संस्कृति के इस साहित्य वाले हिस्से का अध्ययन करती है। सांस्कृतिक आलोचना की सार्थकता का विश्लेषण करते हुए टेरी इगल्टन ने तो साहित्य के विभागों का नाम ही सांस्कृतिक-अध्ययन विभाग रख देने की सलाह दी थी। सांस्कृतिक आलोचना उस दौर की उपज थी, जब सिद्धान्त-निर्माण का बोलबाला था, हर छोटा-बड़ा आलोचक थियरी बनाने में लगा था। थियरी ज्ञान मीमांसा और सत्तामीमांसा के एक अंग के रूप में साहित्य और संस्कृति का अध्ययन करती थी। थियरी की बाढ़ अब उतर चुकी है और साहित्य की सापेक्ष स्वायत्तता और स्वकीयता को नये सिरे से समझने की कोशिश चल पड़ी है, किन्तु इस समूचे घटनाक्रम से यह अभिज्ञान तो हो ही गया कि साहित्य को ज्ञानमीमांसा और सत्तामीमांसा के परिप्रेक्ष्य में ही ठीक से समझा जा सकता है। मुक्तिबोध के शब्दों में कहें तो साहित्य-समीक्षा सभ्यता-समीक्षा भी है। सभ्यता-समीक्षा के दायित्व से सम्पृक्त होकर ही साहित्य-समीक्षा सार्थक हो सकती है। यह कहना ठीक नहीं होगा कि मुक्तिबोध से पहले साहित्य-समीक्षा के इस गुरुतर दायित्व का एहसास हिन्दी में किसी को था ही नहीं। किन्तु मुक्तिबोध को इस बात का श्रेय अवश्य दिया जाना चाहिए कि उन्होनें साहित्य-समीक्षा को सही मायने में सभ्यता-समीक्षा के रूप में विकसित और स्थापित किया। यह काम उन्होंने उस समय किया जब साहित्य में आधुनिकतावाद का बोलबाला था और उसकी स्वायत्तता का बढ़ चढ़कर बखान किया जा रहा था। यह वही समय था जब पुराने ढंग की ‘मार्क्सवादी आलोचना’ साहित्य की स्वायत्तता के तर्क का ठीक-ठीक जवाब नहीं दे पा रही थी। लेकिन मुक्तिबोध के आलोचनात्मक लेखन पर बात आगे बढ़ाने से पहले रचना और आलोचना के सम्बन्ध को लेकर जो चर्चा शुरू हुई थी, उस पर दोबारा लौटें।

उल्लेखनीय है कि सॉस्यूर के भाषा-विषयक चिन्तन से प्रेरित संरचनावाद ने साहित्यिक आलोचना को एक मुकम्मल शास्त्र में तब्दील करने की कोशिश की और इस प्रक्रिया में साहित्य के मूलभूत नियमों को खोज निकालने का दावा किया। आलोचना को परजीवीपन से ऊपर उठाकर विज्ञान के समकक्ष खड़ा कर देने की मुहिम से पहले नॉर्थाप फ्राई अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘एनॉटमी ऑफ़ क्रिटिसिज्म’ में ऐसा उद्यम कर चुके थे। फ्राई के विचार रचना और आलोचना के अंतर्संबंधों को समझने की दृष्टि से महत्वपूर्ण है, इसलिए उनकी संक्षेप में चर्चा अप्रासंगिक न होगी।

यह धारणा, कि रचनाकार ही रचना के साथ ‘न्याय‘ कर सकता है, मानकर चलती है कि आलोचक परजीवी है, जबकि सच्चाई यह है कि आलोचना एक स्वतंत्र विद्या है जो साहित्य का अध्ययन करती है, जैसे विज्ञान वस्तु जगत अध्ययन करता है। आलोचना के अपने नियम कायदे और सिद्धान्त हैं। फ्राई के अनुसार रचनाकर-आलोचक के लिए अपनी रचनात्मक अभिरूचि से ऊपर उठ पाना प्रायः असंभव होता है। छोटे-मोटे लोगों की तो बात ही क्या टी.एस. इलियट जैसे प्रतिभाशाली व्यक्तित्व का भी आलोचनात्मक विवेक काफी कुछ उनकी रचनात्मक अभिरूचि से निर्धारित दिखता है। रचनाकार का अपने और दूसरों के बारे में लेखन दिलचस्प तो हो सकता है लेकिन उसे अन्तिम और आधिकारिक लेखन नहीं कहा जा सकता। अक्सर रचनाकार अपने लेखन के भी ख़राब आलोचक साबित हुए हैं। प्रमाण स्वरूप अनेकों उदाहरण दिये जा सकते हैं। फ्राई के मुताबिक ‘जब रचनाकार आलोचक की तरह बोलने लगता है तब वह आलोचना नहीं, दस्तावेज़ निर्मित करता है। इस दस्तावेज़ का आलोचक द्वारा परीक्षण अपेक्षित होता है। सामान्य रूप से यह माना जाता है कि रचयिता के मुक़ाबले आलोचक रचना के महत्व का बेहतर निर्णायक होता है। यह धारणा चली आ रही है कि आलोचक को रचना का अन्तिम निर्णायक मानना हास्यास्पद है, जबकि व्यवहार में यह स्पष्ट है कि वही (आलोचक) रचना का अन्तिम निर्णायक होता है। इसका कारण निश्चयात्मक (Assertive) लेखन और साहित्यिक लेखन में विभेद न कर पाने की असमर्थता है। वर्णानात्मक-निश्चयात्मक लेखन की उत्पत्ति सक्रिय इच्छा-शक्ति और सचेत मस्तिष्क से होती है और ऐसा लेखन मुख्य रूप से कुछ ‘कहने‘ से ताल्लुक़ रखता है।

जैसा कि पहले कहा गया, फ्राई के बाद संरचनावाद आया। संरचनावाद ने साहित्य के मूलभूत सिद्धान्तों, रूढ़ियों, और परम्पराओं को खोज निकालने का दावा किया। आलोचना शास्त्र बन गई, बल्कि जोनाथन कूलर के शब्दों में कहें तो काव्यशास्त्र, संरचनावादी काव्यशास्त्र। और फिर आया उत्तर संरचनावाद, उसने इस तरह के शास्त्र-सिद्धान्त निर्माण की संभावना को सिरे से खारिज कर दिया, लेखन की परम्परागत कसौटियों और श्रेणी विभाजन को तोड़ दिया, और विधाओं की मर्यादा और स्वायत्तता को मानने से इन्कार कर दिया। साहित्य की साहित्यकता का बखान जिन गुणों के आधार पर किया जाता था, वे सभी गुण, विश्लेषण करने पर पता चला, गैर साहित्यिक लेखन में भी मौजूद हैं। निष्कर्ष यह निकला कि साहित्यिक लेखन में ऐसा कोई आभ्यन्तिरक गुण नहीं जो गैर साहित्यिक लेखन में मौजूद न हो। दोनों में फर्क सिर्फ प्रकार्य (Function) और रूढ़ि से पैदा होता है। तात्विक और आधारभूत भिन्नता वस्तुतः सांस्कृतिक निर्मिती है और उसे विखण्डित करने की ज़रूरत है। फिर क्या था स्त्री-पुरूष (प्रकृति-संस्कृति) की तरह रचना और आलोचना की द्विआधारी अवधारणा को भी खण्डित करने की आवश्यकता महसूस हुई। इहाब हसन ने अपनी पुस्तक ‘पैराक्रिट्सिज्म’ में इस जरूरत को पूरा कर दिया। हसन ने दिखाया कि रचना और आलोचना में कोई तात्विक और आधारभूत अन्तर नहीं है। जो अन्तर है वह सांस्कृतिक निर्मित है और उसे तोड़ देने में ही दोनों का भला है।

‘आलोचना भी रचना है कहने में रचना की श्रेष्ठता कायम रहती है, जैसे झाँसी की रानी को मर्दानी कहने में मर्द की श्रेष्ठता कायम रहती है। उत्तर संरचनावाद में श्रेष्ठता के इस तात्विक और बुनियादी आधार को विखण्डित कर अस्मिता और विधा की स्वायत्तता को ही समस्याग्रस्त बना देता है। यहाँ भिन्नता का महत्व है लेकिन यह भिन्नता तात्विक और बुनियादी किस्म की नहीं है। इस भिन्नता के आधार पर किसी को हीन या श्रेष्ठ नहीं ठहराया जा सकता है।

अब न तो व्यक्ति की स्वायत्तता का कोई पैरोकार बचा है और न ही कला और साहित्य का। ये सभी पाठ (Text) हैं और ये पाठ परस्पर सम्बद्ध (Intertextual) हैं। परस्पर सम्बद्धता का मतलब है कि कोई भी पाठ पूर्णतः मौलिक नहीं है, दूसरे पाठ से जुड़ा हुआ उस पर निर्भर है। इसका निहितार्थ यह भी है कि सभी पाठ बराबर हैं। लब्बोलुआब यह कि रचना और आलोचना के बीच खड़ी दीवार ढह चुकी है। रचना आलोचनात्मक हो गई है और आलोचना रचनात्मक।

यह एहसास भले ही नया हो किन्तु सच्चाई यही है कि श्रेष्ठ आलोचना और रचना में ऐसा आत्यान्तिक भेद कभी था ही नहीं। मुक्तिबोध एक ऐसे लेखक हैं जिनका लेखन रचना और आलोचना के बीच की पारस्परिक सीमाबद्धता को लगातार समस्याग्रस्त बनाता है। उनकी कविताएँ, कहानियाँ और लेख विधाओं के पारम्परिक चौखटे में फिट नहीं बैठते। कविता में वे थीसिस लिखते हैं और उनके लेखों में ऐसे टुकड़े ख़ूब मिल जायेंगे जिन्हे मज़े से कविता में खपाया जा सकता हैं। उनकी कहानियाँ ऐसी हैं जिनमें रेखाचित्र, लोक-नीति-कथा और निबन्ध के गुण घुले-मिले हैं। ‘एक साहित्यिक की डायरी’ को क्या कहेंगे? रचना या आलोचना? मुक्तिबोध पारम्परिक किस्म के आलोचक नहीं हैं। वस्तुतः आलोचना उनके सम्पूर्ण लेखन का अभिन्न हिस्सा है, कोई आपदधर्म नहीं। कुछ लोग सोचते हैं कि अपने विरोधियों और साहित्य के दरोगा अर्थात् आलोचकों को जवाब देने के लिए उन्होंने आलोचना को आपद् धर्म के रूप में चुना। इस बात में आंशिक सच्चाई हो सकती है किन्तु उन्हें ध्यान से पढे़ं तो यह बात समझ में आ जाती है कि उनका लगभग समूचा लेखन ही बहस मुबाहिसे से बना है। यह बहस विरोधियों से ही नहीं होती, विरोधियों से भी ज्यादा स्वयं से होती है। इसलिए आलोचना उनके लेखन का आपदधर्म नहीं स्वधर्म है। उनका रचनात्मक लेखन भी एक प्रकार की आलोचना है, सभ्यता-समीक्षा है। कविता में थीसिस लिखने की उनकी प्रतिश्रुति का मतलब हैः कविता में सभ्यता-समीक्षा लिखना।

इसलिए मेरा खयाल है कि मुक्तिबोध के आलोचनात्मक लेखन की चर्चा करते समय हमें सिर्फ उनके ‘आलोचनात्मक लेखन’ पर ध्यान नहीं देना चाहिए क्योंकि उनके ‘आलोचनात्मक चिन्तन’ के कई मोती उनकी रचनाओं में डूबे हुए हैं। मैं उनके आलोचनात्मक चिन्तन के कुछ ऐसे ही पक्षों का यहाँ उल्लेख करना चाहूँगा। मैं जानता हूँ कि यह काम आसान नहीं है फिर भी कुछेक प्रसंग आपके समक्ष रखता हूँ।

अक्सर कहा जाता है कि रचना का मर्म तो रचनाकार ही जानता है। इसलिए यदि रचना का ‘असली’ अर्थ जानना है तो रचनाकार से पूछो। आलोचक तो बाहरी व्यक्ति है वह रचना के साथ न्याय नहीं कर सकता। यह बात भी सिद्ध हो चुकी है कि लेखक अपनी रचना (कहानी, कविता, उपन्यास, आलोचना…) का अन्तिम और अधिकारिक व्याख्याकार नहीं हो सकता। क्योंकि, रचना केवल वही नहीं कहती जो लेखक कहलाना चाहता है, बहुत कुछ ऐसा भी कहती है जो वह नहीं कहलाना चाहता। यही नहीं, रचना का अर्थ पाठक और संदर्भ बदलने के साथ बदल जाता है। वस्तुतः रचना जन्म लेने के बाद रचनाकार से स्वतंत्र हो जाती है और सामाजिक जीवन का हिस्सा बन जाती है। सामाजिक जीवन को प्रभावित करती है और सामाजिक जीवन से प्रभावित होती है। कालजयी रचनाओं की जीवन-यात्रा लम्बी होती है। मामूली रचनाएं अपने रचयिता से विलग होने के बाद शीघ्र ही कालकवलित हो जाती हैं क्योंकि उनमें बदलते हुए संदर्भ में पुनर्नवता की संभावना नहीं होती। जिसे अपनी सामर्थ्य पर भरोसा नहीं होता वह रचना को सीने से चिपकाए ‘असली’ अर्थ न समझ पाने के लिए पाठकों-आलोचकों को कोसता रहता है। आलोचना को प्राध्यापकीय कहकर गरियाने वाले ज्यादातर स्वनामधन्य रचनाकार इसी कोटि में आते हैं। मुक्तिबोध को अपनी रचनात्मक सामर्थ्य पर भरोसा था। इसीलिए वे मानते हैं कि कविता पूर्ण हो जाने के बाद कवि से स्वतंत्र जीवन जीने लगती हैः

नहीं होती, कहीं भी ख़त्म कविता नही होती

कि वह आवेग त्वरित काल यात्री है।

व मैं उसका नहीं कर्ता,

पिता-धाता

कि वह कभी दुहिता नहीं होती,

परम स्वाधीन है वह विश्वशास्त्री है।

गहन-गम्भीर छाया आगमिष्यत् की

लिए, वह जनचरित्री है।

नये अनुभव व संवेदन

नये अध्याय-प्रकरण जुड़

तुम्हारे कारणों से जगमगाती है

व मेरे कारणों से सकुच जाती है।

कहने की आवश्यकता नहीं कि कविता (रचना) रचयिता से मुक्त होकर अपना भावी जीवन प्रारम्भ करती है और फिर उसमें नये अनुभव एवं संवेदन जुड़ते चले जाते हैं। जिस रचना में ऐसी सामर्थ्य होती है वही कालजयी कहलाती है; बाकी रचनाएं रचनाकार के साथ ही कालकवलित हो जाती है।

रचना जन्म के बाद रचनाकार से स्वाधीन हो जाती है, यह बात समझाने के लिए शायद ज़्यादा मशक्कत की जरूरत नही; लेकिन इसी से जुड़ा हुआ सवाल है, रचनाकार और रचना के सम्बन्ध का। यह सवाल ज़्यादा उलझा हुआ है और इसका संतोषजनक समाधान खोज निकालना आसान नहीं। उल्लेखनीय है कि मुक्तिबोध के समय में भी इस सवाल पर बहस हुई थी। अज्ञेय ने इलियट के वज़न पर भोक्तामन और सृष्टा-मन तथा जीवनाभूति और सौंदर्यानुभूति में विभेद किया था। मुक्तिबोध ने इस अवधारणा का ज़ोरदार खण्डन करते हुए भोक्ता-मन एवं स्रष्टा-मन के ऐक्य पर ज़ोर दिया था। ऐक्य का विशद विश्लेषण करते हुए उन्होंने सौन्दर्यानुभूति को जीवनानुभूति से गुणात्मक रूप से भिन्न माना। इस बात का निहितार्थ यह है कि रचना को जीवन का ‘बाइप्रोडक्ट’ नहीं कहा जा सकता। रचना और रचनाकार के बीच कोई प्रत्यक्ष, पारदर्शी और निष्क्रिय सम्बन्ध नहीं होता। रचना प्रक्रिया के मुक्तिबोध द्वारा किये गये विश्लेषण से इस बात की पुष्टि होती है। वस्तुतः रचना एक सचेत कर्म है और रचना के दौरान रचनाकार अपनी सोच के मुताबिक अनुभव को काटने-छाँटने एवं सम्पादित करने के लिए ‘स्वतंत्र’ होता है। किंतु यह स्वतंत्रता भी सापेक्षिक ही है। क्योंकि रचनाकार की स्वतंत्रता को सामाजिक स्थिति, अवचेतन, जड़ीभूत सौंदर्याभिरूचि जैसे कई कारण जाने-अनजाने प्रभावित करते हैं। फिलहाल इस तफ़सील में न जाकर सिर्फ़ भाषा चरित्र के बारे में बात करते हैं। औसत समझ के विपरीत भाषा आइने की तरह कोई पारदर्शी और निष्क्रिय माध्यम नहीं है जिसके आर-पार देखा जा सके। भाषा एक स्वायत्त संकेतप्रणाली है, जिसके अपने नियम-कायदे हैं। जीवन-जगत् का बोध भाषा में ही संभव होता है। इसका मतलब यह है कि भाषा सिर्फ़ साधन नही है, उसके बिना बाहर जीवन-जगत् का बोध संभव ही नही। जीवन-जगत् का बोध भाषा के रास्ते से गुज़रता है। और चूँकि भाषा दर्पण की तरह कोई निष्क्रिय पारदर्शी माध्यम नही है, भाषा अपना खेल दिखाती है। फ़ैज के शब्दों में कहें तो ‘बात बदल-बदल जाती है।’ कहना चाहते हैं कुछ और कह जाते हैं कुछ और।

भाषा का यह खेल जीवन-जगत् के बोध के समय ही नहीं, रचना-प्रक्रिया के दौरान भी चलता रहता है। यही नहीं जब रचना पूर्ण हो जाने पर पाठक से रूबरू होती है तब भी भाषा का यह खेल जारी रहता है। यही कारण है कि अलग-अलग देशकाल के पाठक/आलोचक एक ही रचना का अर्थ अलग-अलग ढंग से करते हैं। यदि ऊपर कही गयी बातें सही हैं तो फिर यह मानना पड़ेगा कि रचना रचनाकार के जीवन की प्रत्यक्ष और पारदर्शी अभिव्यक्ति नहीं है। मुक्तिबोध के शब्दों में सौन्दर्यानुभूति जीवनानुभूमति से गुणात्मक रूप से भिन्न चीज है; पूर्णतया पृथक न सही, किन्तु प्रतिरूप भी नहीं। सौन्दर्यानुभूति को जीवनानुभूति से गुणात्मक रूप से भिन्न बताने के बाद मुक्तिबोध को लगा कि कई दफा रचनाकार सिर्फ स्वाँग भरता है, वास्तव में वैसी अनुभूति उसके जीवन में होती नहीं। जैसे अभिनेता पात्रों का अभिनय करता है वैसे वह सिर्फ अभिनय कर रहा होता है। नयी कविता में ऐसा स्वाँग खूब दिखायी पड़ता है। मुक्तिबोध ने लिखा है कि महादेवी वर्मा की कविताओं में दुख की भरमार है लेकिन महादेवी ने स्वयं स्वीकार किया है कि उनका जीवन वैसा दुखमय नहीं था जैसा कि उनकी कविताएं पढ़ने पर प्रतीत होता है।

उल्लेखनीय है कि रोलां बार्थ भी लेखन को स्वांग ही मानते हैं, भले ही इस शब्द का इस्तेमाल न करते हों। उन्होंने ब्रेख्त के नाट्य-सिद्धान्त का उल्लेख करते हुए लिखा है कि जैसे ब्रेख्त के यहाँ अभिनेता, जिस पात्र का अभिनय करता है, उससे तादात्म्य स्थापित नहीं करता, वैसे ही ब्रेख्तियन अंदाज में अपने बारे में बोलता हूँ। यहाँ बोलने (लिखने वाले) ‘मैं’ और वास्तविक ‘मैं’ में दूरी बनी रहती है; ‘उसे जीने के बजाय दिखाता हूँ।’ लेखन इमेज सिस्टम का प्रदर्शन है। अपने काल्पनिक आत्म से दूरी बनाए रखते हुए और साथ ही अन्य के परिपे्रक्ष्य से उसका निरीक्षण करते हुए उसकी विभिन्न भूमिकाओं का डिमान्स्ट्रेशन या रिहर्सल है। जरूरत के मुताबिक लगाया गया मुखौटा है। जाहिर है कि मुक्तिबोध लेखन को स्वांग मानने के हिमायती नहीं, बल्कि लेखन और जीवन में एकता के पक्षधर थे। फिर भी वे किसी स्थायी, स्वायत्त, आत्मपूर्ण और सुसमन्वित व्यक्ति-अस्मिता की अवधारणा को भी स्वीकार नहीं करते। जबकि अज्ञेय ‘नदी का द्वीप’ में इसके ठीक विपरीत, एक स्वायत्त, आत्मपूर्ण एवं स्थायी व्यक्ति-अस्मिता की अवधारणा पेश करते हैं। उत्तर आधुनिक सिद्धान्तकार व्यक्ति-अस्मिता की ऐसी अवधारणा को तो मिथ या फिक्शन मानते ही हैं, फ्रेडरिक जेम्सन जैसा वामपंथी विचारक भी उनकी इस बात के लिए तारीफ़ करता है कि उन्होंने आत्म-पूर्ण समन्वित आत्म की अवधारणा को छिन्न-भिन्न कर दिया। मुक्तिबोध के यहाँ आत्म की अस्मिता स्वयं-सम्पूर्ण और स्थिर नहीं है, बल्कि बाहरी दबाव और भीतरी (परस्पर विरोधी) आग्रहों से लगातार संशय-ग्रस्त, अनिर्णीत, विरोधाभासी और परिवर्तनशील है। परम अभियक्ति या अरूण कमल की तलाश तो निरन्तर है, लेकिन झूठे समन्वय या शिलीभूत सामंजस्य के मर्म को भी वे बख़ूबी समझते हैं। मुक्तिबोध की कविता लगातार यह दिखाती है कि व्यक्ति की अस्मिता ‘नदी के द्वीप’ की तरह स्थिर नहीं होती। जैसे विचारधारा के भीतर से एक प्रच्छन्न विचारधारा झाँकती दिखाई पड़ती है, वैसे ही एक व्यक्ति के भीतर एक और व्यक्ति की मौजूदगी का एहसास होता रहता है। इन दोनों के बीच अनवरत संवाद चलता रहता है। यह संवाद अस्मिता के किसी स्वायत्त-आत्मपूर्ण (नदी का द्वीप जैसी) अवधारणा को नकारता है। मुक्तिबोध के यहाँ अस्मिता की अवधारणा जिस रूप में आती है, कई मायनों में वह जूलिया क्रिस्तेवा की ‘threshold’ की अवधारणा से मिलती जुलती है। उल्लेखनीय है कि क्रिस्तेवा के यहाँ चेतन और अवचेतन के बीच चौहद्दी लगातार बदलती रहती है, क्योंकि इनके बीच निरन्तर संवाद चलता रहता है। अस्मिता का कोई भी रूप अन्तिम और पूर्ण नहीं होता। पूर्णता स्वप्न में तो संभव है लेकिन यथार्थ में नहीं, मुक्तिबोध यह समझते थे।

यदि अस्मिता का कोई भी रूप पूर्ण और अन्तिम नहीं है तो उसमें सकारात्मक और नकारात्मक परिवर्तन भी संभव हैं। यही कारण है कि कल तक आग उगलने वाले मृत ज्वालामुखी बन जाते हैं और रावण के घर पानी भरने लगते हैं। कोई ज़रूरी नहीं कि रचनाकार अपने इस रूप को रचना में प्रस्तुत करे ही। अनुभव, संवेदना और कल्पना का सहारा लेकर वह स्वांग भी भर सकता है। मार्सेल प्रूस्त ने लिखा है कि पुस्तक में सामने आने वाला व्यक्तित्व और सामाजिक जीवन में दिखाई पड़ने वाला व्यक्तित्व अलग-अलग होते हैं। इलियट के कथन से हम वाकिफ़ ही हैं, उसे दोहराने की ज़रूरत नहीं। अब जबकि आत्मकथा को भी लेखक के जीवन की सीधी पुनर्प्रस्तुति मानने के बजाय लेखक के जीवन का सृजित गल्प माना जा रहा है, रचना को लेखक के जीवन का पर्याय मानने का कोई तुक नहीं। यह ठीक है कि कुछ रचनाकारों के जीवन और रचना में पर्याप्त समानता दिख सकती है, किंतु सर्वत्र ऐसा हो, यह ज़रूरी नहीं। लेखन एक विशिष्ट लीला कर्म हैं, रचनाकार के सम्पूर्ण व्यक्तिगत सामाजिक जीवन का लेखा-जोखा नहीं। लेखन और रचनाकार के जीवन में संगति की अपेक्षा एक आदर्श के रूप में ठीक है, लेकिन अक्सर ऐसी संगति होती नहीं है। आलोक धन्वा या वी.एस. नयपाल अपवाद नहीं है; बात सिर्फ़ यह है कि उनके जीवन की कुछ बातें सामने आ गयीं, और हम छाती पीटने लगे। चोरी तो ज़्यादातर लोग करते हैं लेकिन चोर वही कहलाता है जो चोरी करते पकड़ा जाय और जिसे सज़ा मिले। इसलिए बेहतर यही होगा कि रचनाकार की रचना और जीवन दोनों को देखा जाय। लेकिन मुसीबत यह है कि रचनाकार का जीवन, विशेष रूप से व्यक्तिगत जीवन, पाठक की पहुँच से बाहर है। वह तो उतना ही देख सकता है जितना दिखाने के लिए लेखक तैयार हो। वैसे इस मामले में वी.एस.नयपाल की दाद देनी पड़ेगी। उन्होंने माना है कि लेखक के जीवन की पड़ताल करने की चाहत बिल्कुल वैध है। उन्होंने कहा है कि लेखक के जीवन का व्योरा अन्ततः लेखक की पुस्तक से बेहतर साहित्यिक कृति साबित हो सकता और अपने समय के सांस्कृतिक ऐतिहासिक पक्ष को ज्यादा गहराई से आलोकित कर सकता है। इसलिए यदि मुक्तिबोध दिमागी गुहांधकार में झाँकने की कोशिश करते थे और बाह्य संघर्ष के साथ-साथ आत्म संघर्ष पर इतना जोर देते थे, तो क्या ग़लत करते थे, अब तक के अनुभव ने हमें यही सिखाया है कि मानव-मस्तिष्क बहुत जटिल है और तर्क-विवेक को अक्सर चकमा दे जाता है। वह सामाजिक-आर्थिक स्थितियों से निरपेक्ष नही है, लेकिन उसे सामाजिक-आर्थिक स्थितियों में निःशेष (Reduce) भी नहीं किया जा सकता।

देखिये बात कहाँ से कहाँ पहुँच गई। क्या लिखने चला था और क्या लिख गया! अभी तो लगता है कि सिर्फ़ भूमिका ही बनी है। जो बातें लिखना चाहता था वे तो रह ही गईं।

राजकुमार जी

प्रो॰राजकुमार

शोर-शराबे से दूर अध्ययन-अध्यापन में मग्न रहने  वाले युवा-तुर्क हिन्दी आलोचक। भक्ति साहित्य, हिन्दी नवजागरण, आधुनिकता, आधुनिक साहित्य, प्रेमचंद, हिन्दी कहानी इत्यादि पर लगातार लेखन। किताबों में जैसी रुचि इनकी  है,  वह अन्यत्र दुर्लभ ही हो गई है। फिलहाल, बी॰एच॰यू॰ के हिन्दी विभाग में प्राध्यापक।इनसे dr.kumar.raj@gmail.com पर संपर्क संभव।

 

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