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‘रईस’ की तुलना में ‘काबिल’ अच्छी फिल्म है: तत्याना षुर्लेई

 

“रईस” की तुलना में मैं “काबिल” की ओर हूँ. यह फ़िल्म “रईस” से अच्छी इसलिए है कि “काबिल” यह दिखावा नहीं करता है कि वह कुछ नया और आर्टिस्टिक दिखानेवाला है. दोनों फिल्मों को देखकर फिर से यह दोहराना पड़ेगा कि अगर किसी को बारीक सिनेमा बनाना नहीं आता है तो उसे मुख्यधारा में ही रहना चाहिए. मुख्यधारा और मनोरंजन कोई कमतर जगह नहीं है और ऐसी फिल्मों की बड़ी ज़रुरत है. “काबिल” में कुछ न कुछ कमियां तो हैं लेकिन “रईस” से अच्छी इसलिए लगती है कि यह अपने दर्शकों के प्रति फेयर और फ्रैंक है. इसका ट्रेलर भी किसी को धोखा नहीं देता है. सब को पता है कि यह मनोरंजन के लिए बनी एक व्यावसायिक फ़िल्म है और जिसकी कहानी उम्मीद के मुताबिक ही है. #लेखक

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काबिल  पोस्टर

काबिल: मनोरंजन कोई बुरी बात नहीं है

By तत्याना षुर्लेई

फ़िल्म की कहानी रोमांटिक और मासूम प्यार से शुरू होती है, फिर इसमें दारुण दुःख पहुंचाने वाली क्रूरता, हिंसा और अन्याय आते हैं, और अंततः राहत देनेवाला बदला. फ़िल्म का नायक, रोहन भटनागर (ऋतिक रोशन) एक अँधा जवान आदमी है जो एक सुन्दर लड़की, सुप्रिया (यमी गौतम) से प्यार और शादी करता है. सिनेमा में दिखने वाले विकलांग लोगों में अक्सर किसी एक कमी की जगह उन्हें कई असाधारण क्षमताएं दी जाती हैं (न सिर्फ भारतीय फिल्मों में – ऐसा स्टीरियोटाइप दुनिया की बहुत सारी फिल्मों में प्रभुत्व रखता है). रोहन भी इसी तरह का आदमी है – उसको दिखाई नहीं देता है लेकिन इस विकलांगता के प्रतिउत्तर में वह दुसरे लोगों की आवाज़ों को अच्छी तरह नक़ल करता है. रोहन कार्टून का डबिंग करता है और इस काम में इतना प्रतिभावान है कि अकेले ही फ़िल्म के सारे नायकों की अलग-अलग आवाजें देता है. उसकी यह योग्यता बाद में बदला लेने वाले दृश्यों में उनकी बहुत मदद करेगा.

आसपास में रहनेवाले दो अपराधी, अमित (रोहित रॉय) और उसका दोस्त माधव (रोनित रॉय) बार-बार रोहन और सुप्रिया की ख़ुशी के आड़े आते हैं. इनके लिए इस जोड़ी की विकलांगता मजाक उड़ानेवाली बात है. एक दिन वे छेड़-छाड़ से आगे चले जाते हैं और सुप्रिया का बलात्कार करते हैं. अमित का भाई शहर का बड़ा आदमी है इसलिए वह आसानी से भ्रष्ट पुलिस को अपने पक्ष में कर लेता है. भ्रष्ट पुलिस हिंदी सिनेमा का सब से पसंदीदा टॉपिक है जिससे फिल्मवाले अभी तक थके नहीं हैं. लेकिन विषयों का दुहराव और दर्शकों के उम्मीदों पर खरा उतरने वाला प्लॉट मुख्यधारा की सिनेमा के सबसे जरुरी हिस्से हैं.

अपनी पत्नी की मौत के बाद, यह देखकर कि पुलिस कुछ नहीं करेगा, रोहन खुद बदला लेता है और भ्रष्ट पुलिस इंस्पेक्टर से जीतता है. यह प्लॉट बहुत टिपिकल और आसान है – ऐसी फिल्में तो बार-बार बनती हैं, फिर भी हमेशा की तरह वे अपने दर्शकों को अंत में बड़ी राहत देती हैं. “काबिल” में नयी बात यह है कि फ़िल्म की कहानी एक ही तरह के दो दृश्यों से अच्छी तरह खेलती है. उदहारण के लिए रोहन की पत्नी के बलात्कार के केस में इंस्पेक्टर बार-बार बोलता है कि सबूत के बिना वह कुछ नहीं कर सकता है, लेकिन बाद में, बदले वाले दृश्य में, फ़िल्म का नायक भी पुलिस से अपने क्राइम के सारे सबूत छुपाता है. सुप्रिया ने फँसी लगा ली तो रोहन ने माधव को भी फांसी पर लटकाया. सुप्रिया का बलात्कार करने से पहले उसको बिस्तर से बांधा और उसके मुँह में कपड़ा लगाया गया था ताकि वह कुछ बोल न सके, तो ऐसी ही स्थिति लेटाकर अमित की भी हत्या होती है. इस तरह के अलग-अलग आइने में प्रतिबिंबित होने वाले दृश्यों की तरह सारी उल्टी परछाईयाँ फ़िल्म में दिखाई गईं हैं.

रुसी लेखक, अन्तोन चेखव ने एक बार लिखा की नाटक के शुरू में दर्शकों को अगर दीवार में लटकी बन्दुक दिखाई देती है तो इसका मतलब यह है कि कहानी में इसका इस्तेमाल जरुरी है. “काबिल” में इस नियम का प्रयोग बहुत हुआ है. लगभग हर छोटे दृश्य, जैसे साईकिल वाला, या रोहन का पत्नी को घड़ी गिफ्ट करना इत्यादि. पहले तो इन सब का कोई बड़ा मतलब नहीं दिखता है, लेकिन बाद में ये सारे दृश्य वापस आते हैं और नायक अपने बदले वाले दृश्य में इन सब का कोई न कोई प्रयोग करता है.

सबसे अच्छी बात यह है कि मुख्यधारा की दूसरी फिल्मों के विपरीत “काबिल” में जब भी  किसी ऑब्जेक्ट का दुबारा इस्तेमाल है तो दर्शकों को याद दिलानेवाला बोरिंग फ्लैशबैक या ऑफ-स्क्रीन से झुंझला देने वाली आवाजें नहीं आती हैं (बस फ़िल्म के अंत में अंधे लोगों के बारे में रोहन के शब्द दोबारा आए हैं). साथ ही साथ “काबिल” अपने दर्शकों की बुद्धिमत्ता का सम्मान करता है जो कि पॉपुलर फिल्मों में अक्सर नहीं होता है.

ऋतिक रोशन ने “काबिल” से पहले भी विकलांग आदमी का अभिनय किया है. मगर इस बार उसने अच्छी तरह से अपने सबसे बड़े हुनर को अपने नायक की विकलांगता से जोड़ दिया है. ऋतिक का सब से बड़ा कौशल उसका नाच है जो इस बार ड्रीम सीक्वेंस का हिस्सा नहीं है. डांस स्कूल के सीन में ऋतिक फिर से दर्शकों को यह दिखाता है कि वह बॉलीवुड का सब अच्छा डांसर है. पुराने थिएटर में लड़ाई के सीन में नायक के अंधापन के साथ अँधेरा का भी दिलचस्प इस्तेमाल है. यह जरुर है कि नायक का कौशल कभी-कभी कुछ ज़्यादा ही दिखाया गया है जो कि विकलांग आदमी में नहीं होते हैं.

अंधे लोगों की ज़िन्दगी में जो कुछ भी अजीब चीजें, हरकतें सामान्यतः दिखती हैं, फिल्मवालों ने भरसक कोशिश की है कि उनकी व्याख्या प्रस्तुत की जाएँ. शादी की रात, नायक और नायिका के कमरे में जली हुई सारी मोमबत्तियाँ, जो ट्रेलर में भी दिखाई गईं हैं, किसी को अजीब लग सकती हैं. इसीलिए फ़िल्म में उसकी व्याख्या है कि वे क्यों आईं! यहाँ मोमबत्ती फ़िल्म में चेखव वाली चीज़ बन गयी. दिलचस्प बात यह भी है कि इस फ़िल्म में ऋतिक रोशन की दूसरी फिल्मों से अलग दर्शकों को उसके दोनों अंगूठे पुरे समय दिखाई देते हैं. यह निशान कोई विकलांगता नहीं है, बल्कि नायक के भाग्यशाली होने की निशानी है, फिर भी अपनी पुरानी फिल्मों में ऋतिक इसे छुपाता था. चूँकि “काबिल” सामन्य लोगों से अलग दिखने वाले लोगों के शांति से जीने के अधिकार और उनके प्रति होने वाले भेद-भाव के बारे में फ़िल्म है, इसीलिए दूसरों से अपनी भिन्नता दिखाना विकलांगता के पक्ष में एक मज़बूत आवाज़ है. विकलांग नायक का अभिनय करना और खुद दूसरों से कुछ अलग होना अलग-अलग बातें हैं और यहाँ ऋतिक ने फिर से अपनी एक और खासियत का अच्छा इस्तेमाल किया.

फ़िल्म में कमियां ज़रूर हैं और उनमें सब से बड़ी शायद फ़िल्म का आइटम नंबर है. इसकी ज़रुरत बिलकुल नहीं थी, क्योंकि यह गाना और परफॉरमेंस अच्छा नहीं हैं. शायद फिल्मवाले आगे आने वाली अपने नायक की अलग-अलग लड़ाइयों से पहले दर्शकों को थोडा-सा आराम देना चाहते थे, फिर भी अगर ज़रुरत थी तो इसे ज़्यादा अच्छी तरह से करना चाहिए था. सुप्रिया का भूत वाला आईडिया भी ज़्यादा अच्छा नहीं था, इससे फ़िल्म बस ज़्यादा दयनीय बन जाती. नायिका की मौत और उससे पहले उसके प्रति घटित अपराध ही इतने कष्टप्रद हैं कि इससे ज़्यादा कुछ डालने की जरुरत नहीं थी.

फ़िल्म में एक चिंताजनक बात माधव की बहन के प्रति रोहन का व्यवहार है. माधव और उसका दोस्त अमित जब सुप्रिया को छेड़ते थे तो रोहन को मालूम था कि यह महसूस करना कितना कष्टप्रद है. फिर भी अपने बदले वाले क्षण में रोहन माधव की बहन को छेड़ता है. यह ज़रूर है कि रोहन का व्यवहार उतना ख़राब नहीं है जितना अमित और माधव का था. वह बस अमित की आवाज़ का नक़ल करता है और यह दिखाने की कोशिश करता है कि यह सब बुराइयाँ अमित ही करता है. लेकिन, बाद में वह माधव को स्पष्ट करता है कि यह आईडिया उसे यह महसूस करवाने के लिए था कि जब कोई तुम्हारी प्यारी बहन को छेड़ता है तो तुम्हें कैसा लगता है. इस तरह की सोच पूरी दुनिया में बहुत पॉपुलर है– जब एक आदमी दुसरे आदमी की औरत से बदतमीजी करता है तो बदले में उसकी औरत से भी यही बदतमीजी करनी चाहिए. जबकि दोनों मामलों में औरतें एक तरह से बेकसूर होती हैं. इसीलिए आदमियों के झगड़े में उनको घसीटने और दंडित करने का यह आईडिया बहुत खतरनाक है.

अगर फ़िल्म में एक छोटा-सा स्पष्टीकरण यह होता कि अपराधी क्यों यह सब अपराध करते हैं तो यह भी कहानी के लिए और भी अच्छा होता, और आखिर में इतनी लड़ाइयों के बाद नायक के चेहरे पर ज़्यादा निशान दिखने चाहिए थे. मेनस्ट्रीम सिनेमा का हीरो सुपर हीरो की तरह होता है लेकिन फिर भी इतनी पिटाई के बाद हीरो के चेहरे में भी कोई न कोई चोट तो आता ही है. इन कमियों के बावजूद “काबिल” वीकेंड के शाम के लिए बहुत अच्छी फ़िल्म है जिसे देखते समय दर्शक रो सकते हैं, हंस सकते हैं और अंत में राहत महसूस कर सकते हैं.

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तत्याना षुर्लेई पोलैंड की रहने वाली हैं, एक इंडोलॉजिस्ट (भारतीय उपमहाद्वीपीय भाषा और संस्कृति की जानकार)  और फिल्म आलोचक हैं. हिंदी की मशहूर पत्रिकाओं और ब्लॉग्स के लिए लिखती रही हैं. पोलैंड के शहर क्राकोव स्थित जेगिलोनियन विश्वविद्यालय से “द कोर्टसन फिगर इन इंडियन पॉपुलर सिनेमा: ‘ट्रेडिशन, स्टीरियोटाइप, मैनिपुलेशन” नामक विषय पर पीएचडी हैं. वर्तमान में मनिपाल विश्वविद्यालय, कर्नाटक के यूरोपीय अध्ययन संस्थान में पढ़ाती हैं.

हैदर और बर्फ के अंगारे: तत्याना षुर्लेई 

कलाकार की रचना-प्रक्रिया से वास्ता रखना सिर्फ एक बौद्धिक शगल नहीं होता है बल्कि इसका सीधा संबंध पाठ-प्रक्रिया से भी होता है. पाठ-प्रक्रिया को ज्यादा दूर तक खींचने की जरुरत नहीं है बल्कि इसे अभी समीपी-अध्ययन (Close Reading) तक ही सीमित रखा जाय तो बेहतर है. विशाल भारद्वाज ‘हैदर’ क्यों बनाना चाहता था? क्या इस सवाल को ढूंढें बिना ‘हैदर’ की ‘क्लोज रीडिंग’ की जा सकती है !! इसे बहुत सरल शब्दों में कहा जाए तो वह यह कि विशाल भारद्वाज शेक्सपीयर के तीन नाटकों पर फिल्म बनाना चाहता था. ‘मैकबेथ’ और ‘ऑथेलो’ पर क्रमशः ‘मकबूल’ और ‘ओमकारा’ बना चूका था. इसी प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए उसने ‘हैमलेट’ को ‘हैदर’ के रूप में परदे पर रूपांतरित किया है. ‘हैदर’ की परिवेश विषयक ‘असंगतियों’ पर अथाह चर्चाएँ हो चुकी हैं और ऐसी तमाम चर्चाएँ कहीं न कहीं ‘फिल्म’ को कला के एक विधा के रूप में, एक प्रसिद्द नाटक के दृश्य में रूपांतरण के सन्दर्भ में और एक निदेशक की रचना-प्रक्रिया के सन्दर्भ में देखने में अक्षम रही हैं. तत्याना ने इन्हीं अछूते मुद्दों को बारीकी से देखने की कोशिश की है.

हैदर (२०१४)- पोस्टर

हैदर (२०१४)- पोस्टर

 By तत्याना षुर्लेई 

50 अलग अडॉप्टेशन के बाद नया और इतना अच्छा हैमलेट सिर्फ एक जीनियस बना सकता था।

हैमलेट का अभिनय करना न सिर्फ हर अभिनेता का ख्वाब होता है, बल्कि यह वह नाटक भी है जिसकी अलग-अलग व्याख्याएं हर दौर में संभव होती रहेंगी और शायद इसलिए इसका संयोजन आसान नहीं है। ‘हैदर’ विशाल भारद्वाज की ऐसी तीसरी फिल्म है जो शेक्सपीयर के नाटकों पर आधारित है और यह भी लगता है कि यह अब तक की उनकी सबसे अच्छी फिल्म है।

‘हैदर’ की कहानी कश्मीर में चल रही है, इससे अच्छी और प्रासंगिक बात कुछ और हो नहीं सकती थी। शेक्सपीयर के नाटक में कहा जाता है कि देश की स्थिति ठीक नहीं है और वह देश अक्सर जेल जैसा दिखाया जाता है। भारत में कश्मीर के अलावा वह कौन-सा प्रदेश हो सकता था जहां की स्थिति नाटक की तरह ही गड़बड़ है और जिसके नागरिक कैदी की तरह जीवन बिताते हैं? बहुत से आलोचक इस फिल्म की राजनीतिक स्थिति के बारे में लिखते हैं, लेकिन सबसे पहले यह स्पष्ट करना जरूरी है कि विशाल भारद्वाज चाहते क्या थे? वह चाहते थे कि फिल्म के दर्शक न सिर्फ ‘हैदर’ के दुःख को समझें बल्कि यह भी देखें कि वह अपने पिता की तरह ही विक्टिम बन गया है। फिल्म के निर्देशक को इतनी जटिल परिस्थितियों की तलाश इसलिए भी थी ताकि वे वास्तव में शेक्सपीयर के नाटक से मिलती-जुलती लगें। दि ट्रेजेडी ऑफ हैमलेट, प्रिंस आफ डेनमार्क में डेनमार्क न सिर्फ नायकों का देश है बल्कि पूरी दुनिया का एक निचोड़ भी पेश करता है जहां बुराई का राज है और बुरे लोग हमेशा जीतते हुए पाए जाते हैं। विशाल भारद्वाज की फिल्म में यह वक्तव्य-विवरण (statement) भी बहुत अच्छी तरह दिखाया गया है। आजकल कोई नहीं बोलेगा कि अगर धरती पर कहीं स्वर्ग है तो वह यहीं है यहीं है यहीं है, क्योंकि आज का कश्मीर एक नर्क है जहां के लोग भयरहित नहीं हैं और वहां किसी को नहीं मालूम है कि कौन दोस्त है और कौन दुश्मन। नर्क जैसे भयावह और भयानक समय-समाज में मनोरंजन (बॉलीवुड/सिनेमा) एक ख्याली पुलाव है, जहां सलमान खान के नकलची/प्रशंसक भी हत्यारे निकलते हैं और सिनेमा-घर का इस्तेमाल लोगों को मौत की सजा देने के लिए होता है। संघर्ष के दोनों पक्ष समान रूप से जालिम हैं और यह दयाहीनता हैदर और उसके पिता के अंदर भी घुसपैठ बढ़ा रही है। नायक का पिता, डॉक्टर हिलाल इंतकाम चाहता है और हैदर भी सचमुच में मानने लगता है कि इंसाफ पाने का यही एकमात्र विकल्प है, लेकिन अंत में वह समझ जाता है कि यही वह इंतकाम है जिसके चलते उसमें, कश्मीर में और पूरी दुनिया में दयाहीनता और निर्ममता या कहें कि बुराई हमेशा के लिए विद्यमान रहेगी। क्या कश्मीर के अलावा इतना प्रासंगिक कोई दूसरा उदाहरण संभव था? यह स्थान इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि फिल्म के परिवेश में व्याप्त ठंडापन और सख्ती भी शेक्सपीयर के डेनमार्क से मिलती-जुलती है जो इस बात के लिए भी उकसाती है कि विशाल भारद्वाज का रूपांतरण दि ट्रेजेडी ऑफ हैमलेट, प्रिंस ऑफ डेनमार्क से एक मायने में अलग भी है और बहुत समान भी। फिल्म में ज्यादा रंग नहीं दिखाए जाते हैं और जो हैं भी, वे धीरे-धीरे गायब हो जाते हैं। अंत में बस एक तेज रंग, लाल, ही बाकी रह जाता है जिसे फिल्म में बर्फ से भरपूर एकवर्णी दृश्य में अलग से चटखता हुआ दिखाया जाता है।

अत्यधिक ठंडे माहौल के कारण संघर्ष और खतरे का एहसास और भी जोरदार बन जाता है। विशाल भारद्वाज की इस फिल्म में कहीं भी वातानुकूल या गर्म माहौल नजर नहीं आता है। जब लोग अपने घरों में हैं तब भी उनके मुंह से भाप निकलती है। बस प्रेम-दृश्यों में यह ठंड थोड़ी-सी कम हो जाती है, और यह सिर्फ हैदर और अर्शिया के प्रेम-प्रसंगों में ही नहीं दीखता है बल्कि गजाला और खुर्रम के प्रेम-प्रसंगों में भी दर्शनीय है। इस फिल्म में नाटक से जो सबसे बड़ा अंतर दीखता है, वह यह है कि फिल्म में हैदर का चाचा उसके पिता और अपने भाई को राज्य के लिए नहीं बल्कि उसकी बीवी को पाने के लिए फंसाता है और बाद में मरवा देता है। यह बड़ा अंतर भी कुछ आलोचकों को पसंद नहीं है, लेकिन शेक्सपीयर के नाटक के आधुनिक रूपांतरण में राज्य को हड़पना दिखाना थोड़ा मुश्किल है और यह अजीब भी लग सकता है, क्योंकि वह आज के समय में बड़ी कंपनियों में चलने वाली हैमलेट की कहानी बन चुकी है… (Hamlet, Michael Almereyda, 2000) गजाला अपने पति से ज्यादा खुर्रम को प्यार करने लगती है और शायद इसलिए कि डॉक्टर हिलाल अपने काम में ज्यादा व्यस्त रहता है और खुर्रम के लिए सिर्फ गजाला सबसे महत्वपूर्ण है। यद्यपि यहां फिल्म नाटक से अलग है। एक औरत के लिए किसी को मार देना या युद्ध तक करना कोई नई बात नहीं है, न सिर्फ यूरोपीय साहित्य में बल्कि भारतीय साहित्य में भी इसे आसानी से चिन्हित किया जा सकता है। फिर भी, जो नई और दिलचस्प बात विशाल भारद्वाज की फिल्म में है, वह यह है कि मेच्योर औरत को दिखाने के इस नए तरीके के लिए बॉलीवुड के दर्शकों को ‘हैदर’ तक बहुत इंतजार करना पड़ा है। हैदर की मां अपनी ढलती उम्र के बावजूद एक सुंदर और आकर्षक औरत होने के एहसास को महसूस कर सकती है, उसे अपने प्रति एक आदमी को पागल बनाने के लिए होमर वाले ‘दी इलियड’ की हेलेन ऑफ ट्रॉय या रामायण की सीता की तरह जवान होने की आवश्यकता नहीं है, और ऐसी नायिकाएं भारतीय सिनेमा से अक्सर गायब ही दिखती हैं। फिल्म की शुरुआत में गजाला को दूसरी मुसलमान औरतों की तरह ही दिखाया जाता है, लेकिन खुर्रम के घर जाने के बाद उसके कपड़े बदल जाते हैं, बाल वह हमेशा खुले रखती है और वह सचमुच में एक लुभावनी (सिडक्टिव) औरत में तब्दील हो जाती है। गजाला को सिर्फ खुर्रम से ही प्यार नहीं है, बल्कि सबसे पहले उसे अपने बेटे से प्यार है, इसलिए उसकी आत्महत्या अर्शिया की खुदकुशी से अलग है। पिफल्म की ये दो औरतें ‘गलत प्यार’ में पड़ जाने या पिफर परिस्थितिगत विपर्यय के कारण खुद को मार लेती हैं। अर्शिया अपने पिता के खूनी से प्यार करती है, गजाला अपने पति के हत्यारे से, और यह उनके लिए असहनीय है। गजाला की मौत में क्रोध्, हलचल और नाटकीयता भी है क्योंकि वह न सिर्फ खुद को मारना चाहती है, बल्कि अपने बेटे को बचाना भी चाहती है। अर्शिया की मृत्यु अपेक्षाकृत उत्तेजनाविहीन और शांत है। अपने पिता की मौत के बाद वह नाटक की नायिका की तरह पागल हो जाती है, लेकिन दूसरों को फूल देने के बदले वह अपने पिता के लाल स्कार्फ को रेशा-रेशा बर्बाद करती हुई दिखती है। यह स्कार्फ उसने खुद ही बनाकर अपने पिता को भेंट किया था और हैदर को पकड़ते समय अर्शिया का पिता इसी स्कार्फ से हैदर की गर्दन को अपने काबू में लेता है। आज उसी स्कार्फ के रेशे-रेशे हो गए, रेशम उसके जख्मों को प्रतिबिंबित करता हुआ जान पड़ता है। इस दृश्य को विशाल भारद्वाज ने एक काव्यात्मक ऊंचाई दी है।

दि ट्रेजेडी ऑफ हैमलेट, प्रिंस ऑफ डेनमार्क को देखने वाले हमेशा दो दृश्यों का इंतजार करते हैं : पहला नायक द्वारा उच्चरित, टू बी ऑर नॉट टू बी वाला आत्मालाप और दूसरा नायक द्वारा खोपड़ी से बातचीत। फिल्म में टू बी ऑर नॉट टू बी, टू गो ऑर नॉट टू गो हो गया है जो इसे व्यंग्यात्मक और थोड़ा-सा निराशाजनक भी बनाता है, हालांकि यह शेक्सपीयर से मिलता-जुलता भी है क्योंकि उसके नाटक में बहुत सारे हास्यप्रद तत्व मिलते हैं, लेकिन खोपड़ी वाला दृश्य एक मास्टरपीस है। नाटक में कब्रिस्तान में काम करने वाले हैमलेट की प्रेमिका के लिए कब्र बना रहे हैं और फिल्म में तीन बूढ़े अपने लिए कब्र बना रहे हैं। कब्रिस्तान में गाने वाले बूढ़े प्राचीन ग्रीस के नाटकों के कोरस की तरह पूरी कहानी का समाहार पेश करते हैं। उनकी तीन कब्रें ऊपर से एक खोपड़ी जैसी दिखाई जाती हैं। वह खोपड़ी, कब्रिस्तान और थके हुए लोग, जो सोना चाहते हैं और जिनके लिए उम्मीद सिर्फ अंधेरा ही अंधेरा है, पूरे कश्मीर का रूपांतरण भी बन जाते हैं, गजाला और हुसैन मीर के शब्दों से ज्यादा मजबूत। हैदर की मां और उससे पहले हुसैन मीर कहता है कि इंतकाम से आजादी नहीं मिलती है, लेकिन वह शायद इसलिए नहीं मिलती है क्योंकि लोग सचमुच ही ज्यादा थक गए हैं।

फिल्म की संरचना को अगर बारीकी से देखें तो इसकी बुनावट में निर्देशकीय रचनात्मकता का एक सचेत प्रयास स्पष्ट ही दिखता है। इसमें बहुत से दृश्य बार-बार जोडि़यों में दिखाए जाते हैं। फिल्म की शुरुआत में डाॅक्टर के घर को बारूद से उड़ाकर धूल में मिला दिया जाता है और अंत में कब्रिस्तान में ऐसे ही एक दूसरे घर को इसी तरह से नष्ट किया जाता है। अपने घर के खंडहर में हैदर जब पहली बार अर्शिया के साथ होता है, तब लड़की का भाई आता है, जब दूसरी बार वहीं वह अपनी मां से मिलता है, तब अर्शिया का पिता आता है। मरे हुए लोगों की लाशों के ढेर से एक लड़का उठ जाता है, कब्रिस्तान में जीवित लोग कब्र में लेट जाते हैं। डॉक्टर के घर में इबादत करने वाले एक आदमी को मार दिया जाता है, बाद में खुर्रम को उसका इबादत करना ही उसे मरने से बचा लेता है। गजाला अपने शाल के नीचे छिपाए रिवाल्वर से अपने बेटे को इमोशनली ब्लैकमेल करती है और बाद में शाल के नीचे छिपाए हुए ग्रेनेडों से खुदकुशी करती है। दूसरी दिलचस्प बात फिल्म में गाने का इस्तेमाल है जो बहुत ही अच्छा बन पड़ा है। सब से जीनियस दृश्य कब्रिस्तान में होने वाला कार्य-व्यापार है जिसकी चर्चा ऊपर की गई है। हैदर द्वारा गजाला और खुर्रम को, संकेत में ही सही, संबोधित नाटकीय और कहानीनुमा गाना भी बहुत ही खास है और उसका नृत्य और चेहरे पर रंगों की लकीरें न सिर्फ जनजातीय लोगों में प्रचलित युद्ध वाले नाच जैसा है, बल्कि एक तरह से तांडव-दृश्य को रचता हुआ मालूम पड़ता है।

शुरू में मैंने लिखा कि हैमलेट का अभिनय करना हर अभिनेता का ख्वाब है और इस फिल्म में शाहिद कपूर ने न सिर्फ इस ख्वाब को निभाया है बल्कि उसने और तब्बू ने पूरी फिल्म को ही लगभग चुरा लिया है।

साभार- पाखी, नवम्बर, २०१४ 

Tatiana Szurlej

Tatiana Szurlej

तत्याना षुर्लेई एक Indologist और फिल्म-आलोचक हैं। हंस, पहल, अकार आदि हिन्दी पत्रिकाओं के लिए लिखती रही हैं। फिलहाल पोलैंड के शहर क्राकोव स्थित Jagiellonian University में The Courtesan Figure in Indian Popular Cinema:Tradition, Stereotype, Manipulation. नामक विषय पर पीएचडी के लिए शोधरत हैं। 

Haider: Is Vishal Bhardwaj the new Laurence Olivier? By Tatiana Szurlej

Engaging with the creative-process of an artist isn’t merely an intellectual hobby but it is also directly related to the textual-reading. It is not necessary to overstretch this textual-reading but it is preferable to limit it to close-reading. Why did Vishal Bhardwaj want to create ‘Haider’? Is a close-reading of ‘Haider’ possible without answering this question!! To put it very simply, Vishal Bharadwaj wanted to make films on three plays of Shakespeare. He had already made ‘Maqbool’ and ‘Omkara’, respectively on Macbeth and Othello. Taking forward this journey, he has adapted Hamlet as ‘Haider’. There have been countless discussions on the ‘discrepancies of Haider’s milieu’ and all these discussions, somewhere fail to see ‘film’ as a form of artistic expression, as a screen  adaptation of a classic play and to locate it in the context the creative-process of a director. Tatiana has tried to examine these untouched aspects closely. A Hindi version of the present critique is also available, which will be shortly published in the November issue of a monthly print magazine; we will try to present it here as soon as the issue actualises. 

Haidar (2014)- Poster

Haidar (2014)- Poster

By Tatiana Szurlej

It is hurculean task to act Hamlet, but it’s also a prized dream of many ambitious actors. May be that’s why there have been so many screen adaptations of one of the best and at the same time one of the most difficult of Shakespeare’s plays. We’ve already seen many variations of it, from routine conventional and traditional interpretations to unorthodox adaptations. Vishal Bhardwaj’s Haider is one of those adaptations, where the director tries to narrate an old story in a new context, like he did earlier with two other plays of Shakespeare, Macbeth and Othello. And this time Bhardwaj showcased not only the best of his Shakespearean plays, but also the best of his works so far. With this film he clearly demonstrates that Shakespeare can be read in different historical and cultural contexts. But to do so, meticulous reading and understanding of Shakespear is a must. Sure Bhardwaj makes certain changes in the story, but at the same time he stays as much Shakespearean as he can possibly, and this puts him in the same league with Kenneth Branagh or Laurence Olivier.

Haider is set in Kashmir, the idyllic panorama abandoned not only by Indian filmmakers, who opt for Switzerland instead, but even by God himself, a denouement similar to the kingdom of Denmark, described by Shakespeare as a place where everything rots. Is there any better location in India with similar denouement? The tragedy of Hamlet lays not only in the fact that his father is murdered, but, mostly in the situation that gets more and more complicated with the consequence that Hamlet becomes everybody’s enemy, a boy who is (at least in the beginning) all innocent like any one else. To reveal this mechanism at work, it is important to put in some political bacdrop in the screen story and to throw up a live and palpable conflict, this alone can help the viewer to understand the protagonist’s situation. Denmark, as presented by Shakespeare, is a metaphor for a world where the power that reigns is Evil and where to survive means to be Machiavellian. Bhardwaj toes the line, showing Kashmir as a place where nobody is comfortable and safe, and where even a madman is not allowed to pour out his heart. Kashmir is no more the heaven on the earth, it has turned into a hell, where even an entertainment such as Bollywood cinema is in fact a camouflage, hiding murderers and their criminalities. There are no good and bad sides of the conflict shown in the film; both are cruel and heartless. Even the protagonist’s father loses his great humanity, clearly shown in the beginning of the story, and becomes a wicked person who wants revenge. For a while heartbroken Haider really thinks that this is the best way to fight for justice, but in the end he changes his mind, realizing that looking for vengeance is not the way to fight for freedom. At the same time, however, Haider becomes murderer too, who kills and causes death of his beloved ones which makes him a different, wounded person, and his victory a bitter one.

Kashmir is an important setting not only because of political background, but also for visual aspect of the film. Monochromatic and cold places again associate the story of Bhardwaj with unadorned medieval Denmark of Shakespeare’s play. There are not many colours in the film, and those which appear in the beginning gradually vanish along with the announcement of the “new Kashmir” and subsequent snow-fall, making the environment more and more frigid. Finally there is only sombreness left, with some strong red elements, which emphasizes not only the blood, but also show-cases the exact theme of the story, the anger of the protagonist and his mother’s strong sexuality. The red patch on the face of dancing Haider intimates the fact that his mother becomes sexual attraction and gratification for another man, and his cpnsequent rage of vengeance.

The biggest difference between the film and the play lays in the fact that Haider’s father was killed by his brother not for the kingdom, but because of his beautiful wife. This change in ploy is natural, since it is rather difficult to depict the contemporary tale in which two brothers fight for the kingdom, especially if the story supposes to be original (there is already a version of the play in which Hamlet’s father is an owner of the big company – a film made by Michael Almereyda in 2000, and there was no point of repeating this idea). Haider’s mother, Gazala, seems to love her brother-in-law Khurram more than her husband, may be because doctor Hilal was so busy with his job and unmindful of putting his family in danger from time to time, on the other hand Khurram cares only for her. The feelings of Gazala and other characters are clearly visible in many scenes, because, as already mentioned, there is not much warm in the film, and even when protagonists stay inside their houses their breaths are often frozen. Only love makes the environment a bit warmer, the one that Haider feels toward Arshya, toward his mother, and also those which Gazala has for Khurram. Here, even if there is a little difference between the film and the play, a strong Shakespearean spirit remains intact with its strong influence of the ancient Greek and Roman culture which clearly appears in Gazala motif, being another example of the stories in which a woman inevitably is the reason of war. What is, however, new in the adaptation of Bhardwaj, and probably shocking for Indian cinema, is the fact that spectators finally can see a mature woman, who still is so attractive that she can smite her brother-in-law. Gazala doesn’t have to be young to become as much desirable as the best known heroines, like, Helen of Troy from The Iliad or Sita from Ramayana. And Tabu could play the real, eye-catching woman, and not only a suffering mother, so much characteristic of Indian cinema, proving the point and rightly so that it is possible to cast mature actresses in interesting roles. In the beginning of the film Gazala is depicted in a very conventional way, as many Muslim wives, but after she moves to Khurram’s house she starts wearing different clothes and dissolves her hair, which makes her more and more seductive. Despite her sexuality, however, she remains a mother, that’s why her suicide is different from the one committed by Arshya. Both heroines, the only women in film, become victims of their “wrong love” which cause their death. Arshya loves a man, who killed her father, Gazala marries a murderer of her husband, but as already mentioned, Gazala is not only a lover, but also a mother, that’s why her suicidal death is full of anger and thirst for blood of those who want to hurt her son. To the opposite, Arshya’s death is calm and almost unnoticeable. She doesn’t distribute flowers to other people like Shakespeare’s Ophelia, but destroys her father’s red scarf, which she had made and given to him earlier. Bhardwaj doesn’t show her committing suicide, but lying on the bed covered with red wool, which looks like wounds, and which becomes an interesting counterpoint with real wounds covering Haider’s face in the final sequence of the film.

The Tragedy of Hamlet, Prince of Denmark is widely known for the hero’s famous “to be or not to be” monologue, and his conversation with the skull of jester. Bhardwaj decides to present the monologue in a rather comical way, two Salmans ask each other if they should go or should not, but this change also stays in the spirit of the play, in which we can also find many humorous elements. The second scene, however, appears a masterpiece, becoming one of those rare moments in the film, which stays with the viewer even long after the show. There are two gravediggers in the play who prepare the grave for Ophelia singing obscene songs. Bhardwaj shows three old men, who dig graves for themselves while singing a haunting song of tired people, who want to sleep. Their dark figures presented on the snow not only look like a chorus from ancient Greek theatre, who comments what is going on in the tragedy, but, in fact, becomes one. The bird’s-eye view shot shows the three holes made by old men look like a huge skull as well. This skull-like ground, graveyard, and tired people become another metaphor of Kashmir, much stronger than Gazala’s and Hussain Mir’s statement about meaninglessness of vengeance. They both say that revenge would never bring freedom to anyone, but maybe people are still forced to live in hell because they are too tired to try to escape.

There are many elements in the film, which, even if they don’t play big part in the story, are clear reference to the play, like the hobby-horse mentioned by Hamlet and shown in the scene in which the birth of new Kashmir is announced. There are also, apart from the counterpoint mentioned above, many other scenes, which become complemented with each other. The demolished house of the doctor Hilal in the beginning comes back in the climax as another building, this time the one on the graveyard, destroyed in similar way. Arshya’s brother disturbs his sister, when she accompanies Haider to the ruined house, and when the protagonist comes back to the remains of the building, this time to meet his mother, the person who disturbs again is Arshya’s father. There is a boy getting up from the heap of dead bodies and alive people who lay in the graves. There is also a man, who is killed while praying in doctor Hilal’s house, and another pray which saves Khurram’s life. The revolver, by which Gazala tries to blackmail her son is hidden under her shawl just like the grenades, which will help her to save him at the end, and so on. Another interesting thing is the use of music with few songs, being rather a background than a real performance. The only exceptions are the mentioned scene in the graveyard, and the show revealing Khurram’s crime which are both very important parts of the film. The dance of Haider, by which he shows his anger and despair, is not only similar to a tribal war dance, but also to destructive rage of tandava, and as such is one of the most intriguing part of the movie.

As mentioned in the beginning, playing Hamlet is a dream chance for many actors, but not many of them can put the chance to good use. Shahid Kapoor’s performance, however, upstaged all the other, maybe except Tabu’s, which is outstanding as well. Of course the other characters were not so expressive, however, still extraordinary, like, the ghostly white figure played by Irrfan Khan, or Kay Kay Menon begging for death, but Kapoor and Tabu simply stole the whole show. In my private rating I give the film 9/10, not 10/10 because of the unnecessary use of the voice-over, repeating the statements about vengeance in the last scene, where Haider puts the gun to Khurram’s head and then leaves him. There was no need of such literalism, typical rather for simple mainstream stories, which sometimes make viewers bored and distracted. Still, even knowing that Vishal Bhardwaj never disappoints, I haven’t seen such a good film for a long time.

Tatiana Szurlej

Tatiana Szurlej

Tatiana Szurlej is a young Indologist and film critic. She also contributes about Bollywood in Hindi journals more often. Currently, she is working on “Tradition, Stereotype, Manipulation: The Courtesan Figure in Indian Literature and Popular Cinema” for her Ph.D from Faculty of Philology, Jagiellonian University, Krakow. She can be contacted on tatiana.szurlej@gmail.com.

स्त्रीविरोधी और दिशाहीन फिल्म है हाइवे: तत्याना षुर्लेई

इम्तियाज अली की  इस फ़िल्म में बहुत कमियाँ है। पहली कि शायद वह खुद नहीं जानता था कि उसकी फ़िल्म किसके बारे में होगी। क्या यह फ़िल्म एक अमीर, ऊबी हुई लड़की के बारे में है जिसको जीवन में थोड़ा सा एडवेंचर चाहिए और जिसके लिए दुनिया के बाकी लोग उसके नौकर जैसे होते हैं, क्या स्टॉकहॉम सिंड्रोम से पीड़ित व्यक्ति के बारे में है या एक ऐसी लड़की के बारे में है जो अचानक इस सच्चाई को ढूंढ लेती है कि उसको अपने झूठे परिवार की ज़रूरत नहीं है क्योंकि बाहर की दुनिया में ज्यादा अच्छे लोग रहते हैं।

Highway's Poster

Highway’s Poster

इम्तियाज अली की हाइवे  किसके बारे में है?

By तत्याना षुर्लेई

इम्तियाज अली की नयी और अत्यंत लोकप्रिय फ़िल्म हाइवे का मूल संदेश इसमें है कि उसकी नायिका, वीरा ‘खतरा/जोखिम’ से क्या समझती है। जवान लड़की अपने माँ-बाप द्वारा प्रवचित इस ज्ञान को नकारती है कि घर के बाहर की दुनिया लड़कियों के लिए बहुत खतरनाक है क्योंकि इस समय उसके लिए घर ही सबसे बड़ा खतरा है।

अली की फ़िल्म के समालोचक यह लिखकर उसको बड़ी दाद देते हैं कि आखिर पुरुष-प्रधान समाज से मुक्ति चाहने वाली नयी नायिकाएँ भारत में भी उत्पन्न हो गई हैं, जिनको हुक़्मऊदीली करने से डर नहीं है, जो उम्र में छोटी होने के बावजूद पूर्ण विकसित है। यह सब कुछ पढ़कर मैं खुद से पूछ रही हूँ कि मैंने वही फ़िल्म देखी या शायद कोई दूसरी; क्योंकि उपरोक्त दृष्टि से इस फिल्म को सिर्फ देखने में ही मैं असफल नहीं रही, बल्कि इसे देखकर मुझे लगता है कि जिस समय में महिलाओं के अधिकार के बारे में इतने सारे वाद-विवाद हो रहे हैं उस समय में यह फ़िल्म प्रतिक्रियावादी निष्कर्षों की शिकार लगती है और सब से खतरनाक बात यह कि कोई इस गलती को नहीं देखता है।

फ़िल्म की कहानी बहुत ही सरल है: वीरा बड़े घर की बेटी है और उसकी शादी होनेवाली है लेकिन वह ज़्यादा खुश नहीं लगती है। क्यों? कोई स्पष्ट कारण नहीं दिया जाता है, बस दर्शकों को मालूम हो जाता है कि उसको साँस लेने के लिए थोड़ी सी हवा चाहिए, थोड़ी सी शांति और आज़ादी भी। यह समझने वाली बात अवश्य है कि शादी की तैयारियों से वह थोड़ी सी थकी है लेकिन यह आज़ादी वाली इच्छा बिलकुल स्पष्ट नहीं है; ऐसा लगता है कि जैसे वीरा मध्ययुग में रहती है और उसके परिवार में अभी तक परदा-प्रथा का चलन है। नहीं तो वे कौन से कारण हैं कि इतने बड़े बाप की बेटी घर से बाहर नहीं निकल सकती है। हाँ, फ़िल्म की कहानी में यह स्पष्ट है कि वीरा आज़ाद लड़की है लेकिन उसकी आज़ादी की सीमाएँ भी बड़ी हैं। इतनी बड़ी कि वह अकेली कहीं नहीं जाती है, खुद गाड़ी नहीं चलाती है, साँस लेने के लिए भी लड़के के साथ बाहर निकलती है। लड़का अच्छी तरह जानता है कि आलीशान बंगलों से बाहर की दुनिया अमीर लोगों के लिए बहुत खतरनाक है – और कैसे न होगा? यही तो भारत है और सब को मालूम है कि यहाँ रात को क्या क्या होता है और वह भी तब जब जवान लड़की सड़क पर निकल आई हो, लेकिन वीरा साहसी और स्वतंत्र है न? समस्या यही है कि लड़के के साथ गाड़ी में बैठने के लिए ज़्यादा बहादुर होने की जरूरत नहीं है इसलिए पेट्रोल पम्प आने के बाद दुस्साहसिक अभियान (adventurous journey) की प्यासी वीरा गाड़ी से बाहर निकल जाती है। लड़का उसको वापस बुला रहा है लेकिन खुद नहीं निकलता है क्योंकि वह अच्छा लड़का है, नियमों को तोड़ने वाला नहीं है (क्या आजकल बड़े घर के लड़के भी परदों के पीछे बैठने लगे हैं?)। वीरा वापस आना नहीं चाहती है और इसी समय पेट्रोल पम्प लूटने आए डकैत उसका अपहरण कर लेते हैं। इतना सब कुछ हो जाने के बावजूद घर वापस आते ही वीरा अपने माँ-बाप को क्यों बोलती है कि घर के बाहर के खतरे के बारे में आप लोगों की बातें झूठी हैं? वह घर से निकली और उसका अपहरण हो गया। अनजान अत्याचारी पुरुषों ने उसे बार-बार पीटा और बाल पकड़कर अपने साथ दौड़ाया। क्या खतरे का यह रूप काफ़ी या अपमानजनक नहीं था? क्या औरतों के संदर्भ में घटित हिंसा का संबंध सिर्फ़ अस्मत से ही होता है, क्या हिंसा के बाकी रूप मामूली होते हैं? फ़िल्म के अधिकांश हिस्से में वीरा के चेहरे पर चोट के निशान दिखते हैं जो डकैतों के हिंसक व्यवहार को याद दिलाने के लिए काफी है, इसके बावजूद वह अपहरणकर्ता, महावीर उस लड़की को अपना रक्षक लगता है और वीरा उसके साथ रहना चाहती है।

कुछ लोग बोलते हैं कि फ़िल्म स्टॉकहॉम सिंड्रोम के बारे में है और इसलिए वीरा का व्यवहार थोड़ा सा अजीब लग सकता है लेकिन बात यह है कि मुझे इस स्टॉकहॉम सिंड्रोम में विश्वास भी नहीं है। फ़िल्म में एक बहुत महत्त्वपूर्ण दृश्य है जब वीरा अपहरणकर्ताओं के चंगुल से भागना चाहती है लेकिन शोर हो जाने के कारण जल्दी पकड़ी जाती है। महावीर लड़की को भागने की सज़ा देता है और इसके बाद लड़की को कहता है कि भाग जाओ। वह अच्छी तरह जानता है कि वह वापस आ जाएगी। हाँ, यही सच है क्योंकि यहाँ रूपक के बतौर फिल्म को देखना एक भयंकर भूल होगी। क्यों? क्योंकि इसमें फ़िर से अच्छी तरह दिखाया जाता है कि बाहर की दुनिया लड़कियों के लिए खतरनाक है। वीरा बाहर निकल जाती है लेकिन वहाँ कोई मदद करनेवाला नहीं है और औरत को हमेशा किसी की मदद चाहिए। वह उतनी ही स्वतंत्र हो सकती है जितनी अनुमति उसके साथ वाला पुरुष उसे देगा। पहला निष्क्रमण एक पुरुष के साथ हुआ और दुसरा महाभिनिष्क्रमण भी पुरुषों की सहायता के बिना संभव नहीं हो सकता है। इसी कारण वीरा वापस आ जाती है और यह कदम उसकी अधीनता का सबसे बड़ा सबूत दे जाती है। इसलिए मेरी समझ में यह नहीं आता कि इस दृश्य को देखकर लोग कैसे विश्वास कर सकते हैं कि यह फ़िल्म एक ज़ोरदार और आज़ाद ख्याल की एक महिला के बारे में है और वीरा के वापस आने के बाद, महावीर की व्यंग्यपूर्ण टीका-टिप्पणी सुनकर सिनेमाघर में बैठे हुए लोग हँस कैसे सकते हैं?

 दर्शकों को जल्द ही पता चलता है कि वीरा का बचपन बहुत ही दमघोंटू घटनाओं के बीच बीता है। उसका अंकल उसे बचपन से ही मोलेस्ट (यौन हिंसा/छेड़-छाड़) करता आया है। वीरा ने अपनी माँ को सब कुछ बताया लेकिन माँ ने मदद करने के बजाय बेटी को ही चुप रहने को कहा। शायद इसीलिए जब महावीर उसको अपने ही आदमी से बचाता है (जो वीरा के साथ ज़ोर-जबर्दस्ती करने की कोशिश करता है) तब वीरा अचानक बदल जाती है। महावीर का यह छोटा व्यावसायिक-कर्तव्य (जिसका संबंध अपहरण उद्योग की नैतिकता से भी है) उसके लिए ही काफ़ी है, इसके बाद लड़की का डर अपने आप गायब हो जाता है और वीरा अपहरणकर्ताओं से बातचीत करनी शुरू कर देती है। उसके लिए यह काफ़ी है कि वे लोग उसकी अस्मत लूटनेवाले नहीं हैं और जो आदमी अस्मत की लूटपाट नहीं करता है, वह अपहरण करने, थप्पड़ मारने या बाल खींचने के बावजूद अच्छा है।  इसलिए वीरा निश्चय करती है कि वह उन लोगों के साथ जाएगी। उसको पता नहीं है कि वे कहाँ जा रहे हैं, वह ट्रक के पीछे बंद हो जाती है, ज्यादा कुछ भी नहीं देख सकती है लेकिन फिर भी, न जाने क्यों आज़ाद महसूस करती है। वह न वापस आना चाहती है और न ही मंज़िल पर पहुँचना – उसको बस, रास्ता, फ़िल्म के टाइटल वाला हाइवे पसंद है जिसका स्पष्ट मतलब यह है कि जब से वीरा को पता चला कि जो लोग उसके साथ हैं वे उसकी अस्मत लूटने वाले नहीं हैं, अच्छे लोग हैं, बस यही सब उसके लिए एक साहस बन जाता है।

फ़िल्म के शुरुआती अंश के दृश्य उदासीन और डार्क है लेकिन जब से वीरा के विचार में यात्रा ज़्यादा खतरनाक नहीं है, तब से फ़िल्म में ज़्यादा रंग और प्रकाश, गाने और सरसो के फूलों के खेत भी आते हैं। लेकिन स्टॉकहॉम सिंड्रोम कहाँ चला गया? मुझे लगा कि एक जटिल प्रेम संबंध देखूँगी जिसमें एक जवान लड़की खतरनाक आदमियों की रखैल बनना चाहती है लेकिन फ़िल्म एक बिगड़ैल लड़की के बारे में है जो दो आदमियों की लाड़ली गुड़िया बन जाती है और उनके साथ घूमती है। हाँ, एक आदमी थोड़ा सा सनकी और खतरनाक लगता है लेकिन दूसरा अच्छा अंकल जैसा है। वीरा खुद भी बदल जाती है और पश्चिमी कपड़े देशी में बदल जाते हैं। लेकिन यहाँ भी उसका व्यवहार ज़्यादा स्वभाविक नहीं है, टुरिस्ट जैसा है– उसको पता नहीं है कि वह भारत के किस प्रदेश में है, दूसरी भाषा के अक्षर नहीं पहचानती है, गरीबों के घर और छोटे-छोटे गंदे सड़क उसको ज्यादा अच्छे लगते हैं, एक डिस्को गाना बजाकर आदमियों के सामने नाचती है। इन सब का मतलब यही हो सकता है कि वह अच्छी तरह जानती है कि उसके साथ कुछ भी बुरा नहीं होगा या इतनी वेबकूफ़ है कि अपराधियों के साथ सफ़र करते हुये भी खतरों से अनजान है। कहने का मतलब कि यह जो भी है लेकिन स्टॉकहॉम सिंड्रोम नहीं है। फ़िल्म की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि उसके पात्रों का मनोवैज्ञानिक चित्रण बहुत ही सतही है।

फ़िल्मवालों ने ब्यूटी ऐन्ड दी बीस्ट के आदिरूप से प्रेरणा ले लिया है। लड़की जवान, सुंदर और मासूम है और आदमी हिंसक, तीखा और खतरनाक। लेकिन इतना नहीं। महावीर वीरा को ज़बरदस्ती अपने पास रखता है लेकिन लड़की अच्छी तरह जानती है कि बीस्ट के अंदर एक खूबसूरत और अच्छा राजकुमार बंद है। वीरा से बातचीत करने का महावीर का तरीका अच्छा नहीं है लेकिन लड़की बार-बार उसके संपर्क में आने की कोशिश करती है, यह जानकर कि अंदर से वह ज़रूर बहुत अच्छा आदमी है। वह ऐसा क्यों करती है? इसलिए नहीं कि वह महावीर से भावनात्मक रूप से जुड़ी हुयी है, लगता है कि वह अपने सफ़र को खत्म करना नहीं चाहती है और सफ़र के लिए आदमी की ज़रूरत है। वीरा अच्छी तरह जानती है कि अपहरण के कारण महावीर का जीवन खतरे में है और यह भी अच्छी तरह जानती है कि ऐसे किसी अवश्यंभावी आपदा के बाद खुद उसे कुछ नहीं होगा क्योंकि वह बस पीड़िता है, इसके बावजूद वह महावीर को जाने नहीं देती है और वे दोनों पहाड़ जाते हैं। इस नयी जगह में भी लड़की का व्यवहार टुरिस्ट जैसा है जो झोपड़ी में रहने के खेल से खुश है। शायद इस मामले में भी वह फिर से इतनी भोली थी कि सचमुच उसको लगने लगा कि महावीर को अब कुछ नहीं होगा। महावीर की मौत के बाद, एक अनूठे और बहुत अच्छे दृश्य में उसका सच्चा दुख प्रकट होता है, यह जानकर कि यह सब कुछ उसकी गलती थी या शायद वह सचमुच अपहृत होकर खुश थी और अगर खुश थी तो बस इसलिए कि महावीर नौकर की तरह वह सब कुछ करता था, जो वह चाहती थी।

भारतीय सिनेमा ऐसी कहानियों को दिखा चुका है जिनमें औरत को अपने अपहरणकर्ता से प्यार हो जाता है और इतिहास में भी ऐसी बहुत सी कहानियाँ हैं जिनमें औरत अपने अपहरणकर्ता से शादी कर लेती है और वापस आना नहीं चाहती है। इन फिल्मों और कहानियों से यहाँ अंतर यह है कि वीरा महावीर से शादी करना नहीं चाहती है – वह उसके लिए बस एक दुस्साहसिक-अभियान (adventurous journey) था। लड़की का परिवार उसको वापस स्वीकर करता है, होनेवाला पति रिश्ता तोड़ना नहीं चाहता है। सब कुछ ठीक है लेकिन वीरा फ़िर से भागना चाहती है; अंकल के बारे में सच्चाई-वमन, चिल्लाना उसके लिए काफी नहीं है। अंततः पता नहीं चलता कि परिवार वालों ने वीरा के आरोपों का विश्वास किया कि नहीं या मान्सून वेडिंग के परिवार की तरह अश्लील अंकल से रिश्ता तोड़ लिया। लगता है कि ऐसा कुछ नहीं हुआ, इसलिए वीरा वापस पहाड़ आती है लेकिन अपने सपने की झोपड़ी के लिए नहीं बल्कि इससे ज़्यादा सुविधा-सम्पन्न और बड़े घर में रहने। उस घर को देखकर लगता है कि अमीर बाप से भी रिश्ता तोड़ना असंभव था क्योंकि जिस लड़की को किसी पुरुष की मदद नहीं मिलती है, उसके लिए बाहर की दुनिया बहुत खतरनाक है।

इम्तियाज अली की फ़िल्म में बहुत कमियाँ है। पहली कि शायद वह खुद नहीं जानता था कि उसकी फ़िल्म किसके बारे में होगी। यह फ़िल्म न एक अमीर, ऊबी हुई लड़की के बारे में है जिसको जीवन में थोड़ा सा एडवेंचर चाहिए था और जिसके लिए दुनिया के बाकी लोग उसके नौकर जैसे होते हैं, न स्टॉकहॉम सिंड्रोम से पीड़ित व्यक्ति के बारे में है और न ही एक ऐसी लड़की के बारे में है जो अचानक इस सच्चाई को ढूंढ लेती है कि उसको अपने झूठे परिवार की ज़रूरत नहीं है क्योंकि बाहर की दुनिया में ज्यादा अच्छे लोग रहते हैं। जो भी है, नायिका के “विद्रोही” व्यक्तित्व के अतिरिक्त पता नहीं क्यों फ़िल्म महावीर के वंचित/दमित बचपन को और उसके अपने माँ से मज़बूत रिश्ते को दिखाने की कोशिश करती है– उन सब दृश्यों की ज़रूरत नहीं थी, छोटी लड़की के फ़्लैशबैक वाले दृश्य के साथ, क्योंकि सस्ता और सतही मेलोड्रामा के अलावा उनका कोई इस्तेमाल नहीं है। लगता है कि सच्चे विद्रोही और आज़ादी का थोड़ा सा और इंतज़ार करना पड़ेगा। दुख की बात यह है कि हाइवे के लोकप्रियता का अर्थ यह नहीं है कि दर्शक विद्रोही नायिका को देखने के लिए तैयार है बल्कि वे हँसते-हँसते एक अविकसित, नासमझ  लड़की के खेल को उतना ही देखते हैं जितना उसके आसपास के पुरुषों ने उसको खेलने दिया।

तत्याना षुर्लेई

तत्याना षुर्लेई

तत्याना षुर्लेई एक Indologist और फिल्म-आलोचक हैं। हंस, पहल, अकार आदि हिन्दी पत्रिकाओं के लिए लिखती रही हैं। फिलहाल पोलैंड के शहर क्राकोव स्थित Jagiellonian University में The Courtesan Figure in the Iconography on Indian Popular Cinema:Tradition, Stereotype, Manipulation.  नामक विषय पर पीएचडी के लिए शोधरत हैं। उनसे tatiana.szurlej@gmail.com पर संपर्क संभव है।

Om-Dar- Ba-Dar: Excerpts Of Original Script

८०९० के दशक में सिनेमा की मुख्या धारा और सामानांतर सिनेमा से अलग भी एक धारा का एक अपना रसूख़ थायह अलग बात है कि तब इसका बोलबाला अकादमिक दायरों में  ही ज्यादा था। मणि कौलकुमार साहनी के साथसाथ कमल स्वरुप इस धारा के प्रतिनिधि फ़िल्मकार थे।  वैकल्पिक और सामाजिकसंचार साधनों और डिजिटल के इस जमाने में ये निर्देशक फिर से प्रासंगिक हो उठे हैं। संघर्षशील युवाओं के बीच गजब की लोकप्रियता हासिल करने वाले कमल  स्वरूप की  कल्ट फिल्म  ओम दर बदर इधर फिर से जी उठी हैं। अभी हाल ही में एनएफडीसी  ने  इसे डिजिटली  संरक्षित कर एक  एक बड़ा काम किया है। यह कदम एक महान फिल्म को जीवनदान देने जैसा है।  डिजिटली संरक्षित होते ही इसने अपने कमाल दिखाने शुरू कर दिये हैं। पीवीआर ने  इसे  17 जनवरी, 2014 से  पूरे देश में  प्रदर्शित करने  का फैसला किया है।  

आज व्यावसायीक और तथाकथिक सामानांतर फिल्मों का भेद जब अपनी समाप्ति के कगार पर पहुँच चुका हैतब कमल स्वरूप और इनकी कल्ट फिल्म  ओम दर बदर  की विगत महत्ता और योगदान पुनर्समीक्षा की मांग करता है।  इसी कड़ी में यहाँ  ‘ओम दर बदर ‘ की मूल पटकथा के कुछ हिस्से आपसे साझा किया जा रहा है। 

ओम दर बदर पोस्टर

ओम दर बदर पोस्टर

सीन नं. 28: इन्टीरियर/एक्सटीरियर:

                बाबूजी का ग़रीब घर/गली, सुबह  बारिश की पहली हवा  बाबूजी, गायत्री,   छोटा ओम।

                {आंगन में गायत्री पंखों के सामने बैठकर बाल सुखा रही थी। -फिर गंघी करने लगी। बाल झटकी – आइने के सामने खड़ी होकर सफेद बाल ढूंढने लगी। तोड़कर अंगुली में लपेटा – आंगन में फेंका तो धूप आई – जाकर धूप में खड़ी हुई।}

                {अपने कमरे में बाबूजी खाट पर अख़बार ओढ़े सो रहे थे। दीवार पर एक छिपकली थी।}

गायत्री: ओम ! स्कूल कब जायेगा?

                {ओम अंदर कमरे में बैठा भूगोल के नक्शे में बनी नदी में रंग भर रहा था।

ओम: छुट्टी है।

                {गायत्री का कंघी करता हुआ हाथ रुक गया}

गायत्री: क्यों ?

ओम: बरसात होगी।

गायत्री: क्यों ?

ओम: तू कंघी जो कर रही है।

                {बरसात के पहले वाली हवा चली। कैलेन्डर फड़फड़ाने लगे। बाबूजी की बनाई जन्म-पत्रियाँ हवा में उड़ीं। हवा का रुका हुआ झोंका छूट कर उथल-पुथल मचाने लगा। गायत्री – समेटने लगी।

 

सीन नं. 29: एक्सटीरियर:

                {शहर में तूफान के पहले वाला अंधड़ा छाया। साइकिलें हवा में उड़ीं। पेड़ उखड़े। सड़क पर पागल औरत हँसने लगी।}

सीन नं. 30: 28 के समान।

                {ओम शान से आसमान की तरफ देख रहा था। आसमान गरजा तो दीवार की छिपकली बाबूजी के मुंह पर रखे अख़बार पर गिरी। बुरी ख़बरें थीं। बाबूजी डरकर उठ बैठे। पांव में जूते पहले से पहने हुए थे। हाथ बनाई छोटी प्रश्न कुंडलियां हवा में उड़ रही थीं। एक ख़ास चीज़ ढूंढने लगे। अलमारी, तकिये सब छान मारे। आंगन में कुंडलियों के दो राकेट बने हुए थे। खोलकर देखा।

बाबूजी: ओम, तू कमरे में आया था।

ओम: न। 

बाबूजी: तो रॉकेट कौन उड़ा रहा था।

ओम: रूस और अमेरिका।

बाबूजी: गायत्री, दो कुंडलियां नहीं मिल रहीं, हवा में तो नहीं उड़ीं।

                {गुलशन नंदा के उपन्यास में रखी कुंडलियां निकालकर बाबूजी को दी}

गायत्री: मैं पढ़ रही थी।

बाबूजी:     तीस की बीस कर रहा हूं। एक साल के दस मिलेंगे। ख़िज़ाब है।

गायत्री: छि: ! घुट घुट के मरेगी वो। -मेरे भी तो बाल सफेद हो रहे हैं।

बाबूजी: तो चली जा जहां तू समझती है हमेशा: जि़न्दा रहेगी।

                {गायत्री अपमानित होकर अपनी खटिया के किनारे पर जा बैठी। दरवाज़े से गली दिखती थी। वो बाहर गली में निकली। कुछ दूर पहुंचते ही बारिश की पहली बौछार गिरी। बचने को भागी।}

सीन नं. 31: एक्सटीरियर:

                झील में नौका विहार, चांदनी रात, ठंड,   लाल रूमाल डाले आवारा     छोरा और हिप्पन छोरी।

                {लाल रूमाल और काला चश्मा पहने आवारा छोरा और हिप्पन छोरी नाव चला रहे थे}

छोरा: जानती हो प्यार किसे कहते हैं: {ल व्ह} एल.ओ.वी.ई.! लव, लेक ऑफ सॉरो- ओ, ओसियन ऑफ़ टीयर्स- वी, वैली ऑफ डैथ- ई, एण्ड आफ लाईफ। प्यार कोई बाजारू – चीज़ नहीं है जो अमेरिका में बिके।

                {नाव दूर जाकर पानी में डूब गई}

सीन नं. 32: इन्टीरियर/एक्सटीरियर:

                पिक्चर हाल, दिन, बारि गायत्री, जगदीश, दर्शक

                {अन्धेरी में गायत्री को लगा कई जन उसे घूर रहे हैं। जगदीष की नजर की पकड़। जगदीष पर्दे की ओर देखने लगा। वो भी अकेला था। पिक्चर छूटी। भीड़ दरवाजे की तरफ बढ़ने लगी। जगदीश सामने खड़ा था – हकला कर बोला – ‘‘आई लव यू’’ और तेज़ी से पलटकर भागा। गायत्री हक्की बक्की रह गई। भीड़ दरवाज़े के बाहर छूटी तो सीढि़यां उतरते हुए, फुल साइज़ मिरर में अपने को कइयों के बीच अकेला पाई।

सीन नं. 33: एक्सटीरियर:

                सुनसान सड़क, बारि के बाद दोपहर, जगदीश,  गायत्री, ऑटोरिक्शा

                {बारिश के बाद सड़क के दोनों ओर पेड़ धूप में सूख रहे थे। गायत्री अकेली, उदास घर की ओर जा रही थी एक ऑटोरिक्शा कान के पास से सनसनाता हुआ गुजर गया। छाती पर हाथ गया तो चुन्नी गायब।}

          ऑटोरिक्शा – कुश्ती लड़ेगी…….

                { ऑटोरिक्शा के बाहर लाल चुन्नी हवा में लहराई}

                इसके पहले कि चुन्नी जमीन पर गिरती, जगदीश ने साईकल पर बैठे-बैठे चुन्नी को नीचे गिरने से बचा लिया। साईकल पर बैठे-बैठे चुन्नी गायत्री को लौटाई।

जगदीश: आई एम सॉरी। पर कुसूर आपका भी है।

गायत्री: अकेली थी इसलिये।

जगदीश: अकेला मैं भी हूँ।

                {कुछ दूर तक दोनों के बीच तनाव बना रहा। जगदीश ने चुनौती देकर पूछा}

जगदीश: उचक कर कैरियर पर चढ़ सकती हैं आप। लिफ्ट दे रहा हूँ।

                {गायत्री उचक कर बैठ गई। जगदीश के हाथों में हैंडल कांपा। गायत्री मुस्कुराई। साईकल डबल बोझ से चरमरा कर चली।}

सीन नं. 34: एक्सटीरियर:

                बाबूजी के घर की छत और गली, शाम बारि के बाद, जगदीश और गायत्री

                {जगदीश ने गायत्री को घर के बाहर उतारा।}

जगदीश: माय सेल्फ जगदीश, फराम झुमरी तलैया।

                {गायत्री ने छत से जगदीश को जाते हुए देखा जगदीश सामने से आती हुई साईकिल से टकरा कर गिर पड़ा। गायत्री खिलखिलाती हुई सीढि़यों से आंगन में उतरी। ठोकर लगी। वहीं बैठकर सोच में डूब गई।

सीन नं. 35: इन्टीरियर/एक्सटीरियर:

                बाबूजी का घरपिछवाड़े की गली, दोपहर बारिके बाद, जगदीश,  गायत्री

                {गायत्री ने रेडियो पर स्टेशन ढूंढा,  फिर मोढ़े पर बैठ कर आंगन में गायत्री मशीन वाली सुई से कपड़े पर तोता बना रही थी। सामने गली से धोबी अपने गधे के साथ गुजरा। फिर पोस्ट मैन आया।

पोस्टमैन: गायत्री संकर केयर आफ बी संकर-

                {चिट्ठी खोल कर पढ़ने ही वाली थी कि रेडियो पर अपना नाम सुना।}

रेडियो प्रोग्राम:

          और ये खत है इस प्रोग्राम को बेहद चाहने वाले, झुमरी तलैया के जगदीश साहब का – लिखा है कि आज से झुमरी तलैया की बजाय उन्हें अजमेर का माना जाये – लीजिये मान लिया – जगदीष साहब आपने पता तो बदल लिया लेकन आपका मनपसंद गीत पिछले आठ साल से नहीं बदला- आपका फरमाइशी गीत हाजिर है- और हमेशा की तरह इसी गाने को सुनना चाहते हैं- अजमेर से ही जगदीश, गायत्री, ओम, टिंकू, झिंकू, पिंकी, डॉली और उनके मम्मी डैडी-

                {गाना शुरू हुआ। गायत्री ने चिट्ठी पढ़ी}

चिट्ठी: आवाज़ की दुनिया के दोस्तों। मैंने कभी ख्वाब में भी नहीं सोचा था कि फरमाइशी प्रोग्राम में मेरे नाम के साथ जुड़ी लड़की पिक्चर हॉल में मिलेगी। क्या पता इन फरमाइशी प्रोग्राम में जुड़े नामों का सम्बन्ध जन्म-जनमान्तर का हो। कहां मैं झुमरी तलैया और तुम अजमेर….खिड़की खोलो तो मैं दिखूं…………।

                {गायत्री ने खिड़की खोली तो दिल धड़का। नाले के उस पार जगदीश साईकिल की घंटी बजाकर हंस रहा था। गायत्री खिड़की की ओट में हो ली। चिट्ठी को आगे पढ़ा।

चिट्ठी: मेरी साईकिल का ख्याल रखना

                                                तुम्हारा जे.

                {फिर से खिड़की से झांका तो केवल साईकिल खड़ी थी। गायत्री खिड़की से साईकिल का ख्याल रखने लगी।}

कमल स्वरूप

कमल स्वरूप

कमल स्वरुप फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टिट्यूट पुणे के1974 के स्नातक हैं। घासीराम कोतवाल(1976),अरविन्द देसाई की अजीब दास्तान (1978), गाँधी(1982), सलीम लंगड़े पर मत रो (1989),सिद्धेश्वरी (1989)जैसी फिल्मों में सहायक निर्देशकसंवाद लेखकप्रोडक्शन डिजाइनर और शोधार्थी के बतौर इनका रचनात्मक सहयोग रहा है। बतौर निर्देशकनिर्माता कमल स्वरुप ने अभी तक सिर्फ एक फिल्म बनाई है– ओम दर बदर(1988), भारतीय उपमहाद्वीप में अपनी तरह की एक मात्र कल्ट फिल्मफिल्म फेयर पुरस्कार से पुरस्कृत। ओम दर बदर के अलावे कुछ डाक्यूमेंटरी फिल्में भी।  दादा साहेब फाल्के और भारतीय फिल्मइतिहास  के अद्भुत अध्य्येता। दादा साहब फाल्के का महावृतांत  ‘ट्रेसिंग  फाल्के ‘ के नाम से प्रकाशित । इसी साल दादा साहेब फाल्के  रचित एक नाटक  से प्रेरित  डॉक्यूड्रामा  ‘रंगभूमि ‘ का निर्माण।    

Madras Café and the Indian state apparatus: Prabhat Kumar

BY Prabhat Kumar

I watched Shoojit Sircar’s film Madras Café (MC) early this week. Commenting on a film released three-four weeks ago, when we are flooded with new Hindi films every Friday, is a lazy exercise and also involves the risk of going unread. Nevertheless, I am eager to share my thoughts on MC.Madras Cafe

For a person who has a superficial knowledge about the minute factual details regarding Ex-PM Rajiv Gandhi’s assassination in the context of Sri Lankan ethnic strife –involving Sinhala dominated Sri Lankan state, minority Tamil nationalist organization, Indian state apparatus– the film has been an engaging experience. While watching, however, I also somewhat felt irritated for being unable to keep pace with the movie. On an afterthought I have excused myself. Probably it is the film’s shortcoming, not mine. Quite contrary to the generally overstretched Hindi films, MC might be over edited! Audience is bombarded with fast-paced information. Back and forth movement of camera on the scale of the narrative’s time could have been avoided. Notwithstanding these minor flaws, on the whole, it appears to be a good film. A director’s film, indeed, that has got excellent support from his cameraman (especially footage of violence and suffering by civilians) and good assistance from the film’s background scores. At the level of acting the co-producer John Abraham (Indian RAW agent in Sri Lanka) has not done badly with his unchanging expressions. Nargis Faqri, a British war journalist who speaks with American accent, is not very bad either. Characters like by Bala (Prakash Belawadi), the John’s boss in Sri Lanka and the RAW chief in India (Siddharth Basu) were the most impressive and appeared immaculate in their performances. Other characters, even minor ones, like SP (Rajeev Pandey) who taps phone conversations, were looking natural exhibiting a better range of expressions than John.

Slowly, as I emerged from this engaging entertainer, I found that film had grown on me. Although very important in its own right, I was not bothered about facticity of an avowedly fictional political thriller. Instead, the cinematic narrative of a real political event struck a chord: the violence of Sinhala majoritarian nationalism pitted against its Tamil ethnic minority, counter-violence of the Tamil ethno-nationalism, incalculable suffering of the civilians (Tamil as well as non-Tamils) and moreover, the role of Indian state and its security apparatus in the ethnic strife of Sri Lanka, last but not the least, the global network of military-industrial business interests in the security market of nation-states (referred to in passing but far from staying unnoticed). For a person like me, who watches almost all good-bad-ugly Hindi films, it is the sensitive (but safe!) treatment of such subjects that was a new experience.

Before I wanted to pen down my musings, howsoever politically inflated it may appear below, I checked how has this film been reviewed and received in (English) media. I found most of what I have written about MC’s craft above had already been told. However, only a couple of reviews had noticed what I mentioned in the preceding paragraph: the significance of the film’s ‘political’ subject. Reviews dealing with the political side of the film, I feel, have mentioned and lauded only the too obvious (or should I say convenient to comment upon!) a subject: human tragedy of the strife captured by brilliant camera work. Other glaring and not so glaring but certainly inconvenient aspects of the film have gone uncommented.

To be precise, in my opinion, the film does not show, for e.g., early background of the nasty workings of the majoritarian Sinhala nation-state, what actually in the early years Tamil resistance stood for, etc. I will refrain from commenting further on what MC does not cover. After all, MC is essentially an ‘Indian statist narrative’, which tries to be self-consciously realistic by resisting melodrama. John, an Indian army officer, is the sutradhar, the narrator-protagonist. He tells us the story in the capacity of a participant observer, a RAW agent in Sri Lanka. He is sent there to materialise what Indian state could not do politically and officially. John is there (like Rambo!) to curtail the hegemony of LTF (read LTTE) by pitting other Tamil nationalist rivals against Anna (read Prabhakaran). However, he fails because of betrayal by his locally entrenched superior (another RAW official who is coincidentally Tamil). A duty-bound official suffers personal injuries, physical as well as emotional. More importantly perhaps, the sutradhar – the honest Indian citizen is a broken personality who later sank himself into alcohol for his inability to avert a ‘national’ disaster. The primary point of his telling (starting with hackneyed scene of confession to a priest in the Church) is to underline his failure to save his ex-prime minister (Rajiv Gandhi), because of the moles in the state’s own apparatus. There are also other moments, big and small, in the film’s narrative, the political import of which, I believe, could not be ignored. Remember the crucial but brief conversation between ex-intelligence man (played by Dibang) and the protagonist John in Thailand when the actual motive of the planned assassination is told. Through the sutradhar, the audience is told that big business houses of world negotiate through footloose (ex-) diplomats and (ex-) security servicemen for the smooth running and profit of their international enterprise. They function extraterritorially; they buy passage for their business; and directly or indirectly finance killing, warfare, also sale arms (?) to the state or ‘non-state’ actors (here LTTE).

To state the obvious, what is clearly shown in this ‘Indian statist’ narrative is the messy and unapologetic role of the Indian state and its security agencies in the ethnic strife of Sri Lanka. What is more, the film also shows (in the largely nationalist vein) the ‘extra-legal’ global network of military-industrial business interests in the security market of nation-states in which men from Indian establishment may have a clear stake and involvement.

Let me explain. Indian state and its security apparatus are shown to be deeply involved in the extra-legal and extra-territorial activities in the neighbouring region. How security agencies of the big and powerful nation-states, and India is no exception, manoeuvre the political happenings of the region without caring for its tragic human consequences. Military establishments are no exception to corruption, individual greed for money and power. These are issues which are unsurprising to those who engage in some ways or the other, directly or indirectly, with everyday work and practice of the state security agencies. Yet these are also the issues, about which discussion is hardly found to be taking place in public– discussion which could raise questions on its moral-political legitimacy. Probably, a large part of its citizenry (of course those who do not face violence directly) believes in their nation-state’s projected holy self-image; that the nation and its saviour army are too virtuous and sacrosanct to be involved in such acts. Profoundly undemocratic aspect of such involvements is hardly ever talked about in open. On the contrary, such discussions are either systematically discouraged, or take place from the statist perspective where interest of the state-apparatus is projected as the ‘national’ interest. Those who would dare to raise such issues from the non-statist position are received with suspicion in the age of jingoistic nationalism nurtured and propagated by the state and its embedded media. If one talks about India’s diabolic role in sabotaging the democratic upsurge in neighbouring Nepal, if one talks about the possibility of Indian security establishment’s entrenched interest and role in tearing apart the democratic upheaval on its own frontiers, s/he runs the risk of being targeted as ‘anti-national’.

The film, intentionally or unintentionally, brings this issue home. Although told from the perspective of an Indian state official for whom such illegal acts are dirty necessities (for the problem always already exists and initiated by the ‘other’; only way to save the nation is to break the ranks of ‘other’ nation/s operational either in the form of state or waiting-to-be-state!), the film visiblises the darker side of security discourse of the nation-states. It also exposes the transnational nexus of business executives and (retired!) security hawks, a nexus that has clear political consequences not only at the levels of high politics of the nation-state but also for the mass of people in general. MC, apart from being good in terms of its craft, may also be appreciated for this.

However, appreciation of MC as a film, which renders the illegitimate aspects of nation-state and its security apparatus visible on the silver screen, is contingent upon the way the film is received. Critics’ articulation of MC’s reception in public sphere has hardly spelt out this problematic aspect of the movie. A general silence probably reflects consent or at best indifference to such practices of the security state. Tamil nationalist groups have raised political objections. (Some wanted a ban on the film, which is of course unjustified.) But theirs is a populist opposition which accuses the movie for being biased against the (now dead) Tamil militarist-nationalist chief Anna (Prabhakaran) and his fief, the LTTE – a waiting-to-be-state. An opposition which hardly takes into account the issues and problems underlined above.

Prabhat Kumar

Prabhat Kumar

Prabhat Kumar, Assistant Professor of History, Presidency University, Kolkata

समाज के हाशिए का सिनेमाई हाशिया: तत्याना षुर्लेई


 सिनेमा के सौ साल के इतिहास में  दलितों  के बारे में ज़्यादा फ़िल्में नहीं हैं। शुरू में ऐसा लगा कि गाँधी जी और उनके तरह के दुसरे सुधारकों की मदद से यह विषय लोकप्रिय होगा लेकिन जल्दी ही ऐसी फ़िल्में मुख्यधारा के विषय से बाहर चली गयीं। क्या भारतीय दर्शक ऐसी फ़िल्मों के लिए तैयार नहीं हैं? मुझे लगता है कि आधुनिक सिनेमा में सब कुछ दिखाया जाता है इसलिए इस विषय से इतना डर ज़्यादा अजीब लगता है। जब हम बॉलीवुड फ़िल्मों की संख्या के बारे में सोचेंगे तो यह देखेंगे कि दलित न सिर्फ़ जाति के वरीयता-क्रम से बाहर हैं बल्कि सिनेमा से भी बाहर हैं। 100 करोड़ से उपर की जनसंख्या वाले देश के सिनेमा में बहुजन-जीवन के स्वाभाविक-चित्रण का अभाव चिंताजनक है और इसका एक बड़ा कारण संभवतः यह है कि बहुजनों का बड़ा हिस्सा अभी भी सिनेमा के उपभोक्ता समुदाय में तब्दील नहीं हुआ है। यह तब तक नहीं बदलेगा जब तक उनकी परिस्थितियों को स्वभाविक तरीके से नहीं दिखाया जाएगा। अगर हम दलित-समस्या पर ही केन्द्रित रहेंगे और सिर्फ़ सुधार के आग्रही के बतौर ही दलितों का चित्रण करेंगे तो वे कभी समाज के स्वाभाविक हिस्से की तरह कभी नहीं दिखेंगे।

अछूत कन्या

अछूत कन्या

समाज के हाशिए का सिनेमाई हाशिया

भारतीय व्यावसायीक फ़िल्मों में दलितों की अनुपस्थिति।

BY तत्याना षुर्लेई

एक पुरानी कहानी है – थाइलैंड में रहनेवाली एक राजकुमारी एक बड़ी नदी में जहाज पर यात्रा करती थी। नदी के किनारे खड़ी भीड़ तालियां बजाकर राजकुमारी और उसके साथ जाने वाले नौकरों का स्वागत करती थी। यह सब देखकर राजकुमारी अतिउत्साह में भीड़ की ओर कुछ ज्यादा ही झुक जाती है और जहाज़ से बाहर गिरकर पानी में डूब जाती है। जहाज़ और किनारे पर खड़े लोगों में से किसी ने उसकी मदद नहीं की। ऐसा क्यों हुआ? इन सारे लोगों में से किसी ने उसकी मदद क्यों नहीं की? राजकुमारी उस जहाज़ में बहुत सारे नौकरों के साथ यात्रा करती थी। उन नौकरों और किनारे पर खड़े लोगों से कोई न कोई तो मछुआरा ज़रूर रहा होगा जिसको अच्छी तरह तैरना भी आता होगा। इसका जवाब बहुत आसान है – राजकुमारी दुसरे लोगों से इतनी ऊपर थी कि किसी को उसको छूना मना था[1]।

अस्पृश्यता के अलग अलग प्रकार होते हैं।  Brian De Palma की फ़िल्म के द्वारा चर्चित ‘अस्पृश्यता’ के अलावा एक और का ज़िक्र करना चाहिए क्योंकि इसके बारे में सब लोगों को पता है। दूसरा मामला भारत से संबंधित है जहाँ एक दुसरे से छू जाना भयावह माना जाता है। दोनों में डर बराबर है मगर आधार अलग। देवी बनी हुई राजकुमारी या खतरनाक माफ़िया से डर और उनकी अस्पृश्यता भारतीय दलितों की अस्पृश्यता से बहुत दूर है।

बहुत सारे सुधारक जो भारत में रहते थे अछूतों की ज़िंदगी को बदलने की कोशिश करते थे लेकिन अजीब बात यह है कि इस काम में उन में से किसी ने फ़िल्म का इस्तेमाल नहीं किया। भारतीय निर्देशकों के लिए भी फ़िल्म अधिप्रचार (PROPAGANDA) के लिए उचित साधन नहीं लगता था। यह भी एक अजीब बात है क्योंकि अधिप्रचार के लिए फ़िल्म सब से अच्छा साधन है। फ़िल्म बनानेवाले लोग समाज सुधारकों के साथ काम नहीं करते थे। इसी प्रकार गाँधी जी जो अछूतों के लिए बहुत काम करना चाहते थे और करते भी थे लेकिन फ़िल्म की मदद से अपने सुधारों के बारे में कुछ नहीं बताते थे। उनके लिए फ़िल्म कभी अच्छी चीज़ नहीं थी और उन्होंने कभी पसंद  भी नहीं किया। उनके लिए फ़िल्में पतनशील पश्चिमी सभ्यता का एक और उदाहरण था या फिर साधारण मनोरंजन का एक छोटा सा साधन जिसका ज़िंदगी में कोई महत्त्व नहीं है। उन्होंने स्वीकार किया कि उन्होंने सिर्फ़ एक फ़िल्म देखी है। यह फ़िल्म 1943 वाली विजय भट्ट की ‘राम राज्य’ थी और शायद इसीलिए उन्होंने कभी नहीं सोचा कि यह मनोरंजन करने वाला, साधारण लोगों का तमाशा अपने पैदाइश से ही वह सब कुछ दिखाता जिसके बारे में वे बताते हैं[2]।

उदाहरण के लिए फ़िल्म की दुनिया में अलग अलग धर्म के लोग साथ साथ रहते हैं और यह बात किसी को कभी अजीब नहीं लगती थी। शुरू से ही ऐसी स्थिति थी कि अक्सर हिंदू धर्म के देवताओं या राजाओं का अभिनय मुसलमान अभिनेता करते थे और मुसलमान के पीरों या सम्राटों का अभिनय हिंदू अभिनेता। यह भी कोई नयी बात नहीं है और न कभी थी कि किसी समय में सब से लोकप्रिय अभिनेता मुसलमान होते हैं और दुसरे समय में हिंदू। ‘तीन खानों’, यानी आमीर खान, शाहरुख़ खान और सलमान खान की लोकप्रियता जो 1990 के दशक में थी, इसका अच्छा उदाहरण हो सकता है। इसी समय में ‘कुछ लोगों’ के लिए ऋतिक रोशन की सम्भावना का हिंदू धर्म से स्पष्ट संबंध था। उन ‘कुछ लोगों’ के लिए ऋतिक तीन खानों से जीतने के लिए आ गया और हिंदू धर्म मुसलमानों से जीतने के लिए[3], लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ऋतिक की लोकप्रियता के अतिरिक्त बाकी तीनों अभिनेता फ़िर भी मशहुर रहे। शाहरुख़ खान के साथ एक ध्यान देने योग्य घटना हुयी जो कि बहुत अच्छा उदहारण है। वह काम करने के बाद बहुत थके होने के कारण एक गाँव के पास गाड़ी में ही सो गया। जब उठा तो उसने गाँववालों की भीड़ देखा। गाँववाले आग्रह कर उसे एक घर में ले गए और वहाँ यज्ञ-वेदी के स्थान पैर  उसने अपनी तस्वीर देखी[4]। एक और ऐसी ही कहानी जिसके बारे में बताना मुझे उचित लगता है अशोक कुमार की है। वह अभिनेता जो विभाजन के बाद अपने स्टुडियो ‘बॉम्बे टाकीज’ में बहुत से मुसलमानों को काम देता था। एक बार वह अपने एक दोस्त के साथ स्टुडियो से घर जा रहा था। रास्ते में मुसलमानों का इलाका पड़ता था, जहाँ एक एक बारत जा रही थी। अशोक के दोस्त को डर लगा की बारत वाले उनके साथ कुछ बुरा बर्ताव करेंगे लेकिन भीड़ के लोगों ने अशोक कुमार को पहचान लिया, उन दोनों को स्वागत किया और उनको सब से अच्छा रास्ता दिखाया। दोस्त आश्चर्यचकित हो गया लेकिन अशोक कुमार ने उसको कहा कि मुझे एक क्षण के लिए भी डर नहीं था क्योंकि कलाकारों की कोई जाति या धर्म नहीं होता है[5]।

स्पष्ट रूप से फिल्मी- दुनिया की स्थिति इतनी अच्छी नहीं थी, जितनी आशोक कुमार के विचार में थी। उदाहरण के लिए देवानन्द धर्म के कारण सुरया से शादी नहीं कर सकता था। सुरया के परिवार ने उसको देव को छोड़ने का हुक्म दिया, क्योंकि देव हिंदु था। कुछ समय बाद सुरया को अफ़सोस हुआ लेकिन फैसला बदलने के लिए देर हो चूका था[6]। इसी तरह जब 1957 में नर्गिस को ‘मदर इंडिया’ में काम मिल गया तो कुछ लोगों को यह अच्छा नहीं लगा। वे नहीं चाहते थे कि देश का प्रतिरूप एक मुसलमान औरत हो[7]। फ़िर भी, हम यह कह सकते हैं कि ये सिर्फ़ छोटे उदाहरण हैं। फ़िल्म की दुनिया में धर्म का उतना महत्त्व नहीं था जैसे मामूली जीवन में।

इन उदाहरणों में हम लोग देख सकते हैं कि फ़िल्म में ‘अनुदारता से लड़ाई और कुछ अलग दुनिया दिखाने की कोशिश’ हमेशा कहानियों की स्तर पर होती थी। फ़िर भी, इसका मतलब यह नहीं है की ऐसी फ़िल्में कभी नहीं बनाई जाती थीं जिनकी कहानियों में अलग-अलग पूर्वाग्रहों से, दुर्गुणों से लड़ाई होती थी (धर्म के क्षेत्र से अलग)! इस तरह हम यह कह सकते हैं कि पहती फ़िल्म जो अस्पृश्यता के बारे में थी जो कि गाँधी जी के सुधार-आन्दोलन से प्रेरित थी Franz Osten की ‘अछूत कन्या’ जो 1936 में बनाई गई। यह फ़िल्म प्रताप नाम के ब्राहमण लड़का और कस्तुरी नाम की अछूत लड़की की एक दारुण प्रेम-कहानी है। कस्तुरी के पिता, जिनका नाम दुखीजा है, एक स्टेशन-मास्टर हैं और प्रताप के पिता की एक दुकान है। दुखीजा ने एक बार प्रताप के पिता की जिन्दगी बचायी और इस घटना से उन दोनों की बहुत अच्छी दोस्ती है। उनका अपने बच्चों की दोस्ती से कोई विरोध नहीं है लेकिन जब प्रताप और कस्तुरी की दोस्ती से प्रेम उत्पन्न होता है तो अचानक उन दोनों की जातियों का अंतर दिखाई देता है। यह अंतर जो पहले बिलकुल प्रकट नहीं था। प्रताप की अपनी जाती की एक लड़की से शादी की जाती है और यह शादी कस्तुरी के लिए कोई चौंकानेवाली या गज़ब बात नहीं है। अछूत लड़की के लिए यह सब इतना स्वाभाविक है कि वह प्रताप की पत्नी – मीरा से दोस्ती करती है। प्रताप के पिता की अछूतों से दोस्ती गाँववालों को पसंद नहीं है और जब इस कारण से उसके साथ दुर्घटना होती है तो दुखीजा उसके लिए जल्दी दवा लाना चाहता है और जाती हुई रेलगाड़ी को रोकता है। दुर्भाग्या से उसको न दवा मिलती है न कोई पुरस्कार मिलता है, बल्कि वह अपने काम से निकाला जाता है। उसके स्थान पर एक जवान लड़का आता है जिसका नाम मनु है। दुखीजा मनु और कस्तुरी की शादी करवाता है। दुर्भाग्यपूर्ण कि लड़की शादी को स्वीकार करती है और कोई फ़रियाद नहीं करती, तब भी जब उसको पता चलता है कि मनु की एक और शादी हो चूकी थी और उसकी पत्नी – कजरी उनके साथ रहने के लिए आ जाती है। कस्तुरी कजरी को दीदी बुलाती है और कभी कोई बुराई नहीं करती है। फ़िर भी मनु की दुसरी पत्नी को बड़ी ईर्ष्या है क्योंकि मनु सिर्फ़ कस्तुरी से प्रेम करता है। मीरा कजरी की सहेली है। पहली मुलाकात में प्रताप की पत्नी कजरी को कहती है कि उसका पति भी सिर्फ़ कस्तुरी से प्यार करता है। कजरी के मन में कस्तुरी को निकलाने की अशुभ राय आती है और दोनों औरतों की चुगली के कारण प्रताप और मनु के बीच बहुत बड़ा झगड़ा होता है। वे दोनों रेल की पटरी पर मार-पीट करते हैं और आनेवाली गाड़ी पैर ध्यान नहीं देते हैं। रेलगाड़ी को रुकवाने के चक्कर में कस्तुरी की मौत होती है। इस लज्जाजनक विषय को दिखाने के लिए, जो पहले किसी से नहीं दिखाया गया, इस फ़िल्म को बहुत सारी प्रशंसाएँ मिली[8]। वास्तव में 1936 में ऐसे विषय के बारे में बताना बहुत बड़ी बहादुरी थी। अफ़सोस की बात सिर्फ़ यह है कि इतने सालों में किसी दुसरे निर्देशक ने कुछ ऐसा नहीं किया। शायद Franz Osten के लिए ऐसी कहानी को दिखाना इतनी मुशकिल बात नहीं थी क्योंकि वह जर्मनी से भारत आया था और जिसके लिए यह विषय कोई बड़ा निषेध नहीं था। हमें फ़िर भी यह स्वीकार करना होगा कि फ़िरंगी होने के बावजूद Osten ने अपने दर्शकों को जो दिखाया उसके लिए उसने भारतीय समाज का बड़ी गहराई से अध्ययन और अनुभव किया। Osten का अनुभव उन स्थानों में अच्छी तरह दिखाई देता है जहाँ फ़िल्म के नायक और नायिका बिना किसी झिझक के अपने उपर आरोपित भाग्य को स्वीकार करते हैं और अपनी खुशी और सन्तुष्ट भविष्य के लिए लड़ाई नहीं करते हैं। दिलचस्प बात यह है कि फ़िल्म अपने दर्शकों को भी बहुत अच्छी लगी। हमें यह भी याद रहना चाहिए कि अच्छी व्यावसायीक फ़िल्म वह होती है जो सब को पसंद हो, सीधे-सादे लोगों को भी जो कि अक्सर बहुत रूढ़िवादी होते हैं। अगर ऐसे दर्शकों को अचानक विवादग्रस्त कहानी देखने की इच्छा होती है और देखने के बाद यह कहानी उनको पसंद है तो इसका मतलब यह है कि वे दर्शक कुछ न कुछ परिवर्तनों के लिए तैयार हैं। हो सकता है कि Osten की फ़िल्म उसी समय में लोगों को इसलिए पसंद थी क्योंकि वे गाँधी जी के दबाव में थे लेकिन यह भी सच है कि फ़िल्म का निषेध बिल्कुल हटा नहीं हुआ। प्रताप और कस्तुरी के बीच में प्रेम है और लड़का अपनी प्रेमिका को अक्सर छूता है। प्रताप के पिता अपनी दुकान की सब चीज़ें कस्तुरी को बेचते हैं। बहुत आश्चर्यचकित बात यह है कि एक क्षण में प्रताप कस्तुरी के साथ गाँव से भागना चाहता है और लड़की के इनकार के बाद भगवान को पूछता है कि उसने उसको भी अछूत क्यों नहीं बनाया! ऐसा उत्कर्षण एकदम नयी बात है जो अक्सर नहीं मिलती है। यह भी बुद्धिमानी वाली बात है जिसकी सहयता से हर दर्शक देख सकता है कि सिर्फ़ अछूत होने से कोई दोष नहीं है, समस्या तब उत्पन्न हो जाती है जहाँ दो जातियों के लोग एक दुसरे से प्रेम करते हैं। शादी के लिए समाज की अनुमति का अभाव फ़िल्म की सिर्फ़ एक कठिनाई है, लेकिन सबसे बहुत महत्त्वपूर्ण कठिनाई तो वह है जो सब को याद दिलाती है कि कई ऐसे निषेध होते हैं जिनको तोड़ना असंभव है। हम देख सकते हैं कि 1936 में भारतीय समाज थोड़े परिवर्तनों के लिए तैयार था लेकिन ज़्यादा नहीं। फ़िल्म में महत्त्वपूर्ण बात यह भी है कि नियमों तोड़ने की सज़ा लड़की को मिलती है। शायद यह उस विचार से संबंधित है कि एक जाति से दुसरी जाति के बीच किसी भी तरह के अतिक्रमण की सज़ा उसको मिलती है जिसकी जाति नीची है।

फिल्म की प्रस्तुतीकरण और पारंपरिक-शैली की परवाह किए बिना ‘अछूत कन्या’ बहुत बहादुर फ़िल्म है। इस बहादुरी का सबुत सबसे पहले यह है कि दुसरी ऐसी फ़िल्म के लिए हमें बहुत इंज़ार करनी पड़ी। 1959 में बिमल राय ने ‘सुजाता’ की फ़िल्म बनाई जो फ़िर से अछूत लड़की और ब्राम्हण लड़के के प्रेम की कहानी है।

उपेन्द्रनाथ चौधरी और उसकी पत्नी चारू की एक छोटी बेटी है जिसका नाम रमा है। जब लड़की की उम्र एक साल की है तो चौधरियों के घर में एक दुसरी लड़की आती है। वह लड़की अनाथ है जिसके माता-पिता आसपास के गाँव में रहते थे। समस्या यह है कि वह लड़की अछूत है इसलिए श्रीमती चौधरी छोटी लड़की की देखभाल के लिए अपनी नौकरानी को हुक्म देती है। श्रीमती चौधरी का डर स्पष्ट है लेकिन इसी समय में आश्चर्य की बात यह है कि उसको अपनी बेटी के अपवित्र हो जाने से डर नहीं है। जबकि अछूत लड़की को वही आया को देती है जो छोटी रामा की देखभाल करती है। आया को भी इस स्थिति में कोई समस्या नहीं है और वह नयी बच्ची की देखभाल करती है यद्यपि छोटी लड़की उसकी जाति से भी नीचे की है, लेकिन ऐसा शायद इसलिए है कि आया को वही करना चाहिए जो मालिक कहते हैं और उसको किसी भी तरह की शिकायत करने का भी अधिकार नहीं है। उपेन्द्रनाथ जल्द ही अपनी पत्नी के व्यवहार से विपरीत अछूत लड़की को स्वीकार करता है और उसका नाम सुजाता रख देता है। चारू को समाज से निकलने का बहुत डर है इसलिए उसको सुजाता से अपने पति के किसी भी तरह के संपर्क बहुत बुरे लगते हैं।

सुजाता को स्वीकार करने में सब से बड़ी बाधा बुढ़ी बुआ – गिरिबाला है। वह बहुत धर्मिक औरत है इसलिए एक पण्डित के साथ चोधरियों के यहाँ आती है। पण्डित के लिए अछूत लड़की से मिलना बड़ा अपमान है। वह समझ नहीं सकता है कि ऐसी बच्ची ऊँची जाति के लोगों को साथ कैसे रह सकती है और वह चौधरियों के घर को छोड़ने का निश्चाय करता है। उसके जाने से पहले जब उपेन्द्रनाथ उसको पूछता है कि उसके विचार में सुजाता और घर के दुसरे लोगों में सचमुच कोई बड़ा अंतर है, पण्डित कहता है कि अछूतों के शरीर से जहरीली हवा निकलती है जो आसपास के लोगों के लिए बहुत खतरनाक है। उपेन्द्रनाथ को यह बहुत मज़ेदार लगता है लेकिन पण्डित कहता है कि विटामिन को भी कोई देख नहीं सकता है पर इसका मतलब नहीं है कि ऐसी कोई चीज़ नहीं होती है।

पण्डित की सोच एक दुसरे पण्डित के विचारों से मिलती-जूलती है। बटुप्रसाद शर्मा शास्त्री बनारस के एक मंदिर में गुरू है और 2007 में बनी स्टालिन कुरूप के एक वृत्तचित्र ‘India Untouched: Stories of a People Apart’ का एक चरित्र। इस पण्डित के मन में भी बहुत सारे अजीब उदहारण होते हैं जिनके अनुसार अछूतों को अपने भाग्ये को स्वीकार करना चाहिए और जीवन को बदलने के बारे में सोचना मना है। पण्डित के अनुसार जिस मनुष्य को हवाई जहाज़ को चलाना नहीं आता है वह उसे नहीं चलाएगा। वैसे ही अछूतों को सिर्फ़ यह करना चाहिए जो परंपरा के अनुसार उनको हमेशा करना था। स्टालिन कुरूप की फ़िल्म में एक और ब्रहमाण है। वह कहता है कि हर व्यक्ति अपने काम करने के लिए पैदा होता है और वह सिर्फ़ वही काम कर सकता है जो उनके पूर्वज शताब्दियों से करते आये हैं। वह ब्राम्हण है, उसको चिंतन करना अच्छी तरह आता है और यह उसके लिए आसान है जब कि दुसरों के लिए असंभव। वैसे ही सफ़ाई करनेवाला या नाई को भी ऐसे ही कौशल आते हैं जिसके बारे में ब्राम्हणों को बिल्कुल ज्ञान नहीं है। कभी कभी पश्चिम के लोगों को यह असंभव लगता है कि 21 शताब्दी में भी लोगों के अंदर इतने पूर्वाग्रह होते हैं! लेकिन, ये दो उदहारण अच्छी तरह दिखाते हैं कि बिमल राय की ‘सुजाता’ का पण्डित कोई अतिरंजित व्यक्ति नहीं है बल्कि भारत में सचमुच में ऐसे लोग हैं जो आज भी इन बेतुकी बातों पर विश्वास करते हैं.

सुजाता चौधरियों के घर में रहकर बड़ी हो जाती है लेकिन यहाँ एक और विरोधाभास दिखाई देता है। चारू लड़की को कभी नहीं छूती और अपने पति को हमेशा घुड़की देती है जब उपेन्द्रनाथ अछूत लड़की के पास जाता है। अजीब बात यह है कि इसी समय में वह अपनी बेटी रामा को सुजाता के साथ खेलने की अनुमति देती है। सुजाता की स्थिति एक उपेक्षिता सी है – वह स्कूल नहीं जाती है, घर पर मता-पिता की देखभाल करती है और उद्यान में फूलों की। सुजाता की इस हालत के बावजूद उसकी सौतेली बहन उसके प्रति कभी बुरा व्यवहार नहीं करती है, फ़िर भी दिलचस्प बात यह है कि रमा को अपनी सौतेली बहन कि स्थिति कभी भी अजीब नहीं लगती है। रमा को मालूम नहीं है कि सुजाता उसकी सौतेली बहन है फ़िर भी वह माता-पिता से कभी नहीं पूछती है कि सिर्फ़ मैं ही स्कूल क्यों जाती हूँ और केवल मेरा ही जन्मदिन क्यों मनाया जाता है! घर के लोग चाहते हैं कि रमा की शादी अधीर से होती। अधीर एक जवान लड़का है जो गिरिबाला के साथ रहता है। जब वह पहली बार चौधरियों के घर आता है तो उसको सुजाता के उपर प्रेम आता है। उसका प्यार बहुत गहरा है और वह तब भी नहीं बदलता है जब उसको पता चलता है कि सुजाता अछूत जाति की लड़की है। अधीर अपने घर को छोड़ने के लिए तैयार है क्योंकि वह सिर्फ़ सुजाता से शादी करना चाहता है। चारू सोचती है कि उसकी सौतेली बेटी ने जानबूझकर अधीर को लुभाया क्योंकि उसको रमा के प्रति ईर्ष्या थी और वह अपनी बहन से प्रतिशोध लेना चाहती थी। सुजाता पर चिल्लाने के समय चारू अचानक सिढ़ियों से गिरती है और उसकी हालत बहुत गंभीर है। चारू के इलाज के लिए रक्त-आधान की ज़रूरत है। दुर्भाग्य से पति, रमा और अधीर का ब्लड-ग्रूप चारू से नहीं मिलता है पर सुजाता का वही है जिसकी जरुरत है। इस तरह सुजाता अपनी सौतेली माँ की जिन्दगी बचा सकती है।

यह दृश्य जहाँ रक्त-आधान चल रहा है बहुत दिलचस्प है क्योंकि हम यहाँ स्पष्ट रूप से देख सकते हैं कि सुजाता के खून के बारे में सुनकर उपेन्द्रनाथ बहुत अश्चार्यचकित हो जाता है। वह आदमी हमेशा सुजाता की रक्षा करता था और पण्डित के पागल विचारों पर हंसता था लेकिन कहीं अंदर में शायद वह भी सचमुच सोचता था कि अलग अलग जातियों के लोगों में ऐसे अंतर होते हैं।

बिमल राय की फ़िल्म अछूतों की पहली फ़िल्म बहुत सालों के बाद बनाई गई लेकिन इसमें भी गाँधी जी के विचारों से स्पष्ट संबंध है। सुजाता अक्सर नदी के किनारे जाती है और वह समय बिताने के लिए उसकी सब से अच्छी जगह है। जब उसको पता चलता है कि वह अछूत जाति की एक लड़की है जिसको चारू और उपेन्द्रनाथ ने गोद में लिया है, वह निराश होकर नदी के पास आती है और तेज़ बारिश में भींग जाती है। वह आत्महत्या करने का निश्चय करती है लेकिन जब पानी की तरफ़ आती है तब उसकी साड़ी का आँचल पास ही खड़ी गाँधी जी की मूर्ती से फँस जाता है। सुजाता मूर्ती की ओर देखती है और बारिश की बूंदें जो गाँधी जी के चेहरे पर बहती हुई आँसू जैसी दिखाई देती हैं।

गाँधी जी एक मात्र सुधारक नहीं है जिनका फ़िल्म में ज़िक्र है। रमा के कॉलेज में एक नाटक दिखाया जाता है जिसे देखने के लिए वह सारे परिवार को बुलाती है। समस्या यह है कि गिरिबाला नहीं चाहती है कि सुजाता भी जाए और वह बेचारी घर पर रहती है। जो नाटक दिखाया जाता है वह रबीन्द्रनाथ ठाकूर का ‘चंदलीका’ है। नाटक देखती हुई गिरिबाला को यह बहुत उचित लगता है कि स्कूल के स्टेज पर खड़े बुद्ध अछूत लड़की के हाथों से पानी लेते हैं और सभी जातियों की बराबरी के बारे में व्याख्यान देते हैं। गिरिबाला यह नहीं देखती है कि नाटक की अछूत लड़की और सुजाता में कोई अंतर नहीं है। यह व्यंग्य ऐसे लोगों के प्रति किया गया जिनके लिए सुधार सिर्फ़ एक प्रचार वाक्य हैं। फ़िर भी फ़िल्म की अंत में गिरिबाला भी यह साबित करती है कि प्यारे अधीर के लिए वह अपने विचारों को छोड़ सकती है। जब अधीर घर को छोड़ना चाहता है तब गिरिबाला सुजाता को स्वीकार करती है और कहती है कि शायद वह सचमुच पुरानी पीढ़ी की मानसिकता की वाहक है, उसे अब युवा विचारों को जगह देनी चाहिए।

अफ़सोस की बात यह है कि वास्तविकता हमको अच्छी तरह दिखाई देती है कि युवा आदर्शवादियों के सब सुधार असफल हुए और बॉलीवुड ने फ़िर से कभी ऐसी कहानी नहीं दिखाई। ‘सुजाता’ ‘अछूत कन्या’ की ही तरह बहुत सुगम फ़िल्म थी इसके बावजूद कि बिमल राय Franz Osten से आगे चला गया और उसने अछूत लड़की का ब्राहमण लड़के से शादी को संभव बनाया। व्यावसायीक सफलता के बावजूद सिनेमा के निर्देशकों को इस विषय से बड़ा डर है। ‘सुजाता’ के समय से भारत में बहुत मजबूत फ़िल्में बनी हैं और बहुत से निषेध टूटे भी हैं। फिर भी, अंतर्जातीय और विधवा विवाह आज भी मामूली दर्शकों को अनुचित लगते हैं।

सिनेमा की मुख्यधारा से अलग रहने वाले निर्देशकों का तरीका कुछ अलग ही होता है इसलिए वे आक्सर व्यावसायीक फ़िल्मों के निर्देशकों से ज़्यादा आज़ाद होते हैं। उनके लिए दर्शकों का ख्याल इतने महत्त्वपूर्ण नहीं हैं लेकिन इसके बावजूद भी हिंदी सिनेमा में, कला फिल्मों, सामानांतर फिल्मों और स्वतंत्र फिल्मों में भी, दलित-समस्याओं के चित्रण का अभाव है। यह बात अजीब लगती है क्योंकि आज़ाद निर्देशकों के लिए औरतों की स्वतन्त्रता, धर्मों के क्षेत्र में लड़ाई या घूसखोरी दिखाने में कोई समस्या नहीं है। जाति के निषेध को तोड़ने की हिम्मत उपर्युक्त सारे क्षेत्रों से ज्यादा चुनौती-पूर्ण है.

बहु-चर्चित निर्देशक श्याम बेनेगल ने, जिन्हें कई-एक राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुके हैं, अपनी पहली फ़िल्म 1974 में बनाई। इस फ़िल्म का नाम ‘अंकुर’ है और यह भी अछूत औरत और ब्राहमण आदमी के रिश्ते की कहानी है। फ़िल्म के नायक सुर्या की शादी बचपन में हो गई है और अब उसे अपनी पत्नी का इंतज़ार करना है। वह अपने पिता जी की जमींदारी के अंतर्गत आने वाले एक छोटे गाँव में जाता है और देखता है कि उसके घर के पास एक सुंदर औरत रहती है। औरत का नाम लक्ष्मी है और वह अछूत है। उसका जीवन बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है क्योंकि उसका पति शराबी है। लक्ष्मी बच्चा चाहती है लेकिन किसी कारण से यह उसके लिए असंभव है। सुर्या चाहता है कि लक्ष्मी उसके लिए काम करे और उसको अपने लिए खाना पकाने की अनुमति देता है जो न सिर्फ़ गाँव वालों के लिए बल्कि लक्ष्मी के लिए भी आश्चर्यजनक है। एक दिन लक्ष्मी का पति कहीं जाता है और लक्ष्मी और सुर्या एक दुसरे के करीब आते हैं। आशिक़ों का संतोष अचानक नष्ट हो जाता है जब सुर्या की पत्नी गाँव में आती है। इसी समय को लक्ष्मी को पता चलता है कि वह माँ बननेवाली है। सुर्या की पत्नी को अच्छी तरह मालूम है कि उसके पति और लक्ष्मी के बीच में क्या है और वह दुसरी औरत को निकलाने की कोशिश करती है। जब सुर्या को बच्चे के बारे में पता चलता है तो वह लक्ष्मी को घर से निकलाता है। इसी समय लक्ष्मी का पति शराब छोड़कर वापस आता है। लक्ष्मी को डर है कि पति बच्चे के बारे में क्या सोचेगा लेकिन बह खुश होकर सुर्या के घर जाता है, यह सोचकर कि शायद उसको काम मिलेगा। ब्राहमण सोचता है कि अछूत आदमी उसको मारने के लिए आ रहा है और मार-पीट शुरू कर देता है। गाँव के दुसरे लोग भी इस मार-पीट में सूर्या को मदद देते हैं। जब लक्ष्मी को पता चलता है तो वह आती है और अपने पति की रक्षा करती है।

यह एक सरल कहानी है जिसमें निरंतर नैतिक शिक्षा नहीं है परन्तु फिल्म-निर्माण के लिहाज से कहानी का बहुत अच्छा चित्रांकन है। फ़िल्म में हम यह देख सकते हैं जो अक्सर पश्चिमी लोगों के लिए समझने में सब से मुश्किल है – क्या भारतीय समाज में अछूतों के प्रति सचमुच इतनी घृणा है जहाँ सेक्स करने और मारने के समय यह अस्पृश्यता खत्म हो जाती है। इस कहानी में सुधार के उपदेश या प्रचार के लिए शायद स्थान नहीं है लेकिन भारतीय समाज के जातिवादी जकड़न और ढोंग पर एक करारे व्यंग्य के कारण, जो कि भारतीय सिनेमा में अक्सर नहीं होता है, इसको याद रखना चाहिए। यह फ़िल्म मामूली दर्शकों के लिए नहीं है लेकिन सिनेमा का एक बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा तो ज़रूर है।

1981 में बनी सत्यजित रायकी ‘सद्गति’ ‘शतरंज के खिलाड़ी के बाद उनकी दुसरी हिंदी फ़िल्म है। दोनों फ़िल्में प्रेमचंद की कहानी पर आधारित हैं। प्रेमचंद की कहानी ‘सद्गति’ ‘चमार’ जाति से आने वाले दुखी नाम के एक व्यक्ति के बारे में है जो अपने बेटी की शादी करवाना चाहता है और इसके लिए ब्राहमण का आशीर्वाद चाहिए ताकि वह घर आकर शुभमुहूर्त निकाल सके। वह अछूत है इसलिए उसको ब्राहमण का बहुत लंबा इंतज़ार करना है। बेचारे आदमी के पास पैसा नहीं है इसलिए ब्राहमण उसको लकड़ी काटने का हुक्म देता है। आदमी भूख के कारण कमज़ोर है इसलिए अच्छी तरह काम नहीं कर सकता है। जब आखिर में ब्राहमण जाने के लिए तैयार है वह देखता है कि दुखी मर गया है। गाँव में रहने वाले अछूत मरे हुए आदमी को लेना नहीं चाहते हैं और ब्राहमण चुपचाप दुखी की लाश को दूर ले जाता है और वापस आने के बाद नहा लेता है और इसी समय जानवर खेत में लेटे हुए लाश को खाते हैं।

फ़िल्म प्रेमचंद की कहानी के बहुत नज़दीक है। अछूत आदमी को अलगअलग हुक्म दिये जाते हैं, इसके बावजूद की उसने भैंसों के लिए घास लाया है। वह सब कुछ करता है बार-बार गाँव के केंद्र में खड़ी हुई रावण की बड़ी मूर्ती के पास जाकर, लेकिन लकड़ी को काटना उसके मौत का कारण बना।

बेचारा दुखी मर जाता है। बाकी अछूतों को इस घटना के बारे में पता चलता है। इसलिए जब ब्राहमण उनके यहाँ आता है और उनको लाश ले जाने की हुक्म देता है तो वे लोग उसको ध्यान नहीं देते हैं। दुखी के समुदाय के लोगों ने लाश नहीं उठाने का फैसला कर एक तरह से ब्राह्मण द्वारा हुए अत्याचार का विरोध करते हैं। यहाँ एक ध्यान देने वाली बात यह है कि दुखी जिस लकड़ी को काट रहा था, वह ऐसी-वैसी लकड़ीनहीं थी। वह ब्राह्मणवाद और जातिवाद का कठोर गट्ठर था और कितने दुखी को उसके लिए मरना पड़ा है।

राय की फ़िल्म और प्रेमचंद की कहानी में असाधारण अनुकूलता है जो थोड़ी सी अश्चार्यजनक है क्योंकि यह लेखक भारत में बहुत लोकप्रिय है। प्रेमचंद की कहानियों के आधार पर फ़िल्म बनाना आसान बात नहीं है क्योंकि वह आमतौर पर समाजिक-दोषों के बारे में लिखता था, लेकिन समाधान नहीं बताता था और ऐसी कहानियां व्यापारिक फ़िल्मों के लिए ज़्यादा अच्छा विषय नहीं है क्योंकि उन फ़िल्मों को स्पष्ट समाधान चाहिए। नायक द्वारा खलनायक का वध जैसी कहानियां।

1991 में बनाई हुई ‘दीक्षा’ एक और बॉलीवुड के बाहर की हिंदी फ़िल्म है जहाँ दलितों का ज़िक्र है। फ़िल्म का आलेख कर्नाटक के लेखक यू. आर. अनंतमूर्ति की कहानी पर आधारित है। 1992 में इस फ़िल्म को हिंदी की सब से अच्छी फ़िल्म के लिए पुरस्कार भी मिला लेकिन फिल्म व्यावसायीक रूप से सफल नहीं हुई। फ़िल्म का नायक एक छोटा ब्राम्हण लड़का है जिसका नाम नानी है। वह गाँव में रहने वाले एक ब्राम्हण का एक बेटा है। नानी के पाँच भाई मर गए हैं इसलिए उसका पिता निश्चय करता है कि उसको पढ़ाई के लिए पण्डित उडूप के यहाँ भेज देगा ताकि भगवान उसको जीवित रखे। पण्डित के दो वरिष्ठ शिष्य हैं जो अक्सर नानी को बहुत कष्ट पहुंचाते हैं, पर पण्डित की एक जवान बेटी यमुना भी है जो विधवा बन गई और वह नानी को अपने बेटे के समान समझती है।

जब पण्डित गाँव से कुछ दिनों के लिए कहीं जाता है तो यमुना और गाँव के अध्यापक के बीच में प्रेम उत्पन्न होता है और विधवा गर्भवती हो जाती है। पण्डित के वरिष्ठ शिष्यों के कारण गाँव के सारे लोगों को पता चलता है कि यमुना माँ बननेवाली है। यमुना पाप से बचने के लिए गर्भपात करवा लेती है। इसके बाद उसका पाप और बड़ा हो जाता है। पण्डित अपने शिष्यों को घर भेज देता है और अपनी जीवित बेटी का अंतिम संस्कार करता है।

यह फ़िल्म विधवाओं की स्थिति के बारे में है लेकिन इसमें अछूतों की स्थिति को भी दर्शाया गया है। पण्डित का नौकर कोगा अछूत है। वह हमेशा ब्राहमण लड़कों की तरह पढ़ना चाहता था। गाँव में रहनेवाले दुसरे अछूत आदमियों के लिए कोगा का व्यवहार उनकी जाति का अपमान है। वे लोग सोचते हैं कि कोगा ब्राहमण बनना चाहता है और यह उनके लिए सब से बड़ा पाप है क्योंकि हर जाति को अपना कर्तव्य करना चाहिए। इसी तरह कोगा दोहरा परित्यक्त बन जाता है, न घर का न घाट का। एक बार अपनी जाति के कारण और दुसरी बार अपने व्यवहार-विचार के कारण जो उसकी जाति के लोगों के विचारों के अनुकूल नहीं है। जब कोगा की बुआ जो उसकी एक ही रिश्तेदार थी मर जाती है अछूत आदमी पण्डित से उसके लिए अंतिम संस्कार की भीख मांगते हैं। शुरू में पण्डित के लिए यह खयाल घृणित लगता है लेकिन बाद में जो कोगा चाहता है वह करता है।

अरुण कौल की इस फ़िल्म में, जैसे पहले बिमल राय की फ़िल्म में, एक बुढ़ी औरत है जो दुसरों को पापी मानती है जबकि अपने व्यवहार में सब से दुराचारी लगती है। जब वह पण्डित को अछूत औरत के लिए अंतिम संस्कार करते हुए देखती है तो इसके बारे में दुसरे ब्राहमणों को बताती है जिसके कारण गाँववाले पण्डित उडूप पैर ध्यान रखना शुरू कर देते हैं। अच्छी बात यह है कि गाँववाले छोटे नानी को नहीं देखते हैं क्योंकि यह लड़का एक मात्र ऐसा व्यक्ति है जिसके लिए कोगा वैसा ही मनुष्य है जैसे गाँव के सब बाकी लोग। नानी के कोगा के प्रति के व्यवहार का आधार बच्चे की ‘दुनियावी अज्ञानता’ है जो अच्छी तरह दिखाता है कि लोगों में अंतर स्वभाविक नहीं होते हैं, बस संस्कृति से संबंधित। नानी कोगा की बुआ के लिए प्रर्थना करता है और नहीं समझता है कि क्यों पण्डित का व्यवहार दुसरों को इतना बुरा लगा! इस छोटे लड़के की संवेदना का एक और बहुत अच्छा उदाहरण है इस दृश्ये में है जब नानी कोगा को लड्डू देता है। अपने काम के लिए कोगा को खाना मिलता है। यमुना उसको चावल देती है ताकि वह भूख से नहीं मरे और काम कर सके लेकिन नौकर को मिठाई देना कुछ और ही इंगित करता है और अच्छी तरह दिखाता है कि छोटा लड़का बड़ों से अच्छी तरह आत्मा की अवश्यकता समझता है। नानी का व्यावहार इसका भी सबूत है कि सब पूर्वाग्रह अंतर्जात नहीं होते हैं पर संस्कृतिक विकास से संबंधित हैं।

छोटे लड़के का खुद से गहरा आकर्षण कोगा के लिए थोड़ा दहशतपूर्ण है। वह वही व्यक्ति है जिसके लिए नियमों के अनुसार व्यवहार करना जरुरी है इसलिए छोटे बच्चों को अधिकारों तोड़ने की अनुमति नहीं देता है। एक दृश्ये में नानी कोगा को तंग करता है और सारा समय उसको छूने की कोशिश करता है। बेचारे कोगा को ऊँचे ताड़ का पेड़ पर चढ़ना चाहिए। कोगा और गाँव के दुसरे अछूतों का व्यवहार यह अच्छी तरह दिखाई देता है कि अछूत लोग खुद से सोचते हैं कि पारंपरिक सोच-विचार से लड़ाई करना उचित बात नहीं है। जिसका कोगा की बुआ की मौत के बाद के दृश्य में ज़िक्र किया गया है, इस में भी कोगा पण्डित से अंतिम संस्कार मांगता है सिर्फ़ इसलिए कि इससे बुआ की आत्मा को शांति मिलेगी। कोगा सोचता है कि उसको यह करना चाहिए क्योंकि वह उसे पुरे जीवन मायूसी देता रहा। इस मायूसी का आधार यह था कि वह अपनी जाति के कर्तव्य नहीं करता था और अलग चीज़ों में दिलचस्पी रखता था। इन सब के कारण वह शायद अच्छा और संवेदनशील आदमी बन गया, लेकिन गाँव में रहनेवाले लोगों के विचार में अच्छा अछूत तो नहीं ही था और इस कारण एक हास्यस्पद व्यक्ति बन गया था।

जैसे पहले ही ज़िक्र किया गया उपर्युक्त तीनों फिल्में पुरस्कारों के बावजूद लोकप्रिय नहीं हुई। लेकिन शायद इन फ़िल्मों के कारण मुख्यधारा विषयक के निर्देशक कुछ सालों के बाद यह सोचने लगे कि इस समस्या को अपने दर्शकों को धीरे-धीरे दिखाना चाहिए। बॉलीवुड फ़िल्मों में उपदेश और नए सवालों को पूछना दो चीजें हैं । कभी पुरी फ़िल्मी कहानी किसी समस्या के बारे में होती है और इस प्रश्न को हल करने के बाद यह दिखाई देती है कि असहिष्णुता से किसनी खत्रा आती है। इसी तरह की फ़िल्म का एक अच्छा उदाहरण अनील शर्मा की ग़दर: एक प्रेम कथा है। यह फ़िल्म भारत-विभाजन के समय एक सिख लड़के और मुसलमान लड़की के प्रेम के बारे में है। लड़की के पिता को इस रिश्ते से तब तक विरोध है जब तक उसकी बेटी की दुर्घटना नहीं होती है। इस के बाद वह सोचने लगता है कि उसके कारण प्यारी बेटी की मौत हो सकती थी और यह सोचने लगता है कि धर्म इतना महत्त्वपूर्ण नहीं है। हम देख सकते हैं कि मुख्य समस्या धर्मों के अंतर का है लेकिन फ़िल्म के अंत में दर्शकों को कहा जाता है कि ऐसे अंतर समाज के लिए ठीक नहीं है।

दूसरी तरह की फ़िल्मों में भी यही होता है जिस में तकरारी बातें बिल्कुल प्राकृतिक होती हैं। ऐसी फ़िल्म का अच्छा उदाहरण मनमोहन देसाई की ‘अमर, अकबर, एंथोनी’ है। इस फ़िल्म की कहानी बॉलीवुड में लोकप्रिय खोया-पाया के सूत्र पर आधारित है। यह बचपन में खोये हुए तीन भाइयों की कहानी है जिन से एक हिंदू परिवार में बड़ा होता है, दुसरा मुसलमान परिवार में और तीसरे को इसाई धर्माचार्य गोद में लेता है। इस फ़िल्म में धर्मों के अंतर के बारे में कोई कुछ नहीं कहता है और सच के प्रकाशन के बाद किसी को अजीब नहीं लगता है कि हर आदमी का अलग धर्म है और अलग धर्म की पत्नी।

कौन सी योजना सही है यह कहना आसान नहीं है इसलिए वे इन दोनों फ़िल्मों में नहीं आती है। लेकिन लगता है कि निषेध को स्वभाविक बनाना तब तक मुमकिन होता है जब तक दर्शक इसके लिए तैयार है इसलिए दलितों के बारे में ऐसी फ़िल्में नहीं होती हैं और उनकी फिल्में तब तक सामने नहीं आएँगी जब तक लोग विशवास नहीं कर लेते कि दलित सचमुच दुसरे लोगों से बराबर हैं।

आशुतोष गोवारिकर की ‘लगान’ की कहानी अवास्तविक दुनिया में चली जाती है लेकिन ऐसी दुनिया बनाकर भी अछूतों को दुसरी जातियों से बराबर होने की अनुमति नहीं दी गई। फ़िल्म एक छोटे गाँव के लोगों के बारे में है जो अंग्रेज़ों से लड़ाई करते हैं। फ़िल्म का नायक – भुवन लगान हटाने के लिए अंग्रेज़ों से क्रिकेट खेल में जीतने की तैयारी करता है। उसका समूह भारतीय समाज का दर्पण है। इसमें अधिकांश हिंदू है लेकिन इसमें भी मुसलमान और सिख हैं। यह और बात है कि इस छोटे गाँव में मुसलमान भी रहते हैं और एक सिख कहीं दूर से अचानक आता है और इसमें कोई आश्चर्य नहीं है क्योंकि फ़िल्म की दुनिया वास्तविक नहीं है। हमको इसके बारे में भी याद करना चाहिए कि सिख और मुसलमान दोनों बहुत अच्छे खिलाड़ी हैं जिनको निकालना बहुत मुश्किल है। उन के द्वारा किए गए दोष उनके कौशल की कमी से नहीं आते हैं बल्कि विरोधियों के छल खेल या अभागी परिस्थितों के परिणाम हैं।

खेल शुरू होने से पहले एक और खिलाड़ी की ज़रूरत है। आसपास के गाँवों में रहनेवाले तैयारी को देखने को लिए आते हैं और उनमें एक अछूत आदमी भी है जिसका नाम कचरा है। एक क्षण में गेंद उसकी तरफ आता है और भुवन कचरा को इसे फेंकने को कहता है। जब कचरा गेंद को फेंकता है तो सब लोग देख सकते हैं कि वह अच्छी तरह गेंद को घुमा सकता है। भुवन कचरा को तुरंत अपने समूह में लेना चाहता है लेकिन जब वह इसके बारे में बताता है तब समूह के बाकी लोग खेलने से इंकार करते हैं। पहले वे भुवन के सब अजीब उद्देश्यों को स्वीकार करते थे लेकिन अछूत के साथ खेलना उनके लिए बहुत बड़ी बात है। भुवन कचरा को छूता है और सब को बताता है कि भारत को इसीलिए इतनी आसानी से उपनिवेश बनाया गया है क्योंकि उनके लोग एक दुसरे को साथ दे नहीं सकते हैं। अंत में कचरा अंतिम खिलाड़ी बन जाता है और खेल में आखिरी दाँव उसे ही खेलना है। उसकी दुगनी ज़िम्मेदारी है – अगर हार जाएगा तो उसका नया स्तर चला जाएगा और वह दुसरों से पहले से ज़्यादा तिरस्कृत होगा। जो गाँववाले हर दुसरे व्यक्ति को माफ़ करते हैं लेकिन कचरा को उसकी जाति के कारण सज़ा मिल सकती है! शायद यह तनाव कचरा के लिए मुश्किल है इसलिए वह असफल हो जाता है। सैभाग्य से भारत को एक और मौका दिया जाता है और इस बार भुवन को आखिरी दाँव खेलना है। भुवन को सफल होने का नसीब मिलना बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। फ़िल्म को बनाने वालों ने अपनी कहानी के बारे में बहुत सोचा और उन्होंने बहुत अच्छी तरह से अछूतों के प्रति आदर दिखाया। भुवन और कचरा दोनों भाग्यशाली थे और इसलिए भारत जीत गया। अगर नायक के कौशल कचरा से बड़े होते तो दर्शक यह सोच सकते थे कि अछूतों को सचमुच विशवास नहीं करना चाहिए क्योंकि मुख्य क्षण में वे निराशाजनक होते हैं!

अंग्रेज़ों से लड़ाई के बारे में बनी फिल्म ‘लगान’ का भुवन आमीर खान बाद में इसी विषय पर बनी एक दुसरी फ़िल्म में भी आ गया। केतन मेहता की ‘मंगल पाण्डे: द राइजिंग’ में अंग्रेज़ लोग सब से पहले जातिवादी हैं। जब एक अंग्रेज़ी दावत के समय भारतीय नौकर से एक गोरी औरत पर शराब छलक जाता है तो उसको बहुत बड़ी सज़ा मिलती है। नौकर को पीटता हुआ अंग्रेज चिल्लाता है कि उसकी गोरी औरत को छूना मना है और उसे कुत्ते कह कर संबोधित करता है। फ़िल्म का नायक मंगल पांडे मार खा रहे नौकर की रक्षा करता है लेकिन बाद की दृश्य में वह भी दुसरों के प्रति तिरस्कार दिखाता है। वह ब्राहमण है जिसको हर सुबह नदी में नहाना है। एक दिन वापस जाने के समय वह सड़क पर सफ़ाई करनेवाले अछूत से टकराता है। मंगल का व्यवहार वैसा ही है जैसा पहले नौकर के प्रति अंग्रेज़ का था और वह भी अछूत को कुत्ते की उपाधि देता है।

हम कह सकते हैं कि फ़िल्म में दिखाए गए अंग्रेज़ लोग गोरी चमड़ी के कारण अक्सर खुद को ज़्यादा अच्छा समझते हैं लेकिन फ़िर भी उनके लिए भारतीय लोगों से सम्पर्क उतना घृणित नहीं है। अंग्रेज़ों के बड़े घरों में सारे भारतीय नौकर काम करते हैं और उनसे खाने या पीने की वस्तु लेने में कभी कोई समस्या नहीं थी।

फ़िल्म सिपाही विद्रोह के बारे में है और इसका मुख्य विषय कारतूस की समस्या है। अंग्रेज़ लोग बड़ी आसानी से भूल जाते थे कि भारतीय सिपाहियों के लिए धर्म कितना महत्त्वपूर्ण है और उनके नियमों की इज्जत नहीं करते थे। 1806 में सिपाही नयी वर्दियों का विरोध करते थे जिनके कारण वे अपनी जाति से निकाल जा सकते थे, 1825 में समुद्र पार करना जो कि समाजिक नियमों के विरुद्ध था और अफगानिस्तान के युद्ध के समय बड़ी समस्या यह थी कि हिंदू सिपाहियों के लिए रोज़ का स्नान असंभव था और उनको मुसलमानों से खाना खरीदना था। कारतूस की समस्या सच में धर्म और संस्कृति के अपराध का सिर्फ़ एक और उदाहरण था।[9]

मंगल का अंग्रेज़ी दोस्त उसको भरोसा दिलाता है कि कारतूस के बारे में जो अफ़वाह होते हैं वे सच नहीं हैं लेकिन जब सब को पता चलता है कि मंगल का अपवित्रीकरण हुआ है तो वह तुरंत अपनी जाति से निकाल जाता है। लगता है कि अंग्रेज़ अच्छी तरह नहीं समझते हैं कि यह बात कितनी महत्त्वपूर्ण है और उनकी अज्ञानता के कारण मनुष्य को समाज के बाहर जीना पड़ता है जो मौत से भी बदतर है। मंगल यह सब कुछ न सिर्फ़ अपने अंग्रेज़ दोस्तों को स्पष्ट करता है बल्कि विदेशी दर्शकों को भी जो कभी इसके बारे में कुछ नहीं जानते हैं या विशवास नहीं करते हैं कि क्या यह सब कुछ सचमुच इतना महत्त्वपूर्ण है!

अपने ऊँचे स्तर को खोने के बाद मंगल हीरा से रिश्ता बनाता है। यह भी स्पष्ट है कि अगर वह शुद्ध ब्राहमण होता तो प्यार के बावजूद वेश्या से करीबी रिश्ता कभी नहीं बनाता। और, यहाँ भी भारत और अंग्रेज़ का अंतर है। विदेशी सिपाहियों के लिए हर वेश्या लालच थामने के लिए होती है, भारतीय या कोई दुसरी वेश्याओं में उनके लिए कोई अंतर नहीं है। केतन मेहता की फ़िल्म अछूतों के प्रति के बुरे व्यवहार का विरोध नहीं करता है और सिर्फ़ यह दिखाता है कि जातियों से अंतर कितने महत्त्वपूर्ण हैं।

इसी साल में बनी हुई आशुतोष गोवारिकर की ‘स्वदेश’ में भी हम पश्चिमी दृष्टि से भारत देख सकते हैं लेकिन यह दृष्टि ‘मंगल पाण्डे: द राइजिंग’ से कुछ अलग है। फ़िल्म के नायक का नाम मोहन है और वह भारत को छोड़कर यू एस ए में रहता है जहाँ नासा में काम करता है। एक दिन वह अपने देश में वापस जाने का निश्चय करता है अपनी आया को ढूढ़ने के लिए। आया एक छोटे गाँव में रहती है जहाँ इंटरनेट नहीं है, बिजली अक्सर चली जाती है और सब लोग वैसे ही जीते हैं जैसे पुराने ज़माने में। गाँव आने के बाद मोहन का व्यवहार पश्चिमी पर्यटक जैसा है – वह काफिले में सोता है, सिर्फ़ बोतल का पानी पीता है और यह नहीं समझ सकता है कि सब लोग इस तरह गाँव में कैसे जी सकते हैं।

गाँववालों में से एक अछूत आदमी – मेला राम रोज़-रोज़ मोहन के लिए खाना लाता है क्योंकि उसको आशा है कि विदेशी मेहमान उसको अपने साथ अमरीका ले जाएगा। मोहन का व्यवहार फ़िर से विदेशी पर्यटक के जैसा है और वह बिना किसी नियंत्रण के गाँव वालों का खाना खाता है। हम यह सोच सकते हैं कि शायद उसको पता नहीं है कि मेला राम कौन-सी जाति से है लेकिन बाद में जब गाँव में रहने वाले बुढ़े लोग मोहन की आलोचना करते हैं फिर भी वह मेला राम से दोस्ती नहीं छोड़ता है। फ़िल्म में अक्सर दिखनेवाले दृश्यों में मोहन, मेला राम और डाकखाने में काम करनेवाला निवारण तीनों एक स्कूटर पर बैठकर कहीं जाते हैं। सच में मोहन बीच में बैठता है जिसके मदद से मेला राम और निवारण का स्पर्श हो नहीं सकता है लेकिन यह फ़िल्म इस उपाय का पहला उदाहरण हो सकता है जिस में कोई समस्या नहीं होता है और फ़िल्म की दुनिया का अनुक्रम प्राकृतिक, स्वाभाविक है। फ़िल्म के गाँव में अछूत दुसरे लोगों से कुछ अलग होते हैं लेकिन इतनी नहीं और अगर कोई उनसे दोस्ती करना चाहता है तो कोई उसका विरोध नहीं करेगा। यह छोटा कदम है लेकिन अच्छी तरह दिखाई देता है कि फ़िल्म वाले धीरे धीरे इस समस्या को दिखाने में साहसी हो रहे हैं।

फ़िल्म में एक और दृश्य है जिस पर हमें ध्यान देना चाहिए। गाँव में सिनेमा आता है और सब अछूत पर्दे की दुसरी ओर में बैठकर दर्पण में प्रतिवर्तन जैसा कुछ देख सकते हैं। यह बड़ी असुविधा नहीं है जब तक कि फ़िल्म को देखने के लिए उपशीर्षकों (Subtitles) की ज़रूरत नहीं है लेकिन ऊँचे और नीचों का ऐसा स्पष्ट विभाजन अपमानजनक है। फिल्म के समय बिजली फिर से चली जाती है और पर्दे के सामने बैठे हुए बच्चे रो पड़ते हैं। मोहन सब को तारे दिखाता है और इस समय गाना गाता है। गाने की पराकाष्ठा में पर्दा हटाया जाता है। मोहन अपना टेलीस्कोप लाता है और सब को तारे और चन्द्र को देखने की अनुमति देता है। सब से महत्त्वपूर्ण बात यह है कि मोहन को जातियों को बराबरी के बारे में कोई भाषण देने की ज़रूरत नहीं है जैसे पहले भुवन को था और सब लोग साथ साथ टेलीस्कोप से देखते हैं बिना किसी शिकायत के। ‘स्वदेश’ अछूतों के बारे में नहीं है लेकिन वो यहाँ भी आ गया है और इस तरह दिखाया गया है कि यह फ़िल्म अब तक की सब से बहादुर फ़िल्म है। यह भी महत्त्वपूर्ण है कि किसी ने इसके लिए फ़िल्म की आलोचना नहीं की और इसका मतलब यह है कि फ़िल्म को बनानेवाले ने कहानी में अच्छी तरह अपने विचार डाल दिए हैं जो मुख्यधारा विषयक फिल्मों के लिए बहुत ही आवश्यक हैं।

चर्चित समाजिक आलोचक, प्रकाश झा ने 1985 में ‘दामूल’ बनाई जिसमें अमीर लोगों द्वारा गरीबों का शोषण दिखाया गया है। फ़िल्म ने उसको मशहूर बनाया और फिल्म को पुरस्कार भी मिले। 2011 में उसने दलितों के बारे में ‘आरक्षण’ बनाई। यह फ़िल्म निचली जातियों की प्रतिरक्षा के बड़े दावों के बावजुद उन्हीं जातियों के बीच में विवादास्पद हो गई।

यह एक युवा– दीपक की कहानी है। बह दलित है इसलिए शिक्षित होते हुए भी उसको काम नहीं मिलता है। प्रतिष्ठित कॉलेज का मुख्य अध्यापक – प्रभाकर अनंद उसको अपने स्कूल में काम देता है क्योंकि वह आदमी सालों से सभी जातियों के गरीब तबके के युवाओं को शिक्षित करने के लिए संघर्षरत है। आरक्षण-निति की मदद से निचली जातियों को स्कूलों और विश्वविद्यालयों में स्थान मिलता है वह प्रभाकर के विचार में बहुत अच्छा समाधान है। फ़िल्म का खलनायक मिथिलेश सिंह है जिसके लिए सिर्फ़ पैसा सबसे महत्वपूर्ण है और जो प्रभाकर को नष्ट करना चाहता है। शुरू में फ़िल्म में आरक्षण की निति के बारे में एक वाद-विवाद है और आरक्षण के फ़ायदे और नुकसान बताये जाते हैं। अफ़सोस की बात यह है कि फिल्म अपने विषय से जल्दी भटक जाती है और हम दुराचार और पैसों से सच्चाई की जीत का अरुचिकर और थकाऊ धर्माचार देखते हैं जिस में ‘दामूल’ की सरलता तो बिलकुल ही नहीं है।

मिथिलेश अपना स्कूल स्थापित करता है और पैसेवाले लोगों को बताता है कि उनके बच्चों को सिर्फ़ उसके स्कूल में ऐसी शिक्षा मिलेगा जिसकी ज़िंदगी में ज़रूरत होगी। धीरे धीरे वह प्रभाकर के स्कूल के अध्यापकों को प्रलोभन देता है। प्रभाकर और दीपक गरीब-बच्चों को गोशाले में पढ़ाते हैं और अंत में जीत जाते हैं क्योंकि परीक्षा में उनके विद्यार्थियों को सब से ऊँचे अंक मिलते हैं। लगता है कि अमिताभ बच्चन ने निश्चय किया है कि अब वह भारीय समाज का अनुभवी परामर्शदाता बन जाए। माननीय अभिनेता का व्यवहार आजकल अक्सर शिष्यों को शिक्षा देनेवाले गुरु जी जैसा है और यह ख़तरनाक बात है क्योंकि इस प्रवृति के कारण उसकी फ़िल्में पहले जैसी अच्छी नहीं हैं। यह बड़ी अफ़सोस की बात है क्योंकि अमिताभ बहुत अच्छा अभिनेता है। ‘आरक्षण’ की चर्चा इसलिए करनी चाहिए क्योंकि फ़िल्म विवादग्रस्त बन गई। अगर लोगों को इस फिल्म में कहानी दिखाने-कहने का तरीका पसंद नहीं आया तो यह आश्चर्य-जनक बात नहीं होती क्योंकि इस क्षेत्र में फ़िल्म बहुत ही खराब है लेकिन दर्शकों की समस्या कुछ और ही थी। दिलचस्प बात यह है कि जिन दर्शकों को इस विषय से सम्बंधित ज़्यादा बहादुर फ़िल्में पहले ही मिल चूकी हैं उन्होंने इस फ़िल्म को देखने के बाद खुद को अपमानित महसूस किया।

निचली जातियों के दर्शकों को सब से खराब यह लगा कि फ़िल्म का नायक सैफ़ अली खान हो गया[10]। ऐसी स्थितियाँ पहले होती थीं और मैंने ‘मदर इंडिया’ का ज़िक्र किया लेकिन इस बार यह कहना मुश्किल है कि दर्शकों को अपमानित क्या लगा? क्या उनको अच्छा लहीं लगा कि अभिनेता मुसलमान है या उसका कुलीन वंश का होना जो कि फ़िल्म के उसके कार्य-भाग से संबंधित नहीं था[11]। सब से दिलचस्प बात यह है कि जिन लोगों को फ़िल्म पसंद नहीं थी वे ऐसे लोग थे जिनकी पक्षधरता का दावा फ़िल्म करती थी। दलितों के विरोध का मतलब यह हो सकता है कि आखिर में उन लोगों को अपनी नीतियों के बारे में पता है और अपनी सुविधा के लिए वे लड़ सकते हैं जो कि अच्छी बात है। फ़िर भी निराशा का कारण थोड़ा सा तकलीफ़देह लगता है अगर हम इस नायक को ध्यान से देखेंगे। दीपक बहुत अच्छा आदमी है लेकिन उसकी एक कमी है और यह ऐसी बात है कि वह बड़ी आसानी से अपना आपा खो सकता है और अकसर निराश होकर अपनी उग्रता का इस्तेमाल करता है। मिथिलेश से टकराना सब के बस की बात नहीं है, दीपक आता है और स्कूल को नष्ट करता है। पहले भी वह अक्सर दुसरों को मार देता है और उसे बोलने का सलीका नहीं है, यह सब नायक का बहुत बड़ा दोष है। दीपक की आक्रामकता का स्पष्टीकरण यह हो सकता है कि पढ़ाई के बावजुद निचली जातियों के लोग हमेशा अपरिष्कृत होंगे और शायद यह अच्छी बात है कि उन लोगों को ऊँचे स्तर का काम नहीं मिलता है क्योंकि वे खतरनाक हैं। दलितों की रक्षा करने के लिए फ़िल्म का ऐसा नायक अजीब लगता है, लेकिन समस्या है कि फ़िल्म के दर्शकों को नायक नहीं, अभिनेता पसंद नहीं था। अगर लोगों को नायक अच्छा नहीं लगता तो उनका क्रोध समझ में आने योग्य होता लेकिन अभिनेता का विरोध करना एक तरह से वही व्यवहार है जैसा दलितों के प्रति वर्षों से हो रहा है।

सब से निराशाजनक यह बात है कि कुछ भारतीय प्रदेशों में फ़िल्म को प्रतिबंधित किया गया और निर्देशक से फ़िल्म के कुछ दृश्यों को काट देने की मांग की गयी जिसका मतलब यह है कि अस्पृश्यता आजकल भी भारत में एक संवेदनशील विषय है। लेकिन अगर अछूतों की रक्षा करने के लिए बनाई हुई फ़िल्म के दृश्ये भी दलितों को अपमानित करते हैं तो दर्शकों का बिगड़ना आश्चर्यजनक बात नहीं है। इस फ़िल्म में प्यार को दिखाने की तरीका भी दिलचस्प है। प्रभाकर की बेटी और दीपक एक दुसरे से कुछ न कुछ प्यार करते हैं लेकिन उनका प्रेम फ़िल्म का मुख्य विषय नहीं है। हम यह बता सकते हैं कि नायक और नायिका की रिश्ता ऐसे उपाय का उदाहरण है जिसके अनुसार फ़िल्म कोई बात इस तरह दिखाता है मानो वे दुनिया के स्वभाविक नियम थे, लेकिन इसमें कुछ ऐसे अंश हैं जो हमको इस तरह से सोचने की इज़ाजत नहीं देती है। सब से पहले दर्शकों को पता नहीं है कि नायक और नायिका के बीच सचमुच प्यार है या सिर्फ़ गहरी दोस्ती, लगता है कि फ़िल्म बनाने वालों को ज़्यादा दिखाने से थोड़ा सा डर था और अगर ऐसा डर इस प्रकार की फ़िल्म में दिखाई देता है तो यह विषय दिखाने से कोई फ़ायदा नहीं है। दीपक और प्रभाकर की बेटी के बीच में अगर प्यार है तो इसे दर्शकों के मन में उतरना चाहिए है नहीं तो इसके होने या न होने से कोई फ़र्क नहीं पड़ता है। व्यभिचार को फ़िल्म में इतना स्थान देना और आरक्षण के बारे में स्पष्ट विचार नहीं दिखाना भी अच्छे सिद्धांत नहीं थे। फ़िल्म का रवैया इतना रक्षात्मक है कि इसे समाजिक समस्याओं में सम्बंधित बताना असंभव है, आप सभी को खुश कर के समस्याओं को संबोधित नहीं कर सकते हैं। निर्देशक को न सिर्फ़ सुधारों के बारे में बताना पर अपनी विचारों को भी दिखाने से डर है। ऐसे ही जगह में वे बहुत गंभीर और आडंबरपूर्ण भाषण डालते हैं जो शुरू में थकाऊ और बाद में हास्यास्पद होते हैं। यह फ़िल्म शायद बॉलीवुड की सबसे बेकार फ़िल्म है और इस कारण सचमुच उसको दिखाने से मना करना चाहिए था।

अंत में एक और विवादास्पद फ़िल्म की ज़िक्र करना उचित लगता है। शेखर कपूर की ‘बैन्डिट क्वीन’ 1994 में बनी हुई है और अछूतों के बारे में नहीं है लेकिन एक और समस्या का अच्छा उदाहरण है। यह फ़िल्म फूलन देवी के जीवन के बारे में माला सेन की किताब पर आधारित है। यह कहानी अच्छी तरह न सिर्फ़ यह दिखाती है कि हर व्यक्ति की ज़िंदगी में समाज की कितनी बड़ी भूमिका होती है लेकिन यह भी कि भारत जैसे देश में जहाँ समाजिक बुनावट इतना उलझा हुआ है कि अपने जीवन को तय करना बहुत मुश्किल है। फ़िल्म की फूलन देवी निचली जाति से है और गरीबी के कारण बचपन में उसकी शादी एक बुढ़े आदमी से हुयी है क्योंकि उसको लड़की के परिवार से बड़े दहेज की ज़रूरत नहीं थी। पति से लुटी हुई लड़की अपने गाँव वापस आती है लेकिन उसकी जीवन पहली जैसी हो नहीं सकती है क्योंकि पति को छोड़ने के बाद बदतहज़ीब हो गई है।

अरुंधती राय[12] एक मजेदार बात कहती है कि शेखर कपूर ने कहा था कि उसने अपने फ़िल्म में सत्य दिखाया फिर भी वह कभी फूलन देवी से मिलने नहीं गया और उस समय फूलन जीवित थी और जब वह अपनी फ़िल्म बनाता था तो उसी समय जेल से आज़ाद भी हुयी थी। निर्देशक अपनी नायिका को नहीं जानता था और उसने फूलन की जीवन की कहानी उससे कभी नहीं सुनी। फूलन की आत्मकथा माला सेन की किताब से कुछ कुछ अलग है और दोनों कपूर की फ़िल्म से बहुत अलग हैं। निर्देशक के लिए बलात्कार, बहुत सारी लूटपाट, गोलियों की आवाज़ सब से महत्त्वपूर्ण लगती हैं। यह सच ज़रूर है कि इन घटनाओं के कारण फूलन के जीवन में बहुत बदलाव आया लेकिन उसके जीवन में आये इन सारे बदलाव के मूल स्रोत इन घटनाओं में नहीं थे। फ़िल्म फूलन के परिवार की समस्याओं के बारे में कुछ नहीं कहता है। उसके जीवन की सारी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं का कारण उसके चाचा का प्रतिशोध था। फ़िल्म देखते हुए कि पश्चिमी दर्शकों के लिए यह समझना मुश्किल है कि फूलन की इन सारी स्थितिओं का मूल उसकी जाति है। जिस गिरोह का नेता निचली जाति में पैदा हुआ विक्रम है और एक तरह से गिरोह की लड़ाइयों का आधार भी है लेकिन लोग सिर्फ़ अलग अलग जातियों के नाम बोलते हैं और इन सब का अर्थ पश्चिमी दर्शकों के लिए स्पष्ट नहीं है। इसी समय दिखाया जाने वाला यौन-शोषण दर्शक का ध्यान मुख्य विषय के विपरीत कर देता है। भारतीय दर्शक के लिए जातियों से संबंधित दुर्व्यवहार को समझना ज़्यादा आसान है लेकिन सिनेमा के इतिहास में पहली बार औरत के प्रति होने वाला क्रूरतम यौन-अपराध दिखाया गया। यह बात गहरी समस्याओं से आगे निकल जाती है और सब से महत्त्वपूर्ण खबर छिप जाती है। भारत में कपूर की फ़िल्म के बारे में लिखने वाले लोग अक्सर इस पर एकाग्र होते हैं कि इस फ़िल्म में पहली बार नंगी औरत दिखाई जाती है। यह सच नहीं है क्योंकि नंगी औरत को हम अंग्रेज़ी वाली गिरीश कर्नाड की ‘उत्सव’ में देख सकते हैं लेकिन निराशाजनक बात यह ज़रूर है कि कपूर की फ़िल्म की लोकप्रियता इसी के कारण हुई है। शायद यह सच है कि ऐसे विवादात्मक दृश्यों को देखने के लिए ही लोग सिनेमा जाते हैं लेकिन कभी कभी याद रखना चाहिए कि अगर ऐसी चीज़ें ज़्यादा होंगी तो दर्शक दुसरे महत्त्वपूर्ण विषय नहीं देख पाएगा और वे विषय नंगे शरीर से शायद ज़्यादा आवश्यक हैं। हिंदी सिनेमा का उदाहरण देकर हमने देखा कि सिनेमा के सौ साल के इतिहास में अछूतों के बारे में ज़्यादा फ़िल्में नहीं हैं। शुरू में ऐसा लगा कि गाँधी जी और उनके तरह के दुसरे सुधारकों की मदद से यह विषय लोकप्रिय होगा लेकिन जल्दी ही ऐसी फ़िल्में मुख्यधारा के विषय से बाहर चली गयीं। क्या भारतीय दर्शक ऐसी फ़िल्मों के लिए तैयार नहीं हैं? मुझे लगता है कि आधुनिक सिनेमा में सब कुछ दिखाया जाता है इसलिए इस विषय से इतना डर ज़्यादा अजीब लगता है। जब हम बॉलीवुड फ़िल्मों की संख्या के बारे में सोचेंगे तो यह देखेंगे कि दलित न सिर्फ़ जाति के वरीयता-क्रम से बाहर हैं बल्कि सिनेमा से भी बाहर हैं। 100 करोड़ से उपर की जनसंख्या वाले देश के सिनेमा में बहुजन-जीवन के स्वाभाविक-चित्रण का अभाव चिंताजनक है और इसका एक बड़ा कारण संभवतः यह है कि बहुजनों का बड़ा हिस्सा अभी भी सिनेमा का उपभोक्ता समुदाय में तब्दील नहीं हुआ है। यह तब तक नहीं बदलेगा जब तक उनकी परिस्थितियों को स्वभाविक तरीके से नहीं दिखाया जाएगा। अगर हम दलित-समस्या पर ही केन्द्रित रहेंगे और सिर्फ़ सुधार के आग्रही के बतौर ही दलितों का चित्रण करेंगे तो वे कभी समाज के स्वाभाविक हिस्से की तरह कभी नहीं दिखेंगे। उपर्युक्त वर्णित सारी फ़िल्मों में से ‘स्वदेश’ और ‘अंकुर’ ने सब से अच्छा काम किया है क्योंकि इन फ़िल्मों में दलितों के प्रति कोई बड़ा पूर्वाग्रह नहीं दिखाया गया है।’अछूत कन्या’ और ‘सुजाता’ में भी दलितों का जैसा चित्रण किया गया है वैसा आज दिखाना असंभव लगता है, इसलिए हमको शायद पुराने जानकारों से फ़िर से ज्ञान लेना पड़ेगा क्योंकि वे अधुनिक निर्देशकों से ज़्यादा बहादुर थे।

[1] http://whatismatt.com/thailand-urban-legends/ (13.01.2012).

[2] U. Woźniakowska, Bollywood, Pragnienie prawdy i tęsknota za    mitem, Kraków 2010, p. 48.

[3] A. Chopra, King of Bollywood, Shah Rukh Khan and the Seductive World of Indian Cinema, New York, Boston 2007, p.     187.

[4] S. Mehta, Pociąg do Bollywood, „National Geographic”, 2, 2005, p. 79.

[5] N. Ghosh, Ashok Kumar. His Life and Times, New Delhi 1995,     p. 67-68.

[6] A. Chowdhury, Dev Anand. Dashing Debonair, New Delhi, 2004,    p. 17-18.

[7] M. Bose, Bollywood. A History, Glouceshire, 2006, p. 205.

[8] R. Dwyer, 100 Bollywood Films, London 2005, p. 12-13.

[9] J. Kieniewicz, Historia Indii, Wrocław 1980, p. 608-610.

[10] http://timesofindia.indiatimes.com

[11] http://www.hindustantimes.com

[12] http://www.sawnet.org/books/writing/roy_bq1.html

Tatiana Szurlej

Tatiana Szurlej

तत्याना षुर्लेई एक Indologist और फिल्म-आलोचक हैं। फिलहाल पोलैंड के शहर क्राकोव सिथत Jagiellonian University में The Courtesan Figure in the Iconography on Indian Popular Cinema:Tradition, Stereotype, Manipulation.   नामक विषय पर पीएचडी के लिए शोधरत हैं।

साभार- हंस फरवरी 2013, सिनेमा के सौ साल 

A Cinematic Framing Of Urban-Polpular cultural Forms: Heroine (2012): Dhiraj K Nite

BY Dhiraj K Nite

The Bollywood has recently benefited from insights of a couple of radical-liberal craftsmen. These craftsmen claim to bring up reflexive realism to the commercial cinema. Madhur Bhandarkar is one of them. The output is a critical narcissistic engagement with the dominant theme of commercial cinema, i.e., the life and culture of wealthy individuals and moneyed professional. Bhandarkar has offered us, thus, an intense movie Heroine. Here, he continues to pour out his critical liberal take on his subject which we have seen him doing in Page 3, Corporate, and Fashion(2008). Very soon I will suggest where he makes departure in his latest venture.

The Heroine’s protagonist, Mahi Arora (Karina Kapoor) yearns for love, company and certainty in her life. She does so in the midst of her pursuit of climbing and remaining at the peak of achievement and success. It is a 19thc bourgeois notion of love, simply another name of a ‘marriage of convenience’ rather than of love. It is contrary to a meaning of love which we find in Sartre’s and Fanon’s work(1952): Love means a person is in the quest for something what s/he likes to have within him/her. Mahi is a celebrity, Bollywood star and a character of the 21st century’s matured professional world. The 19thc bourgeois notion of love descends in Mahi’syearning from the intervention made by her mother. Mahialready had two moments of break up in her youthful life. These moments failed to perturb and rub her professional spirit and the ‘happy-going’ orientation of life. The mother’s intervention reorients her at one stroke. The sharp editing of the movie and its singlefocus do not lend this shift become preachy nor penetrative.

Heroine DVD Cover

Heroine DVD Cover

Hereon, Bhandarkar repeats himself in this movie what he has already created in Fashion(2008). Mahi looks for the combination of aninsuring marital life and professional stability. The goal eludes her while it is testing her patience and emotional depth. She proves herself perturbable, and emotionally vulnerable. She pays price for it. The third moment of break up visits her to take an irreparable toll. The smoke of cigrate, galas of alcohol and half-lit flat accompany her inner turmoil. [The light management is splendid in the movie.] In between Bhandarkar once again reveals to us how individualistic and economistic have become the foundation of marital life of Page 3 couples? How promiscuity not just undercuts the façade of monogamy, but functions as a tool to greasing business transection?

Mahi and her advisors ensure her comeback by exploiting sexual transection with a man of substance. The latter is this time no other than a cricket star, i.e., another Star of our cultural, entertainment industry. Bhandarkar’s take on a nexus between the cricket star and the Bollywood star is astute. Only a flamboyant batsman rather than a destructive bowler could become a part of this nexus. Nonetheless, the character of Mahi does something what is hitherto infrequent to occur in Indian cinema. Before it, we have seen in the movie Gulaland Ishqiyathat a female protagonist deploys her sexual possession to hunt for her worldly pursuit.

Mahi is back in the industry. Sooner than later, she is made to realise that she should prove that she is an actor alongside a Star. She divulges in an Art cinema for an image change and become invulnerable to her mainstream male co-star. Bhandarkr’s momentary take on this matter amuses us with the revelation of the inner world of venerate artists of the Art cinema. Its artist is forthright, even when s/he is not unproblematic.

The main plot tells us that Mahi has learnt to prioritise her career first than any pull of certainty in sexual/marital life. The latter should wait. This maturity, or to call a decision, brings up at her door fourth break-up; a reunion with an erstwhile beloved; and one more round of break-up with him. In fact, the latter break-up follows Mahi’s newly acquired inability to become indulgent in the loving relationship; and that she could undertake only in favour of professional achievement. Finally, she also learnt to generate a sexual scandal around herself to attract viewers to her movie. This has become now an ‘acceptable’ pattern in the industry. After all, our memory is short about this! The scandal brings roaring favour of the viewer to her low-budget woman-centric movie (Annie), and new film offers pack her for next two years.

The door of professional achievement is an open one to her. Like Fashion’s MeghnaMathur, Mahi ends up in Europe. Meanwhile, both have gained solace and certain meaning of life by becoming caring to astruggling professional in the same industry.

Unlike Meghna, Mahi finds genuine pleasure and peace of mind when she quits the industry and merges herself in the crowd and immerses on the street. This is a romantic departure made by Bhandarkar in this movie.The explanation for this difference refers to the realisation made by Mahi how lonely an actress could become in the end of the day in this world of celebrity? How depersonalised and self-serving are participants in that world? This is a truly romantic philosophical input, and it demands suspension of any disbelief against its ‘upside-down’ impact on Mahi.

The focus on a continually evolving persona of Mahi and the application of sharp-edge editing has made the movie absorbing. A viewer may not feel cheated. One would definitely be perplexed by the fact of little search for the root of flicker and fickle in human nature of Mahi. She appears no more than a lurking symptom. Isn’t it her origin in a broken, emotionally drained family in-itself a symptomatic element of something else? However, we are witnessing more and more such characters, who may not be meeting the same end.

The Heroine is a commentary on a nexus among professionals (private lives of men, women and transgender), their profession (economic activity), and entertainment capital. Bhandarkarhighlights how the first two are inextricable in the regime of the third, as we find these in the Bollywood. Here, crockery, duplicity and double-crossing define business transection and are rules of the game. Im/morality submits to the regime of entertainment capital. When Mahi feels disgusted with it, she should become an onlooker and prefer oblivion.

Bhandarkar further brings to us a radical-liberal commentary on the popular cultural forms of urban life. The urban cultural forms include the cinema, fashioning, media channels, and cricketing sport. Glamour, luxury, and boisterous living seem to drive its participants. They value human links to the point when they find them useful to satisfy base desires for money, veneration and carnal sensation. They share few deeper concerns for camaraderie, collective consciousness for love and humanism. Indeed, the collective unconscious predominates. How much the reaction of Mahi in the ways of withdrawal from this devouring collective unconscious is a desirable option to others? Pessimism of Bhandarkar marks it different from what his Fashion and Page 3proposed to us.

Yet, Bhandarkar’s pessimist resolution to the problem does not loom large on the movie. The casts have been eager to step into the director’s frame. They have gratified the close-up camera by sufficiently contorting their facial muscle, and reserving their body language to bring characters on the screen. These sound technical sides of the movie reins pessimism of the resolution from casting any uninviting spell over viewers.

Dhiraj k NiteDhiraj Kumar Nite, A Social Scientist, an emerging film critic,  University of Johannesburg,  Ambedkar Univeristy Delhi. You can contact him through   dhirajnite@gmail.com.

फिल्मी दुनिया की सीख: इब्राहीम जलीस

By इब्राहीम जलीस

पाकिस्तान और भारत में जहां गरीबी और मुफ़लिसी, दुनिया के सारे देशों से कई गुना अधिक है, वहां साधारण आदमियों के लिए सब से अधिक सस्ते प्रकार का मनोरंजन, सिनेमा है। दिन-भर के कामकाज और मेहनत मशक्कत के बाद लोग-बाग जब थके हारे अपने घर वापस लौटते हैं तो घर में एक बीमार और कुरूप बीबी और रोनी सूरत के कुछ बच्चे उनकी दिन-भर की कोफ्त और थकान में और अधिक वृद्धि कर देते हैं। इसी वजह से आम लोग यह चाहते हैं कि वे अपनी बीमार और मरियल बीवी से दूर और मधुबाला के अधिक समीप रहें। ठंडे चूल्हे वाले घर के बजाय आरमदायक फर्नीचर वाले एअरकंडीशन्ड सिनेमाघर में अपना समय किल करें। यदि आप दोपहर से लेकर आधी रात तक पाकिस्तान और भारत के सिनेमाघर पर विहंगम दृष्टि डालें, तो आपको यह महसूस होगा कि सिनेमा घर किसी मुर्दा चूहे की लाश है जिस पर असंख्य चीटियां चिपटी हुई हैं।mughal-e-azam-800

    मैंने न केवल फिल्म बनाने वाले आदमियों-फिल्म निर्माताओं को बहुत समीप से देखा है अपितु फिल्म देखनेवालों का भी बड़ा गहरा मनोवैज्ञानिक अध्ययन किया है और मुझे विश्वास है कि कई अवसरों पर फिल्म देखने वाले फिल्म बनाने वालों से अधिक दिलचस्प और आश्चर्यजनक सिद्ध हुए हैं। मैंने एक बार बड़ी गम्भीरता से विचार किया कि हमारे साधारण गरीब नागरिक सिनेमा के इतने ज्यादा शौकिन क्यों है? वे जब अपने छोटे वेतनों और सीमित आय में अपने दैनिक जीवन के खर्चे पूरे नहीं कर सकते, तो सिनेमा क्यों देखते हैं और सिनेमा देखना उनके लिए क्यों इतना आवश्यक है? क्या यह खेदपूर्ण नहीं है? इन प्रश्नों पर बड़ी देर तक विचार करने के पश्चात में इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि दिनभर कठोर परिश्रम करने के बाद आदमी आराम और मनोरंजन चाहता है। हमारे इन दोनों देशों में साधारण आदमियों के लिए न तो फ्री क्लब हैं और न मुफ्त खेलों के स्टेडियम हैं। ले-दे के पब्लिक गार्डन हैं जहां जाते हुए साधारण आदमी इसलिए डरते हैं कि पुलिस के सिपाही उन्हें जेबकतरे या औरतों का पीछा करने वाले बदमाश घोषित करके पकड़ लेते हैं! रही सड़कें, तो उन पर घूमना-फिरना इसलिए भी मुसीबत बन जाता है कि पुलिस उनका धारा 106 के अंतर्गत आवारगर्दी में चालान कर देती है। क्योंकि उनके कपड़े मैले होते हैं और शक्ल सूरत से वे साफ गरीब आदमी मालूम होते हैं और पुलिस की दृष्टि में हर गरीब आदमी आवारा होता है! अब रहा जाता है घर। घर भला क्या मनोरंजन-स्थल बन सकता है? जबकि घर में और काल कोठरी में यूं भी तनिक सा अन्तर होता है। घर में बीवी का बिस्तर एकमात्र मनोरंजक स्थल है किन्तु इसके भावी परिणाम बड़े भयंकर होते हैं अर्थात हर साल एक बच्चा!

फिर दूसरी बात यह है कि साधारण आदमियों की बीवियां अधिकतया सुन्दर नहीं होतीं। वे अधिकतया काली या सांवली, चेचक-ग्रस्त, गन्दी और कुरूप होती हैं। और इन औरतों की खातिर उन्हें हर महीने कम से कम पचास रूपयों से लेकर अधिकाधिक ढाई सौ रूपयो तक कमाने और उनके इलाज व रख-रखाव पर व्यय करने पड़ते हैं। इसके विपरीत हर रोज केवल नौ आने खर्च करके वह ढाई घन्टे तक हसीन से हसीन एक्ट्रेस को खरीद लेते हैं। कामिनी कौशल केवल नौ आने में अपना सारा सौन्दर्य और कान्ति उनकी सेवा में प्रस्तुत कर देती हैं। नर्गिस अपनी सारी प्रेम कहानी उन के हवाले कर देती है। निम्मी अपने संगीत से उन्हें आनन्दित कर देती है। गीतावाली और कुक्कू उन को प्रसन्न करने के लिए ठुमुक ठुमुक कर और थिरक थिरक कर पर्दे पर नाचती हैं। महमूद,  जानीवाकर उन्हें हँसा-हँसा कर अधमुआ कर देते हैं।

         यह सब केवल ढाई घन्टों के लिए होता है मगर होता है केवल नौ आने में!

    लेकिन दिन भर के सख्त कामकाज और कठोर परिश्रम के बाद ढाई घन्टे का यह हुस्न व इश्क, नाच-रंग और हंसी, दिल्लगी से भरपूर मनोरंजन, उनकी थकी हुई तबियतों और उदास मन को नये सिरे से तर-ओ-ताजा कर देता है। और वह अपने बीवी बच्चों के लिए तो नहीं, कम से कम गीताबाली की खातिर जिन्दा रहने के लिए आत्महत्या करने के उस विचार को त्याग देता है। जो सूदखोर पठान या खानदानी सेठ के कर्जे के लगातार तकादों से तंग आकर सुबह उनके मन में उत्पन्न हुआ था। सिनेमा घर से बाहर निकलते हुए वे मन ही मन में पठान और सेठ को दुत्कारते हैं-

    ‘इन साले की ऐसी की तैसी। आत्महत्या करके क्यों हराम मौत मरें। कर्जा कभी न कभी अदा कर ही देंगे। अगर इस जलील कर्जे की वजह से बेमौत मर गये तो कामिनी कौशल और नर्गिस का हुस्न वहां कहां नजर आएगा। निम्मी और गीतावाली के प्रभावशाली एवं कामोत्तेजक शरीर के मोड़-तोड़ वहां कहां हम देख सकेंगे। लता मंगेशकर किसके लिए नगमों का जादू जगाएगी और रीहाना किसके लिए थिरक-थिरककर नाचा करेगी?’

    हमारी जनता को नित्य कि मुसीबतों और दुखों से भरपूर जिन्दगी को सहारा देने में हमारी फिल्में बड़े आश्चर्यजनक कारनामे अंजाम देती है। मुझे याद है कि मेरा दोस्त रशीद खां ‘गमे-जानां और गमे-दौरां’ दोनो से तंग आकर एक दिन अपने जीवन को खत्म कर देने का पक्का इरादा कर चुका था, किन्तु जब मुझे इस का ज्ञान हुआ तो मैं उस का ‘गम गलत’ करने के लिए उसे एक फिल्म दिखाने को ले गया और उस फिल्म ने उस बेचारे की जान बचा ली। वह फिल्म संयोगवश उसकी जिन्दगी के उतार चढ़ाव से बड़ी मिलती जुलती थी। विषेशतयः इस फिल्म में एक गीत था। जिसके बोल थे-

         इन्सान क्या जो ठोकरें नसीब की न सह सके।

    यह गीत सुनते ही मेरा दोस्त आंखों में आंसू छलकाकर बोला-यार। मैंने मरने का इरादा अब बदल दिया है। अब जिन्दा रहूँगा और जिन्दगी की कठोरताओं के साथ अनवरत रूप से लड़ता रहूंगा। इसके बाद से वह नित्य नसीब की ठोकरे खाता चला जा रहा है, परन्तु चेहरे से बड़ा संतुष्ट प्रतीत होता है और हरदम गुनगुनाता रहता है-

         इन्सान क्या जो ठोकरें नसीब की सह न सके।

    इसके इलावा जब वह अपने आसपास अपने जैसे शोषित-पीड़ित लोगों को रोता और सिसकता हुआ देखता है तो उनकी पीठ पर हाथ मारकर गाते हुए उन्हें परामर्श देता है-

         गाये चला जा, गाये चला जा,

         एक दिन तेरा भी जमाना आएगा।

    मैं अपने यहां के सिनेमाघरों को एक ऐसा स्कूल समझता हूं जहां इन्सान को बड़ी से बडी मुसीबतें बर्दाश्त करने के ओर उसके साथ ही साथ किसी औरत का चुनाव करके उससे मुहब्बत करते रहने, मालदार प्रतिद्वन्द्वि को नीचा दिखाने और अन्त में अपनी प्रेमिका से शादी करने के लाभदायक और रामबाण सबक पढ़ाये और सिखाए जाते हैं!

    किसी की यह आपत्ति बिलकुल ठीक है कि हमारे सिनमा घर, हमारी जनता को एक प्रकार के ‘गुनाह बेलज्जत’ की ओर आकृष्ट कर रहे हैं। लेकिन मेरे ख्याल में यह गुनाह बेलज्जत उस गुनाह बालज्जत के मुकाबले में अधिक बेहतर गुनाह है! यदि हमारे सिनेमाघर न होते, मो मुझे विश्वास है कि हमारी गरीब जनता में शराबखोरी, बलात्कार और शीलहरण जैसी गंदी बीमारियां अधिकता से फैल जातीं। इसका स्पष्ट प्रमाण है कि पिछले दिनों कराची के सिनमा मालिकों ने हड़ताल कर दी थी और सारे सिनेमाघर बन्द हो गये थे, तो उस समय कराची के सारे शराबखाने, ताड़ीघरों और रंडियों के कोठों पर तिल धरने के लिए भी जगह नहीं मिलती थी। उन दिनों शराब-फरोश होटलवालों, ताड़ी विक्रेता और रंडियां दिन-रात अल्लाह मियां से दुआएं मांग रही थीं कि खुदा करे कि सिनेमाघर हमेशा के लिए बंद हो जाएं और हमारे मदिरालय और कोठे इसी तरह दिन होली रात दिवाली मनाते रहे। उन्हीं दिनों की एक घटना मैं आपको बता दूं कि उन दिनों शराबखानों में यह कथन बड़े-बड़े बोड़ों पर लिखकर लगवाये गये थे कि-

         सुबह का भूला शाम को घर लौट आए तो उसे भूला नहीं कहते।

और कोठेवालियां इस तरह की गजल और गीत गा रही थीं-

         वह आयें घर में हमारे खुदा की कुदरत है।

         कभी हम उन को, कभी अपने घर को देखते हैं।

         घर आया मोरा परदेसी,

प्यास मिटी मोरी अंखियन की।

इसके बाद अचानक यह हड़ताल खत्म हो गई। सिनेमा खुल गये तो शराबखाने भी खाली हो गये और रंडियों के कोठे भी विरान हो गये। रंडिया बड़ा चीख चीखकर गाती रहीं-

         रात है तारों भरी छिटकी हुई चांदनी

         ऐसे में आ बालमा प्यार की बातें करें…

         हो प्यार की बातें करें।

लेकिन निम्मी, बीनाराय, सबीहा, नूरजहां, शम्मी, गुलशन आरा, यहां तक की बूढ़ी लीला चिटनिस तक ने लोगों का दामन न छोड़ा और उन्हें बुरी राह पर न जाने दिया, पथ-भ्रष्ट न होने दिया। लोग बाग ‘गुनाह बालज्जत‘  से फिर ‘बाल-बेलज्जत’ की ओर लोट आये। इस प्रकार उनका चरित्र और नैतिकता बुराई की ओर जाते जाते फिर अच्छाई की ओर लौट आई। यह सही है कि सिनेमा देखना साधारण आदमी के लिए और विषेशतया गरीब आदमी के लिए एक फिजूलखर्ची ही है। लेकिन यह उस फिजूलखर्ची से लाख गुना बेहतर है, जो शराब बनकर बह जाती है या फिर ‘बाजार ए हुस्न’ से खरीदी हुई बीमारियों का इंजेक्शन बन जाती है। साधारणतया यदि हम फिल्म देखने के परिणामों को देखे तो ज्ञात होता है कि सिनेमा देखने के इस रोग ने हमारी जनता को एक हल्की सी फिजूलखर्ची में फंसाकर दूसरी कई बड़ी महंगी और तबाह कर देनेवाली बुराइयों से बचा लिया है। कराची के सिनमा-मालिकों ने कुछ दिनों के लिए सिनेमाघरों पर ताले लगाकर हमारी आपकी आंखे खोल दीं और बता दिया कि सिनेमाघरों का अस्तित्व जनता के चरित्र को खराब होने से बचाने के लिए कितना आवश्यक है। यूं तो सिनेमाघर भी जनता के लिए एक झक मारने का स्थान है, किन्तु सिनेमाघरों की हड़ताल के समाप्त होते ही जनता ने ‘शाम ढले खिड़की तले सीटी बजाना छोड़ दिया।’ और उस मार्ग पर आ गई जो रीगल, इरोज, नाज, ताजमहल, प्लाजा, रैक्स, पैराडाइज, निशांत, यहां तक कि बाजार ए हुस्न में से गुजरता हुआ सुपर, राक्सी और नूरमहल सिनेमा तक चला जाता है। लेकिन कोई महबूब-नौरोजी रास्ता नहीं भटकता और सारे महबूब-नौरोजी श्यामा को देख-देख कर केवल आँखें सेंकने पर ही संतोष किए लेते हैं।

हमारे सिनेमाघर दूसरा जो लाभदायक सबक इन्सानों को सिखाते हैं, वह है ‘मुहब्बत का सबक’ या प्रेम का पाठ! हमारे सिनेमाघर इन्सानों को कभी नफरत का सबक या घृणा का पाठ नहीं सिखाते। वर्तमान यूग में जबकि एक इंसान को दूसरे इंसान की मुहब्बत की नितांत आवश्यकता है, हमारे सिनेमाघर बहुत बड़े इंसानी कर्तव्य का पालन कर रहे हैं। यह और बात है कि वहाँ मर्द को सिर्फ औरत से और औरत को सिर्फ मर्द से मुहब्बत करने का सबक सिखाया जाता है। लेकिन यह भी तो खालिस इंसानी मुहब्बत ही हुई। इसके अलावा अगर मर्द औरत से नहीं तो क्या गाय-बकरी से, और औरत मर्द से नहीं तो क्या हाथी-घोड़े से मुहब्बत करेगी!Hum Dono Rangeen - Front

हमारे सिनेमाघरों में मुहब्बत का कोई लंबा, पेचीदा और सब्र की आजमाइश करने वाला सबक नहीं सिखाया जाता बल्कि बहुत संक्षिप्त और बहुत आसान अर्थात ‘चट मुहब्बत पट ब्याह!’ परिणामस्वरूप इन सिनेमाघरों से निकलने के बाद एक मुहल्ले के आमने-सामने घरों में रहने वाली लड़की और लड़का जब बाहर की ओर खुलने वाली खिड़कियाँ खोलती या खोलता है तो दोनों एक-दूसरे को दिलीप कुमार और मधुबाला की तरह बस देखते ही फिदा हो जाते हैं, या एक-दूसरे पर आसक्त हो जाते हैं। इसके एक-दो महीने बाद दोनों में शादी हो जाती है। और यदि शादी नहीं भी हो सकती तो वे दोनों रात्रि के अंधकार में गीतबाली और देवानंद की तरह घर से भाग खड़े होते हैं और लाहौर या दिल्ली में पकड़े जाते हैं और फिर फिल्म ‘दिल की बात’ या ‘हम दोनों’ की तरह दोनों का विवाह हो जाता है। हमारे सिनेमाघरों में चट मुहब्बत और पट ब्याह की सीख इसलिए दी जाती है कि कहीं लोग-बाग क्रोध में आकार सिनेमाघर का फर्नीचर ही न तोड़ दें कि क्यों तुमने संतोष कुमार की शादी सबीहा से नहीं कराई। हमारी जनता न्यायप्रिय होती है। और हर मामले में न्याय चाहती है। इसके अलावा शुरू का एक इस्लामी पहलू यह भी निकलता है कि कुँवारे मर्द और कुँवारी औरत को जन्नत में जगह नहीं मिल सकती। इसलिए हमारे सिनेमाघर जो साधारण गरीब आदमियों को उनकी नित्य की ज़िंदगियों के जहन्नुमों से निकालकर ढाई घंटे के लिए सिनेसंसार के स्वर्ग में ले जाते हैं। वे यह चाहते हैं कि उनके सारे दर्शकगण फिल्मी तर्ज की मुहब्बत और शादियाँ करके दुनिया से सीधे जन्नत चले जाएँ! इस सिलसिले की अंतिम बात यह है कि यदि फिल्म के अंत में शादी न हो तो फिर ‘मजा’ नहीं आता और लोग ‘मजे’ के लिए ही फिल्म देखते हैं! अब भला यह भी क्या बात हुई कि दिलीप कुमार छः बजे शाम से सवा आठ बजे रात तक श्यामा से मुहब्बत करता रहा और आठ बज कर बीस मिनट पर उसको छोड़कर हिमालय पर्वत पर जाकर साधु बन गया–? भला क्या मजा आया! मजा तो तब जब ही है कि नूरजहां और संतोष कुमार रिट्ज़ सिनेमा में शादी करें और हम और आप अपने घर जाकर दाल-रोटी का ‘वलीमा’ खाएँ!Aankhen-7

हमारे सिनेमाघर हमारी जनता को सबसे अधिक महत्वपूर्ण जो सबक पढ़ाते हैं वह है वर्ग-घृणा का सबक अर्थात गरीब का गरीब की मदद करना और अंत में दौलतमंद आदमी को नीचा दिखाने का सबक। आपने हर फिल्म में देखा होगा कि एक गरीब किन्तु स्वस्थ और सुंदर नवयुवक होता है, उस पर एक अमीर और दौलतमंद आदमी की नौजवान लड़की फिदा हो जाती है। इस अमीर लड़की का बाप गरीबों पर बड़ा जुल्म ढाता है तो गरीब नवयुवक उस लड़की से, छेड़खानियाँ कर करके खूब बदला चुकता है और अंत में जब अमीर लड़की मालदार बाप की दौलत को ठोकर मार्कर गरीब नवयुवक की तंग, अंधेरी और गंदी ‘चाल’ में बैठी चूल्हा फूंकते-फूंकते रोने-बिसुरने लगती है तो सिनेमाघर में बैठे हुये सारे दर्शक प्रसन्न होकर ज़ोर-ज़ोर से तालियाँ बजाते हैं, सीटियाँ बजाते हैं और चीखने लगते हैं:-

“वह पट्ठे प्रेमनाथ! खूब बदला लिया है। और मजा चखा साली को।”

और जब अमीर लड़की का बाप अपनी भागी हुई लड़की को ढूँढता-ढूँढता गरीब नौजवान की चाल पर पहुंचता है तो उस चाल के गरीब लौंडे उसकी कार पर पथराव आरंभ कर देते हैं और सिनेमा में सीखिए हुई गालियों की बौछार करते हैं। और जब अमीर बाप अपनी नाज-व-नखरों में पली हुई लड़की को गरीब नौजवान का गंदा अंडर-वेयर और लूँगी ढोते देखता है तो उस पर बरस पड़ता है। लेकिन अमीर लड़की साफ-साफ कह देती है—

‘‘पिता जी! मुझे प्रेम हो गया है। (अर्थात प्रेमनाथ हो गया है।) प्रेम आलीशान कोठियों में अनहीन रहता। प्रेम गरीबों की कुटियाओं में रहता है।”

इस डायलाग पर सिनेमा देखने वाले ‘माजे-गामे’ चीख पड़ते हैं-

“वाह पट्ठी जीवन्द रह।”

इसके बाद जब उसका अमीर बाप सिर झुकाए वापिस जाने लगता है तो सिनेमा के दर्शक लोग घृणा से पुकारते हैं-

“धत्त- हात तेरी पापड़ वाले!”

“नस जा ऐथूँ कमीनियाँ।”

“ढर्रर्र….!”

दरवाजे से बाहर निकलते हुये उसकी भिड़ंत हीरो- गरीब नौजवान से होती है तो अमीर आदमी उसे दस हजार रूपये के नोट देता है। दस हजार रुपया ले ले और लड़की वापिस दे दे! किन्तु स्वाभिमानी गरीब नौजवान (जो केवल दस हजार के बदले में फिल्म के हीरो की भांति काम कर रहा है।) दस हजार रूपये अमीर आदमी के मुँह पर दे मारता है। इस पर गरीब दर्शकों के हर्ष का ठिकाना नहीं रहता। बस उनका कुर्सियाँ तोड़ना शेष रह जाता है।

अब इस सिलसिले में एक रहस्य की बात यह है कि अमीरों के विरुद्ध गरीबों के मन में फिल्मों द्वारा घृणा उत्पन्न करना भी स्वयं अमीरों और सेठों का एक लाभदायक व्यवसाय है। फिल्में केवल अमीर लोग बनाते हैं और एक-एक फिल्म पर लाखों रूपये खर्च करते हैं। ये फिल्मों में अमीर और गरीब की टक्कर और अमीर को गालियाँ और गरीब को विजय इसलिए दिलवाते हैं कि ऐसा करने से लोग अधिक-से-अधिक संख्या में फिल्म देखते हैं और इन्हें खूब मुनाफा होता है। अब इस मुनाफे की खातिर यदि अमीरों को नित्य ढाई घंटे के तीन शो के हिसाब से साढ़े साथ घंटे टक्क गालियाँ पड़ती रहें तो क्या हर्ज है! दौलतमंद आदमी यूँ भी दौलत के मामले में बड़े बेगैरत होते हैं!!

यह आंतरिक रहस्य चाहे कुछ भी क्यों न हो, यह तो एक तथ्य और वास्तविकता है कि हमारे सिनेमाघर शनैः शनैः हमारी जनता में वर्ग-चेतना उत्पन्न करते जा रहे हैं और गरीब इन्सानों को उत्साहित कर रहे हैं कि घबराने की कोई बात नहीं है। एक दिन तुम्हारा भी जमाना आएगा इसलिए गाये चला जा, गाये चला जा! टैक्सी ड्राइवर है तो क्या हुआ, सेठ जी की लड़की को भगा ले आ और अपना मैला-कुचैला लंगोट उससे धुलवा। उससे अपना वर्षों का ठंडा चूल्हा गर्माया करो और फिर खटिया पर लेट कर बड़े आराम से अपनी दौलतमंद महबूबा से कहो-

“मान मेरा एहसान अरी नादान कि मैंने तुझसे किया है प्यार!”

और सिनेमाघर को धन्यवाद दो जिसने तुम्हें जीवन का इतना महत्वपूर्ण सबक सिखाया है, पाठ पढ़ाया है।

मुहब्बत ज़िंदाबाद!

सिनेमा ज़िंदाबाद!

सेठ की लड़की ज़िंदाबाद!

हमारा इश्क़ ज़िंदाबाद!

हम दोनों—ज़िंदाबाद

हमारी  गरीबी….ज़िंदा…नहीं यह गलत हो गया!

Ibrahim Jaleesइब्राहीम जलीस उर्दू के बड़े तरक्कीपसंद अफसानानिगार और व्यंग्यकार रहे हैं। उर्दू में इनका स्थान वही है जो हिन्दी में हरिशंकर परसाई जी का है। इब्राहीम जलीस मूलतः हैदराबाद के रहने वाले थे। लेकिन आज़ादी-विभाजन के समय पाकिस्तान चले गए। पाकिस्तान में उनका ज़्यादातर समय लाहौर और कराची में बीता। वहाँ भी वे तरक्कीपसंद जमात के ही हिस्सेदार रहे । उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं- उल्टी कब्र, नेकी कर थाने में जा, ऊपर शेरवानी अंदर परेशानी, हँसे और फंसे, शगुफ्ता शगुफ्ता और काला चोर आदि। 

अनुवादक- अख्तर वागेश्वरी

नई कहानियाँ , मई 1967 से  साभार 

सिनेमा: अभिव्यक्ति का नहीं अन्वेषण का माध्यम: कमल स्वरुप

By  कमल स्वरुप

भारतीय सिनेमा के सौ होने के उपलक्ष्य में अपने तरह का एकदम अलहदा फिल्म-निर्देशक कमल स्वरुप से  ‘हंस- फरवरी- 2013- हिन्दी सिनेमा के सौ साल’ के लिए  उदय शंकर द्वारा लिया गया एक साक्षात्कार

(८०९० के दशक में सिनेमा की मुख्या धारा और सामानांतर सिनेमा से अलग भी एक धारा का एक अपना रसूख़ था. यह अलग बात है कि तब इसका बोलबाला अकादमिक दायरों में ज्यादा था. मणि कौल, कुमार साहनी के साथसाथ कमल स्वरुप इस धारा के प्रतिनिधि फ़िल्मकार थे. वैकल्पिक और सामाजिकसंचार साधनों और डिजिटल के इस जमाने में ये निर्देशक फिर से प्रासंगिक हो उठे हैं। संघर्षशील युवाओं के बीच गजब की लोकप्रियता हासिल करने वाले इन फिल्मकारों की फिल्में (दुविधा, माया दर्पण और ओम दर बदर जैसी) इधर फिर से जी उठी हैं। आज व्यावसायीक और तथाकथिक सामानांतर फिल्मों का भेद जब अपनी समाप्ति के कगार पर पहुँच चुका है, तब इन निर्देशकों की विगत महत्ता और योगदान पुनर्समीक्षा की मांग करता है।

कमल स्वरुप फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टिट्यूट पुणे के1974 के स्नातक हैं। घासीराम कोतवाल(1976), अरविन्द देसाई की अजीब दास्तान (1978), गाँधी(1982), सलीम लंगड़े पर मत रो (1989), सिद्धेश्वरी (1989)जैसी फिल्मों में सहायक निर्देशक, संवाद लेखक, प्रोडक्शन डिजाइनर और शोधार्थी के बतौर इनका रचनात्मक सहयोग रहा है। बतौर निर्देशकनिर्माता कमल स्वरुप ने अभी तक सिर्फ एक फिल्म बनाई हैओम दर बदर(1988), भारतीय उपमहाद्वीप में अपनी तरह की एक मात्र कल्ट फिल्म, फिल्म फेयर पुरस्कार से पुरस्कृत। ओम दर बदर के अलावे कुछ डाक्यूमेंटरी फिल्में भी। दादा साहेब फाल्के और भारतीय फिल्मइतिहास का अद्भुत अध्य्येता। फ़िलहाल दादा साहब फाल्के का महावृतांत रचने में मशगुल।  

Tracing Phalke By kamal swaroop

Tracing Phalke By kamal swaroop

  • प्रश्न एक: भारतीय सिनेमा की एक सदी बीत गई। तो, सबसे पहला सवाल यही कि सिनेमा क्या है? और इस आलोक में भारतीय-सिनेमा की विशेषताएं क्या हैं?

 कमल स्वरुप– हमारा अधिकांश सिनेमा या तो वास्तविक जीवनकाल का एक संक्षिप्त संस्करण होने का प्रयत्न है या फिर किसी साहित्यिक कृति की जस की तस अनुकृति होने की कोशिश। मैं चाहता हूँ कि ऐसे फिल्मकार हो जो अपनी कृति को सदा सफल और लोकप्रिय मुहावरों में तिरोहित कर देने की जगह सिनेमा को साहित्य के नाट्यकृत पुनरुत्पादन की भूमिका से खुद को अलग कर पाठ,गति, ध्वनि और बिम्ब के सम्बन्ध को पुनर्व्यख्यायित करने का प्रयत्न करें। सिनेमा अभियक्ति का नहीं अन्वेषण का माध्यम है। सिनेमा के वस्तुगत यथार्थ का लेखक के अंतर्जगत, नैतिकता या सौंदर्यशास्त्र से कोई सम्बन्ध नहीं है। ये तत्व यथार्थ को दोष-पूर्ण बनाते हैं। सिनेमा- भावुकता और प्रतीकात्मता से रहित शुद्ध कला कृति है । ऐसा आलें रॉबग्रिए का कहना है और मैं उनसे पूर्णतया सहमत हूँ।

संख्या की दृष्टि से देखा जाए तो भारत दुसरे देशों की तुलना में बहुत आगे है। यूरोप का फिल्म-उद्योग हॉलीवुड के हमले के सामने घुटने टेक चुका है। केवल भारत है जिसका फिल्म-उद्योग आत्मनिर्भर है। किन्तु, सिनेमा की दृष्टि से देखा जाए तो भारतीय फिल्में अभी तक नौटंकी और नाट्य-संगीत से ऊपर नहीं उठी हैं। शायद यही कारण है कि वह अब तक हॉलीवुड से बचा हुआ है।

  • प्रश्न दोः भारतीय सिनेमा राजा हरिश्चंद्रसे शुरू होकर ओमदरबदरसे होते हुए वर्तमान तक आकर आता है. और इस यात्राक्रम में भारतीयसिनेमा मिथक, विज्ञान, और संस्कृति का सम्मिलन लगता है. इन श्रेणियों(synthesis) की अभिव्यक्ति के रूप में सिनेमा को कैसे देखते हैं!! (The movie omdarbadar comingles mythology, science, tradition and creats the existentiality of the present. How do you see film as the expression of the synthesis of these categories !

कमल स्वरुप– आज जो भी मूल्य हैं सब अतीत के हैं। प्रारंभ में फिल्मों का उपयोग दूसरे माध्यमों में प्रकट कलाकृतियों को किसी स्थायी माध्यम में परावर्तित करने का प्रयास था। कथा-कहानियाँ, नाटक या फिर रविवर्मा के पौराणिक चित्र। इन कृतियों के प्रतीकों में समकालीनता को तलाशते हुए उनके राजनैतिक रूपांतरण की कोशिश हुयी। फिर आये ऐतिहासिक आख्यान और संतों के जीवन- चित्र। फिल्में अतीत की स्मृतियों के व्यापक प्रचार-प्रसार का माध्यम बना। फिल्मों में ध्वनि के आगमन के बाद अतीत की उन्हीं मूक कहानियों  को फिर से दोहराया गया, चित्रित किया गया। और, फिर आये सामाजिक समकालीन नाटकों और साहित्यिक कृतियों का फ़िल्मी रूपांतरण।

सिनेमेटोग्रफिक यंत्रों  का अविष्कार और विकास-क्रम अपने आप में एक स्वयंसिद्ध घटना थी।वह कला का माध्यम कब बनी और कैसे बनी ,वह दूसरी बात है लेकिन हमें यह  बात भी नहीं भूलना चाहिये कि सिनेमेटोग्राफी जादूगरों, जांत्रिकों और तांत्रिकों के मिले जुले प्रयत्न थे, उनकी इच्छा शक्ति थी। कुछ लोगों का मानना है कि यह केवल एक प्राकृतिक संयोग भर था। अनेक नए उपन्यासकारों में सिनेमा के प्रति उत्पन हुये आकर्षण का कारण क्या था? वे कैमरे की वस्तुपरकता से नहीं बल्कि उसकी आत्मपरकता और कल्पनात्मक संभावनाओं से प्रभावित हुये थे। वे सिनेमा को अभिव्यक्ति का नहीं, बल्कि अन्वेषण का माध्यम मानते थे। और, उन्हें सर्वाधिक दिलचस्पी उस पदार्थ में हुई जिसे लेखन में व्यक्त करना ज़रा भी संभव नहीं था। दोनों इंद्रियों, आँख और कान पर एक साथ खेल करना। इन बोलते चलचित्रों में कोई आदिम गुण है। वह वर्तमान का हिस्सा है। सनातन वर्तमान का समूचा बल और वेग। सिनेमा, बिम्बों की प्रकृति का नहीं बल्कि उनकी संरचना का सवाल था। ये नयी फ़िल्मी सरंचनाएँ, बिम्बों और ध्वनियों की ये हलचलें दर्शक की समझ में फ़ौरन आ जाती हैं। इनकी ताकत साहित्य से बहुत बड़ी है। यही युग न्यू थियेटर, बाम्बे टाकीज और  प्रभात का था।फिर बने तारे सितारे। उनके प्रजनन के अनुष्ठान, मानों सिनेमेटोग्राफिक मशीन की मूल प्रकृति, मेकेनिकल्स मीन्स ऑफ़ रिप्रोडक्शन को मुंह चिढ़ाते। ये नए फोटोजेनेटिक्स (photo-genetics) पीढियों दर पीढ़ियों का राष्ट्रीय कैलेंडर रचने लगा। कथा केवल उनके प्रेमपुराण थे। हम उनके जन्म-मृत्यु से अपना जीवन नापने लगे। साहित्य-सिनेमा ने इस प्रजनन की निष्ठुरता और असहिष्णुता के सामने घुटने टेक दिए। पूँजी के हाथ एक कालजयी हरम लगा था। इस मादक अग्निस्नान में दर्शक स्वाहा होने लगे। काल की बलि चढ़ा।

मैं अब सीधे ओम दर बदर  पर आना चाहूँगा। कुछ घुमा-फिरा कर। किसी महान रचनाकार के शब्द हैं, जिनका नाम मैं नहीं बताना चाहता हूँ- नक़ल से अक्ल वो रहे सदा। वह फिल्म मेरी कल्पना के टुकड़े थे और मैं भाषा के समान सरचना का आनंद ले रहा था। किन्तु मैं चाहता था कि एक ऐसे संसार का संवाहक बनूँ जो कि न तो बिम्ब है, न ध्वनि। यही वह संसार है जिस तक मैं विभिन दिशाओं से, अनेक सड़कों से होकर पहुँचाना चाहूँगा और वह सत्य मेरे बचपन का दानव होगा। वह उसी दानव से बचने के लिए बुनी गयी कहानी थी। मृत्यु से बचने का मेरा उपहास-जनक अनुष्ठानिक-प्रयत्न और उसका भयावह अंकन। ओम फिल्म नहीं है, वह फिल्मों से पलायन का चित्रण है। मैं सिनेमा के संसार में भाग कर आया था, यथार्थ से छुपने किन्तु मैंने पाया कि सिनेमा मृत्यु भी है और पुनर्जीवन भी और ओम के द्वारा मैं भाग निकला, यह मैं दावे के साथ कहता हूँ। मुझे अपनी मॉक (mock)- मृत्यु का खेल खेलने में खूब मज़ा आया। ओम फिल्म नहीं, खुद को एक झांसा था और न ही मैं कोई फिल्मकार।

Om darbadar(1988)

Om darbadar(1988)

  • प्रश्न तीनः सिनेमा अभिव्यक्ति के सशक्त माध्यम के रूप में क्या हमारे सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन को दिशानिर्धारित करने में सक्षम है? स्वातंत्र्योत्तर भारतीय सामाजिकराजनीतिक परिदृश्य में हस्तक्षेप करने में यह कितना सक्षम हुआ है!! पूरी भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में (एकदो अपवादों को छोड़) कोई भी अच्छी राजनैतिक फिल्म नहीं बन पाई है। इसमें सेंसर बोर्ड की ज़िम्मेदारी है या साहस की कमी?

कमल स्वरुप– मेरे लिए सिनेमा अभिव्यक्ति नहीं कितु अभिव्यक्ति के विभिन्न व्याकरणों की जांच-पड़ताल है। जैसा कि शुरू मैंने में ही कहा कि सिनेमा अन्वेषण है। वैसे भी रियल नारियल है, क्यों और सरपलस (surplus) पैदा किया जाये। हमें ‘भंगी’ फिल्मकारों की ज़रुरत है जो झाड़ू फेरे और इस रियल नारियल के खिलाफ जंग छेड़े। वर्ना पता नहीं लगता नेहरू जी की मुद्रा दिलीप कुमार से आई थी या दिलीप कुमार की नेहरू जी से। नर्गिस मदर इण्डिया पहले बनी या फिर शक्ल समान होने का कोई खानदानी राज़ है।

मज़े की बात है कि फालके खुद स्वदेशी आन्दोलन के हिस्सा थे और तिलक के जीवन से प्रभावित थे। जब उन्होंने लाइफ ऑफ़ क्राइस्ट देखी तो लगा हम अपने भारतीय बिम्ब कब परदे पर देखेंगे। ये विदेशी कल्पनाएँ हमारी चेतना को धीरे धीरे नष्ट कर देंगी। शुरू की फिल्मों के बिम्बों में गूढ़ राजनैतिक संदेश छुपे हुये रहते थे और अंग्रेजों को सेंसर बोर्ड की स्थापना करनी पड़ी थी। पौराणिक आख्यानों के बाद ऐतिहासिक फिल्मों के ज़रिये एक राष्ट्रवादी उतेजना को पैदा किया जाने लगा था। उसके बाद सामाजिक फिल्मों के ज़रिये समाज में व्याप्त रुढ़िवादी रीति-रिवाजो पर प्रहार किये जाने लगे।भक्ति काल के संतो पर बनी सभी फिल्में खूब सफल रहीं । फिल्मों के ज़रिये से एक आत्मविश्वास जगाया जा रहा था।

अब रही बात आज की। सबसे पहले मैंने राजनैतिक फिल्मों की बात कुमार शाहनी से सुनी थी उन दिनों मैं उनकी फिल्म तरंग में काम कर रहा था। वे वामपंथी विचारधारा से जुड़े थे। मैंने समझा कि राजनैतिक फिल्में, सत्ता के शक्ति-संघर्षो की कथा होती है। उसे दर्शाने के लिए वे वामपंथी विचारों का या कहें तो फार्मूला का उपयोग करते थे। फिर जाना कि सत्ता-संघर्ष केवल देश में ही नहीं, यहाँ तक कि परिवार में भी चलती है और वह किसी भी आधार पर हो सकती है।

अब मैं मनाता हूँ कि एक ही बात को विभिन कोणों से देखने पर अलग ही घटना का निर्माण होता है।और, वे सारेदृष्टिकोण अलग-अलग विचारधारा का निर्माण करती हैं जो कि हमारे निजी स्वार्थों से नियंत्रित होती हैं। निजी स्वार्थों से परे जाने के लिए हमे एक वस्तुनिष्ठ विज्ञान का सहारा लेना पड़ता है जो कि एक असम्भव कार्य है। यहाँ पर समानुभूति की अपेक्षा की जा सकती है, जिस की कमी आज हम सब में है। मैंने यह बात केवल घटक में देखी है।

  • प्रश्न चारः समकालीन बॉलीवुड सिनेमा में  तकनीकी  विकास तो झलकता है किन्तु विषयवस्तु के स्तर पर अधकचरापन बारबार उभरकर आता है। बड़े निर्देशकों की फिल्मों में भी! इसे बौद्धिकता के अभाव से जोड़कर देखा जाए या ईमानदारी के अभाव से? एक कलामाध्यम के रूप सिनेमा की   स्वायत्तता को आप कैसे देखते हैं?

कमल स्वरुप– डिजिटल के आने से मुझे लगता है कि हम पहली बार स्वायत्तता को क्लेम कर सकतें हैं। सिनेमा अनुभूति और संवेदना, व्यष्टि और समष्टि के सम्बन्ध का विज्ञान है। विभिन्न नाट्य एवं ललित कलाओ का समिश्रण है। किसी घटना के काल और दिक् के आयामों का रूपांकन है। इस स्तर की सूक्ष्मता का बॉलीवुड में पूर्णतया अभाव है। हमारे यहाँ अब तक प्रोडक्शन डिजाइन (production design) नाम की चीज़ का पता नहीं है। फिल्म का मतलब है स्टार कौन है और इसी बात पर पैसा उठता है। बॉलीवुड की अपनी भाषा है और उसका जीवन से कोई सम्बन्ध या जीवन के प्रति कोई प्रतिबद्धता नहीं है। और उन्हें देखना हमारी आदत बन चुकी है, हमारे काल का निर्णय उसी से होता है। जब आमिर खान चलता है तो सब लड़के उसी जैसे लगने लगते हैं। जब अमिताभ चला था तो सब उसी जैसे लगने लगे थे .

  • प्रश्न पांचः बालीवुड सिनेमा की भाषा पहले उर्दू हुआ करती थी फिर हिन्दीउर्दू का मिलाजुला खूबसूरत रूप। अस्सी के दशक के बाद हिन्दी में बोले गए संवादों को दुबारा अंग्रेजी में दोहराने का चलन बढ़ा जिससे फिल्मों की लंबाई भी अनावश्यक रूप से बढ़ती थी और अब ज्यादातर सिनेमा के नामों में भी अंग्रेजी के नाम जोड़े जाने लगे हैं। ऐसा क्यों हो रहा है?

कमल स्वरुप– बोलती फिल्मों के शुरू होने पर अधिकतर लेखक हिंदी उर्दू से आये थे, अधिकतर लाहौर से। अब तो हिंदी-उर्दू कोई भी नहीं पढ़ता। कुछ लोग एनएसडी से भले आते हैं, पर अब मुंबई में हिंदी-उर्दू नाम मात्र के लिए बची है। धीरे धीरे बोलचाल की भाषा अंग्रेज़ी में बदल रही है। स्क्रिप्ट इंग्लिश में लिखी जा रहीं हैं। सवांद हिंदी में ज़रूर होते हैं पर अधिकतर अंग्रेजी फिल्मो के अनुवाद। हॉलीवुड इस बात को समझ रहा है और अपनी अधिकांश फिल्मों को भारतीय भाषाओं  में डब करके एक नया बाज़ार खड़ा कर रहा है।

  • प्रश्न छः: क्या हिन्दी सिनेमा की दुनिया भी दो हिस्सों में बंट गई हैएक इलीटिस्ट सिनेमा जो मल्टीप्लेक्स में चलता हैदूसरा जो मझोले शहरों और कस्बों में

कमल स्वरुपमल्टीप्लेक्स वाले दर्शक भारतीय फिल्मो में हॉलीवुड या योरोपियन फिल्मो का व्याकरण ढूंढने जाते हैं ,छोटे शहरों के लोग शायद अभी तक उससे परिचित नहीं हैं। पर एक ज़माना था जब यह अंतर नहीं था। हमारा अपना खुद का विकसित व्याकरण था। प्रभात, न्यू थिएटर, राजकमल आदि काफी आगे थे और किसी भी वर्ग के दर्शक से संवाद करने में सक्षम थे.

  • प्रश्न सात: भारतीय सिनेमा के सर्वांगीण के विकास के लिए क्या कुछ होना चाहिए?

कमल स्वरुप– उत्पादन का विकेंद्रीकरण। तत्पश्चात, प्रांतीय कृतियों का अनुवादों के जरिये आदान-प्रदान। नाट्य एवं ललित कलाओं के कर्मियों का एक-जुट मंच, हर शहर-प्रान्त में।साहित्यिक-पत्रिकाओं की तरह सिने-कृतियों का वितरण। हर छोटे शहरमें फिल्मोत्सव और सिने-शिक्षा के शिविर।

  • प्रश्न आठ: ओमदरबदर की परंपरा से प्रभावित युवा निर्देशक सिनेमा के व्याकरण को बदलने की कोशिश कर रहे हैं. क्या इसे सार्थक बदलाव के रूप में देखा जा सकता है?

कमल स्वरुप– कुछ दिन पहले मैंने आनंद गाँधी की Ship of Theseus देखी और उसे अपने काफी करीब पाया। पूर्णतः एक वैचारिक फिल्म, जो की ब्रह्म-विभ्रम की प्रस्तुति के पार जाती है।

Kamal swaroop

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साभार – हंस- फरवरी- 2013- हिन्दी सिनेमा के सौ साल

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