Archive for the month “January, 2015”

गाँधी या गोडसे: हरिशंकर परसाई

By हरिशंकर परसाई

महात्मा गाँधी को चिट्ठी पहुँचे

यह चिट्ठी महात्मा मोहनदास करमचंद गाँधी को पहुंचे. महात्माजी, मैं न संसद-सदस्य हूँ, न विधायक, न मंत्री, न नेता. इनमें से कोई कलंक मेरे ऊपर नहीं है. मुझमें कोई ऐसा राजनीतिक ऐब नहीं है कि आपकी जय बोलूं. मुझे कोई भी पद नहीं चाहिये कि राजघाट जाऊँ. मैंने आपकी समाधि पर शपथ भी नहीं ली.

आपका भी अब भरोसा नहीं रहा. पिछले मार्च में आपकी समाधि मोरारजी भाई ने भी शपथ ली थी और जगजीवन राम ने भी. मगर बाबू जी रह गए और मोरारजी प्रधानमंत्री हो गए. आख़िर गुजराती ने गुजराती का साथ दिया.

जिन्होंने आपकी समाधि पर शपथ ली थी उनका दस महीने में ही ‘जिंदाबाद’ से ‘मुर्दाबाद’ हो गया. वे जनता से बचने के लिए बाथरूम में ही बिस्तर डलवाने लगे हैं. मुझे अपनी दुर्गति नहीं करानी. मैं कभी आपकी समाधि पर शपथ नहीं लूँगा. उसमें भी आप टाँग खींच सकते हैं.

आपके नाम पर सड़कें हैं- महात्मा गाँधी मार्ग, गाँधी पथ. इनपर हमारे नेता चलते हैं. कौन कह सकता है कि इन्होंने आपका मार्ग छोड़ दिया है. वे तो रोज़ महात्मा गाँधी रोड पर चलते हैं.

By R.K. Lakshman

By R.K. Lakshman

इधर आपको और तरह से अमर बनाने की कोशिश हो रही है. पिछली दिवाली पर दिल्ली के जनसंघी शासन ने सस्ती मोमबत्ती सप्लाई करायी थी. मोमबत्ती के पैकेट पर आपका फोटो था. फोटो में आप आरएसएस के ध्वज को प्रणाम कर रहे हैं. पिछे हेडगेवार खड़े हैं.

एक ही कमी रह गयी. आगे पूरी हो जायेगी. अगली बार आपको हाफ पेंट पहना दिया जायेगा और भगवा टोपी पहना दी जायेगी. आप मजे में आरएसएस के स्वयंसेवक के रुप में अमर हो सकते हैं. आगे वही अमर होगा जिसे जनसंघ करेगा.

कांग्रेसियों से आप उम्मीद मत कीजिये. यह नस्ल खत्म हो रही है. आगे गड़ाये जाने वाले में कालपत्र में एक नमूना कांग्रेस का भी रखा जयेगा, जिससे आगे आनेवाले यह जान सकें कि पृथ्वी पर एक प्राणी ऐसा भी था. गैण्डा तो अपना अस्तितव कायम रखे है लेकिन कांग्रेसी नहीं रख सका.

मोरारजी भाई भी आपके लिए कुछ नहीं कर सकेंगे. वे सत्यवादी हैं. इसलिए अब वे यह नहीं कहते कि आपको मारने वाला गोडसे आरएसएस का था.

यह सभी जानते हैं कि गोडसे फांसी पर चढ़ा, तब उसके हाथ में भगवा ध्वज था और होठों पर संघ की प्रार्थना- नमस्ते सादा वत्सले मातृभूमि. पर यही बात बताने वाला गाँधीवादी गाइड दामोदरन नौकरी से निकाल दिया गया. उसे आपके मोरारजी भाई ने नहीं बचाया.

मोरारजी सत्य पर अटल रहते हैं. इस समय उनके लिए सत्य है प्रधानमंत्री बने रहना. इस सत्य की उन्हें रक्षा करनी है. इस सत्य की रक्षा के लिए जनसंघ का सहयोग जरूरी है. इसलिए वे यह झूठ नहीं कहेंगे कि गोडसे आरएसएस का था. वे सत्यवादी है.

तो महात्माजी, जो कुछ उम्मीद है, बाला साहब देवरास से है. वे जो करेंगे वही आपके लिए होगा. वैसे काम चालू हो गया है. गोडसे को भगत सिंह का दर्जा देने की कोशिश चल रह रही है. गोडसे ने हिंदू राष्ट्र के विरोधी गाँधी को मारा था.

गोडसे जब भगत सिंह की तरह राष्ट्रीय हीरो हो जायेगा, तब तीस जनवरी का क्या होगा? अभी तक यह ‘गाँधी निर्वाण दिवस है’, आगे ‘गोडसे गौरव दिवस’ हो जायेगा. इस दिन कोई राजघाट नहीं जायेगा, फिर भी आपको याद जरूर किया जायेगा.

जब तीस जनवरी को गोडसे की जय-जयकार होगी, तब यह तो बताना ही पड़ेगा कि उसने कौन-सा महान कर्म किया था. बताया जायेगा कि इस दिन उस वीर ने गाँधी को मार डाला था. तो आप गोडसे के बहाने याद किए जायेंगे. अभी तक गोडसे को आपके बहाने याद किया जाता था.

एक महान पुरुष के हाथों मरने का कितना फयदा मिलेगा आपको? लोग पूछेंगे- यह गाँधी कौन था? जवाब मिलेगा- वही, जिसे गोडसे ने मारा था.

एक संयोग और आपके लिए अच्छा है. 30 जनवरी 1977 को जनता पार्टी बनी थी. 30 जनवरी जनता पार्टी का जन्म-दिन है. अब बताइये, जन्मदिन पर कोई आपके लिए रोयेगा? वह तो खुशी का दिन होगा.

आगे चलकर जनता पार्टी पुरी तरह जनसंघ हो जायेगी. तब 30 जनवरी का यह महत्त्व होगा- इस दिन परमवीर राष्ट्रभक्त गोडसे ने गाँधी को मारा. इस पुण्य के प्रताप से इसी दिन जनता पार्टी का जन्म हुआ, जिसने हिंदू राष्ट्र की स्थापना की.

आप चिंता न करें, महात्माजी! हमारे मोरारजी भाई को न कभी चिंता होती है और न वे कभी तनाव अनुभव करते हैं. चिंता क्यों हो उन्हें? किसकी चिंता हो? देश की? नहीं. उन्होंने तो ऐलान कर दिया है- राम की चिड़िया, राम के खेत! खाओ री चिड़िया, भर-भर पेट! तो चिड़िया खेत खा रही है और मोरारजी को कोई चिंता, कोई तनाव नहीं है.

बाकी भी ठीक चल रहा है. आप जो लाठी छोड़ गए थे, उसे चरण सिंह ने हथिया लिया है.

चौधरी साहब इस लाठी को लेकर जवाहरलाल नेहरू का पीछा कर रहे हैं. जहाँ नेहरू को पा जाते हैं, एक-दो हाथ दे देते हैं. जो भी नेहरू की नीतियों की वकालत करता है, उसे चौधरी आपकी लाठी से मार देते हैं.

उस दिन चंद्रशेखर ने कहीं कह दिया कि नेहरू की उद्योगीकरन की नीति सही थी और उससे देश को बहुत फायदा हुआ है.

चरण सिंह ने सुना तो नौकर से कहा- अरे लाना गाँधीजी की लाठी!

लाठी को लेकर चंद्रशेखर को मारने निकल पड़े. बेचारे बचने के लिए थाने गए तो थानेदार ने कह दिया- पुलिस चौधरी साहब की है. वे अगर आपको मार रहे हैं तो हम नहीं बचा सकते.

आप हरिजन वगैरह की चिन्ता मत कीजिये. हर साल कोटा तय रहता है कि इस साल गाँधी जयंती तक इतने हरिजन मरेंगे. इस साल ‘कोटा’ बढ़ा दिया गया था, क्योंकि जनता पार्टी के नेताओं ने राजघाट पर शपथ ली थी.

उनकी सरकार बन गयी. उन्हें शपथ की लाज रखनी थी. इसीलिये हरिजनों को मारने का ‘कोटा’ बढ़ा दिया गया. खुशी है कि ‘कोटे’ से कुछ ज्यादा ही हरिजन मारे गए. आप बेफिक्र रहें, आपका यश किसी ना किसी रुप में सुरक्षित रहेगा.
आपका
एक भक्त

साभार: परसाई रचनावली-4

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भारतवन अधिनायक: संतोष झा

संतोष झा बिहार के युवा रंगकर्मी, संगीतकार, नाटककार और संस्कृतिकर्मी हैं. फिलहाल एक राजनितिक नाटक ‘भारतवन अधिनायक’ के रिहर्सल में व्यस्त हैं. हिंदी की कुछ कविताओं को स्वर और संगीत देने के कारण खासे चर्चित रहे हैं. उनके द्वारा लिखित नाटक ‘भारतवन अधिनायक’ से कुछ गीत हम यहाँ साझा कर रहे हैं. नाटक के पीडीऍफ़ संस्करण के लिए यहाँ चटका लगा सकते हैं.भारतवन अधिनायक -संतोष झा और उनसे संपर्क की इच्छा हो तो  hirawal@gmail.com पर  लिख भी  सकते  हैं. 325265_355927197757029_1801603844_o

By संतोष झा 

1.

वन-वन-वन अधिनायक जय हे

भारतवन अधिनायक

गेंडे विशाल, लोमड़-सियार

औ’ स्वान तुम्हारे सेवक

प्रति वृक्ष-वृक्ष वानर-समूह

तुम ही उन सबके नायक

भेड़-बकरियां-गायें

श्रद्धानत हो आएं

सम्मुख नवाएं माथा

2.

डेवलपमेंट का नया आइडिया !

क’मॉन गाइज़ लेट्स मेक इट सक्सेसफुल

वन टू थ्री फोर हैव ग्लास फुल-फुल

दुनिया जाए भाड़ में, यू बी जस्ट कूल!

वन टू थ्री फोर हैव ग्लास फुल-फुल

हैव ग्लास फुल-फुल, हैव ग्लास फुल-फुल

हैव ग्लास फुल-फुल, हैव ग्लास फुल-फुल

चलो पीछे-पीछे-पीछे-पीछे-पीछे-पीछे देखें

चलो आगे-आगे-आगे-आगे-आगे-आगे बढ़ें

चलो शेयर करें व्हाट्स अप पे

चलो शेयर करें फेसबुक पे

दुनिया जाए भाड़ में, यू बी जस्ट कूल!

क’मॉन गाइज़ लेट्स मेक इट सक्सेसफुल

वन टू थ्री पफोर हैव ग्लास फुल-फुल

हैव ग्लास फुल-फुल, हैव ग्लास फुल-फुल

हैव ग्लास फुल-फुल, हैव ग्लास फुल-फुल

3.

घर तो निकला हवा-हवाई, रोज़ी का क्या होगा राजा?

घर तो निकला हवा-हवाई, रोटी का क्या होगा राजा?

घर तो निकला हवा-हवाई, ऊपर से बढ़ती महंगाई

ऊपर से बढ़ती महंगाई, बच्चों का क्या होगा राजा

घर तो निकला हवा-हवाई, रोज़ी का क्या होगा राजा?

घर तो निकला हवा-हवाई, रोटी का क्या होगा राजा?

4.

भारतवन का नया राज है, नया काज है, नया साज है

कौन बताए किसके सर पे, इस शासन का रखा ताज है

कल तक दिल्ली में दिखता था, नागपूर में दिखे आज है

ऐ भारतवन के बाशिंदो! बैल, गधे, आज़ाद परिंदो

आंख मूंदकर जीनेवालो, आसमान में उड़नेवालो

लक्कड़बग्घे घूम रहे हैं, गिद्ध डाल पर झूम रहे हैं

खों-खों, भौं-भौं, हुआं-हुआं में, दाना-पानी कहीं नहीं है

क्या होगा बछड़ों-चूज़ों का, इसकी चिंता कहीं नहीं है

कोई कहता एक रंग का बैल रहेगा भारतवन में

कोइ कहता एक रंग की चिडि़या होगी इस उपवन में

आखें खोलो, उठो एक संग, भारतवन के ऐ बाशिंदो !

नागपूर-दिल्ली से कह दो – हमें हमारा वतन चाहिए

नए राज के लंगूरों से कह दो – हमको अमन चाहिए

अमन चाहिए!

अमन चाहिए!!

अमन चाहिए!!!

पेरूमल मुरुगन और वन पार्ट वुमन: प्रणय कृष्ण

मुरुगन ने किसी प्रथा पर कोई मूल्य निर्णय नहीं दिया है, अच्छा या बुरा नहीं कहा है, उन्होंने सिर्फ एक कोमल कहानी कही है जो एक समाज में जन्मी है. उस समाज की कुछ प्रथाएं और मान्यताएं हैं जो उस समाज में जी रहे लोगों के जीवन से लिपटी हैं, उन्हें कोई कथाकार, इतिहास-लेखक या नृतत्वशास्त्री कृत्रिम ढंग से काट कर अलग नहीं कर सकता. ऐसा करना खुद को झूठा साबित करना है, कला और समाज दोनों से गद्दारी है. मुरुगन ने ऐसा करने से इनकार किया है, लेखक की मृत्यु की कीमत चुका कर भी. लेकिन पाठकों और जागरूक नागरिकों का प्यार उन्हें वापस लौटा लाएगा. ज़रूर ही लौटा लाएगा. #लेखक _80236804_modhorupaganfinalcurved

तमिल लेखक पेरूमल मुरुगन पुनरुज्जीवित होंगे

By प्रणय कृष्ण

तमिल लेखक पेरूमल मुरुगन ने १४ जनवरी को फेसबुक पर लिखा, लेखक पेरूमल मुरुगन मर गया. वह भगवान नहीं है, लिहाजा वह खुद को पुनरुज्जीवित नहीं कर सकता. वह पुनर्जन्म में भी विश्वास नहीं करता. आगे से, पेरूमल मुरुगन सिर्फ एक अध्यापक के बतौर ज़िंदा रहेगा, जो वह हरदम रहा है.” अब तक मुरुगन के खिलाफ धर्म और जाति के स्वयंभू ठेकेदारों से लेकर उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हक़ में आवाज़ उठाने वाले लोगों ने लाखों शब्द व्यय किए होंगे, लेकिन लेखक की पीड़ित अंतरात्मा की यह तीन पंक्तियां सब पर भारी हैं. लेखक मर गया, लेकिन २०१५ के हिन्दुस्तान के राज और समाज की हिंसक दयनीयता जी रही है. मुरुगन का वक्तव्य ऐसे वक्त पर टिप्पणी है जिसमें जनता की वंचनाओं और हाहाकार को एक सामूहिक पागलपन की ओर मोड़ देने की पुरजोर कोशिशें हो रही हैं. अतीत की रमणीय कपोल-कल्पनाओं और भविष्य के मादक सपनों की गरज के बीच आज के भारत की कराह सुनाई देनी बंद होती जा रही है. वे सारे परदे जिनपर चित्र और चलचित्र दिखाई देते हैं और वे सारे यंत्र-तंत्र जिनसे आवाजें सुनी जाती है, झपट लिए गए हैं. मानव विकास सूचकांक में दुनिया के १३५वें पायदान पर खड़े भारत की वर्तमान वास्तविकता, वास्तविक अतीत तथा यथार्थपरक भविष्य के चित्र और स्वर अदृश्य और गूंगे बनाए जा रहे हैं.

आस्था में चार साल की देरी से आए उबाल के तहत मुरुगन के जिस उपन्यास को पिछले दिसंबर महीने से   निशाना बनाया गया है, वह २०१० में प्रकाशित हुआ था जिसका अंग्रेज़ी अनुवाद ‘वन पार्ट वुमन’ के नाम से २०१३ में पेंग्विन से छप कर आया. रोचक यह है कि इस उपन्यास में न तो ईशनिंदा है और न ही किसी धर्म या उसकी प्रथाओं का विरोध. उपन्यासकार ने उनपर व्यंग्य भी नहीं किया है, न कोई भंडाफोड़ किया है. उपन्यास का संवेदनात्मक उद्देश्य ही अलग है. मुरुगन की इतिहास-दृष्टि और सामाजिक चेतना मिथकों और आस्थाओं में लिपटे जीवन की वास्तविक धड़कनों और मर्म को इस उपन्यास में प्रत्यक्ष कर देती है, उनके दुश्मनों की निगाह में यही उनका अपराध है. उन्हें मुरुगन की कथा-सृष्टि भी सच की तरह डराती है. सच से ऐसा डर ही उन्हें सामाजिक सच्चाइयों के हर अनुसंधान या साहित्यिक पुनर्रचना को आस्था की तोपों से मार गिराने का अभ्यस्त बनाता है. सत्य से सत्ता का युद्ध बड़ा पुराना है, लेकिन हम जिस २०१५ के भारत में रह रहे हैं, वहां सच के आखेटक पहले से अधिक मूर्ख, किन्तु प्रशिक्षित हैं.

घटनाएं

२७ दिसंबर, २०१४ के ‘द हिन्दू’ अखबार के अनुसार तिरुचेंगोडे नगर की आर.एस.एस. इकाई के अध्यक्ष महालिंगम ने २६ दिसंबर के दिन ५० से अधिक लोगों का जुलूस निकाला और मुरुगन के इस उपन्यास की प्रतियां जलाई. भाजपा, आर.एस.एस. तथा कुछ अन्य हिंदूवादी संगठनों ने लेखक की गिरफ्तारी की मांग भी की (हालांकि अब जबकि लेखक के समर्थन में भी आवाजें तेज़ हो रही हैं, ये संगठन समूचे घटनाक्रम में अपनी भूमिका नकार रहे हैं). इसी रिपोर्ट के मुताबिक़ बीस दिन पहले से मुरुगन को धमकियां मिल रही थीं. बाद में उपन्यास के विरोधस्वरूप शहर बंद भी कराया गया. १२ जनवरी को नमक्कल के जिला प्रशासन ने लेखक को उनके विरोधियों के साथ शान्ति वार्ता के लिए बुलाया. यहाँ प्रशासन ने मुरुगन को ‘बिनाशर्त माफी’ माँगने, अगले संस्करण में उपन्यास में वर्णित स्थानों का नाम बदलने और उसके ‘आपत्तिजनक अंशों’ को हटाने, वर्तमान संस्करण की अनबिकी प्रतियों को बाज़ार से वापस लेने और भविष्य में ऐसी कोई हरकत न करने का वचन देने संबंधी हलफनामे पर दबाव देकर दस्तखत कराया. इस प्रकार सरकारी देख-रेख में संविधान की धारा १९(१)(ए) की धज्जियां उड़ाई गयीं. ध्यान रहे मुरुगन जिस अंचल के लेखक हैं, उसी अंचल के एक सपूत थे ‘पेरियार’. जातिप्रथा-विरोधी, अंधश्रद्धा-विरोधी, सेक्युलर और नास्तिक ‘पेरियार’ की कर्मभूमि पर एक लेखक के साथ यह सब कुछ होना भारी विडम्बना है. द्रविड़ आन्दोलन के साथ पेरियार की विरासत जुडी हुई है, लेकिन उसी आन्दोलन से निकली एक पार्टी तमिलनाडू की सत्ताधारी पार्टी है और दूसरी मुख्य विपक्षी पार्टी. सत्ताधारी पार्टी की भूमिका नमक्कल प्रशासन की  हरकतों से ज़ाहिर है और विपक्षी पार्टी की भूमिका इस प्रकरण पर उसकी चुप्पी से. ( मामला तूल पकड़ने पर इस पार्टी ने लेखक के पक्ष में एक-दो बयान जारी करके छुट्टी पा ली है) अनेक लेखकों ने ठीक ही लक्ष्य किया है यह प्रकरण द्रविड़ पार्टियों की पस्ती के दौर में हिंदुत्व की ताकतों द्वारा तमिलनाडू में पाँव पसारने की कवायद का सूचक है. एक जागरूक नागरिक के रूप में मुरुगन अपने इलाके में शिक्षा की दुकानदारी के खिलाफ लिखते रहे हैं और पर्यावरण की धज्जियां उड़ानेवालों के खिलाफ भी. यह सारे निहित स्वार्थ भी उनके खिलाफ परदे के पीछे सक्रिय हैं.

४८ वर्षीय मुरुगन नमक्कल में शासकीय कला विद्यालय में तमिल पढ़ाते हैं. उन्होंने अबतक ३५ पुस्तकें लिखीं है जिनमें ७ उपन्यास और तमिलनाडू के कोंगू (पश्चिम) क्षेत्र की बोलियों का शब्दकोष भी शामिल है.

उपन्यास का कथानक

यह उपन्यास कोंगू अंचल के जन-जीवन का अत्यंत संवेदनशील चित्र प्रस्तुत करता है. इस अंचल के जंगल, पहाड़, वनस्पति, पशु-पक्षी, मेले, नृत्य, संगीत, खेल-तमाशे, हाट-बाज़ार, खान-पान, पहनावा, देवस्थान और उनसे जुडी आस्थाएं, लोकविश्वास और किसान जीवन को कथा में जीवंत इसीलिए किया जा पाया है कि उपन्यासकार उस अंचल का मार्मिक जानकार ही नहीं, गंभीर अध्येता भी है.

उपन्यास के इसी आंचलिक परिवेश में निस्संतान किसान दंपत्ति पोन्ना(पत्नी) और काली(पति) की कोमल कथा प्रवाहित है. दोनों एक दूसरे को बेहद प्यार करते हैं. लेकिन उनके paraparpapअकुंठ प्यार पर निस्संतान होने का ग्रहण लग जाता है. रिश्तेदारों, दोस्तों और पड़ोसियों के ताने पोन्ना को ज़्यादा सुनने पड़ते है. तीज-त्यौहार और मांगलिक अवसरों पर कर्मकांडों के वक्त ‘बाँझ स्त्री’ के प्रति अपमानजनक व्यवहार के चलते वह धीरे-धीरे अपने घर की चहारदीवारी में सिमटती चली जाती है. काली को भी समय समय पर किसी न किसे प्रकरण में लज्जित होना पड़ता है. उसका भी सामाजिक जीवन सीमित होता जाता है. उसकी नपुंसकता की चर्चाएँ भी होती हैं. निस्संतान दंपत्ति की संपत्ति पर रिश्ते-नातेदारों ही नहीं, पड़ोसियों की भी निगाह है. काली को उसकी मां और दादी दूसरा विवाह करने की सलाह देती हैं. इस प्रस्ताव पर पोन्ना के मां- बाप को भी कोई ऐतराज़ नहीं है, वे इतने में ही संतुष्ट हैं कि दूसरी स्त्री के साथ उनकी बेटी भी उसी घर में रहे, निकाली न जाए. पोन्ना और काली भी कभी कभी एक दूसरे का मन टोहने या चिढाने के लिए आपस में दूसरे विवाह की बात करते हैं. पोन्ना सदैव ही भारी मन से ही सही, यह कहती है कि काली की खुशी के लिए वह इसके लिए भी तैयार है. वास्तव में दोनो ही एक दूसरे से इतना प्यार करते हैं कि मन बांटने के लिए इस प्रस्ताव पर चाहे जो चर्चा करते हों, उसकी वास्तविक संभावना को कभी मन में स्वीकार नहीं करते. काली की मां और दादी उनके परिवार पर देवी -देवताओं का श्राप मानती हैं. निर्वंश होने के श्राप से मुक्ति के लिए काली और पोन्ना वर्षानुवर्ष न जाने कितने देवी-देवताओं, मंदिरों-मठों का चक्कर लगाकर, न जाने कितनी पूजा-पाठ, व्रत-अनुष्ठान करके थक चुके हैं. काली की मां और दादी के पास परिवार पर श्राप के अलग अलग किस्से हैं. वे हर किस्से के अनुरूप श्रापमुक्ति के उपाय करते हैं. पाठक इन किस्सों में उस अंचल के तमाम सामाजिक संबंधों की भी झांकी पाता है. ये किस्से अलग-अलग जातियों के बीच, अलग अलग तबकों के बीच, आदिवासियों और गैर-आदिवासियों के बीच, स्त्री और पुरुष के बीच, औपनिवेशिक समय में अंग्रेजों और देशियों के बीच, मनुष्य और देवता के बीच संबंधों की झलक दिखलाते है. ये किस्से उस अंचल के ऐतिहासिक-सामाजिक जीवन की मिथकीय अभिव्यक्तियाँ हैं. ऐसे किस्सों और लोकविश्वासों को पिरोने और अंचल के जीवंत नृवंशीय चलचित्र प्रस्तुत करने का हुनर मुरुगन अपने अनेक उपन्यासों में पहले भी दिखला चुके हैं. अपने अंचल के प्रति गंभीर ऐतिहासिक दायित्व का निर्वाह करते हुए उन्होंने अतीत के लेखकों द्वारा उस अंचल पर लिखी गई चीज़ों की खोज की और उन्हें दो खण्डों में प्रकाशित किया. उन्होंने टी.ए. मुथूसामी कोनार द्वारा इस अंचल पर लिखे इतिहास-ग्रन्थ जिसे लुप्त मान लिया गया था, उसे खोजकर पुनर्प्रकाशित कराया. ( देखें ए.आर. वेंकट चेलापति का लेख, ‘द हिंदु’, १२ जनवरी)

       एक भरा-पूरा, सुन्दर और संतुष्ट वैवाहिक जीवन सामाजिक मान्यताओं के चलते किस तरह अवसादग्रस्त होता है, लेकिन अवसाद के आगे पराजय नहीं मानता, इसे मुरुगन ने बहुत कोमल और संवेदनशील रंग-रेखाओं में अंकित किया है. काली और पोन्ना का निश्छल और उन्मुक्त प्यार समाज की मान्यताओं के टकराकर कैसे कैसे अंतर्द्वंद्वों से गुज़रता है, उसके सूक्ष्म से सूक्ष्म कंपन को उपन्यासकार की लेखनी पकड़ लेती है. वे तत्व जो इन पात्रों के मन की सुन्दर गहराइयों में लेखक की उंगली पकड़ कर उतरने की जगह उन सुन्दर उँगलियों को ही तोड़ देने को पुरुषार्थ समझे बैठे हैं, उनका कलेजा सचमुच काठ का बना है. उपन्यास का अंत ट्रैजिक है. काली के दूसरे विवाह के प्रस्ताव और श्रापमुक्ति के सभी उपाय विफल होने पर पोन्ना और काली दोनों की मांएं एक अलग योजना बनाती हैं. अर्द्धनारीश्वर के स्थानीय मंदिर में हर साल तमिल वैकासी महीने ( मई-जून) में १४ दिन का मेला लगता है. चौथे दिन पहाड़ों से देवता उतरते हैं और उनकी रथ की सवारी अगले दस दिन निकलती रहती है, अंतिम दिन वे वापस चले जाते हैं. अंतिम दिन मेले में भारी भीड़ होती है और माना जाता है कि इस दिन मेले में उपस्थित सभी पुरुष देवता होते हैं. निस्संतान स्त्रियों के लिए यह दिन भाग्यशाली होता है, जहां वे किसी देवता से समागम कर संतान-प्राप्ति कर सकती हैं. ऐसी संतानें देवता का प्रसाद या देव-संतानें मानी जाती हैं. काली की मां इस दिन पोन्ना को मेले में भेजे जाने के लिए काली को सहमत नहीं कर पाती. एक साल बीत जाता है. अगले साल मेला शुरू होने के समय काली का साला मुथु (जो उसका बाल-सखा भी है) बहन-बहनोई को इसके लिए राजी करने उनके घर आता है. मंदिर पोन्ना के घर से नज़दीक है. हर साल मेले के समय काली पोन्ना को लेकर अपने ससुराल जाया करता था और वहीं से वे मेला घूमने जाते थे. ऐसे में मुथु के आग्रह पर काली पोन्ना को तत्काल उसके साथ भेजने को राजी हो जाता है और खुद मेले के १४वे दिन आने का वादा करता है. लेकिन पोन्ना को देव-समागम के लिए भेजे जाने से वह इनकार कर देता है. मुथु बहन से झूठ बोलता है कि बहनोई काली ने इस बात की अनुमति दे दी है. पोन्ना को इसकी तस्दीक खुद काली से करने का वक्त नहीं मिलता, फिर भाई की बात पर अविश्वास का कोई कारण नहीं था क्योंकि काली और मुथु साले-बहनोई ही नहीं बाल-सखा भी थे. एक नाटकीय घटनाक्रम में चौदहवें दिन काली के ससुराल पहुँचाने के बाद मुथु सदा की तरह काली को लेकर खाने-पीने, मौज-मस्ती करने घर से खूब दूर ले जाता है, ताकि अगली सुबह तक दोनों लौट न पाएं. उधर पोन्ना के मां-बाप उसे लेकर बैलगाड़ी में मेले की ओर चल देते है. काली और मुथु दूरस्थ स्थान पर खाने-पीने के बाद सो जाते हैं. लेकिन काली की नींद आधी रात के बाद खुल जाती है. वह वापस ससुराल की ओर चल पड़ता है. भोर में वहां पहुँच कर जब उसे ताला जडा मिलता है, तो उस पर वज्रपात सा होता है. उसकी भावनाएं पछाड़ खाकर गिरती हैं. उसे लगता है कि पोन्ना ने उसके साथ धोखा किया है. यहीं उपन्यास ख़त्म होता है.

ट्रेजेडी का भाव सघन इसलिए होता है कि दरअसल किसी ने किसी को धोखा नहीं दिया. मुथु, काली की माँ, उसके सास-ससुर- सभी काली और पोन्ना का दुःख दूर करना चाहते हैं. मुथु ने इसी खातिर बहन से झूठ बोला. पोन्ना मेले में जाने को खुद तत्पर नहीं है. वह काली को खुश देखना चाहती है, उसके किए बड़ा से बड़ा त्याग करने को तैयार है, ऐसे में उसकी रजामंदी जानकार वह मेले में जाने को तैयार होती है. यह निश्छल भावनाओं की ऐसी दुनिया है जहां हरेक व्यक्ति जो कर रहा है वह दूसरे की खुशी के लिए कर रहा है, लेकिन परिणाम वह निकलता है जो किसी ने न चाहा था. मेले की भीड़ में ‘देवता’ से उसकी भेंट सुगम हो सके, इसके लिए पोन्ना को अकेला छोड़ जब उसकी माँ गायब हो जाती है, तब के बाद का वर्णन उपन्यासकार की सामर्थ्य का सबसे ताकतवर साक्ष्य है. पोन्ना की मार्फ़त पाठक तमाम स्थानीय सांस्कृतिक कला-रूपों, नाटकों और रिवाजों की दृश्यावली से गुज़रता है, लेकिन सबसे बड़ा नाटक तो पोन्ना के मानसपटल पर अभिनीत हो रहा है. भारी भीड़ में अकेले होने के भय से शुरू करके अपरिचितों के बीच अनाम होने की खुशी तक उसके मन में अनेक भाव आते और जाते हैं. परिचय की दुनिया की हर नज़र उसे छेदती थी, क्योंकि वह निस्संतान थी. मेले में भीड़ का हिस्सा होकर वह ऐसी हर नज़र से आज़ाद थी, जहां न वह किसी को जानती थी और न कोई उसे. लेकिन अवचेतन के सह-सम्बन्ध और संस्कार उसकी निगहबानी बदस्तूर कर रहे थे. जब भी कोई ‘देवता’ उसकी ओर रुख करता, उसके और अपरिचित देवता के बीच काली का चेहरा परिचिति या स्मृति की छाया सा झिलमिला उठाता, क्योंकि पति से भी ज़्यादा काली वह व्यक्ति है जिससे वह सबसे ज़्यादा प्यार करती है. एक छोटे से स्वप्न-दृश्य में बचपन के प्यार का एक चेहरा भी कौंधता है. यह कोई नैतिक द्वंद्व नहीं है. काली के विपरीत पोन्ना के मन में इस प्रथा पर आस्था का कोई संकट नहीं है. काली की खुशी के लिए और अपने जानते में उसकी ‘अनुमति’ से ही वह ‘देवता’ की खोज में आई है, लेकिन क्या एक क्षण को भी काली को भूले बगैर ‘देवता’ से मिलन संभव हो पाएगा? इस द्वंद्व को उपन्यासकार ने चेतन और अचेतन के बीच, परिचित और अनजाने के बीच, सम्बन्ध-भावना और स्वातंत्र्य-कामना के बीच, मानवीय भाव-यंत्र और देवत्व के तसव्वुर के बीच – एक साथ अनेक स्तरों पर अभूतपूर्व संवेदनशीलता से अंकित किया है. अंततः पोन्ना इस द्वंद्व से पार जाती है, इसका संकेत करके उपन्यासकार आगे बढ़ जाता है. समागम का दृश्य उपस्थित करने और पाठक को गुदगुदाने की उसकी कोई इच्छा ही नहीं है.    

कहानी का अंत नहीं हुआ, लौटेगा कहनेवाला

  उपन्यास के अंतिम दृश्य में काली को तड़पता देख पाठक की उत्कंठा बढ़नी स्वाभाविक है, लेकिन उपन्यास ख़त्म हो जाता है. पाठक के ज़ेहन में ढेरों सवाल हैं? क्या पोन्ना और काली का सम्बन्ध-विच्छेद हो जाएगा? क्या काली यह जान कर कि पोन्ना को उसकी ‘अनुमति’ की झूठी जानकारी थी, उसे अपना लेगा? क्या पोन्ना यह जानकार कि उससे झूठ बोला गया था, अपराधबोध या आत्महंता भाव से ग्रस्त हो जाएगी? ऐसे में अपने माँ-बाप और भाई के प्रति उसका क्या रुख होगा? यदि वह अपने माँ-बाप और भाई को क्षोभ में त्याग दे और काली उसे फिर से न अपनाए, तो वह कहाँ जाएगी? यदि उसे देव-संतान होती है, तो उस संतान का भविष्य क्या है? श्री चेलापति ने अपने लेख में लिखा है कि ढेरों पाठकों ने लेखक को पोन्ना और काली की आगे की कहानी बताने के लिए अनेक पत्र लिखे. जवाब में लेखक ने उपन्यास को आगे के दो खण्डों में जारी रखने का वादा किया है, दोनों खण्डों के शीर्षक भी बताए हैं. मुरुगन को यह वादा निभाना ही पडेगा. लेखक की मृत्यु की घोषणा के बावजूद उसे खुद को पुनरुज्जीवित करना होगा. पाठक ज़रूर उन ताकतों से लड़ेंगे और जीतेंगे जो कि लेखक के पुनरुज्जीवन में बाधा हैं.

मुरुगन के लेखक को मार देनेवाली ताकतों को इस उपन्यास की मूल संवेदना से कुछ लेना लादना नहीं है. उनके लिए निस्संतान स्त्रियों द्वारा एक स्थानविशेष के मंदिर के मेले में आपसी सहमति से विवाह-बाह्य, धर्मानुमोदित और सामाजिक स्वीकृति प्राप्त यौन-सम्बन्ध बनाने की प्रथा का उपन्यास में कथात्मक विनियोग ‘आपत्तिजनक’ है. इसे वे धर्मविरुद्ध, स्त्रियों की मर्यादा के विरुद्ध और उस इलाके के लिए अपमानजनक मानते हैं. क्या उपन्यासकार ने इस प्रथा की वकालत की है या उसका अनुमोदन किया है? ज़ाहिर है ‘नहीं’. कहानी की तर्क-योजना और संवेदनात्मक  उद्देश्य में उक्त प्रथा की हिमायत या आलोचना का कोई काम ही नहीं है. लेकिन ज़रा प्राचीन ग्रंथों पर नज़र डालें और देखें कि ‘नियोग’ की प्रथा को कितने धर्मशास्त्रों की सम्मति प्राप्त थी. भारतरत्न पंडित पांडुरंग वामन काणे ने गौतम, वसिष्ठ, बौधायन, याज्ञवल्क्य, नारद, कौटिल्य आदि धर्मसूत्रकारों की सम्मतियों उद्धृत की है तथा महाभारत के आदिपर्व, अनुशासनपर्व और शांतिपर्व में नियोग के उदाहरणों और संकेतों की चर्चा की है. (धर्मशास्त्र का इतिहास-प्रथम भाग) मुरुगन की पुस्तक जलानेवाले तत्व इन धर्मसूत्रों और महाभारत के बारे में क्या ख्याल रखते हैं? शास्त्र और लोक की बात छोड़ भी दें, तो क्या मानवशास्त्र का अध्ययन यह नहीं बताता कि ऐसी प्रथाएं लगभग सभी प्राक-आधुनिक समाजों में रही आई हैं? यह भी कि आधुनिक समय में भी तमाम प्राक-आधुनिक प्रथाएं रूप बदलकर क्या अपनी निरंतरता नहीं बनाए रखतीं? मुरुगन ने किसी प्रथा पर कोई मूल्य निर्णय नहीं दिया है, अच्छा या बुरा नहीं कहा है, उन्होंने सिर्फ एक कोमल कहानी कही है जो एक समाज में जन्मी है. उस समाज की कुछ प्रथाएं और मान्यताएं हैं जो उस समाज में जी रहे लोगों के जीवन से लिपटी हैं, उन्हें कोई कथाकार, इतिहास-लेखक या नृतत्वशास्त्री कृत्रिम ढंग से काट कर अलग नहीं कर सकता. ऐसा करना खुद को झूठा साबित करना है, कला और समाज दोनों से गद्दारी है. मुरुगन ने ऐसा करने से इनकार किया है, लेखक की मृत्यु की कीमत चुका कर भी. लेकिन पाठकों और जागरूक नागरिकों का प्यार उन्हें वापस लौटा लाएगा. ज़रूर ही लौटा लाएगा.

प्रणय कृष्ण

प्रणय कृष्ण

इलाहाबाद युनिवर्सिटी और जेएनयू से अध्‍ययन. प्रखर हिंदी आलोचक. जन संस्‍कृति मंच के महासचिव. देवीशंकर अवस्‍थी सम्‍मान  से सम्मानित .

विडंबनात्मक परिवेश की रूपक-कथा है ‘आस्था’: प्रणय कृष्ण

अगर आधुनिकता की यह विडंबना आधारभूत है, तो कोई न कोई तबका हर समाज में ऐसा होगा जो इस विडम्बना को सबसे पहले और सबसे ज़्यादा गहराई से अभिव्यक्त करेगा। हिंदुस्तान में यह तबका कौन-सा है? ‘आस्था’ फिल्म का जवाब है कि यह तबका है महानगरों में रहनेवाली मध्यवर्गीय युवा औरतें। फिल्म की नायिका उन्हीं का प्रतिनिधित्व करती है। ऐसा नहीं कि दूसरे सभी तबके इस विडंबना से अछूते हैं, लेकिन इतिहास का निरंकुश चुनाव इसी तबके का है। मध्यवर्ग के महानगरीय आदमी की पितृसत्तात्मक सुरक्षा इस विडंबना से बचने की एक ढाल है। उसके तरकश में आदर्शवाद के तीर इस विडंबना से निपटने के लिए अभी बाकी हैं। लेकिन एक स्त्री जरूर तैयार होती गई है जिसकी परिभाषा परिवार, परंपरा और आदर्शवाद के दायरे में संभव नहीं है। # लेखक 04257290

फिल्म ‘आस्था’ से गुज़रते हुए

1. कहानी– मानसी एक सुन्दर-सी बेटी की मां और एक नेकदिल प्रोफेसर पति का प्रेम पाने वाली पत्नी है। घर की ज़़रूरतें पति की आय से पूरी हो जाती हैं, लेकिन ख्वाहिशें नहीं। बेटी को जूते की ज़रूरत है। मानसी जूते खरीदने जाती है, लेकिन जो जूता पसंद आता है वह उसके बजट से बाहर है। दुकान में उपस्थित एक महिला रीता जूते बंधवा देती है और बाकी के पैसे चुकता कर देती है। फिर वह उसे अपनी गाड़ी में बिठा कर होटल लाती है और एक पुरुष के हवाले कर देती है, इस हिदायत के साथ कि नई है। इस पुरुष से मानसी को मिलता है ढेर सारा रुपया और (प्रतिरोध के बाद) संतुष्टि। घर लौटती हुई मानसी में आत्मग्लानि है। घर लौटने पर बेटी जूते पाकर खुश है, पति से वह सब कुछ बताना चाहती है, लेकिन कह नहीं पाती और बात बदल देती है। फिर तो ना-नुकुर करते हुए भी बिज़नेस का यह सिलसिला शुरू हो जाता है। सहेली के घर देखी गई ब्लू फिल्म के नाम पर वह पति को भी नए तरीकों से सुखी करती है। अंततः एक छात्रा के सामने पोल खुलने पर उसी छात्रा के माध्यम से और कहानी के रूप में पति को सारी बात बताती है। पति एक ऐसे आदर्श पति की भूमिका निभाता है जो पत्नी के हालात को समझने की कोशिश करे और इस तरह वह बाज़ार से मुक्त होकर घर की होकर रह जाती है।

 2. कहानी का पाठ (या शायद अतिपाठ): इस कहानी को हम आधुनिकता के विडंबनात्मक परिवेश की रूपक-कथा के रूप में देखने की कोशिश करें। पहले कुछ कविताओं के टुकड़े-

(अ) मिट्टीपन मिटाए नहीं मिटता/ आकाशपन हटाए नहीं हटता/आकाश और मिट्टी के इस संघर्ष के बीच/ मेरे ज़ख्मों का कजऱ् चुकाए नहीं चुकता

-मराठी कवि कुसुमाग्रज की कविता का एक अंश

(आ) कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता

कभी ज़मीं तो कभी आस्मां नहीं मिलता।

-हिंदवी कवि ‘शहरयार’

ऊपर के दोनों उद्धरण आधुनिकता की आधारभूत विडंबना पेश करते हैं- यहां ज़मीन या मिट्टी का अर्थ है सुरक्षा (भौतिक और मनोवैज्ञानिक), जुड़े होने की इच्छा (बिलांगिंगनेस), निरंतरता (कन्टीन्यूटी) और अस्मिता (आइडेंटिटी)। आसमान का अर्थ है- अभिलाषाओं का संसार, ख्वाहिशों की उड़ान, फैल जाने की इच्छा। प्राक्-आधुनिक इंसान को परिवार, समुदाय, परंपरा और धर्म के रूप में ज़मीन मिली हुई थी। उसकी जड़े पुख्ता थीं, उसकी संवेदना स्थानीकृत थी, आकाशधर्मा नहीं, सभ्यता के विकास ने उसकी उत्पादन क्षमता को कल्पनातीत ढंग से बढ़ा दिया और उसकी इच्छाओं को उड़ने के लिए आसमान दिया।

‘हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले‘ -गालिब

आधुनिक मनुष्यता में जड़ों और इच्छाओं, ज़मीन और आसमान का विभेद पैदा हुआ। भौतिक विकास ने इच्छाओं को कल्पना से बाहर निकालकर वास्तविकता में पूरा करने का आश्वासन दिया। आधुनिक मनुष्य के चार आर्य सत्य है- (1) इच्छाएं हैं। (2) इच्छाओं का कारण है। (3) इच्छाओं की पूर्ति है। (4) इच्छाओं की पूर्ति का मार्ग है।

लेकिन दिक्कत ये है कि इच्छाओं की पूर्ति का मार्ग बाज़ार से होकर जाता है। बाज़ार यानि भौतिक प्रगति के वितरण का तरीका। इस वितरण पर जिन शक्तियों का नियंत्रण है, वे वितरण को असमान बनाती है, लेकिन इच्छाओं की भौतिक पूर्ति संभव है, इस संभावना का सार्वभौम असर होता है। आधुनिक विकासक्रम में समाज को संगठित करने की पुरानी सभी संस्थाओं में जो कुछ नहीं था, वह सब बाज़ार में उपलब्ध है, लेकिन बाज़ार खुद, सबको सब कुछ नहीं दे सकता।

कविता में ज़मीन और आसमान एक साथ न मिल जाने की आधुनिक विडंबना कविता में एक बोध के रूप में व्यक्त हुई है, जबकि फिल्म ‘आस्था’ इस जटिल यथार्थ को फिल्म माध्यम के सारे ही संसाधनों की सहायता से उसके सारे वस्तुगत आयामों में घटनाओं का आधार देकर विकसित करती है। हालांकि आधुनिकता का यह द्वंद्व अनेकशः रूमानी कविताओं, मनोविश्लेषण और अस्तित्ववाद के माध्यम से व्यक्त होता रहा है। भारत में यह द्वंद्व अब अधिक वयस्क हुआ है, ’80 और ’90 के दशक में। पूंजीवाद की आयु दुनिया के स्तर पर बढ़ी है और इसी अनुपात में आधुनिक चेतना का विभाजन गहराता गया है।

हमने ज़मीन और आसमान के ये प्रतीक लिए ही नहीं होते यदि ‘आस्था’ फिल्म में नायिका ने एक संवाद में अपनी व्यथा इन्हीं प्रतीकों में व्यक्त न की होती। शायद इसलिए भी कि ये प्रतीक सार्वभौम हैं।

3. इस विडंबना का वाहक कौन है?

अगर आधुनिकता की यह विडंबना आधारभूत है, तो कोई न कोई तबका हर समाज में ऐसा होगा जो इस विडम्बना को सबसे पहले और सबसे ज़्यादा गहराई से अभिव्यक्त करेगा। हिंदुस्तान में यह तबका कौन-सा है? ‘आस्था’ फिल्म का जवाब है कि यह तबका है महानगरों में रहनेवाली मध्यवर्गीय युवा औरतें। फिल्म की नायिका उन्हीं का प्रतिनिधित्व करती है। ऐसा नहीं कि दूसरे सभी तबके इस विडंबना से अछूते हैं, लेकिन इतिहास का निरंकुश चुनाव इसी तबके का है। मध्यवर्ग के महानगरीय आदमी की पितृसत्तात्मक सुरक्षा इस विडंबना से बचने की एक ढाल है। उसके तरकश में आदर्शवाद के तीर इस विडंबना से निपटने के लिए अभी बाकी हैं। लेकिन एक स्त्री जरूर तैयार होती गई है जिसकी परिभाषा परिवार, परंपरा और आदर्शवाद के दायरे में संभव नहीं है। ‘रोज़ा’ फिल्म का गीत याद आता है-

दिल है छोटा सा, छोटी सी आशा

मस्ती भरे मन की, भोली सी आशा

चांद तारों को छूने की आशा

आसमानों में उड़ने की आशा-

इस उड़ने की आशा को भला कौन-सा मध्यवर्गीय आदर्शवाद समेट पाएगा? कौन-सा परिवार और कौन-सी परंपरा इस चांद सितारों को छूने की इच्छा को पचा पाएंगे? एक तरफ सीता-सावित्री का कैंप है, दूसरी ओर मिस इंडिया, मिस यूनिवर्स का। बीच में एक लंबा दायरा है इतिहास, समाज और पीढि़यों का जिसमें एक बड़ा काफिला युवा स्त्रियों का चला जा रहा है- सीता के कैंप से मिस यूनिवर्स के कैंप की तरफ, एक तीसरे कैंप की तलाश में तमाम आंवागार्द लोग, महिलाओं के जनसंगठन, समाजवादी राजनीति करने वाले, सभ्यता समीक्षक, कलाकार और विचारवंत चले जा रहे हैं, लेकिन हैरत है कि सीता-सावित्री वाले कैंप और मिस वर्ल्ड वाले कैंप में फिर भी एक संवाद है, तीसरे कैंप के अन्वेषी तो कहीं संवाद में ही नहीं।

बाज़ार ने बोतल में बंद एक जिन्न को आज़़ाद कर दिया है- वह जिन्न जो मनुष्य की दमित आज़ादी है,  उसका अपूर्ण संसार है। यह जिन्न उस पर ज़्यादा चढ़ेगा जिसकी चेतना में वह सर्वाधिक कैद था।

इस फिल्म का एक दृश्य है जो दर्शकों की समूची सांस्कारिकता को तेज़ आघात देकर विजड़ित कर देता है। एक तरफ पति अपने मित्र के साथ किसी गांव में पंचायत की कार्यवाही देख रहा है जहां औरत विक्रय की वस्तु है, लेकिन पेट में बच्चा होने के नाते पंचायत उसकी भी राय जानना चाहती है कि वह किसके पास जाना चाहेगी। दूसरी ओर पत्नी को फुसलाकर एक दलाल महिला एक धनी व्यक्ति के बिस्तर में पहुंचा देती है। एक ओर पंचायती न्याय में तन्मय पति, दूसरी ओर परपुरुष की वासना का प्रतिरोध करती, छटपटाती पत्नी, दोनों ही दृश्य तेज़ी से एक दूसरे के समानांतर दिखाए जाते हैं। नेपथ्य में तेज़ संगीत बज रहा है। मानो कि उसी के शोर से पति को पत्नी का आर्तनाद नहीं सुनाई पड़ रहा। ज़रा सोचिए दर्शक की हालत।यह दृश्य उसके सांस्कारिक मन की पीड़ा को गहराता चला जाता है।

वे जो ‘आस्था’ फिल्म का ‘जलती जवानी’ टाइप पोस्टर देखकर फिल्म देखने चले आते हैं, इस दृश्य संयोजन से वे भी स्तब्ध थे। लेकिन वास्तविक आघात तो तब लगता है जब चरमोत्तेजन की ओर अग्रसर वह घरेलू पत्नी प्रतिरोध करना बंद करके, आनंद लेने लगती है। एक आनंद जो उसके वैवाहिक जीवन में उसे कभी नहीं मिला था, एक परपुरुष ने उसे दे दिया था। हिंदी फिल्मों में इतना तनावयुक्त शायद ही कोई दूसरा दृश्यांकन हुआ होगा। पूरे हॉल में स्तब्धता छा जाती है। यहां यह कह देना आवश्यक है कि चरमोत्तेजन (Orgasm) को एक नितांत जैविक तथ्य के रूप में लेना घातक है। यहां चरमोत्तेजन एक रूपक है उस मुक्ति का जो उसे एक नीरस पारिवारिकता से मिलती है। यहां गौरतलब है कि यह परिवार कोई संयुक्त परिवार नहीं, जिसका बोझा औरतें ढोती हैं। पति भी कोई सामंत नहीं, बल्कि आधुनिक सोच बरतने वाला पढ़ा-लिखा समझदार व्यक्ति है। फिर वह क्या है जो नायिका को एक अलगाव में ले जाता है? उसके पति की पुस्तकें, उसकी विद्वता और लोकप्रियता, उसका हंसमुख और मिलनसार स्वभाव सभी कुछ पत्नी से यह अपेक्षा करता है कि पत्नी अपने व्यक्तित्व को उसी में लय कर दे। जब पत्नी कहती है कि ‘इनकी मर्जी के बगैर इस घर में सूई भी इधर से उधर नहीं हो सकती’, तो वह अपने इसी भयानक अलगाव को व्यक्त कर रही होती है। असल में यह औरत अपने जि़ंदा हस्ती के लिए स्वायत्त लिविंग स्पेस खोज रही है। पति का सारा आदर्शवाद जो इस स्त्री के स्वाधीन व्यक्तित्व की अवहलेना पर टिका है; वह आदर्शवाद स्त्री की संवेदना, उसके भावनात्मक संसार, स्वप्न और अभिलाषाओं के प्रति अंधा है। पुरुष होने के नाते परिवार के बाहर भी उसकी एक दुनिया है, लेकिन स्त्री के लिए छत, दीवार, घरेलू काम, भोजन, बच्ची और पति मिलकर उसके अस्तित्व के अधूरेपन का गायन करते हैं, उसे सेलेबे्रट करते हैं; यहीं आकर यह फिल्म आदर्शवाद पर टिके मध्यवर्गीय एकल परिवार (न्यूक्लियर फैमिली) के खोखले स्त्री-पुरुष संबंधों का भाष्य बन जाती है। इन संबंधों में बहुत-सा आदर्शवाद, आवेग (पैशन) और अनुभव की साहसिकता (एडवेंचर) के ज़बर्दस्त अभाव पर पर्दा नहीं डाल पाता। यही कारण है कि यह परिवार बाज़ार के सामने इतना असहाय है।

4. तुम्हीं से जनमूं तो शायद मुझे पनाह मिले-

इस फिल्म के आखीर में एक खूबसूरत गीत फिल्माया गया है जिसकी टेक है- ‘तुम्हीं से जनमूं तो शायद मुझे पनाह मिले।’ इस फिल्म की नायिका ने बाज़ार में ज़रूरतों से आगे ख्वाहिशों के एक संसार को अपना इंतज़ार करते पाया, लेकिन इन ख्वाहिशों की पूर्ति को वैधता नहीं प्राप्त है। बाजार उसके व्यक्तित्व की न पाई गई अभिव्यक्ति को स्वायत्त करता है, लेकिन जड़ों से उसे उखाड़कर, उसकी संबंध भावना की विशिष्टता छीनकर, उसके निरंतरताबोध को विघटित करके। उसकी नई पाई गई आज़ादी वैधता के लिए भटकती है। अजीब दयनीय है यह आज़ादी जिसने उसके व्यक्तित्व को विभाजित कर दिया है। एक तनी हुई रस्सी पर विभाजित व्यक्तित्व के दोनों हिस्से एक दूसरे से मिलने के लिए दिन-रात चलते हैं। भटकती हुई आत्मा अपनी मुक्ति का स्तोत्र पढ़ती है- ‘‘तुम्हीं से जनमूं तो शायद मुझे पनाह मिले…’’ क्या यह प्रेतमुक्ति संभव हो पाएगी?

इस गीत के दृश्यांकन में आदमी-औरत के पारंपरिक रिश्तों का इतिहास बजता है। गीत के दौरान ओमपुरी की भंगिमा हिंदी फिल्मों के न जाने कितने आदर्शवादी नायकों को एक साथ उपस्थित कर देती है। अपनी ही ज्वाला में धधकती भटकन को रेखा उतनी ही खूबसूरती के साथ चेहरे में उतार देती है। सब्र और ज़ब्त का प्रतीक बना नायक नायिका के समूचे आवेग को अपने हिमालय जैसे मजबूत कंधे पर सांत्वना की ठंडी थपकी देता है। अजीब विडंबना है कि आवेग और साहसिकता की ज्वाला बर्फ जैसे ठंडे और धैर्ययुक्त आदर्शवाद से मांग करती है- ‘तुम्हीं से जनमूं तो शायद मुझे पनाह मिले’- इस गीत का पुरुष पहाड़-सा धीरज है और औरत है बहाव से युक्त सरिता। पहाड़ से नदी निकलती है, इस युग-युग की स्वाभाविकता को फिर से पाने की कोशिश है, लेकिन प्रतीक बदल गए हैं- पहले जो पहाड़ था, वह आज भी बर्फ है। किंतु पहले जो नदी थी, आज वह ज्वाला है। इस गीत के फिल्मांकन से लगता है कि ज़मीन फिर पंरपरा में खोजी जा रही है, लेकिन ‘शायद’ नहीं। ‘तुम्हीं से जनमूं तो शायद मुझे पनाह मिले’- इस पंक्ति का भेद खोलने वाला शब्द है ‘शायद’, जो कि पूरे दृश्यांकन में नायक और नायिका की पूरी संकल्पना के बीच दरार की तरह सक्रिय है। आधुनिकता ने ज़मीन और आसमान, ज़रूरत और अभिलाषा, परिवार और बाज़ार, आदर्शवाद और आवेग, तर्कसम्मत और अतक्र्य के बीच जो विभाजन पैदा किया है, वह किसी उच्चतर क्रांतिकारी रूपांतरण में हल होगा, अथवा वापसी संभव है? कुछ लोग परिवार को पवित्र गाय मानते हैं। उनसे इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि एकल परिवार खुद बाज़ार के दबाव से पैदा हुई है। संयुक्त परिवार बाज़ार के दबाव में ही टूटा था। इसलिए एकल परिवार को बाज़ार के ऊपर कोई नैतिक व्यवस्था मानना गलत है।

अपने ही जीवन की कथा, पति की कहानी में सुनने के बाद एक दृश्य में जब बिस्तर में नायिका उससे पूछती है कि यदि यह कहानी सचमुच सही हो, और कहानी की नायिका वास्तविकता में वह स्वयं हो, तो क्या उसी विशालहृदयता के साथ वह उसे समझने की कोशिश करेगा? ओमपुरी का जवाब है- ‘कुछ भी हो सकता है।’ जी हां! कुछ भी हो सकता है। जिन्न को पकड़कर वापस बोतल में भेजने की कोशिश भी हो सकती है। विकसित पूंजीवादी देशों के नेता परंपरा और परिवार को बचाने की चीख पुकार मचा ही रहे हैं। लेकिन, दूसरी ओर आदर्शवाद की खोल उतारकर इंसान और जिन्न अर्थात् इंसान और उसका ही सद्यःमुक्त रूप जो जिन्न की तरह उसकी चेतना में कैद था, उन दोनों का मिला-जुला रूप भी पैदा हो सकता है। रास्ता खुला है। रास्ता फिल्म में नहीं, जि़ंदगी और इतिहास की गतियों में है। शुक्र है कि ‘इतिहास’ का अभी तक ‘अंत’ नहीं हुआ है।

प्रणय कृष्‍ण। इलाहाबाद युनिवर्सिटी और जेएनयू से अध्‍ययन। प्रखर हिंदी आलोचक। जन संस्‍कृति मंच के महासचिव।  देवीशंकर अवस्‍थी सम्‍मान  से सम्मानित ।

प्रणय कृष्ण की सद्य प्रकाशित पुस्तक ‘प्रसंगवश: साहित्य और समाज की चंद बहसें’ से साभार
(लोकयुद्ध , 16 मार्च -17 अप्रैल, 1997)

Georges Wolinski: ‘Virtue of His Contradictions’

Wolinski has played a significant part in demolishing what he calls the France of Marshal Pétain, whom he remembers having had to honour as a schoolboy. He is proud of the battles he has had with the censorship in the course of establishing the satirical magazines Harakiri and Charlie Hebdo. French law punishes not the distributors of ‘scurrilous’ literature but the authors and editors. That meant that personal courage was enough, commercial restraints were absent. He won the battles because he had a more powerful weapon: humour. He made the nation laugh at its own principles. But not the whole country, by any means. ‘Provincial France’ looked upon him and his kind as ‘intellectual terrorists’ and he admits to the accuracy of that description. He has been terrorizing those in power with his mockery, like a naughty child who pulls faces at a teacher. He was initially inspired by the cartoons of the American Harvey Kurtzman and the magazine Mad, but he has been much more radically satirical. Charlie Hebdo has been able to attack in a way that would be impossible in the United States, where subjects like religion may not be touched; Charlie Chaplin’s unpopularity in his later years, says Wolinski, shows that Americans refused to mock the very basis of their society. # Author

Georges Wolinski

Georges Wolinski

By Theodore Zeldin

It is Georges Wolinski, whose cartoons appear daily in the Communist paper L’Humanité, who has produced what is perhaps the most scathing contemporary portrait of the Average Frenchman. Flaubert, in the nineteenth century, wrote a Dictionary of Clichés, to ridicule the banalities of ordinary conversation, what people repeated to each other all the time. Wolinski’s caricatures add up to a similar treasury of what old fogeys today in provincial France, la France profonde, regard as wisdom. He has created two characters, whom he calls the Two Dinosaurs or the Two Idiots. They are always seated at a café table, with a glass of wine in front of each. The large one is vigorous in his denunciation of the imbecilities of the age and florid in his nostalgia for the good old days. The small one meekly and readily agrees with him, for he is easily impressed by his friend’s fine phrases and he wants to be respectable at all costs; his petty preoccupations, his efforts to please his wife, act as a kind of unanswered accompaniment, for the large one never listens to him.

The Two Idiots are stern believers in maintaining order. They approve of the Riot Police (the CRS): the large one says, ‘you must be fair: the CRS are quite different from the SS’. ‘They are only doing their job,’ echoes the small one. ‘Decent people,’ says the large one, ‘do not pay taxes so that the prison cells of bandits should be decorated like holiday resorts, with prison warders to serve them like waiters, a white napkin on their arm: A little more champagne Sir?’ The small one timidly suggests that perhaps not everyone in prison deserves to be there: ‘judicial errors do occur sometimes’. ‘Perhaps,’ his friend replies, ‘but I would rather have the prisons full of innocent people than the streets full of criminals.’

The pair are agreed that the trouble with the country is that the old inhibitions have been destroyed, ‘nothing is forbidden; the French have lost their sense of honour.’ For example, one of the large man’s cousins, who got engaged to a charming girl, happened to have syphilis. Everybody knew this, except the girl, because she was well brought up and did not know about such matters. So the marriage took place, no one said anything, and in due course they produced an idiot boy. But ‘honour was saved’. ‘Do you not think that is carrying the sense of honour a little far?’ ‘Monsieur,’ the large man insists, ‘that is how our families behaved in the past: there were no limits to the sense of honour.’ That is the one thing where he is glad there are no limits. ‘It’s lucky they’ve invented penicillin all the same,’ murmurs the small one.

But change is something both of them hate. They are appalled by the antics of the young. They protest at having to subsidize universities which are only schools for sexual orgies. They hate trade unionists, ecologists, Marxists, intellectuals, unmarried mothers and nude bathers, just as they cannot bear foreigners, Jews, the mini-skirt, abortion, lenient judges and divorced parents, sensuality and sociologists. They are suspicious of people who claim to have more talent than others: ‘If God had wanted men to have talent, he would have given talent to everybody.’ They look back to an imaginary age, when people were satisfied with their lot, when the unhappy man was content with his unhappiness, when even the leper was happier than the modern executive overworking so as to give the impression that he is rich. Like Voltaire’s absurd Dr Pangloss, they say fear is needed because without it there would be no religion; hate is necessary, because without it there would be no need for an army. Without ignorance, there would be no distinguished people, comme il faut, who were superior to the ignorant. Without shame we would all go about with naked bottoms. ‘As at St Tropez,’ chirps in the small one. ‘It is folly,’ says the large one, ‘to believe that one can make a society better than the people who live in it.’ In the olden days, every village knew who slept with whom, who among the mayor, the chemist and the lawyer, were sexual perverts, cheats or Nazi collaborators; but they managed to live peacefully together all the same. What is the point of new-fangled interference, and technocratic computers? They are suspicious of modern inventions, and of all people who are not suspicious. The thought of having to bequeath France to the intolerable young generation appals them. But to whom else can they bequeath it? asks the little one.

Wolinski has spent his life attacking these kinds of average Frenchmen, who are Colonel Blimp in England and ‘petty bourgeois’ in France. He is the enemy of taboos and principles, of the assumption that the poor do not want to live like the rich, or that women should keep their eyes lowered, that children should not speak at table unless they are spoken to, that pornography and drugs should be available to the upper classes only, and that the best jobs should be reserved for those whose parents had the best jobs. He has not invented these conservatives; they have had a part in his own life. His father was a small employer who was killed by his communist workers during the Popular Front of 1936. His step-father was a ‘typical Frenchman’ who read the right-wing Figaro and the sporting daily L’Equipe. He was brought up by his grandfather, a pastry cook, in the European quarter of Tunis. (It is important to remember that to the previous generation, France was not just a corner of Europe, but an international empire of a hundred million inhabitants; that a proportion of Frenchmen are a Mediterranean, not northern people, and that both the Archbishop of Paris and the leader of the largest trade union are of Polish origin.) Old-fashioned ideals of respectable family life were piously preserved there: the colonial French, the Jews, the Mediterraneans each kept to themselves, but they shared similar attitudes. In Wolinski’s childhood, women looked after the house, knitted, sewed and ironed, leaving the hard work to Arab servants; the men lived separately, going to the café to play cards and talk. Children were forbidden to swear and parents were careful to say nothing improper in front of them. The only rude jokes that were tolerated were about the bottom, excreting and farting, but not about sex. Wolinski discovered pornography by prising open a cupboard in which were kept the military decorations of an uncle killed in the war, and where he found the Decameron and Lady Chatterley secretly hidden. But he could barely understand them. He grew up chaste and prudish, and the chaste American films of those years, which he loved, suited him perfectly. It was only later on a motorcycling holiday in Italy that he discovered the joys of sex, in a Genoese brothel.

One of the great differences between that world and today’s world, for him, is that it is now possible to mention such subjects publicly. Fifteen years ago the male magazine Lui was banned for a photograph that revealed too much breast. Now sex is a frequent subject of humour, and major cartoonists have produced what in other countries would be labelled pornographic humour. Wolinski has played a significant part in demolishing what he calls the France of Marshal Pétain, whom he remembers having had to honour as a schoolboy. He is proud of the battles he has had with the censorship in the course of establishing the satirical magazines Harakiri and Charlie Hebdo. French law punishes not the distributors of ‘scurrilous’ literature but the authors and editors. That meant that personal courage was enough, commercial restraints were absent. He won the battles because he had a more powerful weapon: humour. He made the nation laugh at its own principles. But not the whole country, by any means. ‘Provincial France’ looked upon him and his kind as ‘intellectual terrorists’ and he admits to the accuracy of that description. He has been terrorizing those in power with his mockery, like a naughty child who pulls faces at a teacher. He was initially inspired by the cartoons of the American Harvey Kurtzman and the magazine Mad, but he has been much more radically satirical. Charlie Hebdo has been able to attack in a way that would be impossible in the United States, where subjects like religion may not be touched; Charlie Chaplin’s unpopularity in his later years, says Wolinski, shows that Americans refused to mock the very basis of their society.

But Wolinski does not represent the triumph of the new open-minded young France against the old France, which is an absurdly simplified contrast. Though he works for the official communist daily newspaper, he is not a member of the party. He feels most comfortable among the communists because he likes the warmth of their human relations, their unpretentiousness. Among socialists he meets too many well-educated people, who come from the same social background and the same schools as the Giscard technocrats, who are not his sort. The communists are more often self-taught like himself, rejected by their schools as hopeless failures; they have built up their own popular culture. Wolinski is not impregnated by the classics of French literature: as a boy, he liked American films and comics, English and American books, Edgar Allan Poe, Kipling, Jerome K. Jerome, Mark Twain, Fenimore Cooper. ‘No French book made me laugh as a boy.’ He believes he appeals to the same sort of ‘uncultured’ people, to the inhabitants of the working class suburbs, where dreary highrise buildings have very little that is French about them. He produces three books of cartoons a year, and he sells 50,000 of each, easily outdoing more fashionable novelists and philosophers. Altogether he has published thirty books. His first film was seen by one-and-a-half million people. He admits that working for the communists means there are subjects that cannot be mentioned; he has learnt instinctively to recognize what the party line is; but he feels amply compensated by the friendliness of his readers, whom he meets at party festivals. He likes them because they are not snobbish, they are not ascetics either, they want to enjoy a good life like everyone else; he finds their company relaxing. If he worked for a large circulation paper, he would hate the fierce competitiveness, the life with daggers drawn; in L’Humanité the quarrels are ideological, but there is less struggle for money, for careers. He once aspired to be in charge of an important newspaper, but he has now decided that he does not like giving orders, or being a leader. He values his independence most of all, which means he values the right to be himself. He has achieved that right, because he feels that he is now at last in power, in the sense that his generation, who were teenagers in 1960, have now become successful pop stars of one sort or another. Now they are accepted as part of the middle-aged establishment; they have achieved their victory.

Humour for Wolinski today involves lucidity on the one hand and provocation on the other. He does not think there are specifically national forms of humour. Humour is the ability to see through the veils of convention. Humour is dangerous because it can reveal everything as absurd, which is why so many comics commit suicide. But it is also a kind of maturity. Though he is so scathing in his commentary on the world, he lives very calmly in it. He does not get excited. ‘I have no complexes.’ He is amazed at the way his wife gets worried by minor problems. Everything is a worrying problem, he thinks, but that means that perhaps nothing is a problem. There is no saying what is a real problem, and even if one knew, one would not know how to solve it. It is best not to try to understand too much. ‘If you want to make mankind happy, start on yourself.’ He thinks happiness is not achieved by a policy of self-sacrifice and loving others: it is made up of mere moments of pleasure, as when a hungry man gets a bowl of rice; it is a smile, and a note on a guitar, the promise that one will not be tortured today, a cool hand on a burning forehead, and of course reading the works of Wolinski while lying on a sofa, eating a bar of chocolate. However, it is never quite possible to believe what Wolinski says: he refuses to avoid contradicting himself, since he thinks now one thing and now the opposite. His challenge to accepted ideas means that he can challenge his own ideas too: a person who has definite ideas, he says, becomes either a fascist or a believer. That makes Wolinski one of the most terrifying of humorists because he makes a virtue of his contradictions. For example, he makes one of his characters say: ‘If to be racist is not to like people who are different from one, well, then I am a racist.’ His defence is that truth needs to be exaggerated, and pursued to its extremes; by this means he shows that everyone including himself has something of the racist in him. His is a humour that seeks to destroy all defences, and not to spare his own. It is different from Bouvard’s cynicism, which is defensive; Wolinski is on the contrary a terrorist who blows up all certainties and himself in the process.

Behind his grenades, he is, of course, a quiet home-loving man, whose two main interests are his family and reading books. His little daughter trips into the room, saying she has a message for him; she kisses him and runs out. ‘Is that your message?’ The telephone rings all the time, but he knows it is for his wife, a journalist, who is Le Monde’s specialist on feminist affairs. He leaves it to her to answer. In his booklined study he seems cut off from the world, but he hates being alone. He and his wife, in nine years of marriage, have not spent more than three nights in separate beds. The one thing he has not succeeded in blowing up is the ‘phallocrat’ that resides deep inside him. He admits that when he married he treated his wife as a pretty toy; he says he cannot take women seriously because he always wants to touch them. He used to infuriate his wife by staring at other women: he tries to be more careful now, but he remains persuaded that if men have eyes, it is above all to look at women. He would give the sight of all the sunsets of Venice for that of a woman’s bottom. If one could weigh men’s staring at women, he says, how many kilos of stares would a woman count at the end of a day; and they would be stares weighing very different amounts, depending on whether they came from a Yugoslav window cleaner, an adolescent with complexes, a lorry driver whose cabin is full of pinups, or the woman hunter who is certain there is always one in a hundred who will respond to his advances. Wolinski is fascinated by all the traditional women’s stratagems: ‘I would be unhappy in a society that rejected flirting, high heels, transparent clothes, perfumes, and trousers that hug bottoms. I believe I am not the only one of my species.’ He is quite unable to get used to the new feminist theories, which is inconvenient, because his wife, having refused to remain the housewife he would have preferred her to be, has become a leading activist in the feminist movement. He insists that he needs to feel loved, to imagine that she regards him as an idol, ridiculous though that may be. She treats him rather toughly. ‘You really are the woman I need,’ he retorts, ‘because I have no will power; thanks to you, I appear to have it. Alone I would have spent my nights crawling round bars. I would have become fat, dirty and alcoholic. I believe that all that men do which is good, they do to try to impress their wives. What luck that there are wives.’ But it is becoming more and more difficult to impress them. Men are becoming more like teachers whose pupils suddenly laugh at them. To laugh at his teachers was precisely what Wolinski did in his youth. So, ultimately, he is proud of his wife being what she is, and he is sorry for all those women who are not fortunate enough to have a husband as nice as himself. Having thrown grenades throughout his life, he is bemused by the fact that he has been standing on a feminist grenade all the time.

Theodore Zeldin

Theodore Zeldin

His two-volume history, France 1848– 1945 (1973, 1977), received international acclaim: The Times called it “brilliant, original, entertaining and inexhaustible”; Paris Match said that it was “the most perspicacious, the most deeply researched, the liveliest and the most enthralling panorama of French passions”. His other books include the novel Happiness (1988). Theodore Zeldin has been awarded the Wolfson Prize and figures on Magazine Littéraire’s list of the hundred most important thinkers in the world today.

Excerpt from Theodore Zeldin’s  Book  ‘The French’  (1983)

Cabu: Doubts are Essential, I Hate Them Who Claim to Know Everything

“Cartoonists make a living out of people’s stupidity, a trait that only seems to be on the increase with the passing of the years.”

Cabu with his cartoon character Le Grand Duduche  Photo: LYDIE/SIPA/REX

Cabu with his cartoon character Le Grand Duduche
Photo: LYDIE/SIPA/REX

By Theodore Zeldin

‘WHAT DO YOU want to do when you grow up?’ asks the harassed father of his little boy with a vacant face. ‘I don’t know.’ ‘Don’t know! Don’t know! That is no answer: Think. At your age, you must know what you want to do.’ So the little boy promises to think. He goes and asks his little girlfriend, but she does not know what she wants to do either. He goes and asks his doddering grandfather what he wants to do in the future, but he does not know. He goes to the kitchen and asks the cook. ‘If the pigs don’t eat me, I’ll get my pension and retire,’ says she. ‘That’s not so silly,’ thinks the little boy. He goes back to his father, who is sitting at a desk, by a telephone, with graphs on the wall and glum despair on his face, and tells him: ‘When I grow up, I shall retire, and raise pigs, but I’ll take care not to let them eat me.’ This boy could serve as a mascot for the third category of French people: those who are involved neither in the rat race, nor in traditional working-class protest, those who do not want power over others. What will there be to distinguish him, in due course, from the international fraternity of drop-outs?

Jean Cabut, who drew the strip cartoon containing this story, is now forty-four, and he does not know what he will do when he grows up either. The filmmaker Jean-Luc Godard has called him ‘the best journalist in France’: he is certainly being a faithful reporter when he presents the dilemmas of his countrymen in pithy moral tales of this sort. But it is not surprising that he can give no better answer himself than the little boy did. The basis of his view of life is that he does not like people who know the answers. He considers them dangerous: they never ask themselves questions; they never know doubt and Cabu (which is how he signs his cartoons) insists that it is essential to have at least some doubts. He has created a famous character, Mon Beauf (my brother-in-law) who incarnates all the complacency of provincial France. This only half-fictitious person is partly based on Cabu’s real brother-in-law, who is an insurance man in the Vosges (Cabu’s sister is a gym mistress), though the face has some resemblance to the Mayor of Nice, Médecin, who once sued Cabu for libel and whom Graham Greene is now annoying in a different way. Cabu is a journalist as well as a cartoonist, because he does not deal in imaginary stereotypes, but always bases himself on real people around him; he is an eavesdropper who has no need to resort to fiction. Every time he goes to see his brother-in-law he comes back with a bag of gems. It was while still at school that he came to hate that type: he started a magazine called Le Petit Fum, short for fumiste (meaning those who do nothing seriously and on whom one cannot count); that was the label the scientists gave the classicists, on the ground that they did not work much. Cabu hated the scientists because they were always fascinated by how things worked, but never asked themselves the questions, what good does it do? What purpose does it serve? He is one of those who always calls into doubt every aspect of civilization, and he does not spare himself.

He is not sure whether he is a utopian with his head in the clouds or a prematurely senile old fogey worshipping nostalgia. He regards adolescence as the best years of life, because everything seems possible then, because the adolescent lives in a world of dreams, imagining all sorts of wonderful situations, and everything he encounters in the real world has the unspoilt taste of novelty. The first girl Cabu took in his arms, the first cartoon he sold to a newspaper, are memories of ecstasy he has not repeated. Le Grand Duduche, Cabu’s most famous cartoon character, is about seventeen, but he is not just a representative of the young generation. Duduche provides one of the most accurate histories of the young over the last two decades, because Cabu has observed them very precisely through his own son and the four children of his wife, but Duduche is much more than an heir of Billy Bunter. He is not a greedy, naughty child, but a naive observer of the law of the jungle that school life is, and through his adventures at school, shows life outside school to be a similar kind of jungle. Duduche is in many ways Cabu himself, still marvelling at the inexplicable imbecilities of those who pretend to be adults. The events of 1968 were the great moment in Cabu’s life: ‘that was my Great War of 1914’; adolescence he describes as a permanent revolution of 1968 that constantly repeats itself. He would like to keep that spirit alive. But of course he has his doubts. Why is it that 1968 did not usher in a new world? Here Cabu shows that both he and Duduche, while having an irrepressible faith in man, are also disappointed with him. The rebels of 1968 made the same mistake as their fathers; they used violence, and that is self-defeating; they became greedy for power, and that corrupts; and above all they did not realize that they were really just like their parents, and they have now in middle age developed all the awful vices of their parents. Duduche is in love with his headmaster’s daughter, and she is a silly girl he has nothing in common with: Cabu himself as a young man always fell in love with prim, Catholic girls: ‘we are all like that, our ideas and our behaviour don’t coincide.’ When Duduche goes to the first communion party of his young cousin, he watches all the relatives pile their expensive gifts on a table – radios, walkie-talkies and toy cars; the cousin accepts politely, and then paints his revolutionary slogan of protest on the wall: Down with the Consumer Society. The pleasures of adolescence are, of course, all to be obtained outside the school syllabus: Duduche is a marginal who does not like syllabuses or systems and so is Cabu: ‘it is very important for me that each one of us can have solitude when he wants it – as Sartre said, hell is other people; solitude is necessary for reflection; but solitude only works if you feel comfortable with yourself.’

The worst experience of Cabu’s life was therefore, not surprisingly, his period of military service. He could not bear that the army should tell him what to do and dress him from top to toe. (He has printed a marvellous, deadly serious, long army report on the relative merits of different kinds of underpants for conscripts.) He was given no responsibility: he felt diminished in the army, as though forced to acknowledge his weakness before the powers that be. Such an admission is all the more painful for him, since he is very conscious of man’s fragility: another of his cartoon characters is a mongol boy – he had one for a neighbour – who symbolizes the narrow line that separates success from failure: that is so frightening that he has to laugh. It was the callousness of the army that turned him into an anti-militarist. He was sent to fight in Algeria: he and his mates had been on duty for two weeks, day and night, and were dying of thirst in the boiling heat: a helicopter came to give them water, but it landed half a mile away from them, and they had to bring the water up in jerry cans on their backs. Then they saw another helicopter land on the doorstep of the commander’s post: a general emerged from the plane bearing a bottle of champagne in an ice bucket: he presented it to their colonel and flew off. ‘That day, I understood that the military really constitute a caste apart.’ Cabu has been a relentless champion of non-violence ever since: he believes one solution for the world’s ills that has not been tried is passive resistance; he has demonstrated for unilateral disarmament; his book of cartoons, Down With All Armies, has sold 75,000 copies. He has not hesitated to descend to vitriolic insult of soldiers and strident caricature, but he has also published conversations with real soldiers who are perfectly decent people, who claim to be left-wing, who can even quote Mao, and who say they are only doing a job like any other, that offers security and a pension. That only makes it worse from his point of view, that they should spend their lives collecting medals ‘for having destroyed a battalion of flies on a dung heap with no thought for the danger involved’. Cabu protests also against nuclear power. He protests against the pollution of the environment. He resents modern concrete architecture, and protests that his home town, Châlons-sur-Marne, should have had all its character destroyed by expansion and rebuilding. He sees no need for supermarkets: ‘the little old shops were perfectly adequate.’ He knows life in the past was awful for most people, but he regrets something in it all the same. He prefers jazz to rock, and Charles Trenet to any modern singer. He prefers cars made in the 1920s. He contradicts everything he says about his love of youth by complaining that France’s old civilization should stoop to borrow from America, which is a mere 200 years old.

Of course, he is horrified by what he says; he cannot stand Arab music, that is one sign of his Frenchness, but he thinks it really is time he learnt to appreciate it. He feels French because he loves the countryside and the architecture, but he is ashamed that he has not travelled more. His friends think of him as quintessentially French, because of his passion for its old houses and its little shops, and because he makes a virtue out of his nostalgia, but it is not difficult to imagine him attending Aldermaston nuclear demonstrations in Britain, and living in a Suffolk village, for he is not only a vegetarian, but seldom drinks either, so the inevitable excuse of the Frenchman, that he cannot be separated from his wine or his mother’s cooking, does not apply. Cabu is puzzled by the behaviour of his son, who mocks him for having made no real difference to the world, despite all his endless protesting. He thinks that perhaps history goes in cycles, and that the young will one day return to the idealistic spirit of 1968. But he is well aware that he is not fulfilling his vision of adolescence, of being always open to new ideas. He admits he might be in a rut himself, that he may be guilty of precisely the same obstinacy for which he criticizes his brother-in-law. So what he does with the second half of his life will be the real test of his philosophy. Is it possible, or desirable, to go beyond passive resistance to the rat race and other forms of violence? There might well be interesting developments when Cabu is a grandfather: that will produce for the first time in history a combination of a sizable group of radical pensioners – in good health and with a long expectation of life, with plenty of frustrated energy for more experiment – and a new generation of precocious grandchildren who will have no grudge against them, as they might against their parents: together they might do more than engage in the traditional spoiling of grandchildren.

Dissatisfaction both with the consumer society and with traditional forms of protest against capitalism started when prosperity was at its peak. In 1968, in a profound revolution that has been played down with the modest title of the Events of May, many young people suddenly called the bluff of those in authority. Students rioted, workers occupied factories, life came to a temporary standstill. It resumed after a few months, but for a while the whole country was led to question its values, and it emerged that quite a few people did not accept them. The graffiti on the walls of Paris proclaimed: Pleasure not Power. I reject the Past. I want Dialogue. The Right to Enjoyment. Revolution is Orgasm. An End to Metro, Boulot, Dodo, i.e. to a life that consisted simply of travel, work and sleep. The search was now not for money, or promotion or material comforts, but for a more elusive sense of fulfilment, for a combination of security and excitement, for the Good Life, or as it was now called, the Quality of Life. This was not specifically French. The Americans had reacted against their greater prosperity even earlier, and the hippies were the predecessors of the new French marginaux, the people who opted into the margins of society. The magazine Actuel which kept these people in touch and enabled them to do things in common was partly modelled on New York’s Greenwich Village Voice. Since then the daily newspaper, Libération, and the magazine Autrement have sustained and co-ordinated the urge to experiment with new ways of life. But 1968 has cast graduated ripples far beyond the small groups who have actually withdrawn completely into rural or intellectual independence. Many of those who were in their twenties in 1968 have been permanently marked by their experiences; they are less dogmatic, less political, less brutal than they would otherwise have been. And in society at large, even among those who reacted in horror against the revolt, the sense of hierarchy is less pronounced, personal relations are less liable to be contemptuous; even the prefect of police speaks with a gentler voice. The ‘right to be different’ is respected more than it used to be, at least theoretically.

The generation of 1968, or more precisely the affinity of 1968, since it is less an age group than a tendency, are worried by their inability to fulfil their promise, in the sense of showing more practical, concretely identifiable results from their agitation and experiment. Cabu says there is something of the old schoolmaster in him (his father was one) wanting to make people happy despite themselves. That is the source of the dissatisfaction that gnaws at him and those like him. They cannot accept that they have achieved a lot simply by living their own lives with greater decency; they cannot measure the moral contagion that has introduced more gentleness into human relationships by the presence of people who are not willing to use violence, and are not inspired by greed for money or power. They cannot reconcile themselves to the thought that what distinguishes them from the rest of society is their acknowledgement that the same ideals cannot suit everyone, so that they would be unlikely to ‘make everyone happy’ if they did have more influence. They represent a temperament, not a solution. Is not Cabu worried by people who know what the solutions are?

Theodore Zeldin

Theodore Zeldin

His two-volume history, France 1848– 1945 (1973, 1977), received international acclaim: The Times called it “brilliant, original, entertaining and inexhaustible”; Paris Match said that it was “the most perspicacious, the most deeply researched, the liveliest and the most enthralling panorama of French passions”. His other books include the novel Happiness (1988). Theodore Zeldin has been awarded the Wolfson Prize and figures on Magazine Littéraire’s list of the hundred most important thinkers in the world today.

Excerpt from Theodore Zeldin’s  Book  ‘The French’  (1983)

यथार्थ का दुस्स्वप्न और आखेटक स्त्री: आशुतोष कुमार

‘अपने जैसा जीवन ‘ , ‘नींद थी और रात थी ‘ और ‘स्वप्न समय ‘ सविता सिंह  के अब तक प्रकाशित तीन कविता- संग्रह हैं . इन कविताओं से गुजरते हुए सहज ही महसूस किया जा सकता है कि यहाँ जो ‘मैं’ है , वह एक ‘स्त्री’ है.  वह सभी कालों और सभ्यताओं की स्त्रियों का प्रतिनिधित्व करती है . बेशक वह कवयित्री के समय की, हमारे अपने समय की, निवासी  है. लेकिन उसे भरपूर अहसास है कि वह एक  परंपरा में स्थित है , बल्कि उसी के हाथों निर्मित है. यह पितृसत्ता की अतिप्राचीन परंपरा है . यह स्त्री के लिए वंचना, दमन और  उत्पीड़न की परंपरा है . सविता सिंह की कविताओं की  ‘स्त्री’ इस परंपरा के बारे में अच्छी तरह जानती है . सचेत है . वह इस महान परंपरा की  कैद से मुक्ति चाहती है .  उनकी कविता  मुक्ति के स्वप्न की कविता है . उनके यहाँ स्वप्न एक बार बार दुहराया जाने वाला का विषय है।  #लेखक

By Tumpa Chakraborty

By Tumpa Chakraborty

कविता मुक्ति की एक रणनीति है

By आशुतोष कुमार 

 ‘स्त्री’ के लिए कविता अनेक रूपों में मुक्ति की रणनीति हो सकती है.
अनादि काल से स्त्री कविता का विषय जरूर बनती रही है , लेकिन खुद उसकी  – एक साधारण स्त्री की –  पहुँच शास्त्रीय कविता तक नहीं रही . उसे कविता का लुत्फ़ उठाने लायक शिक्षा और दीक्षा से वंचित रखा गया .  उसे कभी इतनी फुर्सत ही नहीं दी गई कि वह कविता पर ध्यान दे सके . कुछ भी हो , कविता के लिए फुर्सत चाहिए .   रसास्वादन के लिए भी , रचना के लिए भी . यह फुर्सत पुरुष के पास  हो सकती थी . फुरसतिया तबके के पुरुष के पास तो इफरात में थी . उसने इस फुर्सत का इस्तेमाल नायिका- भेद और नख-शिख के अलावा प्रेम की विभिन्न दशाओं का रस लेने में किया.  लेकिन  ‘स्त्री’ के पास न तो फुर्सत थी , न अवसर था , न कविता तक उसकी पहुँच थी . अमीर तबकों की स्त्री के पास भी पुरुष को लुभाने के लिए आकर्षक स्त्री बने रहने की काम की व्यस्तता थी . पुरुष की रची कविता के सांचे में खुद को ढालने की अंतहीन व्यस्तता . खुद उसके लिए कविता नहीं थी.  उसके जीवन में कविता की गुंजाइश नहीं थी . मतलब यह कि कविता  ‘स्त्री’ के  उत्पीड़न के यंत्र के रूप में काम कर रही थी . पुरुष की कविता  ‘स्त्री’ से उसकी मनुष्यता छीन कर उसे श्रृंगार-सामग्री या भोगवस्तु में बदल रही थी . या , ज़्यादा से ज़्यादा देवी या माँ के छवि में कैद कर उसे पूजा की सामग्री में बदल रही थी .

‘ अपने जैसा जीवन ‘ संग्रह की कविता  ‘परंपरा में’ सविता सिंह की  ‘स्त्री’ साफ़ कहती है –

‘ दूर तक सदियों से चली आ रही परम्परा में
उल्लास नहीं मेरे लिए
कविता नहीं
शब्द भले ही रौशनी के पर्याय रहे हों औरों के लिए
जिन्होंने नगर बसाए हो ,
सभ्यताएं बनायी हों
युद्ध लादे हों
शब्द लेकिन छुप कर मेरी आँखों में धुंधलका ही बोते रहे हैं
और कविता रही  है गुमसुम
अपनी परिचित असहायता में
छल-छद्म से बुने जा रहे शब्दों के तंत्र में
इन नगरों के साथ निर्मित की गई एक स्त्री भी
जिसकी आत्मा बदल गई उसकी देह में’ ….

 लेकिन इसी कविता में यह  ‘स्त्री’ सदियों तक प्रतीक्षा  करती है , शब्दों को अपनी मुक्ति की रणनीति के रूप में आजमाने के लिए .

‘ …..शब्दों के षड्यंत्र तब होंगे  उसकी विजय के लिए
बनेंगे नए नगर फिर दूसरे
युद्ध और शांति पर नए सिरे से लिए जायेंगे फैसले .’

मुक्ति की रणनीति के रूप में कविता की यह नयी भूमिका ‘स्वप्न समय ‘ में  कविता के नाम लिखी गई  कविता ‘ तुम्हे लिखना ‘ में यों प्रकट होती है –

‘… एक गरम नदी के किनारे खड़े होना लिखना है मेरी कविता
उस दृश्य को देखना
जहां अनभिज्ञता के शव आते हैं
अपनी मासूम मनुष्यता छोड़ने
पहनने कठोर ज्ञान के परिधान

तुम्हे लिखना बदल लेना है
इस जीवन को दूसरे जीवन से
एक स्वप्न को दूसरे से
या फिर इस जीवन को स्वप्न से ‘

‘मासूमियत’ का त्याग कर परम्परा से प्राप्त शव जैसे जीवन को एक नए जीवन से बदल लेने  का स्वप्न . यह स्वप्न ही उस स्त्री की कविता है . यह स्वप्न उसकी रणनीति है . यह एक स्वप्न को दूसरे स्वप्न से बदलना भी है . अचेतन जीवन से उपजे निस्पंद स्वप्न को चेतना से दीप्त जीवन-स्वप्न में . यह कविता सपने  देखने का सपना है . सपने से वंचित  ‘स्त्री’ के लिए सपना  देखना मुक्ति की रणनीति है. उसके पास जीवित रहने का इसके सिवा और कोई तरीका नहीं है कि दुस्स्वप्न जैसे जीवन को स्वप्न से बदल लिया जाए .

सपने देखने का सपना मुक्ति की  रणनीति का एक हिस्सा है . दूसरा हिस्सा यथार्थ को सपने में देखना है .  दुस्स्वप्न की तरह देखना . यह दूसरा हिस्सा निर्णायक है .यथार्थ से आँखें मूँद कर सपने  देखना पलायन है . पलायन मुक्ति का रास्ता नहीं हो सकता . मुक्ति का रास्ता केवल उस सपने में हो सकता है , जो यथार्थ के दुस्स्वप्न के भीतर गहरे धंस कर देखा जाता है . उस यथार्थ को बाहर से देखना काफी नहीं है . उसे प्रत्यक्ष नहीं देखा जा सकता . प्रत्यक्ष जो दिखता है , वह आभासी यथार्थ है . प्रत्यक्ष  दिखने वाला संसार आभासी यथार्थ का संसार है . यह आदर्शों , आदर्शवाक्यों  , घोषणापत्रों ,सजावटों , पच्चीकारियों , नकाबों , बहुरूपों , विभ्रमों और कपट का संसार है . यह , बकौल शमशेर , ‘होनी और अनहोनी की उदास रंगीनियों’ का संसार है . इस आभासी  संसार की  हकीकत को उसकी सारी तफसीलों के साथ आदि से अंत तक  देखने के लिए उसे सपने में ढाल कर देखने की तरकीब कारआमद पायी गयी है . कबीर ने अपनी उलटबांसियों में इसी तरकीब का इस्तेमाल किया था . मुक्तिबोध की फैंटेसी और बोर्खेज की जादुई कहानियों में इसी तरकीब का इस्तेमाल किया गया है .  सविता सिंह की कविताओं में बोर्खेज का आनाजाना लगा रहता है . यथार्थ को सपने में ढाल कर देखने की सब से बड़ी सुविधा यह है कि  कम से कम उसे देखा जा सकता है ! भले ही वह दुस्स्वप्न  हो , आखिरकार टूट सकता है . उसे बदला भी जा सकता है . उसमें  वे सारी सम्भावनाएं हो सकती हैं , जो यथार्थ में नहीं हो सकतीं .

‘… और यह जीवन भी है जैसे अपना ही हाथ उलटा पड़ा हुआ
किसी पत्थर के नीचे
इसे सीधा करते रहने का यत्न ही जैसे सारा जीवन
तडपना पत्थर की आत्मीयता के लिए ज्यूं सदा
हल्के पांव ही चलना श्रेयस्कर है  इस धरती पर इसलिए

एक नींद  की तरह है सब कुछ
नींद उचटी कि गायब हुआ
स्वप्न-सा चलता यह यथार्थ …’
(किसकी नींद स्वप्न किसका’/ ‘स्वप्न समय’)

नींद उचटने पर  गायब होने की गुंजाइश वह तिनका है जिसके सहारे ‘स्त्री’ -जीवन के इस  कठोर विकल्पहीन यथार्थ को आँख टिका कर देखा जा सकता है . कविता में दर्ज किया जा सकता है .  सपना यथार्थ के सब से मार्मिक तथ्यों को , उसके सारतत्व को , रूपक में बदल कर देखने की कला है . नींद में जो सपने की तरह दिखाई देता है , वही जागते हुए कविता की तरह  दिखता है .  पत्थर के नीचे उलटे पड़े हाथ जैसे जीवन को उसके इस असली रूप में स्वप्न में नहीं तो और कैसे देखा जा सकता है . जीवन जैसे पत्थर के नीचे दबे हाथ को सीधा करते रहने का यत्न . और तड़पना उस पत्थर की आत्मीयता के लिए ! भले ही  इसे एक स्वप्न या दुस्स्वप्न की तरह देखा जा सकता हो , लेकिन इस हकीकत को स्वप्न में भी देखना दुखदायी है. बकौल तुलसीदास ,  ‘पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं’ ! लेकिन आखिरकार उसे  देखना , ठीक- ठीक दर्ज़ करना और सलीके से  बयान करना उस से  मुक्ति पाने की एक रणनीति है .

स्वप्न में यथार्थ को देखने की इस कला की खोज किसने की ? अधिक सम्भावना है , यह ‘स्त्री’ की खोज रही होगी .  याद कीजिये , बचपन में मांओं और नानियों के मुंह से सुनी हुई कहानियां . इन कहानियों में जीवन का कितना बड़ा यथार्थ रूप बदल कर आता है.  कहानी में ढल कर आता है . वो तमाम कहानियाँ यथार्थ को सपने में ‘देखने’ लायक , कहने- सुनने लायक , समझने लायक और बदलने  की आशा जगाने लायक बनाने के सिवा कुछ और नहीं करती थीं . जादुई यथार्थवाद के महान लेखक गाब्रिएल गार्सिया मार्केस की तरह फैंटेसी के कवि मुक्तिबोध ने भी अपनी कला के लिए अपनी मां का ऋण स्वीकार किया है . यह उसके लिए ज़िन्दा रहने और जीने की कला भी है . उसने इसे अपने अनुभव से पाया होगा.यह  उसके जीने की शर्त रही होगी . असहनीय यथार्थ को सपने में ही सहा जा सकता है . दुस्स्वप्न जैसे जीवन को नींद में ही  जिया जा सकता है . ‘स्त्री’ का सारा जीवन जैसे एक लम्बी नींद हो.

‘बहुत सुबह जग जाती हैं मेरे शहर की औरतें
वे जगी रहती हैं नींद में भी
नींद में ही वे करती हैं प्यार, घृणा और सम्भोग
निरंतर रहती हैं बंधी नींद के पारदर्शी अस्तित्व से
बदन में उनके फुर्ती होती है
मस्तिष्क में शिथिलता ..’
(‘सच का दर्पण ‘से )

मस्तिष्क की यह शिथिलता जड़ता नहीं है .एक असम्भव जीवन जीने की रणनीति है . कविता की अंतिम पंक्तियाँ प्रमाण हैं –
‘… फिर भी
अपने एकांत के शब्दरहित लोक में
एक प्रतिध्वनि-सी
मन के किसी बेचैन कोने से उठती जल की तरंग-सी
अपने  चेहरे को देखा करती हैं
एक दूसरे के चेहरे में
बनाती रहस्यमय ढंग से
एक दूसरे को अपने सच का दर्पण ..’

‘स्त्री’ की कविता दुस्स्वप्न से स्वप्न तक एक निरंतर यात्रा है .  यथार्थ और स्वप्न का सहजीवन है . यह सहजीवन यथार्थ या स्वप्न की आतंककारी स्वायत्तता से मुक्ति की रणनीति है . यह यथार्थ को स्वप्न में और स्वप्न को यथार्थ में बदलने की प्रक्रिया भी है .

यह तय है कि मुक्ति की रणनीति के रूप में देखा गया स्वप्न एकांतिक निजी स्वप्न नहीं हो सकता . यथार्थ हमेशा सांझा होता है , इसलिए मुक्ति भी सांझी ही हो सकती है . ‘स्त्री’ अपने अनुभव से इस सच को जानती है . वह जानती है कि उसका दुख न  संयोग है , न निजी दुर्भाग्य . यह उसके सामाजिक अस्तित्व में अंतर्निहित है .  मनुष्य की सभ्यता ने अब तक जो अपना स्वरूप रचा है , यह दुख उसकी मूल अंतर्वस्तु है . इस दुख के भागीदार के लिए अपने सहभागियों से अपरिचित रहना मुमकिन नहीं . वर्चस्व और हिंसा की सभ्यता में दुख केवल स्त्रियों के हिस्से में नहीं आया है . यह उन सब की नियति बन कर आया है जो इस उत्पीड़न और हिंसा के निशाने पर हैं . जैसे वे ‘रेड इंडियन ‘ लोग , जिन्हें संयुक्त राज्य अमरीका  की स्थापना के लिए लगभग पूरी तरह उजाड़ दिया गया (‘शैटगे ,जहां ज़िन्दगी रिसती जाती है’) . जैसे भारत के वे आदिवासी जिन्हें तेज विकास दर के नाम पर रोज  उजाड़ा और खदेड़ा जा रहा है (स्वप्न के ये राग’). जैसे ‘कर्नाटक के  एक  अँधेरे गाँव में / जीवन का खेल समाप्त करने की तैयारी कर रहा’  किसान परिवार(‘अंत’) ,जैसे बीच सडक पर गिर पड़े खदेड़े जाते वे मुश्ताक मियाँ  जो ‘ढाबा चलाते थे / लाखों लोगों को अब तक खिला चुके थे / गोश्त रोटी तरकारी दाल सलाद’ (‘मुश्ताक मियाँ की दौड़’), जैसे दुनिया भर के गरीब मेहनतकश लोग , जैसे देश भर में छाये एक ‘नए अँधेरे ‘ को पह्चानने की कोशिश कर रहा बच्चा( ‘नया अन्धेरा’)जैसे खून और खामोशी में धकेल दी गयी मासूम बच्चियां (‘खून और खामोशी’), जैसे किताबें , जैसे जंगल- नदियाँ- पहाड़ , और जैसे वे पेड़ जो ‘रात भर जगे रहते हैं'(‘अनिद्रा में’).

‘….जंगल के जंगल कारतूस और बन्दूकों से लैस अब
रात भर जगे रहते हैं पेड़
कुछ बच नहीं पा रहा
न मर्द , न औरतें , न बच्चे
न रात , न उसका रहस्य ..’
(‘अनिद्रा में’ से )

‘स्त्री’ जानती है कि इन सब कविता-वंचितों की नियति और मुक्ति सांझा है . इसलिए उसकी कविता इन सब की कविता  है . इन सब की मुक्ति की रणनीति है. इन सब की मुक्ति का स्वप्न है . ‘स्त्री’ इन सब का प्रतिनिधित्व करती है .

इस तरह जब ‘स्त्री’ इस  विराट विकराल यथार्थ को स्वप्न के जरिये देखती है , तब उसे सभी कालों और सभ्यताओं में चल रहे आखेट के दृश्य दिखाई देते हैं . इस आखेट के निशाने पर स्त्री हो या भील लोग हों या मासूम बच्चियां हों या ‘नये अँधेरे’  को पहचान रहे बच्चे हों . यह आखेट इतना पुराना है और इस तरह लगातार जारी है कि  अक्सर  उसके दृश्य स्वप्न में  पूर्वजन्म की स्मृतियों की तरह आते हैं ( ‘सपने और तितलियाँ’ ; ‘चांद, तीर और अनश्वर स्त्री’ ). यह आखेट जो  ‘स्त्री’ की कविता में यथार्थ का दुस्स्वप्न है  , वह उसके स्वप्न में एक प्रति-आखेट में बदल जाता  है . यह इस तरह होता है कि जो आखेट के निशाने पर थे , वे खुद को बचाने-छुपाने- भगाने की कोशिश करना छोड़ खुद आखेट में शामिल हो जाते हैं . बचने -भागने की कोशिश करना बेकार है , क्योंकि आखेटक कई गुना अधिक ताकतवर है , और हर जगह मौजूद है .  उसके मंसूबों को विफल करने का एक ही उपाय है , उसे खुद आखेट के निशाने में बदल देना . इकतरफा आखेट को दुतरफा  बना देना . यह आखेटक के लिए हतप्रभ करने वाली स्थिति है . यह उसके पराजय की शरुआत है . क्योंकि  इस स्थिति से निपटना उसे आता ही नहीं . उसे आखेट के निशाने पर होने का  कोई अनुभव ही नहीं है . वह भागते हुए शिकार पर तीर चला सकता है , लेकिन पलटवार की स्थिति में चारो खाने चित हो जा सकता है .

यों  स्वप्न में स्त्री पलटवार करती है. प्रतिआखेटक है. यही मुक्ति की रणनीति है . यही उसकी कविता है .

‘.. वे ही कह सकते हैं कि एक स्वर उन्होंने बचा रखा है
कहने के लिए कि कितना जरूरी है
इस संसार को अपनी ही खूंरेजी  से बचाना
वे कह रहे हैं या कि गा रहे हैं
कि वे पुराने हैं बहुत पुराने
उन्होंने देखे हैं छः सौ चालीस चाँद
और भगवान का मरना भी
जबकि बिरसा भगवान मर नहीं सकता
जब तक तीर है और निशाना
जब तक आता है उन्हें विषकंटक  से विष निकलना
पकाना  उसे तीर पर लगाना ..’
(‘स्वप्न के ये राग’ से )

‘.. आखेट के लिए बुलाता है अगर कोई मुझे
नहीं है भागना
शामिल होना है इस खेल में
आखेटक से डरना नहीं
यदि बचे रहना है

मुझे मालूम है अब खूब
रात  और स्वप्न के मैदान में
तीर और चाँद मुझे देखा करेंगे
और मैं रहूंगी हिरणों के झुण्ड में शामिल
उनकी छलांगों के मुक्ति विलास में
लांघती -फांदती जंगल के जंगल ..’
(‘चांद, तीर और अनश्वर स्त्री’ से )

‘… वह मेरे पीछे पीछे है घोड़े पर
थोड़ा सुस्त अब रह रह कर दहाड़ता मगर
फिर बिलखता और सर को पटकता
दिखाता अपने घाव और रक्तस्राव
और मैं भागती जाती हूँ
पेड़ों की फुनगियों पर पहुँच जाती हूँ
डालों पर झूलती हूँ
यह सब मुझे एक खेल- सा लग रहा है
तभी वह फेंकता है संशय के बीज हवा में
कहता है यह खेल नहीं क्रूरता है ..’
(‘सपने और तितलियाँ’से )

इन तीन में से आख़िरी उद्धरण जिस कविता से लिया गया है , वह मुक्ति की  रणनीति के रूप में कविता विधा की स्वाभाविक सीमा को भी दर्ज करती है . कविता में आखेट और प्रतिआखेट के रूपक के जरिये  ‘स्त्री’ आखेट के लक्ष्य जैसी अपनी नियति को चुनौती देती है . वह स्वप्न देखने के साहस का इस्तेमाल यथार्थ के दुस्स्वप्न को चुनौती देने में करती है . लेकिन सपने में वह इस दुस्स्वप्न को  किसी सुस्वप्न से बदल नहीं सकती . इसके लिए उसे सपने से बाहर जाना होगा . सपना देखना स्वप्नहीन  यथार्थ को चुनौती देना है , उसे  सपने -जैसी सच्चाई में बदल देना नहीं .

आखेट के  सपने का  प्रतिआखेट के सपने में बदलना  स्वप्न- चक्र का पूरा हो जाना है . सपने में इसके आगे की सम्भावना नहीं है . सपने में इसके आगे केवल इस स्वप्न-चक्र को दुहराया जा सकता है . ‘सपने और तितलियाँ ‘ में यही  दुहराव अनेक जन्मों में दुहराई जा रही कथाओं के रूप में प्रकट होता है .  हर जन्म में वही घुड़सवार आखेटक पुरुष ‘स्त्री ‘ के प्रेमी के रूप में लौटता है . हर जन्म में वह स्वयं  आखेट भी बनता है. पिछले जन्म में वह अपने प्रतिद्वंदियों का आखेट बनता है और इस जन्म में अपनी प्रेमिका का.  अपने हर जन्म में वह आखिरकार मार दिया जाता है . फिर भी एक नए जन्म में उसे लौटना  है , क्योंकि ‘स्त्री’ और पुरुष , प्रेमिका और प्रेमी , आखेट और आखेटक  एक दूसरे के हिस्से हैं .

‘… याद करो हम कौन हैं  – एक दूसरे के हिस्से
अलग कर दिए गए थे जो कई सदी पहले…’

बेहद दिलचस्प है देखना कि एक सचेत मुक्तिकामी स्त्री  की कविता में  पुरुष और स्त्री की छवियाँ कितनी पारंपरिक हैं!  पुरुष हमेशा घोड़े पर सवार हो कर आता है . ‘..ऐसा लगता है कि वह खुद भी एक घोड़ा है / उसके भीतर भी एक वेग है / एक सनक तापों के रौंदने की क्षमता से उपजी.. .’ और ‘स्त्री’ भी वही पारंपरिक स्त्री है , जिसके ‘पांव दुर्बल हैं’ , और जिसके पास ‘फल और नदियाँ’ हैं ! उनका  इसी तरह होना स्वाभाविक है , क्योंकि वे एक ही स्वप्न के दो हिस्से हैं .  वे एक ही स्वप्न -रणनीति के दो हिस्से हैं . वे एक ही कविता के दो हिस्से हैं . वे एक दूसरे के बिना अधूरे हैं . एक दूसरे के बिना उनका होना सम्भव ही नहीं. यह एक विपरीत युग्म ( देरिदा का ‘बाइनरी अपोजीशन’ ) है .उनकी निष्पत्ति  आखेट और प्रतिआखेट के निरंतर चलने वाले चक्र में ही है . इसलिए अंततः

‘.. आता है धीरेधीरे लौट कर
फिर सारा दुख सारा पश्चाताप
जिनसे मेरी दुनिया तब भी जीवंत थी
सिर्फ उनमें तितलियाँ चुम्बनों की तरह नहीं
यातनाओं में शामिल हमशक्लों के तरह थीं
और प्रेम के लिए अस्तित्व खतरों में था ..’

दुहराव की जिस प्रक्रिया का संकेत इस कविता में है , उसे तीनों संग्रहों की कुल कविताओं में भी देखा जा सकता है . यहाँ स्वप्न , दुस्स्वप्न , रात , नींद , आखेट और प्रतिआखेट के मजमून बार बार दुहराए जाते हैं . जैसे स्त्री और  पुरुष की  परम्परागत छवियाँ बार-बार दुहराई जाती हैं . इस तरह मुक्ति की रणनीति के रूप में कविता सपना देखने का संकल्प  तो  है , लेकिन वह किसी अदेखे नए स्वप्नलोक के  सृजन से कुछ  दूर है . ये कवितायें सपनों के बारे में  हैं . लेकिन इन कविताओं में उस  मुक्त स्त्री की उपस्थिति , उसकी नयी छवि , उसका नया यथार्थ ,उसकी नयी कल्पनाएँ , उसके नए सपने , उसका नया प्रेमी –यह सब कुछ अभी संभावना भर है  .  यहाँ कविता के बाहर वास्तविक जीवन में  जीवनमरण का संघर्ष करती हुई मुक्त स्त्री के अनुभव  कम   है . यह अभी भी ‘अजन्मी मछलियों का संसार है ‘ . ‘स्वप्न समय ‘ में इसी शीर्षक  की एक कविता का अंत इस तरह होता है –

‘..काश ! मुक्ति इससे भी थोड़ी आसान होती
कोई ऐसी स्थिति होती
कि आक्रोश और अस्वीकृति बदल जाते सीधे नए यथार्थ में
जैसे रोशनी और शब्द बोर्खेज के यहाँ
तब्दील हो जाते हैं आँखों में .. ‘

लेकिन आक्रोश और अस्वीकृति (माने कविता ) सीधे नए यथार्थ में नहीं बदल सकते . मुक्तिकामी कवि के लिए यह अहसास भी कम नहीं . इसका मतलब यह है कि स्वप्नलोक में विचरते हुए भी  उसके पांव हकीकत की जमीन से अलग नहीं हैं . इसका मतलब यह है  कि मुक्ति की रणनीति की तरह लिखी जा रही  कविता मुक्ति की  रणभूमि से बहुत दूर नहीं है .

 आशुतोष कुमार

आशुतोष कुमार

  चर्चित युवा आलोचक. हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफ़ेसर. जनसंस्कृति मंच से जुड़ाव. इनसे   ashuvandana@gmail.com  पर संपर्क संभव है.

विश्व व्यापार संगठन और भारतीय कृषि: सियाराम शर्मा

२०१४ में प्रकशित पुस्तकों पर नज़र दौड़ाते हुए अनिल यादव इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि हिंदीजीवियों  में  कविता-कहानी का हैजा है, वे कथेत्तर गद्य की तलाश में निकले थे और लगभग दोनों हाथ खाली  खड़े होने को विवश  हो गए. सियाराम शर्मा भी हिंदी ही पढ़ाते हैं, जेएनयू या डीयू या एयू या बीचयू में नहीं बल्कि दुर्ग जैसे एक छोटे शहर में. लेकिन इनकी चिंताओं में कहीं भी हिंदी वाली हैजानुमा कवितायें या कहानियाँ नहीं हैं. भारतीय कृषि पर बरपा संकट इनको सबसे ज्यादा चिंतित करता है. अपनी इस चिंता को एक निष्कर्ष पर पहुंचाने के क्रम में अर्थशास्त्र जैसे नीरस इलाके में घुस गए हैं. इनकी इस विजातीय हरकत को देखते हुए सुरेन्द्र चौधरी याद आ जाते हैं जिनका सबसे प्रिय विषय दर्शन और अर्थशास्त्र था. नयी कविता और नयी कहानी के दौर से शुरू हुयी हैजारूपी कविताई और कहानीगिरी ने गूढ़ चिंताओं से  धीरे-धीरे खुद को अलग कर इच्छागिरी का पैजामा धारण कर लिया है.  सियाराम शर्मा जी अथक परिश्रम से कृषि , किसान  और व्यापार से सबंधित करीब सवा सौ पृष्ठ की एक पुस्तक (भारत का गहराता कृषि संकट और किसानों की आत्महत्याएं) पिछले एक साल से तैयार किये बैठे हैं लेकिन प्रकाशकों का टोटा पड़ा हुआ है. लेखकों से पैसे की उगाही कर उनकी किताबें छापने वाले प्रकाशकों से निश्चय ही सियाराम जी की नहीं बनेगी, अगर यह बनाव होता तो वे भी तथाकथित कविताई-कहानीगिरी ही करते नज़र आते. यह सब लिखने का आशय यही है कि कुछ प्रकाशकों या सहृदयों की नज़र शायद इस पांडुलिपि को उबारने में मदद करे. उनसे संपर्क के जरिये निम्न टेक्स्ट के अंत  में उपलब्ध है. पेश है, उसी पाण्डुलिपि की एकल बानगी. 

By Tushar Waghela

By Tushar Waghela

विश्व व्यापार संगठन और भारतीय कृषि

By सियाराम शर्मा

 उरूग्वे के पुन्टा डेल स्टेट में 1986 में शुरू हुए व्यापार वार्ताओं के चक्र का अंतिम दौर मोरक्को के शहर माराकेश में 1994 तक चला।  इन वार्ताओं के बाद 1994 से विश्व व्यापार समझौता कृषि क्षेत्र में लागू हुआ। यह समझौता कृषि क्षेत्र में निवेश और व्यापार के नियमों को वैश्विक स्तर पर संस्थाबद्ध किये जाने का प्रयास था।  इसका मुख्य उद्देश्य कृषि क्षेत्र को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कर उत्पाद एवं व्यापार को निजी मालिकाने की ओर ले जाना था।  यह सिर्फ व्यापार समझौता न होकर राष्ट्रों की सीमाओं से परे साम्राज्यवादी राजनीति और अर्थनीति के विस्तार का व्यावहारिक रूप भी था।  बहुराष्ट्रीय निगमों के माध्यम से पिछड़े एवं विकासशील राष्ट्रों के बाजारों पर कब्जा करने और प्रभुत्व जमाने का यह कारगार हथियार था। विश्व बैंक और अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष जैसी संस्थाओं ने विकसित राष्ट्रों के एजेन्ट के रूप में उनके छिपे हुए एजेन्डों को लागू करने के लिए राष्ट्रीय सरकारों पर दबाव बनाने का कार्य किया।  इस समझौते ने राष्ट्रीय सरकारों की स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमताओं को कमजोर कर उसे नव साम्राज्यवादी शक्तियों के हाथों की कठपुतली बना दिया।

 कृषि क्षेत्र में विश्व व्यापार की शुरूआत इन तर्कों के साथ हुई कि अक्षम प्रतियोगियों की आर्थिक सहायता बंद कर दी जायेगी। सरकारों द्वारा नियंत्रित सुरक्षित अन्न भंडारों को समाप्त कर दिया जायेगा तथा सीमा शुल्क हटा लिया जायेगा।  इससे विश्व व्यापार उस दिशा की ओर मुड़ जायेगा, जहाँ माँग अधिक होगी। किसानों को विनियमित बाजारों से लाभ होगा और उनके उत्पादों का बेहतर मूल्य मिलेगा। बाजार की स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के कारण उपभोक्ताओं को भी सस्ते  मूल्य पर खाद्य सामग्रियाँ प्राप्त होंगी।  विकासशील देशों को यह भी विश्वास दिलाया गया कि विकसित राष्ट्र कृषि पर दी जाने वाली सहायता को नियंत्रित करेंगे, जिससे विकासशील देशों के कृषि उत्पादों को विकसित राष्ट्रों के बाजारों में प्रवेश मिलेगा। लेकिन वास्तविकता यह है कि विकसित देशों ने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तरीके से अपने किसानों को आर्थिक सहायता जारी रखी तथा विश्व व्यापार में बहुराष्ट्रीय निगमों को उतार कर समान प्रतियोगिता के सिद्धांत को तिलांजली दे दी। अमीर देशों ने विकासशील देशों को अपना बाजार उपलब्ध कराने की जगह उनके बाजारों पर कब्जा कर लिया।

कृषि क्षेत्र में विश्व व्यापार के लाभों का जो सब्जबाग दिखाया गया उससे हमारे देश का बौद्धिक वर्ग भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका।  सी.एच. हनुमंत राव और अशोक गुलाटी जैसे अर्थशास्त्री ने ई.पी.डब्ल्यू (31 दिसम्बर 1994) में लेख लिखकर भारतीय कृषि को विश्व व्यापार से एकीकृत किये जाने की जोरदार वकालत की। उनका तर्क था कि खाद्य आत्मनिर्भरता के दायरे में कृषि का विकास ठहरावग्रस्त है।  अतः हमें डेयरी उत्पादों तथा निर्यात योग्य फलों, फूलों और सब्जियों के उत्पादन और खाद्य प्रसंस्करण की तरफ विशेष ध्यान देना चाहिए।  इससे कृषि व्यापार को लाभ पहुँचेगा और इसका फायदा रिस-रिस कर समाज के निचले तबकों तक पहुँचेगा। जाहिर है इन अर्थशास्त्रियों के विचार शासक वर्ग के विचारों से मेल खाते थे।  अतः हमारी सरकारें इसी मार्ग पर चलीं।

 विश्व व्यापार समझौते के तहत हमारे देश के शासक वर्ग ने विकसित देशों के इफरात सब्सिडी प्राप्त, उन्नत पूँजीवादी कृषि के समक्ष अरक्षित, उपेक्षित और अविकसित भारतीय कृषि को अचानक असमान प्रतिस्पर्धा में उतार दिया। यहीं से भारतीय कृषि और किसानों की लोमहर्षक त्रासदी शुरू हुई। 1994 में कृषि से सम्बन्धित हुआ मोरक्को समझौता 1 जनवरी 1995 से हमारे देश में लागू कर दिया गया। भारत सरकार ने अमेरिकी दबाव के तहत घुटने टेकते हुए विश्व व्यापार संगठन के समझौतों के अनुसार 31 दिसम्बर 1999 को मात्रात्मक प्रतिबंध लगाने के अपने अधिकारों को त्याग दिया। अप्रैल 2001से अधिकांश मालों पर से मात्रात्मक प्रतिबंध हटा लिया गया। इसके साथ ही आयात शुल्क में भारी कटौती की गयी। इन नीतियों के कारण निर्यात की अपेक्षा आयात की मात्रा में इजाफा हुआ जो भारतीय कृषि और व्यापार के लिए नुकसानदेह साबित हुआ।  मात्रात्मक प्रतिबन्ध और आयात शुल्क घटाने का भारतीय कृषि पर पड़े दुष्प्रभाव को हम खाद्य तेलों के आयात  के संदर्भ में देख सकते हैं। कृषि क्षेत्र में विश्व व्यापार समझौता लागू होने के पूर्व सन् 1993-94 में हम खाद्य तेलों में आत्मनिर्भरता के करीब थे।  लेकिन 1995 में इन नीतियों को लागू होने के बाद सबसे ज्यादा खाद्य तेलों का बाजार खोला गया।  मात्रात्मक प्रतिबन्ध हटाये जाने और आयात शुल्क में कटौती के कारण बड़े पैमाने पर विदेशों से सोया और पाम तेलों का आयात किया गया।  इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि खाद्य तेलों के संदर्भ में आत्मनिर्भरता के लक्ष्य से आज हम काफी दूर हैं।  आज हम अपनी खाद्य तेल की जरूरतों का लगभग आधा हिस्सा आयात करते हैं। मात्रात्मक प्रतिबन्ध वह सुरक्षात्मक हथियार है जिससे किसी देश की सरकार अपनी जरूरतों के अनुसार मालों का नियंत्रित आयात करती है। साथ ही गैर जरूरी आयातों को प्रतिबंधित करती है, जिससे देश के भीतर की कीमतों के घटाव या बढ़ाव को नियंत्रित करने में मदद मिलती है।  आयात शुल्क वह उपाय है जिससे विदेशी वस्तुओं पर शुल्क लगाकार उसे मँहगा किया जाता है ताकि उससे प्रतिस्पर्धा में देशी उत्पादोंको सुरक्षा प्रदान किया जा सके।

हमारे देश में कृषि को संरक्षण दिये जाने वाली प्रक्रियाओं को समाप्त किये जाने तथा आयात -निर्यात पर प्रतिबंध हटा लिये जाने से हमारे किसान और उपभोक्ता दोनों उतार-चढ़ाव भरे विश्व बाजार के भँवर की चपेट में आ गये।  विश्व व्यापार समझौतों के तहत सरकारी खरीद तथा समर्थन मूल्य को कम कर दिये जाने से किसान बेबस और लाचार हो गये। दूसरी ओर विकसित राष्ट्रों ने तरह-तरह के बहाने बनाकर अपने किसानों को भारी सहायता जारी रखी। अतः उनके किसानों की व्यक्तिगत उत्पादन लागत कम हुई और बाजारों में कम कीमत पर अपने उत्पादों को बेचकर भी वे मुनाफे में रहे। हमारे किसान अपनी अत्यधिक लागत और कम बाजार भाव के कारण ऋणग्रस्त होकर आत्महत्या करने को मजबूर हुए। विश्व व्यापार समझौतों के तहत यह प्रावधान भी है कि हर देश अपने कुल घरेलू उपभोग का 2 प्रतिशत अनाज विश्व बाजार से खरीदेगा। विपरीत परिस्थितियों के कारण हमारे किसानों को प्रतिस्पर्धी विश्व बाजार में तो प्रवेश नहीं ही मिला, वे अपने घरेलू बाजार के 2 प्रतिशत हिस्से से भी वंचित रह गये। यही वह मूल कारण है, जिससे खेती में निरंतर घाटा सहते हमारे किसान खेती छोड़कर दिहाड़ी मजदूर बनने और शहर दर शहर विस्थापित होकर भटकने को मजबूर हुए।  विश्व व्यापार समझौतों से प्रभावित सन् 2000 तक पूरी दुनिया के लगभग 3 करोड़ किसान अपनी जमीनों से हाथ धो बैठे।

विकासशील देशों के नजरिये से देखे जाने पर कुछ विश्लेषकों ने विश्वव्यापार समझौतों को ’धोखाधड़ी की नायाब मिसाल’ कहा है।  यह गलत दिशा में किया गया व्यापार का उदारीकरण था। यह समझौता पश्चिमी देशों, खासकर यूरोप और अमेरिका के हितों को प्रश्रय देता है।  विकासशील देशों की चाय, कॉफ़ी, कोक आदि वस्तुएँ जो आज उनके बाजारों में निर्यात हो रही है, वह समझौतों के पूर्व भी होती थी। इन वस्तुओं का घरेलू उत्पादन उनके यहाँ नहीं के बराबर था। अतः उन्हें कोई नुकसान नहीं हुआ। कुछ विकासशील देशों को तो इन वस्तुओं के व्यापार में विकसित राष्ट्रों द्वारा तरजीही दर्जा प्राप्त था। इस प्रकार विकासशील देशों को विकसित देशों में कोई नया बाजार नहीं मिला पर अपने बाजारों को उनके लिए खोलना पड़ा। इन देशों में उनके द्वारा ऐसी वस्तुओं का निर्यात किया गया जो उनके मुख्य खाद्यान्न थे। इससे उन देशों में कीमतें गिरी और उत्पादन हतोत्साहित हुआ। उत्पादकों की मुसीबतें बढ़ गयी। सोफिया मर्फी ठीक ही कहती है ’’कृषि संबंधी समझौता कृषि  के लिए एक खास मॉडल निर्धारित किये हुए है और उस मॉडल को खुद बनवाये हुए नियमों के माध्यम से लागू करवाता है। यह धनी देशों का मॉडल है जो औद्योगिक कृषि को आगे बढ़ाता है और विकासशील देशों की सरकारों से उसी नक्शेकदम पर चलने की अपेक्षा करता है। यह उन अरबों किसानों की जरूरतों और हितों की अनदेखी करता है जो धनवानों की उस दुनिया में नहीं रहते।  … हालांकि यह समझौता प्रकट रूप से केवल विश्व बाजार और व्यापार से ही संबंध रखता है, लेकिन इस बारे में निर्देश देता है कि कोई भी देश अपने कृषि क्षेत्र में किस प्रकार का निवेश कर सकता है। व्यवहार में कृषि सम्बन्धी समझौता विकसित देशों में सब्सिडी को वैधानिकता प्रदान करता है, जो विश्व बाजार को विकृत कर देता है और विकासशील देशों के सामने उपलब्ध विकल्पों को कम कर देता है, जो ग्रामीण खुशहाली और घरेलू खाद्य सुरक्षा को संरक्षित करने में रूचि रखते हैं।’’01

भारत जैसे देशों ने विकसित राष्ट्रों से कुछ ज्यादा ही उम्मीदें लगा रखी थीं।  हमारे देश में व्यापक गरीबी और बेरोजगारी को देखते हुए यहाँ की खेती और किसानों को विश्व बाजार के हमलों से रक्षा करने की जरूरत है। इस सम्बन्ध में एम.एस. स्वामीनाथन का यह आकलन और सुझाव विचारणीय है,- ’‘विश्वव्यापार समझौते का पाठ प्रभुत्वशाली ढंग से पश्चिम के पक्ष में झुका हुआ है। उसे विकसित ही इसी तरह किया गया है। … हुआ यह कि हमने पश्चिम से इसकी अनावश्यक उम्मीदें लगा ली कि वह सब्सीडियां कम करेगा, हमारे उत्पादों को बाहरी बाजारों में और ज्यादा प्रतियोगी बनने देगा। … हमें दस-पन्द्रह वर्षों तक के लिए सस्ते मालों से बाजार पाटे जाने से सुरक्षा चाहिए।  हमें गरीबी पर काबू पाना चाहिए, लेकिन हमें यह कहने में शर्म नहीं आनी चाहिए कि हमारा देश गरीब है और हमें संरक्षण की जरूरत है। इस तरह विश्वव्यापार संगठन समझौते में एक ‘आजीविका बॉक्स’ की जरूरत है (जिसके अन्तर्गत देशों को इसका अधिकार मिले कि अगर आयातों का असर उनके लोगों की आजीविका पर पड़ता है तो आयातों पर अंकुश लगा सकें)। हो सकता है कि हम खाद्य सुरक्षा हासिल कर चुके हों, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि आजीविका सुरक्षा भी हासिल कर चुके हैं।’’02 विश्व व्यापार अपने आप में कोई लक्ष्य नहीं है। यह एक उपकरण मात्र है, जिससे कोई राष्ट्र अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है।  अतः विश्व व्यापार के नियमों को किसी राष्ट्र की कृषि नीति केा प्रभावित करने या निर्देशित करने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए।  संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर और मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा के अनुसार किसी राज्य का दायित्व अपने नागरिकों का सम्मान करना, संरक्षण देना और जरूरतों को पूरा करना है।  अतः विश्वव्यापार के नियमों से अगर किसी राज्य के नागरिकों के संरक्षण और सम्मान का मानवाधिकार प्रभावित होता है तो उसे अपने ऊपर प्रभावी नहीं होने देना चाहिए।  अपने नागरिकों के मानवाधिकारों की रक्षा के लिए वैसे प्रावधानों की मुखालफत की जानी चाहिए।

विश्व व्यापार में शामिल दैत्याकार बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की इफरात पूँजी और बाजार पर उसके एकाधिकार की प्रवृत्ति मुक्त व्यापार के बुनियादी सिद्धांतों के विपरीत है। ये कम्पनियाँ बहुत ही संगठित और आक्रामक तरीके से किसी वस्तु के व्यापार में शामिल होकर उस देश के बाजार पर एकाधिकार का षड्यंत्र रचती हैं। किसी भी खाद्य वस्तु या प्रसंस्करण के व्यापार में उतरकर ये सबसे पहले आपूर्ति बढ़ाकर कीमतों को लागत मूल्य से भी नीचे के स्तर तक ले जाकर प्रतिस्पर्धियों को बाजार से बाहर कर देती हैं और बाजार पर पूर्णतया कब्जा कर लेने के बाद मनमानी कीमत वसूलती हैं।  ये कंपनियाँ कई वस्तुओं का व्यापार कई देशों में एक साथ करती हैं। अतः किसी भी खाद्य वस्तु या देश में लम्बे समय तक व्यापार घाटा सहकर भी अन्य देशों और मालों से प्राप्त मुनाफे के आधार पर अपने प्रतिद्वंद्वियों को तबाह और बर्बाद कर बाजार से निष्कासित करने में पूरी तरह सक्षम होती हैं। आई.बी.पी., कारगिल, कॉनआग्रा ऐसी ही ताकतवर बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ हैं।  ’कॉनआग्रा’ एक ऐसी ही विशाल कंपनी है, जिसका 25 प्रतिशत खाद्य सामग्री, चारा, उर्वरक, 53 प्रतिशत हिमशीत भोजन और 22 प्रतिशत किराने के उत्पादों की बिक्री पर कब्जा है। यह कंपनी अनाज भंडारण करने वाले 100 ऐलीवेटर, 2000 मालगाड़ी के डिब्बे और 1,100 मालवाहक नौकाओं की मालिक है। यह सबसे बड़ी टर्की उत्पादक और दूसरी सबसे बड़ी मुर्गा उत्पादक है। यह अपने मुर्गों के लिए दाना खुद बनाती है। इसी तरह ’कारगिल’ दुनिया की ग्यारहवीं बड़ी कंपनी है, जिसके 60 देशों में 800 जगहों पर 70 हजार कर्मचारी कार्यरत हैं। यह नमक, चीनी, मक्का, गेहूँ, चावल, सोयाबीन, मूँगफली, फल, सब्जियाँ, गोमांस, कपास, रबर और स्टील आदि पचास अलग-अलग प्रकार की जिन्सों का व्यापार करती है।  इसकी पूरी दुनिया में फैले हुए बल्क टर्मिनल हैं जो 40 मिलियन टन अनाज संभाल सकते हैं।  इसके पूरी दुनिया में फैले केन्द्र निजी दूर संचार तंत्र से जुड़े हैं।  ये सभी निगम अपनी साधनों की प्रचुरता, अपने विस्तार एवं विशेषज्ञता के बूते बाजार की हर हरकत से लाभ उठाने में सक्षम हैं।  जैसे वे व्यापारिक उपग्रहों व सांख्यिकी प्रतिष्ठानों से किसी देश के कृषि उत्पादन का पूर्वानुमान उस देश की सरकार से भी पहले लगा लेते हैं।

2007 में जब पूरी दुनिया खाद्य संकट से जूझ रही थी, बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ मुनाफा पीटने में लगी हुई थीं।  दुनिया का संकट इनके लिए वरदान साबित हो रहा था। 2007 की पहली तिमाही में आर्चर डैनियल्स मिडलैण्ड की कमाई में 42 प्रतिशत, मोनसैंटो की 45 प्रतिशत और कारगिल की कमाई में 86 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी। कारगिल की सहयोगी कंपनी मोजैक फर्टिलाइजर का मुनाफा तो बढ़कर 1200 फीसदी हो गया था।

कुछ बहुराष्ट्रीय कंपनियों की सालाना आय देखकर किसी के भी होश उड़ सकते हैं।  ’’सन् 2007 में खाद्य प्रसंस्करण कम्पनी नेस्ले ने 9.7 अरब डॉलर का मुनाफा कमाया, जो 65 निर्धनतम देशों के 2007 के कुल घरेलू उत्पाद से भी ज्यादा था। दुनिया की सबसे बड़ी खुदरा कम्पनी वालमार्ट ने 31 जनवरी 2009 को समाप्त होने वाले वित्तीय वर्ष में 13.3 अरब डॉलर का मुनाफा कमाया। केवल मुनाफे की ही यह धनराशि 2007 में दुनिया के लगभग आधे देशों (कुल मिलाकर 88 देशों) के कुल सकल घरेलू उत्पाद से ज्यादा थी (कुल बिक्री सैकड़ों अरब डॉलर में थी)। इस बाजार की ताकत से ही वह दोनों क्षमता प्राप्त होती है, जिससे कि कीमतों का पूर्वानुमान (और कुछ हद तक उनका निर्धारण) किया जाता है और सौ से अधिक देशों में, जहाँ ये विशालतम कंपनियाँ व्यवसाय करती हैं, उनमें से कई देशों में व्यापार तथा निवेश नीति पर मनचाहा प्रभाव डालने के लिए राजनीतिक दबदबा बनाया जाता है और इसी से यह शक्ति भी प्राप्त होती है कि भावी प्रतियोगियों को किनारे लगाया जा सके।’’03 दरअसल मुक्त विष्व व्यापार की सबसे बड़ी खिलाड़ी और लाभार्थी ये बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ ही हैं।  ये किसी भी देश की राष्ट्रीय सरकारों को प्रभावित करने के साथ-साथ उन्हें गिराने और बनाने की ताकत भी रखती हैं।  यह जानकर आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि ये बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ ही विश्व व्यापार समझौते के लिए सबसे ज्यादा लालायित थीं।  उरूग्वे दौर का अमरीकी दस्तावेज ’कारगिल’ के भूतपूर्व वरिष्ठ उपाध्यक्ष डॉन आमस्तुत्ज ने तैयार किया था, जो अमरीकी कृषि विभाग के भूतपूर्व कर्मचारी भी थे।

विश्व व्यापार समझौतों के बाद मात्रात्मक प्रतिबन्ध हटाये जाने तथा आयात शुल्क में कटौती के कारण अमेरिकी और यूरोपीय सस्ते मालों के आयात से भारतीय बाजार पट गया। अमेरिका और यूरोप अपने किसानों को अत्यधिक सब्सिडी प्रदान करता है। अतः उनके किसान लागत मूल्य से कम पर भी अपने कृषि उत्पादों को बेचकर भारी मुनाफे में रहते हैं। इसके बरक्स भारतीय किसानों की सब्सिडी प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में बहुत ही कम है। जो सब्सिडी थोड़ी बहुत बची है उसमें भी निरंतर कटौती की जा रही है।  बीज, खाद, डीजल, बिजली एवं अन्य कृषि उपकरणों के महँगे होने के कारण हमारे किसानों की उत्पादन लागत बहुत ज्यादा होती है।  अतः उच्च सब्सिडी प्राप्त विदेशी कृषि उत्पादों के द्वारा गिराये गये बाजार मूल्य पर अपने उत्पादों को बेचकर वे भारी नुकसान उठाते हैं। वे अपने पूर्व में लिये गये कर्ज की भरपाई कर नहीं पाते और उससे भी ज्यादा नये कर्ज के चंगुल में फँस जाते हैं।  भारत सरकार ज्यादा से ज्यादा आयात शुल्क लगाकर अपने किसानों की रक्षा कर सकती थी पर ऐसा न करके विदेशी कृषि उत्पादों के आगे उसने अपने किसानों को हलाल होने के लिए छोड़ दिया है।

विकसित राष्ट्रों ने विश्व व्यापार समझौतों के तहत सब्सिडी घटाने का वादा पूरा नही किया,  उल्टे और बढ़ा दिया। विश्व व्यापार के नियम सबके लिए समान नहीं हैं। अमेरिका और यूरोपीय देशों ने कृषि भुगतान तथा माल की कीमतों को अलग कर तथा आधारभूत ढाँचे को व्यापक मदद पहुँचाकर अप्रत्यक्ष रूप से सब्सीडियों को बनाये रखा। अमेरिका अपने हर किसान को सालाना लगभग 35000 डॉलर की सब्सिडी प्रदान करता है, जबकि भारतीय किसानों की औसत वार्षिक आमदनी 300-400 डॉलर है।  एक जापानी किसान को अमेरिकी किसानों से भी ज्यादा सब्सिडी मिलती है। दूसरी तरफ जापान यह कहकर कि उसके लिए चावल केवल माल नही, बल्कि जीने की शैली है, चावल के आयात पर 200 प्रतिशत शुल्क लगाकर अपने किसानों के हितों की रक्षा करता है।

अमेरिकी किसानों को उनकी फसल के कुल मूल्य से दुगने से भी ज्यादा सब्सिडी मिलती है।  पी. साईनाथ के अनुसार ’’39 खरब डॉलर के कृषि मूल्य पर अमरीका अपने कपास उत्पादकों को 47 खरब डॉलर की सब्सिडी देता है।  इस सब्सिडी ने निचले स्तर पर अन्तर्राष्ट्रीय कपास बाजार को तहस-नहस कर दिया। …बुर्किनाफासो और माली के राष्ट्रपतियों ने जुलाई 2003 में न्यूयार्क टाईम्स को लिखे एक लेख में लिखा है- ’आपकी कृषि सब्सिडियाँ हमारा गला घोंट रही हैं।’’04  हमारी दलाल और दब्बू सरकारों में तो इतना आत्मविश्वास भी नहीं है कि इस तरह की उचित शिकायत कर सकें।

जाहिर है ऐसे असमान और अरक्षित स्थिति में अमेरिकी और यूरोपीय किसानों के समक्ष भारतीय किसानों को असहाय छोड़ देना मौत के मुँह में धकेलना नहीं तो और क्या है?  भारतीय देशी और विदेशी कँपनियां एक तरफ लागत सामग्रियों की कीमतें बढ़ाकर किसानों को लूटती हैं, दूसरी तरफ सरकार थोड़ी-बहुत बची हुई सब्सिडियों में कटौती करके, समर्थन मूल्य और सरकारी खरीद बंद करके उनके संकट को और भी बढ़ा देती है।  विदेशों से आयातित सस्ते दर के कृषि उत्पाद रही सही कसर भी पूरी कर देते हैं।  भारतीय किसानों की मराणासन्न स्थिति का फायदा उठाने में स्थानीय महाजन और सूदखोर भी पीछे नहीं रहते।  फसल दर फसल घाटा, गैर संस्थागत ऋणों की वसूली के दबाव के आगे उन्हें आत्महत्या के सिवा और कोई रास्ता नहीं दिखता।  इस तरह किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्याएँ, आत्महत्या नहीं, सोची-समझी रणनीति के तहत ठण्डे मन से की गयी हत्याएँ हैं।  आज चारों तरफ से घेरकर व्यवस्था उनका शिकार कर रही है।

उपर्युक्त स्थितियों में भारतीय किसानों की रक्षा के लिए सब्सिडियाँ बढ़ायी जानी चाहिए।  लेकिन अन्तर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं के दबाव में और वित्तीय पूँजी को प्रसन्न करने के लिए भारतीय किसानों को दी जाने वाली सब्सिडियों में निरंतर कमी की जा रही है।  विश्व व्यापार समझौतों के पूर्व 1990 के दशक तक खेती को दी जाने वाली सब्सिडी 200 हजार करोड़ थी, जिसमें 2011 तक 100 हजार करोड़ की कटौती कर दी गयी। कृषि के नाम पर कुछ सब्सिडी मिलती भी है, उसे उद्योगों द्वारा डकार लिया जाता है। खादों पर दी जा रही सब्सिडियाँ इधर किसानों को न मिलकर, खाद कंपनियों को दी जा रही है। लेकिन इससे किसानों को कोई खास राहत नहीं मिल पाती।  उन्हें खादों पर उतना ही खर्च करना पड़ता है। 2011 के बजट में अगले वर्ष के लिए उर्वरक सब्सिडी में 9 फीसदी यानी 4979 करोड़ रूपये की कटौती की घोषणा की गयी थी।  ’’सरकार ने चालू वित्त वर्ष (2013-14) के लिए डीएपी जैसे फ़ॉस्फेट और पोटाश आधारित रासायनिक उर्वरकों पर सब्सिडी और कम करने का फैसला किया है। ….उर्वरक मंत्रालय का अनुमान है कि उर्वरकों पर सब्सिडी चालू वित्त वर्ष में 4,500 से 5,000 करोड़ रूपये कम होकर करीब 27,500 करोड़ रह जायेगी’’ (देखें- ‘जनसत्ता’, नई दिल्ली, 02 मई, 2013, पृ. 01)।  इससे न सिर्फ खादों के मूल्य बढ़ जायेंगे, बल्कि खादों की किल्लत भी हो जायेगी। कुछ अन्य सब्सिडियाँ जो छोटे किसानों को दी जाती है, उसका 65 से 70 प्रतिशत हिस्सा धनी किसानों द्वारा झपट लिया जाता है।  छोटे किसान उससे वंचित ही रह जाते हैं।  सरकार काॅरपोरेट घरानों के कर माफी तथा राजस्व में कटौती के माध्यम से 2008-09 में 4,18,095 करोड़ रूपये की सब्सिडी दी थी, जबकि उसी वर्ष खाद्य पर दी गयी कुल सब्सिडी मात्र 43,688 करोड़ की थी।

भारतीय किसान दुनिया का पहला ऐसा उत्पादक है, जिसके उत्पाद की कीमत तय करने में उसकी कोई भूमिका नहीं होती। उसकी मजबूरी है कि उसे अपना अनाज लेकर मंडी में जाना होता है, जहाँ उसकी कीमतें दलाल, व्यापारी और सरकार तय करती है। इन तीनों की भूमिका शोषणकारी होती है। भारतीय किसानों की सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि अपने कृषि कार्य में काम आने वाली सामग्रियों को वे कॉर्पोरेट घरानों और मल्टीनेशनल कंपनियों द्वारा तय किये दामों पर खरीदते हैं। इसी तरह अपने अनाजों को विदेशों से आयातित उच्च सब्सिडी प्राप्त उत्पादों द्वारा गिराये गये भाव पर बेचते हैं।  कीमतों के निर्धारण में उनकी कोई भूमिका नहीं होती। उनकी आर्थिक स्थिति इतनी खराब होती है कि वे बाजार भाव बढ़ने की प्रतीक्षा भी नहीं कर पाते और कम कीमतों पर आपदा बिक्री के लिए मजबूर होते हैं।  यह आम बात है कि फसल उत्पादन के समय उसकी कीमत कम होती है।  इन्हीं कम कीमतों पर व्यापारी और अब तो बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ भी किसानों से अनाज खरीदकर बाद में बढ़े दामों पर बेच देती हैं।

अन्ततः वास्तविकता यही है कि किसानों के उत्पादन के बढ़ते लागत मूल्य और उसके श्रम का प्रतिदान उसे नहीं मिलता। यही कारण है कि देश के विभिन्न हिस्सों से आज किसानों द्वारा अपनी फसलें बर्बाद किये जाने की निराशाजनक सूचनाएँ मिल रही हैं। यह एक तरह का आत्मघाती कदम है। आत्महत्या से पूर्व उठाया गया आखिरी कदम। छत्तीसगढ़ के भाटापारा में दलालों की किचकिच से तंग आकर किसान बाजार के बाहर ट्रकों पर लदे गोभी फेंककर चले जाते हैं।  गोभी की फसलों से भरे खेत पर हल चला देते हैं। उत्तरप्रदेश और हरियाणा के किसान गन्ने को अपने खेतों में जला डालते हैं। उत्तरप्रदेश के प्रतापगढ़ में प्रसिद्ध आँवला उत्पादक किसान दलालों की मनमानी से तंग आकर आँवला के पेड़ों की कटाई करने लग जाते हैं। बंगाल के हुबली और बर्द्धमान में किसान आलू को सडकों पर डाल देते हैं। इन समस्त घटनाओं का कारण यही है कि किसानों को अपने उत्पादों का उचित मूल्य नहीं मिल पाता। उत्पादन वे करते हैं और लाभ दलाल और व्यापारी चट कर जाते हैं। छत्तीसगढ़ के वनवासी इलाकों में हर्रे की कीमत वनौषधि विभाग ने 6 रूपये किलो तय की है, जबकि देश के किसी भी शहर में इसका मूल्य 200 रू. किलो से ज्यादा है।

किसानों के साथ नाइंसाफी यह है कि अन्य उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें जिस रफ्तार से बढ़ती है, किसानों के उत्पादों के मूल्य उस तेजी के साथ नहीं बढ़ते। 1967 में एक क्विंटल गेहूँ बेचकर उस समय का किसान 212 लीटर डीजल खरीद सकता था, लेकिन आज उतना ही गेहूँ बेचकर वह सिर्फ 25 लीटर डीजल खरीद सकता है। ढाई क्विंटल गेहूँ के समर्थन मूल्य से उस समय एक तोला सोना खरीदा जा सकता था पर आज 1 तोला सोना खरीदने के लिए 22 क्ंिवटल गेहूँ बेचने की जरूरत होगी। स्पष्ट है, किसानों के उत्पादन के मूल्य जिस मापदण्ड पर तय किये जाते हैं, उसमें खोट है।  जान-बूझकर उनके हितों की अनदेखी कर उनके साथ अन्याय किया जाता है, क्योंकि उनका कोई मजबूत संगठन नहीं है।  उनकी कोई सम्मिलित आवाज नहीं है।  जब से कृषि उत्पादों का बाजार विश्व बाजार से जुड़ा है, कीमतों में उतार-चढ़ाव बहुत तेजी के साथ होता है।  देशी व्यापारी हों या बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ, बढ़ती हुई कीमतों का फायदा खुद निगल जाती हैं, पर घटती कीमतों का सारा बोझ किसानों के ऊपर डाल देती हैं।  बाजार की अनिश्चितताओं का पूँजीवादी हल है-वादा व्यापार या ठेके की खेती।  लेकिन ये दोनों विकल्प किसानों को अपनी खेती से अलगाव में डालकर उसे बड़ी पूँजी का यांत्रिक गुलाम बना देते हैं।

औपनिवेशक जमाने में अकाल और भूख से मौतें भयावह सच्चाई थी। आजादी के बाद भूख और कुपोषण के अभिशापों से मुक्ति तथा किसानों की सहायता के लिए सरकारी खरीद और सार्वजनिक वितरण प्रणाली जैसी योजनाओं की शुरूआत की गयी। सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से जरूरतमंदों तक उचित मूल्य पर खाद्य सामग्रियाँ पहुँचायी गयी। सरकारी खरीद और सार्वजनिक वितरण प्रणाली किसान और उपभोक्ता दोनों को बाजार के उतार-चढ़ाव के खतरों से महफूज रखते हैं। लेकिन विश्वव्यापार समझौतों की दिशा में विश्व बैंक की ओर से भारत एवं अन्य विकासशील देशों पर निरंतर दबाव डाला जा रहा है कि सरकारी खरीद और सार्वजनिक वितरण प्रणाली को समाप्त किया जाये। बहुत सारे पिछड़े और विकासशील देशों ने 1990 के दशक से ही सार्वजनिक वितरण प्रणाली को छिन्न-भिन्न करना शुरू कर दिया था। हमारी सरकार भी धीरे-धीरे इस व्यवस्था को कमजोर और निश्प्रभावी बनाती जा रही है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर भ्रष्टाचार के आरोप पहले से ही लगते रहे हैं पर खाद्य सुरक्षा और नगद भुगतान की आड़ लेकर आज इस व्यवस्था को खत्म करने की साजिश चल रही है। व्यापक जनता की खाद्य सुरक्षा पर्याप्त सरकारी खरीद और जनवितरण प्रणाली के माध्यम से उचित दर पर जनसाधारण तक खाद्यान्न पहुँचाने पर ही निर्भर है पर जनसंख्या बढ़ने के साथ ही सरकारी खरीद निरंतर घटती जा रही है। 2005-06 में चावल, गेहूँ एवं अन्य खाद्यान्नों की कुल सरकारी खरीद 4.24 करोड़ टन की गयी थी जो 2006-07 और 2007-08 में घटकर क्रमशः 3.59 तथा 3.76 करोड़ टन हो गयी। नौवें दशक में विभिन्न राज्यों में गैर खाद्य निर्यात योग्य वस्तुओं के लिए जिन विभिन्न बोर्डों का गठन किया गया था, उन्हें अब जानबूझकर अक्षम बना दिय गया है। कपास, कॉफ़ी, चाय, रबर और मिर्च उत्पादक किसानों द्वारा वैश्विक स्तर पर गिरे मूल्यों पर अपने उत्पादों को बेचना महाराष्ट्र, आन्ध्र, कर्नाटक और केरल जैसे राज्यों में किसान आत्महत्याओं का सबसे बड़ा कारण रहा है।

उत्सा पटनायक द्वारा सरकारी खरीद और सार्वजनिक वितरण प्रणाली को समाप्त किये जाने के विकसित देशों के दबाव के पीछे हमारे खाद्य तंत्र पर उनके कब्जे की मंशा को पहचानना उचित ही है।  इसीलिए वे आगाह करती हैं, ’’सरकारी खरीद तथा समर्थन मूल्य की जो व्यवस्था हमारे यहाँ लागू है, किसान तथा उपभोक्ता, दोनों को ही विश्व बाजार के अंधाधुंध उतार-चढ़ावों से बचाती है।  ठीक इसी व्यवस्था को विश्व बैंक द्वारा अपने हमलों का निशाना बनाया जा रहा है, जो इसे कथित रूप से तो ’कार्यकुशलता’ के नाम पर लेकिन वास्तव में इसलिए नष्ट करना चाहता है ताकि हमारे देश को विकसित देशों से अनाज के शुद्ध आयातकर्ता में तब्दील किया जा सके।’’05

देश में बड़े पैमाने पर गरीबी तथा भूख से मौतों तथा किसानों की आत्महत्या की घटनाओं को देखते हुए सार्वजनिक वितरण प्रणाली और सरकारी खरीद को समाप्त करने के बहुत ही गंभीर परिणाम होंगे।  खुद योजना आयोग के आँकड़ों के अनुसार देश के 32 प्रतिशत लोग गरीब हैं।  योजना आयोग द्वारा राज्य सरकारों पर निरंतर दबाव डाला जा रहा है कि बी.पी.एल. के अंतर्गत 36 प्रतिशत से ज्यादा लोगों को न लाया जाये।  कई बार कुपोषण और भूख से मौतों पर सुप्रीम कोर्ट केन्द्र सरकार को फटकार लगा चुका है। जब भी कुपोषण और भूख का मामला उठाया जाता है सरकार हमेशा यह तर्क देती है  कि गरीबी घट रही है तथा देश में अनाजों की कमी नहीं हैं।  अन्न भण्डार भरे हुए हैं, लेकिन गिरती क्रय शक्ति के कारण बहुसंख्यक लोग खाद्यान्न खरीदने की स्थिति में नहीं हैं।  2011 तक गरीबी का पैमाना शहरों में 17 रू. और गाँवों में 12 रू. रोजाना खर्च को माना गया था, जो कहीं से उचित नहीं है।  सुप्रीम कोर्ट ने सड़ते हुए अनाजों और भूख से हो रही मौतों की खबरों के बीच कहा था अगर सरकार गोदामों में सड़ते हुए अनाजों की रक्षा नहीं कर सकती तो देश के गरीबों में मुफ्त बाँट दे, लेकिन सरकार के कानों पर जूँ तक नहीं रेंगी।

अन्य उत्पादों की अपेक्षा कृषि उत्पादों की कीमतें हमेशा से कम रही हैं।  इसके पीछे सरकारों की मंशा यह रहती है कि मजदूरी तथा वेतन का भुगतान कम करना पडे़ तथा कम कीमत पर उद्योगों को कच्चा माल उपलब्ध कराया जा सके।  हरित क्रांति के बाद बीज, खाद, कीटनाशकों तथा डीजल और विद्युत के बढ़ते खर्चों ने किसानों की उत्पादन लागत बढ़ा दी।  खुले बाजार के मूल्य कभी-कभी उत्पादन लागत से भी कम होते हैं। अतः किसानों ने कृषि क्षेत्र में बने रहने के लिए सरकार से समर्थन मूल्य की माँग की और इसके लिए बड़े आन्दोलन हुए।  विश्व व्यापार के नये दौर में जब से विदेशों से भारी मात्रा में सब्सिडी प्राप्त अनाज भारतीय बाजार मे प्रवेश करने लगे हैं और विशालकाय कम्पनियाँ अनाज व्यापार में शामिल हुई, कृषि उत्पादों की कीमतें और भी गिर गयीं। अतः ऐसे में किसानों के हितों रक्षा के लिए समर्थन मूल्य की महती आवश्यकता है। किसान संगठनों की तरफ से हमेशा यह माँग हो रही है कि स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के अनुरूप समर्थन मूल्य तय किया जाये।  उस सिफारिश में लागत मूल्य का 50 प्रतिशत लाभ जोड़कर न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित किये जाने की बात कही गयी है।

इधर देश के विभिन्न हिस्सों में एक नयी प्रवृत्ति उभर कर सामने आयी है कि किसान सिर्फ अपने फसलों की बर्बादी और ऋणग्रस्तता के कारण ही आत्महत्या नहीं करता, बल्कि फसलों के उचित मूल्य और सरकार द्वारा समर्थन मूल्य न मिल पाने की वजह से भी आत्महत्याएँ कर रहा है।  ’’पश्चिम बंगाल के बर्दवान जिले में बीते 6 महीने के भीतर 27 किसान अपनी जान ले चुके हैं। खुदकुशी की वजह यदि जानें, अपनी फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य न मिल पाना है। यानी इन किसानों ने अपनी जान फसल के नुकसान होने की वजह से नहीं, बल्कि फसल के सही दाम न मिल पाने की वजह से ले ली।  …….. उनका बहुत सारा धान न तो सरकारी खरीद में आ सका और न ही उन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य मिल पाया।  …… पिछले दिनों जब केन्द्रीय दल ने उत्तरप्रदेश और बिहार का दौरा कर जमीनी हकीकत जाननी चाही, तो मालूम चला कि वहाँ भी किसानों को घोषित मूल्य से 30 फीसदी कम पर धान बेचने को मजबूर होना पड़ा।  …. बर्दवान में सामने आये किसान खुदकुशी के मामले हमें मुल्क में एक नयी सच्चाई से वाकिफ कराते हैं कि जब किसी वजह से फसल चैपट होती है, तब तो किसान मुसीबत में होता ही है, लेकिन जब पैदावार अच्छी होती है और उसे अपनी फसल का वाजिब दाम नहीं मिल पाता, तब भी वह मुसीबत में आ जाता है।’’06

स्पष्ट है कि उपर्युक्त परिस्थितियों में किसानों और कृषि की रक्षा के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य बहुत सकारात्मक भूमिका निभा सकता है। पर इसे लेकर हमारी सरकारें कितनी गंभीर है इसे 2007 के उदाहरण से समझा जा सकता है।  2007 में गेहूँ की फसल आने के बाद सरकार ने 750 रू. क्विंटल की दर से समर्थन मूल्य की घोषणा की पर बाजार मूल्य ज्यादा होने के कारण 100 रू. बोनस देने का विचार किया। बोनस देकर भी सरकार का न्यूनतम समर्थन मूल्य 850 रू. प्रति क्ंिवटल, बाजार दर 950 रू. से कम था। उस समय गेहूँ का अन्तर्राष्ट्रीय बाजार भाव 1050 रू. प्रति क्विंटल था। अतः व्यापारियों, कॉर्पोरेट समूहों तथा बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने सरकार द्वारा समर्थित मूल्य से ज्यादा कीमत चुकाकर किसानों से गेहूँ खरीद कर या तो अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में बेच दिया या बचाकर रख लिया। सरकार का लक्ष्य उस समय 150 लाख टन गेहूँ खरीदने का था। लेकिन उतना गेहूँ भी उसे किसानों से नहीं मिल पाया। बाद में जब बफर स्टॉक समाप्त होने लगा और गेहूँ की किल्लत हुई तो विश्व बाजार से लगभग दुगुने मूल्य पर उसे 13 लाख टन गेहूँ खरीदने का निर्णय लेना पड़ा। जो सरकार अपने किसानों को हजार रूपये क्विंटल समर्थन मूल्य देने को भी तैयार नहीं थी (जो उस समय का अन्तर्राष्ट्रीय बाजार मूल्य था) वही सरकार किसानों को दिये गये समर्थन मूल्य के दुगुने में गेहूँ का आयात करती है। इससे मनमोहन सिंह सरकार की किसानों के प्रति असंवेदशीलता और अदूरदर्शिता का अंदाजा लगाया जा सकता है।

अभी हाल-फिलहाल भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौता दुग्ध व्यवसाय और डेयरी उत्पादों के लिए ताबूत में आखिरी कील साबित होने जा रहा है। सन् 2007 से यूरोपीय यूनियन और भारत के बीच मुक्त व्यापार समझौता पर बातचीत चल रही है, जिसे पिछले दिनों प्रधान मंत्री की जर्मनी यात्रा के दौरान तमाम विरोधों के बावजूद लगभग अंतिम रूप दे दिया गया।  यह समझौता वाहन, दवा, सूचना प्रौद्योगिकी के साथ-साथ डेयरी उद्योग के लिए विश्वव्यापार समझौता के बाद गुलामी का दूसरा शर्मनाक दस्तावेज है।

यह आश्चर्यजनक है कि एक सम्प्रभु राष्ट्र के रूप में हम ऐसे गैरबराबरी के अपमानजनक समझौते करने के लिए विवश क्यों हैं? यह हमारे परजीवी शासक वर्ग के दब्बूपन का घृणित उदाहरण है।  जिस तरह इंग्लैण्ड के औद्योगिकीकरण और ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापार ने हमारे लघु और कुटीर उद्योगों को ऐतिहासिक रूप से बर्बाद कर डाला था उसी तरह आज एक बार फिर यूरोपीय यूनियन के साथ किया जाने वाला यह समझौता हमारे डेयरी उद्योग को तबाह कर देगा।  पहले से ही आत्महत्या कर रहे किसानों के लिए यह समझौता आग में घी का काम करेगा।

1994-95 में कृषि क्षेत्र में विश्वव्यापार समझौता लागू होने के बाद विकासशील देशों ने आयात-निर्यात पर नियंत्रण तथा सीमा शुल्क को समाप्त करना शुरू कर दिया। अतः पूर्व में उन देशों की कृषि को जो संरक्षण प्राप्त था, वह धीरे-धीरे खत्म होने लगा। विकसित देशों के कृषि उत्पाद उन देशों में प्रवेश कर वहाँ के स्थानीय उत्पादों के साथ प्रतिस्पर्धा करने लगे। फलतः खाद्यान्न की कीमतों में भारी गिरावट देखी गयी। एफ.ए.ओ. के अनुसार 1997 से 2003 के बीच सभी जिंसों के संयुक्त मूल्य सूचकांक में वास्तविक अर्थों में 53 प्रतिशत की गिरावट आयी।  कम कीमतों का अर्थ है सस्ता आयात। इससे स्थानीय उत्पादकों के हित बुरी तरह प्रभावित हुए और कृषि पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा। 2005 तक विकासशील देशों के कृषि उत्पादों की स्थिति खराब होने पर अनाजों की कीमतें चढ़ने लगीं। ऐसी स्थिति में विकसित देशों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने आपूर्ति में कमी कर कीमतों को और चढ़ने दिया। परिणामस्वरूप 2007 का अभूतपूर्व खाद्यान्न संकट उभर कर सामने आया। अन्तर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं द्वारा निर्देशित स्थानीय कृषि के संरक्षण को खत्म करने वाली नीतियों और सस्ते आयात ने कई देशों की कृषि को चैपट कर दिया। ’लाइफ एण्ड डेब्ट्’ नामक वृत्तचित्र यह दिखाता है कि अमेरिका के सस्ते अनाजों के आयात ने जमैका की कृषि को पूरी तरह बर्बाद कर दिया।

हमारे देश ने जमैका जैसे देशों से सीख लेने का कार्य नहीं किया। हमारे देश का शासक वर्ग भी स्थानीय कृषि को संरक्षण देकर, खाद्य आत्मनिर्भरता प्राप्त करने की अपेक्षा आयात के आधार पर जनता के पेट भरने का सपना देखने लगा है। मुख्य खाद्य फसलों की अपेक्षा निर्यात योग्य कृषि उत्पादों को उपजाने पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है। नगदी फसल उगाने का यह दबाव अतीत की नील खेती की याद दिलाता है। इसके पीछे तर्क यह दिया जाता है कि आज के विश्वग्राम में आवश्यक नहीं है कि हर देश हर वस्तु का उत्पादन करे। अमेरिका और आॅस्ट्रेलिया अगर ज्यादा अनाज उत्पादित करने की स्थिति में हैं तो हम अपने संसाधनों को इस पर क्यांे बर्बाद करें और क्यों न उनके सस्ते अनाज को आयातित कर अपनी जरूरतों को पूरा करें और उपभोक्ताओं को भी राहत दें? यह तर्क ऊपर से लुभावना जरूर लगता है पर यह हमारी कृषि को बर्बाद करने वाला तथा विकसित देशों के हाथों अपनी खाद्य जरूरतों को गिरवी रखने जैसा है।

कृषि उत्पादों के आयात-निर्यात के बारे में सरकार की कोई स्पष्ट नीति नहीं है।  व्यापारिक उदारीकरण के बाद भारत को कृषि उत्पादों के निर्यात का कोई नया बाजार नहीं मिला ।  उल्टे निर्यात की अपेक्षा आयात मेें भारी वृद्धि हुई।  1996-97 और 2003-04 के बीच मात्रा में 375 प्रतिशत और मूल्य में 300 प्रतिशत की आयात में वृद्धि हुई ।  केवल 1998 और 2000-01 के बीच कृषि उत्पादों का औसत वार्षिक आयात करीब 64 प्रतिशत बढ़ गया।  वहीं निर्यात में 7 प्रतिशत की कमी आयी।  घटता निर्यात और बढ़ता आयात कृषि व्यापार की दयनीय स्थिति खुद बयान करता है।

अपनी खाद्य आत्मनिर्भरता को त्याग कर निर्यात योग्य फसलों को बढ़ावा देने की नीति वस्तुतः विकसित देशों द्वारा पैदा किया गया एक ऐसा षड्यंत्र और दुष्चक्र है जिसमें हमारे देश के साथ-साथ अन्य विकासशील देश भी फँसते जा रहे हैं।  अधिकांशतः विकसित देश अपनी जलवायु की विशिष्टताओं के कारण आमतौर पर एक फसली उत्पादन वाले देश हैं, जबकि अपने गर्म और समशीतोष्ण जलवायु के कारण ज्यादातर विकासशील देश बहुफसली उत्पादन वाले हैं।  यहाँ फसलों के उत्पादन में विविधता है।  अतः विकसित देश यह चाहते हंै कि विकासशील देश उन फलों, फूलों, सब्जियों, चाय और कॉफ़ी का उत्पादन करें जिनकी उन्हें जरूरत है और जिनका उत्पादन वे नहीं कर पाते।  इसके साथ ही वे अपने गेहूँ, मक्का जैसे अतिरिक्त और फालतू खाद्य फसलों को हमारे देश के बाजारों में खपा दें। इसीलिए विश्व बैंक और अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा हमें निर्यात योग्य फसलों का पाठ पढ़ाया जाता है। हमारे देश में निर्यात योग्य फसलों में सोयाबीन का महत्वपूर्ण स्थान है। यह एक ऐसी फसल है जिसका सीधे उपयोग जनता नहीं करती। इसका तेल भी अन्य तिलहनों की तरह छोटी मशीनों से नहीं निकाला जा सकता ।  यह पूरी तरह उद्योग और बाजार पर आश्रित उत्पाद है। इसे विकसित देशों की रणनीति के तहत हमारे देश में बढ़ावा दिया गया। हमें घोशित रूप से यह बताया गया कि इसमें बहुत प्रोटीन है इसलिए इसकी खेती से हमारे देश में कुपोषण की स्थिति में सुधार आयेगा, जबकि वास्तविकता यह भी थी कि विकसित देशों को पशुचारे के रूप से इसके खल्ली के आयात की आवश्यकता थी। हमारे यहाँ सोयाबीन की खेती वस्तुतः विकसित देशों में पशु आहार की कमी को पूरा करने के लिए प्रेरित की गयी थी।  आज भी इसकी खल्ली मुख्यतः विकसित देशों को निर्यात की जाती है। म.प्र. के होशंगाबाद और हरदा जिलों में जहाँ इसकी सर्वाधिक खेती की जाती है, जमीन बंजर होने के कगार पर पहुँच चुकी है।

आज विकासशील देशों का शासक वर्ग विकसित देशों की चालों में फँसकर, अपनी खाद्य आत्मनिर्भरता को संकट में डालकर उनकी जरूरतों के सामानों को पैदा करने की पैरवी कर रहा है। विकासशील देशों के आपसी होड़ और विकसित देशों में सीमित माँग के कारण विकसित देशों को कम कीमत पर उनकी जरूरतों के सामान मिल रहे हैं।  इसके एवज में हमारा कृषि तंत्र और खाद्य आत्मनिर्भरता चैपट हो रही है। ’’निर्यात बलाघात के लिए गुंजाइश बनाने के लिए घरेलू खाद्य उत्पादन की ही कुर्बानी देनी पड़ती है। … विकसित देश थोड़े से हैं, पर काफी संगठित हैं।  दूसरी ओर विकासशील देश बहुत ज्यादा हैं और अच्छी तरह संगठित नहीं हैं। इसलिए, होता यह है कि एक जैसे ढाँचागत समायोजन कार्यक्रम के अन्तर्गत अस्सी से ज्यादा विकासशील देश एक जैसे उत्पादों मंे निर्यात बलाघात के साथ एक-दूसरे के खिलाफ होड़ कर रहे होते हैं। जाहिर है कि इस क्रम में उन्हंे प्रतिस्पर्धी ढंग से अपनी मुद्राओं का अवमूल्यन भी करना पड़ा है। अब ऐसे हालात में, अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में उनके उत्पादों की इकाई कीमत नीचे ही खिसकनी है।’’07  इन्हीं कारणों से भारत के कपास, रबर तथा नारियल उत्पादक किसानों को निर्यात मंे भारी नुकसान उठाना पड़ा और वही उनकी आत्महत्या का प्रमुख कारण बना।

1991 में कपास के अन्तर्राष्ट्रीय मूल्य बहुत ज्यादा थे। सिर्फ एक वर्ष में ही पिछले तीन वर्षों को मिलाकर किये गये 34000 टन के निर्यात की अपेक्षा इस वर्ष 374000 टन कच्चे कपास का निर्यात किया गया। इस निर्यात से हुए फायदे ने बहुत सारे किसानों को भटकाया। आगे चलकर फसल बदलाव के खर्च और कपास उपजाने की बढ़ती लागत को पूरा करने के लिए भारी मात्रा में कर्ज लेकर महाराष्ट्र, आन्ध्रप्रदेश, कर्नाटक और पंजाब के किसानों ने कपास उत्पादित किये।  1996 से अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में कपास की कीमतें तेजी से गिरने लगीं।  वर्ष 1995 से 2001 के बीच कपास की कीमतें लगभग आधी हो गयी।  इसके कारण भारतीय किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा और उनमें आत्महत्या की प्रवृत्तियाँ बढ़ीं।  सरकार किसानों के लिए कुछ भी नहीं कर पायी।

प्रायः कृषि संकट और किसानों की आत्महत्या का समाधान कृषि के विविधीकरण तथा नकदी फसलों के उत्थान में देखा जाता है। सरकार अनाजों के उत्पादन में कम आबादी वाले विकसित पश्चिमी देशों की नीतियाँ अपना रही है। सरकारी तंत्र लगातार किसानों में यह भ्रम फैलाने की कोशिश कर रहा है कि गेहूँ, चावल आदि खाद्य फसलों की जगह उच्च मूल्य वाले निर्यात योग्य फसलों का उत्पादन करो। इसके माध्यम से किसानों को जल्दी अमीर बनने का सपना दिखाया जाता है। अधिकांशतः नकदी फसलों का लागत मूल्य ज्यादा होता है जिसके लिए किसानों को कर्ज की जरूरत होती है।  इन निर्यात योग्य नकदी फसलों के वैश्विक मूल्य पर विशालकाय बहुराष्ट्रीय कंपनियों का नियंत्रण होता है।  इन फसलों के उतार-चढ़ाव भरे मूल्य के भँवर में फँसकर किसानों को अक्सर घाटा लगा है। अब यह तथ्य पूरी तरह प्रमाणित है कि खाद्य फसलों के उपजाने वाले किसानों की अपेक्षा नकदी फसल उगाने वाले विदर्भ, तेलंगाना, कर्नाटक और केरल के किसानों ने ज्यादा आत्महत्याएँ की हैं।

 भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश में खाद्य फसलों की जगह कपास, फलों, फूलों, सब्जियों, औषधीय पौधों और जट्रोफा की खेती को बढ़ावा देना पहले से ही अनाजों के उत्पादन में आये ठहराव और खाद्य संकट को और भी ज्यादा गंभीर बना देना है।  ऐसा बहुसंख्यक जनता की जरूरतों और आवश्यकताओं की अपेक्षा शहरी मध्यवर्ग और बाहरी माँगों को तरजीह देने के कारण होता है।  ‘निर्यात समृद्धि लाता है’, जैसे भ्रमपूर्ण विचारों से मुक्त होकर घरेलू मांग और जरूरतों का भी खयाल रखा जाना चाहिए।  नहीं तो एक संकट का समाधान दूसरे बड़े संकट को जन्म दे सकता है।

 उत्सा पटनायक का मानना है कि उदारीकरण की नीतियाँ लागू होने के बाद भारत ही नहीं, अन्य विकासशील देशों का रूझान भी खाद्य फसलों की अपेक्षा निर्यात योग्य फसलों की ओर बढ़ा।  खाद्यान्न उपजायी जाने वाली जमीनों पर निर्यात योग्य फसलें उगायी जाने लगी।  इससे उन देशों के साथ वैश्विक स्तर पर भी खाने योग्य अनाजों की उपलब्धता में कमी आयी।  1980-85 में विश्व में प्रति व्यक्ति अनाज का उत्पादन 335 किलो ग्राम था।  जो 2000-05 में घटकर 310 कि.ग्रा. रह गया।  भारत और चीन का नब्बे के दशक तक पूरे विश्व में अनाज उत्पादन में 30 प्रतिशत का योगदान था।  इनके बदले रूझानों ने खाद्यान्न उत्पादन को विशेष रूप से प्रभावित किया। भारत, चीन, इंडोनेषिया, फिलीपीन्स, थाइलैण्ड, वियतनाम, इरान, मिस्र, पाकिस्तान, बांग्लादेष और श्रीलंका जैसे ग्यारह विकासषील देषों का विष्व अन्न उत्पादन में 40 प्रतिषत का योगदान रहा है। 1989-90 और 2003-04 के पन्द्रह वर्षांे के बीच प्रति वर्ष इनका अनाज उत्पादन 1.1 प्रतिशत की दर से बढ़ा जबकि जनसंख्या 2 प्रतिशत की दर से बढ़ रही थी।  पर ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि इस बीच इन देशों के निर्यात योग्य फसलों के उत्पादन में 10 गुना तेज वृद्धि हुई। स्पष्ट है कि इन देशों में जिन जमीनों और संसाधनों का उपयोग उस देश की जनता के खाद्यान्न उत्पादन के लिए होना चाहिए था, उसे विकसित देशों में निर्यात के लिए किया गया।

 साम्राज्यवादी देशों द्वारा प्रेरित भूमंडलीकरण की नीतियों ने एक ऐसी नवऔपनिवेशिक स्थिति निर्मित कर दी है जिसे देखकर औपनिवेशिक दिनों की याद ताजा हो जाती है। जिस तरह उपनिवेशों की उपजाऊ जमीन और संसाधनों से आकर्षित होकर विकसित देशों ने उन पर राजनीतिक और आर्थिक नियंत्रण प्राप्त किया था, आज बदले हुए स्वरूप में विश्वव्यापार की नीतियों के कारण उसी तरह का नियंत्रण पुनः कायम कर लिया है। जमीन, श्रम और संसाधन हमारे हैं लेकिन हम उनकी जरूरत की वस्तुएँ उत्पादित कर उनके दरवाजे तक पहुँचा रहंे हैं।  कल तक हम चाय, कॉफ़ी, चीनी और रूई का निर्यात करते थे पर आज हमारे देश में उपजाये गये फल, फूल और सब्जियाँ उनके दुकानों की शोभा बढ़ा रही हैं। उत्सा पटनायक के शब्दों में कहें तो ’’उपनिवेशीकृत भारत के किसान भूखों मरते थे, जबकि इंग्लैण्ड को गेहूँ का निर्यात किया जाता था और अब आधुनिक भारत के किसानों में भोजन की कमी हो गयी है, जबकि वे विदेशों के धनाढ्य उपभोक्ताओं के लिए खीरा और गुलाब पैदा कर रहें हैं।’’08

अंग्रेजी साम्राज्यवाद ने भारत के खाये जाने योग्य अनाजों को माल में तब्दील करके उसे निर्यात की वस्तु बना दिया था।  आज वही कार्य हमारे आजाद देश की सरकारें कर रहीं हैं। ‘‘1857 से 1900 के बीच, जो अकाल के सबसे बुरे साल थे, अनाज का निर्यात तीस लाख टन प्रति वर्ष से बढ़कर 1 करोड़ टन हो गया, जो पच्चीस लाख लोगों के साल भर के भोजन के बराबर था और ठीक उसी समय, मोटे तौर पर अनुमानित, एक करोड़ बीस लाख से दो करोड़ नब्बे लाख के बीच लोगों की मौत हुई। जैसा कि डेविस टिप्पणी करते हैं ’लन्दनवासी वास्तव में भारतीयों के मुँह की छीनी हुई रोटी खा रहे थे’ और एक अन्य प्रेक्षक को उद्वृत करते हुए वे लिखते हैं ’यह एक विसंगति है कि अपने यहाँ अकाल की मार झेल रहा  भारत दुनिया के अन्य हिस्सों में खाद्यान्न की आपूर्ति कर रहा था।’’09 हमारी चुनी सरकारों द्वारा अपनायी गयी निर्यातोन्मुखी नीतियों ने एक बार फिर हमें उन्नीसवीं सदी की उन्हीं औपनिवेशिक स्थितियों में ले जाकर पटक दिया है ।  क्या  सचमुच इतिहास  अपने को दुहराता है ?

संदर्भ:

  1. सोफिया मर्फी/‘कृषि क्षेत्र में मुक्त व्यापार: एक बुरा विचार जिसका वक्त पूरा हो चुका है’/विश्वव्यापी कृषि संकट’ (मंथली रिव्यू में प्रकाशित लेखों का संग्रह) गार्गी प्रकाशन/जनवरी-2010/पृ.
  2. एम.एस. स्वामीनाथन से आशा कृष्ण कुमार की बातचीत/’पश्चिम के पक्ष में झुकी हुई है विश्व व्यापार संगठन की व्यवस्थाएँ’/’सहमत मुक्तनाद’/वर्ष-02, अंक-10, 12/अक्टूबर-दिसम्बर, 2000/पृ. 8-9.
  3. सोफिया मर्फी/वही. पृ.
  4. पी. साईनाथ/किसानों की आत्महत्या क्यों ? / ’फिलहाल’/वर्ष-9/ अंकः 15-18/अगस्त-सितम्बर, 2008/ पृ. 30
  5. उत्सा पटनायक/’अन्तर्राष्ट्रीय बाजार और भारतीय किसान’/’सहमत मुक्तनाद’/वर्ष-01, अंक-04,/अपै्रल-मई, 1999/पृ.
  6. जाहिद खान/ (पश्चिम बंगाल) किसानों की समस्याओं पर कब संजीदा होगी सरकारें/ ’समकालीन जनमत’/मार्च, 2012/पृ.
  7. उत्सा पटनायक/से सुकुमार मुरलीधरन की बातचीत/’तबाही का रास्ता’/’सहमत मुक्तनाद’/वर्ष’2, अंक-10, 12/अक्टूबर-दिसम्बर 2000/पृ.
  8. उत्सा पटनायक/’भारत और विकासशील देशों में खाद्य संकट की शुरूआत’/विश्व खाद्य संकट (मंथली रिव्यू में प्रकाशित लेखों का संग्रह)/गार्गी प्रकाशन/जनवरी 2010/ पृ.
  9. फिलिप मैकमाइकल/विश्व खाद्य संकट: ऐतिहासिक संदर्भ/विश्व खाद्य संकट/वही पृ.

संपर्क: सियाराम शर्मा, 7/35, इस्पात नगर, रिसाली, भिलाई नगर, जिला-दुर्ग (छत्तीसगढ़), पिन कोड- 490006, मो0 – 9329511024 e-mail – prof.siyaramsharma@gmail.com   

सुबह वाकई बेनकाब थी उर्फ अंसारी जी: टीना नेगी 

बच्चों द्वारा अपने सपने खुद बुनने को प्रोत्साहन देने में देश-दुनिया के गिने-चुने लोग ही सक्रिय हैं. इन्हीं में एक संस्था है ‘अंकुर सोसायटी फाॅर आॅल्टरनेटिव्ज़ इन एजुकेशन.’ दिल्ली के इर्द-गिर्द मजदूर बस्तियों में शैक्षणिक केंद्र चलाने वाली इस संस्था से जुड़े लोगों को जब लगा कि इन समाजों के अनुभव और अनुभूतियां शब्दों की दुनिया में सीधे पहुंचनी चाहिए और अब तक कहानी में पात्र भर रहे चरित्र यदि स्वयं अपनी बात कहें तो बेहतर होगा. बस! एक नई सकारात्मक शुरुआत हो गई. इन लोगों ने अपने शैक्षणिक केंद्रों के बाल-किशोर भागीदारों को लिखने के लिए उत्साहित और प्रेरित किया समय-समय पर लेखकीय कार्यशालाएं आयोजित कीं. धीरे-धीरे नतीजे सामने आने लगे. ‘अंकुर’ की शर्मिला भगत और प्रभात कुमार झा के प्रयासों से ‘बहुरूपिया शहर’(राजकमल प्रकाशन 2007), यशोदा सिंह की किताब दस्तक’(वाणी प्रकाशन 2012) और ‘अकार’ का 2014 का विशेषांक पाठकों के सामने है. हंस को उदय शंकर के माध्यम से उनकी कुछ रचनाएं देखने को मिलीं. हम इन किशोरों के लेखन-कौशल पर चमत्कृत रह गए. रचनाजी, बलवंत कौर और विभासजी के साथ मिलकर यह तय हुआ कि ‘घुसपैठिये’ शीर्षक से देश भर में हाशिए पर पड़े समाजों में हो रहे युवा लेखन को हम पाठकों के सामने लाएं-बगैर किसी मुरौवत के. इसी क्रम में इस अंक में प्रस्तुत है टीना नेगी की कहानी ‘‘सुबह वाकई बेनकाब थी उर्फ अंसारी जी’’. # संजय सहाय, (संपादक, हंस )

यह स्तम्भ दिल्ली और आसपास की कामगार बस्तियों के तरुण-युवा लेखकों की प्रतिनिधि रचनाएं आप तक पहुंचाएगा. ये लेखक और इनका लेखन बने-बनाए खांचों में नहीं समाते. ‘घुसपैठिये’ स्तम्भ के लेखक अभी-अभी जवान हुए हैं या हो रहे हैं. एकाध को छोड़कर इसके सभी संभावित लेखकों की उम्र २0 वर्ष के अंदर ही है। लेकिन इन सब में कुछ सामान्य विशेषताएँ भी हैं. सभी की आर्थिक-सामाजिक पृष्ठभूमि लगभग समान हैं। इससे भी बड़ी विशेषता यह है कि इनके लिए बचपन की किताबें कागजों से उतनी नहीं बनती हैं जितनी उनके संघर्ष, मोहल्लों, माहौल और जगह से बनती हैं. उनकी लिखाई में वे जगहें आपको सुरक्षित मिलेंगी। आप शायद महसूस करें कि साहित्य के उत्पादक और उपभोक्ता, अभिलेखन/रिकाॅर्डिंग और सृजन, कि़स्सा और तथ्य के बीच के अंतर यहाँ धुंधले पड़ जाते हैं साहित्य के सुरक्षित-आरक्षित डिब्बे में घुस आये इन घुसपैठियों को आप कैसे बरतेंगे, यह आप ही को तय करना है. # घुसपैठिये स्तम्भ -परिचय 

दक्षिणपुरी की एक रसोई सौजन्य: अंकुर

दक्षिणपुरी की एक रसोई, सौजन्य: अंकुर

अंसारी जी

By टीना नेगी 

सुबह के साढ़े पाँच बजे, जब अँधेरा भूरा होने लगता है और सपाट आसमान में हल्के नीले बादल दरारें बनाकर उभरने लगते हैं तब अंसारी जी के मोहल्ले में सब कुछ रोज़ाना वाली एक-सी धुन में शुरू हो जाता है। घुर्र-घुर्र करती पानी की मोटरों से घरों की दीवारें और ज़मीन झन्नाटें लेने लगती हैं। चबूतरों पर पानी की बाल्टियाँ उड़ेल दी जाती हैं, नहीं तो पाइप से छूटती ताजे पानी की दूधिया धार सारा आँगन भिगोती हुई गली में उतर आती हैं और सींक वाली झाडुओं का ज़बरदस्त संगीत एक साथ नहीं तो एक के बाद एक सुनाई देने लगता। इस बीच अंसारी जी उबासियाँ लेते हुए अपने पुराने, जर्जर मकान की बालकनी पर खड़े होकर मोहल्ले भर को निहारते हैं।

‘या अल्लाह’ कहते हुए जब उनकी मोटी-मोटी अकड़ी हुई साँवली बाँहों से अंगड़ाई फूटती है तब पड़ोस की औरतों की नज़रें भी उस बालकनी की तरफ़ उठ जाती हैं। चेहरे पर घूँघट और दरवाज़े के पल्ले खींच लिए जाते हैं, शर्म और लिहाज़ की ये झलकियाँ दो जगह और दो माहौल को जैसे एक फ़ासला दे देती हैं। अंसारी जी अपनी मूंछों पर ताव देते हुए एक अजीब अभिमान के साथ हँसते हैं, जैसे उनका कोई छोड़ा हुआ तीर बिल्कुल सटीक निशाने पर लग गया हो। कमर पर चेकदार सूती धोती, कुछ-कुछ लंगोट की तरह बाँध लेते हैं और अर्द्धनग्न सी अवस्था में अपने बेडौल शरीर के साथ वहीं बालकनी पर झुक जाते हैं। कमरे में रखे रेडियो के बजने की आवाज़ आती है। सत्तर के दशक के गाने तेज़ आवाज़ में बजने लगते हैं। आसपास को जबरन जागने पर मजबूर करता हुआ यह शोर अक्सर पड़ोसियों से झगड़े की वजह बनता है पर हफ्ते दस दिन बाद रेडियो फिर से बजने लगता है और अंसारी जी का गला भी, जो सातो सुर लगाकर गाने की कोशिश करता है। औरतें घूँघट की आड़ से बड़बड़ाती हैं, कनखियों से देखकर ताने देती हैं, मर्द जात से कौन बोले, सोचकर मुँह नहीं लगाती।

अंसारी जी की साइकिल के स्टैण्ड से उतरने की आवाज़ आती है और बेटी मासूमा चिल्लाती है, ‘अब्बूजान हमारे लिए अख़बार लेते आना!’ तब अंसारी जी के दफ़्तर जाने का पैग़ाम मिल जाता है। घंटे भर में पड़ोसन  शबनम बेगम को घेरते हुए कहती हैं, ‘समझाती क्यों नहीं अपने मियां को! सुबह-सुबह सबकी नींद हराम करता है।’ इस बात पर उनकी आपस में झड़प हो जाती है। शबनम बेगम सौ बराबर एक का काम करती हैं। अंसारी जी की हर मुमकिन हिमायत लेती हैं फिर चाहे हफ्ते भर सहेलियाँ पास न बुलाएँ पर शौहर से बढ़कर कुछ नहीं समझती हैं।

सत्रह गज ज़मीन पर खड़ी एक खोकेनुमा दुकान के उपर बने उनके दुमंजिला मकान की कुछ यही तस्वीर और कहानी रही है। अंसारी जी के घर की खिड़कियों और दरवाज़ों से धूप और हवा के अलावा शायद ही कोई बेरोक-टोक सफ़र करता है।

‘सरकारी नौकर हैं’ कहकर ख़ुद को देश की सेवा में लगा बताते हैं और अंसारी जी पाँच बजे तक की ड्यूटी पूरी लगन से निपटाकर दो बजे ही लौट आते हैं। उसके बाद दोपहर घर में और शाम गली में गुज़रती है। वही सत्तर के दशक के गाने रेडियो में गूँज पड़ते हैं। घर के आगे चारपाई डालते हैं और हाथ में चाय का कप लिए वहीं बैठ जाते हैं। आदमियों से कम ही बोलचाल रखते हैं पर हर गुज़रती महिला से दुआ-सलाम जरूर करते हैं। उम्र में जिनसे छोटे हैं और रिश्ते में जिनके भाईजान, उनसे तो हँसी-ठिठोली भी खूब होती है, जैसे सामने वाले घर में रहने वाली मधु बहन, इनसे मज़ाक करने को अंसारी जी की आदत कहें, या शौक, या उनके मिज़ाज़ का ही हिस्सा। जब तक मधु को मधुबाला कहते हुए उससे एक गिलास ठंडा पानी नहीं माँगते तब तक अंसारी जी का दिन नहीं बनता। शबनम बेगम ऊपर से अंसारी जी की हर आवाज़ पर कान जमाए रखती है। कभी चाय तो कभी पकौड़े के बहाने अपने मियाँ को घर की चैखट की तरफ़ खींचती रहती हैं। मन में खटका-सा लगा रहता है क्योंकि अपने शौहर के मिजाज वह जानती है।

नहाने के बाद गीले बदन ही अंसारी जी शाम को दोबारा घर के बाहर चारपाई पर जम जाते हैं। चारपाई का सिरहाना मधु के घर की चैखट के ठीक सामने लगाते हैं। फिर शरीर की मांसपेशियाँ तानकर कुछ इतने ज़ोर से अंगड़ाई लेते हैं कि गुद्दी पर टिकी पानी की बूंदें कमर पर फिसलने लगती हैं। चारपाई की रस्सियाँ चटख कर कर्र-सा शोर करती हैं। आसपास खेलते बच्चे अपना ठिकाना कुछ दूर जमा लेते हैं। शाम के उस माहौल में अजीब-सी गर्माहट भर आती है। अंसारी जी चारपाई पर लेट कर मस्ताने अंदाज़ में गीत गुनगुनाने लगते हैं, ‘जिंदगी एक सफर है सुहाना, यहाँ कल क्या हो किसने है जाना…’ या फिर ‘ये दिल तुम बिन कहीं लगता नहीं, अब क्या करें…’। अंसारी जी की आँखें चारों तरफ़ कुछ ऐसे घूमती हैं जैसे माहौल से कुछ छाँट या बीन रही हांे। कुछ ऐसा ढूंढ़ रहीं हों जिसे टिक कर निहारा जा सके, जिससे बतियाया जा सके।

बेटी मासूमा जब अब्बूजान को गली में गाता हुआ सुनती है तो घर में बजता रेडियो बंद कर देती है और फरमाती है ‘अब्बूजान आप ख़ुद ही गा लीजिए! अच्छा गाते हैं’ कहकर वो अपनी पोथी-पुस्तकों में उलझ जाती है। अब्बू जो हर दिन उसे अख़बार लाकर देते हैं, उन अख़बारों से उसकी अलमारी का नीचे वाला ख़ाना भर चुका है। वह अख़बार को ज़्यादा नहीं पढ़ती, बस उसके तीसरे पन्ने पर आने वाले कैरियर विकल्प पढ़ती है और डायरी में एक फेहरिश्त बनाती जाती है कि बड़ी होकर क्या बनेगी! इससे भी उब जाती है तो सारे अख़बार निकालकर हीरो-हीरोइन की फ़ोटो की कटिंग शुरू कर देती है पर ऐसा वह सिर्फ़ तब करती है जब अब्बूजान घर पर नहीं होते। इसलिए अब्बूजान सिर्फ़ उसकी उस फेहरिश्त के बारे में ही जानते हैं जिसे रात को उनके कंधों पर लटक कर वो दिखाती है और बताती है- ‘‘देखिए, अब्बूजान! हमने डायटीशियन के कोर्स के बारे में पढ़ा है। हमें तो यही कराइयेगा!’’ अब्बूजान भी मासूमा की नर्म हथेलियाँ थाम कर बड़े प्यार से ‘हाँ’ में सिर हिला देते। उनकी चुप्पी और मुस्कुराहट उन हज़ार सपनों की गवाही देती है जो वह मासूमा के लिए देखते हैं। उनके लाए अख़बारों का सही इस्तेमाल मासूमा ही जानती है, ऐसा वह सोचते तो फ़क्र से फूल जाते हैं।

एक रोज़ सर्द शाम को जब गली हल्की धुंध में ढकी हुई थी। सभी मकानों के बंद दरवाज़ें, खिड़कियों पर डाले परदे अपना उजाला अपने में ही समेट कर बैठे थे। गली का शोर भी जैसे शांत होकर उस शाम सिकुड़ गया था। कई चबूतरों पर शाम की दावत की तैयारी चल रही थी। इन चूल्हों और तसलों से उठता धुंआ कोहरे में घुल-मिलकर शाम को और धुंधला बना रहा था। अंसारी जी भी अपने कमरे की हीटर वाली गर्माहट को अलविदा कहकर बाहर निकले। हाथ में चाय का कप था पर होठों पर कोई गीत नहीं। इस ठंडी शाम भी उनके बदन पर सिर्फ़ एक धोती थी और गीले बालों में पानी की बूँदें मोती की तरह चमक रही थीं। सीढ़ी से उतरते ही उन्होंने चारपाई को हाथ से गिराकर घर के सामने बिछा दिया और हमेशा की तरह उस पर तनकर बैठ गए। आँखों ने मधु के घर के दरवाज़े की तरफ़ देखा जो कि बंद था। दरवाज़े के पीछे वाला परदा भी चैखट पर सरका हुआ था। अंसारी जी दरवाज़े की झिर्री से भी अंधेरे के सिवा कुछ और नहीं टटोल पा रहे थे। ऊपर शबनम बेगम भी चूल्हे-चैके में जुटी हुई थी। मासूमा अम्मी का हाथ बँटाते हुए तरकारी काट रही थी। अब्बूजान ने कहा था कि अगर मासूमा तरकारी काटना सीख जाएगी तब इस ईद पर उसे शरारा दिलायेंगे। नीचे खामोश बैठे अंसारी जी की नज़रें मधु को ढूंढ़ रही थीं। कान उस सन्नाटे से जैसे चिढ़ बैठे थे और कहीं से आती चूडि़यों की खनक पर गर्दन तुरंत घूम जाती थी। यहाँ शबनम बेगम का सारा ध्यान अंसारी जी पर सिमटा हुआ था। उनकी आवाज़ उसे नीचे के माहौल का अंदाज़ा देती थी पर आज वह भी नहीं सुन पायी थी। मधु के घर का बंद दरवाज़ा देखकर अंसारी जी की बेताबी बढ़ती जा रही थी। जाड़े की ठंड में भी माथा पसीने से गीला था कि अचानक चारपाई से उठकर सीढि़याँ चढ़ते हुए उन्होंने करारी आवाज़ में पुकारा, ‘शब्बो ज़रा टांड से तसला उतार, मैं आता हूँ! इस जाड़े का कुछ तो इंतज़ाम करना ही पड़ेगा!’ शबनम बेगम ने आवाज़ सुनते ही चूल्हा बुझा दिया और स्टूल को टांड की तरफ़ खिसका दिया और फट से चढ़कर तसला उतार लाई। जब तक अंसारी जी ऊपर आए वह उनके लिए तसला लेकर तैयार खड़ी थी। अंसारी जी ने बिना किसी भाव के अपनी शब्बो की तरफ़ देखा, तसला और चैखट के पास रखा कोयले का कट्टा लेकर नीचे उतरने लगे। जाते-जाते आले में से माचिस भी उठा ली। पीछे से मासूमा ने पुकारा, ‘अब्बू देखिए हम तरकारी काटना सीख गए’। मासूमा की खनखनाती आवाज से ही मानो अंसारी जी के चेहरे पर बसंत खिल आता हो, वे मुस्कुराते हुए पलटे और बोले, ‘हाँ तो ठीक है, अब हम अपनी मासूमा के लिए शरारा भी ला सकते हैं और अच्छा शौहर भी!’ कहते हुए वे अपने सामान के साथ नीचे उतर गए। मासूमा शरारा सुनकर बेहद खुश हो गई, इसलिए चाकू-तरकारी छोड़ अम्मी की तरफ़ घूमी और बोली, ‘अम्मी, अब्बू अच्छा शौहर कहाँ से लायेंगे? ये अच्छा शौहर क्या होता है?’

शबनम बेगम की निग़ाहें अब तक सीढ़ी पर टिकी हुई थी और अंसारी जी की उन आंखों को याद कर रही थी जो उससे कुछ नहीं कहती थीं, कुछ नहीं सुनाती थीं, बस कायदे पढ़ाना जानती थीं। जब मासूमा की ‘अच्छे शौहर’ वाली बात पर शबनम का ध्यान गया तो लगा, क्या बेहुदा सवाल पूछ रही है ! ऐसी कोई चीज़ तो आज तक शब्बो को मिली ही नहीं। वह मासूमा पर झल्ला पड़ी और बोली, ‘नहीं मिलेगा अच्छा शौहर! क्योंकि तुम्हारे अब्बू उसे पहचानते ही नहीं है इसलिए तुम सिर्फ़ तरकारी काटो, तुम्हें ही अच्छी बेगम बनना पड़ेगा।’ कहकर शबनम फिर से चूल्हा जलाने लगी, पर अंदर से जैसे भभक उठी थी।

नीचे अंसारी जी तसले में आग जलाने में जुटे हुए थे। तसले में मुट्ठी भर-भर के कोयले झोंकते जा रहे थे, फिर मिट्टी का तेल छिड़ककर माचिस की तीली से आग सुलगा दी। पहले काला धुंआ उनके घर के आगे मंडराता रहा फिर आग की लपटें ऊँची और ऊँची होने लगीं। आग की उस रोशनी में अंसारी जी के चेहरे का तमतमाता हुआ तेज़ गुस्सा साफ़ नज़र आ रहा था। वे शांत, एकदम खामोश उस जलती हुई आग को देख रहे थे। कोहनियाँ घुटनों पर टिकाए हुए दोनों हाथों की उंगलियाँ एक-दूसरे में फँसाए बैठे थे। दाहिने कान में डली सोने की बाली भी चमक रही थी। तसला चारपाई से नीचे लटकते पैरों के पास रखा था, जिसे बार-बार पैर मार कर घुमा देते। दूर पनवाड़ी की दुकान के पास खेलते बच्चे ऐसा करते हुए अंसारी जी को ग़ौर से देख रहे थे।

गली के लगभग सभी चूल्हे बुझ चुके थे, औरतों ने रोटी पकाकर चूल्हों को अंदर कर लिए थे और किवाड़ लगा सभी अपने घरों में घुस गए थे। पर यहाँ अंसारी जी का मकान गली के एक चैथाई हिस्से में रोशनी बिखेर रहा था। ऊपरी मंजिल से बल्ब की पीली रोशनी बाहर फैल रही थी जो शबनम बेगम ने अंसारी जी के इंतज़ार में जलाई थी और नीचे जलती हुई आग का उजाला था जो सीधे मधु के घर को रोशन कर रहा था।

अचानक सामने वाले घर की चैखट का परदा हटा, कुंड़ी खोलने की आवाज़ आई और किसी ने एक झटके से दरवाज़ा खोल दिया। अंसारी जी की आँखें कुछ ऐसी बेसब्री से उठी जैसे कोई कबूतर फड़फड़ाकर अचानक किसी दूसरी जगह आ बैठा हो। उस रोशनी में अंसारी जी ने मधु के चबूतरे पर आकार लेती एक बड़ी सी नवयौवना काली परछाई देखी। परछाई, जो पास आते-आते और बड़ी, और बड़ी होने लगी। उन्होंने नज़र उठाकर सामने देखा तो मधु नई नवेली दुल्हन की तरह सजी-सँवरी सामने खड़ी थी। भारी कढ़ाई वाली साड़ी मानो कहर बरपा रही हो, और मेकअप से चमचमाते सफेद चेहरे पर जैसे धूप खिली हो। चमेली के सफेद फूलों वाला गजरा जूड़े में सजा हुआ और गुलाबी होंठ आज और सूर्ख होकर मुस्कुरा रहे थे। अंसारी जी जैसे सच में किसी खूबसूरत ख़्वाब को जी रहे थे। उनके आसपास का उजाला और ज़्यादा रोशन हो गया था। ठंड से ठिठुरते बदन में एक गुनगुना-सा अहसास भर गया था कि तभी घुँघट माथे पर सरका कर मधु ने अंसारी जी की तरफ़ देखा; इस देखने में एक ऐसी जल्दबाजी थी कि उसमें अंसारी जी का हाल-चाल लेने का या कुछ पूछने का कोई भाव नहीं था। मधु ने घूमकर अपने घर का दरवाज़ा बंद कर दिया, ताले में खटाखट चाबी घुमा दी और पलटकर अंसारी जी की तरफ़ चाबी का गुच्छा उछालते हुए बोली, ‘ज़रा ये शब्बो भाभी को दे दीजिएगा। हम घूमने जा रहे हैं। बाहर वे मेरा इंतज़ार करते होंगे!’ उसके लफ़्ज जिस तेज़ी से गूँजकर गुम हुए, उतनी ही तेजी से पायल की झनकार छोड़ते उसके कदम गली से बाहर हो लिए।

अंसारी जी की आँखें गली की आखिरी छोर तक मधु को निहारती रहीं। पायल की छन-छन में कान अब भी खोए हुए थे, लगता था कि वह मूरत अब भी सामने चबूतरे पर खड़ी है। ऊँची उठती आग की लपटों में यह आसानी से पढ़ा जा सकता था। उनकी आँखें की चैंधियाहट ऐसी थी कि कल्पना और काश के आसमान से उतरना आसान नहीं था। इस उजाले में वास्तविक जीवन का सादा चेहरा कहीं कोसो दूर खड़ा नज़र आता है, फिर उस चेहरे से मासूमा और शबनम दिखाई भी पड़ जाए तो भी कान उनकी पुकार को नकार देते।

उस रात ऊपरी मंजिल पर बल्व की पीली रोशनी यूं ही कायम रही। शब्बो न तो अपने मियाँ को ऊपर बुलाने के लिए पुकार पाई न मासूमा के उस सवाल का, कि ‘अच्छा शौहर क्या होता है’, कोई वाजि़ब जवाब दे पाई। रात भर ज़हन में तरह-तरह के सवाल कुलमुलाते रहे। करवटों के खेल में आसमान फिर से नीला हो गया।

गली में फूल-माला बेचने वालों, अख़बार वालों का आना शुरू हो गया था। चबूतरों पर फिर से चूल्हे जल उठे थे। अंसारी जी की बेढब काया सुबह चारपाई पर पड़ी खर्राटे ले रही थी। मिट्टी के लाल तवे पर रोटी थपक कर डालते हुए औरतें कनखियों से चारपाई पर पसरे हुए अंसारी जी पर भी एक नज़र डाल देतीं, और आपस में इशारे करते हुए फुसफुसाने लगतीं। कई बार हँसी के सुरीले ठहाके भी उस ओर से सुनाई दे जाते – ‘आज क्या हुआ शब्बो के मियां को! लगता है शब्बो ने रात घर में घुसने नहीं दिया।’ कहकर सारी की सारी गर्दन उठाकर ऊपर शब्बों की बालकनी की तरफ़ देखने लगीं। उस सुबह मासूमा को किसी ने अख़बार लाने का वादा नहीं किया।

खैर, सूरज चढ़ा और मक्खियों ने अंसारी जी के कानों पर भिन्न-भिन्न का शोर किया और तब एक झटके से ‘या अल्लाह’ की पुकार के साथ अंसारी जी ने ख़ुद को चारपाई से परे धकेल दिया। उनके इस तरह अचानक उठने से चारपाई जैसे हैरान थी। उसकी रस्सियाँ काफ़ी देर तक चरमराते हुए झूलती रही। कंचे खेलने के लिए जमीन में पिल ढूंढ़ते बच्चे भी इस आवाज़ से दंग रह गए। हैरान-परेशान सा वह लम्हा अंसारी जी के नींद भरे चेहरे पर केन्द्रित हो गया- सूजी हुई आँखें… मूंछों पर ताव नहीं… चिपचिपाहट से भरा चेहरा, बाल बिखरे हुए और धोती पर हज़ार सिलवटें। उबासियाँ मानो पूरे चेहरे की त्वचा को हिला रही थीं। इस सज्जन पुरुष को कभी किसी ने ऐसे नहीं देखा था। आज की सुबह वाकई बेनकाब थी।

उस सुबह की चर्चा महीनों गली में चलती रही। अंसारी जी इस अजीब हादसे से, जो जाने कैसे उनके साथ हो गया था, परेशान होकर शब्बो से झगडते रहे। शब्बो को भी कई दिन अपनी सहेलियों का मज़ाक झेलना पड़ा। कई शाम घर के आगे चारपाई नहीं बिछी। रेडियों में गाने नहीं बजे। सुबह पांच बजे ‘या अल्लाह’ की अज़ान सुनाई दी पर उस बालकनी पर कोई भी खड़ा नज़र नहीं आया ताकि उसकी निगाहों से झिझक कर मुँह फेरना पड़े। इस दौरान अंसारी जी मासूमा को ज़्यादा वक़्त देने लगे। रात को वह अब्बू की गोद में लेटकर शेखचिल्ली के किस्से सुनती। अब सुबह में अब्बू उसे कुरान पढ़कर सुनाते और कई खेलों में मासूमा के जोड़ीदार बनते। अंसारी जी मासूमा के लिए अब किसी फि़ल्म के नायक से कम नहीं थे। उसके अब्बू जैसा कोई नहीं, ये बात उसने अपनी हर सखी-सहेली को रटवा दी थी। शब्बो बेगम बाप-बेटी के इस रिश्ते को हर पहलू से देख रही थी। मासूमा कब तक खुश रह पायेगी इस बात से वे परेशान रहती, पर उसके मियाँ इसी बहाने घर के भीतर को जीने लगे हैं, यह अहसास उसे सुकून पहुँचाने के लिए काफी था।

उस दिन घर मासूमा की किलकारियों से गूँज रहा था। अंसारी जी ने शेखचिल्ली का कोई मज़ेदार किस्सा खत्म किया था। उनके घुटनों पर बैठकर झूलती मासूमा उस किस्से पर अब तक हँस रही थी। जब अंसारी जी मासूमा को झुलाते हुए ऊपर की तरफ़ ऊँचा उठा देते तब वह और तेज़ी से चिल्ला कर हँसती। अंसारी जी भी मासूमा की इस अदा पर ठहाका लगाने लगते। बाहर बरामदे में शब्बो, मासूमा को नहाने के लिए पुकार रही थी पर अब्बू के आगे अम्मी को कौन सुने! सुबह की चाय के बाद दोनों अपनी मस्ती में खो गए थे। शुरूआत मासूमा ने अपनी डायरी खोल कर की थी फिर अख़बारों का पुलिंदा अब्बू के आगे बिखेर दिया था। उसके बाद मासूमा की फरमाइश पर अब्बू कहानी सुनाने लगे थे। शब्बो ने बीच में अपनी मौजूदगी छेड़ते हुए कहा भी था कि दोपहर में कहानी नहीं सुनाते, कोई रास्ता भटक जाएगा, पर बाप-बेटी के उस रिश्ते में शब्बो के दाखिल होने की कोई जगह नहीं थी। अब दोनों झूलने और झुलाने में मगन हो गए थे कि अचानक मासूमा अब्बू के पैरों से उतरकर उनकी पीठ से चिपक गई। अब्बू की गर्दन को उसने अपनी दोनों बाँहों के घेरे में लेकर मुँह को उनके कान के करीब ले जाकर धीरे से बोली, ‘अब्बूजान आज सात समंदर पार वाला गीत हो जाए, बहुत दिन हो गए!’ अंसारी जी ने खरखरा कर गला साफ़ किया और फिर राम जी के तोते की तरह शुरू हो गए- ‘सात समंदर पार से गुडि़यों के बाज़ार से…’ तभी मासूमा बोली, ‘पापा जल्दी आ जाना, एक सुंदर सी गुडि़या लाना..’ फिर दोनों साथ में गाते रहे।

मासूमा के चेहरे पर खुशी बिना अपना रूख बदले उसी तरह कायम थी। अंसारी जी की आँखें बंद, चेहरा स्थिर सा और होंठ अपनी धुन में गाए जा रहा था। शब्बो उनकी आवाज़ में असीम सुख की कल्पनाएँ संजो रही थी। वह बाप-बेटी के इस रिश्ते के दरम्यान नहीं बल्कि दरकिनार हो दूर खड़ी थी, फिर भी इसे दूर से दर्शक की तरह ही देखने और महसूस करने का जो लुत्फ़ था वह उसके लिए किसी जन्नत से कम नहीं था; अंसारी जी की शखि़्सयत में अपने शौहर को तलाशती हुई मानो मासूमा के अब्बूजान से टकरा गई हो और इस टकराने वाले लम्हें को अब वह ताउम्र जीना चाह रही हो।

तभी मासूमा अब्बू की पीठ से उतर गई। अंसारी जी थोड़ी रौबदार आवाज़ में बोले, ‘जाओ मासूमा अब ज़रा एक गिलास पानी लेकर आओ!’ मासूमा दौड़कर पानी ले आई। अंसारी जी गटागट पानी गले से उतार गए। पानी पीने के बाद अब्बू की भीगी मूंछों को देखकर मासूमा हँस पड़ी। अंसारी जी बोले, ‘हमारी मासूमा तो हमारी हर बात मानती है, अब तो शरारा दिलाना ही पड़ेगा, है ना!’ मासूमा ने झट से हाँ में गर्दन हिला दी। अगले ही पल सवाल दागा, ‘शरारा आप कहाँ से लायेंगे अब्बू?’ अब्बू हँसकर बोले, ‘अरे कहाँ से लायेंगे कि क्या बात है पगली, चांदनी चैक ले चलेंगे तुम्हें, जो पसंद आए वह ले लेना!’ सुनकर मासूमा शांत हो गई। कुछ पल अंसारी जी के चेहरे को देखती रही। अंसारी जी का ध्यान अब उस पर से हट गया था। वे अख़बार पर निगाहें जमा कर बैठ गए थे। उनकी आँखें अखबार की लिखावट पर तैर रही थी। उनके धीरे-धीरे हिलते होंठो को देखकर मासूमा समझ गई कि वे अख़बार पढ़ रहे हैं पर फिर भी उसके बेचैन दिल ने उसे उकसाया और वह बोल पड़ी, ‘अब्बू शरारा तो ठीक है पर आप हमारे लिए अच्छा शौहर भी लाने वाले थे!’ ये सुनते ही अंसारी जी ने हैरतभरी आँखों से मासूमा को देखा। मासूमा के गंभीर चेहरे पर हँसी का नामोनिशान नहीं था। वह अपने जवाब के इंतज़ार में अब्बू की ओर ताक रही थी। मायूस सी मासूमा के मुँह से इतना बड़ा सवाल सुनकर वह खुद को हँसने से रोक न सके। अख़बार को छोड़कर ज़ोर से हंस पड़े। उनका मोटा पेट हँसी के ठहाकों से काफी देर हिलता रहा। आँखें चमक उठीं। चेहरा तरोताज़ा हो गया। अपनी हँसी को विराम और गले को आराम देकर उन्होंने कुछ दम भरते हुए कहा, ‘हाँ, हाँ, ज़रूर! क्यों नहीं! अच्छा शौहर भी ले आयेंगे हम!’ सुनकर मासूमा ने अगला सवाल किया, ‘पर अब्बू, पहले बताइये कि अच्छा शौहर होता क्या है?’ मासूमा की आँखों में जिज्ञासा साफ़ नज़र आ रही थी। अब्बू ने उसकी कलाई पकड़कर पास खिसकाते हुए उसे बोले, ‘अच्छा शौहर वह होता है जो हमारी मासूमा को बेइंतहा मोहब्बत करे। उसकी सारी ख्वाहिशें पूरी करे। उसका अपने से भी ज़्यादा ध्यान रखे और हमेशा उसे खुश रखे।’ जवाब सुनकर खामोश मासूमा जैसे अब्बू की आँखों में कुछ टटोलने लगी पर अंसारी जी तो इस बेहद सच्चे जवाब के साथ ख़ुद को ख़ाली कर चुके थे। ज्ञान और धर्म की कोई अनमोल बात किसी को बताते हुए जैसा आनंद कोई गुरू महसूस करता है कुछ वैसे ही फक्र का अहसास अंसारी जी के चेहरे पर नज़र आ रहा था। मासूमा एकटक अपने अब्बू की आँखों में झाँक रही थी कि तभी उसने फिर से अब्बू को पुकारा और कहा, ‘अब्बूजान क्या आप भी एक अच्छे शौहर हैं?’ सवाल सुनकर अंसारी जी के मुँह से निकलने वाली ‘हाँ’ अंदर ही कहीं घुट कर रह गई और स्तब्ध से मासूमा को देखते रहे। चाहकर भी अपना जवाब बुनने के लिए शब्द नहीं खोज पाए। मासूमा ने बेसब्री दिखाते हुए उनकी बाँह झिंझोड़ कर पुकारा, ‘बताइए न अब्बू, आपके जैसा ही होता है न अच्छा शौहर?’ अंसारी जी के हाथों से मासूमा की कलाई छूट गई। शब्बो ने बाहर से पुकारा, ‘मासूमा, आज नहाना नहीं है क्या या अंदर बातें ही बनाती रहोगी?’ मासूमा अब्बू को खामोश पाकर सब्र खो बैठी और उठकर तौलिया ढूँढ़ने लगी। अंसारी जी भी हाथ में अख़बार उठाकर बैठ गए पर इस बार उनकी नज़रें अख़बार की लिखावट पर ही टिकी रहीं, तैर नहीं पाईं!

टीना नेगी

टीना नेगी

 ‘अंकुर-कलेक्टिव’ की नियमित रियाजकर्ता। 2011 में लाहौर में आयोजित बाल-साहित्य-सम्मेलन में अंकुर की तरफ से बाल-लेखकों के साथ किस्सागोई की प्रस्तुती। उनके लेखन के कुछ टुकड़े ‘फर्स्ट सिटी’ और ‘अकार’ में प्रकाशित। संपर्कः एल-259, सेक्टर- 5, दक्षिणपुरी, डाॅ. अम्बेदकर नगर, नई दिल्ली-110062

साभार: हंस, जनवरी, 2015 

भीष्म साहनी की कहानी-(अ)कला: संजीव कुमार

हिंदी कहानी के आन्दोलन ने जहाँ एक और पुरानी जड़ता को तोड़कर नयी ज़मीन तैयार की, वहीँ उसमें कभी मूर्खतापूर्ण और कभी षड्यंत्रपूर्ण चयनवाद भी उभरा. हिंदी के कई महत्वपूर्ण कहानी लेखक इस चयनवाद के शिकार हुए. ऐसे आन्दोलनों के शिकार भीष्म साहनी  भी हुए. यह चयनवादी आलोचना उनकी भी थी जो अपने को प्रगतिशील और जनवादी सिद्ध करने के लिए कुछ भी कर रहे थे.  इस चयनवाद के शिकार भीष्म साहनी जी अकेले नहीं हुए. कई दूसरे महत्वपूर्ण हिंदी कथा लेखक और कवि या तो पीढ़ियों के अंतराल के नाम पर आधुनिक न रहे या फिर उनके सामाजिक संघर्ष को क्रांतिकारी  तत्त्वों में शामिल न किया गया. यह अवश्य ही दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थिति थी जिसके विरुद्ध आज भी संघर्ष करने की आवश्यकता बनी हुयी है. खासकर तब; जबकि क्रांतिकारिता की व्याख्या सामाजिक परिवर्तन के दूसरे छोर पर जा रही है…. फिट्गेराल्ड ने कभी कहा था, ‘मैं अपने समकालीनों के साथ नहीं होना चाहता, क्योंकि मेरी नियति भविष्य के कूड़ेदान में नहीं होगी.’ भीष्म साहनी अपने समय के साथ हो सकते हैं, अपने समकालीन लेखकों के साथ नहीं…. ऐसा नहीं है कि भीष्म साहनी जी अपनी कहानियों के कलात्मक रूपगठन के प्रति असचेष्ट हों. वे इस दिशा में यशपाल की उस शैली का थोड़ा अभ्यास किया मालूम पड़ते हैं जो प्रतिमुखता का एक नाटकीय चरम बिंदु पूरे घटनाक्रम के भीतर से खड़ा कर लेती है और हमें अभिभूत करती है… आधुनिकतावादी लेखकों ने कथानक को प्रायः व्यर्थ बना दिया है. हिंदी में प्रेमचंद-यशपाल से लेकर भीष्म साहनी और अमरकांत-रेणु ने उनकी पुनः प्रतिष्ठा के लिए संघर्ष किया है. भीष्म जी की तमाम कहानियों की रूप-रचना में एक कथानक होता है, एक भरी-पूरी कहानी होती है, जिसमें अकेला चरित्र अपनी भीतरी परिस्थितियों में कम होता है. एक पूरा व्यापाररत समुदाय उनके साथ दिखता है. ..कहानीपन की रक्षा का संघर्ष कहानी की रचनात्मक पहचान के लिए आवश्यक हो गया है. आज की अधिकांश कहानियों में हलचल तो बहुत होती है, पर अंतर्वस्तु में एक रिक्तता-सी लगती है.  # सुरेन्द्र चौधरी (‘हिंदी कहानी : रचना  और परिस्थिति ‘ में संकलित  ‘भीष्म  साहनी : नए  राष्ट्रीय बोध के अन्वेषक ‘ लेख से )  

फोटो- त्रिभुवन तिवारी, आउटलुक से साभार

फोटो- त्रिभुवन तिवारी, आउटलुक से साभार

   

By संजीव कुमार

यह थोड़ा अजीब तो है, पर क्या करें, कि कहानीकार भीष्म साहनी के बारे में सोचते हुए बरबस ‘मोहन जोशी हाजि़र हों’ और ‘तमस’ वाले अभिनेता भीष्म साहनी याद आ जाते हैं। दोनों जगह उनका किरदार ऐसा था जिसमें आविष्ट नाटकीयता वाले क्षणों की पर्याप्त गुंजाइश थी, पर भीष्म जी के अभिनय ने उन क्षणों को असाधारण तरीक़े से उभारने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखायी। उसे किसी चिह्नित की जाने योग्य नाटकीयता के हवालेे नहीं किया। बस, जीवन के सहज प्रवाह का थोड़ा असहज हो जाना ही चिह्नित हो पाया। लगा, हम सामान्य दिनचर्या में आए हुए कुछ व्यतिक्रमों से रू-ब-रू हैं, उन व्यतिक्रमों के प्रति अतिरिक्त रूप से संवेदनशील बनानेवाली अभिनय-कला से नहीं। मानो हम बिना किसी नाटकीयता के प्रत्यक्ष जीवन की सादगी का साक्षात्कार कर रहे हों, उस जीवन की कलात्मक पुनर्रचना का नहीं।

कहानीकार भीष्म साहनी भी ऐसे ही हैं। उनकी कहानियां कथा-स्थितियों और पाठक के बीच किसी कहानीकार की मध्यस्थता का अहसास नहीं होने देतीं। बेहद सीधे-सादे तरीक़े से वे कहानी कहते चले जाते हैं। कहीं कोई चमकता हुआ वाक्य नहीं, कोई ऐसी साहित्यिक हिकमत नहीं जिसे देखकर आप ‘वाह’ कह उठें, कहीं किसी प्रसंग को थम-ठहर कर अलग से उभारने का जतन नहीं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल होते तो शायद कहते कि इन्हें जीवन के मार्मिक स्थलों की पहचान नहीं है, इसलिए उन जगहों पर ठहर कर धैर्य से रमते नहीं हैं। पर मार्मिक स्थलों की पहचान का यह सूत्र तुलसीदास पर, या पुरानी/प्रचलित कथा को उपजीव्य बनानेवाले किसी भी रचनाकार पर तो लागू हो सकता है, भीष्म जी पर लागू नहीं हो सकता। तुलसी के पास कथा पहले से थी, विमर्श और वक्रता ही अपनी थी। उन्हेें एक पूर्वप्रचलित कथा में धैर्यपूर्ण ट्रीटमेंट की मांग करनेवाले मार्मिक स्थलों की पहचान करनी थी। भीष्म जी के पास कथा – यानी घटनाओं का कंकाल – और विमर्श, दोनों अपना है। उन्हें किसी पहले की कथा में ख़ास अपनी वक्रता पैदा नहीं करनी है। उनका कौशल उपजीव्य कथा की घटना-शृंखला में मार्मिक स्थलों की पहचान कर उसका सधे हाथों से ट्रीटमेंट करने में नहीं, स्वयं ऐसे स्थलों की कल्पना-उद्भावना करने में निहित है – ऐसी कथा-स्थितियों की उद्भावना जहां पात्र और परिस्थितियों के घात-प्रतिघात से जीवन का कोई मार्मिक पक्ष, कोई दबा हुआ आशय, कोई पहचाना किंतु अनपहचाना-सा सत्य बेसाख़्ता उभर आये।… और इस काम में भीष्म साहनी माहिर हैं। शायद इसी महारत केे चलते उनमें सीधेे-सादे ढंग से कहानी कह जानेे का दुर्लभ-सा आत्मविष्वास है।

भीष्म जी की इस विशेषता को नामवर सिंह ने अचूक ढंग सेे पहचाना था। ‘कहानी नयी कहानी’ में कहानी की संरचना को लेकर जगह-जगह अनेक सूत्र देते हुए जिस सूत्र के उदाहरण के रूप में उन्होंने भीष्म साहनी का उल्लेख किया है, उसे याद कीजिए। सजीव बिंब, सांकेतिकता, ‘आधारभूत विचार का द्रवीभूत होकर संपूर्ण कहानी के शरीर में भर उठना’, वातावरण-निर्माण, टेक्स्चर – इन सबकी चर्चा करते हुए भीष्म साहनी की कहानियां उदाहरण नहीं बनी हैं। वे उदाहरण बनी हैं इस सूत्र का: ‘‘कहानी जीवन के टुकड़े में निहित ‘अंतर्विरोध’, ‘द्वंद्व’, ‘संक्रांति’ अथवा ‘क्राइसिस’ को पकड़ने की कोशिश करती है और ठीक ढंग से पकड़ में आ जाने पर यह खंडगत अंतर्विरोध ही वृहद् अंतर्विरोध के किसी-न-किसी पहलू का आभास दे जाता है।… यह एक विरोधाभास है कि कहानी जैसा एकान्वित शिल्प अंतर्विरोध पर निर्भर होता है। नये कहानीकारों में भीष्म साहनी में एक ही साथ इन दोनों विशेषताओं का सर्वोत्तम सामंजस्य मिलता है। इस दृष्टि से भीष्म साहनी सबसे सफल कहानीकार हैं।’’ इसके बाद वे ‘चीफ़ की दावत’ का सधा हुआ विश्लेषण करते हैं और बताते हैं कि किस तरह कहानी की मां केवल एक चरित्र नहीं रह जाती, संपूर्ण प्राचीन का प्रतीक बन जाती है। और किस प्रकार ‘एक समर्थ कहानीकार जीवन की छोटी-से-छोटी घटना में अर्थ के स्तर-स्तर उद्घाटित करता हुआ उसकी व्याप्ति को मानवीय सत्य की सीमा तक पहुंचा देता है।’

यह अकारण नहीं है कि जीवन के टुकड़े में निहित अंतर्विरोध, द्वंद्व, क्राइसिस आदि को पकड़ने के उदाहरण के रूप में ही भीष्म जी याद आये, सजीव बिंब या वातावरण-निर्माण या ‘संगीत का-सा प्रभाव उत्पन्न करने’ का सामथ्र्य आदि के उदाहरण के रूप में नहीं। प्रतीक की बात ज़रूर की गई है (‘संपूर्ण प्राचीन का प्रतीक’), पर यह सायास नियोजित प्रतीक के अर्थ में नहीं है, जैसा राजेंद्र यादव या मोहन राकेश के यहां मिलता है। मोहन राकेश की ‘एक और जि़ंदगी’ में कोर्टरूम के भीतर पंखे से कटकर नीचे गिरे पक्षी का प्रतीक एक सजग सहित्यिक युक्ति है जो तलाक लेते पति-पत्नी के बच्चे की लहूलुहान आत्मा का प्रतीकार्थ व्यक्त करने के लिए प्रयुक्त हुई है। ‘चीफ़ की दावत’ की मां को ऐसी साहित्यिक युक्ति केे अर्थ में प्रतीक नहीं कहा गया है। इसीलिए मां प्रतीक ‘है’ नहीं, प्रतीक ‘बन जाती है’। प्रतीक ‘बन जाना’, दरअसल, पठन के स्तर पर उपलब्ध की गई व्यंजना या ध्वनि है, जो इसीलिए संभव हुई है कि कहानीकार ने एक अंतर्विरोध से जुड़ी विडंबना को सफ़ाई से पकड़नेवाली कथा-स्थिति निर्मित की है। कोई आष्चर्य नहीं कि मां के प्रतीक बन जाने की बात कहते हुए नामवर सिंह को काव्यशास्त्र में वर्णित व्यंजना की याद आई: ‘‘काव्यशास्त्र के आचार्यों ने मुख्यार्थ के भीतर से जो अर्थ की व्यंजना कराई है, वह भी इसी का रूप है। जीवन का सत्य इसी तरह खंड के भीतर से, किंतु उसे खंडित करता हुआ पूर्ण की ओर संकेेत करता है; खंड की सीमा को तोड़कर पूर्ण में मिलता है, मुख्यार्थ को बाधित करके रसमय अर्थ को व्यंजित करता है…।’’

मुख्यार्थ से आगे जाकर व्यंजित होनेवाला अर्थ (मुख्यार्थ कोे बाधित करके नहीं, मुख्यार्थ-बाध लक्षणा का लक्षण है; इस बात पर नामवर जी के नंबर कट सकते हैं), खंड की सीमा को तोड़कर पूर्ण में मिलता जीवन-सत्य – भीष्म जी की कहानियों की यह विशेषता उन्हें सीधा-सादा नहीं रहने देती, अंदाज़े-बयां में वे जितनी भी सीधी-सादी लगें। इसीलिए कहा है, दिल को देखो, चेहरा न देखो…। वस्तुतः अंदाज़े-बयां की सादगी और कहानी विधा की अपनी आकारिक सीमाओं के साथ भीष्म जी जितनी बड़ी वास्तविकताओं की ओर संकेत कर पाते हैं, वही उनके महत्व का आधार है। उनकी यादगार कहानियां – ‘चीफ़ की दावत’, ‘वाड्.चू’, ‘ओ हरामज़ादेे’, ‘अमृतसर आ गया है’, ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ आदि – इसीलिए यादगार हैं। ‘वाड्.चू’ का उदाहरण लें। किसी भावुक कर देनेवाले संस्मरण की तरह प्रतीत होती यह कहानी आपको अचूक ढंग से यह अहसास कराती है कि व्यक्तिगत स्तर पर अपने दौर से विदाई ले लेना किसी के लिए संभव नहीं। आपका दौर आपका पीछा नहीं छोड़ता। वाड्.चू पुरानी पोथियों में ही घुसा रहता है, महाप्राण बुद्ध के प्रति एक भावुक लगाव में सिमटा। उसे न नेहरू से मतलब है, न चाउ एन लाई से। उसके अंदर मातृभूमि को लेकर कोई नाॅस्टैल्जिक भाव नहीं है, भले ही कहानी के प्रथम पुरुष वाचक को यह लगता रहा हो कि एक बार अपनी ज़मीन पर लौटने के बाद दुबारा भारत आना उसके लिए भावनात्मक कारणों से संभव नहीं होगा। वाड्.चू के साथ ऐसा कुछ नहीं होता। वह चीन जाता है और दुबारा अतीत की उन्हीं पोथियों में शरण पाने के लिए भारत लौट आता है। लेकिन दोनों जगह वह राज्यतंत्र की निगाह में संदिग्ध है। कोई यह मानने को तैयार नहीं कि वह किसी राज्यतंत्र के लिए हानिरहित एक अतीतजीवी प्राणी है। उसका दौर उसका पीछा करता रहता है और जब पीछा करना छोड़ता है, तब तक वाड्.चू का सर्वस्व लुट चुका होता है। अपने आसपास जितना अतीत उसने इकट्ठा कर रखा था, पांडुलिपियों और नोट्स की शक्ल में, जो उसकी दृष्टि में अत्यंत मूल्यवान था, छिन्न-भिन्न हो जाता है। वाड्.चू का जीवन सारहीन, बेमानी-सा हो जाता है और कुछ समय बाद उसकी मृत्यु हो जाती है। मानो एक ख़ास तरह के पर्यावरण में ही जी पानेवाले प्राणी से उसका पर्यावरण छीन लिया गया हो।

क्या वाड्.चू की त्रासदी को एक व्यक्ति की बदकि़स्मती के रूप में पढ़ा जा सकता है? निस्संदेह, पढ़ा तो जा ही सकता है, पर यह भी निष्चित है कि एक चरित्र और उसके साथ परिस्थितियों के इस घात-प्रतिघात की योजना भीष्म जी ने इतने संकरे पठन के लिए नहीं की है। अनैतिहासिक और समय-निरपेक्ष होकर जिया नहीं जा सकता, यह कठोर सचाई वाड्.चू की त्रासदी में व्यंजित होती है और यह व्यंजना व्यक्तियों से आगे वर्गों, समुदायों और राष्ट्रों पर भी लागू होती है। ‘खंड की सीमा को तोड़कर पूर्ण में मिलता जीवन-सत्य’ यही है जिसको साधने में यह सीधी-सादी कहानी कामयाब है। और इसे साधने के लिए भीष्म जी किसी ऐसी हिकमत का प्रयोग नहीं करते जिसे मैं थोड़े मज़ाकिया लहज़े में ‘सफऱ्ेस टेंशन’ कहना पसंद करता हूं। वे कोई ऐसा वाक्य नहीं लिखते जो आपको अर्थ की किसी विशेष दिशा की ओर ढुलकाने का ज़रिया बन जाए। बावजूद इसके अभिधा से आगे व्यंग्यार्थ की ओर आपकी यात्रा अनिवार्य हो जाती है, क्योंकि कहानी अपने वाक्यों से नहीं, वाक़यों से वह ध्वनि पैदा करने में समर्थ है।

इस रूप में गहरी अर्थ-व्यंजनाओं से भरी कथा-स्थितियों की कल्पना करना ही कहानीकार के तौर पर भीष्म साहनी का स्व-भाव है। शैली-शिल्प में नयापन या अतिरिक्त आकर्षण पैदा करना उनका स्व-भाव नहीं है, इसीलिए जहां वे इसकी कोशिश करते भी हैं, वहां उन्हें कोई सफलता नहीं मिलती। ‘वाड्.चू’ में ही देखें तो पहले वाक्य के साथ भीष्म जी ने एक चैंकाऊ कि़स्म की शुरुआत करने की कोशिश की है: ‘तभी वाड्.चू आता दिखाई पड़ा।’ लेकिन यह ‘तभी’ बिल्कुल जमता नहीं, क्योंकि वह अपना औचित्य सिद्ध नहीं कर पाता। शैली का चैंकाऊपन कतई प्रति-उत्पादक हो जाता है। इसी तरह ‘चीलें’ कहानी में वे चील का जो प्रतीक खड़ा करने की कोशिश करते हैं, वह ख़ासा निष्प्रभावी है। दरअसल, कहानियां उनके भीतर इस तरह के वातावरणधर्मी प्रयोगों के रूप में जन्म नहीं लेती हैं। नयी कहानी में स्त्री-पुरुष-संबंधों वाले कथ्य और प्रतीकात्मक-सांकेतिक शैली-शिल्प-विधान को जो महत्व मिला था, उसने शायद धक्का देकर भीष्म जी को ऐसी कहानी लिखने के लिए प्रेरित किया। वे अपनी प्रकृति से मूड/मनःस्थिति को आधार बनानेवाले कहानीकार हैं नहीं, जैसे कि वे ‘चीलें’ में दिखना चाहते हैं।

पर इसका यह भी मतलब नहीं कि मनोविज्ञान पर उनकी पकड़ मूड/मनःस्थिति को आधार बनानेवालों के मुक़ाबले कहीं भी कमतर है। यह कहते हुए मुझे ‘चीफ़ की दावत’ समेत भीष्म जी की कितनी ही कहानियां याद आ रही हैं, पर जि़क्र सिर्फ़ ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ का करूंगा जिसका पाठ अभी मेरी मेज़ पर नहीं है और जिसे पढ़े हुए भी लगभग तीस साल गुज़र चुके हैं। उसका मुख्य पात्र अंग्रेज़ीयत से बहुत प्रभावित है। उसे अंग्रेज़ों की सभी चीज़ें बड़ी अच्छी लगती हैं। एक बार वह कहानी के ‘मैं’ से कहता है कि देखो, अहम् ब्रह्मास्मि का जो अंग्रेज़ी अनुवाद है, वह कितना सुंदर है, ‘आई ऐम द डिवाइन फ़्लेम’। और ऐसा कहते हुए उसके चेहरे पर एक अजीब तरह का दिव्य भाव उभर आता है। फिर कहानी में एक प्रसंग आता है जिसमें एक सिनेमा हाॅल के यूरिनर से अंग्रेज़ उसे धक्के मारकर हटा देते हैं, क्योंकि वह – एक काला देसी आदमी – उन्हें इंतज़ार करवा रहा है। इस घटना के बाद जब कहानी का प्रथम पुरुष वाचक उसके घर पहुंचता है तो कमरे में न पाकर उसे ढूंढ़ता हुआ छत पर जाता है। वहां देखता है कि वह आंखें मूंदे हुए ध्यानस्थ बैठा है और बुदबुदा रहा है, ‘आई ऐम द डिवाइन फ़्लेम… आई ऐम द डिवाइन फ़्लेम’। वाचक को लगता है कि वह मंत्र बुदबुदाता हुआ सतह से दो इंच ऊपर उठ गया है।

यह कथा-सार मैं तीस साल पहले, अपनी किशोेरावस्था मेें पढ़े हुए पाठ केे आधार पर बता रहा हूं। मुमकिन है, इसमें मेरा कुछ अपना भी जुड़ गया हो। पर कहानी की मुख्य विडंबना निभ्र्रांत है। और कहने की ज़रूरत नहीं कि वह हीनता-ग्रंथि की गहरी मनोवैज्ञानिक पकड़ पर टिकी है। मनोवैज्ञानिक पकड़ के इसी अर्थ में ‘अमृतसर आ गया है’ या ‘ओ हरामज़ादे’ भी मुख्यतः मनोविज्ञान की कहानियां हैं, भले ही कहानीकार घटनाओं की जगह मनःस्थितियों के रचाव में दिलचस्पी लेता न दिखाई दे।

कुल मिलाकर, भीष्म साहनी की अनेक कहानियां कहानी विधा की शक्ति का उदाहरण हैं। जिन लोगों को यह लगता था कि इस छोटे आकार की विधा में बड़ी बात को समेटने का माद्दा ही नहीं है, उन्हें खरा उत्तर देनेवाली कहानियों में भीष्म जी की कई कहानियां शामिल हैं। सबसे बड़ी बात कि यह माद्दा कथा-कथन की सादगी और भरपूर पठनीयता को बनाये रखते हुए हासिल किया गया है। कहानीकार बनने के इच्छुक किसी नये लेखक को अगर यह आत्मविश्वास अर्जित करना हो कि वह भी कहानियां लिख सकता/सकती है तो उसे भीष्म जी की कहानियां अवश्य पढ़नी चाहिए।

संजीव कुमार

संजीव कुमार

संजीव कुमार। युवा आलोचक और कहानीकार। ‘जैनेन्द्र और अज्ञेयः सृजन का सैद्धांतिक नेपथ्य’ पुस्तक के लिए देवीशंकर अवस्थी सम्मान। दिल्ली विश्विद्यालय के देशबंधु कॉलेज में  प्राध्यापक। इनसे sanjusanjeev67@gmail.com पर संपर्क सम्भव है।

सहमत (सफ़दर हाशमी मेमोरियल ट्रस्ट) द्वारा प्रकाशित भीष्म साहनी पर केंद्रित पुस्तिका से साभार

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