Archive for the month “April, 2020”

रामचंद्र शुक्ल और हिन्दी साहित्य का इतिहास: चंदन श्रीवास्तव

रामचंद्र शुक्ल और हिन्दी साहित्य का इतिहास: मकानों का दस्तूर कि मकान बनाने वाला अब बरामदे में रहा

ज्यों प्रेम की रीत त्यों साहित्य वा साहित्य के विवेचना की रीत – यहां उसी को देखके जीते हैं जिस काफिर पर दम निकले ! और जो साहित्य के विवेचना की रीत ऐसी ना हो तो बनायी जानी चाहिए. जो ना हुआ सो आगे भी ना हो — ये कोई सिद्धवाक्य थोड़े है ! सो, प्रियजन शुक्ल के इतिहास विवेचन में पड़े सो ठीक, स्वागत-योग्य! लेकिन ये क्या कि खंडन-मंडन से आगे निकलकर शुक्ल-भंजन, निन्दन-बहिष्करण तक चले जायें. अईसे तो लइका के नहवावन धोवावन के फेरा में पनिये नहीं, कठौती, लोटा और खुद लईकवे गुड़ूही में जा गिरेगा !

लगे कि इहां हम कवनो बुढ़भस कर रहे हैं तो आगे मत पढिएगा लेकिन हमको हर बात पर पहिले बुढ़ऊ लोग लऊकते हैं. जईसे शुक्ल जी के इतिहास(हिन्दी साहित्य) के बारे में फेसबुक पर बात बढ़ी तो जाने कवना तर्क से हमरा हिया चहुंच गया एरिक फ्रॉम के बहुते पुरान-धुरान एगो लेख पर. नाम है इंडिविजुअल एंड सोशल ओरिजन ऑफ न्यूरोसिस. ई लेख एतना पुरान भया कि हियां कवनो मेंशन का हकदार नहीं बाकिर का करें कि जिया में कुछ लाइन एकदमे से कांटा का माफिक घुप के रह गया है एरिक फ्रॉम का. @ लेखक 

By चंदन श्रीवास्तव

एरिक फ्रॉम लिखते हैं कि विज्ञान का इतिहास दोषदार(ना ठीक लगे तो त्रुटिपूर्ण पढ़ें) तथ्यों का इतिहास होता है. तो भी, ये दोषदार तथ्य विचार की प्रगति के पगचिन्ह हैं काहे कि उनमें एगो खास गुण होअत है. गुण ई कि दोष चाहे जेतना हो लेकिन ये तथ्य बंजर ना होते, बड़े उपजाऊ होते हैं. बस इन तथ्यों में निहित सत्य भ्रमपूर्ण धारणाओं के कारण ढंका-छिपा रह जाता है…एक-दो पीढ़ी के अंतराल से इनमें सुधार कर लिया जाता है.

एरिक फ्रॉम आगे लिखते  हैं कि मानवीय विचारों की प्रगति जो इस रास्ते होती है तो ऐसा क्यों होता सो जानना कठिन नहीं. किसी भी मानवीय चिन्तन का उदेश्य संपूर्ण सत्य तक पहुंचना होता है, परिघटनाओं को उनकी पूर्णता में पहिचानना होता है. लेकिन किसी भी मनुष्य को जीवन तो बड़ा छोटा मिला होता है और वो इसी छोटे जीवन में संसार भर के सच की छवि अपनी आंखों देख लेना चाहता है. अब ऐसा तब ही हो सकता है जब किसी मनुष्य की जीवन-अवधि मनुष्य –जाति की जीवन-अवधि के मेल में हो. ऐतिहासिक विकासक्रम में ही मनुष्य पर्यवेक्षण की तकनीक जोगाड़ कर पाता है, नये तथ्य जुटा पाता और तथ्यों के मामले में बेहतर से बेहतर वस्तुनिष्ठता तक पहुंच पाता है जो कि सच को संपूर्णता में जानने के लिए जरुरी है.

इसके तुरत ही बात एरिक फ्रॉम एक सूत्रीकरण करते हैं कि ‘एक अन्तराल होता है सत्यान्वेषक के देखे सत्य और ज्ञान की उस सीमा के बीच जिसमें वो सत्यान्वेषक रह रहा होता है.’ मतलब, युग बढ़े तो ज्ञान-लाभ की दृष्टियां, तथ्य उत्खनन के औजार और पूछे जाने योग्य समझे गये प्रश्नों की काया और अभ्यंतर का विस्तार हो. युग के ज्ञान की सीमा बहुधा उस युग में पैदा ज्ञानी की भी सीमा होती है.

फ्रॉम का निष्कर्ष है कि चूंकि सत्यान्वेषण में निकले लोग अब अपने को किसी अधर में लटका तो नहीं रख सकते ना, सो वे इस अन्तराल को अपने युग में उपलब्ध ज्ञानराशि से जहां तक संभव हो, भरने की चेष्टा करते हैं भले ही इस ज्ञान राशि में वैसी वैधता का अभाव हो जैसी कि उनके देखे सत्य के झलक में समायी हो सकती है.

आप ठीक समझे हमरी पॉलिटिक्स को. निहायते कंजरवेटिव साऊंड करने का खतरा उठाते हुए हियां हमरा प्रस्ताव एरिक फ्रॉम की ऊपरोक्त अंतर्दृष्टि से शुक्लजी के इतिहास-लेखन को भी देखने का है. किन्तु-परन्तु बहुते है ऐसा करने में. एक तो यही कि फ्रॉम विज्ञान के इतिहास का बात कर रहे हैं तो साहित्य का इतिहास पर कईसे लागू कर दें. ऊ सत्य और वस्तुनिष्ठ का फेरा में हैं जबकि हियां जोर सौन्दर्य, संवेदना वा कि चित्तवृत्ति अऊर सब्जेक्टिविटी पर है, आदि-आदि. फिर भी हमको लगता है, एक कोशिश कर ली जाये कहीं के पैना से कहीं का चिऊरा चलाने में.

अगर ऐसा करेंगे तो नजर आयेगा कि शुक्लजी ने ‘शिक्षित समूह की बदलती हुई प्रवृतियों को लक्ष्य करके हिन्दी साहित्य के इतिहास के काल-विभाग और रचना की विभिन्न शाखाओं का एक कच्चा ढांचा खड़ा किया.” (मेरा जोर कच्चा ढांचा पर समझें और जो बन सके तो हम-आप एक पक्का सा जान पड़ता ढांचा बनाने की जुगत करें !)
अब इस कच्चे ढांचे में अगर ये आता है कि जनता की चित्तवृतियों का मेल युगीन साहित्य से बैठाकर इसी सहारे इतिहास तैयार करना है तो फिर कह लेने दीजिए कि शुक्लजी से पहले ऐसा हिन्दी साहित्य पर विचार करने वालों ने सोचा जरुर था(भारतेंदु मंडल के साहित्यकारों ने, बांग्ला में तो खैर हो ही चुका था.) लेकिन सोच को साकार करने का पहला काम शुक्लजी ने ही किया. उनका इतिहास अपने प्रस्ताव के पालन का अद्भुत साक्ष्य है. सो, ठेठ इस एक कारण से भी शुक्ल जी के इतिहास-ग्रंथ का पढ़ना-पढ़ाना सतत जारी रहना चाहिए.

दूसरी बात, हममें से बहुत कम होंगे जो शुक्लजी की पद्धति से इनकार कर सकें: जनता की चित्तवृति में बदलाव के साथ तद्युगीन साहित्य में भी बदलाव. चित्तवृतियों की बदलती परंपरा से साहित्य के बदलाव की परंपरा का सामंजस्य दिखाना. इसके हेतु-स्वरुप राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक परिस्थितियों का अंकन.

चाहूं तो बड़ी आसानी से कहूं कि ये वाली पद्धति शुक्लजी के मन में यों ही नहीं कौंधी – इसके पीछे भारत को उपनिवेश के रुप में गढ़ने-साधने का जो बड़ा ज्ञानकांड है, उसका बड़ा योगदान है. लेकिन इतना मानने के बाद भी क्या इस बात से इनकार कर सकता हूं कि कोई जब आज साहित्य का इतिहास लिखने चलता है, समालोचना में प्रवृत्त होता है तो वो बहुधा शुक्लजी वाली पद्धति का ही पालन कर रहा होता है. खूब गुस्सा कीजिए कि ‘साहित्य चित्तवृत्तियों का संचित रुप’ होता है- इस निष्कर्ष तक वे कैसे पहुंचे भला और आप क्यों मानें भला. आपका सवाल जायज है कि प्रतिनिधि पात्र, प्रतिनिधि परिस्थिति और प्रतिनिधि रचनाकार किसे मानें भला. जो-जो घटित हुआ उसके महत्व-अमहत्व को कैसे खोजें-छांटे भला और ये कैसे मानें कि किसी युग की प्रधानवृत्ति सबही की सब उस युग के साहित्य में चली आई. स्वयं प्रधान प्रवृत्ति और गौण प्रवृत्ति के बीच भेद करने वाली नजर को भी टोहिये-टोकिये लेकिन ये क्या कि चित्तवृत्तियों से साहित्य का रिश्ता मानने से ही इनकार कर दें. नहवावना के पानी के साथ लरिका तो नहीं गुड़ूही में डाल सकते ना.

एक और उदाहरण लीजिए : शुक्लजी का इतिहास साहित्य और कुसाहित्य के बीच भेद करता है तो साहित्य और असाहित्य के बीच भी. जो कुछ लेखन पूर्ववर्ती मौजूद है उसमें बहुत तो नीति-उपदेश है, मत-मतांतर का निरुपण है तो ऐसी ‘बोली-बानी’ को साहित्य के श्रेणी में नहीं रखते शुक्ल जी. हो सकता है, आपको लगे शुक्लजी कुछ बोली-बानी की वेधकता को ना पहिचान सके, सो उसे असाहित्य की श्रेणी में रखा और विवेचन योग्य ना माना या माना तो सम्यक मूल्यांकन ना किया. लेकिन इस सूत्रीकरण से कैसे इनकार करेंगे कि साहित्य के इतिहास का अपना विषय साहित्य ग्रंथ ही होने चाहिए, धर्मग्रंथ वा कि राजनीति के ग्रंथ नहीं. तो फिर शुक्लजी एक सूत्र तो देते हैं ना कि साहित्य का इतिहास लिखना है तो तय कीजिए कि साहित्य का ग्रंथ कौन-सा है, आप उसे साहित्य का ग्रंथ क्यों मानते हैं.

शुक्लजी के साहित्य विषयक इतिहास को पढ़ते हुए मुझे सबसे अच्छा वहां लगता है जहां लिखा मिलता है कि कथा के मर्मस्थलों को पहिचानो. शुक्लजी को कथा का एक मर्मस्थल वन में बैठी सभा में महसूस हुआ. शायद, आपको और मुझे ना लगे ये मर्मस्थल बल्कि वितृष्णा हो कि गजब का वर्णाश्रम है भाई. बात तो ठीक है—लेकिन सूत्रीकरण का क्या करें? क्या इस बात से ही इनकार कर दें कि कथा में कोई मर्मस्थल भी होते हैं, उनकी पहिचान करनी होती है.

जातिवादी-ब्राह्मणवादी आग्रह, अवैज्ञानिकता और सांप्रदायिकता के आरोप नये नहीं. ‘सांचा’ वाले लेख में अस्सी के दशक में ये बात शिक्षाशास्त्री कृष्णकुमार लिख चुके. बाद को कृष्णकुमार को अपने लेख में संशोधित करने लायक ना लगा हो तो उन्होंने ना लिखा (हो सकता है, लिखा हो मैंने ही ना पढ़ा हो) इस टेक पर 19वीं सदी के उत्तरार्ध के हिन्दी साहित्य के बारे में कुछ लेख इतिहासकार सुधीरचंद्र ने भी लिखा. लेकिन उन्हें अपने लिखे में संशोधन करना पड़ा. संशोधन में उन्होंने पूरी किताब लिखी- द ऑप्रेसिव प्रजेन्ट: लिटरेचर एंड सोशल काश्ससनेस इन कॉलोनियल इंडिया.

कहने का मतलब ये नहीं कि नई पीढ़ी नये सवालों, तथ्यों, प्राथमिकता के आलोक में शुक्ल जी के इतिहास लेखन पर प्रश्न ना उठाये, उठाये जरुर लेकिन इतनी विनम्रता जरुर रहे कि जो कुछ सोचा जा रहा है वो भी अपने युगीन अंतर्दृष्टियों और तथ्यों की सीमा से बंधा है, कि वो अंतरिम सच ही है. अंतिम नहीं और इस अंतरिम सच तक पहुंचना इसलिए भी मुमकिन हो सकता है कि एक शुक्लरचित ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ भी है. इतिहास के संग्रहालय में ना रखिये, (चीज पहुंचती संग्रहालय में तब है जब वो मृत हो जाय)- शुक्ल का इतिहास हमारे राष्ट्र होने की खूबियों-खामियों का धड़कता हुआ दस्तावेज है सो इस दस्तावेज से मतभेद और मनभेद रखने के लिए निरंतर जिरह में लगे रहिए और जिरह तब होगी जब ये कितबिया संग्रहालय में नहीं आपकी किताबों की रैक पर एकदम आंखों की सीध में रखी होगी.

चंदन श्रीवास्तव

चंदन श्रीवास्तव

मूलतया छपरा (बिहार) के निवासी, पिछले पंद्रह सालों से दिल्ली में। आईआईएमसी और जेएनयू में पढ़ाई। “उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हिन्दी लोकवृत्त का निर्माण” शीर्षक से पीएचडी, दिल्ली के कॉलेजों में छिटपुट अध्यापन, फिर टीवी चैनल की नौकरी और अब विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सीएसडीएस) की एक परियोजना इंक्लूसिव मीडिया फॉर चेंज से जुड़े  रहे हैं, फिलहाल बिहार में प्राध्यापक हैं। इनसे  chandan@csds.in पर संपर्क संभव है। 

पोएट्री इन द टाइम ऑफ़ कोरोना: उस्मान खान

एक दिन के चार पहलू

usman-khan-poem

स्क्रीनशॉट- L’été (1968)

By उस्मान खान

1.

समय की अधूरी कविताएँ 

सुबह का कुचला दर्द

शाम को फन उठाकर

फूंफकारने लगा

घर की दिशा से

 

वे एक-दूसरे से कटे हुए

एक-दूसरे की थकान में देखते

भूख की लंबी होती परछाइयाँ

सड़क किनारे चुपचाप बैठी हुई

 

कि जाने किस अति पर

ट्रक के टायरों के ख़ुद पर से

गुज़रने के पहले,

समय की अधूरी कविताओं में से एक

बीच सड़क पर खड़ी हो गई –

उनके ही लाचार आक्रोश का घोष बनकर –

 

‘ओ मेरे साथ चीख़ती

उत्पीड़ित आत्माओं,

अपनी ही मूर्खताओं

का दंड भोग रहे हैं  हम

 

हमारी आँतों के खालीपन से निकली प्रार्थनाएँ

हम पर हँस रही हैं निर्लज्ज – बेतहाशा

 

अपनी ही संतानों का वध

नए-नए तरीकों से

बार-बार करने का शाप

हमने ही ख़ुद को दिया है

 

अपनी ही माँ को विष पिलाकर

हम कर रहे हैं उन्मादी-नृत्य

थालियाँ बजा-बजाकर, खिलखिलाकर

 

कीटनाशकों के शाही-स्नान

का यह पवित्र मुहूर्त

हमने ही निकाला है

 

हम ही मोहित

गले में रस्सी डाल

झूल रहे हैं वटवृक्ष की

लटकती जड़ों के बीच

 

हम ही ज़ालिम को ख़ुदा बनाकर

उसके आदेश पर दीये जलाकर

कर रहे हैं आत्मदाह

 

हत्यारों की पूजा का रिवाज

हमने ही शुरू किया है

 

हमने ख़ुशी-ख़ुशी चुनी है

कुत्ते की मौत,

फिर अपने सिर के घाव को

चाटने की अनिवार्य असफल जद्दोजहद क्यों?’

 

अंतिम शब्द की पीड़ा की गूँज मिटने से पहले

वे खाने के पैकेट लुटने में लग गए थे।

 

वह चीख़ थी, चिल्लाहट थी,

शोर थी, झल्लाहट थी,

वह उनकी ही कविता थी बीच सड़क पर –

तार-तार,

अब भी अधूरी-सी।

 

उन्होने इस साल का महाचन्द्रमा

एक-दूसरे की भेड़िया-आँखों में देखा था,

वह रजत अवसाद था

और उनकी जीभ पर रोटी का नहीं

अपने ही ख़ून का स्वाद था।

 

वे अपनी ही हड्डियाँ चबा रहे थे,

ख़ुद को ज़िंदा रखने की

ग़लीज़ दीनता के मातहत।

 

कि इसी बीच, उनके ही बीच से

समय की एक और अधूरी कविता

अपनी ही अवमानना के विरुद्ध

खड़ी हो गई तनकर

एक और चीख़-पुकार बनकर

 

‘ओ मेरे साथ जुझते

भविष्य के सृजनकर्ताओं

आओ, बेहतर दुनिया के ख़ाब देखने वालों,

हमारे युग के कवि-योद्धाओं,

अपनी सोच, अपना ज़मीर,

अपने शस्त्र संभालो।

 

इस महाचन्द्रमा के डूबने से पहले

चलो छिन लाएँ,

इस धरती के आदमखोरों से

अपनी उम्मीद, अपना यक़ीन।

 

काम के बोझ तले दब चुकी

हो चुकी नफ़रत का शिकार

जो आत्माएँ,

उन्हें बाहर निकालें,

उनके रोग की दवा बनाएँ,

पूरी करें

अपने समय की अधूरी कविताएँ…!’

***

2.

जय-जय

उनका नाम जपो दिन-रात

करो उनके मन की बात

उनकी ही सुनो

उनकी ही सुनाओ

अपनी बुद्धि बेच खाओ!

मूर्खता का करो संचय

उनकी भी जय-जय

तुम्हारी भी जय-जय!

 

वे गिने रोकड़ा

वे गिने माल

तुम गिनो उनके झाँट के बाल

अपनी करनी पर रहो डटे

यूँ उनके तुम्हारे दिन कटे

श्रद्धामय रसमय सुखमय

उनकी भी जय-जय

तुम्हारी भी जय-जय!

 

कहे तो मारो

कहे तो मर जाओ

करे ईशारा,

तो तुम नाचो-गाओ

जब वे मदारी बन जाए

करे तमाशा

डुगडुगी बजाए

तुम भी बन जाओ

मरकट महाशय

उनकी भी जय-जय

तुम्हारी भी जय-जय!

 

तुम उन पर अपना तन-मन वारो

सही-ग़लत क्या नहीं विचारो

ताक पर रख दो ज्ञान-विज्ञान

पुलिस के लट्ठ को मानो वरदान

सूजे कूल्हों का क्या भय

उनकी भी जय-जय

तुम्हारी भी जय-जय!

***

3.

वह जहाँ अभी बना नहीं

 

जहाँ दिल पे वक़्त का बोझ न हो

उम्मीद जहाँ ज़मींदोज़ न हो

जहाँ साथ तुम्हारा रहे सदा

जहाँ तनहाई का खौफ़ न हो

वह जहाँ अभी बना नहीं।

 

जहाँ चाँद खिले  तो जाँ खिले

हर रंग के फ़ुल जहाँ खिले

मन मारकर जीना न हो

हर दिल का हर अरमाँ खिले

वह जहाँ अभी बना नहीं।

 

जहाँ सोचने पे न सज़ा मिले

जहाँ बोलने पे न क़ज़ा मिले

जहाँ इन्साँ इन्साँ से डरे नहीं

जहाँ सबको सारा मज़ा मिले

वह जहाँ अभी बना नहीं।

 

अभी तो चेहरे हैं ग़मगीं

अभी तो है खूं-आलूदा ज़मीं

हर आँख में है अभी नमी

मेरे दिल अभी न ठहर कहीं

वह जहाँ अभी बना नहीं।

***

4.

मेरे साथी

 

मेरे साथी  मेरी बात सुन

मिट्टी के ख़ाबों की तामीर

धरती की अदम्य उम्मीद

आने वाले मौसम के ग़ुलाब

हम ही तो हैं।

 

ये रोग, ये नृशंसताएँ

ये हिंसा का नंगा नाच

ये क्रूरता का दौर लंबा

हमारा इम्तिहान ही तो है

हमारी हार नहीं।

 

ये यातना, ये दर्द

ये घुटन, ये दुख

ये अजनबीपन

ये धन का घृणित राज

नहीं है अखंड।

अभी तो भविष्य के प्रेमाख्यान

अपने साहसी धिरोदात्त

नायक-नायिकाओं को जन्म दे रहे हैं

हमारी कश्मकश के बीच

देखो,  रात ढल रही है।

***

usman khanउस्मान खान हिंदी कवि और कथाकार हैं. उन्होंने इधर बीच पर्याप्त काम किया है. इस काम में कविताओं और कहानियों के साथ-साथ आलोचना भी शामिल है.  जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से मालवा के लोक–साहित्य पर पीएचडी की करने के बाद वह फिलहाल रतलाम के एक कॉलेज में पढ़ा रहे हैं. उनसे usmanjnu@gmail.com पर बात की जा सकती है.

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