Archive for the month “May, 2020”

नामाकूल मुर्गे और मुर्गियों की कलगी: मिखाईल शोलोखोव

मिखाईल शोलोखोव विश्व साहित्य के बड़े नाम और नोबेल पुरस्कार विजेता हैं.  उनका उपन्यास ‘वर्जिन सॉयल अपटर्नड् ‘ सोवियत प्रयासों से शुरू हुयी  साझेदारी खेती ,पशुपालन और उसके इर्द-गिर्द के संघर्ष  एवं जीवन की कहानी है. इसी उपन्यास का एक एक अंश यहाँ प्रस्तुत है.

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आवरण-पृष्ठ : वर्जिन सॉयल अपटर्नड्

कुंवारी भूमि का जागरण 

By मिखाईल शोलोखोव

सुबह नाश्ता करके वह मुर्गियों के बाड़े की और चल दिया. उसे देखकर बूढ़े अकीम बेसख्लेबनोव ने गुस्से में चिल्लाकर पूछा,

“तू सुबह-सबेरे यहाँ क्या कर रहा है?”

“तुम्हें और मुर्गियों को देखने आया हूँ. क्या हाल-चाल है बाबा?”

“अच्छी-खासी जिन्दगी कट रही थी पर अब मत पूछो.”

“क्यों, क्या हो गया?”

“मुर्गियों ने जीना हरम कर दिया है.”

“यह कैसे?”

“तू एक दिन यहाँ रूककर देख, तब समझ जाएगा! नामाकूल मुर्गे दिन भर आपस में लड़ते रहते हैं, उन्हें अलग करते-करते तो मेरी टांगें टूट गयी. मुर्गियों को ही लो, देखने में लग सकता कि जनानी बात है पर ये भी दिन भर एक-दूसरी की कलगी नोचती रहती है. भाड़ में जाए ऐसी नौकरी. आज ही दवीदोव के पास जाकर छुट्टी करने के लिए बोलूँगा और मधुमक्खियों की देख-रेख के लिए भेजने को कहूँगा.”

“बाबा, धीरे-धीरे वे एक दूसरे के आदी हो जायेंगे.”

“जब तक वे आदी होंगे, बुड्ढा कब्र में उतर चूका होगा. भला यह भी मर्दों का काम है? आखिर को मैं भी तो कज्जाक हूँ. तुर्कों की लड़ाई पर जा चुका हूँ. पर यहाँ मुझे मुर्गियों का कमांडर बना दिया है. नौकरी किये दो दिन ही हुए हैं पर बच्चे मेरा पीछा नहीं छोड़ते. जब घर जाता हूँ तो वे चिल्लाने लगते हैं, ‘बुड्ढा मुर्गी-छेड़! अकीम बाबा मुर्गी-छेड़!’ मुझे सबका मान-सम्मान प्राप्त था, पर बुढ़ापे में मुर्गी-छेड़ की उपाधि लेकर मरूँगा क्या? नहीं, मैं बिलकुल नहीं चाहता!”

“अरे छोड़ो भी, अकीम बाबा. बच्चों से क्या लेना?”

“अरे अगर बच्चे ही कहते तो कोई बात नहीं पर कई लुगाइयां भी उनके साथ हो गयी हैं. कल दोपहर खाना खाने जा रहा था. कुएं पर नास्तेन्का दोनेत्स्कोवा पानी खींच रही थी. पूछती है: ‘बाबा, मुर्गियों को संभाल पा रहे हो न? मैं बोला, ‘हाँ-हाँ.’ – बाबा, मुर्गियां अंडे दे भी रही हैं या नहीं?’ मैं बोला, ‘हाँ, कुछेक दे रही हैं पर ज्यादा नहीं.’ और वह कल्मीक घोड़ी पता है क्या बोली हंसकर? ‘देखना, जुताई तक वे एक टोकरी अंडे दे दे नहीं तो तुमसे करवाएंगे मुर्गे का काम.’ ऐसे मजाक सुनने के लिए मैं बुड्ढा हो गया हूँ. और यह नौकरी मुझे बिलकुल पसंद नहीं.”

बुड्ढा कुछ और भी कहना चाहता था पर बाड़े के पास दो मुर्गे भिड़ गए, एक की कलगी से खून की धारा फूट पड़ी और दूसरे की गल-थैली से मुट्ठी भर पंखों का ढेर उड़ा. बुड्ढा अकीम संटी उठाकर उनकी ओर दौड़ पड़ा.

अनुवाद: विनय शुक्ल 

 

लंचबॉक्स: विदेह के सदेह होने की कथा : अमितेश कुमार

लंचबॉक्स (2013) ने इस धारणा को चोट पहुंचाई है कि कलात्मक स्तर की फिल्म सहजता से संप्रेषित नहीं हो सकती है. इसने हिंदी सिनेमा उद्योग का यह सच भी उजागर किया है कि असली समस्या ऐसी फिल्मों को दर्शकों तक कायदे से नहीं पहुंचाये जाने का है. यदि फिल्में कायदे से दर्शकों तक पहुंचे तो निःसंदेह उसे दर्शक मिलेंगे. वही दर्शक जिनकी मूढ़ता को लेकर हम आश्वस्त हो चुके हैं. लेकिन करोड़ी क्लब के सिनेमा दर्शकों के इतर या उनके भीतर दर्शकों का एक ऐसा वर्ग भी है जो ताजी, संवेदनशील, बेहतर शिल्प में कही गई फ़िल्में भी देखना चाहता है.

‘लंचबॉक्स’ सिनेमाई पाठ के उन उदाहरणों में से एक है जिसे आप जितनी बार पढ़ते हैं एक नवीन अर्थ निकलता है. जितनी बार आप अपनी दृष्टि का परिप्रेक्ष्य बदलते हैं उतनी बार सिनेमा का परिप्रेक्ष्य भी बदलता है. इसके कथ्य में एक ‘मूल्यपरक’ तरलता है और यह किसी कहानी की तरह हमारे जीवन में बहुत तिरछे होकर घूसती है और वहीं अटकी रह जाती है. इसलिये इस फिल्म पर बात करते हुए आप कथ्यपरक बातों के अलावा बहुत सी वागाडंबर वाली भी बात कर सकते हैं क्योंकि आप इस फिल्म के प्रभाव में है. #लेखक 

लंचबॉक्स: विदेह के सदेह होने की कथा

By अमितेश कुमार 

फिल्म का शीर्षक ही वह दरवाजा है जिससे फिल्म के पाठ की अर्थबहुलता में आप आसानी से प्रवेश कर सकते हैं. लंचबॉक्स के गलत पते पर पहुंच जाने का ‘संयोग’ फिल्म की वह केंद्रीय घटना है जिसके इर्द गिर्द पूरा आख्यान रचा गया है. डब्बेवाले के अनुसार लंचबॉक्स के गलत पते पर पहुंचने की संभावना नगण्य है क्योंकि उसे हार्वर्ड, प्रिंस चार्ल्स इत्यादि का प्रमाण पत्र मिल चुका है. फिल्म  के बाहर यदि हम इस तथ्य को जाँचे तो भी इस दावे पर यकीन न करने की कोई गुंजाईश नहीं है. यह ‘संयोग’ वह सिनेमाई युक्ति है जिसे फिल्मकार ने अपनाया है.

फिल्म का बड़ा हिस्सा लंच बनाने, डब्बावालों के लंच पहुंचाने और लंचटाइम के बीच घटित होता है. इस लंच के मायने इन किरदारों के लिये फिल्म के शुरू में जो रहते हैं फिल्म के अंत में वही नहीं रह जाते. इला का अपनी पड़ोसन (फिल्म में जिसकी आवाज भर है) से जुड़ाव का एक स्रोत खाने की रेसेपी है जिससे वह अपने पति को खुश कर उसका ध्यान अपनी ओर खींचना चाहती है जो जीवन की आपाधापी में उससे विमुख हो चुका है. जिससे अपनी पत्नी के बनाये खाने का स्वाद भी पहचाना नहीं जाता. इला की यह कोशिश विफल रहती है क्योंकि लंचबॉक्स गलत पते पर पहुंच गया है, एक रूखे आदमी ‘साजन फर्नांडिस’ के पास, जो खाने के समय भी किताब पढ़ता रहता है, जिसके बारे में उसके कार्यालय में अफवाहें फैली हैं, जिससे उसके मुहल्ले के बच्चे डरते हैं, जो नितांत अपने अकेलेपन में समय से पहले स्वैच्छिक सेवानिवृति लेकर मुंबई से बाहर जाना चाहता है.

इला और साजन की जिंदगी टकराती है और लंचबॉक्स में रखी पर्चियों से दोनों की बातचीत शुरू होती है. साजन की जिंदगी की कठोरता के पीछे का तथ्य और उसके भीतर का कोमल भी सामने आने लगता है. तीसरा मुख्य किरदार असलम शेख है जो साजन की जगह लेने उसी के कार्यालय में आया है. वह खाने की पहचान रखता है, वह ‘लंचबॉक्स’ को आत्मीयता से सूंघ कर उसके स्वाद की टोह लेता है. स्वंय भी खाना बना सकता है, ट्रेन की यात्रा के दौरान सब्जी काटता है. इला के भेजे हुए लंच से साजन की भोजन में दोबारा रूचि जगती है, फिल्म में पहली बार जब लंच साजन की मेज पर आता है वह उसकी तरफ़ आँखे उठा कर भी नहीं देखता लेकिन बाद में रोज वह लंचबॉक्स का इंतजार करने लगता है. इला को अपनी पति का खिंचाव वापस नहीं मिलता लेकिन उसके व्यक्तित्व का एक अलग हिस्सा खुलता है. साजन उसके बनाये खाने में रूचि ले रहा है. खाने में शेख की रूचि ही साजन और उसको लंचटाइम के दौरान एक दूसरे से जोड़ती है.

फिल्म के तीनों ही किरदारों के लिये खाने के मायने अलग अलग हैं. इला के लिये यह उसकी सत्ता का बोध कराने वाला और उसका विश्वास कायम रखने वाला काम है, साजन के लिये यह जरूरत के अलावा कुछ नहीं और शेख इसकी कीमत जानता है इसलिये उसके लिये यह दिव्य है, वह डब्बा सूंघ कर स्वाद बताने की क्षमता रखता है. यह ‘भूख’ ही है जिसका अलग-अलग रूप सामने आता है. इला की मां इस भूख के मायने भूल चुकी है. उसे इसकी याद अपने पति की मौत के तुरंत बाद आती है. वह महसूस करती है कि पति की सेवा में उसने भूख जैसे जरूरी चर्या को भी भूला दिया था. इला के पति का भोजन से कृत्रिम संबंध है. साजन इला को बताता कि मुम्बई में बहुत से लोग लंच में सिर्फ़ केला खाते हैं. शेख के लंच में भी सेब और केला ही रहता है.

‘लंचबॉक्स’ के तीनों मुख्य किरदारों का कथा सरंचना में प्रवेश क्रम से होता है. पहले इला (निमरत कौर) आती है, बच्चे को तैयार करती, पति के लिये खाना बनाती, लंचबॉक्स पैक करती और डब्बे वाले को सौंपती हुई, शाम को अच्छे से तैयार होकर पति का इंतजार करती इला. जिसके पास समय काटने का यंत्र अपनी पड़ोसन से बात करना, मनपसंद गाने सुनना, जो उसकी पड़ोसन कैसेट से इला की ही फरमाइश पर बजाती है, खाना बनाना, कपड़े धोना आदि है. इला की दिनचर्या में एक यांत्रिकता और रोजमर्रापन की एकरसता है. वैवाहिक जीवन भी नीरस है जिसमें साजन की सलाह पर अमल कर कुछ रंग भरना चाहती है. हनीमून के कपड़े में अपनी फ़िगर की मेंटनेस दिखा कर और अपने होने वाले बच्चे की याद दिला कर भी वह पति को हासिल नहीं कर पाती. पति (नकुल वैध) की देह भाषा और अभिनय इला के अभिनय में और दिनचर्या के काम में वह पूरा रसायन अभिव्यक्त होता है जो पति और पत्नी के बीच में है. क्या यह केवल इला का जीवन है? इस फिल्म में दो और ‘औरतें’ हैं. इला की मां और पड़ोसी देशपांडे आंटी. इन दोनों का जीवन अपने अशक्त पति के इर्द गिर्द ही समर्पित है लेकिन इन दोनों को इससे कोई शिकायत नहीं है. लेकिन इला में एक विद्रोह है. वह कम से कम सोचती है कि वह भूटान जाये जहां खुशी उत्पादन से अधिक कीमती है. वह बाहर निकलने का अवसर तलाशती है क्योंकि वह उस रसायन को खोज रही है जो दो लोगों को साथ रखने के लिये जरूरी है. दिनचर्या की एकरसता से वह उब चुकी है. लंचबॉक्स में लिखी चिठ्ठियां उसे रास्ता दिखाती है. लेकिन वह अपने जीवन-चक्र से बाहर नहीं निकल पाती. वह एक विद्रोही चिट्ठी लिख कर उसे भविष्य में दुबारा पढ़ना चाहती है.

सिनेमा का दूसरा किरदार साजन फर्नांडिस (इरफ़ान खान) विधुर है जो क्लेम डिपार्टमेंट में काम करता है. वह एक रूखा आदमी है जिससे मोहल्ले के बच्चे भी गेंद मांगने में डरते हैं. जो एक गलत पते के लंचबॉक्स में धन्यवाद की चिट की बजाये ‘Food was Salty Today’ की चिट लिखता है. पडोस की लड़की उसको देखकर अपने घर की खिड़की बंद कर देती है. वह नितांत अकेलेपन और ठहराव को जी रहा है और इसे तोड़ने में उसकी कोई दिलचस्पी नजर तब तक नहीं आती जबतक उसके जीवन में गलत पते से भटका एक लंचबॉक्स और उसकी ऑफिस में उसकी जगह लेने वाला शेख नहीं आता है. इला से खतो-किताबत के बाद उसके व्यक्तित्व की अंदरूनी सरंचना में परिवर्तन होता है. हम देखते हैं कि वह सहज हास्य बोध भी रखता है, वह शेख को अफ़वाह की सच्चाई न बता कर कि उसने बिल्ली को मारा था, कहता है कि दरअसल वह आदमी था इसलिये शेख भी बच के रहे. साजन की इला को लिखी चिठ्ठियां किसी कविता से कम नहीं है.

 things are never bad as seen

just watched your weight

उसके कठोर और सपाट चेहरे के पीछे का उसका एक सुखद अतीत है. चरित्र की जटिलता और गहराई को इरफ़ान खान ने बड़े सहज अंदज में जिया है. यह वह किरदार है जो जितना बाहर है उतना ही भीतर. जीवन के प्रति आशा रखने के लिये इला को प्रेरित करते हुए वह ट्रेन में एक वृद्धा की मुस्कान का जिक्र करता है. शेख की नौकरी बचाता है. इस किरदार में एक यात्रा है जिसकी सूक्ष्मता को पढ़ा जाना चाहिये. साजन का ठोसपन जैसे जैसे घूलता है वैसे ही उसमें अचानक एक ठहराव लौटता है. अचानक उसे अपने बूढ़े होने का बोध होता है और वह इला से अपने संबंधों के बारे में सोचता है. नासिक जा कर बसने का निश्चय पर अमल कर लेता है. उसके सामने बच्चे हैं, गेंद के लिये, वह उन्हें कहता है कि वह इसलिये वापस आया है ताकि बच्चे किसी का ग्लास न तोड़े और रात में वह लड़की उसे देखकर हाथ हिलाती है, अपनी खिड़की बंद नहीं करती. वह ऐसा आदमी है जिसकी जिंदगी दफ़्तर और घर के बीच सिमट गई है, पत्नी के न होने का अकेलापन उसे रूखा बना गया है. उसका कोई सामुदायिक जीवन नहीं है. वह अपना काम परफ़ेक्शन से करता है और दूसरे भी करें यह उम्मीद भी रखता है. उसका जीवन ट्रेन में, बस में और खड़े खड़े बीत गया है, वह डरता है कि कहीं उसकी कब्र भी ‘वर्टिकल’ न हो जाये. साजन अपने जीवन की नीरसता का अभ्यस्त हो चुका है उसकि दिलचस्पी इसको तोड़ने में भी नहीं है. जबकि वह अपने आस-पास बदलती और बनती हुयी दुनिया से भी बाख़बर है. वह जीवन की मुश्किलों के बारे जानता है लेकिन उसका स्वंय का अलगाव चरम पर है लेकिन मानवीय रिश्ते का स्पर्श जब उसे छूता है तो वह लौटता है और पूरी संवेदना के साथ.

सिनेमा के तीसरा किरदार असलम शेख (नवाजुद्दीन शेख) की गतिविधियां किसी नियमग्रस्तता से बाध्य नहीं है, इला और साजन की तरह. वह अपने लिये रास्ता बनाना जानता है, जिजीविषा से भरा हुआ है. उसे अपने आप पर विश्वास है. वह साजन की उपेक्षा का उसे जवाब देता है ‘सब कुछ खुद से सीखा है यह भी सीख लूंगा’. अनाथ है लेकिन ‘अम्मी कहती है’, उसका तकिया कलाम है, इससे वह अपनी बात का वज़न बनाता है. रिश्ते बनाने में उसकी दिलचस्पी है. इसके लिये वह परेशान करने की हद तक कोशिश करता है कि साजन से रिश्ता बनाये, और उसमें सफ़ल भी होता है. ऑफिस में वह साजन की जगह लेने आया है लेकिन वह उसका विपरीत किरदार है. शेख के किरदार की अलमस्ती को नवाज जीवंत कर देते हैं.

लंचबॉक्स का एक मुख्य किरदार मुंबई शहर है, जो डब्बेवालों की डब्बा पहुंचाने की यात्रा, साजन और शेख के ऑफिस जाने और आने की यात्रा के माध्यम से सिनेमा में दर्ज होती है. ‘लंचबॉक्स’ में मुंबई का सिनेमाई स्टिरीयोटाइप नहीं है बल्कि रोजमर्रा की मुंबई है,  कामकाजी मर्दों, गृहणियों, डब्बोवालों, लोकल ट्रेन, ऑटो, टैक्सी की मुंबई. मुंबई की स्थानिकता को फिल्म गति और ठहराव दोनों ही बिंबों के जरिये पकड़ती है. एक तरफ यह मुंबई के बिलकुल स्थानीय-रूढ़ जीवन और इसमें जूझ रहे व्यक्तियों के जरिये मुंबई की एक अलग, सिनेमा में कम दिखाई जाने वाली पहचान को स्थापित करता है, वहीं दूसरी तरफ मुंबई के बहाने समकालीन महानगरीय जीवन की सार्वभौम छवि को भी उभारता है. मुंबई होते हुए भी यह जीवन कहीं का भी हो सकता है, जहां मर्द कार्यालय में और सड़कों पर हैं, एवं स्त्रियां किचेन में. बच्चे स्कूल जा रहे हैं या खेल रहे हैं.

आज के परिदृश्य में चिठ्ठी के जरिये बातचीत असंभव-सा लगता है. दोनों किरदार एक दूसरे से फोन पर बात करने की कोशिश नहीं करते. कहानी के बाहर इसे अतार्किक माना जा सकता है. मोबाइल का इस्तेमाल सिनेमा में सबसे व्यस्त शख्स इला का पति करता है.

इला की पड़ोसी उसके बगल में नहीं उसके फ्लैट के ऊपर रहती है. दोनों का एक दूसरे से संपर्क आवाजों, आडियो कैसेट और सामान लेन-देन करने वाली टोकरी के जरिये होता है. उनके संपर्क की छवि अमूर्त है. पति-पत्नी, मां-बेटी, सामुदायिक हर प्रकार का रिश्ता प्रभावित हो रहा है. इला के जोर देने पर उसकी मां पैसे लेने की बात जब स्वीकार कर लेती है तब इला खुद असमंजस में पड़ जाती है. पिता की मृत्यु पर इला कह तो देती है कि उसका पति भी आ रहा है लेकिन इसके सच होने के प्रति वह खुद आश्वस्त नहीं है. इला अपनी मां के सामने एक झूठ को जीने के लिये विवश है और उसकी मां भी सच जानते हुए इस झूठ को कायम रखती है. झूठ ही उन दोनों को जीवन के कठोर यथार्थ से सामना करने का हौसला देता है. सामुदायिक रिश्ता शहर में बिलकुल ही दरक चुका है. साजन के ऑफिस और मोहल्ले दोनों जगहों ने साजन को उसके अकेलेपन पर छोड़ दिया है. इसको सायास शेख तोड़ता है जो स्वयं भी अकेला है. इस शहर में सभी लोगो ने अपना एकांत विकसित कर लिया है और अब वे उसी में रहने को अभिशप्त हैं.

फिल्म की पटकथा में छोटी-छोटी बारिकियां भी ओझल नहीं हुई हैं.  इंटरकट संपादन के बीच दृश्यों में तरलता और एक दूसरे में घूल जाने की विशेषता है. रंग, प्रकाश और दृश्य- सज्जा का संयोजन ऐसा है जिससे यथार्थ कभी भंग नहीं होता या अतिरंजित नहीं लगता. इला कपड़े धो रही है, कैमरा स्थिर है, फोन की आवाज आती है. वह फ्रेम से बाहर चली जाती है. फ्रेम स्थिर है फिर आवाज आती है, आ रही हूं. कोई स्पष्ट सूचना नहीं है लेकिन दर्शकों को पता चल जाता है कि घटना क्या घटी है. दृश्यों की यही संवादात्मकता सिनेभाषा को सघन बनाती है. अकेलेपन, निराशा, सूनेपन को रचने में कैमरे की बेहतरीन मदद ली गई है.

इला देशपांडे आंटी के अशक्त पति का जिक्र चिठ्ठी में कर रही है, साजन के ऑफिस सारे पंखें चल चल रहे हैं. चिठ्ठी में देशपांडे आंटी के पंखे का रूकने का जिक्र होते ही साजन ऊपर देखता है, सिर्फ उसके सिर के ऊपर का पंखा नहीं चल रहा है, फिर वह धीरे-धीरे चलने लगता है, ऑफिस के बाकी पंखे सामान्य हैं.

साजन को एक स्त्री के बच्चे समेत आत्महत्या की सूचना मिलती है वह इस कदर आशंकित होता है कि अगले दिन ऑफिस में लंच का इंतजार करता है. कैमरा भी इस इंतजार को चित्रित करता है. दर्शकों की उत्सुकता बढ़ जाती है और अंततः चपरासी के लंच रखे जाने से इस आशंका का शमन होता है. ‘लंचबॉक्स’ हमें यह याद दिलाता है कि सिनेमा मूलतः दृश्य माध्यम है, जिसमें श्रव्य थोड़ा गौण हो तो वो और भी बेहतर संवाद रच सकता है. सिनेमा का एंटी क्लाइमेक्स में जाना कुछ निराश करता है. फिल्म साजन की तलाश और इला के इतंजार पर खतम होती है.

लंचबॉक्स अपने ‘अस्तित्व’ से उचाट हुए दो पात्रों को आमने-सामने रखता है जो अपने विदेहपन को त्याग कर सदेह होते हैं. आज मनुष्य के सामने सबसे बड़ा संघर्ष अपनी अंदरूनी संवेदना को बचाये रखना का है, यह संघर्ष आंतरिक अधिक है. ‘लंचबाक्स’ की सफलता इस संघर्ष के सूक्ष्म चित्रण में है. यह संघर्ष चलते हुए पंखे को साफ करने जैसा है जिसमें अपना हाथ भी सुरक्षित रखना है और पंखा भी साफ रखना है.

 

Amitesh Kumar

 

अमितेश कुमार, दिल्ली विश्वविद्यालय से पीएचडी हैं और इलाहबाद विश्विद्यालय में प्राध्यापक हैं.  रंगमंच संबंधित  ब्लॉग ‘रंगविमर्श’ के मॉडरेटर हैं। अमितेश से amitesh0@gmail.com पर संवाद संभव है। 

 

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