Archive for the month “June, 2012”

गैंग्स ऑफ शंघाई का नॉस्टेल्जिया है वासेपुर: कुमार सुन्दरम

(गैंग्स ऑफ़ वासेपुर की इधर खूब चर्चाएँ हैं, प्रशंसकों की एक लम्बी कतार भी खड़ी हुई, लेकिन प्रशंसा के आधार को स्पष्ट करती हुई कोई समीक्षा अभी गुजरी नहीं है. जैसी स्पष्टता और तेवर सुन्दरम की इस आलोचना में है, प्रशंसकों के यहाँ से अभी आना बाकी है.)

By कुमार सुन्दरम
पत्रकारिता एक मिशन है या रोज़गार? आरएसएस एक सांस्कृतिक संगठन है या राजनीतिक परिवार और गैंग्स ऑफ वासेपुर कुछ नया गढने का एक प्रयोग है या एक मुम्बईया फिल्म, ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब भाई लोग अपनी सुविधा और मौके के हिसाब से कुछ भी दे डालते हैं। जहाँ तक चला ले जाएँ वहाँ तक मिशन, जब पकड़ में आने लगें तो बोलेंगे भाई हम भी तो एक धंधा ही कर रहे हैं, इतनी उम्मीद ही कैसे लगाते हैं..

फिल्म का प्रचार इसके रियलिस्टिकखुरदरेपन के लिए किया जाता रहा लेकिन अगर जब किसी ने यह पूछा कि भाई इसमें कोयला मजदूरों का संघर्ष सिरे से गायब है और यूनियनों का सिर्फ वसूली वाला चेहरा ही सामने आता है तो जवाब मिला भाई अब ये कोई डाक्यूमेंट्री थोड़े ही है। शंघाईके बारे में कुछ ऐसा ही पूछे जानेपर दिबाकर बनर्जी ने कहा कि तब तो ये प्रोपगंडा फिल्म हो जाती। और मुंबई में हाल के हिंसक विस्थापनों के लिए जिम्मेदार देशमुखखानदान को खास धन्यवाद जब इस फिल्म के टाइटल्स पर आता है तब?

फिल्म को समझने का शायद एक तरीका शायद यह भी होता है कि परदे के उल्टी तरफ देखा जाय. जब हम बच्चे थे तो कौतूहल से उस जगह देखते थे जहां से रंगबिरानी रौशनियाँ निकलती हैं. लेकिन उस तरफ नहीं, फिल्म को देख रहे दर्शकों की नज़रों में.

दिल्ली के उस एक मॉलस्थित सिनेप्लेक्स के अंदर जहां मैं वासेपुर देख रहा था, वासेपुर भागतीन के किरदार अच्छी तादाद में थे. वासेपुर के तीसरे भाग में, जो शायद अनुराग कश्यप ना बनाएँ, रामाधीर सिंह के पोतों से लेकर सुल्ताना डाकू की चौथी पीढ़ी तक सब उपस्थित थे. ज़्यादातर बिहार के जातिवाद‘ ‘जंगलराजइत्यादि से परेशान होकर दिल्ली आये. कारपोरेट से लेकर कॉलसेंटरों तक में नौकरियाँ करते हैं, मुखर्जी नगर में यूपीएससी की तैयारी करते हैं, मीडिया में हैं, कई तो ब्लॉग भी चलाते हैं. दिल्ली में अपने उन सभी प्यारे लोगों को पीछे छोडकर अपने आदरणीय पिताजी, गजब के वो चाचा और उनके दोस्त जो अब भी छुट्टियों में मजे करवाते हैं जब हम दिल्ली से उनके लिए विदेशी ब्रांडेड दारू बैग में छुपाकर पहुंचते हैं. इस फिल्म को ऐसी कई दर्जन सोफिस्टिकेटेड आँखें देख रही थीं और वर्तमान की उधेडबुन के बीच उन तीन घंटों में अपनी नास्टेल्जिया को जी रही थीं. सारे नहीं, लेकिन कई दर्जन लोग तो उस हॉल के अंदर बाकायदा हर फ्यूडल संवाद, मनोज वाजपेयी की हर लुच्ची नज़र और कलात्मक ambiguity के उस understated टेक्सचर पर सीटियाँ बजा रहे थे और फब्तियां कस रहे थे. इंटरवल के बाद तो मॉल वालों ने बकायदा बाउंसरों को बुलाया इनको काबू करने के लिए.

क्या अनुराग ने यह फिल्म ऐसे दर्शकों को ध्यान में रख कर बनाई है? सीटियाँ बजाते तो लोगों को बैंडिट क्वीनके दौरान भी देखा गया था. बासु चटर्जी की आख़िरी फिल्म आस्थाके पोस्टर भी लोकल वितरकों ने बाकायदा रेखा की हॉट फ़िल्म के बतौर बनवाए थे. लेकिन फेसबुक पर वासेपुर के ऑफिशियल फैन पेज पर न सिर्फ पचानबे प्रतिशत कमेंट्स ऐसे ही चटाखेदार हैं, बल्कि खुद इस पेज के मॉडरेटर ने भी वासेपुरतीन के ग्लोबल बाशिंदों को सहलाने वाली ऐसे ही स्टेटस और तस्वीरें साझा की थीं। फेसबुक पर एक जगह अपील की गई है क्या आप मानते हैं एक अनुराग कश्यप एक राइजिंग स्टारहैं? तो फिर वोट कीजिये, नहीं तो सरदार खान आपकी कह के ले लेगा ! यहाँ दर्शकों से पूछा गया है कि बताइये वासेपुर का सबसे अच्छा डायलाग कौन सा है और पढ़िए वासेपुरतीन के लोगों ने क्या क्या लिखा है। इस बातचीत में शामिलफ्यूडल नॉस्टेल्जिया से ग्रस्त ज़्यादातर ऊंचीजात के लड़के ही शामिल हैं, भले ही कोई इस फिल्म के स्त्रीकिरदारों को मजबूत बताता फिरे।

यह बिलकुल वाजिब बात है कि एक ही टेक्स्ट के कई पाठ हो सकते हैं और लोग आखिर अपने हिसाब से ही हर सीन को डीकोड करेंगे. लेकिन अनुराग, दिबाकर और विशाल भारद्वाज जैसे लोगों की फिल्मों सचेत रूप से इन सभी पाठों को, इन सभी दर्शकों को ध्यान में रखती हैं. देवडी में अच्छे गाने हैं, वेबकैम के ऐसे रेफेरेंस जिनपर खूब सीटियाँ बजीं वह भी हैं और जिनको कुछ विमर्श ढूँढना ही है उनके लिए पुरानी नई पारो के बीच तुलनात्मक अध्ययन का भी पूरा स्कोप है. यह सबकुछ सचेत है. कश्यप जैसे लोगों ने न सिर्फ हमारी फिल्मों का नया क्राफ्ट गढा है बल्कि इसके लिए नया बाज़ार, नया अर्थशास्त्र और प्रमोशन के नए तरीके भी ढूंढें हैं. लेकिन इन सबका मूल्यांकन करते समय सन 90 के बाद के उस सामाजिक बैकग्राउंड को भी ध्यान में रखना होगा आखिर जिसके चलते ही यह सब संभव हुआ है.

कहने को तो हाल की इन सारी फिल्मों ने हिन्दी सिनेमा को ज़मीनी टच दिया है, शायद पहली दफा डीटेल्सऔर टेक्सचर पर इतना काम हुआ है. लेकिन गौर से देखें तो सच को, उस खुरदरे टेक्सचर को एक निर्लिप्त artifact बना देना क्या एक ट्रेजेडी नहीं है? इश्किया की देहाती विद्या बालन में वह बिलकुल शहराती विटऔर sensuousness हो, शंघाई में मुंबई की बस्तियों के संघर्षों को लेकर यह सब चलता रहता है, बहुत क्रूर है यहाँ सबटाइप अवसरवादी सिनिकल निर्लिप्तता हो या वासेपुर के मजेदार माफिया हों, इन सबमें सच के कुछ हिस्सों को लकड़ी की हूहू मूर्ति में तब्दील कर आपके सामने ऐसे रख दिया गया है जिसे आप प्रशंसा और हसरतों से देखते रहे. रियलिटी का यह सिनेमाई रिप्रोडक्शन इतना जबरदस्त है कि वासेपुर के लोग भी उतना ही विरोध करते हैं जिससे दुनिया को पता चल जाय कि वासेपुर असल में कोई जगह है, और फिर फिल्म देखने बैठ जाते हैं. मैं भी दूसरा हिस्सा देखने के लिए टिकट कटाऊंगा ही.

ज़मीन की खुशबू और खुरदरापन लिए ये फिल्में इतनी ही ज़मीनी हैं कि वासेपुर और इश्क्रिया के ज़माने में मेरे कसबे के हॉलों में लोग या तो मिथुन/अमिताभ की पुरानी फिल्में देखते हैं या फिर भोजपुरी की. ये नई ज़मीनी फिल्में ज़मीन के लोगों पर बनी हो सकती हैं, उनके लिए नहीं बनी हैं. क्योंकि मल्टीप्लेक्स से लेकर संगीत के अधिकार तक इनका अर्थशास्त्र पूरा हो जाता है. कमसेकम उन पुरानी फिल्मों के प्रोड्यूसरों को मेरे गाँव के दर्शकों के बारे में सोचना पडता था. अब ये दिक्कत खत्म हो गई है. तो सिनेमा की दुनिया में दो धड़े हैं एक जो अपने दर्शकों को उन्ही की दुनिया की कहानियां सुनाता है, और दूसरा उस दुनिया की जो अब वो पीछे छोड़ आए हैं. और नास्टेल्जिया की ताकत इतनी ज़्यादा होती है कि कमसेकम अभी के लिए तो यश चोपडा ने भी इसके आगे घुटने टेक दिए हैं और इश्कज़ादे बनाने में लग गए हैं. एक समूचा टीवी चैनल बस सरोकारों के बाज़ार पर ही टिका है. सब दरअसल मध्यवर्ग के इस संक्रमण काल की उपज है, एक और कुछ समय बाद हम इन छिछले इमोशंस को भी झिडक देंगे. मसाला फिल्मों की ताकत चूकी नहीं है. यह सिर्फ संयोग है लेकिन कितना सटीक कि वासेपुर और दबंग बनाने वाले सगे भाई हैं और उन्होंने बाज़ार के दो हिस्सों को आपस में बाँट लिया है.

यह सब लिखने का मतलब मध्यवर्ग के सर्षकों को गरियाना नहीं है. ना ही उस संभावना को जिसमें मुख्यधारा की सीमाओं के बीच अलग तरह का कुछ कहने की गुंजाइश बने. लेकिन जिरह यह है कि आप उस भाषा का, उस संभावना का उपयोग कर किसलिए रहे हैं.

हिन्दी के वर्चुअल स्पेस का, जे.एन.यू के मेस का आप अपने प्रचार के लिए उपयोग तो करें लेकिन जब सवाल पूछ लिए जाएँ तो आप अपना एरोगेंस दिखायें, यह कमसेकम आपके लिए तो अच्छे आसार नहीं ही हैं। अनिल जी की इस बात पर ध्यान दें – “शुरूआती गुबार थमने के बाद यह फिल्म अपने निर्देशक की कह के नहीं ‘कस के लेगी’ इसमें कोई दो राय नहीं है।

कुमार सुन्दरम जे.एन.यू. में निरस्त्रीकरण अध्ययन के शोधार्थी हैं. इनकी वेबसाईट DiaNuke.org परमाणु ऊर्जा को लेकर चल रहे संघर्षों पर ज़रूरी बहसों, दस्तावेजों और जानकारियों का अच्छा ठिकाना है.

अकथ कहानी प्रेम की: संतो धोखा कासूं कहियो-2 : मार्तंड प्रगल्भ

(‘संतों धोखा कासूं कहियो’ के पहले भाग पर व्यापक प्रतिक्रियाएं हुईं. सहमती-असहमति दोनों स्वरों को सुना-पढ़ा गया. अधिकांश प्रतिक्रियाएं मौखिक रूप में ही आयीं. लेकिन, जो भी आयीं उनके माध्यम से लेख के कुछ-एक महत्वपूर्ण अभाव उभर कर सामने आये.  कबीर की कविता को पढने में या कवि कबीर को खोजने में पुरुषोत्तम अग्रवाल जी की पुस्तक कितनी मदद करती है, जैसे बिंदु अछूते रह गए थे. समीक्षा के बहाने इस लेख में मार्तंड ने कबीर के कविपक्ष और उस कविपक्ष के प्रति अग्रवाल जी के व्यवहार को खंगालने की कोशिश की है. अभी तक अग्रवाल जी की कोई भी टिपण्णी इस लेख के सन्दर्भ में सामने नहीं आयी है, समीक्षा-लेख की इस धारावाहिकता को समृद्ध करने में उनकी टिपण्णी एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगी, ऐसी उम्मीद अभी शेष है!)

By  मार्तंड प्रगल्भ

एक आलोचक-विचारक के रूप में पुरुषोत्तम अग्रवाल हमेशा प्रभावित करते रहे हैं. और जैसा हर आलोचक-विचारक के साथ होता है, पुरुषोत्तम अग्रवाल की चिंतन धारा में भी अलग-अलग पड़ाव आये हैं. अलग-अलग काल खण्डों में जो कुछ वैचारिक दुनिया में घटता जाता है आलोचक-विचारक उससे संवाद भी करता जाता है. इस क्रम में कभी वह समकालीन चिंतन की आलोचना करता है ,कभी उसको एक हद तक स्वीकार करता है, कभी मुखामुखम से चिंतन की नयी दिशा पाता है, और कभी समकालीन विमर्शों के हाथों पराजित सा महसूस करते हुए अपनी चिन्ताधारा को उनके आगे नतमस्तक कर देता है. अग्रवाल जी की किताब ‘अकथ कहानी प्रेम की ..’ को अर्चना वर्मा ने ‘पुरुषोत्तम के प्रेम की अकथ कहानी’ के रूप में देखा है. मैं भी चाहता हूँ कि इस किताब को खुद पुरुषोत्तम जी के चिंतन की कहानी की तरह देखा जाए. हाँ फिलवक्त उस चिंतन के केंद्र में कबीर ही होंगे.

किताब बार-बार घोषणा करती है  कि वह पुरुषोत्तम जी के पिछले तीस वर्षों के अथक परिश्रम का फल है. और यह भी कि इस किताब में आई स्थापनाएं और अवधारणाएं बीज रूप में वही हैं  जो ‘विचार के अनंत’ में थीं. क्या सचमुच ऐसा है? पहले हम यह देखते हैं कि इस किताब में कबीर विषयक स्थापनाएं क्या हैं. फिर थोड़ी चर्चा ‘विचार के अनंत’ के बीज विचारों की होगी ,ताकि पुरुषोत्तम जी के दावों को जांचा-परखा जाए. इसके साथ ही साथ यह तो देखने का प्रयास चलता ही रहेगा कि उनके तीस वर्षों के इस अथक परिश्रम ने कबीर को हमारे सामने किस रूप में उपस्थित किया है और इस प्रकार उनकी ‘कवि कबीर की खोज’ ने कबीर की कविता के बारे में हमारे मूल चिंतन में कैसा परिवर्तन किया है. इसी चर्चा में हमें आलोचक-विचारक पुरुषोत्तम की चिंतन की दिशा और उनकी हताशा का भी साक्षात्कार शायद हो जाए!

पूरी किताब मोटे तौर पर दो भागों में है. पहला और बड़ा हिस्सा कबीर के वक्त को पहचानने के लिए इतिहास और समाज विज्ञान की मान्यताओं से जिरह का भ्रम पैदा करती है. और दूसरा हिस्सा कबीर की कविताई पर है. यह देखना मनोरंजक है कि पहले हिस्से की मान्यताओं का दूसरे हिस्से की व्याख्याओं से रिश्ता दूर-दूर का ही है. पर रिश्ता तो है. क्योंकि कबीर की कविता तक पहुँचने के लिए , उसको पूरा पाने के लिए समय के विस्तार को और उसकी कारस्तानियों को समझना तो होगा. और पुरुषोत्तम का दावा है कि इसे समझने में जो सबसे बड़ी रुकावट है, वह है औपनिवेशिक काल में रची गयी और अब बद्धमूल हो गयी हमारी दृष्टि. जिसे वह ‘औपनिवेशिक ज्ञान-कांड’ कहते हैं. उनका दावा है कि इस ‘ज्ञान-कांड’ से मुक्त हो के देखें तो साफ़ दीखता है कि कबीर वैष्णव थे! और उनकी काव्य संवेदना के मूल में बनियों की संवेदना है!

किताब में कहीं लिखा है कि कबीर अपने को “जाति-कुल निरपेक्ष वैष्णवता के सर्वाधिक निकट पाते हैं- ‘भगती नारदी मगन सरीरा| इहि विधि भव तरे कबीरा’, कारण यह कि वैरागी जात-पांत की परवाह नहीं करते थे- ‘इन मुन्डीयन मेरी जात गंवायी|’ (पृष्ठ-१६३) फिर कुछ पृष्ठों बाद लिखते हैं- “शाक्त-साधना कबीर की जिज्ञासा का आरंभ या एक पड़ाव ही हो सकती थी, परिणति नहीं| वहाँ से शुरू करके वे नाथों, सूफियों के रास्ते से भी गुजरे और आखिरकार जो पहचान  उनके साथ चली, जिसे उन्होंने खुद अपनाया, वह वैष्णव की ही थी”.(पृष्ठ-१८६) अर्थात कबीर वैष्णव ही थे. ये रामानंदी वैष्णव थे , स्मार्त नहीं. स्मार्त वैष्णव तो तुलसीदास थे. रामानंदी वैष्णव तो जाति-कुल निरपेक्ष थे. परन्तु अग्रवाल जी ने कहीं ये नहीं दिखाया है कि भक्ति के अलावा भी क्या रामानंदी वैष्णव जीवन के हर क्षेत्र में जाति व्यवस्था को नकार देते थे. जैसा कि नाथों के यहाँ था. कबीर के जिन पदों का हवाला अग्रवाल  देते हैं उनमें किसी भी पद में कबीर सीधे सीधे खुद को वैष्णव उसी तरह नहीं कहते जैसे खुद को जुलाहा कहते हैं. फिर वैष्णवों को भी धिक्कारते हुए कहते ही हैं कि ‘ वैष्णव भया तो क्या भया, बूझा नहीं विवेक’. पूरी किताब में उस विशेष परिस्थिति और सन्दर्भ की अनदेखी है जहां से कबीर नारद भक्ति और रामानंदी वैष्णवता दोनों की आलोचना करते हुए भक्ति और व्यक्ति दोनों की और इस प्रकार अपने आस-पास के व्यापक समाज की मूलगामी व्याख्या करते हैं. अग्रवाल जी ने नीची जातियों के बीच वैष्णवता की स्वीकार्यता के साक्ष्य के लिए विलियम क्रुक का उदाहरण दिया है. और इस जगह अग्रवाल कहीं ये सवाल  नहीं उठाते कि खुद क्रुक अग्रवाल के अनुसार बताई गयी रामानंदी वैष्णवता को कैसे समझ रहे थे. दरअसल यह भी एक विशेष चयन है. बाकी चिन्तक जो उपनिवेश काल में भक्ति और जाति पर विचार कर रहे थे वो तो खैर गैर ऐतिहासिक और ‘औपनिवेशिक- ज्ञानकाण्ड’ की तैयारी में थे, परन्तु क्रुक की बातें रोज़मर्रा की वास्तविकता को  देख रही थी. इसलिए “ ‘निम्न’ जातियों के वैष्णव पंथों की विशेषता विलियम क्रुक ने बिलकुल ठीक पहचानी थी- “ ब्राह्मणों के वर्चस्व और विशेषाधिकारों का विरोध करते हुए, सार्वजनिक उपासना के पवित्रतर और अधिक बौद्धिक रूपों की प्रतिष्ठा”. इस प्रकार कबीर के समय को और क्रुक के समय को लगभग एक मानते हुए अग्रवाल जी सामाजिक परिवर्तन की गैर ऐतिहासिक समझदारी तक पहुँच जाते हैं. अगर क्रुक की बात सही थी तो यह भी सही था कि कबीर और अन्य निर्गुनियों ने वर्णाश्रम  की जो मूलगामी आलोचना की थी वह सगुण भक्ति के प्रभाव और ब्राह्मण धर्म के १७वीं सदी के अंत और १८वीं सदी में होने वाले पुनरुत्थान के बाद भी अपनी विशेषताएं बहुत हद तक बचाए रखा था. अकारण  नहीं कि ऊपर से खुद को वैष्णव मानते हुए भी ये ‘निम्न जातियां’ ब्राह्मण धर्म  के बरक्स अपने को ज्यादा ‘प्रगतिशील’ बनाए रखीं थीं. वैसे यह भी जानने लायक है कि क्या सचमुच ये जातियां खुद को वैष्णव कहती थीं? या फिर क्रुक ने अपनी तरफ से इन्हें वैष्णव मान लिया था? क्रुक उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशक में नोर्थ वेस्ट प्रोविंस और अवध का सर्वेक्षण कर रहे थे. २०वीं सदी के पहले दशक के शुरुआत में ही ग्रियर्सन को किसी मिशनरी मि. डन ने चिट्ठी लिखा  था. मि. डन ने इलाहाबाद ,दिल्ली और गुडगाँव जिलों के अपने १९ साल के अनुभव के आधार पर तुलसी के बारे में ग्रियर्सन की बात की पुष्टि की, तथा लिखा की तुलसी के दोहे या चौपाइयों को सुनांने से प्रशासकों का काम कितना आसान हो जाता है क्योंकि लोग तब उनसे अपना जुड़ाव महसूस करते हैं. लेकिन उसने अपने पत्र में यह भी बताया था कि कबीर के दोहे भी उतने ही लोकप्रिय हैं. हिंदू ब्राह्मण और बनियों के बीच तुलसी ज्यादा स्वीकार्य थे जबकि The influence of Kabir is, I think fully important, in fact, Kabir touches races and castes who have little in common with Krishanism and who know little of राम दशरथ का बेटा, but much of राम जग का करता, as they phrase it (and pronounce it too.) Kabir is, if I mistake not the great Guru of kolis and chamars as well as many higher in the scale. (pp.462-63)(Appendix 1 , On The Influence Exercised by Tulasi Das in Western Hindostan .JRAS- 1903.) मि. डन को ये निम्न जातियां वैष्णव नहीं लगी थीं!

द्विवेदी जी के यहाँ कबीर ‘अवैष्णव नहीं थे’. अग्रवाल जी के यहाँ वह सीधे वैष्णव हो गए. सामाजिक और धार्मिक पहचानों की ऐसी व्याख्याएं कबीर के भीतर के उस ऐतिहासिक क्षण को अनदेखा करता है जहां श्रम में निहित विचारधारा, उधार ली गयी विचारधाराओं पर विजय पा लेती है. कबीर के भीतर का जुलाहा अपने श्रम की विचारधारा जब पहचान जाता है तो उसके लिए धर्म और वर्णाश्रम जैसे भेदपरक प्रवर्ग और शोषणपरक व्यवस्थाओं का सच भी सामने आ जाता है. कबीर के काव्य में जो निषेधपरक शब्दावलियों की इतनी भरमार है वह उनके चिंतन पद्धति की भी एक खास विशेषता है. और वह है सत्य को निषेध के निषेध के रूप में पहचानने और समझने की कोशिश. कबीर की सहज दृष्टि, उनके सहज तर्क और प्रत्यक्ष अनुभव को महत्व देने की घोषणा अर्थात उनके अनुभव सम्मत विवेकवाद ने ‘निषेध के निषेध’ को उनकी काव्य युक्ति में बदल लिया है. और जहां तक वैष्णव होने की बात है ,कबीर का यह पद हमें कुछ और ही बता रहा है-

माटिक कोट पषानक ताला, सोई बन सोई रखवाला|
सो बन देखत जीव डेराना, ब्राह्मण वैष्णव एकै जाना|
जौ रे किसान किसानी करई, उपजै खेत बीज नहिं परई |
छांड़ि देहु नर झेलिक झेला, बूडे दोऊ गुरु औ चेला|
तीसर बूडे पारधि भाई, जिन बन डाहो दावा लाई|
भूँकि भूँकि कूकुर मरि गयऊ, काज न एक सियार से भयऊ|
मूस बिलाय एक संग, कहु कैसे रहि जाय|
अचरज एक देखहु हो संतो, हस्ती सिंघाहि खाय||(रमैनी ६०,रामकिशोर शर्मा संपादित)

मिट्टी के किले पर पत्थर का ताला लगा है. चारो तरफ साधनाओं का जंगल है . इनको देख के जीव डरता है. साधनाओं के इस जंगल के अलग-अलग रखवाले हैं. और सब जड़ हैं पत्थर के ताले जैसे हैं. फिर वो ब्राह्मण हो या वैष्णव. ये खुद भी डूबेंगे और अपने चेलों को भी डुबायेंगे. ये अपना फायदा खोजने वाले सियार हैं जिनसे किसी काम के संभव होने की आशा करना भी मूर्खता है. कबीर किसी संशय में नहीं थे. उन्हें साफ़ पता था कि ऊपर-ऊपर की भिन्नता रखने वाले ब्राह्मण या वैष्णव, सब माया के जंजाल के वशीभूत हैं. इनके सहारे मुक्ति की आशा व्यर्थ है. इनकी साधना झूठी है. ऎसी स्थिति में कबीर के कुछ पदों में वैष्णवों के प्रति थोड़ी सहानुभूति देख कर अग्रवाल जी कबीर को भी वैष्णव घोषित कर देते हैं. और हमारी समझ से यह भूलवश नहीं है. इसके पीछे भी एक राजनीतिक दृष्टि है. और वह है गांधी के वैष्णवता को कबीर से जोड़ने की राजनीति. इस किताब में कम से कम तीन जगहों पर ‘देशज आधुनिकता’ और गांधी के दर्शन की साम्यता तो स्पष्ट की ही गयी है. लब्बो लुआब यह है कि ‘औपनिवेशिक ज्ञान कांड’ का सार्थक प्रतिउत्तर गाँधी के देशज आधुनिकता में है, और यह ‘देशज आधुनिकता’ कबीर की ही परम्परा में है. कबीर वैष्णव थे और ‘वैष्णव जन ते..’ गाने वाले गांधी सच्चे कबीर पंथी!

पुरुषोत्तम जी ने यह भी दिखाया है कि मध्यकाल में व्यापार के विकास ने बनियों को एक समृद्धि और रूतबा दिया. इस कारण बनियों के यहाँ मिलने वाला ‘फेयर प्ले’ का एथिक्स समाज में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है. और इस प्रकार वर्णाश्रम को चुनौती देते हुए जन्म-आधारित भेद भाव को चुनौती देता है. बनिया समाज दरअसल पुरुषोत्तम जी की ‘देशज आधुनिकता’ का अग्रदूत था. और इस प्रकार कबीर की ‘आधुनिक चेतना’, उनका वर्णाश्रम विरोध, समानता की घोषणा बनिया समाज के एथिक्स का ही काव्य संवेदन में रूपांतर था. और पुरुषोत्तम जी ने साबित करना चाहा है कि कंजूस बनियों का मिथक तो औपनिवेशिक काल की उपज है. वरना कबीर ने तो खुद अपने साईं को ही बनिया कहा था. बेवकूफ बनियों का मिथक झूठा है. पुरुषोत्तम जी दस्तकारों और ‘निम्न जातियों’ की संवेदना को कबीर में रूपांतरित होने पर चलताऊ ढंग से टिप्पणी करते चलते हैं जबकि बनियों कि संवेदना और कबीर पंथ में उनकी उपस्थिति पर विस्तार से और जब भी मौक़ा मिलता है चर्चा करते हैं. बालाघात का यह अंतर निम्न जातियों से आने वाले दस्तकारों के आत्मविश्वास और उस आत्मविश्वास में निहित क्रान्तिकारी चेतना से कबीर की काव्य-संवेदना को अलग करने की प्रक्रिया में है. अग्रवाल जी लिखते हैं- “व्यापारी और दस्तकार उस कवि से निश्चय ही अपनापा महसूस कर सकते थे, जो अपने राम को, साईं को कभी रंगरेज बना देता था, कभी ‘बाणियाँ’. जो कविता में भी अपनी कल्पना तरह-तरह की दस्तकारी के काम करने वाले कारीगर के रूप में भी करता था, और दूकानदार व्यापारी के रूप में भी. जो सार्थक जीवन बिताने के संतोष को उस दुकानदार की भाषा देता था, जिसने सौदा पूरा बेच लिया है, इसलिए जिसे हाट में दुबारा आने की ज़रूरत नहीं रही-“ पूरा किया बिसाहुणाँ,बहुरि न आवौं हट्ट.” और जो जीवन व्यर्थ गवां देने की चूक को भी वाणिज्य का अवसर गवां देने के रूपक में ही बांधता है- “कहे कबीर कछू बनिज न कीयौ, आयौ थौ इहि हाटि’ (ग्रंथावली, राग केदारी,१४) जो अपने मन को, लाभ के लोभ में मूल ही न गवां बैठाने की चेतावनी भी सावधान व्यापारी के लहजे में ही देता है-“मन बंजारा जागी न सोई| लाहे कारनि मूल न खोई” (ग्रंथावली,राग बिलाबल,६) “(पृष्ठ-१४४) कविता के रूपकों और प्रतीकों को अगर इस तरीके से पढ़ा जाए तो फिर निम्न पद का क्या मतलब निकलेगा –

मन बनियाँ बनिज न छोड़ै|
जनम जनम का मारा बनियाँ, अजहूँ पूर न तौले |
पासंग के अधिकारी लैले,    भूला    भूला    डोलै|
घर में दुविधा कुमति बनी है, पल पल में चित तोरै|
कुनबा वाके सकल हरामी,  अमृत  में  विष   घोलै|
तुमहीं जल में तुमहीं थल में , तुमही घट घट बोलै |
कहै कबीर या वा सिष को डरिये, हिरदे गाँठि न खोलै | (कबीर-वाणी, १५९)

क्या यहाँ ‘कबीर की संवेदना और व्यापारियों के बीच आत्मीयता पर रोशनी’ पड़ रही है? साई को बनिया बताने वाले कबीर, मन को भी बनिया बताते हैं. हमेशा डाँड़ मारने वाला बनिया. कभी पूरा न तौलने वाला बनिया. कुमति का मारा बनिया. अमृत में भी विष घोलने वाला बनिया. मिलावट का व्यापार करने वाला बनिया. ऐसे बनियों का तो पूरा कुनबा ही ‘हरामी’ है. इन ‘हिरदे गाँठि न खोलै’ बनियों से तो हमेशा डरना चाहिए. अब अगर पुरुषोत्तम जी के ही तर्क पर चलें तो बनियों के ‘फेयर-प्ले’ के एथिक्स का तो कबीर ने चिंदी-चिंदी कर डाला है इस पद में. और कंजूस बनियों के छवि निर्माता ‘औपनिवेशिक आधुनिकता’ से उसका यह महान योगदान छीन लेते हैं कबीर! कवि कबीर की खोज क्या ऐसे ही आधारहीन साक्ष्यों पर होगी! वास्तव में पुरुषोत्तम जी को बनियों के एथिक्स के सहारे कबीर की कविता के मूल में निहित उस क्रांतिकारी संवेदना से ध्यान हटाना था जिसे हम ‘अनुभवसम्मत विवेकवाद’ कहते हैं. और यह ‘अनुभवसम्मत विवेकवाद’ शास्त्रों के विवेकवाद को नकारने वाला और ‘आखिन देखि’, प्रत्यक्ष अनुभव को अभिव्यक्त करने वाला ‘निम्न जातियों’ से आये कामगारों के यहाँ ही संभव था. वर्णाश्रम की मूलगामी आलोचना और धर्म मात्र की मूलगामी आलोचना के पीछे भी इसी को मानना चाहिए. और हाँ कबीर की काव्य संवेदना को बनियों की संवेदना बताने के खतरनाक खेल से बाज आना चाहिए. और कबीर की कविता को अपनी मान्यताओं की पुष्टि के लिए इस्तेमाल करने की साजिश का विरोध करने वाले पुरुषोत्तम जी के खुद के वैचारिक पूर्वग्रह भी यहाँ स्पष्ट ही हैं. और कौन जाने जैसे जैनियों को बनियों ने संरक्षण दे कर उसकी क्रांतिकारी अंतर्वस्तु को खान पान तक की शुद्धता और अहिंसा तक सीमित किया कहीं वही हाल कबीर पंथों में बनियों की उपस्थिति ने तो पैदा नहीं किया! बहरहाल यह शोध का विषय है. इस ओर थोडा इशारा मोनिका हर्टस्मान ने भी किया ही था.(देखें संवेद, जुलाई २०१०. पृष्ठ-१९२-१९३)

आइये थोडा रुक कर बात कबीर की नारदी भक्ति पर भी करते चलते हैं. पुरुषोत्तम जी का कहना है कि कबीर खुद अपनी भक्ति को नारदी मानते हैं. ‘भक्ति नारदी मगन सरीरा’. जायसी कहते हैं कि कबीर नारदी भक्ति के इतने बड़े साधक थे कि इस साधना में खुद नारद भी उनसे पीछे छूट गए. ‘ना नारद तब रोइ पुकारा, एक जुलाहे सो मैं हारा’. यह बात पुरुषोत्तम जी को नामवर जी ने एक निजी बातचीत में कहा था. किताब के दूसरे संस्करण में इसका उल्लेख पुरुषोत्तम जी ने किया है. रुक कर सोचने वाली बात यह है कि जायसी ने कबीर को नारदीय भक्ति के आदर्श नारद से भी आगे जाने वाला क्यूँ कर कहा है. कबीर की भक्ति में वो कौन सी बात है जो उसे नारद सूत्र में निरुपित भक्ति से भी आगे ले जाती है. कबीर क्यूँ कर नारदीय भक्ति को ट्रांसैन्ड कर पाए. नारद भक्ति सूत्र उस प्रक्रिया की ओर इशारा करता है जो १०वीं सदी के अनन्तर समूचे यूरेशिया में घटित हो रहा था. इसे द्विवेदी जी शास्त्रों का लोक की तरफ झुकना कहते हैं. और शेल्डन पोलक देश्यभाषाकरण की व्यापक प्रक्रिया के सहारे व्याख्यायित करते हैं. जिस प्रकार संस्कृत- अपभ्रंश की सार्वत्रिक और अर्द्ध सार्वत्रिक संस्कृति को विस्थापित कर देशी भाषाओं में साहित्य रचना शुरू हुई उसी प्रकार धर्म साधनाओं के पुराने शास्त्रों को स्थानीय धर्ममतों ने चुनौती दी. इस प्रक्रिया में ही भक्ति संबंधी पुराने शास्त्रीय चिन्तनों को ज्यादा लोकोन्मुख और स्थानीय विशेषताओं से जोड़ने की कोशिशें भी हुई. यह एक दुहरी प्रक्रिया थी जहां लोक का शास्त्रीकरण भी ओ रहा था और शास्त्रों का लौकिकीकरण भी. उत्तर भारत में देश्यभाषाकरण की प्रक्रिया जैसे तुर्क सत्ता और उसके साथ आये इस्लाम और सूफी तत्वों के भिन्न सांस्कृतिक-राजनीतिक हस्तक्षेप से शुरू हुई उसी प्रकार भक्ति आदि के चिंतन के लौकिकीकरण पर भी इस भिन्न सांस्कृतिक हस्तक्षेप का प्रभाव पड़ा. मध्यकाल के वैष्णव भक्त विश्वनाथ ने कहा कि ‘प्रेम ही परम पुरुषार्थ है- प्रेमाः पुमर्थो महान्’. ऐसा पहले कभी नहीं कहा गया था. चार पुरुषार्थों के अतिरिक्त प्रेम न केवल पांचवां पुरुषार्थ माना गया वरन् इसे अन्य पुरुषार्थों से ज्यादा श्रेष्ठ भी कहा गया. भक्तों के लिए और सारे पुरुषार्थ कोई अर्थ नहीं रखते. क्या यह सूफियों का प्रभाव नहीं था. उसी तरह नारद भक्ति सूत्र में भी भक्ति को ‘परप्रेमरूपा’(२) ‘अमृतस्वरूप च’ (३) कहा गया. यहाँ अनिर्वचनीय को सीधे प्रेमस्वरुप ही माना गया.( अनिर्वचनीयं प्रेम्स्वरूपम् .५१.) प्रेम की ऎसी प्रतिष्ठा में सूफियों का प्रभाव था. चाहे पाकपत्तन के बाबा फरीद हों या लोरिक चन्दा की प्रेमकहानी गाने वाले मुल्ला दाउद. देशी भाषाओं में प्रेम को प्रतिष्ठित करने वाले ये सूफी ही उत्तरभारत की देशी भाषाओं के पहले पहल कवि थे. बहरहाल चाहे वो विश्वनाथ हों या नारद भक्ति सूत्रकार, भक्ति और प्रेम की यह जाति-कुल निरपेक्षता भक्ति के विशेष क्षेत्र में ही सीमित था. रोज़मर्रा की आम ज़िंदगी में वैष्णवों को शास्त्र-सम्मत आचरण करने होते थे. ऐसा नारद भक्ति सूत्रों से भी स्पष्ट है.  कबीर ने नारदीय भक्ति को ठीक वैसे ही स्वीकार नहीं किया. नारद भक्ति सूत्र में भक्ति के लिए जाति-कुल और कर्मकांड तथा लोक-वेद दोनों को अस्वीकार किया था, ऐसा उन सूत्रों को समग्रता में पढने पर सही नहीं लगता. भक्ति के क्षेत्र में समानता की चर्चा तो एक हद तक रामानुजम के यहाँ भी थी.फिर भक्ति के आदर्श उदाहरण के रूप में गोपियों की कृष्ण के प्रति प्रेम को बताया गया है. लेकिन ये प्रेम कैसा होगा और किस तरीके से होगा इसका उल्लेख नहीं किया गया है क्यूंकि यहाँ सूत्रकार सीधे भागवत में वर्णित गोपी-कृष्ण लीला को अप्रत्यक्ष रूप से संदर्भित मान रहा होता है. इसके अलावा निम्न सूत्रों को पढ़ने से हमें धर्म और वर्णाश्रम की कबीर द्वारा की गयी मूलगामी आलोचना और नारद भक्ति सूत्रों के अंतर का भी पता चलता है.

११.लोकवेदेषु तदानुकूलाचारणं तद्विरोधिषूदासीनता ||
१२.भवतु निश्चयदाढ्रयांदृध्व शास्त्ररक्षणम् ||
१३. अन्यथा पतित्यशंकया ||
१४. लोकोऽपि तावदेव भोजनादि व्यापारस्त्वाशरीरधारणावधि||
६१. न तदसिद्धौ लोकव्यवहारो हेयः किन्तु फलत्यागस्तत्साधनं च कार्यमेव||
६२. स्त्रीधननास्तिकचरित्रं न श्रवणीयम्|| (फिर भी स्त्री विरोधी दृष्टि के पीछे नाथपंथियों का प्रभाव बताते हैं अग्रवाल!,जबकि वर्णाश्रम की कठोर आलोचना करने वाले नाथों के बदले जाति-निरपेक्ष भक्ति के लिए नारदीय भक्ति सूत्र को ज़िम्मेदार मानते हैं! प्रेम के लिए भी नारदीय सूत्र, सूफियों का प्रभाव नहीं! यह उलटबांसी नहीं तो क्या है.)
७३. वादो नाव्लम्ब्यः ( कबीर खूब वाद करते हैं, और यह अग्रवाल जी के लिए नाथों का प्रभाव नहीं है!)
७६. भक्तिशास्त्राणि माननीयानि तादुद्धोधककर्माणि करणीयानि||

दस्तकारों और कामगारों के बढ़ते दबाव ने भक्ति के क्षेत्र में समानता को सामाजिक क्षेत्र में समानता के दावों में रूपांतरित किया. अकारण नहीं कि रामानंद के पहले निम्न जातियों के कामगारों की इतनी स्वीकृति नहीं थी. और कबीर ने इस दबाव को काव्य में रूपांतरित करते हुए धर्म और वर्णाश्रम की मूलगामी आलोचना की. यह अंतर इतना स्पष्ट है कि इसे किसी भी प्रकार से नारदीय भक्ति के पूर्ण स्वीकार में रिड्यूस नहीं किया जा सकता है. और न ही रामानंदी वैष्णवता की चादर में छुपाया जा सकता है. प्रेम अगर भक्ति है और केवल यही भक्ति है तो सहज प्रेम में रूकावट डालने वाले सारे मिथ्या जंजालों को भी खतम किया जाना ज़रूरी है. कबीर ने अपनी पिछली सारी परम्पराओं की आलोचना अपने सहज कामगार चित्त से की थी. और यही कारण है कि वो नाथों से लेकर नारद भक्ति और रामानंदी वैष्णवता सबको ट्रांसैंड कर जाते हैं. पुरुषोत्तम इसे बताना नहीं चाहते लेकिन प्रेम के अमर गायक जायसी इसे देख भी रहे थे और कह भी रहे थे. यहीं आकर वो उस जुलाहे से हार मान लेते हैं. कबीर के इस क्रिटिक का अग्रवाल के वैष्णव थीसिस में कोई जगह नहीं है. लेकिन कबीर पंथियों की सहज चेतना में यह लगातार रहता आया है. कई तरह के दबाव और अप्प्रोप्रियेशन के बाद भी. क्षितिमोहन सेन ने कबीर पंथी साधुओं से सुन कर जो पद इकट्ठे किये थे उनमें कबीर के नाम से यह पद भी शामिल था. कबीर यहाँ खुद नारद को संबोधित करते हैं-

नारद, प्यार सो अंतर नाहीं |
प्यार जागै तौही जागूं  प्यार सोवै तब सोऊँ ||
जो कोई मेरे प्यार दुखावै जड़ा-मूल सों खोऊँ||
जहां मेरा प्यार जस गावै तहां करौं मैं बासा||
प्यार चले आगे उठ धाऊँ मोहि प्यार की आसा||
बेहद्द तीरथ प्यार के चरननि कोट भक्त समाय||
कहैं  कबीर प्रेम  की महिमा प्यार देत बुझाय|| (२-१११, कबीर वाणी)

जो कोई भी मेरे प्यार को कष्ट देगा , उसके रास्ते में बाधा डालेगा, मुझसे दूर करने की कोशिश करेगा, दुनिया के जंजाल में फाँसेगा, अलग-अलग पंथों में भटकायेगा, ऊंच नीच का बाज़ार चलाएगा, बाह्याचार में उलझायेगा फिर चाहे वो ब्राह्मण हो या वैष्णव, शाक्त हो या वैरागी, योगी हो या अवधू , हिंदू हो या तुरक, काजी हो या पंडित, उसे मैं जड़-मूल से वंचित कर देता हूँ. नारद! प्रेम में अंतर नहीं होता, भेद नहीं होता. अर्थात नारद भक्ति में जो प्रेम का अंतर दिखाया गया है या उसका पालन किया जाता रहा है ,कबीर को वह स्वीकार नहीं. कबीर की मूलगामी आलोचना की यह प्रखरता कबीर पंथी साधुओं के चित्त से पूरी तरह धुल नहीं गयी थी. भले ही पुरुषोत्तम जी ‘औपनिवेशिक ज्ञानकाण्ड’ के सहारे यह मनवाने की कोशिश करते हों. भले ही पुरुषोत्तम गांधी को वैष्णव कबीर की परम्परा में शामिल करने का मिथ्या भ्रम फैलाते हों.

कबीर और नारद भक्ति के बीच के इस अंतर को समझने पर हमें यह भी समझ आने लगता है कि क्यों पुरुषोत्तम जी भक्ति के निर्गुण-सगुण विभाजन के बदले शास्त्रोक्त और काव्योक्त भक्ति के विभाजन को प्रस्तावित करते हैं. निर्गुण और सगुण भक्ति के साथ भक्ति के सामाजिक आधारों की स्पष्ट पहचान जुडी है. एक बार अगर यह पहचान इससे अलग कर दिया जाए तो कबीर आदि निर्गुनियों की प्रखर चेतना का महत्व भी धूमिल  हो जाएगा. पुरुषोत्तम जी कहते हैं कि नारद भक्ति सूत्र में प्रस्तावित भक्ति दरअसल शास्त्र से मुखामुखम करती कविता की स्वतंत्र संवेदना वाली भक्ति है. इसी भक्ति को रामानंद ने भी स्वीकार किया था. इसलिए यह गीता या भागवत में वर्णित भक्ति से अलहदा है. इस प्रकार नारद भक्ति सूत्र काव्योक्त भक्ति की प्रस्तावना रखता है. अगर केवल इसी मान्यता को ध्यान में रखें तब तो हिंदी के सारे भक्त कवि काव्योक्त भक्ति में समाहित हो जाएंगे. क्या सूर सिर्फ भागवत में वर्णित लीलाओं का अनुवाद कर रहे थे? या तुलसी ही ‘नानापुराण निगमागम सम्मत’ कहने मात्र से अपनी कविता में शास्त्रों का अनुवाद कर रहे थे? अगर वह अनुवाद मात्र होता तो कविता की लिहाज से कतई महत्वपूर्ण नहीं रह जाता. दरअसल जिसे काव्योक्त भक्ति कहा जा रहा है उस लिहाज से हिंदी के सारे भक्त कवि काव्योक्त भक्ति के अंतर्गत ही आ जायेंगे. इसलिए यह विभाजन निर्गुण भक्ति काव्य में निहित उस क्रांतिकारी चेतना की अवहेलना है जिसके दांत सगुण भक्ति ने उखाड़ दिए थे. पुरुषोत्तम जी का कहना है कि भक्ति काल में निर्गुण और सगुण का वैसा विभाजन नहीं था जैसा बाद में पंथों ने खडा किया था. तो क्या दार्शनिक स्तर पर सूर के भ्रमर गीतों की प्रखर निर्गुण आलोचना और सामाजिक स्तर पर  साखी,सबदी दोहरा गाने वाले निर्गुनियों को तुलसी की फटकार महज धोखा है? खुद पुरुषोत्तम जी १९९२ में जब ‘भक्ति संवेदना: शास्त्र और काव्य का मुखामुखम’ लिख रहे थे तो सर्जनात्मक शब्द के व्यापक पोलिटिक्स को शास्त्रों के बरक्स केंद्र में रखने की अपील कर रहे थे. उनके ध्यान में राम के नाम पर होने वाली हिंदू फासिस्ट राजनीति के समक्ष खुद सर्जनात्मक शब्द की राजनीति को रखने का आग्रह था. आग्रह था कि ‘हिंदू’ जाति की जो एक समस्याविहीन,आतंरिक संघर्षरहित राजनीतिक इकाई के रूप में जो राष्ट्रीय आख्यान  रचा गया था उसने साहित्यिक विरासत का मूल्यांकन करने के जो ‘नोर्म’ बनाए थे उसके सामने भक्ति काव्य की सर्जनात्मक चेतना को प्रतिष्ठित किया जाए. भक्तिकाव्य के ऊपर हिंदी-हिंदू का समीकरण लादने के बजाये, “हिंदू जातिपरक नार्म के समक्ष इसे नतमस्तक करने की बजाय यदि इसके अपने स्वरुप को परखा जाए तो स्पष्ट होगा कि इसमें समाज के आतंरिक उपनिवेशीकरण की तीखी आलोचना व्यक्त हुई है”( विचार का अनंत, पृष्ठ-१३०). इस प्रकार हिंदू फासीवादी राष्ट्रीय आख्यान के उत्तर में वह आतंरिक रूप से विभाजित हिंदू अस्मिता और उसके भीतर के उपनिवेशीकरण की तीखी आलोचना करने वाली निर्गुण काव्य संवेदना को सामने रखने की कोशिश कर रहे थे. और उनका आग्रह था कि ‘साहित्य की अन्याभिमुखता को श्रेयस्कर मानने वाली साहित्यिक दृष्टि का भद्रलोकीय आत्मछवियों से जो गहरा सम्बन्ध’ रहता आया है, वह भद्र लोक ‘उपनिवेशीकरण से अत्यंत क्षुब्ध है, लेकिन आतंरिक उपनिवेशीकरण से सर्वथा बेखबर’. आज जब खुद पुरुषोत्तम आतंरिक उपनिवेशीकरण को भूल कर उपनिवेशीकरण से ही केवल क्षुब्ध हैं. जब आतंरिक उपनिवेशीकरण के ब्राह्मणवाद रुपी विचारधारा को खुद ही उपनिवेशीकरण की उपज बता रहे हैं, तब कबीर आदि के सर्जनात्मक शब्द को, उनकी प्रखर ब्राह्मणवाद-विरोधी चेतना को, ‘देशज आधुनिकता’ जैसे मुल्लमे से छुपाने की कोशिशों को क्या कहा जाएगा! अगर वो सचमुच अन्याक्रांत न होकर समाज को आगाह करने और सर्जनात्मक सब्द को स्थापित करने का दावा कर रहे हैं तो फिर उन्हीं के शब्दों में कहना होगा कि “इस दायित्व को निभाने की उत्सुकता और साहित्य के स्वत्व की चिंता यदि सच्ची है तो फिर मुक्तिबोध के मुहावरे का सहारा लेकर यही कहा जा सकता है कि ‘पार्टनर पहले अपनी पॉलिटिक्स साफ़ कर लो” (वही, पृष्ठ- १३१)

कबीर की कविता धर्मसत्ता के बरक्स धर्मेतर अध्यात्म को प्रतिष्ठित करने वाली कविता है. अग्रवाल जी की यह स्थापना सचमुच विचारोत्तेजक है . लेकिन दुर्भाग्य यह है कि पूरी बात-चीत में धर्म और धर्मेतर अध्यात्म दोनों ही एक पार-ऐतिहासिक(transhistorical) पद की तरह आये हैं. ठीक उसी तरह जैसे फायरबाख के यहाँ आये थे. मार्क्स की १८४४ की आर्थिक और दार्शनिक पांडुलिपियों में आये धर्म संबंधी चिंतन को उनके बाकी लेखन से काट कर पढ़ने पर ऐसे निष्कर्ष आते रहे हैं. वह भी तब जब पुरुषोत्तम जी के लिए श्रम के अलगाव से मुक्ति का ऐतिहासिक सन्दर्भ या मार्क्सवाद महज पश्चिमी प्रबोधन के बाध्यकारी आख्यान दिखते हों. बहरहाल ज्यादा विस्तार में न जाते हुए मैं उसी पाण्डुलिपि के सहारे अपनी बात रखने की कोशिश करता हूँ. पूरे विवाद के लिए अलग से किसी लेख की ज़रूरत है.

अग्रवाल जी ने बड़ी चालाकी से मार्क्स का सहारा लेकर श्रम और आध्यात्मिकता के अलगाव और उनके वस्तूकरण को दो अलग अलग घेरों के रूप में व्याख्यायित किया है. हांलाकि बाद में यह जोड़ना नहीं भूलते कि दोनों परस्पर सम्बंधित हैं. कैसे सम्बंधित हैं इस पर विचार नहीं है. और जहां मार्क्स ने विचार किया भी है उस हिस्से को अपने हिसाब से उपयोग में लाते हैं. मैं इस बात को दिखाने के लिए पहले अग्रवाल जी को उद्धृत करूँगा फिर मार्क्स को. मार्क्स को सीधे अंग्रेजी में उद्धृत करूँगा ताकि अनुवाद की दिक्कत से अर्थ सम्प्रेषण में दिक्कत न हो जाए. अग्रवाल लिखते हैं-

मनुष्य की आत्मसत्ता प्रकृति को ज्यों का त्यों अपना लेने की बजाय, उसके साथ आवयविक अस्तित्व में बने रहने की बजाय प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व, प्रेम और संघर्ष के रूप में फलीभूत होती है. इस क्रम में सामजिक संगठन भी बनता है और मनुष्य की स्वतः स्फूर्त गतिविधियां –कल्पना और श्रम- उसके लिए परी हो जाती है; और तब : “मनुष्य की प्रजाति सत्ता (स्पेसीस बीइंग) भी उससे छीन  जाती है. उसकी प्रकृति और मनुष्य होने के नाते उसकी प्रजाति की विशिष्ट संपदा- आध्यात्मिकता- दोनों उससे छीन जाती हैं. दोनों(उसका स्वभाव न रहकर) उसके व्यक्तिगत अस्तित्व का साधन-मात्र रह जाती हैं. मनुष्य की देह पराई हो जाती है और ठीक उसी तरह पराई हो जाती है : उसकी बाहरी प्रकृति तथा उसकी अध्यात्म सत्ता- उसकी मनुष्य सत्ता.(पृष्ठ-३२४)

अब मैं मार्क्स को सीधे उद्धृत करता हूँ. ध्यान दे कि श्रम से अलगाव का रिश्ता आध्यात्मिक अलगाव से कैसे जुडता है और अग्रवाल कहाँ उसे अलग कर रहे होते हैं.

It is just in his work upon the objective world, therefore, that man really proves himself to be a species-being. This production is his active species life. Through this production, nature appears, as his work and his reality. The object of labour is, therefore, the objectification of man’s species-life: for he duplicates himself not only, as in consciousness, intellectually, but also actively, in reality, and therefore he sees himself in a world that he has created. In tearing away from man the object of his production, therefore, estranged labour tears from him his species life, his real objectivity as a member of the species, and transform his advantage over animals into the disadvantage that his inorganic body, nature, is taken away from him.
Similarly, in degrading spontaneous, free activity to a means, estranged labour makes man’s species-life a means to his physical existence.
The consciousness which man has of his species thus transformed by estrangement in such a way that species [-life] becomes for him a means.
Estranged labour turns thus:
(3)Man’s species-being, both nature and his spiritual species-property, into a being alien to him, into a means for his individual existence. It estranges from man his own body, as well as external nature and his spiritual aspect, his human aspect.”(EPM, pp. 74,progress publishers,1977.)

अपने श्रम के उत्पाद से, अपने जीवन के क्रिया-कलापों से, अपने प्रजाति सार से अलगाव का तत्काल परिणाम होता है मनुष्य का मनुष्य से अलगाव. जो सम्बन्ध किसी मनुष्य का अपने काम से होता है, अपने श्रम के उत्पाद से होता है वही सम्बन्ध उसका दूसरे मनुष्यों से भी होता है, दूसरे मनुष्यों के श्रम से होता है और उस श्रम की वस्तु से होता है.

Hence within the relationship of estranged labour each man views the other in accordance with the standard and the relationship in which he finds himself as a worker.(pp.75)

इस प्रकार श्रम के परायेपन की अभिव्यक्ति और उपस्थिति वास्तविक जीवन में कैसे होती है ? मार्क्स यह सवाल करते हैं. अगर श्रम का उत्पाद हमसे अलग है एलियन है तो आखिर है किसका? अगर हमारी अपनी क्रियाएँ हमारी नहीं है, किसी के द्वारा मजबूर की गयी हैं,  तो वह दूसरा कौन है. एक सत्ता (बीईंग) जो मैं नहीं है. कौन है वह सत्ता? मार्क्स कहते हैं वह सत्ता इश्वर है. जो अपने वास्तविक एजेन्ट पुरोहितों आदि से हमारे आत्म पर कब्जा जमाए बैठा रहता है. (pp.75-76) इतिहास के अलग-अलग काल खण्डों में यह इश्वर श्रम के दूसरे ठेकेदारों से समझौता करता चलता है. कबीर के समय केवल इश्वर की सत्ता थी. उस सत्ता के वास्तविक एजेंट अलग-अलग संप्रदायों के ठेकेदार थे. मनुष्य-से मनुष्य को बांटने वाला वर्णाश्रम था. ब्राह्मणवादी सत्ता तंत्र था. अपने श्रम के अलगाव को समझने और मुक्त होने के क्रम में ही इस पूरी व्यवस्था का मूलभूत नकार कबीर के यहाँ संभव हुआ. इसी ने उनके प्रजाति-सत्ता को मुक्त किया. इसी कारण उनकी कविता ,उनकी कला में आध्यात्मिक अलगाव से भी मुक्ति है. कबीर सम्पूर्ण श्रम को मुक्त नहीं कर पाए. खुद के अभिज्ञान को ज़रूर उन्होंने कला में रूपांतरित किया. या रूपांतरित करने की कोशिश की. उनका अध्यात्म और प्रेम इसी मौलिक अभिज्ञान के कारण इतना सहज और विशिष्ट लगता है. अग्रवाल इस सच्चाई को समझ नहीं पाए. फिलवक्त इस अलगाव के पीछे काम करने वाला पूंजीवाद धर्मसत्ता के साथ नए राजनीतिक सम्बन्ध में है. नए सम्बन्ध बनाता जा रहा है. कबीर के समय वैश्विक दृष्टि का भ्रम केवल धर्म की भाषा में व्यक्त होता था. इसलिए उसकी आलोचना भी उसी भाषा में थी. आज वह धर्म और पूंजी के संश्लिष्ट रिश्तों में है. पूंजी से मुक्ति के लिए श्रम संघर्षरत है. इसलिए इस आध्यात्मिक अलगाव से मुक्ति की भाषा और संवेदना पूंजीवादी राजनीतिक से लड़कर ही हो सकती है. श्रम के अलगाव को दूर करने वाली राजनीति की भाषा में ही हो सकती है. अग्रवाल या तो इसे समझते नहीं हैं या समझना नहीं चाहते.

कबीर की कविताई पर अग्रवाल जी ने सहृदयता से विचार किया है. लेकिन पूरे किताब की स्थापनाओं का उसमे कोई योगदान नहीं है. मृत्यु और प्रेम संसार की सभी श्रेष्ठ कविताओं के विषय रहे आये हैं. भिन्न-भिन्न ऐतिहासिक पलों में इनका भिन्न-भिन्न तरीकों से कवियों ने अपनी काव्य अनुभूतियों में अनुवाद किया है. शब्द की महत्ता कविता पहचानती है. और वह जीवन के ज्यादा नजदीक भी होती है. इसलिए वह केवल दर्शन नहीं है. दर्शन से ज्यादा जीवन है. कबीर की कविता के पास हमें आज भी जाना होता है और आगे भी जाना होगा. पता नहीं अग्रवाल जी की स्थापनाएं कुछ दिनों बाद खुद कबीर की कविता के सामने बेबस नज़र आने लगें!

  मार्तंड प्रगल्भ जे.एन.यू. के भारतीय भाषा केंद्र में पी.एच.डी. के लिए शोधरत  हैं.

चलती हुई तस्वीरें या सपनों का कारखाना : सिनेमा क्या है? : तत्याना षुर्लेई

(भारतीय सिनेमा के सौ साल की अभी खूब चर्चाएँ हैं. लेकिन यह सौ साल इसी साल क्यूँ? जबकि यूरोप में तो यह १९९५ में मनाया जा चुका है. इसके सैद्धांतिक आधार क्या रहे हैं/ क्या हैं? हिंदी में इसकी चर्चा नहीं के बराबर है. सिनेमा यथार्थ है या कल्पना? दस्तावेज है या रूपक? इन्हीं सवालों  को तत्याना बहुत ही बारीकी से इस संक्षिप्त से नोट में हमें बताने की कोशिश करती हैं. तिरछी स्पेल्लिंग इस अंतर-दृष्टि-परक लेख  के लिए उनका आभारी है. साथ ही साथ यह उम्मीद भी कि तत्याना के द्वारा उठाये गए प्रश्नों के आलोक में यह बहस आगे भी चले!)
By तत्याना षुर्लेई
सिनेमा बहुत पुराना आविष्कार नहीं है, उसका जन्म 28 दिसम्बर 1895 को हुआ, जब लिमिएर (Lumière) -बंधु ने पेरिस में अपना नया मशीन दिखाया। एक दिलचस्प बात यह है कि पहला शो ग्रैंड होटल के ‘इंडियन रूम’ मे किया गया। शायद यह जगह एक संकेत था कि आगे चलकर भारत फिल्मों का सब से बड़ा व्यावसायिक केंद्र बन गया। पहले शो के बाद लोगों को पता चला कि यह आविष्कार कितना अच्छा है और सारी दुनिया बंधुओं की चलती हुर्इ तस्वीरें देखना चाहती थी। आस्ट्रेलिया (Australia) जाते हुए लिमिएर-बंधुओं के सहयोगियों ने मुंबई में रुककर, 7 जून 1896 को पहली बार भारत में फिल्मों का शो किया।

 इस शो के बाद पशिचम देशों की ही तरह भारत में भी यह नया आविष्कार लोगों को बहुत अच्छा लगा। कुछ सालों बाद पहली भारतीय फिल्म 19वीं शताब्दी के अंत से पहले बनायी गयी (अलग-अलग स्त्रोतों में पहली भारतीय फिल्म बनने का काल अलग-अलग लिखा जाता है। (1897 साल से 1900 तक)। भारतीय सिनेमा के जनक सखाराम भाटवाडेकर उर्फ सवे दादा  हैं जो महाराष्ट्रा में रहने वाले एक फोटोग्राफर थे. लिमिएर-बंधुओं के मशीन से मोहित होकर उन्होनें एक कैमरा खरीदा और आस-पास में जो भी दिलचस्प लगा उसे अपने कैमरे में कैद करने लगे । इस समय की भारतीय फिल्में पश्चिम से मिलती-जुलती थीं जो कि सिर्फ वास्तविकता दिखा रही थीं।

तथापि भारत और पशिचम के देशों में एक बड़ा अंतर है। यूरोप और इंग्लैंड में सिनेमा का सौ साल  1995 को मनाया जा रहा था। जिसका मतलब यह है कि पशिचम के विचार से पहली फिल्म  लिमिएर-बंधुओं की चलती हुई तस्वीर थी। भारत की सिथति बिल्कुल अलग है। राजा हरिश्चंद्र  के पहले की किसी भी फिल्म को, जिसे सखाराम भाटवाडेकर उर्फ सवे दादा ने या दादा  साहेब  फाल्के ने बनाया था, फिल्म नहीं मानी जाती है. सिनेमा का सौ साल राजा हरिश्चंद्र का सौ साल है  जिसमें पहली बार एक कहानी दिखाया गया. ऐसा अंतर क्यों?  इस सवाल का जवाब ढूँढ़ने के लिए  हमें सब से पहले फिल्म के तत्त्वों के बारे में सोचना चाहिए। अपने इतिहास के आरंभ में फिल्म, सभी  लोगों के लिए , तस्वीर उतारने का नया तरीका माना जाता था। चलती हुई तस्वीरें इसलिए  महत्त्वपूर्ण  मानी गयीं क्योंकि वह दर्शकों को फोटो से ज्यादा वास्तविक लगती थीं। ऐसी तस्वीरें जीवन के प्रलेख मानी जाती थीं, जो सालों बाद पुराने जमाने के बारे में अगली पीढियों को सब कुछ बोलेंगी। इसीलिए, लोग मानते थे कि फिल्मों का भविष्य सिर्फ दस्तावेजीकरण से संबंधित है। आज भी कभी न कभी कहा जाता है कि फिल्मों में दस्तावेजीकरण बहुत आवश्यक है और कुछ लोगों के लिए यह सिनेमा का आधार भी है। फिर भी यहाँ एक समस्या पैदा हो जाती  है, और हम यह सवाल पूछ सकते हैं कि फिल्मों में यथार्थ है क्या? और, ऐसी चीज संभव है? हर फिल्म अपने रचयिता की दृष्टि के आधार पर बनती है और निर्देशक के भावना को दिखाती है। सवे दादा को अपनी पहली फिल्म बनाने से पहले शायद ही किसी कहानी के बारे में सोचना था, या फिर जो कुश्ती दंगल उन्होंने दिखाया, वे दोनों वास्तविक और उनकी –दृष्टि की थीं, कोई यथार्थवाद नहीं। और, इसी तरह  सारी फिल्में  बनाई जाती हैं। वे दर्शकों को सिर्फ वह देखने की अनुमति देती हैं जो उनको दिखाई जाती हैं। लोगों की आँखें वास्तव में फिल्म की आँखें हैं, निर्देशक की आँखें हैं.

सिनेमा के इसी शुरूआती दौर में, एक दूसरा विचार पैदा हुआ, भारत और पशिचम दोनों जगहों पर, जो लिमिएर-बंधु द्वारा बनी फिल्मों से बिल्कुल अलग था। यूरोप के फ्रांस में रहते हुए जॉर्ज मेलियेस(Gorges Méliès s) सिनेमा का एक जादूगर बन गया और भारत में दादा साहब फाल्के ने वही काम किया जो मेलियेस ने फ्रांस में किया। दोनों के लिए फिल्म इसलिए महत्त्वपूर्ण थी कि इसकी मदद से वे अपने दर्शकों को सपने दिखा सकते थे। इसी विचार से यूरोप में भी कुछ लोगों के लिए लिमिएर-बंधू सिर्फ कैमरे का आविष्कारक था,  जबकि असल फिल्में मेलियेस के काम से संबंधित थीं। फिल्म की शुरूआत तब हुई जब इसमें कहानी आ गयी और इस तरह फिल्म का विकास बिलकुल नए रास्ते से होने लगा। सिनेमा के इन शुरूआती महारथिओं ने कभी नहीं सोचा था कि फिल्मों की यह योग्यता सब से महत्त्वपूर्ण हो जायेगी। फिल्में लोगों के लिए सबक भी है तो यथार्थ भी, लेकिन सब से पहले दर्शकों को सपनों की एक दुनिया में ले जाने वाली वह नानी है, जिसकी उम्र सौ साल या उससे ज्यादा हो गयी है, साथ ही साथ सपनों की दुनिया में ले जाने के उसके कौशल में भी इजाफा हुआ है। फिल्मों में कुछ चीजें ऐसी हो सकती हैं जो आसपास वास्तव में नहीं होती हैं और यह सब करतब दर्शकों के लिए कभी-कभी यर्थाथ से ज्यादा आकर्षक होता है। हमने देखा कि चलती हुर्इ तस्वीरें हमेशा कोई न कोई कहानी दिखाती हैं, तो शायद भारत में फिल्मों का इतिहास इसलिए राजा हरिश्चंद्र  के समय से शुरू होता है क्योंकि पहली बार, इसमें दिखाई गयी कहानी लोगों को अदभुत लगी। क्या यही कहानीपन महत्त्वपूर्ण फिल्मों की प्रवीणता है? क्या हमारे प्रश्न का उत्तर यहाँ है?

नहीं। दादा साहब फल्के ने राजा हरिश्चंद्र से पहले भी कुछ ऐसी फिल्में बनायीं थीं, जहाँ जादूगरी से भरी कतरबें थीं जिन्हें लोग वास्तविक दुनिया में नहीं देख पाते। उन सब में शायद कोई कहानी नहीं थी लेकिन अदभुत चीजें थीं इसलिए हम पूछ सकते हैं कि उनकी कोई और फिल्म पहली भारतीय फिल्म क्यों नहीं कही जाती? मुझे लगता है कि ऐसा इसलिए हुआ कि दर्शकों के लिए आज भी इन दो चीजों की अवश्यकता है, पहला कोई अदभुत कहानी, और इसके अतिरिक्त ऐसी दुनिया जो हमारे आसपास नहीं है। अगर भारत में फिल्मों का सौ साल, पहली फीचर फिल्म का सौ साल माना जा रहा है तो इसका मतलब यह भी हो सकता है कि भारतीयों के लिए फिल्म में जो बात सब से महत्त्वपूर्ण है वह यह कि इसमें सपना बुनने की शक्ति है.

यूरोप में कुछ लोगों के लिए सिनेमा का आधार पुराने जमाने के दर्शन से संबंधित है जो प्लेटो की गुफा की तरह है। प्लटो ने जीवन और दुनिया की वास्तविकता के बारे में लिखकर एक ऐसी सिथति का वर्णन किया जहाँ कुछ लोग गुफे में बैठे हैं। वे प्रवेश-द्वार से विमुख होकर बाहर नहीं दीवार को देखते हैं। उन लोगों के पीछे कुछ हो रहा है, वास्तविक दुनिया है, वास्तविक चीजें और वास्तविक जीवन भी। लेकिन लोग जो देख पाते हैं वह केवल इस यर्थाथ की छाया है जो दीवार पर दिखायी जाती है।  यर्थाथ लोगों के पीछे है। और, जिसे वे देख सकते हैं वह यर्थाथ से मिलता-जुलता होकर भी उससे अलग ही है। सिनेमा घर कुछ लोगों के लिए ऐसी ही गुफा है। चित्रपट पर कुछ न कुछ तो दिख जाता है जो सच्चाई जैसा है। लेकिन वास्तव में, दर्शक सिनेमा के परदे पर वैसे ही देख सकते हैं जैसे गुफा में लोग दीवार पर देख सकते हैं, जो कि सच्चाई से बहुत दुर है। फिर भी यूरोप में फिल्म के दर्शकों के लिए यह सब से महत्त्वपूर्ण है कि फिल्म जिंदगी से मिलती-जुलती चीज है। जो फिल्म सपनों की तरह कहानी दिखाती है बहुत लोगों के विचार में वह कोई कला नहीं है। फिल्मों के इतिहास की शुरूआत से ही यह सब से बड़ी समस्या थी। दो तरह के विचारों के बीच टकराहट थी। आज भी उन दोनों विचारों में से एक ऐसा है जो यह मानता है कि फिल्मों को सिर्फ यर्थाथ दिखाना चाहिए और दुसरा यह कि फिल्मों में सब से अच्छी वह दूसरी दुनिया है जो वास्तविक दुनिया से बहुत अलग है।
प्लटो का विचार लेकर हम फिल्मों के बारे में यह कह सकते हैं कि वह दुनिया जो चित्रपट दिखाई जाती है सही नहीं है और वास्तव से कुछ बेकार भी है क्योंकि वास्तव से अच्छा कुछ नहीं हो सकता। भारतीय फिल्मों की सिथति यूरोप से अलग है क्योंकि इसका दर्शनिक आधार भी कुछ और है। भारतीय सिनेमा का दर्शनिक आधार जो कि प्लेटो के गुफे से मिलता-जुलता भी है और अलग भी है। हम कह सकते हैं कि अगर यह सब कुछ जो आसपास है सिर्फ माया है और फिल्मों का यर्थाथ, दुनिया से इतना अलग होता है तो शायद सिनेमा में रचा गया यर्थाथ ही मूल यर्थाथ है। शायद, सिनेमा लोगों के लिए इतना मजेदार इसलिए है क्योंकि जो वे फिल्मों में देखते हैं वह यथार्थ है, माया नहीं। यह तो सिर्फ रूपक है लेकिन इसका एक छोटा दार्शनिक आधार तो हो ही सकता है। भारत का सिनेमा जब सपनों का कारखाना बन गया तब इसे सिनेमा माना गया।

जैसे पहले बताया सब फिल्मों की कोई कहानी होती है और कोई फिल्म शुद्ध यर्थाथ दिखा नहीं सकती। अगर सारी दुनिया माया है तो वास्तविकता ढूंढने के लिए कुछ ऐसा चाहिए था जो लोगों के आसपास से बिलकुल अलग था। इसलिए फिल्मों का इतिहास फाल्के के फिल्म से शुरू हुआ। क्योंकि, सच्चा यर्थाथ सिर्फ कुछ ऐसा ही हो सकता है जिसे दर्शकों के आसपास से विरोध हो। मुझे आशा है कि इस तरह के फिल्मों का अंत कभी नहीं आएगा क्योंकि मनोरंजन और चमत्कार आज भी सिनेमा में बहुत महत्त्वपूर्ण हैं।

 तत्याना षुर्लेई एक Indologist और फिल्म-आलोचक हैं। फिलहाल पोलैंड के शहर क्राकोव सिथत Jagiellonian University में The Courtesan Figure in the Iconography on Indian Popular Cinema:Tradition, Stereotype, Manipulation.    नामक विषय पर पीएचडी के लिए शोधरत हैं।

आभार: प्रकाश के.रे , क्योंकि यह लेख उनके द्वारा शीघ्र सम्पादित स्मारिका/पुस्तक हिदुस्तानी सिनेमा के सौ बरस से उधार माँगा गया है और पत्रिका नेशन फर्स्ट ,जहाँ यह प्रकाशित  हो चुका है .

संतों धोखा कासू कहियो-1 (पुरुषोत्तम अग्रवाल की किताब ‘अकथ कहानी प्रेम की..’ की समीक्षा)) : मार्तंड प्रगल्भ

By  मार्तंड प्रगल्भ
 

कबीर वैष्णव थे . आरंभिक आधुनिक काल में विकसित होती देशज आधुनिकता ने जो मूल्य सामने रखा कबीर उसके अग्रदूत थे, इनकी भक्ति काव्योक्त थी. और इनकी वैष्णवता जाति-कुल निरपेक्ष थी. कबीर के समय से विकसित होती देशज आधुनिकता को अवरुद्ध किया औपनिवेशिक शासन ने. इस औपनिवेशिक शासन ने अपना एक ज्ञान-कांड रचा जिसके प्रभुत्व में फिर से जाति व्यवस्था  प्रतिष्ठित हुई. इस ज्ञानकाण्ड ने देशज ज्ञान के विकास को रोक दिया. इसने पूरे भारतीय चिंतन में एक विच्छेद पैदा किया. और इस प्रकार पश्चिमी या यूरोपीय आधुनिकता के बाध्यकारी मूल्यों को हमारे यहाँ प्रतिष्ठित करने की कोशिश की गयी. लेकिन कबीर के समय से विकसित होती देशज आधुनिकता को औपनिवेशिक शासन के खिलाफ लड़े जा रहे राजनीतिक संघर्ष में पुनः स्थापित करने की कोशिश गांधी ने की. गांधी भी वैष्णव थे. जाति-कुल निरपेक्ष कबीर की वैष्णवता को ‘वैष्णव जन ते…’ के रूपक में उन्होंने लोकप्रिय किया. इसकी ग्राह्यता खुद इसकी लोकप्रियता में थी. जिस प्रकार कबीर शाक्त को नकार कर वैष्णव हुए थे, उसी प्रकार जिन क्रान्तिकारियों ने शाक्त चिंतन से प्रेरणा ली उसकी बनिस्पत वैष्णव गांधी की देशज आधुनिक मुहावरों को जनता ने अपने ज्यादा करीब पाया क्योंकि जनता के धार्मिक अस्तित्व ने पहले ही गैर- वैष्णव परम्परा को एक लिहाज से अस्वीकार कर दिया था. इस प्रकार गांधी ने औपनिवेशिक ज्ञान मीमांसा के प्रतिरोध का नेतृत्व किया. आज भी हमें गांधी के इस चिंतन पद्धति को समझना होगा तभी कल्याण है. पुरुषोत्तम अग्रवाल की अकथ कहानी यही है. और इस कहानी में रूकावट डालने वाले तत्वों खासकर ‘मार्क्सवाद’ और गौण रूप से वर्त्तमान दलित चिंतन को कथित रूप से ‘औपनिवेशिक’ ज्ञानकाण्ड की उपज बता दिया गया है. कुछ लोगों ने ध्यान दिलाया है कि इस अकथ कहानी में जासूसी कहानियों का सा प्रभाव है. और जासूसी कहानियाँ तो लोकप्रिय हुई उन्नीसवीं सदी के अंत और बीसवीं सदी के आरम्भ में अंग्रेजी कहानियों की नक़ल से और उस नक़ल के बांगला संस्करणों के अनुवाद से. अब अगर आख्यान रूपों का कुछ ऐतिहासिक सन्दर्भ होता है तो इस जासूसी कहानी का भी सन्दर्भ है ,और कहना होगा कि यह सन्दर्भ औपनिवेशिक ही है. पश्चिमी ही है. यूरोपीय ही है. लेकिन काल में बिलकुल हमारे आपके साथ. इस नवउपनिवेशवाद और वैश्विक आवारा पूंजी के दौर में!

            आइये इस कहानी को थोडा और करीब से पढ़ें. लेकिन इसके पहले मैं एक कहानी और सुनाता हूँ. भारतेंदु हरिश्चंद्र हिंदी के आधुनिक विद्वानों में सम्मानीय हैं. कुछ लोगों के लिए ‘हिंदी नवजागरण’ के अग्रदूत हैं. हिंदी साहित्य में भारतेंदु युग भी है. भारतेंदु भक्त थे. वैष्णव थे. परिवार इनका व्यापारियों का था. अग्रवाल थे. साथ ही राजभक्त भी थे. पश्चिम के ढंग की आधुनिकता भी आकर्षित करती थी. इन्होने भक्ति विषयक कवितायें लिखी हैं. साम्प्रदायिक आधार पर उत्तर-भक्तमाल की रचना भी की है. नारद भक्ति सूत्र और शांडिल्य भक्ति सूत्र का अनुवाद भी किया है क्रमशः ‘तदीय सर्वस्व’ और ‘भक्ति सूत्र वैजयंती’ के नाम से. उन्होंने ‘वैष्णवता और भारतवर्ष’ नाम से एक लेख भी लिखा था. इस लेख में उन्होंने घोषित किया कि भारत का प्रकृत धर्म वैष्णवता ही है. अभी वैष्णव धर्म में थोड़े संस्कार की ज़रूरत है क्योंकि ये बाह्य आडम्बरों में ज्यादा घिरे हैं. फिर क्रिस्तान, ब्राह्म, मुसलमान आदि में भक्ति की प्रधानता से ये सब लोग भी वैष्णवों के सादृश्य हैं. इसलिए “ बाह्य आग्रहों को छोड़कर केवल आतंरिक उन्नत प्रेममय भक्ति का प्रचार करें, देखें कि दिग्दिगंत से हरिनाम की कैसी ध्वनि उठती है और विधर्मीगण भी इसको सर झुकाते हैं कि नहीं और सिक्ख, कबीरपंथी आदि अनेक दल के हिन्दुगण भी सब आप से आप बैर छोड़ कर इस उन्नत समाज में मिल जाते हैं कि नहीं”. इस प्रकार भारतेंदु के ‘भारतवर्ष’ के लिए एक ‘प्रकृत धर्म’ चाहिए था और वह ‘राष्ट्रधर्म’ वैष्णवता थी. वैष्णव मत की उनकी समझदारी अधिकाँश में कृष्ण भक्ति संप्रदायों से बनी थी. इस समझ को उन्होंने राष्ट्र की तत्कालीन बन रही समझदारी से जोड़ दिया. वैष्णवता को उन्होंने सनातन भारतीय आत्म के रूप में समझाने की कोशिश की. इस पहचान में भारतेंदु पूर्व और उनके समकालीन पश्चिमी भारतविदों के धर्म सम्बन्धी चिंतन का प्रभाव भी है. और  इस प्रकार वैष्णवता तत्कालीन राष्ट्र सम्बन्धी चिंतन के परिप्रेक्ष्य में भारतेंदु के लिए एक राजनीतिक मुहावरा भी था. इस निबंध में भारतेंदु ने वैष्णवमत को भारत का प्रकृत धर्म बताते हुए इसके ३६ कारण भी गिनवाए हैं, यह कहते हुए कि: “जो कोई कहे कि यह तुम कैसे कहते हो कि वैष्णव मत ही भारत का प्रकृत धर्म है तो उसके उत्तर में हम स्पष्ट कहेंगे कि वैष्णव मत ही भारतवर्ष का भूत है और वह भारतवर्ष का हड्डी लहू में मिल गया है. इस के अनेक प्रमाण हैं, क्रम से सुनिए” और पहला ही प्रमाण हमारे भक्ति विषयक चिंतन के लिए मजेदार तर्क देता है जिसमे भारतेंदु कहते हैं, “पहले तो कबीर, दादू, सिक्ख, बाउल आदि जितने पंथ हैं सब वैष्णवों की शाखा प्रशाखाएँ हैं और भारतवर्ष इन पंथों से छाया हुआ है.” अभी हमने ऊपर देखा कि सिक्ख, कबीर पंथी आदि अनेक दल के हिन्दूगण वैष्णव नहीं थे अभी सब वैष्णव हो गये! और विधर्मियों को भी वैष्णव हो ही जाना चाहिए क्योंकि मूल रूप से उनकी भक्ति भी वैष्णव थी.इसी प्रकार बाकी सारे कारणों को पढ़ने से साफ़ हो जाता है कि विभिन्न धार्मिक मतों को ऐसे ही वैष्णवता के विशाल छत्र के नीचे उन्होंने एक करने की कोशिश की थी.

इसके बावजूद भारतेंदु की वैष्णवता तरल पहचान वाली थी. वैष्णवता की इस तरलता में कैथोलिक भाव का अन्वेषण और उसकी प्रतिष्ठा ग्रियर्सन ने की. ग्रियर्सन के यहाँ वैष्णव भक्ति की कृष्ण मार्गी समझदारी को राम की भक्ति के साथ मिलाकर एक भारतीय धर्म की कल्पना हुई जिसमे विक्टोरियन समर्पण की छौंक शामिल है. भक्ति के उत्स में नेस्टोरियन ईसाईयों के प्रभाव वाली मान्यता तो कड़ी आलोचनाओं के प्रभाव में उन्होंने लगभग छोड़ दी लेकिन भक्ति के आदर्श के रूप में तुलसी के राम को उन्होंने नहीं छोड़ा. तुलसी सचमुच के ‘राष्ट्रकवि’ थे और बाकी सारे कवियों में सबसे ज्यादा कैथोलिक थे. इसलिए ब्रिटिश राज को यहाँ कैथोलिक धर्म के प्रचार की और मिशनरी कार्यों की वैसी ज़रूरत नहीं है. समझना सिर्फ यह है कि इस देश के लोगों के हृदय पर राज करने वाली राम भक्ति भावना को समझा जाए और उसके सहारे कैथोलिक धर्म और राजभक्ति के सन्देश को लोगों तक ले जाया जाए[1]. औपनिवेशिक ज्ञान मीमांसा और उसके राज्य प्रचारित स्वरुप में यह एक बड़ा परिवर्तन था. भक्ति के इस ‘राष्ट्रीय चरित्र’ को बल मिला खुद हिंदी के द्विवेदीयुगीन विचारकों के द्वारा.

द्विवेदी युग की मर्यादा और नैतिकता पर इस प्रचारित वैष्णव भक्ति का बहुत ही बड़ा प्रभाव पड़ा. और इस मर्यादा और नैतिकता के सबसे बड़े सिद्धांतकार के रूप में रामचंद्र शुक्ल ने वैष्णव भक्ति की कृष्णमार्गी परिभाषा में तुलसी के राम को प्रतिष्ठित किया और उसमे कैथोलिक ईसाई तत्वों के विदेशीपन को एक सिरे से नकारते हुए इसे भारत के स्वाभाविक और प्रकृत भक्ति के रूप में स्थापित कर दिया[2]. इसी वजह से कबीरादि निर्गुनियों की भक्ति को विदेशी पद्धति की भक्ति कह कर खारिज किया गया. राष्ट्र-धर्म के रूप में हिंदू सगुण  राम भक्ति को पहचान देने के साथ ही यह विदेशी राज के खिलाफ संघर्ष की एक हिंदू-राष्ट्रवादी परिणति थी. इसका राष्ट्रीय आख्यान मुसलमानों को सामने रख कर निर्मित हुआ और तात्कालिक कैथोलिक विदेशीपन को भी चुनौती मिल गयी. इस काम में द्विवेदी युगीन कवि,संपादक , विचारक सब शामिल थे. और इसी वैष्णव व्यक्ति की मुक्ति के स्वर छायावाद में भी प्रखर थे. अपने तमाम नयेपन के वावजूद छायावाद वैष्णव था. मुख्यधारा की गांधीवादी राजनीति और छायावादी साहित्य दोनों ही वैष्णव थे. देशभक्ति की परिभाषा वैष्णव थी. औपनिवेशिक राज्य से संघर्ष के हथियार भी औपनिवेशिक ज्ञानमीमांसा से ही निकले थे.

यहाँ तक कि बड़थ्वाल ने निर्गुण सम्प्रदाय के कवियों-भक्तों में एक सुचिंतित दर्शन की खोज करते हुए उसे उपनिषदों की धारा से जोड़ दिया और साबित किया कि भारत का प्रकृत धर्म यही है और यह भी वैष्णव ही है[3]. और सूफी प्रभावों को भी परोक्ष रूप से भारतीय बताया गया क्यूंकि सूफी दर्शन भी भारतीय वेदान्त से ही विकसित हुआ था! इस प्रकार कबीरादी निर्गुनिये भी मिलाजुलाकर उसी राष्ट्रीय आख्यान में शामिल कर लिए गए. भक्ति अभी भी ‘मुसलमान’ आक्रमण की प्रतिक्रिया में आई मानी जाती थी और इस प्रकार ब्रिटिश राज में भी यही भक्ति हमें संबल दे सकती थी!

हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इस लिहाज से भक्ति संबन्धिनी चिंतन में एक पैराडाइम शिफ्ट लाया. उन्होंने भक्ति को भारतीय चिन्ताधारा के स्वाभाविक विकास के रूप में दिखाया और इस में ब्राह्मणेतर धर्मों के लोकपरक तत्वों का योगदान निरुपित किया. चूँकि यह चिन्ताधारा ईसा के हजार साल के आसपास खुद ही लोक की ओर झुकने लगी थी अतः यह भक्ति भी लोकधर्म थी. जब भक्ति लोक धर्म थी तो निश्चित ही वैष्णव धर्म भी लोक परक था.लेकिन इस बात से द्विवेदी जी पूरी तरह सहमत नहीं थे कि संतमत भी उसी तरह वैष्णव था जैसा सगुण भक्ति. द्विवेदी जी के लोकधर्म संबन्धिनी चिंतन ने उन्हें मध्यकालीन बोध को समझने के लिए मजबूर किया.और इसलिए द्विवेदी जी के पास उस तरह का कोई राष्ट्र-धर्म नहीं था. इस लोक संबन्धिनी चिंतन के कारण उनमें राष्ट्रवादी इतिहास दृष्टि से मुक्ति के प्रयास भी दिखाई पड़ते हैं. द्विवेदी जी पर मोनियर विलियम्स के पॉपुलर धर्म संबन्धिनी चिंतन का प्रभाव भी देखा जा सकता है. द्विवेदी जी ने मुसलमान आक्रमण की प्रतिक्रिया में भक्ति के उद्भव या प्रसार को नकारा और भक्ति को दक्षिण से उत्तर तक एक आंदोलन की तरह दिखाने का प्रयास किया.भक्ति को भक्ति आंदोलन के आख्यान की तरह देखने की शुरुआत तो बड़थ्वाल के यहाँ ही हो जाती है.[4]लेकिन उसका व्यापक निरूपण और उसकी सैद्धांतिकी  द्विवेदी जी के लेखन में रूप ग्रहण करती है और तब से आज तक भक्ति को एक आंदोलन की तरह ही देखा जाता है. द्विवेदी जी ने भक्ति आंदोलन को राष्ट्रीय आंदोलन के आख्यान की तरह देखा था. जिस ग्रियर्सन के हवाले से भक्ति-आंदोलन का ज़िक्र द्विवेदी जी ने किया है उस हवाले में ग्रियर्सन ने आंदोलन या मूवमेंट के बदले भक्ति को एक विचार या आईडिया लिखा था. लेकिन इस आईडिया या विचार को ‘क्रांति’ या ‘रिवोल्यूशन’ ज़रूर कहा था[5]. बहरहाल राष्ट्रीय आंदोलन के आख्यान में भक्ति को अवस्थित किया गया, दक्षिण से उत्तर में आकर नोटिस प्राप्त भक्ति के चार संप्रदायों और भक्तमाल की परम्परा ने इसमें अपना योगदान भी दिया.

औपनिवेशिक दौर के इन चिन्तनों के परिप्रेक्ष्य में अग्रवाल जी की कहानी ने नया नुक्ता ढूंढ निकाला है. पहले भक्ति के वैष्णव परिभाषा में रामभक्ति को स्थापित किया गया था. अब अग्रवाल जी का कहना है कि उसमें कबीर को रखा जाए. क्योंकि रामानंदी वैष्णवता ही देशज आधुनिकता की प्रभावी धारा है न कि स्मार्त वैष्णवता जो कि तुलसी की है. भक्ति सम्बन्धी पूर्ववर्ती सभी चिंतन औपनिवेशिक ज्ञानमीमांसा से प्रभावित हैं और इसलिए औपिवेशिक आधुनिकता के गढ़े गए आख्यान हैं. जबकि कबीर को समझने के लिए हमें देशज आधुनिकता को समझना होगा. देशज आधुनिकता की शुरुआत पंद्रहवीं सदी के आसपास हुए सौदागरी पूंजीवाद के विकास के साथ जुड़ता है. व्यापारियों की स्वायत्तता ने पुरानी वर्णव्यवस्था पर आघात किया. उनके ‘फेयर प्ले’ के एथिक्स ने आधुनिक मूल्य बोध को जन्म दिया. जहां व्यक्ति सत्ता को जन्म आधारित भेदभाव से मुक्त करने का प्रयास शामिल है. इस विकसित होती आधुनिकता में पहले से विकसित होते काव्योक्त वैष्णवता, जो नारद भक्तिसूत्र में और रामानंद के चिंतन में दिखाई देता है, का महत्वपूर्ण योगदान है. भक्ति काव्य को सगुण-निर्गुण के द्विविभाजन में देखना बाद के पंथों के साहित्य के प्रभाव में है. खुद भक्त इस विभाजन को नहीं मानते हैं. उस वक्त दरअसल एक भक्ति का लोकवृत्त बन रहा था. यह लोक वृत्त आधुनिक परिघटना है और अलग अलग समाजों में अलग अलग तरीके से उसी समय विकसित हो रहा था. यह लोकवृत्त आधिकारिक और निजी वृत्त से अलग सार्वजनिक विषयों पर स्वायत्त ढंग से चितन करता है. कबीर की बानी इसी लोकवृत्त का सबसे प्रखर स्वर था.

सौदागरी पूँजीवाद के विकास और उसके कारण संभव हुए भक्ति रूपी लोकजागरण की चर्चा रामविलास शर्मा ने विस्तार से की है. १९५० के दशक में रूसी भारतविदों के बीच यूरोपीय पुनर्जागरण या रेनेसंस के साथ भक्ति काल की सादृश्यता पर गहन और विस्तृत चर्चा हुई थी. इस विस्तृत चर्चा पर विद्वानों का ध्यान कम ही गया है. इन चर्चाओं का संक्षिप्त परिचय हमें इ.पी. चेलिशोव की किताब ‘भारतीय साहित्य की समस्याएं’ में मिलता है. कहना न होगा कि ये सभी मूलरूप से मार्क्सवादी चिन्तक ही थे. और इनमें से किसी ने भी भारतीय समाज को बर्फ में जमे समाज की तरह नहीं देखा था. लेकिन ‘आरंभिक आधुनिकता’ सम्बन्धी वर्त्तमान पश्चिमी चिंतन से ख़ासा प्रभावित पुरुषोत्तम अग्रवाल मार्क्सवादी इतिहास-दृष्टि की आलोचना पूरी किताब में करते ही चले गए हैं. लेकिन देशज आधुनिकता की अपनी ऐतिहासिक समझदारी के लिए इन्हें भी सौदागरी पूँजीवाद का सहारा लेना ही पड़ता है! सौदागरी पूंजीवाद के विकास के साथ नगरों के विकास ने दस्तकारों का जो नया वर्ग तैयार किया और साथ ही समाज के निम्न समझी जाने वाली जातियों में जो आत्मविश्वास और स्वतंत्र चेतना पैदा किया उसके साथ कबीर जैसे संत भक्तों का जो सम्बन्ध है वह केवल ‘फेयर प्ले’ के मुहावरे से नहीं समझा जा सकता है. इस सम्बन्ध की समझदारी हमें ग्राम्शी जैसे मार्क्सवादियों से ही मिल सकती है. नामवरसिंह ने बहुत पहले इस ओर संकेत भी किया था. जब तक इस महत्वपूर्ण ऐतिहासिक प्रक्रिया को नहीं समझा जाता तब तक हम यह भी नहीं समझ पायेंगे कि दसवीं शताब्दी में बनते नारद भक्ति सूत्र और रामानंद की वैष्णवता से कबीर की भक्ति कैसे ज्यादा मूलगामी हो जाती है. और तब हमें भक्ति के शास्त्रोक्त और काव्योक्त विभाजन का आशय भी स्पष्ट हो जाएगा.दरअसल भक्ति के निर्गुण और सगुण विभाजन में छिपे भक्ति के भिन्न सामाजिक आधारों को भक्ति विषयक चिंतन से विस्थापित करने का प्रयास है काव्योक्त और शास्त्रोक्त के संस्कृत काव्य शास्त्रीय मुहावरे को सामने लाना. और तब हमें यह भी समझ आएगा कि वर्णाश्रम की कठोर आलोचना करने वाले नाथपंथियों का अग्रवाल की कहानी में कोई जगह क्यूँ नहीं है. पूरी कहानी में नाथपंथ का ज़िक्र आता है केवल यह बताने में कि निर्गुण पंथियों की नारी सम्बन्धी दृष्टिकोण को नाथपंथियों का प्रभाव मानना चाहिए![6] जाति निरपेक्ष भक्ति के लिए नारदीय सूत्र और नारी विरोधी दृष्टि के लिए नाथपंथी! इस कहानी की उलटबांसी को क्या कहियेगा. प्रेम के लिए भी जिम्मेदार नारदीय भक्ति, सूफियों का प्रभाव नहीं !

आइये देखते हैं कि रामानंदी वैष्णवता के ऊपरी जाति विरोध को कबीर ने क्यूँ कर मूलगामी जातिविरोध में बदल दिया. कुछ ऐतिहासिक प्रक्रियाओं के उल्लेख उन परिवर्तनों को सामने लाने वाले क्रियाशील व्यक्तिओं के अपने वर्णन में नहीं मिलते. और ऎसी स्थिति में ही ऐतिहासिक दृष्टि की ज़रूरत होती है. ग्राम्शी ने श्रमशील समूह के खंडित विश्वदृष्टि की चर्चा अपने जेल में लिखे नोटबुक में किया है. हम यहाँ रुक कर उसे थोडा पढ़ने की कोशिश करते हैं. जेल में लिखे अपने ‘नोट-बुक’ में ग्राम्शी ने ‘व्यवहार के दर्शन’ की लंबी चर्चा की है| इस चर्चा में उन्होंने ‘सामान्य बोध’ पर विस्तार से अपनी बात रखी है|[7] ‘जनसमूह में कार्यरत व्यक्ति’, सामान्य कामगार दैनन्दिन कार्यों में लगा होता है| फिर भी इस दुनिया के बारे में उसकी कुछ अपनी समझदारी होती ही है| इसी दुनिया के बारे में जिसे वह अपने श्रम से बदलता रहता है|[8] लेकिन उसके पास ‘अपने व्यावहारिक कार्यों को लेकर कोई साफ़ सैद्धांतिक चेतना नहीं होती’| बल्कि-

“उसकी सैद्धांतिक समझदारी ऐतिहासिक रूप से उसके क्रिया-कलापों से भिन्न हो सकती है| कोई संभवतः कह ही सकता है कि उसकी दो सैद्धांतिक चेतनाएं (या एक अंतर्विरोधी चेतना) होती है: एक जो उसके क्रियाकलापों में अन्तर्निहित होती है और प्रकारांतर से उसे वास्तविक दुनिया के व्यावहारिक रूपांतरण में रत अपने सभी साथी कामगारों से एक करती है; और एक जिसे वह अतीत से बिना किसी आलोचना के ग्रहण करता है और जो सतही रूप से व्यक्त और मुखर होती है|”[9]

यह अन्तर्निहित चेतना और सतही रूप से व्यक्त चेतना का अंतर्विरोध दो विरोधी सामाजिक समूहों का प्रतिबिम्बन है| कहना न होगा कि-

“ इस प्रकार इस सामजिक समूह [व्यापक जन समूह वाला एक सबाल्टर्न समूह] की इस दुनिया के बारे में अपनी धारणा होती है,चाहे वह बीज रूप में ही हो;एक धारणा जो अपने को कर्म में अभिव्यक्त करती है ,लेकिन सामयिक रूप से और कभी कभी ही, एक कौंध बनकर- जब वह समूह एक आवयविक पूर्णता से कार्य करता है| लेकिन इसी समूह की एक और धारणा होती है जो उनकी अपनी नहीं होती और अधीनस्थता या बौद्धिक अधीनता के कारण दूसरे समूह से उधार ली गयी होती है; और यह मुखर रूप से इसी धारणा को स्वीकार करता है और खुद मानता है कि इसी का अनुकरण करता है, क्योंकि ‘सामान्य समय’ में वह इसी के अनुसार काम करता है- अर्थात जब इनका आचरण स्वतंत्र या स्वायत्त न हो कर अधीनता या मातहती(submissive and subordinate) में होता है|”[10]

इस प्रकार सबाल्टर्न वर्ग का ‘सामान्य बोध’ आतंरिक रूप से अंतर्विरोधग्रस्त और बिखरा हुआ होता है| यह सामान्य बोध द्विविधाग्रस्त,बहुआयामी और अंतर्विरोधी होता है तथा इसमे कोई परिवर्तन किसी निश्चित ऐतिहासिक प्रक्रिया में प्रभुत्वशाली और मातहत वर्गों के आपसी संबंधों के बदलाव से ही संभव होता है| ‘सामान्य-बोध’ के उस स्वायत्त तत्त्व को जो किसी सबाल्टर्न समूह के क्रियाकलापों में अन्तर्निहित होता है और उनके सभी सदस्यों में अपने श्रम के कारण दुनिया को बदलने के कारण होता है और “सामान्य समय”[11] में प्रभुत्वशाली वर्गों के विचारधारात्मक वर्चस्व के कारण प्रकट नही हो पाता, ग्राम्शी कई बार ‘साधु-बोध’(good sense) कहते हैं|[12] ‘सामान्य-बोध’ के इन दो तत्त्वों के बीच नए उभरने वाले धर्म-मतों और दर्शनों के कारण हमेशा एक गतिशील अंतर्क्रिया भी होती रहती है| जब नए उभरने वाले दर्शन और धर्म मत समाज में एक खास प्रभुत्व बना लेते हैं तो फिर इनका प्रभाव सामान्य बोध के उस तत्त्व पर पड़ता है जो उधार ली गयी होती है| हर दार्शनिक धारा और धर्म-मत की छाया और उसके कुछ अवशेष सामान्य-बोध का हिस्सा बनते चलते हैं| और इस प्रकार सामान्य बोध या ‘लोक-मत’ ऐतिहासिक रूप से रूपांतरित होता चलता है और खुद को विचारों और दर्शनों से समृद्ध भी करता चलता है| इस प्रक्रिया में कई बार लोकमत की अन्तर्निहित धारणा एक ज्यादा सुसंगत विश्वदृष्टि पाने का प्रयास करती है| ग्राम्शी ने सामान्य बोध को ‘दर्शन का लोकगीत’(फोकलोर ऑफ फिलोसोफी) कहा है|[13]सामान्य बोध भविष्य के लोकगीतों के निर्माता होते हैं| जो किसी खास देश-काल में लोकप्रिय ज्ञान का ज्यादा बद्ध(रिजिड) चरण होता है| यहाँ ग्राम्शी न केवल सामान्य बोध या लोक-मत के ऐतिहासिक प्रक्रम को रेखांकित कर रहे है बल्कि लोकगीतों के स्वरुप और उनके इतिहास के अध्ययन का भी सूत्र हमारे सामने रख रहे हैं|

            नयी धार्मिक और दार्शनिक धाराएँ प्रभुत्वशाली और अधीनस्थ वर्गों के संघर्ष से अछूती नही रहती| इन वर्गों के बीच किसी खास ऐतिहासिक क्षण में ‘परिस्थितिवश’ जब संघर्ष एक खास गतिशीलता प्राप्त कर लेता है तो सामान्य बोध का स्वायत्त तत्त्व अपनी उपस्थिति पुरजोर तरीके से अभिव्यक्त करने लगता है| यह श्रम में अन्तर्निहित धारणा की उधार ली गयी धारणा पर एक विजय होती है| यह श्रम करने वालों की परिस्थितियों में हुए एक आधारभूत परिवर्तन के कारण संभव होता है और जिसके फलस्वरूप उनकी स्थिति में आयी सापेक्षिक स्वतन्त्रता उनके सामान्य बोध के स्वायत्त तत्त्व को एक आत्मविश्वास से भर देती है| जब-जब ऐसी स्थिति आती है समाज के संकट(क्राइसिस) की अभिव्यक्ति समाज के दो भिन्न विश्वासों,दो भिन्न धर्मों और दो भिन्न विश्व-दृष्टियों में बँट जाने के डर में होने लगती है| ऐसी ही परिस्थिति में ‘लोक-धर्म’ शास्त्र का ‘विकल्प’ बन कर सामने आती है| और तब नए धर्मों और दर्शनों का फिर से बनना और अपने को पुनर्व्यवस्थित किया जाना शुरू होता है, ताकि पूरे सामाजिक व्यवस्था में फिर से एक विचारधारात्मक एका बनाया जा सके| यह या तो नए आधारों पर ज्यादा प्रगतिशील हो सकता है या फिर अपनी खोई हुई सत्ता को फिर से पाने की कोशिश में पुराने आधार की तरफ पुनरागमन हो सकता है|[14] संत-भक्ति के ज्यादा स्वायत्त और ‘अनुभवसम्मत विवेकवाद’ का धीरे-धीरे भक्ति के ज्यादा शास्त्रीय और वर्चस्व की विचारधारा में पर्यवसन ऐसी ही एक प्रक्रिया थी| इस प्रक्रिया का पहला चरण निश्चित रूप से लोक-धर्म का शास्त्र के विकल्प के रूप में सामने आना था|

            धर्म की ऊपर-ऊपर की एकता भी केवल भ्रम होती है| भक्ति युगीन वैष्णव धर्म भी कहने को ही एक ही था| न केवल उसके भीतर अनेक अंतर-धाराएँ थीं बल्कि वह समाज के भिन्न वर्गों के लिए भिन्न-भिन्न था| किसानों का वैष्णव धर्म एक था, कारीगरों का दूसर तो पंडितों का तीसरा| इसलिए चेतना के साथ धर्म के रिश्तों का अध्ययन एक ही धर्म-मत के विभिन्न रूपों के बीच की भिन्नता को ध्यान में रख कर किया जाना चाहिए| धर्मों के आतंरिक अंतर्विरोध समाज के विभिन्न वर्गों के लिए भिन्न-भिन्न अर्थ रखते हैं. एक ओर धर्म की एक प्रवृति समाज के लिए सार्वभौम नैतिक आचारसंहिता बनाने की कोशिश करती है और दूसरी ओर इस सार्वभौमिक संहिता के वर्चस्व के नकार की प्रक्रिया भी चलती रहती है. और महत्वपूर्ण यह है कि  विभिन्न सामाजिक समूहों में प्रचलित धार्मिक विश्वासों और आचार प्रक्रियाओं से उन अन्तर्निहित तत्त्वों को सामने लाना चाहिए जो धर्म के उन रूपों में वर्चस्वशाली रूप के विरोध में होते हैं. वस्तुतः द्विवेदी जी मध्ययुगीन धर्म-साधनाओं के इतिहास को लिखते समय यही काम कर रहे थे. उन प्रतिरोधी तत्त्वों की पहचान के कुछ संकेत ग्राम्शी ने किये थे| प्रत्यक्ष अनुभव को महत्व देना, ‘खास हद तक “प्रयोगात्मकता” और यथार्थ का सीधा अन्वेषण, हालांकि आनुभविक और सीमित’.[15]ये सब विशेषताएं संतों के यहाँ है. और तब हमें मानना होगा कि भक्ति का लोकवृत्त भी अंतर्विरोधों से परे नहीं था. इसलिए रामानंदी वैष्णवता को कबीर ने खासा रेडिकल बना दिया था.और इस प्रकार समाज का क्राइसिस दो भिन्न मतों में बंट गया था. निर्गुण संतमत और सगुण वैष्णवता. धीरे धीरे भक्ति के आधार क्षेत्र में जब परिवर्तन हुआ और छोटे वनिक, दस्तकारों और निम्न-अछूत जातिओं के यहाँ से निकल कर भक्ति किसानों और ब्राह्मणों के यहाँ पहुंची तो साथ ही साथ नए पुनर्व्यवस्था का प्रयास भी शुरू हुआ. बड़ा किसान वर्ग अभी भी सामंती विचारधारा के प्रभाव में था और इस प्रकार पहले से ज़ारी वर्चस्वशील धार्मिक मतों के प्रभाव में था. यह वर्ग हालाँकि दसवीं ग्यारहवीं सदी से शुरू हुई राज्य निर्माण प्रक्रियाओं और तदनुरूप स्थानीयताओं के पार-क्षेत्रीय मुहावरों और धार्मिक प्रतीकों और धर्म-मतों के प्रभाव में भी थी, और इसलिए पहले की तुलना में निर्गुण मत के लिए कहीं ज्यादा तैयार थी. परन्तु अपनी सामाजिक अवस्थिति के कारण कृष्ण या राम भक्ति के सगुण मतों की तरफ ज्यादा आकर्षित हुई. इस लिए भक्ति का लोक वृत्त भी दो भिन्न सामाजिक आधारों के लिए विमर्श के विषयों और संग्रह त्याग के निर्णयों में भी अंतर्विभाजित थी. ऐसी स्थिति में भक्ति को काव्योक्त और शास्त्रोक्त वर्गीकरणों को एक सिरे से नकारने की ज़रूरत है. और तब जाकर हमें मुक्तिबोध के यह कहने में कि सगुण भक्ति ने निर्गुण भक्ति के क्रांतिकारी दांत उखाड डाले, की सच्चाई मालूम चलती है.

भक्ति के लोकवृत्त की ज्यादा प्रभावशाली निर्गुण धारा के सगुण धारा में परिवर्तन की प्रक्रिया ऐसे ही समझ में आ सकती है. अकारण नहीं कि एक बार बड़े किसान वर्ग पर अपनी छाप छोडने के बाद धार्मिक मतों में एक व्यवस्था आ गयी और भक्ति के वास्तविक उन्मेष ने अपनी ऊर्जा खो दी. इस प्रक्रिया में देशी भाषाओं के क्रांतिकारी इतिहास ने भी एक चरण पूरा कर लिया. और साहित्यिक भाषा के रूप में ब्रज का पार-क्षेत्रीय स्वरुप स्थापित हुआ. मुग़ल सत्ता के पतन के साथ नए क्षेत्रीय राज्य अपनी वैधता के लिए ब्राह्मणों की ओर मुड़े और साहित्य लोकवृत्त से निकल कर दरबारी आधिकारिक वृत्त में चला गया. यह हिंदी की नयी साहित्यिक संस्कृति थी. और अब भक्ति का धार्मिक आवरण ज्यादा लौकिक श्रृंगार में अभिव्यक्त होने लगा. राधा-कृष्ण तो सुमिरन के बहाने थे.

परन्तु ऐसा नहीं है कि किसी समय हुए व्यापक सामजिक उथल पुथल के बाद समाज से वह चेतना गायब हो जाती है. अलग-अलग स्वरूपों में वह समाज के भीतर ज़िंदा रहती है. भक्ति के परवर्ती पंथों के स्वरुप और उन पंथों के सामजिक आधारों के विश्लेषण से इस बात का पता चलता है. हांलाकि यह एक ज़टिल प्रक्रिया है. डेविड लौरेंज़न ने ‘कबीर पंथ और सामजिक प्रतिरोध’ के अपने अध्ययन में इसे समझने की कोशिश की है. लोरेंज़न लिखते हैं: “इस अध्याय की मूल संकल्पना यह है कि कबीर की शिक्षा में सामजिक और धार्मिक विरोध के महत्वपूर्ण तत्व पाए जाते हैं. इन तत्वों का मूल अभिप्राय और प्रकार्य चाहे जो रहा हो, ये पंथ के अनुयायियों द्वारा –अधिकतर शूद्रों, अछूतों और आदिवासियों जैसे हाशिए के समूहों द्वारा –ऊंच-नीच पर आधारित जाति-व्यवस्था की कुछ पहलुओं को नकारने के लिए प्रयोग में लाये गए, साथ ही कबीरपंथ में अपनी सदस्यता के द्वारा वे उसी समाज के भीतर आत्मसात होने के अनुकूल भी बने. वो ‘संस्कृतिकरण’ के द्वारा अपनी स्थिति को ‘बदलने’ की कोशिश भी करते हैं. जितना ही वे उच्च जाति की विचारधारा को आत्मसात करते हैं उतना ही अपनी सामजिक स्थिति को ‘ऊंचा’ उठाने का प्रयास करते हैं.लेकिन वास्तव में, ये सामजिक समूह यह आशा नहीं कर सकते कि दूसरों की निगाहों में उनकी जातिगत स्थिति नाटकीय ढंग से ऊपर उठ जाएगी. फिर भी, कबीरपंथ की अधिक समतावादी विचारधारा में उन्हें एक सकारात्मक आत्मछवि प्राप्त होती है जो कि रूधिग्रस्त ब्राह्मणवादी हिंदू परम्परा के द्वारा आरोपित जन्मजात निम्न स्थिति को अस्वीकार करती है.”[16] कबीर की लोकप्रियता कबीर पंथों के बाहर भी बहुत रहती आई है. और इस मामले में भी उसके भिन्न सामाजिक आधारों को औपनिवेशिक काल में भी रेखांकित किया गया था. ऊपर ग्रियर्सन को लिखे एक मिशनरी की चिट्ठी का जो ज़िक्र पाद टिपण्णी में है उससे भी इस बात का पता चलता है.

आइये हम फिर नारद भक्ति के कबीर द्वारा स्वीकार पर कुछ करीब से विचार करते हैं. कबीर ने नारदीय भक्ति को ठीक वैसे ही स्वीकार नहीं किया. नारद भक्ति सूत्र में भक्ति के लिए जाति-कुल और कर्मकांड तथा लोक-वेद दोनों को अस्वीकार किया था, ऐसा उन सूत्रों को समग्रता में पढने पर सही नहीं लगता. भक्ति के क्षेत्र में समानता की चर्चा तो एक हद तक रामानुजम के यहाँ भी थी.फिर भक्ति के आदर्श उदाहरण के रूप में गोपियों की कृष्ण के प्रति प्रेम को बताया गया है. लेकिन ये प्रेम कैसा होगा और किस तरीके से होगा इसका उल्लेख नहीं किया गया है क्यूंकि यहाँ सूत्रकार सीधे भागवत में वर्णित गोपी-कृष्ण लीला को अप्रत्यक्ष रूप से संदर्भित मान रहा होता है. इसके अलावा निम्न सूत्रों को पढ़ने से हमें धर्म और वर्णाश्रम की कबीर द्वारा की गयी मूलगामी आलोचना और नारद भक्ति सूत्रों के अंतर का भी पता चलता है.

११.लोकवेदेषु तदानुकूलाचारणं तद्विरोधिषूदासीनता ||

१२.भवतु निश्चयदाढ्रयांदृध्व शास्त्ररक्षणम् ||

१३. अन्यथा पतित्यशंकया ||

१४. लोकोऽपि तावदेव भोजनादि व्यापारस्वत्वाशारीरधारणावधि||

६१. न तदसिद्धौ लोक्व्यवहारो हेयः किन्तु फल्त्यागास्तत्साधनं च कार्यमेव||

६२. स्त्रीधननास्तिकचरित्रं न श्रवणीयम्|| (फिर भी स्त्री विरोधी दृष्टि नाथपंथियों का प्रभाव बताते हैं अग्रवाल!)

७३. वादो नाव्लाभ्यः( कबीर खूब वाद करते हैं, और यह अग्रवाल के लिए नाथों का प्रभाव नहीं है!)

७६. भक्तिशास्त्राणि माननीयानि तादुद्द्धोधककर्माणि करणीयानि||

            भक्ति के उद्भव और प्रसार के दो आख्यान हमें पुराने वक्त में मिलते हैं. इसमे पहला संस्कृत में है और दूसरा देशी भाषा में. संस्कृत वाला आख्यान ‘भागवत महात्म्य’ में है जो कि ‘भागवत’ के पहले जोड़ा गया है और निश्चित रूप से सतरहवीं शताब्दी के आसपास से पहले का नहीं है. खुद भक्ति ने नारद को कहा था:

उत्पन्न द्रविड़ं साहम वृद्धिम कर्णाटके गता|

क्वचितक्वचित महाराष्ट्रे गुर्जर जिणॅतमगता ||

और फिर वृन्दावन में आने से वह पुनः जवान हो गयी है लेकिन उसके कर्म और ज्ञान नामक दो पुत्र अभी भी वृद्ध हैं और अचेत पड़े हैं यमुना के तट पर. इनके सुस्थित होने के लिए भी भागवत पाठ की ज़रूरत होती है.

            दूसरा है एक दोहा जिसे सब जानते हैं लेकिन कोई यह नहीं कह पाता कि इसका उल्लेख पहले पहल कहाँ हुआ था:

                                    भक्ति द्राविड़ ऊपजी  लाए रामानंद

प्रगट किया कबीर ने सप्तद्वीप नवखण्ड.

पहला दोहा तो निश्चित रूप से किसी कृष्ण भक्ति के सम्प्रदाय का लिखा हुआ है. और दूसरा शायद किसी निर्गुणपंथी का. परन्तु भक्ति के दक्षिण में उत्पन्न होने और उत्तर में आने को लेकर दोनों ही आख्यान सहमत हैं. भक्ति के इन दोनों आख्यानों से जुड़े हुए कुछ वाजिब प्रश्न हैं. अगर ये आख्यान औपनिवेशिक काल के पहले के हैं तो फिर निश्चित है कि औपनिवेशिक काल के पहले ही भक्ति के दो आख्यान थे, भक्ति के दो स्वरूपों पर चर्चा थी. एक कबीर को भक्ति का अग्रदूत बताता है दूसरा ब्रजभूमि को. हो सकता है यह केवल साम्प्रदायिक प्रतिष्ठा का सवाल हो. यह भी हो सकता है कि भक्ति के दो स्वरुप आरम्भ से ही लोगों के सामने स्पष्ट हो. इन दोनों आख्यानों से ही भक्ति के सगुण-निर्गुण स्वरूपों का प्रश्न भी जुड़ा है. कुछ विद्वान मानते हैं कि भक्त कवियों के यहाँ सगुण-निर्गुण दो भिन्न भक्ति की अवधारणाएं थीं और यह केवल भगवान के दो भिन्न स्वरूपों से आगे जाकर खास सामाजिक आधारों वाली विचारधारा थी. इन दो भिन्न भक्ति अवधारणाओं के निम्न और उच्च जातियों से स्पष्ट संबंद्ध थे. निर्गुण भक्त कवि में सामाजिक प्रतिरोध की चेतना थी. कुछ विद्वानों के अनुसार यह विभाजन पंथ-निर्माण की प्रक्रिया से जुड़े हैं और इनकी निर्मिति सतरहवीं शताब्दी के अंत और अठारहवीं शताब्दी के आरम्भ से बननी शुरू हुई थी. कुछ विद्वान इसे औपनिवेशिक ज्ञान कांड की उपज बताते हैं. मिलाजुलाकर अभी भी कोई स्पष्ट मान्यता या मोटामोटी समझदारी इस विषय पर बन नहीं पायी है. मनोरंजक बात यह है कि औपनिवेशिक काल में हुए भक्ति विषयक चिंतन में होने वाले परिवर्तनों का पैटर्न भी इन दो आख्यानों में निरुपित भक्ति के स्वरुप की ओर इशारा करते हैं. भारतेंदु के वैष्णव भक्ति से लेकर निर्गुण पंथ और संतमत के क्रांतिकारी अंतर्वस्तु की पहचान तक औपनिवेशिक काल में हुए भक्ति के माइनों में परिवर्तन में भी इन दो आख्यानों की भिन्नता दिखाई देती है. अगर ये आख्यान औपनिवेशिक काल से पूर्व के हैं तो मानना पड़ेगा कि औपनिवेशिक काल के चिंतन की दिशा भिन्न पड़ावों को पार करते हुए औपनिवेशिक पूर्व भक्ति की भिन्न-भिन्न मान्यताओं के आख्यान के करीब ही पहुँच रही थी,  निश्चित रूप से अपने नए राजनीतिक उद्देश्यों के साथ. तब फिर औपनिवेशिक पूर्व सामाजिक-राजनीतिक भिन्नताओं की एक धारा औपनिवेशिक काल में भी सक्रिय रही मानी जा सकती है जिसका अलग-अलग स्तरों पर उपनिवेशवाद विरोधी विचारधारा के साथ अलग-अलग अन्तर्क्रियाओं की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता. अर्थात औपनिवेशिक राजनैतिक कर्ता(colonial political subject) के रूप में भक्ति पर चिंतन करने वालों और व्यापक जनसमुदाय,जो उस तरह से सीधे औपनिवेशिक शासन के सब्जेक्ट नहीं थे, के चिंतन और प्रतिक्रियाओं के मनोरंजक स्वरुप सामने आ सकते हैं.

इतना तो तय है कि भक्ति के स्वरुप को लेकर चलने वाली उपनिवेशकालीन चर्चा का कुछ सम्बन्ध तो उपनिवेशपूर्व चर्चाओं के पैटर्न से भी है. यहाँ आकार यह बात और स्पष्ट हो जाती है कि जब हम औपनिवेशिक ज्ञानकाण्ड को सर्वथा आधिकारिक औपनिवेशिक संवेदना की निर्मिति से जोड़ते हैं तो उसे निहायत ही नए संबंद्ध विच्छेदक क्षण(moment of dissociation) के रूप में देखते हैं. यह उत्तरौपनिवेशिक इतिहास दृष्टि का प्राथमिक आधार है. लेकिन क्या औपनिवेशिक ज्ञानकाण्ड ने पहले की ज्ञान परम्पराओं और ज्ञान के लोकपरक आख्यानों को सचमुच ही एक सिरे से बदल दिया? इसी सवाल को रंजीत गुहा ने भी दूसरे तरीके से ‘Dominance without Hegemony’ में उठाया है.

राज की विचारधारा के मूर्तिमान ज्ञानकाण्ड के कारण शुरू हुई राजनीति और उस ज्ञानकाण्ड के बाहर पड़ी जनता के असंबद्ध विचारधारात्मक निर्मिति (loose ideological construct) के बीच क्या सचमुच कोई अंतर नहीं था? क्या सचमुच सूर के भ्रमरगीतों  और तुलसी की रचनाओं में मिलने वाला प्रखर निर्गुण विरोध (वैचारिक और सामाजिक), और बाद के पंथों की एक खास सामाजिक पृष्ठभूमि , जिसको ‘कबीरपंथ और सामाजिक प्रतिरोध’ जैसे अध्ययनों में डेविड लोरेंज़न जैसे विद्वानों ने दिखाने की कोशिश की है, का कोई अर्थ नहीं है? क्या अठारहवीं सदी में ब्राह्मणवाद और राज्य सत्ता के संबंद्ध में होने वाले नए परिवर्तनों का चरित्र हमें खुद भक्ति में निहित स्वरूपगत भेद की ओर ध्यान नहीं दिलाता? क्या तब भक्ति के किसी ऐसे लोकवृत्त की कल्पना की जा सकती है जो अंतर्विरोध से रहित हो? क्या भक्ति का सगुण वृत्त खुद आधिकारिक वृत्त के लिए वैचारिक और सामाजिक आधार नहीं रखता था? क्या औपनिवेशिक काल में भक्ति के सगुण राम भक्ति लोक वृत्त का आधिकारिक औपनिवेशिक वृत्त बनना उस खास ऐतिहासिक प्रक्रिया की तार्किक परिणति नहीं है जिसको मुक्तिबोध ने निर्गुण भक्ति के क्रांतिकारी दांत उखाड़ने वाली कह कर सगुण रामभक्ति की ओर इशारा किया था? इस प्रक्रिया को समझे बिना हम उस गलती को भी नहीं समझ पायेंगे जो रंजीत गुहा जैसे सबाल्टर्न इतिहासकार की भक्ति विषयक समझदारी से होती है. इन इतिहासकारों के लिए भक्ति की औपनिवेशिक परिभाषाएँ ही,जिसमे भक्ति को एक सगुण समर्पणवादी सामंती विचारधारा की तरह देखा गया है, व्याख्या का आधार बनती है. इसीलिए ये इतिहासकार भक्ति को सामंती अधीनस्थता की विचारधारा के रूप में देखते हैं और इस एकपक्षीय विचार के कारण औपनिवेशिक अधीनस्थता के लिए पहले से उपलब्द्ध विचारधारा के रूप में इसको निरुपित करते हैं.[17] प्रतिरोध की विचारधारा के रूप में भक्ति का वास्तविक निर्गुण आख्यान उनकी निगाह से गायब रहता है, और इसीलिए औपनिवेशिक प्रभुत्व का भी गैरद्वंद्वात्मक निरूपण हो जाता है. इसलिए ये सबाल्टर्न एक स्तर के बाद बंकिम और गांधी के माध्यम से ही निम्नवर्गीय इतिहास लेखन का दावा करते हैं. और इसी प्रवृत्ति की ओर हिंदी के कुछ विद्वान आलोचक ‘आरंभिक आधुनिकता’ के आख्यान के सहारे पहुंचते हैं. मजेदार बात है की इनके पास सामंतवाद आलोचना की कोई कैटेगरी ही नहीं होती. यहाँ यह भी देखना मजेदार होगा कि औपनिवेशिक ज्ञानकांड के प्रभाव में पैदा हुए राजनीतिक आन्दोलनों ने उपनिवेशपूर्व के सामाजिक-राजनीतिक अंतर्विरोधों को कैसे एक निश्चित दिशा प्रदान की और इनका विभिन्न सामाजिक प्रवर्गों के विश्वदृष्टि पर कैसा प्रभाव पड़ा. दरअसल औपनिवेशिक ज्ञानकाण्ड की द्वंद्वात्मकता को समझाने का प्रयास करना ही होगा.

औपनिवेशिक ज्ञानकाण्ड की द्वंद्वात्मकता को समझे बिना ही हम निकोलस डर्क्स जैसे उत्तर-औपनिवेशिक इतिहासकारों की इस मान्यता को मान लेते हैं कि ब्राह्मणवाद औपनिवेशिक प्रशासकों और हिन्दुस्तानी ओफिसिअल ब्राह्मणों की सांठ-गाँठ की उपज है. इसके चलते औपनिवेशिक काल में ब्राह्मणवाद को फिर से खोजा गया. वरना भक्ति के लोकवृत्त के कारण ब्राहमणवाद तो स्वतः ही एक नोर्मेटिव व्यवस्था से अलग कुछ नहीं थी. जातिनिरपेक्ष हिंदू परम्परा ही मुख्य थी. और देशज आधुनिकता में होने वाले परिवर्तनों की दिशा को अवरुद्ध करते हुए औपनिवेशिक ज्ञानकाण्ड ने हमारी अपनी परम्परा से हमें महरूम कर दिया और हमारी राजनितिक प्रक्रियाओं को गलत दिशा प्रदान की. इस औपनिवेशिक ज्ञानकाण्ड के खिलाफ कोई लड़े तो वह राजनीतिक और दार्शनिक स्तर पर गांधी !

 यह बात तो तय है कि ब्राह्मणवाद एक विचारधारा के रूप में कभी एक सा नहीं था. इतिहास के अलग अलग काल खण्डों में समाज के स्तरीकृत जातिभेदों में परिवर्तन होते रहे हैं. इन परिवर्तनों का सम्बन्ध भूमि पर विभिन्न समूहों के अधिकार और राज्य के निर्माण प्रक्रिया से भी जुड़ा हुआ है. भूमि संबंधों में परिवर्तन के कारण कुछ जातियां वर्णाश्रम में ऊपर चले जाते रहे हैं. नयी व्यापारिक गतिविधियों ने नयी जातियों को वर्णाश्रम में शामिल किया है. परन्तु एक पदानुक्रमिक संरचना के रूप में ब्राहमणवाद, एक शोषणकारी विचारधारा के रूप में ब्राह्मणवाद चला आया है. इस विचारधारा का सत्ता तंत्र से भी बहुत करीबी सम्बन्ध रहा है और लगातार शासकीय विचारधारा के रूप में भी प्रभावी रहा है. मध्यकाल में इस्लाम के आगमन के साथ इस शासकीय विचारधारा को पहले की अपेक्षा कहीं अधिक चुनौती मिली. परन्तु तुर्क-मुग़ल सत्ता ने भी आमतौर पर शासकीय कार्यों में इस विचारधारा को स्वीकार ही किया था. लेकिन राज्य के बदलते स्वरुप और १४वीं १५वीं सदी तक आते आते नगरीकरण और  वाणिज्यीकरण की तेज होती प्रक्रियाओं ने ब्राह्मणवादी विचारधारा को कड़ी चुनौती दी. धर्म मत के रूप में भी इस्लाम ने चुनौती पेश की. देश्यभाषाकरण की प्रक्रिया ने कुछ पहले ही साहित्यिक संस्कृति को भी संस्कृत-अपभ्रंश की सार्वत्रिकता और अर्द्ध-सार्वत्रिकता से मुक्त कर दिया था. राज्य के स्वरूपों में होने वाले परिवर्तनों के साथ इस नयी विकसित देश्यभाषाकरण का गहरा रिश्ता है जिसे शेल्डन पोलक ने समझने की कोशिश की है. परन्तु दक्षिण भारत से उत्तर भारत में देश्यभाषाकरण की प्रक्रिया भिन्न थी और इस प्रक्रिया में  तुर्कसत्ता के साथ भिन्न संस्कृति के आगमन ने बड़ी भूमिका अदा की थी. यही कारण है दक्षिण भारत की अपेक्षा उत्तरभारत की भक्ति ने भी ज्यादा रेडिकल रुख अपनाया था. वह राज्य और संस्कृति के पोलिटि के दक्षिण भारतीय रूपों से ज्यादा मुक्त भी हो पायी. इसलिए भी भक्ति के उद्भव में इस्लाम के चार आने के ‘प्रभाव’ को चार आने तक सीमित करना भूल है. और इसलिए भी भक्ति के विकास में इस्लाम की भूमिका को भी कम करके आंकना भूल है. इसलिए कबीर जैसे रेडिकल चिंतकों की अकथ कहानी में इस्लाम की भूमिका का अनदेखा किया जाना भूल है. और इसलिए भी गाँधी की देशज आधुनिकता से कबीर की ‘आधुनिकता’ भिन्न विचारसरणी वाली है.

बहरहाल ब्राह्मणवाद में जो दरार १५वीं सदी के आसपास पैदा हुई उसमे मुग़ल सत्ता के पतन के साथ बदली हुई परिस्थिति में फिर से एक पुनरुत्थान देखने को मिलता है. जो इतिहासकार उत्तर-औपनिवेशिक इतिहास दृष्टि से उतने आक्रान्त नहीं हैं, उन्होंने इस प्रक्रिया को बखूबी लक्ष्य किया है. बहुत सारे इतिहासकारों को छोड़ भी दिया जाए तो सिर्फ उमा चक्रबर्ती की ‘जेंडरिंग कास्ट’ में उन्होंने दिखाया है कि औपनिवेशिक शासकों ने १८वीं  सदी में आरम्भ हुए राज्य के ब्राह्मणीकरण की प्रक्रिया को और ज्यादा तेज किया, तथा उसे संस्कृत के उच्च पाठों के सहारे रिजिड और कोडीफाइ भी किया. लेकिन इस शासकीय प्रक्रिया के बाहर ब्राह्मणवाद का शोषणकारी स्वरुप तब भी ज़ारी था और शासकों के लिए कई जगह मुश्किल निर्णयों का सबब भी बनता था[18]. साथ ही इस शोषण से मुक्ति के संघर्ष भी चल रहे थे. फूले जैसे चिंतकों ने धार्मिक मुहावरों से बाहर जाकर पूरे ब्राह्मणीय संरचना को शोषण की संरचना के रूप में व्याख्यायित किया और उसे अस्वीकार किया. संस्कृतिकरण और सुधारवादी कर्मकांडों की आलोचना की. उन्होंने ब्राह्मणीय संरचना में बद्ध निम्न जातियों की अवरुद्ध ‘सांस्कृतिक कल्पना’ को मुक्त करने का प्रयास किया. धर्म से बाहर जाकर समाज में स्थित सामाजिक और आर्थिक अंतर्विरोधों को जाति व्यवस्था के प्रश्न के केन्द्र में लाया. उनका लेखन उन लोगों से अलग था जो अपनी-अपनी जातियों का इतिहास लिख रहे थे या फिर उच्च जातियों के उन लेखकों से जो जाति को गलत और बाध्यकारी सामंजस्य के रूप में देखते थे. आगे चलकर फूले की परंपरा में पेरियार और अम्बेडकर जैसे चिंतकों ने महती भूमिका निभाई. हम उनके विचारों से संवाद कर सकते हैं, आलोचना कर सकते हैं, उन्हें कई जगह नकार सकते हैं, लेकिन जातिगत शोषण के गांधीवादी हल से तब भी बेहतर स्थिति में उनके चिंतन को पाते हैं. यह अकारण नहीं कि ब्राह्मणवाद के शोषणकारी स्वरुप को ठेठ जिंदगियों से उठाने वाले प्रेमचंद कफ़न की मूलगामी समीक्षा तक पहुंचते हैं और इस प्रकार कोलोनिअल ज्ञानकाण्ड के बाहर पडी रोज़मर्रा की जिंदगियों में उस सत्य को देख लेते हैं जो अग्रवाल और डर्क्स जैसे उत्तरौपनिवेशिक नहीं देख पाते! जाति के साथ भूमि संबंधों को नज़रअंदाज करते हुए उत्तर-औपनिवेशिक आलोचना भी दरअसल अस्मितामूलक विमर्शकारों और राजनीतिज्ञों की गलती को ही दुहराता है. फिर उपनिवेश विरोधी आंदोलन की भिन्न ध्वनियों को भी अस्वीकार करते हुए गांधी के चिंतन में उसकी सही दिशा तलाश करता है.[19]यह औपनिवेशिक काल के पोलिटिकल कंडीशनिंग का तो नकार है ही वर्तमान पोलिटिकल कंडीशनिंग का भी नकार है. जाति से वर्ग में रूपान्तरण की प्रक्रिया को समझे बिना हम वर्तमान नवउदारवादी-नवउपनिवेशवादी कंडीशंस से लड़ नहीं सकते. और इस प्रकार भारत के अर्द्ध-सामंती अर्द्ध-औपनिवेशिक चरित्र को समझे बिना ब्राह्मणवाद को भी नहीं समझ सकते. आज कोई भी सामजिक समूह वैश्विक पूंजीवाद से बाहर नहीं है. अगर हमें इतिहास से शिक्षा लेना है तो प्रतिरोध की उस धारा से प्रेरणा लेनी होगी जो कबीर आदि के यहाँ अपने श्रम की विचारधारा में निहित थी और धर्म की मूलगामी आलोचना करती थी. जैसे फूले ने जातिव्यवस्था की सामजिक-आर्थिक कंडीशनिंग पर ध्यान दिलाया. कबीर की परम्परा कोई भी हो गांधी की नहीं है. कबीर की देशज आधुनिकता कोई भी हो गांधी की देशज आधुनिकता नहीं थी. फिलहाल इतना ही. अग्रवाल जी की कहानी के दूसरे हिस्सों पर बहस फिर कभी.


[1] कुछ विद्वानों ने ग्रियर्सन पर पश्चिमी हिन्दुस्तान में भी तुलसी के महत्व को बढ़ा-चढ़ा कर बताने का आरोप लगाया था. उसके उत्तर में ग्रियर्सन ने एक चिट्ठी का हवाला दिया था जो उसे किसी मिशनरी मि. डन ने लिखा था. मि. डन ने इलाहाबाद ,दिल्ली और गुडगाँव जिलों के अपने १९ साल के अनुभव के आधार पर तुलसी के बारे में ग्रियर्सन की बात की पुष्टि की, तथा लिखा की तुलसी के दोहे या चौपाइयों को सुनांने से प्रशासकों का काम कितना आसान हो जाता है क्योंकि लोग तब उनसे अपना जुड़ाव महसूस करते हैं. लेकिन उसने अपने पत्र में यह भी बताया था कि कबीर के दोहे भी उतने ही लोकप्रिय हैं. हिंदू ब्राह्मण और बनियों के बीच तुलसी ज्यादा स्वीकार्य थे जबकि “The influence of Kabir is, I think fully important, in fact, Kabir touches races and castes who have little in common with Krishanism and who know little of राम दशरथ का बेटा, but much of राम जग का करता, as they phrase it (and pronounce it too.) Kabir is, if I mistake not the great Guru of kolis and chamars as well as many higher in the scale”. (pp.462-63)दूसरी ओर तुलसी के प्रभाव से बाहर रहने वाले मुस्लिम समुदाय की ओर भी इशारा किया है. और इस समुदाय को प्रभावित करने के लिए प्रशासकों और मिशनरियों को उर्दू भाषा का ज्ञान होना चाहिए. “You can govern Indians through the medium of Urdu or Pedantic Hindi. If you want to win the Mohammadan you need to speak good Urdu, throwing in a quotation or two from SADI or HAFIZ. But for the real Hindu you must take the opposite line. His vernacular poets are the key to his affections, and there do occasionally come days, when the mere conscientious but unsympathetic official will be powerless”(pp.463) देखें: Appendix 1 , On The Influence Exercised by Tulasi Das in Western Hindostan .JRAS- 1903. तुलसी के सामान ही प्रभावशाली और लोकप्रिय कबीर को ग्रियर्सन ने लगभग छोड़ ही दिया है अपने भक्ति आख्यान में! साथ ही देखें, Vijay Pinch,  Bhakti and the British Empire ,Past & Present. Volume: 179. Issue: May,2003.

[2] देखें, रामचंद्र शुक्ल,२००४. सूरदास, ‘भक्ति का विकास’ में.प्रकाशन संस्थान: नयी दिल्ली.

[3] देखें पीताम्बर दत्त बडथ्वाल, १९५०, हिंदी काव्य में निर्गुण सम्प्रदाय, अनु. श्री परशुराम चतुर्वेदी, संपा.- डॉ. भागीरथ मिश्र. अवध पब्लिशिंग हाउस: लखनऊ.खास कर पृष्ठ- ८४.

[4] वही, पृष्ठ-७०, ८०. निर्गुण आन्दोलन को इन्होने पहले के वैष्णव आंदोलन से अलग करने की कोशिश इस्लाम और शुद्र जातियों के विशेष सामजिक सन्दर्भ में की है. लेकिन है ये भी वैष्णव ही. एक जगह वह लिखते हैं; “इस प्रकार हम देखते हैं कि निर्गुण मत के मूल स्रोत का पता चाहे हम जिस भी प्रकार लगाना चाहें, सबसे अधिक उस वैष्णव सम्प्रदाय में मिलाता है जो इससे अत्यंत निकट था और केवल कुछ ही बातों के लिए हमें इस्लाम तथा सूफी स्रोतों की ओर जाना पडता है.”(पृष्ठ-३२२) और उसमे भी सूफी दर्शन तो खुद ही भारतीय स्रोत से निकला है. अर्थात वैष्णव ही है.(पृष्ठ-७४)

[5] देखें ग्रियर्सन, JRAS-1903(पृष्ठ- ४४९)और JRAS-1907(पृष्ठ- ३१४) इस विषय पर विस्तृत चर्चा के लिए देखें. हावले जॉन स्ट्रैटन, introduction. International Journal of Hindu Studies 11, 3 (2007): 209–25.

[6] देखें पुरुषोत्तम अग्रवाल. अकथ कहानी प्रेम की: कबीर की कविता और उनका समय. पृष्ठ-५७.राजकमल प्रकाशन, दिल्ली-२०१०.

[7] एंटोनियो ग्राम्शी. सेलेक्सनस फ्रॉम दी प्रिजन नोटबुक्स, अनुवाद. क्युन्तिन होयरे और जयोफ्रे नोवेल स्मिथ. पृष्ठ-३२५-३४३.इन्टरनेशनल पब्लिशर,न्यू योर्क:१९७१.

[8] यहाँ ग्राम्शी मार्क्स के थेसिस ओन फायरबाख के ग्यारहवें थेसिस के सन्दर्भ में दुनिया को बदलने की चेतना को दर्शन के अर्थ में ले रहे हैं| वह दुनिया को बदलने के लिए किये जा रहे श्रम की चेतन विचारधारा के अर्थ से ‘सामान्य बोध’ को अलग करने की कोशिश करते हैं|

[9][9]  एंटोनियो ग्राम्शी. सेलेक्सनस फ्रॉम दी प्रिजन नोटबुक्स, अनुवाद. क्युन्तिन होयरे और जयोफ्रे नोवेल स्मिथ. पृष्ठ-३३३. इन्टरनेशनल पब्लिशर,न्यू योर्क:१९७१.

[10] वही,पृष्ठ-३२७.

[11] “Normal Times”: as opposed to the exceptional (and hence potentially revolutionary) moments in history in which a class or group discovers its objective and subjective unity in action.(pp.327)

[12] “Philosophy is criticism and superseding of religion and “common sense”. In this sense it coincides with “good” as opposed to “common sense”.”(pp.326)

“…Overcoming bestial and elemental passions through a conception necessity which gives a conscious direction to one’s activity. This is the healthy nucleus that exist in “common sense”, the part of it which can be called “good sense” and which deserves to be made  more unitary and coherent”(pp.328)

[13] “Every social stratum has its own ‘common sense’ and its own ‘good sense’, which are basically the most widespread conception of life and of man. Every philosophical current leaves behind a sedimentation of “common sense”. This is the document of its historical effectiveness. Common sense is not something rigid and immobile, but is continually transforming itself, enriching itself with scientific ideas philosophical opinions which have entered in ordinary life. ‘Common sense’ is the folklore of philosophy, and is always half-way between folklore properly speaking and the philosophy, science and economics of the specialist. Common sense creates the folklore of  the future, that is a relatively rigid phase of popular knowledge at a given place and time”(pp-326) (emphasis mine)

[14] मध्युगीन धर्मविरोधी आंदोलनों और चर्च के विशेष सन्दर्भ में ग्राम्शी ने इस प्रक्रिया को कुछ यूँ व्यक्त किया है-“ In the past such divisions  in the community of the faithful were healed by strong mass movements which led to ,or were absorbed in, the creation of new religious orders centered on strong personalities (St Dominic, St Francis)… The heretical movements of the Middle Ages… represented a split between masses and intellectuals within the church. The split was ‘stitched over’ by the birth of popular religious movements subsequently reabsorbed by the Church through the formation of the mendicant orders and a new religious unity”(pp331 and 331n). भारत में चूँकि चर्च जैसी कोई केंद्रीय सत्ता नहीं थी और न ही धर्म ठीक रीलिजन, इस लिए यहाँ नयी धार्मिक व्यवस्था का स्वरुप ठीक उसी तरह नहीं रहा जैसा यूरोप में बना था| अतः सगुण भक्ति के चरित्र पर बात करते हुए इस भिन्न सन्दर्भ को ध्यान में रखना चाहिए| साथ ही दसवीं से चौदहवीं सदी तक होने वाले परिवर्तनों की क्षेत्रीयता और उसके पार-क्षेत्रीय मुहावरों को भी ध्यान में रखना चाहिए| नए वैष्णव धर्म को चर्च की एकता कारी धार्मिक विचारधारा के रूप में लेने से भारी भूल की संभावना है| अकारण नही कि इस नीचे से बनते वैष्णव धर्म को द्विवेदी जी ने लोक-धर्म ही माना था| यह निश्चित है की इस प्रक्रिया में चलने वाले वर्चस्व और अधीनस्थता की प्रक्रियायों को उनके खास सामजिक वर्गों के सन्दर्भ में द्विवेदी जी नही देख पाए थे|

इस प्रक्रिया की विशेष चर्चा बंगाल वैष्णव स्कूल के सन्दर्भ में पार्था चटर्जी ने भी की है| देखें पार्था चटर्जी. ‘ ‘कास्ट एंड सबाल्टर्न कांसस्नेस’, सबाल्टर्न स्टडीज vi: रायटिंगस ओन साउथ एशियन हिस्टरी एंड सोसाइटी, एडी. बाइ रंजीत गुहा,पृष्ठ-१६९-२०९. ओ.यु.पी., नई दिल्ली:१९८९.

[15] ग्राम्शी,वही,पृष्ठ-३४८.

[16] डेविड लोरेंजन.२०१०. निर्गुण संतों के स्वप्न. अनु. धीरेन्द्र बहादुर सिंह. श्रृंखला संपादक- पुरुषोत्तम अग्रवाल. पृष्ठ-२१९. राजकमल: दिल्ली.

[17] देखें.Ranajit Guha.”Dominance Without Hegemony And Its Historiography” , in ‘Subaltern Studies VI: Writing on South Asian History and Society’; ed. by Ranajit Guha; pp. 257-265;Oxford ,New Delhi 1989. रंजीत गुहा लिखते हैं : “If the politics of collaboration was informed by the Humean idiom of obedience- however uneasy that obedience might  have been under the hushed, almost hopeless, urge for enfranchisement among the colonized- it drew its sustenance, at the same time, from a very different tradition- the Indian tradition of Bhakti. All the collaborationist moments of subordination in our thinking and practice during the colonial period were linked by Bhakti to an inert mass of feudal culture which has been reproducing loyalism and depositing it in every kind of power relation for centuries before the British conquest.”

[18] इस विषय पर विस्तृत चर्चा के लिए देखें. उमा चक्रबर्ती:२००३. जेंडरिंग कास्ट: थ्रू अ फेम्निस्ट लेंस. खास कर ये दो अध्याय. ‘प्रीकोलोनिअल स्ट्रक्चर ऑफ कास्ट एंड जेंडर:ऐन एटीन सेंचुरी इक्साम्प्ल’ और ‘कास्ट इन द कोलोनिअल पीरियड’. स्ट्रेस: कोलकाता.

[19] देखें. निकोलस डर्क्स:२००२. कास्ट्स ऑफ माइंड: कोलोनिअलिस्म एंड मेकिंग ऑफ मॉडर्न इंडिया. पृष्ठ- २९८-३०२ खास कर. परमानेंट ब्लैक: दिल्ली.

मार्तंड प्रगल्भ जे.एन.यू. के भारतीय भाषा केंद्र में पी.एच.डी. के लिए शोधरत    हैं.


The Timid Investigators: An Homage to Roberto Bolaño

The Timid Investigators: An Homage to Roberto Bolaño.

by Frederic Tuten

Then Maria came in and I said do you want café or café con leche, and then Bebe came in and I said do you want a café con leche or a mescal. Maria said she wanted a mescal with a fat worm and then Bebe said she wanted a clear tequila, then Maria said Verlaine is a better poet than Rimbaud who turned Verlaine from anapest to pederast, then Luiz came in with a kitchen knife and started cutting his dick right in front of us, but when Maria, who came from Xochimilco and whose father was a tram conductor and whose mother had run a small brothel in Taxco before she saw the light of Jesus and married and had Maria and several other Brats as Maria called them, and Maria said stop cutting that huge magnificent dick of yours or at least don’t do it here in the kitchen, and Luiz said he was going to start a magazine and publish only nuns and queers. Fuck you, I said, fuck you, chinga tu madre! Then two guys I didn’t know came in high from pot and giggling like tweens, Maria said hello Paco, hello Paquito. They were the twins from Guadalajara and wrote for a magazine called Anal Retention and they were stars in the poetry world faction that sided with Quevedo against Gongora and said they would stomp anyone who read that pussy Quevedo, but they were frail and I could not imagine their stomping a sleeping cockroach drunk on pulque, then I said, Hey! Twins, you want a café solo or a café con leche or a diet Coke or a zero Coke or maybe a Fanta lite, or maybe an Aztec cola but just then Maria took me by the arm and said come with me, I have to tell you something. And we went to the bedroom where a young woman was sleeping off the night before and Maria said don’t mind her, that’s just Silvina, she’s blind and gives handjobs for five pesos, and an extra five if you come on her face. She must make a lot of money I said. She does, she’s rich and owns property in Pedregal and in Chapingo but nobody knows so don’t tell, anyway I wanted you to know I don’t love you and that I will never sleep with you no matter what you do so don’t write any poems for me because that won’t work the way it did when you fucked my sister, Leche de Amor—I never fucked her I said. Yes you did she said, Carlota el Camino told me and Leche de Amor told her. I saw bright lights flash in the window, then the slam of a car door, then two huge guys the size of shipyards barged in pistols in hand. “Where is that faggot Noche de Azul?” one said, spitting out a plank of a toothpick cut from plywood.

“Where is that Quevedo faggot?” the one with the flat nose said; “We have a little present for him,” the other with a flatter nose said.

“Who’s looking?” I asked.

“The Gongora twins,” they answered with flames.

“I see,” I said. “Where are your flowers, the dead ones you rob from the graves of orphans? Where are the moist pennies you steal from your mother’s bra?”

They pretended to cry. And I said, real poets do not cry, they write poems to make others cry.

They were insulted they said and would never forgive the insult or the faggot who engineered it and I would pay with my dick they said and brandishing knives long like swords they inched toward me but I leaped out the window and landed on Octavio Rima as he was pissing against the wall. I always knew you loved me he said shaking the last drops off his smallish dick before tucking it away in his pants, really filthy chinos like they had never been washed and he said who’s got time for laundry when poetry must be rescued from the dens of faggots without talent and who shit on Catullus and Wallace Stevens. He was getting started on the New York School whoever they were and imitated their verses:

The milk
Carton
On the Table
Cups
Of emptiness
With a lump
Of Sugar
& two shots of café Pico.

I told him that the Gongora Brothers were after me and that I had no time for his parodies because actually I could see the brothers hanging out the widow and the one with the flatter nose took out his stringy thing and starting raining down on us with his piss. God! That smelled like garlic and mouse shit boiled in goat milk and I ran off just in time not to get drenched but got stopped ten feet away by Leche de Amor, who hoisted a broken umbrella over our heads and said, Don’t believe my sister, she loves you and wants so much to fuck you, learning from me what a limp fuck you truly are.

Oh! Mexico! I sang. Oh! Leche de Amor with your love of café con sangre de bachelor penguins and of disgusting sex on piss-soaked mattress. Oh! Obsidian night of the soul and of trucks spilling the fat of book grease along the Carretera Toluca on the way to Tira al Pichon. Oh! Mexico and its oblong shadows of teeth and its back streets with lampposts of hanging men and goats. Oh! Fat churros boiled in motor oil and powdered with fine Chinese chalk; sombreros packed with dog shit and nails.

We got into Lope de Luna’s parked car—a ’68 blue Chevy with faux-leopard-skin seats and souped-up engine—and sped off, Octavio and Leche de Amor and me, with the Gongora Brothers in such close pursuit I could read Vallejo’s poems in their headlights. Octavio turned off his lamps and made a dramatic swerve down a dark earthen road, not that I could see the road or anything ahead, only a slice of moon and a few boring clouds above. What a thing, thinking that the last thing to see were the boring fat clouds and a ten-cent slice of shitty moon, and to be crashing in a lunatic car with a poet with a worm for a dick and a woman who liked it limp, like Neruda’s rhymes. Octavio finally flashed on his brights and ahead we saw the Gongora Brothers waiting for us with shotguns and square balloons. I had just enough time to sing out “adios muchachos, compañeros de mi vida” before the car veered off down a ravine and into a forest of magueys and frightened boulders.

When I woke, I found Octavio Rima with his severed head in his lap and Leche de Amour with a thin glass shard through her chest, I myself was no bargain or sight for sore eyes, with my front teeth on my lap like little chicklets with bloody roots. I thought: Let me write one more poem, one more poem that I will dedicate to Rios Juliano, the mad Joycean from Madrid, the one who fishes sonnets and sombreros from his window. Adios!

Frederic Tuten is the author of five novels, notably The Adventures of Mao on the Long March and Tintin in the New World. His book of interrelated short stories, Self Portraits: Fictions, was published in 2010. He lives in New York.

So many Insights in one interview : Roberto Bolano

1.Underdevelopment only allows for great works of literature. Lesser works, in this monotonous or apocalyptic landscape, are an unattainable luxury.

2. Deep down—and I think you’ll agree with me—the question doesn’t lie in the distinction of realist/fantastic but in language and structures, in ways of seeing.

3. I’ll insist at the risk of sounding pedantic (which I probably am, in any case), that when I write the only thing that interests me is the writing itself; that is, the form, the rhythm, the plot. I laugh at some attitudes, at some people, at certain activities and matters of importance, simply because when you’re faced with such nonsense, by such inflated egos, you have no choice but to laugh. All literature, in a certain sense, is political. I mean, first, it’s a reflection on politics, and second, it’s also a political program. The former alludes to reality—to the nightmare or benevolent dream that we call reality—which ends, in both cases, with death and the obliteration not only of literature, but of time.

4. I don’t believe all that much in writing. Starting with my own. Being a writer is pleasant—no, pleasant isn’t the word—    it’s an activity that has its share of amusing moments, but I know of other things that are even more amusing, amusing in the same way that literature is for me. Holding up banks, for example. Or directing movies. Or being a gigolo. Or being a child again and playing on a more or less apocalyptic soccer team. Unfortunately, the child grows up, the bank robber is killed, the director runs out of money, the gigolo gets sick and then there’s no other choice but to write. For me, the word writing is the exact opposite of the word waiting. Instead of waiting, there is writing. Well, I’m probably wrong—it’s possible that writing is another form of waiting, of delaying things.

5. I’m not one of those nationalist monsters who only reads what his native country produces.

6. the form, the structure, always belong to you, and without form or structure there’s no book, or at least in most cases that’s what happens. Let’s say the story and the plot arise by chance, that they belong to the realm of chance, that is, chaos, disorder, or to a realm that’s in constant turmoil (some call it apocalyptic). Form, on the other hand, is a choice made through intelligence, cunning and silence, all the weapons used by Ulysses in his battle against death. Form seeks an artifice; the story seeks a precipice. Or to use a metaphor from the Chilean countryside (a bad one, as you’ll see): It’s not that I don’t like precipices, but I prefer to see them from a bridge.

7.  A self-portrait requires a certain kind of ego, a willingness to look at yourself over and over again, a manifest interest in what you are or have been. Literature is full of autobiographies, some very good, but self-portraits tend to be very bad, including self-portraits in poetry, which at first would seem to be a more suitable genre for self-portraiture than prose. Is my work autobiographical? In a sense, how could it not be? Every work, including the epic, is in some way autobiographical. In the Iliad we consider the destiny of two alliances, of a city, of two armies, but we also consider the destiny of Achilles and Priam and Hector, and all these characters, these individual voices, reflect the voice, the solitude, of the author.

8.  Nicanor Parra says that the best novels are written in meter. And Harold Bloom says that the best poetry of the 20th century is written in prose. I agree with both. But on the other hand I find it difficult to consider myself an active poet. My understanding is that an active poet is someone who writes poems…….  the important thing is to keep reading it. That’s more important than writing it, don’t you think? The truth is, reading is always more important than writing. 

 

कारमेन बौल्लोसा द्वारा लिया गया रोबेर्तो बोलानो से एक साक्षात्कार – मेरी कुछ पसंदीदा-चुनिंदा पंक्तियाँ


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