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बना रहे गंगा ढाबा: संदीप सिंह

आज-कल जे.एन.यू. के गंगा ढाबा की जबर्दस्त चर्चा चल रही है. उसके कारणों के विस्तार में जाने का यहाँ समय नहीं है. ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि गंगा ढाबा की उपस्थिति के क्या मायने हैं उसे समझा जाय. उन्हीं मायनों से आज की चर्चा प्रासंगिक होती है. कभी-कभी यह जरुर लगता है कि जेएनयू  वालों के लिए गंगा ढाबा एक ‘फेटिश’ तो नहीं है, जिन्हें सहलाना उन्हें बहुत पसंद है. या फिर एक ऐसी जगह जहाँ की कुछ यादें जीवन भर के लिए एक टीस की तरह बजती है. मौसम ख़ुशगवार हो तो यह दर्द मीठी-मीठी सुइयों की तरह चुभता है और मौसम ने साथ नहीं दिया तो खुद भी सुई बन जाने से नहीं हिचकते हैं.

खैर, संदीप सिंह द्वारा लिखित यह  छोटा सा टुकड़ा  ‘गंगा ढाबा’ के मायनों को समझने में नजदीक की एक  दृष्टि देता है.

गंगा ढाबा (फोटो- विकास कुमार)

गंगा ढाबा (फोटो- विकास कुमार)

By संदीप सिंह 

जेएनयू से कम नाम जेएनयू के ‘गंगा ढाबा’ का नहीं है।  जब हम लोग इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंडर ग्रैजूएशन के छात्र थे तभी से दिल्ली गए सीनियर्स से जेएनयू के किसी गंगा ढाबा का नाम सुना करते थे जो ‘सुबह चार बजे तक खुला रहता था और जहाँ लोग चाय के कप के साथ गर्मागर्म बहसें किया करते हैं’। इलाहाबाद जैसे शहर में हॉस्टल में रहते हुए, जहाँ देर रात गए चाय पीने के लिए हमें प्रयाग रेलवे स्टेशन जाना पड़ता था, हमारे मन में गंगा ढाबा की एक बड़ी ही रोमांटिक छवि उभरती थी।

जेएनयू में एडमिशन वाली भागदौड़ के बाद हम तीन-चार इलाहाबादी दोस्त जो उस साल अलग-अलग विषयों में वहां दाखिल हुए थे, बाकायदा तैयार होकर ‘गंगा ढाबा देखने’ निकले थे। संभवतः हम चारों के लिए ढाबे का पहला दर्शन ‘दृश्यभंग’ जैसा था। हमारी कल्पना में जो एक व्यवस्थित, रोशनी से भरपूर और अब तक हमारे देखे-जाने ढाबा-कैंटीनों की तस्वीर थी, टूट गयी. अजीब झाड-झंखाड़ से भरी हुई एक उबड़-खाबड़ जगह, जहाँ चलने में आपके पैरों को आँखें रखनी पड़ती हैं। बैठने के लिए कुर्सियां न मेजें बल्कि टेढ़े-मेढ़े पत्थर। ऊपर खुला आकाश और बबूल की लगातार गिरती रहने वाली पत्तियों  की कांटेदार शाखाएं, जिनसे कब आपकी चाय में चींटा गिर पड़ेगा इसका ख्याल हमेशा रखना पड़ता है।

इस शुरुआती झटके के बाद थोडा गौर करने पर हमने पाया कि थोड़ी-थोड़ी दूरी  पर बने स्टूलंनुमा पत्थरों पर बैठे लोग अँधेरे और रोशनी के बीच वाली स्थिति में सच में कुछ बतियाये जा रहे थे। दूसरा झटका हमें ढाबे के काउंटर पर लगा। न नानवेज  न वेज! सिर्फ चाय, शुरू में एकदम अच्छा न लगने वाला पराठा, आलू के एकाध तैरते टुकड़े के साथ पानी से पतली ‘आलू मटर’ की सब्जी और आमलेट जैसी एक दो चीजें, और बस! समझ में नहीं आया कि आखिर ढाबा इतना फेमस क्यों है?

कैम्पस में थोडा व्यवस्थित होने के बाद जब पूरी लाइब्रेरी ‘पढ़’ जाने का जोश अपने उफान पर था, 11.30 पर लाइब्रेरी बंद होने के बाद गंगा ढाबा जाकर घंटा डेढ़ घंटा बैठना हमारी आदतों में कब शामिल हुआ, ये मैं कभी ठीक से जान नहीं पाया। धीरे-धीरे उस ‘अँधेरे-उजाले’ में बिखरे हुए उबड़-खाबडपन के भीतर से बनने वाले ‘स्पेस’ का अहसास होने लगा था। यह ‘स्पेस’ जेएनयू की खासियत है। गंगा ढाबा के ‘स्पेस’ का एबनार्मल या अनप्लांड स्ट्रक्चर उसकी विशेषता है। इसका अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि किसी भी किस्म की कितनी भी प्राइवेट बात जितने निश्चिन्त तरीके से आप गंगा ढाबा पर कर सकते हैं उतनी निश्चितता से संभवतः जेएनयू के किसी और पब्लिक स्पेस में नहीं, लाइब्रेरी कैंटीन और आजकल के 24*7 ढाबा पर तो बिलकुल ही नहीं। पार्थसारथी चट्टानों के बाद जेएनयू में सबसे ज्यादा प्रेम प्रस्ताव संभवतः गंगा ढाबा के ही स्टूलनुमा पत्थरों के बीच उपस्थित अँधेरे-उजाले में स्वीकारे या ठुकराए जाते हैं, ऐसा मैं सिर्फ दूसरों के अनुभव से नहीं कह रहा हूँ। गंगा ढाबा की यह संरचना उसके ‘स्पेस’ को  एक खास किस्म की ‘वैयक्तिक्त्ता/पहचान’ देती है जिसमें आप बहुत सहज महसूस करते हैं। अगर आप गौर से देखें तो पायेंगे के ढाबे की इस ‘व्याप्ति’ के किसी कोने में बैठा एक लड़का या लडकी सबकी नजरों में आये बगैर सबको या किसी एक को ताके जा रहा है।

खैर, इसी ढाबे से हमने छात्र संगठनों के नेताओं/कार्यकर्ताओं को ‘आइडेंटीफाई’ करना शुरू किया। 2004 के उस ज़माने में मौर्याजी की दुकान के बगल में देर रात तक लगने ‘आइसा के लोगों का अड्डा काफी विजिबल हुआ करता था। एसएफआई के लोग वहां कम दिखते थे, उनका मुख्य अड्डा उस समय छात्रसंघ का ऑफिस ही हुआ करता था जिसको हम लोग अक्सर बाहर से झाँककर लौट आया करते थे। ऐसे ही किसी एक दिन जब मैं अपने कुछ मित्रों के साथ देर रात गंगा ढाबा पर बैठा हुआ था हमें आइसा के किसी कार्यकर्ता ने अगले दिन दिखाई जा रही फिल्म ‘एक मिनट का मौन’ की पर्ची दी जिसमें उस क्रांतिकारी छात्र नेता के जीवन और संघर्ष को  देखने के बाद रवि यादव और क्लास के ‘बाबा’ अमरेन्द्र त्रिपाठी के साथ मैं काफी खराब मनःस्थिति में चला गया था।

उस समय हम अभिषेक सर जो हाल ही में फुलब्राईट स्कालरशिप पूरी कर लौटे थे और आजकल बोस्टन विश्वविद्यालय में अध्यापक हैं, की शागिर्दगी में उनके शब्दों में ‘गंगा ढाबा’ करते थे। उनके हिसाब से ‘गंगा ढाबा करना’ सही में जेएनयूआइट होना है। यह भी सच है कि सबसे पहले ठीक ठीक से ऋत्विक घटक, सबाल्टर्न स्टडीज, रणधीर सिंह, फ्रेंचेस्का के पब्लिक स्फेयर, पाल ब्रास, पाल रिकर, फूको और हैबरमास के बारे में वहीँ और उन्ही से सुना।

बाद में छात्र सक्रियता के दौर में जब अक्सर हमारा मेस का खाना छूट जाया करता था या देर रात कैम्पेन ख़त्म होती थी, हमारी भूख वही ढाबा वाला पराठा ही मिटाता था जिससे हमारी शिकायतें कभी ख़त्म नहीं हुईं। जुलूस ख़त्म हुआ है और रात के 1 बज चुके हैं। 10-15 रूपये में अगर पेट भरना है तो चलो गंगा ढाबा। संगठन की कमेटी की बैठक देर रात ख़त्म हुई है, अगले दिन की प्लानिंग का तनाव साफ़ दिख रहा है, भूख लगी है, चलो गंगा ढाबा। युनियन की काउंसिल की तल्ख़ बैठक ख़त्म हुई है, मूड ऑफ़ है, चाय पीनी है, चलो गंगा ढाबा। मालूम है कोई दोस्त/कामरेड या अच्छा लगने वाला मिल ही जायेगा जिसको देखकर आप खुश हो जाते हैं. आप अकेले हैं, मन नहीं लग रहा है, चलो गंगा ढाबा।

जेएनयू का अघोषित पोलिटिकल सेंटर है गंगा ढाबा। सब कुछ वहीँ से शुरू होता है, जुलूस भी और चुनावी अफवाह भी। आजकल के नए ढाबे/कैंटीन  अपनी संरचना में काफी सीमित और संकुचित है जिन पर इस बाजारू समय का असर साफ़ दिखता है. और दिखता है कि कैसे इस ‘समय’ में दीक्षित होने वाले हमारे नौजवान गंगा ढाबा की अहमियत को शायद कम समझ रहे हैं। बावजूद इसके गंगा ढाबा इस ‘समय’ के दबाव में नहीं आता है, अपनी पहचान के साथ खड़ा रहता है, सर नहीं झुकाता। चमक-दमक भरे इस ‘बाजारू’ समय का एक तरह से क्रिटीक है गंगा ढाबा।
जेएनयू में गंगा ढाबा  का होना आश्वस्तिदायक है। वो कहता है कि तुम आओ, मैं हूँ और वहीँ मिलूंगा। बना रहे, बचा रहे गंगा ढाबा।

sandeep singhसंदीप सिंह जेएनयू  छात्रसंघ के अध्यक्ष  और छात्र संगठन आइसा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके हैं . आजकल अध्ययन-चिंतन  में निमग्न हैं . उनसे संपर्क जरिया उनका गुल्लक , sandeep.gullak@gmail.com है. 

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एक स्थायी आर्थिक आपातकाल: स्लावोज ज़िज़ेक

By स्लावोज  ज़िज़ेक 

“आज पूंजीवाद  विरोधियों की कमी नहीं है. यहाँ तक कि हम पूंजीवाद की वीभत्सता के बारे में अत्यधिक आलोचनाएं सुन सुन थक गए हैं. जहाँ अखबार, टीवी की जांच रिपोर्टें और खूब बिकने वाली किताबें वातावरण को प्रदूषित करने वाली कंपनियों, भ्रष्ट बैंक मालिकों जो कि जनता की कीमत पर मोटी तनख्वाहें उठा रहे हैं और फैक्टरियों में बाल मजदूरों की ख़बरों से अटी पड़ी हैं. हालांकि, इस तरह की आलोचना में एक पेंच है भले ही यह कितना ही निष्ठुर प्रतीत हो : यह आलोचना एक नियम के रूप में कभी भी इस उदार लोकतांत्रिक ढांचे पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगाती है. उद्देश्य खुले या ढंके रूप में यही है कि कैसे पूंजीवाद को मीडिया दबाव, संसदीय जांच, कड़े कानूनों और ईमानदार पुलिसिया जांच से नियमित किया जाए. बुर्जुआ राज्य के कानून की उदार लोकतांत्रिक मशीनरी पर कभी प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया जाता. यह मशीनरी एक पवित्र गाय है जिसे यहाँ तक कि सबसे ज्यादा नैतिकतावादी पूंजीवाद विरोधी – वर्ल्ड सोशल फोरम, सिएटल आन्दोलन – छूने की भी हिम्मत नहीं करते”

(न्यू लेफ्ट रिव्यू में छपे स्लावोज  ज़िज़ेक के  लेख का एक अंश…..जिसका अनुवाद देश के चर्चित युवा-छात्र  नेता, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्रसंघ  के पूर्व अध्यक्ष  और छात्र-संगठन आइसा के अध्यक्ष  संदीप सिंह ने किया है। जिनसे sandeep.aisa@gmail.com पर संपर्क संभव है )

यूरोपीय महासंघ के देशों द्वारा कमखर्ची प्रस्तावों (कटौती प्रस्तावों) के खिलाफ इस साल होने वाले विरोध प्रदर्शनों – ग्रीस में और थोडा मध्यम स्तर पर आयरलैंड, इटली और स्पेन – में दो ख़बरों ने काफी जगह बनाई. सरकारी, वर्चस्वशाली खबर, जो इस संकट का एक गैर राजनीतिक स्वाभाविकीकरण पेश करती है, के हिसाब से प्रस्तावित कटौती प्रस्ताव किसी राजनीतिक इच्छा से प्रेरित न होकर तटस्थ वित्तीय तर्कशास्त्र की अनिवार्यता हैं. मतलब अगर हमें अपनी अर्थव्यवस्था को स्थिर रखना है तो सुधारों की कड़वी दवा तो निगलनी पड़ेगी. दूसरी खबर विरोध कर रहे मजदूरों, छात्रों और पेंशनयाफ्ताओं की है, जो कटौती प्रस्तावों को वैश्विक वित्तीय पूंजी द्वारा कल्याणकारी राज्य के बचे खुचे शेष को ख़त्म करने के एक हमले के रूप में देख रही है. अंततः एक परिप्रेक्ष्य से IMF अनुशासन और व्यवस्था के एक तटस्थ एजेंट के रूप में सामने आता है तो दूसरे परिप्रेक्ष्य से वैश्विक पूंजी के अत्याचारी एजेंट के रूप में.

दोनों ही दृष्टिकोणों में सच का एक अंश है. जिस तरह IMF अपने सदस्य देशों से व्यवहार करता है, उसके सुपरईगो आयाम को भुलाया नहीं जा सकता है. जहाँ एक तरफ वह बकाया क़र्ज़ के लिए उन्हें डांटता-फटकारता है वहीँ दूसरी ओर नए कर्जों का प्रस्ताव भी रखता है, जिन्हें सब जानते हैं कि वे उसे चुका नहीं पायेंगे. इस तरह वे उस दुष्चक्र में और गहरे फंसते चले जाते हैं जहाँ पुराना क़र्ज़ और नए कर्जों को न्योता देता है. IMF  की यह सुपरईगो रणनीति इसलिए भी कारगर होती है क्योंकि कर्ज़दार देश, ये जानते हुए कि वे पूरा क़र्ज़ लौटा नहीं पायेंगे, इसमें भी फायदे की आशा रखते हैं.

हालांकि प्रत्येक कहानी में सच्चाई का एक अंश है लेकिन वस्तुतः दोनों गलत हैं. यूरोपीय सत्ता प्रतिष्ठानों द्वारा प्रचारित कहानी इस तथ्य पर पर्दा डालती है कि यह भयंकर घाटा वित्तीय क्षेत्र को बड़े पैमाने पर बेलआउट देने और मंदी के दौरान सरकारी करों में गिरावट के कारण हुआ है. एथेंस को दिया जाने वाला भारी लोन फ्रांसीसी और जर्मन बैंकों से यूनान द्वारा लिए गए क़र्ज़ को वापस कराने में इस्तेमाल होगा. यूरोपीय महासंघ के आश्वासन का असली उद्देश्य प्राइवेट बैंकों को मदद करना है क्योंकि यूरो जोन का कोई भी देश अगर दिवालिया होता है तो पूरे यूरोपीय महासंघ को भीषण छति होगी. दूसरी तरफ विरोध कर रहे लोगों की कहानी मौजूदा वामपंथ की विपन्नता की गवाह है. इनकी मांगों में मौजूदा कल्याणकारी राज्य के साथ किसी भी तरह के समझौते के खिलाफ एक आम नकार के अलावा कोई सकारात्मक कार्यक्रममूलक दृष्टि नहीं है. यहाँ पर यूटोपिया व्यवस्था में कोई आमूलचूल बदलाव नहीं है बल्कि ये है कि इसी व्यवस्था के भीतर कल्याणकारी राज्य को टिकाया जा सकता है. दूसरी तरफ हमें इसके विरोधी तर्क में निहित सत्य के अंश को नहीं भूलना चाहिए कि अगर हम वैश्विक पूंजीवाद के दायरे में ही रहते हैं तब हमारे लिए मजदूरों, छात्रों और पेंशनरों को मिलने वाली सुविधा में कटौती करना बेहद आवश्यक है.

Courtesy-  AP Photo

Courtesy- AP Photo

अक्सर सुनने में आता है कि यूरोपीय महासंघ के संकट का असली सन्देश यह है कि सिर्फ यूरो मुद्रा नहीं बल्कि एकीकृत यूरोप का विचार ही मर चुका है. इससे पहले कि हम यह वक्तव्य मान लें इसको एक लेनिनवादी मोड़ देना चाहिए. यूरोप मर चूका है – ठीक है. लेकिन कौन सा यूरोप? उत्तर है – वैश्विक बाजार में समाहित उत्तर राजनीतिक यूरोप, वैसा यूरोप जो लगातार जनमत संग्रहों में ख़ारिज किया जा चुका है, ब्रुसेल्स का तकनीकपरस्त यूरोप. वह यूरोप जो अपने आप को यूनानी उत्साह, आवेग, करुणा के विरुद्ध ठन्डे यूरोपीय तर्क और गणित के पक्ष में प्रस्तुत करता है. वैसे यह कितना भी यूटोपियन लगे पर एक नए यूरोप के लिए संभावनाएं खुली हैं: एक साझे मुक्तिकामी कार्यक्रम पर आधारित एक पुनर्राजनीतिकृत यूरोप. वह यूरोप जिसने प्राचीन यूनानी लोकतंत्र, फ्रांसीसी और अक्टूबर क्रान्ति को जन्म दिया. इसलिए इस मौजूदा वित्तीय संकट पर बोलते समय हमें सम्पूर्ण संप्रभु राष्ट्र-राज्यों की पुनर्वापसी के लोभ से बचना चाहिए; जो कि मुक्त विचरण करने वाली अंतर्राष्ट्रीय पूंजी (जो एक राज्य को दूसरे राज्य के खिलाफ इस्तेमाल करती है) के लिए आसान चारा होते हैं. पहले के किसी भी दौर से ज्यादा आज के संकट को हमारा जवाब वित्तीय पूंजी की सार्वभौमिकता से ज्यादा सार्वभौमिक और अंतर्राष्ट्रीय होना पड़ेगा.

एक नया दौर

एक चीज स्पष्ट है: कल्याणकारी राज्य के दशकों में जब कटौतियां अपेक्षाकृत कम थीं और होती भी थीं तो इस वायदे के साथ होती थीं कि जल्दी ही सबकुछ सामान्य हो जाएगा, अब हम एक ऐसे दौर में प्रवेश कर रहे हैं जिसमें आर्थिक आपातकाल की स्थिति स्थायी होती जा रही है. यह लगातार बनी रहने वाली स्थिति है, जीवन के अंग जैसी. अपने साथ यह ज्यादा दूरगामी और गंभीर, कमखर्ची के उपाय, सुविधाओं में कटौती, कमजोर शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं तथा रोज़गार के बड़े संकट को लेकर आयेंगी. वामपंथ इस कठिन कार्यभार को रेखांकित करने का सामना कर रहा है कि हम राजनीतिक अर्थशास्त्र से जूझ रहे हैं. इसका मतलब है कि कुछ भी ‘नेचुरल’ नहीं है – वर्तमान वैश्विक अर्थतंत्र राजनीतिक निर्णयों की एक कड़ी पर निर्भर करता है. साथ-साथ इस बात को जानते हुए भी कि जब तक हम पूंजीवादी व्यवस्था के भीतर रहेंगे इसके नियमों का उल्लंघन निष्कर्षतः आर्थिक विद्ध्वंस्ता लाएगा क्योंकि ये व्यवस्था एक छद्म नेचुरल तर्कशास्त्र का पालन करती है. यद्यपि यह स्पष्ट है कि हम बढ़े हुए शोषण के एक नए चरण में प्रवेश कर रहे हैं जिसे वैश्विक बाजार (आउटसोर्सिंग इत्यादि) ने आसान बना दिया है, हमें अपने दिमाग में यह स्पष्ट रखना चाहिए कि यह इसी व्यवस्था के द्वारा थोपा गया है जो हमेशा आर्थिक रूप से ढहने के कगार पर रहती है.

इसलिए यह उम्मीद करना निरर्थक होगा कि मौजूदा संकट सीमित होगा और यूरोपीय पूंजीवाद बढ़ती जनसँख्या के लिए जीवन के अपेक्षाकृत ऊँचे स्तर की गारंटी करता रहेगा. यह शायद एक विचित्र क्रांतिकारी राजनीति होगी जो उम्मीद करती है कि स्थितियां जारी रहेंगी तथा पूंजीवाद को निष्प्रभावी तथा हाशिये का बना देंगी. इस तरह की तर्कप्रणाली के खिलाफ हमें बोदिऊ (Bodieu) की यह बात जरूर पढ़नी चाहिए कि कुछ नहीं होने से विपदा अच्छी है. हमें क्रांति के प्रति अपने आग्रह के लिए खतरा उठाना होगा भले ही क्रांति अस्पष्ट विपदा बनकर रह जाए. वामपंथ के अविश्वास का सबसे अच्छा सूचक संकट के प्रति उसका भय है. सच्चा वामपंथ संकट को बिना किसी भ्रम के गंभीरतापूर्वक लेता है. इसकी बुनियादी अंतर्दृष्टि यह है कि यद्यपि सारे संकट दुखदायी और खतरनाक हैं पर वे अवश्यसंभावी हैं. और यह वे धरातल हैं जिस पर लडाइयां छेड़ी और जीती जाती हैं. इसीलिये आज पहले से कहीं ज्यादा माओ-त्से-तुंग का पुराना नारा महत्वपूर्ण हो गया है – “स्वर्ग के नीचे हर चीज में घोर उलट-पुलट है और परिस्थितियां बेहतरीन हैं.”

आज पूंजीवाद के विरोधियों की कमी नहीं है. यहाँ तक कि हम पूंजीवाद की वीभत्सता के बारे में अत्यधिक आलोचनाएं सुन-सुन कर थक गए हैं. जहाँ अखबार, टीवी की जांच रिपोर्टें और खूब बिकने वाली किताबें वातावरण को प्रदूषित करने वाली कंपनियों, भ्रष्ट बैंक-मालिकों जो कि जनता की कीमत पर मोटी तनख्वाहें उठा रहे हैं और फैक्टरियों में बाल मजदूरों की ख़बरों से अटी पड़ी हैं. हालांकि, इस तरह की आलोचना में एक पेंच है, भले ही यह कितना ही निष्ठुर प्रतीत हो : यह आलोचना एक नियम के रूप में कभी भी इस उदार लोकतांत्रिक ढांचे पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगाती है. उद्देश्य खुले या ढंके रूप में यही है कि कैसे पूंजीवाद को मीडिया दबाव, संसदीय जांच, कड़े कानूनों और ईमानदार पुलिसिया जांच से नियमित किया जाए. बुर्जुआ राज्य के कानून की उदार लोकतांत्रिक मशीनरी पर कभी प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया जाता. यह मशीनरी एक पवित्र गाय है जिसे यहाँ तक कि सबसे ज्यादा नैतिकतावादी पूंजीवाद विरोधी – वर्ल्ड सोशल फोरम, सिएटल आन्दोलन – छूने की भी हिम्मत नहीं करते.

राज्य और वर्ग

ठीक यहीं पर मार्क्स की अंतर्दृष्टि पहले से कहीं ज्यादा तर्कसंगत ठहरती है. मार्क्स के अनुसार स्वतंत्रता का सवाल सिर्फ राजनीतिक सवाल नहीं है॰ जैसा की वैश्विक वित्तीय संस्थान, किसी देश के ऊपर निर्णय सुनाने के लिए करते हैं – क्या वहां मुक्त चुनाव होते हैं? क्या न्यायाधीश स्वतंत्र हैं? क्या प्रेस दबाव से मुक्त है? क्या मानवाधिकारों का सम्मान किया जाता है? असल में वास्तविक स्वतंत्रता की कुंजी सामाजिक संबंधों के ‘गैर राजनीतिक’ तंत्र में निहित होती है, बाजार से परिवार तक. जहाँ कारगर सुधार के लिए राजनीतिक सुधार  की आवश्यकता से ज्यादा उत्पादन के सामाजिक संबंधों में परिवर्तन की जरूरत होती है. हमलोग इस पर वोट नहीं करते कि कौन किस चीज पर कब्ज़ा जमाये है या फैक्ट्री में मजदूर-प्रबंधक सम्बन्ध कैसे होने चाहिए; इन सभी को राजनीति की परिधि से बाहर की प्रक्रिया में गिना जाता है. ऐसी आशा करना भ्रमपूर्ण है कि इन क्षेत्रों में लोकतंत्र की मात्रा बढ़ाकर कारगर बदलाव लाया जा सकता है. इन क्षेत्रों में कारगर बदलाव, कानूनी अधिकारों की परिधि के बाहर निहित है. निश्चित तौर पर इस तरह की लोकतान्त्रिक प्रक्रियाएं एक सकारात्मक भूमिका अदा करती हैं लेकिन वे उसी बुर्जुआ राज्य मशीनरी का हिस्सा बनी रहती हैं जिसका उद्देश्य बिना किसी बाधा के पूंजीवादी पुनरुत्पादन की कार्यप्रणाली को बनाये रखना है. इन अर्थों में बोदिऊ (Bodieu) के तर्क बिलकुल सही थे कि आज हमारा अंतिम शत्रु पूंजीवाद, साम्राज्य या शोषण नहीं बल्कि लोकतंत्र है. अंतिम व्यवस्था के रूप में ‘लोकतान्त्रिक प्रक्रिया’ की सर्वस्वीकृति पूंजीवादी संबंधों के क्रांतिकारी बदलाव में बड़ी बाधा है.

लोकतान्त्रिक संस्थाओं के बारे में फ़ैली मोहग्रस्तता को दूर करने का कार्यभार इन संस्थाओं के नकारात्मक प्रतिपक्ष ‘हिंसा’ के बारे में फैले भ्रम को दूर करने से नजदीकी से जुड़ा हुआ है. उदाहरण के लिए, बोदिऊ ने हाल में राज्य की सत्ता के खिलाफ मुक्त क्षेत्र बनाकर आत्मरक्षात्मक हिंसा को प्रस्तावित किया. इस फार्मूला के साथ समस्या यह है कि यह राज्य की सामान्य कार्यप्रणाली और राज्य के असमान्य रूप से कार्य करने के बीच अंतर खोजने की एक गलत धारणा पर आश्रित रहता है. लेकिन वर्ग-संघर्ष का मार्क्सवादी ककहरा है कि शांतिपूर्ण सामाजिक जीवन स्वतः ही एक वर्ग (पूंजीपति) की अस्थाई जीत की अभिव्यक्ति है. अधीनस्थ और सताए हुए लोगों के दृष्टिकोण से वर्गीय वर्चस्व बनाये रखने वाले तंत्र के रूप में राज्य की उपस्थिति-मात्र ही हिंसक सच्चाई है. इसी प्रकार फ्रांसीसी क्रांति का एक नायक राबसपियरे ने कहा था कि राजा की हत्या इसलिए नहीं उचित है कि उसने कोई अपराध किया था बल्कि राजा की उपस्थिति ही अपने आप में एक अपराध है जो लोगों की स्वतंत्रता के खिलाफ खडी रहती है. इस ख़ास अर्थ में शोषितों द्वारा शासक वर्ग और उसके राज्य के खिलाफ ताकत का इस्तेमाल अंतिम निष्कर्ष के रूप में हमेशा आत्मरक्षात्मक होता है. यदि हम इस बिंदु को नहीं समझते हैं तो राज्य को ‘नार्मलाइज’ करते हैं और उसकी हिंसा को राज्य से जुड़ी हुई ज्यादतियों का एक विषय मान लेते हैं. स्थापित उदारवादी मान्यता है कि कई बार हिंसा का इस्तेमाल जरूरी हो जाता है लेकिन वह कभी भी वैध नहीं है – पर्याप्त नहीं है. क्रांतिकारी मुक्तिकामी परिप्रेक्ष्य के हिसाब से हमें इसे घुमाकर देखना चाहिए: शोषितों के लिए हिंसा हमेशा वैध है (क्योंकि उनका अस्तित्व ही हिंसा का परिणाम है) लेकिन हिंसा हमेशा जरूरी नहीं; यह हमेशा रणनीतिक विचार-विमर्श का मामला है कि शत्रु के खिलाफ ताकत का इस्तेमाल करना है कि नहीं.

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संक्षेप में हिंसा पर जमी हुई धुंध को साफ़ (डिमिस्टीफाई) करना होगा. बीसवीं सदी के कम्युनिज्म के साथ जो गलत था वह यह नहीं था कि उसने हिंसा का इस्तेमाल किया- राज्य की ताकत पर कब्जा करने और उसे बरकरार रखने के लिए गृहयुद्ध छेड़ा – बल्कि उनकी कार्यप्रणाली में था जिसमें पार्टी को ऐतिहासिक औजार के रूप में देखा गया जिसने हिंसा को अनिवार्य बनाया और वैधता प्रदान की. चिली की अलेंदे सरकार को कैसे कमजोर किया जाये इसके बारे में सुझाव देते हुए हेनरी किसिंजर एक नोट में लिखता है “अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर दो”. आज पुराने अमेरिकी अधिकारी इस बात को खुले तौर पर स्वीकार कर रहे हैं कि यही नीति वेनुजुएला के खिलाफ लागू की गयी थी: भूतपूर्व अमेरिकी सेक्रेटरी आफ स्टेट लारेंस ईगल बर्गर ने वेनुजुएला की अर्थव्यवस्था के बारे में ‘फाक्स’ न्यूज पर कहा “शावेज के खिलाफ अभियान शुरू करने के लिए हमारे पास यह एक हथियार है जिसका हमें इस्तेमाल करना चाहिए. अर्थव्यवस्था को बर्बाद करने के लिए मुख्यतः आर्थिक हथियार जिससे कि देश और उस क्षेत्र में उसकी स्वीकार्यता कम हो जाये”.  मौजूदा आर्थिक आपातकाल में भी हम स्पष्टया तटस्थ बाजार की प्रक्रियाओं से नहीं बल्कि राज्यों और वित्तीय संस्थाओं के अत्यधिक संगठित, रणनीतिक हस्तक्षेपों का सामना कर रहे हैं जो इस संकट को अपनी शर्तों पर हल करना चाहते हैं- इस स्थिति में क्या उनके ये कदम आत्मरक्षात्मक नहीं हैं?

ये विचार उन क्रांतिकारी बुद्धिजीवियों की आरामदायक आत्मगत स्थितियों को हिलाकर रख देंगे जो अभी भी अपने बौद्धिक क्रियाकलापों को जारी रखे हुए हैं जिसका मजा उन्होंने पूरे बीसवीं शताब्दी में लिया: एक तूफानी राजनीतिक स्थिति पैदा करने की चाहत. एडोर्नों और होर्खाईमर ने इस महाविपत्ति को प्रशासित विश्व में ‘नवजागरण के द्वंद्व’ की परिणति में देखा. जार्जियो अगाम्बेन ने बीसवीं शताब्दी के यातना शिविरों को पूरे पश्चिमी राजनीतिक प्रोजेक्ट की सच्चाई के रूप में परिभाषित किया. लेकिन 1950 के पश्चिमी जर्मनी में होर्खाइमर के व्यक्तिव को अगर हम याद करते हैं तो वे जहाँ एक तरफ आधुनिक उपभोक्तावादी पश्चिमी समाज में ‘तर्क की समाप्ति’ की आलोचना करते हैं वहीँ दूसरी ओर सर्वाधिकारवाद और भ्रष्ट तानाशाही के समुद्र में स्वतंत्रता के एकमात्र द्वीप के रूप उसी समाज का वे समर्थन भी करते हैं.

बुद्धिजीवी मूलतः सुरक्षित और आरामदायक जीवन जीते हैं और अपनी इस जीवनशैली को सही ठहराने के लिए अगर वो आमूलचूल महाविपत्ति का परिदृश्य खड़ा करें, तो क्या होगा? बहुतों के लिए, बेशक, यदि क्रांति होती है तो इसे सुरक्षित दूरी पर होना चाहिए – क्यूबा, निकारागुआ, वेनेजुएला इत्यादि जिससे कि इन दूरदराज क्षेत्रों में होने वाली क्रांतियों से उनके ह्रदय भी गदगद रहें और उनका कैरियर भी आगे बढ़ता रहे परन्तु उन्नत औद्योगिक अर्थव्यवस्थाओं में बढ़िया से काम कर रहे कल्याणकारी राज्यों के मौजूदा विध्वंस की स्थिति में, क्रांतिकारी बुद्धिजीवी सत्य के एक पल का सामने करने जा रहे हैं जहाँ उन्हें यह तय करना है कि वे वास्तविक परिवर्तन चाहते हैं या नहीं – क्योंकि वे अब इसे प्राप्त कर सकते हैं.

………… सामाजिक आर्थिक संबंधों के क्षेत्र में हमारा युग अपने आप को परिपक्व दौर में पाता है, जिसमें मानवता ने पुराने यूटोपियन सपनों को नष्ट कर दिया है और यथार्थ की सीमाओं को इसकी सारी असाध्यताओं के साथ स्वीकार कर लिया है – पढ़ें पूंजीवादी सामाजिक आर्थिक यथार्थ. इस पूंजीवादी यथार्थ का धर्मादेश है कि “आप कुछ नहीं कर सकते हैं”. आप व्यापक सामूहिक कार्यकलापों में शामिल नहीं कर सकते क्योंकि यह सर्वसत्तावादी आतंक में तब्दील होगा, आप पुराने कल्याणकारी राज्यों की तरफ वापस नहीं जा सकते क्योंकि यह आपको दौड़ से बाहरकर आर्थिक संकट में फंसा देगा, आप अपने आप को वैश्विक बाजार से अलग नहीं कर सकते. अपने वैचारिक रूप में इकोलॉजी भी विशेषज्ञों की राय पर आधारित बाह्य कारकों की असम्भवता की सूची जोड़ती है उदाहरण के लिए ग्लोबल वार्मिंग दो डिग्री से ज्यादा नहीं.

यहाँ पर दो तरह की असम्भवता (Impossibility) के बीच अंतर करना जरूरी है. पहली, सामाजिक टकराहट की यथार्थ असम्भवता और दूसरी ‘असम्भवता’ जिस पर वर्चस्वशाली वैचारिक चिंतन फोकस करता है. शासक वर्ग की वैचारिकी द्वारा प्रचारित असम्भवता यहाँ पर अपने आप को द्विगुणित कर अपने आप के लिए मुखौटे का काम करती है. इस असंभवता का वैचारिक काम पहली असम्भवता (सामाजिक टकराहट) के सच पर पर्दा डालना है. आज शासक वर्ग की विचारधारा क्रांतिकारी बदलाव, पूंजीवाद के उन्मूलन और एक सच्चे लोकतंत्र (जो भ्रष्ट संसदीय खेलों में सीमित नहीं हो गया है) की ‘असम्भवता’ को मनवा लेने का प्रयास करती है जिससे कि हम पूंजीवादी समाजों में व्याप्त सामाजिक टकराव की वास्तविक ‘असम्भवता’ को भूल जाएँ.

इसीलिये वैचारिक ‘असम्भवता’ को पार करने का लाकान (Lacan) का फार्मूला यह नहीं है कि “सब कुछ सम्भव है” परन्तु यह है कि “असंभव संभव है”. लाकान का ‘असम्भवता’ का यथार्थ पहले से तय एक सीमा नहीं है जिसका हमें हिसाब रखना पड़ेगा, बल्कि व्यवहार का एक क्षेत्र है. हमारा व्यवहार संभावनाओं के क्षेत्र में मात्र एक हस्तक्षेप नहीं है – यह संभावनाओं के संयोजन को ही बदल देता है और अंततः संभावनाओं की अपनी शर्तें पैदा करता है. यही कारण है कि कम्युनिज्म यथार्थ से रिश्ता रखता है – कम्युनिस्ट व्यवहार का मतलब है कि उस वास्तविक बुनियादी टकराहट में हस्तक्षेप करना जो आज के वैश्विक पूंजीवाद को चिन्हित करता है.

स्वतंत्रताएं

फिर भी यह प्रश्न बना रहता है कि इस असम्भाव्यता को संभव करने के लिए इस तरह के कार्यक्रममूलक बयान के क्या मायने है जबकि हम अनुभवमूलक असम्भाव्यता से घिरे हुए हैं: एक विचार के रूप में विशाल जनमानस को गोलबंद करने में कम्युनिज्म की विफलता? अपनी मौत से दो साल पहले जब यह स्पष्ट हो गया था कि अखिल यूरोपीय क्रांति संभव नहीं है और यह जानते हुए भी कि एक देश में समाजवाद की स्थापना निरर्थक है, लेनिन ने लिखा – “मजदूरों और किसानों की क्षमता को दस गुना तेज़ करने के बाद भी पूर्ण निराशाजनक परिस्थिति में अगर हमें पश्चिमी यूरोपीय देशों से अलग एक नई सभ्यता की बुनियादी जरूरतों को पैदा करने का एक मौक़ा दिया तो यह कम बड़ी बात नहीं है”. (लेनिन, ‘हमारी क्रांति’,1923, संकलित रचनाएँ, Vol. 33, मास्को, 1966, पेज 479)

क्या बोलीविया की मोरालेस सरकार, वेनेजुएला की शावेज सरकार और नेपाल की माओवादी सरकार के सामने ये दिक्कतें नहीं रही हैं? ये सत्ता में ‘साफ़ सुथरे’ लोकतान्त्रिक चुनावों से आये न कि तख्तापलट से. लेकिन जैसे ही वे सत्ता में आये राज्य और पार्टी नेटवर्क के अपने समर्थकों को सीधे गोलबंद करने लगे. उनकी परिस्थिति वस्तुतः निराशाजनक है: इतिहास की पूरी गति बुनियादी तौर पर उनके खिलाफ है. वे अपने पक्ष में किसी ‘स्वाभाविक’ प्रवृत्ति की उम्मीद नहीं कर सकते, कुल मिलाकर वे एक आपाधापी की स्थिति में थोड़ा बेहतर करने की उम्मीद कर सकते हैं. लेकिन क्या यह उन्हें एक अनूठी स्वतंत्रता नहीं देती है? और हम – आज का वामपंथ – क्या इसी परिस्थिति में नहीं है?

अंततः हमारी परिस्थिति क्लासिकल बीसवीं शताब्दी की परिस्थिति से एकदम विपरीत है जिसमें वामपंथ को पता था कि उसे क्या करना है (सर्वहारा की तानाशाही स्थापित करनी थी) उसे सिर्फ लागू करने के लिए सही समय की धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करनी थी. आज हमें यह पता नहीं है कि हमें क्या करना है, लेकिन हमें व्यवहार में उतरना है क्योंकि कुछ नहीं करने का परिणाम भयानक होगा. हमें ऐसे जीने के लिए बाध्य किया जाएगा जैसे कि ‘हम स्वतंत्र हैं’. हमें एकदम विपरीत परिस्थितियों में, गहराइयों में कदम रखने का ख़तरा उठाना पड़ेगा. हमें नयेपन के आयामों को फिर से खोजना पड़ेगा, बजाय इसके कि किसी तरह से मशीनरी चलती रहे और पुराने में जो कुछ अच्छा था – शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी सामाजिक सेवाएं- को बचा लिया जाए. संक्षेप में हमारी स्थिति वैसी है जैसा कि स्टालिन ने परमाणु बम के बारे में कहा था कि ये कमजोर दिल वालों के लिए नहीं है. या फिर जैसा कि ग्राम्शी ने पहले विश्वयुद्ध से शुरू हुए दौर को चित्रित करते हुए कहा “पुरानी दुनिया मर रही है और नयी दुनिया पैदा होने के लिए संघर्ष कर रही है, यह समय पिशाचों का है”.

अभिव्यकि की स्वतंत्रता और सभ्यता की राजनीति वाया गणपति बाईपास

(मई-दिवस और गणपति-विवाद से सम्बंधित मीरा के लेख ने बहुत सारे लोगों को उस दिन की घटना के साथ-साथ हमारे राजनीतिक और सांस्कृतिक व्यवहार को भी revisit करने को वाध्य किया, साथ ही साथ एक बड़े कैनवस की बहस को भी आमंत्रित किया. लोगों ने फेसबुक, ब्लोग्स और पर्चों में इस लेख के हवाले से राजनीतिक व्यवहार में सिविक सेन्स के अभाव से लेकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की प्रकृति जैसे विषयों पर चर्चाएं की.  सहमती और असहमती दोनों स्वरों को देखा जा सकता था.. फिर इन सभी प्रतिक्रियाओं के आलोक में मीरा की एक  दूसरी टिपण्णी भी आयी..संदीप सिंह का यह लेख इस बहस की एक और कड़ी को सामने लाता है.)

By संदीप सिंह

एक मई को लाल बैंड के जेएनयू कार्यक्रम में गायिका त्रिथा को ‘गणपति गायन’ से रोके जाने की घटना ने एक महत्वपूर्ण बहस को आगे बढ़ाया है. इस बहस ने अभिव्यक्ति की आजादी, सेंसरशिप, इतिहास, संस्कृति व धर्म के बारे में आमतौर पर रहने वाली (‘बनी-बनाई’) ‘उदार’ (कई बार सरल इसलिए बचकानी भी) समझ के सम्मुख कुछ गौरतलब सवाल खड़े किये हैं.

                क्या त्रिथा को गणपति गायन से ‘रोका जाना’ उचित था? क्या यह ‘रोका जाना’ ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सामूहिक हत्या’ थी? क्या यह ‘श्रोताओं’ की ‘अकल्पनीय असहनशीलता’ थी? इस ‘रोके जाने’ की जरूरत/चाहत, क्या वैचारिक स्तर पर एबीवीपी जैसे संगठन की सोच से मिलती समझ की पैदाइश थी, फर्क सिर्फ डिग्री का था? क्या यह ‘रोका जाना’ इतिहास के लेखन, पुनर्लेखन, प्रतीकों की व्याख्या-पुनर्व्याख्या के प्रति उदासीन रहते हुए ‘लोकप्रिय’ और ‘पोलिटीकली करेक्ट’ बने रहने का एक उदाहरण था? क्या यह ‘रोका जाना’ धार्मिक/सांस्कृतिक/ऐतिहासिक, प्रतीकों/छवियों/व्यक्तित्वों (उदा. के लिए गणेश) की उत्पत्ति के ऐतिहासिक स्रोतों के प्रति लापरवाह/अनभिज्ञ रहने के चलते पैदा हुआ था? क्या यह ‘रोका जाना’ अपने आप में विचार और कार्यवाही के स्तर पर एक तरह की सेंसरशिप का नमूना नहीं था? क्या ऐतिहासिक प्रक्रिया में वर्चस्वशाली शक्तियों द्वारा रचा-पचा ली गयीं तमाम छवियाँ/प्रतीक हमसे ज्यादा सावधानी, धैर्य, खुलेपन और गंभीर दृष्टि की मांग नहीं करते? कला/साहित्य/धर्म/इतिहास इत्यादि विमर्शों/अनुशासनों में अनगिनत किस्म के और कई बार विरोधी विचारों/व्याख्याओं की उपस्थिति से संवाद/जिरह/बहस करने की हमारी पद्धति/औजार क्या होंगे? भविष्य में दुबारा ऐसी कोई स्थिति पैदा होने पर हम क्या कदम उठाएंगे? आदि कई सवाल हैं जो हमसे निश्चय ही हमारी (अक्सर) बनी-बनाई मान्यताओं पर गंभीर चिंतन की मांग करते हैं.

             कई साथियों की यह चिंता/प्रतिवाद गौरतलब है कि बिना बात/बहस आनन्-फानन तरीके से बीच में गायन को ‘रोका जाना’ येनकेनप्रकारेण असंगत/बेमेल (विरोधी) विचारों/प्रतीकों/छवियों के प्रति हमारे ‘असहिष्णु’ और गैर ऐतिहासिक रवैये को दिखाता है. कुछ साथियों का मानना है कि अपनी अंतर्वस्तु में यह ‘रोका जाना’ कहीं न कहीं अपनी सुविधा/असुविधा (पढ़िए पोलिटिकली करेक्ट होना) अनुसार सेंसरशिप थोपने और ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ के हनन का परिचायक है.

            शुरू में यह साफ़ कर देना उचित होगा कि संभवतः ‘गणपति गायन’ की समाप्ति पर आयोजकों द्वारा उक्त गायन से अपनी असहमति/आपत्ति जाहिर करते हुए कलाकार से भी संदर्भित मंच/कार्यक्रम और उसके उद्देश्यों के प्रति सचेत/संवेदनशील रहने की जिम्मेदारी को चिन्हित कराते हुए अपना विरोध दर्ज किया जा सकता था. संभवतः असहमति जाहिर करने का यह एक ज्यादा लोकतांत्रिक, कारगर व स्वस्थ तरीका होता.

            लेकिन क्या यह (तथाकथित) ‘रोका जाना’ सच में आयोजकों (श्रोताओं के बड़े नहीं भी तो एक हिस्से) को आरएसएस व एबीवीपी के समकक्ष खड़ा कर देता है, यहाँ अब फर्क सिर्फ क्वांटिटी का है क्वालिटी का नहीं? क्या इसके बाद हम नैतिक/वैचारिक स्तर पर सेंसरशिप की मुखालफत करने का अधिकार खो देते हैं या कमजोर कर देते हैं?

           एक सवाल उठा कि “आपके के लिए किसी अत्यंत महत्वपूर्ण अवसर पर, आप द्वारा सचेतन बनाये गये मंच पर आकर कोई अनपेक्षित ढंग से ऐसी बातें/विचार कहता/गाता है जिन पर हमारी आपत्ति, विरोध/मतभिन्नता है तो हमारा रवैया/व्यवहार कैसा होगा’? क्या हम उसे बोलने नहीं देंगे? चुप करा देना ही क्या आपत्ति दर्ज करने का एकमात्र तरीका है? बहस, तर्क, व्यंग, विडम्बना और वाद-विवाद का क्या हुआ”? इस बिंदु पर थोडा ठहरकर सोचने की जरूरत है.

           क्या इस सवाल को उठाने की गुंजाईश है कि वह कौन सी ‘अभिव्यक्ति’ है जिससे हम स्वस्थ बहस करेंगे और कौन सी ‘अभिव्यक्ति’ है जिससे सीधी मुठभेड़ करेंगे? क्या हम सारी ‘अभिव्यक्तियों’ से स्वस्थ बहस करेंगे या मुठभेड़ करेंगे? क्या स्वस्थ बहस और मुठभेड़ इतने ही दो विरोधी पद हैं?  क्या यह कहे जाने की छूट है कि दरअसल हर किसी के लिए ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ के सैधांतिक आधार पर खड़े होकर हम ‘समय-काल-परिस्थिति’ के अनुसार भिन्न-भिन्न सन्दर्भों में पैदा हुई “अभिव्यक्तियों” से भिन्न-भिन्न तरीकों से मुखामुखम,हस्तक्षेप/व्याख्या करेंगे? क्या यह कहे जाने की गुंजाईश है कि भिन्न-भिन्न ‘अभिव्यक्तियों’ से वाद-विवाद/संवाद/संघर्ष में जाने के हमारे कोण अलग-अलग होंगे? क्या ‘अभिव्यक्ति’ अपने आप में कोई परम चीज है? या हम सारी ‘अभिव्यक्तियों’ को एक कटेगरी मानकर, एक ही तरीके का व्यवहार प्रस्तावित कर रहे हैं? क्या किसी ‘अभिव्यक्ति’ के बरक्स हमारा रवैया ‘अभिव्यक्ति’ की अंतर्वस्तु और रूप से तय होगा या इसके लिए हमारे पास बना-बनाया कोई निर्धारित निर्विवाद फ्रेमवर्क है?

त्रिथा इलेक्ट्रिक के सदस्य मई दिवस कार्यक्रम में/ चित्र: प्रकाश के रे

           यहाँ पर विनम्रतापूर्वक यह दुबारा कहे जाने की जरूरत है कि इन सवालों से त्रिथा के गायन को रोके जाने को प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन करने की कोशिश समझ बैठने की भूल कतई न की जाए. तुलनाएं अक्सर सरल समाधान प्रस्ताव करती हैं लेकिन कई बार यह बहुत खतरनाक हो जाता है. ‘अभिव्यक्तियों’ की अंतर्वस्तु और रूप के स्तर पर न जाने कितनी किस्में हैं जाहिर है कि सवाल उठता है, हम उनसे कैसे ‘डील’ करें?

             आपत्ति, विरोध, असहमति दर्ज करने की वह कौन सी लक्ष्मण-रेखा है जिसे पार करते ही आप ‘असहिष्णु’ होकर अभिव्यक्ति की ‘सामूहिक हत्या’ करने लगते हैं? क्या यह रेखा आपत्ति/विरोध की शारीरिकता(physicality) में है? क्या ‘दर्शकों’ द्वारा हूटिंग कर कलाकार को अपना ‘परफार्मेंस’ बंद करवा देने को ‘कलाभिव्यक्ति की सामूहिक हत्या’ नहीं कहा जाएगा? क्या कार्यक्रम के दायरे से बाहर जा रही या उस ओर बढ़ रही प्रस्तुति और कलाकार को सचेत करना या उसे उस प्रस्तुति को खत्म करने को कहना ‘अविश्वसनीय असहिष्णुता’ है? ऐसा प्रतीत होता है कि दर्शकों द्वारा शोर मचाकर या दूसरी प्रस्तुति (इस प्रसंग में लाल बैंड) की मांगकर सम्बंधित कलाकार को हटने के लिए कहना ठीक है लेकिन किसी पदाधिकारी या व्यक्ति द्वारा इसी बात को जाकर कहना अनुचित! और यह वैलेंटाइन का विरोध करने वालों से बस एक कदम पीछे है! आखिर ऐसा क्यों है? कहा गया कि “यदि श्रोताओं द्वारा अस्वीकार (किस माध्यम से? चिल्लाकर, ताली बजाकर या खड़े होकर या बैठे-बैठे शोर मचाकर?) कर दिए जाने पर गायिका स्वयं हट जातीं तो यह एक बात हो सकती थी. लेकिन जिस क्षण कोई, नेता या भीड़, स्टेज पर आकर प्रस्तुति को खत्म करवाता है, सेंसरशिप थोपने की एक कार्यवाही है”. क्या एक बार फिर से यह पूछना नाजायज होगा कि क्यों ऐसा माना जा रहा है कि ‘अभिव्यक्ति’ विशेष के बरक्स आपत्ति का एक रूप सहनीय है तो दूसरा रूप असहनीय! श्रोता अपनी जगह पर बैठे-बैठे हल्ला मचाकर कलाकार को मंच छोड़ने के लिए मजबूर कर दें तो वह ठीक लेकिन श्रोताओं की उसी राय/आपत्ति को कोई पदाधिकारी मंच पर जाकर व्यक्त कर दे तो बेठीक! इस बात को भी यहाँ नोट करा देना होगा कि एक पदाधिकारी और एक आम छात्र के बीच (उदारवादी नजरिये से देंखे )सत्ता का अलग टैग आमतौर से लगा रहता है, लेकिन जेएनयू के सन्दर्भ में यह सच है कि यहाँ के छात्र शक्ति संतुलन में सबसे बड़ी भूमिका निभाते हैं, खैर. हालांकि सिद्धांततः दोनों तरह की कार्यवाहियां एक तरह की सेंसरशिप का उदहारण हैं. मुझे लगता है कि यहाँ पर हम कहीं न कहीं ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ को संदर्भित और सापेक्षिक रूप से देख पा रहे हैं. न ही ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ परम है न ‘विरोध करने की आजादी परम है.

            कोई भी कलाकार रचता/गाता/लिखता क्यों है? सम्प्रेषण के लिए. क्या सम्प्रेषण की चाहत की यह रचनात्मक भूख उसे अपने लक्षित श्रोता/भोक्ता समुदाय की भावनात्मक और वैचारिक/ऐतिहासिक  बनावट-बुनावट, पसंद-नापसंद (रचनात्मक) से निरपेक्ष रख सकती है? ‘अभिव्यक्ति’ और उसको कहने की आज़ादी को अगर प्रभावी और संप्रेषणीय होना है तो उसे स्थान, घटना, सन्दर्भ, समय, औचित्य और रूचि के साथ संगति में आना पड़ेगा. तभी वह कला और कलाकार अपने होने को ज्यादा सही तरीके से स्थापित कर पायेगा. बावजूद इसके, इस भ्रम में नहीं रहना चाहिए कि अंततः बाकी आजादियों की तरह ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ भी उन परिस्थितियों की सीमाओं/शर्तों से पूरी तरह कभी मुक्त नहीं हो सकती, जिन परिस्थितियों में वह पैदा हुई है, अगर लक्ष्य सम्प्रेषण है तो! यह परिस्थितियां जेएनयू में मई दिवस के कार्यक्रम की हो सकती हैं और (थोडा व्यंगात्मक होने की छूट हो तो) आधुनिक बाज़ार में प्रकाशक और प्रकाशनों की भी!

            यह एकदम सच है कि भले ही एक मई की घटना के बहाने से यह बहस हो रही है लेकिन इससे उठे सवाल अपने आप में गंभीर निहितार्थ लिए हुए हैं. और नागरिक समाज में एक छात्र, बुद्धिजीवी और नागरिक के बतौर हमसे हमारे अधिकारों, जिम्मेदारियों और दायित्वों के प्रति ज्यादा गंभीर होने की मांग करते हैं.

          वाम-जनवादी ताकतों को अधिकतम संभव सीमा तक ‘अभिव्यक्ति के अधिकार’ की रक्षा में खड़ा होना चाहिए. चाहे वह खुद के अधिकार की बात हो या विरोधी के अधिकार की. जैसा वाल्तेयर कहते हैं (ठीक-ठीक याद नहीं) कि ‘हो सकता है कि मैं आपसे पूरी तरह असहमत हूँ, पर आपकी अभिव्यक्ति की रक्षा मैं अपनी जान देकर भी करूँगा’. नवजागरण की इस उक्ति के तुरंत बाद हमें यह कथन भी याद कर लेना चाहिए कि ‘आपकी स्वतंत्रता वहाँ आकर खत्म हो जाती है, जहाँ से मेरी नाक शुरू होती है’.

           अब यहाँ पर यह साफ़ कर देना ठीक रहेगा कि ‘चुप’ करा देने की ‘राजनीति’ (और स्पष्ट कहें तो) ‘दक्षिणपंथी राजनीति’ क्या होती है? जितना हम सारे लोगों के अनुभवों में दर्ज इतिहास की दास्ताँ है उससे हम जानते हैं कि ‘चुप’ करा देने की दक्षिणपंथी राजनीति कैसे और किन तर्कों से काम करती है? ऐसा कहा जा सकता है कि इस राजनीति के भीतर ‘डायलाग’(dialogue) की वैसी कोई सम्भावना नहीं होती है, जैसे कि जेएनयू में मई दिवस के सन्दर्भ में हम कर रहे हैं? अगर यह सही है तो, दोनों तरह की राजनीति न सिर्फ क्वांटिटी बल्कि क्वालिटी के स्तर पर भी भिन्न होगी. अगर थोडा बहुत इस ‘दक्षिणपंथी राजनीति को ‘बहस या डायलाग’ में खींच कर लाया जा सका है तो उन कारणों और प्रक्रियाओं पर भी गौर करना जरूरी हो जाता है जिनके चलते शक्ति-संतुलन को बदलने-बनाने की कोशिश समाज के भीतर हर वर्ग अपने-अपने तरीके से करता है. तथा उसी प्रक्रिया और अनुपात में सामने वाले वर्ग को भी प्रभावित करता है. क्या यह नहीं कहा जा सकता है कि ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ के लिए संघर्षरत जेएनयूएसयू जैसे मंच और उसकी राजनीति को निश्चय ही इन शक्तियों से अक्सर मुठभेड़ करनी पड़ती है. इस पोजीशन के साथ खड़े होते हुए कि त्रिथा प्रकरण में और ज्यादा बेहतर तरीके से हस्तक्षेप किये जाने की आवश्यकता थी, मैं यह कहने की कोशिश कर रहा हूँ कि सरलीकरण और सरल तुलनाओं से बचा जाए. यहाँ पर एक सक्रिय बुद्धिजीवी की भूमिका जेएनयूएसयू जैसे मंचों को अपनी सूक्ष्म अंतर्दृष्टि और आलोचनात्मकता से लैस करने की हो सकती है.

             अगर राजनीति विभिन्न तबको/वर्गों/श्रेणियों द्वारा अपने आपको संगठित कर सत्ता संरचना में हस्तक्षेप करने की जरूरत से पैदा होती है तो यह ध्यान देना जरूरी है कि राजनीति में प्रतीकों का इस्तेमाल किया जाता है, प्रतीक अपनेआप में राजनीति नहीं होते. इन किस्म-किस्म के प्रतीकों में अर्थ/अनर्थ और छवियाँ भरने का काम हर दौर में विभिन्न तबकों की राजनीति अलग-अलग तरीके से करती है. इस प्रक्रिया के बारे में स्पष्ट समझ रखना निहायत जरूरी है.

              राजनीतिक रस्साकशी के विभिन्न स्तरों पर कार्यरत समाज के विभिन्न तबको से तमाम प्रतीकों के ‘ओरिजिन’ के ज्ञान की पेशेवराना मांग करना या रिक्लेम किये जाने का आह्वान करना, संभव है कि एक दूसरे किस्म के दुष्चक्र को ही पैदा करे.

               हमारी राजनीति क्या होनी चाहिए? इस दौर में हमें ब्राह्मणवाद को कमजोर करना है या ‘गणपति’ को उसके चंगुल से मुक्त करना है? मुझे लगता है कि हमें ब्राह्मणवाद को कमजोर करना है. इस प्रक्रिया में ‘गणपति’ मुक्त भी हो सकते हैं और गायब भी हो सकते हैं! और ऐसा हमारे उन सारे प्रतीकों और भूत के साथ एक आलोचनात्मक ऐतिहासिक दृष्टिसंपन्न रिश्ते के चलते होगा.

              अपनी राजनीति का वर्चस्व स्थापित करने में हमें तमाम नये प्रतीक गढ़ने होंगे और यह भी संभव है कि कुछ पुराने प्रतीकों, छवियों का नवोन्मेष भी हो. लेकिन क्या हम मुख्यतः प्रतीकों को मुक्त कराने की लड़ाई लड़ेंगे या वर्तमान को बदलने की प्रक्रिया में प्राचीन का, उसकी छवियों का भी पुनुर्त्थान होता हुआ देखेंगे और प्रयास करेंगे? यहाँ पर ऐसा प्रतीत हो सकता है कि किसी को लगे कि प्रतीकों को मुक्त करने की लड़ाई, वर्तमान को बदलने के संघर्ष से अलहदा है पर वास्तव में ऐसा नहीं है. ऐतिहासिक प्रक्रिया में रूढ हो चुके कुछ प्रतीकों को हम छोड़कर आगे बढ़ेंगे और कुछ नए प्रतीक/छवियाँ गढ़ेंगे. बुद्धिजीवी को इस प्रक्रिया में अपना पार्ट तो अदा करना ही होगा!

            यह कहना भी मौजूं है कि जहाँ जरूरी है कि हम संस्कृत और सभ्यता के उलझे सवालों, प्रतीकों और घुमावों को समझे, उतना ही यह जानना भी जरूरी है कि इन तमाम मिथकों, छवियों और प्रतीकों की वर्तमान समय में उपस्थिति/प्रस्तुति किन-किन ध्वनियों, संकेतों और मंतव्यों के साथ हो रही है. वो लोग, जो मुक्ति की लड़ाई के हमवार हैं लेकिन संभवतः बुद्धिजीवियों/पेशेवरों जैसी दक्षता नहीं रखते (जिसके अपने सामाजिक ऐतिहासिक कारण हैं) वे किन-किन नजरियों से या नजरिये से इन प्रतीकों को देखते हैं और मुक्ति की उनकी रोजाना लड़ाई में ये प्रतीक/छवियाँ किस ओर खड़े दिखते हैं? इस बात से हमें नजर नहीं चुरानी चाहिए.

              हम ऐसा क्यों करते है? क्यों हमारे कुछ दोस्त इस बात से आहत हैं और कहीं न कहीं उनकी भाषा में गुस्सा, दुःख और कुछ खो जाने की अनुभूति तैरती है?

              इस व्यवस्था से निकली तमाम संरचनात्मक, संस्थात्मक एवं सांस्कृतिक शक्तियां छात्रों-युवाओं को किस तरह शोषण के विभिन्न रूपों और इतिहास की पहचान से वंचित रखते हैं, साथ ही साथ वे किस तरह संघर्ष के इतिहास को भी मिटाने की कोशिश करते हैं, हम सब ये जानते हैं. ‘आज़ादी और अवसर’ के ‘उदारवादी’ रिटारिक के झांसे में शासक उलझे हुए सवालों का आसान जवाब प्रस्तावित करते हैं जहाँ जीवन के विपरीत अनुभवों पर चर्चा करके चेतना विकसित करने का स्पेस नहीं होता. बाँध-बूंध कर रखे गये युवाओं के इस समुदाय से जब चेतनासंपन्न युवाओं का एक तबका बाहर निकलकर इस शोषण की विभिन्न संरचनाओं/संस्कृतियों/संस्थाओं को चुनौती देता है, तो उसी समय वह हर रोज अपनी पहले की समझदारी को भी तोड़ता जाता है पर सब एक साथ नहीं तोड़ पाता है. इसीलिये संघर्ष के टेढ़े-मेढे रास्तों में यदि वह कई जगह गिरता/फिसलता है तो निश्चय ही वह अपने नए अनुभवों से सीखता हुआ पुराने को छोड़ रहा होता है. यहाँ पर आंदोलनों के एक अनुभवी भागीदार और सिद्धांतकार के बतौर कठिन परिस्थितियों में आंदोलन की स्पिरिट को ऊँचा रखने और नए अनुभवों को बेहतर तरीके से सूत्रबद्ध करने के रूप में ‘आर्गेनिक’ बुद्धिजीवी की   भूमिका एक बहुत ही महत्वपूर्ण शक्ल अख्तियार कर लेती है. इस बुद्धिजीवी का स्वर समाज के अन्य ‘स्थापित बुद्धिजीवियों’ के स्वर से अलग होता है, जो हमेशा युवाओं की इस नई पौध को ख़ारिज व बदनाम करते हैं. इसी प्रक्रिया में युवा इस बुद्धिजीवी पर भरोसा करते हैं और संघर्ष के कठिन समय में उसकी मदद लेते हैं. बुद्धिजीवियों को यह बात समझनी होगी कि व्यवहार से ज्ञान प्राप्त करने की इस प्रक्रिया में ऐसे क्षण जरूर आयेंगे.

पुनश्च: इस लेख को पूरा करने में विशेष तौर पर कॉ सनी, कॉ अनमोल, कॉ सौरभ नरूका और कॉ रामनरेश राम से हुई बातचीत का काफी योगदान है.

संदीप सिंह जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष हैं और वामपंथी छात्र संगठन आइसा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. इनसे sandeep.aisa@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

साभार-bargad

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