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मोहनदास अब महात्मा था: कृष्ण कल्पित

मोहनदास अब महात्मा था

By कृष्ण कल्पित

1.

रेलगाड़ी के तीसरे-दर्ज़े से भारत-दर्शन के दौरान मोहनदास ने वस्त्र त्याग दिये थे.

अब मोहनदास सिर्फ़ लँगोटी वाला नँगा-फ़क़ीर था और मोहनदास को महात्मा पहली बार कवीन्द्र-रवींद्र ने कहा.

मोहनदास की हैसियत अब किसी सितारे-हिन्द जैसी थी और उसे सत्याग्रह, नमक बनाने, सविनय अवज्ञा, जेल जाने के अलावा पोस्टकार्ड लिखने, यंग-इंडिया अख़बार के लिये लेख-सम्पादकीय लिखने के साथ बकरी को चारा खिलाने, जूते गांठने जैसे अन्य काम भी करने होते थे.

राजनीति और धर्म के अलावा महात्मा को अब साहित्य-संगीत-संस्कृति के मामलों में भी हस्तक्षेप करना पड़ता था और इसी क्रम में वे बच्चन की ‘मधुशाला’, उग्र के उपन्यास ‘चॉकलेट’ को क्लीन-चिट दे चुके थे और निराला जैसे महारथी उन्हें ‘बापू, तुम यदि मुर्गी खाते’ जैसी कविताओं के जरिये उकसाने की असफल कोशिश कर चुके थे.

युवा सितार-वादक विलायत खान भी गाँधी को अपना सितार सुनाना चाहते थे उन्होंने पत्र लिखा तो गाँधी ने उन्हें सेवाग्राम बुलाया.

विलायत खान लम्बी यात्रा के बाद सेवाग्राम आश्रम पहुंचे तो देखा गांधी बकरियों को चारा खिला रहे थे यह सुबह की बात थी थोड़ी देर के बाद गाँधी आश्रम के दालान में रखे चरखे पर बैठ गये और विलायत खान से कहा – सुनाओ!

गाँधी चरखा चलाने लगे घरर घरर की ध्वनि वातावरण में गूंजने लगी.

युवा विलायत खान असमंजस में थे और सोच रहे थे कि इस महात्मा को संगीत सुनने की तमीज़ तक नहीं है.

फिर अनमने ढंग से सितार बजाने लगे महात्मा का चरखा भी चालू था घरर घरर घरर घरर…

विलायत खान अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि थोड़ी देर बाद लगा जैसे महात्मा का चरखा मेरे सितार की संगत कर रहा है या मेरा सितार महात्मा के चरखे की संगत कर रहा है!

चरखा और सितार दोनों एकाकार थे और यह जुगलबंदी कोई एक घण्टा तक चली वातावरण स्तब्ध था और गांधीजी की बकरियाँ अपने कान हिला-हिला कर इस जुगलबन्दी का आनन्द ले रहीं थीं.

विलायत खान आगे लिखते हैं कि सितार और चरखे की वह जुगलबंदी एक दिव्य-अनुभूति थी और ऐसा लग रहा था जैसे सितार सूत कात रहा हो और चरखे से संगीत निसृत हो रहा हो !

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2.

दिल्ली में वह मावठ का दिन था

३० जनवरी, १९४८ को दोपहर ३ बजे के आसपास महात्मा गाँधी हरिजन-बस्ती से लौटकर जब बिड़ला-हॉउस आये तब भी हल्की बूंदा-बांदी हो रही थी.

लँगोटी वाला नँगा फ़क़ीर थोड़ा थक गया था, इसलिये चरखा कातने बैठ गया. थोड़ी देर बाद जब संध्या-प्रार्थना का समय हुआ तो गाँधी प्रार्थना-स्थल की तरफ़ बढ़े,

कि अचानक उनके सामने हॉलीवुड सिनेमा के अभिनेता जैसा सुंदर एक युवक सामने आया जिसने पतलून और क़मीज़ पहन रखी थी.

नाथूराम गोडसे नामक उस युवक ने गाँधी को नमस्कार किया, प्रत्युत्तर में महात्मा गाँधी अपने हाथ जोड़ ही रहे थे कि उस सुदर्शन युवक ने विद्युत-गति से अपनी पतलून से Bereta M 1934 semi-autometic Pistol निकाली और

धाँय धाँय धाँय…

शाम के ५ बजकर १७ मिनट हुये थे नँगा-फ़क़ीर अब भू-लुंठित था हर तरफ़ हाहाकार कोलाहल कोहराम मच गया और हत्यारा दबोच लिया गया.

महात्मा की उस दिन की प्रार्थना अधूरी रही.

आज़ादी के बाद मची मारकाट साम्प्रदायिक दंगों और नेहरू-मण्डली की हरक़तों से महात्मा गाँधी निराश हो चले थे.

क्या उस दिन वे ईश्वर से अपनी मृत्यु की प्रार्थना करने जा रहे थे जो प्रार्थना के पूर्व ही स्वीकार हो गयी थी !

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कृष्ण कल्पित

अपने तरह का अकेला-बेबाक और विवादित कवि । कृष्ण कल्पित का जन्म 30 अक्टूबर, 1957 को रेगिस्तान के एक कस्बे फतेहपुर शेखावटी में हुआ। अब तक कविता की तीन किताबें और मीडिया पर समीक्षा की एक किताब छप चुकी है। एक शराबी की सूक्तियां  के लिए खासे चर्चित। ऋत्विक घटक के जीवन पर एक पेड की कहानी नाम से एक वृत्तचित्र भी बना चुके हैं।  अभी  हाल ही में बाग़-ए-बेदिल नाम से  एक विलक्षण  और विशाल  काव्य-संकलन  के साथ-साथ ‘कविता-रहस्य ‘ नामक पुस्तक प्रकाशित । 

‘संपूर्ण क्रांति’ और ‘रेलगाड़ी’ के बीच जरुरी अन्तर को ‘बाग़-ए-बेदिल’ में खोजता हमारे जमाने का एक ‘मीर’: चंदन श्रीवास्तव

शराबी की अद्भुत सूक्तियां लिखने वाले कृष्ण कल्पित जी , सद्य प्रकाशित काव्य-संकलन ‘बाग़-ए-बेदिल’ कारण इधर घनघोर चर्चा के केंद्र बने हुए हैं. बहुतेरे लोगों ने उनकी पूर्व-पंक्तियाँ के आधार पर ही मान लिया था कि वे अब प्रकाश में नहीं आयेंगें। शराबी की सूक्तियां नामक कितबिया में वे पहले ही लिख गए थे- कभी प्रकाश में नहीं आता शराबी/ अंधेरे में धीरे धीरे/ विलीन हो जाता है. कविता के प्रति जैसा समर्पण/लगाव इस शराबी के पास है वैसा रेअर ही देखने को मिलता है. और यह रेअरनेस ही वह जिजीविषा है जो उन्हें बार-बार प्रकाश में लाता है. बाग़-ए-बेदिल वाला प्रकाश तो इतना तेज है कि बहुतेरों की आँखें चौंधिया गयी हैं और बहुतेरे ऐसे हैं जो इस तेज में भी बारीकियां पढ़ रहे हैं.

‘बाग़-ए-बेदिल’ पर जे.एन.यू में आयोजित संगोष्ठी में चन्दन श्रीवास्तव एक वक्ता के बतौर आमंत्रित थे. इस संगोष्ठी में उनके कविता-कर्म को गम्भीरता से लेने की जरुरत महसूस की गयी. चन्दन श्रीवास्तव का यह यह लेख इसी प्रक्रिया की शुरूआती कड़ी है. बाग़-ए-बेदिल और कृष्ण कल्पित के कवि-व्यक्तित्व के ऊपर आगे भी लेख दिए जायेंगे।  

बाग़-ए-बेदिल

बाग़-ए-बेदिल

By  चंदन श्रीवास्तव

विश्वविद्यालयी दिनों की ट्रेनिंग की वजह से तबीयत कुछ ऐसी हो चली है कि लफ्ज किताब सुनते ही मन में एक रटी-रटायी पंक्ति गूंजने लगती है- आखिर! इस किताब की पॉलिटिक्स क्या है ? हैरत नहीं कि किताब बाग़-ए-बेदिल हाथ आई तो ऐसा ही हुआ। किताब भारी-भरकम है, आकार से भी और आवाज से भी। अदबी मुआमले की समझ के मामले में अपनी औकात देखी तो भार उठाने की हिम्मत नहीं हुई। सोचा, चलो किसी और के लिखे से काम चलाते हैं। और इसी फिराक में नजर अटकी बाग़ ए बेदिल पर कवि अरुणकमल की टिप्पणी के एक टुकड़े पर कि – “ कल्पित ने अतीत को वर्तमान में ढाल दिया है और वर्तमान को अतीत में ढालकर उसे व्यतीत होने से रोका है, इसलिए हर कविता कई कालों में प्रवाहित होती है। ” कहते हैं बदलाव सृष्टि का नियम है। अपनी इतिहास-प्रदत्त स्थिति के कारण आप उससे सहमत-असहमत हो सकते हैं। सो, अरुणकमल की पंक्ति को पढ़कर लगा कृष्ण कल्पित की कोशिश समय के अनवरत घूमते पहिए को थाम लेने की है। लगा, कृष्ण कल्पित अपने खास समय के भीतर बदलाव के किसी रंग-ढंग से असहमत हैं और ‘कविता के कुरुक्षेत्र’ में उस बदलाव पर जीत हासिल करने के लिए उतरे हैं।

लेकिन, कृष्ण कल्पित का अपने कवि और कविता के बारे में ख्याल ऐसा निष्कर्ष निकालने से रोकता है। अपने कवि-कर्म को लेकर कल्पित साहब का कहना है कि -“ ये कवितायें एक उपेक्षित और दीवार से लगा दिए गए कवि की प्रति-कवितायें हैं।”  और “ इन कविताओं में शब्दों का आयुधों और अस्त्र-शस्त्रों की तरह उपयोग आत्म-रक्षार्थ ही हुआ है..किसी दुश्मन, किसी भूखंड, या कीर्ति को विजित करने के लिए नहीं। हर कवि को अपने लिए एक कवच का निर्माण करना पड़ता है और कविता-साधना तो निश्चय ही किसी निरंतर युद्ध से कम नहीं..। ” आगे परंपरा का निजी-पाठ करते हुए उन्होंने यह भी जोड़ा है कि-“प्रागैतिहासिक काल से ही कविता से तीर-तमंचों का काम लिया जाता रहा है- आत्मरक्षार्थ या मानवता की रक्षा के लिए। ” इस शुरुआती (इस वजह से कच्चे और अधबने) पाठ में अगले अनुच्छेदों तक कोशिश करुंगा कि बाग़-ए-बेदिल को कृष्ण कल्पित के आत्म-वक्तव्य के प्रति ईमानदार रहते हुए पढ़ने की कोशिश करुं और इस निष्कर्ष निकालने की हिम्मत जुटा सकूं कि अतीत को वर्तमान में ढालना या फिर वर्तमान को अतीत में ढालकर उसे व्यतीत होने से रोकना कल्पित की कविता की पॉलिटिक्स के भीतर एक प्रक्रिया है, परिणति कत्तई नहीं।

बाग़ ए बेदिल के अपने पाठ की शुरुआत इस प्रश्न से करें – कृष्ण कल्पित को क्यों लगता है कि उनकी कवितायें एक उपेक्षित और दीवार से लगा दिए गए कवि की प्रति-कवितायें हैं? अपनी भारी-भरकम काया में सैकड़ों कविताओं को समेटने वाली इस किताब का उत्तर होगा एक शिकायत या कह लें फरियाद की शक्ल में सामने आयेगा-

उस देश में जेबकतरों की तरह कवियों ने भी अपने इलाके बांट रखे थेमी लार्ड।

वहां गिरहकटोंपिंडारियों मवालियों कबाड़ियों और हलकटों को कवि कहने का रिवाज थाहुजूर।

औरकवियों से उस देश में अपराधियों का सा सलूक किया जाता थामहोदय!…

कबाड़ीपन और कवि-कर्म के बीच का भेद क्योंकर मिट रहा है ? बाग़-ए-बेदिल का उत्तर है-

‘ यह विचार विपथता इसलिए थी,

कि वह उस जनपद का नहींदस जनपथ का कवि थासार्त्र !

बाग़-ए-बेदिल की कविता विपथता का कारण विपर्यय में खोजती है। ‘ जनपद ’( याद करें पुराने वक्तों के महाजनपदों को, देश से राष्ट्र बनने की हिंसक प्रक्रिया को, मेट्रोपॉलिटनी सार्वभौमिकता से स्थानीयता को बचाये रखने की जुगत को) और ‘दस जनपथ ’( 10 डाऊनिंग स्ट्रीट से निकले लोकतंत्र/आधुनिकता की भारतीय अनुकृति का नया संस्करण) के बीच का विपर्यय। जिससे अपेक्षा थी कि ‘उस जनपद का कवि’होकर रहेगा वह ‘दस जनपथ का कवि’ जिस समय के भीतर बनने को बाध्य हुआ उस समय के लक्षण क्या हैं ? वह समय कौन-सा है जिसमें कवि हलकट बनने को बाध्य और आतुर एक साथ है? बाग़-ए-बेदिल का उत्तर है-

जेपी, लोकतंत्र की आँख से ढलका हुआ आंसू था,

जो अब सूख चला हैपार्थ।

कि जनता आती है’ वाले विशाल मैदान में,

अब बाजीगर और रंडियां घूमते हैं।

दरअस्ल संपूर्ण क्रांति अब एक रेलगाड़ी का नाम हैसार्त्र!

और, ऐसे समय में क्या अघट घट रहा है ?

बाग़-ए-बेदिल की मानें तो-

ब्राह्नणों की फौज से जब घिर गई मायावती,

देख लेना एक दिन उसको बना देंगे सती।

बीवियां फिरती हैं दुनिया भर में कत्थक नाचतीं,

और, भारत मां तुम्हारे घर में बर्तन मांजती,

बुझ गये दीपक तो क्या आओ उतारें आरती,

वाजपेयी को मिला सम्मान भारत-भारती।

एक ऐसे समय में जब मर्यादाओं का भयंकर उलटफेर आंखों के आगे हो, कविता और कबाड़ का, कवि और गिरहकट का अंतर समाप्त हो रहा हो, तो कृष्ण कल्पित के अपने ही शब्दों में मानवता के रक्षार्थ कविता और कवि को क्या करना चाहिए? दूसरे शब्दों में, जब व्यवस्था अपने बाशिन्दों को विज्ञापनी भाषा में समझा रही हो कि दरअसल क्रांति एक रेलगाड़ी का ही नाम है और वह इस तरह कि तुम अपने जनपद से चलकर दस जनपथ और दस जनपथ(और उसके पसारे) से निकलकर अपने जनपद के भीतर अबाध आवाजाही कर सकते हो, और इस तरह, मानवीय मुक्ति के एक नये आख्यान में प्रवेश कर सकते हो, तो कविता, व्यवस्था की इस भाषा के काट में क्या करे ? किन शब्दों से बने कौन-से आयुध लाये ? इस प्रश्न का उत्तर खोजने चलें तो एक रास्ता खुलता है जिसपर चलकर आप कह सकें कि अतीत को वर्तमान में ढालना और वर्तमान को अतीत में ढालकर उसे व्यतीत होने से रोकना दरअसल कृष्ण कल्पित की कविता के लिए एक प्रक्रिया है और परिणति है उस भाषा को हासिल करने की कोशिश करना जो मुक्ति की प्रचलित भाषा की काट में खड़ी हो।

कल्पित इस भाषा को खोजने के लिए बार-बार अतीत की कविता के उस्तादों के पास लौटते हैं। चाहें तो कह लें, शेखावटी, जयपुर, पटना जैसे ‘उस जनपद’ का अपना घर “लुटियन दिल्ली” के जोर से लुट जाने का गम गलत करने के लिए किसी पीर-फकीर-शायर की मजार पर बैठना चाहते हैं। वहां झरने वाली निबौलियों को उठाकर पूरे हिन्दुस्तान की कविता की रिवायत के भीतर बे दर-ओ-दीवार का एक घर बसाना चाहते हैं। उन्हें उम्मीद, वहां से प्रचलित भाषा की काट करने वाली एक भाषा मिल सकेगी।यही वजह रही होगी जो पुस्तक के शीर्षक में आया शब्द बेदिल किताब के हर्फों में एक कहानी लेकर जिन्दा होता है। कहानी कविता के भेष में कुछ यों है कि-

औरंगजेब के बड़े बेटे आजमशाह ने,

बेदिल आजीमाबादी/देहलवी को मिलने के लिए बुलाया

तो बेदिल ने यह मिसरा लिख भेजापार्थ!

दुनिया अगर देहेन्द न जुम्बम ज जाए खीश- मन बस्ता अम हिनाए-किनायत ब जाये खीश

( दुनिया भी अगर दे दो तब भी मैं अपनी जगह से नहीं हिलूंगा क्योंकि मैंने अपने पांवों में सब्र की मेहंदी लगा ली है)

कविता के भीतर इस कथा की पुनर्वासी करके कल्पित एक साथ कई काम करते हैं। एक तो वे आपके मन के भीतर पैठी ऐसी ही अनेक कथाओं के लिए राह खोलते हैं। इस कथा को पढ़कर बिरला ही होगा जिसके मुंह पर यह पंक्ति ना आ जाये- आवत जात पनहिया टूटी बिसर गयोहरिनाम- संतन को कहा सिकरी सो काम। किसी को मिर्जा गालिब का यह शेर भी याद आ सकता है- हजार कस्द करता हूं इस जा से कहीं और जाने का- दिल कहता है तू जा मैं नहीं जाने का। और, बेतरतरीबी के तर्क से मन के किसी कोने में बैठा ‘अंगद का पाँव’ भी याद आ सकता है। तेजरफ्तारी अगर आज के जीवन और जगत को परिभाषित करने वाली वर्चस्वकारी भाषा है तो फिर कृष्ण कल्पित कविता के उस्तादों के पास जाकर वहां से उनके ठहराव ढूंढ़ लाते हैं।जो कोई बेदिल की तरह सब्र की मेहँदी लगाकर ठहरा है, कोई किसी भक्तकवि की तरह रामकथा में रमने की वजह से ठहरा है तो कोई गालिब की तरह नये-पुराने पस-ओ-पेश में पड़कर ठहरा हुआ है। ठहराव का अपना निजी ठौर खोज सकें- इसके लिए कृष्ण कल्पित की कविता कथाओं या कह लें काव्य-पंक्तियों की एक झनकार(शुक्लजी के शब्दों में कहें तो अर्थ और प्रसंग का गर्भत्व) रचती है। कल्पित की कविताओं(बाग़-ए-बेदिल में) के शब्द और पंक्तियां ‘अर्थ’ और ‘प्रसंग’खोजने के क्रम जब ‘आखर’ तलाशती हैं तो एक पूरा सिलसिला कायम हो जाता है, पूरब की कविता के रुप-शिल्प, कथ्य और वस्तु को सुनने-सुनाने का। कवि अपनी तरफ आखर और अरथ की पूरी परंपरा सौंपने को उत्सुक है ताकि पाठक नये सिरे से रचने और लड़ने के लिए तैयार हो सकें।

आखिर को एक बात दो शब्द “पार्थ” और “सार्त्र” पर। बाग ए बेदिल की कविता का स्थापत्य इन दो शब्दों के बिना संभव नहीं। जैसे कबीर की कविता में संबोध्य का चयन(साधो, संत, पांड़े/बांभन) के अनुकूल कविता की वस्तु बदलती है, साथी ही इन शब्दों के आने के साथ मानो विषय की घोषणा हो जाती है, ठीक उसी तरह कृष्ण कल्पित के बाग़-ए-बेदिल में ‘पार्थ’ और ‘सार्त्र’ कविता की बनावट के दो पाट हैं, और अपने नाम के अनुकूल वस्तु को धारण करते हैं। पार्थ, कुरुक्षेत्र यानि भावी महाविनाश की आशंका के बीच किंकर्तव्यविमूढ़ खड़ा पात्र है, कृष्ण उसे कर्तव्य का उपदेश देते हैं- युद्धस्व..। आशंका सार्त्र के साथ भी है। दो विश्वयुद्धों के बीच खड़ा एक चिन्तक जिसकी आंखों के आगे आधुनिकता या कह लें तर्कबुद्धि पर आधारित राज्यसत्ता/विज्ञान/उद्योग का चरित्र उजागर हुआ और आधुनिकता प्रदत्त मानव-मुक्ति का आख्यान हिरोशिमा पर परमाणु बम के धमाके के साथ दम तोड़ गया। पार्थ के सामने अपने समय की मर्यादाओं के भंग होने का संकट खड़ा हुआ था तो सार्त्र के सामने नई मर्यादाओं के भंग होने का संकट, वे मर्यादाएं जिनका वादा था- हमारे चौखटे में रहो, मुक्ति हो जाओगे । आधुनिक और प्राचीन, दोनों ने मुक्ति शब्द के साथ छल किया- इस बात के दो गवाह कृष्ण कल्पित की कविता में‘पार्थ’ और ‘सार्त्र’ हैं। दोनों को हाजिर-नाजिर जान, बाग़-ए-बेदिल कभी पीड़ा, कभी व्यंग्य, कभी पुकार तो कभी ललकार और कई बार हिकारत के स्वर में बोलती है।

जाहिर है, ग्लोबल गांव होने की जिद में पड़ी दुनिया के विस्थापितों/ शापितों की जगतपीड़ा और आत्मपीड़ा में नाभिनाल रिश्ता बैठाने को बेचैन यह यायावर कवि कृष्ण कल्पित अपने ठौर के तौर पर पार्थ और सार्थ को ही चुन सकता था।

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव,  मूलतया छपरा(बिहार) के निवासी, पिछले पंद्रह सालों से दिल्ली में। पहले आईआईएमसी और फिर जेएनयू में पढ़ाई। “उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हिन्दी लोकवृत्त का निर्माण” शीर्षक से पीएचडी के बाद दिल्ली के कॉलेजों में छिटपुट अध्यापन, फिर टीवी चैनल की नौकरी और अब विकासशील समाज अध्ययन पीठ(सीएसडीएस) की एक परियोजना इंक्लूसिव मीडिया फॉर चेंज से जुड़े हैं। इनसे  chandan@csds.in पर संपर्क संभव है। 

( यह कृष्ण कल्पित को समझने की शुरुआती कोशिश है. लिखने वाले ने ना तो उनकी सारी रचनाओं का पाठ किया है और ना ही पढ़ी हुई कविताओं पर पर्याप्त समय देकर सोचा है। अगर बेतरतीबी के भीतर से कोई तरतीब बन सकती हो तो इस कोशिश को भी इसी रुप में देखा जाय)

बाग़-ए-बेदिल, अंतिका प्रकाशन , प्रकाशन वर्ष : 2013, पृ. सं: 512, मूल्‍य : HB 850/-, PB 450/- 

विश्व हिन्दी सम्मेलन और साइकिल की कहानी: कृष्ण कल्पित

By कृष्ण कल्पित

 विश्व हिन्दी सम्मेलन

जिस भाषा में हम बिलखते हैं
और बहाते हैं आंसू
वे उस पर करते हैं सवारी
भरते हैं उड़ान उत्तुंग आसमानों में

एक कहता है मैं नहीं गया
मुझे गिना जाए त्यागियों में
एक कहता है मैं चला गया
मुझे गिना जाए भागियों में

एक आसमान से गिरा रहा था सूचियां
हिन्दी पट्टी के सूखे मैदानों पर

हिन्दी के एक नए शेख ने
बना रखा था सरकारी कमेटियों का हरम
एक से निकलकर
दूसरे में जाता हुआ

एक मूल में नष्ट हो रहा था
दूसरा ब्याज में और तीसरा लिहाज़ में

एक चिल्लाता था
मैं जीवन भर होता रहा अपमानित
अब मुझे भी किया जाए सम्मानित

एक कहता था
मुझे दे दिया जाए सारा पैसा
मैं उसका डॉलर में अनुवाद करूंगा
एक कहता था नहीं
सिर्फ मैं ही बजा सकता हूं
यह असाध्य वीणा

एक साम्राज्यवादी
एक सम्प्रदायवादी के गले में
फूल-मालाएं डाल रहा था
एक स्त्री किसी निर्दोष के रक्त से
करती थी विज्ञप्तियों पर हस्ताक्षर

यह एक अजीब शामिल बाजा था
जिसमें एक बाजारू गायक
अश्लील भजन गा रहा था

एक सम्पादक
विदेश राज्य मन्त्री के जूते में
निर्जनता ढूंढ रहा था
एक पत्रकार का
शास्त्री भवन की एक दराज़ में
स्थाई निवास था

एक कहता था मैं इतालवी में मरूंगा
एक स्पेनिश में अप्रासंगिक होना चाहता था
एक किसी लुप्त प्राय भाषा के पीछे
छिपता फिरता था

एक रूठ गया था
एक को मनाया जा रहा था
एक आचार्य जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय
में कराह रहा था
एक मसखरा
मुक्तिबोध पर व्याख्यान दे रहा था

 एक मृतक

ब्रिटिश एअरवेज़ के पंखों से लिपटा हुआ था

दूसरा मृतक
भविष्य में होने वाली
सभी गोष्ठियों की अध्यक्षता कर चुका था
एक आत्मा
आगामी बरसों के
सभी प्रतिनिधि मण्डलों में घुसी हुई थी

यह भूमण्डलीकरण का अजब नज़ारा था कि
सोहो के एक भड़कीले वेश्यालय में
हिन्दी का लंगोट लटक रहा था

और दूर पूरब में
और धुर रेगिस्तान के किसी गांव में
जन्म लेता हुआ बच्चा
जिस भाषा में तुतलाता था
उसे हिन्दी कहा जाता था

कहां खो गया प्रतिरोध !
क्या भविष्य में सिर्फ़
भिखारियों के काम आएगी
यह महान भाषा !

इसी भाषा में एक कवि
दो टूक कलेजे के करता पछताता
लिखता जाता था कविता
और फाड़ता जाता था।

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Bicycle-thieves's Poster

Bicycle-thieves’s Poster

साइकिल की कहानी

यह मनुष्य से भी अधिक मानवीय है
चलती हुई कोई उम्मीद
ठहरी हुई एक संभावना
उड़ती हुई पतंग की अंगुलियों की ठुमक
और पांवों में चपलता का अलिखित आख्यान
इसे इसकी छाया से भी पहचाना जा सकता है

मूषक पर गणेश
बैल पर शिवजी
सिंह पर दुर्गा
मयूर पर कार्तिक
हाथी पर इन्द्र
हंस पर सरस्वती
उल्लू पर लक्ष्मी
भैंसे पर यमराज
बी. एम. डब्ल्यू पर महाजन
विमान पर राष्ट्राध्यक्ष
गधे पर मुल्ला नसरूद्दीन
रेलगाड़ी पर भीड़
लेकिन साइकिल पर हर बार कोई मनुष्य

कोई हारा-थका मजदूर
स्कूल जाता बच्चा
या फिर पटना की सड़कों पर
जनकवि लालधुआं की पत्नी
कैरियर पर सिलाई मशीन बांधे हुए
साइकिल अकेली सवारी है दुनिया में
जो किसी देवता की नहीं है

साइकिल का कोई शोकगीत नहीं हो सकता
वह जीवन की तरफ दौड़ती हुई अकेली
मशीन है मनुष्य और मशीन की यह सबसे प्राचीन
दोस्ती है जिसे कविता में लिखा पंजाबी कवि
अमरजीत चंदन ने और सिनेमा में दिखाया
वित्तोरिया देसीका ने ’बाइसिकल थीफ’ में

गरीबी यातना और अपमान की जिन
अंधेरी और तंग गलियों में
मनुष्यता रहती है
वहां तक सिर्फ साइकिल जा सकती है
घटना-स्थल पर पायी गयी सिर्फ इस बात से
हम इस निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सकते कि
साइकिल का इस्तेमाल मनुष्यता के विरोध में
किया गया जब लाशें उठा ली गयी थीं
और बारूद का धुआं छट गया था तब

साइकिल के दो चमकते हुए चक्के सड़क के
बीचों-बीच पड़े हुए थे घंटी बहुत दूर
जा गिरी थी और वह टिफिन कैरियर जिसमें
रोटी की जगह बम रखा हुआ था कहीं
खलाओं में खो गया था।

एक साइकिल की कहानी
अंततः एक मनुष्य की कहानी है !

कृष्ण कल्पित

कृष्ण कल्पित

अपने तरह का अकेला-बेबाक और विवादित कवि । कृष्ण कल्पित का जन्म 30 अक्टूबर, 1957 को रेगिस्तान के एक कस्बे फतेहपुर शेखावटी में हुआ। अब तक कविता की तीन किताबें और मीडिया पर समीक्षा की एक किताब छप चुकी है। एक शराबी की सूक्तियां  के लिए खासे चर्चित। ऋत्विक घटक के जीवन पर एक पेड की कहानी नाम से एक वृत्तचित्र भी बना चुके हैं।  अभी  हाल ही में बाग़-ए-बेदिल नाम से  एक विलक्षण  और विशाल  काव्य-संकलन  प्रकाशित । आवारगी का काव्यशास्त्र  इसी संकलन  की भूमिका है। 

डायरी कविता

By   उस्मान खान

 
1 नवंबर

एक समय
कविता की अंतिम पंक्ति से पहले
हम देखेंगे
जूता पॉलिश जूता पॉलिश हो गई है

2 नवंबर

आशंका है
छत पकड़कर
झूल रहा बन्दर की तरह
सौ वाट का बल्ब
खीं खींयाता दुःस्वप्न
जहाँ राबिया तुम
रौशनदान तोड़कर
अभी अभी भागी हो
और गाँव गोईरे
ईमली की डाल पर
चमगादड़ सी लटक गई हो
क्या हुआ था ?
जिन्दगी इतनी कठिन तो नहीं थी
कि एक शांत धूसर आभा ओढ़ ली जाए !

3 नवंबर

मीरा तुम अपना जिस्म लिए
घुग्घू के पर तौलने में डूबी
ठहरी हुई सड़क पर ठहरी
जा चुकी कार का सुँघती
धुआं
. . . . . . . . . . . . .
कुछ ठिठुरती नींदों की तरफ
ईशारा करती स्ट्रीट लाईट साथ
एका कर सुअरों के भटकती
सुँघती फिरती फूटपाथ
मृत्यु
. . . . . . . . . . . .
मौसम की कसमसाहट
घड़ी नहीं बताएगी
सरकारी दफ़्तर भी नहीं

4 नवंबर

मृत्यु !
एक शहर में भटकते हम दोनों
एक दिन टकराएँगे ही!

5 नवंबर

जेबें इतनी खाली हैं
कि अलीफ  लैला का आखिरी किस्सा भी
सल्फास की गोलियों को सुनाया जा चुका है

6 नवंबर

मेरे पास
एक लाश है
एक दुःस्वप्न
और शिशिर की निःशेष रात

                                                             और कोई जवाब नहीं है !

7 नवंबर

नीम-बुझी गलियों की दीवारों के
अँधेरे उजाले पर
बोध की सारी पीड़ा और क्रोध
उभारता चला जा रहा है
अंडरग्राउंड का गुलमोहर का फूल

10 नवंबर

जैसे आईना टूटता है
और नींद पीड़ाओं का सिलसिला हो जाती हैं
सीपियों में मिली कविताएँ
मेरी साँसों में
अश्वत्थामा के कपाल सी
मैं सूरज को अपने सर में रख लेता हूँ
और कुर्सी को छतपंखे की जगह टाँग देता हूँ

11 नवंबर

तुम घोड़ों से आए
और तुमने सिर्फ दो स्वाद हमारे लिए शाश्वत बना दिए
एक कड़वा
और एक कसैला
तुम घोड़ों से आए
और तुमने सिर्फ दो चीज़ें हमें दीं .
नाल
और लगाम।

12 नवंबर

फ्लायओवर के नीचे
हैंगओवर में …..जाम।
चाँद और फैंटेसी
सड़क पर बिखरे जा रहे हैं
और ऑटो में चेता है
सौ वाट का बल्ब।

13 नवंबर

हल्के.हल्के
तय करके
कई सदियों का सफ़र
एक राग!
अपनी कोमल ऊँगलियों में
ठंडी मिजराबें संभाले
मेरे बालों में पिरो रही है
शहरज़ाद !
. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .
मेरे भाईयों का नाम बताओ ! जो मुझे अंधेरे कुँए में फेंक गए थे !! और जैसे रात हो गई थी  रेगिस्तान में !!!

14 नवंबर

फ्लाय ओवर के नीचे
कुत्ते पोस्टमार्टम करते हैं !!
रात के तीन !!!

17 नवंबर

विक्षिप्त अफवाहें
आईने और आँखों के बीच
आँखें दरकती हैं
आईना कोढ़ाता है
घर से न लाश मिलती है
न आईना

18 नवंबर

कुछ इंजेक्शन
और गर्भाशय कुछ
लँगड़ाते फिरते हैं
शहर में

19 नवंबर

इस व्यवस्था की पूर्वशर्त है
कि तुम्हारी आत्महत्या की जाएगी
और साबूत खड़े लोग वे भाँड
हटाते रहेंगे ऊँगलियों के पोरों से घी की गंध
और देखते रहेंगे अपनी वीर्यसनी गाँड

23 नवंबर

असंगता थी
उदासी थी
घर के कोने धूसर थे
लैम्पपोस्ट उदास थे
प्रसव-पीड़ा से बिल्लियाँ चिल्लाती थीं
सड़क पर उड़ते काग़ज़ के टुकड़ों की आवाज़ मनहूस थी
चाकू लिए एक आदमी घुमता था
क्षिप्रा के तट पर सन्नाटा था
मगर इतना तो नहीं था कभी !
जंगलों पर
और बस्तियों पर
ये अपशकुन सा क्या मँडरा रहा है !

24 नवंबर

तुम आते
जैसे शबे विसाल चाँद पर बादल आता है
जैसे सही वक्त पर मानसून आता है
जैसे यादों के शहर में वह मोड़
जहाँ अपने महबूब से मिलना हुआ था
जैसे गोंद आता है बबूल में
और नदी में मछलियाँ
. . . . . . . . . .
इस तरह नहीं
जैसे रतौंधी
जैसे घाव पर मक्खियाँ
जैसे घर पर पुलिस
जैसे इमरजेंसी !
जैसे हत्या !!
जैसे ब्लेकआउट….

26 नवंबर

मेरी कहानियों की सौ सौ नायिकाएँ और नायकों को
जो महुए की चूअन सीने पर महसूस करते थे।
जो जिन्दगी को भरपूर जीना चाहते थे।
जो बेनाम गलियों के मोड़ों पर
घरों के साफ सूथरे कमरों में
सड़कों की भरी पूरी छातियों पर
झाडियों में
और पहाडियों पर
क़त्ल हुए।
और जिनके बरसाती गीतों की धुन पर
डोला करते थे साँची के स्तूप
रात की व्याकुलता में
बिडियाँ सुलगाते देखा मैंने
और देखा गुस्से से दाँत पिसते उन्हें !

28 नवंबर

जीवन
साँझ सा निःशब्द
शेष हो जाए
श्वास निःश्वास के क्रम में
दुःख कठिन हो जाए जमकर
पर
तुम प्यार नहीं हो
तुमको प्यार नहीं लिखूँगा !

3 दिसंबर
     निषिद्ध इतिहासों में लेकिन दर्ज

  मेंढकों कनखजूरों फुद्दियों की हत्याएँ

4 दिसंबर

प्रेम में
निषिद्ध
मृत्यु का मौन
आवाज़ खोजता है।

5 दिसंबर

रात को एक बजे
पेपरवेट के नीचे दबाए गए
यातना के इतिहास के सेंसर्ड पन्ने
बस्ती से मसान तक
घुग्घूओं के परों से झड़ते हैं
. . . . . . . . . . .
जब्तशुदा गाडियों पर जमी धूल
रातगश्त पर भेज चुकी है
पुलिसवालों को
. . . . . . . . . . .
दो ट्यूबलाईटों के बीच खड़े
आदमक़द आईने में
एक केंचूआ रेंग रहा है

उस्मान खान समकालीन हिंदी कविता के अलहदा कवि हैं. चर्चाओं और पुरस्कारों की भीड़ से अलहदा…छपाऊ मानसिकता से भी अलहदा..जे.एन.यू. के हिंदी विभाग से मालवा के लोक-साहित्य पर शोधरत हैं. इनसे usmanjnu@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

उस्मान खान की कवितायें –उदासीनता नहीं उदासी

By आशुतोष कुमार

तुम घोड़ों से आए
और तुमने सिर्फ दो स्वाद हमारे लिए शाश्वत बना दिए –
एक कड़वा
और एक कसैला
तुम घोड़ों से आए
और तुमने सिर्फ दो चीज़ें हमें दीं –
नाल
और लगाम।घोड़ा शानदार और सुन्दर पशु है .घोड़ों और मनुष्य का साथ बहुत पुराना है.घोड़े जब साथ  आये ,प्रगति की  गति बहुत तेज हो गयी. इतिहास अश्वारोही योद्धाओं की विजयगाथाओं का एक अटूट सिलसिला है.  शायद यही वज़ह हो कि   मशीनों का ज़माना आया तो उन की ताकत मापने का पैमाना भी अश्वशक्ति ही मानी  गयी. मध्ययुग से ले कर आधुनिक समय तक सभ्यता के उत्तरोत्तर विकास में घोड़ों की केन्द्रीय भूमिका है. मनुष्य  के मन में घोड़ों की गहरी स्मृति है. घोड़ों और मनुष्य ने एक दूसरे को किस तरह बदला   ?क्या मनुष्य ने घोड़ों को मनुष्यवत बनाया ?या घोड़ों ने मनुष्य को पशुवत  ?क्या घोड़ों ने  मनुष्य की दुनिया को घोड़ों की दुनिया में तब्दील कर दिया?इस  दुनिया में कुछ तो  हैं लड़ाकू हमलावर घोड़े और बहुत सारे लगाम पहने नाल ठुंके घोड़े ?उस्मान खान की डायरी श्रृंखला की कविताओं से चुनी गयी यह छोटी सी कविता मनुष्यता के इतिहास की हमारी आमफहम समझ को ही नहीं झकझोरती ,हमारी स्मृतियों को भी बेतरह उलट पलट देती है. स्मृतियों का अन्धेरा  अतल सतह पर  आ जाता है .स्मृतियों का स्वाद बदल जाता है . वे कडवी और कसैली हो जाती हैं. स्मृतियों को सहेजना  दरअसल दुनिया को समझने का एक ढंग है . सिर्फ मीठी यादों को सहेजने वाल हमारा मन एक ऐसी विश्वदृष्टि का निर्माण करता है , जिस में मनुष्य की एक गरिमामय छवि उभरती है .कड़वी और कसैली यादें इस छवि को छिन्नभिन्न कर देती हैं. लेकिन हमें खुद के अधिक करीब भी .

कविता स्मृतिधर्मा होती है .  कविता में स्मृति अनेक रूपों में आती है. एक रूप वह है , जिस में कड़वाहट भारी स्मृतियों को छांट दिया जाता है. दूसरा वह है , जिस में उन्हें संशोधित कर दिया जाता है . कई बार  आमूलचूल बदल दिया जाता है.  कपोलकल्पनाओं को स्मृतियों में खपाने की कोशिश की जाती है. इस तरह स्मृतियों को कलात्मक बनाया जाता है . स्मृति स्वयं एक ‘कला’ बन जाती है.  एक रूप वह  भी  है , जिस में समकालीनता को स्मृतिहीनता का पर्याय समझ लिया जाता है. उस्मान की कविता में स्मृति की भूमिका  इन सब रूपों से अलग है . सब से पहले तो यह कि वह कविता में प्रवाहित होते समय को अतीत , वर्तमान और भविष्य के तीन  अलग अलग खांचों में विभाजित करने से बचती है . वह  वर्तमान में जीवित है .भविष्य में  ताकती झांकती है. अतीतमोह बिल्कुल  नहीं  है.

स्मृति की यह सक्रिय भूमिका असल में विस्मृति  के खिलाफ एक मुहिम है .  विस्मृति को प्रोत्साहन देना मनुष्य की सजग चेतना को नियंत्रित करने का सब से कारगर तरीका  है .उस्मान की एक और छोटी सी कविता इसे यों रेखांकित करती है —
आप मुझे मूर्ख कह सकते हैं , पर

मैं सचमुच भूल गया हूँ कि

मेरी जान

 फिलिस्तीन की उस सड़क में है

जिस पर एक भी फिलिस्तीनी नहीं चलता

या मैं मर गया हूँ

 मनोरमा के साथ.

उस्मान की कविता में जीव- जंतुओं का एक समूचा जीवित संसार है. केंचुए , कनखजूरे ,उल्लू , शैवाल , गिद्ध , मकड़ियां , सियार , ऊँट ,चूहे .वे सब निरीह प्राणी , जिन्हें हम देख कर भी नहीं देखते.  उस्मान हिंदी कविता को ‘फूल -बच्चा – चिड़िया – लड़की ‘ की समकालीन दुनिया से आगे ले गए हैं. यहाँ ऐसी कविता है , जिस में  में ” दुःस्वप्न हुई गलियों में थिरकती है ईश्वर की परछाईं/चाँद सबसे फ़ज़ूल चीज़ों में से हो जाता है/ग़ुलाब और ओस और जलेबी की तरह/और मिट्टी-सना एक केंचुआ/धीरे-धीरे सड़क पार करता है/जेठ की धूप  में..” इन पंक्तियों की व्याख्या करने की कोशिश फ़िज़ूल है. जेठ की धूप में सड़क पार करता मिट्टी-सना केंचुआ ईश्वर  की परछाइयों  को चुनौती  देता हुआ दुःस्वप्न-  गलियों में   जीवन के अंतिम स्वप्न को जिस तरह जीवित रखता है , वह हिंदी कविता की एक अविस्मर्णीय घटना है. लेकिन वही  केंचुआ जब दो ट्यूब लाइटों के बीच खड़े  ‘आदमकद  ‘  आईने में रेंगता हुआ नज़र  आता है , तब कविता के आईने में दिखती आदमी की कायांतरित शक्ल  स्तब्ध   और उदास करती है.

उस्मान की कविता में गाढ़ी  उदासी   है. बहुत दिनों से उदासी हिंदी कविता से बहिष्कृत रही  है. उदास होना कुछ गुनाह जैसा हो गया. उदास मौसमों के हर ज़िक्र के साथ उन से लड़ने का संकल्प घोषित करना लाजिमी मान  लिया गया. समकालीन हिंदी कविता साथ के दशक की कथित  चरम नकारवादी कविता  को विस्थापित  करती हुयी आयी थी. ‘अकविता ‘ में निराशा का कुछ ऐसा उत्सव मनाया गया कि वह समकालीन कवियों के लिए एक निषिद्ध वस्तु  हो गयी. कविता को आशावादी होना चाहिए. उसे विकृति और विद्रूप में रस लेने की जगह जीवन की सहजता , सुन्दरता , गतिशीलता और संघर्ष- भावना को देखने और दिखाने पर बल देना चाहिए. इस काव्य- सिद्धांत को कविता की जीवनधर्मिता  के रूप में इतनी  लोकप्रियता मिली कि अब वह हिंदी कविता के कॉमन सेन्स  का हिस्सा है. इस कॉमन सेन्स में जनवादी और ‘गुणीजनवादी’ ( अभिजनवादी ?) दोनों समान रूप से शरीक हैं .जाहिर है यह जीवन में व्याप्त निराशा को कविता के आशावाद से परास्त करने  का काव्य- संकल्प था . सो अंत- पन्त पलट कर  गहनतम निराशा में तब्दील हो जाना इस के लिए लाजिमी था. प्रमुख समकालीन  कवियों के यहाँ  ऐसे उदाहरण प्रचुर हैं.

‘निराशाद’ और ‘आशावाद’ से अलग उस्मान की कविताओं में हमारे समय की गहरी उदासी सहज रूप से मौजूद है. उस की कविता प्राचीन सभ्यताओं के दफ़न नगरो से ले कर आधुनिक सभ्यता के उजाड़े गए गाँव तक में भटकती हुयी त्रासदियों की गवाह बनने का माद्दा रखती है .उस की कविता में ‘देश का उदास चेहरा नाजी यातना शिविरों पर झुकी किसी चुप शाम की तरह’ उस की ‘मज्जा में टंकित करता है यातनाओं का उपन्यास’. उस की कविता में उन औरतों की उदासी है , जो ‘रात भर एक रुपये  को डेढ़ रुपया बना देने वाला जिन्न ढूँढती हुयी सडकों से जूझती’ हैं. ‘उदास रतजगों के मोड़ पर खड़ी’ उस की कविता ‘मेजों पर धूल की तरह जमी उदासी’ साफ़ करती है.

इन उदासियों को देख कर कविता को उदासी के आदाब सिखाने वाले नासिर काज़मी की याद आना सहज है. ” हमारे घर की दीवारों पे   नासिर / उदासी बाल खोले सो रही है. ” नासिर की शायरी में भी उन के जमाने की उदासी थी. एक देश , एक संस्कृति ,एक सभ्यता का विभाजन   और उस से उपजा   भोगौलिक  और मनोवैज्ञानिक  विस्थापन उन की उदासी का सबब था. उस्मान के समय तक आते विभाजन और विस्थापन के आयाम और भी विकट हुए हैं.

इस व्यवस्था की पूर्वशर्त है
        कि तुम्हारी आत्महत्या की जाएगी
       और साबूत खड़े लोग – वे भाँड
                             हटाते रहेंगे ऊँगलियों के पोरों से – घी की गंध
                    और देखते रहेंगे अपनी वीर्य-सनी गाँड

जब कि  गाँव शहरों में व्यापक आत्महत्याओं की खबरें बासी पड़ चुकी हैं , कविता उस विभाजन को दर्ज करती है , जिस के ओर  साबुत भांड खड़े हैं , और दूसरी तरफ वे लोग हैं , जिन की आत्महत्याए जनसंहार की तरह व्यवस्था की पूर्वशर्त बन जाती हैं. ‘ तुम्हारी आत्महत्या की जायेगी ‘ जैसी पंक्ति अद्भुत तीक्ष्णता      से उस झूठ   को उद्घाटित  कर देती  है , जिस में प्रायोजित  जनसंहार को ‘ आत्महत्याओं का नाम दिया जाता है. जल , जंगल और जमीन की खुली  ग्लोबल लूट ने इस विभाजन के दोनों ओर खड़े समूहों को मनुष्यता की उन जड़ों से विस्थापित कर दिया है , जिन से जुड़े रहना मनुष्यता   की परिभाषा   और भाषा   की गरिमा को बचाए रखने की पूर्वशर्त है.

कविता को सरलता , सुन्दरता  , शांति और  सुकून का अंतिम शरण्य समझने वाले रसिकजन इस कविता में ‘मौर्बिदिती ‘ या रुग्णता के दर्शन कर सकते हैं. लेकिन रोग से बेखबर रहना सब से बड़ी रुग्णता है. जब जीवन के उनियादी मूल्य , विचार और संवेदनाये हमले की ज़द में हों , तब उदासीनता सब से बड़ा रोग है. उस्मान की कविता में मनुष्यता की तमाम दुस्साध्य  बीमारियों की जागरूकता है . यह जागरूकता उदास करती है . लेकिन  इस  गहरी उदासी के चलते ही उदासीनता असंभव हो जाती है. इस उदासी को नकार कर आशावाद और निराशावाद के झूले में झूलने वाली कविता एक बनावटी आत्मतोष में स्खलित होती है .इस तरह कविता के भीतर बड़े हो हल्ले के साथ लड़ी जाने वाली लडाइयां अक्सर जिन्दगी की असली लड़ाइयों के प्रति  एक काव्यात्मक उदासीनता निर्मित करती है.अकारण नहीं है कि ऐसी तमाम कवितायें मुखर रूप से राजनीतिक न दिखने को कविता के एक मूल्य की तरह स्थापित करती हैं. इस के बरक्श   उस्मान को यह कहने में कोई झिझक नहीं है कि उन की कवितायें ‘ कतई राजनैतिक ‘ हैं  .क्योंकि ” कविता  में संभव  है उदासी / उदासीनता बिल्कुल नहीं. 

समकालीन हिंदी कविता पर बारीक नज़र रखने वाले युवा आलोचक आशुतोष  कुमार दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक हैं. इनसे  ashuvandana@gmail.com  पर संपर्क कर सकते हैं.

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