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चेतावनी और प्रश्नपत्र : निकानोर पार्रा

नेरुदा एक कवि के रूप में  स्थापित हो चुके थे और मेधा से लैस भी थे, तभी उन्हें भान हुआ कि पाठक-श्रोता के रूप में उन्हें एक बड़ी जनता मिल सकती है, इसलिए वे कम्युनिस्ट हो गए. कम्युनिस्ट तो वे हो गए लेकिन उनसे कविता छूट गयी, इसके बावजूद वे देश-दुनिया में लोकप्रिय हो उठे. उन्होंने वही किया, जो वे चाहते थे. किन्तु मैं कहना चाहता हूँ कि बाज़ मक्खियों से नहीं लड़ता है. अपनी प्रसिद्धि के चरम पर जब बाज़ मक्खियों के साथ नाचना शुरू कर दे तो वह विदूषक बन जाता है. वे स्पीलबर्ग जैसे बड़े व्यापारी बन गए! सिनेमा के एक व्यक्तित्व के रूप में स्पीलबर्ग बड़े ही प्रतिभावान आदमी थे, लेकिन क्या हुआ? बहुत, बहुत बड़ा व्यापार. अब वह एक बाज़ है जो मक्खियों के साथ नाचता है.

अब निकानोर पार्रा मेरा मास्टर है. जब नेरुदा एक बड़े कवि और एक रोमांटिक कम्युनिस्ट थे, तब वह एक अकवि (एंटी पोएट्री) था. लोगों को उसने सच्ची कविताओं से वाबस्ता कराया, वह सचमुच में एक मजेदार आदमी था. वह मेरा मास्टर था, मैं उसे एक कवि की तरह प्यार देता था. जब मैं ‘एंडलेस पोएट्री’ शूट कर रहा था तब वे सौ साल के हो चुके थे. मैं उनसे मिलने गया, वे सौ साल के हैं, सौ साल के. प्रखर मेधा से लैस आज भी वे जिंदा हैं, और हमेशा की तरह कुछ कठिनाइयों के बीच अपना काम कर रहे हैं. वे एक इंसान हैं, निपट इंसान, जिनसे मैंने बात की है. अपनी फिल्म में मैंने खुद भी सौ साल के एक बुड्ढे की भूमिका की है. मैं उन्हें देखने गया और कहा, “एक सौ साल का आदमी मुझसे क्या कहना चाहेगा?” वे बोले, “बूढ़ा होना कोई अपमान नहीं हैं. तुम अपने पैसे खोते हो, अपनी यौवन-महिमा के गुणगान से निजात पाते हो; धन-यौन-लिप्सा से मुक्त हो जाते हो. इस तरह तुम सबकुछ खोकर फतिंगे में तब्दील हो जाते हो.”   # अलेखान्द्रो  जोदरोवस्की

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Snap Shot – Persona (1966)

 

चेतावनी

By निकानोर पार्रा

अगले आदेश तक 

आग लगने पर

लिफ्ट का नहीं

सीढ़ियों का इस्तेमाल करें

अगले आदेश तक

ट्रेन में धुम्रपान न करें
गंदगी न फैलाएं

शौच न करें

रेडियो न सुनें

अगले आदेश तक

हर उपयोग के बाद

टॉयलेट को फ्लश करें

ट्रेन जब प्लेटफ़ॉर्म पर हो

तब शौच न करें

बगल के सहयात्री से लेकर

धार्मिक सैनिकों तक के प्रति अपनी राय रखें

जैसे, दुनिया के मजदूरों एक हो,

हमारे पास खोने को कुछ नहीं है (धत्)

हमारा जीवन तो परम पिता परमेश्वर, ईसा मसीह
और पवित्र आत्मा का महिमागान है आदि

अगले आदेश तक

इंसान एक रचयिता की संपन्न कृति है (धत्),

इंसानों के कुछ अपरिहार्य अधिकार हैं

उनमें से कुछ इस प्रकार हैं:

जीने की आज़ादी और खुश रहने के तरीके की खोज

वैसे ही जैसे दो जोड़ दो चार होता है

यह अंतिम है लेकिन कम नहीं

इन सच्चाइयों को वैसे भी

हम हमेशा से स्वयंसिद्ध मानते आये हैं

 

प्रश्नपत्र

अकवि क्या है:

वह, जो ताबूत और अस्थि-कलश की दलाली करता है?

एक जनरल, जो खुद के बारे में ही निश्चित नहीं है?

एक पादरी, जिसे किसी चीज पर  आस्था नहीं है?

एक सैलानी, जिसके लिए हर चीज अजीब है; वृद्धावस्था और मृत्यु भी?

एक वक्ता, जिस पर आप विश्वास नहीं कर सकते?

खड़ी-चट्टान की कोर पर खड़ी एक नर्तकी ?

एक आत्ममुग्ध, जो हर किसी से प्यार करता है?

एक जोकर, जो गाल बजाता है

और बेवज़ह यूँ ही बुरा बनता है ?

एक कवि जो कुर्सी पर सोता है?

आधुनिक समय का एक कीमियागर?

एक आरामतलब क्रांतिकारी?

एक पेटी-बुर्जुआ?

एक जालसाज?

एक ईश्वर?

एक मासूम?

सैंटियागो, चिली का एक किसान?

सही उत्तर को रेखांकित करें.

अकविता क्या है:

चाय की प्याली में एक तूफ़ान?

चट्टान पर बर्फ का एक धब्बा?

मानव-मल से ऊपर तक भरा एक पतीला,

जैसा कि फादर साल्वेतियेरा मानता है?

एक आइना, जो झूठ नहीं बोलता?

लेखक-संगठन के अध्यक्ष के गाल पर पड़ा एक तमाचा?

(ईश्वर उनके आत्मा की रक्षा करे!)

युवा कवियों को एक चेतावनी?

जेट-चालित एक ताबूत?

एक ताबूत, जो वायुमंडलीय दायरे से बाहर परिक्रमा करता है?

एक ताबूत, जो कि केरोसिन से चलता है?

एक शवदाह-गृह, जहाँ कोई शव नहीं है?

सही उत्तर के सामने X चिन्हित करें.

उदय शंकर द्वारा अनुदित ये कवितायें  क्रमशः मिलर विलियम्स और  टी विग्नेसन  के अंग्रेजी  अनुवाद पर आधृत हैं.

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गंदगी से लाचार लिबास एवं अन्य कवितायें: रॉबर्तो बोलान्यो

“सत्तर के शुरू की बात है शायद। मेक्सिको शहर में, या शायद कोई और लातिन अमेरिकी शहर रहा होगा, एक कवि सम्मलेन हो रहा था. कवि आते जा रहे थे, कविता कभी निलंबित, कभी ज़लील  होती जा रही थी. तमाशे के आदी लोग, जो कुछ सुनाई दे रहा था उसे कविता जान खुश थे.  अचानक सभा में एक बरगलाया सा लौंडा ऐसे घुसा मानो अभी अपने बस्ते से बन्दूक निकाल सब कवियों का मुँह वन्स एंड फॉर आल बंद कर देगा। जैसे ही लौंडे ने हाथ बस्ते में डाला चूहों और कवियों में फर्क में करना कठिन हो गया. थैंकफुल्ली चूहे मौका देख फरार हो गए. लौंडे की आँखों में खून था — कुछ नशे के कारण कुछ नींद के.  उसने बस्ते में हाथ डाला और एक कागज़ का परचा निकाल उसे से जोर जोर से पढ़ने लगा. लौंडा कवि निकला। चीख चीख कर लौंडा जिसे पढ़ रहा था वह उसकी कविता नहीं, बल्कि भविष्य की  उसकी कविताओं का घोषणापत्र था. लौंडा पढ़ता रहा, लोग सुनते रहे. फिर अंतरिक्ष के किसी दूर कोने से आये धूमकेतु की तरह अपना प्रकाश बाँट लौंडा अंतर्ध्यान हो गया. वह लौंडा बोलान्यो था. ” मयंक तिवारी की कही इन्हीं पंक्तियों के साथ लीजिये प्रस्तुत है  उदय शंकर द्वारा अनुदित रॉबर्तो  बोलान्यो की  तीन  कवितायें .

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Snap Shot- Endless Poetry (2016)

By रॉबर्तो  बोलान्यो

लिजा उवाच

मेरी दुनिया वहीं,

टेप्याक के पुराने गोदाम वाले टेलीफोन बूथ में

ख़त्म हो गई,

जब लिजा ने बताया कि वह किसी और के साथ सोयी.

लंबे बाल और बड़े लंड वाला वह दुबला-पतला लौंडा

उसे चोदने के लिए एक और डेट की भी मोहलत नहीं ले सका.

उसने बताया कि इसमें इतना गंभीर होने वाली बात कुछ भी नहीं है, लेकिन

तुझे अपने जीवन से निकालने के लिए इससे बेहतर कोई और उपाय भी नहीं है.

पारमेनीडेस गार्सिया साल्दाना लंबे बाल रखता था

उसमें लिजा के प्रेमी होने की संभावनाएं थीं

सालों बाद पता चला कि वह एक पागलखाने में मर गया

या खुद से ही खुद को मार डाला.

लिजा अब किसी भी गांडू के साथ सोना नहीं चाहती थी.

कभी-कभी वह सपने में आती है

और मैं देखता हूँ कि

लवक्राफ्टियन मैक्सिको में

वह खुश और शांत है.

हमने संगीत सुना (टैंड हीट, जो कि पारमेनीडेस गार्सिया साल्दाना का प्रिय बैंड था)

और तीन बार सम्भोग किया.

पहली बार वह मेरे भीतर उतर आया

फिर मुँह में

और तीसरी बार पानी के धागे से बंधी बंसी की तरह

मेरी छातियों के बीच फंस गया.

यह सब हुआ सिर्फ दो घंटों में, लिजा ने कहा.

मेरी जिन्दगी के बदतरीन दो घंटे,

मैंने फ़ोन के दूसरी छोर से कहा.

लिजा की याद

रात के अंधेरों से छनती

लिजा की यादें फिर से झरती हैं.

एक जंजीर, उम्मीद की एक किरण:

मैक्सिको का एक आदर्श गाँव,

बर्बरता के समक्ष लिजा की मुस्कान,

लिजा की एक स्थिर तस्वीर,

लिजा के खुले फ्रिज से एक धुंधली रौशनी

बेतरतीब कमरे में झड़ रही है,

जब कि मैं चालीस का हो रहा हूँ,

वह बरबस चिल्लाती है

मैक्सिको फ़ोन करो, शहर मैक्सिको फ़ोन करो,

अराजकता और सौंदर्य के बीच बड़बड़ाते

अपनी  एक मात्र सच्ची प्रेमिका से बात करने के लिए

फ़ोन बूथ के चक्कर लगाने वाले

रॉबर्टो बोलानो को फ़ोन करो.

गंदगी से भरपूर लाचार लिबास

कुत्तागिरी के दिनों में,

मेरी आत्मा मेरे दिल से पसीज गयी.

तबाह, लेकिन जीवित,

गंदगी से भरपूर लाचार लिबास,

फिर भी, प्यार से भरपूर.

कुत्तागिरी, जहाँ कोई भी अपनी

उपस्थिति दर्ज कराना नहीं चाहता.

जब कवि कुछ भी करने लायक नहीं रह जाते हैं

तब कुत्तागिरी की उपस्थिति-पंजि में

सिर्फ उनके ही नाम अंकित होते हैं.

लेकिन मेरे लिए अभी भी बहुत कुछ करना शेष था!

फिर भी, उजाड़ गाँवों से गुजरते हुए

मैं वहां गया,

लाल चींटियों, और तो और काली चींटियों द्वारा

अपनी मृत्यु के लिए अभिशप्त:

यह डर बढ़ता ही गया,

जब तक कि उसने तारों को चूम नहीं लिया.

मैक्सिको में पढ़ा एक चिलीयन

कुछ भी झेल सकता है,

मेरी समझ से यह सच नहीं है.

रात के अंधेरों में मेरा हृदय विलाप किया करता था.

एक रूहानी नदी तपते होठों को गुनगुनाती थी,

बाद में पता चला कि वह मैं था-

रूहानी नदी, रूहानी नदी,

इस बुद्धत्त्व ने इन उजाड़ गाँवों के किनारों से

खुद को एकमेक कर लिया.

धातुई यथार्थ के बीच

तरल वास्त्विकाताओं की तरह

उभरते हैं,

गणितज्ञ और धर्माचार्य

ज्योतिषी और डाकू.

सिर्फ जोश और कविता,

सिर्फ प्रेम और स्मृति ही दृष्टि देती है,

न कि यह कुत्तागिरी

न ही सामान्य राहगीरी.

न ही यह भूलभुलैया.

यह मैं तभी तक मानता रहा जब तक

मेरी आत्मा मेरे दिल से पसीज नहीं गयी थी.

यह सच है कि यह बीमार मानसिकता थी,

लेकिन फिर भी जिन्दादिली इसी में थी.

उदय शंकर द्वारा अनुदित ये कवितायें लोरा हेल्ली के अंग्रेजी अनुवादों पर आधृत हैं.

आज की चीख़ पुकार में एक बहुत कोमल तान खो गयी है: उदय शंकर

By उदय शंकर

 राजेंद्र यादव को नजदीक से जानने का मेरा कोई दावा नहीं है। उनसे मिलना संयोगवश ही रहा है। ये संयोग मेरे जीवन के अद्भुत यादगार क्षण रहे हैं। उनसेकुल जमा चार मुलाकातों की याद है मुझे। शायद मैं इंटरमीडिएटअंतिम वर्ष का छात्र था, जब उन्हें पहली बार साक्षात देखने-सुनने का मौका मिला, गया में। वे कहानी की रचनाशीलता से संबन्धित किसी विषय पर बोल रहे थे। मैंने उनसे कुछ सवाल किए थे। उनका वक्तव्य और अपना सवाल कुछ भी याद नहीं है। सिर्फ कुछ दृश्य ही दिमाग में टंगे रह गए। बाद में मैं जेएनयू आ गया और आते ही छात्र-राजनीति और संस्कृति-कर्म के बारीक सीमांतों पर सक्रिय रहने लगा। मुझे प्रेमचंद के ऊपर एक जनसभा करने और वक्ताओं को तलाशने की जिम्मेवारी सौंपी गई थी। मैंने राजेन्द्र जी से फोन पर बात की, वे सहर्ष ही आने के लिए राजी हो गए और साफ-साफ कहा कि मैं अपनी गाड़ी से आऊँगा लेकिन पेट्रोल के पैसे देने पड़ेंगे। मैंने हाँ कह दिया। वे नियत समय से पहले ही जेएनयू आ गए थे। नियत समय तक के लिए क्या किया जाय यह उनकी फौरी चिंता थी, तो उन्होंने तपाक से कहा कि पाण्डेय जी (मैनेजर पाण्डेय) से मिलने चला जाय। मीटिंग खत्म हुयी और जाते समय पेट्रोल-खर्च के पैसे मैंने उनके हाथ में दिये तो उन्होंने उसे लौटा दिया और बोले कि तुमलोग विद्यार्थी हो, इसे अन्य मद में खर्च करना।

जब बोलने वाले ज्यादा होते हैं तब मैं खामोश रहना ही पसंद करता हूँ और जब बोलने वाला कोई नहीं हो तो सिर्फ मैं ही बोलता हूँ, ऐसी मेरी आदत बन गई है। राजेन्द्र जी अक्सर लोगों से घिरे रहने वाले व्यक्ति थे। ऐसे में उनके नजदीक पहुँचने के तीन ही तरीके बचते थे, जिन्हें अक्सर नवांकुर लोग आजमाते थे- एक आप वाचालपन के शिखर को प्राप्त हों, सुंदर-‘अवांगार्द’ कन्या हों या आप बेचारगी को प्राप्त हो चुके अस्मिता-लोलुपहों। मैं इन तीनों कसौटियों पर खरा नहीं उतर पाता था। इसलिए ये मुलाकातें आगे की नजदीकियों में तब्दील नहीं हो सकीं।

इधर 2013 के शुरुआती महीनों में उनसे मिलना-जुलना फिर से शुरू हुआ और इन संयोगों को संभव बनाने का काम अक्सर कहानीकार-फ़िल्मकार मित्र संजय सहाय जी ने किया। एक मुलाक़ात काफी रंगीन और लंबी भी रही। प्रेसक्लब के खुले आसमान में करीब 3-4 घंटे की बैठकी। उन्होंने जिस ड्रिंक का ऑर्डर दिया था वह भी याद है- वर्जिन मैरी या ब्लडी मैरी। वे शायद सालों बाद प्रेस क्लब आए थे। यह शाम किसी भी साहित्यिक समाज के लिए गौरवान्वित होने वाली शाम थी। प्रेस क्लब के सचिव को जब पता चला कि यहाँ राजेन्द्र यादव आए हुये हैं, तो वे खुद हमारे टेबल के पास आए। राजेंद्र यादव की उपस्थिती को स्वयं और प्रेस क्लब के लिए सम्मान की बात कहते हुये विनम्रता से धन्यवाद ज्ञापित करते रहे। हमलोग राजेन्द्र जी के नेतृत्व में जब वहाँ से उठे तो ऐसा लगा मानो दो-तीन सौ लोगों से भरा-पूरा प्रेस क्लब उठ खड़ा हुआ हो; वे जहां से गुजरते लोग उठ खड़े होते, उनके गुजरते ही खुसफुसाहट शुरू हो जाती- अरे नहीं जानते राजेन्द्र यादव को,हंस के संपादक हैं। राजेन्द्र जी के प्रति सोचने-समझने के मेरे नजरिये को इस एक वाकये ने लगभग बदल दिया था। राजेन्द्र यादव के public-intellectual होने के ‘पाठकीय’/भावकीय प्रतिक्रिया का मैं साक्षी बना था। हिन्दी के बुद्धिजीवी जगत से अतिपरिचित किसी भी व्यक्ति के लिए यह एक विलक्षण और पराभौतिक अनुभव था। हिन्दी का लेखक और इतना सम्मान!! हिन्दी में सम्मान की अजीब स्थिति है। जब से वैचारिक प्रतिबद्धताओं की लेखनी थोड़ी उल्लंग हुयी है तब से हिन्दी वाले सिर्फ हिंदीतर लोगों का ही सम्मान कर पाते हैं। लेन-देन की एक सामान्य प्रक्रिया के अतिरिक्त सम्मान का कोई खास महत्व आजकल नहीं रह गया है। नुकसान करने की क्षमता रखना ही सम्मान पाने की योग्यता है। हिन्दी के अध्यापकों के पीछे चलने वाले भीड़नुमा चेला-चाकरों को देखकर यह अंदाज लगाना मुश्किल नहीं है। राजेन्द्र जी किसी को क्या नुकसान पहुंचा सकते थे, और किसी को फायदा भी क्या पहुंचा सकते थे, खासकर उनलोगों को जिनके पास प्रेस क्लब में बैठ सकने का सामर्थ्य हो।

राजेन्द्र जी को हिन्दी में सत्ता के एक केंद्र के बतौर प्रचारित किया जाता है। मैं सत्ता के किसी वायवीय संकल्पना में अभी भी विश्वास नहीं कर पाता हूँ। सत्ता को मैं अभी भी आर्थिक-राजनीतिक परिप्रेक्ष्यों में ही समेटने का हामी हूँ। राजेन्द्र यादव को जितना भी जान पाया हूँ, मुझे वे कभी भी आर्थिक-राजनीतिक रूप से किसी को लाभान्वित करने वाली स्थिति में नज़र नहीं आए, नुकसान तो छोड़ ही दीजिये। राजेन्द्र जी अगर सत्ता के केंद्र थे भी तो उस केंद्र को मैं एक वायवीय केंद्र से ज्यादा कुछ नहीं मानता हूँ। राजेन्द्र जी ने इस सत्ता केंद्र को अपने आस-पास एक ‘नो लॉस नो प्रॉफ़िट ज़ोन’ की तरह विकसित किया था। यह उनका औरा था और कुछ नहीं। उनके संगी-साथी क्या-क्या कर गुजरे, इसका इशारा नामवर सिंह ने अभी हाल ही में किया है- “राजेन्द्र के मन में कहीं भीतर तक यह बात बैठ गई थी कि वे मोहन राकेश और कमलेश्वर से कम महत्वपूर्ण न मान लिए जाएं।” नई कविता-नई कहानी वाले दौर के जिन भी लोगों ने सत्ता-नवीसी नहीं की या सत्ता का एक वायवीय औरा बनाने में सफल नहीं हुये वे कब से कहाँ हैं या कवलित हुये किसी को पता नहीं है। बहुत पहले ही एक उदाहरण बन चुके भुवनेश्वर को हम भलीभाँति जानते हैं। बहुत दिनों तक लापता रहे और फिर रेलवे ट्रैक पर भिखारियों की दशा में मरे हुये पाये गए। स्वदेश दीपक लापता हैं। सतीश जमाली असाध्य बीमारियों से घिर कर अपने घर में ही कैद हैं। अमरकान्त अपनी दीन-हीन दशाओं के साथ कभी-कभी खबर बन जाते हैं। कुछ लोगों की बदौलत मधुकर सिंह भी अभी खबर बने थे। राजेन्द्र यादव में ही यह कौशल और सामर्थ्य था कि ऐसी खबरों से वे वाबस्ता बचे रहे और रंगीन-खुशमिजाज़ विषमयोगी तिग्गी के दिग्गी बने रहे।

विजय सोनी

विजय सोनी

यह सब मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि राजेन्द्र जी के अन्त्येष्टि कार्यक्रम के साथ ही साथ एक और कलाकार की अन्त्येष्टि हुयी थी उस दिन। मेरे लिए यह लगभग कॉस्मिक अनुभव था। राजेंद्र जी के साथ-साथ जिस कलाकार की अन्त्येष्टि उस दिन सम्पन्न हुयी थी, वे विजय सोनी (1937-2013) थे। मेरे लिए यह कॉस्मिक अनुभव क्यों था, इसके लिए थोड़ा पीछे जाना पड़ेगा। साल भर पहले ही दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान के सभागार में मुक्तिबोध के ऊपर आयोजित कार्यक्रम में वरिष्ठ कवि मंगलेश डबराल बोल रहे थे। उन्होंने याद दिलाया कि सत्तर के दशक में मुक्तिबोध की लंबी कविता ‘अंधेरे में’ का प्रयोगधर्मी मंचन विजय सोनी के निर्देशन में सम्पन्न हुआ था। साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा कि उनकी विदुषी पत्नी अग्नेष्का सोनी थी। उस समय के बाद से वे दोनों लापता हैं, किसी को नहीं पता है कि वे आज-कल कहाँ हैं। अग्नेष्का नाम सुना-सुना लग रहा था, थोड़ा प्रयास किया तो याद आया कि अरे यह तो वही अग्नेष्का हैं जिन्हें मुक्तिबोध लंबी-लंबी चिट्ठियाँ लिखा करते थे। मैं उन चिट्ठियों को दुबारा पढ़ गया। उन चिट्ठियों में विजय सोनी का भी जिक्र है। अग्नेष्का की पसंद की मुक्तिबोध दाद देते हैं। विजय सोनी को वे अपना नया मित्र कहते हैं। अग्नेष्का मुक्तिबोध के काफी करीब थीं। मुक्तिबोध के जन्म के 50 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष में आलोचना ने एक विशेषांक निकाला था उसमें अग्नेष्का जी का भी एक लेख शामिल है, यह लेख मुक्तिबोध के सद्य प्रकाशित कहानी-संकलन काठ का सपना का बहुत ही सटीक मूल्यांकन करता है। बहुत ही मेहनत से लिखी गई समीक्षा थी यह। अग्नेष्का कोवल्स्का-सोनी नाम से हिन्दी कविता के ऊपर स्वतंत्र रूप से दो पुस्तकें पोलिश में लिख चुकी हैं- एक का नाम है 1947 के बाद हिन्दी कविता की नई राहें और दूसरे का, समकालीन हिन्दी कविता और हिन्दी की साहित्यिक परंपरा । इसी नाम से इनका एक पर्चा फ़िलॉसफ़ी की एक अङ्ग्रेज़ी पत्रिका में है, जिसका शीर्षक है- नेचर एंड फ्रीडम: सम रिफ़्लेक्संस । इसका प्रकशन वर्ष 1976 है। मुक्तिबोध की चिट्ठियों में ही नहीं बल्कि मलयज की डायरियों में भी अग्नेष्का और विजय सोनी का जिक्र पचासों बार मिलता है। अग्नेष्का मलयज की शिक्षिका थीं, पोलिश भाषा पढ़ाती थीं और मलयज से उनकी दोस्ती भी थी। बाद में जब अग्नेष्का जी ने विजय सोनी के साथ शादी कर ली तो मलयज भी इस दंपति के दोस्त हो गए। मलयज ने बहुत ही अपनापे के साथ इन लोगों का जिक्र किया है। मलयज लिखते हैं- “अग्नेष्का के मनोभाव उनके चेहरे पर उतने खुलकर नहीं आते, किन्हीं और चीजों में घुले-मिले रहते हैं। तब विजय को चित्रकारी के प्रति अपने नए-नए रुझान से काफी स्फूर्ति और उत्साह मिलता था। वे कुछ न कुछ पेंट कर रहे होते और लोगों की उनके चित्रों के बारे में क्या प्रतिक्रिया है यह जानने के लिए उत्सुक रहते।” विजय सोनी चित्रकारी की दुनिया में विको सोनी के नाम से जाने जाते थे। उनके चित्रों की प्रदर्शनी के समाचार/रिपोर्ट उस समय के अखबारों में छपते थे। मलयज की एक पुस्तक जख्म पर धूल के आवरण-चित्र और साज-सज्जा की जिम्मेवारी भी विजय सोनी ने संभाली थी। शमशेर भी चित्रकार विको सोनी/विजय सोनी के प्रशंसक थे। शमशेर की एक पूरी की पूरी कविता विजय सोनी के लिए है-

 विजय सोनी के चित्र

(नयी दिल्ली में विजय सोनी के चित्रों की प्रदर्शनी का उद्घाटन करते हुए दो शब्द)

जिस्म जहां घुलता है/ रंगों की कोमलता में खो जाने/ पावन आवेश दुख और दर्द का/ सुख की झांकियों का/ जहां रोशनी और अंधेरे की/ शतरंज बिछाता है/ जहां दूरियों में हम हैं/ और नज़दीकियों में तुम/ और जहां मिलते हैं वह/ एक कैनवस है/ जिसे हम छू नहीं सकते/ क्योंकि उसे हम जी रहे हैं/ यह एक माध्यम है/ जिसे रंग मिल-मिल के पकड़ने के लिए/ खोये जा रहे हैं/ यहां जो कुछ ठोस है/ वह धड़क रहा है/ और जहां धड़कन है वहां ख़ामोशी है/ दम साधे हुए। आज की चीख़ पुकार में/ एक बहुत कोमल तान/ खो गयी है। उसे पाना है। विजय सोनी, तुम डेनमार्क जाओ /स्वीडन पोलैण्ड में /कोई नया रूप /जन्म ले रहा है /अनपहचाने शायद/ उसकी परछाईं मैं यहां /पकड़ रहा हूं/ “शिल्प चक्र” में। शायद मुक्तिबोध आज/ यहीं खड़ा है*./वह ऊंचा व्यक्ति /जो हम सब के पीछे है, और /हम सब को ऊपर से/ देख रहा है। हम पीछे मुड़ कर न देखें। सामने ही देखें। शायद उसकी नज़र/आईना बने। हम सब की नज़र/उसका आईना बने। और हम उसको देखें /जो हमारा /आने वाला व्यक्ति है.

 विजय सोनी चित्रकार के रूप में दिल्ली में काफी लोकप्रिय थे। कम से कम हिन्दी बुद्धिजीवियों की बीच इनकी चर्चा ज़ोरों पर थी। लेकिन इनके चित्रकार वाले रूप से अलग भी इनका एक रूप था और वह था उनका रंगकर्म। वे विश्वविख्यात पोलिश रंगकर्मी येजि ग्रोतोव्स्कि के ‘थियेटर लैब’ से पूअर थियेटर में बाकायदा प्रशिक्षित थे। येजि ग्रोतोव्स्कि के नजदीकी लोगों का मानना है कि उनका हिंदुस्तान के प्रति अद्भुत लगाव था, 1960 में उन्होंने ‘शकुंतला’ का मंचन पोलैंड में किया था। एक बार एक एक्टर की तलाश में भारत भी आ चुके थे। ऐसे में विजय सोनी का येजि ग्रोतोव्स्कि के प्रति आकर्षित होना और उनके पास थियेटर सीखने चले जाना उस समय के लिहाज से बहुत बड़ी बात थी। प्रशिक्षण समाप्त कर वापस लौटते ही उन्होंने ‘अंधेरे में’ का आशंका के द्वीप नाम से मंचन किया। यह अपने-आप में एक जटिल टेक्स्ट का चुनाव था लेकिन बहुत ही कम संसाधनों की मदद से उन्होंने इसे सम्पन्न किया। जयदेव तनेजा लिखते हैं- ‘काली पैंट पहने छः अभिनेताओं ने मंच पर, अपनी देह भंगिमाओं और समूहनों से अन्याय और शोषण के कुछ धारावाहिक बिम्ब उभारे।’ महादेवी बुद्धिजीवी वर्ग के बारे कहती हैं कि ‘उसके एक शरीर में दो प्रेतात्माएँ रहती हैं- धन-लिप्सा और अभाव। इसी की उछल-कूद उसके भीतर मची रहती है।’ दूधनाथ सिंह इस संदर्भ में विजय सोनी को याद करते हुये लिखते हैं- ‘एक बार बहुत पहले श्री विजय सोनी ने यहाँ इलाहाबाद में मुक्तिबोध की कविता ‘अंधेरे में’ का एक नृत्य-नाट्य प्रस्तुत किया था। उसमें हर पात्र सिर्फ लंगोटी लगाए हुये नंगा था। सबकी नसें और पसलियाँ और चेहरे ऐंठे हुये थे। महादेवी की उन्हीं प्रेतात्माओं का प्रतीकात्मक नृत्य था वह।’ आशंका के द्वीप के अलावा उनके द्वारा निर्देशित एक और नाटक की जानकारी मिलती है- लंकाधिराज। इन नाटकों का मंचन उन्होंने दिल्ली के बाहर अन्य शहरों में भी किया था। कहने का तात्पर्य यह है कि विजय सोनी और अग्नेष्का सोनी अपने दौर के लेखकों-बुद्धिजीवियों के बीच में बहुत ही जाने-पहचाने नाम थे।

उस दिन विजय सोनी की गुमनामी/लापता हो जाने वाले वक्तव्य ने मुझे काफी चौंकाया था। मुझे यह भी लगा कि शायद वे पोलैंड में जाकर बस गए होंगे। मैंने अपने जान-पहचान के कुछ पोलिश दोस्तों को भी (जो हिन्दी पब्लिक स्फियर में रुचि भी रखते हैं) इस बारे में कई-एक बार बताया, लेकिन वे भी कुछ बता पाने सफल नहीं रहे। हिन्दी के किन्हीं लोगों से पूछने की कोई जरूरत ही बाकी नहीं रह गई थी क्योंकि हिन्दी के बुद्धिजीवियों की सभा में ही मंगलेश यह बोल रहे थे। मैंने इंटरनेट पर भी बहुत कुछ ढूँढने की कोशिश की लेकिन कुछ हाथ नहीं आया। धीरे-धीरे इसे भूलता ही जा रहा था कि राजेन्द्र जी वाले अन्त्येष्टि कार्यक्रम में मैं युवा आलोचक संजीव कुमार के साथ खड़ा था, तभी उन्होंने एक वृद्ध विदेशी महिला की ओर इशारा किया जिनके गले में एक रुद्राक्ष की माला पड़ी हुयी थी। वे उस वृद्ध महिला की फुर्ती और इस उम्र में भी इतने स्वस्थ चाल पर आश्चर्य व्यक्त कर रहे थे। मेरी तरह संजीव भी उस महिला से अपरिचित थे और सिर्फ उत्सुक निगाहों के आसरे थे। थोड़ी देर में ही पता चला कि यह अग्नेष्का सोनी हैं जो वह अपने पति विजय सोनी के शव के साथ अंतेयष्टि के लिए यहाँ आयी हैं। थोड़ी देर के लिए अपने पति के शव को छोडकर वे राजेंद्र जी को भी श्रद्धांजली देने आयीं। जैसा कि मैंने पहले भी कहा कि यह दुर्योग मेरे लिए लगभग कॉस्मिक था। जिस कलाकार-विदुषी दंपति को लगभगलापता-गुमनाम समझ लिया गया था उसका प्रकटीकरण क्या ऐसे ही होना था! वे कौन सी स्थितियाँ होती हैं जिनमें लोग गुमनाम हो जाते हैं। जबकि वे होते हैं, उसी जगह होते हैं जहां हम उनकी गुमनामी की चर्चाएँ करते हैं। वे दोनों इसी शहर में पिछले 30 वर्षों से थे। उनकी बेटी चारु सोनी अङ्ग्रेज़ी की बड़ी पत्रकार हैं। (मलयज ने अपनी डायरी लिखा है- “चारु तब बहुत छोटी थी शायद दो साल की। मैं घर की सीढ़ियाँ चढ़ने के पहले पहले सड़क पार वाली दुकान से कैडवरी की रंग-बिरंगी चाकलेटी गोलियों का पैकेट खरीदना नहीं भूलता…” ऐसी ही कई-एक पंक्तियाँ चारु के लिए भी हैं) इंडिया टुडे, मेल टुडे, आउटलुक जैसी अङ्ग्रेज़ी की राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में लिखती रही हैं। लेकिन हम हिन्दी वाले एकदम से उपराम हो जाते हैं और इसी तरह कितने लोग गुमनाम हो जाते हैं। विजय सोनी की मृत्यु की खबर सिर्फ एक अङ्ग्रेज़ी अखबार के अलावा कहीं छपा हुआ नहीं दिखा। अगर उनके अन्त्येष्टि का समय राजेन्द्र यादव के समय से अनायास नहीं टकराया होता तो हम आज भी यही मानते रहते कि वे लापता हैं। मैं इसे सिर्फ एक घटना नहीं मानता हूँ बल्कि एक प्रवृति के बतौर देखता हूँ। हिन्दी साहित्य समाज के भीतर कुछ तो बदला है जिसके सूचक के बतौर इसे देखने कोशिश करता हूँ।

क्या हिन्दी में आधुनिकता समकालीनता का द्योतक हुआ करती थी, जिसे हम आज कहीं न कहीं खो चुके हैं। मुक्तिबोध, शमशेर, मलयज, विजय सोनी, राजेंद्र यादव, मोहन राकेश, कमलेश्वर तो दूसरी तरफ रेणु, मार्कन्डेय, शिव प्रसाद सिंह, अमरकांत, शेखर जोशी जैसे लेखकों द्वारा जिस भी रचना परिवेश का निर्माण हो रहा था क्या वह एक समकालीन रचना-समाज को निर्मित करता था। समकालीनता से तात्पर्य यह कि अपने समय और समाज के बृहत्तर/बहुयामी यथार्थ को व्यक्त करने वाला परिवेश। यह हुआ विषय-रूपों की समकालीनता। मैं इसी को विधा-रूपों की समकालीनता तक खींचने की कोशिश करता हूँ तो लगता है कि मुक्तिबोध, शमशेर, मलयज, विजय सोनी, राजेंद्र यादव,मोहन राकेश, कमलेश्वर इत्यादि लेखक –कलाकार विधारूपों के संदर्भ में समकालीनता का एक नया ही परिवेश गढ़ रहे थे। चित्रकार, फ़िल्मकार, रंगकर्मी, पत्रकार आदि पहली बार हिन्दी साहित्यिक-समाज की मुख्य धारा में पहचाने जाने लगे थे। एक तरह की आवाजाही दिखने लगती है और प्रगाढ़ होती है। यह आवाजाही साहित्य-रूपों को प्रभावित करने लगती है। कविता-कहानी आदि पर चित्रकला, रंगकर्म और सिनेमा के असर दिखने शुरू होते हैं। पहली बार एक भरापूरा हिन्दी बुद्धिजीवी तबके का निर्माण होता हुआ दिखता है। राजेन्द्र जी के अन्त्येष्टि कार्यक्रम में जो इतनी भीड़ उमड़ी थी क्या वह सिर्फ हिन्दी लेखकों की भीड़ थी। नहीं, उसमें उन सारे विधाओं के लोग थे जिनसे एक बुद्धिजीवी तबका का निर्माण होता है और इस तबके के साथ राजेन्द्र जी के आवयविक संबंध ने भी उन्हें पब्लिक इंटेलेक्चुअल का दर्जा दिया है। यह उनका अपना कौशल था। अपने समय में विजय सोनी इसी भरेपूरे बौद्धिक समाज में चमक उठते हैं। इस प्रक्रिया को स्वाभाविक गति से आगे बढ़ना था लेकिन स्वाभाविकता अक्सर जालों-जंजालों के हाथों परास्त होती रही। फिर हम इस पराजय को ही स्वाभाविक मान लेते हैं। अगर यह उस स्वाभाविक प्रक्रिया का पराजय नहीं तो और क्या है कि अपने समय के लोकप्रिय-चर्चित-हुनरमंद और विद्वत दंपति से हमारा साक्षात्कार सिर्फ दैवीय दुर्योगों या संयोगों पर ही क्यों निर्भर था!! कुछ तो ऐसा चल रहा है जो सीधा नहीं है। टेढ़ा है पर मेरा है वाले समाज में सीधे की चिंता ही कहीं लोगों को टेढ़ा न लगने लगे!!

 उदय शंकर

उदय शंकर

जेएनयू से पीएचडी के लिए शोधरत। तीन खंडों में आलोचक सुरेंद्र चौधरी के रचना संचयन का संपादन। सांस्‍कृतिक आंदोलनों से जुड़ाव। उनसे udayshankar151@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

साभार- अकार 

वह भी कोई देश है महाराज: ट्रेवेल्स विथ हेरोडोटस

By उदय शंकर 

अनिल यादव का यात्रा संस्मरण, ‘वह भी कोई देश है महाराज’, आज ही खत्म किया. खत्म करते ही गच्च से एक सन्नाटे का शिकार हो गया.

वह भी कोई देश है महाराज

वह भी कोई देश है महाराज

सात बहनों का वह देश कितना मनभावन लगता है. वहां का मुख्य मंत्री हवाई जहाज लिए गायब हो जाता है और हम इंडियन आइडियल के बिग बॉस नुमा तोंद सहलाते हुए, अपने ही डकार की बदबू में सहज हुए मलेशियन एयरलाइन्स के बारे में चिंतित चिप्स खा रहे होते हैं. सारी फजिहत का रामवाण ‘रामदेव पाचन पाउडर’ पी रहे होते हैं. सारी गलाजत और बदहजमी अपने में ही देखने के ऐसे आदि हुए कि सात बहनें और ध्रुव तारा सभी को स्वर्गादपि गरीयसी ही समझते रहे.

इक्की-दुक्की खबरें ऐसे पहुँचती हैं मानो शांत और स्थैर्य चित्त वाली बहनों ने बहुत दिन बाद स्त्रियोचित मर्यादाओं को ताक पर रख कर कोई छींक मार दी हो. यादव जी का यह पूरा संस्मरण उस छींक में सना हुआ है जो हमें सहज नहीं रहने देता है. यदा-कदा वाली छींक नहीं महराज, बल्कि छींकों का नैरन्तर्य है- वह देश.

ज्ञानरंजन ने इस पुस्तक के बारे में बहुत ही अर्थपूर्ण टिपण्णी की है- लेखक पथ का दावेदार नहीं है, वह जीवनदायी अन्वेषण करता है. यह हिंदी साहित्य की अकेली कृति है, इसके जोड़ या तोड़ की कोई और रचना अभी तक नहीं हुयी है, यही ज्ञानरंजन जी का कहना है. और यह सच भी है. इसे लिखने या अनुभव करने के लिए जिस तरह का फक्कड़पन और निस्सारता वाला अंदाज चाहिए वह अनिल यादव में है. यादव की कहानियों के सन्दर्भ अशोक भौमिक ने एक बात कही थी कि लेखक लिखने में रस लेने लगता है. यह संस्मरण जिस तटस्थता और रूखेपन से लिखा गया है, वह इस पुस्तक की गजब की पूंजी है.  अपने आप से,  दृश्यों से, घटनाओं से यह विलगाव विपस्सना के असर की याद दिलाती है, जिसका इस पुस्तक में जिक्र भी है- ‘विपस्सी अपनी मृत्यु को भी आते और खुद को ले जाते हुए तटस्थ भाव से देखता है.’ इतनी सारी बंदूके, हत्याएं, ध्रूमपान – नशाखोरी की तरकीबें और वेश्याएं,  क्या यह कम है किसी लेखक को भटकाने के लिए,  लेकिन यह अनिल यादव की ही खासियत है कि वह ऐसे दृश्यों को बहुत ही ठंडेपन से एक पंक्ति में निपटा कर अग्रिम यात्राओं के लिए अपनी ऊर्जा को बचा लेता है.

अनिल यादव के इस संस्मरण को पढ़ते हुए मुझे न तो हिंदी का कोई लेखक याद आया न ही पत्रकार. हिंदी में बौद्धिक जुगाली और उससे निर्मित अमर पक्षधरता एक ऐसी कुंजी है जिससे हम अपने पसंदीदा और आदर्श रचनात्मक संसार को खोल कर कबाड़खाने में सुरक्षित करते चलते हैं. ऐसे-ऐसे लेखक और पत्रकार हमारे आदर्श हैं जिनकी कूल जमा पूंजी उनकी बौद्धिक तलवार है और उसके चलने और न चलने को जांचने वाला कोई भी मानक इस ‘स्थिर समाज’ में नहीं है.

जेनुइन बौद्धिक तलवार सिर्फ विचारों को ही नहीं काटती बल्कि वह आत्मघाती भी होती है, आत्मघाती का अर्थ नैराश्य वाले दार्शनिक आधार में नहीं ढूंढा जाए- सीधा, सरल अर्थ यह कि तलवार की धार पे धावनो है. यह आत्मघाती तलवार इन तथाकथित आदर्शों में से किसी के पास नहीं है. वे सब हाई स्कूल में होने वाले भाषण-प्रतियोगिता के धुरंधर हैं जहाँ इच्छा से एक पक्ष चुन लेना होता है. अनिल यादव के पास ऐसा कोई भी पक्ष नहीं है, और जो तलवार है, वह भी आत्मघाती है.

अनिल यादव के इस यात्रा संस्मरण को पढ़ते हुए मुझे सिर्फ एक आदमी की याद आती रही, वह अनिल की तरह ही पत्रकार और धुरंधर यात्री था- रिजार्ड कपूसिंस्की. एकमात्र कम्युनिस्ट जिसे पोलैंड ने स्वीकार किया और सम्मान दिया. वह दुनिया भर के 27 क्रांतियों का साक्षी बना, 40 बार जेल गया और 4 बार फांसी की सजा हुयी और हर बार एक आश्चर्य की तरह महाभिनिष्क्रमण करता नज़र आया. वह आज़ादी के कुछ ही वर्षों बाद भारत आया था, उसे न तो अंग्रेजी आती थी और न ही अन्य भारतीय भाषाएँ. संवादविहीनता की स्थिति में भी वह किस तरह की संवेदनाएं पिरो गया, उसे उसकी पुस्तक- ट्रेवेल्स विथ हेरोडोटस में देखा जा सकता है. उसकी कुछ पंक्तियाँ-

I arrived in Calcutta from Benares by train, a progress, as I was to discover,from a relative heaven to an absolute hell….Usually,a different color skin attracts attention here; but nothing distracts the denizens of Sealdah Station, as they seem already to settle into a realm on the other side of life. An old woman next tome was digging a bit of rice out of the folds of her sari. She poured it into a little bowl and started to look around,perhaps for water, perhaps for fire, so that she could boil the rice. I noticed several children near her, eyeing the bowl. Staring—motionless, wordless.This lasts a moment, and the moment drag son. The children do not throw themselves on the rice; the rice is the property of the old woman, and these children have been inculcated with something more powerful than hunger.

A man is pushing his way through the huddled multitudes. He jostles the old woman, the bowl drops from her hands, and the rice scatters onto the platform, into the mud, amidst the garbage. In that split second, the children throw themselves down, dive between the legs of those still standing,dig around in the muck trying to find the grains of rice. The old woman stands there empty-handed, another man shoves her.The old woman, the children, the train station,everything—soaked through by the unending torrents of a tropical downpour. And I too stand dripping wet, afraid to take a step; and anyway, I don’t know where to go.

अनिल यादव में विवरण की ऐसी ही ताकत है और ऐसी ही संवेदनशील भाषा, जो कभी भी व्यक्त होने में ना-नुकुर नहीं करती है. और ‘अनिश्चितता ऐसी जैसे जरुरी आत्मविश्वास को पाने का चक्कर हो.’ अनिल यादव में हिंदी के रिजार्ड कपूसिंस्की होने की भरपूर संभावना को अक्षुण्ण पाता हूँ और ज्ञानरंजन के ही शब्दों में मेरा भी मन ‘वह भी कोई देश है महाराज’ को तरह-तरह से विज्ञापित करने का करता है.

पुस्तक को मंगाने हेतु अंतिका प्रकाशन से इस पते पर संपर्क किया जा सकता है – अंतिका प्रकाशन सी-५६/यूजीएफ़-४ शालीमार गार्डन, एक्सटेंशन-II ग़ाज़ियाबाद-२०१००५ (उ.प्र.) antika56@gmail.com]

शिप ऑफ थीसियस – अनहोनी और होनी की उदास रंगीनियाँ: उदय शंकर

BY उदय शंकर

शिप ऑफ थीसियस । सबसे पहले यह शीर्षक ही दर्शक को जिज्ञासु बनाता है। आनंद गांधी, जो फिल्म के लेखक-निर्देशक हैं, का मानना है कि यह शीर्षक मूलतः एक थॉट-एक्सपरिमेंट है जिसका प्रेरणा-स्रोत ‘शिप ऑफ थीसियस’ नामक एक विरोधाभासी (पैराडॉक्सिकल) गुत्थी है। वह गुत्थी इस रूप में है कि थीसियस ने एक जहाज बनाया था और सौ साल बाद उस जहाज का एक-एक पुर्जा बदल दिया गया। मतलब कि उस जहाज में अब कोई भी पुर्जा ऐसा नहीं बचा था जिसे थीसियस ने उसमें लगाया था। पहला सवाल यहीं पर आता है कि क्या यह 100 साल बाद वाला जहाज भी थीसियस का जहाज है या नया जहाज है? अगर नया है तो वह कौन सा समय, बिन्दु या पुर्जा है जहां से जहाज अपनी पहचान (Identity) का नवीकरण शुरू करता है। एक तरह की उलझन, विरोधाभास जिसका कोई तार्किक उत्तर या निष्कर्ष संभव नहीं है, पैराडॉक्स कहलाता है। किसी पैराडॉक्स का कोई भी निष्कर्ष या उत्तर अपने आप में, ‘पहले अंडा या मुर्गी’ टाइप का, उलझन पैदा करती है। इसी कारण से यह सवाल अस्तित्व के सवाल के आस-पास टीक जाता है और यही वह बिन्दु है जहां आनंद गांधी इस पैराडॉक्स को मानवीय जीवन-जगत के बीच में रख कर देखते हैं। शिप ऑफ थीसियस फिल्म इसी जिज्ञासा के साथ शुरू होती है (जैसा कि आनंद गांधी का कहना है) कि इंसान के शरीर की एक-एक कोशिका 7 साल के बाद बदल जाती है। इस बदलाव के कारण किसी भी इंसान में क्या-क्या परिवर्तन होते हैं? वह आदमी क्या वही रह जाता है या कुछ और हो जाता है? अगर वह कुछ और हो जाता है तो वह क्या है, जैसे अनगिनत सवाल उभरते हैं। इन सवालों का कोई भी तर्कसंगत उत्तर संभव नहीं है। बहुतों का तो यहाँ तक मानना है कि इस तरह के सवाल या बदलाव की कोई भी सम्पूर्ण अभिव्यक्ति भाषा में संभव नहीं है, भाषा में व्यक्त हुये ऐसे जिज्ञासु तेवर को कोई भी आसानी से बचकानी हरकत कह सकता है। इस तरह की जिज्ञासाओं को अनुभूत करने के लिए एक तरह की संवेदना की आवश्यकता होती है। मेरा मानना है कि विरोधाभासी गुत्थियों, जीवन-शैली-प्रक्रिया को दर्शाने के लिए सिनेमा बहुत ही अच्छा माध्यम है। शिप ऑफ थीसियस जीवन की सतत-प्रक्रिया में उभरने वाले विरोधाभास का बखान है, बिना किसी मूल्य-निर्णय के, सिर्फ बखान।

ship of theseus's Poster

ship of theseus’s Poster

शिप ऑफ थीसियस में यह बखान तीन कहानियों के माध्यम से सम्पन्न हुआ है। पहली कहानी नेत्रहीन फोटोग्राफर आलिया (आयदा-अल-काशेफ) की है। नेत्र रूपी अभावात्मक स्थिति को वह कैमेरे से संतुलित करती है। यह संतुलन ही उसकी पहचान (एक अच्छी और प्रशंसित फोटोग्राफर के रूप में) को निर्मित करती है। अभाव उसके लिए रचनात्मकता का स्रोत बन जाती है। वह ‘अपने अनुभव-संसार’ में खुद को सम्पूर्ण महसूस करती है। बाद में जब उसे आँखें और रोशनी वापस मिल जाती है तो वह खुद को असहज महसूस करती है। वह एक दूसरे अभावात्मक स्थिति में चली जाती है, फोटोग्राफी नहीं कर पाती है। भौतिक-अभाव की पूर्ति रचनात्मक-अभाव (पहचान का संकट) के रूप में प्रकट हो जाती है। यहीं पर सवाल खड़ा होता है कि आलिया की असली पहचान क्या है? आँख वापस आने के बाद वाली आलिया पुरानी आलिया से कितनी अलग है, नयी है या वही है? यह एक विरोधाभासी गुत्थी है।

 दूसरी कहानी मैत्रेय(नीरज कबि) नाम के एक श्वेतांबर साधु/भिक्षु की है। जिनके बारे में कहा जाता है कि वे साधु कम शास्त्री ज्यादा हैं। जीव-जंतुओं के अधिकारों और पर्यावरण को बचाने के लिए संघर्ष करते हैं। वे इस संघर्ष में किसी भी तरह के समझौते के लिए तैयार नहीं हैं और यही ‘नैतिक आवेग’ उनकी पहचान है। वे पेट की बीमारी से परेशान हैं लेकिन दवाइयाँ नहीं लेते हैं क्योंकि हर दवा के पीछे जीव-जंतुओं की हिंसा है। यही समस्या आगे जाकर लिवर सिरोसिस में तब्दील हो जाती है जिसका तत्काल इलाज बहुत जरूरी है क्योंकि समस्याएँ विकराल रूप धारण कर कैंसर में तब्दील हो सकती हैं। उनका नैतिक आवेग फिर आड़े आ जाता है और वे समझौता करने के बजाय जीवन को त्यागने का फैसला करते हुये आमरण अनशन की शुरुआत करते हैं। आमरण अनशन और बीमारी दोनों के प्रभाव ने उन्हें एक दिन अंदर से तोड़ दिया, जीने की ललक फिर से पैदा हो गई और डॉक्टर/दवा की सेवा लेने को तैयार हो गए। उनमें लिवर का प्रत्यारोपण (Liver Transplantation) किया जाता है और वे फिर से स्वस्थ्य हो जाते हैं। उनके स्वस्थ होने में जीव-हिंसा का योगदान शामिल हो गया। अब वे ‘श्वेतांबर साधु/भिक्षु’ नहीं रहते हैं। पहली कहानी की तरह ही यहाँ भी एक अभावात्मक स्थिति से दूसरी अभावात्मक स्थिति की ओर यात्रा है। दोनों स्थितियों में उत्पन्न हुये पहचान के संकट का कोई तर्कसंगत जवाब नहीं है, इसीलिए यह कहानी भी एक विरोधभासी-गुत्थी का निर्माण करता है।

तीसरी कहानी नवीन (सोहुम शाह) नामक एक स्टॉकब्रोकर की है। उपर्युक्त दोनों कहानियों से यह कहानी थोड़ी भिन्न है। पहली भिन्नता यह है कि शुरुआती दोनों कहानियों के पात्रों की ‘पहचान-यात्रा’ रचनात्मक-नैतिक पहचान से भौतिक पहचान की पूर्णता को पाने का है। इस कहानी में घटना-क्रम के लिहाज से यह यात्रा विपरीत दिशा में चित्रित है। कहानी का शुरुआती दृश्य ही यह इंगित करता है कि वह अब भौतिक-रूप से एक सम्पूर्ण इंसान है क्योंकि उसमें किडनी का प्रत्यारोपण (Transplantation) संपन्न हो गया है। वह अब स्वस्थ है। इसके बाद ही उसका पेशागत पहचान स्पष्ट होता है कि वह दिन-रात सिर्फ पैसों के बारे में सोचने वाला एक स्टॉकब्रोकर है। उसकी नानी समाजसेविका है, जिसके पास वह आज-कल रहता है। एक दुर्घटना में नानी का पैर टूटता है और वह फिर से अस्पताल वाले माहौल में चला जाता है। नानी उसे हमेशा ताना देती है कि फ्रीडम-फाइटर और समाज-सेविका का नाती अमेरिका का पिट्ठू बना बैठा है। लोगों के सामने वह खुद को अपमानित महसूस करता है। इसी बीच पता चलता है कि डॉक्टरों के गिरोह ने एक मजदूर की किडनी चुरा ली है। संयोग ही है कि जिस दिन नवीन को किडनी लगाई गई थी उसी के एक दिन पहले मजदूर की किडनी चोरी हुयी थी और दोनों का ब्लड-ग्रुप भी एक ही है। नवीन को शक होता है कि कहीं वही किडनी उसे नहीं लगाई गई है। यहाँ से नवीन एक नई पहचानगत यात्रा पर निकलता है। शंका का समाधान जल्द ही हो जाता है और पता चलता है कि मजदूर की किडनी स्टॉकहोम, स्वीडन के एक अमीर आदमी को लगाई गई है। नवीन उस आदमी से मिलने स्टॉकहोम जाता है। इन सारे प्रयासों का लब्बोलुआब यह निकला कि रोता हुआ हारा-पीटा मजदूर फिर से हरा हो जाता है। यहाँ फिर वही सवाल कि स्टॉक-ब्रोकर से कार्यकर्ता बनने की इस यात्रा में नवीन ने जो-जो पहचान पाया उनके बीच में क्या संबंध है? कौन सी पहचान नवीन की सम्पूर्ण पहचान है? संकुचित और अनैतिक संसार के निवासी नवीन का यह कायाकल्प भी एक विरोधाभासी गुत्थी ही है।

तात्कालिक स्फुट विचार 1शिप ऑफ थीसियस एक ऐसी फिल्म है जिसने बॉलीवुड में विद्यमान ‘छवि-समृद्धि के स्टीरियोटाइप’ को तोड़ा है। इस लिहाज से भी यह कुछ अपवाद फिल्मों की श्रेणी में आती है। फिल्म ‘छवि-समृद्धि’ के सबसे आसान तरीके मसलन ‘स्मोक, पिस्टल और सेक्स’ से एक सचेत दूरी बनाती है। यह दूरी और कुछ नहीं बल्कि छवि-अंकन में निष्णात आनंद की एक सचेत रचनात्मक जिम्मेवारी को दिखाता है। जहां आप ‘प्रचलित जनाभिरुचियों’ को सहलाते नहीं हैं बल्कि आप उसे संशोधित-संवर्द्धित और संश्लिष्ट करते हैं। जिसके बाद आपको यह कहने की जरूरत नहीं पड़ती है कि धूम्रपान करने से कर्क रोग होता है या संभोग करने से एड्स होता है।

तात्कालिक स्फुट विचार 2– कला में विचार(Idea) को विचार के रूप में चित्रित करना खतरे से खाली नहीं है। दर्शन का क्षेत्र पहले से ही इसके लिए सुरक्षित है। कला-सिनेमा-साहित्य में विचार को शब्दों-रंगों से रंगना तब-तक सार्थक नहीं कहा जायेगा, जब-तक उसका एक सामाजिक परिप्रेक्ष्य स्पष्ट न हो। आनंद गांधी की फिल्म शिप ऑफ थीसियस  के सन्दर्भ में जो नया विवाद पैदा हुआ है, उसकी समस्या की जड़ मुझे यहीं दिखती है। राइट हियर राइट नाउ, कंटिन्युअम और शिप ऑफ थीसियस देखने के बाद यह कहा जा सकता है कि आनंद का मानना है कि जगत में जो कुछ भी घटता है उसका कोई न कोई लिंक पूरे समाज के साथ जुड़ा होता है और इसी में एक तार्किक सामाजिक सार्थकता भी निहित होती है। यह मान लेने के बाद सम्बद्धता-प्रतिबद्धता का सवाल गौण हो जाता है। मतलब आज हमारा जीना सिर्फ एक विचार का घटित होना भर है। आनंद को इस आइडिया वाले गेम से बाहर निकलना होगा। भरे-पूरे समाज को चित्रित करने के क्रम में घटिया विचार भी परिष्कृत हो जाता है। यह चिंता इसलिए है कि बॉलीवुड में बहुत दिन बाद कोई ‘क्राफ्ट्स मैन’/हुनरमंद निदेशक दिखा है, जरुरत है कि आर्टिस्ट के दर्जे तक कैसे पहुंचा जाये।

1.

किसी फिल्म को लोगों की दृष्टि से बचा ले जाना हो तो उसे आर्ट फिल्म का दर्जा दे दो। शिप ऑफ थीसियस  के संदर्भ में शुरू में ही यह प्रयास दिखा, लेकिन यह सफल होता हुआ नहीं दिख रहा है। क्या आर्ट फिल्म कोई स्पष्ट-परिभाषित पद है? यह अतिप्रचलित पद पता नहीं कब, कैसे और किन फिल्मों के लिए स्थिर हो गया, समझ के परे है। अमेरिका-इंग्लैंड की तर्ज पर यह बॉलीवुड में भी घुस गया। जहां फिल्म-निर्माण एक उद्योग के बतौर स्थापित हुआ, फिल्में सार्वजनिक उपभोग (Mass Consumption) के लिए माल में तब्दील हुयीं। यूरोप में आर्ट फिल्म जैसे पद का प्रचलन नहीं है। क्या इसमें कुछ संकेत छुपे हो सकते हैं? अगर इसे थोड़ा स्पष्ट किया जाय तो ऐसे कहा जा सकता है कि दो तरह की फिल्में होती हैं। एक कंपनी (Producent) की फिल्में होती हैं, दूसरी रचयिता/निर्देशक (Author/Director) की फिल्में होती हैं। दुनिया भर की तमाम क्लासिक फिल्में रचयिता/निर्देशक की फिल्में हैं। शिप ऑफ थीसियस रचयिता/निर्देशक की फिल्म है। किसी कंपनी के हितों को ध्यान में रख कर बनाई गई ‘कमर्शियल फिल्म’ नहीं है। बॉलीवुड और हॉलीवुड में फिल्म को एक कला-माध्यम के रूप में सिर्फ तकनीक और पैसे के संदर्भ में ही देखा-समझा गया है। जिस कला-माध्यम की शुरुआत मैन विद द मूवी कैमरा से हुयी हो, वह कैसे हॉलीवुड और बॉलीवुड में मैन विद द वुमेन, वायलेन्स, स्मोक, सेक्स, पैसा एंड 3डी ग्लासेस हो गया! मैन विद द मूवी कैमरा की परंपरा वाली फिल्मों ने अपनी एक भाषा विकसित की है- दृश्य भाषा (Visual language)। यह भाषा यथार्थ के विवरणों को पकड़ने में बड़ी सहायक हुयी है। फिल्म जैसे दृश्य कला-माध्यम की सबसे बड़ी भूमिका अभी तक कुछ रही है तो वह है यथार्थ के विवरणों को उसकी सम्पूर्ण नग्नता और सुंदरता के साथ सामने ले आना। बेला तार जैसा प्रसिद्ध निर्देशक इसीलिए जाना जाता है। वातावरण की एक-एक हरकत को पकड़ने के लिए वह बहुत समय लेता है, पत्तियाँ अगर टूट कर जमीन पर गिरती हैं तो  हवा चलने के बाद वह फिर से उड़ती भी हैं और इस क्रिया को कैद करने में जितना भी समय लगता है, बेला तार वह समय लेता है। लॉन्ग शॉट/वाइड एंगल के संदर्भ में कैमेरे पर उसकी ऐसी पकड़ दिखती है, मानो एडिटर को बहुत मगज़मारी नहीं करनी पड़ी होगी। कहानी सुनने के आदि हम बॉलीवुड के भावक को यह सब कुछ अजीब लगता है। बेला तार/तारकोव्स्की जैसे निर्देशकों की फिल्मों में वातावरण के विवरणों वाला यथार्थ जैसे ही पर्दे पर दिखता है तो मानो यथार्थ मूर्तिमान हो उठता है और लगता है कि यथार्थ से ज्यादा सुंदर, उदास, हिंसक कुछ हो ही नहीं सकता है। यह वातावरण, जिसमें एक साथ बहुत चीजें घटित हो रही हैं, की बारीकियों को सम्पूर्णता में पकड़ने की कोशिश करना यही एहसास दिलाता है कि दृश्य-श्रव्य कला का इससे बड़ा उत्स कुछ और नहीं हो सकता है और जिसने भी इसे संपूर्णता में पकड़ने की कोशिश की है वह बड़ा कलाकार हुआ है, और साथ ही साथ उस वातावरण में उपस्थित चरित्र (अभिनेता/अभिनेत्री), जो कि लंबे समय तक के लिए सहजता की मांग करता है, की सार्थकता उसके अभिनय-सामर्थ्य से तय होती है। (यह स्थिति प्रयोग-सिनेमा(मणि कौल) के उस प्रस्तावना के विरोध में ठहरती है जहां अभिनय-कौशल को एक बाहरी गुण मानने का आग्रह था।) अकारण नहीं है कि फिल्म-कला के इस पक्ष ने साहित्य को, खासकर कथा-लेखन(Fiction Writing) को ‘बुरी’ तरह प्रभावित किया है। दूर से उदाहरण लेने से अच्छा है कि अपने निर्मल वर्मा को ही देख लिया जाय। उनकी कथा-शैली ऐसी फिल्मों से प्रभावित लगती है। जब वे इस तरह लिखते हैं -‘वह पतझड़ की एक शाम थी। पेड़ों से पत्तियाँ नदारद थीं। आँखों के सामने से कुछ पीली और बहुत सारी सूखी पत्तियाँ उड़ती हुयी चली जाती थीं। पत्तियों की खड़-खड़ से अचानक उसका आत्मचेता मन सचेत होता है और वह सामने से आती हुयी दिखती है।’ शायद असद जैदी ने तो कहीं लिख भी दिया है कि निर्मल वर्मा को पढ़ना ऐसा लगता है मानो आप किसी खराब फिल्म की पटकथा पढ़ रहे हों। क्योंकि यह शैली पर्दे पर ही साक्षात होती है। कथा-लेखन पर इसका असर कितना सही है या कितना गलत है यह बहस का एक अलग विषय हो सकता है। ठीक इसके उलट बॉलीवुड/हॉलीवुड की फिल्मों को कथा-साहित्य ने (पल्प फिक्शन) ने बहुत ही प्रभावित किया है। इस प्रभाव के कारण हम सिनेमा जैसे दृश्य-कला को भी साहित्य के मानदंडों पर ही तौलते रहे हैं और कथानक की बारीकियों को टटोलने में ही अपनी समीक्षक-बुद्धि की इतिश्री समझते रहे हैं। और जहाँ फिल्मों ने कहानियों को प्रभावित किया, वहाँ हम ‘कथानक का ह्रास’ टाइप जुमले फेंक कर उसके विश्लेषण में खुद को न्योछावर करते रहे हैं। शिप ऑफ थीसियस एक ऐसी फिल्म के रूप में हमारे समक्ष चुनौती पेश करती है, जहां से कथा-शिल्प और फिल्म-शिल्प की बहस की शुरुआत हो सकती है। कहानी-कथा के भाषा-शिल्प में बनी फिल्मों की भीड़ में शिप ऑफ थीसियस सिनेमा की भाषा/शैली में तीन कहानियाँ कहती है।

2.

शिप ऑफ थीसियस के अतिप्रचार को भी लोग मुद्दा बना रहे हैं और इसका कारण किरण राव-अमीर खान के समर्थन को बता रहे हैं। यह बात सही है कि किरण राव ने इस फिल्म को एक बड़े प्लेटफॉर्म पर आने का मौका दिया है। लेकिन फिल्म के साथ किरण राव का यह जुड़ाव फिल्म के बन जाने और फिल्मोत्सवों में चर्चा हो जाने के बाद का जुड़ाव है। मैं खुद इस फिल्म की चर्चा कमल स्वरूप जैसे फिल्म निर्देशक से 2 साल पहले से सुनता आ रहा हूँ। कहने का मतलब यह कि किरण राव का इस फिल्म से कोई रचनात्मक जुड़ाव नहीं है। आनंद गांधी का कितना नाम हो रहा है, इससे पहले यह भी देख लेना चाहिए कि एक अच्छी फिल्म से जुड़ने के कारण किरण राव का भी नाम हो रहा है कि नहीं! यहाँ सारे जुड़ाव का मूल स्रोत है शिप ऑफ थीसियस । अगर किरण राव में इतनी क्षमता है कि वे किसी फिल्म को अतिप्रचारित (बौद्धिक खेमों में) करवा सकती हैं, तब तो धोबी घाट को भी वही परिणाम मिलना चाहिए था जो शिप ऑफ थीसियस को मिल रहा है!!

शिप ऑफ थीसियस को सिनेमाघर में लगे अभी एक सप्ताह हुये ही थे कि उसकी पहली कहानी पर आइडिया को चोरी करने का आरोप लगने लगा। पहली कहानी को रंग से महरूम (Bereft Of Colours) नामक एक डिप्लोमा शॉर्ट फिल्म से प्रेरित बताया गया। आनंद इस आरोप को सिरे से नकारते हैं। मैंने भी इस डिप्लोमा फिल्म को देखा और पाया कि पहली कहानी और डिप्लोमा फिल्म में विचार के शुरुआती स्तर पर कुछ समानताएँ हैं। लेकिन दोनों फिल्मों के निष्कर्ष अलग-अलग हैं। अगर विचार की समानता को किनारे रख दें तो इसमें किसी को शक नहीं है कि आनंद की फिल्म डिप्लोमा फिल्म की तुलना में ज्यादा सुंदर/समृद्ध, यथार्थवादी और आगे बढ़ा हुआ कदम है। जैसे पिकासो का वह महत्वपूर्ण चित्र जिसे हम कोरिया में जनसंहार (Massacre in Korea) नाम से जानते हैं, साथ ही साथ लोग यह भी जानते हैं कि यह चित्र फ्रांसिस्को डि गोया  के चित्र तीन मई, 1808 (1814) से प्रभावित है। पूरा का पूरा कम्पोजीशन फ्रांसिस्को डि गोया से उठाया गया है लेकिन पिकासो ने उस फ्रेम को/ कम्पोजीशन को एकदम से एक तीव्रता के साथ समकालीन बना दिया। आनंद गांधी अगर अनजाने में भी उस डिप्लोमा से कुछ लिए होंगे तो भी शिप ऑफ थीसियस की पहली कहानी की कोई भी तुलना (समानधर्मा के सेंस में) डिप्लोमा फिल्म से संभव नहीं है; क्योंकि दोनों फिल्म की अंतश्चेतना में एक तरह का विलगाव है। घटना-स्तर की समानता को ही अगर हम कला में चोरी का मामला बनाते हैं तो परंपरा में संवर्द्धन की गुंजाइश वाली स्थिति से छुटकारा पा लेना होगा। तुर्गनेव ने कहा था कि हमलोग (कहानी लेखक) गोगोल के ओवरकोट से निकले हैं। तुर्गनेव के कहने का साफ संकेत था कि हमारी कहानियों में गोगोल की परंपरा जगमगाती है। परंपरा का एक-एक पड़ाव कलाकृति में दीपदिपाता है और यह सब इसलिए भी होता है कि हर कलाकृति अपने आदिम-रूपों को पाने के लिए लालायित रहती है। इन मानकों के आस-पास जो भी कृति अपनी जगह बनाने में सफल होती है उन्हें हम क्लासिक का दर्जा देते हैं। ऐसी फिल्मों को हम लेखक-निर्देशक की फिल्में कहकर कंपनियों की फिल्मों से अलगाते हैं। किसी भी अच्छी फिल्म/क्लासिक फिल्म की जब हम चर्चा करते हैं तो सुधी समीक्षक सबसे पहले उसमें उसी परंपरा की खोज करते हैं। परंपरा से लेते हुये क्या तोड़ा, क्या जोड़ा, या और कुछ नहीं तो परंपरा का निर्वहन ही किया कि नहीं! इस निर्वहन पर भी लोग आरोप लगा सकते हैं कि निर्देशक ने कहाँ-कहाँ से माल टीपा है। अगर, मैं संवेदनशीलता के तकाजे को भूल जाऊँ तो कह ही सकता हूँ कि शिप ऑफ थीसियस वातावरण के नैराश्य को चित्रित करने के लिए तारकोव्स्की के कैमेरे का इस्तेमाल करता है। दो या तीन जगह आपको साफ-साफ दिखेगा कि दृश्य तारकोव्स्की की फिल्म स्टॉकर (1979) से प्रभावित हैं और मिरर (1975) का वह प्रसिद्ध धान का खेत भी यहाँ मौजूद है। शहरी संरचना को एक सांस्कृतिक बिम्ब के रूप में चित्रित करते समय आनंद गांधी के यहाँ क्रिस्टोफ़ किसलोवस्की भी मौजूद हैं। इसी तरह एक धार्मिक/आध्यात्मिक व्यक्तित्व की दुनिया या उसकी ऊंचाई को दिखाता हुआ अलेखान्द्रो जोदोरोवस्की के होली माउंटेन का रेड टावर भी एक जगह दिखता है। बेला तार भी अपने लॉन्ग शॉट और वाइड एंगल के साथ हैं। आर्टिस्ट (2011) का भी स्पर्श दिख सकता है, पहली कहानी में इस स्पर्श को लोग अनुभव कर सकते हैं। आर्टिस्ट में लोग गूंगे थे, इसलिए इशारों में बात करते थे। तकनीकी साधनों के विकास/आविष्कार ने जब लोगों को जुबान और कान दे दी तो मुख्य पात्र ने जीना स्थगित कर दिया क्योंकि बाकी लोग कहने-सुनने के अभ्यास में व्यस्त हो गए। मुख्य पात्र इस नए आविष्कार के साथ सहज नहीं हो पा रहा था और खुद को समाप्त कर देना ही बेहतर समझा। और विजय आनंद की गाइड(1965) तो है ही। हालांकि, आनंद गांधी का कहना है कि उन्होंने गाइड नहीं देखी है और इसे नहीं मानने का कोई कारण नहीं है। परंपरा का अनुभव/असर कोई प्रत्यक्ष क्रिया नहीं है। फिल्म-निर्माण की प्रक्रिया में यह अनुभव एक सामूहिक अनुभव हो जाता है, जिसके अंत में यह निर्दिष्ट करना भी संभव नहीं होता कि कौन सा असर कहाँ से आया है और यह तब तक चलेगा जब तक वह एक सामूहिक रचना-कर्म बना रहेगा। इन तमाम प्रभावों को उस यात्रा की तरह ही मानता हूँ जहां हर कला-कृति अपने आदिम रूप को पाना चाहती है।उस आदिम रूप को पाने के लिए उसकी एक यात्रा पीछे की तरफ होती है, जिसमें परंपरा के महत्वपूर्ण पड़ाव जगमगाते से दिखते हैं।

यह असर फिल्म का असर नहीं होकर परंपरा का असर है और गाइड का असर साफ-साफ दिखता है। मसलन जब मैत्रेय का एक साथी साधु कहता है –“और आपके गुरु जी बोस्टन में हैं। वो भी हमारे सप्रिय मैत्रेय की तरह साधु कम और शास्त्री ज्यादा हैं। चलो अँग्रेजी बोलने का कुछ तो फायदा हुआ।” याद करें, गाइड का वह दृश्य जहां साधु-पंडित बने राजू और परंपरागत पंडित-पुजारियों के बीच शास्त्रार्थ होता है। परंपरागत पंडित-पुरोहितों द्वारा संस्कृत में पूछे गए सवाल से राजू अवाक रह जाता है, तब पुरोहित लोग उसका मज़ाक उड़ाते हैं कि ‘संस्कृत आती हो तब न’। इसके बाद राजू उनसे अँग्रेजी में सवाल करता है, तो पंडित-पुरोहित अवाक हो जाते हैं, फिर राजू उनका मज़ाक उड़ता है- ‘अँग्रेजी आती हो तब न!!’  दूसरा दृश्य, अन्न-त्याग के बाद जब राजू मरणासन्न है जहां लोगों का मेला लगा हुआ है। अन्न-त्याग के बाद मरणासन्न स्थिति में पहुँचे मैत्रेय के आस-पास वही दृश्य अपने लघु-रूप में मौजूद है। लेकिन इन सब प्रभावों के बावजूद शिप ऑफ थीसियस  आनंद गांधी की फिल्म है, एक निर्देशक-लेखक की फिल्म है क्योंकि अपने निष्कर्षों में यह गाइड से अलग है और यह निष्कर्ष ही आनंद का वैचारिक प्रस्थान है। गाइड में दया-दर्शन का पात्र बना राजू मर जाता है क्योंकि उसे एक विश्वास/आस्था को कायम रखवाना था इसे वह नैतिक जिम्मेवारी की तरह ढोता है लोगों के अंदर से यह आस्था भी अगर खत्म हो जाएगी तो उनकी मानवीय जिजीविषा दम तोड़ देगी। शिप ऑफ थीसियस के मैत्रेय के सत्य-प्रयोग में खुद की जिजीविषा आड़े आ जाती है और जीने का तर्क हावी हो जाता है। भावना पर तर्क की जीत जैसा कुछ। क्योंकि एक जगह मैत्रेय खुद कहता है- “Just cut down the sentimentality a bit. We must address people’s reason more.”

3.

फिल्म-आलोचना, साहित्य-आलोचना एक तरह की संवेदना की मांग करती है। 1980 में जन्मे आनंद गांधी 19 साल की उम्र से ही फिल्मों-धारावाहिकों के लिए लिख रहे हैं। 14 साल की उम्र से ही संस्थागत ज्ञान-अध्ययन क्षेत्र को अलविदा कहकर स्वाध्याय और गुणी-ज्ञानी के संगत में चले जाते हैं। हिन्दुस्तानी-परंपरा के दार्शनिक सवालों से लेकर पश्चिम तक के दार्शनिक गुत्थियों से जूझते रहे हैं, और यह दार्शनिक गुत्थी अपने ‘बालकोचित प्रयासों’ के साथ उनकी सारी फिल्मों में मौजूद रही है। 32 साल की उम्र में शायद ही किसी भारतीय निदेशक ने ऐसा नाम कमाया हो, जैसा आनंद गांधी ने शिप ऑफ थीसियस को बनाते ही हासिल किया है। शिप ऑफ थीसियस को देखते हुये इतना जरूर महसूस होता है कि यह कला के उस दायरे फिल्म है जहां बालकोचित जिज्ञासा सी सरलता और ‘अबोधता’ एक प्राथमिक मांग होती है और आनंद गांधी उस मांग को पूरा करते हैं। आनंद अपने वक्तव्यों में जितने ज्ञानी-मुनि ध्वनित होते हैं, शिप ऑफ थीसियस  में उतने ही मासूम दिखते हैं। उन्हें यह भलीभाँति पता है कि उनकी कहानियों का उत्स कुछ दार्शनिक सवाल हैं लेकिन वे कह कहानी ही रहे हैं और यही रचनात्मक ईमानदारी उन्हें ग्राह्य बनाता है। नहीं तो, प्रयोग-सिनेमा की तरह सतह से उठते देर नहीं लगता आनंद गांधी को। जहां ‘बौद्धिक-प्रलाप’ कहानी की सतह पर ही बजबजाने लगता है, और टेक्स्ट के मूल स्रोत को भी सशंकित कर देता है। आधुनिक रचना-प्रक्रिया का यह स्वाभाविक क्रम रहा है- विचार<थीम<कहानी। शिप ऑफ थीसियस अगर इसी रचना-प्रक्रिया को उदाहृत करता है तो क्या गलत करता है? यह सवाल जरूर वाजिब है कि जिन दार्शनिक गुत्थियों को वह सुलझाने के लिए कहानियाँ कहता है, क्या वह उन गुत्थियों को या उनकी प्रासंगिकता को सार्थक करता है? और कुछ लोगों का मानना है कि वह सार्थक नहीं करता है। क्या इसी से फिल्म या किसी भी कला-रूप को हम खारिज कर सकते हैं?

4.

अब जरा तीनों कहानियों का जायजा लें जिनसे शिप ऑफ थीसियस बनता है या शिप ऑफ थीसियस नामक विरोधाभासी गुत्थी को बखानने के क्रम में जो तीन कहानियाँ कही गई हैं। इस पर थोड़ा सोचने की गुंजाइश श्रद्धेय आलोचक पुरुषोत्तम अग्रवाल ने पैदा कर दी है,  फिल्म देखने के तत्काल बाद फ़ेसबुक के अपने वाल पर उन्होंने प्रतिक्रिया दी “…the film makes a case for organ donation, a very noble thing to do in itself….” क्या सचमुच फिल्म सिर्फ यही कहती है? मुझे लगता है यह स्थितियों के सरलीकरण के अलावा और कुछ नहीं है। तीनों कहानियों में अंगदान के अलावा भी कुछ शानदार चीजें साझा हैं। अंगदान कितना भी महान हो लेकिन वह सिर्फ घटना है। इन तीनों कहानियों में मुझे जो शानदार लगी और साथ ही साथ जो तीनों कहानियों में साझा की गई है, उसका संबंध एक विचार से भी है। वह विचार यह है कि मानसिक रूप से हम अपने समाज के हिस्से नहीं हैं। ऐसे में हमारा अस्तित्व हमेशा दूसरे के मुक़ाबले तय होता है या पहचान पाता है। उस दूसरे से, जिससे हम सार्थक होना चाहते हैं, भौतिक रूप से एक अन्यता (otherness) का संबंध होता है। यही अन्यता मानसिक रूप से अपने समाज-वर्ग-जाति-लिंग-पेशा आदि के संबंध में द्रष्टव्य होता है। भौतिक और मानसिक अन्यता का यह भाव और स्थिति परस्थितियों को विडंबनात्मक बनाती है, जिससे कहानी में contrast पैदा होता है। पहली कहानी की नेत्रहीन फॉटोग्राफर आलिया के संसार में न तो कोई दूसरा फोटोग्राफर है और न ही कोई नेत्रहीन। वह अक्सर आँख वालों की दुनिया से प्रशंसित होती है, एक गैर पेशेवर दुनिया की ओर मुखातिब रहती है। इस भौतिक अन्यता को वह मानसिक अन्यता में भी बरकरार रखना चाहती है। अपने पुरुष दोस्त से उसकी हर तकरार इसी ओर इशारा करती है। जैसे ही आँख वाली दुनिया में वह आँख के साथ शामिल होती है उसकी भौतिक अन्यता समाप्त हो जाती है और यही उसके लिए बेचैनी का सबब है।

जिस सांसारिक मोह-माया से उबरने के लिए मैत्रेय के मंडली के लोगों ने भिक्षुक होना स्वीकार किया, मैत्रेय को छोड़कर सभी लोग वापस उसी माया-मोह में फँसते दिखते हैं। लोग ज्यादा खाने के कारण या ज्यादा खाने के लिए दवाइयाँ खाते हैं। भक्तजनों से ज्यादा सेवा-भाव के लोलुप दिखते हैं। इन तमाम प्रयासों के बावजूद उनके लिए एक सात्विक भाव लिए कोई भक्तमंडली नहीं दिखती है, दिखती भी है तो कुछ ‘घरेलू महिलाओं’ की एक भीड़। मैत्रेय इन साधुओं से एकदम अलग दिखता है। बिना किसी आग्रह-भाव के इनके आस-पास पढ़े-लिखे संभ्रांत से दिखते भक्तों की एक जमात है। जिसमें युवा भी हैं और बुड्ढे भी। डॉक्टर हैं तो वकील भी हैं। यही संभ्रांत सांसारिक तबका उनकी बातों को तवज्जो देता है। पढ़ने लिखने की सामाग्री मुहैया करता है। यहाँ भी दिखता है कि मैत्रेय अपने साधु-जमात से मानसिक रूप से असंपृक्त है, लेकिन भौतिक रूप से उसी समाज का हिस्सा है। इस मानसिक असंपृक्ति को वह संभ्रांत सांसारिक भक्तों के बीच घुलाना चाहता है। यहाँ वह एक तरह का मानसिक लगाव अनुभव करता है। लेकिन इस तरह का मानसिक लगाव कुछ बलिदान भी मांगता है, इसी वेदी पर गाइड के राजू जी को अपनी बलि देनी पड़ी थी।

और अंत में, तीसरी कहानी का नवीन, एक स्टॉक ब्रोकर, शेयर बाज़ार का दलाल, पैसों का लालची। नानी के बहाने समाजसेवियों की जमात में गिर पड़ा है। इस कहानी में आप कह सकते हैं कि नवीन की स्थिति अन्य कहानियों की तुलना में स्वाभाविक नहीं है बल्कि परिस्थितिजन्य है। नवीन के भीतर होने वाले बदलाव को हम देख सकते हैं। यहाँ भी शेयर बाज़ार वाले उसके  संगी-साथी या उनका भरा-पूरा समाज नहीं दिखता है। नवीन के भीतर हुये बदलाव और नानी की संगत ने पहले से विद्यमान मानसिक अन्यता को तीव्रता प्रदान कर दी है। इस तीव्रता के कारण वह मानसिक रूप से अब नानी से संपृक्त महसूस करने लगा है। इस कहानी में पूर्व की दोनों कहानियों की निरंतरता के तत्व की तुलना में विलोम-तत्व(antithesis) ज्यादा प्रभावशाली हैं, ऐसा मुझे लगता है। शुरुआती दोनों कहानियों के पात्रों का यात्रा-क्रम अभावात्मक हैं। भौतिक अभाव पर जीत रचनात्मक और नैतिक अभाव का कारण बनता है। भौतिक अभाव से रचनात्मक और नैतिक अभाव की यात्रा। दूसरे तरीके से कहें तो रचनात्मक-नैतिक समृद्धि से ‘रचनात्मक-नैतिक ह्रास’ की यात्रा। आलिया और मैत्रेय की यात्रा एक ही मायने में सार्थक है कि वे शारीरिक (भौतिक) पूर्णता को पाते हैं, लेकिन यह उनका सम्पूर्ण व्यक्तित्व नहीं बनाता है। नवीन की यात्रा में अभावात्मक स्थिति जैसा कुछ नहीं है। वह एक साथ शारीरिक-सामाजिक-सांस्कृतिक सभी तरह की समृद्धि की ओर अग्रसर है। तीसरी कहानी में सामाजिक परिप्रेक्ष्य का दायरा अन्य दोनों कहानियों के बनिस्पत ज्यादा बड़ा और स्पष्ट है। घटनाओं के जमघट वाला भरा-पूरा संसार और यही वह कारण है कि यह कहानी पूर्व की दोनों कहानियों का विलोम सा लगता है; लेकिन ऐसा भी नहीं है कि यह कहानी कोई निरंतरता भंग करती है क्योंकि तीनों में परिवर्तन, परिवर्तन का परिणाम और परिवर्तन के कारण जैसे सवाल कहीं न कहीं विरोधवासी स्थितियों में डालता है।

5.

फिल्म की तीनों कहानियों को जोड़ने वाला भौतिक सूत्र वह आदमी है जिसने आठ लोगों को जीवन-प्रदान किया है। उसी एक आदमी के आँख, लिवर और किडनी क्रमशः आलिया, मैत्रेय और नवीन को लगाया गया है। इस बिना पर भी यह सिर्फ अंगदान की कहानी नहीं रह जाएगी? क्योंकि यहाँ भी एक विरोधाभास खड़ा होता है कि उस आदमी के अंग, जो अन्य आठ लोगों को लगाया गया है, अन्य लाभार्थियों में लग कर क्या अपने पुराने पहचान से पृथक हो गए हैं या उन्हें नया पहचान मिल गया है? यहाँ भी एक विरोधाभास है। अगर इस फिल्म को सिर्फ अंगदान की कहानी होना होता तो कम से कम उसे पाँच और कहानियाँ कहनी पड़ती। उस महादानी की भी एक कहानी है जो स्वयं फिल्म में साक्षात नहीं है, वैसे ही जैसे फिल्म का निर्देशक भी साक्षात नहीं होता है। वह एक अंधेरे खोह में, जो कभी-कभी बीहड़ का भी आभास दिलाता है, हेडटॉर्च लिए कुछ खोज रहा है। यह खोह या गुफा प्लेटो के के गुफा जैसा भी नहीं है। जहां लोगों का एक समूह है। समूह जंजीर से (अमिताभ वाला जंजीर भी हो सकता है) बंधा है। उन्हें पीछे देखने की इजाज़त नहीं है जबकि प्रकाश-स्रोत उनके पीछे ही है लेकिन वे उसे देख नहीं पा रहे हैं। वे प्रकाश के उद्गम से अंजान अपनी छायाओं को दीवाल पर देखते हैं और उन्हें ही यथार्थ समझ बैठे हैं। इस खोह में वह दानी व्यक्ति अकेला है प्रकाश-स्रोत को खुद ललाट में बांध रखा है और अपनी छाया को साथ लिए आगे बढ़ता जा रहा है। उसने क्या अनुभूत किया यह बताने के लिए वह हमारे बीच नहीं है, लेकिन उसके हाथ में एक कैमरा था और वह अपनी गति-दिशा और गंतव्य के रास्ते को रिकॉर्ड करता जा रहा था। उसने गंतव्य को पाया कि नहीं यह भी हमें मालूम नहीं है। हम सिर्फ उस ‘लक्ष्य’ को पाने की प्रक्रिया से वाकिफ हैं और वह प्रक्रिया इतनी समृद्ध है कि हम उस अधूरी यात्रा को भी उसकी  सचेत और गंभीर संलग्नता के बतौर संज्ञान में लेने को तत्पर हैं। हर ‘सफल यात्रा’ कुछ संज्ञाएँ देकर समाप्त हो जाती है, फिर संज्ञाओं की यात्रा शुरू होती है, मसलन कुछ आविष्कार, कुछ दवाइयाँ, कुछ स्थान और कुछ ‘ज्ञान’ भी। और, हर असफल यात्रा बहुत सारी कहानियाँ देकर हमें भी खुद में साझा कर लेती है, वह हमारे भावनात्मक संसार में एक थाती बनकर बस जाती है। हम सारी कहानियों को समेटने में सफल नहीं हो सकते हैं, क्योंकि वे हमारी क्षमताओं और उम्र के पार होती हैं। बहुत सारी कहानियाँ ऐसी भी होती हैं जो अनकही रह जाती हैं। किसी एक फिल्म में उन सारी कहानियों को समेटना संभव भी नहीं था। शिप ऑफ थीसियस उन्हीं कहानियों में से तीन कहानी को हमारे सामने लाती है और बॉलीवुडीय सिने-अनुभव में एक थाती के रूप में सँजोये जाने वाली फिल्म के रूप में स्थिर/सुरक्षित हो जाती है। कहीं इस फिल्म की एक समीक्षा पढ़ रहा था जिसमें समीक्षक ने यह इच्छा जाहिर की थी कि वह फिल्म के हिन्दी subtitle के लिए खुद को बिना पारिश्रमिक प्रस्तुत करना चाहता है ताकि वह अपनी माँ को यह फिल्म दिखा सके। मेरी माँ न हिन्दी जानती है और न ही अँग्रेजी फिर भी मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि किसी भी बॉलीवुडीय फिल्म से ज्यादा बढ़िया तरीके से वह इस फिल्म को समझ सकती है। क्योंकि, इसकी एक यात्रा पीछे की ओर भी है। जहां वह फिल्म-कला के आदिम रूप को पाने की कोशिश करती है। शिप ऑफ थीसियस की इस यात्रा से उड़ने वाले धूल-कण से निकलने वाली कौंध ने लोगों को कम से कम एक बार आँख मींचने के लिए मजबूर तो कर ही दिया है। दूसरी तरह कहना हो तो जैसे कुमार गंधर्व का कोई गीत आईपॉड में लगाकर उसका ईयरफोन ‘फिल्मी गाने’ के किसी श्रोता के कान में चुपके से ठूंस दिया गया हो।

इति

(इस समीक्षा को लिखवा लिए जाने के लिए अपने अन्यतम मित्र संजय सहाय जी का आभारी हूँ…मित्र रवीश चौधरी से हुयी बात-चीत से बहुत कुछ हासिल किया हूँ और इस लेख में भी बहुलांश इस्तेमाल करने की कोशिश किया हूँ, रवीश जी का भी आभार। )
 उदय शंकर

उदय शंकर

जेएनयू से पीएचडी के लिए शोधरत। तीन खंडों में आलोचक सुरेंद्र चौधरी के रचना संचयन का संपादन। सांस्‍कृतिक आंदोलनों से जुड़ाव। उनसे udayshankar151@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

उन्नीसवीं सदी के स्वप्नदर्शियों के भग्नावशेष: बलराज साहनी और हजारी प्रसाद द्विवेदी के पत्राचार

बलराज साहनी और पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी

प्रस्तुति : उदयशंकर

हिन्दी साहित्य का इतिहास अगर 150 साल पुराना है, तो सिनेमा का इतिहास भी 100 साल पुराना है। हिन्दी साहित्य की प्रस्तावना में इस बात पर ज़ोर रहा कि वह सामाजिक कर्तव्यबोध को अंगीकार करे, और उस समय का कर्तव्यबोध राष्ट्रवादी आंदोलन के स्वर देना था। हिन्दी सिनेमा भी कमोवेश इसी कर्र्तव्यबोध से परिचालित हुआ, और यही कर्तव्यबोध सिनेमा और साहित्य में आवाजाही की तात्कालिक वजह थी। दादा साहेब फाल्के खुद स्वदेशी आंदोलन के प्रभाव में थे। बलराज साहनी के पारिवारिक संस्कार आर्यसमाजी रहे हैं और हिन्दू धर्म-व्यवस्था के भीतर आर्यसमाजी खुद को ‘पहला आधुनिक’ मानता है।
1 मई 1913 को  जन्में बलराज साहनी का जन्मशती वर्ष पिछले महीनों ही समाप्त हुआ है और यह संयोग ही है कि भारतीय सिनेमा का जन्मशती वर्ष 3 मई 2013 को समाप्त हुआ। इस संयोग के बड़े निहितार्थ हैं। कुछ तो बात थी, कि फिल्मों से ‘व्यवसायिक जुड़ाव’ को प्रेमचंद से लेकर हजारी प्रसाद जी तक ‘उज्जवल पेशा’ नहीं मानते थे। फिल्मों से बलराज साहनी जैसों का जुडऩा हमारे पूर्वजों का शंका-समाधान करता है, तो कहीं खरोंचे भी लगा देता है। फिल्म एक आधुनिक विधा है, जैसे कहानी और उपन्यास हैं। इसीलिए इन विधाओं की सार्थकता भी इसी में निहित है कि ये एक न्यूनतम बुर्जुआ नैतिकता की मांग करते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि इन तीनों विधाओं में प्रतिक्रियावादी अभिव्यक्ति संभव नहीं है, लेकिन इसके लिए एक स्तर की ‘कलात्मक चालबाजी’ की जरूरत पड़ती है। हिन्दी साहित्य में व्याप्त एक प्रकार की आलोचनात्मक समृद्धि ने अक्सर इन चालाकियाँ को पकड़ी है। गंभीर सिनेमा-समीक्षा के अकाल के कारण सिनेमा की चालबाजियाँ अक्सर सफल रही हैं, जिसके कारण साहित्य और सिनेमा के बीच आवाजाही में एक फांक उत्पन्न हुई।

बलराज साहनी का सिनेमा से जुड़ाव एक आधुनिक युवा बौद्धिक का जुड़ाव था। उनके जन्मशती के बहाने साहित्य-सिनेमा के बीच आवाजाही की जो परंपरा बलराज साहनी ने कायम की थी, उसको विमर्श का बिन्दु होना चाहिए। बलराज साहनी और हजारी प्रसाद जी के बीच की यह बातचीत इसी आवाजाही की प्रस्तावना थी। जिसकी पहलकदमी बलराज साहनी ने की थी। यह दखल किसी आउटसाइडर की तरह नहीं है, बलराज इसमें हिन्दी की साहित्यिक गतिविधियों के निष्णात नज़र आते हैं। यह बात-चीत पूर्व प्रकाशित है, लेकिन इस प्रस्तावना का जिक्र या उत्साही-स्वागत शायद ही कहीं मिलता है। द्विवेदी जी ने अपनी मुलाकात के 25 वर्ष पूरे होने के अवसर पर बलराज ने पत्राचार द्वारा यह बातचीत की थी। लेकिन 60 के दशक की ‘नई कहानियाँ’ में छपी इस बातचीत का कोई खास नोटिस नहीं लिया गया।
बलराज और हजारी प्रसाद जी इस बातचीत में लगभग हामी भरते हुये, एक दूसरे की शंकाओं को सहलाते हुए दिखते हैं। बलराज साहनी घोषित कम्यूनिस्ट के हकदार माने जाते रहे हैं और पंडित जी जो कुछ भी हों लेकिन कम्यूनिस्ट नहीं थे। बातचीत का बड़ा हिस्सा मार्क्सवाद को लेकर है और मार्क्सवाद की हिन्दी साहित्य  में प्रचलित प्रविधियों से दोनों नाखुश हैं। हिन्दी की क्लासिक कहानी ‘कफन’ को दोनों इसी प्रविधि से प्रभावित कहानी मानते हैं। इनका मानना है कि इस कहानी से साम्राज्यवादियों द्वारा भारत की ‘प्रचारित-छवि’ को हवा मिलती है। वे इसे प्रेमचंद की एक ‘गौण कहानी’ की संज्ञा देते हैं। 

क्या ऐसा नहीं लगता कि ‘दो बीघा ज़मीन’ जैसी फिल्म का भावी यथार्थ ‘कफ़न’ में प्रेमचंद व्यक्त कर चुके थे! कफ़न कहानी साहित्य की परंपरा में झटका नहीं है बल्कि परंपरा का विकास ही है। यथार्थ के स्तर पर कम से कम झटका नहीं है, दृष्टि/दर्शन के स्तर पर जरूर एक तरह का उच्चस्तरीय स्थानापन्न है। निराला 1921 में लिख चुके थे-

चाट रहे जूठी पत्तल/ वे सभी सड़क पर खड़े हुए,
और झपट लेने को उनसे कुत्ते भी हैं अड़े हुए!

प्रेमचंद 1936 में कफन में कबीर को उद्धृत करते हैं- ‘ठगिनी क्यों नैना झमकावै’ और निराला फिर 1937 में लिखते हैं-  ‘जो मार खा रोई नहीं, / सजा सहज सितार’

और, 1940 में सुमित्रा नन्दन पंत भी लिख रहे हैं-

‘तीस कोटि संतान नग्न तन,

अर्ध क्षुधित, शोषित, निरस्त्र जन,

मूढ़, असभ्य, अशिक्षित, निर्धन

जैसा कि विष्णु खरे ने 1 मई के नवभारत टाइम्स में लिखा है – ”प्राण को दादासाहेब फाल्के सम्मान देना सही हो सकता है लेकिन बलराज को वह इसीलिए नहीं दिया गया कि वे कम्युनिस्ट थे तो वह सरासर अन्याय है।” कफन को कमतर  आँकने में भी कहीं अनजाने यही तर्क तो काम नहीं कर गया कि प्रेमचंद ने ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ के पहले अधिवेशन का उद्घाटन भाषण दिया था।
इस आत्मीय बातचीत में व्यक्तित्व की जो प्रांजलता दिखती है, वह आज छीजते-छीजते दुर्लभ ही हो गयी है। व्यक्तित्व की इस प्रांजलता के कारण ही लगता है कि ये दोनों महान विभूतियाँ अपने अंतर्विरोधों के साथ इस वार्तालाप में प्रस्तुत हैं और ऐसे अंतर्विरोध भी भावी पीढिय़ों के लिए थाती हैं। @ उदयशंकर

बलराज साहनी

बलराज साहनी

पण्डितजी,

हमारी जान-पहचान को अब 25 बरस से अधिक समय हो चुका है। समय की इस बड़ी-सी गठरी का यह तकाज़ा है कि हम सीधी दिल की बात सच्ची और खरी-खरी एक-दूसरे के साथ कहने से न झिझकें। आपकी स्पष्टवादिता से मुझे और अन्य पाठकों को भी लाभ पहुँचेगा। इसी आशा से मैंने ‘नई कहानियाँ’ के प्रश्नोत्तरी आमन्त्रण को स्वीकार किया है। अब आपसे पहला सवाल पूछता हूँ। आशा है आप मेरी विनम्र विनती पर ध्यान देंगे।
शान्तिनिकेतन में आपने मुझे पहली बार जुलाई 1937 में देखा था। मैं कलकत्ता से अपने मित्र स.ही. वात्स्यायन का आपके नाम परिचय-पत्र लेकर आया था। आप उन दिनों हिन्दी भवन की इमारत की तकमील का इन्तज़ार कर रहे थे और किसी दूसरे घर में रह रहे थे। वह घर मुझे याद नहीं आ रहा है, धुँधला-सा याद आता है, क्षिति दा के घर के कहीं  निकट था, बताने की कृपा करें। ठीक मकान को याद करके मुझे और भी बहुत-सी बातें याद आएँगी।
जिस समय मुझे नौकरी दी गई थी, उस समय शान्तिनिकेतन की आर्थिक स्थिति बहुत-कुछ गिरी हुई थी। मुझे रख लेने की गुरुदेव की उदारता और आपके हामी भरने पर अन्दर-ही-अन्दर प्रबन्धकों की ओर से विरोध किया गया होगा। क्या सचमुच ऐसा कोई विरोध उठा था? आपने उसका कैसे मुकाबला किया? मेरे अध्यापक बनने के तीसरे या चौथे दिन बोलपुर की हिन्दी सभा के तुलसी जयन्ती समागम के लिए आपने मुझे सभापति बनाकर भेज दिया, जबकि आपको तब तक मालूम हो चुका था कि मेरा हिन्दी-साहित्य या विशेषकर तुलसी-साहित्य के सम्बन्ध में परिचय न के बराबर था। क्या आपको उस समय खयाल नहीं आया कि मैं उन लोगों के सामने अपनी मूर्खता का प्रदर्शन करके शान्तिनिकेतन और हिन्दी विभाग को भी लज्जित करूँगा? आपने मुझे क्यों भेजा, चन्दोलाजी को क्यों नहीं भेज दिया?
उन दिनों आपको यह भी ज्ञात हो चुका था कि अंग्रेजी को छोड़ मैं भारत की किसी भाषा में भी सहज प्रवाह के साथ नहीं बोल सकता था, अपनी मातृभाषा पंजाबी में भी नहीं। यदि आप मुझे छोटी कक्षाएँ दे देते तो मैं काम-चलाऊ भला बुरा अध्यापक बन जाता। पर आपने तो पड़ते ही मुझे बी.ए. फाइनल क्लास को हिन्दी उपन्यास पर व्याख्यान देने पर लगा दिया। क्या आपका विचार था कि अपनी अयोग्यता का उचित एहसास जल्दी हो जाने से मैं शान्तिनिकेतन छोड़कर भाग खड़ा होऊँगा?
या क्या मैं इस अयोग्यता को जल्दी-से-जल्दी दूर करने में जुट जाऊँगा?
आपको याद होगा जब मैं यह क्लास ले रहा होता था तो आप विद्या भवन की खिड़की में बैठे दूर से मेरी वेदना देख रहे होते थे। उस समय आपके मन में कौन से विचार उठ रहे होते थे?
मेरे सौभाग्य से आपकी और भगवतीप्रसाद चन्दोलाजी के स्नेह-भरे प्रोत्साहन से मेरी नाव डूबने से बच गई थी। फिर भी आपने देखा होगा कि उस अल्हड़ उम्र में मेरे दिमाग पर अंग्रेज़ी साहित्य ही छाया हुआ था। हिन्दी तो दूर, मैं बंगला और स्वयं गुरुदेव के साहित्य को भी किसी गिनती में नहीं लाता था। फिर आपने यह भी देखा होगा कि हिन्दी की तुलना में मैं उर्दू का ज्यादा प्रशंसक था। क्या इस बात पर आपको गुस्सा नहीं आता था। अगर आता था तो आपने कभी जाहिर क्यों न किया?
यह आखिरी सवाल शायद आपके लिए मुश्किल होगा, पर चिन्ता न करें, अगर आपने 25 प्रतिशत नम्बर भी हासिल कर लिये तो मैं आपको पास कर दूँगा (आपकी उन दिनों मेरे प्रति की गई लिहाजदारियों को ध्यान में रखते हुए)।
आपको याद होगा 1937-38 के दिनों में एक प्रगतिशील आन्दोलन चला था। आपकी उसके साथ कोई सहानुभूति नहीं थी। इसका कारण उस समय मेरी समझ में नहीं आता था। पर अब मैं उस समय के आपके दृष्टिकोण की सच्चाई को अधिक गम्भीरता से समझ सकता हूँ। वास्तव में अपने को अपने देश के प्राचीन संस्कृति-पक्ष से काट लेने में ही प्रगतिशील साहित्य-सर्जना के प्रथम लक्षण देखने में आए थे। इन लोगों का चिन्तन अँग्रेजी साहित्य के नवीनतम प्रयोगों की नकल करना चाहता था, पर देश की राजनीतिक दासता इसे खुलेआम अंगीकार करने के रास्ते में बाधक थी। इसी कारण उन्होंने अपने अचेतन मनोरथ को छिपाने के लिए ऊपर से मार्क्सवाद का मुलम्मा चढ़ा लिया था, हालाँकि उस समय उनका क्रियाकलाप मार्क्सवाद के सिद्धान्तों के साथ कहीं भी मेल नहीं खाता था। वर्ग-भेद और वर्ग-संघर्ष का नारा बुलन्द करने के पीछे भारत के मज़दूर-किसान के जीवन को और स्वतन्त्रता-संग्राम में उनकी प्रभावशाली भूमिका को यथार्थ और रचनात्मक ढंग से आँकने की कोई भावना नहीं थी, बल्कि इस बहाने समाज की गन्दगी और निम्न वर्ग के जीवन को कुरूप तथा विकृत रूप में उछाला गया।
प्रेमचन्द की कहानी ‘कफन’ की, जो कुछ लोग कहते हैं कि प्रेमचन्द ने इन्हीं प्रगतिवादियों के प्रभाव के नीचे लिखी थी, उन दिनों खूब वाह-वाह की गई थी। मुझे याद है कि आपको यह कहानी तनिक भी पसन्द नहीं थी, और आप इसे प्रेमचन्द के साहित्य का सगुण प्रतीक मानने के लिए बिलकुल तैयार नहीं थे।
आज इतने सालों के बाद मैं इस बात को अपना कर्तव्य समझ स्वीकार करना चाहता हूँ कि आप सच कह रहे थे। ‘कफन’ प्रेमचन्द की एक गौण कहानी है, जिसमें उन्होंने पहली बार अपने देश के मनुष्यों को ऐसे ढंग से पेश किया है जिससे भारत-निन्दक मिस मेयो के नक्शेकदम पर चलने वाले साम्राज्य-समर्थक अंग्रेज, अमरीकी और पश्चिमी लेखकों के बयानों को समर्थन मिलता है।
ऊपर मैं उस वक्त के अपने पिछले और अंग्रेज़ी-परस्त साहित्यिक दृष्टि-कोण का वर्णन कर चुका हूँ। प्रगतिवादी धारा से एकदम और बिना सोचे-समझे प्रभावित हो जाने का अपने बारे में यही कारण मेरी समझ में आता है।
उपरोक्त उच्छृंखलता उस ज़माने के प्रगतिवादियों के व्यक्तिगत जीवन में भी छलकती थी।
इन बातों को घटे एक युग बीत चुका है। मैं यह भी जानता हूँ कि अपने को प्रगतिशील कहने वालों में बहुत से अब भी वैसे हैं जिन्होंने अपने पुराने कुसंस्कारों से अपने को मुक्त नहीं किया है। उन्होंने इस संस्था को केवल एक गुर के रूप में इस्तेमाल किया है, और उनकी असफता साहित्य-क्षेत्र में उनकी गौण उपलब्धि से स्पष्ट हो जाती है।
पर कुछ ऐसे भी है जिन्होंने समय के साथ-साथ अपने साहित्य मूल्यों को सच्चाई और निडरता के साथ जाँचा है और परीक्षण किया है, और उत्तम, सजीव साहित्य निर्माण करने की दिशा में अग्रसर हुए हैं। उन्होंने नेहरू की भाँति गहराई से अनुभव किया है कि मार्क्सवाद वास्तव में साहित्यकार को अपने देश की परम्पराओं से काटना नहीं सिखाता, बल्कि उसके साथ जोडऩा और उनके उत्तम अंशों को निखारना और विकसित करना सिखाता है। यह हमारे प्राचीन दर्शनशास्त्र का दुश्मन नहीं है, बल्कि उसी के गर्भ में से जन्म लेनेवाला एक नवीन दर्शन है, जिसके अन्दर आज के ज़माने का युगसत्य कहलाने की सामथ्र्य है। मार्क्सवादी विचारधारा, कट्टरपन्थी गुटबन्दियों की मित्र नहीं बल्कि सख्त दुश्मन है। रूढि़वाद और मार्क्सवाद का आपस में कोई मेल नहीं है।
साहित्य-साधना भी एक पवित्र तीर्थ है। यहाँ व्यक्ति राग-द्वेष से रहित होकर ही सत्यं, शिवं, सुन्दरं के साथ अपनी वृत्तियों का मेल बिठा सकता है। यदि इन विचारों से व्यक्ति मुक्त न हो तो अपना भी उतना ही नुकसान कर बैठता है जितना दूसरे का। और एक पुराने मित्र की हैसियत से मैं यह कहने का साहस किये बिना नही रह सकता कि व्यक्ति-पक्षपात में फँसकर हम सबने अपना बहुत-सा नुकसान किया है और अपने वास्तविक लक्ष्य से दूर चले गये हैं। मैं आपसे पूछना चाहता हूँ: आप प्रगतिवाद को अब किस रूप में देखते हैं? क्या आपके मन में अब भी प्रगतिवाद के प्रति उसी प्रकार की अरुचि है? क्या आप समझते हैं कि हिन्दी-साहित्य के क्षेत्र में वादविवाद और व्यक्तिगत गुटबन्दी समाप्त हो सकती है? मैं समझता हूँ कि ऐसा हो सके तो हिन्दी साहित्य बड़े लम्बे डग भरकर केवल भारत के ही नहीं बल्कि संसार-भर के साहित्य के साथ बड़े थोड़े काल में शाना-ब-शाना खड़ा होने के योग्य हो सकता है, और मैं यह भी कहने का साहस करता हूँ कि इस शुभ काम में आप, अज्ञेय, पन्तजी और यशपालजी जैसे प्रतिभाशाली और अनुभवी व्यक्ति बहुत बड़ी भूमिका अदा कर सकते हैं। नई पौध को इन समस्याओं और विचारों से बचा सकते हैं जिनमें से हमारी पीढ़ी गुज़री है। आप अपने जीवन-अनुभव के आधार पर उनका मार्गदर्शन कर सकते हैं। मैं स्वयं मुद्दत से साहित्यिक क्षेत्र से बहुत-कुछ बाहर रह रहा हूँ, बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि मार्क्सवाद और गुरुदेव टैगोर के शिक्षण, दोनों ने मिलकर मुझे अपनी मातृभाषा पंजाबी के चरणों में भेज दिया है, पर हिन्दी साहित्य के साथ मेरा पुराना प्यार है, और उसे विकास पाते देखने की मेरी आन्तरिक अभिलाषा है। इसीलिए आपसे यह कठिन प्रश्न पूछा है। आशा है सवाल की लम्बाई के लिए आप मुझे क्षमा कर अपने गम्भीर और धैर्यपूर्ण स्वभाव के अनुसार उत्तर देने का कष्ट करेंगे।
विनीत

बलराज

पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी

पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी

प्रिय भाई बलराज जी,

आपकी लम्बी प्रश्नावली भाई भीष्मजी ने मेरे पास भेजी है और अनुरोध किया है कि मैं उसका जवाब लिखकर उन्हें भेज दूँ। इन प्रश्नों का उत्तर देने के पहले थोड़ा भूमिका के रूप में कह लेना इसलिए आवश्यक है कि आपने अपनी प्रश्नावली की भूमिका में कुछ डरा देनेवाली बातें लिख दी हैं। बहुत जल्दी ही हम दोनों के परिचय के तीस वर्ष पूरे हो जाएँगे। इस बीच हम दोनों में थोड़ा-बहुत परिवर्तन भी हुआ ही होगा, लेकिन इन प्रश्नावली को देखकर ऐसा लगता है कि आप कुछ अधिक बुद्धिमान हो गए हैं और मैं जहाँ-का-तहाँ हूँ। आपकी बुद्धिमत्ता का पहला प्रमाण यह है कि बातचीत करने से पहले आपने शर्त लगा दी है कि बातें खरी-खरी होंगी, अर्थात् कोई बाद में अपनी कही बात से मुकर नहीं सकेगा। आजकल अखबारों में विभिन्न दलों और देशों के नेताओं में हुई बातचीत के जो विवरण छपते हैं उनमें इस प्रकार की शर्त प्राय: देखी-सुनी जाती है, अर्थात् यह परिपक्वता का लक्षण है। इससे पहले आपसे हमारी बीसियों बार बातचीत हो चुकी होगी, लेकिन, न कभी आपने और न मैंने खरी-खरी बात करने की प्रतिज्ञा की। ”बहु धनु ही तोर्यों लरिकाई, कबहुँ न अस रिस कीन गुसाई!” मगर मेरे प्यारे बलराजजी, मैं अब भी यह मानता हूँ कि खरी-खरी कहने की शपथ लेना कोई अच्छी बात नहीं है। जो आदमी बार-बार शपथ खा रहा हो कि मैं साफ-साफ कह रहा हूँ, उसका दिल साफ है कि नहीं, इसके बारे में मुझे बराबर सन्देह रहता है। मेरे अन्दर तो अब यह परिवर्तन हुआ है कि मैं मानने लगा हूँ कि सच्ची सच्चाई जैसी खरी कभी होती ही नहीं जैसी खरी कहने की कसम खानेवाले सोचा करते हैं। बहुत पुराने जमाने में वैदिक ऋषि ने अनुभव किया था कि विधाता ने सत्य का मुख सुनहरे ढक्कन से ढँककर रख दिया है। मनु ने बताया था कि सत्य प्रिय होना चाहिए, यही सनातन धर्म है। सो आपके प्रश्नों का उत्तर देते समय अगर मैं कोशिश करूँ कि यथाशक्ति सनातन धर्म की अवहेलना न करूँ तो क्षमा कीजिएगा। बस, इतनी-सी भूमिका के बाद मैं अब मूल विषय पर आ रहा हूँ।
सन् 1937 में आप जब अज्ञेयजी की चिट्ठी लेकर आये थे तो मैं क्या कर रहा था, यह मुझे याद नहीं। लेकिन इतना मुझे याद है कि आपसे थोड़ी-सी बातचीत करने के बाद ही मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई थी और मुझे लगा था कि मेरे सामने एक सहज-स्वच्छ होनहार युवक खड़ा है, और यदि इस अवसर पर मैं इसकी सहायता कर सकूँ तो कदाचित् एक अच्छे साहित्यिक को साहित्य-जगत् को दे सकूँगा। मुझे जहाँ तक स्मरण है, आपकी कुछ कहानियाँ छपी थीं और आपने मुझे पढऩे को दी थीं। एक नाम तो अब भी याद है ‘जीजाजी का स्नान’। यह मुझे बहुत अच्छी लगी थी। बाद में यह जानकर और भी प्रसन्नता हुई थी कि इस कहानी के नायक और कोई नहीं, मेरे प्रिय मित्र चन्द्रगुप्त विद्यालंकारजी थे। उन कहानियों को पढ़कर मैंने मन-ही-मन एक बड़े भावी साहित्यकार की कल्पना कर ली थी। जब आप फ़िल्म की दुनिया में चले गए तो मुझे बड़ी निराशा हुई, क्योंकि दूर-दूर से मेरी ऐसी धारणा बनी हुई थी कि फिल्मी दुनिया में साहित्यकार समाप्त हो जाता है। खरी-खरी कहने की आदत उस समय भी नहीं थी, इसलिए मैंने आपको कुछ लिखा नहीं। लेकिन आपको याद होगा कि ‘दो बीघा जमीन’ में आपका अभिनय देखने के बाद मैंने आपको एक पत्र लिखा था, जिसमें लिखा था कि आपने फ़िल्म-जगत् में जाने से मुझे बड़ी निराशा हुई थी, परन्तु ‘दो बीघा ज़मीन’ में आपका अभिनय देखने के बाद मैंने अपना विचार बदल दिया है। उस अभिनय के देखने के बाद मुझे लगा था कि अगर मैंने शुरू-शुरू में खरी-खरी कहकर आपको इस क्षेत्र में जाने से रोकने का प्रयत्न किया होता तो बड़ी गलती की होती। मुझे याद आया कि एक बुजुर्ग साहित्यकार ने आपको शुरू-शुरू में निरुत्साहित भी किया था और उपदेश की मार खाकर ही आप कलकत्ता में शान्तिनिकेतन पहुँचे थे।
खैर, यह तो अवान्तर बात हुई। शुरू-शुरू में मैंने शान्तिनिकेतन में आपको पहचान अवश्य लिया था, लेकिन अपनी ही सीमाओं के कारण मैं आपके भविष्य की कल्पना ठीक-ठीक नहीं कर पाया था। उन दिनों मैं जब किसी के भविष्य को उज्जवल समझता था, तो यही कल्पना किया करता था कि वह प्रेमचन्द, गोर्की, टॉलस्टाय जैसा कुछ होगा। अभिनय के क्षेत्र में कोई बहुत बड़ा हो सकता है, यह मेरी कल्पना नहीं थी। लेकिन मैं अब भी कभी-कभी मन-ही-मन में सन्तोष अनुभव करता हूँ कि पहचानने में मुझसे चूक नहीं हुई थी। मेरे पास उस समय आपको देने योग्य काम वहीं था। मेरा क्षेत्र सीमित था, शक्ति उससे भी अधिक सीमित। मैंने बच्चों को पढ़ाने का काम देने में बड़ी झिझक और संकोच अनुभव किया था। लेकिन आपने इसे इस प्रकार लिया जैसे चारों पदार्थ मिल गए हो आपको उस स्थान पर रखने में मुझे कोई कठिनाई नहीं हुई थी। गुरुदेव मेरी बातें मान लेते थे और आपको देखकर तो वे भी बहुत प्रसन्न हुए थे। आपको यदि बताऊँ कि आपकी ‘क्वालिफिकेशन’ मैंने गुरुदेव को क्या बताई थी तो आपको आश्चर्य होगा। मैंने उनसे बड़े घटाटोप के साथ कहा — ”यह लड़का पंजाब यूनिवर्सिटी से अंग्रेजी में एम.ए. है, लेकिन छोटे-से-छोटा काम करने में आनन्द अनुभव करता है। हिन्दी की परम्पराओं से एकदम अपरिचित है और इसीलिए इसके दकियानूस होने की कोई संभावना नहीं है। आश्रम में कुछ दिन रहने के बाद बहुत अच्छा साहित्यिक हो सकेगा।” गुरुदेव का चेहरा दमक उठा, बोले, ”पका बाँस लेकर मैं क्या करूँगा? कच्चा ही अच्छा है जिसे अपने मन के अनुसार सुखाकर आश्रम के अनुकूल बनाया जा सके।”
मैं शुरू से ही ऐसा विश्वास करता आया हूँ कि हिन्दी में ऐसे नवीन प्रतिभाशाली लोगों के आने की आवश्यकता है जो विभिन्न शास्त्रीय मर्यादाओं के भीतर से गुजरे हुए हैं। केवल हिन्दी की अपनी शास्त्रीय मर्यादा के भीतर से जो लोग आये हैं वे भी साहित्य-सेवा के लिए उपयुक्त ही हैं, लेकिन वे ही एकमात्र अधिकारी हैं, ऐसा मैं नहीं मानता। आपको चुपके से यह बता देना चाहता हूँ (बिलकुल जनान्तिक में) कि मैं अपने साथियों और मित्रों को एक नारा देने लगा हूँ — ”save hindi from medrevalism” (हिन्दी को मध्ययुगीन मनोवृत्तियों से बचाओ)। आप जिन दिनों की बात कर रहे हैं उन दिनों मेरे मन में यह बात स्पष्ट नहीं थी, लेकिन थी ज़रूर। मुझे ऐसा लगता है कि आपको चुनने में मेरे मन की भावना अवश्य काम कर रही थी। मैं चाहता था (और अब भी चाहता हूँ) कि हिन्दी के विद्यार्थी विभिन्न भाषाओं के साहित्यिक अनुशासन (डिसिप्लिन) में शिक्षित लोगों का दृष्टिकोण समझें और यदि सम्भव हो तो वे लोग भी बिलकुल संस्कार-मुक्त होकर हिन्दी की विभिन्न साहित्यिक विधाओं और व्यक्तियों पर अपना मत प्रकट करें। यही कारण है कि मैं हिन्दी के विद्याथियों के सामने बंगला, उर्दू, संस्कृत और अंग्रेजी के जानकारों को ले जाया करता था। आपसे हमारे विद्यार्थी आधुनिक दृष्टि पा सकें, यह मेरी आशा थी और निस्सन्देह मेरी आशा फलवती हुई थी। आपको हिन्दी की गतिविधि से परिचित कराना मेरा एक और उद्देश्य था और आप जब हिन्दी की लम्बी शब्द-सूची लेकर मेरे पास आते थे तो मुझे बेहद खुशी होती थी। मुझे याद है कि बोलपुर वाली सभा में सभपातित्व करने के  पहले आप तुलसीदास के बारे में जानने के लिए कितना छटपटा रहे थे। आपकी छटपटाहट से मुझे एक प्रकार का दुष्टता-भरा मजा आ रहा था। यह तो मैं कभी नहीं चाहता था कि आप शान्तिनिकेतन छोड़कर चले जाएँ। वस्तुत: आपके शान्तिनिकेतन छोड़ जाने से मुझे जितना कष्ट हुआ उतना और किसी घटना से नहीं हुआ था। लेकिन यह मेरी हार्दिक इच्छा थी कि आपके समान प्रतिभाशाली आधुनिक मनोवृत्ति के युवक को कुछ पुरानी परम्परा के रसास्वादन का भी चस्का लगा दूँ। मेरा विश्वास है कि वह चस्का, थोड़ी मात्रा में ही सही, लगा अवश्य था।
प्रिय बलराजजी, पाँचवें प्रश्न में आपने कुछ ऐसी बात पूछी है जिसका उत्तर देना वस्तुत: अपने-आपको ही समझने का प्रयास है। केवल आपके बारे में ही नहीं, और कई प्रसंगों में मैंने ऐसा पाया है कि जो लोग हिन्दी की या मेरी विचार-पद्धति की उपेक्षा करते हैं वे मुझसे बहुत अधिक प्यार पा चुके हैं। मैं भरसक प्रयत्न यह करता हूँ कि घृणा किसी से न करूँ, लेकिन मेरे जीवन में ऐसे भी बहुत-से मित्र आए हैं जो हिन्दी की उपेक्षा और मेरी विचार-पद्धति का विरोध करने के कारण मुझसे दूर हो गए हैं, अर्थात् मैं उन्हें अपना प्रेम नहीं दे सकता हूँ। बहुत-से मेरे ऐसे मित्र हैं जो मेरी बातों का विरोध करते हैं और फिर भी मेरे घनिष्ठ मित्र हैं और बहुत-से ऐसे भी हैं जो बहुत दूर तक मेरे समान विचार रखनेवाले हैं, फिर भी मैं उन्हें अपना निकट का मित्र नहीं मान पाता। इसका कारण किसी बाहरी आदर्श या सिद्धान्त में न होकर मेरी प्रकृति में ही होना चाहिए। कई बार मैं स्वयं अपने इस ढंग से परेशान हुआ हूँ, लेकिन अब मैंने समझा है कि यह बात न तो मेरा गुण है न दोष। यह स्वरूप है। स्वभाव, अर्थात् अपना भाव — something  particularly my own. आपके इस पत्र के पढऩे से पहले, मैंने इस विषय पर गम्भीरता से नहीं सोचा। आज सोचने को बाध्य हुआ। ऐसा लगता है कि मुझे जो चीज आकृष्ट करती है, ईमानदारी है। जो चीज़ मुझमें नहीं है, वह जब दूसरों में देखता हूँ तो प्रभावित होता हूँ, आकृष्ट होता हूँ। इतना और भी कह दूँ कि जिस ईमानदारी की बात कह रहा हूँ, वह मेरे अपने दृष्टिकोण से देखी हुई सच्चाई है, जिसके लिए किसी वादविवाद या बहस की गुंजाइश नहीं है। मैं समझता हूँ कि इतना कह लेने के बाद आपके प्रश्न का उत्तर देना अब आवश्यक नहीं रह गया।
आपने अन्तिम प्रश्न को स्वयं बहुत कठिन बताया है और मुझे आश्वासन दिया है कि पच्चीस प्रतिशत अंक मिलने पर भी आप पास कर देंगे। वस्तुत: यह प्रश्न उतना कठिन नहीं है। मुझे कुछ ऐसी आदत-सी पड़ गई है कि जिस बात को नहीं समझता उसके बारे में बोलता ही नहीं। परन्तु मेरे मौन रहने का मतलब विरोध प्रकट करना नहीं होता। उन दिनों प्रगतिवाद का नया आन्दोलन चला था और बात पूरी तरह से मेरी समझ में नहीं आ रही थी। मैं समझने की कोशिश कर रहा था।
जो बात मेरी समझ में नहीं आ रही थी वह यह थी कि विदेशी भाषा के माध्यम से विदेश के इतिहास से ग्रहण की हुई भावधारा को प्रकट करने वाले लोग कैसे प्रगतिवादी हुए? प्रगतिवाद को मैं इतिहास की माँग समझता हूँ। वह रटी-रटाई शब्दावली से नहीं बल्कि हमारे रक्त मांस से निकलकर ही सहज ग्राह्य हो सकता है। हमारा देश कोई नौसिखुआ देश नहीं है। हमारी सहस्त्रों वर्ष की वैचारिक परम्पराएँ हैं जिनकी जड़ें बड़ी गहराई तक गई हुई हैं। हम प्रगतिवाद के नाम पर उन दिनों जो कुछ लिख रहे थे वह हमारे लिए सहज और स्वाभाविक नहीं था। बनावटी और अलग-थलग वस्तु थी। शुरू मैं ही कह चुका हूँ कि मैं खरी-खरीवालों के दल में नहीं हूँ। इसलिऐ जो चीज अच्छी न लगे, उसके खिलाफ तुरन्त कुछ लिखकर दिल के गुब्बार निकालने में मेरा एकदम विश्वस नहीं है। सो मैं इस विचारधारा को यथाशक्ति समझने का प्रयास करता रहा हूँ और जहां तक याद है सन् 1944-45 से पूर्व उसके बारे में कुछ नहीं लिखा। जिन दिनों सभी लोग कहते थे कि ‘कफन’ प्रेमचन्दजी की सबसे अच्छी कहानी है, दिनों यह बात मेरे गले के नीचे नहीं उतर पा रही थी। लेकिन आप-जैसे एक-आध अंतरंग मित्र को छोड़कर अपने मनोभावों को बाहर प्रकट नहीं होने दिया। आज मैं प्रेमचन्द को उन दिनों की तुलना में कदाचित् अधिक अच्छी तरह समझ पाता हूँ और अपने विचारों को भी अधिक स्पष्ट रूप से समझ पा रहा हूँ।
जैसा कि मैंने ऊपर लिखा है, प्रगतिशील चिन्तनधारा को मैं युग की माँग मानता हूँ। आधुनिक युग के तीन चरण बीत चुके हैं। मध्यकालीन मनोवृत्ति से मनुष्य की मुक्ति के तीन पद-चिन्ह स्पष्ट हो गये हैं, पहला यह कि मनुष्य किसी परलोक में या परजन्म में मुक्ति पाने की बात अब नहीं सोचता। इसी लोक में, इसी मत्र्यकाया में वह सब प्रकार के आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक बन्धनों से मुक्त होने को अधिक महत्वपूर्ण मानने लगा है। दूसरा यह कि मनुष्य ने ऐतिहासिक चेतना को सर्वथा अपना लिया है। सब-कुछ विकास-परम्परा के भीतर से गुज़रता आया है, गुज़रता रहेगा — धर्म भी, ईश्वर भी। इस ऐतिहासिक बोध ने हमें पुराने साहित्य और कलाकृतियों को समझने की नई स्वस्थ दृष्टि दी है। हम इतिहास के एक विशेष बिन्दु पर अपने को रखकर तात्कालिक परिप्रेक्ष्य में तुलसीदास को समझ सकते हैं, रसास्वादन कर सकते हैं, परन्तु साथ ही यह निश्चित रूप से मानते हैं कि हमारी सारी प्रशंसा और रसग्राहिता के बावजूद ऐसा ही लिखना आज के युग के लिए उपादेय नहीं भी हो सकता है। ऐतिहासिक चेतना ने हमें मध्यकालीन मनुष्य से बिल्कुल भिन्न बना दिया है। यह अधिक रूढि़मुक्त और स्वतन्त्र विचार के हो गए हैं। तीसरा चिन्ह है व्यष्टि मुक्ति के स्थान पर समष्टि मुक्ति की धारणा। हम यह अनुभव करने लगे हैं कि किसी एक व्यक्ति को भय, शोक, मोह आदि से मुक्त करना पर्याप्त नहीं है। पूरे-के-पूरे समाज-मानव को ही शेषण के भय और मोह से मुक्त करना हमारा उद्देश्य होना चाहिए। प्रच्छन्न रूप से और हमारे अनजान में यह विचारधारा सारे संसार में व्याप्त हो रही है। इसी का परिणाम है कि दुनिया का हर देश, चाहे वह डिक्टेटरशाही के अधीन ही क्यों न हो, अपने को कल्याणकारी राज्य या welfare state समझने में गौरव अनुभव करता है। सवाल यह नहीं है कि वह welfare state है या नहीं। यहाँ मेरा उद्देश्य उस वैचारिक क्रान्ति की ओर ध्यान आकृष्ट करना है जो जाने-अनजाने संसार-भर में क्रियाशील है। जो साहित्य प्रगतिशील होता है उसमें ये तीनों चिन्ह अवश्य विद्यमान रहते हैं। जो लोग व्यक्तिगत कुण्ठा को प्रगति समझते हैं या अपनी चरित्रगत कमजोरियों को ही प्रगति मान लेते हैं, वे नितान्त व्यक्तिवादी हैं। उनकी रचनाओं में मध्यकालीन मनोवृत्ति से मुक्ति का कोई लक्षण नहीं मिलता। उन लोगों को मैं प्रगतिशील नहीं मानता बल्कि सच पूछिये तो उन्हें साहित्यकार भी नहीं मानता। मेरे अब तक के कथन का अर्थ यह न समझिएगा कि मेरे विचार में दीर्घकाल से संचित और अर्जित मानवीय मूल्य बेकार हो गए हैं। बिलकुल नहीं। केवल उनका परिप्रेक्ष्य और विनियोग बदला है। मनुष्य ने दीर्घकाल की साधना से जो कुछ पाया उसमें इतना और जुड़ गया है। घर में अच्छे व्यक्तित्व वाले एक बच्चे के और आ जाने से परिवार के व्यक्तिगत सम्बन्धों में भी परिवर्तन आ जाते हैं। यहाँ तो मानवता की गोद में तीन-तीन शानदार व्यक्तित्व वाले बच्चे आ गए हैं। इसलिए सम्बन्ध तो बदलेंगे ही, बदलते ही रहते हैं। इस बार जरा ज़्यादा बदलाव अनुभव हो रहा है।
जो लोग केवल आखिरी किनारे को जानते हैं वे सही अर्थों में प्रगितिशील नहीं हैं और जो उसके शुरू या बीच के किनारों को ही जानते हैं वे भी नहीं है। प्रगतिशील चिन्तन सम्पूर्ण इतिहास की देन है। इसीलिए हर साहित्यकार से इतिहास उसकी माँग करता है।
दलबन्दी बुरी बात है। साहित्य के क्षेत्र में और भी बुरी है, लेकिन अस्वाभाविक नहीं है। किसी शक्तिशाली व्यक्तित्व के इर्द-गिर्द प्रभावित लोग अनादिकाल से इकट्ठे हो जाते रहे हैं और साहित्य में, धर्म में, राजनीति में दल बनाने का सूत्रपात करते हैं। ये दल पहले भी बन चुके हैं, अब भी बन रहे हैं और आगे भी बनेंगे। मगर आजकल हम लोग इनसे जितना चिन्तित हैं उतना कदाचित् पहले के लोग चिन्तित नहीं हुआ करते थे। आज भी जो लोग मध्ययुगीन मनोवृत्ति के हैं वे अपेक्षाकृत कम परेशान होते हैं। जिनके मन में ऊपर बताये हुए तीन लक्षण अधिक स्पष्ट हो गए होते हैं वे ही अधिक चिन्तित होते हैं। क्योंकि श्रद्धा या अन्धश्रद्धा के आधार पर गठित दल न हो ऐतिहासिक बोध के अनुकूल पड़ता है और न समष्टि चेतना के। मुझे ऐसा लगता है कि साहित्य में इन दिनों जो दलबन्दियाँ हो रही हैं वे साहित्यिक उपलब्धियों से उतना सम्बद्ध नहीं हैं जितना अन्य प्रकार की बातों से। जैसे-जैसे मनुष्य की छोटी-बड़ी भौतिक आवश्यकताओं को आसानी से पूरी करने के साधनों पर समष्टि-मानव का अधिकार बढ़ता जाएगा, वैसे-वैसे इन दलबन्दियों का डरावना और कुत्सित रूप सड़ता जाएगा और स्वस्थतर रूप प्रकट होते जाएँगे। इनको दूर करने के प्रयत्न का अर्थ है मनुष्य को अभाव और अज्ञान से मुक्त करने का प्रयत्न।
प्रिय बलराजजी, मेरा विश्वास है कि मनुष्य एक दिन क्षुद्रताओं से ऊपर अवश्य उठेगा। ये मार-काट, लड़ाई-झगड़े, दलबन्दियाँ और व्यूहबन्दियाँ सब उसी महान् लक्ष्य को प्राप्त करने के प्रयत्नों की कसमसाहट हैं। गुरुदेव की वह बात मुझे याद आती है, जो कुछ इस प्रकार की है — हम लुहार की दुकान पर बैठे हैं। ठाँय-ठाँय, खटर-खटर, गर्दो-गुब्बार देखकर घबराये हुए हैं। लेकिन अगर हमें मालूम हो कि वीणा के तार बन रहे हैं जो तैयार होने पर मधुर ध्वनि ही उत्पन्न करेंगे, तो हमारी घबराहट बहुत कम हो जाएगी। आइये, हम लोग भी विश्वास करें कि वीणा के तार तैयार हो रहे हैं। हम नहीं तो हमारे बच्चे उनसे निकली हुई मधुर ध्वनि को अवश्य सुनेंगे।
मैं सोच रहा हूँ कि मेरी इस बात को सुनने के बाद आप कहीं हँसने न लगें. यह न समझने लगें कि उन्नीसवीं शताब्दी के स्वप्नदर्शियों के भग्नावशेष आज भी बचे हुए हैं। लेकिन मैं आपको विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि मैं वैसा स्वप्नदर्शी नहीं हूँ। उन्नीसवीं शताब्दी के स्वप्नदर्शी भौतिक विज्ञान की उपलब्धि से झूम उठे थे। मैं अपने को उनसे भिन्न मानता हूँ। भौतिक विज्ञान स्थानगत जानकारियों का विश्लेषण है, जिसे अंग्रेज़ी में special कहते हैं, लेकिन मनुष्य-जीवन कालगत अनुभूतियों का विषय है जिसे अंग्रेज़ी में temporal कहा करते हैं। इतिहास इसी श्रेणी का विज्ञान है। काव्य और संगीत इसी श्रेणी के ज्ञान हैं। मैं वैज्ञानिक विश्लेषण पर आधारित प्राविधिक सफलताओं से ही उल्लसित होकर स्वप्न नहीं देखने लगा हूँ। मेरा विश्वास इतिहास से झनकर आया है।
मैं समझता हूँ आपके प्रश्नों का 25 प्रतिशत पाने लायक उत्तर हो गया है।

– हजारी प्रसाद द्विवेदी, चंडीगढ़ ८-१०-१९६५

पीएचडी के अंतिम वर्ष में जेएनयू के शोध छात्र उदयशंकर ने इसे ‘पहल’ के लिये उपलब्ध कराया है। नई कहानियां नवम्बर 1965 के अंक से साभार।

सहमतिया संप्रदाय: हिन्दी पब्लिक स्फीयर वाया फेसबूक

By उदय शंकर 

‘हिन्दी पब्लिक स्फीयर’ के बारे में शोध करने वालों का तांता लगा हुआ है। वे उस समय के बारे में ज्यादा उन्मुख हैं, जब हिन्दी साहित्य और संवाद की भाषा बन रही थी। किसी भी देश-काल-भाषा के पब्लिक स्फीयर को परिभाषित करने में सबसे बड़ी बाधा या चुनौती उन्हें साहित्य से मिलती है। क्योंकि लेखक अपनी कहानियों/कविताओं/आलोचनाओं के जरिये प्रत्यक्षतः कोई संकेत नहीं छोड़ता है या साफ शब्दों में कहें तो वह कोई उपदेशक या रिपोर्टर नहीं होता है, न रात का और न दिन का। वह समाज के या मम के मर्म का द्रष्टा होता है इसीलिए उसके सहारे समाज की परिधि में नहीं बल्कि हृदय में पहुंचा जाता है। लेकिन, इसे पाने के लिए शोधार्थी की योग्यता में सब्र, सहिष्णुता, तीक्ष्णता और संवेदनशीलता जैसे गुणों का रहना लगभग अपरिहार्य है। यह अकारण नहीं है कि उस हिन्दी पब्लिक स्फीयर को अगर किसी एक मात्र आलोचक ने पकड़ने की कोशिश की है तो वह हैं श्री रामविलास शर्मा। लेकिन इतना श्रमसाध्य (मानस के साथ) अभ्यास कोई काहे को करेगा। इसलिए चालू शोधार्थी  अक्सर कुछ उत्तेजक/विवादोन्मुख चिट्ठी-पत्री के जुगाड़ में लगा रहता है। जैसे ही वह उसके हाथ में आती है, उसकी कलम यूरेका-यूरेका बहने लगती है। हिन्दी पब्लिक स्फीयर की चर्चित-अनूदित पुस्तकें इसी यूरेका-यूरेका की गूँज से गुंजयमान हैं।

धन्यवाद गूगल जी

धन्यवाद गूगल जी

यह तो एक भूमिका थी। मैं सोच रहा था कि आज से 100 साल बाद यदि कोई शोधार्थी इस समय के हिन्दी पब्लिक स्फीयर पर बात करेगा तो, वो सबसे पहले क्या ढूंढेगा (उम्मीद है कि उस समय भी रामविलास शर्मा जैसे एक-दो ही होंगें, इसलिए ऐसे लोगों की साहित्योन्मुख अभिरुचियों को छोड़ ही दिया जाय)! मुझे लगता है जो अनूदित-चर्चित किताबें होंगी उनमें हिन्दी लेखकों के फेसबूक स्टेटस की बहुत चर्चा होगी(क्योंकि यह सीआईए के आर्काइव में सुरक्षित होगा)। फेसबूक प्रोफ़ाइलस को हासिल करने के लिए शोधार्थी सीआईए में जुगाड़ बैठाएगा, घंटों एक-एक प्रोफ़ाइल को गंभीरता से सालों तक पढ़ता रहेगा और फिर कुछ निष्कर्षों या समस्या-समाधानों के साथ अपना शोध सम्पन्न करेगा। किताब पहले अङ्ग्रेज़ी में छपेगी जिसे सबसे पहले कोई बाबू मुशाय अमेरिका या इंग्लैंड में पढ़ लेगा। फिर वह अनूदित होकर हिन्दी में आएगी। उसमें मुख्य बातें क्या होंगी, वे बिन्दुवार निम्न हैं:

  • हिन्दी में पाँच से दस हजार की संख्या में जागरूक लोग थे।
  • प्रत्येक हिन्दी लेखक के पास एक बंधुआ फोटोग्राफर होता था क्योंकि वे अक्सर फोटो खिंचवाते थे। वे अपनी विदेश यात्राओं की तस्वीरों को शब्दों से ज्यादा महत्वपूर्ण समझते थे, क्योंकि उनके हिसाब से इनमें शब्दों से ज्यादा गूढ रहस्य होते थे। वे विदेश-यात्राओं की तस्वीरों को ही यात्रा संस्मरण समझते थे।
  • हिन्दी लेखक घरेलू किस्म के लोग होते थे, क्योंकि वे फेसबूक पर अक्सर अपनी बीबी, बच्चों और रिशतेदारों की चर्चा करते थे। उनकी लिखी कविताओं, विचारों को प्रमुखता से शेयर करते थे, बात-बात में उन्हें टैग करते थे। वे चाहते थे कि उन्हें जो लोकप्रियता और सामर्थ्य हासिल हुआ है वे उनके परिवार को भी हो।
  • हिन्दी लेखक अंग्रेजी भी जानते थे क्योंकि वे अपने लिखे को या अपने पर लिखे को छोड़कर बाकी सबकुछ  अंग्रेजी में शेयर करते थे। वे साहित्य की भी बातें करते थे इससे पता चलता है कि वे कभी साहित्य भी लिखा करते थे। लेकिन फेसबूक साक्ष्य बताता है कि वे सिर्फ विदेशियों के लिखे साहित्य, जो या तो मूल अँग्रेजी में होता था या अँग्रेजी में अनूदित होता था, को ही पढ़ने लायक और शेयर करने लायक समझते थे। उनके फेसबूक से यह भी पता चलता है कि हिन्दी साहित्य-समाज के बारे में लेखक के अलावा जो आधिकारिक ज्ञाता था वो कोई अमेरीकन/ब्रिटिश या हिंदीतर अंगेजीदां था।
  • किसी एक लेखक के सहारे पता नहीं चलता है कि कोई दूसरा भी लेखक हुआ था, क्योंकि एक लेखक के पास कोई दूसरा लेखक नहीं दिखता है, 4099 या इससे अधिक की संख्या में सिर्फ इनके फ़ालोवर होते थे जो सिर्फ ‘सहमत-सहमत’ नामक एक पारिभाषिक टर्म  का इस्तेमाल करते थे जिसका शाब्दिक अर्थ ‘साथ हूँ’ होता है। इसीलिए कई-एक लेखकों के फ़ेसबूक के तुलनात्मक अध्ययन का सहारा लेना पड़ता है। तीन-चार लेखकों की बानगी लेने के बाद पता चलता है उस समय  ‘सहमतिया’ संप्रदाय बहुत ही लोकप्रिय था क्योंकि 3000 या इससे अधिक सहमतिया लोग हर लेखक के फ़ालोवर थे। इका-दुका लोगों की प्रोफ़ाइल ऐसी दिखी जिनके सहमत कहने का अर्थ ‘सहमतिया’ संप्रदाय के अर्थ से मेल नहीं खाता है।
  • हिन्दी लेखक दुनिया के अन्य भाषाओं के लेखकों की अपेक्षा ज्यादा यौन-संवेदिक हुआ करता था क्योंकि जितनी गंभीरता और संवेदनशीलता से साथ वह महिला फ़ालोवर्स की पोस्ट लाइक करता था या उन पर कमेंट करता था उस संवेदनशीलता को हासिल करने के लिए पुरुष फ़ालोवर अक्सर लीला रूप धारण करते थे ऐसा द्रष्टव्य होता है।
  • प्रत्येक हिंदी लेखक के पास प्रशंसकों की पूँजी होती थी. प्रथमतया वे प्रशंसक कम दलाल ज्यादा दीखते हैं क्योंकि ‘गरीब लेखकों’ के प्रशंसक न के बराबर दीखते हैं. ये सारे दलाल से दिखने वाले प्रशंसक अपने अध्ययन-कार्य क्षेत्र के असफल लोग लगते हैं, क्योंकि इनमें से अधिकांश का स्वाभाविक कर्म-क्षेत्र या अध्ययन-क्षेत्र हिंदी साहित्य नहीं दिखता है. लेकिन इन्हें दलाल कहना इसलिए पुष्ट नहीं होता है क्योंकि लेखक गण इन्हें बहुत ही आदर-सत्कार से स्मरण करते थे. अमेरीकी अनुभव के आधार पर यह भी अनुमान लगाया जा सकता है ये लोग वेतनभोगी प्रचारकर्ता थे. लेकिन यह हिंदी साहित्य की बात है इसीलिए लेखक का वक्तव्य सर्वोपरि माना जाना चाहिये. इससे यह अनुमित होता है कि हिंदी साहित्य का प्रचार साहित्येत्तर और गैर हिंदी जमातों तक सुनिश्चित हो रहा था.

जारी….

 उदय शंकर

उदय शंकर

 

जेएनयू से पीएचडी के लिए शोधरत। तीन खंडों में आलोचक सुरेंद्र चौधरी के रचना संचयन का संपादन। सांस्‍कृतिक आंदोलनों से जुड़ाव। उनसे udayshankar151@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

 

वेलरियन ब्रौव्चेक: प्रगीत विधा का जीनियस फ़िल्मकार

By उदय शंकर 

(यहाँ फ़िल्मकार का कोई मूल्यांकन करने या या उसके फिल्मों को विश्लेषित करने की कोशिश नहीं की गई है। बल्कि एक ऐसे फ़िल्मकार को जिसे भारी उपेक्षा और एक स्तर की बदनामी झेलनी पड़ी उसको याद करने भर की कोशिश है। अभी उसकी फिल्मों को ठीक से पुनर्संयोजित भी नहीं किया जा सका है। अधिकांश फिल्में प्रोड्यूसर के गोदाम में पड़ी बर्बाद हो रही हैं। इधर कुछ जागरूकता बढ़ी है और लोगों ने खोज-खबर लेनी शुरू की है। देखते हैं कितना कुछ बचाया जा सकता है।  लेकिम एक ‘फतवा ‘तो दिया ही जा सकता है कि वेलरियन ब्रौव्चेक जैसा ‘हुनरमंद ‘यूरोपीय सिनेमा के इतिहास में न के बराबर हुये हैं। निम्नलिखित टेक्स्ट के बाद उसकी  शॉर्ट फिल्मों के  कुछ लिंक भी दिये जा रहे हैं। )

walerian Borowczyk

walerian Borowczyk

 एक जीनियस फ़िल्मकार कैसे ताउम्र एक ‘पोर्नोग्राफर’ फ़िल्मकार का खिताब ढोता रहा, उसका एक अद्भुत उदाहरण है- वेलरियन ब्रौव्चेक। वह इस तमगे से कैसे पीड़ित रहा होगा, हम इसकी सिर्फ कल्पना कर सकते हैं क्योंकि इस बावत उसका कोई रक्षात्मक बयान भी सामने नहीं आता है। हालांकि उसके बड़े कैनवास की फिल्मों को ही लोग सिर्फ देखते रहे और आलोचित करते रहे। लेकिन इसमें भी सच्चाई नहीं है। जिस न्यूडिटी को बर्गमैन जैसे फिलकार एक आध्यात्मिक दिव्यता के साथ प्रस्तुत करते हैं, उसी दिव्य-दृष्टि की ‘हिंसक अन्तर्रात्मा’ को पूरी नग्नता के साथ बेलौस होकर वेलरियन ब्रौव्चेक अपनी फिल्मों में प्रस्तुत करता है। यूरोपीय सिनेमा (सोवियत ब्लॉक) का अतिप्रचारित बहुलांश ईसाइत से अनुप्राणित आध्यात्मिक संवेगो से चालित चालाक राजनीतिक फिल्में हैं। इन फिल्मकारों की कम से कम तीन बिंदुओं के आस-पास सहमति थी। मैंने कहीं और भी लिखा था, उसे यहाँ भी दुहराना आवश्यक है-

  • उनमें एक सोवियत विरोधी टोन हमेशा मौजूद है।
  • ईसाइयत-घटाटोप से लैस एक तरह की आध्यात्मिकता भी अधिकांश में आभासित होती रहती है।
  • इनमें म्यूजिक-कंपोजर की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण है, जिनके ऊपर पश्चिमी -संगीत का व्यापक असर है क्योंकि ‘अभिजात’ अवसाद बिना इलेक्ट्रॉनिक म्यूजिक और सिंथेसाइज़र के भरा-पूरा नहीं लगता है।

इन विशेषताओं को एक-एक फिल्मकारों के लिए हम सामान्यकृत भले नहीं कर पाएं लेकिन इनके कारण जो एक भरा-पूरा माहौल बनता है उसकी सामान्य विशेषताओं में मैं इन्हें जरुर पाता हूँ।

इस मायने में वेलरियन ब्रौव्चेक एक सीधा-साधा और नीडर फ़िल्मकार था। राजनीति उसे उतनी ही आती थी जितना किसी भी सामान्य प्रगतिशील इंसान को आती है। उसकी राजनीति के दो बिंदुओं को कोई भी बहुत ही स्पष्टता से पकड़ सकता है-

  • कैथॉलिक चर्च द्वारा सामाजिक जीवन को प्रभावित करने की जो धार्मिक राजनीति थी, उसका वह आजीवन घोर विरोधी रहा। कैथॉलिक चर्च का उतना बड़ा आलोचक यूरोपीय सिनेमा ने दूसरा कोई और नहीं दिया। उसकी फिल्मों में नग्नता का बहुलांश इसी विषय के इर्द-गिर्द वाली फिल्मों में दृष्टिगोचर होता है। क्योंकि आर्थिक संसाधनों पर जब से पूंजीवादी राज्य-शासन-प्रणाली का कब्जा हुआ है तब चर्च जैसी धार्मिक संस्थाएं सांस्कृतिक कार्यव्यवहारों तक सीमित हुयी हैं और उनके इस सांस्कृतिक पूंजी पर सबसे बड़ा हमला अक्सर प्रगतिशील/प्रेमिका महिलाएं करती रही हैं।
  • युद्ध की विभीषकाएँ, परमाणु बम का हमला और किसी भी तरह की सैनिक कार्यवाहियों का एक रचनात्मक विरोध उसकी फिल्मों की बड़ी विशेषता रही है।

  लेकिन जब इस राजनीति के इर्द-गिर्द वह रंग भरता था और उसको गति देता था तो कृष मार्कर जैसे बौद्धिक फ़िल्मकार को भी वह चकित कर देता था, खासकर छोटी फिल्मों में जहां उसकी कला अपने चरम को छू जाती है। उसकी फिल्मों से बौद्धिक उत्तेजना कितनी मिलती है यह बताना पेशेवर बौद्धिकों का काम है। लेकिन हम इतना जरूर कह सकते हैं कि भावना की तारों को  झनझनाने वाले फ़िल्मकार रेयर ही हुये हैं और उसमें वेलरियन ब्रौव्चेक का नाम सबसे पहले सम्मान के साथ लिया जाना चाहिए। कृष मार्कर जैसे बौद्धिक फ़िल्मकार के साथ उसकी दोस्ती मूलतः बुद्धि और भावना का ही योग है। अकारण नहीं है कि पोलैंड से फ्रांस आ जाने के बाद उसने पहली फिल्म Les Astronautes(1959) कृष मार्कर के साथ बनायी। वेलरियन ब्रौव्चेक के प्रति सोवियत संघ कोई उदार था, यह नहीं कह सकते हैंक्योंकि उसकी फिल्म Goto – Island of Love(1968) कम्युनिस्ट पोलैंड में प्रतिबंधित हो चुकी थीं। लेकिन, अभी तक के अवलोकन से मुझे नहीं लगता है कि उसकी फिल्मों का टोन सोवियत विरोधी रहा है। जैसा की मैंने पहले भी कहा कि वह सीधा-साधा कलाकार था और  लेफ्ट बैंक के फ़िल्मकार कृष मार्कर की अपेक्षा बहुत ही कम राजनीतिक था फिर भी उसका मित्र था। लेफ्ट बैंक की फिल्मों को प्रोड्यूस करने वाले ARGO ने उसकी फिल्मों को प्रोड्यूस किया। वह पेंटिंग, लिथोग्राफी, पोस्टर मेकिंग, कॉमिक्स-राइटिंग में निष्णात था। इसलिए वह छोटे कैनवास की फिल्मों का उस्ताद था। जैसे कृष मार्कर की बौद्धिक डाक्यूमेंट्री फिल्मों की विधा को निबंध/लेख कहा जाता है, वैसे ही वेलरियन ब्रौव्चेक की छोटी फिल्मों को प्रगीत की संज्ञा दी जा सकती है, सुगठित और अपनी मारक-क्षमता में अचूक, लिरिकल फिल्में।

The Astronauts (1959) का एक दृश्य

The Astronauts (1959) का एक दृश्य

Once Upon a Time (1957)

Dom(1958)

School (1959)

The Astronauts (1959)

Renaissance(1963)

Games of Angles (1964)

Theater of Mr and Mrs Kabal(1967)

Une Collection Particuliere (973)

  जारी…..

 उदय शंकर

उदय शंकर

जेएनयू से पीएचडी के लिए शोधरत। तीन खंडों में आलोचक सुरेंद्र चौधरी के रचना संचयन का संपादन। सांस्‍कृतिक आंदोलनों से जुड़ाव। उनसे udayshankar151@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

 

 

 

सिनेमा: अभिव्यक्ति का नहीं अन्वेषण का माध्यम: कमल स्वरुप

By  कमल स्वरुप

भारतीय सिनेमा के सौ होने के उपलक्ष्य में अपने तरह का एकदम अलहदा फिल्म-निर्देशक कमल स्वरुप से  ‘हंस- फरवरी- 2013- हिन्दी सिनेमा के सौ साल’ के लिए  उदय शंकर द्वारा लिया गया एक साक्षात्कार

(८०९० के दशक में सिनेमा की मुख्या धारा और सामानांतर सिनेमा से अलग भी एक धारा का एक अपना रसूख़ था. यह अलग बात है कि तब इसका बोलबाला अकादमिक दायरों में ज्यादा था. मणि कौल, कुमार साहनी के साथसाथ कमल स्वरुप इस धारा के प्रतिनिधि फ़िल्मकार थे. वैकल्पिक और सामाजिकसंचार साधनों और डिजिटल के इस जमाने में ये निर्देशक फिर से प्रासंगिक हो उठे हैं। संघर्षशील युवाओं के बीच गजब की लोकप्रियता हासिल करने वाले इन फिल्मकारों की फिल्में (दुविधा, माया दर्पण और ओम दर बदर जैसी) इधर फिर से जी उठी हैं। आज व्यावसायीक और तथाकथिक सामानांतर फिल्मों का भेद जब अपनी समाप्ति के कगार पर पहुँच चुका है, तब इन निर्देशकों की विगत महत्ता और योगदान पुनर्समीक्षा की मांग करता है।

कमल स्वरुप फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टिट्यूट पुणे के1974 के स्नातक हैं। घासीराम कोतवाल(1976), अरविन्द देसाई की अजीब दास्तान (1978), गाँधी(1982), सलीम लंगड़े पर मत रो (1989), सिद्धेश्वरी (1989)जैसी फिल्मों में सहायक निर्देशक, संवाद लेखक, प्रोडक्शन डिजाइनर और शोधार्थी के बतौर इनका रचनात्मक सहयोग रहा है। बतौर निर्देशकनिर्माता कमल स्वरुप ने अभी तक सिर्फ एक फिल्म बनाई हैओम दर बदर(1988), भारतीय उपमहाद्वीप में अपनी तरह की एक मात्र कल्ट फिल्म, फिल्म फेयर पुरस्कार से पुरस्कृत। ओम दर बदर के अलावे कुछ डाक्यूमेंटरी फिल्में भी। दादा साहेब फाल्के और भारतीय फिल्मइतिहास का अद्भुत अध्य्येता। फ़िलहाल दादा साहब फाल्के का महावृतांत रचने में मशगुल।  

Tracing Phalke By kamal swaroop

Tracing Phalke By kamal swaroop

  • प्रश्न एक: भारतीय सिनेमा की एक सदी बीत गई। तो, सबसे पहला सवाल यही कि सिनेमा क्या है? और इस आलोक में भारतीय-सिनेमा की विशेषताएं क्या हैं?

 कमल स्वरुप– हमारा अधिकांश सिनेमा या तो वास्तविक जीवनकाल का एक संक्षिप्त संस्करण होने का प्रयत्न है या फिर किसी साहित्यिक कृति की जस की तस अनुकृति होने की कोशिश। मैं चाहता हूँ कि ऐसे फिल्मकार हो जो अपनी कृति को सदा सफल और लोकप्रिय मुहावरों में तिरोहित कर देने की जगह सिनेमा को साहित्य के नाट्यकृत पुनरुत्पादन की भूमिका से खुद को अलग कर पाठ,गति, ध्वनि और बिम्ब के सम्बन्ध को पुनर्व्यख्यायित करने का प्रयत्न करें। सिनेमा अभियक्ति का नहीं अन्वेषण का माध्यम है। सिनेमा के वस्तुगत यथार्थ का लेखक के अंतर्जगत, नैतिकता या सौंदर्यशास्त्र से कोई सम्बन्ध नहीं है। ये तत्व यथार्थ को दोष-पूर्ण बनाते हैं। सिनेमा- भावुकता और प्रतीकात्मता से रहित शुद्ध कला कृति है । ऐसा आलें रॉबग्रिए का कहना है और मैं उनसे पूर्णतया सहमत हूँ।

संख्या की दृष्टि से देखा जाए तो भारत दुसरे देशों की तुलना में बहुत आगे है। यूरोप का फिल्म-उद्योग हॉलीवुड के हमले के सामने घुटने टेक चुका है। केवल भारत है जिसका फिल्म-उद्योग आत्मनिर्भर है। किन्तु, सिनेमा की दृष्टि से देखा जाए तो भारतीय फिल्में अभी तक नौटंकी और नाट्य-संगीत से ऊपर नहीं उठी हैं। शायद यही कारण है कि वह अब तक हॉलीवुड से बचा हुआ है।

  • प्रश्न दोः भारतीय सिनेमा राजा हरिश्चंद्रसे शुरू होकर ओमदरबदरसे होते हुए वर्तमान तक आकर आता है. और इस यात्राक्रम में भारतीयसिनेमा मिथक, विज्ञान, और संस्कृति का सम्मिलन लगता है. इन श्रेणियों(synthesis) की अभिव्यक्ति के रूप में सिनेमा को कैसे देखते हैं!! (The movie omdarbadar comingles mythology, science, tradition and creats the existentiality of the present. How do you see film as the expression of the synthesis of these categories !

कमल स्वरुप– आज जो भी मूल्य हैं सब अतीत के हैं। प्रारंभ में फिल्मों का उपयोग दूसरे माध्यमों में प्रकट कलाकृतियों को किसी स्थायी माध्यम में परावर्तित करने का प्रयास था। कथा-कहानियाँ, नाटक या फिर रविवर्मा के पौराणिक चित्र। इन कृतियों के प्रतीकों में समकालीनता को तलाशते हुए उनके राजनैतिक रूपांतरण की कोशिश हुयी। फिर आये ऐतिहासिक आख्यान और संतों के जीवन- चित्र। फिल्में अतीत की स्मृतियों के व्यापक प्रचार-प्रसार का माध्यम बना। फिल्मों में ध्वनि के आगमन के बाद अतीत की उन्हीं मूक कहानियों  को फिर से दोहराया गया, चित्रित किया गया। और, फिर आये सामाजिक समकालीन नाटकों और साहित्यिक कृतियों का फ़िल्मी रूपांतरण।

सिनेमेटोग्रफिक यंत्रों  का अविष्कार और विकास-क्रम अपने आप में एक स्वयंसिद्ध घटना थी।वह कला का माध्यम कब बनी और कैसे बनी ,वह दूसरी बात है लेकिन हमें यह  बात भी नहीं भूलना चाहिये कि सिनेमेटोग्राफी जादूगरों, जांत्रिकों और तांत्रिकों के मिले जुले प्रयत्न थे, उनकी इच्छा शक्ति थी। कुछ लोगों का मानना है कि यह केवल एक प्राकृतिक संयोग भर था। अनेक नए उपन्यासकारों में सिनेमा के प्रति उत्पन हुये आकर्षण का कारण क्या था? वे कैमरे की वस्तुपरकता से नहीं बल्कि उसकी आत्मपरकता और कल्पनात्मक संभावनाओं से प्रभावित हुये थे। वे सिनेमा को अभिव्यक्ति का नहीं, बल्कि अन्वेषण का माध्यम मानते थे। और, उन्हें सर्वाधिक दिलचस्पी उस पदार्थ में हुई जिसे लेखन में व्यक्त करना ज़रा भी संभव नहीं था। दोनों इंद्रियों, आँख और कान पर एक साथ खेल करना। इन बोलते चलचित्रों में कोई आदिम गुण है। वह वर्तमान का हिस्सा है। सनातन वर्तमान का समूचा बल और वेग। सिनेमा, बिम्बों की प्रकृति का नहीं बल्कि उनकी संरचना का सवाल था। ये नयी फ़िल्मी सरंचनाएँ, बिम्बों और ध्वनियों की ये हलचलें दर्शक की समझ में फ़ौरन आ जाती हैं। इनकी ताकत साहित्य से बहुत बड़ी है। यही युग न्यू थियेटर, बाम्बे टाकीज और  प्रभात का था।फिर बने तारे सितारे। उनके प्रजनन के अनुष्ठान, मानों सिनेमेटोग्राफिक मशीन की मूल प्रकृति, मेकेनिकल्स मीन्स ऑफ़ रिप्रोडक्शन को मुंह चिढ़ाते। ये नए फोटोजेनेटिक्स (photo-genetics) पीढियों दर पीढ़ियों का राष्ट्रीय कैलेंडर रचने लगा। कथा केवल उनके प्रेमपुराण थे। हम उनके जन्म-मृत्यु से अपना जीवन नापने लगे। साहित्य-सिनेमा ने इस प्रजनन की निष्ठुरता और असहिष्णुता के सामने घुटने टेक दिए। पूँजी के हाथ एक कालजयी हरम लगा था। इस मादक अग्निस्नान में दर्शक स्वाहा होने लगे। काल की बलि चढ़ा।

मैं अब सीधे ओम दर बदर  पर आना चाहूँगा। कुछ घुमा-फिरा कर। किसी महान रचनाकार के शब्द हैं, जिनका नाम मैं नहीं बताना चाहता हूँ- नक़ल से अक्ल वो रहे सदा। वह फिल्म मेरी कल्पना के टुकड़े थे और मैं भाषा के समान सरचना का आनंद ले रहा था। किन्तु मैं चाहता था कि एक ऐसे संसार का संवाहक बनूँ जो कि न तो बिम्ब है, न ध्वनि। यही वह संसार है जिस तक मैं विभिन दिशाओं से, अनेक सड़कों से होकर पहुँचाना चाहूँगा और वह सत्य मेरे बचपन का दानव होगा। वह उसी दानव से बचने के लिए बुनी गयी कहानी थी। मृत्यु से बचने का मेरा उपहास-जनक अनुष्ठानिक-प्रयत्न और उसका भयावह अंकन। ओम फिल्म नहीं है, वह फिल्मों से पलायन का चित्रण है। मैं सिनेमा के संसार में भाग कर आया था, यथार्थ से छुपने किन्तु मैंने पाया कि सिनेमा मृत्यु भी है और पुनर्जीवन भी और ओम के द्वारा मैं भाग निकला, यह मैं दावे के साथ कहता हूँ। मुझे अपनी मॉक (mock)- मृत्यु का खेल खेलने में खूब मज़ा आया। ओम फिल्म नहीं, खुद को एक झांसा था और न ही मैं कोई फिल्मकार।

Om darbadar(1988)

Om darbadar(1988)

  • प्रश्न तीनः सिनेमा अभिव्यक्ति के सशक्त माध्यम के रूप में क्या हमारे सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन को दिशानिर्धारित करने में सक्षम है? स्वातंत्र्योत्तर भारतीय सामाजिकराजनीतिक परिदृश्य में हस्तक्षेप करने में यह कितना सक्षम हुआ है!! पूरी भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में (एकदो अपवादों को छोड़) कोई भी अच्छी राजनैतिक फिल्म नहीं बन पाई है। इसमें सेंसर बोर्ड की ज़िम्मेदारी है या साहस की कमी?

कमल स्वरुप– मेरे लिए सिनेमा अभिव्यक्ति नहीं कितु अभिव्यक्ति के विभिन्न व्याकरणों की जांच-पड़ताल है। जैसा कि शुरू मैंने में ही कहा कि सिनेमा अन्वेषण है। वैसे भी रियल नारियल है, क्यों और सरपलस (surplus) पैदा किया जाये। हमें ‘भंगी’ फिल्मकारों की ज़रुरत है जो झाड़ू फेरे और इस रियल नारियल के खिलाफ जंग छेड़े। वर्ना पता नहीं लगता नेहरू जी की मुद्रा दिलीप कुमार से आई थी या दिलीप कुमार की नेहरू जी से। नर्गिस मदर इण्डिया पहले बनी या फिर शक्ल समान होने का कोई खानदानी राज़ है।

मज़े की बात है कि फालके खुद स्वदेशी आन्दोलन के हिस्सा थे और तिलक के जीवन से प्रभावित थे। जब उन्होंने लाइफ ऑफ़ क्राइस्ट देखी तो लगा हम अपने भारतीय बिम्ब कब परदे पर देखेंगे। ये विदेशी कल्पनाएँ हमारी चेतना को धीरे धीरे नष्ट कर देंगी। शुरू की फिल्मों के बिम्बों में गूढ़ राजनैतिक संदेश छुपे हुये रहते थे और अंग्रेजों को सेंसर बोर्ड की स्थापना करनी पड़ी थी। पौराणिक आख्यानों के बाद ऐतिहासिक फिल्मों के ज़रिये एक राष्ट्रवादी उतेजना को पैदा किया जाने लगा था। उसके बाद सामाजिक फिल्मों के ज़रिये समाज में व्याप्त रुढ़िवादी रीति-रिवाजो पर प्रहार किये जाने लगे।भक्ति काल के संतो पर बनी सभी फिल्में खूब सफल रहीं । फिल्मों के ज़रिये से एक आत्मविश्वास जगाया जा रहा था।

अब रही बात आज की। सबसे पहले मैंने राजनैतिक फिल्मों की बात कुमार शाहनी से सुनी थी उन दिनों मैं उनकी फिल्म तरंग में काम कर रहा था। वे वामपंथी विचारधारा से जुड़े थे। मैंने समझा कि राजनैतिक फिल्में, सत्ता के शक्ति-संघर्षो की कथा होती है। उसे दर्शाने के लिए वे वामपंथी विचारों का या कहें तो फार्मूला का उपयोग करते थे। फिर जाना कि सत्ता-संघर्ष केवल देश में ही नहीं, यहाँ तक कि परिवार में भी चलती है और वह किसी भी आधार पर हो सकती है।

अब मैं मनाता हूँ कि एक ही बात को विभिन कोणों से देखने पर अलग ही घटना का निर्माण होता है।और, वे सारेदृष्टिकोण अलग-अलग विचारधारा का निर्माण करती हैं जो कि हमारे निजी स्वार्थों से नियंत्रित होती हैं। निजी स्वार्थों से परे जाने के लिए हमे एक वस्तुनिष्ठ विज्ञान का सहारा लेना पड़ता है जो कि एक असम्भव कार्य है। यहाँ पर समानुभूति की अपेक्षा की जा सकती है, जिस की कमी आज हम सब में है। मैंने यह बात केवल घटक में देखी है।

  • प्रश्न चारः समकालीन बॉलीवुड सिनेमा में  तकनीकी  विकास तो झलकता है किन्तु विषयवस्तु के स्तर पर अधकचरापन बारबार उभरकर आता है। बड़े निर्देशकों की फिल्मों में भी! इसे बौद्धिकता के अभाव से जोड़कर देखा जाए या ईमानदारी के अभाव से? एक कलामाध्यम के रूप सिनेमा की   स्वायत्तता को आप कैसे देखते हैं?

कमल स्वरुप– डिजिटल के आने से मुझे लगता है कि हम पहली बार स्वायत्तता को क्लेम कर सकतें हैं। सिनेमा अनुभूति और संवेदना, व्यष्टि और समष्टि के सम्बन्ध का विज्ञान है। विभिन्न नाट्य एवं ललित कलाओ का समिश्रण है। किसी घटना के काल और दिक् के आयामों का रूपांकन है। इस स्तर की सूक्ष्मता का बॉलीवुड में पूर्णतया अभाव है। हमारे यहाँ अब तक प्रोडक्शन डिजाइन (production design) नाम की चीज़ का पता नहीं है। फिल्म का मतलब है स्टार कौन है और इसी बात पर पैसा उठता है। बॉलीवुड की अपनी भाषा है और उसका जीवन से कोई सम्बन्ध या जीवन के प्रति कोई प्रतिबद्धता नहीं है। और उन्हें देखना हमारी आदत बन चुकी है, हमारे काल का निर्णय उसी से होता है। जब आमिर खान चलता है तो सब लड़के उसी जैसे लगने लगते हैं। जब अमिताभ चला था तो सब उसी जैसे लगने लगे थे .

  • प्रश्न पांचः बालीवुड सिनेमा की भाषा पहले उर्दू हुआ करती थी फिर हिन्दीउर्दू का मिलाजुला खूबसूरत रूप। अस्सी के दशक के बाद हिन्दी में बोले गए संवादों को दुबारा अंग्रेजी में दोहराने का चलन बढ़ा जिससे फिल्मों की लंबाई भी अनावश्यक रूप से बढ़ती थी और अब ज्यादातर सिनेमा के नामों में भी अंग्रेजी के नाम जोड़े जाने लगे हैं। ऐसा क्यों हो रहा है?

कमल स्वरुप– बोलती फिल्मों के शुरू होने पर अधिकतर लेखक हिंदी उर्दू से आये थे, अधिकतर लाहौर से। अब तो हिंदी-उर्दू कोई भी नहीं पढ़ता। कुछ लोग एनएसडी से भले आते हैं, पर अब मुंबई में हिंदी-उर्दू नाम मात्र के लिए बची है। धीरे धीरे बोलचाल की भाषा अंग्रेज़ी में बदल रही है। स्क्रिप्ट इंग्लिश में लिखी जा रहीं हैं। सवांद हिंदी में ज़रूर होते हैं पर अधिकतर अंग्रेजी फिल्मो के अनुवाद। हॉलीवुड इस बात को समझ रहा है और अपनी अधिकांश फिल्मों को भारतीय भाषाओं  में डब करके एक नया बाज़ार खड़ा कर रहा है।

  • प्रश्न छः: क्या हिन्दी सिनेमा की दुनिया भी दो हिस्सों में बंट गई हैएक इलीटिस्ट सिनेमा जो मल्टीप्लेक्स में चलता हैदूसरा जो मझोले शहरों और कस्बों में

कमल स्वरुपमल्टीप्लेक्स वाले दर्शक भारतीय फिल्मो में हॉलीवुड या योरोपियन फिल्मो का व्याकरण ढूंढने जाते हैं ,छोटे शहरों के लोग शायद अभी तक उससे परिचित नहीं हैं। पर एक ज़माना था जब यह अंतर नहीं था। हमारा अपना खुद का विकसित व्याकरण था। प्रभात, न्यू थिएटर, राजकमल आदि काफी आगे थे और किसी भी वर्ग के दर्शक से संवाद करने में सक्षम थे.

  • प्रश्न सात: भारतीय सिनेमा के सर्वांगीण के विकास के लिए क्या कुछ होना चाहिए?

कमल स्वरुप– उत्पादन का विकेंद्रीकरण। तत्पश्चात, प्रांतीय कृतियों का अनुवादों के जरिये आदान-प्रदान। नाट्य एवं ललित कलाओं के कर्मियों का एक-जुट मंच, हर शहर-प्रान्त में।साहित्यिक-पत्रिकाओं की तरह सिने-कृतियों का वितरण। हर छोटे शहरमें फिल्मोत्सव और सिने-शिक्षा के शिविर।

  • प्रश्न आठ: ओमदरबदर की परंपरा से प्रभावित युवा निर्देशक सिनेमा के व्याकरण को बदलने की कोशिश कर रहे हैं. क्या इसे सार्थक बदलाव के रूप में देखा जा सकता है?

कमल स्वरुप– कुछ दिन पहले मैंने आनंद गाँधी की Ship of Theseus देखी और उसे अपने काफी करीब पाया। पूर्णतः एक वैचारिक फिल्म, जो की ब्रह्म-विभ्रम की प्रस्तुति के पार जाती है।

Kamal swaroop

Kamal swaroop

साभार – हंस- फरवरी- 2013- हिन्दी सिनेमा के सौ साल

New Harvest, A Film By Pallavi Paul: Uday Shankar


 

By  Uday Shankar

Craft is a divine and natural art. A craftsman is not artistic in himself; artistic feat which has been accumulated through talent and practice. To be human is not necessarily to be a craftsman. A sparrow building its nest, creation of bobby by ants and a spider weaving its web are examples of craft. We can become ‘Spiderman’, but not spider itself. This is what is- ‘being human’. We can imitate the action of spider, we can rather think about the process of weaving. This thinking constitutes our art. The knowledge of generations is inherent in us. For whatever art has been accumulated throughout generations, one doesn’t have any sense of greed or personal attachment towards it. Until today, anyone has hardly ever heard a smith proclaiming that a vessel is not saleable; or same for the weaver about a cloth, a goldsmith about ornaments. For them, these constitute their daily bread.

Today, whosoever is not even a tiller of land, he proclaims to have sown seeds in the sky. But even if there can be no fruits in sky or God on land, a poem can come alive and reinforce itself. This poem has the power to bear fruits in sky and God on land. It is like the hope of a technician who breathes to see a night convert to a day. Do modern dreams have creativity? We know to live in the natural rhythm of night and day; we want the moon in night and the sun in day. Why do we let our sight vanish in the shimmering nylon lights of night which dance in an artificial carnal climax and the clear bright lights of the day ?! The absence of creativity in dreams has extended itself in our material lives. We want to fill the rampant absence of creativity with trickery of sorcerers and incorrigible patters of the demented. Some season creates the feeling of conviviality and is universal. But thanks to the prevailing impotent technicians, we have lost that ability of experiencing it. May it be winter or summer, we are beyond guillotining ourselves in tepid waters. We are alive only through our recollections in which we have no formative contribution. Far from adding to them, we are unable to appreciate them. We are engrossed in vile masturbations. That part of life prone to disappearance is craft which has been bequeathed. To define this craft is the study of our art life for which we are absolutely incapable. What will be left of us if what is bequeathed in the form of craft of life is sundered? Will the craft sustain the essence of art and poetry? Can we rescue that indomitable bird that can’t help but be fraught with creativeness?

          The End

Film- Nayi Kheti(New Harwest)
Dirctor- Pallavi Paul
Text- Uday Shankar
English Translation-  Nivedita Yashvant Fadnis 

FromFilm, courtesy-Pallavi Paul

FromFilm, courtesy-Pallavi Paul

नयी खेती (फिल्म)- पल्लवी पॉल

क्राफ्ट दैवीय होता है, नैसर्गिक होता है। क्राफ्ट्समैन कोई ‘हुनरमंद’ आदमी नहीं होता है, ‘हुनर’ जिसे प्रतिभा और अभ्यास से अर्जित किया जाता है। मनुष्य होने की खासियत क्राफ्ट्समैन होना नहीं है। चिड़िया का अपना घोंसला बनाना, चींटियों द्वारा बाँबियों का निर्माण करना या फिर मकड़ी का जाला बुनना, यह सब क्राफ्ट्स के उदहारण हैं। हम स्पाइडर मैन ही बन सकते हैं, स्पाइडर नहीं और यही मनुष्य होना है। हम स्पाइडर की नक़ल उतार सकते हैं, उसके बारे में सोच सकते हैं और यह हमारी कला है, आर्ट है। पीढ़ियों का अभ्यास आपमें अनायास शामिल है। पीढ़ियों के अभ्यास से जो हुनुर आपने ‘अर्जित’  किया है, उसके लिए आपके भीतर कोई लोभ, व्यक्तिगत लगाव नहीं होता है। आज तक शायद ही किसी कुम्हार से यह कहते सुना गया कि यह घड़ा बिकाऊ नहीं है, किसी बुनकर से चादर, सोनार से गहने। यह उनलोगों की रोजी-रोटी का स्वाभाविक धंधा है।

आज की तारीख में जो कहीं से किसान नहीं है कह रहा है कि वह आसमान में धान बो रहा है। लेकिन आसमान में धान या जमीन पर भगवान्  भले नहीं जमें, कविता जरुर उग और जम सकती है और इसी कविता में यह शक्ति भी है कि आसमान में धान और जमीन में भगवान्  दोनों उगवा सकती है। यह उसी तरह है जैसे किसी तकनीशियन का एक पुराना सपना था कि रात दिन हो जाए! क्या आधुनिक सपने रचनात्मकता से रहित हैं!! हम रात और दिन की स्वाभाविक लय में जीना चाहते हैं, हमें रात में चाँद ही चाहिए और दिन में सूर्य। रातों को जगमगाती और कृत्रिम कामोन्माद में थिरकतीं नाइलोन की लाइटों और दिन के  ‘सफ्फाक उजाले’ की समानता को हम अपनी समझदार आँखों से क्यों ओझल हो जाने देते हैं! सपनों में रचनात्मकता का अभाव व्यावहारिक जिंदगियों तक में फ़ैल गया है। खुद की व्यावहारिक जिंदगियों में व्याप्त रचनात्मक अभावों  को हम जादूगरी करामातों और पागलों की बड़बड़ाहट से भरना चाहते हैं। कभी कोई ऋतू एक खुशनुमा अहसास जगाती होगी और जो सार्वभौम भी होती होगी। लेकिन रचनात्मकता से हीन तकनीशियनों की बदौलत यह अहसास भी हमारी हथेलियों से फिसल गया है। अब सर्द क्या गर्म क्या, गुनगुने पानी में गिलोटिन निगलने के हम आदि हो चुके हैं। हम सिर्फ स्मृतियों के सहारे जिन्दा हैं, जिसमें हमारा कुछ भी साझा नहीं है। उसमें कुछ जोड़ना तो दूर,उसे  हम सराह भी नहीं पा रहे हैं क्योंकि हमारी हथेलियों पर सरसों उग आयीं हैं और हम अपने तैलीय हाथों से सिर्फ हस्तमैथुन करना जानते हैं। हमारी जिन्दगी का जो भी हिस्सा जीने लायक है वह एक क्राफ्ट है और वह भी पुरखों का दाय है। इसी क्राफ्ट को व्याख्यायित करना हमारे कला-संसार का अभ्यास है और हम इस मामले में भी खुद को अक्षम पाते हैं। जब पुरखों का दिया यह जीवन-शिल्प भी हमसे छीन जाएगा, क्या बचेगा? क्या क्राफ्ट की व्याख्या में रत हमारी कला, कविता बच पाएगी? क्या हम हारिल पक्षी की उस जीवटता को बचा ले जाएंगे, जो ग्रहण-अर्जन(और सर्जन भी ) की वृति से कभी बाज नहीं आता !!
इत्यलम !!!
फिल्म- नयी खेती (New Harvest) 
नीदेशक- पल्लवी पॉल 
पाठ (Text)- उदय शंकर 

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