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‘संपूर्ण क्रांति’ और ‘रेलगाड़ी’ के बीच जरुरी अन्तर को ‘बाग़-ए-बेदिल’ में खोजता हमारे जमाने का एक ‘मीर’: चंदन श्रीवास्तव

शराबी की अद्भुत सूक्तियां लिखने वाले कृष्ण कल्पित जी , सद्य प्रकाशित काव्य-संकलन ‘बाग़-ए-बेदिल’ कारण इधर घनघोर चर्चा के केंद्र बने हुए हैं. बहुतेरे लोगों ने उनकी पूर्व-पंक्तियाँ के आधार पर ही मान लिया था कि वे अब प्रकाश में नहीं आयेंगें। शराबी की सूक्तियां नामक कितबिया में वे पहले ही लिख गए थे- कभी प्रकाश में नहीं आता शराबी/ अंधेरे में धीरे धीरे/ विलीन हो जाता है. कविता के प्रति जैसा समर्पण/लगाव इस शराबी के पास है वैसा रेअर ही देखने को मिलता है. और यह रेअरनेस ही वह जिजीविषा है जो उन्हें बार-बार प्रकाश में लाता है. बाग़-ए-बेदिल वाला प्रकाश तो इतना तेज है कि बहुतेरों की आँखें चौंधिया गयी हैं और बहुतेरे ऐसे हैं जो इस तेज में भी बारीकियां पढ़ रहे हैं.

‘बाग़-ए-बेदिल’ पर जे.एन.यू में आयोजित संगोष्ठी में चन्दन श्रीवास्तव एक वक्ता के बतौर आमंत्रित थे. इस संगोष्ठी में उनके कविता-कर्म को गम्भीरता से लेने की जरुरत महसूस की गयी. चन्दन श्रीवास्तव का यह यह लेख इसी प्रक्रिया की शुरूआती कड़ी है. बाग़-ए-बेदिल और कृष्ण कल्पित के कवि-व्यक्तित्व के ऊपर आगे भी लेख दिए जायेंगे।  

बाग़-ए-बेदिल

बाग़-ए-बेदिल

By  चंदन श्रीवास्तव

विश्वविद्यालयी दिनों की ट्रेनिंग की वजह से तबीयत कुछ ऐसी हो चली है कि लफ्ज किताब सुनते ही मन में एक रटी-रटायी पंक्ति गूंजने लगती है- आखिर! इस किताब की पॉलिटिक्स क्या है ? हैरत नहीं कि किताब बाग़-ए-बेदिल हाथ आई तो ऐसा ही हुआ। किताब भारी-भरकम है, आकार से भी और आवाज से भी। अदबी मुआमले की समझ के मामले में अपनी औकात देखी तो भार उठाने की हिम्मत नहीं हुई। सोचा, चलो किसी और के लिखे से काम चलाते हैं। और इसी फिराक में नजर अटकी बाग़ ए बेदिल पर कवि अरुणकमल की टिप्पणी के एक टुकड़े पर कि – “ कल्पित ने अतीत को वर्तमान में ढाल दिया है और वर्तमान को अतीत में ढालकर उसे व्यतीत होने से रोका है, इसलिए हर कविता कई कालों में प्रवाहित होती है। ” कहते हैं बदलाव सृष्टि का नियम है। अपनी इतिहास-प्रदत्त स्थिति के कारण आप उससे सहमत-असहमत हो सकते हैं। सो, अरुणकमल की पंक्ति को पढ़कर लगा कृष्ण कल्पित की कोशिश समय के अनवरत घूमते पहिए को थाम लेने की है। लगा, कृष्ण कल्पित अपने खास समय के भीतर बदलाव के किसी रंग-ढंग से असहमत हैं और ‘कविता के कुरुक्षेत्र’ में उस बदलाव पर जीत हासिल करने के लिए उतरे हैं।

लेकिन, कृष्ण कल्पित का अपने कवि और कविता के बारे में ख्याल ऐसा निष्कर्ष निकालने से रोकता है। अपने कवि-कर्म को लेकर कल्पित साहब का कहना है कि -“ ये कवितायें एक उपेक्षित और दीवार से लगा दिए गए कवि की प्रति-कवितायें हैं।”  और “ इन कविताओं में शब्दों का आयुधों और अस्त्र-शस्त्रों की तरह उपयोग आत्म-रक्षार्थ ही हुआ है..किसी दुश्मन, किसी भूखंड, या कीर्ति को विजित करने के लिए नहीं। हर कवि को अपने लिए एक कवच का निर्माण करना पड़ता है और कविता-साधना तो निश्चय ही किसी निरंतर युद्ध से कम नहीं..। ” आगे परंपरा का निजी-पाठ करते हुए उन्होंने यह भी जोड़ा है कि-“प्रागैतिहासिक काल से ही कविता से तीर-तमंचों का काम लिया जाता रहा है- आत्मरक्षार्थ या मानवता की रक्षा के लिए। ” इस शुरुआती (इस वजह से कच्चे और अधबने) पाठ में अगले अनुच्छेदों तक कोशिश करुंगा कि बाग़-ए-बेदिल को कृष्ण कल्पित के आत्म-वक्तव्य के प्रति ईमानदार रहते हुए पढ़ने की कोशिश करुं और इस निष्कर्ष निकालने की हिम्मत जुटा सकूं कि अतीत को वर्तमान में ढालना या फिर वर्तमान को अतीत में ढालकर उसे व्यतीत होने से रोकना कल्पित की कविता की पॉलिटिक्स के भीतर एक प्रक्रिया है, परिणति कत्तई नहीं।

बाग़ ए बेदिल के अपने पाठ की शुरुआत इस प्रश्न से करें – कृष्ण कल्पित को क्यों लगता है कि उनकी कवितायें एक उपेक्षित और दीवार से लगा दिए गए कवि की प्रति-कवितायें हैं? अपनी भारी-भरकम काया में सैकड़ों कविताओं को समेटने वाली इस किताब का उत्तर होगा एक शिकायत या कह लें फरियाद की शक्ल में सामने आयेगा-

उस देश में जेबकतरों की तरह कवियों ने भी अपने इलाके बांट रखे थेमी लार्ड।

वहां गिरहकटोंपिंडारियों मवालियों कबाड़ियों और हलकटों को कवि कहने का रिवाज थाहुजूर।

औरकवियों से उस देश में अपराधियों का सा सलूक किया जाता थामहोदय!…

कबाड़ीपन और कवि-कर्म के बीच का भेद क्योंकर मिट रहा है ? बाग़-ए-बेदिल का उत्तर है-

‘ यह विचार विपथता इसलिए थी,

कि वह उस जनपद का नहींदस जनपथ का कवि थासार्त्र !

बाग़-ए-बेदिल की कविता विपथता का कारण विपर्यय में खोजती है। ‘ जनपद ’( याद करें पुराने वक्तों के महाजनपदों को, देश से राष्ट्र बनने की हिंसक प्रक्रिया को, मेट्रोपॉलिटनी सार्वभौमिकता से स्थानीयता को बचाये रखने की जुगत को) और ‘दस जनपथ ’( 10 डाऊनिंग स्ट्रीट से निकले लोकतंत्र/आधुनिकता की भारतीय अनुकृति का नया संस्करण) के बीच का विपर्यय। जिससे अपेक्षा थी कि ‘उस जनपद का कवि’होकर रहेगा वह ‘दस जनपथ का कवि’ जिस समय के भीतर बनने को बाध्य हुआ उस समय के लक्षण क्या हैं ? वह समय कौन-सा है जिसमें कवि हलकट बनने को बाध्य और आतुर एक साथ है? बाग़-ए-बेदिल का उत्तर है-

जेपी, लोकतंत्र की आँख से ढलका हुआ आंसू था,

जो अब सूख चला हैपार्थ।

कि जनता आती है’ वाले विशाल मैदान में,

अब बाजीगर और रंडियां घूमते हैं।

दरअस्ल संपूर्ण क्रांति अब एक रेलगाड़ी का नाम हैसार्त्र!

और, ऐसे समय में क्या अघट घट रहा है ?

बाग़-ए-बेदिल की मानें तो-

ब्राह्नणों की फौज से जब घिर गई मायावती,

देख लेना एक दिन उसको बना देंगे सती।

बीवियां फिरती हैं दुनिया भर में कत्थक नाचतीं,

और, भारत मां तुम्हारे घर में बर्तन मांजती,

बुझ गये दीपक तो क्या आओ उतारें आरती,

वाजपेयी को मिला सम्मान भारत-भारती।

एक ऐसे समय में जब मर्यादाओं का भयंकर उलटफेर आंखों के आगे हो, कविता और कबाड़ का, कवि और गिरहकट का अंतर समाप्त हो रहा हो, तो कृष्ण कल्पित के अपने ही शब्दों में मानवता के रक्षार्थ कविता और कवि को क्या करना चाहिए? दूसरे शब्दों में, जब व्यवस्था अपने बाशिन्दों को विज्ञापनी भाषा में समझा रही हो कि दरअसल क्रांति एक रेलगाड़ी का ही नाम है और वह इस तरह कि तुम अपने जनपद से चलकर दस जनपथ और दस जनपथ(और उसके पसारे) से निकलकर अपने जनपद के भीतर अबाध आवाजाही कर सकते हो, और इस तरह, मानवीय मुक्ति के एक नये आख्यान में प्रवेश कर सकते हो, तो कविता, व्यवस्था की इस भाषा के काट में क्या करे ? किन शब्दों से बने कौन-से आयुध लाये ? इस प्रश्न का उत्तर खोजने चलें तो एक रास्ता खुलता है जिसपर चलकर आप कह सकें कि अतीत को वर्तमान में ढालना और वर्तमान को अतीत में ढालकर उसे व्यतीत होने से रोकना दरअसल कृष्ण कल्पित की कविता के लिए एक प्रक्रिया है और परिणति है उस भाषा को हासिल करने की कोशिश करना जो मुक्ति की प्रचलित भाषा की काट में खड़ी हो।

कल्पित इस भाषा को खोजने के लिए बार-बार अतीत की कविता के उस्तादों के पास लौटते हैं। चाहें तो कह लें, शेखावटी, जयपुर, पटना जैसे ‘उस जनपद’ का अपना घर “लुटियन दिल्ली” के जोर से लुट जाने का गम गलत करने के लिए किसी पीर-फकीर-शायर की मजार पर बैठना चाहते हैं। वहां झरने वाली निबौलियों को उठाकर पूरे हिन्दुस्तान की कविता की रिवायत के भीतर बे दर-ओ-दीवार का एक घर बसाना चाहते हैं। उन्हें उम्मीद, वहां से प्रचलित भाषा की काट करने वाली एक भाषा मिल सकेगी।यही वजह रही होगी जो पुस्तक के शीर्षक में आया शब्द बेदिल किताब के हर्फों में एक कहानी लेकर जिन्दा होता है। कहानी कविता के भेष में कुछ यों है कि-

औरंगजेब के बड़े बेटे आजमशाह ने,

बेदिल आजीमाबादी/देहलवी को मिलने के लिए बुलाया

तो बेदिल ने यह मिसरा लिख भेजापार्थ!

दुनिया अगर देहेन्द न जुम्बम ज जाए खीश- मन बस्ता अम हिनाए-किनायत ब जाये खीश

( दुनिया भी अगर दे दो तब भी मैं अपनी जगह से नहीं हिलूंगा क्योंकि मैंने अपने पांवों में सब्र की मेहंदी लगा ली है)

कविता के भीतर इस कथा की पुनर्वासी करके कल्पित एक साथ कई काम करते हैं। एक तो वे आपके मन के भीतर पैठी ऐसी ही अनेक कथाओं के लिए राह खोलते हैं। इस कथा को पढ़कर बिरला ही होगा जिसके मुंह पर यह पंक्ति ना आ जाये- आवत जात पनहिया टूटी बिसर गयोहरिनाम- संतन को कहा सिकरी सो काम। किसी को मिर्जा गालिब का यह शेर भी याद आ सकता है- हजार कस्द करता हूं इस जा से कहीं और जाने का- दिल कहता है तू जा मैं नहीं जाने का। और, बेतरतरीबी के तर्क से मन के किसी कोने में बैठा ‘अंगद का पाँव’ भी याद आ सकता है। तेजरफ्तारी अगर आज के जीवन और जगत को परिभाषित करने वाली वर्चस्वकारी भाषा है तो फिर कृष्ण कल्पित कविता के उस्तादों के पास जाकर वहां से उनके ठहराव ढूंढ़ लाते हैं।जो कोई बेदिल की तरह सब्र की मेहँदी लगाकर ठहरा है, कोई किसी भक्तकवि की तरह रामकथा में रमने की वजह से ठहरा है तो कोई गालिब की तरह नये-पुराने पस-ओ-पेश में पड़कर ठहरा हुआ है। ठहराव का अपना निजी ठौर खोज सकें- इसके लिए कृष्ण कल्पित की कविता कथाओं या कह लें काव्य-पंक्तियों की एक झनकार(शुक्लजी के शब्दों में कहें तो अर्थ और प्रसंग का गर्भत्व) रचती है। कल्पित की कविताओं(बाग़-ए-बेदिल में) के शब्द और पंक्तियां ‘अर्थ’ और ‘प्रसंग’खोजने के क्रम जब ‘आखर’ तलाशती हैं तो एक पूरा सिलसिला कायम हो जाता है, पूरब की कविता के रुप-शिल्प, कथ्य और वस्तु को सुनने-सुनाने का। कवि अपनी तरफ आखर और अरथ की पूरी परंपरा सौंपने को उत्सुक है ताकि पाठक नये सिरे से रचने और लड़ने के लिए तैयार हो सकें।

आखिर को एक बात दो शब्द “पार्थ” और “सार्त्र” पर। बाग ए बेदिल की कविता का स्थापत्य इन दो शब्दों के बिना संभव नहीं। जैसे कबीर की कविता में संबोध्य का चयन(साधो, संत, पांड़े/बांभन) के अनुकूल कविता की वस्तु बदलती है, साथी ही इन शब्दों के आने के साथ मानो विषय की घोषणा हो जाती है, ठीक उसी तरह कृष्ण कल्पित के बाग़-ए-बेदिल में ‘पार्थ’ और ‘सार्त्र’ कविता की बनावट के दो पाट हैं, और अपने नाम के अनुकूल वस्तु को धारण करते हैं। पार्थ, कुरुक्षेत्र यानि भावी महाविनाश की आशंका के बीच किंकर्तव्यविमूढ़ खड़ा पात्र है, कृष्ण उसे कर्तव्य का उपदेश देते हैं- युद्धस्व..। आशंका सार्त्र के साथ भी है। दो विश्वयुद्धों के बीच खड़ा एक चिन्तक जिसकी आंखों के आगे आधुनिकता या कह लें तर्कबुद्धि पर आधारित राज्यसत्ता/विज्ञान/उद्योग का चरित्र उजागर हुआ और आधुनिकता प्रदत्त मानव-मुक्ति का आख्यान हिरोशिमा पर परमाणु बम के धमाके के साथ दम तोड़ गया। पार्थ के सामने अपने समय की मर्यादाओं के भंग होने का संकट खड़ा हुआ था तो सार्त्र के सामने नई मर्यादाओं के भंग होने का संकट, वे मर्यादाएं जिनका वादा था- हमारे चौखटे में रहो, मुक्ति हो जाओगे । आधुनिक और प्राचीन, दोनों ने मुक्ति शब्द के साथ छल किया- इस बात के दो गवाह कृष्ण कल्पित की कविता में‘पार्थ’ और ‘सार्त्र’ हैं। दोनों को हाजिर-नाजिर जान, बाग़-ए-बेदिल कभी पीड़ा, कभी व्यंग्य, कभी पुकार तो कभी ललकार और कई बार हिकारत के स्वर में बोलती है।

जाहिर है, ग्लोबल गांव होने की जिद में पड़ी दुनिया के विस्थापितों/ शापितों की जगतपीड़ा और आत्मपीड़ा में नाभिनाल रिश्ता बैठाने को बेचैन यह यायावर कवि कृष्ण कल्पित अपने ठौर के तौर पर पार्थ और सार्थ को ही चुन सकता था।

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव,  मूलतया छपरा(बिहार) के निवासी, पिछले पंद्रह सालों से दिल्ली में। पहले आईआईएमसी और फिर जेएनयू में पढ़ाई। “उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हिन्दी लोकवृत्त का निर्माण” शीर्षक से पीएचडी के बाद दिल्ली के कॉलेजों में छिटपुट अध्यापन, फिर टीवी चैनल की नौकरी और अब विकासशील समाज अध्ययन पीठ(सीएसडीएस) की एक परियोजना इंक्लूसिव मीडिया फॉर चेंज से जुड़े हैं। इनसे  chandan@csds.in पर संपर्क संभव है। 

( यह कृष्ण कल्पित को समझने की शुरुआती कोशिश है. लिखने वाले ने ना तो उनकी सारी रचनाओं का पाठ किया है और ना ही पढ़ी हुई कविताओं पर पर्याप्त समय देकर सोचा है। अगर बेतरतीबी के भीतर से कोई तरतीब बन सकती हो तो इस कोशिश को भी इसी रुप में देखा जाय)

बाग़-ए-बेदिल, अंतिका प्रकाशन , प्रकाशन वर्ष : 2013, पृ. सं: 512, मूल्‍य : HB 850/-, PB 450/- 
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मुक्तिबोध: ‘अंधेरे’ के उस महाकवि से बहुत कुछ सीखना बाकी है: रामजी राय

(रचनाओं से अधिक लेखकों की चर्चा करने वाला समाज सही अर्थों में साहित्यिक समाज नहीं कहा जा सकता . लेखक के प्रभा -मंडल का रचनाओं के प्रकाश – वृत्त से अधिक चमकीला हो जाना पढने वाले समाज के बरक्स पूजने वाले समाज की ओर संकेत करता है . अभी शताब्दियों के बहाने अज्ञेय को उनकी तेजी से बढ़ती हुयी अप्रासंगिकता से बचाने की खूब कोशिशें हुईं . लेकिन उनकी कौन सी रचना नए सिरे से उभर कर सामने आयी है ? किन रचनाओं के अलक्षित किन्तु कालजयी महत्व के बारे में हिंदी पाठकों की जानकारी में इज़ाफा हुआ है ? कौन -सी रचनाओं को हिंदी के नए पाठक -समाज की स्वीकृति और सराहना मिली है ?रचना से अधिक व्यक्ति की चर्चा चर्चाकारों के पूजापाठी संस्कारों के अलावा लेखक की रचनात्मक विरासत की कमजोरी की तरफ भी इशारा करता है.

अगले साल मुक्तिबोध की मृत्य के पचास साल पूरे हो रहे हैं . ”अँधेरे में ” के प्रकाशन के भी. इस आधी सदी में हमने अपने लोकतंत्र में इस कविता को क्रमशः उतरते देखा है . जैसे कविता में दर्ज दुस्स्वप्न को फलीभूत होते हुए . इस कविता को फिर से पढ़ने , समझने और इस पर चर्चा करने का यह मुनासिब वक्त है . जरूर चर्चा के दौरान असहमति , आलोचना और विरोध के स्वर भी मुखर हों , क्यंकि बहसों के झंझावात मन ही विचार के फूल खिलते हैं . आशुतोष कुमार )

मुक्तिबोध- हरिपाल जी की कूची से

मुक्तिबोध- हरिपाल जी की कूची से

By रामजी राय

मुक्तिबोध की 1943-44 के बाद की सारी कविताओं  का केंद्र है ‘‘सत्य से सत्ता के युद्ध का रंग’’, खासकर आजादी के बाद की कविताओं का तो जैसे यह एकमात्र केंद्रीय तत्व बन गया। मुक्तिबोध के यहां इसी को आत्मसात और अभिव्यक्त करने का नाम है ‘नई कविता का आत्मसंघर्ष’। यथार्थ में इस संघर्ष के मार्ग की अड़चनें और रुकावटें भी होती हैं। और यथार्थ में वर्ग हैं और वर्गसंघर्ष है सो, कोई भी आत्मसंघर्ष अनिवार्यतः इस वर्ग संघर्ष का अंग है। मुक्तिबोध के यहां साधना नहीं, संघर्ष ही केंद्रीय पद है। वर्गसंघर्ष, आत्मसंघर्ष और चेतना के संघर्ष के त्रिकोणात्मक रूप में।  वैसे ही जैसे “हमारा जीवन त्रिकोणात्मक है- बाह्य जगत अर्थात वर्ग जगत; बाह्य की क्रियाओं और रूपों को आत्मसात करता और उसके विरुद्ध या अनुकूल प्रतिक्रियाएं करता बाल्यकाल से निर्मित होता आ रहा हमारा  अंतर्जीवन;  इन दोनों भुजाओं की आधार-रेखा हमारी अपनी चेतना कि जो चेतना इन दो भुजाओं के बिना अपना स्वरूप और आकार ही स्थापित नहीं कर सकती।”  कलात्मक संघर्ष यही है – तत्व के लिए संघर्ष, दृष्टि विकास का संघर्ष और अभिव्यक्ति को सक्षम बनाने का  संघर्ष। बेशक सापेक्षिक रूप से स्वायत्त अपने गति-नियमों के साथ। इसकी विशद व्याख्या मुक्तिबोध ने  ‘कला का तीसरा क्षण’ नामक निबंध में व अन्यत्र भी  की है।

जितना ही तीव्र है द्वंद्व क्रियाओं -घटनाओं का

बाहरी दुनिया में

उतनी ही तेजी से

भीतरी दुनिया में चलता है द्वंद्व कि

फिक्र से फिक्र लगी हुई है। (अंधेरे में)

भीतर का दूसरा हिस्सा भी

चुप नहीं है

भीतर का दूसरा पक्ष भी

चुप नहीं है

फैलाता आग भरे हमले की धूम

तड़ातड़ टकराने लगी हैं

विचारों की लाठियां

हवाओं में घूम!

खून रंगे माथों को चूम

खयालों की मुंडेर से जोरदार

पत्थरों की खूब बौछार

भयानक! दंगा है भीतरी हिस्सों में तेज,

फेंककर मारी जातीं कुर्सियां

माथों को तोड़ती है मेज

विधान की अंतः सभाओं में

वारदातें सनसनीखेज!!… (चंबल की घाटियां)

  ‘‘साहित्य जीवन की पुनर्रचना होती है’’ और इस पुनर्रचना में रचनाकार के संवेदनात्मक उद्देश्य की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। मुक्तिबोध ने इस संवेदनात्मक उद्देश्य के महत्व और उसे पहचाने  जाने  पर बहुत बल दिया है।  दृष्टि विकास का संघर्ष मुक्तिबोध के आत्म संघर्ष का एक प्रमुख तत्व रहा है। ज्ञान के क्षेत्र में अद्यतन खोजों का आलोचनात्मक नजरिए से विश्लेषण करते हुए अपने सिद्धांत को विकसित और अद्यतन बनाने का संघर्ष मुक्तिबोध के संवेदनात्मक उद्देश्य का अंग है। डा. रामविलास शर्मा का मुक्तिबोध से टकराव खासकर इसी एक बात पर सबसे अधिक है। वे इसे मार्क्सवाद को अद्यतन बनाया जाना नहीं मानते हैं इसीलिए उन्हें रहस्यवाद, अस्तित्ववाद और फ्रायड आदि के साथ मार्क्सवाद का समन्वय दिखता है। इस पर यहां चर्चा की गुंजाइश नहीं है। इस विषय में स्वतंत्र रूप से विचार किया जाना चाहिए। मुक्तिबोध के संवेदनात्मक उद्देश्य से इस या उस वजह से अलगाव में पड़ जाना भाष्यकारों की मूल समस्या रही है। सच-सच बातों को वह सीधे-सीधे कहने को तड़प गया। अपने कहे जानेवालों ने  उस समय भी उनकी अनसुनी की और आज भी अनसुनी छोड़  देना चाहते हैं। आखिर क्यों?

 क्योंकि – ‘जगत-समीक्षा की हुई उसकी, विवेक-विक्षोभ महान उसका, अंधेरे में रहकर भी द्यृति-आकृति-सा भविष्य का नक्शा दिया हुआ उसका’, वे सह नहीं सकते थे। क्योंकि ‘‘वे बहुत असुविधकारक थे, वे मूल्य सत्य थे इस जग के परिवर्तन के, उनसे होता पट-परिवर्तन, यवनिका-पतन मन में जग में’’। ये मूल्य-सत्य सहानुभूतिकर्ता बनने भर की नहीं बल्कि अपने क्रियागत परिणति के लिए  कम से कम सक्रिय कार्यकर्ता बनने की मांग करते हैं।

उसके अपने कहे जानेवाले विभिन्न कारणों से उस कैंड़े के थे नहीं, जिस कैंड़े का वह था कि कह पाते

‘‘नहीं, नहीं, उसको मैं छोड़ नहीं सकूंगा

सहना पड़े जो मुझे भले ही।’’

अंधेरा उसके लिए कविता की टेकनीक नहीं थी, न ही वह उसकी गुप्त पीड़ाओं, चिंताओं या कि उसकी आत्मग्रस्तता से उपजता था (उसकी कविता में मौजूद अंधेरे को उसके प्रशंसकों, आलोचकों ने इन्हीं रूपों में देखा हैं ) वह यथार्थ था, उसके समय और समाज का अंधकार था, जिसे गश खाकर गिरते होरी की आंखों में छाते हुए प्रेमचंद ने देखा था, जिसे निराला ने देखा था –

‘‘…उगलता गगन घन अंधकार

खो रहा दिशा का ज्ञान

स्तब्ध है पवन चार’’

या कि ‘‘गहन है, यह अंधकारा’’ और जिसे मुक्तिबोध ने भी देखा

‘‘चिंता हो गई, कविता पढ़ते ही

उसमें से अंधेरे का भभकारा उमड़ा’’।

चिंता इसलिए भी कि ऐसा नहीं होना था। आजादी मिलने के साथ तो इस अंधेरे को खत्म होते जाना था। लेकिन यह और भी बढ़ता जा रहा है। इस आजादी के साम्राज्यवाद से समझौतापरस्ती की असलियत को दूसरे कई अन्य लोगों ने भी देखा, इसे कहा और लिखा भी। शुरुआती दौर में कम्युनिस्ट पार्टी ने तो इस आजादी को ‘झूठी आजादी’ कहा। प्रगतिशील कवियों ने इस पर कविताएं भी लिखीं। लेकिन  विकसित हो रहे नए यथार्थ की गहनता उन कविताओं में न थी।

सब कुछ के बावजूद आजादी स्वयं में एक नया यथार्थ थी। इसके आकर्षण थे, व्यामोह, झांसे और कुटिलताएं थीं। इस ऐयारी चांदनी के अंदर लोगों की तकलीफें बढ़ रही थीं, गरीब, किसान, मजदूर जगह-जगह इसके खिलाफ आंदोलनों, हड़तालों आदि में उतर रहे थे, सरकार उन्हें पुलिस-दमन के जरिए दबा रही थी लेकिन खुद कम्युनिस्ट पार्टी धीरे-धीरे इस सबसे किनारा कसने लगी थी। पहले सैद्धांतिक स्तर पर फिर व्यवहार में भी। तीसरी पार्टी कांग्रेस के प्रस्ताव में कहा गया: ‘शांति के लिए भारत का संघर्ष घनिष्ठ रूप में भारत की पूर्ण और निर्बंध राष्ट्रीय स्वाधीनता के प्रश्न के साथ जुड़ा हुआ है। इस स्वाधीनता का अर्थ है पहले अंग्रेजों के नियंत्रण से मुक्ति और सामंतवाद को खत्म करना।’ पार्टी की तीसरी कांग्रेस दिसंबर 53-जनवरी 54 में हुई। इसमें गौर करने लायक है प्रस्ताव का पहला हिस्सा। इसमें शासक वर्ग से कम्युनिस्ट पार्टी के समझौते की गंध मिल रही थी, बजरिए विदेश नीति। नेहरू की ‘प्रगतिशील विदेश नीति’ पूर्ण और निर्बंध राष्ट्रीय स्वाधीनता की प्रमुख आधार बन गई । किसी भी देश की विदेश नीति गृहनीति का ही विस्तार होती है। इस नाते थोड़ा संदेह करने के लिए भी गृहनीति की जांच-परख कर लेनी चाहिए थी। दूसरे कि  भारत में साम्राज्यवाद था तो लेकिन प्रत्यक्ष तौर पर नहीं। उसका रूप बदल गया था। इसलिए प्रधान अंतर्विरोध भी बदल गया था। इस प्रस्ताव में ‘तथा सामंतवाद को खत्म करना’कहने के जरिए उस प्रधान बन गए अंतर्विरोध को गौण बना देने की गंध भी मौजूद है। बाद  में यह कहा जाने लगा कि ‘भारत की स्वाधीनता और अर्थतंत्र को सुदृढ़ करने का संसाधन है ’सोवियत संघ और चीन से भारत के संबंध। (चौथी  कांग्रेस, 1956)। साफ-साफ कहा गया कि ‘पूंजीपति वर्ग साम्राज्यवाद का विरोध करता है, राष्ट्रीय अर्थतंत्र पर उसकी पकड़ को ढीला करने की कोशिश करता है लेकिन इसके साथ ही विदेशी पूंजी के और अधिक आयात के लिए सुविधाएं देता है।’रामविलास शर्मा कहते हैं कि यह स्थिति का सही वर्णन है और टिप्पणी करते हैं ‘साम्राज्यवाद से देशी पूंजी के अंतर्विरोध बने हुए हैं, साथ ही विदेशी पूंजी के और अधिक आयात के लिए सुविधाएं भी वह देता है।’लेकिन नतीजा क्या निकला? शासक वर्ग से कम्युनिस्ट पार्टी का साझा। बाद की कथा सबको मालूम है – ‘एक शम्मा थी दलीले शहर सो वह भी खामोश’ – ‘काला समुंदर ही लहराया, लहराया!’ जिसके कि होने में गहन अंशदान तुम्हारा।

यहां एक बात नोट कर लेनी चाहिए कि इसके साथ कम्युनिस्ट पार्टी के अंदर सैद्धांतिक अंतर्विरोध भी बढ़ने लगे और आंतरिक बहसें तेज हो गईं। साथ ही यह भी कि सैद्धांतिक धरातल पर मुक्तिबोध पर भी इसका प्रभाव दिखता है, मुख्यतः विदेश नीति वाले मसले पर। जिसका हवाला मुक्तिबोध संबंधी अपने पुनर्मूल्यांकन वाले लेख में डा. शर्मा ठीक ही देते हैं, लेकिन यह प्रभाव केवल व्यावहारिक धरातल तक ही सीमित है, जीवनानुभवों, संवेदनात्मक अनुभवों के धरातल पर नहीं। वहां स्थिति इसके ठीक उलट है। इस पर चर्चा उचित जगह पर आगे होगी। कुल मिलाकर यह 1947 के बाद का , नया यथार्थ था और इसकी अनिवार्य मांग हो गई, ‘इसका तू शोध कर, इसका तू भाष्य कर।’

‘काली उन लहरों को पकड़कर अंजलि में

जब-जब मैं देखना चाहता हूं-

क्या हैं वे? कहां से आई हैं?

किस तरह निकली हैं

उद्गम क्या, स्रोत क्या

उनका इतिहास क्या

काले समुंदर की व्याख्या क्या, भाष्य क्या’

और मुक्तिबोध इस नए यथार्थ का, इस बाहर-भीतर पसर रहे अंधेरे का उसकी संपूर्णता में निरीक्षण-आत्मनिरीक्षण, उसके मूल कारणों, उससे पैदा हो रहे प्रश्नों, प्रश्नों के कारणों को जानने और उसकी एक-एक लहर का चित्रण करने के काम में दम साधे, पूरे मनोयोग, धीरज और हां, पूरी जिज्ञासा, कहिए जिज्ञासा का पूरी तरह शिकार होकर उतर पड़ते हैं। जिज्ञासा जो ‘बाल्यकाल, नवयौवन और तारुण्य के विभिन्न उषःकालों में हृदय का छोर खींचती हुई, आकर्षण के सुदूर ध्रुव-बिंदुओं से हमें जोड़ देती है।… ‘देखने’ की इच्छा, ‘जानने’ की इच्छा, ‘रहस्य’ की उलझी हुई बातों को सुलझाने की इच्छा, कितनी मनोहर, कितनी दुर्निवार और अदम्य हो सकती है, यह उसी से जाना जा सकता है जो जिज्ञासा का शिकार है। ’सुदूर नेब्युला से लेकर आभ्यांतर निराले लोक तक, अति निकट वर्तमान से लेकर सुदूर अतीत तक, अपने देश से लेकर देश-देशांतर तक की इस साहस और जोखिम भरी जिज्ञासा-यात्रा में ‘सहसा’, ‘अचानक’, ‘यकायक’, ‘अकस्मात’ बहुत कुछ दिखता, लुप्त होता, मिलता, खोता, आता, जाता रहता है। भय और पुलक की चिहुंकन और सिहरन, खतरनाक अघट घटनाओं की थरथरी आदि बहुत कुछ अनुभव के हिस्से बनते रहते हैं। ‘साहित्य और जिज्ञासा’ नाम से उनका एक छोटा-सा लेकिन बहुत बेहतरीन निबंध है। अपने इस निबंध में मुक्तिबोध लिखते हैं, ‘उम्र में बढ़कर, जब हमें ‘ओपीनियन’ बनाने की आदत पड़ जाती है, जब हम बुद्धिमान और बुद्धिवादी बन जाते हैं तब हमारे दिमाग की बाल-कमानी यानी जिज्ञासा पुरानी और घटिया हो जाती है। तब इसे किसी बालक को जरूरत पड़ती है, जो यह टाइमपीस तोड़कर देखे कि उसकी भीतरी बनावट क्या है।

 ‘लेकिन पुराने बालकों में ऐसे लोग भी निकलते हैं, जिनमें जिज्ञासा की तीव्र दृष्टि और आग्रहशीलता के साथ उस ओर यौवनसुलभ श्रम करने की प्रवृत्ति और खोज के आधार पर वृद्धसुलभ अनुभवपूर्ण मत बनाने की शक्ति रहती है। साहित्य इस जिज्ञासा का ऋणि है।’ और हिंदी साहित्य मुक्तिबोध और नागार्जुन की जिज्ञासा का ऋणि रहेगा। मुक्तिबोध की कविताओं में स्वप्न सौंदर्य पर तो कई एक का ध्यान गया है, बल्कि जरूरत से ज्यादा ही और कुछ ने तो इसे उनकी वृत्ति ही मान लिया – ‘स्वप्न उनकी वृत्ति है, वे चीजों को स्वप्न में परिवर्तित किए बगैर समझ ही नहीं पाते’ – और इसके लिए उनकी काफी लानत-मलामत भी की है, लेकिन मुक्तिबोध की इस जिज्ञासा-वृत्ति और इस नाते उनके काव्य सौंदर्य के एक लगभग अछूते पक्ष की तरफ अभी लोगों का ध्यान नहीं गया है।

मुक्तिबोध ने साहित्य और जिज्ञासा नामक अपने इस निबंध में एक और महत्वपूर्ण बात कही है – ‘कहा जाता है कि साहित्य हृदय की भावनाओं से उत्पन्न होता है। इसमें यह और जोड़ देना चाहिए कि भावना जिज्ञासा की पैठ के बिना, उसके द्वारा की जानेवाली तटस्थ तथा तीव्र खोज के, ऊंचा साहित्य उत्पन्न नहीं कर सकती। ध्यान में रखने की बात यह है कि भावना, जिसके प्रति वह है उसके प्रति आकर्षण या विरोध के (बिना) काम नहीं कर सकती। अर्थात, वह पक्ष या विपक्ष में ही काम कर सकती है। किंतु जिज्ञासा के द्वारा की गई यथार्थवादी खोज से प्राप्त ज्ञान के आधार पर, और उसकी सहायता से, चलनेवाली भावना अलग होती है। वह एक चरित्र या स्थिति के विश्लेषण के टुकड़ों को फिर से जोड़कर समन्वय और सामान्यीकरण करती है। किंतु वह इतना करके ही चुप नहीं रहती, चरित्र के विकास के मूल कारणों की खोज करती है, प्रश्नों के कारणों का अनुसंधान और उनका चित्रण करती है। और इस दृष्टि से वह चित्रण और स्थिति दोनों के प्रति अधिक न्याय करती है।’

नए यथार्थ के सर्वेक्षण का यह काम उनकी कविताओं में इस रूप में प्रस्तुत है मानो एक फील्ड वर्क हो, जमीनी सर्वेक्षण –

‘ओ नागात्मन,

संक्रमण-काल में धीर धरो

ईमान न जाने दो!!

तुम भटक चलो

इन अंधकार मैदानों में सर-सर करते…

खोदो, जड़ मिट्टी को खोदो!

ओ भूगर्भशास्त्री,

भीतर का बाहर का

व्यापक सर्वेक्षण कर डालो।’

और सर्वेक्षण इसलिए कि यह एक सामाजिक दायित्व है, जिसे वहन करना है –

‘वे आते होंगे लोग

जिन्हें तुम दोगे

देना ही होगा, पूरा हिसाब

अपना, सबका, मन का, जन का।’

इसीलिए मुक्तिबोध की कविताएं एक ही साथ बाहर और भीतर दोनों तरफ चलती हैं। इस दायित्वबोध के साथ चरित्र, चरित्रों की बाहरी-भीतरी स्थितियां, चरित्रों का विकास, विकास के मूल कारण, प्रश्न, प्रश्नों के कारण, लोग, लोगों की गतिविधि, मनोहर वाद-विवाद, संवाद, बहसें, टकराहटें व उलझाव और इनमें से बदलते जगत का चेहरा, अपनी पूरी प्रक्रिया के साथ चित्रित हैं। मुक्तिबोध के यहां काव्य सौंदर्य, काव्यानुभव, काव्याभिव्यक्ति अर्थात सब कुछ एक प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया से अलग रहकर मुक्तिबोध के काव्य सौंदर्य को नहीं समझा जा सकता। लेनिन ने अपनी किताब ‘भौतिकवाद और अनुभवसिद्ध आलोचना’ में एक जगह लिखा है, ‘सत्य एक प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया से अलग सत्य कुछ नहीं है।’

ऊपर से देखने पर मुक्तिबोध का काव्यशिल्प एक जैसा लगता है। लेकिन एक जैसे लगते काव्यशिल्प के अंदर काफी विविधता है। खोज की यह प्रक्रिया इस विविधता का आधार है। एक ही कविता में जिस तरह कई-कई स्थितियां, कथाएं, कथाओं की उपकथाएं, चरित्र, नाटकीय मोड़, संवाद, मनोहर वाद-विवाद, उद्बोधन, आत्मउद्बोधन आदि हैं, उसी अनुरूप एक ही कविता के अंदर कई शिल्प और भाषा के कई स्तर, कई भंगिमाएं हैं। हर कविता सधी हुई हो सो बात नहीं। कई कविताओं में अटकाव है और अभिव्यक्ति उलझी हुई। कुछ कविताओं में ब्यौरे लंबे हैं, कई जगह अनावश्यक भी। ध्यान देने की बात है कि कई कविताएं किसी दूसरी कविता का पूर्वाभ्यास लगती हैं। उदाहरण के लिए ‘एक टीले और एक डाकू की कहानी’ नामक कविता ‘चंबल की घाटियां’ कविता का पूर्वाभ्यास लगती है, तो कई बार एक कविता की कोई पंक्ति दूसरी किसी कविता में अधिक परिमार्जित-विकसित और संक्षिप्त रूप में आती है, तो कई बार एकाध-दो पंक्तियों में आकर अपनी किसी पूर्व स्थिति, पूर्व संदर्भ का बोध कराती लगती है और कई बार तो कुछ भिन्न तरह से आकर पहले की कविता-स्थिति, अनुभव, निष्कर्ष की समीक्षा के उपर टिप्पणी या उसमें संशोधन-परिवर्तन का आभास देती हुई अपनी नई स्थिति को जताती हुई लगती है। ‘अंधेरे में’  का इस दृष्टि से अध्ययन दिलचस्प होगा। कुल मिलाकर ऐसा लगता है मानो कविताएं एक-दूसरे से मिलकर किसी समग्र को अभिव्यक्त कर रही हों या कि एक में मिलकर कोई एक ही कविता बना रही हों। मुक्तिबोध खुद भी कहते थे कि मैं हर रूप में कविता में, कहानियों में एक बात को अभिव्यक्त कर देने के प्रयास में लगा रहता हूं। इसलिए अपनी ही इतनी काट-छांट, इतना संशोधन, इतना लिखना

‘कि फिर भी वह अधूरा था अधूरा…

केवल भावना से काम चलना खूब था मुश्किल

…हमें था चाहिए कुछ वह

कि जो ब्रह्मांड समझे त्रस्त जीवन को

हमें था चाहिए कुछ वह

कि जो गंभीर ज्योतिःशास्त्र रच डाले

नया दिक्काल-थियोरम बन

प्रकट हो भव्य सामान्यीकरण

मन का

कि जो गहरी करे व्याख्या

अनाख्या वास्तविकताओं

जगत की प्रक्रियाओं की

कि पूरा सत्य

जीवन के विविध उलझे प्रसंगों में

सहज ही दौड़ता आए –

स्मरण में आए –

मार्मिक चोट के गंभीर दोहे सा

कि भीतर से सहारा दे

बना दे प्राण लोहे सा।’

‘यही थी भूमिका हम तुम मिले थे जब।’

इस खोज-यात्रा में मुक्तिबोध ने बहुत कुछ देखा। देखा चमचमातों की धाक है, भीड़ है, भड़क्का, है, जमाना उचक्का है। देखा शोषण की अति मात्रा, स्वार्थों की सुख-यात्रा से, आत्मा से जाते हुए अर्थ और मरी हुई सभ्यता को। दार्शनिक दुखों की गिद्ध सभा और उस दार्शनिक आत्मा को भी देखा, स्वर दबा सिसकते जो जब जीवित थी, जन-उत्पीड़न विभ्राट-व्यवस्था के सम्मुख, छाया जीवन जीकर भी, उदर-शिश्न के सुख भोगती रही, आध्यात्मिक गहन प्रश्न के सुख भोगती रही। जीने से पहले ही समस्याओं के हल को मरते हुए देखा। चंबल की घाटी को देश में बदलते और खतरनाक लूटपाट, आग डकैतियां होते देखा। काले समंदर का पश्चिमी किनारे से नाता और जमाने का चेहरा देखा जहां साम्राज्यवादियों की चलती है; उसकी पैसे की संस्कृति, भारतीय आकृति में बंधकर, दिल्ली को वाशिंगटन और लंदन का उपनगर बनाने पर तुली है और भारतीय धनतंत्री, जनतंत्री बुद्धिजीवी स्वेच्छा से उसी का ही कुली है। देखा बड़े प्रेम से बटन होल में फूल लगाकर, अपने मालिक के ये चाकर खद्दरधारी प्यारे मिस्टर जनरल डायर को, उन्हें लीलने आई नारे भरी खचाखच सड़क पर, मंचों पर से फायर-फायर भौंकते। देखा इस महा कंस से भय खाकर आत्मोत्पत्र सत्य, अनुभव बालक को कचरे के ढेरों, कुओं, बावडि़यों, सुनसान रास्तों पर चुपचाप फेंके जाते और देखा उस अनुभव बालक की आक्रोश मुख-गरिमा का सौंदर्य। देखा उपेक्षित काल-पीडि़त सत्य के समुदाय, असंख्य स्त्री-पुरुष-बालक भटकते हैं। किसी की खोज है उनको, किसी नेतृत्व की, जो सिर्फ इंसान होने की हैसियत चाहते हैं, जैसे आसमान, पेड़ या मैदान एक शानऔर हैसियत रखते हैं, वैसे ही और ठीक उसी ठोस और पक्की बुनियाद पर जो अपने लिए इज्जत तलब करते हैं। बराबरी का हक, बराबरी का दावा, नहीं तो मुठभेड़ और धावा। देखा लड़ाइयां और लड़ाइयों के मोर्चे। और इस भयानक अंधेरे में भी देख लिया देश की गहन मृतात्माओं को दल बांध रात में फासिस्टी जुलूस में चलते, जिसमें नेता और धनपति, अखबारपति, बड़े-बड़े श्रीमुख, प्रकांड आलोचक-कवि-साहित्यकार से लेकर तो शहर के कुख्यात डोमी जी उस्ताद तक को शामिल। देखा किसी जनक्रांति के दमन निमित्त मार्शल लाॅ को लगते। और इस सर्वेक्षण की प्रक्रिया में ही मुक्तिबोध विकसित करते हैं अपनी वह काव्य भाषा जो ‘मानो वह गहरे जनसंकट का प्रसंग हो या युग-युग की अनुभव पीड़ा के विस्फोटों के उत्पन्न ज्वलंत पत्थर कोयले के दुर्धर स्फुलिंग हो।’या कि ‘सत्य से सत्ता के युद्ध का रंग’ हो। खासकर आजादी के बाद और उसमें भी 54 से लेकर 64 तक की कविताओं में युद्ध का यह रंग और अधिक गहरा और सुर्ख होता गया।

यह सर्वेक्षण इतना गहन व विस्तृत, इसका चित्रण और अभिव्यक्ति इतनी यथार्थ है कि इसके जरिए थोड़े ही और श्रम से स्वतंत्र भारत के आज तक का सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहास लिखा जा सकता है।

नए भारत की खोज

एक महत्व की बात घटित हुई, इस प्रक्रिया में गुणात्मक अंतर आ गया – नए यथार्थ की यह खोज नए भारत की खोज में बदल गई।

‘प्रतिष्ठित राज्य-संस्कृति के प्रभावी दृश्य

सुंदर सभ्यता के तुंग स्वर्ण-कलश

सब आदर्श

उनके भाष्यकर्ता ज्ञानवान महर्षि

ज्योतिर्विद, गणितशास्त्री, विचारक, कवि

सभी वे याद आते हैं

प्रतापी सूर्य हैं वे सब प्रखर जाज्वल्य

पर, यह क्या

अंधेरे स्याह धब्बे सूर्य के भीतर बहुत विकराल

धब्बों के अंधेरे विवर-तल में से

उभरकर उमड़कर दल बांध

उड़ते आ रहे हैं गिद्ध

पृथ्वी पर झपटते हैं!

निकालेंगे नुकीली चों से आंखें

कि खएंगे हमारी दृष्टियां ही वे!’

अपनी प्राचीन गौरवशाली सभ्यता और संस्कृति की बेहद सटीक व्याख्या और उसके प्रति बेहद ताकतवर और धारदार नजरिया और कितना रोमांचित और सजग करनेवाला।

‘मन में ग्लानि, गहन विरक्ति… भयानक क्षोभ।’

‘मेरी छांह …खड़ी स्तब्ध

उसके गहन चिंताशील नेत्रों में

विदारक क्षोभमय संतप्त जीवन दृश्य क्रमागत तिर रहे से हैं।

जहां भी डालती वह दृष्टि

संवेदन-रुधिर-रेखा-रंगी तस्वीर तिर आती

गगन में, भूमि पर सर्वत्र दिखते हैं

तड़प मरते हुए प्रतिबिंब

जग उठते हुए द्युति-बिंब

दोनों की परस्पर-गुंथन

या उलझाव लहरीला

व उस उलझाव में गहरे

बदलते जगत का चेहरा।’

इस नजर से ‘अंतःकरण का आयतन संक्षिप्त है’ एक बेहद खूबसूरत और महत्व की कविता है। बहरहाल, अब

‘झूठी है संगति

झूठी हैं बुद्धियां

सब आत्मशुद्धियां झूठी…’

जैसे ‘ब्रह्मराक्षस’ कविता के निरंतर शुद्धि-स्नान पर बेलौस टिप्पणी। कवि के सामने एक ही सवाल रह जाता है

‘कि सारे प्रश्न छलमय

और उत्तर और भी छलमय

समस्या एक

अपने सभ्य ग्रामों और नगरों में

सभी मानव सुखी, सुंदर व शोषणमुक्त कब होंगे!’

और मन में केवल एक जिज्ञासा भरी तड़प

‘हमारे देश भारत में

पुरानी हाय में से

किस तरह से आग भभकेगी

उड़ेंगी किस तरह भक से

हमारे वक्ष पर लेटी हुई विकराल चट्टानें

व इस पूरी क्रिया में से

उभरकर भव्य होंगे, कौन मानव गुण!’

और कवि एक सुचिंतित निष्कर्ष पर पहुंचता हुआ हठात निर्णय लेता है, –

‘सुकोमल काल्पनिक तल पर

नहीं है द्वंद्व

का उत्तर

तुम्हारी स्वप्न वीथी कर सकेगी क्या

बिना संहार के सर्जन असंभव है

समन्वय झूठ है

सब सूर्य टूटेंगे व उनके केंद्र फूटेंगे

उड़ेंगे ब्रह्मांड में सर्वत्र

उनके नाश में तुम योग दो।’

कोई हमदर्दी नहीं, पुराने के साथ पूरी तरह एक रैडिकल रॅप्चर, क्रांतिकारी संबंध विच्छेद के बिना नए भारत का स्वप्न नहीं देखा जा सकता। उसकी खोज और स्थापना नहीं की जा सकती। यह हमारे नवजागरण और स्वतंत्रता आंदोलन के मनीषियों-चिंतकों, नेताओं और रवीन्द्रनाथ, जयशंकर प्रसाद आदि जैसे कवि विभूतियों की आलोचना भी है।

फैंटेसी को काव्यरूप के बतौर अपनाना मुक्तिबोध की मजबूरी थी। इस नए यथार्थ के विस्तृत सर्वेक्षण और उस यथार्थ से प्राप्त नए भारत के स्वप्न को – इतने बड़े आख्यान को, उसके इतिहास, भूगोल, संदर्भ और परिप्रेक्ष्य के साथ – संभव समग्रता में संभवतः किसी अन्य काव्य रूप द्वारा अभिव्यक्त भी नहीं किया जा सकता था। इस काव्य रूप के अपने कुछ नुकसान थे। मुक्तिबोध न केवल इसके प्रति सजग थे बल्कि चित्रण की यथार्थता के प्रति भी वे सजग थे, सजग और प्रतिबद्ध। इस प्रक्रिया में अधिकांशतः हुआ यही है कि यथार्थने – युग के, जग के गहरे विक्षोभों ने, नए सौंदर्यानुभवों के कर्ण कर्कश गद्य ने फैंटेसी की जमीन ही नहीं फाड़ी बल्कि उसे इतना झीना बना दिया कि उसमें से यथार्थ हमेशा झलमलाता रहे। बेशक, मुक्तिबोध की कविताएं हमसे अवश्य ही थोड़े धीरज, हार्दिकता, थोड़े समय और श्रम की मांग करती हैं। प्रसंगवश, व्यक्तित्व और मिजाज के स्तर पर मुक्तिबोध के आदर्श जयशंकर प्रसाद नहीं हैं। अगर कोई है तो सबसे आगे बढ़कर कबीर हैं। इसके प्रमाण मुक्तिबोध की कविताओं में भरे पड़े हैं, कहीं ‘उस चोट के गंभीर दोहे सा’ तो कहीं ‘भीतर कोई बैठा है कबीर मर्मी’ तो कहीं

‘भव्य हजारों साल पुराने ओ बूढ़े उस्ताद

तुम्हारी क्रियावन-वेदना क्या कहना

तुम बाजार में खड़े स्वयं जलती मशाल…

ब्रह्म-रंध्र में गूंजेगा फिर द्रोही-अनहद नाद, ओ बुजुर्ग उस्ताद’

आदि कई रूपों में। ‘भविष्यधारा’ कविता में तो कबीर का जिक्र आने के बाद कविता कुछ इस तरह आगे बढ़ती है जैसे कबीर स्वयं मुक्तिबोध ही हों। भक्तिकाल पर एक नई दृष्टिा डालता, रामचंद्र शुक्ल और हजारी प्रसाद द्विवेदी से भिन्न इतिहास दृष्टि से उसकी व्याख्या और कबीर के समकालीन बतानेवाले लेख को सभी जानते हैं। कबीर की तरह ही मुक्तिबोध भाषा से जिस तरह का काम चाहते हैं, ले लेते हैं।

मुक्तिबोध नए भारत की खोज पर आकर रुकते नहीं, इस विवेक-प्रक्रिया की क्रियागत परिणति के लिए और अधिक जाग्रत, और अधिक बेचैनी से भर उठते हैं। ‘अब न समय है, जूझना ही तय है… फजूल है इस वक्त कोसना खुद को। एकदम जरूरी दोस्तों को खोजूं, पाऊं मैं नए-नए सहचर, सकर्मक सत्-चित्-वेदना-भास्वर।’

‘अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने ही होंगे

तोड़ने होंगे ही मठ और गढ़ सब।’

यहां ‘अभिव्यक्ति’ का अर्थ एक ही रहता है लेकिन संदर्भ और आयाम बहुत हैं। संदर्भ बदलने के साथ इसका रूप भी बदल जाएगा। सामाजिक, राजनीतिक आंदोलन से लेकर तो जनक्रांति तक सब अभिव्यक्ति ही है – जनता की, जनसंघर्षों की, उनके स्तर की। अब नए-नए मित्र और सहचर, एकदम जरूरी दोस्त, सकर्मक सत्-चित्-वेदना-भास्वर इसलिए तो नहीं खोजे जा रहे हैं कि लेखकों का प्रगतिशील या आपको यह न पसंद हो तो कह लीजिए परिमली संगठन बनाना है। बल्कि इसलिए खोजे जा रहे हैं कि जूझना ही तय है, कि इसके बगैर इस यथार्थ अंधेरे को नहीं मिटाया जा सकता, कि नए भारत के स्वप्न को पूरा नहीं किया जा सकता। हमारे जैसे देश और समाज में यह ‘अभिव्यक्ति’ ‘जनक्रांति’ है और यह भी कि यह ‘सशस्त्र जनक्रांति’ है। नामवर सिंह को अन्य परेशानियों के अलावा इस बात से भी परेशानी है कि ‘कोई मुक्तिबोध को एकदम सशस्त्र क्रांति का समर्थक घोषित कर रहा है।’सशस्त्र से पहले ‘एकदम’ शब्द लगाकर नामवर सिंह अपने लिए एक छूट लेते हैं और सशस्त्र क्रांति को खारिज भी कर देते हैं। वे कहना यह चाहते हैं कि अब शांतिपूर्ण क्रांति भी हो सकती है – ‘शांतिपूर्ण संक्रमण।’ ख्रुश्चेव के सोवियत की सत्ता पर आने के बाद से यह सिद्धांत आया और सीपीआई ने इसे मान भी लिया। रामविलास शर्मा नामवर सिंह की परेशानी पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं कि इस जनक्रांति की कहीं कोई व्याख्या नहीं की गई लेकिन मुक्तिबोध की कविताओं में यह क्रांति सशस्त्र अवश्य है, भले ही ‘एकदम सशस्त्र’ न हो। और फिर कविताओं से, कविताओं के वातावरण से यह दिखाते हैं कि यह क्रांति का रूप ही देखते आए थे। यह बिल्कुल सही है। लेकिन वे मूल रूप से (इस बाबत उन्होंने और भी बहुत कुछ कहा है) यह सिद्धांत प्रतिपादित करते हैं कि जहां भी संसदीय जनतंत्र कायम हो गया है, वहां सशस्त्र क्रांति नहीं हुई है। और कहा कि मुक्तिबोध दुनिया में अन्य देशों में चल रहे छापामार युद्धों के आधार पर अपने यहां सशस्त्र क्रांति का चित्र बनाते थे। अर्थात भारत में सशस्त्र क्रांति नहीं होगी। और इस तरह दोनों आलोचक सिद्धांततः एक जमीन पर ही आ खड़े होते हैं, राजनीतिक शब्दावली में इसे सामाजिक-जनवाद कहते हैं। जिसका वर्ग आधार है पेट्टि बुर्जुआ, मध्य वर्ग। अब मुक्तिबोध अपने तीव्र आत्म-संघर्ष के बावजूद कहां व कितनी दूर तक मध्यवर्गी चेतना से ग्रसित थे या मुक्त इनके साथ इस बहस में उलझना फजूल है।

कम्युनिस्ट पार्टी की चौथी  पार्टी कांग्रेस (1956) से शासक वर्ग से साझा का, समझौते का जो रास्ता निकला था, वह ‘शांतिपूर्ण संक्रमण’ के रास्ते से गुजरता हुआ वर्ग संघर्ष और क्रांति की जरूरत से इंकार में अपनी पूर्णता को प्राप्त हो गया है। यही हाल विभाजन के बाद बनी सीपीएम का है। बेशक, उसकी इस यात्रा का सूत्र दूसरा रहा है। शासक वर्ग के चरित्र के इस विश्लेषण से कि वह ‘साम्राज्यवाद का विरोध करता है और राष्ट्रीय अर्थतंत्र पर उसकी पकड़ को ढीला करता है…। ’मुक्तिबोध का संवेदनात्मक ज्ञान तो टकराता ही है, ज्ञानात्मक संवेदन भी टकराता है। पहले ज्ञानात्मक संवेदन को ही लें। मुक्तिबोध ने ‘अंग्रेज गए पर इतनी अंग्रेजी पूंजी क्यों?’ शीर्षक के अंतर्गत प्रकाशित एक टिप्पणी में कहा है, ‘आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि पंडित नेहरू की पंचवर्षीय योजनाओं में भी प्रतिवर्ष 100 करोड़ रुपयों की विदेशी पूंजी निमंत्रित की गई है। पंचवर्षीय योजना के नाम पर औद्योगिक क्षेत्र में भारतीय पूंजीपति, विदेशी पूंजीपतियों (अंग्रेजों और अमरीकियों) से सांठ-गांठ किए हुए हैं।’आगे इस सांठ-गांठ का आर्थिक आंकड़ों के साथ विस्तृत ब्यौरा है। फिर निष्कर्ष निकाला गया है कि – ‘यहां केवल इतना ही कह देना पर्याप्त है कि एकाधिकारवादी स्वदेशी पूंजी विदेशी आर्थिक स्वार्थों से बहुत हद तक मिल गई है, जिसका फल यह है कि भारत में अन्य विदेशी पूंजी तथा ब्रिटिश पूंजी का शिकंजा ढीला होने के बजाय और अधिक कस गया है’( ‘सारथी’ 3 अक्तूबर, 1954)। आगे इसी टिप्पणीमें अपनी कम पूंजी लगाकर भी विदेशी पूंजी द्वारा अपने से कई गुना अधिक देशी पूंजी पर कई तरीके से नियंत्रण किए जाने के तथ्य दिए गए हैं और निष्कर्ष निकाला गया है कि – ‘…यह अपेक्षा कि भारतीय पूंजीपति इस विदेशी शिकंजे का विरोध करेंगे व्यर्थ-सी है। अपने मुनाफे की वृद्धि के लिए भारत-शासन पर निर्णायक प्रभाव रखते हुए वे साम्राज्यवादी पूंजी को बुलाते हैं, उस पूंजी के जूनियर पार्टनर की हैसियत से काम करते हैं और उनसे पूंजीबद्ध हो जाते हैं। पंचवर्षीय योजना ने उनको इस कार्य में अधिक उत्साहित किया है। स्पष्ट बात यह है कि ये कल के राष्ट्रवादी पूंजीपति आज भारत को केवल औपनिवेशिक क्षेत्र बनाए रखने की ओर ही कदम बढ़ा रहे हैं। ’मुक्तिबोध ने बस इसे राजनीतिक अर्थशास्त्रीय सूत्रीकरण करते हुए मात्र यह नहीं कहा है कि ‘वस्तुतः ये विदेशी पूंजी के दलाल हैं’, अन्यथा इस विश्लेषणात्मक टिप्पणी से अर्थ यही निकलता है। अगर यहां ‘कामायनी: एक पुनर्विचार’ में इस पूंजीवाद की जन्मकुंडली पर व्यक्त मुक्तिबोध के विचार को जोड़ दें तो जो चित्र प्रस्तुत होता है वह यह कि दलाली इस पूंजीपति का जन्मचिह्न (बर्थ मार्क) है: ‘शक्तिशाली ब्रिटिश साम्राज्यवाद के भीतर भारतीय पूंजीवाद का जन्म हुआ। इसके भीतर औद्योगिक पूंजीवाद बहुत क्षीण था। बड़े-बड़े करोड़पतियों की आमदनी का जरिया वस्तुतः अनुत्पादनशील लेन-देन और सट्टा (पढि़ए मिस्ट्रीज आॅफ दी बिड़ला हाउस) था। ’ऐसा पूंजीवाद सामंतवाद से लड़ भी नहीं सकता। ‘साम्राज्यवाद के अंर्गत, पूंजीवादी अर्थतंत्र के भीतर, सामंती तत्वों की प्रभाव-छायाएं बड़ी सघन, बहुत लंबी-चैड़ी और विस्तीर्ण रही। …अर्थात, कुल मिलाकर सामंती तत्वों के प्रति जो आमूल परिवर्तनकारी व्यापक उग्र प्रतिक्रिया होनी चाहिए थी, वह न हुई। …राजनीति, समाजनीति के क्षेत्र में इस प्रक्रिया ने गांधीवादी अर्थतंत्र की प्रवृत्ति को जन्म दिया। मशीनों के विरुद्ध, व्यापक औद्योगीकरण के विरुद्ध, राष्ट्र के केंद्रस्थ शासनतंत्र के विपरीत ग्राम प्रजातंत्र की स्थापना के पक्ष का समर्थन करनेवाली एक ऐसी विचारधारा थी, जो भारत की अविकसित, आर्थिक अवस्था को कायम रखना चाहती थी।… भारत के पिछड़े हुए स्वरूप को समाप्त करने के बजाए उस स्वरूप में आदर्शवादी रंग मिलाना चाहती थी। पूंजीवाद ने कुशलतापूर्वक इस विचारधारा का अपने लिए उपयोग कर लिया।…’और इस तरह भारत में ’47 के बाद जो सामाजिक ढांचा बना वह अर्द्ध सामंती और अर्द्ध औपनिवेशिक था। कम्युनिस्ट पार्टी ने सामंतवाद के खिलाफ निशाना साधते हुए इस राजनीतिक-सामाजिक ढांचे को तोड़ने की जगह शासक वर्ग सम समझौते का, उसका पिछलग्गू बनने का रास्ता अपनाया। इस ढांचे को बलपूर्वक तोड़े बगैर भारतीय जनता की मुक्ति और भारत का उनमुक्त विकास संभव नहीं है –

‘इस-उस जमाने के धंसानों में से

उमड़ते हैं अंधेरे के मेघ

मैं एक थमा हुआ मात्र आवेग

रुका हुआ एक जबर्दस्त कार्यक्रम

मैं एक स्थगित हुआ अगला अध्याय

अनिवार्य

आगे ढकेली गई प्रतीक्षित

महत्वपूर्ण तिथि।’(चंबंल की घाटियां)।

इसी कविता में मध्यवर्ग के साथ-साथ कम्युनिस्ट पार्टी की इस समझौतापरस्ती की भी गहरी आलोचना है ऐसा मानना चाहिए – ‘प्रस्तरीभूत मैं गतियों का हिम हूं

बीच ही में टूट गया कोई पराक्रम हूं’

जैसी पंक्तियां कम्युनिस्ट पार्टी की ओर ही इशारा करती हैं। अन्यथा मध्य वर्ग के किस पराक्रम का जिक्र हो सकता है जो बीच ही में टूट गया। फिर तो

‘शिलीभूत भूमि से

सामंजस्यों का घनीभूत जितना

यत्न है तुम्हारा

उतना ही बंजर बनती है दुनिया

उतनी ही जिंदगी उजाड़ बनती।’

यहां ‘अभिव्यक्ति’ से पैदा हुए दूसरे मसले पर भी बात कर ली जाए। अब अगर अभिव्यक्ति के अंदर जनक्रांति तक समाहित है तो यह भी है कि हर समाज, जिसकी अपनी एक विशेष ऐतिहासिक अवस्था, कालखंड है उसकी अपनी एक ‘संपूर्ण अभिव्यक्ति’, ‘परम अभिव्यक्ति’ भी होती है। कविता या अन्य कला रूप में यह ‘परम अभिव्यक्ति’ सापेक्षिक रूप में ही होगी। मुक्तिबोध की कविताओं में इसकी भी व्याख्या नहीं की गई है, जैसे क्रांति की भी नहीं की गई है। लेकिन कविता की इन पंक्तियों – ‘इसीलिए मैं हर गली में

और हर सड़क पर

झांक-झांक देखता हूं हर एक चेहरा

प्रत्येक गतिविधि

प्रत्येक चरित्र

व हर एक आत्मा का इतिहास

हर एक देश व राजनीतिक स्थिति और परिवेश

प्रत्येक मानवीय स्वानुभूत आदर्श

विवेक-प्रक्रिया, क्रियागत परिणति!!

खोजता हूं पठार…पहाड़…समुंदर

जहां मिल सके मुझे

मेरी वह खोई हुई

परम अभिव्यक्ति

आत्म-संभवा।’

– से कुछ अर्थ निकाला जा सकता है। जिसे किसी निरपेक्ष, रहस्यवादी पूर्ण ज्ञान की तलाश होगी, वह समाधि लगाएगा, कुंडनिली जगाएगा या और बहुत कुछ जो होता है करेगा, वह दूसरा इतना कुछ क्यों करने जाएगा। किसी विश्वविद्यालय, फांउडेशन या कि शोध संस्थान ने उसे इसकी नौकरी भी नहीं दे रखी थी। उसने तो यह जिम्मेदारी खुद अपने कंधों पर ले रखी थी, इस दायित्वबोध के नाते कि ‘वे आते होंगे लोग

जिन्हें तुम दोगे

देना ही होगा, पूरा हिसाब

अपना, सबका, मन का, जन का।’

इस खोज के उद्देश्य सामाजिक हैं। इस खोज की प्रक्रिया यथार्थवादी है, वह यह जानता था कि यह विश्व बोधगम्य है, इसे पूरी तरह जाना जा सकता है लेकिन इसे पूरी तरह कभी भी नहीं जाना जा सकता, क्योंकि वह परिवर्तनशील है। वह हिंदी साहित्य में सबसे अधिक वैज्ञानिक आविष्कारों की न केवल जानकारी रखता था बल्कि कविता में उनका उपयोग भी करता था। इसलिए कहा जा सकता है कि उसने इस ‘परम अभिव्यक्ति’ पद का सापेक्षिक रूप में ही प्रयोग किया होगा, शायद लेनिन के शब्दों में यह सोचते हुए कि ‘फिर भी पूर्णता की मांग ज्ञान को पथरा जाने से रोकती है’ – फिर वही यात्रा सुदूर की, फिर वही खोज भरपूर की। इस खोज का संवेदनात्मक उद्देश्य क्रांतिकारी था वह अपने समय की केवल व्याख्या भर नहीं, उससे मुठभेड़ करते हुए इसकी संपूर्णता में यथार्थ अभिव्यक्ति के जरिए उसे बदलने में हिस्सेदार होना चाहता था। स्पष्ट है कविता क्रांति नहीं होती। लेकिन क्रांति की दुर्निवारता, आसन्नता को अपने समय के यथार्थ के रूप में अभिव्यक्त कर पाना, परम अभिव्यक्ति हैं ऐसी अभिव्यक्ति साहित्य जगत में स्वयं एक क्रांति होती है और वास्तविक जगत में होनेवाली क्रांति से अलग भी होती है और एकाकार भी। इस क्रांतिकारी संवेदनात्मक उद्देश्य को अस्मिता की तलाश के जरिए व्याख्यायित नहीं किया जा सकता, उसके क्रांतिकारी महत्व, उसकी सामाजिक उपयोगिता पर पर्दा जरूर डाला जा सकता है।

सन् 1989 मंे इलाहाबाद में ‘कविता के नए प्रतिमान: पुनर्विचार’ से एक व्याख्यानमाला में व्याख्यान देते हुए नामवर सिंह ने कहा, ‘‘कविता के नए प्रतिमान’ में ‘अनुभूति की प्रामाणिकता’, ‘जटिलता’, ‘तनाव’, ‘विसंगति’, ‘विडंबना’, ‘ईमानदारी’ आदि संकल्पनाओं का जो परीक्षण किया था और अनेक की अपर्याप्तता और असंगतियों का जो संकेत किया था वह केवल तार्किक था। ये सभी अमेरिकन ‘नई समीक्षा’ की संकल्पनाएं थीं।…ये अवधारणाएं केवल अपनी साहित्यिक भूमिका ही नहीं निभा रही थीं बल्कि इनकी एक निश्चित राजनीतिक भूमिका भी थी। ‘कविता के नए प्रतिमान’ में यह नहीं कहा गया है। ‘कविता के नए प्रतिमान’ का रूपवाद यह है कि उसमें रूपवाद की आलोचना भी रूपवादी ढंग से की गई है, ऐतिहासिक आधार पर नहीं।’बताया कि ‘शीत-युद्ध के काल में समीक्षा का जो प्रतिमान सबसे अधिक फला-फूला वह था ‘न्यू क्रिटिसिज्म’ (नई समीक्षा)। इस समीक्षा सिद्धांत मंे यह कहा गया कि बड़ी कविता वह है जिसमें विचारधारा न हो, जिसमें ‘पैराडाक्स’ हो, द्वंद्व हो, तनाव हो, कवि कमिट न करे। तो यह है शीत-युद्ध का काव्यशास्त्र। इसकी सारी शब्दावली ‘विचारधारा के इस अंत’ की शब्दावली है। कहा जाने लगा कि ‘नाजीवाद’ के साथ ही यह कम्युनिस्ट विचारधारा का भी अंत हो गया।’अर्थात इस ‘शीत-युद्ध के काव्यशास्त्र’ का उद्देश्य था कम्युनिज्म विरोध। अब जिस ‘कविता के नए प्रतिमान’ के ‘केंद्र’ में मुक्तिबोध हैं, उनका सारा काव्य और समीक्षा सिद्धांत मूलतः इस शीत-युद्ध के सिद्धांत के खिलाफ संघर्ष है। इस संघर्ष में उन्होंने साफ तौर पर यह निष्कर्ष निकाला कि ‘नई कविता के कलेवर पर शीत-युद्ध की छाप है।’ सवाल यह है कि केंद्र की हालत तो यह है लेकिन उसको अपने ‘कविता के नए प्रतिमान’ के केंद्र में रखनेवाले से ऐसी चूक क्यों हुई? सीधे तो नहीं लेकिन प्रकारांतर से नामवर सिंह यह सफाई देते हैं कि ’‘1968 के आसपास भारतीय राजनीति और उसके समानांतर हमारे साहित्य में जो महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए थे, उनकी झलक ’68 में तो मिली थी, पर उसका वेग बाद में प्रकट हुआ। नक्सलबाड़ी आंदोलन चाहे जितना भी दुस्साहसिक रहा हो, उसने हमारी संपूर्ण चेतना को झकझोर दिया। ‘नई कविता’ के बाद हमारा साहित्य बहुत नगराभिमुख हो चला था। ‘अकविता’ जैसे अराजकतावादी आंदोलन महानगरों की चेतना से आक्रांत थे। नक्सलबाड़ी आंदोलन ने पुनः हमारी नगराभिमुख चेतना को गांवों की ओर लौटाने का काम किया। इसी के चलते बड़े-बड़े कवियों के रहते हुए धूमिल जैसे कवि ने गंवई-गांव के ठेठ मुहावरे से सारी ‘नई कविता’ के भाषा के जादू को तोड़ दिया। 1968 के बाद हमारे देश की राजनीति में और साहित्य में एक लड़ाकूपन, एक जुझारूपन आया, अनेक नए कवि एक नई भाषा और एक नई संवेदना लेकर आए। मुझे लगता है कि ‘कविता के नए प्रतिमान’ में जो नहीं था – परिवर्ती परिस्थितियों के कारण मैं उसे अधिक स्पष्टता से देख पाया।’’ और कहा कि जो काम तब नहीं हो पाया अर्थात ‘नई समीक्षा’ का ऐतिहासिक आधार पर खंडन वह ‘कविता की दूसरी परंपरा’ की खोज और स्थापना के लिए जरूरी है।

और इसके लिए आधुनिकतावाद के दो विभाग बनाए ‘पश्चिमी आधुनिकतावाद और दूसरा, उससे अलग ठेठ अपनी जमीन से, अपनी परंपरा से जो लोग अपना विकास कर रहे थे, अपने लिए रास्ता निकाल रहे थे।’पहली धारा में वे थे जो ‘इलियट, पाउंड आदि की आधुनिकतावादी संवेदना के आधार पर कविताएं लिख रहे थे – अज्ञेय, मुक्तिबोध, शमशेर बहादुर सिंह आदि। दूसरे में थे – नागार्जुन, त्रिलोचन, केदारनाथ अग्रवाल।’ और प्रश्न किया कि देखना यह चाहिए कि सार्थक कविता और काव्य मूल्यों का निर्माण किस धारा के अंतर्गत हुआ? अव्वल तो यह विभाजन ही अवसरवादी, सुविधावादी विभाजन है – ‘गलतियां करते ही रहने का धंधा है तुम्हारा’ – मुक्तिबोध, कबीर, प्रेमचंद, निराला की ठेठ परंपरा को विकसित, परिमार्जित और उन्नत करनेवाली धारा के कवि हैं। इस ओर इस लेख में संकेत भी किए गए हैं। स्वयं नामवर सिंह की अन्य दो बातों से भी यही प्रमाणित होता है। नंबर एक कि वे कहते हैं कि ‘कविता की दूसरी परंपरा’ की खोज और स्थापना के लिए ‘नई समीक्षा’ के ऐतिहासिक आधार का खंडन जरूरी है। अगर ऐसा ही है तो ‘कविता के नए प्रतिमान’ में यह काम आप भले नहीं कर पाए, मुक्तिबोध पहले ही यह काम कर गए हैं। उनका समूचा काव्य शीत-युद्ध के काव्य मूल्यों के पीछे छिपे वर्ग मूल्य और राजनीति के खिलाफ ज्वलंत दस्तावेज है। इस तरह, यह काम आपके लिए छूटा हुआ नहीं है।

दूसरी बात, जिस नक्सलबाड़ी के घटित होने के वर्षों-वर्षों बाद उसकी रोशनी में आप जो कुछ देख पाए, उस नक्सलबाड़ी जैसे किसी विद्रोह की दुर्निवारता की पूर्वाभास है मुक्तिबोध की कविता। जिस फैंटेसी में वे विचरण कर रहे थे, वही नक्सलबाड़ी के विद्रोह के रूप में वास्तव हुई – मैं विचरण करता-सा हूं एक फैंटेसी में, सच है यह फैंटेसी कल वास्तव होगी। उसके सपने का आधार बाहर के देशों में हो रहे छापामार युद्ध ही नहीं थे। सबसे पहले वह अपने लोगों के दहाड़ते विक्षोभों, धरती के छाती के अंदर की ज्वालामुखियों की गड़गड़ाहट को बड़े ध्यान से सुन-देख रहा था और इस सबको सामने ले आने के लिए जी-मर रहा था। वह किसी सुदूर, जिसे कभी न कभी तो जरूर होना है अर्थात क्रांति के प्रति निचतिवादी आस्था रखनेवालों में से नहीं, उसकी हर लहर को यथार्थ रूप में हृदयंगम करनेवालों में से था। वह देख रहा था – छिड़ने ही वाली है युगव्यापी एक बहस, होने ही वाली है भारी जद्दोजहद। और ’68 में कम्युनिस्ट पार्टी दो हिस्सों में बंट गई – सीपीआई और सीपीएम के रूप में। लेकिन सीपीएम के अंदर भी भारतीय शासक वर्ग के चरित्र और भारतीय क्रांति के रास्ते को लेकर छिड़ी बहस रुकी नहीं और तेज हो गई – फूट पड़ी नक्सलबाड़ी के विद्रोह की चिंगारी – ‘हठात आंखों के सामने लगा, जैसे भारतवर्ष पर छाए हुए अंधेरे बादल छंट गए हों, दीप्त सूर्यालोक से जगमगा रहा हो मेरा देश भारतवर्ष, जनता का जनवादी भारतवर्ष, समाजवादी भारतवर्ष।’(चारु मजुमदार) और जैसे जादू के जोर से खिंची चल पड़ी दसियों हजार नौजवान कम्युनिस्टों की एक समूची पीढ़ी, जिस पीढ़ी ने स्वेच्छा से रवींद्रनाथ के शब्दों में ‘जीबन आर मृत्यु के पाएर भृत्य बानिए’(जीवन और मृत्यु को पांवों की दासी बनाकर) शहादत कबूल की। मुक्तिबोध नक्सलबाड़ी के अवांगार्द कवि हैं।

जिस तरह नक्सलबाड़ी क्रांति के ठेठ भारतीय रास्ते की, नए भारत की खोज है, उसी तरह ‘परम अभिव्यक्ति की खोज’ नए आधुनिक भारत और भारतीय काव्य मूल्यों की खोज है – इस पर आगे और बात की जानी चाहिए – जिसे नामवर सिंह मुक्तिबोध को ईलियट, पाउंड आदि की आधुनिकतावादी संवेदना के खांचे में रखकर ‘अस्मिता की खोज’ बना डालते हैं और उसके क्रांतिकारी महत्व और सामाजिक उपयोगिता पर पर्दा डाल देते हैं। मुक्तिबोध, नागार्जुन, त्रिलोचन को चर्चा के केंद्र में ले आने का काम भी सबसे आगे बढ़कर नक्सलबाड़ी ने किया, जैसे उन मूल्यों को जिनकी नामवर सिंह ने चर्चा की है और ठीक ही चर्चा की है।

आप की ही बात मान ली जाए कि आपने ‘नई समीक्षा’ के रूपवाद का रूपवादी ‘खंडन’ किया है तब भी विडंबना देखिए कि आप रूपवाद के रूपवादी खंडन में ही फंसे रह गए (यह क्यों हुआ! क्योंकर हुआ!!) जबकि उसने भाववादी शिल्प, ‘बुर्जुआ के ही औजार का उपयोग’ कर 1947 के बाद के नए यथार्थ, नए भारत की खोज की यथार्थ अभिव्यक्ति कर डाली। ‘इससे फर्क नहीं पड़ता कि आपने हथियार किसी डकैत से लिया या किसी और से असल सवाल यह है कि आप उसका कैसा और किसलिए इस्तेमाल करते हैं।’ (लेनिन)। ‘परम अभिव्यक्ति की खोज’ ठेठ अर्थों में आधुनिक नए भारत की खोज है, ‘अस्मिता की खोज’ नहीं।

‘अजीब हुआ

वह भीतर से देदीप्यमान जो रहती थी

भू-गर्भ-गुहा

अब अंधियारी, काली व स्तब्ध

निश्चेतन, जड़, दुःसहा!!

अजीब हुआ!!’

11 सितंबर, 1964। मुक्तिबोध नहीं रहे। लेकिन नए भारत को निर्मित और स्थापित करने का काम अभी भी बाकी है। जो फासिस्ट शक्तियां कल तक अंधेरे में जुलूस निकालकर चलती थीं और जो, 1975 में आपातकाल के रूप में एक बार सामने आई थीं, आज वे खुलेआम देश की छाती पर चढ़ी हुई दिन में भी अंधेर मचाए हुए हैं। वे आधुनिक मानव मूल्यों को, जनतंत्र को, वह चाहे जितना कमजोर ही क्यों न हो, खत्म कर देश पर पूरी तरह (अभी वे इसमें पूरी तरह कामयाब नहीं हो पाई हैं) फासिस्ट शासन थोप देना चाहती हैं। नए आर्थिक सिद्धांत बनाकर देश की स्वतंत्रता और संप्रभुता को साम्राज्यवादियों के हाथों गिरवी रखती जा रही हैं। परिवर्तन की विरोधी, अतीत को व्यतीत न माननेवाली सनातनी शक्तियां यह सब कुछ भारतीयता और भारतीय संस्कृति के नाम पर करना चाहती हैं। उनके अनुसार, ‘हमारे यहां (भारत में) अतीत व्यतीत नहीं होता।’ (निर्मल वर्मा, भारत और यूरोप प्रतिश्रुति के क्षेत्र) वे आधुनिक जीवन मूल्यों के लिए संघर्ष को यूरोप बनाम भारत, भारतीय बनाम पश्चिमी के जाल में उलझाकर रूढि़वादी, प्रतिक्रियावादी जीवन मूल्यों को स्थापित करना चाहती हैं। वे क्रांतिकारी, परिवर्तनकारी नवीन प्रेरणाओं को हर तरह से राष्ट्रीय उन्मादों को पैदा कर मार डालना चाहती हैं। वैचारिक क्षेत्र में तरह-तरह के ‘उत्तरवाद’ मूल रूप से प्रतिक्रियावाद की ही विचारधाराएं हैं। उपभोक्तावाद से संयुक्त अवसरवाद की बाढ़ मुक्तिबोध के समय से कहीं ज्यादा विकराल हुई है। कल तक एकाध-दो फांउडेशन आदि हुआ करते थे, आजकल न जाने कितने फाउंडेशन और ‘स्वयंसेवी संस्थाएं’ हैं, बौद्धिक वर्ग को क्रीतदास बनाने और किराए के विचारों का उद्भाष कराने के लिए। ‘उम्मीद भी पहले-सी चुलबुली लड़की नहीं रही’(विस्वावा शिंबोश्र्का) ऐसे में औरों के साथ-साथ वामपंथी कतारों का एक हिस्सा भी इस उपभोक्तावादी-अवसरवाद में खूब गोते लगा रहा है। इस नाते भी वैचारिक अंधेरा और घना हो रहा है। अंतरराष्ट्रीय-राष्ट्रीय स्थितियां जिस तरह की हैं वे फासिस्ट शक्तियों और विचारों को सुदृढ़ कर रही हैं। आतंकवाद के नाम पर अमरीका का अफगान युद्ध साम्राज्यवादी युद्ध है, इसमें कोई शक नहीं। यह कौन सा मोड़ लेगा यह तय नहीं है लेकिन हमारे अपने देश में इस स्थिति का फायदा उठाकर शासन-सत्ता एक फासिस्ट सत्ता के रूप में उभर आने की पूरी कोशिश कर रही है –

‘साम्राज्यवादियों के बदशक्ल चेहरे

एटमिक धुएं के बादलों-से गहरे

क्षितिज पर छाए हैं

…साम्राज्यवादियों के पैसे की संस्कृति

भारतीय आकृति में बंधकर

दिल्ली को

वाशिंगटन व लंदन का उपनगर बनाने पर तुली है

भारतीय धनतंत्री

जनतंत्री बुद्धिवादी

स्वेच्छा से उसी का ही कुली है

…जन-राष्ट्र-लोकनायक

जन-मुक्ति-आंदोलन

के सिद्ध विरोधी

ये साम्राज्यवादियों की पांत में ही बैठे हैं

जनता के विरुद्ध घोर अपराध कर

फांसी के फंदे की रस्सी से ऐंठे हैं।’

लगभग ऐसा ही है हमारे ‘जमाने का चेहरा’। बेशक, इसके खिलाफ अपने देश में भी और दुनिया के पैमाने पर विरोध की शक्तियां भी पहले के मुकाबले बड़े पैमाने पर गतिशील और लामबंद हो रही हैं। हमें अपने समय और समाज का नए सिरे से भीतर से बाहर तक व्यापक सर्वेक्षण करने, और भी अधिक दृढ़ता से और भी अधिक कठोर आत्म संघर्ष चलाने, ज्ञान के क्षेत्र में अद्यतन खोजों का आलोचनात्मक नजरिए से विश्लेषण करते हुए अपनी विश्वदृष्टि को विकसित और अद्यतन बनाने की जी-तोड़ कोशिश करना बहुत जरूरी है। ‘जो उम्मीद त्याग चुके हैं’ – कहने दो उन्हें जो कहते हैं। हमें जनता की प्रतिरोधी शक्ति, क्रांतिकारी भावना और सामाजिक क्रांति में उम्मीद जगाने वाली अभिव्यक्ति के लिए ही जीना और मरना है। ‘अंधेरे’ के उस महाकवि से हमें आज भी बहुत कुछ सीखना बाकी है।

रामजी राय

रामजी राय

रामजी राय  बहुत कम और तीखा लिखने के साथ-साथ अपनी राजनीतिक सक्रियताओं के लिए जाने जाते हैं। समकालीन जनमत के प्रधान संपादक। जन संस्कृति मंच से जुड़ाव।

पटना कलम- विलुप्त शैली की कुछ कवितायें: कृष्ण कल्पित

By कृष्ण कल्पित 

1

जेपी लोकतन्त्र की आँख से ;

ढुलका हुआ आँसू था,

जो अब सुख चला है, पार्थ!

‘कि जनता आती है’ वाले;

विशाल गांधी मैदान में,

अब बाजीगर और रंडियाँ घूमते हैं!

दरअसल;

सम्पूर्ण क्रांति

अब एक रेलगाड़ी का नाम है, सार्त्र!

Image by Uday Shankar

Image by Uday Shankar

2.

(आज नालंदा-राजगीर से लौटा हूँ, पार्थ!)

उड़ रही  ख़ाक बची है, भंते!

बुद्ध की राख़ बची है, भंते!

गिड़गिड़ाने से कुछ नहीं हासिल,

बात-बेबाक बची है, भंते!

बाँट दी सबको चिट्ठियाँ दुःख की,

अब कहाँ डाक बची है, भंते!

परखचे उड़ चुके हैं कल्पित के,

इक फकत साख बची है, भंते!

मेरे हिस्से की पी गए शमशेर,

अब महज़ ताख बची है, भंते!

3.

(विश्वनाथ त्रिपाठी के लिए)

काहे नाराज़  हो निउनिया तुम।

दिल में जूँ राज़ हो निउनिया तुम।

बज रहा साज़ हो निउनिया तुम।

मेरी आवाज़ हो निउनिया तुम।

मुझको अंज़ाम-ए-मुहब्बत समझो,

और आगाज़ हो निउनिया तुम।

कल कहाँ थी मुझे नहीं मालूम,

अब-अभी-आज हो निउनिया तुम।

बंड था बाण भूल जा उसको,

अब तो हल्लाज हो निउनिया तुम।

एक पनवाँ खिलाय दो हमको,

काहे नाराज़ हो निउनिया तुम।

Image by Uday Shankar

Image by Uday Shankar

4.

आज क्या लिखके भेज दूँ तुमको।

तुम तो जानो हो क्या कहूँ तुमको।

रंग फबता है नीलगूँ तुमको।

तुम जो बोलो तो कल मिलूँ तुमको।

हममें कुछ फ़र्क़ ही नहीं जानम,

मैं भी पागल हूँ और जुनूँ तुमको।

आज कुछ इस तरह से हो जाए,

बोलता मैं रहूँ सुनूँ तुमको।

इक उचटती निगाह ले जाओ,

कुछ तो तोहफ़ा नज़र करूँ तुमको।

बेख़याली में काश हो जाए,

डगमगा कर के थाम लूँ तुमको!

5.

मैं भी कब तक यहाँ रह लूँगा,

मैं भी एक दिन मर जाऊँगा।

मेरा घर है चाँद के पीछे,

मैं भी अपने घर जाऊँगा।

सरहप्पा से गोरख आई,

ऐसी थी मजबूत बुनाई,

ओढ़ रहा हूँ बड़े जतन से,

मैं भी चादर धर जाऊँगा।

आज मेरे कल दिवस दूसरा,

आएगा फिर नया सिरफिरा,

थोड़े दिन की बात है जानम,

मैं भी तुम्हें बिसर जाऊँगा!

6.

कौन मक्कार कहता है कि

ठुमरी का अवसान हो जाएगा, पार्थ!

ख़माज ख़त्म हो जाएगा,

दादरा नष्ट हो जाएगा और चैती बिसरा दी जाएगी!

तब उस स्त्री का क्या होगा

जिसने अपना जीवन

करुण-किरवानी को अर्पित कर दिया है, सार्त्र!…

‘चैत मास बोले रे कोयलिया, हे रामा! मोरे अंगनवा!’

और वह अंधा हारमोनियम वादक!

कृष्ण कल्पित

कृष्ण कल्पित

अपने तरह का अकेला-बेबाक और विवादित कवि । कृष्ण कल्पित का जन्म 30 अक्टूबर, 1957 को रेगिस्तान के एक कस्बे फतेहपुर शेखावटी में हुआ। अब तक कविता की तीन किताबें और मीडिया पर समीक्षा की एक किताब छप चुकी है। एक शराबी की सूक्तियां  के लिए खासे चर्चित। ऋत्विक घटक के जीवन पर एक पेड की कहानी नाम से एक वृत्तचित्र भी बना चुके हैं। 

आलोचना -सहस्त्राब्दी अंक सैंतालीस से साभार 

समकालीन कविता का आत्मसंघर्ष: सुधीर रंजन सिंह

By सुधीर रंजन सिंह 

(इस आलेख को भारत भवन में प्रस्तुत करने को लेकर मुझे एक अत्यंत आत्मीय और अग्रज कवि से तीखे विवाद और आत्मसंघर्ष से गुज़रना पड़ा है। मैं कभी किसी राजनीतिक संस्था या लेखक संगठन का सदस्य नहीं रहा। मैं कवि और आलोचक हूँ। कदाचित अस्वीकृत। स्वीकृति की शर्तें पूरी करने में मैं अपने को अयोग्य अनुभव करता हूँ। मंच और संस्थाओं से संवाद के स्तर पर मेरा सम्बन्ध रहा है। इसके लिए भी मैंने खुद होकर विशेष प्रयास नहीं किया। आलोचनात्मक लेखन प्रायः मैंने अपनी अकादमिक आवश्यकताओं  के अधीन किया है। आमंत्रण अथवा आग्रह पर कुछ ही लेखन किए हैं। अवसर ही कम थे। दूसरे स्तर पर, अपने लोगों से सीखने में मैं कभी पीछे नहीं रहा। यह प्रक्रिया है, जिसका लाभ मुझसे दूसरों ने भी लिया होगा। मेरा अनुभव है कि मेरी बातों का जिन लोगों ने लाभ लिया, मंच पर खड़े होने की दशा में उन्होंने मेरी तरफ पीठ कर ली।
मंचों की पीठ मेरी ओर अधिक रही। प्रतिबद्धता की पीठ भी मेरी ओर रही। विरोधियों का सामना करते हुए यह बात होती तो मैं इसे भी सह लेता। उनके साथ तो सामंजस्य के कीर्तिमान स्थापित किए गए। कॅरियर की दुनिया में, चाहे वह साहित्य से सम्बन्धित क्यों न हो, कोई सचमुच शत्रु नहीं होता और सच्चा मित्र भी शायद ही कोई होता है। सच यही है कि सत्ता संरचना से बाहर कोई नहीं है, और इसका पापबोध भी नहीं है। सामंजस्य को रणनीति की संज्ञा दी जाती है। लेकिन उनका यह सोचना कहाँ तक ठीक है कि दूसरे हमेशा  बिना हथियार और रणनीति के अपने पापबोध में अलग-थलग पड़े रहें?
मित्र की मर्जी के विरुद्ध मैंने यह आलेख प्रस्तुत किया, निश्चित  ही यह अपराध मुझसे हुआ है। इसे लेकर मैं यही अनुभव करता हूँ, भर्तृहरि का श्लोक है- ‘‘बौद्धरो मत्सरग्रस्ताः प्रभवः स्मयदूषिताः। अबोधोपहताष्चान्ये जीर्णमंङ्गे सुभाषितम्।।’’ इसकी अनुरचना मेरे द्वारा की गई है- ‘‘जाऊँ, किसे सुनाऊँ/ ठहरे जो विज्ञ विषारद/ रोग डाह का उन्हें लगा है/ कुबेर बड़े कि अधिकारी जो/ रहते ऐंठे-ऐंठे हैं/ जनगण है अपना/ समझ उतना पाए न वह/ छीज जातीं बातें अच्छी/ देह के भीतर।’’)

 लाँग नाइन्टीज़: अनेकान्त काल

विषय है मानवीय मूल्य और समकालीन हिन्दी कविता का आत्मसंघर्ष। यहाँ विशेषण के रूप में आया मानवीय स्वयं मूल्य है, और जहाँ तक मुझे ध्यान है कविता के सन्दर्भ में मानवीय मूल्य को आगे करके कोई बहस नहीं चली है। हिन्दी में नई कविता के सिद्धान्तकारों के द्वारा प्रचलित पद है- मानव मूल्य। यह बहस के लिए तब बड़ा विषय हुआ करता था और उसके पीछे एक उद्देश्य था। साहित्यिक बहसों के पीछे उद्देश्य प्रायः राजनीतिक ही हुआ करते हैं। मानव मूल्य पर विचार के साथ भी यह था। मुझे थोड़ी देर के लिए उस प्रसंग में जाने की इजाजत दें। उसके बाद मैं समकालीन कविता के आत्मसंघर्ष पर जिरह की इजाजत चाहूँगा। अन्त में यदि सम्भव हुआ तो मानवीय मूल्य पर अपनी बात समाप्त करूँगा।

धर्मवीर भारती की एक पुस्तक का नाम है- मानव मूल्य और साहित्य। भारती नई कविता के प्रमुख कवियों में से हैं, लेकिन नई कविता के प्रमुख सिद्धान्तकार थे लक्ष्मीकांत वर्मा और विजय देवनारायण साही। लक्ष्मीकांत वर्मा की पुस्तक नई कवित के प्रतिमान, जो बहस की दृष्टि से उस ज़माने में पर्याप्त महत्त्व की थी, में एक लेख है- मानव विशिष्टता और आत्मविश्वास के आधारमानव विशिष्टता से लक्ष्मीकांत वर्मा का आशय मानव मूल्य ही था। यह 1957 की पुस्तक है। इससे पहले 1948 से 1956 के बीच जयशंकर प्रसाद से पद उधार लेकर लघुमानव की धारणा को आगे किया गया था, जिसका विकास विजय देवनारायण साही के प्रसिद्ध विवादित लेख लघुमानव के बहाने हिन्दी कविता पर बातचीत में हुआ। उसमें लघुमानव को मानव मूल्य का सैद्धान्तिक आधार दिया गया और छायावाद से लेकर अज्ञेय तक की कविता पर विचारोत्तेजक टिप्पणी की गई। बाद में लक्ष्मीकांत वर्मा ने साही के प्रयास को नई कवितावादी सूत्र के रूप में सामने रखा मानव मूल्यों के सन्दर्भ में लघु-मानव की कल्पना नामक लेख में। इस प्रकार, ‘मानव मूल्य पद अथवा अवधारणा नई कविता द्वारा प्रचलित है। उसी की शब्दावली में कहें तो यह नई कविता के सहचिन्तन की उपलब्धि है। यह अच्छी बात है कि नई कविता में सामूहिक चिन्तन था, जो आज प्रायः दुर्लभ हो गया है। उस सामूहिक चिन्तन का दोष यह था, मुक्तिबोध की शब्दावली में कहें, उसने एक क्लोज्ड सिस्टम बना लिया था, जिससे संघर्ष की आवश्यकता थी, और जिसे मुक्तिबोध ने आत्मसंघर्ष की संज्ञा दी थी – नई कविता का आत्मसंघर्ष। आज हम समकालीन कविता के आत्मसंघर्ष पर बात कर रहे हैं तो उस आत्मसंघर्ष को भी याद किया जाना चाहिएजिसे मुक्तिबोध ने नई कविता के सन्दर्भ में आवश्यक समझा था। उनकी यह बात यहाँ याद करने योग्य है, ‘‘नई कविता में स्वयं कई भावधाराएँ हैं, एक भाव-धारा नहीं। इनमें से एक भाव-धारा में प्रगतिशील तत्त्व पर्याप्त है।  समीक्षा होना बहुत आवश्यक है। मेरा अपना मत है, आगे चलकर नई कविता में प्रगतिशील तत्त्व और भी बढ़ते जाएँगे, और वह मानवता के अधिकाधिक समीप आएगी।’’1

आगे चलकर नई कविता में प्रगतिशील तत्त्व तो नहीं बढ़े- नई कविता ही नहीं रही- लेकिन प्रगतिशील कविता का जो अगला विस्तार हुआ, उसमें नई कविता के तत्त्व अवश्य बढ़ गए। यह एक हद तक ज़रूरी भी था। नई कविता में नएपन पर जो जोर था, उसका मूल्य है। उसके कुछ दीग़र मूल्यों से असहमति की गुंजाइश है। मुक्तिबोध का आत्मसंघर्ष उसी गुंजाइश को दर्शाता है। उनके यहाँ मानवता का प्रयोग नई कविता के सहचिन्तन के परिणाम के रूप में आने वाला मानव मूल्य के अर्थ में नहीं हुआ है। नई कविता में मानव मूल्य को अर्थ दिया गया था- अनुभूति की प्रामाणिकता, ‘अनुभूति की ईमानदारी आदि। इस अर्थ में खोट नहीं है, खोट है इसकी ऐतिहासिक नियति में। नई कविता से पहले यूरोप में आवाँगार्द कला में प्रामाणिक अनुभव को पकड़ने का सराहनीय प्रयास हुआ था, लेकिन बाद में वही प्रामाणिक अनुभव शीतयुद्ध की राजनीति की विचारधारा बना, जिसका शिकार नई कविता भी हुई। उसके प्रति मुक्तिबोध ने सावधान किया था। उनके शब्द हैं, ‘नई कविता के बुर्ज से शीतयुद्ध की गोलन्दाजी हो रही है। यह आकस्मिक नहीं है कि मुक्तिबोध ने अनुभूति की प्रामाणिकता के वज़न पर जीवनानुभूति पद को आगे किया। जीवनानुभूति में मानवता का पक्ष प्रबल है। आज हम कह सकते हैं कि जीवनानुभूति की धारणा कविता के सन्दर्भ में पर्याप्त नहीं है, लेकिन उसकी ऐतिहासिक आवश्यकता से इनकार नहीं कर सकते हैं। उसमें शीतयुद्ध की गोलन्दाजी के विरुद्ध जीवनानुभूति के ज़रिए मानवता के अधिकाधिक समीप जाने की चेष्टा की गई है।

शीतयुद्ध 1986-’87 में समाप्त हो गया। आज यह बहस बेकार है कि शीतयुद्ध का खलनायक अमरीका था या अमरीका और रूस दोनों देश। सिर्फ़ यही कहा जा सकता था कि द्विधु्रवीय व्यवस्था से विश्वव्यापी संकट पैदा हो गया था। शीतयुद्ध की समाप्ति के पाँच साल बाद सोवियत-कम्यून भी समाप्त हो गये और  नई विश्व-व्यवस्था आई। इस बात को बीस साल हो गए हैं। आज इस गोष्ठी के माध्यम से कविता के सन्दर्भ में मानव मूल्य का प्रश्न उठाया गया है तो इसकी प्रासंगिकता को समझना हमारे लिए ज़रूरी है। नई कविता की वापसी तो सम्भव नहीं है, लेकिन मुझे लगता है कि नई कविता की जो राजनीति थी, जिससे मुक्तिबोध ने अगाह किया था, उसी तरह की समझ की वापसी हो रही है।

90 के बाद का समय हमारा जीवन काल है- हमारा यानी सामान्य रूप से स्वाधीनता के आसपास जनमे लोगों से लेकर युवतम पीढ़ी का। इनमें संवेदना अथवा चेतना के धरातल पर मैं बहुत भेद नहीं करना चाहता। समसामयिक होने के नाते लोगों के पूर्वग्रह काम कर सकते हैं। समकालीनता के साथ यह बात प्रायः होती ही है। वर्तमान मतभेद की भूमि न हो, तो वह कितनी बेजान चीज़ होगी, इसका अनुमान किया जा सकता है। इसके बावजूद, वर्तमान की वास्तविक विशिष्टताओं का शरसन्धान कठिन होता है। इसके लिए बहुत बड़ी बहस की आवश्यकता है। वर्तमान के अन्तर्विरोध आखिर हमारे ही अन्तर्विरोध होते हैं, जिन्हें समझने के लिए समसामयिक ऐतिहासिक यथार्थ को कठोर आत्मचेतना के स्तर पर पहचानने की आवश्यकता होती है।

समकालीनता पर कच्ची-पक्की बहसें हमेशा चलती रहती हैं। कविता के सन्दर्भ में कई उल्लेखनीय बहसें हुई हैं। अभी-अभी एकांत श्रीवास्तव ने वागर्थ का अंक निकाला है- हिन्दी कविता: 80 के बाद (लाँग नइान्टीज़)। उसमें दस लोगों ने बहस में भाग लिया है। लाँग नाइन्टीज़ की अवधारणा बद्रीनारायण की है। 2008 में देखने को मिली द लाँग नाइन्टीज़: समय को समझने का एक विनम्र प्रस्ताव शीर्षक से। उसी की कड़ी है फटी हुई जीभ की दास्तान नामक लेख जो 2009 में छपा था। वह विचारोत्तेजक मामला है, जिस पर मैंने थोड़ा-सा लिखा है जो आलोचना के नए अंक में छपा है। आज की बहस में भी मैं लाँग नाइन्टीज़ से जुड़ी कुछ बातें कहने की इजाजत चाहूँगा।

लाँग नाइन्टीज़ के पहले राजेश जोशी और विजय कुमार आलोचना के मंच से समकालीनता और कविता विषय को बहस के लिए आगे कर चुके थे। बाद में राजेश जोशी ने अपनी दूसरी नोटबुक वाली किताब का नाम ही रखा- समकालीनता और साहित्य। उसमें समकालीनता और कविता लेख में मेरी धारणा का उल्लेख किया गया है, जो मैंने एरिक हॉब्सबॉम की ‘शॉर्ट सेंचुरी के वज़न पर रखी थी- हमारे अपने सन्दर्भ में 19वीं शताब्दी की शुरूआत 1857 के विद्रोह से और 20वीं शताब्दी की शुरूआत 1947 में मिली आज़ादी से मानी जानी चाहिए। राजेश जोशी ने अपनी सुविधा के अनुसार मेरी उस बात को छोड़ दिया कि हमारे सन्दर्भ में 20वीं शताब्दी लगभग असमाप्त है। समाप्ति के कुछ चिह्न बाबरी मस्जिद के ध्वंस और उसके बाद की कुछ घटनाओं में अवश्य दिखते हैं। लेकिन हम 21वीं शताब्दी में आ गए हैं, कि इसे लेकर मेरे मन में दुविधा है। सूचना-प्रौद्योगिकी के विस्तार के लिहाज से यह आप कह सकते हैं कि हम लगभग 21वीं शताब्दी में आ गए हैं।

यह हमारा जीवन काल है। जब तक हम जि़न्दा हैं इसे समझने के लिए बार-बार नए सिरे से प्रयास की आवश्यकता होगी। और यह कोई प्रलय-काल नहीं है। वे बहुत-सी आशाएँ जो मनुष्य ने कल्पित की थीं, इस काल में फली-फूल रही हैं। एक स्वप्नहीनता के बावजूद। यह बात कविता में भी है। कविता का अर्थ होता है स्वप्नहीनता के विरुद्ध होना, भविष्य की ओर देखना। ब्रेख्त की मशहूर कविता है आने वाली पीढि़यों से, जो इस बेचैनी के साथ शुरू होती है- सचमुच, मैं एक अँधेरे वक्त़ में जी रहा हूँ!यह उस वक्त़ की कविता है जब द्वितीय विश्वयुद्ध का आग़ाज़ हो चुका था। मानवता भीषण ख़तरे में पड़ गई थी। यह कवि के लिए घोर आत्मसंघर्ष का दौर था, जिसमें वह अपनी कमियों को भी टटोलता है। सबने पढ़ी होगी यह कविता। कविता समाप्त होती है-

पर तुम, जब वह वक्त आए

आदमी आदमी का मददगार हो

याद करना हमें

कुछ समझदारी के साथ।

वह वक्त़ आए, कविता इसी के लिए लिखी जाती है। इसी बात में कवि की समकालीनता, आत्मसंघर्ष और भविष्य में उसका जीवन है। यही मानवीय मूल्य भी है। मानवीय मूल्य सत्य के अन्वेषण में है। सत्य वही नहीं जो हम देखते हैं, बड़ा सत्य वह है जो हम चाहते हैं। सवाल यह है कि हम चाहते क्या हैं और कितनी ताकत के साथ चाहते हैं। बहुत ऊर्जा चाहिए। बहुत ताकत चाहिए। बहुत सावधानी भी चाहिए। लेकिन विगत के उद्यमों, चाहे वे आसन्न विगत के क्या न हों, को झुठलाने और नकारने की आवश्यकता नहीं पड़नी चाहिए। पुराने के बीच से ही नया फूटता है। नए के भीतर से दूसरा नया फूटेगा। पुराना फ़ैशन की तरह कभी न लौटे, लेकिन उसका अद्भुत अपनी जगह ज़रूर बना रहेगा, और उसमें झाँकने की भी आवश्यकता बनी रहेगी।

समकालीन कवि वह है जो अपने को पूर्ववर्तियों की वैचारिक मान्यताओं की कड़ी के रूप में देखता है। वह केवल वास्तविकता की ओर उन्मुख नहीं है। वास्तविकता को वह आत्मचेतना के स्तर पर रचने का प्रयास करता है, जिसमें भविष्य और उसके रास्ते संकेतित होते हैं। यह काम चुपचाप चलता है, बहुत बोलकर नहीं। कविता की यही प्रकृति है। कवि के आत्मसंघर्ष की यह प्रकृति है। कवि वास्तविकता का हिस्सा मात्र नहीं होता। वह वास्तविकता के विरुद्ध एकांत की रचना करता है,और एकांत जिस चुप्पी की रचना करता है उसमें अनन्त का स्फोट होता है। दूसरे शब्दों में, भविष्य का स्फोट होता है।

प्रश्न है हमारा समय क्या है? हमारे समय की कविता कैसी है? बद्री हमारे समय को लाँग नाइन्टीज़ नाम देते हैं। लाँग नाइन्टीज़ यानी हॉब्सबॉम की ‘शॉर्ट सेंचुरी के बाद का समय, जिसमें पुराना समाप्त हो चुका, लेकिन नए का स्वप्न साफ नहीं है। लाँग नाइन्टीज़ पद में, इस तरह समाजवाद के भविष्य के प्रति निराशा दिखाई देती है। निराशा उचित है। लेकिन उस निराशा के उत्तर में इधर-उधर से लाए गए वैचारिक संस्रोतों में जो चमक और ऊर्जा देखी गई है, और जिस तरह पूर्व पीढ़ी के कृतित्व पर शरसन्धान किया गया है, वह आत्मश्लाघापूर्ण विच्छेद की ऊँचाई पर है। किसान, मजदूर और प्रोलेटेरियत आन्दोलनांे के बरक्स उपेक्षित एवं दलित, महिला एवं सबाल्टर्न प्रतिरोध बद्री के अनुसार ’90 के बाद की विशेषता है। (वागर्थ-209/34) इससे सहमत होने की गुंजाइश मेरी समझ से कम बनती है। ये बातें बहुत पहले पैदा हो गई थीं। हॉब्सबॉम की पुस्तक एज़ ऑफ एक्सट्रिम्स के शुरू में लोगों की नज़र में बीसवीं शताब्दी क्या है शीर्षक के अन्तर्गत कुछ टिप्पणियाँ शामिल की गईं हैं। नोबेल पुरस्कार से सम्मानित रीता लेवी मोंतेलसिनी की टिप्पणी है, ‘‘सभी बातों के बावजूद इस शताब्दी में अच्छे से अधिक अच्छे के लिए क्रांतियाँ हुई हैं… चैथी सत्ता का उदय और सदियों से दमित नारी का उत्थान।’’ यह बात यूरोप की तुलना में भारत में कम हुई थी, लेकिन हुई थी। कविता में भी ’90 से पहले यह दिखाई पड़ती है। रघुवीर सहाय में स्त्री प्रश्न खूब है। मंगलेश, अरुण कमल, राजेश जोशी और उदयप्रकाश में भी है। यह अलग बात है कि इन कवियों ने इसे अलगा कर दिखाने की कोशिश नहीं की, और पिछले दौर में कवयित्रियों का अभाव रहा। अच्छी बात है कि बद्री ने अपने पूर्व के कुछ कवियों को, जिसमें राजेश और अरुण हैं, सरलीकरण की प्रवृत्ति से बाहर रखकर देखा है, लेकिन इसके लिए उन्हें ’90 का ऋणी बना दिया है। बड़ी चीज़ नब्बे है; जैसे पहले छायावाद के विरुद्ध बड़ी चीज़ नई कविता थी। नयी कविता छायावादी संस्कार की शत्रु थी; ’90 परवर्ती प्रगतिशील संस्कार का किंचित शत्रु हुआ।

प्रगतिशील कविता, अपने सफल-असफल दावों में, मानवता के लिए संश्लिष्ट विश्वदृष्टि अर्जित करने का प्रयास करती है। विश्वदृष्टि का अर्थ विचारधारा अथवा माक्र्सवादी दृष्टि नहीं। विश्वदृष्टि का सम्बन्ध साहित्य से है, वह साहित्य से उद्भूत होने वाली चीज़ है। नई कविता भी विश्वदृष्टि अर्जित करने का प्रयास करती है। अज्ञेय के यहाँ यह बात है। प्रगतिशील कविता और नई कविता, दोनों आधारभूत विभिन्नताओं को टटोलने का प्रयास करती हैं। दोनों अपने-अपने स्तर पर एक जगह आकर मिलने का भी प्रयास करती हैं। शमशेर और मुक्तिबोध, दोनों इस बात के उदाहरण हैं। अच्छी बात थी कि इन कवियों में जीत की तमन्ना थी तो असफलता का इतिहास रचने का साहस था, जो बाद में कम दिखाई पड़ता है। आज सफलता के लिए जोड़-तोड़ कितना बढ़ा है, बद्रीनारायण को भी मालूम है।

बद्रीनारायण ने जितने समकालीन प्रतिरोध गिनाए हैं, उनमें से एक है सबाल्टर्न। यह भी ’90 की कोई संवृत्ति नहीं है। दूसरी बात, जैसे आवाँगार्द की कला में बाद में आकर्षण नहीं बचा था, वही बात सबाल्टर्न के साथ है। सबाल्टर्न लोग त्रासदी के प्रसन्न-चित्त आख्याता बन गए, सांस्कृतिक प्रभुत्व (कल्चरल हिगेमनी) तोड़ना उनके एजेंडे में नहीं रहा। आज जब मजदूरों, किसानों, निम्न बुर्जुआ का लोकप्रिय गठबंधन, जिसे जनता कहा जाता है, गायब हो रहा है, सबाल्टर्न पर फ्रेडरिक जैम्सन की उत्तर आधुनिकता के विमर्षों पर यह टिप्पणी सही बैठती है।

इसके लिए फ्रायड के स्वप्न विश्लेषण के रूपक का इस्तेमाल किया गया है। संभवतः सब बातों के बावजूद यह नई कहानी नहीं है। फ्रायड के उस आनन्द को याद करें जो उन्हें एक अस्पष्ट आदिवासी संस्कृति की खोज से प्राप्त हुआ था। स्वप्न विश्लेषण की अनेक परम्पराओं में से सिर्फ़ यह खोज उनकी अवधारणा के काम की थी कि सभी स्वप्नों के सेक्स सम्बन्धी छुपे अर्थ होते हैं- केवल सेक्स सम्बन्धी स्वप्नों के, जिसके कुछ और ही अर्थ होते हैं। यही बात उत्तर आधुनिक बहसों पर भी लागू होती है। जिस विराजनीतिक नौकरशाही से यह संवाद स्थापित करता है, वहाँ समस्त सांस्कृतिक लगने वाली बातें राजनीतिक नीतिशिक्षण का प्रतीकात्मक रूप निकालती हैं- सिवाय एकमात्र स्पष्ट राजनीतिक स्वर के जो पुनः राजनीति से संस्कृति में घुसपैठ का लक्ष्य रखता है।2

    बद्रीनारायण ने ’90 के दशक में उभरे कवियों में सामान्य सम्बन्ध-सूत्र की दृष्टि से स्थानीयता अथवा लोक को जो महत्त्व दिया है वह तब तक फ्रायडीय आनन्द से आगे की कहानी नहीं बन सकता, जब तक कि उसकी आधारभूत विभिन्नता किसी संश्लिष्ट और मूलगामी विश्वदृष्टि पर आकर नहीं मिलती। कम-से-कम दबाव पैदा करने की षक्ति तो उसमें होनी ही चाहिए। मैं यह नहीं कहता कि आज की कविता में यह बात एकदम नहीं है; लेकिन स्थानीयता अथवा लोक के नाम पर विराजनीतिक नौकरशाही से सामंजस्य बैठाने और सत्ता संरचना में अपने को खपा देने का भी काम कम नहीं हुआ है। संभव है कि इस कहानी के हम भी किरदार और पवित्र पापी हों। इस बात से कविता के आत्मसंघर्ष का गहरा सम्बन्ध है।

    फूको प्रतिपादित करते हैं सत्ता सर्वत्र है। कोई भी ऐसा स्थान नहीं है, जहाँ से प्रतिरोध को सत्ता से अलगाया जा सके। जो विरोध में खड़ा है वह वास्तव में दूसरे प्रकार की सत्ता है। साहित्य अथवा कविता प्रतिरोध की सत्ता के रूप में भी इसका अपवाद नहीं है। इसलिए पूर्व पीढ़ी को कोसना और अपनी पीठ थपथपाना ठीक नहीं है। इस रास्ते हम समकाल के ही बन्दी हो जाते हैं। ठीक काम यह है कि हम समसामयिक ऐतिहासिक यथार्थ और उसकी चुनौतियों से आत्मचेतना के स्तर पर टकराते रहें। इसे सच्ची रचनाशीलता कही जा सकती है। इससे नए रास्ते निकलेंगे, नई युगचेतना निर्मित होगी। परिवर्तनकारी समय (पद बद्री का) की रचना भी इसी रास्ते होगी। भारत माता ग्राम-वासिनी, जो लाँग नाइन्टीज़ के सम्पादकीय में एकांत श्रीवास्तव ने उत्साह में जो कहा है, भावना के स्तर पर मैं उनकी बात की इज्जत करता हूँ, लेकिन उसमें निहित नाॅस्टैलिजिया और रूमानियत से बात नहीं बनेगी। कई-कई विषय और भावधाराओं की ज़रूरत है। समकालीन कविता के आत्मसंघर्ष में केवल गाँव और कस्बा शामिल नहीं हैं। विगत की तुलना में उसके क्षेत्र में कई गुना विषय बढ़ गए हैं। काव्य-वस्तु के विकास के लिए भी संघर्ष करना है, जो इस सूचना प्रौद्योगिकी युग में कई गुना कठिन हो गया है। काव्य-विषय की दृष्टि से हमें भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। सूचना प्रौद्योगिकी की पहुँच कवि-चेतना को मात कर देती है। उससे सीखने और टकराने, दोनों की ज़रूरत है। हम सूचना और संचार प्रविधियों की अर्थव्यवस्था में आ चुके हैं। इसकी नई उत्पादन विधि, डी. फोरे की मानें तो, साॅफ्टवेयर के विकास को भी पार कर जाएगी, किस हद तक, उसे अभी समझा नहीं जा सकता है।3 इस तरह कवि-कर्म कठिन से कठिनतर होता जाएगा। ऐसे में, हमारी अन्तःप्रेरणाएँ ही सबसे अधिक काम आएँगी। दूसरी बात, सूचना प्रौद्योगिकी भी विषय है। बड़ा विषय है। जैसे पहले औद्योगिक क्रान्ति और मजदूरों के आन्दोलन बड़े विषय थे।

    हमारे समकालीन कवि दो प्रकार के हैं। एक वे हैं जो अपनी रचना और उसके विषयों को लेकर बहुत मुखर हैं। उन्हें अपने को मनवाने की चिन्ता अधिक रहती है। समझौताविहीन स्तर पर और बेहतरी की दिशा में या कहें प्रगति की मंशा से यदि किसी में यह है, उसे भी आत्मसंघर्ष के रूप में मंजूर किया जाना चाहिए। दूसरे वे हैं जो अपने कवि होने के प्रति संकोच का भाव रखते हैं। उनका आत्मसंघर्ष कठिन है। उनमें अन्तःप्रेरणाएँ अधिक सक्रिय रहती हैं, लेकिन उन्हें समझने में कवि अपने को असमर्थ महसूस करता है। जब कवि ही नहीं समझ पाता तो दूसरों के लिए समझना मुश्किल काम होगा ही। इस मुश्किल के भीतर कवि के आत्मसंघर्ष को समझने और इसी दृष्टि से उसे महत्त्व दिए जाने की आवश्यकता है। आज कवि बहुत हैं, लेकिन इस मुश्किल के भीतर ऊँचाई पाने वाले कवि बहुत कम हैं। जो हैं उन्हें आगे रखकर देखने की ज़रूरत है। आत्मसंघर्ष वाली बात ठीक-ठीक तभी समझ में आ सकती है।

    अन्तःप्रेरणा- जिसे पुराने लोग कारयित्री प्रतिभा कहते थे। यह उत्पाद्य प्रतिभा है। प्रतिभा कहने से भी काम चल सकता है। इसमें अनुभूति, जीवनानुभूति और कलात्मक अनुभूति, सभी बातें शामिल हो जाती हैं। यह सदैव बेहतरी अथवा अच्छाई की दिशा में सक्रिय रहती है। इसे मान लेने के बावजूद, जैसा कि मैं समझता हूँ, अन्तःप्रेरणा वह स्पेस है जहाँ अच्छाई और बुराई को बराबर का दर्जा प्राप्त होता है। अन्तःप्रेरणा में हम एक वस्तु को दूसरी वस्तु को विकल्प के रूप में नहीं देखते, उनसे चेतनागत सम्बन्ध अथवा विषेष प्रकार का तादात्म्य स्थापित करते हैं। सम्बन्ध की प्रकृति अथवा वह विषेष प्रकार क्या है, यह महत्त्वपूर्ण है। अन्तःप्रेरणा की क्रियाओं में अच्छा और बुरा दोनों समान महत्त्व रखते हैं। इस सम्बन्ध में फूको का एक कथन याद आता है, ‘‘मैं नहीं कहता कि सभी चीज़ें बुरी हैं, लेकिन वे सभी चीज़ें खतरनाक हैं जो ठीक-ठीक बुरी के समान नहीं हैं।’’4

    एक साक्षात्कार में यह बात आई है। और मैं जब यह पढ़ रहा था तो अचानक मुझे रामचरितमानस का अन्तिम दोहा याद आया-

कामहि नारि पिआरी जिमि लोभहि प्रिय जिमि दाम।

तिमि  रघुनाथ  निरंतर  प्रिय  लागहु  मोहि राम।

    मैंने शुरू में कहा था कि अंत में मानवीय मूल्य पर भी एकाध बात करूँगा। कामपिपासा और लोभ बुराई है, अमानवीय है। तुलसी ने अपनी भक्ति को उसके समकक्ष रखा। बुराई में जितनी शक्ति होती है, वह भक्ति को प्राप्त हो, भाव यह है। भक्ति को पाने के लिए उस पर बुराई को उत्प्रेक्षित करना पड़ा। मानवीय मूल्य तो ठीक है, लेकिन जो संसार है उसमें मानवीय-अमानवीय, अच्छा-बुरा, सब कुछ है- सुगुन छीर अवगुन जल ताता; मिलइ रचइ परपंच विधाता।

    अन्तःप्रेरणा के क्षेत्र में अन्तर्बाधा के लिए स्थान नहीं है। लेखक के नाते हम जानते हैं कि मूल्य अन्तिम नहीं होते। सात्र्र का यह कथन महत्त्वपूर्ण है, ‘‘मानवता को अभी निर्धारित होना बाकी है।’’ यही समझ हमें फासीवादी होने से बचाती है और आत्मसंघर्ष के लिए युक्ति प्रदान करती है।

    एक साथ कई विषयों से गुज़रना और उनसे जुड़े प्रश्नों पर बात करना कठिनाई पैदा करता है। यह दौर ही ऐसा है- अनेक विषयों और प्रश्नों से घिरा। इस अर्थ में मैं मानता हूँ कि नौवाँ दशक और उसके बाद का समय अलग से दिखाई देता है। लेकिन इसे लाँग नाइन्टीज़ ही कहा जाए, इसे लेकर मेरे मन में दुविधा है। बद्रीनारायण की इस बात से मैं सहमत हूँ कि नब्बे के दशक के पूर्व की कविता में जा वैचारिक संस्रोत काम कर रहे थे, वे बाद में कमजोर पड़ गए या अपर्याप्त साबित हुए। हमारे समय में अनेकान्त का महत्त्व है। हम किसी भी बुनियादी विषय पर एकमत होने की स्थिति में पहले की तुलना में बहुत कम हैं। दूसरी ओर, दूसरों की तरफ से प्रस्तावित विषय और विचार के प्रति हम पहले की तरह द्वेषी नहीं हैं। हम अकेला विकल्प हैं, यह बात अब नहीं रही। हमारा विवाद सबसे है और अपने आपसे भी है, जो जीवन और रचनाशीलता दोनों में मायने पैदा कर रहा है। लेकिन जिस दुनिया में हम जी रहे हैं उसमें ख़तरे भी कई गुना बढ़ गए हैं, उसमें हार जाने का डर विगत की तुलना में बढ़ गया है। यह एक ऐसा क्षण अथवा विन्दु है जो हमें इस समझ पर कायम होने के लिए विवश करता है कि पिछले दर्शन का महत्त्व है, लेकिन उसमें ज़रूरी संशोधन और नये अध्याय जोड़ने की ज़रूरत पड़ेगी। अभी तो हमें यही पता नहीं है कि हम कहाँ जा रहे हैं। यह अनेकान्त काल है। लेकिन रचनाशीलता के लिए, तमाम मुश्किलों के बावजूद, यही ऊर्वर काल है। हमें अपना काम करते हुए इस उम्मीद पर अपने को कायम रखने की ज़रूरत है, जो ब्रेख्त की उद्धृत पंक्तियों में है, ‘…जब वह वक्त आए/ आदमी-आदमी का मददगार हो/ याद रखना हमें/ कुछ समझदारी के साथ। जब वह वक्त़ आएगा तो बे्रख्त के साथ शायद हमें भी कुछ समझदारी के साथ थोड़ा याद रखा जाए। आमीन!

 सन्दर्भ:

(1) मुक्तिबोध रचनावली-5/334 (पे.बै.).

(2) फ्रेडरिक जैम्सन, पोस्ट मार्डनिज़्म ऑर द कल्चरल लॉजिक  ऑफ लेट कैपिटलिज़्म, पृ.-64.

(3) प्रसन्न कुमार चैधरी की पाण्डुलिपि अतिक्रमण की अन्तर्यात्रा से साभार.

(4) फूको रीडर, पॉल  रेबिनो (सम्पादक), पृ.-343.

 भारत भवन में 21.12.2012 को पढ़ा गया आलेख। कुछ अंश नहीं पढ़े गए। संशोधित।

sudhir ranjan singh

sudhir ranjan singh

हिन्दी के आलोचक। काव्य संकलन ‘और कुछ नहीं तो’ और आलोचना की पुस्तक ‘हिन्दी समुदाय और राष्ट्रवाद’ प्रकाशित। एक कविता संकलन और आलोचना की दो पुस्तकें शीद्घ्र प्रकाश्य। भोपाल के शासकीय महाविद्यालय में प्राध्यापन।

निराला की समकालीनता: कुछ सूत्र-बिन्दु : विजय कुमार

By  विजय कुमार 

  •  दोस्तोवोस्की के लिए सुन्दरता एक चाहना है, इसीलिए वो त्रास है, और त्रास व सुन्दरता दोनों कभी एक दूसरे से अलग हो ही नहीं सकते.
  • सुकरात तो फ़कीर टाइप के आदमी थे सड़कों पर चलते हुए प्रवचन देते थे और फिर उन्हें जहर का प्याला दिया गया. प्लेटो ने उनके विचारो को लोगों के बीच प्रसारित करना उचित समझा. लेकिन, इसी क्रम हुआ यह कि प्लेटो कब अपने विचारों को सुकरात के नाम से कहने लगा पता ही नहीं चला. इसमें हुआ यह कि प्लेटो सुकरात के बहाने अपने समय के विचारों में सुकरात को देखने लगा.
  • १२ वीं-१३ वीं सदी के कवि थे ‘दांते’. उनके बारे में २० वीं सदी के एक आधुनिक कवि मोंताले ने, जो इटली के एक कवि थे, दांते भी इटली के थे, एक बहुत खुबसूरत बात कही है कि दांते में कुछ ऐसा है जो मेरा बहुत व्यक्तिगत है. और चूँकि मेरा बहुत व्यक्तिगत है इसलिए मैं उसके परे जाता हूँ और इस तरह दांते को ढूंढता हूँ. “Some thing is in myself which is relating to it to my own particular experience of Dante. It could amount more personal and therefore worthy and being reported and discussed here.”
  • एक निराला रामविलास शर्मा के हैं जो नवजागरण के अग्रदूत हैं, एक निराला दूधनाथ सिंह सिंह के हैं जो कि आत्महंता निराला हैं, एक तीसरा निराला रमेशचंद्र शाह के भी हैं जो प्रपत्तिभाव वाले निराला को वास्तविक निराला मानते हैं. और यहाँ तक कि हमारे युवा साथी प्रणय कृष्ण के भी निराला हैं, जो निराला को मार्क्सवाद की कसौटी पर कसते हैं और खरा नहीं पाते हैं. कुंवर नारायण जी के यहाँ भी चार तरह के निराला दीखते हैं- सामाजिक यथार्थ वाले निराला, गीतात्मक, राग और सौंदर्य के निराला, व्यंगकार निराला और अंत में अर्चना और आराधना वाले निराला. विजय कुमार इसमें ५ वाँ देशभक्ति और जागरण वाले निराला को जोड़ते हैं. एक व्यक्ति के अलग-अलग रूप दिखाई दे सकते हैं लेकिन एक सेंट्रल यूनिटी को निराला में तलाशना जरुरी है कि जो चार-पञ्च अलग-अलग रूप दिखाई देते हैं इनकी वास्तविक केंद्रीय अन्विति क्या है?
  •  फ्रेडरिक जेम्सन कहता है कि पूंजीवाद एक ऐसी अवस्था में पहुँच गया है जिसमें तीन चीजों पर उसने कब्ज़ा कर लिया है और मनुष्य लगभग खदेड़ दिया है, मनुष्य को उसके मनुष्यत्व  से बेदखल कर दिया है. १. प्रकृति २.ग्रामीण संस्कृति ३. मनुष्य के अंतःकरण
  • २१ वीं सदी को परिभाषित करते हुए इटालियो केल्विनो ने जिन पांच चीजों पर जोर दिया है वह आज के सबसे बेसिक मुद्दे लगते हैं-  १. स्पीड(गति) २. लौजिकल(यथातथ्य होना) ३. डिजिटल (छाविकेंद्रित) ४. लाइटनेस(हल्कापन) ५. PREDICTABILITY (पुर्वानुमेयता)
  • जिस दौर में हमलोग जी रहे हैं, हमारी ज्यादातर कविताएं अस्तित्व के संकट की कवितायें हैं, व्यक्तित्व के प्रस्फुटन की कविता नहीं है. व्यक्तित्व से अस्तित्व के संकट तक की यह यात्रा पूरे पूंजीवाद की विकास-यात्रा है.
  • व्यक्तित्व क्या है? व्यक्तित्व बनता है आपकी प्रतिरोधात्मक शक्ति द्वारा, सब कुछ दाँव पर लगा देने के द्वारा, एक रैडिकल मूलभूत आकर्षण को लेकर चलने के द्वारा. निराला में इस व्यक्तित्व की की जो गहनता है इसको हम कितनी तरह से परिभाषित कर सकते हैं!.. निराला का जो एक रूप है ‘व्यक्तित्व’ इसी व्यक्तित्व को आज हमें फैलाने का अवसर नहीं मिल रहा है. हमें बहुत सीमित कर दिया जा रहा है.
  •   दोस्तोवोस्की ने जितना पाप का और पुण्य का संघर्ष देखा, जितना देवत्व और शैतानियत का संघर्ष अपने अपने उपन्यासों में रचा, दोस्तोवोस्की से ज्यादा तो संसार में कोई भी व्यक्ति मनुष्य के भीतर के सत और असत  के संघर्ष का लगभग पागल कर देने वाला इतना बड़ा ड्रामा खड़ा नहीं ही किया है और वही दोस्तोवस्की अंत में क्रिश्चिनिटी की तरफ जाते हैं. लेकिन, यह क्रिश्चिनिटी धार्मिक क्रिश्चिनिटी नहीं है . दोस्तोवोस्की की क्रिश्चिनिटी उस त्रास की है जिसमें वे अपने आप को समर्पित कर देते हैं.
  • सुसेन सेन्टेक कहती हैं कि Artist is a narrator and also is a commentator. कलाकार एक बखान करता है और बखान करते हुए वो एक चिन्तक भी है. ये दोनों चीजें एक साथ चलती हैं  सरोज स्मृति जैसी कविता में .
  • ‘छायावादी कविता मूलतः बिम्ब है.’ इक्कीसवीं सदी का जो समय है उसने तो अब बिम्बों को भी हमारे हाथों से छीन लिया है. मास मीडिया बिम्बों का प्रोडक्सन हाउस हो गया है. कवियों-कलाकरों के सामर्थ्य के बाहर चला गया है, बिम्ब रचना.
  •  समकालीन हिंदी कविता में जो जो नरेशन बढ़ा है, narratives की एक नई परंपरा आयी है उसका कारण क्या है ? इसका कारण है कि बिम्ब की सत्ता इतनी ज्यादा ताकतवर हो गयी है आपके सामने कि अब उस बिम्ब के सामने आपको फिर से narratives को लाना पड़ेगा.

विजय कुमार (जन्म १९४९) कवि आलोचक एवं सम्पादक हैं। कविता की संगत इनकी प्रमुख आलोचना पुस्तकें है। ‘अँधेरे में विचार’ नामक पुस्तक भी खासी चर्चित. सदी के अंत में कविता (उद्भावना कविता विशेषांक) इनकी संपादित पुस्तक है।

(उपर्युक्त बिन्दुओं को  हिंदी विभाग, बी.एच.यू. द्वारा ४ जनवरी २०१२ को ‘निराला की समकालीनता’ विषय पर आयोजित कार्यक्रम में दिए गए व्याख्यान से  साभार लिया गया है, भाषण के पूर्ण और मूल रूप के लिए परिचय-११ का अंक देखें.)

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