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अमरकांत की कहानी ‘हत्यारे’ और आज का समय: मार्तण्ड प्रगल्भ

 बात तो करनी है ‘अमरकांत की कहानी ‘हत्यारे’ और आज का समय’ पर और इसी कहानी पर विचार करके मैं आया था। लेकिन कल की कुछ चर्चाएं जो खासतौर से यथार्थवाद के सम्बन्ध में या सत्य के सम्बन्ध में या यथार्थ और रचना के सम्बन्ध में हुई थीं उनके बारे में भी मैं इस कहानी के संदर्भ से कुछ सोच रहा था. जिसे मैं आगे स्पष्ट करूँगा. चर्चा का प्रस्तुत विषय गंभीर तो है ही मनोरंजक भी है। गंभीर क्यूं है इस पर थोड़ा बाद में चर्चा की जाएगी। पहले, मनोरंजक क्यूं है इसकी थोड़ी चर्चा कर ली जाए। आज का जो विषय है, इस विषय के साथ दिक्कत यह है कि आप जहां चाहे इस विषय को फिट कर सकते हैं। समाजशास्त्र का कोई सेमिनार हो, (तो) उसमें भी यह विषय आ जाएगा। दरअसल हुआ क्या है कि आलोचना की जो समाजशास्त्रीय पद्धति है उसने विषयों का टोटा खत्म कर दिया है और इस तरह के शीर्षक की आवाजाही बेरोकटोक चलती रहती है। जैसे, बहुत सारे शोधार्थी इसी तरह के शोध विषय चुन लेते हैं; कोई रचना ले ली और उसमें आज का समय या रचना का समय जोड़ दिया और पूरा एक शोध प्रबंध तैयार हो गया! इसके चलते, इस तरह के विषयों की पुनरावृत्ति बढ़ी है जिससे विषय की गंभीरता एक यांत्रिक पुनरुत्पादन में नष्ट हो जाती है और कई बार हम चीजों को ठेठ समाजशास्त्रीय व्याख्या तक सीमित कर लेते हैं। मानो किसी समय का जो अर्थशास्त्र है उसके बारे में जान लेना (ही विषय को समझने के लिए पर्याप्त) है , कि नेहरू युग के अवसान के समय क्या स्थितियां थीं उसकी थोड़ी चर्चा कर ली जाए और (रचना तथा उन स्थितियों) दोनों में ऐतिहासिक सम्बन्ध जोड़ लिया जाए और इस प्रकार आज के समय में हत्यारे कहानी की सार्थकता सिद्ध हो जाती है। इस पद्धति के चलते जो गंभीर और सारगर्भित सवाल हैं वो ढंक दिए जाते हैं।  # लेखक 

अमरकांत

अमरकांत

रचना और आलोचना के प्रश्न जीवन के प्रश्न होंगे कि नहीं!

By मार्तण्ड प्रगल्भ

हर सचेत और क्रियावान मनुष्य अपने समय की जटिलता को समझना चाहता है। उस समय को समझना चाहता है जिससे उसके अंग-प्रत्यंग-अनुषंग परिस्थिति विशेष में निर्मित हो रहे हैं। मनुष्य के वर्तमान की वर्तमानता (प्रजेन्स ऑफ प्रजेन्ट) क्या है? इस प्रश्न को लेकर वह कई जगह भटकता फिरता है. और ऐसे ही संकट के समय कोई कहानी या कविता या कोई अन्य कलारूप अपने भीतर के अदम्य आकर्षण से उसे अपनी ओर खींच लेते हैं। महान रचनाएं वक्त-बेवक्त ऐसा ही अदम्य आकर्षण पैदा करती हैं। तो सवाल यह है कि ‘हत्यारे’ कहानी का हम कथा आलोचकों-कथाकारों की सभा में क्या महत्त्व है। या हम सरीखों के लिए ‘हत्यारे’ की उपयोगिता क्या है? क्षमा करेंगे, यहां उपयोगिता किसी उपयोगवाद के अर्थ में नहीं है बल्कि मार्क्स जिसे उपयोग-मूल्य कहते हैं उसके अर्थ में है। दरअसल यह कहानी-कला और कथा आलोचना दोनों के लिए गंभीर सवाल है।

कल की चर्चा में समकालीनता और आज के समय के बारे में हमारे समय के महत्त्वपूर्ण आलोचक (रविभूषण) अपनी बात रखते हुए कल कह रहे थे कि 1944 से हमें अपना समय मानना चाहिए। उस साल एक किताब आयी थी- रोड टू सर्फडम; वहां से एक नए ऐतिहासिक युग ‘बाजारवाद की केंद्रीयता’ की शुरुआत होती है और उसको एक विभाजक रेखा माननी चाहिए। चूंकि वे अध्यक्ष हैं, इसलिए मैं क्षमा मांगते हुए कहना चाहता हूं कि यह काल निर्धारण की हेगेलियन पद्धति है, जहां विचार की प्रमुखता से इतिहास का मूल्यांकन किया जाता है। अब 1944 में किताब आयी और वहां से नए समय की शुरुआत हो तब तो उदारतावाद की शुरुआत लास्की आदि से ही हो जाएगी। अगर इतिहास विचारों की क्रमबद्धता, गत्यात्मकता और द्वन्द्वात्मकता में निहित है तो यह हेगेलियन पद्धति है। 44 में शेखर एक जीवनी का दूसरा खण्ड आता है। प्रयोगवाद, तारसप्तक ऐसी बहुत सारी चर्चाएं शुरु होती हैं। उनमें से किसको अपने समय का आधार बनाया जाए यह एक प्रश्न है। दूसरा प्रश्न, क्या अर्थशास्त्र के अनुशासन से चलकर साहित्य के लिए काल निर्धारण सम्भव है? अगर अर्थशास्त्र से इतिहास में परिवर्तन के चरणों को समझना है तो प्रभात पटनायक इसके लिए ज्यादा मुफीद होंगे। साहित्य के आलोचक के लिए ये प्रश्न महत्त्वपूर्ण क्यों हैं और फिर इतिहास निर्माण की जो वास्तविक शक्तियां हैं, जिनके प्रति हम अपनी प्रतिबद्धता भी व्यक्त करते हैं, वे इतिहास के निर्धारक बिंदु होंगे या कोई शिकागो स्कूल निर्धारक बिंदु होगा! कहने का तात्पर्य यह कि जैसे हमारा नया समय हमारी परिस्थितियों के अनुरूप भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन का भी एक नया समय था और वह नक्सलबाड़ी के आंदोलन से शुरु होता है तो इसे भी कोई कह सकता है कि यह हमारा अपना समय है। दृष्टि भेद का अंतर है। बहरहाल, सवाल है- आज का समय से मतलब क्या है? क्या आज की कहानी और कथा आलोचना का समय आज का समय है! और यदि यह सवाल है तो सवाल फिर रचना-प्रक्रिया का होगा अर्थात् प्रश्न आज के कलाकार की रचना-प्रक्रिया का है। यहां रचना-प्रक्रिया से तात्पर्य आज की कहानी की रचना-प्रक्रिया से है। सीधे शब्दों में कहें तो हत्यारे की रचना-प्रक्रिया हम सरीखों के लिए क्यों महत्त्वपूर्ण है। कहानीकार की तरफ से भी, पाठक की तरफ से भी और (ध्यातव्य है कि) आलोचक भी सबसे पहले एक पाठक ही होता है। इस रचना-प्रक्रिया को प्रारम्भिक रूप से आलोचक पाठक की ही हैसियत से समझेगा. कथाकार की तरफ से यह प्रक्रिया थोड़ी भिन्न होगी। इस भिन्नता की प्राथमिक पहचान कथाकार को होगी। लेकिन शीघ्र ही आलोचक पाठक की हैसियत से तटस्थ होगा और कथाकार लेखक की हैसियत से। यह तटस्थता कथाकार और आलोचक दोनों को कहानी के एक वस्तुनिष्ठ आकलन और मूल्यांकन की ओर प्रेरित करेगा। आकलन और मूल्यांकन के इसी क्रम में हत्यारे कहानी और आज के समय के जटिल अंतरसंबंधों की पहचान हम लोग शायद कर पाएं।

बहरहाल, कहानी पाठ की जो सबसे आम पद्धति है- वह समाजशास्त्रीय पद्धति है। जिसमें आप रचना से समाज, समाज से रचना में बराबर आवाजाही करते हैं और यह अच्छी बात भी है। कहानी के ‘आडियन्स’ की भिन्नता से इस तरह की समझ को विकसित करने का और इस समझ के चलते आडियन्स को, पाठक को विकसित करने की प्रक्रिया चलनी चाहिए। जैसे, सन् ’62 में अमरकांत की कहानी ‘हत्यारे’ आती है। यह नेहरू युग के अवसान और उसके मोह भंग का संधिकाल है और अगर हम ध्यान दें तो यह नई कहानी और अकहानी के संधिकाल की भी कहानी है और इस लिहाज खुद यह कहानी अमरकांत की कहानी यात्रा में एक ‘ब्रेक’ की तरह है। दो नायक हैं या खलनायक हैं। खलनायकत्व नायकत्व प्राप्त कर रहा है। दोनों नायकों को यदि गौर से देखें तो एक गोरा है, ऊंचा है। दूसरा सांवला है, ठिगना है। दोनों एक ही तरह की वेशभूषा में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के आस-पास किसी बाजार में टहल रहे होते हैं और उनकी बातचीत जब शुरु होती है तो ठेठ लहज़े में, ‘हलो, सन!..इतना लेट क्यों, बेटे?’ इस तरह की एक बातचीत शुरू होती है। हमारे विमर्शों का जो दबाव है उसकी तरफ से अगर हम इस कहानी में एक संभावना की बात करें तो जो सांवला है वह भिन्न वर्ग का है, कहानी की संभावना है क्योंकि कहानी में कहीं-कहीं स्टेटमेंट्स (बयान) भी ऐसे आते हैं कि ‘तुमको सेक्रेटेरियट का भंगी बनाऊंगा!’ गोरा गुरु है। सांवला चेला है। गुरु उसको शिक्षित करता है। ठीक उसी प्रक्रिया में जैसे घीसू माधव को शिक्षित करता है. हत्यारे कहानी में जब गिलास में दोनों शराब बांटते हैं तो सांवला चुपके से अपनी शराब गोरे के गिलास में डाल देता है। (इस पर गोरा कहता है) ‘लेकिन जब तुम इतनी पी नहीं सकते तो अवसर आने पर घूस कैसे लोगे. जालसाजी कैसे करोगे, झूठ कैसे बोलोगे? फिर देश की सेवा क्या करोगे, खाक!’ सांवला अभी सीख रहा है। औरत के पास जाना अभी तक सीखा नहीं है. और फिर गोरा कहता है, ‘आज तो कुछ रचनात्मक कार्य होना चाहिए!’ तो रचनात्मक लीडरशिप क्या है? रिक्शा मजदूरों की बस्ती की तरफ चलता है। बस्ती के शुरु में ही पान की छोटी सी दुकान है। जिस पर पान-सिगरेट तो मिलती ही है रोजमर्रा की और सारी चीजें भी मिलती हैं, और वे दोनों मजदूरों की बस्ती आरम्भ होते ही जो पहली झोपड़ी है उसमें  घुस जाते हैं। एक महिला चूल्हे पर खाना बना रही होती है। उसके देखते ही गोरा मुस्कुराकर बोला, ‘ये विश्व लोफर संघ के अध्यक्ष हैं। इनको हर तरह से तुम्हें खुश करना है.’ दोनों औरत के साथ सम्बन्ध बनाते हैं। पैसा नहीं देते हैं और जब औरत कहती है, ‘लाइए मैं (पैसे का खुदरा करवा कर) ले आती हूं.’ तो गोरा बोलता है, ‘तुम तो पूंजीपति हो! तुमको किस बात की कमी है।…अरे, तुम देश की महान कार्यकत्री हो, तुम कहाँ कष्ट करोगी?’ और आगे बढ़ता है कहता है, ‘साले जूते निकालकर हाथ में लेलो! सांवला बोला ‘क्यों?’…(गोरा कहता है) ‘भाग साले! आर्थिक और सामाजिक क्रांति करने का समय आ गया है!’ दोनों भागना शुरु करते हैं। औरत बाहर निकल कर कहती है- ‘अरे, लूट लिया हरामी के बच्चों ने!’ मजदूरों की बस्ती से कुछ लोग उसके पीछे दौड़ पड़ते हैं। दोनों अरबी घोड़े की तरह सरपट भागे जा रहे हैं। कभी बाएं घूम जाते हैं। कभी दाएं घूम जाते हैं। इतने में मजदूरों का एक लड़का फुर्ती से सांवले की तरफ तीर की तरह बढ़ता चला जाता है और लगता है उसको पकड़ ही लेगा। ऐसे में गुरु गोरा रुक जाता है। जेब से चाकू निकालकर खोल लेता है और पीछा करते हुए आ रहे मजदूर के पेट में घोंप देता है और फिर भाग जाता है। कोलतारी सड़क पर आगे की स्ट्रीट लाइट में दोनों के सुंदर और पुष्ट शरीर पर पसीने की बूंदें छरछरा रही हैं; यह युद्ध का सिम्बल है ‘सिम्बलाइजेशन ऑफ पॉवर’ है, और वे फिर न जाने कहां अंधेरे में गुम हो जाते हैं. यह पूरी कहानी है। ध्यान दें कि जो नेहरूवियन आदर्शवाद है उसकी खोल के भीतर से जो फासिज्म पैदा हो रहा है यूथ के बीच में, वह उसी आदर्श की भाषा में ही पैदा हो रहा है. फासिज्म के साथ दिक्कत यही है, उसको आना तो हमारी ही भाषा में पड़ेगा। सामाजिक, आर्थिक क्रांति की भाषा में, लेकिन वो रूपवाद है। उसका यथार्थ फासिज्म है। आदर्श के उस रूपवाद का यथार्थ फासीवाद है और इसी फासीवादी टेन्डेन्सी की कहानी ‘हत्यारे’ है। और यह फासीवादी टेन्डेन्सी यूथ में व्याप्त हो रही है, जबकि हमारा देश सबसे नौजवान है, मोदी युवाओं को लेकर बड़े प्रसन्नचित हैं; एक युवा देश के भीतर, खुद युवा वर्ग के भीतर तरह-तरह के विभाजन हैं। इसको अगर ध्यान में न रखा जाएगा तो दिक्कत की बात होगी और अमरकांत की खासियत यही है। उनकी चिंता हमेशा ही परिवर्तनकारी शक्तियों के पहचान में आने वाले संकट को कहानी में रखने की है। बहरहाल, चूंकि मजदूरों की बस्ती में जा करके वह हत्या करता है। इसलिए वहां जा कर कहानी एलीगरी में बदलती है और यह मूल्य-निर्णय शामिल होता है कि फासीवादी चरित्र हमेशा ही वर्किंग क्लास (मजदूर वर्ग) के विरोध में होगा।

 बहरहाल, ये तो कहानी का एक सिंपल पाठ है। लेकिन क्या इसीलिए हत्यारे कहानी हमारे लिए महत्त्वपूर्ण है। फासीवाद के इस नए दौर के चरित्र के बारे में, उपभोक्ता समाज के बनने की प्रक्रिया के बारे में, बहुत सारी बातें इस कहानी को पढ़े बिना ही हम समझ भी रहे थे। क्या जरूरत थी कि इसको पढ़ा जाए! एक सचेत बुद्धिजीवी, एक एक्टीविस्ट जो सचमुच में परिवर्तन लाना चाहता है। जो परिवर्तन चाहता है। यथार्थ में परिवर्तन की गति को पहचानना चाहता है। उनके लिए केवल  कहानी का सामान्य पाठ ही होगा तो यह महत्त्वपूर्ण नहीं होगा।

यहाँ मैं संक्षेप में हिंदी के चार आलोचकों की चर्चा करना चाहूंगा, जिन्होंने ‘हत्यारे’ कहानी के बारे में लिखा है या अमरकांत के बारे में लिखा है। विश्वनाथ त्रिपाठी समाजशास्त्रीय, राजनीति के अपराधीकरण से लेकर अपराध के राजनीतीकरण और स्टूडेन्ट पॉलिटिक्स की वह पूरी प्रक्रिया जो जेपी मूवमेंट के भीतर से निकली है उसके ‘रिप्रजेन्टेशन’ के बतौर हत्यारे कहानी की अच्छी व्याख्या करते हैं। लेकिन वह एक सवाल उठाते हैं कि अमरकांत के पात्र कहीं भी संघर्ष क्यों नहीं करते हैं? अगर समाज में संघर्ष है तो अमरकांत के पात्र संघर्ष करते हुए क्यों नहीं दिखते। अजीब बात यह है कि ठीक यही आलोचना राजेन्द्र यादव भी अमरकांत के बारे में करते हैं कि अमरकांत की कहानी का कोई भी पात्र संघर्ष नहीं करता है। वहां आस्तित्व की समस्या महत्त्वपूर्ण है, आस्था का प्रश्न महत्त्वपूर्ण नहीं है। लेखकीय आस्था एक ओढ़ी हुई चीज है. मनुष्य के अस्तित्व की लड़ाई ज्यादा महत्त्वपूर्ण है और इसलिए अमरकांत अस्तित्ववादी कथाकार हैं। अब विश्वनाथ त्रिपाठी तो यह नहीं कहेंगे कि वे अस्तित्ववादी कथाकार हैं लेकिन हाँ, यह कहेंगे कि संघर्ष करता हुआ पात्र नहीं दिखता है। संघर्ष करते हुए पात्रों को दिखाना चाहिए। समाजवादी यथार्थवादी की जो अपेक्षा है वह अमरकांत के ऊपर विश्वनाथ त्रिपाठी की तरफ से (लागू की जाती है) और राजेन्द्र यादव हत्यारे को अस्तित्ववाद की कहानी मान लेते हैं। ‘हत्यारे’ नाम से सार्त्र की भी एक कहानी है और अगर समय हो तो संक्षेप में सार्त्र की ‘हत्यारे’ कहानी के अस्तित्ववाद का अमरकांत से क्या अंतर है इसे मैं देखना चाहूंगा और वह अंतर अपने अंतिम रूप में किसका अंतर होगा। बहरहाल, द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद का समय है। ब्रिटेन की एक कोर्ट में एक ऐसे केस की सुनवाई होनी है, जिसका जीतना तय है और वह बात यह है कि एक टी.बी. का डाक्टर है। एक दिन उसके पास बहुत अमीर आदमी आता है। लेकिन वह टी.बी. से बुरी तरह ग्रस्त है। बहुत बूढ़ा हो गया है। चल-फिर नहीं पा रहा है। दोनों फेफड़े उसके खराब हो चुके हैं और वह डाक्टर के पास बैठता है। डॉक्टर कहता है अब कोई उपाय नहीं है। तो मरीज बहुत विनती करता है। डॉक्टर कहता है, लगता है बड़े पैसे वाले हो। मरीज स्वीकार करता है तो डाक्टर उसे सलाह देता है कि तुम आज से कुछ खाओ-पीओ मत और अब सिर्फ पानी का सेवन करो और दूर कहीं चले जाओ। छः महीने गुजर जाते हैं। एक दिन अचानक वह आदमी हट्टा-कट्टा, सूटेड-बूटेड डॉक्टर के क्लीनिक में प्रवेश करता है। डॉक्टर पहचान नहीं पाता है। तब मरीज पूरी बात डॉक्टर को फिर से बताता है और डॉक्टर को बहुत सारा पैसा देने की बात कहता है। डॉक्टर चिंतित हो जाता है। वह मेज की दराज में रिवाल्वर निकाल कर अमीर आदमी को गोली मार देता है और उसका फेफड़ा निकाल कर टेबल रख कर पर निरीक्षण करने लगता है और कहता है कि इससे मनुष्य का विज्ञान पर से विश्वास ही उठ जाएगा। इसलिए मनुष्य समाज के कल्याण में उसकी हत्या कर देनी पड़ी और यह केस कोर्ट में गया है और लोग मान रहे हैं कि डॉक्टर जीत जाएगा। यह अस्तित्ववाद की कहानी है। अस्तित्व की समस्या का जो दर्शन फैलाया गया, इतिहास मुक्त व्यक्ति के स्वतंत्र अस्तित्व का प्रश्न, वह सार्त्र की कहानी में है। अमरकांत की कहानी में वह नहीं है।

यहां अमरकांत की कहानी के संदर्भ में संक्षेप में सुरेंद्र चौधरी और नामवर सिंह के पाठों के अंतर के बारे में एक बात करना चाहूंगा। सुरेंद्र चौधरी ने कहा कि हत्यारे कहानी में हत्या नहीं हुई होती तो यह बहुत महत्त्वपूर्ण कहानी होती। क्यों? क्योंकि हत्या वहां अतिनाटकीयता का प्रयोग मात्र है. जिससे कहानी में एक मादक भंगिका तो पैदा हुई है लेकिन वह कुछ कहानी में नया नहीं जोड़ती है और यह अच्छा हुआ कि अमरकांत ने आगे ऐसा प्रयोग नहीं किया। उन्होंने कहा जो परिवर्तनकारी प्रक्रिया है उसमें जो प्रच्छन्न खतरे छुपे हुए हैं वह अमरकांत की कहानी में ज्यादा बेहतर आता अगर वह हत्या नहीं हुई होती। यानि एक नपुंसक, बड़बोली, ऐय्याश युवा पीढ़ी का ज्यादा सही चित्रण हुआ होता अगर ये हत्या नहीं हुई होती। नामवर सिंह ने कहा अगर इस कहानी में हत्या नहीं हुई होती तो यह कहानी इतनी महत्त्वपूर्ण नहीं होती। उन्होंने कहा कि कहानी में हत्यारे के द्वारा की गई हत्या कहानीकार का या रचना का मूल्य-निर्णय है। एक वैल्यू जजमेंट है। अगर रचना की प्रक्रिया में यह वैल्यू जजमेंट (मूल्य-निर्णय) नहीं है, यह मैं अपनी भाषा में बोल रहा हूं एक इंटरव्यू में नामवर सिंह ने चलते हुए यह बात कही थी, तो रचना जो फासिस्ट टेन्डेन्सी दिखाना चाह रही है, जो आज एक अजीब तरह की प्रवृत्ति पैदा हो रही है ,उसे दिखाया नहीं जा सकता. युवाओं के आदर्श का अतीत में स्वतंत्रता आंदोलन का एक पूरा दौर है. पर वह आदर्श दूसरे थे। यह आदर्श दूसरे हैं। इन आदर्शों के रेहटारिक में जो कंटेंट है उसके प्रति मूल्य-निर्णय कीजिएगा कि नहीं यह एक रचना-प्रक्रिया का सवाल है। सुरेंद्र चौधरी के लिए कहानी में हत्या कहानी को अतिनाटकीय बना देती है, दूसरी ओर नामवर सिंह के लिए महत्त्वपूर्ण। दो मार्क्सवादी ओलोचकों की दृष्टि में यह भेद क्यों है? क्या यह यथार्थवाद की दो भिन्न दृष्टियां हैं? क्या यथार्थवाद बीसवीं सदी के साथ गुजरी हुई बात हो गई है! इसका हम सरीखों के लिए क्या कोई महत्त्व नहीं है? यह हमारे लिए भिन्न चर्चा का बिंदु है। यहां मैं अभी तफ्सील नहीं करना चाहूंगा, वक्त कम है। परंतु हमारे समय के एक प्रमुख चिंतक फ्रेडरिक जेम्सन के लिए यह बीती बात नहीं है। इसी साल उनकी एक पूरी किताब यथार्थवाद पर आयी है। यह किताब यथार्थवाद के साथ एक प्रयोग के लिए आमंत्रित करती है और खुद यथार्थवाद के भीतर विकसित होती आयी विरोधी प्रविधियों के द्वन्द्वात्मक चिंतन को विकसित करने का प्रयास करती है। मैं अंग्रेजी में जेम्सन को थोड़ा पढ़ना चाहूंगा अगर आप चाहें तो.

बीसवीं सदीं के इतिहास की आंतरिकता को कैसे समझा जाए इसी क्रम में जेम्सन लिखते हैं, ‘My experiment here claims to come at realism dialectically, not only by taking as its object of study the very antinomies themselves into which every constitution of this or that realism seems to resolve: but above all by grasping realism as a historical and even evolutionary process in which the negative and the positive are inextricably combined, and whose emergence and development at one and the same time constitute its own inevitable undoing, its own decay and dissolution. The stronger it gets, the weaker it gets; winner loses; its success is its failure. And this is meant, not in the spirit of the life cycle (“ripeness is all”), or of evolution or of entropy or historical rises and falls: it is to be grasped as a paradox and an anomaly, and the thinking of it as a contradiction or an aporia. Yet as Derrida observed, the aporia is not so much “an absence of path, a paralysis before roadblocks” so much as the promise of “the thinking of the path.” For me, however, aporetic thinking is precisely the dialectic itself; and the following exercise will therefore be for better or for worse a dialectical experiment.’

(मेरा प्रयोग यथार्थवाद तक द्वंद्वात्मक तरीके से पहुँचने का है. यह प्रयोग यथार्थवाद के इस या उस विरोधाभासी युग्मों के अध्ययन तक ही अपने को सीमित नहीं करता है, वरन् यथार्थवाद को एक ऐतिहासिक और विकासमान प्रक्रिया के रूप में देखने का हिमायती है. इस प्रक्रिया में यथार्थवाद के नकारात्मक और सकारात्मक पक्ष साथ-साथ अंतर्गुम्फित रहते आये हैं। अपने उदय और विकास की इस प्रक्रिया में ही वह अपना क्षय और अपनी मृत्यु भी रचता चलता है। ज्यों-ज्यों वह मजबूत होता है त्यों-त्यों वह कमज़ोर होता चलता है। विजेता पराजित हो जाता है। इसकी जीत में ही इसकी हार शामिल है। जीवन-चक्र के अर्थ में नहीं, उद्विकास के अर्थ में नहीं, किसी एन्ट्रापी के अर्थ में नहीं न ही किसी ऐतिहासिक उत्थान पतन की दास्तान के अर्थ में. बल्कि एक विरोधाभास की तरह अंतर्विरोध के अर्थ में इसे सोचने का प्रयोग. एक द्वंद्वात्मक प्रयोग।)

इस विचारोत्तेजक प्रयोग में हम सब यदि शामिल हों तो हमारी कहानी आलोचना के लिए और शायद उनके लिए भी अच्छा होगा जो आज यथार्थवाद के पीछे डण्डा लिए दौड़ रहे हैं। जी, मेरा इशारा हिंदी कहानी के पिछले 25 सालों के विकास पर बात करने वाले आलोचना के कुछ नए राजकुमारों की तरफ भी है। बहरहाल, यह कहानी फिर कभी।

हत्यारे कहानी में जो मूल्य-निर्णय है वह हत्या की घटना में है। जरूरी नहीं कि हर कहानी में यह मूल्य-निर्णय आये ही। लेखकीय मूल्य-निर्णय कोई अनिवार्यता नहीं है। परंतु अपराध की इस मनोवृत्ति के बारे में, इस फासीवादी प्रवृत्ति के बारे में अगर कहानी के भीतर उसके मजदूर वर्ग का विरोधी होने का निर्णय नहीं होता तो यह कहानी इतनी मूल्यवान नहीं होती। वह पेटी बुर्जुआ की जो एक खास प्रवृत्ति है- नपुंसक, बड़बोली, ऐय्याश युवा पीढ़ी का चरित्र-चित्रण मात्र बन कर रह जाती। ऐसे चरित्रों के भावी विकास का, गहरे खलनायकत्व का उद्घाटन वहां नहीं हो पाता। यह पीड़ा भरी प्रतीक्षा के प्रतिक्रियावादी रूपांतरण की कहानी है। विद्रूप विडंबनाओं के नायक घीसू और माधव लुम्पेन सर्वहारा हैं और हत्यारे कहानी के नायक या खलनायक, यदि कहने की अनुमति दें, तो लुम्पेन पेटी बुर्जुआ हैं। कहानी के भीतर का यह मूल्य-निर्णय दरअसल रचना-प्रक्रिया का एक अहम हिस्सा है।

 हमारे आज के कथालोचक यह दावा कर रहे हैं कि जन-जीवन में जब कोई यूनिंगफाइंग फैक्टर नहीं है तो कहानी के भीतर वह कहां से होगा। किसी यूनिंगफाइंग फैक्टर के बिना कहानी की रचना-प्रक्रिया में कोई मूल्य-निर्णय तो आ ही नहीं सकता। फिर क्या किया जाए! यूनीफाइंग फैक्टर मतलब -विश्वदृष्टि या जीवन दृष्टि। लेकिन यथार्थ के असम्बद्ध होने की चर्चा पहली बार तो नहीं हो रही है। और हम अपने अनुभव से जानते हैं कि समाज के संक्रमण काल में हमेशा ही ऐसी बातें होती रही हैं। ऐसी बातों में हमारे समय के एक प्रमुख चरित्र की ईमानदार स्वीकारोक्ति भी होती है। याद करें कि आधुनिकतावाद की धारा के एक आदि नायक टी.एस. इलियट ‘डीसोसिएशन ऑफ सेंसबिलटी’ की चर्चा किया करते थे। पिछले 20-25 सालों के तीव्र परिवर्तन ने हमारी संवेदनाओं में एक असम्बद्धता तो पैदा की ही है। जैसे इलियट के समय में भी हुई थी। आज हम तेजी से उपभोक्तावादी समाज में बदलते जा रहे हैं। हमारी पिछली पीढ़ी के महान सिनेमाकार और राजनीतिक कार्यकर्ता पियरे पाउलो पासोलिनी ने फासीवाद के नए स्वरूप को उपभोक्तावाद में बदलते देखा था। देख लिया था, इसलिए उनकी हत्या कर दी गई. और फासीवाद के इस आसन्न संकट के काल में पुराने और नए के संधिकाल में हमारी भी चेतना आक्रांत है. इसलिए मानव विरोधी विचारधाराओं के द्वारा चेतना पर छायी इस धुंध को और अधिक मिस्टीफाई (रहस्यात्मक) करने का षडयंत्र रचा जा रहा है। खण्ड-खण्ड पाखण्ड की दृष्टि एक ऐसी ही मानव विरोधी विचारधारा है। ताज्जुब नहीं, इस विचारधारा का पहला हमला यथार्थवाद पर है। ऐसा क्यूं है कि मानव विरोधी विचारधाराओं का पहला हमला समय-समय पर यथार्थवाद के खिलाफ होता है! क्योंकि यथार्थवाद और चाहे जो हो उसके मूल में है मानव-विरोधी मिस्टीफिकेशन को, उसके धुंध को साफ कर देना। डी-मिस्टीफिकेशन यथार्थवाद की एक प्राथमिक शर्त है। जहां से बुर्जुआ सोसायटी के लिए अपने-आप यह शैली खतरनाक सिद्ध हुई है। बहरहाल, उसके अलग-अलग ट्रेडीशन हैं, अंग्रेजी ट्रेडीशन, फ्रेंच ट्रेडीशन खैर! लेकिन सीधे डी-मिस्टीफिकेशन एक महत्त्वपूर्ण काम है। मूल्य-निर्णय का सम्बन्ध क्या इस डी-मिस्टीफिकेशन से है? डी-मिस्टीफिकेशन की यह प्रक्रिया बदलाव की नई ताकतों के प्रति रचना-प्रक्रिया में मूल्यबोध की तरह आती है। लेखक की प्राथमिक संवेदना से लेकर पाठ की प्रक्रिया तक इसका निरंतर विकास होता है। ब्रेख्त के लिए रचना-प्रक्रिया के साथ चलने वाला यह डी-मिस्टीफिकेशन एक क्रियावान, उत्कंठापूर्ण और प्रयोगात्मक भी है. या दुसरे शब्दों में कहें तो सामाजिक संस्थाओं और भौतिक दुनिया के प्रति वैज्ञानिक दृष्टि का उन्मेष है। यथार्थवाद इसी वैज्ञानिक दृष्टि को प्रोत्साहित करता है, प्रयोग के स्तर पर भी। और यह प्रक्रिया त्रिस्तरीय है। पहली, रचना में पात्रों और उसकी काल्पनिक दुनिया के बीच। दूसरी, रचना और पाठक के बीच। तीसरी, रचना-रचनाकार का अपने कच्चे माल और टेक्निक के बीच। यथार्थवाद का यह त्रिआयामी व्यवहार (प्रैक्सिस) परंपरागत अनुकरणों और उनके शुद्ध प्रतिनिधिमूलक केटेगरी को ध्वस्त कर देता है. जिसके प्रभाव में आजकल का अधिकांश दलित लेखन है। फिर बकौल जेम्सन ‘रीडिंग इज ए सिम्बोलिक एक्ट’। इस ‘सिम्बोलिक एक्ट’ के प्रति सजग होना, आत्म सजग होना जरूरी है। यह सजगता एक सचेतन क्रिया है। इस क्रिया में अपने राजनीतिक अवचेतन की संरचना के प्रति सजगता भी शामिल है। दिक्कत यह है कि क्या हमारा लेखन और हमारी आलोचना खुद आत्म सजग है! ‘हत्यारे’ कहानी का पाठ आज के समय में यही चुनौती हमारे समक्ष रखता है। बात सिर्फ रचना के क्लास मोटिफ को उद्घाटित करने या अलग-अलग विमर्शों के  लिहाज से उसकी व्याख्या का नहीं है . अर्थात् रचना के बाहर की दुनिया का प्रतिबिम्ब और उसकी व्याख्या का नहीं है। बल्कि रचना की विकासमान सम्पूर्णता का है। इसीलिए उसकी हिस्टोरीसिटी का है। विषय से विचार तक की यात्रा का खतरा दरअसल हिस्टोरीसिटी के अन्वेषण का खतरा है। अमरकांत की कहानी में यह हिस्टोरीसिटी उसके मूल्य-निर्णय की प्रक्रिया में आयी है। यह हिस्टोरीसिटी न केवल समकालीनता का यूनीफाइंग फैक्टर है वरन् हमारे और रचना के कालांतर का भी एक यूनीफाइंग फैक्टर है। यह रचना से पाठक तक लगातार जारी है. इस अर्थ में यह हिस्टोरीसिटी विद्आउट हिस्ट्री है .और इसी अर्थ में यह वर्तमान की वर्तमानता है। इसी अर्थ में हत्यारे कहानी खुद अमरकांत की कहानी-कला की आलोचना है। उसमें एक ब्रेक है. अमरकांत के कहानी संसार में एक घटना की तरह। हत्यारे कहानी का अंत कुछ इस तरह होता है, ‘झोपड़ियों से कुछ व्यक्ति निकलकर युवकों के पीछे दौड़े। तारकोल की सड़कें जन-शून्य थी। दोनों युवक अरबी घोड़ों की तरह दौड़ रहे थे। वे कभी बाएं घूम जाते, कभी दाएं। पीछा करने वालों में एक फुर्तीबाज व्यक्ति तीर की तरह उनकी ओर बढ़ रहा था।…जो व्यक्ति ‘हाय मार डाला’ कहके लड़खड़ा कर गिर पड़ा। इसके बाद दोनों पुनः तेजी से भाग चले। तब बिजली का खम्भा आया तो रोशनी में उनके पसीने से लथपथ ताकतवर शरीर बहुत सुंदर दिखाई देने लगे। फिर वे न मालूम किधर अंधेरे में खो गए!’ जिस अंधेरे में दोनों न जाने कहां गुम हो गए यह वही अंधेरा है जो मुक्तिबोध के ‘अंधेरे में’ है। जहां वे डोमा जी उस्ताद को देख लेते हैं। हम अपने अंधेरे में क्या देख रहे हैं! यह क्या हमारे मूल्य-निर्णय से तय नहीं होता!

दो अवांतर प्रसंग छोटे-छोटे- एक, हमारा एक कलाकार मित्र अनुपम मूवमेंट में पेंटिंग्स करता है। उसकी एक समस्या है। हालांकि यह कहानी के बाहर का प्रसंग है लेकिन कला का महत्त्वपूर्ण प्रश्न है और यथार्थवाद का भी एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न है। वह कहता है कि हम जिस शैली में अब तक पेंटिंग्स बनाते आए हैं अब यथार्थ उसी शैली में बद्ध होकर हमारे सामने आ रहा है। याद कीजिए मुक्तिबोध की भी यही समस्या थी। वह कहता है कि मैं अपने ही शिल्प में बंधने के चलते यथार्थ को नहीं देख पा रहा हूं- यह जो परिवर्तनशील यथार्थ है। वह अपना एक अनुभव बताता है कि वह एक बार एक स्त्री के जीवन की किसी परिस्थिति पर बड़े भावावेग से एक चित्र बना रहा होता है। पेंटिंग्स पूर्ण नहीं हो पा रही है। वह परेशान है। अचानक इस परेशानी में वह अपना शरीर काटकर खून से पेंटिंग का एक हिस्सा बना देता है और अपने बाल नोचकर पेंटिंग्स में जहां-तहां चिपका देता है और कहता है कि मुझे बहुत शांति मिली है। कलाकार रचना में अपने बॉडीली प्रजेन्स (शरीरी उपस्थिति) को खोजना चाह रहा है। पेंटर पेंटिंग्स में अपनी उपस्थिति खोजने की कोशिश में है। यह बॉडली प्रजेन्स का क्राइसिस कला का एक वास्तविक अनुभव तो है, लेकिन यह मिसप्लेस्ड क्वेश्चन है। यह प्राब्लम मिसप्लेस्ड है क्योंकि पॉलिटिक्स में जैसे वह अपनी प्रजेन्स को आंदोलन के भीतर देख रहा है; रचना, जो प्रोटेस्ट के भीतर से निकलने वाली रचना है इसलिए महत्त्वपूर्ण भी है, के भीतर भी अपना बॉडली प्रजेन्स ढूंढ़ रहा है। राजनीति की दुनिया का कला की दुनिया से जो सम्बन्ध होगा, वह क्या होगा? क्या रचना-प्रक्रिया में जिसको मुक्तिबोध कहते हैं, जब तक तटस्थता नहीं होगी तब तक तदाकारिता सम्भव नहीं है। प्रश्न वहां अटैच होकर के बॉडली प्रजेन्स का, स्वानुभूति का नहीं है प्रश्न डिटैचमेंट का है। यह डिटैचमेंट लग सकता है कि कोई आधुनिकवादी तर्क हो, उपभोक्तावादी सर्जक मन का। खैर, इस पर चर्चा कहीं और।

दूसरा प्रसंग, नामवर सिंह ने हाल-फिलहाल पप्पू यादव की किताब का लोकार्पण किया। पप्पू यादव हत्यारे कहानी के नायक भी हैं। प्रश्न है, उन्होंने हत्यारे कहानी के बारे में कहा कि वहां मूल्य-निर्णय महत्त्वपूर्ण है. यह बात तो सही है कि दुनिया भर में अपराधियों की डायरियां आदि काफी लोकप्रिय हुई है;  उस पर विचार करना एक अलग बात है. लेकिन उसकी किताब का लोकार्पण करना एक राजनीतिक काम है। इसमें आपका मूल्य-निर्णय होगा कि नहीं! यानि रचना और आलोचना के प्रश्न जीवन के प्रश्न होंगे कि नहीं! यह एक महत्त्वपूर्ण सवाल है। शायद इसी अर्थ में प्रेमचंद कहते थे कि हर कोई चाहता है कि मेरा जीवन एक कहानी बन जाए।

मार्तण्ड प्रगल्भ

मार्तण्ड प्रगल्भ

छात्र राजनीति और संस्कृति-कर्म में व्यस्त रहने वाले मार्तण्ड प्रगल्भ जे.एन.यू. के भारतीय भाषा केंद्र में पी.एच.डी. के लिए शोधरत  हैं। उनसे mpragalbha1@gmail.com पर संपर्क संभव है

(जन संस्कृति मंच के कथा समूह के प्रथम आयोजन ‘कथा मंच’ के तृतीय सत्र में कथाकार मार्तण्ड द्वारा ‘अमरकांत की कहानी हत्यारे और आज का समय’ पर इलाहाबाद में दिनांक 22 दिसंबर, 2013 को प्रस्तुत व्याख्यान। लिप्यावतरण- श्रीकांत पाण्डेय।)

हिन्दी नवजागरण की परिकल्पना पर पुनर्विचार की जरूरत : राजकुमार

हिन्दी नवजागरण की अवधारणा ज्ञान के विशेष पैराडाइम के अन्तर्गत, जिसे सुविधा के लिए औपनिवेशिक आधुनिकता का पैराडाइम कह सकते हैं, गढ़ी गयी थी। आधुनिकता की ज्ञानमीमांसा के निकष पर ही समस्याएँ चिन्हित की गयीं और उसी के अनुरूप समाधान सुझाए गए। इक्कीसवीं सदी तक आते-आते ज्ञान का यह पैराडाइम बदल गया। पैराडाइम बदलते ही समस्याओं की पहचान और उनके समाधान के स्वरूप में भी बदलाव आ गया। उन्नीसवीं सदी में जन्मी विचारधाराओं को यथावत दुहराकर न तो आज की समस्याओं की सम्यक् पहचान संभव है और न ही उनका समाधान। इसलिए हिन्दी नवजागरण की परिकल्पना और उसके द्वारा सुझाए गए विकल्पों पर नये सिरे से विचार करने की जरूरत है। क्योंकि पुराने पैराडाइम के तहत दिये गये जो उत्तर पहले सही लगते थे, वे अब कारगर नहीं लगते। इसी परिप्रेक्ष्य में हिन्दी नवजागरण की अवधारणा और उससे जुड़ी समस्याओं को नये सिरे से समझने की शुरूआती कोशिश इस लेख में की गयी है।   # लेखक

सहमत से साभार-संपादित

सहमत से साभार-संपादित

By राजकुमार

1857 के विद्रोह में मध्यवर्ग और व्यवसायियों/उद्यमियों की भूमिका प्रायः नगण्य रही है। किन्तु विद्रोह के बाद घटित होने वाले नवजागरण और राष्ट्रीय आन्दोलन में इन्हीं दो वर्गों की केन्द्रीय भूमिका रही। नवजागरण और राष्ट्रीय आन्दोलन में नेतृत्व इन्हीं दो वर्गों के हाथ में रहा। 1857 के विद्रोह और परवर्ती नवजागरण के चरित्र में जो अन्तर दिखायी पड़ता है, उसकी व्याख्या इनके वर्ग-चरित्र में आये बदलाव के सहारे की जा सकती है। इसी कारण नवजागरण कालीन चिन्तकों के दृष्टिकोण में अंग्रेजी राज के प्रति एक खास तरह की दुविधा दिखायी पड़ती है। वे अंग्रेजी राज की तारीफ करते हैं किन्तु साथ ही कुछ मुद्दों पर उसकी आलोचना भी करते हैं। इस दुविधा को इतिहासकार सुधीर चन्द्र ने अपनी पुस्तक आप्रेसिव प्रेजेण्ट में ‘एम्बीवैलेन्स’ का नाम दिया है। ‘एम्बीवैलेन्स’ का हिन्दी में ‘आविकर्षण’ के रूप में अनुवाद किया गया है। नवजागरण कालीन चिन्तकों में राष्ट्रभक्ति-राजभक्ति, स्त्रियों की स्वाधीनता और मुसलमानों को लेकर दुविधा दिखायी पड़ती है। ऐसा आविकर्षण केवल हिन्दी नवजागरण तक सीमित नही है, दूसरी भाषाओं के नवजागरण में भी इन मुद्दों को लेकर ऐसा ही आविकर्षण मौजूद है।

इतिहासकार रंजीत गुहा ने अपनी पुस्तक ‘सम एलीमेंट्री ऐस्पेक्ट्स  ऑफ पीजेंट इनसर्जेन्सी इन कॉलोनियल इंडिया’ में लिखा है कि 57 के विद्रोहियों के दृष्टिकोण में अंग्रेजी राज के प्रति एक सचेत शत्रुता का भाव था। वे अंग्रेजी राज को उखाड़कर अपना शासन कायम करना चाहते थे और अंग्रेजी राज की किसी भी सकारात्मक भूमिका को स्वीकार नहीं करते थे। पुरुषोत्तम अग्रवाल ने अपने एक निबंध ‘1857 और हिन्दी नवजागरण’ में भारतेन्दु युगीन हिन्दी नवजागरण के चिन्तकों के दृष्टिकोण और 57 के विद्रोहियों के दृष्टिकोण में दिखायी देने वाले अन्तर की विस्तार से चर्चा की है। वे रामविलास शर्मा के इस तर्क से सहमत नहीं हो पाते कि भारतेन्दु युग हिन्दी नवजागरण का दूसरा चरण है। उल्लेखनीय है कि रामविलास शर्मा 1857 के विद्रोह को हिन्दी नवजागरण का प्रथम चरण मानते हैं और भारतेन्दु युग को उसकी निरन्तरता में दूसरा चरण। लेकिन जैसाकि ऊपर कहा गया, हिन्दी नवजागरण को 1857 के विद्रोह की निरन्तरता में देखना सही नहीं है। 1857 के विद्रोह और हिन्दी नवजागरण के बीच अंग्रेजी शासन के प्रति दृष्टिकोण में आये अन्तर के साक्ष्य पर 57 और भारतेन्दु युग के बीच निरन्तरता से ज्यादा विच्छिन्नता के तत्व परिलक्षित होते हैं।

भारतेन्दु युगीन हिन्दी नवजागरण की एक बड़ी समस्या यह है कि इसमें कथित उर्दू परम्परा में लिखे गये साहित्य की चर्चा ही सिरे से गायब है। हिन्दी नवजागरण की शुरूआत ही भारतेन्दु के इस कथन से मानी गयी है कि 1873 में हिन्दी नये चाल में ढली। उर्दू को आप हिन्दी की शैली मानें या उसकी परिकल्पना को ही अस्वीकार करें, लेकिन सच्चाई है कि हिन्दी के नये चाल में ढलने से पहले उर्दू में साहित्य लिखने का सिलसिला शुरू हो चुका था। इसलिए फारसी लिपि या उर्दू में फारसी-अरबी के शब्दों को जबर्दस्ती ठुँसने की आलोचना करने के बावजूद हिन्दी जाति के नवजागरण की चर्चा से उर्दू में लिखे गये साहित्य को आप बाहर नहीं कर सकते। ऐसा करने से  उसकी साम्प्रदायिक परिणति की सम्भावनाएँ बढ़ जाती हैं और अन्ततः वही हुआ भी। मुख्य बात यह है हिन्दी क्षेत्र की व्यापकता और भाषायी जटिलता के कारण यहाँ ऐसी स्थितियाँ उत्पन्न हुईं कि तेलगू, बांग्ला या मराठी की तरह हिन्दी का कोई एक रूप सुनिश्चित करना और बाकी रूपों को बाहर कर देना सभी को स्वीकार्य निर्णय नहीं बन पाया। फारसी और फिर उर्दू की परम्परा के विकास के कारण हिन्दी के ही कई रजिस्टर बन गये। कई बार तो एक ही समय में अलग-अलग परम्परा से जुड़े लोग इन रजिस्टरों का अलग-अलग ढंग से उपयोग करते दिखायी पड़ते हैं। समस्या तब उत्पन्न होती है जब हम इनमें से किसी एक रूप के आधार पर हिन्दी का स्वरूप स्थिर करने की कोशिश करते हैं। हिन्दी, हिन्दुस्तानी और उर्दू के बीच खींचतान के समूचे इतिहास को इसी परिप्रेक्ष्य में समझना चाहिए। भारतेन्दु युगीन हिन्दी नवजागरण की समस्या यह है कि उसने हिन्दी का एक सही रूप तय कर बाकी रूपों को प्रकारान्तर से अवैध घोषित कर दिया और उनके बारे में किसी भी प्रकार के चिन्तन-अध्ययन का ही निषेध कर दिया। उर्दू परम्परा में लिखे गये साहित्य को हिन्दी नवजागरण के दायरे से बाहर कर देने के बावजूद भारतेन्दु को इस बात का एहसास था कि उर्दू शायरी की परम्परा से भिन्न खड़ी बोली हिन्दी में कविता लिख पाना आसान नहीं होगा। विद्वानों को इस बात पर विचार करना चाहिए कि हिन्दी को उर्दू से अलगाने के बावजूद स्वयं भारतेन्दु उर्दू में रसा नाम से कविता क्यों लिखते थे। यही नहीं, इस बात पर भी नये सिरे से विचार किया जाना चाहिए कि नयी चाल की हिन्दी के समर्थक भारतेन्दु अपनी ज्यादातर कविताएँ ब्रज भाषा में क्यों लिखते हैं। खड़ी बोली में तो उन्होंने ‘अमीर खुसरों के वजन पर सिर्फ मुकरिया ही लिखी। एक खास तरह की हिन्दी की वकालत करने के बावजूद भारतेन्दु के लेखन में उर्दू और ब्रज भाषा की उपस्थिति बहुत ही महत्वपूर्ण है। यदि गम्भीरता से विचार किया जाये तो इससे हिन्दी क्षेत्र के भाषायी मानचित्र की जटिलता को समझने में मदद मिल सकती है।

असल में भारतेन्दु संक्रमण कालीन दौर के रचनाकार-चिन्तक हैं, जहाँ कई तरह के विचार और प्रभाव तो सक्रिय है लेकिन इनमें से किसी को निर्णायक बढ़त हासिल नहीं हुई है। भारतेन्दु के रचनात्मक व्यक्तित्व में कई धाराएँ-उपधाराएँ सक्रिय दिखायी पड़ती हैं। इसीलिए उर्दू और ब्रज भाषा की साहित्यिक परम्परा के प्रति कम से कम रचनात्मक स्तर पर उनके यहाँ कुछ गुंजाइश बची हुई है।

किन्तु द्विवेदी युग तक आते-आते अंग्रेजी शिक्षा के प्रचार-प्रसार के परिणामस्वरूप भारत के तत्कालीन चिन्तक इस नतीजे पर पहँुचे कि भारत की पराधीनता का मुख्य कारण ये है कि यहाँ पश्चिमी ढंग के राष्ट्रवाद का विकास नहीं हो पाया। भारत की मुक्ति और एक स्वाधीन राष्ट्र के रूप में उसके विकास के लिए उसे पश्चिमी राष्ट्रों के वजन पर पुनर्गठित करना होगा। अब इस बात का कोई विशेष महत्व नहीं रह गया कि भारतीय सभ्यता में स्वाभाविक रूप से विकसित होने वाली प्रवृत्तियों को केन्द्र में रखकर ‘आधुनिक’ भारत की परिकल्पना की जाए। इसके बजाय सारा जोर इस ओर चला गया कि भारतीय सभ्यता की उन विशेषताओं को चिन्हित किया जाए, जिन्हें खींच-खाँच कर पश्चिमी राष्ट्रवाद के साँचे में फिट किया जा सके।

द्विवेदी जी समेत उस समय के बुद्धिजीवियों को ये बात सालने लगी कि राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्रवाद की परिकल्पना कैसे संभव होगी। भारत पश्चिमी राष्ट्रों से इस मायने में भिन्न था कि यहाँ कई भाषाएँ बोली जाती थीं। किन्तु सबसे ज्यादा लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा के रूप में हिन्दी को खड़ा कर राष्ट्रभाषा बनने के उसके दावे को मजबूत करने के लिए ऐसी हिन्दी की परिकल्पना की गयी, जिसमें हिन्दी के विविध रूपों और तथाकथित जनपदीय भाषाओं/ बोलियों के लिए कोई जगह नहीं बची। इसका परिणाम ये हुआ कि भारतीय सभ्यता में भाषाओं के विकास और उनके पारस्परिक सम्बन्ध को या तो नजरअन्दाज कर दिया गया या उसको समझने का विवेक ही नहीं उत्पन्न हो पाया। यदि समूचे भारत के भाषायी मानचित्र की चर्चा न भी की जाय तो भी इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि हिन्दी प्रदेश में एक ही समय में अलग-अलग कार्यों के लिए और कभी-कभी एक ही कार्य के लिए हिन्दी के भिन्न-भिन्न ‘रजिस्टर’ का इस्तेमाल होता रहा है। हिन्दी प्रदेश का भाषायी स्वरूप हमेशा बहुभाषी रहा है। भाषायी स्वरूप को लेकर असहमतियाँ हो सकती हैं और होनी भी चाहिए, लेकिन उनके अस्तित्व को ही दरकिनार कर गढ़ी गई हिन्दी नवजागरण की कोई भी परिकल्पना, नेक इरादों के बावजूद, आत्मघाती और अन्ततः साम्प्रदायिक होने के लिए अभिशप्त है।

किसी एक भाषायी रजिस्टर पर केन्द्रित हिन्दी की परिकल्पना से जितनी समस्याएँ सुलझती हैं उससे ज्यादा समस्या पैदा हो जाती है। हिन्दी प्रदेश के भाषायी मानचित्र को जनपदीय बोलियों और राष्ट्रीय भाषा के द्वि-आधारी विरुद्धों में रखकर देखने से उत्तर भारतीय भाषाओं के अन्तर्सम्बन्ध को समझने-समझाने की अभी तक जो कोशिश होती आयी है, उस पर पुनर्विचार करने की जरूरत है। असल में उत्तर भारतीय भाषाओं को किसी अन्य प्रसंग में लिखे गए ए.के. रामानुजन के वक्तव्य को किंचित परिवर्तित करते हुए कहें तो, एक ही सातत्य या स्पेक्ट्रम के क्रमशः परिवर्तित होते हुए हिस्से के रूप में देखा जाना चाहिए। कई बार इसका एक छोर दूसरे छोर से काफी अलग लगता है, लेकिन है वो उसी स्पेक्ट्रम का हिस्सा। इस स्पेक्ट्रम में दिखायी पड़ने वाले भाषायी परिवर्तन को चोटियों और घाटियों के रूपक के जरिये व्याख्यायित कर सकते हैं। चोटियाँ इस स्पेक्ट्रम के वो बिन्दु हैं, जहाँ उनका अन्तर आत्यन्तिक रूप में दिखाई पड़ता है और घाटियाँ वह स्थल हैं, जहाँ ये तीक्ष्णता क्रमशः ढलान पर उतरते हुए एक दूसरी भाषायी चोटी की ओर चढ़ने लगती है। ये भाषायी घाटियाँ ऐसे  पाॅकेट हैं, जहाँ एक भाषा या बोली का रजिस्टर धीरे-धीरे दूसरी भाषा के रजिस्टर में तब्दील होने लगता है। मनुष्य के शरीर में फैली हुई नसों की तरह ये भाषाएँ परस्पर जुड़ जाती हैं। इनकी सीमाएँ धँुधली, अस्पष्ट और खुली हुई हैं। इसीलिए इन भाषाओं/बोलियों के रजिस्टर दूसरी बोली या भाषा से, आधुनिक युग से पहले तक, जुड़े हुए दिखायी पड़ते हैं। राजनीतिक-आर्थिक सांस्कृतिक कारणों से इनमें से किसी एक भाषायी रजिस्टर का दायरा बढ़ जाता है और उसे ही कुछ लोग भाषा या राष्ट्र की भाषा के रूप में पुरस्कृत करने लगते हैं। इसमें भी कोई हर्ज नहीं, लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब किसी भाषायी रजिस्टर विशेष को राष्ट्र की भाषा के रूप पुरस्कृत करने की प्रक्रिया में अन्य भाषायी रजिस्टरों को जनपदीय बोली के रूप में अवमूल्यित या तिरस्कृत कर दिया जाता है। यहाँ तक कि उन्हें साहित्य और कला की भाषा के रूप में भी आगे जारी रखने के औचित्य का निषेध कर दिया जाता है। यदि हम भाषा और बोली के युग्म में हिन्दी प्रदेश की भाषायी प्रकृति पर विचार करने के बजाय उनके अन्तर्सम्बन्ध के नैरूतर्य पर विचार करें तो हम उन गलतियों को दोहराने से बच सकते हैं, जिनका सामना हिन्दी जाति की एक भाषा खड़ी करने के यांत्रिक रवैये के कारण अभी तक हम करते रहे हैं। उत्तर भारत की भाषाओं/ बोलियों में नैरन्तर्य का एक बड़ा प्रमाण ये है कि क्रिया रूपों अथवा उच्चारण में कुछ अन्तर के बावजूद इनके शब्द भण्डार में कोई विशेष अन्तर नहीं है।

ये सही है कि अठारहवीं शताब्दी में हिन्दी के उस भाषायी रजिस्टर में जिसे आज उर्दू कहते हैं, बोल-चाल के शब्दों को निकालकर फारसी और अरबी के शब्दों की खूब भर्ती की गई। नतीजा ये हुआ कि इस परम्परा में लिखे गये साहित्य का दायरा अरबी-फारसी जानने वाले कुछ अभिजनों तक ही सीमित हो गया और यहाँ की लोक भाषाओं से उसका सम्बन्ध कमजोर पड़ गया। इस प्रवृत्ति की आलोचना करना तो ठीक था, लेकिन इस परम्परा में लिखे गए साहित्य की उपलब्धियों का सिरे से निषेध कर ‘नए चाल में ढली’ हिन्दी में साहित्य लिखने और उसे इस परम्परा से अलग दिखाने के लिए जैसा साहित्य लिखा गया, उसमें इस परम्परा की साहित्यिक उपलब्धियों से कुछ भी न ग्रहण करने का भाव ज्यादा था।

यदि भारतेन्दु युग में उर्दू की परम्परा से नई हिन्दी का सम्बन्ध-विच्छेद हुआ तो द्विवेदी युग की उपलब्धि ये है कि इस दौर में ब्रजभाषा की परम्परा से भी उसे काट दिया गया। रीति विरोधी अभियान चलाकर ये सिद्ध करने का प्रयास किया गया कि ब्रजभाषा में आधुनिक युग की संवेदना वहन करने की सामथ्र्य नहीं है। ब्रजभाषा में तो पतनशील सामंती मानसिकता की कामुक शंृगारिक कविताएँ ही लिखी जा सकती हैं। रीतिकालीन शृंगारिक कविताओं को ही नहीं, स्त्री लोकगीतों को भी विक्टोरियन नैतिकता के प्रभाव में अश्लील घोषित कर दिया गया जबकि इतिहास यह है कि आधुनिक योरोपीय भाषाओं में भी अपनी क्लासिक साहित्य और ज्ञान को आत्मसात कर कुछ-कुछ वैसा ही साहित्य लिखा गया था जैसा रीतिकालीन कविताओं में दिखाई पड़ता है इस बात को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया कि सूर, मीरा से लेकर न जाने कितने भक्त कवियों ने इसी भाषा में कविताएँ लिखी हैं। रीतिकालीन दौर में भी शंृगारिक कविताएँ लिखने वाले कवियों से ज्यादा ऐसे कवियों की संख्या है, जिन्होंने भक्ति-प्रधान कविताएँ लिखी हैं। यही नहीं, कथित रीतिकाल के दौर में ही 60 से भी अधिक संख्या में वीरकाव्य-लिखे गए हैं। दैनंदिन जीवन से सम्बन्धित समस्याओं पर लिखी गई कविताओं के साथ-साथ नीतिपरक कविताएँ भी इस दौर में कम नहीं लिखी गईं। स्वयं भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, नरोत्तमदास और जगन्नाथ दास ‘रत्नाकर’ जैसे आधुनिक दौर के कवियों के यहाँ भी वैसी कविताएँ नहीं मिलतीं, जिनका रीति-विरोधी अभियान के नाम पर विरोध किया गया। असल में उर्दू के दावे को खारिज करना तो आसान था, लेकिन उर्दू के दावे को खारिज करने के बाद ब्रजभाषा के दावे को खारिज करना बहुत मुश्किल था। साहित्यिक उपलब्धि की दृष्टि से तो खड़ी बोली कहीं से ब्रज भाषा के सामने खड़ी ही नहीं होती। उर्दू को दरकिनार करने के बाद साहित्य की भाषा के रूप में व्यापकता और विस्तार की दृष्टि से भी ब्रजभाषा का दायरा खड़ी बोली के मुकाबले बहुत विस्तृत था। गुजरात से लेकर बंगाल तक ब्रजभाषा में साहित्य लिखने की परम्परा दिखायी पड़ती है। खड़ी बोली के पक्ष में दूसरा तर्क ये दिया गया कि ब्रजभाषा में गद्य का पर्याप्त विकास नहीं हुआ, लेकिन यदि उर्दू परम्परा के विकास को हिन्दी से अलग कर दें, तो उस समय तक हिन्दी में ही गद्य का कौन सा विकास दिखाया जा सकता था। ये सही है कि फोर्ट विलियम काॅलेज, ईसाई मिशनरियों और अन्य लोगों के सहयोग से उन्नीसवीं शताब्दी में हिन्दी गद्य का तेजी से विकास हुआ। जो शोध हुए हैं, उनके आधार पर ये कहना भी पूरी तरह सही नहीं है कि ब्रजभाषा में गद्य का विकास ही नहीं हुआ। सबसे पुराने व्याकरण और शब्दकोश ब्रजभाषा के ही बनाये गये और अनेक संस्कृत ग्रन्थों का ब्रजभाषा-गद्य में अनुवाद किया गया। इन सारे तथ्यों पर ध्यान देने के बाद ये बात समझ में आती हैं कि रीतिविरोधी अभियान के नाम पर वास्तव में ब्रजभाषा के साहित्यिक-वैचारिक अवदान का निषेध किया जा रहा था।

चूँकि हिन्दी नवजागरण की अवधारणा किसी न किसी रूप में आधुनिकता के प्रोजेक्ट के साये में विकसित हो रही थी और इस प्रोजेक्ट के मुताबिक पहले से चली आ रही सांस्कृतिक और वैचारिक परम्पराएँ व्यर्थ और पिछड़ी हुई मान ली गई थीं, इसलिए आधुनिकता के प्रोजेक्ट को हिन्दी में उतारने के लिए हिन्दी का ऐसा रजिस्टर ज्यादा उपयुक्त लगा, जिस पर परम्परा का कोई बोझ ही नहीं था। खड़ी बोली में आधुनिक युग से पहले साहित्यिक-वैचारिक लेखन की कोई उल्लेखनीय परम्परा नहीं थी, इसलिए उसमें पूर्व परम्परा से सम्बन्ध-विच्छेद करने की कोई जरूरत ही नहीं थी। परम्परा की चिन्ता किये बिना, जो चाहें, जैसे चाहें, लिख सकते थे। उल्लेखनीय है कि मुगलकाल में उर्दू का विकास भी कुछ इसी तरह हुआ था। प्रसिद्ध इतिहासकार मुजफ्फर आलम ने अपने एक लेख में लिखा है कि उर्दू में लेखन के पीछे दो शर्तें लगाई गई थीं, पहली यह कि इसकी लिपि फारसी होगी, दूसरी यह कि बोल-चाल की भाषा में शब्द न उपलब्ध होने पर फारसी या अरबी से शब्द लिये जायेंगे। खड़ी बोली उर्दू में बिल्कुल नये सिरे से साहित्य लिखना ब्रज-भाषा की तुलना में इसलिए आसान था, क्योंकि ब्रजभाषा में साहित्य की एक पूर्व परम्परा थी, जबकि खड़ी बोली में साहित्य लिखने की कोई उल्लेखनीय परम्परा नहीं थी। खड़ी बोली उर्दू की तरह ही खड़ी बोली हिन्दी में जिस तरह के साहित्य-लेखन की शुरूआत हुई, उसका न तो उर्दू की परम्परा से, न ब्रजभाषा की परम्परा से कोई उल्लेखनीय सम्बन्ध दिखायी पड़ता है। लोकसाहित्य की परम्परा से सम्बन्ध स्थापित करने का तो खयाल भी नहीं आता। परम्परा से विच्छेद या परम्परा से मुक्ति के इन दोनों उदाहरणों की विशद चर्चा तो यहाँ संभव नहीं है, फिर भी खड़ी बोली हिन्दी में लिखे गए आधुनिक साहित्य पर दो चार बातें करना बेहद जरूरी है।

रामविलास शर्मा ने लिखा है कि हिन्दी नवजागरण में अंग्रेजी शिक्षा और पश्चिमी ज्ञान की कोई उल्लेखनीय भूमिका नहीं रही। थोड़ी रियायत देते हुए उन्होंने ये जरूर जोड़ दिया है कि अंग्रेजी साहित्य की मानवतावादी और प्रगतिशील परम्परा भी रही है और उससे सीखने में कोई हर्ज नहीं। लेकिन आधुनिक हिन्दी साहित्य की गम्भीरता से पड़ताल करने पर ये बात स्पष्ट हो जाती है कि उसकी मूल प्रेरणा और आदर्श अंग्रेजी साहित्य ही रहा है। ज्यादातर आधुनिक हिन्दी साहित्य पश्चिम से प्रेरणा लेते हुए और उसी के मानदण्ड पर लिखा गया है। कहने वाले चाहें तो कह सकते हैं कि ये अंग्रेजी साहित्य की नकल है। लेकिन अंग्रेजी के प्रसिद्ध उत्तर औपनिवेशिक चिंतक होमी भाभा ने नकल में भी अकल की बात करते हुए मिमिक्री और हाइब्रिडिटी (संकरता) के सिद्धान्तों के सहारे औपनिवेशिक देशों में लिखे गए साहित्य के महत्व का बहुत जोर-शोर से प्रतिपादन कहते हुए इस प्रकार के साहित्य की उपनिवेशवाद-विरोधी भूमिका को रेखांकित करने का गंभीर प्रयास किया है। होमी भाभा के इस तर्क को सामान्य रूप से आज भी दोहराया जा रहा है। लेकिन वास्तव में ये एक पैराडाइम शिफ्ट था। प्रसिद्ध इतिहासकार रणजीत गुहा के अनुसार पैराइाइम के इस युद्ध में पश्चिम की विजय हुई; अद्भुत पर अनुभूति की विजय हुई। विद्वानों ने रणजीत गुहा के इस तर्क की आलोचना करते हुए दिखाया है कि पश्चिम के विपरीत भारतीय यथार्थवादी उपन्यास विस्मय, फैन्टेसी और काव्यत्व से पूर्णतः विच्छिन्न नहीं थे। इसलिए ये कहना सही नहीं है कि इस पैराडाइम शिफ्ट के कारण पहले से चली आ रही भारतीय साहित्यिक परम्परा का पूरी तरह निषेध हो गया। ये तर्क सही है, पर असल बात ये है कि इस पैराडाइम शिफ्ट के बाद साहित्य, संस्कृति और ज्ञान-विज्ञान की बुनियाद आधुनिकता की ज्ञानमीमांसा पर टिक जाती है और भारतीय ज्ञानमीमांसा की परम्परा का इस्तेमाल सिर्फ खाली जगहों को भरने के लिए, एक ऐसा संस्करण तैयार करने के लिए किया जाता है, जिसकी पैकेजिंग भारत में की गई हो। इसे कुछ इस तरह समझना चाहिए, जैसे उत्पादन भले ही भारत में हो रहा हो लेकिन उसकी टेक्नाॅलजी पश्चिम से ली गई हो। इसी तर्क को आगे बढ़ाते हुए कहना चाहिए कि लिखा भले ही भारतीय भाषाओं में जा रहा है, लेकिन उसका विन्यास और उसकी अन्तर्दृष्टि पश्चिम से ली गई है। भारतीय भाषाओं में लिखने से कोई साहित्य भारतीय नहीं हो जाता और न ही भारतीय भाषाओं में चिन्तन करने से कोई चिन्तन भारतीय हो जाता है।

उत्तर औपनिवेशिक चिन्तकों द्वारा तैयार माॅडल के विकल्प के रूप में मैं एक दूसरे किस्म के माॅडल का प्रस्ताव करने की जुर्रत कर रहा हँू। थोड़ी देर के लिए कल्पना कीजिए कि भारतीय ज्ञानमीमांसा और साहित्यिक परम्परा की नियामक भूमिका को स्वीकार करते हुए आधुनिकता की ज्ञानमीमांसा से भी हमने कुछ तत्व लिये होते तो उसकी सूरत और सीरत कुछ और होती। राजनीतिक और सामाजिक चिन्तन के क्षेत्र में गाँधी ने और काव्य के क्षेत्र में कुछ ऐसी ही कोशिश रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने की थी। किन्तु ये इकलौती कोशिशें थीं और परवर्ती चिन्तकों और रचनाकारों ने इन्हें परम्परावादी, रहस्यवादी कहकर नकार दिया। परिणाम ये हुआ कि साहित्य, संस्कृति और ज्ञान के क्षेत्र में जो भी चिन्तन हुआ उसकी नियामक प्रेरणा पश्चिमी आधुनिकता की ज्ञानमीमांसा से तय होती रही। हिन्दी में तो सामान्य रूप से आज जैसी स्थिति है, वो और भी विडम्बनापूर्ण है। यहाँ तो उस ज्ञान को, जिसका विकास पश्चिम में 30-40 के दशक में हुआ था, आज भी भारतीय चिन्तन के रूप में पूरे भक्तिभाव से दोहराया जा रहा है। जबकि पश्चिम में भी इस ज्ञान को अब कोई तवज्जो नहीं दे रहा। इसीलिए आधुनिक युग में भारतीय भाषाओं में जो साहित्य लिखा गया है, उसमें ज्यादा ऐसा नहीं है, जिसे सही मायने में भारतीय साहित्य कहा जा सके। जो है, वह पश्चिमी आधुनिकता के सर्वव्यापी प्रभाव के बावजूद है।

यह अकारण नहीं है कि यद्यपि आधुनिक हिन्दी साहित्यिक चिन्तन में भक्ति आन्दोलन के महत्व का बढ़चढ़कर बखान किया जाता है, किन्तु विरली ही कोई ऐसी रचना होगी, जिसे पढ़कर लगे कि ये रचना भक्ति संवेदना से गुजकर लिखी गई है। परम्परा का किताबी ढंग से बखान तो खूब किया गया, लेकिन परम्परा से रचनात्मक स्तर पर कुछ भी सीखने और ग्रहण करने के चिन्ह कुछ ही रचनाओं में दिखाई पड़ते हैं। मतलब बिल्कुल साफ है, परम्परा का गुणगान कीजिए और कुछ भी लिखते समय उसे भूल जाइए। कुछ विद्वान गरीबी, भूखमरी, किसान, मजदूर जैसे विषयों पर लिखी गई रचनाओं के आधार पर ये सिद्ध करने की कोशिश करते हैं कि इसकी प्रेरणा भक्तिकालीन साहित्य से आई है। अब उन्हें कौन समझाए कि भक्ति काव्य-संवेदना से उसका कोई सम्बन्ध नहीं है। इस प्रकार के विषयों पर लिखी गई रचनाओं का प्रेरणास्रोत पश्चिमी चिन्तन और यथार्थवादी साहित्यिक परम्परा है। भक्ति आन्दोलन न भी होता तो भी इन विषयों पर इसी ढंग से लिखा जाता। दूसरे देशों में, जहाँ भक्ति साहित्य जैसी कोई परम्परा नहीं है, इन विषयों पर थोड़े-बहुत हेर-फेर के साथ इसी ढंग से लिखा गया है। इन विषयों पर लिखी गई रचनाओं को देखने से शायद ही कहीं ऐसी प्रतीति होती हो कि उन्हें भारतीय सांस्कृतिक एवं बौद्धिक परम्परा को आत्मसात करके लिखा गया है। परम्परा के मूल्यांकन से समृद्ध रचनाएँ हिन्दी में ज्यादा नहीं हैं। कुल मिलाकर भारतेन्दु की कुछ रचनाओं, प्रेमचन्द और रेणु के कथा-साहित्य, प्रसाद और मुक्तिबोध की कविताओं के अतिरिक्त कौन सी ऐसी रचनाएँ हैं, जिन्हें भारतीय परम्परा के बीच से निकली हुई रचनाओं के रूप में चिन्हित किया जा सके। विडम्बना ये है कि आधुनिक साहित्य में जहाँ भक्ति साहित्य का सचमुच असर दिखाई पड़ता है, उसे रहस्यवादी कह कर खारिज कर दिया जाता है। इसका सटीक उदाहरण है कि भक्ति काल का सबसे अधिक गुणगान करने वाले रामविलास शर्मा ने मुक्तिबोध की कविताओं को रहस्यवादी कहकर खारिज कर दिया। जबकि उनकी कविता के टेक्स्चर में संत साहित्य की संवेदना की गहरी छाप है। हबीब तनवीर और विजयदान देथा की रचनाओं के बारे में जरूर ऐसा कहा जा सकता है कि वे भारतीय साहित्यिक परम्परा से अनुस्यूत और उसे आगे बढ़ाने वाली रचनाएँ हैं, लेकिन उन पर विचार करने के लिए एक स्वतंत्र लेख की दरकार होगी।

उल्लेखनीय है कि प्रगतिशील लेखक संघ (1936) के पहले घोषणा-पत्र में भक्तिकालीन साहित्य को पलायन का साहित्य कह कर खारिज कर दिया गया था। प्रेमचन्द ने इस अधिवेशन के बहुप्रशंसित अध्यक्षीय भाषण में आधुनिक युग से पहले के समूचे साहित्य को मौजमस्ती और मनबहलाव का साहित्य करार दिया था। बाद में परम्परा के मूल्यांकन के प्रसंग में भले ही उस गलती को दुरुस्त कर लिया गया हो लेकिन रचनात्मक लेखन और वैचारिक चिन्तन के क्षेत्र में परम्परा के सकारात्मक मूल्यांकन से कुछ भी ग्रहण करने की जहमत उठाने के निशान विरले ही दिखाई पड़ते हैं।

पश्चिम में आधुनिकता के अभ्युदय के साथ साहित्य और कलाओं को आधुनिकता के प्रोजेक्ट के सहायक के रूप में देखने की प्रवृत्ति जोर पकड़ने लगी और उन्नीसवीं शताब्दी में यथार्थवाद के अभ्युदय के साथ अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच गई। उल्लेखनीय है कि पश्चिम में समाज विज्ञान का विकास विज्ञान की पद्धति की बुनियाद पर हुआ था और इसीलिए समाज का अध्ययन करने वाले शास्त्रों को ‘समाज विज्ञान’ के रूप में प्रतिष्ठित करने पर जोर दिया गया। एंगेल्स ने तो माक्र्स के चिन्तन का महत्व प्रतिपादित करते हुए स्पष्ट रूप से लिखा कि जैसे डार्विन ने प्रजातियों के विकास के नियम खोज निकाले वैसे ही माक्र्स ने समाज के विकास के नियम खोज लिये। यही कारण है कि लम्बे समय तक माक्र्सवाद को समाज के विकास के नियमों की पहचान कराने वाला विज्ञान कहा जाता रहा। फिलहाल इस बहस के विस्तार में जाने की जरूरत नहीं है, संप्रति विचारणीय मुद्दा ये है कि साहित्य और कलाओं को आधुनिकता के प्रोजेक्ट के अधीन कर देने की परिणति क्या हुई? प्रेमचन्द द्वारा प्रगतिशील लेखक संघ के पहले अध्यक्षीय भाषण ‘साहित्य का उद्देश्य’ की चर्चा हम पहले कर चुके हैं, इसी क्रम में प्रेमचन्द की उस प्रसिद्ध और बार-बार दोहराई जाने वाली उक्ति के उल्लेख के जरिये हम अपने तर्क को आगे बढ़ाना चाहेंगे। प्रेमचन्द ने कहा था, ‘साहित्य देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई नहीं, बल्कि उनके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई है।’ प्रेमचन्द के इस वक्तव्य पर थोड़ा रुककर विचार करें तो ये स्पष्ट हो जाएगा कि प्रेमचन्द यहाँ पर साहित्य के महत्व का जिस प्रकार प्रतिपादन कर रहे हैं, उससे राजनीतिक चिन्तन की केन्द्रीयता का निषेध नहीं होता। यहाँ राजनीतिक चिन्तन के सर्वोपरि महत्व को स्वीकार करते हुए उसी दायरे में और उसी कसौटी पर साहित्य के महत्व को राजनीतिक चिन्तन से भी आगे के कदम के रूप में रेखांकित किया गया है। प्रेमचन्द अक्सर कहते भी थे कि जो काम गाँधी राजनीति में कर रहे हैं, वही काम वो साहित्य के दायरे में कर रहे हैं। कहने की जरूरत नहीं होनी चाहिए कि यहाँ साहित्य के महत्व का प्रतिपादन राजनीतिक प्रोजेक्ट के अधीन ही है, भले ही उसे राजनीति के आगे-आगे चलने वाली मशाल ही क्यों न कहा गया हो। रामचन्द्र शुक्ल ने भी अपने प्रिय कवि तुलसीदास के साहित्य के मार्फत साधनावस्था के जिस साहित्य को सर्वोत्कृष्ट घोषित किया और जो पहली नजर में ठेठ भारतीय निकष जान पड़ता है, वास्तव में आधुनिकता के विमर्श से बहुत गहरे प्रभावित निकष है। इसलिए यह अकारण नहीं है कि आधुनिक साहित्य के मूल्यांकन के प्रसंग में वे ठाकुर जगमोहन सिंह के उपन्यास ‘श्यामास्वप्न’ के बजाय लाला श्रीनिवासदास के ‘परीक्षागुरु’ को तरजीह देते हैं, क्योंकि वह अंगे्रजी ढंग का नावेल है। इससे यह बात खुलकर सामने आ जाती है कि सब कुछ के बावजूद आधुनिक हिन्दी साहित्य अन्ततः अंग्रेजी ढंग का ही साहित्य है। यह बिल्कुल संभव है कि रामचन्द्र शुक्ल ने जानबूझकर और सचेत रूप से ऐसा न किया हो। लेकिन, जैसा कि कहा जाता है, जादू वही जो सिर चढ़कर बोले; ये आधुनिकता का जादू है, जो हिन्दी के लेखकों-आलोचकों के सिर चढ़कर बोल रहा है। फिर चाहे वो रामचन्द्र शुक्ल हों, महावीर प्रसाद द्विवेदी हों या प्रेमचन्द ही क्यों न हों। महावीर प्रसाद द्विवेदी ने तो साहित्य को ‘ज्ञानराशि का संचित कोश’ कह कर साहित्य को आधुनिकता के प्रोजेक्ट के अधीन करने की पहले से चली आ रही प्रक्रिया को जैसे उसकी तार्किक परिणति तक पहँुचा दिया। रामचन्द्र शुक्ल ने द्विवेदी जी के साहित्य-विवेक पर सही टिप्पणी की है: 1)‘कवि और कविता कैसा गम्भीर विषय है, कहने की आवश्यकता नहीं। पर इस विषय की बहुत मोटी-मोटी बातें बहुत मोटे तौर पर कही गयी हैं। ….2) द्विवेदी जी के लेखों को पढ़ने से ऐसा जान पड़ता है कि लेखक बहुत मोटी अक्ल के पाठकों के लिए लिख रहा है। एक-एक सीधी बात कुछ हेरफेर -कहीं-कहीं केवल शब्दों के ही- साथ पाँच-छह वाक्यों में कही हुई मिलती है।…3) इन पुस्तकों को एक मुहल्ले में फैली बातों से दूसरे मुहल्ले वालों को कुछ परिचित कराने के प्रयत्न के रूप में समझना चाहिए।’ साहित्य की बुनियादी भूमिका के इस अवमूल्यन का परिणाम ये हुआ कि वह आधुनिकता के विमर्श के इर्द-गिर्द घूमने लगा, कभी उसके पीछे-पीछे तो कभी, प्रेमचन्द के कथन के वजन पर कहें तो, उसके आगे-आगे।

मनुष्य के सामाजिक जीवन को नितान्त भौतिक समृद्धि के परिप्रेक्ष्य में परिभाषित करने का परिणाम ये हुआ कि जीवन के वे आयाम, जिनकी सिर्फ भौतिक सन्दर्भों में व्याख्या एक सीमा के बाद संभव नहीं है, लेकिन जो भौतिक उपलब्धि से कम महत्वपूर्ण नहीं हैं, हमारे चिन्तन की परिधि से ही बाहर चले गए। भावनाओं, संवेदनाओं और मानवीय जीवन की अस्तित्वमूलक चिन्ताएँ और मानवीय अस्तित्व की सार्थकता की वे परिकल्पनाएँ, जो भौतिक उपलब्धि से आगे जाती हैं, का भी इस राजनीतिक विमर्श में अवमूल्यन हो गया। यहाँ पर ये ध्यान दिलाने की जरूरत है कि भारतीय चिन्तन परम्परा में मानवीय जीवन के अस्तित्व की सार्थकता को कभी भी सिर्फ भौतिक उपलब्धियों के निकष पर तौलने की कोशिश नहीं की गई थी। बहुत पीछे न भी जाएँ तो भक्तिकालीन साहित्य की बुनियादी संवेदना के सहारे भी इसे समझा और समझाया जा सकता है। असल में साहित्य, संगीत और कलाएँ मनुष्य की संवेदना के उन आयामों को जागृत, उद्दीप्त और समृद्ध करती हैं, जहाँ तक आधुनिकता के ‘एक आयामी’ विमर्श से पैदा होने वाला समाज विज्ञान पहुँच ही नहीं सकता। साहित्य, संगीत और कलाएँ मानवीय अस्तित्व की सार्थकता के उन आयामों को रचती रही हैं, जिनकी चिन्ता आधुनिकता के विमर्श में कम ही दिखाई पड़ती हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे मानवीय अस्तित्व की सार्थकता को सिर्फ भौतिक उपलब्धि के निकष पर परिभाषित करने की प्रक्रिया का अतिक्रमण करती हैं। ऐसा नहीं है कि साहित्य और कलाएँ भौतिक समृद्धि, गैर-बराबरी और किसी भी प्रकार के भेदभाव और शोषण को पूरी तरह से नजर अंदाज करती हैं, लेकिन यह जरूर है कि वे भौतिक समृद्धि को मानवीय अस्तित्व की सार्थकता के एकमात्र निकष के रूप में देखने के विमर्श में ढलने से इनकार करती हैं। इसके बजाय वे मानवीय अस्तित्व की सार्थकता के उन आयामों (कल्पित या वास्तविक) को रचती हैं, जिनके सामने भौतिक समृद्धि का पैमाना फीका लगने लगता है।

इतिहासकार ज्ञानेन्द्र पाण्डेय ने अपने लेख ‘गैरियत का गद्य’ में लिखा है कि मनुष्य के आत्यन्तिक दुखों को इतिहास के दायरे में दर्ज कर पाना नामुनकिन है। सुख-दुख, हर्ष-विषाद की आत्यन्तिक मनःस्थितियों के आयाम जिस तरह साहित्य, संगीत तथा कलाओं में आते हैं, वे समाज विज्ञान के विषयों में उस तरह से आ ही नहीं सकते। विडम्बना ये है कि आधुनिकता के साथ पैदा होने वाले समाज विज्ञान के इर्द-गिर्द मंडराने वाला साहित्य अपनी उस बुनियादी भूमिका को चाहे-अनचाहे अप्रासंगिक मानकर छोड़ देता है, जहाँ तक समाज विज्ञान के किसी विषय के लिए पहुँच पाना ही मुश्किल है। उर्दू के कवि मोमिन की एक पंक्ति है, ‘तुम मेरे पास होते हो, गोया जब कोई दूसरा नहीं होता।’ इसी पंक्ति के वजन पर, चाहें तो, कह सकते हैं कि साहित्य और कलाएँ वहाँ भी मनुष्य के पास होती हैं, जहाँ ज्ञान-विज्ञान के दूसरे अनुशासन पहुँच  ही नहीं पाते।

यह अकारण नहीं है कि पहले स्वच्छन्दतावादी और फिर आधुनिकतावादी साहित्य और कलाओं में आधुनिकता के इस ‘एक आयामी’ विमर्श से बाहर निकलने की एक लहूलुहान जद्दोजहद दिखाई पड़ती है। ये सही है कि आधुनिकता के इस लौहपाश से बाहर निकलने में आधुनिक साहित्य और कलाएँ सफल नहीं हुईं, लेकिन इससे उनकी कोशिश का महत्व कम नहीं हो जाता।

महावीर प्रसाद द्विवेदी ने साहित्य को ज्ञानराशि का संचित कोश मानकर और कविता तथा गद्य के अन्तर को मिटाकर और चाहे-अनचाहे साहित्य को पूर्व औपनिवेशिक परम्परा से काटकर जिस प्रकार के साहित्यिक लेखन को पुरस्कृत किया, उसके आदर्श कवि मैथिली शरण गुप्त ही हो सकते थे। मैथिली शरण गुप्त की कविता को देखकर लगता है कि जैसे समूची भारतीय परम्परा में उनसे पहले कोई कवि ही नहीं हुआ और वे पहले व्यक्ति हैं, जिन्होंने कविता लिखने का बीड़ा उठाया है। संवेदनात्मक दृष्टि से कुछ नैतिक आग्रहों के पद्य में अनुवाद के अतिरिक्त शायद ही ऐसा कुछ हो, जिसके लिए उनकी कविता को पढ़ना जरूरी लगे। समूची भारतीय काव्य परम्परा में कविता की दुनिया कभी भी इतनी इकहरी और एकायामी नहीं रही, जितनी मैथिली शरण गुप्त की कविताओं में दिखाई पड़ती है। स्वाभाविक ही था कि छायावादी काव्य में इस एकायामी इतिवृत्तात्मकता से असंतोष फूट पड़ता। लेकिन जैसा पहले भी उल्लेख किया जा चुका है कि ज्यादातर आधुनिक साहित्य का विकास अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त व्यक्तियों द्वारा, अंग्रेजों द्वारा स्थापित शिक्षा केन्द्रों यानी विश्वविद्यालयों के परिसर में हुआ। इसीलिए छायावादी कविता में कृत्रिम कल्पनाशीलता तो खूब है, लेकिन वैसी कल्पनाशीलता बहुत कम है, जिनका जन्म एक गहरी बेचैनी से होता है और जिसके साक्ष्य कबीर, जायसी, सूर, मीरा और यहाँ तक कि तुलसीदास के साहित्य में दिखाई पड़ते हैं।

यह अकारण नहीं है कि समूचे प्रगतिवादी, यथार्थवादी और यहाँ तक कि आधुनिकतावादी साहित्य में भी गहरी सांस्कृतिक बेचैनी और उहापोह के ऐसे निशान कम ही दिखाई पड़ते, जिनसे ये प्रतीत हो कि ये समूचा साहित्य भारतीय सभ्यता की उस सुदीर्घ परम्परा में लिखा गया है, जिसमें सब कुछ बुरा ही नहीं है, बहुत कुछ अच्छा भी है।

अन्त में ये कहना अनुचित नहीं होगा कि सही मायने में भारतीय साहित्य में नवजागरण तो तब होगा जब हम आधुनिकता से पहले की साहित्यिक और ज्ञान परम्परा से तथा लोक परम्परा से, आधुनिकता के निकष को अन्तिम सच न मानते हुए, नए सिरे से संवाद स्थापित करेंगे।

प्रो॰राजकुमार

प्रो॰राजकुमार

प्रो॰ राजकुमार।  शोर-शराबे से दूर अध्ययन-अध्यापन में मग्न रहने  वाले युवा-तुर्क हिन्दी आलोचक। भक्ति साहित्य, हिन्दी नवजागरण, आधुनिकता, आधुनिक साहित्य, प्रेमचंद, हिन्दी कहानी इत्यादि पर लगातार लेखन।  किताबों में जैसी रुचि इनकी  है,  वह अन्यत्र दुर्लभ ही हो गई है। फिलहाल, बी॰एच॰यू॰ के हिन्दी विभाग में प्राध्यापक।इनसे dr.kumar.raj@gmail.com पर संपर्क संभव। 

साभार- नया ज्ञानोदय 

उपनिवेशवाद / साम्राज्यवाद कभी प्रगतिशील नहीं होता (रामविलास शर्मा की याद )- प्रणय कृष्ण

(यह लेख उद्भावना पत्रिका के हाल ही में प्रकाशित रामविलास शर्मा महाविशेषांकसे लिया गया है. प्रकाशित लेख की प्रूफ संबंधी अशुद्धियाँ यहाँ यथासंभव ठीक कर इसे प्रस्तुत किया जा रहा है .)  

BY प्रणय कृष्ण

रामविलास शर्मा के बौद्धिक संघर्ष को महज साहित्य तक सीमित मानकर उसे नहीं समझा जा सकता. उनके काम को भाषा विज्ञान, दर्शन, इतिहास, राजनीतिविज्ञान, अर्थशास्त्र आदि समाजविज्ञानों में बाँट कर देखना-समझना और उससे निष्कर्ष निकालना और भी गलत है. कभी-कभी कुछ अकादमिक विद्वान उनके लिखे-पढ़े को समाजविज्ञान की किसी शाखा की पद्धतियों से बाँध कर उसकी प्रशंसा या निंदा करते हैं. दर-असल उनके लिखे-पढ़े का सम्बन्ध समकालीन समाज-विज्ञानों के अनुभववादी रुझान से कतई नहीं है. उसका सम्बन्ध मार्क्सवाद से ग्रहण की गई उस अध्ययन पद्धति से है जो दृश्यमान को भेदकर वास्तविकता तक पहुँचनेवाली समग्रतावादी पद्धति है. उसमें ‘स्पेश्लाइज़ेशन’ वाला रुझान नहीं है. साम्राज्यवाद-विरोधी मुक्ति-संघर्ष के बौद्धिक-योद्धा के रूप में ही उन्होंने साहित्य से लेकर तमाम क्षेत्रों में अनथक दौड़ लगाई. वे अगर कुछ थे तो भारत के अग्रणी साम्राज्यवाद-विरोधी चिन्तक थे जैसे कि कई अन्य पराधीन रहे देशों के ऐसे ही चिन्तक. फ्रान्ज़ फैनन को आप सांस्कृतिक अध्ययन, जेंडरस्टडीज़, उत्तर-औपनिवेशिक अध्ययन, मनोरोगशास्त्र, सोशल एक्सक्लूज़न, अश्वेत अध्ययन आदि तमाम शाखाओं में पढ़ सकते हैं जिनमें से ज़्यादातर अनुशासन गैर-पारंपरिक हैं, लेकिन अंततः आप उनके साहित्य को उपनिवेशवाद-विरोधी चिंतन की विश्व-धरोहर में ही स्थान देंगे. फैनन से हम कई अर्थों में उनकी तुलना नहीं कर सकते, लेकिन रामविलास शर्मा का लेखन भी उपनिवेशवाद-विरोधी चिंतन की विश्व-धरोहर है. वे तीसरी दुनिया के मुक्ति-संग्रामों के पिछले दौर के तमाम बड़े चिंतकों की तरह ही मार्क्सवाद को पराधीन देशों की मुक्ति का दर्शन मानते थे.

Ram-Vilas-Sharma

बौद्धिक योद्धा की उनकी भंगिमा अकादमिक निस्संगता (और अहम् को भी) चोट पहुंचाने वाली है. डेविड मैकलेनन ने लिखा है, “मार्क्स की मृत्यु के बाद की शताब्दी में समाज-विज्ञानों का जो ज़बरदस्त विकास हुआ है, उसमें इकहरेपन के दो आयाम हैं- लम्बवत (वर्टिकल) अर्थ में वह संकीर्ण ‘विशेषज्ञताओं’ के घेरे में उत्पादित ऐसे विद्वानों का (बौद्धिक) उत्पाद है जो कम से कम के बारे में अधिक से अधिक जानते हैं और क्षैतिज (हारिजान्टल) अर्थ में उसका सम्बन्ध समाज के सतही घटना-प्रपंच से है जो प्रेक्षण और परिमाण के मापन के लिए आसानी से सुलभ हैं.”

ज़ाहिर है कि रामविलास शर्मा का चिंतन इस इकहरेपन के खिलाफ है. वे वस्तुओं की गतिशील अंतर्संबद्धताओं का पता लगाने, उनकी तह तक पहुँचने की कोशिश में इतिहास, दर्शन, समाज, राजनीति, कला-साहित्य और अर्थव्यवस्था का अध्ययन करते हैं, अकादमिक सैर पर निकलने के किसी शौक के चलते नहीं. हर अनुशासन में जाने के पीछे प्रेरणा कहीं भी महज अकादमिक नहीं है. एक ही प्रेरणा है ‘साम्राज्यवाद और सामंतवाद का विरोध’, भारत की आज़ादी के बाद भी औपनिवेशिक अन्यथाकरण को ध्वस्त करते हुए पूरे उप-महाद्वीपीय इतिहास, संस्कृति और जन-जीवन की वास्तविकताओं को वापस पाना, स्वायत्त करना ही उनकी प्रेरणा है, बहुत कुछ एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमरीका के उन उपनिवेशवाद-विरोधी चिन्तकों की तरह जिन्होंने वि-उपनिवेशीकरण के दौर में अपने-अपने देशों-महाद्वीपों के बारे में सारे साम्राज्यवादी चिंतन और तर्क-पद्धति को पलटा. गिरिजा कुमार माथुर की काव्य-पंक्तिया हैं –

मेरी छाती पर रखा हुआ साम्राज्यवाद का रक्त-कलश

मेरी धरती पर फैला हैमन्वंतर बनकर मृत्यु-दिवस

इन्हें ही संदर्भित कर अपने बारे में बोलते हुए ११ जनवरी, 1994 को साहित्य अकादमी में रामविलास जी ने कहा, “गिरिजाकुमार ने एक बात कही थी- ‘साम्राज्यवाद का रक्त-कलश’- यह किसी न किसी रूप में मेरे मन में बराबर रहती है.”

इसीलिए उन्होंने साहित्य की प्रगतिशीलता का पैमाना भी ‘सामंतवाद और साम्राज्यवाद के विरोध’ को बनाया. इसी पैमाने पर उन्होंने हिन्दी के आधुनिक साहित्य को कसा और पुराने साहित्य को भी. इसी आधार पर उन्होंने परम्परा का मूल्यांकन किया. जब साम्राज्यवाद के अधीन भारत नहीं था, तब के साहित्य और सांस्कृतिक जागरण को उन्होंने ‘सामंतवाद के विरोध’ के आधार पर जनजागरण कहा और सामंतवाद के साथ साम्राज्यवाद के विरोध पर आधारित जागरण को ‘नवजागरण’ कहा. भाषा- विज्ञान की तरह रुख करने का कारण भी साम्राज्यवाद का विरोध था. रामविलास शर्मा ने खुद ही कहा है, “भाषा -विज्ञान में काम करने की एक प्रेरणा ये थी की पाश्चात्य विद्वान कहते थे की भारत का कोई भी भाषा परिवार भारत का नहीं है… साम्राज्यवाद कहता है की तुम्हारा कोई भाषाई रिक्थ नहीं है. मैं कहता हूँ कि हमारा भाषाई रिक्थ है, हमारे भाषा-परिवारों के आपसी सम्बन्ध समझे बिना तुम यूरोप की भाषाओं का विकास नहीं समझ सकते.”(11 जनवरी, 1994 को साहित्य अकादमी में दिया गया व्याख्यान) दर्शन शास्त्र के अध्ययन में प्रवृत्त होने का कारण भी यही है. रामविलास जी के शब्दों में,” कुछ लोगों ने दर्शनशास्त्र पर लिखना शुरू किया. सुरेन्द्रनाथ दासगुप्ता ने जो भारतीय दर्शन का इतिहास लिखा है, उसके आरम्भ में उन्होंने बताया है, कैसे यूरोप के लोग कहते हैं कि भारत का कोई दर्शन नहीं है. भारत में देवकथाएं हैं, मिथक हैं, काव्य हैं और धर्म तो हैं ही. लेकिन विवेक-सम्पन्न दर्शन भारत में नहीं है. आपके पास कोई भाषाई रिक्थ नहीं है, कोई दार्शनिक रिक्थ नहीं है.” (उपरोक्त भाषण से) भारतीय अर्थशास्त्र, इतिहास और सामाजिक व्यवस्था के क्षेत्र में उन्होंने जो काम किया वह तो उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद के औचित्य-स्थापन को ध्वस्त करने के लिए सबसे ज़रूरी था. मानव-मुक्ति, तीसरी दुनिया और भारत की मुक्ति के लिए वे जिस एकमात्र विचारधारा को ज़रूरी मानते थे, वह थी मार्क्सवाद. वे यह देख रहे थे कि साम्राज्यवाद के समर्थक,भारत की गुलामी को औचित्यपूर्ण ठहरानेवाले बहुत से विचारकों को मार्क्स की भारत संबंधी आरंभिक धारणाओं, खुद पूंजीवाद को एक ख़ास ऐतिहासिक मोड़ पर प्रगतिशील मानने की उनकी धारणाओं से बल मिल रहा है. ऐसे में उनके लिए सबसे ज़रूरी था कि मार्क्स-एंगेल्स के विचारों का विकास दिखलाकर यह बताएं कि कैसे भारत के बारे में, उसके अर्थतंत्र, समाज-व्यवस्था के बारे में, भारत में औपनिवेशिक हस्तक्षेप के मूल्यांकन के सन्दर्भ में उनके विचार कैसे और क्यों बदले, ताकि कोई उनके विचारों के समृद्ध, और विकसनशील रिक्थ में से कुछ को चुनकर साम्राज्यवाद की प्रगतिशीलता स्थापित न कर सके. हम इस लेख में मुख्यतः रामविलास जी के इसी पक्ष पर अपना ध्यान केन्द्रित रखेंगे, लेकिन मार्क्सवाद से उनकी संलग्नता का एक दूसरा पहलू भी है जो कम महत्वपूर्ण नहीं है. वह पहलू यह है की मार्क्सवाद के स्रोतों में मुख्यतः क्लासिकीय जर्मन दर्शन, फ्रांसीसी समाजवाद और ब्रिटिश राजनीतिक अर्थशास्त्र की चर्चा होती है,लेकिन समग्र मानव-मुक्ति के दर्शन के रूप में उसके सतत विकास के लिए यह आवश्यक है की पूरब की बौद्धिक विरासत का अनुसंधान कर उसे सतत विकासशील मार्क्सवादी विचार-सरणी के वैध स्रोत के रूप में कैसे स्थापित किया जाए. रामविलास जी ने ‘मार्क्स और पिछड़े हुए समाज’ शीर्षक पुस्तक में क्लासिकीय मार्क्सवाद के स्रोतों में पूरब की बौद्धिक विरासत के योगदान को रेखांकित करने की पुरजोर कोशिश की है. मैं नहीं कह सकता की उस पुस्तक से मार्क्स और एंगेल्स के विचारों पर ‘यूरो -केन्द्रिक’ होने के आरोपों का किस हद तक परिहार होता है, लेकिन यह सच है की खुद मार्क्स और एंगेल्स ने जिस विचारधारा को जन्म दिया था, वह समूचे मानव समाज की मुक्ति की विचारधारा थी. उन्होंने अनेकशः अपने लेखन में पूरब में क्रान्ति की सम्भावनाओं को तलाशा था, गो की उन्हें विकसित देशों में समाजवादी क्रान्ति पहले होने की उम्मीद आखिर तक थी, जिसे इतिहास ने सही साबित नहीं किया. उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद से पीड़ित देशों के मार्क्सवादी बहुधा अपने देशों के इतिहास, समाज, दर्शन, साहित्य की समस्याओं पर विचार करते हुए मार्क्सवादी ज्ञान परम्परा को समृद्ध करते रहे हैं. इससे न तो मार्क्सवाद राष्ट्रवाद के मातहत हो जाता है और न ही उसका अंतर्राष्ट्रीयतावाद कहीं से आहत होता है. कुछ गैर मार्क्सवादियों और कुछ भूतपूर्व मार्क्सवादियों ने मार्क्सवाद का भारतीयकरण करने के लिए रामविलास जी की दाद दी है. अब रामविलास जी तो वापस आएँगे नहीं उन्हें यह बताने की मार्क्सवाद कोई ऐसी वस्तु नहीं जिसका ‘भारतीयकरण’, ‘पाकिस्तानीकरण’ या ‘जापानीकरण’ हो सकता हो. वह सार्वभौम मानवता की संपत्ति है. रामविलास जी उसे पिछड़े हुए देशों की मुक्ति के लिए विशेष प्रासंगिक पाते हैं जिनमें भारत भी एक है. उन्हीं के शब्दों में, “गोरे उपनिवेशों के अलावा पराधीन और नीम पराधीन देशों की जनता अपनी आज़ादी के लिए बराबर लड़ती रही. विश्व बाज़ार की बहुसंख्यक जनता पिछड़े हुए देशों की है. जो दर्शन, जो विज्ञान इस जनता को अपनी आज़ादी के लिए लड़ना सिखाता है, अपने पिछड़ेपन से निकलकर नए जीवन का निर्माण करना सिखाता है, उसका नाम मार्क्सवाद है.” (पृष्ठ 2, मार्क्स और पिछड़े हुए समाज) लेकिन पिछड़े हुए देशों के लोगों को, उनके मुक्ति-योद्धाओं और चिंतकों को यह विज्ञान, यह दर्शन उनकी ज़रूरतों के हिसाब से बना-बनाया नहीं मिला था. उन्हें इसे अपने परिस्थितियों में विकसित और समृद्ध करना था और है. मार्क्सवाद विचारों की कोई बंद व्यवस्था नहीं है, वह मार्क्स और एंगेल्स के जीवनकाल में ही पूर्ण नहीं हो गई. आगे के लोगों ने उसका विकास जारी रखा. नाम ही लेना हो तो लेनिन, रोजा लक्ज़मबर्ग, ग्राम्शी, माओ आदि उल्लेखनीय हैं. मार्क्सवाद, मशहूर मार्क्सवादी चिन्तक रणधीर सिंह के शब्द उधार लेकर कहें तो ‘अपूर्ण परियोजना’ (अनफिनिश्ड प्रोजेक्ट) है. मार्क्स-एंगेल्स ने किसी ‘क्लोज्ड सिस्टम’ का निर्माण नहीं किया था. मार्क्सवाद पर शासक वर्ग के लगातार होने वाले हमलों से उसकी रक्षा भे उसके विकास द्वारा ही संभव है.

रामविलास शर्मा के चिंतन की जो दूसरी बात उन्हें अकादमिक बौद्धिकता से अलग करती है, वह है उनकी अपने परिवेश से गहरी सम्बद्धता. उनके पाँव अपनी ही धरती में धंसे हुए हैं जहां से वे दुनिया को समझते हैं. अकादमिक बौद्धिकता के लिए गगनविहारी होना सुलभ है, सम्बद्ध होना दुष्कर. बैसवाड़े की धरती, अवध के लोकजीवन, भारत की किसान और मेहनतकश जनता, हिन्दी भाषा, भारतीय साहित्य, दर्शन, संगीत, कला और इतिहास से उनकी सम्बद्धता उनके विश्व-दृष्टिकोण के विकास में सहायक है, बाधक नहीं. यह सम्बद्धता शताब्दियों से चले आ रहे साम्राज्यवादी और उपनिवेशवादी वैदुश्य द्वारा पराधीन देशों, उनके इतिहास और उनके निवासियों के बारे में पूर्वाग्रहग्रस्त निष्कर्षों से लड़ने में उनकी सहायता करती है. यह सम्बद्धता उन्हें संकीर्ण नहीं बनाती, बल्कि तमाम पराधीन जातियों से ‘दर्द का रिश्ता’ बनाने और ‘मुक्ति का साझा’ करने में सहायक है. रामविलास जी का कहना था की उन्हें याद करने से ज़्यादा महत्वपूर्ण है उन्होंने जो सवाल उठाए हैं, जो मुद्दे उठाए हैं, उनपर विचार किया जाए. आज उनकी जन्मशती के अवसर पर ये मौक़ा है की हम उनको याद करने के ज़रिए उन विराट समस्याओं से रू-ब-रू हों जिन्हें हल करने का उन्होंने अथक प्रयास किया. वे पराधीन भारत में जन्में और जवान हुए और भारत की राजनीतिक आज़ादी के 55 साल देखने के बाद विदा हुए.

रामविलास शर्मा ने भारत में अंग्रेज़ी राज की प्रगतिशील भूमिका मानने से इनकार किया और यही उन्हें सामान्यतः उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद की प्रगतिशील भूमिका के बौद्धिक प्रत्याख्यान के अथक अभियान की ओर ले जानेवाला प्रस्थान-बिंदु है. वास्तव में यह धारणा (यानी उपनिवेशवाद/साम्राज्यवाद की प्रगतिशील भूमिका का नकार) पराधीन देशों के मुक्ति-संघर्षों तथा मार्क्सवादी चिंतन की विकासमान परम्परा की महत्वपूर्ण सैद्धांतिक देन है. मार्क्स-एंगेल्स के लेखन में भी बाद के दिनों में इस धारणा के बीज मिलने शुरू हो गए थे. यह सच है कि कम्यूनिस्ट मेनिफेस्टो सहित मार्क्स क़ी अन्य आरंभिक कृतियों में सामंतवाद और दूसरी प्राचीन उत्पादन पद्धतियों के मुकाबले पूंजीवाद उत्पादन की शक्तियों और संबंधों में लगातार क्रांतिकारी परिवर्तन करते चले जाने के अर्थ में प्रगतिशील बताया गया है. उसकी प्रगतिशीलता का दूसरा पहलू यह था कि वह इतिहास की पहली उत्पादन-व्यवस्था थी जो उन भौतिक परिस्थितियों तथा वर्ग-शक्तियों (सर्वहारा वर्ग) को पैदा कर रहीं थी जो उसका खात्मा करके समाजवाद की स्थापना करेंगी. लेकिन मार्क्स ने जब यह प्रतिपादित किया तो उनके सामने उदाहरण योरप का था, खासतौर पर ब्रिटेन और फ्रांस का जहां (19वीं सदी के मध्य में जबसे उनकी कृतियां मिलना शुरू होती हैं) पूंजीवाद पुराने सामंती सम्बन्धों को मिटाकर एक क्रांतिकारी भूमिका निभा रहा था. यदि यह माना जाए की पूंजीवाद की प्रगतिशीलता का निकष समाजवादी रूपांतरण के अंतिम लक्ष्य के लिए भौतिक परिस्थितियाँ पैदा करना है, तो यह भी मार्क्स और मार्क्सवाद की बहु आयामी प्रस्थापनाओं में से महज एक है जिसका सन्दर्भ 19वीं सदी के योरप में समाजवादी क्रान्ति की मार्क्स की उम्मीद है. वास्तव में 20वीं सदी की समाजवादी -मार्क्सवादी क्रांतियाँ पिछड़े हुए देशों में हुईं. मार्क्स ने ‘पूंजी’ लिखते वक्त भी चेताया था कि वे ‘पश्चिमी योरप में पूंजीवाद के उद्भव का ऐतिहासिक रेखाचित्र प्रस्तुत कर रहे थे और इसे किसी ऐसे ऐतिहासिक-दार्शनिक सिद्धांत के रूप में न समझा जाए जिस पर चलना किसी भी ऐतिहासिक परिस्थिति में सभी जातियों/जनता की नियति हो. लेकिन उसी ‘पूंजी’ में मार्क्स ने पूंजी के गढ़ों से बाहर उसके प्रसार (उपनिवेशवाद सहित) द्वारा मचाई गई भारी तबाही का वर्णन भी किया है. बाद में तो रूस और उसके पिछड़ेपन के सन्दर्भ में उन्ही संकटों पर वे ध्यान केन्द्रित करते हैं जो आज तीसरी दुनिया में हमारी समस्याएं हैं. वे लगातार विकसित और अर्द्ध-विकसित देशों के बीच द्वंद्वात्मक सबंधों पर ध्यान केन्द्रित कर रहे थे जहां पूंजीवाद ने विकसित देशों की छवि में किसी समरूप व्यवस्था को कायम करने के ज़रिए अपना प्रसार नहीं किया, बल्कि विकसित ओर अल्पविकसित क्षेत्रों के बीच ध्रुवीकृत विश्व-व्यवस्था का निर्माण किया. विकसित और अविकसित क्षेत्र द्वन्द्वात्मक अंतर्संबंधों में बंधकर एक सम्पूर्णता का निर्माण ज़रूर करते हैं, लेकिन वे इस व्यवस्था के परस्पर-समान अंग नहीं है और न ही कभी हो पाएंगे. विशेष रूप से 1870 और 1880 के दशकों में मार्क्स पूंजीवाद की सीधे-सीधे प्रगतिशील लगनेवाली तस्वीर से हट कर विचार करते हैं. उनका ध्यान इस दौर में उन अंतर्विरोधों और पेचीदगियों पर ज़्यादा केन्द्रित होता है जिनका सम्बन्ध उस परिघटना से है जिसे हम आज की शब्दावली में ‘पर-निर्भर विकास’ कहते हैं. पूंजीवादी केन्द्रों ने जिस विराट परिधि को पैदा किया, इतिहास की बड़ी तस्वीर में मार्क्स के यहाँ अब उसका महत्त्व बढ़ चला. रामविलास शर्मा ने लगातार मार्क्स और एंगेल्स के विचारों में विकास को दर्शाया कि किस तरह उन्होंने हर परिस्थिति में पूंजीवाद को प्रगतिशील नहीं ठहराया था. मार्क्स को विकासवादी नज़रिए से पढ़ने पर इतना ही समझ में आता है कि अंततः पून्जीवाद पिछली सभी उत्पादन पद्धतियों के सन्दर्भ से (यानी उनके मुकाबले) ज़रूरी, अपरिहार्य और प्रगतिशील है तथा वे तमाम प्राक-पूंजीवादी सामाजिक शक्तियां जो पूंजीवादी विकास के रास्ते में रोड़ा अटकाती हैं, वे वस्तुगत स्तर पर प्रतिक्रियावादी हैं. तीसरी दुनिया के वे मार्क्सवादी जो मार्क्स का विकासवादी पाठ (प्राणिविज्ञान में लामार्क के विकासवाद के समतुल्य) किए जाने से बराबर सावधान करते हैं, उनमें सादर रामविलास शर्मा का नाम लिया जा सकता है. यह भी ध्यान देने की बात है कि मार्क्स और एंगेल्स के विचारों में बदलाव या विकास अकस्मात् पैदा नहीं होते, बल्कि उनके बीज पहले के विचारों में मिल जाते हैं जिन्हें वे अनेक कारणों से बाद में ही विकसित करने का मौक़ा पाते हैं. मार्क्स के लिए कभी भी मानव समाज का विकास पूर्व -निश्चित चरणों में तत्वतः निर्धारित विकास नहीं था.’द जर्मन आइडियोलोजी’ में उनका कहना है, ” आगे का इतिहास पिछले इतिहास का लक्ष्य है……(यह सोचना) शुद्ध अटकलबाजी है, मिथ्या तोड़-मरोड़ है. ‘ग्रुन्द्रिस्से’ में वे कहते हैं कि’पिछले इतिहास की ‘नियति’, ‘लक्ष्य’ उसमें निहित भावी इतिहास के ‘बीज’ या ‘विचार’ जैसे पदों से जो अभिहित किया जाता है वह और कुछ नहीं बल्कि आगे के इतिहास से निकाले गए अमूर्तन मात्र हैं.’ मज़े की बात यह है कि ये वही प्रारम्भिक कृतियाँ है जिनका सर्वाधिक ‘विकासवादी’ पाठ किया जा सकता है, किया जाता रहा है. आगे जब हम देखेंगे कि पूंजीवाद को एक ख़ास ऐतिहासिक मोड़ और योरप के आधुनिक इतिहास के एक ख़ास क्षण में प्रगतिशील बताने वाले कार्ल मार्क्स की इस धारणा को कैसे सभी परिस्थितियों में सही मानने की प्रवृत्ति ने खुद मार्क्सवादी दायरे में उपनिवेशवाद के औचित्य-स्थापन की प्रवृत्ति को जन्म दिया, तब अधिक स्पष्ट होगा कि मार्क्स को पढने में सावधानियां बरतने की बात बारम्बार क्यों याद रखनी ज़रूरी है.

अकारण नहीं कि 21वीं सदी में अपने महाग्रंथ ‘क्रायसिस आफ सोशलिज्म’ में रणधीर सिंह लिखते हैं, “मार्क्स की रचनाओ की समृद्ध, बहु-आयामी रचनाशीलता की अपनी ‘खामोशियाँ’ और ‘खाली जगहें’ भी हैं -साथ ही सारे ही जीवित यथार्थ की तरह विरोधाभास भी. लेकिन इन रचनाओ में ‘खामोशियों’, ‘खाली जगहों’ पर केन्द्रित करते वक्त इनके विभिन्न और विरोधाभासी पहलुओं में से किसी एक को उसके सन्दर्भ और उनके समूचे रचनाकर्म में उसके स्थान की अवहेलना की कीमत पर अलगा कर देखना उनके मार्क्सवाद के प्रति नासमझी है, उसका अन्याथाकरण है.” (रणधीर सिंह, क्रायसिस आफ सोशलिज्म, पृष्ठ-43)

भारत खेतिहरों का देश है, दुनिया की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक है, उसकी मुक्ति की कठिनाइयां अनंत हैं. अपने देश के मेहनत-मजूरी करनेवालों, खेती करनेवालों को, कारीगरों को कब मुक्त इंसानों की तरह जीने और विकास करने का मौक़ा मिलेगा, कब वे मानसिक और भौतिक रूप से आज़ाद होंगे, ये आज़ादी कैसे हासिल होगी, कौन कौन से पहाड़ इस मुक्ति का रास्ता रोके खड़े हैं, यही रामविलास जी की चिंता का विषय था. सामंतवाद और साम्राज्यवाद ही ये पहाड़ हैं जिन्हें हटाए बगैर भारत देश गरीबी, पिछड़ेपन, जहालत, रोज़मर्रा के रोग- शोक से मुक्त नहीं होगा.

पूंजीवाद की प्रगतिशीलता : कब और किसके लिए ?

रामविलास शर्मा शुरू से ही इस बात को लेकर सजग हैं कि उपनिवेशवाद और ख़ास तौर पर भारत में अंग्रेज़ी राज की प्रगतिशीलता का मिथक पश्चिम योरप के सन्दर्भ में पूंजीवादी क्रांतियों की प्रगतिशीलता के मार्क्स के सामाजिक प्रगति के सिद्धांत से उपार्जित दृष्टिकोण है जो मार्क्स के लेखन की समग्रता की नासमझी से पैदा हुआ है.

हमने पहले ही लक्ष्य किया कि पूंजीवाद की प्रगतिशीलता का जो आख्यान मार्क्स की आरंभिक कृतियों में खासतौर पर मिलता है, उसका ख़ास सन्दर्भ है- पूंजीवाद सामंतवाद और अन्य पुरानी उत्पादन पद्धतियों का विनाश कर उत्पादन के साधनों में क्रांतिकारी परिवर्तन लाता है और मुनाफे के लिए उसे लगातार उत्पादन के साधनों में क्रांतिकारी परवर्तन लाते जाना उसकी संरचनागत मजबूरी है. पुरानी उत्पादन पद्धति से पूंजीवाद में रूपांतरण कैसे होता है?पूंजीवादी उत्पादन पद्धति कैसे अस्तित्व में आती है? “विकास के एक ख़ास चरण में, (पुरानी उत्पादन पद्धति) अपने ही विलोप की भौतिक शक्तियों को सामने लाती है. इस क्षण से नई शक्तियां और नया जोश समाज के हृदय में उफान मारता है, लेकिन पुराना ढांचा उन्हें रोकता है.उसका विनाश किया जाना होता है, विनाश किया गया. उसका सफाया (अर्थात) वैयक्तिक और बिखरे हुए उत्पादन के साधनों का सामाजिक रूप से केंद्रीभूत साधनों में रूपांतरण, ढेर सारे लोगों की बौनी संपत्तियों का कुछ लोगों की बड़ी संपत्तियों में रूपांतरण,विशाल जनसँख्या की ज़मीनों का स्वामित्वहरण, जीविका और श्रम के साधनों से उनकी बेदखली, बड़े पैमाने पर जनसँख्या का भयावह और दर्दनाक स्वामित्वहरण पूंजी के इतिहास की भूमिका है.” (पूंजी खंड 1, अध्याय 32) यह लिखते वक्त मार्क्स के सामने उदाहरण है पश्चिमी योरप का, ख़ास कर इंग्लैण्ड और फ्रांस का, वहां सामंतवाद के साथ पूंजीवाद के टकराव का. सच तो यह है कि यदि वे पूंजीवाद कि इस भूमिका को प्रगतिशील बता रहे थे तो निरपेक्ष रूप से नहीं, बल्कि इसलिए कि योरप को सामने रखकर उन्हें पूंजीवाद पुरानी गतिरुद्ध उत्पादन पद्धतियों और समाजवाद के बीच की ज़रूरी कड़ी लगता था. पूंजीवाद अपने मूलभूत अविवेकपूर्ण और अमानवीय रूप में रोज़-ब-रोज़ अभिव्यक्त होते हुए भी एक अधिक विवेकपूर्ण और मानवीय समाज व्यवस्था अर्थात समाजवाद की ओर रूपांतरण के लिए आधार तैयार करता प्रतीत हो रहा था. इंग्लैण्ड और फ्रांस जैसे देशों में समाजीकृत उत्पादन और पूंजीवादी अधिशोषण के बीच अंतर-विरोध, सर्वहारा और पूंजीपति के बेच अंतर्विरोध पूंजीवाद के भीतर विकसित उत्पादक शक्तियों के लिए अवरोध बना हुआ था जिसका समाधान था समाजवाद. पूंजीवाद ने समाजवाद के लिए विकसित उत्पादक शक्तियों के रूप में न केवल भौतिक आधार तैयार कर दिया था, बल्कि ‘अपनी (अर्थात पूंजीवाद की) ही कब्र खोदने वालों’ यानी सर्वहारा वर्ग को भी जन्म दे दिया था. मार्क्स इस दौर में समाजवादी रूपांतरण के लिए वस्तुगत भौतिक आधार पर काफी जोर देते दिखाई देते हैं. इस दौर में वे उत्पादक शक्तियों में भारी इजाफा, उच्च स्तर के विकास को मानव मुक्ति की आधारभूत शर्त मानते हैं क्योंकि इसके बगैर यानी अभाव और गरीबी की सामान्य दशा में ‘व्यक्तिमत्ताओं का उन्मुक्त विकास’ संभव ही नहीं है जो समाजवाद के लिए ज़रूरी है. उत्पादक शक्तियों में, उत्पादन की प्रक्रिया में उच्चतम विकास पूंजीवाद की विकसित अवस्था वाले देशों में ही था. ऐसा विकास पूंजीवाद ही लाया था. वह प्रगतिशील इस मायने में था की उसने समाजवाद के रूप में मनुष्य को ‘ज़रुरत के दायरे’ से मुक्त ‘ आज़ादी के दायरे में’ दाखिल होने की ज़रूरी परिस्थितियाँ तैयार कर दी थीं. मध्य-युगीन, सामंती पद्धतियों के उत्पादन स्तर पर ऐसा सोचना भी संभव न था. कह सकते हैं कि यह सामाजिक क्रान्ति का मार्क्स का मुख्य सिद्धांत है. लेकिन उनके लेखन में आरम्भ में भी और बाद के दौर में और भी अधिक (सामाजिक क्रान्ति) की वैकल्पिक संभावनाएं और परिप्रेक्ष्य मिलते हैं. उनके यहाँ ऐतिहासिक बदलावों का कोई एकरेखीय, सीधा, चरणबद्ध, पूर्व-निर्धारित ढांचा नहीं है. ग्रुन्द्रिस्से में वे पूंजीवाद से पहले के मानवीय अतीत में उत्पादन पद्धतियों की बहुलता को स्वीकार करते हैं जो कि ख़ास स्थानीय, भौगोलिक, नृवंशीय और ऐतिहासिक परिस्थितियों के प्रभाव में विकसित होती दिखाई देती हैं, जिनमें से प्रत्येक का विश्लेषण उसके अपने स्वतंत्र विकास के तर्क और कोटियों में किए जाने की दरकार है. 1880 से 1882 के बीच अपने ‘क्रोनोलाजिकल नोट्स’ में वे पूंजीवाद के आगे के मानवीय भविष्य के लिए भी उसी तरह रास्तों की बहुलता को मान कर चलते हैं. रणधीर सिंह पश्चिम योरप में पूंजीवाद के विकास के अध्ययन से प्राप्त सामाजिक प्रगति के मार्क्स के सिद्धांत को मुख्य मानते हुए उनके द्वारा प्रस्तावित सामाजिक प्रगति या क्रान्ति के वैकल्पिक रास्तों को उसका सहवर्ती (या पूरक) सिद्धांत मानते हैं. इस दूसरे सिद्धांत का सम्बन्ध अपेक्षाकृत पिछड़े हुए देशों, ‘बाधित’ या देर से विकसित हुए, अशास्त्रीय पूजीवादी विकास वाले देशों से है. मार्क्स इस दूसरे सिद्धांत को पूरी तरह से विकसित नहीं कर सके थे. 1945 में ‘जर्मन आइदियालोजी’ में भी जहां वे विकसित जन (देशों की जनता) की क्रांतिकारी संभावनाओं की बात करते हैं वहीं वे अपवादस्वरूप असमतल विकास के परिणामस्वरूप किसी अल्पविकसित देश में भी समाजवादी क्रान्ति के उभार की संभावना देखते हैं. यह अपवाद ही 20वीं सदी में नियम बन गया.

1840 के दशक के आरम्भ से ही मार्क्स का ध्यान जर्मनी के विलंबित पूंजीवाद और वहां संभावित देर से होनेवाली बुर्जुआ क्रान्ति की ओर इस आशा में गया कि वहां की बुर्जुआ क्रान्ति उसके तत्काल बाद संभावित सर्वहारा क्रान्ति की पूर्वपीठिका बनेगी. कम्यूनिस्ट मेनिफेस्टो में उन्होंने लिखा, कम्यूनिस्टों का ध्यान प्रमुख रूप से जर्मनी की ओर है. वह देश बुर्जुआ क्रान्ति के मुहाने पर खडा है जिसका होना योरपीय सभ्यता की अधिक विकसित अवस्था में होने तथा वहां (जर्मनी में) 17वीं सदी के इंग्लैण्ड तथा 18वीं सदी के फ्रांस के मुकाबले कहीं अधिक विकसित सर्वहारा वर्ग के कारण अवश्यम्भावी है. इसलिए भी कि जर्मनी में बुर्जुआ क्रान्ति उसके तत्काल बाद होनेवाली सर्वहारा क्रान्ति की पूर्वपीठिका होगी.” मार्क्स और एंगेल्स ने जिस बुर्जुआ क्रांति की उम्मीद की थी, वह 1848 में हुई भी, दोनों ने उसमें भाग भी लिया, लेकिन डगमगाते कदमों से कुछ दूर आगे बढ़ने पर बुर्जुआ ने समझौता कर लिया और क्रान्ति बुर्जुआ अर्थों में भी असफल रही. जिस विकसित सर्वहारा वर्ग होने के चलते मार्क्स को वहां बुर्जुआ क्रान्ति के तत्काल बाद समाजवादी क्रान्ति की उम्मीद थी, उसी के डर से बुर्जुआ वर्ग ने पुरानी सामंती व्यवस्था के साथ समझौता कर लिया. मार्क्स के लिए इंग्लैण्ड (1649) और फ्रांस (1789) की बुर्जुआ क्रांतियाँ इसीलिए क्रांतियाँ थीं क्योंकि ‘उस समय बुर्जुआ की जीत नई सामाजिक व्यवस्था की जीत थी’. लेकिन जर्मनी के अनुभव से उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि बुर्जुआ वर्ग अब क्रांतिकारी नहीं रह गया था, उसने सामंतवाद से समझौता किया, उसका विनाश नहीं किया क्योंकि आसन्न सर्वहारा क्रान्ति का भय उस पर भारी पडा. इस बिंदु पर मार्क्स और एंगेल्स पूंजीवाद की प्रगतिशीलता के प्रति विश्वासी नहीं रह गए. जर्मनी का पूंजीपति वर्ग खुद अपनी बुर्जुआ-जनतांत्रिक क्रान्ति पूरा करने के भरोसे के काबिल न रहा. मार्क्स एंगेल्स का यह विश्लेषण आगे रूस में बोल्शेविकों के बहुत काम का साबित हुआ जब लेनिन ने ‘लगातार जारी’ क्रान्ति की राजनीतिक लाइन सूत्रबद्ध की जिसके आलोक में उन्होंने फरवरी से अक्टूबर 1917 की क्रान्ति का रास्ता तय किया. चीनी क्रान्ति का प्रारम्भिक चरण माओ की उस नव जनवादी क्रान्ति से शुरू हुआ जिसका नयापन इस बात में ही निहित था कि वह अतीत की उन सफल जनवादी क्रांतियों से भिन्न थी जहां पूंजीपति वर्ग ने योरप में सामंती वर्चस्व का खात्मा कर दिया था. कमज़ोर, ढुलमुल और जनक्रांति की संभावनाओं से भयाक्रांत चीन का पूंजीपति वर्ग यह काम कर ही नहीं सकता था. मार्क्स का यह विश्लेषण कि सामंतवाद -विरोधी कृषि क्रान्ति एक सफल बुर्जुआ क्रान्ति का मूल है और किसी भी सुसंगत और पर्याप्त पूंजीवादी विकास की पूर्व-शर्त है, 20वीं सदी की क्रांतियों के ऐतिहासिक अनुभवों से प्रमाणित है. जहां इन क्रांतियों को मार्क्सवादियों ने नेतृत्व दिया जैसे कि चीन और रूस में,वहां के परिणाम पूंजीवादी विकास की दृष्टि से क्या हुए और जहां खुद बुर्जुआ ही नेतृत्वकारी ताकत बना रहा जैसे कि भारत में, वहां क्या हुए, इसकी तुलना भी मार्क्स के विश्लेषण को ही प्रमाणित करेगी. रूस और चीन में सामंती अवशेष ख़त्म हुए और भारत में अभी भूमि-सुधार आज़ादी के 65 साल बाद न केवल पूरे नहीं हुए, बल्कि अब तो नव- उदारवादी निजाम में भूमि सुधार के जो आधे-अधूरे प्रयास अतीत में किए गए थे, उन्हें पलटा जा रहा है.

1848 में जर्मनी का पूंजीपति वर्ग यदि सामंतवाद को मिटा कर पूंजीवादी- जनतान्त्रिक क्रान्ति भी नहीं कर सका तो इसीलिए कि वह पुराने (सामन्ती और मध्ययुगीन) समाज के खिलाफ नए (पूंजीवादी और आधुनिक) समाज की नुमाइंदगी नहीं कर रहा था, क्योंकि उसका सम्बन्ध खुद उस पुराने सामंती समाज से था और वह उसी पुराने अप्रासंगिक समाज के भीतर अपने हितों का नवीनीकरण चाह रहा था. (समाजवादी जन-क्रान्ति का भूत उसे अलग सता रहा था.) यही मार्क्स ने उसके चरित्र के बारे में कहा. इस परिघटना की ऐतिहासिक, देश-कालगत विशिष्टता को यदि हम थोड़ी देर के लिए आँख से ओझल करके विचार करें तो पूंजीपति वर्ग का यही चरित्र (जिसे मार्क्स ने उक्त प्रसंग में चिन्हित किया) विलंबित विकास वाले औपनिवेशिक तथा उपनिवेशवाद से आज़ाद हुए देशों के पूंजीपति वर्गों की लाक्षणिक विशेषता है. इन देशों के सत्ता संघर्ष में तथा जहां वे सत्ता में हैं वहां जिस किस्म का पूंजीवादी विकास वे लाए हैं, यह चरित्र अभिव्यक्त होता है. मार्क्स ने ‘पूंजी’ के जर्मन संस्करण के पहले भाग की भूमिका (1867) में लिखा था, “हम… न केवल पूंजीवादी उत्पादन के विकास बल्कि उसके अधूरेपन का भी कष्ट भोग रहे हैं. आधुनिक बुराइयों के साथ साथ विरासत में पाई गई बुराइयों का एक पूरा सिलसिला हमें सता रहा है जो कि पुरानी धुरानी उत्पादन पद्धति के निष्क्रिय रूप में जीवित बने रहने से उपजता है, जो राजनीतिक और सामाजिक पुरावशेषों की अपरिहार्य श्रृंखला को लिए-दिए चलता है. हम सिर्फ जीवित ही नहीं, बल्कि मृत का भी कष्ट भोग रहे हैं’ 1848 की जर्मन क्रान्ति को आधी सदी से भी ज़्यादा देर से हुई बताते हुए मार्क्स ने कहा कि योरपीय क्रान्ति से बहुत अलग वह एक पिछड़े देश में योरपीय क्रान्ति की द्वितीयक स्तर (सेकेंडरी आर्डर) की परिघटना थी. उन्होंने लिखा, ” आम जानकारी है कि दूसरे क्रम की बीमारियों का इलाज ज़्यादा मुश्किल होता है, साथ ही वे शरीर को प्राथमिक बीमारी की अपेक्षा ज़्यादा नुक्सान पहुंचाती हैं.” (मार्क्स, ‘पूंजीपति और प्रति-क्रान्ति’ शीर्षक लेख, 11 दिसंबर, 1848, प्रोग्रेस पब्लिशर्स, मास्को, 1972 से 1994 में इन्टरनेट के लिए अनूदित) दर असल पिछड़े हुए देशों में पूंजीवाद की परिघटना विकसित योरपीय पूंजीवाद का द्वितीयक रूप ही है जिसमें सामंती अवशेष बचे रहते हैं और पूंजीपति बुर्जुआ जनतान्त्रिक क्रान्ति के अयोग्य होते हैं, सामन्तवाद के साथ गठजोड़ करते हैं. कुल मिलाकर ऐसी जगहों पर बुर्जुआ जनतांत्रिक क्रान्ति भी सर्वहारा के नेतृत्व में ही संभव होती है समाजवादी रूपांतरण की ओर अग्रसर होती है. ऐसी क्रांतियों में सर्वहारा नेतृत्व में श्रमिक-किसान गठजोड़ भी आवश्यक है. 1848 में जर्मन बुर्जुआ क्रान्ति की असफलता के बाद भी एंगेल्स को 1856 में लिखा,” जर्मनी में सब कुछ सर्वहारा क्रान्ति को किसान युद्ध के किसी दूसरे संस्करण की सहायता मिलने की संभावना पर निर्भर है.” मार्क्स ने कृषि की प्रधानता वाले सभी समाजों में मज़दूर-किसान गठजोड़ बनाने पर लगातार जोर दिया. उन्होंने कभी भी यह तर्क नहीं रखा कि किसी भी ख़ास देश में समाजवाद की विजय उस देश की जनसंख्या में सर्वहारा के बहुमत में होने पर निर्भर है. वे लगातार ऐसी स्थितियों की तलाश में रहे जिनमें मजदूर दूसरे उत्पीडित तबकों के साथ मिलकर सत्ता पर कब्ज़ा कर सकें और समाजवादी रूपांतरण के लम्बे कष्टसाध्य लक्ष्य की ओर बढ़ने का आरम्भ कर सकें. पेरिस कम्यून के तुरंत बाद की विशष्ट स्थितियों में मार्क्स ने मज़दूर-किसान गठजोड़ का जो सैद्धांतिक माडल विकसित किया, वह आज भी पूंजीवादी दुनिया के अल्प-विकसित और विकासशील देशों में समाजवाद के लिए संघर्ष का एक मार्गदर्शक सिद्धांत बना हुआ है. इसे बाद में लेनिन द्वारा रूसी क्रान्ति के रणनीतिक और कार्यनीतिक व्यवहार के बतौर विकसित किया गया और रूस के समाजवादी रूपांतरण की परियोजना का अंग बना. पिछड़े हुए देशों की प्रगति का यही रास्ता मार्क्स-एंगेल्स-लेनिन-माओ के विचारों से निकलता है जिसमें पूंजीवाद और पूंजीपतियों की प्रगतिशीलता की धारणा निहित नहीं है. भारत में भी कम्यूनिस्ट पार्टियों ने इसी रास्ते को अपना मार्ग-निर्देशक माना (भले ही वे व्यवहार के स्तर पर, कार्यनीति के स्तर पर उनमें बहस हो) और उचित ही यह सूत्रबद्ध किया कि भारत एक ‘अर्द्ध औपनिवेशिक, अर्द्ध सामंती’ समाज है जहां कम्यूनिस्ट लोगों का काम जनवादी क्रान्ति करना, फिर समाजवादी रूपांतरण में जाना है. ऐसा कहते ही बहुत से लोगों को यह भी गलतफहमी हो जाती है कि ऐसा कहनेवाले भारत में पूंजीवाद नहीं मानते. वास्तव में ‘ अर्द्ध औपनिवेशिक,अर्द्ध सामंती’ जैसा पद विशेषण है, संज्ञा नहीं. अर्थात भारत में जो पूंजीवाद है वह औपनिवेशिक और सामन्ती विशेषताएं लिए हुए है. ‘सामंती अवशेष’ जैसे पद से ‘अनायास बचा-खुचा, थोड़ा सा रह गया’ जैसा भाव भी कभी कभी लोग ग्रहण करते देखे गए हैं. अवशेष कहने से भाव यह है कि पूंजी के युग में, जो विश्व-व्यापी है, पुरानी व्यवस्था अभी भी ख़ास कर उपनिवेश रहे देशों में पूंजीवाद के साथ साथ, उसके संरक्षण और सहयोग के साथ उसकी विशेषता के बतौर विद्यमान है. वह इसलिए विद्यमान नहीं है कि पूंजीपतियों ने उसे मिटाने का अभियान छेड़ रखा है, लेकिन अभी भी थोड़ी बहुत बची रह गयी है जो समय बीतने के साथ अंतिम रूप से पूंजीपतियों द्वारा ही ख़त्म कर दी जाएगी. इसके उलट औपनिवेशिक विरासत के बतौर वह पूंजीवादी उत्पादन व्यवस्था के भीतर पूंजीपतियों के सहयोग से कायम है, अनायास नहीं. इसी बात पर बल देने के लिए और ‘अवशेष’ शब्द में निहित गलतफहमी की गुंजायश को कम करने के लिए कुछ लोग ‘मज़बूत सामंती अवशेषों’ की बात करते हैं.

रामविलास शर्मा यह जानते थे कि पूंजीवाद और पूंजीपति वर्ग की प्रगतिशीलता मार्क्सवाद में ही निरस्त हो जाने के बाद भी एक ‘कामन-सेन्स’ के रूप में जीवित है, जिसके चलते ही मार्क्स द्वारा न्यू यार्क ट्रिब्यून में 1853 से 1858 के बीच लिखे गए 33 टिप्पणीनुमा ‘भारत संबंधी लेखों’ के एक ख़ास एकांगी पाठ के कारण बहुतों को यह भ्रम लम्बे समय तक (शायद आज भी) रहा है कि अंग्रेज़ी राज या ब्रिटिश पूंजीवाद ने भारत में एक प्रगतिशील भूमिका निभाई और उसके विरुद्ध 1857 का विद्रोह एक प्रतिक्रियावादी कदम था. एक सीमित अर्थ में और कुछ ख़ास प्रसंगों में मार्क्स को भले ही उपनिवेशवाद का एक ‘प्रगतिशील’ पक्ष नज़र आया हो, लेकिन उन्होंने एंगेल्स के साथ बराबर उपनिवेशवाद के खिलाफ प्रतिरोध का सकारात्मक मूल्यांकन किया, उसपर खुशी मनाई. रामविलास शर्मा ने लम्बे समय तक धैर्यपूर्वक पूंजीवाद और पूंजीपति वर्ग की प्रगतिशीलता का प्रत्याख्यान करते हुए मार्क्सवाद के पूर्वी समाजों के बारे में विकसित हुए विचारों के क्रांतिकारी आशयों की भारत के किसी भी अन्य बौद्धिक के मुकाबले विशद व्याख्या की.

अंग्रेज़ी राज की प्रगतिशीलता के मिथक का एक स्रोत यह धारणा थी कि पूंजीवादी विकास की दृष्टि से इंग्लैण्ड एक बढ़ा हुआ देश था और भारत में आधुनिक जनतांत्रिक शासन व्यवस्था, शिक्षा व्यवस्था, प्रगतिशील क़ानून और समाज सुधार, नागरिक अधिकारों की प्रक्रिया को उसने आरम्भ किया. रामविलास शर्मा ने दिखलाया कि 20वीं सदी के पूर्वार्द्ध तक इंगलैंड में अभी भी ज़मींदार वर्ग ही शासन सत्ता के हर क्षेत्र में हावी था. औद्योगिक क्रांति हो जाने के बावजूद, नए और बढ़ाते हुए उत्पादन संबंधों के अनुकूल राजसत्ता और शासन में परिवर्तन नहीं हुआ था और सत्ताधारी नया भूस्वामी वर्ग पुरानी व्यवस्था कायम किए हुए था जिसके खिलाफ औद्योगिक पूंजी के प्रतिनिधि तथा मज़दूर वर्ग अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए लड़ रहे थे. देहातों में ज़मींदार घुस देकर, शराब पिलाकर और आतंक और ह्त्या के बल पर मतदान कराते थे. (जैसा भारत में आज़ादी के 50-60 सालों बाद तक होता रहा है, अंग्रेजों के तथाकथित लोकतांत्रिक शासन के अधीन 200 साल और फिर भारत में काले अंग्रेजों के 50 साल के शासन के बाद भी).सार्वभौम बालिग़ मताधिकार अभी इंग्लैण्ड में लागू न था. अंग्रेज़ी स्रोतों से ही, ख़ास तौर पर पूंजीपतियों के नेता ब्राईट के भाषणों को उद्धृत कर रामविलास शर्मा यह दिखलाते हैं कि 1863 तक भी वहां खेत मजदूरों की स्थिति अर्धदासता की थी, सामंती धाक मौजूद थी और मजदूरों पर दमन भी भरपूर था. इंग्लैण्ड का सत्ताधारी भूस्वामी वर्ग ही भारतीय उपनिवेश के लिए भी नीतियाँ तय कर रहा था. ऐसे में वह कौन से आधुनिक जनतांत्रिक मूल्य भारत में ला रहा था जो वह अपने देश में ही लाने को तैयार न था? मूल रूप से 1957 में लिखी पुस्तक ‘सन सत्तावन की राज्यक्रान्ति और मार्क्सवाद’शीर्षक पुस्तक में रामविलास शर्मा विस्तार के साथ यह सवाल उठाते हैं. प्रसंगवश यह उल्लेख करना ज़रूरी है कि खुद मार्क्स और एंगेल्स के लेखन में इंग्लैण्ड के पूंजीपति वर्ग द्वारा (फ्रांस के ठीक विपरीत) सामंती अभिजात वर्ग के साथ लम्बे समय तक चले मोल-तोल और समझौतों का उल्लेख मिलता है जिसका रामविलास शर्मा ने उपयोग भी किया है. प्रसंगवश यह भी उल्लेखनीय है कि ग्राम्शी ने अपनी ‘प्रिज़न नोटबुक्स’ में दर्ज किया है कि जिस तरह फ्रांस में सामंती ढाँचे को बलपूर्वक उखाड़ फेंका गया, वैसा योरप में पूंजीवाद ने कहीं नहीं किया, बल्कि प्रायः हर जगह सामंती अभिजातवर्ग के साथ पूंजीपतियों के समझौतों की लम्बी श्रृंखला मिलती है. इस पूरे संक्रमण के दौर में आम जनता की कोई भागीदारी नहीं है. यदि वह इस अर्थ में क्रान्ति है कि उसने अंततः सामंतवाद को समाप्त कर नई सामाजिक व्यवस्था कायम की, तो वह हद से हद एक ‘निष्क्रिय क्रान्ति’ (पैसिव रेवोल्यूशन) ही थी. ग्राम्शी यहाँ तक कहते हैं कि आधुनिक योरपीय राज्यों का जन्म सुधारों की छोटी और क्रमिक लहरों से हुआ, न कि फ्रांस की तरह क्रांतिकारी विस्फोट के ज़रिए. ये ‘क्रमिक लहरें’ सामाजिक संघर्षों के संयोजनों, प्रबुद्ध राजशाहियों आदि द्वारा ऊपर से किए गए हस्तक्षेप और जातीय युद्धों के दबाव में उठीं. इनमें से जातीय (राष्ट्रीय) युद्धों की भूमिका ही प्रमुख थी. कहना न होगा कि औपनिवेशिक भारत और ब्रिटिश सम्बन्ध का जैसा विवेचन रामविलास शर्मा ने किया है, वह ग्राम्शी की उपरोक्त प्रस्थापनाओं को सिद्ध करता है,बावजूद इसके कि रामविलास ग्राम्शी की स्थापनाओं का सहारा नहीं लेते और स्वतंत्र विवेचन के ज़रिए इन्हीं निष्कर्षों पर पहुंचते हैं.

पश्चिम योरप के ऐतिहासिक अनुभवों पर आधारित मार्क्स का सामाजिक प्रगति का सिद्धांत और पूर्वी तथा अल्पविकसित देशों के अनुभवों पर आधारित मार्क्स का सामाजिक सिद्धांत, दोनों को रणधीर सिंह जैसे विचारक क्रमशः प्रमुख सिद्धांत और सहवर्ती या पूरक सिद्धांत के रूप में देखते हैं अर्थात दोनों में पहले और बाद का रिश्ता नहीं है, दोनों साथ चलते हैं, यह ज़रूर है कि दूसरा वाला बाद के दिनों में प्रमुखता पाता है और मार्क्स अपने जीवन काल में उसका समग्र सैद्धांतिक निरूपण नहीं कर सके. लेनिन और फिर बाद में माओ इसका विकास करते हैं. दोनों में आपाततः विरोधाभास दीखता है लेकिन सन्दर्भ सहित समझने पर विरोधाभास से ज़्यादा सह्वार्तिता दिखती है. रामविलास शर्मा सह्वार्तिता की जगह इसे मार्क्स और एंगेल्स के विचारों में आए विकास(बदलाव के अर्थ में) की तरह समझते हैं, बहुत कुछ त्योदोर शैनिन (लेट मार्क्स एंड द रशियन रेवोल्यूशन: मार्क्स एंड दि पेरीफेरीज़ आफ कैपिटलिज्म, 1983) की तरह. वे दोनों में विरोध भी देखते हैं. रामविलास शर्मा के शब्दों में, ” पूंजीपति, मजदूर, किसान, पराधीन देश – इन सब के बारे में मार्क्स की धारणाएं परस्पर सम्बद्ध थीं. एक के बारे में धारणा बदली हो, बाकी के बारे में ज्यों की त्यों बनी रही हो, यह संभव नहीं था. (1) पूंजीपति वर्ग भरपूर क्रांतिकारी है, पुरानी व्यवस्था को आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक स्तर पर बदल देता है. विरोधी धारणा- वह भरपूर क्रांतिकारी नहीं है, हर स्तर पर पुरानी व्यवस्था से समझौता करता है. (2) पूंजीवाद ने सर्वहारा क्रान्ति के लिए परिस्थितियाँ तैयार कर दी है, मजदूर वर्ग समाज का बहुसंख्यक भाग है, वह अकेले समाजवादी क्रान्ति संपन्न करेगा. विरोधी धारणा – अभी तो ज़मींदार वर्ग का प्रभुत्व ख़त्म करना है, मजदूर वर्ग समाज का बहुसंख्यक भाग नहीं है, क्रान्ति की सफलता के लिए किसानों का सहयोग ज़रूरी है. (3) किसान अपनी लघु संपत्ति से बंधे हुए हैं, वे प्रतिक्रियावाद के सहायक हैं, इसलिए मजदूरों को अपनी ही ताकत पर भरोसा करना चाहिए. विरोधी धारणा-किसानों में अनेक स्तर हैं, पूंजीवाद लघु संपत्ति वाले किसानों का भी शोषण करता है, किसान-संग्राम सर्वहारा क्रान्ति का सहायक होगा. (4) पराधीन देशों की समाज-व्यवस्था पुरातनपंथी है, विदेशी पूंजीवाद इस व्यवस्था को छिन्न-भिन्न कर के क्रांतिकारी भूमिका निभाता है, इन देशों का की जनता का उद्धार ब्रिटिश मजदूर वर्ग के उत्कर्ष पर निर्भर है. विरोधी धारणा- पूंजीपति पराधीन देशों की लूट का एक हिस्सा मजदूरों में बांटते हैं, ब्रिटिश मज़दूर वर्ग तब तक मुक्त न होगा जब तक आयरलैंड जैसे देश मुक्त न होंगे, ऐसे देशों का मुक्ति संग्राम, केवल ब्रिटेन के नहीं, सारी दुनिया के मजदूरों की मुक्ति के लिए निर्णायक होगा……. सामाजिक विकास संबंधी मार्क्स की धारणाओं में व्यापक परिवर्तन हुआ, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता.” (मार्क्सवाद और पिछड़े हुए समाज, पृ.482-83)

रामविलास जी जिन्हें विरोधी धारणाएं कह रहे हैं, उन्हें उनके सन्दर्भ में रख कर देखने पर विरोध की जगह सहवर्तिता ज़्यादा प्रतीत होगी. फिर इन दोनों सामाजिक प्रगति के सिद्धांतों में पूर्वापर क्रम भी नहीं है. दूसरे के बीज उन कृतियों में मिल जाएंगे जिनका मूल प्रतिपाद्य पहला वाला सिद्धांत है, यह हम इस आलेख में पहले देख चुके हैं, जबकि बाद की कृतियों में भी पहले वाले सिद्धांत की कई बातें विद्यमान हैं. उदाहरण के लिए 1880 के दशक में मार्क्स और एंगेल्स जब रूस में क्रान्ति की संभावना पर विचार करते हैं तो उनके सामने यह प्रश्न था कि वहां के किसानों में जो सामूहिक स्वामित्व की ‘पेजेंट कम्यून’ जैसी व्यवस्था थी, वह रूस में पूंजीवाद द्वारा नष्ट कर दी जाएगी या कि वह व्यवस्था एक उच्चतर स्तर पर समाजवादी रूपांतरण की प्रक्रिया के लिए मार्ग प्रशस्त करेगी, उसे तेज़ कर देगी. मार्क्स के लिए यह विचार का विषय था कि क्या इतिहास ने किसी जनता के लिए कितनी भी बारीक यह संभावना छोडी है कि वह सामंतवाद से सीधे ही साम्यवादी विकास की मंजिल में प्रवेश कर जाए. मार्क्स का विचार था कि ऐसा हो सकता है यदि रूस में क्रान्ति जल्दी हो, कम से कम इतनी जल्दी कि ‘पेजेंट कम्यूनों’ को नष्ट होने से बचाया जा सके. यह बात सामाजिक विकास के उनके दूसरे वाले सिद्धांत के अनुकूल थी. वेरा ज़ेसुलिच को 1881 में लिखे प्रसिद्द पत्र के पहले प्रारूप में उन्होंने लिखा, ‘यदि क्रान्ति समय से हो जाए, यदि वह अपनी सारी ताकत एक जगह केन्द्रित करके……देहाती कम्यून के मुक्त विकास को सुनिश्चित करे, तब वह(कम्यून) खुद-ब-खुद अपेक्षाकृत जल्दी ही रूसी समाज के पुनरुज्जीवन के एक तत्व के रूप में विकसित हो जाएंगे, (यह तत्व) पूंजीवादी व्यवस्था द्वारा दास बना लिए गए देशों की तुलना में (रूस के लिए) फायदे का है.”

यहाँ कहीं भी क्रान्ति की पूर्व-शर्त के बतौर पूंजीवाद की तकनीकी उपलब्धियों या पश्चिम में विजयी क्रान्ति से मिलनेवाली मदद का कोई उल्लेख नहीं है. इस पत्र के चौथे प्रारूप में (जब इसे अंततः ज़ेसुलिच को भेजा गया) इतना और जोड़ते हैं कि देहाती कम्यून के लिए नुकसानदेह प्रभाव जो उसे चारों ओर से उसे घेरे हुए हैं, उन्हें पहले समाप्त करना होगा, तभी उनके स्वतःस्फूर्त विकास की सामान्य स्थितियां सुनिश्चित हो सकेंगी. उधर एंगेल्स स्पष्ट रूप से यह कह रहे थे कि यह संभावना बेशक चरितार्थ हो सकती है, लेकिन इसकी पूर्वशर्त है विकसित योरप में क्रान्ति का होना. आखिरकार कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो के 1882 के रूसी संस्करण की भूमिका में मार्क्स भी इसी जगह आ खड़े होते हैं. भूमिका में लिखा है,” यदि रूसी क्रान्ति पश्चिम में सर्वहारा क्रान्ति की प्रेरक बनती है, ताकि दोनों एक दूसरे की मददगार बन सकें, तब वर्तमान में रूस में भूमि का सामूहिक स्वामित्व कम्युनिस्ट विकास के लिए प्रस्थान बिंदु बन सकता है” यहाँ स्पष्ट ही पिछड़े हुए रूस में मजदूर किसान गठजोड़ पर आधारित समाजवादी क्रान्ति और विकसित योरप में सर्वहारा क्रान्ति की संकल्पनाएँ ठीक ठीक पूरक रूप में मौजूद हैं, विरोधी धारणाओं के बतौर नहीं.यह अलग बात है कि रूसी क्रान्ति योरपीय क्रान्ति को प्रेरित नहीं कर सकी और रूसी क्रान्ति का जहाज़ आरम्भ से ही पूंजीवादी ताकतों की घेरेबंदी, आतंरिक गृहयुद्ध, फासीवादी आक्रमण वगैरह झेलते अकेले ही अप्रत्याशित रास्तों पर आगे बढ़ा, इन परिस्थितियों में उसके भीतर भी तमाम विकृतियां आती गईं और अंततः 70 साल की आयु पूरी कर दुर्घटनाग्रस्त हुआ. उसने 20 वीं सदी की तमाम पिछड़े देशों की क्रांतियों को और पराधीन देशों के मुक्ति संघर्षों को ज़रूर प्रेरित किया. ये अलग बात है कि मार्क्स की सामाजिक प्रगति की वह धारणा जो उनके जीते जी उनकी मुख्य धारणा के सम्मुख गौड़ बनी रही, 20 वीं सदी में वही मुख्य बन गई, लेकिन वाम आन्दोलन के अनेक विश्वस्तरीय नेता इस बात को समझने से इनकार करते रहे. कौत्सकी को रूसी क्रान्ति से ये शिकायत थी कि उसे पूंजीवाद की विकसित अवस्था में पहुँचने से पहले ही करके लेनिन ने गलत किया. ट्राटस्की क्रान्ति के नेताओं में थे लेकिन विकसित योरप में क्रान्ति न होने से निराश वे एक देश में समाजवाद निर्माण की चुनौतियों को स्वीकार करने से ही कतरा गए. इतिहास का निर्माण मनुष्य करते हैं अपने कर्म से, वह पूर्व-निर्धारित रास्तों पर ही नहीं चला करता. वह महानतम सिद्धांतों से भी छल कर सकता है.

उपनिवेशवाद/ साम्राज्यवाद की प्रगतिशीलता का मिथक

ऐतिहासिक रूप से उपनिवेशवाद मुक्त व्यापार के दिनों में योरपीय व्यापारियों ने कायम किये. उपनिवेश पूंजीवादी उत्पादन पद्धति से पहले भी सामंतवाद के भीतर पनपे व्यापारिक पूंजी के आदिम संचयन के लिए कायम हुए. इस आदिम संचयन ने उपनिवेशों में नहीं बल्कि व्यापारिक कंपनियों के गृह देशों में पूंजीवादी क्रान्ति को संभव बनाया.

मार्क्स की निगाह में योरप की औद्योगिक और पूंजीवादी क्रान्ति इसलिए प्रगतिशील थी कि उसने पुरानी सामंती व्यवस्था का खात्मा कर नई सामाजिक व्यवस्था कायम की थी. लेकिन पेंच यह था इसकी कीमत पराधीन देशों ने चुकाई? अकाल, जनसंहार, दमन, लूट, नस्लीय घृणा, साम्प्रदायिक विभाजन और अमानुषिक अत्याचारों का अंतहीन सिलसिला उपनिवेशों में चलाया गया. आर्थिक रूप से उपनिवेशों की इतनी संपदा लूटी गयी कि वे किसी भी तरह के स्वाधीन विकास के काबिल ही न बचे. खुद मार्क्स ने उपनिवेशों से पूंजी के आदिम संचय की बर्बर प्रक्रिया का रोंगटे खड़े कर देनेवाला वर्णन किया है और उसकी कठोरतम भर्त्सना की है. तब आखिर उपनिवेशवाद के प्रगतिशील होने का विमर्श आया कहाँ से? यदि खुद उपनिवेशवादियों के सभ्यता-प्रसार वाला तर्क छोड़ दिया जाए जिससे मार्क्स एंगेल्स की घृणा उत्तरोत्तर बढ़ती ही गई, तब इसका स्रोत कम्यूनिस्ट घोषणापत्र में पूंजीवाद की क्रांतिकारी भूमिका का जैसा मार्क्स ने चित्रण किया, उस धारणा को उपनिवेशवाद पर भी आरोपित करने में निहित है. कम्यूनिस्ट मेनिफेस्टो में योरप के विजयी पूंजीपति वर्ग से अपेक्षा की गई है वह सारी दुनिया को अपनी ही छवि में सिरजेगा. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. विश्व भर में आत्मप्रसार का जो संरचनागत तर्क पूंजीवाद में अन्तर्निहित है वह अमल में बिलकुल दूसरे ही रूप में आया. वह एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमरीका के देशों में गरीबी, भूख, क़र्ज़, विकासहीनता का विकास, अनुद्योगीकरण लाया. पुराने उपनिवेशवाद पर आरूढ़ होकर इजारेदार पूंजी की अवस्था में जो साम्राज्यवाद आया, वह और भी भीषण था जिसने पूरी दुनिया में उत्पादक शक्तियों का अभूतपूर्व विनाश किया. रामविलास शर्मा ने अपने लेखन के छह दशक तक इस पूरी प्रक्रिया को समझाने और हिन्दीभाषी जनता के विचार और अनुभूति का हिस्सा बनाने का अनथक प्रयास किया. उन्होंने विस्तारपूर्वक दिखलाया कि भारत में उपनिवेशवाद और फिर साम्राज्यवाद ब्रिटेन और विश्व-पूंजी की किन किन अवस्थाओं के साथ विकसित हुआ और उसने भारत में क्या परिणाम उत्पन्न किए. रामविलास शर्मा ने लिखा,’ अंग्रेजों ने यहाँ सामूहिक सम्पत्तिवाले कबीलाई ग्राम समाजों का विध्वंस नहीं किया, उन्होंने यहाँ के प्रतिक्रियावादी सामंतों से मिलकर उभरते हुए पूंजीवाद का विनाश किया, इस ऐतिहासिक सत्य को छिपाने का पयत्न बराबर किया जाता है.’ (भारत में अंग्रेज़ी राज, भाग -2, भूमिका, पृ. 12) जिस आत्मविश्वास के साथ रामविलास शर्मा उपनिवेशवाद की प्रगतिशीलता के मिथक को ध्वस्त करते हैं, वह कई महान उपनिवेशवाद- विरोधी योद्धाओं और चिंतकों की बरबस ही याद दिलाता है. अल्जीरिया के मुक्ति योद्धा फ्रैंज़ फैनन ने निर्भीक टिप्पणी की कि उपनिवेशवाद ने प्राक्-आधुनिक समाजों की आत्मालोचना की परंपरा को नष्ट किया और आत्म-विकास की सारी प्रक्रियाओं को अवरुद्ध कर दिया. यदि हम ध्यान रखें कि खुद मार्क्सवाद के भीतर उपनिवेशवाद को प्रगतिशील माननेवाली किस हद तक प्रभावी रही है और बार-बार प्रकट होती रही है, तो हम रामविलास शर्मा के बौद्धिक संघर्ष को ज़्यादा समझ सकते हैं. सेकेण्ड इंटरनेशनल के नायक जिनके प्रतिनिधि बर्नस्टीन सहित कई बड़े नेता थे, साम्राज्यवाद के पुराने उपनिवेशवादी शासन के पक्षपोषक थे. उन्होंने खुली घोषणा की की औपनिवेशिक शासन प्रगतिशील था, कि वह उपनिवेशों में ‘सभ्यता के उच्च स्तर लाया’, और वहां उसने ‘उत्पादक शक्तियों का विकास किया’. उन्होंने यहां तक कहा की ‘उपनिवेशों को खत्म करने का मतलब होगा बर्बरता’. वे तो समाजवाद में भी उपनिवेशों की ज़रुरत मानते थे और इसके लिए उन्होंने ‘पूंजी का समाजवादी आदिम संचय’ जैसे सूत्रीकरण भी किए थे. यह सच है कि लेनिन के महान सैद्धांतिक कार्यों की बदौलत यह सब मूर्खताएं बंद हुईं, लेकिन खासकर योरपीय वामपंथ में लम्बे समय तक बार-बार जोर मारती रहीं. दूसरी ओर खुश्चेव के समय जब पूंजीवादी और समाजवादी खेमों के बीच शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का सिद्धांत आया, तो साथ ही सोवियत कम्यूनिस्ट पार्टी की तरफ से यह उपदेश भी आया कि राष्ट्रीय मुक्ति संग्राम अब ‘नए दौर’ में प्रवेश कर गए हैं. जहां पहले दौर में संघर्ष मुख्यतः राजनीतिक क्षेत्र में था, अब उसका क्षेत्र आर्थिक है और नव-स्वतंत्र देशों को क्रान्ति को आगे बढाने की मुख्य कड़ी के बतौर आर्थिक विकास पर ध्यान देना चाहिए. माओ ने इसका तीखा प्रतिवाद किया. उन्होंने कहा कि यह सारा उपदेश नव-उपनिवेशवाद का पक्षपोषण है क्योंकि यह एशिया, लैटिन अमरीका और अफ्रीका पर नव-उपनिवेशवाद (जिसका प्रतिनिधि अमरीका है) के भीषण हमलों और उनकी लूट पर, साम्राज्यवाद और शोषित राष्ट्रों के बीच तीखे अंतर्विरोध पर पर्दा डालता है और इन महाद्वीपों की जनता के क्रांतिकारी संघर्षों को कुंद करता है. माओ ने कहा कि बेशक नव-स्वतंत्र देश अपना स्वतंत्र आर्थिक विकास करें, लेकिन यह कार्य साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्ष, उन देशों के भीतर साम्राज्य के एजेंटों के खिलाफ राजनीतिक संघर्ष से पृथक नहीं है. (चीनी समाचारपत्र ‘पीपुस डेली’ में 22 अक्टूबर, 1963को प्रकाशित माओ का लेख) ज़ाहिर है कि ख्रुश्चेव के नेतृत्व वाले संशोधनवाद के ऐसे प्रस्ताव भले ही उपनिवेशवाद का प्रत्यक्ष समर्थन न करते हों, लेकिन साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्षों को कमज़ोर कर प्रकारांतर से शोषित देशों को उसे सहन करने के लिए प्रेरित अवश्य करते हैं. लेकिन योरपीय वाम के अकादमिक हल्कों से साम्राज्यवाद का खुला समर्थन भी गाहे-बगाहे होता ही रहता है. इसका एक उदाहरण उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद को मानव समाज के विकास में गुणकारी बतानेवाली बिल वारेन की 1980 में प्रकाशित पुस्तक ‘इम्पीरियालिज्म::पायनियर आफ कैपिटलिज्म’ है जो मार्क्सवादी कोटियों का इस्तेमाल करती है और न्यू लेफ्ट बुक्स से छपी है. इस से यह अंदाज़ होता है कि उपनिवेशवाद के प्रगतिशील होने का मिथक कोई बंद हो चुकी बहस नहीं है.

उपनिवेशवाद की प्रगतिशीलता की धारणा का दूसरा स्रोत दूसरा स्रोत मार्क्स के भारत विषयक आरंभिक लेख हैं, खासतौर पर 1853 वाला लेख. प्रारम्भिक लेखों में मार्क्स ने भारत को एशियाई उत्पादन पद्धति वाला देश, गतिरुद्ध ग्राम समाज और पूर्वी निरंकुशता के लक्षणों वाला देश मानते हुए भारत में अंग्रेज़ी राज को इस जड़ता को तोड़कर प्रगति क बीज बिखेरने वाले ‘इतिहास के अचेतन औजार’की संज्ञा दी. आज भारत के मार्क्सवादी बौद्धिक जानते हैं कि जब मार्क्स भारत के बारे में लिख रहे थे तो पूरब के बारे मे पष्चिमी ज्ञान अत्यंत सीमित था, कि भारत के विशृंखलित, आत्मनिर्भर गाँवों की छवि मार्क्स ने हेगेल से शब्दशः ग्रहण की थी, कि एषिया की परिवर्तनहीन, गतिरुद्ध छवि 19वीं सदी के योरप को हाब्स और मान्टेस्क्यू जैसे ज्ञानोदय के अग्रदूतों से विरासत में मिली थी, कि प्राक्-औपनिवेशिक भारत की कृषि अर्थव्यवस्था उतनी परिवर्तनहीन और स्वायत्त ग्राम-समुदायों वाली न होकर विनियम और विनियोजन के कहीं बडे़ संचारतंत्र के साथ जुड़ी हुई थी, कि कृषि तकनीक शताब्दियों से वैसी गतिरुद्ध न थी, जैसी मार्क्स ने समझा था, कि स्वायत्त ग्राम इकाइयों को केन्द्रीय स्तर पर जल-प्रबंधन से जोड़ने वाले निरंकुष राजतंत्र (हाइड्रालिक स्टेट) की धारणा गलत थी, बल्कि छोटे बाँध, उथले कुएँ, स्थानीय तालाब जो कि पारिवारिक और सामूहिक श्रम से तैयार किए जाते थे, उनकी सिंचाई में उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका थी जितनी कि केन्द्रीय स्तर पर नियोजित जल-प्रबन्धन की, कि भूसंपत्ति का वैसा अभाव न था जैसा मार्क्स ने समझा था और किसानों के अलग-अलग तबकों का अस्तित्व काफी पहले से था, कि एषियाटिक मोड आफ प्रोडक्शन की धारणा भारत के संदर्भ में ‘अप्रामाणिक‘ है, आदि. महत्वपूर्ण बात यह है कि भारतीय समाज के बारे में ये समझ रामविलास शर्मा सन् 1957 में लिखी अपनी पुस्तक ‘सन् सत्तावन की राज्यक्रांति और मार्क्स वाद‘ में ही पूर्वाषित करते हैं, जिस समय तक भारतीय सामंतवाद और मध्यकाल के बारे में मार्क्सवादी इतिहासकारों के महत्वपूर्ण अध्ययन प्रकाशित नहीं हुए थे. रामविलास शर्मा भारत में अंग्रेज़ी राज कायम होने के वक्त एशियाई उत्पादन पद्धति की बात के समर्थन में एक-एक तर्क का विधिवत प्रत्याख्यान करते गए. रामविलास शर्मा ने जोर देकर कहा कि मार्क्स ने एशियाई पद्धति को वैकल्पिक रूप से जगह जगह ‘आदिम साम्यवाद’ भी कहा था और उसका विस्तार उनके मुताबिक़ एशिया तक सीमित नहीं था, बल्कि आयरलैंड तक इसका प्रसार था. मार्क्स के 1853 में लिखे गए पत्र में एशियाई उत्पादन पद्धति की धारणा का सूत्रपात हुआ और मार्क्सवादी हल्कों में यह लम्बे समय तक परिव्याप्त रही. 1960 के दशक में जब इस धारणा का ट्राटस्कीवाद से प्रभावित अध्ययनों में फिर से उभार हुआ तो उन्होंने एक बार फिर’मार्क्स, त्रातास्की और एशियाई समाज’ नामक पुस्तक लिखकर इसका प्रत्याख्यान किया. एशियाई उत्पादन पद्धति को ध्वस्त करना भारत में अंग्रेज़ी राज की प्रगतिशीलता का मुख्य तर्क था और 1857 को प्रतिक्रियावादी कहने का भी. रामविलास शर्मा ने अपने समकालीन भारतीय मार्क्सवादी लेखकों में भी जहां जहां इस तर्क का प्रभाव देखा, उनसे तीखी बहस की.

भारत के बारे में, अंग्रेज़ी राज की प्रगतिशीलता के बारे में मार्क्स और एंगेल्स के बदले हुए विचारों की उन्होंने पूरी उद्धरणी ही तैयार कर दी. उन्होंने आयरलैंड पर मार्क्स के अध्ययन के हवाले से इस बात पर भी जोर दिया कि यदि समाजवादी क्रान्ति की भौतिक और आत्मिक परिस्थिति तैयार करने के अर्थ में पूंजीवाद प्रगतिशील था, तो उपनिवेशवाद इस प्रगतिशीलता में बाधा था क्योंकि उपनिवेशों से लुटे हुए माल का हिस्सा देकर विकसित देशों के मजदूरों को भ्रष्ट किया गया था. आज पूंजी के गढ़ों में क्रान्ति आज तक नहीं हो सकी तो इसका एक बड़ा कारण साम्राज्यवादी लूट में वहां के मजदूर वर्गों को हिस्सा दिया जाना रहा है. मार्क्स और एंगेल्स ने उत्तरोत्तर उपनिवेशवाद-विरोधी प्रतिरोधों का समर्थन किया, चाहे वे प्रतिरोध कितने भी पिछड़े हुए समाजों में हुए हों. 1857 की बगावत मार्क्स ने ही ने ही उसे भारत का ‘राष्ट्रीय विद्रोह’ कहा था. उन्होंने उसका एशिया के उभार के हिस्से के बतौर स्वागत किया जिसकी एक झलक उन्होंने विद्रोह में देखी थी. उन्होंने तो एशिया के जागरण के बगैर किसी विश्वक्रांति को अकल्पनीय माना था और तमाम उपनिवेशवाद-विरोधी संघर्षों का इसी दृष्टिकेाण से दिल खोलकर स्वागत किया था. 2007 में 1857 के संग्राम की150वी वर्षगाँठ की पूर्वबेला में खुद को प्रगतिशील कह्लेवाले कुछ बुद्धिजीवियों ने नए सिरे से अंग्रेज़ी राज की भारत के लिए महत्ता को रेखांकित किया और 1857 को प्रतिक्रियावादी बताया (देखें जून, 2006 का ‘हंस’ का सम्पादकीय या विभूतिनारायण राय अदि के लेख) पुराने और कब के निरस्त किए जा चुके तर्कों के अलावा नई बात उन्होंने जाती की उठाई. अंग्रेज़ी राज को दलितों के लिए गुणकारी बताया मानो अंग्रेज़ी राज की लूट के फलस्वरूप पड़नेवाले अकालों में मारे गए करोड़ों हिन्दुस्तानियों में दलित न रहे हों, मानो 1857 की बगावत के प्रतिशोध में जो गाँव के गाँव अंग्रेजों ने साफ़ कर डाले उनमें दलित न रहते रहे होंगे, मानो जो दस्तकारियाँ और उद्योग उन्होंने नष्ट किए उनमें दलित न रहे होंगे,जबकि बुनकरों सहित तमाम शिल्पकार जातियां दलित ही थीं. 1857 को ये लोग ब्राह्मणवादी षड्यंत्र बताते हैं. पूछा जाना चाहिए कि अवध में सुरंगों की लड़ाई किन जातियों के लोगों ने लड़ी थी, कुंवर सिंह की सेना के ढेरों नायक किन जातियों के थे, यदि पूरा आरा शहर ही बगावत के आरोप में नामजद किया गया था, तो क्या तब के आरा शहर में दलितों की कोई आबादी थी कि नहीं?. अच्छी बात यह हुई कि खुद दलित साहित्य के भीतर से लोगों ने खोज खोज कर दिखला दिया कि इस विद्रोह के दलित, पिछड़े नायक कौन लोग थे, कि आप हमारे हितैषी बन कर भारत की आज़ादी की लड़ाई में हमारे योगदान हमारी दावेदारी को खारिज न करें.

रामविलास शर्मा यह सवाल उठाते रहे कि यदि अंग्रेजों के आगमन से पहले भारत में बड़े पैमाने पर सौदागरी पूंजी संचित थी, तो औद्योगिक पूंजी के युग में भारत के प्रवेश की संभाव्यता से इनकार नहीं किया जा सकता.

एजाज़ अहमद ने इस लेख में पहले उद्धृत साम्राज्यवाद के समर्थन में बिल वारेन की 1980 में प्रकाशित पुस्तक ‘इम्पीरियालिज्म::पायनियर आफ कैपिटलिज्म’ की आलोचना के क्रम में लिखा ” हम यह भी जानते ही हैं कि 18वीं सदी के आरम्भ में, उपनिवेशवाद द्वारा भारत में निर्णायक युद्धों में जीत हासिल करने तथा भारत में राजसत्ता के संघटन से आतंरिक संकट उत्पन्न होने से पहले, भारत में ‘उत्पादक शक्तियां ‘ इतनी पिछड़ी हुई न थीं जितनी कि साम्राज्यवादी इतिहास-लेखन बताता रहा है. भारत में इतिहासतः निर्मित, सामाजिक रूप से स्थिर अनेक वर्ग थे जो प्राक-औपनिवेशिक निर्माण-उद्योगों और वाणिज्य में लगे हुए थे. भारत के पास पारंपरिक रूप से व्यापार और परिवहन की कुशल व्यवस्था थी जिसमें आतंरिक जहाजरानी और सडकों का व्यापक संजाल शामिल था जिसके चलते थोक मालों की व्यापक आवाजाही थी, पर्याप्त स्तर का नगरीकरण था, सामान मुद्रा व्यवस्थाएं थीं, लम्बी अवधि की परिपक्वता वाले भारी निवेश करने की क्षमता वाले वित्तीय घराने थे,देश के सभी महत्वपूर्ण इलाकों में फ़ैली हुई विभिन्न तरीकों के कार्य में दक्ष श्रमशक्ति थी, गैर-खेतिहर उत्पादनों-धातु-उद्योग से लेकर वस्त्र निर्माण, खनन से लेकर पानी के जहाज के निर्माण तक में असाधारण रूप से विकसित कौशल था. इन सब बातों का निश्चय ही यह अभिप्राय नहीं है कि भारत औद्योगिक पूंजीवाद की अवस्था में पहुँच जाने के मुहाने पर खडा था, लेकिन ठीक इसे तर्क से विचार करें तो ऐसा भी कोई सिद्धांत नहीं है जो यह साबित कर सके कि ब्रिटिश कब्जे के अभाव में भारत (या कम से कम उसके कुछ इलाके) (जापान) की मेईजी क्रान्ति के समतुल्य कोई क्रान्ति नहीं कर सकते थे. दोनों ही संभावनाओ के बारे में निश्चित होना मुश्किल है. (एजाज़ अहमद, ‘इम्पीरिअलिज़्म एंड प्रोग्रेस’ शीर्षक अध्याय, ‘लीनिएजेज़ आफ दी प्रेजेंट; शीर्षक पुस्तक, पृष्ठ-12, तूलिका प्रकाशन, मूल लेख का प्रकाशन 1982 में हुआ)

एजाज़ साहब की ऊपर उद्धृत पंक्तियों से जो निष्कर्ष निकलता है,, वे 1957 में रामविलास शर्मा की लिखी हुई पुस्तक ‘सन सत्तावन की राज्यक्रान्ति’ में ‘अंग्रेज़ी राज की प्रगतिशील भूमिका शीर्षक पहले अध्याय के उप-अध्याय ‘ग्राम -समाज और सामंती अराजकता” में मिल जाएंगे. 1982 में एजाज़ अहमद ये बातें इतनी निश्चिंतता के साथ लिख रहे हैं की उन्हें स्रोत बताने की ज़रुरत नहीं क्योंकि भारत में सामंती युग के बारे में अब तक इतनी सामग्री खुद भारतीय इतिहासकारों ने उपलब्ध करा दी थीं की वे अकाट्य रूप से सर्वमान्य थीं. लेकिन 1957 में रामविलास शर्मा इतने निश्चिन्त नहीं हो सकते थे. उनके सामने इतने अध्ययन उपलब्ध नहीं थे. भारतीय इतिहास में सामंती दौर और मध्यकाल के बारे में आर.एस. शर्मा, इरफ़ान हबीब, सतीश चन्द्र या हरबंस मुखिया के अध्ययन उनके सामने नहीं थे. (दूसरी ओर भारत में अंग्रेज़ी राज के आने से पहले उसके पिछड़े होने, उसके पिछड़ेपन को ही अंग्रेज़ी राज कायम होने का कारण मानना और अंततः अंग्रेज़ी राज की प्रगतिशील भूमिका को स्वयंसिद्ध मानना एक तरह का कामनसेंस बना हुआ था.) रामविलास शर्मा ने उक्त उप-अध्याय में इन्हीं निष्कर्षों को ओ मैली द्वारा संपादित 1941 की पुस्तक ‘माडर्न इंडिया एंड दी वेस्ट’,क्रुक की 1897 की पुस्तक ‘द नार्थ वेस्टर्न प्रोविन्सेज़ आफ इंडिया’, एनी बेसेंट की 1926 की पुस्तक ‘इंडिया बांड ऑर फ्री’, राधाकमल मुखर्जी की ‘द इकानामिक हिस्ट्री आफ इंडिया, 1600-1800’, जे. डब्लू. के. की 1865 की पुस्तक ‘अ हिस्ट्री आफ सिपोय वार इन इंडिया’, अवध गैज़ेटीयर, न्यूज़ एंड व्यूज़ फ्राम द यु.एस.एस.आर जैसे स्रोतों से निकाले थे. रामविलास शर्मा लगातार इन निष्कर्षों के लिए नए-पुराने प्रमाणों की समीक्षा करते रहे. उदाहरण के लिए 1981 में’भारत में अंग्रेज़ी राज, भाग- 1 व 2′ के में इन्हीं निष्कर्षों को और अधिक विस्तार से उन्होंने एडम स्मिथ, एडमंड बर्क, बर्नियर, मोरलैंड, इरफ़ान हबीब, दादाभाई नौरोजी, एम.एन राय, जेंक्स, मेरठ में कम्यूनिस्ट नेताओं के बयान और रजनी पाम दत्त की पुस्तकों की आलोचनात्मक समीक्षा करते हुए निकाला है.

यह सच है रामविलास शर्मा भारत में औद्योगिक क्रान्ति की संभावना के बारे में इतने नपे-तुले ढंग से नहीं बोलते और उनका झुकाव यही है कि ऐसा होना संभावित था यदि अँगरेज़ नहीं आए होते तो. रामविलास शर्मा व्यापारिक पूंजीवाद को वास्तविक पूंजीवाद की परिधि से बाहर रखे जाने के खिलाफ हैं. (इन बातों का सैद्धांतिक मूल्य क्या है, कहा नहीं जा सकता) प्रश्न यह नहीं है कि व्यापारिक या सूदखोर पूंजी को पूंजी कहा जाए या नहीं. मार्क्स ने खुद ही इन्हें पूंजीवादी उत्पादन पद्धति से पहले मध्यकाल से प्राप्त पूंजी के दो रूप कहा है (पूंजी, भाग -1, अध्याय 31), पूंजी के ये दोनों रूप बेहद अलग-अलग सामाजिक व्यवस्ताओं में अपनी परिपक्वता प्राप्त कर सकते हैं, लेकिन खुद-ब-खुद पूंजीवादी उत्पादन पद्धति में तब्दील नहीं हो सकते. पूंजी के ये दो रूप पूंजीवादी उत्पादन पद्धति नहीं कहला सकते, ये सामंती उत्पादन पद्धति की विकसित अवस्था में उत्पादित विनिमय योग्य उत्पादन के प्रसार से सम्बन्ध रखते हैं. पूंजीवाद के लम्बे बचपन में ये रूप रहते हैं.छोटे गिल्ड मास्टर, छोटे कारीगर और यहाँ तक कि उजरती मज़दूर भी लम्बे समय में छोटे पूंजीपति बन जाते हैं, लेकिन औद्योगिक पूंजीवाद व्यापारिक पूंजी के धीमे और स्वाभाविक विकास का परिणाम नहीं है. कारीगर श्रेणियां सौदागरी और सूदखोर पूंजी को औद्योगिक पूंजी बनने से सामंती नियम-कानूनों के ज़रिए रोकती हैं. उदाहर्न्स्वरूप मार्क्स ने डा. आइकिन को उद्दृत करते हुए बताया है कि यहाँ तक कि 1794 तक में लीड्स के छोटे वस्त्र उत्पादकों ने एक प्रतिनिधिमंडल भेजकर इंग्लैण्ड की संसद से एक ऐसा क़ानून बनाने की दरखास्त की थी जो किसी भी व्यापारी को उद्योगपति बनने से रोके.

रामविलास शर्मा जब सौदागरी पूंजीवाद को पूंजीवाद की एक अवस्था के रूप में देखे जाने की मांग करते हैं, तो यह भ्रम होता है की वे व्यापारिक, औद्योगिक और महाजनी पून्जीवादों को एक चरणबद्ध स्वाभाविक विकास मानते हैं,लेकिन जैसा कि मार्क्स ने खुद लिखा, सौदागरी और सूदखोर पूंजी सामंती मध्यकाल में विकसित पूंजी के रूप हैं जो औद्योगिक पूंजी में आप से आप परिणत नहीं हो जाते, लेकिन (औद्योगिक पूंजीवाद) के लम्बे बचपन के दौर में अपनी जगह बनाए रहते हैं, जबतक कि सामंती संबंधों का खात्मा करके इन्हें औद्योगिक पूंजी में रूपांतरित नहीं कर लिया जाता. रामविलास शर्मा खुद भी इरफ़ान हबीब के इस विचार से सहमत हैं कि मुग़ल भारत में सौदागरी पूंजी के विकास से लगता है कि भारतीय अर्थतंत्र काफी आगे बढी हुई मंजिल तक पहुँच गया था लेकिन सौदागरी पूंजी अपने ही विकास द्वारा औद्योगिक पूंजी का रूप नहीं ले सकती. शर्मा लिखते हैं, ” मार्क्स की स्थापना सही है, उसके साथ दो बातें और भी सही हैं. सौदागरी पूंजी के अभाव में औद्योगिक पूंजी का जन्म नहीं होता;उसके जन्म के लिए सौदागरी पूंजी का पहले से विद्यमान होना ज़रूरी है. विनिमय के प्रसार से बाज़ार का निर्माण हो जाने पर ही उद्योग-धंधों को पूंजीवादी ढंग से चलाने की ज़रुरत होती है.'(भारत में अंग्रेज़ी राज और मार्क्सवाद, पृष्ठ. 338) हमने पहले भी कहा कि इन प्रस्थापनाओं के सैद्धांतिक मूल्य के बारे में आश्वस्त नहीं हुआ जा सकता. महत्व लेकिन इस बात का है कि रामविलास अंग्रेज़ी राज को भारत की नियति के रूप में स्वीकार नहीं करते. यहाँ सवाल आता है इतिहास संबंधी दृष्टिकोण का. क्या इतिहास में जो घटा उसे नियति मान लिया जाय? क्या इतिहास जैसा घटा उससे भिन्न कुछ हो ही नहीं सकता था? शायद सामाजिक शोध प्राविधि में ऐसे प्रश्नों के लिए स्थान नहीं है. लेकिन जातीय चेतना से कैसे बेदखल करेंगे इन सवालों को?

कुछ विद्वान् अंग्रेज़ी राज की स्थापना के समय भारत के भीतर पूंजीवादी क्रान्ति करनेवाली शक्तियों का अभाव मानते हैं. कुछ अंग्रेज़ी राज की स्थापना और इस अभाव के बीच कार्य-कारण सम्बन्ध जोड़ते हैं. मार्क्स के खुद के विवरण में इस तरह के किसी कार्य-कारण सम्बन्ध का कोई इशारा भी नहीं है. उन्होंने तो पूंजी के बाह्य प्रसार को पूंजी के आदिम संचय की बर्बर प्रक्रिया के रूप में ही दिखाया है. इस प्रक्रिया का कोई सम्बन्ध उपनिवेश बनाए गए देशों में निर्मित किसी ऐतिहासिक ज़रुरत से नहीं था. यह ऐतिहासिक ज़रुरत पूंजी के पश्चिमी गढ़ों की थी – औद्योगिक क्रान्ति संपन्न करने लायक पूंजी इकट्ठा करने की. इस सम्बन्ध को मान्यता देने का मतलब है अंग्रेज़ी राज को भारत की नियति मानना, भारत की औपनिवेशिक लूट, जनसंहार, देशी उद्योग-धंधों, नगरों,व्यापार, कारीगरों, किसानों की तबाही, औपनिवेशिक अकालों में करोड़ों हिन्दुस्तानियों की मौत सब कुछ को भारत की नियति मानना. रामविलास शर्मा ने अगर इस धारणा से जीवन भर संघर्ष किया तो इसी लिए कि यह धारणा 1947 में सत्ता-हस्तांतरण के बाद भी अकादमिक हलकों और भारत के बौद्धिकों के बड़े वर्ग में जमी रही और भारत के नव-उपनिवेशवादी शोषण का औचित्य स्थापन करती रही. भारत के पूंजीवादी-सामंती गठजोड़ को प्रकारांतर से बल प्रदान करती रही. विश्व साम्राज्यवाद के आर्थिक तंत्र पर भारत की निर्भरता को तर्कपूर्ण सिद्ध करती रही. अंग्रेज़ी राज को भारत की नियति मानना, भारत की औपनिवेशिक लूट,जनसंहार, देशी उद्योग-धंधों, नगरों, व्यापार, कारीगरों, किसानों की तबाही, औपनिवेशिक अकालों में करोड़ों हिन्दुस्तानियों की मौत सब कुछ को भारत की नियति मानना. रामविलास शर्मा ने अगर इस धारणा से जीवन भर संघर्ष किया तो इसी लिए कि यह धारणा 1947 में सत्ता-हस्तांतरण के बाद भी अकादमिक हलकों और भारत के बौद्धिकों के बड़े वर्ग में जमी रही और भारत के नव-उपनिवेशवादी शोषण का औचित्य स्थापन करती रही. भारत के पूंजीवादी-सामंती गठजोड़ को प्रकारांतर से बल प्रदान करती रही. विश्व साम्राज्यवाद के आर्थिक तंत्र पर भारत की निर्भरता को तर्कपूर्ण सिद्ध करती रही.

आज जब भूमंडलीकृत भारत की अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र में वैश्विक पूंजी घुसकर लूटपाट कर रही है, सरकारें बहुराष्ट्रीय कंपनियों और साम्राज्यवादी हितों के हिसाब से नीतियाँ तय कर रही हैं, ढाई लाख से अधिक किसान दो दशकों में आत्महत्या कर चुके हों, प्राकृतिक संसाधनों की लूट के लिए लोग बड़े पैमाने पर विस्थापित किए जा रहे हैं, प्रतिरोध करने पर उनका भीषण दमन हो रहा है, वाम शक्तियां राष्ट्रीय स्तर पर हस्तक्षेप की स्थिति में नहीं दिखतीं, वैचारिक कुहासा घनघोर है, तब रामविलास शर्मा के संघर्ष को ज़रूर याद कर लेना चाहिए और साम्राज्यवाद को अपनी ऐतिहासिक नियति मानने से हर भारतवासी को पूरी शक्ति से इनकार कर देना चाहिए, शब्द में भी, कर्म में भी.

 (प्रणय कृष्‍ण। इलाहाबाद युनिवर्सिटी और जेएनयू से अध्‍ययन। प्रखर हिंदी आलोचक। जन संस्‍कृति मंच के महासचिव।  देवीशंकर अवस्‍थी सम्‍मान  से सम्मानित ।)Pranay Krishna, Photo By Vijay Kumar

अपने अपने रामविलास- प्रणय कृष्ण

(“जो लोग कहते हैं किहिन्दुस्तान में महान और प्रचुर रचनाएँ नहीं हुईं, उन्हें निरुत्तर करने के लिए ‘रानी केतकी की कहानी’ जैसा पुराना उदहारण रखने के बजाय रामविलास शर्मा की सौ पुस्तकें रख देनी चाहिए. जो व्यक्ति १९४९ में व्यापारिक पूंजी की गतिविधियाँ देख कर भारतीय पूंजीवाद की देशज संभावनाओं की तरफ इशारा कर रहा है, वह इतिहास लेखन सम्बन्धी अपनी मौलिक अंतर्दृष्टियों में इरफ़ान हबीब का पूर्वर्ती है. जो व्यक्ति भारत की प्राकौपनिवेशिक आधुनिकता का संधान सत्तर और अस्सी के दशक में ही करने लगा हो, वह नब्बे के दशक में भारत का अर्ली मॉडर्न खोजने वाली इतिहासकार मण्डली का पूर्वर्ती है. जो व्यक्ति १९६१ सामाजिक आधार पर भाषा के विकास की जांच-पड़ताल करने का आग्रह करता हुआ ‘भाषा और समाज’ जैसी विराट पुस्तक लिख रहा था, वह सत्तर के दशक में स्थापित सोशल लिंग्विस्टिक्स की प्रतिष्ठा का पूर्वर्ती है… उनकी कल्पनाशीलता मुख्य तौर पर भारतीय साहित्य और मार्क्सवाद के अध्ययन के जरिये संशोधित हुई थी… वे भारतीय राष्ट्रवाद के सकारात्मक पहलुओं को उभारने वाले ऐसे विद्वान थे जिनकी समीक्षाओं में मार्क्सवाद और राष्ट्रवाद का संश्रय उभरता है. वे तीसरी दुनिया की उन सबसे चमकदार प्रतिभाओं में से एक थे जिन्होंने मार्क्सवाद को युरोकेंद्रियता से मुक्त करके न केवल भारत और हिंदी क्षेत्र के लिए अपना बनाने का कठिन उद्यम किया; पश्चिम और अंग्रेजी की कथित श्रेष्ठता और दंभ से पूरी तरह मुक्त बौद्धिकता का संधान किया; और सबसे अलग और सबसे उपर उठते हुए उन्होंने अपने अहर्निश रचनाकर्म सेदुनिया के सामने चुनौती फेंकी की विचारधारा कोई भी हो, पर पूर्व का ज्ञान प्राप्त करने के लिए पश्चिम की जमीन से हट कर पूर्व की धरती पर कदम रखना होगा” @ अभय कुमार दुबे
यह वर्ष रामविलास शर्मा का जन्म-शताब्दी वर्ष है. प्रस्तुत है प्रणय कृष्ण का यह पूर्वप्रकाशित लेख, प्रणय कृष्ण का यह लेख रामविलास जी के मृत्युपर्यंत उस समय लिखा गया था, जब कुछ आलोचक रामविलास जी की प्रायोजित आलोचना में संलग्न थे. प्रायोजित पत्रिका-विशेषांक के द्वारा बहस को भटकाने की भरसक कोशिश की गयी थी. प्रस्तुत लेख के बहाने उस समय की प्रायोजित ‘बहसों’ से साक्षात्कार संभव होता है, साथ ही फैलाए गए धुंध को छांटने में भी मदद मिलती है. )

By प्रणय कृष्ण

अक्षरपर्व’ नाम की पत्रिका ने रामविलास जी की मृत्यु के एक-डेढ़ वर्ष पहले तमाम लेखकों-बुद्धिजीवियों को एक प्रश्नतालिका भेज कर उत्तर मंगाए थे। रामविलास जी ने उत्तर न देकर दो-चार पंक्तियों का एक पत्र संपादकों को भेजा जिसमें उन्होंने उस प्रश्न पर एतराज जताया जिसमें भारत की एक हजार साल की गुलामी का जिक्र था। रामविलास जी ने साफ कहा था कि मध्यकाल को वे गुलामी का काल नहीं मानते। जाहिर है उन्होंने प्रश्नतालिका को जवाब देने योग्य न मानते हुए भी उक्त प्रश्न में निहित घातक और गलत इतिहासदृष्टि से एतराज जताना जरूरी समझा। सन् 1999 में कल के लिए’ नामक पत्रिका में दिए गए इन्टरव्यू में रामविलास जी कहते हैं ‘‘मुख्य रूप से इस समय सबसे ज्यादा खतरा हिन्दू सम्प्रदायवाद से है। अमरीका भारत जैसे देश में, तीसरी दुनिया के देशों मेंसिर्फ योजनाओं और उद्योगों से आगे नहीं बढ़ सकता उसको सम्प्रदायवाद की छत्रछाया चाहिए। अमरीका भाजपा का ज़्यादा भरोसा करेगा  कांग्रेस का कम करेगा…तो भारत में फासिज्म का खतरा किस रूप में आएगायह कहना तो बड़ा मुश्किल हैलेकिन जिस रूप में भी आएगावह अमरीका के इशारे के बिना नहीं आ सकता….जो भारतीय फासिज्म है और जो यूरोप का फासिज्म हैहत्या आतंक के दांव पेंच में दोनों में कोई फर्क नहीं है. झूठ बोलने में दोनों में कोई फर्क नहीं है। जो अभियोग इन पर लगाया जा सकता है उससे पहले ही वो दूसरों पर लगा देते हैं। हमने ईसाइयों को मारा इसलिए कि तुमने ईसाइयों को बढ़ावा दिया। इस तरह के दांव-पेंच जैसा कि वहां उन्होंने निशाना यहूदियों को बनाया था कि यहूदी जर्मनी के पतन का मुख्य कारण हैंजैसे यहां के ईसाइयोंमुसलमानों या गैर-हिन्दुओं को पतन का मुख्य कारण बताते हैंयह दोनों में फर्क है।… भाजपा  चाहे जितना मुसलमान का विरोध करेईसाई का विरोध करे, उसका मुख्य शत्रु वामपक्ष हैउन्हें समाजवादियों को समाप्त करना है, यह दोनों की समान धारणा है।’’( आज के सवाल और मार्क्सवाद) जाहिर है कि उपरोक्त लम्बा उद्धरण रामविलास जी के उन्हीं साक्षात्कारों में से एक से दिया गया है जो उन्होंने साम्प्रदायिकता और भाजपा के खिलाफ उसी ‘अन्तिम दशक’ में दिए थे जिसमें प्रकाशित उनकी “प्रायः सभी पुस्तकें ऋग्वेद से शुरू होती हैं।” (नामवर सिंह) यदि यह मान भी लिया जाए कि उनकी इन पुस्तकों की स्थापनाएं ‘‘संघ परिवार के फासिस्ट इरादों को एक हथियार प्रदान कर रही हैं’’ (ना. सि.),तो भी यह मानने का कोई कारण नहीं है कि पाठकों के हाथ रामविलास जी की उक्त पुस्तकें ही लगेंगी और फासीवाद के बारे में उनके निभ्रांत साक्षात्कार किसी जादूगरी से गायब हो जाएंगे। बहरहाल यदि इस बात को भुला दिया जाए कि ऋग्वेद और आर्यों के बारे में रामविलास जी का अध्ययन इहलौकिक और भौतिकवादी दृष्टिकोण से किया गया है (और संसार में कोई प्राच्यवादी ऐसा नहीं करता)तो भी यह कैसे नजरअन्दाज किया जा सकता है कि उन्होंने आर्यों को नस्ल मानने से इनकार किया है  । न केवल अपने विद्वतापूर्ण अध्ययन में बल्कि विकृत करके पांचजन्य (फरवरी सन् 2000) में छापे गए उनके ‘विवादास्पद’साक्षात्कार में भी वे कहते हैं कि ‘‘वर्तमान कुरूक्षेत्र मेंसरस्वती नदी के तट परप्राचीन काल में भरतजन रहते थे। इनके कवियों ने ऋग्वेद के सूत्र रचे थे। दासों से भिन्न उन्होंने स्वाधीन गृहस्थों के लिए आर्य शब्द का व्यवहार किया था । पाश्चात्य विद्वानों ने इस शब्द का व्यवहार  विशेष रंग रूप और शारीरिक गठन वाले मानव समुदाय (Race- नस्ल) के लिए किया। ऐसा कोई मानव समुदाय   भारत में नहीं था। महाकाव्यों के दो नायक राम और कृष्ण अपने श्याम वर्ण के लिए प्रसिद्ध थे। इससे गोरी आर्य नस्ल की धारणा खंडित हो जाती है।’’( आज के सवाल और मार्क्सवाद) जाहिर है कि रामविलास जी की उपरोक्त धारणा कोसाम्बी से लेकर रोमिला थापर तक सभी भौतिकवादी इतिहासकारों से मेल खाती हैजिन्होंने आर्यों को नस्ल न मानकर जन अथवा भाषाई समुदाय प्रमाणित किया है। रामविलास जी का यह कैसा अन्धराष्ट्रवादी प्राच्यवाद’ है जो नस्लीय श्रेष्ठता और रक्त शुद्धता के उस मूलभूत विचार को ही पंगु बना देता है जिसके बगैर किसी भी जर्मनइटैलियन अथवा भारतीय फासिस्ट के लिए आर्यों का मूलस्थान उनके देश में होना सारहीन अन्तर्वस्तु रहित तथ्य मात्र रह जाता है। यहां यह याद दिलाना अप्रासंगिक न होगा कि हेडगेवार के गुरू बीएस. मुंजे, (जो मुसोलिनी से मिलकर भी आए थे), से लेकर एम. एस. गोलवरकर तक ( जिन्होंने हिटलर के जातीय सफाए के माडल की महिमा गाई और उसे अपना एजेंडा भी बनाया)  फासीवाद व नाजीवाद के नस्लीय श्रेष्ठता और रक्त-शुद्धता के प्रतिमानों के भारी प्रसंशक थे। उन्हें सिर्फ ऋग्वेद के प्राचीनतम होने और आर्यों का मूलस्थान भारत होने से संतोष न था। रामविलास जी के आर्य तो वैसे भी इस तरह रहते हैं कि “उनका पूरा समाज योगियों का ऐसा अखाड़ा मालूम होता है जो हर समय कविता करनेगीत गाने और आग जलाकर नाचने में मग्न रहता था। ‘‘(ना. सिं.) रामविलास जी का यह कैसा आक्रामक प्राच्यवाद है जिसके मूल प्रेरणास्त्रोत अर्थात आर्य इतने अनाक्रमक हैं कि ‘‘अश्वों के लिए प्रसिद्ध आर्यों की दुनिया में दिग्विजय के अश्व हिनहिनाते दिखें।’’( ना.सि.) ये कैसे सभ्यता प्रसारक हैं जो तलवार और घोड़ों को त्याग महज कविता करने और गीत गाने में मगन रहे और इनकी सभ्यता का प्रसार भाषा तत्वों के निर्यात की मार्फत व्यापार मार्गों से होता रहा। क्या हिटलरमुसोलिनीगोलवरकर ऐसे आर्योंऐसी सभ्यता और उसके प्रसार के ऐसे अहिंसक तरीकों को जरा भी बर्दाश्त कर पाते?क्या मैक्समूलर और दयानंद भी इस आर्य-मीमांसा से अपना तुक ताल बैठा पाते?क्या वे तमाम मूलतत्ववादी जो वेदों को अपौरूषेय मानते हैं वे रामविलास जी द्वारा वेदों को इंसानों की रचना बताए जाने से अधिक ताकतवर महसूस करेंगे?उपरोक्त प्रकरण में आर्यों को नस्ल न माननामध्यकाल को गुलामी का काल न मानना और आज की तारीख में अमरीकी साम्राज्यवाद की शह पर पनपते भाजपाई फासीवाद के बारे में  रामविलास शर्मा के दो टूक विचारों का उल्लेख मात्र इसलिए किया गया है कि मोटे तौर पर संघ परिवार और रामविलास शर्मा की इतिहासदृष्टि के बुनियादी फर्क को रेखांकित किया जा सकेजिसे रामविलास जी के सामान्य पाठक भी  ‘आलोचना के रामविलास अंक’ के बावजूद आसानी से समझते हैं। जाहिर है कि अब तक तो कुछ कहा गया, वह रामविलास जी की धारणाओं को वैध ठहराने के लिए अथवा विरासत के प्रति अंधश्रद्धा जगाने के लिए नहीं बल्कि अपनी विरासत के प्रति ज्यादा उत्तरदायित्वपूर्ण रवैया विकसित करने की मांग से प्रेरित है। इसके बावजूद भी यदि किसी को यह भय सता ही रहा हो कि रामविलास जी का कृतित्व संघ परिवार के फासिस्ट इरादों को हथियार प्रदान कर सकता है तो यह देखना चाहिए कि कहीं रामविलास के उत्तराधिकारी इतने नालायकपुंसत्वहीन और बंजर तो नहीं है कि अपनी विरासत को खुद ही दुश्मनों को सौंपने को तैयार बैठे हों। जाहिर है कि ‘बंदर के हाथ उस्तरा   देने से भी खतरनाक’ (ना. सिं.) यह नालायकियत ही होगी ।

          आलोचना का रामविलास शर्मा अंक रामविलास जी के कृतित्व का कितना भी तीखा पुनर्मूल्यांकन करताउसमें एतराज की कोई बात न होती। लेकिन इस अंक में कहीं प्रत्यक्ष तो कहीं परोक्ष रूप से रामविलास शर्मा के उद्देश्य(Motive) को ही संदिग्ध बताया गया है। कहीं सीधे-सीधे ही उन्हें वर्णव्यवस्था का पोषकप्रच्छन्न हिंदुत्ववादीअंधराष्ट्रवादी प्राच्यवाद का प्रचारक अथवा फंडामेंटलिस्ट कहा गया हैतो कहीं यही बातें आरोपों की शक्ल में नहीं बल्कि इशारतनकही गई हैं जिसे अंग्रेजी में   Insinuation  कहते हैं। ऐसा नहीं कि रामविलास जी के जीते-जी उनकी आलोचना न होती रही होलेकिन तब उनकी आलोचना का दायरा बहुत स्पष्ट था। शायद ही कभी उनके सबसे तीखे आलोचकों ने भी उनके कृतित्व में कोई Hidden Agenda ( गुप्त एजेंडा) खोजा हो। पहले भी उनकी इतिहासदृष्टिहिंदी जाति की अवधारणापरंपरा का मूल्यांकनहिंदी नवजागरण संबंधी विचार और उनकी आलोचना पद्धति से लोग न केवल असहमत रहते आए हैं, बल्कि   खुलकर उनकी आलोचना  भी होती रही है। इतिहासकारों ने उनके इतिहास संबंधी लेखन को पहले भी गंभीरता से नहीं लिया है क्योंकि उनके अनुसार रामविलास जी उन उपकरणों का इस्तेमाल नहीं करते जो इतिहास के अनुशासन के लिए जरूरी हैं। इसी तरह उनके भाषा संबंधी अध्ययन भी विवादास्पद रहे हैं। उनके मार्क्सवाद पर आर्यसमाज और राष्ट्रवाद की छायाएं पहले भी देखी गईं थीं। लेकिन उनके अधिकांश आलोचकों ने उनसे यह मानकर ही वाद-विवाद चलाया कि वे एक मार्क्सवादी प्रस्थान बिंदु से काम कर रहे अध्येता से सही विचारों के लिए संघर्षरत हैं। कम्युनिस्ट पार्टी और वामपंथी विचारधारा से अपना लेखकीय कैरियर शुरू करने वाले नरेश मेहता से लेकर निर्मल वर्मा तक ऐसे बड़े हिंदी लेखकों की कोई कमी नहीं रही है जिन्होंने खुले तौर पर दक्षिणपंथ की ओर पाला बदल लिया। प्रसंगवश इन दो ज्ञानपीठ विजेताओं का ही उल्लेख काफी है। ऐसे में रामविलास शर्मा की क्या मजबूरी थी कि उन्हें अपने फंडामेंटलिज्मअंधराष्ट्रवादप्राच्यवादहिंदुत्ववर्णव्यवस्था के पोषण आदि के लिए मार्क्सवाद के आवरण की जरूरत अंत-अंत तक पड़ती रहीखासकर ऐसे समय में जब सोवियत संघ का पतन हो चुका था और भारत की केंद्रीय सत्ता हिंदुत्ववादियों के हाथ में उनके जीते जी आ चुकी थी? ‘आलोचना के रामविलास अंक’ में इतना जनतंत्र है कि हर तरह की विचारधारा रखने वाले और विचारधाराविहीन लोगों को भी खुली छूट है कि वे उस व्यक्ति के साथ जो चाहें सो करें जिसकी बरसी पर यह अंक निकाला गया। संपादकीय निरपेक्षता का ऐसा अनुपम उदाहरण भला और कहां मिलेगा?  कहते हैं कि कबीर के फूल के लिए उनके हिंदू और मुस्लिम अनुनायियों में झगड़ा हुआ था लेकिन (कुछ लेखों को छोड़ दिया जाए तो) यहां शव के अंग-भंग के लिए एक सर्वानुमति हैमानो मूल चिंता यह हो कि साबुत और अविकृत देह कोई न देख पाए। सबके अपने-अपने रामविलास हैं जिन्हें सबने अपने-अपने एजेंडा को बढ़ाने के लिए नकारात्मक रूप से आविष्कृत किया है। विस्तार-भय से हम यहां ऐसे ही कुछ चुनिंदा लेखों पर विचार करेंगे जिनमें यह प्रवृत्ति घनीभूत हैं।

          टीका-कुंकुमवादी आलोचक वागीश शुक्ल को इस बात का रंज है कि रामविलास शम्बूक वध पर नाराज  क्यों हैं और क्यों ब्रह्मज्ञान पर द्विजों के अधिकार के समर्थक होने के कारण वे कालिदास को लताड़ते हैं। वागीश शम्बूक वध का औचित्य सिद्ध करते हुए बड़े परिश्रम से यह बताते हैं कि शम्बूक सशरीर स्वर्ग जाने की इच्छा के कारण दण्डित किया गया और राम के पूर्वज त्रिशंकु को भी इसी कारण दंड दण्ड मिला था। यह अलग बात है कि जिस  अपराध के लिए  शबूक का वध किया गया,उसी अपराध के लिए  त्रिशंकु को वही दण्ड क्यों नहीं मिला, यह बताना वागीश जरूरी नहीं समझते। पूरी नंगई के साथ जघन्यतम ब्राह्मणवाद का समर्थन करते हुए वागीश लिखते हैं ‘‘यहां किसी ऐसी अनाधिकार चेष्टा का दण्ड दिया गया है जिसके विचार और निर्णय में शम्बूक और त्रिशंकु का भेद नहीं है।’’रामविलास पर आरोप यह है कि कलियुग में सभी वर्णों को तपश्चर्या की अनुमति देने वाली वर्ण-व्यवस्था के सामंतवाद को वे इतनी हिकारत से क्यों देखते हैं। भवभूति के उत्तररामचरित के प्रसंग में रामविलास जी ने एक उद्धरण दिया है जिसमें सीता-वनवास के बाद माता कौशल्या द्वारा 12 वर्ष तक पुत्र राम  का मुंह न देखने का उल्लेख है। बाल की खाल निकालने की शैली में वागीश शुक्ल यह साबित करते हैं कि कौशल्या महज यह कहती हैं कि जिस अयोध्या में उनकी बहू नहीं है उसमें वे नहीं लौटेगी। जबकि वागीश स्वयं कंचुकी नामक पात्र के उस कथन को उद्धृत करते हैं जिसमें वह कहता है- ‘‘हे राजर्षि जनक! जिन कौशल्या देवी ने एक जमाने से राम का मुंह देखना बंद कर रखा हैउन बेहद दुःख में डूबी को ऐसे ही गुस्से से आप और दुखी न करिएगा।’’शम्बूकवध की ही तरह सीता परित्याग के औचित्य की स्थापना में तत्पर वागीश बहुत परिश्रम करके भी यह नहीं बता पाते कि सीताविहीन अयोध्या में न जाने का कौशल्या का प्रण और राम का मुंह न देखने का प्रसंग असंबद्ध कैसे है?क्या अयोध्या के सीताविहीन हो जाने के पीछे राम के अलावा कोई अन्य जिम्मेदार था?यदि रामविलास जी कंचुकी के कथन से यह निष्कर्ष निकालते हैं कि जिस हृदयहीन व्यवस्था के तहत राम, सीता को वनवास देते हैं कौशल्या का प्रण उसी व्यवस्था के खिलाफ आक्रोश हैतो यह असंगत व्याख्या कैसे है? वास्तव में वागीश शुक्ल को सीता परित्याग से लेकर शम्बूक वध तक, सबकुछ औचित्यपूर्ण प्रमाणित करना है और रामविलास की व्याख्या इसमें आड़े आती है। वागीश की विचारधारा को उन लोगों से कोई खतरा नहीं है जो वाल्मीकिभवभूति अथवा कालिदास के साहित्य को पुराणपंथी समझकर खारिज कर देते हैंन ही उनसे जिनके लिए वह पूज्य-पवित्र वस्तु है जिसे अंधे होकर ही पढ़ा जा सकता है। रामविलास शर्मा दरअसल उन क्षेत्रों में भी बेधड़क घुस जाते हैंउन अंतर्विरोधों पर से भी पर्दा हटा देते हैं जिन्हें ढांकने में टीकावादियों को सदियों तक परिश्रम करना पड़ा है। इतना ही नहींबल्कि उनका द्वन्द्ववाद इन निषिद्ध क्षेत्रों से भी जो सार्थक है उसे खींच लाता हैहालांकि कभी-कभी अतिरिक्त भी। इसी तरह रामविलास परंपरा का इहलौकीकरण और विवेकीकरण करते हैं और इसीलिए वे वागीश जैसों के लिए खतरनाक भी हैं।

उधर तुलसीराम रामविलास शर्मा के प्रच्छन्न हिन्दुत्व का लम्बा विवेचन करते हुए इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि ‘‘ब्राम्हण होने की मजबूरी से वे रामविलास निरन्तर ग्रसित हैं,इसलिए तथ्यों को तोड़ना उनकी वैदिक विरासत है।’’एक जमाने में हिन्दू धर्मशास्त्रवैदिक व अन्य संस्कृत ग्रन्थों का पठन-पाठन और उनकी व्याख्या ब्राम्हणों का विशेषाधिकार था। आज एक उलट ब्राम्हणवाद दलितवाद के नाम पर बुद्धकबीरफुलेअम्बेडकर तथा निम्न कही जाने वाली जातियों में पैदा हुए महापुरूषों की विरासत की व्याख्या विशेषाधिकार स्वरूप अपने पास सुरक्षित रखना चाहता है। डा. अम्बेडकर ने ब्राम्हणवाद के गढ़ में घुसकर पवित्र ग्रन्थों की पोल खोलना आजीवन जारी रखा था। शूद्रों की खोज’ नामक ग्रन्थ की प्रस्तावना में उन्होंने लिखा ‘‘यदि यह मान लिया जाए कि शूद्रों का विषय अन्वेषणीय है तो क्या यह पूछा जा सकता है कि मुझको अन्वेषण का अधिकार है या नहीं?कुछ लोगों ने मुझे चेतावनी  दी है कि मैं हिंदुओं के इतिहास और विधान में दखल न दूं। क्यों?यदि यह कहा जाय कि मैं संस्कृत का पण्डित नहीं तो मैं मानने को तैयार हूं परन्तु संस्कृत के पण्डित न होने से मैं इस विषय पर लिख क्यों नहीं सकता? संस्कृत का बहुत थोड़ा अंश है जो अंग्रेजी भाषा में उपलब्ध नहीं है।’’इस उद्धरण को देने की आवश्यकता इसलिए पड़ी क्योंकि ज्ञान के क्षेत्र में विशेषाधिकार को चुनौती देने की जगह अम्बेडकर के बहुत से अनुयायी दलित-श्रमण परंपरा पर किसी भी जन्मना ब्राम्हण के अध्ययन को जन्मजात पूर्वाग्रही घोषित करने में ब्राम्हणवाद को भी मात दे रहे हैं। तुलसीराम जी यदि रामविलास शर्मा की आलोचना इस बात के लिए करते हैं कि वे आर्य वैदिक संस्कृत शास्त्रीय परंपरा से अनार्य-अवैदिक-पालि-प्राकृत-लोक परंपरा को मूलतः परस्पर विरोधी न मानकर एक ही परंपरा की खोज की मार्फत नामवर सिंह ने रामविलास जी से यह बहस दशकों पहले ही छेड़ दी थी। लेकिन इस निष्कर्ष तक वे नहीं पहुंचे थे कि रामविलास ने यह सब सचेत रूप से षड्यंत्रपूर्वक ब्राम्हणों के महिमामण्डनवर्णव्यवस्था के औचित्य स्थापन और हिंदुत्व की श्रेष्ठता को स्थापित करने के लिए किया था। ऐसा नहीं है कि ब्राह्मण षड्यंत्र की इस नवब्राम्हणवादी-दलितवादी सैद्धान्तिकी की मार से दूसरी परंपरा वाले बच गए हों। आखिर कबीर के बहाने धर्मवीर के निशाने पर उसी दूसरी परंपरा के अनुयायी हजारी प्रसाद द्विवेदी ही तो हैं। इसके लिए उनका जन्मना ब्राह्मण होना पर्याप्त थाउनके सारे किए धरे की व्याख्या इस एक तथ्य से हो जाती है। तुलसीराम जी यदि तथ्यात्मक आधार पर रामविलास शर्मा की इस स्थापना को खारिज करते हैं कि अंग्रेजों के शासन काल में वर्णव्यवस्था ज्यादा सुदृढ़ हुईतो बहुतेरे लोग उनकी बातों के वस्तुपरक विवेचन के लिए प्रस्तुत रहते। लेकिन जब उसी सांस में तुलसीराम जी यह निष्कर्ष निकाल बैठते हैं कि रामविलास जी की निगाह में वर्णव्यवस्था की कट्टरता के लिए ब्राह्मण दोषी नहीं थे’ तब वे पढ़ने वालों को निपट मूर्ख ही मान रहे होते हैं। यदि रामविलास शर्मा जाति प्रथा को सामंतवाद की देन कहते हैं और तुलसीराम इसमें ब्राह्मणों का दोष सामंतवाद के मत्थे कहते हैं तो तुलसीराम जी सर्वाधिक प्रसन्न तब होंगे जब वर्ण व्यवस्था ही नहीं बल्कि समूची सृष्टि को ही ब्राम्हणों की साजिश मान लिया जाए। कहना न होगा कि वर्णव्यवस्था संबंधी विवेचन में इतिहासअर्थव्यवस्था और सत्ता विमर्श के सारे संदर्भों को त्याग करके महज षडयंत्र के सिद्धांत पर आश्रित हो जाने की सलाह अम्बेडकर ने किसी को न दी थी। तुलसीराम अच्छी तरह जानते हैं कि रामविलास के विपुल लेखन में एक भी पंक्ति ऐसी खोज पाना असंभव है जिसमें वर्ण व्यवस्था का समर्थन किया गया होउल्टे वर्णव्यवस्था और पुरोहित वर्ग के विरूद्ध सैकड़ों उद्धरण मिल जाएंगे। ऐसे उद्धरण तुलसीराम द्वारा रामविलास को किसी भी तरह से वर्णव्यवस्थावादी सिद्ध करने के मार्ग में भारी बाधा उत्पन्न करते हैं। रामविलास की वर्णव्यवस्था विरोधीपुरोहितवाद विरोधी स्थापनाओं को भी तुलसीराम जी उनकी कुटिलता मानते हैं। रामविलास की वर्णव्यवस्था विरोधीपुरोहितवाद विरोधी स्थापनाओं को भी तुलसीराम जी उनकी कुटिलता मानते हैं। रामविलास की उक्त स्थापनाओं के लम्बे उद्धरण देने की ईमानदारी बरतने के बाद वे कुछ इस शैली में उसकी व्याख्या करते हैं… वे चाणक्य की शैली के ब्राम्हण हैं तथा उस पर प्रगतिशील। उन्होंने इस बात पर विशेष ध्यान दिया है कि कहीं इस ठप्पे की सुर्ख स्याही पुरोहितों के कमण्डल के गंगाजल से धुल न जाएवे उनके विरूद्ध कुछ यथार्थ भी उगल देते हैंवह भी विरोधाभास के साथ।‘‘महाभारत में विश्वामित्र द्वारा चाण्डाल के घर से भूख के कारण कुत्ते का मांस चुराने की घटना का उल्लेख यदि रामविलास जी करते हैं तो वहां भी तुलसीराम जी को षडयंत्र ही नजर आता है। तुलसीराम के अनुसार रामविलास इस घटना का उल्लेख महज इसलिए करते हैं ताकि यह साबित कर सकें कि वर्णव्यवस्था का क्रूर रूप नहीं था। रामविलास शर्मा लिखते हैं- ‘‘पुरोहित वर्ग ने भारतीय संस्कृति के स्रोत ग्रन्थों पर अधिकार कियासामान्य जनता को उनके अध्ययन से वंचित रखा। वेदों को कर्मकांड का ग्रन्थ बनाकर उन्हें पैसा कमाने का साधन बनायासमाज में ऊंच-नीच के भेदभाव को स्थाई बनाने के लिए उनका उपयोग किया।’’रामविलास शर्मा यदि गौतम बुद्ध की विचारधारा को भारत और विश्व के लिए कोसल और मगध के प्राचीन जनपदों की महत्वपूर्ण देन बताते हैं तो इसमें भी तुलसीराम को ‘बौद्धिक धोखाधड़ी’ही दिखाई पड़ती हैक्योंकि रामविलास इन जनपदों और सभी बौद्ध-स्थलों का संबंध उनके अनुसार ऋग्वेद से जोड़ते हैं। तुलसीराम को यह दुःख है कि गौतम बुद्ध की विचारधारा का श्रेय वे खुद गौतम बुद्ध को न देकर वैदिक जनपदों को देते हैं। तुलसीराम जी की इस महान अर्थमीमांसा पर यदि विश्वास करें तो बुद्ध ही नहीं तमाम महामानवों को किसी जनपदकिसी इतिहास अथवा किसी समाज की पैदाइश न मानकर  उन्हें हवा से उत्पन्न स्वयंभू जीव मानना पड़ेगा। आश्चर्य की बात है कि बुद्ध और अम्बेडकर को रामविलास शर्मा जहां भी उद्धृत करते हैं वहां एकाध जगह को छोड़ कर तुलसीराम यह साबित नहीं कर पाते कि उन्होंने गलत उद्धरण दिए हैं। तुलसीराम इन उद्धरणों की अपनी व्याख्या करते हैं और रामविलास शर्मा को इस बात के लिए लताड़ते हैं कि उक्त प्रसंगों की उन्होंने तुलसीराम जैसी व्याख्या क्यों नहीं की जबकि रामविलास के यहां उद्धरण एक तर्कप्रणाली के अंगरूप में आते हैं जिनकी अलग से व्याख्या करने की जरूरत नहीं पड़ती। अम्बेडकर की लिखी शूद्र तथा प्रतिक्रान्ति’ नामक 21 पृष्ठ की पाण्डुलिपि में की गई टिप्पणियों को यदि रामविलास आर्यों के मूलस्थान भारत में होने के अपने निष्कर्ष के समर्थन में उद्धृत करते हैं तो तुलसी राम जी को कोफ़्त होती है। वे अम्बेडकर की लिखी बातों को काट नहीं सकते,इसलिए सलाह देते हैं कि चूंकि आर्यों के मूलस्थान संबंधी प्रश्न अम्बेडकर की चिंता का केन्द्रीय प्रश्न नहीं था लिहाजा इस संदर्भ  में अंबेडकर को उद्धृत करना ही रामविलास की धूर्तता है। आर्य कोई नस्ल नहीं थे बल्कि जनसमुदाय थे तथा आर्यों तथा दस्युओं का भेद नस्ल का न होकर आचार और संस्कृति का था- ऐसी बातें अम्बेडकर के लेखन से जब रामविलास जी निकालते हैं तो तुलसीराम के क्रोध की कोई सीमा नहीं रहती । ऐसे उद्धरणों को वे अम्बेडकर वाड्मय से तो निकलवा नहीं सकते लिहाजा रामविलास के साथ गाली-गलौज करना ही उनके लिए सुविधाजनक पड़ता है। आर्य कोई नस्ल नहीं थे- इस धारणा का जो उद्धरण रामविलास जी अम्बेडकर के हवाले से देते हैं कि जिसके बातें अम्बेडकर की न होकर सातवलेकर की हैं जिसके बारे में फुटनोट में अम्बेडकर ने इंगित करते हुए कहा है कि पूर्ण जानकारी के लिए सातवलेकर द्वारा की गई प्रतिभाशाली बहस को देखें। महत्वपूर्ण यह है कि अम्बेडकर यहां सातवलेकर से कोई असहमति व्यक्त नहीं करते बल्कि उक्त बहस को प्रतिभाशाली भी कहते हैं और तुलसीराम द्वारा तकनीकी मुद्दा उठाए जाने के बावजूद यह तथ्य रह जाता है कि आर्यों के नस्ल न होने की बात को अम्बेडकर विचारणीय मानकर अपने चिन्तन में स्थान देते हैं। तुलसीराम को यदि यह बात गलत लगती है तो उसे रामविलास की बौद्धिक धोखाधड़ी बताने की जगह बेहतर यह होता कि वे यह कहने का साहस जुटा पाते कि ‘यदि अम्बेडकर ने कहा है,तो भी गलत है’।आर्यों को नस्ल सिद्ध करने की हताश कोशिश में वे रिडल्स आफ हिंदुइज्म’ से एक-दो वाक्य बड़ी मेहनत से निकालकर लाते हैं जहां अम्बेडकर ने आर्यों को नस्ल कहकर संबोधित किया है। संघ परिवार के कुत्सा अभियान की चिन्ता से दुबले हो रहे तुलसीराम यहां आसानी से भूल जाते हैं कि आर्यों को नस्ल साबित करना हर तरह के फासिस्टों और संघ परिवार के लिए जीवन-मरण का प्रश्न है। तुलसीराम के मनोगतवाद के सामने ऐतिहासिक तथ्यात्मकता और वस्तुपरक कथन साजिश मात्र हैं। कबीर साहित्य के प्रभूत अंतःसाक्ष्य यदि उन पर वैष्णव और वेदान्ती प्रभाव सूचित करते हैं तो यह अपराध कबीर का ही हो सकता है न कि उनके अध्येताओं का। लेकिन यहां भी तुलसीराम की जिद है कि कबीर खुद चाहे जो कहेंरामविलास को उन पर प्रत्यक्ष बौद्ध प्रभाव दिखलाना चाहिए था और ऐसा न करके उन्होंने ब्राम्हणवादी होने का परिचय दिया। यदि थोड़ी सी ऐतिहासकिता चेतना का स्पर्श तुलसीराम जी को मिला होता तो खुद वेदांत और वैष्णव अहिंसा पर बौद्ध प्रभाव दिखलाकर वे कबीर को दूसरी परंपरा में अवस्थित कर सकते थे। डा. अम्बेडकर द्वारा बौद्ध धर्म ग्रहण करने के लिए धर्मपरिवर्तन शब्द का इस्तेमाल करने पर तुलसीराम बिगड़ खड़े होते हैं और तर्क देते हैं कि चूंकि बौद्ध धर्म भारतीय हैअतः इसे धर्म परिवर्तन के मुद्दे पर कुत्सा अभियान संचालित करता है। दूसरी ओर भारतीयता के तर्क से संघ परिवार बौद्ध धर्म को हिंदुत्व के भीतर ही अन्तर्मुक्त कर लेता है। तुलसीराम को पुण्यभूमि और पितृभूमि वाली सावरकर की अवधारणाओं को याद कर लेना चाहिए था। अभी हाल ही में श्री रामराज द्वारा दलितों को सामूहिक तौर पर बौद्ध धर्म में दीक्षित करने के लिए दिल्ली में एक विराट सम्मेलन आयोजित किया गया था। शुरू में बौद्ध धर्म की भारतीयता के तर्क से संघ परिवार ने इसका कोई विरोध नहीं किया लेकिन जैसे ही उन्हें पता चला कि उस सम्मेलन को ईसाई मिशनरी भी संबोधित करेंगेउन्होंने भारी हंगामा मचाकर इसे प्रतिबंधित करा दिया।

          निष्कर्षतः तुलसीराम जी चले तो थे रामविलास के प्रच्छन्न हिंदुत्व और ब्राह्मणवाद की पोल खोलने लेकिन कुल मिलाकर उनकी द्वन्द्ववादी ऐतिहासिक पद्धति पर ही अनवरत प्रहार करते-करते अपने ही असमाधेय अंतर्विरोधों में फंसे दिखाई देते हैं।

          पूरन चंद्र जोशी मार्क्सवादी विमर्श में गांधी का बड़े पैमाने परकहना चाहिए कि लगभग विचारधारा के स्तर पर पुनर्वास चाहते हैं। रामविलास जी की सन् 2000 में प्रकाशित  पुस्तक ‘गांधीअम्बेडकरलोहिया और भारतीय इतिहास की समस्याएं’ में रामविलास शर्मा की कोशिश है कि इन तीनों की विरासत के प्रगतिशील तत्वों को मार्क्सवादी विमर्श में अपना लिया जाए। रामविलास जी गांधी की क्रांतिकारी विरासत का दावेदार मजदूर वर्ग के दलों को बताते हैं। जोशी जी यह कहते है कि दशकों से चले आ रहे गांधी के बारे में मार्क्सवादियों के मूल्यांकन के बारे में उल्लेख किए बगैर रामविलास जी ने मार्क्सवादी विवेचन द्वारा गांधी के बारे में संशोधन किया है। बेहतर होता कि मार्क्सवादियों द्वारा गांधी के मूल्यांकन की लम्बी परंपरा में जोशी जी स्वयं उतरते और खुद रामविलास जी द्वारा अतीत में गांधी के प्रति रुख का भी विवेचन करते। ऐसा करने से ही वास्तव में उन परिस्थितयों पर प्रकाश पड़ता जिनके कारण 90 के दशक में गांधी-गांधी की गुहार वामपंथी हलकों में भी जोर-शोर से सुनाई देने लगी। वास्तव में गांधी-वध के लिए उत्तरदायी सांप्रदायिक विचारधारा और राजनीति के तेजी से बढ़ने के चलते ही सेक्युलर राजनीति के लिए गांधी की प्रासंगिकता बढ़ गई। गांधी के साथ-साथ लोहिया और अम्बेडकर पर रामविलास जी ने समसामयिक राजनीति के इन्हीं दबावों के चलते ही विचार किया है क्योंकि साम्प्रदायिकता विरोधी राजनीति के विपक्ष में लोहिया और अम्बेडकर को मानने वाले दल ही हिन्दी क्षेत्र में अगुवाई कर रहे थे। राजनीति में संयुक्त मोर्चा स्थापित करने और निकट अतीत को बेहतर ढंग से समझने के लिए अवश्य ही गांधीअम्बेडकरलोहिया की विरासत मार्क्सवादियों के लिए विचारणीय है। लेकिन विचारधारा एक ही होती है और उसमें समझौते नहीं होते । रामविलास जी यदि गांधी के पूर्व मूल्यांकनों पर खामोश हैं तो कहीं न कहीं वे जानते हैं कि इनते सत्य का अंश भी था। इसलिए वे यह कहना नहीं भूलते कि लोग जिसे गांधीवाद कहते हैं वह गांधी जी के चिंतन का बहुत छोटा सा हिस्सा है और उसके बाहर बहुत कुछ है जो मूल्यवान है। पूरन चंद्र जोशी की तरह रामविलास जी को मार्क्सवादियों द्वारा गांधीवाद के पिछले मूल्यांकनों से यह शिकायत नहीं है कि वे गलत थेबल्कि शिकायत यह है कि गांधी में इससे इतर बहुत कुछ थाजो मूल्यवान है और जिस पर उनका ध्यान नहीं गया। इसी कारण जोशी जी की तरह से गांधी के मूल्यांकन में मार्क्सवादियों की कथित ‘हिमालयी भूलों’को सही कर देने का वैसा विसर्जनवादी उत्साह रामविलास में नहीं दिखता। इसीलिए जोशी जी को यह स्वीकार करना पड़ा है कि रामविलास जी के गांधी-मूल्यांकन मे भी अपूर्णता रह गई हैजिसका संशोधन वे नेल्सन मंडेलाहो ची मिन्ह आदि के उद्धरणों से करते हैं। जोशी जी की गांधी-व्यग्रता हिंदी क्षेत्र में वामपंथ की उसी कमजोरी,पिछलग्गूपन और वर्गसहयोग का परिणाम है जिसके खिलाफ रामविलास ने अन्तिम दशक में भी बहुत कुछ कहा है। वास्तव में रामविलास की गांधी-समीक्षा परंपरा के मूल्यांकन का वैसा ही प्रयास है जैसा वे जीवन भर करते रहे और प्रायः अतिरेकपूर्ण ढंग से,जिसके चलते ही उनके अनुयायियों और विरोधियों दोनों के लिए उनका अन्यथा करण सुलभ रहा।

          रामविलास शर्मा के ‘लोहिया कांड’पर प्रकाश डालने वाले गिरीश मिश्र का भी अपना एजेंडा है। यदि राजनीतिक रूप से सजग पाठ न किया जाए तो यह समझना ही मुश्किल हो जाएगा कि लोहिया के बारे में रामविलास के मूल्यांकन से उनका विरोध कहां और क्यों है। लोहिया के चिंतन का एक बड़ा भाग संघ परिवार को मजबूत करता है,लोहिया ने भूमिसुधारों के लिए संघर्ष नहीं किया, लोहिया अराजकतावादी थे तथा ब्राम्हणवाद विरोध को मुख्य लक्ष्य बनाकर लोहिया ने साम्राज्यवाद और सामंतवाद विरोधी लड़ाई को रोका- रामविलास जी की इन सभी बातों से गिरीश मिश्र जी सहमत हैं। सवाल यह है कि उनकी असहमति कहां है?दरअसल रामविलास से यह बहस संचालित करने के भीतर कार्यनीतिक लाइन की एक अहम बहस संचालित करने के लिए लोहिया के बहाने की क्या जरूरत आन पड़ी। गिरीश मिश्र ने इन शब्दों में अपने अभीष्ठ का खुलासा किया है- ‘‘रामविलास शर्मा भाकपा में उस धारा के साथ थे जो कांग्रेस और साम्राज्यवाद दोनों से लड़ने की बात कहती रही। इसलिए जब लोहिया गैरकांग्रेसवाद को लेकर चलते हैं और पिछड़ी जातियों के नवधनाढ्यों के ऊपर आधारित अपनी नई पार्टी बनाते हैं तथा अंग्रेजी हटाओमूर्ति तोड़ोऔर पिछड़ी जातियों के लिए नौकरियों में 60 प्रतिशत आरक्षण की बात करते हैं तो रामविलास जी का उनकी ओर आकर्षित होना स्वाभाविक है,मंडल का क्षणिक तूफान उन्हें अभिभूत कर देता है जैसे सम्पूर्ण क्रांति’ ने अनेक प्रगतिशील बुद्धिजीवियों के पैर उखाड़ दिए। उनका कांग्रेस विरोध जागा। चलो कांग्रेस गई अच्छा हुआमगर वे नहीं सोचते कि कौन आया उनकी जगहऔर जो आया वह कहां ले जा रहा है देश को’’।कहना न होगा कि रामविलास के कांग्रेसविरोध से चिढ़कर उसे लोहिया के गैर-कांग्रेसवाद का समानार्थी सिद्ध करने के लिए गिरीश मिश्र ने रामविलास का बड़ा ही श्रमसाध्य अन्यथाकरण किया है। गिरीश मिश्र के कथन के उलट रामविलास ने बारंबार पिछड़ी जाति की नवधनाढ्य राजनीति पर चोट की है। आरक्षण और मंडल कमीशन का समर्थन न करने के लिए तथा वर्ग और जाति के अन्तर्संबंधों के बारे में सरलीकृत ढंग से सोचने के लिए उनकी आलोचना भी होती रही है। लेकिन गिरीश जी के लिए इन तथ्यों का कोई महत्व नहीं है क्योंकि उन्हें वामपंथ के कांग्रेस-मोह का औचित्य सिद्ध करना जरूरी है। आइए देखें कि वास्तव में रामविलास पिछड़ी जाति की नवधनाढ्य राजनीतिमंडल कमीशन ने जो रिपोर्ट बनाईउसमें कुछ सामग्री टाटा इंस्टीट्यूट के शोधकर्ताओं की दी हुई थी। कमीशन ने इन शोधकर्ताओं को यह समस्या दी थी कि आरक्षण का इतना विरोध तमिलनाडु में नहीं हुआ जितना उत्तर भारत मेंइसका कारण क्या है?तो उन्होंने एक बहुत खोजपूर्ण बात कही कि पिछड़ी जातियों के लोग ज्यादातर हरिजनों का शोषण करने वाले लोग हैं। इनमें ज्यादातर हरिजनों धनी किसान हैं। ये हरिजनों से बेगार कराते हैं। पुराने तरीकों से उनसे काम लेना चाहते हैं। और वे जब काम नहीं करते तो उन्हें  मारते-पीटते हैंउन्हें जिन्दा जला देते हैं। ये जो आए दिन अछूतों की कहानियांसुनने को मिलती हैं- बलात्कार वगैरह की या जिन्दा जलाकर मार डालने की कहानियां तो ये अत्याचार करने वाले कौन हैं? ये ज्यादातर धनी किसान हैं जो उनकी मेहनत से फायदा तो उठाना चाहते हैं लेकिन उन्हें पगार नहीं देना चाहते।’’(आज के सवाल और मार्क्सवाद पृष्ठ-179) रामविलास आगे कहते हैं ‘‘बहुत से लोग जो सामाजिक न्याय की बात करते हैं,धनी किसानों के वर्ग से आते हैं और उनका स्वार्थ इस बात में हैं कि जाति बिरादरी के नाम पर गरीब किसानों और खेत मजदूरों को विभाजित रखा जाए,इनमें   एकता कायम न हो।’’(वही, पृष्ठ 181)

रहा कांग्रेस के बारे में वामपंथ के रूख का सवाल तो रामविलास न तो अंधकांग्रेस विरोधी हैं और न ही कांग्रेस-भाजपा के प्रति समान दूरी के पैरोकार। रवींद्र त्रिपाठी को दिए एक साक्षात्कार में वे कहते हैं- ‘‘देश की राजनीति में दो ताकतवर सिद्धांत हैं। एक है कांग्रेस और भाजपा को समान शत्रु समझने का और दूसरा है कांग्रेस को मुख्य शत्रु मानकर भाजपा के पास जाने का। डा. लोहिया ने हिंदू धर्म और संस्कृति पर जो कुछ लिखा हैउसका निष्कर्ष यह है कि कांग्रेस को हराने के लिए परोक्ष रूप से साम्राज्यवाद और प्रत्यक्ष रूप से संप्रदायवाद का समर्थन करता है। इसी नीति का अनुकरण करते हुए जार्ज फर्नांडीज वहीं पहुंच गए जहां उन्हें पहुंचना चाहिए था और मुलायम यादव सचेत न रहे तो वे भी उसी मुकाम पर पहुंचेंगे।’’ (वही, पृष्ठ 260-61) उपरोक्त उद्धरणों के आलोक में गिरीश मिश्र की स्थापनाएं और भी अबूझ मालूम देती हैं। रामविलास संभवतः कांग्रेस को वैसी क्लीन चिट’ नहीं देना चाहते जैसी बहुत से वामपंथियों को दरकार है,लेकिन आमतौर पर उनकी धारणा मुख्यधारा की कम्युनिस्ट पार्टियों विशेषकर सी.पी.एम. के कांगेस के प्रति रूख से नजदीक है। आइए देखें कि रामविलास इस बाबत क्या राय रखते हैं- ‘‘कांग्रेस मूलतः औद्योगिक पूंजीवाद की प्रतिनिधि है। यह देश का आर्थिक विकास चाहती है और उसके लिए बड़े पूंजीवादी देशों से आर्थिक सहायता भी लेना चाहती है। उसकी आर्थिक परनिर्भरता का पक्ष है। पहला पक्ष विदेशी पूंजी के विरोध का है और देश के लिए आर्थिक आत्मनिर्भरता चाहता है। दूसरा पक्ष विदेशी पूंजी से समझौता करने का पक्षधर है। यह आर्थिक परनिर्भरता का पक्ष है। कम्युनिस्ट पार्टियों को चाहिए कि कांग्रेस के पहले पक्ष को समर्थन दें और दूसरे  पक्ष का विरोध करें… जिस तरह कांग्रेस कभी-कभार सांप्रदायिक ताकतों के साथ समझौता करती है पर वह मूलतः सांप्रदायिक पार्टी नहीं है. जिस तरह कांग्रेस कभी कभार साम्राज्यवाद से और कभी-कभार सामंतवाद से समझौता करती है उसी तरह कभी-कभार सांप्रदायिकता से।’’(वही, पृष्ठ 259-60) कांग्रेस संबंधी रामविलास जी के मूल्यांकन की समीक्षा का यह अवसर नहीं हैलेकिन कम से कम वे इतना सब कुछ तो नहीं मानते जो गिरीश उनसे मनवाना चाहते हैं।

          रामविलास जी के मूल्यांकन में भले ही दृष्टिकोण की अनेकान्तता और सारसंग्रहवाद आलोचना के रामविलास अंक में दिखाई देता हो लेकिन केन्द्रीय बात भी एक है- वह है उनका इतिहास लेखन और परंपरा का मूल्यांकनजिसके आधार पर उनके उद्देश्यों को संदिग्ध बताया गया है। यह मानने में शायद बहुत आपत्ति नहीं है कि वे न तो पेशेवर इतिहासकार हैं और न ही इतिहासलेखन की अद्यतन प्रविधियों का वे इस्तेमाल ही करते हैं। देखना यह होगा कि जिन भी प्रविधियों का इस्तेमाल वे कर रहे हैं उनके पीछे की राजनीति क्या है। जैसा कि इस आलेख के आरंभ में ही उद्धृत किया गयावे इस मामले में निर्भ्रांत हैं कि साम्राज्यवाद की शह के बगैर हिन्दुत्व की राजनीति और फासीवाद उभार देश में संभव नहीं है,उनका मूल प्रस्थान बिंदु साम्राज्यवाद से बौद्धिक मोर्चे पर लड़ते हुए भारतीय इतिहास और परंपरा के उपनिवेशवादी भाष्य को ध्वस्त करना है। इतिहास दर्शन’ नाम की पुस्तक के प्रथम अध्याय में वे अपने मूल प्रस्थान बिंदु को इन शब्दों में व्यक्त करते हैं- ‘‘भारतपश्चिम एशिया और योरप के भाषाई और सांस्कृतिक इतिहास को समझने में सबसे बड़ी बाधा भारत पर आर्यों के आक्रमण का अवैज्ञानिक सिद्धांत है,यह सिद्धांत उस ऐतिहासिक भाषा विज्ञान की देन है जिसका विकास उन्नीसवीं सदी में योरोपियन जातियों के साम्राज्यवादी प्रसार के दौर में हुआ था…योरप की हमलावर जातियों ने उत्तरी,मध्य और दक्षिणी अमरीका की विकसित संस्कृतियों का नाश किया,मूल निवासियों का सामुदायिक संहार करके उनकी भूमि छीन ली,उस पर स्वयं बस गए,बचे हुए आदिवासियों को जंगलों और पहाड़ों में खदेड़ दिया। अपने कारनामों का यह नक्शा उन्होंने प्राचीन भारत के इतिहास पर चिपका दिया।’’

          जाहिर है कि उपरोक्त कथन में रामविलास जी की राजनीति स्पष्ट है। सवाल यह नहीं है कि रामविलास जी आर्य-वैदिक इतिहास के विषय में जो कुछ भी स्थापित करते हैंवह कितना वैज्ञानिक है,बल्कि मुख्य बात यह है कि उपरोक्त प्रस्तावना में उन्होंने अपनी राजनीति से संबद्ध किया जा सकता है?क्या जैसा कि इस लेख के आरंभ में ही कहा गया कि आर्यों की नस्लीय श्रेष्ठतारक्तशुद्धता और विश्वविजेता आक्रान्ता छवि का निषेध किसी भी तरह से संघ परिवार बर्दाश्त कर पाएगा?क्या रामविलास का बहुजातीय बहुधर्मीबहुभाषीय भारत कहीं से भी हिन्दुत्व के अभियान का सहयोगी हो सकता है?यों तो संघ परिवार भी कथित रूप से विदेशियों द्वारा अपने देश के इतिहास के विरूपण से देशवासियों को बचा ले जाने के लिए पाठ्यक्रम बदल रहा है लेकिन यहां विदेशियों में मध्यकाल के मुस्लिम इतिहासकार ही नहींबल्कि इतिहासपुरूष भी शामिल हैं। क्या संघ परिवार रामविलास द्वारा मध्यकाल को गुलामी का काल मानने से इन्कार करने से सहमत होगा?

जिस मध्यकाल में संघ वालों को मंदिर ध्वस्त और मां-बहनों के अपमान के शिवा शायद ही कुछ सकारात्मक दिखता होवहां सही या गलत जातीय विकास और राजसत्ता के हस्तक्षेप से व्यापारिक पूंजीवाद की उन्नति देखने वाले रामविलास का क्या मेल हो सकता है? हिंदुत्व के पुनरूत्थान के हथियार के बतौर सभी भाषाओं की जननी के रूप में संस्कृत का इस्तेमाल इन दिनों संघ परिवार द्वारा जोर-शोर से जारी है। क्या ऐसे में यह याद कर लेना अवधारणा को निरस्त करना भी रामविलास शर्मा ने अपना कार्यभार समझा था और अपने जीवन के अमूल्य डेढ़ दशक यों ही सर्फ नहीं कर दिए थे ?

          बुनियादपरस्ती या मूलतत्ववाद जाहिरा तौर पर धार्मिक संदर्भों में ही अर्थवान प्रत्यय हैं। रामविलास शर्मा ने न तो सृष्टि का आरंभ आर्यों से माना है और न ही भाषा का आरंभ संस्कृत से। रामविलास शर्मा के इतिहास चिंतन और परंपरा के बोध में एक ही मूल का पल्लवन दिखलाकर उसे धार्मिक अभियान की तरह प्रस्तुत करना निःसंदेह एक भयानक अन्यथाकरण हैजो सही ढंग की पालिमिक्स के आगे ताश के महल की तरह ढह जाएगा। इतना ही याद कर लेना पर्याप्त होगा कि अनेक कबीलों द्वारा अनेक स्रोतों से प्राप्त भाषातत्व गणसमाज में जाकर स्थिरता प्राप्त करते हैंआर्य और द्रविण समुदाय के भाषिक तत्व मूलतः किस समुदाय के हैं, यह तय करना मुश्किल है आदि बातें रामविलास के भाषा चिंतन के केन्द्र में है। भारतीय इतिहास में हजारों साल से जारी नृवंशीय, धार्मिक,सांस्कृतिक,तकनीकी सम्मिश्रण और संकरता का रामविलास ने कहां तिरस्कार किया हैयह बताए बगैर उन्हें मूलतत्ववादी कहकर किसी को निकल जाने नहीं दिया जा सकता। यदि एक ही आर्य-वैदिक मूल का पल्लवन ही उनका उद्देश्य होता तो मध्यकाल तो क्या,प्राचीन भारत का भी एक बड़ा हिस्सा उनके लिए अश्पृश्य हो जाता। क्या राष्ट्रीय अस्मिता या भारतीयता के संदर्भ में कहीं भी रामविलास शर्मा ने एक भाषा,एक धर्म,एक नस्ल के सिद्धांत को मान्यता दी?  यदि नहीं,तो उनके मूलतत्ववाद का मूल तत्व क्या है?

रामविलास शर्मा की निःसंदेह एक राजनीति है और उसके पूर्वाग्रह भी हैं। पराधीन भारत में पैदा हुए पहली पीढ़ी के एक  देशज मार्क्सवादी की राजनीति और उसके पूर्वाग्रहों को जिन ऐतिहासिक परिस्थितियों ने निर्मित किया था,उन पर एक निगाह डाल लेना उन तमाम सरलीकरणों और अन्यथाकरणों से रामविलास के आलोचकों को बचा ले जाता जो अकादमिक हलकों के नित नए फैशनों से उत्पन्न होती है।

रामविलास शर्मा के इतिहास लेखन के राजनीतिक उद्देश्यों और उनके द्वारा इस्तेमाल किए गए उपकरणों को समझने के लिए 19वीं शताब्दी के आखीर और बीसवीं शताब्दी के पहले चार दशकों तक भारतीय इतिहास-लेखन के संदर्भों को समझना जरूरी है। भारतीय इतिहास-लेखन की मूल प्रेरणा इन दिनों भारतीय अस्मिता का रचनात्मक निर्माण था जिसके लिए इतिहास और साहित्य दोनों ही अनुशासन एक दूसरे से वर्चस्व की लड़ाई में भी उलझे रहे थे साथ ही एक दूसरे की पद्धतियों को भी अपना लिया करते थे। इस दौर के इतिहास लेखन की प्रेरणा को यदि सुदीप्तो कविराज के शब्दों में कहा जाए तो ‘‘किसी जाति की आत्मछवि या अस्मिता का बुनियादी कार्य है उस जाति द्वारा स्वयं को एक इतिहास देना’’।इन दिनों भारत के प्राचीन अतीत के आविष्कार का मुख्य उद्देश्य उस औपनिवेशिक तर्कपद्धति का मुकाबला करना था जिसके अनुसार भारत राष्ट्रीयता के बोध से रहित कुछ ही समय पूर्व अस्तित्व में आया महज एक भौगोलिक क्षेत्र था। रामविलास शर्मा ने प्राच्यवादियों की तरह प्राचीन भारत का आध्यात्मीकरण नहींबल्कि इहलौकिककरण किया है। प्राचीन वैदिक गण समाजों के अध्ययन की उनकी पद्धति एंगेल्स के माडल पर आधारित है किसी प्राच्यविद के माडल पर नहीं। यहां यह भी याद कर लेना प्रासंगिक होगा कि पूरी दुनिया में 19वीं सदी तक इतिहास-लेखन अभी भी पद्धतियोंउद्देश्यों और मानकों के लिहाज से वैविध्यपूर्ण बना हुआ था।

एक ओर विश्वविद्यालय आधारितअभिलेख-केन्द्रितपेशेवर और आधुनिक अकादमिक अनुशासन के रूप में इतिहास की संकल्पना विकसित हो रही थी जहां प्राथमिक स्त्रोतों के गहन अनुसंधान हो रही थी जहां के द्वारा निष्पक्ष और निस्संग तरीकों से ऐतिहासिक सत्य का उद्घाटन इतिहासकार का दायित्व समझा गया,वहीं दूसरी ओर इतिहास के प्रवाह को अमूर्त दार्शनिक चिंतन की तरह समझने की एक धारा जर्मनी में चल रही थी। फ्रांसीसी क्रांति से उत्पन्न एक रूमानी और राष्ट्रीयतावादी रुझान के साथ इतिहास की एक तीसरी धारा बेहद प्रचलित थी। इस धारा का एक नमूना टी.बी. मैकाले का इंग्लैण्ड का इतिहास’ थाजो उपनिवेशों में नियमित तौर पर पाठ्यपुस्तक के रूप में पढ़ाया जाता था। बेनेडिक्ट एंडरसन ने साम्राज्यवादी सरकारी राष्ट्रवाद’ की  उस विडंबना को उचित ही रेखांकित किया हैजिसके तहत उनके द्वारा योरोपीय श्रेष्ठता और प्राच्य असभ्यता के आख्यान पर आधारित इतिहासों ने उपनिवेशों के पराधीन लोगों की चेतना पर गहरा असर डाला। नतीजे में पराधीन देशों में इसी माडल पर अपने-अपने राष्ट्रीय इतिहास विकसित हुए जो मिल और मैकाले की योरोपीय श्रेष्ठता और प्राच्य असभ्यता की थीसिस के विरूद्ध राष्ट्रीय आत्मगौरव से परिचालित थे। कहना न होगा कि भारत में भी यही प्रक्रिया चल रही थी। यह ऐसा दौर था जिसमें एक ओर जदुनाथ सरकारमो. हबीबगौरीशंकर हीरानंद ओझा आदि पेशेवर इतिहासकार पत्र-पत्रिकाओं में लिख रहे थे, वहीं दूसरी ओर बड़े पैमाने पर भारत के गौरवशाली अतीत के पुननिर्माण से प्रेरित साहित्यिक लोग इतिहास के विषयों पर लोकप्रिय ढंग से लिखा करते थे। इंडियन एंटिक्वेरीएशियाटिक रिसर्चेजजर्नल आफ दि एशियाटिक सोसाइटी आफ बंगाल जैसी नामी-गिरामी शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित लेखों से लेकर रामायणमहाभारतहर्षचरितराजतरंगिणी तक को न केवल साहित्यिक लोगों द्वारा बल्कि ओझा जी जैसे इतिहासकारों द्वारा भी इतिहास का स्त्रोत ही नहीं बल्कि स्वयं इतिहास मान लिया जाता था। औपनिवेशिक इतिहास लेखन के विरूद्ध भारत के महानीकरण पर आधारित पेशेवर इतिहासकारों द्वारा और साथ-साथ साहित्यकारों द्वारा लोकप्रिय इतिहासलेखन 20वीं शताब्दी के चौथे दशक तक जारी रहा। यहां एक अनुशासन के रूप में इतिहास का अर्थ ही था जति की राष्ट्रीयता को फिर से प्राप्त करना। इतिहास का ऐसा ही उपयोग भारतेन्दु से लेकर प्रसाद के नाटकों तथा वृन्दावन लाल वर्मा के उपन्यासों तक में देखा जा सकता है।

          रामविलास शर्मा का इतिहास लेखन एक ऐसा क्षेत्र है जहां 19वीं शती में विकसित रूमानी और राष्ट्रवादी चेतना तथा अध्ययन संस्कार और बाद के दौर में विकसित ऐतिहासिक-भौतिकवादी-द्वन्द्ववादी मार्क्सवादी इतिहासदृष्टि सतत संघर्षरत है। यह संघर्ष उनके इतिहास-लेखन के उद्देश्योंमानकोंप्रविधियों सभी स्तरों पर देखा जा सकता है उनके इतिहास-लेखन की पद्धति पर उस       का प्रभाव स्पष्ट है जो उस समय प्रकाशित होने वाले इंडियन एंटिक्वेरी आदि शोध पत्रिकाओं में लिखने वाले भारतविदों और प्राच्यवादियों द्वारा अपनाई जाती थी। आमतौर पर वेदउपनिषदमहाकाव्य आदि संस्कृत स्रोतों का विश्लेषण होता था। जहां कहीं लोक और जनजातीय परंपराओं का निर्माण ही अभीष्ट था। भारतविद्या और प्राच्यविद्या में भारत का महानीकरण और प्राच्य समाजों की असभ्यता और बर्बरता की परस्पर विरोधी अवधारणाएं संघर्षरत दिखती हैं जो अक्सर इंग्लैंण्ड की कंजरवेटिव और लिबरल धाराओं की राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से भी प्रभावित होती थीं। इतिहास चिंतन की मूलपाठ के विश्लेषण की परंपरा का गहरा संबंध 19वीं शती के उस राष्ट्रवादी विमर्श से है जिसमें एक भाषाएक धर्म और एक संस्कृति की एक धारा जो जर्मनी में विकसित हुई उसमें आर्य नस्ल की श्रेष्ठता का केन्द्रीय महत्व है। इंग्लैण्ड में विकसित राष्ट्रवाद की दूसरी धारा लोकतांत्रिक मूल्योंमैग्नाकार्टासंसदीय लोकतंत्र और प्रजातांत्रिक संस्कृति को राष्ट्रीय गौरव का मुख्य आधार बनाती है। अमरीका वगैरह में योरोपीय अप्रवासियों द्वारा विकसित क्रियोल राष्ट्रवाद की एक तीसरी धारा भी थी। दुनिया भर में राष्ट्रवाद का विकास इन्हीं तीन धाराओं के आपसी संक्रमण से निर्मित बताया जाता है।

          जैसा कि ऊपर कहा गयारामविलास शर्मा की ऐतिहासिक पद्धति पर   का गहरा असर है जिसका संबंध भारतविद्या और प्राच्यविद्या से स्पष्ट है। इन्हीं पूर्वाग्रहों के चलते वे एक इतिहासकार की अपेक्षतया निष्पक्ष पेशेवराना दृष्टि नहीं अपना पाते। अपने इतिहास-चिंतन में साम्राज्यवाद से निपटने के उत्साह में वे विरासत में मिले प्राच्यवादी संस्कारों से निपटे बगैर ऐतिहासिक भौतिकवादी-द्वन्द्ववादी पद्धति जो उन्होंने टकराहटों में उनके इतिहासबोधपरंपरा का मूल्यांकन और यहां तक कि आलोचना दृष्टि का भी निर्माण हुआ है। वर्गीय विश्लेषण के  ऊपर जातीय निर्माण की प्रक्रिया को भक्तिकाल और नवजागरण  के प्रसंगों में तरजीह देनाउनके उसी साम्राज्यवाद-विरोधी पूर्वाग्रह का परिणाम है जहां पद्धति निष्कर्षों से प्रभावित होती है न कि निष्कर्ष पद्धति से।

उनका मार्क्सवादी चाहे जितना मोटा हो और चाहे जितने बड़े सामान्यीकरणों को जन्म देता होउनके इतिहासलेखन का माडल वही हैपद्धतिगत विरासत के बावजूदप्राच्यवाद उनका मूल्यबोध नहीं है। मूलभाषा या जननीभाषा की अवधारणा का खंडनसंस्कृत की जगह जन भाषाओं पर अधिक बल,बहुजातीय-बहुधर्मी-बहुभाषिक राष्ट्रका माडल ऐसे ही तत्व हैं।19वीं और 20वीं शताब्दी के गैर-पेशेवर लोकप्रिय इतिहास-लेखन और पेशेवर कहे जाने वाले राष्ट्रवादी इतिहास लेखनदोनों में प्राचीन भारत के गौरवशाली अतीत के निर्माण के साथ-साथ भारत की गुलामी और नैतिकसामाजिकआर्थिक सभी प्रकार के अधःपतन के लिए मुस्लिम मध्यकाल को जिम्मेदार ठहराया गया है। प्राच्यवादी राजनीति का माडल इतिहास बोध यही है। गौरीशंकर ओझापंसुंदर लाल से लेकर आर.सी. मजूमदार जैसे पेशेवर इतिहासकार और भारतेन्दु से लेकर चतुरसेन शास्त्री जैसे इतिहास का उपयोग करने वाले ऐतिहासिक भौतिकवाद ही है जो रामविलास शर्मा को इस इतिहास बोध के खिलाफ प्रखरता के साथ खड़ा करता है। मूलतः साहित्य के क्षेत्र के ऐसे लोग जो इतिहास के घालमेल से इतिहास और मिथक की विभाजनरेखा को धूमिल कर देते थे, ऐसे ही लोगों ने न कि अकादमिक को गढ़ा है। रामविलास शर्मा साहित्यिक क्षेत्र के पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने इस परिघटना को समझा और अपने इतिहासलेखन को स्पष्टतः साहित्य से अलगाया। मुस्लिमद्वेष और प्राच्यवादियों को भारत के गौरवशाली अतीत उपलब्ध कराने का श्रेय देने और कृतज्ञता ज्ञापन पर आधारित इतिहासबोध, जो प्रधानतः साहित्य के माध्यम से हिंदी समुदाय का कामनसेंस बना हुआ है उसे रामविलास का इतिहास-लेखन लोकप्रिय तरीके से ध्वस्त करता है। यहां यह याद कर लेना भी प्रासंगिक होगा कि हिटलर के समय आर्यों की नस्लीय श्रेष्ठता पर आधारित फासीवादी जर्मन राष्ट्रवाद से प्रभावित होने वालों में टी. एस. इलियट और एजरा पाउण्ड जैसे महान साहित्यकार भी शामिल थे। साहित्य और संस्कृति की अपनी प्रक्रिया में स्मृति, मिथक, स्वप्न आदि का महत्व होता है। इस जमीन से इतिहास की ओर दृष्टिपात करने वाले अक्सर खतरनाक इतिहास बोध तक पहुंचते हैं। एजरा पाउण्ड हों अथवा निर्मल वर्मा, इस नियति तक पहुंचते ही हैं। रामविलास शर्मा पर प्राच्यवाद के संस्कारों को रेखांकित करने वाले आलोचकों का दायित्व बनता था कि वे यह दिखलाते कि प्राच्यवाद की भयानक फासिस्ट और सांप्रदायिक साम्राज्यवादी परिणतियों के खिलाफ रामविलास शर्मा को समझौताविहीन ढंग से खड़ा करने वाला तत्व क्या है। वास्तव में यही उनकी हम ऐतिहासिक द्वन्द्ववादी भौतिकवादी आज भी कहना पसन्द करेंगे।

(पहली बार समकालीन जनमत, जनवरी-मार्च, 2002 में प्रकाशित, बाद में ‘समकालीन चुनौती के संयुक्तांक ५-७, वर्ष ३, अक्टूबर २०११- जून २०१२  में पुनर्मुद्रित)

(प्रणय कृष्‍ण। इलाहाबाद युनिवर्सिटी और जेएनयू से अध्‍ययन। प्रखर हिंदी आलोचक। जन संस्‍कृति मंच के महासचिव।  देवीशंकर अवस्‍थी सम्‍मान  से सम्मानित ।)

निराला की समकालीनता: कुछ सूत्र-बिन्दु : विजय कुमार

By  विजय कुमार 

  •  दोस्तोवोस्की के लिए सुन्दरता एक चाहना है, इसीलिए वो त्रास है, और त्रास व सुन्दरता दोनों कभी एक दूसरे से अलग हो ही नहीं सकते.
  • सुकरात तो फ़कीर टाइप के आदमी थे सड़कों पर चलते हुए प्रवचन देते थे और फिर उन्हें जहर का प्याला दिया गया. प्लेटो ने उनके विचारो को लोगों के बीच प्रसारित करना उचित समझा. लेकिन, इसी क्रम हुआ यह कि प्लेटो कब अपने विचारों को सुकरात के नाम से कहने लगा पता ही नहीं चला. इसमें हुआ यह कि प्लेटो सुकरात के बहाने अपने समय के विचारों में सुकरात को देखने लगा.
  • १२ वीं-१३ वीं सदी के कवि थे ‘दांते’. उनके बारे में २० वीं सदी के एक आधुनिक कवि मोंताले ने, जो इटली के एक कवि थे, दांते भी इटली के थे, एक बहुत खुबसूरत बात कही है कि दांते में कुछ ऐसा है जो मेरा बहुत व्यक्तिगत है. और चूँकि मेरा बहुत व्यक्तिगत है इसलिए मैं उसके परे जाता हूँ और इस तरह दांते को ढूंढता हूँ. “Some thing is in myself which is relating to it to my own particular experience of Dante. It could amount more personal and therefore worthy and being reported and discussed here.”
  • एक निराला रामविलास शर्मा के हैं जो नवजागरण के अग्रदूत हैं, एक निराला दूधनाथ सिंह सिंह के हैं जो कि आत्महंता निराला हैं, एक तीसरा निराला रमेशचंद्र शाह के भी हैं जो प्रपत्तिभाव वाले निराला को वास्तविक निराला मानते हैं. और यहाँ तक कि हमारे युवा साथी प्रणय कृष्ण के भी निराला हैं, जो निराला को मार्क्सवाद की कसौटी पर कसते हैं और खरा नहीं पाते हैं. कुंवर नारायण जी के यहाँ भी चार तरह के निराला दीखते हैं- सामाजिक यथार्थ वाले निराला, गीतात्मक, राग और सौंदर्य के निराला, व्यंगकार निराला और अंत में अर्चना और आराधना वाले निराला. विजय कुमार इसमें ५ वाँ देशभक्ति और जागरण वाले निराला को जोड़ते हैं. एक व्यक्ति के अलग-अलग रूप दिखाई दे सकते हैं लेकिन एक सेंट्रल यूनिटी को निराला में तलाशना जरुरी है कि जो चार-पञ्च अलग-अलग रूप दिखाई देते हैं इनकी वास्तविक केंद्रीय अन्विति क्या है?
  •  फ्रेडरिक जेम्सन कहता है कि पूंजीवाद एक ऐसी अवस्था में पहुँच गया है जिसमें तीन चीजों पर उसने कब्ज़ा कर लिया है और मनुष्य लगभग खदेड़ दिया है, मनुष्य को उसके मनुष्यत्व  से बेदखल कर दिया है. १. प्रकृति २.ग्रामीण संस्कृति ३. मनुष्य के अंतःकरण
  • २१ वीं सदी को परिभाषित करते हुए इटालियो केल्विनो ने जिन पांच चीजों पर जोर दिया है वह आज के सबसे बेसिक मुद्दे लगते हैं-  १. स्पीड(गति) २. लौजिकल(यथातथ्य होना) ३. डिजिटल (छाविकेंद्रित) ४. लाइटनेस(हल्कापन) ५. PREDICTABILITY (पुर्वानुमेयता)
  • जिस दौर में हमलोग जी रहे हैं, हमारी ज्यादातर कविताएं अस्तित्व के संकट की कवितायें हैं, व्यक्तित्व के प्रस्फुटन की कविता नहीं है. व्यक्तित्व से अस्तित्व के संकट तक की यह यात्रा पूरे पूंजीवाद की विकास-यात्रा है.
  • व्यक्तित्व क्या है? व्यक्तित्व बनता है आपकी प्रतिरोधात्मक शक्ति द्वारा, सब कुछ दाँव पर लगा देने के द्वारा, एक रैडिकल मूलभूत आकर्षण को लेकर चलने के द्वारा. निराला में इस व्यक्तित्व की की जो गहनता है इसको हम कितनी तरह से परिभाषित कर सकते हैं!.. निराला का जो एक रूप है ‘व्यक्तित्व’ इसी व्यक्तित्व को आज हमें फैलाने का अवसर नहीं मिल रहा है. हमें बहुत सीमित कर दिया जा रहा है.
  •   दोस्तोवोस्की ने जितना पाप का और पुण्य का संघर्ष देखा, जितना देवत्व और शैतानियत का संघर्ष अपने अपने उपन्यासों में रचा, दोस्तोवोस्की से ज्यादा तो संसार में कोई भी व्यक्ति मनुष्य के भीतर के सत और असत  के संघर्ष का लगभग पागल कर देने वाला इतना बड़ा ड्रामा खड़ा नहीं ही किया है और वही दोस्तोवस्की अंत में क्रिश्चिनिटी की तरफ जाते हैं. लेकिन, यह क्रिश्चिनिटी धार्मिक क्रिश्चिनिटी नहीं है . दोस्तोवोस्की की क्रिश्चिनिटी उस त्रास की है जिसमें वे अपने आप को समर्पित कर देते हैं.
  • सुसेन सेन्टेक कहती हैं कि Artist is a narrator and also is a commentator. कलाकार एक बखान करता है और बखान करते हुए वो एक चिन्तक भी है. ये दोनों चीजें एक साथ चलती हैं  सरोज स्मृति जैसी कविता में .
  • ‘छायावादी कविता मूलतः बिम्ब है.’ इक्कीसवीं सदी का जो समय है उसने तो अब बिम्बों को भी हमारे हाथों से छीन लिया है. मास मीडिया बिम्बों का प्रोडक्सन हाउस हो गया है. कवियों-कलाकरों के सामर्थ्य के बाहर चला गया है, बिम्ब रचना.
  •  समकालीन हिंदी कविता में जो जो नरेशन बढ़ा है, narratives की एक नई परंपरा आयी है उसका कारण क्या है ? इसका कारण है कि बिम्ब की सत्ता इतनी ज्यादा ताकतवर हो गयी है आपके सामने कि अब उस बिम्ब के सामने आपको फिर से narratives को लाना पड़ेगा.

विजय कुमार (जन्म १९४९) कवि आलोचक एवं सम्पादक हैं। कविता की संगत इनकी प्रमुख आलोचना पुस्तकें है। ‘अँधेरे में विचार’ नामक पुस्तक भी खासी चर्चित. सदी के अंत में कविता (उद्भावना कविता विशेषांक) इनकी संपादित पुस्तक है।

(उपर्युक्त बिन्दुओं को  हिंदी विभाग, बी.एच.यू. द्वारा ४ जनवरी २०१२ को ‘निराला की समकालीनता’ विषय पर आयोजित कार्यक्रम में दिए गए व्याख्यान से  साभार लिया गया है, भाषण के पूर्ण और मूल रूप के लिए परिचय-११ का अंक देखें.)

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