Archive for the tag “On valentine day”

वैलेंटाइन डे और हिंदी गद्य के कुछ छींटें

प्रेम मनुष्यता की चरम अभिव्यक्ति है और जाहिर है कि शोषक तंत्र के खिलाफ़ प्रतिरोध की भी।आज के समय में एक तरफ जहाँ वर्चस्ववादी सत्ताएँ सच्चे प्रेम के प्रति बेहद हिंसक बर्ताव कर रही हैं,वहीँ बाज़ार इसकी आत्मा के साथ खिलवाड़ कर रहा है,जहाँ स्त्री-पुरुष को उसने अपने लाभ के लिए खेल के मोहरों में तब्दील कर दिया है।प्रेम पर दोतरफा हमला लगातार जारी है। एक तरफ से प्रेम का गला मरोड़ा जा रहा है तो दूसरी ओर से उसको प्राणविहीन करने की कोशिश की जा रही है। प्रेम के लिए इस अत्यंत कठिन समय में साहित्य में बिखड़े  अनेक प्रेममय पन्नों में से कुछ पन्नों की प्रस्तुति  प्रेम के पक्ष में जारी संघर्ष में शामिल होने का एक प्रस्ताव है। #सुशील सुमन 

By  Banksy

By Banksy

यदि कोई बुढ़िया बार-बार चितौनी देने पर भी लीक से नहीं हटती, तो उनकी बचनावली के ये नमूने हैं — ‘हट जा जीणे जोगिए; हट जा करमा वालिए; हट जा पुतां प्यारिए; बच जा लम्बी वालिए।’ समष्टि में इनके अर्थ हैं, कि तू जीने योग्य है, तू भाग्योंवाली है, पुत्रों को प्यारी है, लम्बी उमर तेरे सामने है, तू क्यों मेरे पहिये के नीचे आना चाहती है? बच जा।

ऐसे बम्बूकार्टवालों के बीच में होकर एक लड़का और एक लड़की चौक की एक दूकान पर आ मिले। उसके बालों और इसके ढीले सुथने से जान पड़ता था कि दोनों सिक्ख हैं। वह अपने मामा के केश धोने के लिए दही लेने आया था, और यह रसोई के लिए बड़ियाँ। दुकानदार एक परदेसी से गुँथ रहा था, जो सेर-भर गीले पापड़ों की गड्डी को गिने बिना हटता न था।
“तेरे घर कहाँ है?”
“मगरे में; और तेरे?”
” माँझे में; यहाँ कहाँ रहती है?”
“अतरसिंह की बैठक में; वे मेरे मामा होते हैं।”
“मैं भी मामा के यहाँ आया हूँ, उनका घर गुरुबाज़ार में हैं।”

इतने में दुकानदार निबटा, और इनका सौदा देने लगा। सौदा लेकर दोनों साथ-साथ चले। कुछ दूर जा कर लड़के ने मुसकराकार पूछा, “तेरी कुड़माई हो गई?”
इस पर लड़की कुछ आँखें चढ़ा कर ‘धत्’ कह कर दौड़ गई, और लड़का मुँह देखता रह गया।

दूसरे-तीसरे दिन सब्ज़ीवाले के यहाँ, दूधवाले के यहाँ अकस्मात दोनों मिल जाते। महीना-भर यही हाल रहा। दो-तीन बार लड़के ने फिर पूछा, ‘तेरी कुड़माई हो गई?’ और उत्तर में वही ‘धत्’ मिला। एक दिन जब फिर लड़के ने वैसे ही हँसी में चिढ़ाने के लिए पूछा तो लड़की, लड़के की संभावना के विरुद्ध बोली, “हाँ हो गई।”
“कब?”
“कल, देखते नहीं, यह रेशम से कढ़ा हुआ सालू।”

लड़की भाग गई। लड़के ने घर की राह ली। रास्ते में एक लड़के को मोरी में ढकेल दिया, एक छावड़ीवाले की दिन-भर की कमाई खोई, एक कुत्ते पर पत्थर मारा और एक गोभीवाले के ठेले में दूध उड़ेल दिया।नहाकर आती हुई किसी वैष्णवी से टकरा कर अन्धे की उपाधि पाई। तब कहीं घर पहुँचा।

[गुलेरी जी की कहानी ‘उसने कहा था’ से जिसका यह शताब्दी-वर्ष है]

(1)

”किरण  – तुम्हारे कानों में क्या है ?”

उसने कानों से चंचल लट को हटा कर कहा –  ”कंगना”!

सचमुच दो कंगन कानों को घेर कर बैठे थे ।

”अरे ! कानों में कंगना ?”

”हाँ – तब कहाँ पहिनूँ?

*         *          *           *           *          *
(4 )
बरसात की रात थी । रिमझिम-रिमझिम बूँदों की झड़ी लगी हुई थी । चाँदनी मेघों से
आँख-मुदौअल खेल रही थी । बिजली, लोल कपाट से बार बार झाँकती थी । वह किसे चंचल देखती थी, और बादल किस मसोस से रह रह कर चिल्लाते थे, इन्हें सोचने का मुझे अवसर नहीं था । मैं तो किन्नरी के दरवाजे से हताश लौटा था, ऑंखों के ऊपर न चाँदनी थी, न बदली। त्रिशंकु ने स्वर्ग को जाते जाते बीच ही से टँग कर किस दु:ख को उठाया, और मैं तो अपने स्वर्ग के दरवाजे पर सर रख निराश लौटा, तो मेरी वेदना क्यों न बड़ी हो । हाय । एक ऍंगूठी भी रहती तो इसे दिखा कर, उसके चरणों से चन्दन चाटता ।

      घर पर आते ही जूही को पुकार उठा – ”जूही । जूही । किरण के पास कुछ भी बचा-वचा हो तो फौरन जा कर माँग लाओ ।” ऊपर से कोई आवाज नहीं आई, केवल सर के ऊपर से एक काला बादल, कालान्त चीत्कार से चिल्ला उठा । मेरा मस्तिष्क घूम गया । मैं तत्क्षण कोठे पर दौड़ा ।

      सब संदूक झाँपे, जो कुछ मिला सब तोड़ डाला, लेकिन मिला कुछ भी नहीं । आलमारी में केवल मकड़े का जाला था । श्रृंगार-बक्स में एक छिपकली बैठी थी । उसी दम किरण पर झपटा ।

      पास जाते ही सहम गया । वह एक तकिये के सहारे नि:सहाय, निस्पन्द लेटी हुई थी । चाँदनी ने खिड़की से आकर उसे गोद में ले रक्खा था, और वायु उस शान्त शरीर पर जल से भिगोया पंखा झल रही थी । मुख पर एक अपरूप छटा थी । कौन कहे कहीं जीवन की शेष रश्मि क्षण भर वहीं अटकी हो । ऑंखों में एक जीवन योति थी । शायद प्राण शरीर से निकलकर किसी आसरे से वहीं बैठ रहा था । मैं फिर पुकार उठा – ”किरण तुम्हारे पास कोई और गहना भी बच गया है”?

      ”हाँ” – क्षीण कण्ठ की काकली थी ।

      ”कहाँ है – अभी देखने दो।”

    उसने धीरे से घूँघट सरका कर कहा –
”वही, कानों का कंगना ।”

      सर तकिये से ढल पड़ा । आँखें भी झिप गयीं । वह जीवन्त रेखा कहाँ उड़ गयी । क्या इतने ही के लिए अब तक ठहरी थी ?

      मेरी आंखें मुख पर जा पड़ीं-वहीं कंगन थे, वैसे ही कानों को घेर कर बैठे थे । मेरी स्मृति तड़िद्वेग से चमक उठी । दुष्यन्त ने अँगूठी को पहिचान लिया था – भूली शकुन्तला, तत्क्षण याद आ गयी थी । लेकिन, दुष्यन्त सौभाग्यशाली थे, चक्रवर्ती राजा थे, अपनी प्राणप्रिया को आकाश पाताल छान कर ढूंढ निकाला । मेरी किरण तो इस भूतल पर नहीं थी, कि किसी तरह प्राण देकर भी पता पाता । परलोक से ढूँढ़ निकालूँ ऐस शक्ति इस दीन हीन मानव में कहाँ?

सारी बातें सूझ गयीं । चढ़ा नशा उतर पड़ा, आँखों पर की पट्टी खुल गयी, लेकिन हाय खुली भी तो उसी समय, जब जीवन में केवल अंधकार ही अंधकार रह गया ।

[राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह की कहानी ‘कानों में कंगना’ से]
*      *        *      *       *     *    *

एक घने कुञ्ज में अरुण और मधूलिका एक दूसरे को हर्षित नेत्रों से देख रहे थे। सन्ध्या हो चली थी। उस निविड़ वन में उन नवागत मनुष्यों को देखकर पक्षीगण अपने नीड़ को लौटते हुए अधिक कोलाहल कर रहे थे।
प्रसन्नता से अरुण की आँखे चमक उठीं। सूर्य की अन्तिम किरण झुरमुट में घुसकर मधूलिका के कपोलों से खेलने लगी। अरुण ने कहा-चार प्रहर और, विश्वास करो, प्रभात में ही इस जीर्ण-कलेवर कोशल-राष्ट्र की राजधानी श्रावस्ती में तुम्हारा अभिषेक होगा और मगध से निर्वासित मैं एक स्वतन्त्र राष्ट्र का अधिपति बनूँगा, मधूलिके!
भयानक! अरुण, तुम्हारा साहस देखकर मैं चकित हो रही हूँ। केवल सौ सैनिकों से तुम…
रात के तीसरे प्रहर मेरी विजय-यात्रा होगी।
तो तुमको इस विजय पर विश्वास है?
अवश्य, तुम अपनी झोपड़ी में यह रात बिताओ; प्रभात से तो राज-मन्दिर ही तुम्हारा लीला-निकेतन बनेगा।

*       *       *       *        *          *          *
अपने साहसिक अभियान में अरुण बन्दी हुआ और दुर्ग उल्का के आलोक में अतिरञ्जित हो गया। भीड़ ने जयघोष किया। सबके मन में उल्लास था। श्रावस्ती-दुर्ग आज एक दस्यु के हाथ में जाने से बचा था। आबाल-वृद्ध-नारी आनन्द से उन्मत्त हो उठे।
ऊषा के आलोक में सभा-मण्डप दर्शकों से भर गया। बन्दी अरुण को देखते ही जनता ने रोष से हूँकार करते हुए कहा-‘वध करो!’ राजा ने सबसे सहमत होकर आज्ञा दी-‘प्राण दण्ड।’ मधूलिका बुलायी गई। वह पगली-सी आकर खड़ी हो गई। कोशल-नरेश ने पूछा-मधूलिका, तुझे जो पुरस्कार लेना हो, माँग। वह चुप रही।
राजा ने कहा-मेरी निज की जितनी खेती है, मैं सब तुझे देता हूँ। मधूलिका ने एक बार बन्दी अरुण की ओर देखा। उसने कहा-मुझे कुछ न चाहिए। अरुण हँस पड़ा। राजा ने कहा-नहीं, मैं तुझे अवश्य दूँगा। माँग ले।
तो मुझे भी प्राणदण्ड मिले। कहती हुई वह बन्दी अरुण के पास जा खड़ी हुई।

[जयशंकर प्रसाद की कहानी ‘पुरस्कार’ से]
*           *          *          *           *

बादशाह शाम की हवाखोरी को नजर-बाग में टहल रहे थे। दो-तीन खोजे घबराए हुए आए और चिठ्ठी पेश करके अर्ज की – ‘हुजूर, गजब हो गया। सलीमा बीबी ने जहर खा लिया और वह मर रही है।’

क्षण भर में बादशाह ने खत पढ़ लिया। झपटे हुए महल में पहुँचे। प्यारी दुलहिन सलीमा जमीन पर पड़ी है। आँखें ललाट पर चढ़ गई हैं। रंग कोयले के समान हो गया है। बादशाह से रहा न गया। उन्होंने घबराकर कहा – ‘हकीम, हकीम को बुलाओ!’ कई आदमी दौड़े।

बादशाह का शब्द सुनकर सलीमा ने उनकी तरफ देखा, और धीमे स्वर में कहा – ‘जहे किस्मत।’

बादशाह ने नजदीक बैठकर कहा – ‘सलीमा, बादशाह की बेगम होकर तुम्हें यही लाजिम था?’

सलीमा ने कष्ट से कहा – ‘हुजूर, मेरा कुसूर मामूली था।’

बादशाह ने कड़े स्वर में कहा – ‘बदनसीब! शाही जनानखाने में मर्द को भेष बदलकर रखना मामूली कुसूर समझती है? कानों पर यकीन कभी न करता, मगर आँखों देखी को झूठ मान लूँ?’

जैसे हजारों बिच्छुओं के एक साथ डंक मारने से आदमी तड़पता है, उसी तरह तड़पकर सलीमा ने कहा – ‘क्या?’

बादशाह डरकर पीछे हट गए। उन्होंने कहा -‘सच कहो, इस वक्त तुम खुदा की राह पर हो, यह जवान कौन था?’

सलीमा ने अचकचाकर पूछा, ‘कौन जवान?’

बादशाह ने गुस्से से कहा – ‘जिसे तुमने साकी बनाकर अपने पास रक्खा था?’

सलीमा ने घबराकर कहा – ‘हैं! क्या वह मर्द है?’

बादशाह – ‘तो क्या, तुम सचमुच यह बात नहीं जानतीं?’

सलीमा के मुँह से निकला – ‘या खुदा।’

फिर उसके नेत्रों से आँसू बहने लगे। वह सब मामला समझ गई। कुछ देर बाद बोली – ‘खाविन्द! तब तो कुछ शिकायत ही नहीं; इस कुसूर की तो यही सजा मुनासिब थी। मेरी बदगुमानी माफ फरमाई जाए। मैं अल्लाह के नाम पर पड़ी कहती हूँ, मुझे इस बात का कुछ भी पता नहीं है।’

बादशाह का गला भर आया। उन्होंने कहा – ‘तो प्यारी सलीमा, तुम बेकुसूर ही चलीं?’ बादशाह रोने लगे।

सलीमा ने उनका हाथ पकड़कर अपनी छाती पर रखकर कहा – ‘मालिक मेरे! जिसकी उम्मीद न थी, मरते वक्त वह मजा मिल गया। कहा-सुना माफ हो, एक अर्ज लौंडी की मंजूर हो।’

बादशाह ने कहा – ‘जल्दी कहो, सलीमा?’

सलीमा ने साहस से कहा – ‘उस जवान को माफ कर देना।’

इसके बाद सलीमा की आँखों से आँसू बह चले और थोड़ी ही देर में ठण्डी हो गई।

बादशाह ने घुटनों के बल बैठकर उसका ललाट चूमा और फिर बालक की तरह रोने लगा।

गजब के अँधेरे और सर्दी में युवक भूखा-प्यासा पड़ा था। एकाएक घोर चीत्कार करके किवाड़ खुले। प्रकाश के साथ ही एक गम्भीर शब्द तहखाने में भर गया – ‘बदनसीब नौजवान क्या होश-हवास में है?’

युवक ने तीव्र स्वर से पूछा – ‘कौन?’

जवाब मिला – ‘बादशाह।’

युवक ने कुछ भी अदब किए बिना कहा – ‘यह जगह बादशाहों के लायक नहीं है – क्यों तशरीफ लाए हैं?’

‘तुम्हारी कैफियत नहीं सुनी थी, उसे सुनने आया हूँ।’

कुछ देर चुप रहकर युवक ने कहा – ‘सिर्फ सलीमा को झूठी बदनामी से बचाने के लिए कैफियत देता हूँ, सुनिए। सलीमा जब बच्ची थी, मैं उसके बाप का नौकर था। तभी से मैं उसे प्यार करता था। सलीमा भी प्यार करती थी; पर वह बचपन का प्यार था। उम्र होने पर सलीमा परदे में रहने लगी और फिर वह शाहंशाह की बेगम हुई, मगर मैं उसे भूल न सका। पाँच साल तक पागल की तरह भटकता रहा। अन्त में भेष बदलकर बाँदी की नौकरी कर ली। सिर्फ उसे देखते रहने और खिदमत करके दिन गुजार देने का इरादा था। उस दिन उज्ज्वल चाँदनी, सुगन्धित पुष्प-राशि, शराब की उत्तेजना और एकान्त ने मुझे बेबस कर दिया। उसके बाद मैंने आँचल से उसके मुख का पसीना पोंछा और मुँह चूम लिया। मैं इतना ही खतावार हूँ। सलीमा इसकी बाबत कुछ भी नहीं जानती।’

बादशाह कुछ देर चुपचाप खड़े रहे। उसके बाद वह दरवाजे बन्द किए बिना ही धीरे-धीरे चले गए।

सलीमा की मृत्यु को दस दिन बीत गए। बादशाह सलीमा के कमरे में ही दिन-रात रहते हैं। सामने नदी के उस पार, पेड़ों के झुरमुट में सलीमा की सफेद कब्र बनी है। जिस खिड़की के पास सलीमा बैठी उस दिन, रात को बादशाह की प्रतीक्षा कर रही थी, उसी खिड़की में, उसी चौकी पर बैठे हुए बादशाह उसी तरह सलीमा की कब्र दिन-रात देखा करते है। किसी को पास आने का हुक्म नहीं। जब आधी रात हो जाती है, तो उस गंभीर रात्रि के सन्नाटे में एक मर्म-भेदिनी गीत-ध्वनि उठ खड़ी होती है। बादशाह साफ-साफ सुनते हैं, कोई करुण-कोमल स्वर में गा रहा है –

दुखवा मैं कासे कहूँ मोरी सजनी !

[आचर्य चतुरसेन की कहानी ‘ दुखवा मैं कासे कहूँ मोरी सजनी’ से]
*        *         *           *         *         *

उसने परास्त हो कर होरी की लाठी, मिरजई, जूते, पगड़ी और तमाखू का बटुआ ला कर सामने पटक दिए।

होरी ने उसकी ओर आँखें तरेर कर कहा – क्या ससुराल जाना है, जो पाँचों पोसाक लाई है? ससुराल में भी तो कोई जवान साली-सलहज नहीं बैठी है, जिसे जा कर दिखाऊँ।
होरी के गहरे साँवले, पिचके हुए चेहरे पर मुस्कराहट की मृदुता झलक पड़ी। धनिया ने लजाते हुए कहा – ऐसे ही बड़े सजीले जवान हो कि साली-सलहजें तुम्हें देख कर रीझ जाएँगी।
होरी ने फटी हुई मिरजई को बड़ी सावधानी से तह करके खाट पर रखते हुए कहा – तो क्या तू समझती है, मैं बूढ़ा हो गया? अभी तो चालीस भी नहीं हुए। मर्द साठे पर पाठे होते हैं।

‘जा कर सीसे में मुँह देखो। तुम-जैसे मर्द साठे पर पाठे नहीं होते। दूध-घी अंजन लगाने तक को तो मिलता नहीं, पाठे होंगे। तुम्हारी दसा देख-देख कर तो मैं और भी सूखी जाती हूँ कि भगवान यह बुढ़ापा कैसे कटेगा? किसके द्वार पर भीख माँगेंगे?’
होरी की वह क्षणिक मृदुता यथार्थ की इस आँच में झुलस गई। लकड़ी सँभलता हुआ बोला – साठे तक पहुँचने की नौबत न आने पाएगी धनिया, इसके पहले ही चल देंगे।

धनिया ने तिरस्कार किया – अच्छा रहने दो, मत असुभ मुँह से निकालो। तुमसे कोई अच्छी बात भी कहे, तो लगते हो कोसने।

होरी कंधों पर लाठी रख कर घर से निकला, तो धनिया द्वार पर खड़ी उसे देर तक देखती रही। उसके इन निराशा-भरे शब्दों ने धनिया के चोट खाए हुए हृदय में आतंकमय कंपन-सा डाल दिया था। वह जैसे अपने नारीत्व के संपूर्ण तप और व्रत से अपने पति को अभय-दान दे रही थी। उसके अंत:करण से जैसे आशीर्वादों का व्यूह-सा निकल कर होरी को अपने अंदर छिपाए लेता था। विपन्नता के इस अथाह सागर में सोहाग ही वह तृण था, जिसे पकड़े हुए वह सागर को पार कर रही थी। इन असंगत शब्दों ने यथार्थ के निकट होने पर भी, मानो झटका दे कर उसके हाथ से वह तिनके का सहारा छीन लेना चाहा। बल्कि यथार्थ के निकट होने के कारण ही उनमें इतनी वेदना-शक्ति आ गई थी। काना कहने से काने को जो दु:ख होता है, वह क्या दो आँखों वाले आदमी को हो सकता है?….

[गोदान  में  प्रेमचंद]
*           *            *         *          *

हिरामन आज सुबह से तीन बार लदनी लाद कर स्टेशन आ चुका है। आज न जाने क्यों उसको अपनी भौजाई की याद आ रही है। …धुन्नीराम ने कुछ कह तो नहीं दिया है, बुखार की झोंक में! यहीं कितना अटर-पटर बक रहा था – गुलबदन, तख्त-हजारा! लहसनवाँ मौज में है। दिन-भर हीराबाई को देखता होगा। कल कह रहा था, हिरामन मालिक, तुम्हारे अकबाल से खूब मौज में हूँ। हीराबाई की साड़ी धोने के बाद कठौते का पानी अत्तरगुलाब हो जाता है। उसमें अपनी गमछी डुबा कर छोड़ देता हूँ। लो, सूँघोगे? हर रात, किसी-न-किसी के मुँह से सुनता है वह – हीराबाई रंडी है। कितने लोगों से लड़े वह! बिना देखे ही लोग कैसे कोई बात बोलते हैं! राजा को भी लोग पीठ-पीछे गाली देते हैं! आज वह हीराबाई से मिल कर कहेगा, नौटंकी कंपनी में रहने से बहुत बदनाम करते हैं लोग। सरकस कंपनी में क्यों नही काम करती? सबके सामने नाचती है, हिरामन का कलेजा दप-दप जलता रहता है उस समय। सरकस कंपनी में बाघ को …उसके पास जाने की हिम्मत कौन करेगा! सुरक्षित रहेगी हीराबाई! किधर की गाड़ी आ रही है?

‘हिरामन, ए हिरामन भाय!’ लालमोहर की बोली सुन कर हिरामन ने गरदन मोड़ कर देखा। …क्या लाद कर लाया है लालमोहर?

‘तुमको ढूँढ़ रही है हीराबाई, इस्टिसन पर। जा रही है।’ एक ही साँस में सुना गया। लालमोहर की गाड़ी पर ही आई है मेले से।

‘जा रही है? कहाँ? हीराबाई रेलगाड़ी से जा रही है?’

हिरामन ने गाड़ी खोल दी। मालगुदाम के चौकीदार से कहा, ‘भैया, जरा गाड़ी-बैल देखते रहिए। आ रहे हैं।’

‘उस्ताद!’ जनाना मुसाफिरखाने के फाटक के पास हीराबाई ओढ़नी से मुँह-हाथ ढक कर खड़ी थी। थैली बढ़ाती हुई बोली, ‘लो! हे भगवान! भेंट हो गई, चलो, मैं तो उम्मीद खो चुकी थी। तुमसे अब भेंट नहीं हो सकेगी। मैं जा रही हूँ गुरू जी!’

बक्सा ढोनेवाला आदमी आज कोट-पतलून पहन कर बाबूसाहब बन गया है। मालिकों की तरह कुलियों को हुकम दे रहा है – ‘जनाना दर्जा में चढ़ाना। अच्छा?’

हिरामन हाथ में थैली ले कर चुपचाप खड़ा रहा। कुरते के अंदर से थैली निकाल कर दी है हीराबाई ने। चिड़िया की देह की तरह गर्म है थैली।

‘गाड़ी आ रही है।’ बक्सा ढोनेवाले ने मुँह बनाते हुए हीराबाई की ओर देखा। उसके चेहरे का भाव स्पष्ट है – इतना ज्यादा क्या है?

हीराबाई चंचल हो गई। बोली, ‘हिरामन, इधर आओ, अंदर। मैं फिर लौट कर जा रही हूँ मथुरामोहन कंपनी में। अपने देश की कंपनी है। …वनैली मेला आओगे न?’

हीराबाई ने हिरामन के कंधे पर हाथ रखा, …इस बार दाहिने कंधे पर। फिर अपनी थैली से रूपया निकालते हुए बोली, ‘एक गरम चादर खरीद लेना…।’

हिरामन की बोली फूटी, इतनी देर के बाद – ‘इस्स! हरदम रूपैया-पैसा! रखिए रूपैया! क्या करेंगे चादर?’

हीराबाई का हाथ रूक गया। उसने हिरामन के चेहरे को गौर से देखा। फिर बोली, ‘तुम्हारा जी बहुत छोटा हो गया है। क्यों मीता? महुआ घटवारिन को सौदागर ने खरीद जो लिया है गुरू जी!’

गला भर आया हीराबाई का। बक्सा ढोनेवाले ने बाहर से आवाज दी – ‘गाड़ी आ गई।’ हिरामन कमरे से बाहर निकल आया। बक्सा ढोनेवाले ने नौटंकी के जोकर जैसा मुँह बना कर कहा, ‘लाटफारम से बाहर भागो। बिना टिकट के पकड़ेगा तो तीन महीने की हवा…।’

हिरामन चुपचाप फाटक से बाहर जा कर खड़ा हो गया। …टीसन की बात, रेलवे का राज! नहीं तो इस बक्सा ढोनेवाले का मुँह सीधा कर देता हिरामन।

हीराबाई ठीक सामनेवाली कोठरी में चढ़ी। इस्स! इतना टान! गाड़ी में बैठ कर भी हिरामन की ओर देख रही है, टुकुर-टुकुर। लालमोहर को देख कर जी जल उठता है, हमेशा पीछे-पीछे, हरदम हिस्सादारी सूझती है।

गाड़ी ने सीटी दी। हिरामन को लगा, उसके अंदर से कोई आवाज निकल कर सीटी के साथ ऊपर की ओर चली गई – कू-ऊ-ऊ! इ-स्स!

-छी-ई-ई-छक्क! गाड़ी हिली। हिरामन ने अपने दाहिने पैर के अँगूठे को बाएँ पैर की एड़ी से कुचल लिया। कलेजे की धड़कन ठीक हो गई। हीराबाई हाथ की बैंगनी साफी से चेहरा पोंछती है। साफी हिला कर इशारा करती है …अब जाओ। आखिरी डिब्बा गुजरा, प्लेटफार्म खाली सब खाली …खोखले …मालगाड़ी के डिब्बे! दुनिया ही खाली हो गई मानो! हिरामन अपनी गाड़ी के पास लौट आया।

हिरामन ने लालमोहर से पूछा, ‘तुम कब तक लौट रहे हो गाँव?’

लालमोहर बोला, ‘अभी गाँव जा कर क्या करेंगे? यहाँ तो भाड़ा कमाने का मौका है! हीराबाई चली गई, मेला अब टूटेगा।’

– ‘अच्छी बात। कोई समाद देना है घर?’

लालमोहर ने हिरामन को समझाने की कोशिश की। लेकिन हिरामन ने अपनी गाड़ी गाँव की ओर जानेवाली सड़क की ओर मोड़ दी। अब मेले में क्या धरा है! खोखला मेला!

रेलवे लाइन की बगल से बैलगाड़ी की कच्ची सड़क गई है दूर तक। हिरामन कभी रेल पर नहीं चढ़ा है। उसके मन में फिर पुरानी लालसा झाँकी, रेलगाड़ी पर सवार हो कर, गीत गाते हुए जगरनाथ-धाम जाने की लालसा। उलट कर अपने खाली टप्पर की ओर देखने की हिम्मत नहीं होती है। पीठ में आज भी गुदगुदी लगती है। आज भी रह-रह कर चंपा का फूल खिल उठता है, उसकी गाड़ी में। एक गीत की टूटी कड़ी पर नगाड़े का ताल कट जाता है, बार-बार!

उसने उलट कर देखा, बोरे भी नहीं, बाँस भी नहीं, बाघ भी नहीं – परी …देवी …मीता …हीरादेवी …महुआ घटवारिन – को-ई नहीं। मरे हुए मुहर्तों की गूँगी आवाजें मुखर हो
ना चाहती है। हिरामन के होंठ हिल रहे हैं। शायद वह तीसरी कसम खा रहा है – कंपनी की औरत की लदनी…।

हिरामन ने हठात अपने दोनों बैलों को झिड़की दी, दुआली से मारते हुए बोला, ‘रेलवे लाइन की ओर उलट-उलट कर क्या देखते हो?’ दोनों बैलों ने कदम खोल कर चाल पकड़ी। हिरामन गुनगुनाने लगा – ‘अजी हाँ, मारे गए गुलफाम…!’

[फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी ‘मारे गये ग़ुलफाम उर्फ तीसरी कसम’ से]
*      *       *      *       *       *     *

“बगल में बंडल-सी कोई चीज़ दबाये दरवाजे के बाहर टुन्नू खड़ा था।उसकी दृष्टि शरमीली थी और उसके पतले होठों पर झेंप भरी फीकी मुसकराहट थी। विलोल आँखें टुन्नू की आँखों से मिलाती हुई दुलारी बोली,”तुम फिर यहाँ टुन्नू? मैंने तुम्हें यहाँ आने से मना किया था न?”
टुन्नू की मुसकराहट उसके होठों में ही विलीन हो गई।उसने गिरे मन से उत्तर दिया,”साल भर का त्योहार था,इसलिए मैंने सोचा कि……”,कहते हुए उसने बगल से बंडल निकाला और उसे दुलारी के हाथों में दे दिया।दुलारी बंडल लेकर देखने लगी। उसमें खद्दर की एक साड़ी लपेटी हुई थी।टुन्नू ने कहा,”यह खास गांधी आश्रम की बनी है।”
“लेकिन इसे तुम मेरे पास क्यों लाये हो?” दुलारी ने कड़े स्वर से पूछा। टुन्नू का शीर्ण वदन और भी सूख गया।उसने सूखे गले से कहा,”मैंने बताया न कि होली का त्योहार था।..”
टुन्नू की बात काटते हुए दुलारी चिल्लाई,”होली का त्योहार था तो तुम यहाँ क्यों आये?जलने के लिए क्या तुम्हें कहीं और चिता नहीं मिली,जो दौड़े मेरे पास चले आये?तुम मेरे मालिक हो या बेटे हो या भाई हो,कौन हो?खैरियत चाहते हो तो अपना यह कफन लेकर यहाँ से सीधे चले जाओ! और उसने उपेक्षापूर्वक धोती टुन्नू के पैरों के पास फेंक दी।टुन्नू की काजल लगी बड़ी बड़ी आँखों में अपमान के कारण आँसू भर आये।उसने सिर झुकाये आर्द्र कंठ से कहा,”मैं तुम से कुछ माँगता तो हूँ नहीं।देखो, पत्थर की देवी तक अपने भक्त के द्वारा दी गयी भेंट नहीं ठुकराती,तुम तो हाड़-मांस की बनी हो।”
“हाड़-मांस की बनी हूँ तभी तो….,”दुलारी ने कहा।
टुन्नू ने जवाब नहीं दिया।उसकी आँखों से कज्जल मलिन आँसूओं की बूँदें नीचे सामने पड़ी धोती पर टप टप टपक रही थीं। दुलारी कहती गई……।

टुन्नू पाषाण-प्रतिमा बना हुआ दुलारी का भाषण सुनता जा रहा था।उसने इतना ही कहा,”मन पर किसी का बस नहीं,वह रूप या उमर का कायल नहीं होता।”और कोठरी से बाहर निकल वह धीरे धीरे सीढियाँ उतरने लगा।दुलारी भी खड़ी-खड़ी उसे देखती रही।उसकी भौं अब भी वक्र थी,परन्तु  नेत्रों में कौतुक और कठोरता का स्थान करुणा की कोमलता ने ग्रहण कर लिया था।उसने भूमि पर पड़ी धोती उठाई,उस पर काजल से सने आँसूओं के धब्बे पड़ गए थे।उसने एक बार गली की में जाते हुए टुन्नू की ओर देखा और फिर उस स्वच्छ धोती पर पड़े धब्बों को बार-बार चूमने लगी।

[शिवप्रसाद मिश्र ‘रूद्र’ ‘बहती गंगा’ में]

*           *          *         *         *      *

मेज़ पर बैठकर मैं फिर पढ़ने का उपक्रम करने लगती हूँ, पर मन है कि लगता ही नहीं। पर्दे के ज़रा-से हिलने से दिल की धड़कन बढ़ जाती है और बार-बार नज़र घड़ी के सरकते हुए काँटों पर दौड़ जाती है। हर समय यही लगता है, वह आया! वह आया!

तभी मेहता साहब की पाँच साल की छोटी बच्ची झिझकती-सी कमरे में आती है,
“आँटी, हमें कहानी सुनाओगी?”
“नहीं, अभी नहीं, पीछे आना!” मैं रूखाई से जवाब देती हूँ। वह भाग जाती है। ये मिसेज मेहता भी एक ही हैं! यों तो महीनों शायद मेरी सूरत नहीं देखतीं, पर बच्ची को जब-तब मेरा सिर खाने को भेज देती हैं। मेहता साहब तो फिर भी कभी-कभी आठ-दस दिन में खैरियत पूछ ही लेते हैं, पर वे तो बेहद अकड़ू मालूम होती हैं। अच्छा ही है, ज़्यादा दिलचस्पी दिखाती तो क्या मैं इतनी आज़ादी से घूम-फिर सकती थी?

खट-खट-खट वही परिचित पद-ध्वनि! तो आ गया संजय। मैं बरबस ही अपना सारा ध्यान पुस्तक में केंन्द्रित कर लेती हूँ। रजनीगन्धा के ढेर-सारे फूल लिए संजय मुस्कुराता-सा दरवाज़े पर खड़ा है। मैं देखती हूँ, पर मुस्कुराकर स्वागत नहीं करती। हँसता हुआ वह आगे बढ़ता है और फूलों को मेज पर पटककर, पीछे से मेरे दोनों कन्धे दबाता हुआ पूछता है, “बहुत नाराज़ हो?”
रजनीगन्धा की महक से जैसे सारा कमरा महकने लगता है।

“मुझे क्या करना है नाराज़ होकर?” रूखाई से मैं कहती हूँ। वह कुर्सी सहित मुझे घुमाकर अपने सामने कर लेता है, और बड़े दुलार के साथ ठोड़ी उठाकर कहता, “तुम्हीं बताओ क्या करता? क्वालिटी में दोस्तों के बीच फँसा था। बहुत कोशिश करके भी उठ नहीं पाया। सबको नाराज़ करके आना अच्छा भी नहीं लगता।”

इच्छा होती है, कह दूँ- “तुम्हें दोस्तों का खयाल है, उनके बुरा मानने की चिन्ता है, बस मेरी ही नहीं!” पर कुछ कह नहीं पाती, एकटक उसके चेहरे की ओर देखती रहती हूँ उसके साँवले चेहरे पर पसीने की बूँदें चमक रही हैं। कोई और समय होता तो मैंने अपने आँचल से इन्हें पोंछ दिया होता, पर आज नहीं। वह मन्द-मन्द मुस्कुरा रहा है, उसकी आँखें क्षमा-याचना कर रही हैं, पर मैं क्या करूँ? तभी वह अपनी आदत के अनुसार कुर्सी के हत्थे पर बैठकर मेरे गाल सहलाने लगता है। मुझे उसकी इसी बात पर गुस्सा आता है। हमेशा इसी तरह करेगा और फिर दुनिया-भर का लाड़-दुलार दिखलाएगा। वह जानता जो है कि इसके आगे मेरा क्रोध टिक नहीं पाता। फिर उठकर वह फूलदान के पुराने फूल फेंक देता है, और नए फूल लगाता है। फूल सजाने में वह कितना कुशल है! एक बार मैंने यों ही कह दिया था कि मुझे रजनीगन्धा के फूल बड़े पसन्द हैं, तो उसने नियम ही बना लिया कि हर चौथे दिन ढेर-सारे फूल लाकर मेरे कमरे में लगा देता है। और अब तो मुझे भी ऐसी आदत हो गई है कि एक दिन भी कमरे में फूल न रहें तो न पढ़ने में मन लगता है, न सोने में। ये फूल जैसे संजय की उपस्थिति का आभास देते रहते हैं।

[‘यही सच है’ में मन्नू भंडारी]
*          *           *            *           *

चयन, संयोजन, संपादन- सुशील सुमन 

Advertisements

All about Little Things: Love, Sex and Gender

I love you and I say this in front of Marie. Your gender looks at the whole person who has sex with her. Your sex, Alexandre, who gives me much pleasure. Your sex, Alexandre, is not important to me. That said, poured another Pernod. Your head that you understand everything, who tells stories and sounding absolutely ridiculous and pretentious. The joke among us is that one takes it very seriously and the other is not taken seriously. – Guess who takes it seriously. – Do you two or all three? Of us, Alexandre and myself. Marie, let me for once… But if I let you! Let me, I beg you, Marie, let me, by a sad story of sex… Understand that stories of sex for me is unimportant. And I do not care if foll�is. I’m so happy with you. I do not care. Understand once and for all brings me to cool Look, I’m starting to get drunk and mumbling. It is absolutely horrible because I say what I think. And I could stay with you all the time, I’m so happy. I feel loved by both. And the other is looking at me with eyes of moths, thinking: “Small, still talking, but I pillars. I beg you, I’m not pretending. But what do you think? For me there are no whores. For me, a girl who fuck with anyone not a whore. To me there is no whores, that’s all. Anyone can suck, fuck and can not be a bitch. I agree. There are no whores on earth, hell, you know. Surely you understand. A married woman who is happy and dreaming of fucking anyone. with the head of her husband, an actor of shit with the milkman, the plumber, is a whore? There. What does the word “whore”? Only pussies, there is only sex. What do you think? It is sad, eh? It is very cheerful. I leave myself screwed by anyone. I fucked and I have a great time. Why did you give much importance to sex stories? Sex… Fuck me good. How I love you! Only you can fuck well. How to deceive people! What are gullible! Only one you, there’s only one me. Only you can fuck well. Only I can be fucked well for you. How funny! What a horrible and sordid! Damn! What a sordid and horrible! If you knew as I love them both. And the little that has to do with sex. I recently deflowered with 19 or 20 years. How little does! And then I had a lot of lovers. And I’m fucked. It may be a patient, a chronic case of nymphomania. And yet I do not care. Getting pregnant would be a real tostonazo. I have an “Tampax” and to take it off and fuck should do their best, brings me to the cooler. If people could understand that fucking sucks. There is only a beautiful thing: Because you love so fuck you want to create a child that you like. If not, is something sordid. You just have to fuck when two people really want. I’m not drunk. If I cry, I do it for all my past life. My past sexual life, which is so short. Five years of sexual life is very short. You see, Marie? I speak because I love you. So many men have fucked me… I have wanted to, you know? I wanted to because I have a fat ass in a given time may be desirable. I have beautiful breasts that are very desirable. My mouth is not bad. And when I paint the eyes, are not bad. And I have fucked a lot in a vacuum. I have wished so in a vacuum. I’m dramatizing, Marie, I’m not drunk. What do you think? What I pity my damn lucky? Not at all. I fucked like a whore. But, you know? I think a man will come some day, love me and make a child because I love it. And love is only valid when you want to have a baby. If you want a child, you feel that you love. A couple who does not want a child, is not a partner, it sucks. Anything, a speck of dust. Couples released… You screwed by your side, darling, fuck me for mine. We are very happy together. We met. We are so good… It is no reproach, on the contrary. My sadness is not a reproach, you know? It’s an old sadness we have had for 5 years. It is your affair. How well he sees you together! Look, you will be happy.

The Mother and The Whore(1973)

The Mother and The Whore(1973)

We get less pay for the same work as men. We’re less likely to get jobs […] We’re less likely to be educated, less likely to be unionized.The present setup of the family puts great strains on us. Either we’re struggling to combine badly paid work with bringing up a family or unable to do work for which we’ve been trained.The area of taboo on our sexuality is much more extensive, and the double standard is still pervasive. Some women still never experience orgasm.When we complain, it’s about little things. We want to drive buses and play football. We don’t want to be brought with bottles or expensive wines, We don’t want to be wrapped up in cellophane, sent off to make tea or shuffled into the social committee. And when you complain about the little things, you get stuck in the little things. It’s difficult to get out of them. It’s difficult to get beyond them and there’s no way they can be dismissed because people say, “Well, you’re just trying to be as men.”But it’s the little things which happen to you all the time.every day, all the time, wherever you go, all your life, which make revolutions. Revolutions are about little things.It’s here that the subordinated relates to the dominated. It’s here that discontent focuses…it’s here the experience is felt, is expressed, articulated, resisted through the particular….the particular pummel you gently into passivity, so that you can’t even see beyond the little things, beyond the particular.We don’t how to find one another or ourselves. Thus we are divided like all oppressed groups, divided by real situations and in our understanding and consciousness of our condition.We’re in different classes, as we devour and use one another.Emancipation is often only the struggle of the privileged to improve and consolidate its superiority.The women of the working class remain the exploited of the exploited, oppressed as workers and oppressed as women.We’re divided, too, because sometimes we’re with families and sometimes we’re without them. This makes us distrust one another, because the woman with a home and children….is suspicious of the women with no ties; she sees her as a threat, a potential threat to her territorial security.And the single woman feels the married woman is being subtly critical of her because she’s not fulfilling her role as homemaker, her function as child bearer. She feels that she’s being accused of being unable to be a woman.They tell us what we should be as we grow up, especially from puberty, we’re under intensive pressure to be acceptable, not to put ourselves outside the safety net of marriage. We’re taught from small girls that failure means not being selected by men. It’s the same as being..The sign of intelligence and subtlety is being able to secure the contractual bargain, handing over your virginity for a marriage document. Orgasm is a matter of merchandise. They don’t like us to be too clever. Remember: you might go to university, but men want someone who can cook. The emphasis in our education tends to be much more on integration. The encouragement of active criticism, of intellectual aggression, is very rare. It’s the cautious virtues which predominate.This is difficult when you find yourself in an intellectual confrontation with men, because there’s a double bind…..it’s assumed you have nothing to say, or it’s difficult to assert that you want to say something to say, or you’re observed to say nothing they assume you’ve got nothing to say.It’s very difficult to stray from the definition of what they want because there’s a danger of being rejected in a double sense. You’re not only rejected as a rebel, but you’re rejected for a moral reason, too. It’s much more difficult to cope with the moral thing. There’s still the whole dirty frightened patronizing world behind “slut,” “tart,” “old slag,” “nymphomaniac,” “dolly,” “bird,” “chick,” “bit of stuff,” “bit of crumpet,” “old bag,” “silly cow,” “bluestocking.” These words have got no male equivalents because there are no male equivalents…limited liberated areas. You give up struggling on every front and you ease into a niche of acceptance. You become the educated housewife with your cooking recipes. Or the image of the suffragette, which is a distorted image: tweedy, [with an air of authority, short hair] and a deep voice, advancing aggressively on the male world, in the boardroom The sexual oppression of this […] is a profound distaste for the male: emancipation simply becomes doing without men.Sexuality is another retreat. Because you haven’t had the choice, the free choice, of what to do with your bodies because they’ve been part of somebody else’s belongings. You prove that you have got control, that you are liberated, simply by fucking. But if you can’t extend the definition of your constraint beyond this, you’re in an even worse hang-up. Because you’re just caught: you’re reacting..you’re reacting not because you’re trying to say, “I want to be something else.” You’re just reacting to…They forget that you’re trapped within a system. You’re trapped fundamentally, through your class.And you’re trapped because you’re still reacting to the definition that somebody else has of you..Marxists have always stressed, when they talk about the subordination of women, that it’s part of the total, mutual devouring process called capitalism. They’ve said that capitalism forces people to eat each other….and that the false relationships between men and men, and women and men, are part of this process. But sometimes this has been twisted into a rather glib distinction..They’ve said, “It’s just an economic thing.” They’ve said, “Wait until we get the revolution, then we’ll deal you actual equality. We’ll give you equal pay, and we’ll give you nursery schools.”Another thing they’ve said is that the way that women are subordinated is through the family…..through a particular kind of historical process which developed along with capitalism. And therefore they’ve said, “When we’ve abolished capitalism, we can then go on to abolish the family….but people are attached to the family now, so you can’t do anything about it.” And in a way you can’t do anything about any of the situations of capitalism, ultimately. But in every other area – in the situation of the working class or in the situation of Negroes – where there’s an idea of struggle..there’s always been the idea that you work firstly for reforms, and then you put forward strategic demands. These are kinds of reforms which cannot be granted in the system, but they lead on to new kinds of possible alternatives. And it seems that it would be a good thing to apply this to women: that is, by asking certain things, you not only get a better condition, but you expose the inadequacies and the contradictions within the system.

British Sounds a.k.a. See You at Mao(1969)

British Sounds a.k.a. See You at Mao(1969)

On Love, Sex and Gender: Lenin’s “Own Words”

Sex and Love

Absorption in the Problem of Sex

“The mention of Freud’s hypothesis is designed to give the pamphlet a scientific veneer, but it is so much bungling by an amateur. Freud’s theory has now become a fad. I mistrust sex theories expounded in articles, treatises, pamphlets, etc. — in short, the theories dealt with in that specific literature which sprouts so luxuriantly on the dung heap of bourgeois society. I mistrust those who are always absorbed in the sex problems, the way an Indian saint is absorbed in the contemplation of his navel. It seems to me that this superabundance of sex theories, which for the most part are mere hypotheses, and often quite arbitrary ones, stems from a personal need. It springs from the desire to justify one’s own abnormal or excessive sex life before bourgeois morality and to plead for tolerance towards oneself. This veiled respect for bourgeois morality is as repugnant to me as rooting about in all that bears on sex. No matter how rebellious and revolutionary it may be made to appear, it is in the final analysis thoroughly bourgeois.”(Clara Zetkin,Reminiscences of Lenin, p. 101)

Lenin was not interested in the approach of the method whereby Freud’s “theory” was used to explain everything, as well as “rooting about in all that bears on sex.” This was based simply on a hypothesis — and moreover a nonsensical one. Lenin ridiculed people “who are always absorbed in the sex problems” and the “superabundance of sex theories.”

In bourgeois society the question of sex is one-dimensionally exaggerated in the name of “sexual liberation,” meaning that instead of sex being dealt with in a truly healthy manner, it becomes increasingly mystified and aggrandized, and what is worse, by sex being turned into a business and treated vulgarly, this especially distorts and eats away at the healthy spirit of youth, turning it into something abnormal and lopsided — and this is something that we can see occurring every day. Lenin recognized that a one-dimensional exaggeration of sex in this distorted form is connected to the rule of the bourgeoisie and serves the interests of bourgeois society. Therefore, Lenin took an attitude of extreme cautious towards attempts to place the psychological concern with sex at the center of things.

“Glass-of-water theory”

“You must be aware of the famous theory that in communist society the satisfaction of sexual desire, of love, will be as simple and unimportant as drinking a glass of water. The glass of water theory has made our young people mad, quite mad…I think this glass of water theory is completely un-Marxist, and moreover, anti-social. In sexual life there is not only simple nature to be considered, but also cultural characteristics, whether they are of a high or low order…Of course, thirst must be satisfied. But will the normal man in normal circumstances lie down in the gutter and drink out of a puddle, or out of a glass with a rim greasy from many lips? But the social aspect is the most important of all. Drinking water is of course an individual affair. But in love two lives are concerned, and a third, a new life, arises. It is that which gives it its social interest, which gives rise to a duty towards the community.”(Clara Zetkin, Reminiscences of Lenin, p. 49)

In periods of turmoil, it is easy for sexual relations to be overturned. The French Revolution is a classic example of this. During the 1917 Russian Revolution, and the subsequent civil war, the past order, authority, and morality were completely rejected, collapsed, and were overturned, and a new order and morality emerged. In such an age, it was inevitable that sexual relations among young people would also be very confused and tend towards being impulsive.

A “communist” theory that encouraged this also emerged, and the “glass-of-water theory” criticized here is one example. There was much talk at the time of a new sexual lifestyle, and Kollontai’s history of women sang the praises of absolute free love.

Lenin opposed this tendency, and sought “self-control and self-discipline” even in affairs of love, warning that “dissoluteness in sexual life is bourgeois [and] a phenomenon of decay” and that this should not be imitated. He asked how this “glass-of-water theory” was any different from bourgeois decadent thought.

Lenin, in particular, pointed out that the “glass-of-water theory” completely ignored the social aspect of love. Certainly the drinking of a cup of water is merely an individual thing. But love, although seen as something “private,” in fact has another aspect. Love is first of all a relationship and connection between two people. Therefore, it is already a social relation. Moreover, through the connection of two people, a “third new life” can be born. Seen from the perspective of humanity, the birth of a child through the relationship between a man and a woman is of decisive social importance. Thus, the social significance of love must be noted, rather than viewing it as purely individual problem. Young people tend to view this as a purely individual problem, and there is no lack of theories that appeal to this tendency. However, according to Lenin this is a mistake and he says that, “as a communist I have not the least sympathy for the glass of water theory, although it bears the fine title ‘satisfaction of love.’”

On “Free Love”

“I feel bound to make one point right away. I suggest you delete altogether paragraph 3 dealing with ‘the demand (on the part of women) for free love.’ This is, in fact, a bourgeois, not a proletarian demand. What do you really mean by it?” (Jan. 17, 1915 letter to Inessa Armand, Collected Works vol. 34)

This is one part of Lenin’s reply to Inessa Armand’s plan to publish a pamphlet for women workers. Lenin says that the section on women’s’ “demand for free love” should be eliminated because it is a “bourgeois, not a proletarian demand.” In other words, “what matters is the objective logic of class relations in affairs of love,” not subjective hopes.

Does the term “free love” really express the interests of the proletarian in “freedom from material (financial) considerations in love,” and freedom “from material cares”? The answer is no. What, then, does this term express? Lenin points out that “in modern society the most talkative and noisy ‘top strata’ mean by ‘free love’” such things as “freedom from earnestness in love,” “freedom from childbirth,” and “freedom to commit adultery.” Therefore, he finds the slogan of “free love” to be a demand of bourgeois women.

Pure and Impure Kisses

“Even fleeting passion, a passion liaison” is ‘more poetic and pure’ than the ‘loveless kisses’ exchanged as a matter of habit between husband and wife. That is what you write. And you propose writing this in your pamphlet. Excellent. Is this counterposing logical?  Loveless kisses which a husband and wife exchange as a matter of habit are impure. Agreed. What do you want to make the contrary? A loving kiss, it would appear. No. You make the contrary a ‘passing’ (why passing?) ‘passion’ (why not love?). It follows logically that these loveless kisses (since they are passing) are the contrary of loveless kisses exchanged between husband and wife… strange!” (Jan. 24, 1915 letter to Inessa Armand, Collected Works vol. 34)

Inessa Armand raised the idea of “free love,” or “even a short-lived passion and love affair,” in opposition to a vulgar, loveless marriage. But Lenin found this a strange opposition. He felt that a loveless connection between a man and a woman should be contrasted instead with a loving relationship. And so Armand was being inconsistent by contrasting a loveless relationship with another unloving relationship of fleeting passion. For this reason, Lenin gave her the following advice: “Would it not be better in a popular pamphlet to contrast the petty-bourgeois, intellectual or peasant vulgar and dirty marriage without love to the proletarian civic marriage with love (and add, if you must have it in, that a short-lived passionate affair can be pure and can be dirty).” (Ibid.)ussr-1

The Woman Question

Sexual Discrimination and the Subjection and Oppression of Women

“The female half of the human race is doubly oppressed under capitalism. The working woman and the peasant woman are oppressed by capital, but over and above that, even in the most democratic of the bourgeois republics, they remain, firstly, deprived of some rights because the law does not give them equality with men; and secondly — and this is the main thing — they remain in ‘household bondage,’ they continue to be ‘household slaves,’ for they are overburdened with the drudgery of the most squalid and backbreaking and stultifying toil in the kitchen and the individual family household.” (“Speech on International Women’s Day”Collected Works vol. 32)

For the past century, the leaders of the emancipation movement in Europe and the North America have called for legal equality for women. But under capitalism it has even been impossible to consistently sustain the formal equality represented by equality under the law. Real equality has remained elusive. This is because women have been trapped in the position of “household slave.” Fourier once made the profound statement that one can judge the true nature of a society by looking at the position of women within it, and to know the historical limitations of capitalism, it is enough to see how half-baked, hypocritical, and deceptive “women’s emancipation” has been under capitalism. Not only has capitalism been unable to free women from “household bondage,” but in fact offers up fraudulent arguments to justify and prettify this situation, endlessly reproducing paens on the superiority of housewives and their devotion. The situation in which the energy of housewives is needlessly wasted needs to be negated, and sublated. How, then, can this be done?

Conditions for the Emancipation of Women

“Owing to her work in the house, the woman is still in a difficult position. To effect her complete emancipation and make her the equal of the man it is necessary for housework to be socialized and for women to participate in common productive labor. Then women will occupy the same position as men.” (“The Tasks of the Working Women’s Movement in the Soviet Republic” Collected Works vol. 30)

In order for women to be liberated Lenin says that two things are necessary: first of all individual housework and housekeeping must be eliminated (are at least reduced to being on the level of a supplemental pastime), and secondly women must participate in common productive labor along with men.

However, have these two things been achieved in bourgeois society, and if so to what extent and in what form have they been achieved?

In bourgeois society, women’s participation in productive labor has been realized to a certain extent. Already one big part of production, and a significant part of such social labor as the textile industry, electrical appliance production, retail labor, service industries, management, agriculture, etc. is performed by women. Needless to say, this participation in the labor force is defended from the stingy bourgeois individualists who say “a woman’s place is in the home.” The issue here is that since, in bourgeois society, this necessary participation is not accompanied by other conditions women are forced to bear an increasingly heavy burden. The issue is not the participation of women in the workforce itself, since this participation is historically inevitable. Without such participation any talk of improving women’s position in society or emancipation would be meaningless.

However, in bourgeois society do the conditions exist for women to participate equally in production alongside men? Has the creation of such conditions actually been seriously considered in bourgeois society? And could this actually be achieved in such a society?

Socialism and the Emancipation of Women

“The real emancipation of women, real communism will begin only where and when a mass struggle begins (led by the proletariat wielding the power of the state) against this petty household economy, or rather when its wholesale transformation into large-scale socialist economy begins.

“Public dining rooms, creches, kindergartens — here we have examples of these shoots, here we have the simple, everyday means, involving nothing pompous, grandiloquent or ceremonial, which can in actual fact emancipate women, which can in actual fact lessen and abolish their inequality with men as regards their role in social production and public life. These means are not new, they (like all the material prerequisites for socialism) were created by large-scale capitalism; but under capitalism they remained, first, a rarity, and secondly, which is particularly important, either profit-making enterprises, with all the worst features of speculation, profiteering, cheating and fraud, or “acrobatics of bourgeois philanthropy,” which the best workers rightly detested and despised.” (“A Great Beginning” Collected Works vol. 29, p. 429)

Here I basically have little to add to what Lenin has already said here. Just think of how many women would like to work but cannot because daycare is unavailable, or those who are reluctant to leave their children at the hands of daycare profits run for the sole purpose of profit! The bourgeoisie not aware that to improve this situation even slightly would require a fundamental change; and even if they were the defense of their own interests would prevent them from doing anything about this. Lenin’s view here that the true liberation of women could only come through the efforts of a proletarian government is filled with very profound truth.417868_357314191055982_1553055859_n

On the Freedom of Divorce

“This example clearly demonstrates that one cannot be a democrat and socialist without demanding full freedom of divorce now, because the lack of such freedom is additional oppression of the oppressed sex — though it should not be difficult to realize that recognition of the freedom to leave one’s husband is not an invitation to all wives to do so!” (“A Caricature of Marxism and Imperialist Economism”Collected Works vol. 23, p. 72)

Of course, even if the complete freedom of divorce is ensured by law, the true liberation of women is still far away. This is because divorce is first of all an individual solution, and therefore an incomplete one. Secondly, in bourgeois society, owing to women’s economic dependence this right cannot always be exercised. Nevertheless, Lenin defended this right and recognized its significance because “the fuller the freedom of divorce, the clearer will women see that the source of their ‘domestic slavery’ is capitalism, not lack of rights” (Ibid. p. 73). Just as Lenin was opposed to bourgeois liberals who felt that protecting the right of divorce was sufficient in itself, he also opposed “extreme leftists” who said that it was problematic to give unconditional support to this demand since it does not represent the fundamental solution to the problem or signify the true liberation of women.

Workers and the Value of the Birth Control Movement

“And to fight not singly as did the best of our fathers and not for deceitful bourgeois slogans, but for our own slogans, the slogans of our class. We fight better than our fathers. Our children will fight still better and they will win. The working class is not dying. It is growing, becoming strong, grown up, united; it is learning and becoming tempered in struggle. We are pessimists as regards serfdom, capitalism and small-scale production, but ardent optimists about the workers’ movement and its aims. We are already laying the foundations of the new building and our children will finish its construction.

“That is why — and that is the only reason — we are unconditional enemies of neo-Malthusianism, which is a trend proper to the petty-bourgeois couple, hardened and egoistical, who mutter fearfully: ‘Only let us hang on somehow. As for children, we’d better not have any.’ It stands to reason that such an approach does not in any way prevent us from demanding the unconditional repeal of all laws persecuting abortion or laws against the distribution of medical works on contraceptive measures and so on. Such laws are simply the hypocrisy of the ruling classes. These laws do not cure the ills of capitalism, but simply turn them into especially malignant and cruel diseases for the oppressed masses.” (“The Working Class and Neo-Malthusianism” Collected Works vol. 19, p. 236)

Lenin was opposed to the Neo-Malthusian birth control movement. This was because this movement was based on egotistical thinking and adopted a hopeless, demoralized view of the future. This is connected to the feeling of fearful petty bourgeois who want to decrease the number of children who they feel only increase the amount of hardship and unhappiness. Workers, however, are different, and have nothing to do with the cries of those who tell people to avoid bearing children since they will only “be maimed” by society. Lenin instead looks to children of the future to “fight better, more unitedly, consciously and resolutely than we are fighting against the present-day conditions of life that are maiming and ruining our generation?” (Ibid. p. 237)

This isn’t in contradiction, however, with the position of opposing laws against abortion, since “such laws are nothing but the hypocrisy of the ruling classes” which “do not heal the ulcers of capitalism [but] merely turn them into malignant ulcers that are especially painful for the oppressed masses.” (Ibid.) The problem lies with efforts that seek to tie a cowardly petty bourgeois dogma to the movement of workers struggling for socialism.

The Woman Question and Social Problems

“And what is the result of this futile, un-Marxist dealing with the question? That questions of sex and marriage are understood not as part of the large social question? No, worse! The great social question appears as an adjunct, a part, of sexual problems. The main thing becomes a subsidiary matter. That does not only endanger clarity on that question itself, it muddles the thoughts, the class consciousness of proletarian women generally.” (Clara Zetkin, Reminiscences of Lenin, p. 54)

Lenin says that he could “scarcely believe [his] ears” when he hared that the chief subjects of interest at “reading and discussion evenings” of German women comrades was sex and marriage.   As we have already seen, Lenin was not fond of the bourgeois tendency to speak of sex exaggeratedly. Here as well, Lenin was opposed to women devoting themselves solely to questions of sex and marriage. For him, the most fundamental question is the “great social question” — in other words, the question of the revolutionary overturn of the capitalist system — and the women’s question is one part of this. Lenin emphasized that these women comrades should always bear in mind this and position the women’s question clearly within this overall question.

Courtesy- http://www.mcg-j.org/e-index.html

Post Navigation

%d bloggers like this: