Archive for the month “February, 2015”

वैलेंटाइन डे और हिंदी गद्य के कुछ छींटें

प्रेम मनुष्यता की चरम अभिव्यक्ति है और जाहिर है कि शोषक तंत्र के खिलाफ़ प्रतिरोध की भी।आज के समय में एक तरफ जहाँ वर्चस्ववादी सत्ताएँ सच्चे प्रेम के प्रति बेहद हिंसक बर्ताव कर रही हैं,वहीँ बाज़ार इसकी आत्मा के साथ खिलवाड़ कर रहा है,जहाँ स्त्री-पुरुष को उसने अपने लाभ के लिए खेल के मोहरों में तब्दील कर दिया है।प्रेम पर दोतरफा हमला लगातार जारी है। एक तरफ से प्रेम का गला मरोड़ा जा रहा है तो दूसरी ओर से उसको प्राणविहीन करने की कोशिश की जा रही है। प्रेम के लिए इस अत्यंत कठिन समय में साहित्य में बिखड़े  अनेक प्रेममय पन्नों में से कुछ पन्नों की प्रस्तुति  प्रेम के पक्ष में जारी संघर्ष में शामिल होने का एक प्रस्ताव है। #सुशील सुमन 

By  Banksy

By Banksy

यदि कोई बुढ़िया बार-बार चितौनी देने पर भी लीक से नहीं हटती, तो उनकी बचनावली के ये नमूने हैं — ‘हट जा जीणे जोगिए; हट जा करमा वालिए; हट जा पुतां प्यारिए; बच जा लम्बी वालिए।’ समष्टि में इनके अर्थ हैं, कि तू जीने योग्य है, तू भाग्योंवाली है, पुत्रों को प्यारी है, लम्बी उमर तेरे सामने है, तू क्यों मेरे पहिये के नीचे आना चाहती है? बच जा।

ऐसे बम्बूकार्टवालों के बीच में होकर एक लड़का और एक लड़की चौक की एक दूकान पर आ मिले। उसके बालों और इसके ढीले सुथने से जान पड़ता था कि दोनों सिक्ख हैं। वह अपने मामा के केश धोने के लिए दही लेने आया था, और यह रसोई के लिए बड़ियाँ। दुकानदार एक परदेसी से गुँथ रहा था, जो सेर-भर गीले पापड़ों की गड्डी को गिने बिना हटता न था।
“तेरे घर कहाँ है?”
“मगरे में; और तेरे?”
” माँझे में; यहाँ कहाँ रहती है?”
“अतरसिंह की बैठक में; वे मेरे मामा होते हैं।”
“मैं भी मामा के यहाँ आया हूँ, उनका घर गुरुबाज़ार में हैं।”

इतने में दुकानदार निबटा, और इनका सौदा देने लगा। सौदा लेकर दोनों साथ-साथ चले। कुछ दूर जा कर लड़के ने मुसकराकार पूछा, “तेरी कुड़माई हो गई?”
इस पर लड़की कुछ आँखें चढ़ा कर ‘धत्’ कह कर दौड़ गई, और लड़का मुँह देखता रह गया।

दूसरे-तीसरे दिन सब्ज़ीवाले के यहाँ, दूधवाले के यहाँ अकस्मात दोनों मिल जाते। महीना-भर यही हाल रहा। दो-तीन बार लड़के ने फिर पूछा, ‘तेरी कुड़माई हो गई?’ और उत्तर में वही ‘धत्’ मिला। एक दिन जब फिर लड़के ने वैसे ही हँसी में चिढ़ाने के लिए पूछा तो लड़की, लड़के की संभावना के विरुद्ध बोली, “हाँ हो गई।”
“कब?”
“कल, देखते नहीं, यह रेशम से कढ़ा हुआ सालू।”

लड़की भाग गई। लड़के ने घर की राह ली। रास्ते में एक लड़के को मोरी में ढकेल दिया, एक छावड़ीवाले की दिन-भर की कमाई खोई, एक कुत्ते पर पत्थर मारा और एक गोभीवाले के ठेले में दूध उड़ेल दिया।नहाकर आती हुई किसी वैष्णवी से टकरा कर अन्धे की उपाधि पाई। तब कहीं घर पहुँचा।

[गुलेरी जी की कहानी ‘उसने कहा था’ से जिसका यह शताब्दी-वर्ष है]

(1)

”किरण  – तुम्हारे कानों में क्या है ?”

उसने कानों से चंचल लट को हटा कर कहा –  ”कंगना”!

सचमुच दो कंगन कानों को घेर कर बैठे थे ।

”अरे ! कानों में कंगना ?”

”हाँ – तब कहाँ पहिनूँ?

*         *          *           *           *          *
(4 )
बरसात की रात थी । रिमझिम-रिमझिम बूँदों की झड़ी लगी हुई थी । चाँदनी मेघों से
आँख-मुदौअल खेल रही थी । बिजली, लोल कपाट से बार बार झाँकती थी । वह किसे चंचल देखती थी, और बादल किस मसोस से रह रह कर चिल्लाते थे, इन्हें सोचने का मुझे अवसर नहीं था । मैं तो किन्नरी के दरवाजे से हताश लौटा था, ऑंखों के ऊपर न चाँदनी थी, न बदली। त्रिशंकु ने स्वर्ग को जाते जाते बीच ही से टँग कर किस दु:ख को उठाया, और मैं तो अपने स्वर्ग के दरवाजे पर सर रख निराश लौटा, तो मेरी वेदना क्यों न बड़ी हो । हाय । एक ऍंगूठी भी रहती तो इसे दिखा कर, उसके चरणों से चन्दन चाटता ।

      घर पर आते ही जूही को पुकार उठा – ”जूही । जूही । किरण के पास कुछ भी बचा-वचा हो तो फौरन जा कर माँग लाओ ।” ऊपर से कोई आवाज नहीं आई, केवल सर के ऊपर से एक काला बादल, कालान्त चीत्कार से चिल्ला उठा । मेरा मस्तिष्क घूम गया । मैं तत्क्षण कोठे पर दौड़ा ।

      सब संदूक झाँपे, जो कुछ मिला सब तोड़ डाला, लेकिन मिला कुछ भी नहीं । आलमारी में केवल मकड़े का जाला था । श्रृंगार-बक्स में एक छिपकली बैठी थी । उसी दम किरण पर झपटा ।

      पास जाते ही सहम गया । वह एक तकिये के सहारे नि:सहाय, निस्पन्द लेटी हुई थी । चाँदनी ने खिड़की से आकर उसे गोद में ले रक्खा था, और वायु उस शान्त शरीर पर जल से भिगोया पंखा झल रही थी । मुख पर एक अपरूप छटा थी । कौन कहे कहीं जीवन की शेष रश्मि क्षण भर वहीं अटकी हो । ऑंखों में एक जीवन योति थी । शायद प्राण शरीर से निकलकर किसी आसरे से वहीं बैठ रहा था । मैं फिर पुकार उठा – ”किरण तुम्हारे पास कोई और गहना भी बच गया है”?

      ”हाँ” – क्षीण कण्ठ की काकली थी ।

      ”कहाँ है – अभी देखने दो।”

    उसने धीरे से घूँघट सरका कर कहा –
”वही, कानों का कंगना ।”

      सर तकिये से ढल पड़ा । आँखें भी झिप गयीं । वह जीवन्त रेखा कहाँ उड़ गयी । क्या इतने ही के लिए अब तक ठहरी थी ?

      मेरी आंखें मुख पर जा पड़ीं-वहीं कंगन थे, वैसे ही कानों को घेर कर बैठे थे । मेरी स्मृति तड़िद्वेग से चमक उठी । दुष्यन्त ने अँगूठी को पहिचान लिया था – भूली शकुन्तला, तत्क्षण याद आ गयी थी । लेकिन, दुष्यन्त सौभाग्यशाली थे, चक्रवर्ती राजा थे, अपनी प्राणप्रिया को आकाश पाताल छान कर ढूंढ निकाला । मेरी किरण तो इस भूतल पर नहीं थी, कि किसी तरह प्राण देकर भी पता पाता । परलोक से ढूँढ़ निकालूँ ऐस शक्ति इस दीन हीन मानव में कहाँ?

सारी बातें सूझ गयीं । चढ़ा नशा उतर पड़ा, आँखों पर की पट्टी खुल गयी, लेकिन हाय खुली भी तो उसी समय, जब जीवन में केवल अंधकार ही अंधकार रह गया ।

[राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह की कहानी ‘कानों में कंगना’ से]
*      *        *      *       *     *    *

एक घने कुञ्ज में अरुण और मधूलिका एक दूसरे को हर्षित नेत्रों से देख रहे थे। सन्ध्या हो चली थी। उस निविड़ वन में उन नवागत मनुष्यों को देखकर पक्षीगण अपने नीड़ को लौटते हुए अधिक कोलाहल कर रहे थे।
प्रसन्नता से अरुण की आँखे चमक उठीं। सूर्य की अन्तिम किरण झुरमुट में घुसकर मधूलिका के कपोलों से खेलने लगी। अरुण ने कहा-चार प्रहर और, विश्वास करो, प्रभात में ही इस जीर्ण-कलेवर कोशल-राष्ट्र की राजधानी श्रावस्ती में तुम्हारा अभिषेक होगा और मगध से निर्वासित मैं एक स्वतन्त्र राष्ट्र का अधिपति बनूँगा, मधूलिके!
भयानक! अरुण, तुम्हारा साहस देखकर मैं चकित हो रही हूँ। केवल सौ सैनिकों से तुम…
रात के तीसरे प्रहर मेरी विजय-यात्रा होगी।
तो तुमको इस विजय पर विश्वास है?
अवश्य, तुम अपनी झोपड़ी में यह रात बिताओ; प्रभात से तो राज-मन्दिर ही तुम्हारा लीला-निकेतन बनेगा।

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अपने साहसिक अभियान में अरुण बन्दी हुआ और दुर्ग उल्का के आलोक में अतिरञ्जित हो गया। भीड़ ने जयघोष किया। सबके मन में उल्लास था। श्रावस्ती-दुर्ग आज एक दस्यु के हाथ में जाने से बचा था। आबाल-वृद्ध-नारी आनन्द से उन्मत्त हो उठे।
ऊषा के आलोक में सभा-मण्डप दर्शकों से भर गया। बन्दी अरुण को देखते ही जनता ने रोष से हूँकार करते हुए कहा-‘वध करो!’ राजा ने सबसे सहमत होकर आज्ञा दी-‘प्राण दण्ड।’ मधूलिका बुलायी गई। वह पगली-सी आकर खड़ी हो गई। कोशल-नरेश ने पूछा-मधूलिका, तुझे जो पुरस्कार लेना हो, माँग। वह चुप रही।
राजा ने कहा-मेरी निज की जितनी खेती है, मैं सब तुझे देता हूँ। मधूलिका ने एक बार बन्दी अरुण की ओर देखा। उसने कहा-मुझे कुछ न चाहिए। अरुण हँस पड़ा। राजा ने कहा-नहीं, मैं तुझे अवश्य दूँगा। माँग ले।
तो मुझे भी प्राणदण्ड मिले। कहती हुई वह बन्दी अरुण के पास जा खड़ी हुई।

[जयशंकर प्रसाद की कहानी ‘पुरस्कार’ से]
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बादशाह शाम की हवाखोरी को नजर-बाग में टहल रहे थे। दो-तीन खोजे घबराए हुए आए और चिठ्ठी पेश करके अर्ज की – ‘हुजूर, गजब हो गया। सलीमा बीबी ने जहर खा लिया और वह मर रही है।’

क्षण भर में बादशाह ने खत पढ़ लिया। झपटे हुए महल में पहुँचे। प्यारी दुलहिन सलीमा जमीन पर पड़ी है। आँखें ललाट पर चढ़ गई हैं। रंग कोयले के समान हो गया है। बादशाह से रहा न गया। उन्होंने घबराकर कहा – ‘हकीम, हकीम को बुलाओ!’ कई आदमी दौड़े।

बादशाह का शब्द सुनकर सलीमा ने उनकी तरफ देखा, और धीमे स्वर में कहा – ‘जहे किस्मत।’

बादशाह ने नजदीक बैठकर कहा – ‘सलीमा, बादशाह की बेगम होकर तुम्हें यही लाजिम था?’

सलीमा ने कष्ट से कहा – ‘हुजूर, मेरा कुसूर मामूली था।’

बादशाह ने कड़े स्वर में कहा – ‘बदनसीब! शाही जनानखाने में मर्द को भेष बदलकर रखना मामूली कुसूर समझती है? कानों पर यकीन कभी न करता, मगर आँखों देखी को झूठ मान लूँ?’

जैसे हजारों बिच्छुओं के एक साथ डंक मारने से आदमी तड़पता है, उसी तरह तड़पकर सलीमा ने कहा – ‘क्या?’

बादशाह डरकर पीछे हट गए। उन्होंने कहा -‘सच कहो, इस वक्त तुम खुदा की राह पर हो, यह जवान कौन था?’

सलीमा ने अचकचाकर पूछा, ‘कौन जवान?’

बादशाह ने गुस्से से कहा – ‘जिसे तुमने साकी बनाकर अपने पास रक्खा था?’

सलीमा ने घबराकर कहा – ‘हैं! क्या वह मर्द है?’

बादशाह – ‘तो क्या, तुम सचमुच यह बात नहीं जानतीं?’

सलीमा के मुँह से निकला – ‘या खुदा।’

फिर उसके नेत्रों से आँसू बहने लगे। वह सब मामला समझ गई। कुछ देर बाद बोली – ‘खाविन्द! तब तो कुछ शिकायत ही नहीं; इस कुसूर की तो यही सजा मुनासिब थी। मेरी बदगुमानी माफ फरमाई जाए। मैं अल्लाह के नाम पर पड़ी कहती हूँ, मुझे इस बात का कुछ भी पता नहीं है।’

बादशाह का गला भर आया। उन्होंने कहा – ‘तो प्यारी सलीमा, तुम बेकुसूर ही चलीं?’ बादशाह रोने लगे।

सलीमा ने उनका हाथ पकड़कर अपनी छाती पर रखकर कहा – ‘मालिक मेरे! जिसकी उम्मीद न थी, मरते वक्त वह मजा मिल गया। कहा-सुना माफ हो, एक अर्ज लौंडी की मंजूर हो।’

बादशाह ने कहा – ‘जल्दी कहो, सलीमा?’

सलीमा ने साहस से कहा – ‘उस जवान को माफ कर देना।’

इसके बाद सलीमा की आँखों से आँसू बह चले और थोड़ी ही देर में ठण्डी हो गई।

बादशाह ने घुटनों के बल बैठकर उसका ललाट चूमा और फिर बालक की तरह रोने लगा।

गजब के अँधेरे और सर्दी में युवक भूखा-प्यासा पड़ा था। एकाएक घोर चीत्कार करके किवाड़ खुले। प्रकाश के साथ ही एक गम्भीर शब्द तहखाने में भर गया – ‘बदनसीब नौजवान क्या होश-हवास में है?’

युवक ने तीव्र स्वर से पूछा – ‘कौन?’

जवाब मिला – ‘बादशाह।’

युवक ने कुछ भी अदब किए बिना कहा – ‘यह जगह बादशाहों के लायक नहीं है – क्यों तशरीफ लाए हैं?’

‘तुम्हारी कैफियत नहीं सुनी थी, उसे सुनने आया हूँ।’

कुछ देर चुप रहकर युवक ने कहा – ‘सिर्फ सलीमा को झूठी बदनामी से बचाने के लिए कैफियत देता हूँ, सुनिए। सलीमा जब बच्ची थी, मैं उसके बाप का नौकर था। तभी से मैं उसे प्यार करता था। सलीमा भी प्यार करती थी; पर वह बचपन का प्यार था। उम्र होने पर सलीमा परदे में रहने लगी और फिर वह शाहंशाह की बेगम हुई, मगर मैं उसे भूल न सका। पाँच साल तक पागल की तरह भटकता रहा। अन्त में भेष बदलकर बाँदी की नौकरी कर ली। सिर्फ उसे देखते रहने और खिदमत करके दिन गुजार देने का इरादा था। उस दिन उज्ज्वल चाँदनी, सुगन्धित पुष्प-राशि, शराब की उत्तेजना और एकान्त ने मुझे बेबस कर दिया। उसके बाद मैंने आँचल से उसके मुख का पसीना पोंछा और मुँह चूम लिया। मैं इतना ही खतावार हूँ। सलीमा इसकी बाबत कुछ भी नहीं जानती।’

बादशाह कुछ देर चुपचाप खड़े रहे। उसके बाद वह दरवाजे बन्द किए बिना ही धीरे-धीरे चले गए।

सलीमा की मृत्यु को दस दिन बीत गए। बादशाह सलीमा के कमरे में ही दिन-रात रहते हैं। सामने नदी के उस पार, पेड़ों के झुरमुट में सलीमा की सफेद कब्र बनी है। जिस खिड़की के पास सलीमा बैठी उस दिन, रात को बादशाह की प्रतीक्षा कर रही थी, उसी खिड़की में, उसी चौकी पर बैठे हुए बादशाह उसी तरह सलीमा की कब्र दिन-रात देखा करते है। किसी को पास आने का हुक्म नहीं। जब आधी रात हो जाती है, तो उस गंभीर रात्रि के सन्नाटे में एक मर्म-भेदिनी गीत-ध्वनि उठ खड़ी होती है। बादशाह साफ-साफ सुनते हैं, कोई करुण-कोमल स्वर में गा रहा है –

दुखवा मैं कासे कहूँ मोरी सजनी !

[आचर्य चतुरसेन की कहानी ‘ दुखवा मैं कासे कहूँ मोरी सजनी’ से]
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उसने परास्त हो कर होरी की लाठी, मिरजई, जूते, पगड़ी और तमाखू का बटुआ ला कर सामने पटक दिए।

होरी ने उसकी ओर आँखें तरेर कर कहा – क्या ससुराल जाना है, जो पाँचों पोसाक लाई है? ससुराल में भी तो कोई जवान साली-सलहज नहीं बैठी है, जिसे जा कर दिखाऊँ।
होरी के गहरे साँवले, पिचके हुए चेहरे पर मुस्कराहट की मृदुता झलक पड़ी। धनिया ने लजाते हुए कहा – ऐसे ही बड़े सजीले जवान हो कि साली-सलहजें तुम्हें देख कर रीझ जाएँगी।
होरी ने फटी हुई मिरजई को बड़ी सावधानी से तह करके खाट पर रखते हुए कहा – तो क्या तू समझती है, मैं बूढ़ा हो गया? अभी तो चालीस भी नहीं हुए। मर्द साठे पर पाठे होते हैं।

‘जा कर सीसे में मुँह देखो। तुम-जैसे मर्द साठे पर पाठे नहीं होते। दूध-घी अंजन लगाने तक को तो मिलता नहीं, पाठे होंगे। तुम्हारी दसा देख-देख कर तो मैं और भी सूखी जाती हूँ कि भगवान यह बुढ़ापा कैसे कटेगा? किसके द्वार पर भीख माँगेंगे?’
होरी की वह क्षणिक मृदुता यथार्थ की इस आँच में झुलस गई। लकड़ी सँभलता हुआ बोला – साठे तक पहुँचने की नौबत न आने पाएगी धनिया, इसके पहले ही चल देंगे।

धनिया ने तिरस्कार किया – अच्छा रहने दो, मत असुभ मुँह से निकालो। तुमसे कोई अच्छी बात भी कहे, तो लगते हो कोसने।

होरी कंधों पर लाठी रख कर घर से निकला, तो धनिया द्वार पर खड़ी उसे देर तक देखती रही। उसके इन निराशा-भरे शब्दों ने धनिया के चोट खाए हुए हृदय में आतंकमय कंपन-सा डाल दिया था। वह जैसे अपने नारीत्व के संपूर्ण तप और व्रत से अपने पति को अभय-दान दे रही थी। उसके अंत:करण से जैसे आशीर्वादों का व्यूह-सा निकल कर होरी को अपने अंदर छिपाए लेता था। विपन्नता के इस अथाह सागर में सोहाग ही वह तृण था, जिसे पकड़े हुए वह सागर को पार कर रही थी। इन असंगत शब्दों ने यथार्थ के निकट होने पर भी, मानो झटका दे कर उसके हाथ से वह तिनके का सहारा छीन लेना चाहा। बल्कि यथार्थ के निकट होने के कारण ही उनमें इतनी वेदना-शक्ति आ गई थी। काना कहने से काने को जो दु:ख होता है, वह क्या दो आँखों वाले आदमी को हो सकता है?….

[गोदान  में  प्रेमचंद]
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हिरामन आज सुबह से तीन बार लदनी लाद कर स्टेशन आ चुका है। आज न जाने क्यों उसको अपनी भौजाई की याद आ रही है। …धुन्नीराम ने कुछ कह तो नहीं दिया है, बुखार की झोंक में! यहीं कितना अटर-पटर बक रहा था – गुलबदन, तख्त-हजारा! लहसनवाँ मौज में है। दिन-भर हीराबाई को देखता होगा। कल कह रहा था, हिरामन मालिक, तुम्हारे अकबाल से खूब मौज में हूँ। हीराबाई की साड़ी धोने के बाद कठौते का पानी अत्तरगुलाब हो जाता है। उसमें अपनी गमछी डुबा कर छोड़ देता हूँ। लो, सूँघोगे? हर रात, किसी-न-किसी के मुँह से सुनता है वह – हीराबाई रंडी है। कितने लोगों से लड़े वह! बिना देखे ही लोग कैसे कोई बात बोलते हैं! राजा को भी लोग पीठ-पीछे गाली देते हैं! आज वह हीराबाई से मिल कर कहेगा, नौटंकी कंपनी में रहने से बहुत बदनाम करते हैं लोग। सरकस कंपनी में क्यों नही काम करती? सबके सामने नाचती है, हिरामन का कलेजा दप-दप जलता रहता है उस समय। सरकस कंपनी में बाघ को …उसके पास जाने की हिम्मत कौन करेगा! सुरक्षित रहेगी हीराबाई! किधर की गाड़ी आ रही है?

‘हिरामन, ए हिरामन भाय!’ लालमोहर की बोली सुन कर हिरामन ने गरदन मोड़ कर देखा। …क्या लाद कर लाया है लालमोहर?

‘तुमको ढूँढ़ रही है हीराबाई, इस्टिसन पर। जा रही है।’ एक ही साँस में सुना गया। लालमोहर की गाड़ी पर ही आई है मेले से।

‘जा रही है? कहाँ? हीराबाई रेलगाड़ी से जा रही है?’

हिरामन ने गाड़ी खोल दी। मालगुदाम के चौकीदार से कहा, ‘भैया, जरा गाड़ी-बैल देखते रहिए। आ रहे हैं।’

‘उस्ताद!’ जनाना मुसाफिरखाने के फाटक के पास हीराबाई ओढ़नी से मुँह-हाथ ढक कर खड़ी थी। थैली बढ़ाती हुई बोली, ‘लो! हे भगवान! भेंट हो गई, चलो, मैं तो उम्मीद खो चुकी थी। तुमसे अब भेंट नहीं हो सकेगी। मैं जा रही हूँ गुरू जी!’

बक्सा ढोनेवाला आदमी आज कोट-पतलून पहन कर बाबूसाहब बन गया है। मालिकों की तरह कुलियों को हुकम दे रहा है – ‘जनाना दर्जा में चढ़ाना। अच्छा?’

हिरामन हाथ में थैली ले कर चुपचाप खड़ा रहा। कुरते के अंदर से थैली निकाल कर दी है हीराबाई ने। चिड़िया की देह की तरह गर्म है थैली।

‘गाड़ी आ रही है।’ बक्सा ढोनेवाले ने मुँह बनाते हुए हीराबाई की ओर देखा। उसके चेहरे का भाव स्पष्ट है – इतना ज्यादा क्या है?

हीराबाई चंचल हो गई। बोली, ‘हिरामन, इधर आओ, अंदर। मैं फिर लौट कर जा रही हूँ मथुरामोहन कंपनी में। अपने देश की कंपनी है। …वनैली मेला आओगे न?’

हीराबाई ने हिरामन के कंधे पर हाथ रखा, …इस बार दाहिने कंधे पर। फिर अपनी थैली से रूपया निकालते हुए बोली, ‘एक गरम चादर खरीद लेना…।’

हिरामन की बोली फूटी, इतनी देर के बाद – ‘इस्स! हरदम रूपैया-पैसा! रखिए रूपैया! क्या करेंगे चादर?’

हीराबाई का हाथ रूक गया। उसने हिरामन के चेहरे को गौर से देखा। फिर बोली, ‘तुम्हारा जी बहुत छोटा हो गया है। क्यों मीता? महुआ घटवारिन को सौदागर ने खरीद जो लिया है गुरू जी!’

गला भर आया हीराबाई का। बक्सा ढोनेवाले ने बाहर से आवाज दी – ‘गाड़ी आ गई।’ हिरामन कमरे से बाहर निकल आया। बक्सा ढोनेवाले ने नौटंकी के जोकर जैसा मुँह बना कर कहा, ‘लाटफारम से बाहर भागो। बिना टिकट के पकड़ेगा तो तीन महीने की हवा…।’

हिरामन चुपचाप फाटक से बाहर जा कर खड़ा हो गया। …टीसन की बात, रेलवे का राज! नहीं तो इस बक्सा ढोनेवाले का मुँह सीधा कर देता हिरामन।

हीराबाई ठीक सामनेवाली कोठरी में चढ़ी। इस्स! इतना टान! गाड़ी में बैठ कर भी हिरामन की ओर देख रही है, टुकुर-टुकुर। लालमोहर को देख कर जी जल उठता है, हमेशा पीछे-पीछे, हरदम हिस्सादारी सूझती है।

गाड़ी ने सीटी दी। हिरामन को लगा, उसके अंदर से कोई आवाज निकल कर सीटी के साथ ऊपर की ओर चली गई – कू-ऊ-ऊ! इ-स्स!

-छी-ई-ई-छक्क! गाड़ी हिली। हिरामन ने अपने दाहिने पैर के अँगूठे को बाएँ पैर की एड़ी से कुचल लिया। कलेजे की धड़कन ठीक हो गई। हीराबाई हाथ की बैंगनी साफी से चेहरा पोंछती है। साफी हिला कर इशारा करती है …अब जाओ। आखिरी डिब्बा गुजरा, प्लेटफार्म खाली सब खाली …खोखले …मालगाड़ी के डिब्बे! दुनिया ही खाली हो गई मानो! हिरामन अपनी गाड़ी के पास लौट आया।

हिरामन ने लालमोहर से पूछा, ‘तुम कब तक लौट रहे हो गाँव?’

लालमोहर बोला, ‘अभी गाँव जा कर क्या करेंगे? यहाँ तो भाड़ा कमाने का मौका है! हीराबाई चली गई, मेला अब टूटेगा।’

– ‘अच्छी बात। कोई समाद देना है घर?’

लालमोहर ने हिरामन को समझाने की कोशिश की। लेकिन हिरामन ने अपनी गाड़ी गाँव की ओर जानेवाली सड़क की ओर मोड़ दी। अब मेले में क्या धरा है! खोखला मेला!

रेलवे लाइन की बगल से बैलगाड़ी की कच्ची सड़क गई है दूर तक। हिरामन कभी रेल पर नहीं चढ़ा है। उसके मन में फिर पुरानी लालसा झाँकी, रेलगाड़ी पर सवार हो कर, गीत गाते हुए जगरनाथ-धाम जाने की लालसा। उलट कर अपने खाली टप्पर की ओर देखने की हिम्मत नहीं होती है। पीठ में आज भी गुदगुदी लगती है। आज भी रह-रह कर चंपा का फूल खिल उठता है, उसकी गाड़ी में। एक गीत की टूटी कड़ी पर नगाड़े का ताल कट जाता है, बार-बार!

उसने उलट कर देखा, बोरे भी नहीं, बाँस भी नहीं, बाघ भी नहीं – परी …देवी …मीता …हीरादेवी …महुआ घटवारिन – को-ई नहीं। मरे हुए मुहर्तों की गूँगी आवाजें मुखर हो
ना चाहती है। हिरामन के होंठ हिल रहे हैं। शायद वह तीसरी कसम खा रहा है – कंपनी की औरत की लदनी…।

हिरामन ने हठात अपने दोनों बैलों को झिड़की दी, दुआली से मारते हुए बोला, ‘रेलवे लाइन की ओर उलट-उलट कर क्या देखते हो?’ दोनों बैलों ने कदम खोल कर चाल पकड़ी। हिरामन गुनगुनाने लगा – ‘अजी हाँ, मारे गए गुलफाम…!’

[फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी ‘मारे गये ग़ुलफाम उर्फ तीसरी कसम’ से]
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“बगल में बंडल-सी कोई चीज़ दबाये दरवाजे के बाहर टुन्नू खड़ा था।उसकी दृष्टि शरमीली थी और उसके पतले होठों पर झेंप भरी फीकी मुसकराहट थी। विलोल आँखें टुन्नू की आँखों से मिलाती हुई दुलारी बोली,”तुम फिर यहाँ टुन्नू? मैंने तुम्हें यहाँ आने से मना किया था न?”
टुन्नू की मुसकराहट उसके होठों में ही विलीन हो गई।उसने गिरे मन से उत्तर दिया,”साल भर का त्योहार था,इसलिए मैंने सोचा कि……”,कहते हुए उसने बगल से बंडल निकाला और उसे दुलारी के हाथों में दे दिया।दुलारी बंडल लेकर देखने लगी। उसमें खद्दर की एक साड़ी लपेटी हुई थी।टुन्नू ने कहा,”यह खास गांधी आश्रम की बनी है।”
“लेकिन इसे तुम मेरे पास क्यों लाये हो?” दुलारी ने कड़े स्वर से पूछा। टुन्नू का शीर्ण वदन और भी सूख गया।उसने सूखे गले से कहा,”मैंने बताया न कि होली का त्योहार था।..”
टुन्नू की बात काटते हुए दुलारी चिल्लाई,”होली का त्योहार था तो तुम यहाँ क्यों आये?जलने के लिए क्या तुम्हें कहीं और चिता नहीं मिली,जो दौड़े मेरे पास चले आये?तुम मेरे मालिक हो या बेटे हो या भाई हो,कौन हो?खैरियत चाहते हो तो अपना यह कफन लेकर यहाँ से सीधे चले जाओ! और उसने उपेक्षापूर्वक धोती टुन्नू के पैरों के पास फेंक दी।टुन्नू की काजल लगी बड़ी बड़ी आँखों में अपमान के कारण आँसू भर आये।उसने सिर झुकाये आर्द्र कंठ से कहा,”मैं तुम से कुछ माँगता तो हूँ नहीं।देखो, पत्थर की देवी तक अपने भक्त के द्वारा दी गयी भेंट नहीं ठुकराती,तुम तो हाड़-मांस की बनी हो।”
“हाड़-मांस की बनी हूँ तभी तो….,”दुलारी ने कहा।
टुन्नू ने जवाब नहीं दिया।उसकी आँखों से कज्जल मलिन आँसूओं की बूँदें नीचे सामने पड़ी धोती पर टप टप टपक रही थीं। दुलारी कहती गई……।

टुन्नू पाषाण-प्रतिमा बना हुआ दुलारी का भाषण सुनता जा रहा था।उसने इतना ही कहा,”मन पर किसी का बस नहीं,वह रूप या उमर का कायल नहीं होता।”और कोठरी से बाहर निकल वह धीरे धीरे सीढियाँ उतरने लगा।दुलारी भी खड़ी-खड़ी उसे देखती रही।उसकी भौं अब भी वक्र थी,परन्तु  नेत्रों में कौतुक और कठोरता का स्थान करुणा की कोमलता ने ग्रहण कर लिया था।उसने भूमि पर पड़ी धोती उठाई,उस पर काजल से सने आँसूओं के धब्बे पड़ गए थे।उसने एक बार गली की में जाते हुए टुन्नू की ओर देखा और फिर उस स्वच्छ धोती पर पड़े धब्बों को बार-बार चूमने लगी।

[शिवप्रसाद मिश्र ‘रूद्र’ ‘बहती गंगा’ में]

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मेज़ पर बैठकर मैं फिर पढ़ने का उपक्रम करने लगती हूँ, पर मन है कि लगता ही नहीं। पर्दे के ज़रा-से हिलने से दिल की धड़कन बढ़ जाती है और बार-बार नज़र घड़ी के सरकते हुए काँटों पर दौड़ जाती है। हर समय यही लगता है, वह आया! वह आया!

तभी मेहता साहब की पाँच साल की छोटी बच्ची झिझकती-सी कमरे में आती है,
“आँटी, हमें कहानी सुनाओगी?”
“नहीं, अभी नहीं, पीछे आना!” मैं रूखाई से जवाब देती हूँ। वह भाग जाती है। ये मिसेज मेहता भी एक ही हैं! यों तो महीनों शायद मेरी सूरत नहीं देखतीं, पर बच्ची को जब-तब मेरा सिर खाने को भेज देती हैं। मेहता साहब तो फिर भी कभी-कभी आठ-दस दिन में खैरियत पूछ ही लेते हैं, पर वे तो बेहद अकड़ू मालूम होती हैं। अच्छा ही है, ज़्यादा दिलचस्पी दिखाती तो क्या मैं इतनी आज़ादी से घूम-फिर सकती थी?

खट-खट-खट वही परिचित पद-ध्वनि! तो आ गया संजय। मैं बरबस ही अपना सारा ध्यान पुस्तक में केंन्द्रित कर लेती हूँ। रजनीगन्धा के ढेर-सारे फूल लिए संजय मुस्कुराता-सा दरवाज़े पर खड़ा है। मैं देखती हूँ, पर मुस्कुराकर स्वागत नहीं करती। हँसता हुआ वह आगे बढ़ता है और फूलों को मेज पर पटककर, पीछे से मेरे दोनों कन्धे दबाता हुआ पूछता है, “बहुत नाराज़ हो?”
रजनीगन्धा की महक से जैसे सारा कमरा महकने लगता है।

“मुझे क्या करना है नाराज़ होकर?” रूखाई से मैं कहती हूँ। वह कुर्सी सहित मुझे घुमाकर अपने सामने कर लेता है, और बड़े दुलार के साथ ठोड़ी उठाकर कहता, “तुम्हीं बताओ क्या करता? क्वालिटी में दोस्तों के बीच फँसा था। बहुत कोशिश करके भी उठ नहीं पाया। सबको नाराज़ करके आना अच्छा भी नहीं लगता।”

इच्छा होती है, कह दूँ- “तुम्हें दोस्तों का खयाल है, उनके बुरा मानने की चिन्ता है, बस मेरी ही नहीं!” पर कुछ कह नहीं पाती, एकटक उसके चेहरे की ओर देखती रहती हूँ उसके साँवले चेहरे पर पसीने की बूँदें चमक रही हैं। कोई और समय होता तो मैंने अपने आँचल से इन्हें पोंछ दिया होता, पर आज नहीं। वह मन्द-मन्द मुस्कुरा रहा है, उसकी आँखें क्षमा-याचना कर रही हैं, पर मैं क्या करूँ? तभी वह अपनी आदत के अनुसार कुर्सी के हत्थे पर बैठकर मेरे गाल सहलाने लगता है। मुझे उसकी इसी बात पर गुस्सा आता है। हमेशा इसी तरह करेगा और फिर दुनिया-भर का लाड़-दुलार दिखलाएगा। वह जानता जो है कि इसके आगे मेरा क्रोध टिक नहीं पाता। फिर उठकर वह फूलदान के पुराने फूल फेंक देता है, और नए फूल लगाता है। फूल सजाने में वह कितना कुशल है! एक बार मैंने यों ही कह दिया था कि मुझे रजनीगन्धा के फूल बड़े पसन्द हैं, तो उसने नियम ही बना लिया कि हर चौथे दिन ढेर-सारे फूल लाकर मेरे कमरे में लगा देता है। और अब तो मुझे भी ऐसी आदत हो गई है कि एक दिन भी कमरे में फूल न रहें तो न पढ़ने में मन लगता है, न सोने में। ये फूल जैसे संजय की उपस्थिति का आभास देते रहते हैं।

[‘यही सच है’ में मन्नू भंडारी]
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चयन, संयोजन, संपादन- सुशील सुमन 

रुपकों-प्रतीकों का आख्यान और दिल्ली चुनाव: चंदन श्रीवास्तव

By चंदन श्रीवास्तव

जब जनता जागती है

किसी को लगा यह दीये और तूफान की लड़ाई थी, किसी ने कहा एक कंकड़ पहाड़ से भिड़ गया है, कोई बोल रहा था दसलखा सूट से डेढ़ सौ रुपल्ली का मफलर उलझ गया है। लोग साल भर से दिल्ली में जनता की सरकार देखने को आतुर थे और ज्यों-ज्यों मतदान का दिन नजदीक आ रहा था वे दिल्ली में सरकार बनाने की लड़ाई को रुपकों और प्रतीकों में बाँधकर आपस में बोल-बतिया रहे थे, अपने-अपने मुहावरे में उसके अर्थ निकाल रहे थे। दिल्ली विधान-सभा के चुनाव के नतीजों के अर्थ पार्टियों को हासिल मत-प्रतिशत के विश्लेषण से नहीं बल्कि इन रुपकों और प्रतीकों को समझने से खुलते हैं। कारण यह कि आम आदमी पार्टी ने दिल्ली विधानसभा चुनावों में जो जीत हासिल( कुल मतों का 54 प्रतिशत) की है उस जीत को वह खुद भी चाहे तो अब भविष्य में नहीं दोहरा सकती। आम आदमी पार्टी की इस सुनामी सरीखी जीत को सिर्फ दीया और तूफान या फिर कंकड़ और पहाड़ के रुपक के विश्लेषण के सहारे समझा जा सकता है। यह रुपक दिल्ली के मतदाताओं के मानस के बारे में बताता है। लोगों को लग रहा था कि यह पार्टियों की चुनावी लड़ाई नहीं बल्कि दो शख्शियतों नरेन्द्र मोदी और अरविन्द केजरीवाल की लड़ाई है, एक ऐसी लड़ाई जिसमें सेर की भिड़ंत सवा सेर नहीं बल्कि मामला हाथी के जोर के आगे एक चींटी के अड़ जाने का है। राजनीतिक जोर के मामले में एकदम से गैर-बराबर जान पड़ती इस लड़ाई में लोगों ने उसका साथ दिया जो सबसे निर्बल जान पडा रहा था। नतीजा आपके सामने है- ‘चींटी शक्कर ले चली- हाथी के सर धूलि!’

By Anindito Mukherjee, reuters

By Anindito Mukherjee, reuters

यह जीत दरअसल भारत के अंतिम जन के भीतर पलती उस नैतिकता की जीत है जो अपने मन को सदियों से यह कहकर समझाता आया है कि ‘निर्बल के बल राम’। उत्तर भारत के गांवों में कहते हैं ‘ना अन्हरा गैया(अंधी गाय) के राम रखवईया’। और अपनी इसी नैतिकता के तकाजे से जनता ने आम आदमी पार्टी का साथ दिया क्योंकि अरविन्द केजरीवाल अपनी कथनी और करनी से बीते एक साल से लोगों को जताते-बताते आ रहे थे कि लोकतंत्र में जनता ही जनार्दन होती है। उन्होंने लोगों का विश्वास हासिल हुआ क्योंकि वे निस्संकोच कहते रहे कि केजरीवाल महत्वपूर्ण नहीं है, आम आदमी पार्टी भी महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि लोकतंत्र में जनता और उसकी जरुरतों का ही प्राथमिक तथा अंतिम तौर पर महत्व है। आम आदमी पार्टी का यही संदेश दिल्ली विधानसभा चुनावों में जीत गया है। लोगों ने आम आदमी पार्टी को नहीं बल्कि खुद को वोट दिया है, स्वयं ही को जिताया है।

भाजपा से सबसे बड़ी चूक इसी मोर्चे पर हुई। उसकी मजबूती ही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन गई। फिर से यह बात सच हुई कि जो किसी ने नहीं हारता वह आखिर को खुद ही से हार जाता है। भाजपा मान चुकी थी कि पार्टी नहीं जीतती पार्टी का चेहरा जीतता है। उसका यह विश्वास लाजिम था क्योंकि नरेन्द्र मोदी के चेहरे को आगे करके भाजपा मई महीने से लेकर अब तक लगातार चुनाव जीतती आ रही थी। भाजपा को विश्वास था, जनता खुद से कोई निर्णायक राय नहीं बना सकती बल्कि रणनीतिक कौशल और प्रबंधन के बूते उसे भाजपा के पक्ष में राय बनाने के लिए विवश किया जा सकता है।भाजपा के भीतर यह विश्वास रणनीतिक कौशल के उस्ताद अमित शाह ने भरा था। अपने इसी विश्वास के बूते उसने दिल्ली में अपनी राज्य इकाई को हाशिया पर धकेलते हुए आंदोलनकारी की छवि बना चुकी किरन बेदी को साथ लिया। किरन बेदी ने लोगों से कहा आप एक वोट देंगे तो आपको दो-दो चीजें मिलेंगी। प्रधानमंत्री से विकास मिलेगा, किरने बेदी से सुरक्षा मिलेगी। चूक इस सोच से हुई। इस सोच ने भाजपा को चुनाव लड़ने वाली एक मशीन में तबदील किया । इस सोच ने लोगों को बताया कि भाजपा जनता को जनार्दन नहीं बल्कि प्रजा मानकर चल रही है, प्रजा जो दाता के आगे हाथ पसारे खड़ी रहती है, दाता के भरोसे रहती है। प्रधानमंत्री ने पार्टी की तरफ से प्रचार करते हुए इस सोच में योगदान दिया। उन्होंने अपने को ‘नसीबवाला’ साबित किया। लोगों का लगा प्रधानमंत्री अपने निजी नसीब से ‘देश के नसीब’ को जोड़कर देख रहे हैं।, दिल्ली के लोगों ने प्रजा की तरह नहीं बल्कि स्वतंत्र नागरिक की तरह आचरण किया और देश की किस्मत को किसी एक व्यक्ति की किस्मत से जोड़कर देखने वाली इस सोच को ही हरा दिया।

बिहार और बंगाल में होने वाले अगामी विधानसभा चुनावों के लिए दिल्ली की मतपेटियों से निकला जनादेश महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। इस जनादेश की गूंज देश में एक नई राजनीति की इबारत लिख सकती है। इस जनादेश से बिहार, बंगाल और यूपी सरीखे राज्यों की राजनीति के लिए दो संदेश निकले हैं। एक संदेश यह कि मीडिया केंद्रित राजनीति और मुखड़ा-केंद्रित पार्टी के इस दौर की काट की जा सकती है। लोगों के कंधे पर सहानुभूति के हाथ रखकर उन्हें जताया जा सकता है कि लोग किसी एक पार्टी के बंधुआ नहीं बल्कि सचमुच सत्ता-परिवर्तन की ताकत रखते हैं। दूसरा संदेश यह कि लोगों को सिर्फ विकास भर नहीं चाहिए। लोग रोटी, कपड़ा, मकान, सेहत, शिक्षा तो सरकार से चाहते ही हैं, उनके भीतर एक न्यायबोध भी होता है। वे चाहते हैं कि संसाधनों का बंटवारा न्यायसंगत ढंग से हो। बिहार, बंगाल और यूपी के गैर भाजपा शासित दल इन दो संदेशों के आधार पर अपनी जमीन पर भाजपा के बरक्स विपक्ष का एक कारगर विचार गढ़ सकते हैं। वे दिल्ली के जनादेश से हासिल आत्मविश्वास के सहारे साबित कर सकते हैं कि विपक्ष का विचार अभी धूमिल नहीं पडा। अगर ऐसा होता है तो माना जाएगा कि भारत में लोकतंत्र अब भी पार्टी या व्यक्ति केंद्रित नहीं बल्कि जनता-केंद्रित है!

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव,  मूलतया छपरा(बिहार) के निवासी, पिछले पंद्रह सालों से दिल्ली में। पहले आईआईएमसी और फिर जेएनयू में पढ़ाई। “उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हिन्दी लोकवृत्त का निर्माण” शीर्षक से पीएचडी के बाद दिल्ली के कॉलेजों में छिटपुट अध्यापन, फिर टीवी चैनल की नौकरी और अब विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सीएसडीएस) की एक परियोजना इंक्लूसिव मीडिया फॉर चेंज से जुड़े हैं। इनसे  chandan@csds.in पर संपर्क संभव है। 

‘Mard Ke Seene Mein Baal Hota Hai’: Abhiruchi Ranjan

By Abhiruchi Ranjan

I made these posters as part of conducting the GSCASH (JNU) workshop in 2013-14. GSCASH workshops are conducted to sensitize the students regarding gender issues. Popular film dialogues and songs are an important means of capturing people’ s imagination. Using these dialogues and songs to create awareness about gender issues is a way Of speaking to the people, instead of speaking at them. Also conveyed in these images and lyrics are  biased attitudes which slowly become normalised and even admirable gender traits.


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Abhiruchi Ranjan is  a student of the Ph.D programme at the Centre for Political Studies, Jawaharlal Nehru University, New Delhi. She can be contacted at abhiruchi.b.ranjan@gmail.com.

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