Archive for the month “April, 2015”

केजरीवाल की टोपी या किसान का साफा: चंदन श्रीवास्तव

By चंदन श्रीवास्तव 

अब से पहले इतना जिम्मेदार कहां था सवा अरब लोगों का यह लोकतंत्र? बीस सालों में तीन लाख तीस हजार किसानों के आत्महत्या कर लेने के बाद फिर से एक किसान ने आत्महत्या की है। गजेन्द्र की मौत आत्महत्या के आंकड़े में एक अंक का इजाफा भर होकर रह सकती थी। लेकिन नहीं, गजेन्द्र की आत्महत्या अनंत की और बढ़ती एक संख्या भर होकर नहीं रह सकी। उसकी आत्महत्या से एकाएक सबका जमीर जाग गया है!  सब अपनी भूमिका पूरी जिम्मेदारी से निभा रहे हैं।

By Katrina Miller

By Katrina Miller

विपक्ष जानता है कि सदन में अब सिर्फ सत्तापक्ष शेष बचा है। तो भी, सदन में इस बचे-खुचे विपक्ष को अपनी जिम्मेदारी याद आई। उसने समवेत स्वर में कहा- प्रश्नकाल स्थगित हो, किसान की आत्महत्या पर तुरंत चर्चा करवायी जाय। लेकिन अध्यक्ष का आसन नहीं डोला। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की संसद के अध्यक्ष ने भी संसदीय कार्यवाही की गरिमा निभायी। उसे लगा लोकतंत्र तो क्रियाविधि से चलता है, लोकतंत्र में प्रक्रियाओं का बड़ा ही महत्व है। सो, उसने प्रक्रियाओं के महत्व की रक्षा की, अपनी जिम्मेवारी निभायी।

प्रश्नकाल स्थगित नहीं हुआ तो सदन में रस्म के मुताबिक हल्ला उठा। सदन के रस्म की रक्षा हुई। रस्म के मुताबिक ही सदन बीस मिनट स्थगित रहा। रस्म के मुताबिक ही कुछ ने वाकआऊट किया, कुछ ने अध्यक्ष के आसन के समीप नारेबाजी की। अध्यक्ष शांत-धीर बैठा रहा जैसा कि उसे आसन की गरिमा का ख्याल करते हुए करना चाहिए था। अध्यक्ष ने अपने पद की गरिमा के अनुरुप कहा “किसानों की आत्महत्या का मामला गंभीर है, इसका राजनीतिकरण मत कीजिए। उसे लगा सदन में समूचा विपक्ष किसान की आत्महत्या की राजनीति कर रहा है। सदन में मौजूद सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता को लगा कि प्रश्नकाल तो स्थगित होना ही चाहिए क्योंकि किसानों की आत्महत्या का मुद्दा प्रश्नकाल से ज्यादा महत्वपूर्ण है। सदन फैसला नहीं कर सका कि लोकतंत्र में कौन सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है? वह प्रश्नकाल ज्यादा महत्वपूर्ण है जिसमें प्रश्न पूछने और उत्तर देने की रस्म निभायी जाती है या किसान की आत्महत्या पर चर्चा ज्यादा महत्वपूर्ण है जिसमें रस्म के मुताबिक ही किसानों की आत्महत्या पर सामूहिक रुप से शोक-संताप-संवेदना व्यक्त की जाती है! यह स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान है। स्वस्थ लोकतंत्र किसी भी प्रश्न पर तुरंत निर्णय नहीं देता, वह उत्तरों को स्थगित रखता है।

सदन के स्थगन के बाद कार्यवाही फिर शुरु हुई। इस बार सरकार ने अपनी सफाई दी। गृहमंत्री ने सर्टिफिकेट दिया कि पुलिस अपनी जिम्मेवारी का निर्वाह कर रही थी।गृहमंत्री ने कहा कि पुलिस मुस्तैद थी, किसान गजेन्द्र सिंह को आत्महत्या से बचाने के लिए दिल्ली “पुलिस लोगों को ताली बजाने से रोक रही थी क्योंकि लोग आम आदमी पार्टी की सभा में बात-बात पर ताली बजा रहे थे, शोर मचा रहे थे।” गृहमंत्री का जमीर जाग चुका था। गजेन्द्र की आत्महत्या के बाद उसे यह भी लगा कि देश में बीते सत्तर साल से कुछ ऐसा चल रहा है जो 60 करोड़ से ज्यादा लोगों के विरुद्ध है। उसने सदन से कहा कि ‘हम सबको एक साथ बैठकर सोचना चाहिए कि क्यों देश के साठ फीसदी लोग इस दशा में हैं कि उन्हें अब भी खाद्य-सुरक्षा की जरुरत पड़ती है। गृहमंत्री का यह कहना सरकार के जमीर के जागने का सूचक था। आखिर सरकार एक किसान की आत्महत्या के बाद सोचना चाहती थी कि इस देश के नौ करोड़ किसान परिवारों में से पचास फीसदी से ज्यादा परिवार क्योंकर इज्जत-आबरु के साथ दो जून की रोटी नहीं जुटा सकते ? सरकार ने जो सत्तर सालों में नहीं सोचा उसे अब सोचना चाह रही थी। वह लगातार सोचे जा रही थी, उसे खुद को नैतिक और वैध साबित करने के लिए लगातार सोचते चले जाने का आभास भर देना होता था। हां, सोचने की इस सतत साधना में बस कोई समाधान नहीं दिख रहा था।

सदन से बाहर भी सब अपनी जिम्मेवारियां निभा रहे थे। जैसे कि आम आदमी का नाम जपकर मुख्यमंत्री की गद्दी पर बैठा वह परम ईमानदार नौकरशाह जो अपनी साफ-सुथरी छवि पर इतना मुग्ध था कि अपनी टोपी पर भी अपनी ही फोटो लगाता था, खुद भी पहनता और किसी पवित्र कर्मकांड की तरह शेष सबको पहनाता था। इसी मुख्यमंत्री ने किसानों के हक में एक सभा की थी। इसी सभा में एक किसान गजेन्द्र ने जान दी थी। गजेन्द्र की जान जाने के बाद यह मुख्यमंत्री अपने मंत्रिमंडल समेत किसानों के हक के लिए मंच पर घंटों जमा रहा। भाषण देता रहा। उसे लगा भाषण देने से किसानों के हक की रक्षा होगी। अब उसे लग रहा है कि उससे गलती हुई, वह माफी मांग रहा है। इस मुख्यमंत्री ने देश के लोकतंत्र में बहुत बड़ा योगदान किया है। उसने भूल-गलती-माफी, धरना-प्रदर्शन आदि को एक अपशब्द में बदल डाला है। एक अपशब्द, जिसमें एक ही साथ दो काम सधते हैं। दूसरे के भरोसे को गाली देना संभव हो जाता है और गाली की जिम्मेवारी से जान छुड़ाना भी संभव हो जाता है। इस मुख्यमंत्री ने गजेन्द्र की जान की कीमत दस लाख लगायी है। यह एक जिम्मेदार मुख्यमंत्री की पहचान है। मुख्यमंत्री जानता है, गजेन्द्र जैसा छोटा-मोटा किसान सारी उम्र खेतों में खटनी करे तो भी खेती की लागत और कीमत के हिसाब से दस लाख नहीं कमा सकता। इस पार्टी का एक प्रवक्ता टेलीविजन पर पूरे देश के सामने रो रहा है। गजेन्द्र की मौत ने उसे भीतर तक झकझोरा है, वह लोगों को बताना चाह रहा है कि गजेन्द्र मौत जितनी सच्ची थी, उसके आंसू भी उतने ही सच्चे हैं। वह इस मौत की सच्चाई को मिटाने के लिए पूरी जिम्मेदारी के साथ अपनी आँख से सच्चे आंसू निकाल रहा है।

गृहमंत्री ने पुलिसिया जांच के और मुख्यमंत्री ने मैजिस्ट्रेटी जांच के आदेश दिए हैं। पुलिस जांच करेगी कि आत्महत्या के लिए गजेन्द्र को किसी ने उकसाया तो नहीं था। मैजिस्ट्रेट जांच करेगा कि गजेन्द्र को किसी ने सभा बिगाड़ने के ख्याल से पेड़ पर चढ़ाया तो नहीं था। टेलीविजन चीख रहा है, वह अपनी जिम्मेदारी निभा रहा है। उसका जोर यह बताने पर है कि गजेन्द्र पगड़ी बांधने में पारंगत था, उसकी रौबीली मूंछे भी थीं, वह मरने से ऐन पहले तक हताश कत्तई नहीं था। टेलीविजन बताना चाह रहा है कि वैसे तो इस देश में किसान आत्महत्या कर रहे हैं लेकिन गजेन्द्र वैसे किसानों में नहीं था जो आत्महत्या कर लें। टेलीविजन गजेन्द्र की मौत पर शोक मनाने से पहले यह सुनिश्चित कर लेना चाहता है कि दिल्ली के जंतर-मंतर पर आम आदमी की सभा में जो हुआ वह किसी किसान का आत्महत्या करना ही था।

देश का प्रधानमंत्री, राज्य का मुख्यमंत्री, मंत्रिमंडल और पार्टी प्रवक्ता, मीडिया और उसके दर्शक-पाठक सब सन्न और शोक-संतप्त हैं, अपनी भूमिका निभा रहे हैं। बस, एक किसान है जिसकी मौत इस सजग लोकतंत्र में थामे नहीं थम रही है। शायद, देश मान चुका है कि जैसे जन्म लेने वाले की मृत्य़ु ध्रुव है वैसे ही किसान का आत्महत्या करना भी अटल सत्य है।

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव,  मूलतया छपरा(बिहार) के निवासी, पिछले पंद्रह सालों से दिल्ली में। पहले आईआईएमसी और फिर जेएनयू में पढ़ाई। “उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हिन्दी लोकवृत्त का निर्माण” शीर्षक से पीएचडी के बाद दिल्ली के कॉलेजों में छिटपुट अध्यापन, फिर टीवी चैनल की नौकरी और अब विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सीएसडीएस) की एक परियोजना इंक्लूसिव मीडिया फॉर चेंज से जुड़े हैं। इनसे  chandan@csds.in पर संपर्क संभव है। 

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ख्याली मूर्ति: नन्दनी हल्दर

यह स्तम्भ  (घुसपैठिये)दिल्ली और आसपास की कामगार बस्तियों के तरुण-युवा लेखकों की प्रतिनिधि रचनाएं आप तक पहुंचाएगा. ये लेखक और इनका लेखन बने-बनाए खांचों में नहीं समाते. ‘घुसपैठिये’ स्तम्भ के लेखक अभी-अभी जवान हुए हैं या हो रहे हैं. एकाध को छोड़कर इसके सभी संभावित लेखकों की उम्र २0 वर्ष के अंदर ही है। लेकिन इन सब में कुछ सामान्य विशेषताएँ भी हैं. सभी की आर्थिक-सामाजिक पृष्ठभूमि लगभग समान हैं। इससे भी बड़ी विशेषता यह है कि इनके लिए बचपन की किताबें कागजों से उतनी नहीं बनती हैं जितनी उनके संघर्ष, मोहल्लों, माहौल और जगह से बनती हैं. उनकी लिखाई में वे जगहें आपको सुरक्षित मिलेंगी। आप शायद महसूस करें कि साहित्य के उत्पादक और उपभोक्ता, अभिलेखन/रिकाॅर्डिंग और सृजन, कि़स्सा और तथ्य के बीच के अंतर यहाँ धुंधले पड़ जाते हैं साहित्य के सुरक्षित-आरक्षित डिब्बे में घुस आये इन घुसपैठियों को आप कैसे बरतेंगे, यह आप ही को तय करना है.

इस बार की घुसपैठिया हैं ग्यारह वर्षीय युवा लेखिका नंदिनी हल्दर .

सौजन्य: पीटीआई

सौजन्य: पीटीआई

ख्याली मूर्ति

By नन्दनी हल्दर

धूप की किरणें छांव में समा रही थीं। थोड़ी छांव तो उन खेले हुए कदमों पर भी थी जो कुछ देर पहले खेल रहे थे। मैं भी उसी धूप में बैठकर मूर्ति को बनते हुए देख रही थी। उसे बनने में एक हफ्ता लग सकता है, ऐसा रामू के मुँह से कहते सुना था। यह मूर्ति पूजा में शामिल होने वाली थी।

ठंडी हवा इधर यूंही टहलने के लिए आ गयी थी। आँखें उस हवा को तसल्ली देकर इशारा करतीं। वह घास का पुतला लगभग तैयार हो चुका था। रामू की सफेद रंग की शर्ट भीगी हुयी हथेलियों से गीली हो चुकी थी। उसने उसको मोड़कर बाजू तक चढ़ा लिया था। मिट्टी से सने हाथ अब इधर-उधर बिखरी पड़ी घास को समेटने में लगे थे। वह पीली-सुनहरी, नुकीली घास मानो उनके हाथों में चुभती ही नहीं हो, ऐसा मैं सोच रही थी।

“अरे रामू अंकल, देखो यह पानी कितना गंदा है?”

“अरे बेटा, गंदा पानी हुआ तो क्या हुआ? यह गंदा पानी ही ज़्यादा काम आयेगा!” वह बोला।

मेरे दिलोदिमाग में तो बस उस मूर्ति का नकाब था। मैं एक ख्याली दुनिया में खो चुकी थी और अपने आप में बुदबुदाने लगी, “आय-हाय! क्या सुंदर होगी मेरी मूर्ति! उसके काले-काले बाल! गोरा-गोरा चेहरा! सुंदर-सुंदर हीरे-मोती वाले गहने! लाल गुलाबी रंग की साड़ी!”

मैंने अब सोच लिया था कि मेरे पूरे मोहल्ले में उस ख्याली मूर्ति से सुंदर कोई भी नहीं। ज़ेहन के एक कोने में मूर्ति अपना घर बना चुकी थी। मूर्ति का नकाब तो एक हफ्ते बाद खुलेगा। जब पुतले को देखने पर ही इतनी खुश थी तो मूर्ति के बनने पर कितना खुश होऊँगी, यही सब सोच रही थी।

बच्चों की टोलियाँ तो वहाँ बैठ ही गई थीं। बच्चे अपनी बातों की ऊँची-ऊँची उड़ान भर रहे थे।

“अरे पता है, मेरे पापा दूसरी शादी करेंगे, वे मेरी सौतेली माँ लायेंगें और मेरी माँ की सौतन।”

“अरे चिंटू, तुझे इन सब के बारे में कैसे पता चला, तू तो स्कूल भी नहीं जाता है!”

“अरे दीदी, मेरे मम्मी-पापा दिन-रात यही सब बातें करते रहते हैं?”

“कितना छोटू है रे तू, लेकिन तेरी बातें इतनी बड़ी-बड़ी हैं, शैतान कहीं का!”

“दीदी मैं शैतान नहीं हूँ।”

“अच्छा चल तू शैतान नहीं, महाशैतान है। अच्छा, वैसे तेरे पापा दूसरी शादी क्यों कर रहे हैं?”

“दीदी, वह सौतेली मम्मी बहुत सुंदर है न इसीलिए।”

तभी चिंटू कुछ सोचने-सा लगा और बोला।

“वाह! मेरी मूर्ति कितनी सुंदर लग रही है, मेरी सौतेली मम्मी की तरह। इसके भूरे-भूरे बाल और सांवली, बिलकुल मेरी तरह। होठों पर उनकी मतवाली लाली, मॉडर्न डिजाइन वाली उनकी साड़ी, जो मैंने मार्केट में देखी थी। अरे दीदी, पता है मेरी सौतेली मम्मी के बाल कैसे हैं? उनके होठ कैसे हैं? उनकी साड़ी पता है, कैसी है? पिंक और आसमानी कलर की है। उसके बॉर्डर में मेहँदी का डिजाइन है। उनके भूरे बाल अधकटे हैं और होठों पर पिंक लिपिस्टिक है।”

उंगली को दिमाग के दायीं तरफ पीटते हुये फिर बोला- “स्क्रू टाईट हो जा, स्क्रू टाईट हो जा। और हाँ, उसके पास चमकने वाली घड़ी भी है। और न… और न… नगों वाली माला भी है। सांवली है पर सुंदर बहुत है। पता है दीदी, मैंने तो यह भी डिसाइड कर लिया है कि रामू अंकल मेरी वाली ही मूर्ति ही बनाएंगें और वह सांवली होगी। वह पिंक और हल्का आसमानी कलर की साड़ी पहनेगी। देखना बिलकुल मेरी सौतेली मम्मी जैसी लगेगी।”

“अरे चिंटू, इतना छोड़ता क्यों है? न ही तेरी सौतेली मम्मी आई है और न ही मूर्ति बनी है और तू अभी से ही आसमान में उड़ने लगा!”

“मेरी मम्मी से पापा पक गए हैं। यह मैं सच कह रहा हूँ।”

“पर चिंटू एक बात ध्यान में रखियो, अगर तेरे पापा तेरे से पक गए तो क्या वे तुझे भी चेंज कर देंगे!”

“मेरे पर विश्वास क्यों नहीं करती हो, सौ बार बोल चुका हूँ कि मैं सच कह रहा हूँ, पर तुम मानती ही नहीं। आज से पहले मेरे पापा तीन शादियाँ कर चुके हैं। पर किसी ने भी मुझे भाई नहीं दिया। पहली मम्मी थोड़ी अटपटी थी। दूसरी मम्मी बहुत हरामन थी। तीसरी जिसने मुझे जन्म दिया और चौथी, सुंदर तो है पर होगी कैसी, यह आगे देखेंगे! मैं चलता हूँ! बाय टाटा सी यू!”

वह घासों से बना पुतला! बच्चे उसे देख खुश हो जाते। पुतले के चारो ओर लोगों की इकट्ठी भीड़ और उनमें चलती बातें। ‘भाई यह क्या है?’ ‘यह रामू क्या बना रहा है?’ ‘पता नहीं, लेकिन सुना है कि कोई मूर्ति बना रहा है।’ ‘कुछ कर तो रहा है। रामू के पास कोई काम भी तो नहीं है।’ ‘राम-राम जी!’ ‘अरे सुरेश भाई क्या हाल हैं?’ ‘हम तो भाई ठीक हैं! तुम कइसन हो?’ ‘राम –राम जी!’ इस तरह की आवाजें जब भी कानों की कुंडी खटखटाती, मेरे ख्यालों और ख्याली मूर्ति को चूर-चूर कर देतीं।

मैं सोच रही थी कि यह पुतला बड़ा सुंदर लग रहा है! अगर उसे दूर से देखा जाये तो असली मानुष लगेगा!

”अरे बेटा, देखना पुतला कैसा लग रहा है?“

“हाँ अंकल, ठीक है!”

रामू ने यह सवाल तभी पूछा जब मैं ख्यालो में खोई थी। मानो वह मेरे जहन में घुसकर मेरे ख्यालों को जान जाता है। डूबते सूरज को शाम की लालिमा घेर चुकी थी। बच्चों के हाथों में अब एक ही चीज़ नज़र आने लगी थी- इधर-उधर करती डोलची, जिसमें वे मदर डेयरी से दूध भरकर लौट रहे थे।

लाल रंग की उबड़-खाबड़ ईंट से रामू मिट्टी के ढेलों को तोड़ रह़ा था। कुछ पल बाद ही मिट्टी के ढेले मुलायम मिट्टी में तब्दील हो चुके थे। रामू उन्हें सान रहा था। अब उस मिट्टी को हाथों में लपेट कर चुभते घासों पर लगा रहा था। शरारती फौज भी अपने कदमों की हाजि़री लगाने चल दिये थे। उनकी निगाहें अब आसपास के माहौल में जम चुकी थीं। वह पिसी हुई, मुलायम सी मिट्टी अब उस मेहमान के कमर तक चढ़ चुकी थी।

आसपास के शोर-गुल से रामू बहुत परेशान था। उसकी परेशान निगाहें मूर्ति से हट नहीं रही थीं लेकिन आवाज़ उसके कानों में समा रही थी जो आसपास से गुजर कर हवा में दूर-दूर तक फैल रही थी। वह मिट्टी सूरज की किरणों से सूख रही थी लेकिन अब भी कहीं न कहीं गीली थी।

घास का पुतला एक मूर्ति में तब्दील हो चुका था। उसने मेहमान का मुखौटा ही बदल दिया था। अब भी मूर्ति के कुछ अवशेष बाकी थे और जिनको निखारने में अभी और वक्त लगना बाकी था। यही वजह थी कि लोगों के कदम अब यहाँ कुछ पल ही टिकने वाले थे। रामू भी बेफ्रिक होकर आसपास बिखरे सामानों को समेटने में लगा था। पड़ोसियों के गले से उतरते लफ्ज भी बंद हो चुके थे, केवल सवारी-गाड़ियों के शोर के अलावा और कुछ भी कानों तक नहीं पहुँच पा रहा था। रात होने ही वाली थी।

रामू के घर की दहलीज़ पर लगी एक छोटी सी तस्वीर मुझे रोक कर अपनी ओर खींच चुकी थी। हाथों के सहारे तस्वीर को उठाया और इस तस्वीर में बनी मूर्ति भी मेरे ख्यालों में अपना घर बनाने लगी।

कदम उस संकरी गली में पहुँचे जहाँ सन्नाटा था। लोग मूर्ति की तरह चुपचाप बैठे थे। कदम अपनी चुप्पी के साथ अब घर के आँगन में पहुँचे। मूर्ति का नकाब पहनकर दिमाग भी तकिये की तरफ़ सरक चुका था। खेलते कदम भी एक-दूसरे के पास सटे लेटे थे। मूर्ति का सुंदर चेहरा बार-बार आँखों के सामने आ रहा था, ऊपर से घर का शोरगुल भी था और आँखों में नींद नहीं थी। इसीलिए ख्याली मूर्ति के बारे में इधर-उधर की बातों को मैं बटोरने में लगी थी। आँखें उन बातों के साथ कब सो गईं, इसकी याद मुझे भी नहीं थी।

सुबह उठकर दादी को अलग ही तरह से सजे हुए देखा। दादी के घुंघरू जैसी लट को देखते ही ज़ेहन में मूर्ति का नकाब आ पहुँचा। हाथों से उस नकाब को हटाया।

“आय-हाय क्या सुंदर लग रही है?”

“शुक्रिया…शुक्रिया!” मेरे बगल में खड़ी दादी बोल पड़ी।

“दादी, आप कहाँ की सोच रही हो? मैं तो अपनी ख्याली मूर्ति की बात कर रही हूँ। उसके काले-काले बाल, गोरा-गोरा चेहरा, हीरे-मोती वाले गहने!”

“देख, मैं भी तो वैसी ही दिख रही हूँ न!” दादी बोली

दादी के साथ बहसबाजी के बाद कदम उस संकरी गली में जा पहुँचे जहाँ गली मूर्ति के कारण जीते-जागते माहौल में तब्दील हो चुकी थी। उस खिड़की के सींकचों पर नज़र बिल्कुल टिकी हुई थी क्योंकि मूर्ति के कुछ अंश उससे दिखाई पड़ रहे थे।

मूर्ति की उंगलियाँ रंगों से भीगी हुई थीं। एक नहीं, दो नहीं, तीन नहीं, चार नहीं, पाँच-पाँच उँगलियाँ! कदम उस दहलीज़ के पास जा पहुँचे। मैंने उन उँगलियों को रामू की खिलखिलाती निगाहों के पास रख दिया जो अभी भी मूर्ति को तराशने में लगा था।

“अरे बेटा, तुम आ गई?”

“जी अंकल!”

“बैठो-बैठो! एक खुशखबरी है।”

“क्या अंकल?”

“कल मूर्ति की रंगाई होगी!”

“क्या? फिर बड़ा मज़ा आयेगा!”

सूरज की किरणें मूर्ति के शरीर को और भी उभार रही थीं। कोई खुरदरी चमकदार-सी चीज़ लेकर रामू मूर्ति के शरीर पर घिसने लगा। मूर्ति के होंठों की खिलखिलाती मुस्कुराहट के साथ-साथ उसकी प्यारी-प्यारी आँखें भी मूर्ति की शोभा को बढ़ा रही थीं।

रामू बड़े उत्साह से अपना काम कर रहा था। शर्ट के बाजू उसी तरह मुड़े हुए थे जिस तरह पहले थे। मूर्ति की घिसाई का वह काम भी निपट चुका था। रामू का थकावटी शरीर उससे बार-बार कह रहा था कि ‘मुझे आराम करना है, मुझे आराम करना है!’ यह बात मेरे ज़ेहन में महफूज़ थी। पर रामू को तो इस बात का एहसास ही नहीं था।

“अंकल, आप सुबह से काम कर रहे हैं! अपने शरीर को आराम तो करने दो!”

“अरे बेटा, इसे परसो देना है!”

“पर अंकल, कल तो रंगाई है!”

मेरे आगे रामू की एक न चली।

“उफ्फ, तू तो मेरा दिमाग़ खा जाती है!” कहकर रामू अपने थकावटी शरीर को बैठा चुके थे।

सामने निगाहों में बसी मूर्ति मुझे और रामू से कुछ न कुछ कह रही थीं, पर मैं और रामू उसे समझने में असमर्थ थे। रामू के गले से निकलते लफ्ज़ होंठों पर मुस्कुराहट ला रहे थे। कुछ पल बाद शैतानी टोली अपनी बातों के साथ वहाँ पहुँच गई।

“अंकल बड़ा ही सुंदर लग रहा है!”

“हाँ-हाँ चिंटू, तुने सही कहा!”

“अंकल इसमें जंग नहीं करोगे?”

चिंटू की बातों से सब ठहाका मारकर हँस पड़े। तभी मैंने जवाब दिया,

“अरे चिंटू जंग नहीं, रंग!”

अक्सर इन्हीं बातों से उदासी भरे चेहरे पर भी मुस्कुराहट खिलखिला उठती है। वक़्त की रफ़्तार अब मौसमों में तब्दील हो चली थी। ‘कल तो रंगाई है, बड़ा मज़ा आयेगा!’

काश! मेरी ख्याली मूर्ति इस मूर्ति से मैच कर जाये! इन्हीं बातों को सोचते हुए घर के दरवाज़े पर दस्तक दी। घर में कोई नहीं था। घर में घुसते ही कदम चौकी पर जा पहुँचे। घर अब वैसा नहीं था जैसा पहले था। मूर्ति के अनुभव के साथ पलकें झुकने को थीं। नींद आँखों में कब आई पता ही नहीं चला।

मूर्ति अभी तक ज़ेहन में थी और जिसका जिक्र बार-बार दिमाग़ में हो रहा था। कुछ पल बाद मेरे कदम रामू के घर पहुँच चुके थे। मूर्ति की रंगाई मेरे आने पर ही शुरू हुई। शैतानी फौज कोने में अपना झुंड बनाए बैठी थी। उन्हीं के पास जाकर मैं भी बैठ गई।

“दीदी, मैंने कहा था न कि रामू अंकल यह मूर्ति बिलकुल मेरी सौतेली माँ जैसी बनायेंगें!”

“अरे चिंटू, अभी तक अंकल ने तो रंग भी नहीं किया। तू तो पहले ही डींगें मारने लग गया।”

रंगों में भींगे पेंट-ब्रुश। उन रंगों से उभरती मूर्ति की छवि जो कि दिल में एक घर-सा बना चुकी थी। इकट्ठी भीड़ में हर निहारती निगाहें जो सिर्फ और सिर्फ उस छवि पर ही टिकी हुयी थीं। मैं भी अपनी ही धून में थी।

मूर्ति की रंगाई शुरू हुई। सबसे पहले मूर्ति के शरीर को सफेद रंग से रंगा, उसके बाद मानुष कलर, हथेलियों के गड्ढों पर थोड़ा-थोड़ा लाल रंग और गालों पर भी वही रंग। कुछ देर बाद रंगाई की यह दुनिया भी खत्म हुयी। मूर्ति को रंग में देखकर आँखें उसे निहारती रहीं। रंगने के बाद उसका शरीर उभर आया था। सफ़ेद मूर्ति अब इंसानी कलर वाले शरीर में तब्दील होने चली थी। अब रामू उसे सजाने में लगा था और मेरा मन मचल-सा रहा था कि काश मैं भी मूर्ति को सजा पाती। मेरे दिल की बात जुबां पर आ ही गई।

“अंकल-अंकल मैं भी सजाऊँ!”

“नहीं बेटा, यह बच्चों का खेल नहीं है।” अपने काम में व्यस्त रामू बोला।

मूर्ति के घुँघराले बाल जो दादी के लटों की तरह लग रहे थे जिसे मैंने आज सुबह-सुबह ही देखा था। मोतियों की एक छोटी-सी माला जिसे मूर्ति को पहनाया जाना था बिलकुल वैसी ही लग रही थी जिसे मैं कमला मार्केट से लायी थी। बहुत-से गहने थे जैसे चूड़ियाँ, लटकन वाले झुमके, बड़ी-बड़ी मालाएँ, गुलाबी ब्यूटीफुल-सी साड़ी जो मन को जिज्ञासु बना रही थी क्योंकि ऐसी साड़ी मैंने कभी देखी ही नहीं थी। बार्डर के रंग आसमानी और लाल थे। रामू इन गहनों और साड़ी को बारी-बारी पहनाते गए। वह सजावट का माहौल भी लगभग खत्म ही हो चुका था।

गहनों के साथ वह प्यारी-सी साड़ी मूर्ति की शोभा में चार चाँद लगा रही थी। उस वक्त चिंटू का मुंह देखने लायक था। बड़ा ही डींगें मार रहा था। ‘मेरी सौतेली मम्मी जैसी मूर्ति बनेगी! आप देख लेना दीदी!’ शायद वह भी मन ही मन सोच रहा होगा कि ‘क्या सोचा था और क्या हो गया!’ उसकी शक्ल के बारह बज चुके थे।

सौतेली माँ किसी मूर्ति में नहीं थी। उनकी खुद की खूबसूरती भला कोई मूर्ति कैसे ले सकती थी!

—समाप्त—-

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नंदिनी हल्दर. जन्म- 26 नवंबर 2004, लक्ष्मीनगर, दिल्ली. अंकुर किताबघर की नियमित रियाजकर्ता. पता- सी-68, सावदा-घेवरा जे.जे. कॉलोनी, दिल्ली- 110081 

साभार: हंस, अप्रैल, 2015

बाकी प्रेम कविताएँ: उस्मान खान

By उस्मान खान

लाल धधकते लोहे के टुकड़े

तुम्हारी आंखें,

आंखों के नीचे हड्डी की टेढ़ी-उभरी लकीर। (नज़्र-ए-शमशेर)

Snap shot from'Would You Be Mine'

Snap shot from’Would You Be Mine’

बाकी प्रेम कविताएं

1.

वहां बारिश होती है

पुरानी लकड़ी की पाट भींगती है

उसकी दरारों से दीमक चूने लगते हैं

माथे पर खिड़की के लोहे की ठंडक महसूस करता हूं

भाप जैसे बूंद-बूंद कर टपक रही है दिमाग़ में

मैं आंखें बंद कर लंबी सांस खींचता हूं

जैसे सकल विस्तार को अपनी श्वास-नलिका में घूमता महसूस करता हूं

बिंदु-बिंदु प्रकाश छिटका है

प्रकाश वर्ष दूर एक-एक बिंदु

कोई मासूम नहीं होता

न तू थी, न मैं था

तू भूल भी गई शायद

या याद भी रहा तो क्या मुझे पता नहीं!

पर एक इच्छा है जागी हुई

कि एक दिन उस खिड़की के लोहे पर माथा रख

हम दोनों बारिश देखें!

मैं तुझे जिस उम्र में छोड़ आया था

असल में, वहीं से तुझे अपने साथ लाया था

जिस दिन बारिश हो रही थी

रसायनों की हल्की गंध के बीच

मैं खड़ा था अकेला अपने में

तुम मुस्कुराई

जैसे, आज कहूं, वसंतसेना!

इसीलिए चाहता था बहुत तुम्हें

कि बक़ौल बेदिल सच सच को ढूंढ़ता है।

जिस दिन बारिश हो रही थी

मैंने एक पल के लिए ब्रह्माण्ड को सुंदर रूप दिया

आत्मसात किया

जैसे एक ठोस वस्तु तरंग बन जाती है

देखते ही देखते विचार बदले कि बस!

एक पल के लिए मैं कितनी दूर बह चला

जैसे ये पल भी उस पल का विस्तार है

जिस दिन बारिश हो रही थी।

2.

मैं बहता जा रहा था

आगे, आगे, बहुत आगे

कि तुमने मुझे श्मशान की याद दिला दी

दोपहर वह मई की

वह झरबेरियों से उलझना

पर तुमने क्यों कहा कि मैं बदल गया हूं,

मुझसे बात भी नहीं की

मिली भी नहीं!

क्या मैं ऐसा बदल गया था

कि हम बात भी नहीं कर सकते थे।

शायद मैंने तुम्हारे मन में बसी

अपनी ही छवि तोड़ दी थी।

3.

तुम ही थी, जिसने मुझसे कहा,

किसी का मज़ाक उड़ाना नहीं अच्छा!

मैंने मन में बसा ली वो तरलता।

कोई कितना इंसान हो सकता!

और कौन सिखाता?

4.

मैं तुम्हें अपनी शक्ल देना चाहता था

तुम मुझे अपनी

समुद्र की लहरों को मैं बाहों में समेट लेना चाहता था

तुम किनारे-किनारे थोड़ी दूर जाना चाहती थी

नाव में ठहरे जल में

हमने देखा अपना बिम्ब

तुम अलग- मैं अलग- बहुत

दूसरी नाव में लेटा मैं

अलग हो गया अचानक

तुमसे – समुद्र से – सबसे

ये सबसे ध्वंसक पल था

मैं बाद में आत्मसात कर पाया

बहुत बाद में बात कर पाया

वह समुद्री खोह का कालापन

मांसल एकदम ठोस

मांस का लोथड़ा

समुद्र में गहरे-गहरे डूबते जाने जैसा

सुबह अचानक रात का नशा उतरा लगे जैसे

तूफ़ान में मिले हम, तूफ़ान में बिछड़े।

5.

उस रात मैं दुःखी था

दुःख से टूटा था

दुःख से भरा हुआ

वंचना का दाह

उपेक्षा की कड़ुआहट

क्रूरता का दर्शन

विश्वासघात का डर जैसे

मैं तुम्हारे सामने इतना बच्चा हो गया

कि खुद डर गया।

6.

जुनूं का एक पल वो अगर जिंदगी बदलता

मैं खींच लाता आज तक वो दोपहर, वो गली

तुम्हारी एड़ियों के ऊपर जो दूज का चांद रखा है

तुम्हारे कंधे के ठोसपन ने जो लरज़ मुझे दी है

लगता है आज भी उस गली में तुम्हारी एड़ियों पर

दूज का चांद रखा हो जैसे

मैंने एक घर चुन लिया था

एक जिंदगी

एक शहर चुन लिया था

एक नदी वहां बहती थी

रेल के पुल के नीचे

जहां हम शाम को घूमने जाया करते थे

मैं खूब मेहनत करता था

तुम खूब खुश होती थीं

तुम खूब मेहनत करती थीं

मैं खूब खुश होता था

वहां गाड़ियां तेज़ चलती थीं

शाम को बाज़ार में खाने-पीने की

तमाम तरह की चीज़ें मिलती थीं

वहीं एक गली में मैदान के पास

मैंने घर ले लिया था

(मुझे और अच्छे से याद नहीं!)

मैं तुम्हारे इतने पास होना चाहता था

कि मेरा दिल फटने लगता था

सांसे तेज़ होने लगती थी

इतने पास के खयाल से ही

मैं इतनी तेज़ दौड़ा

तेज़, और तेज़

मेरी सांस फूलने लगी

सीना फटने लगा

मैं और, और लंबे डग भरने लगा

थंबे, नाले, नदियां, पुल कूदने लगा

मैदान-पहाड़-देश-ग्रह-नक्षत्र

मैं तारों के महासमुद्र में तैरने लगा

तेज़-तेज़-और तेज़- मैं पार करता गया

एक महासमुद्र से दूसरे महासमुद्र से तीसरे महासमुद्र

मैं साइकिल से गिर पड़ा

और मैंने महसूस किया

मेरे सिर पर तुम्हारी हंसी

जुनून बनकर खड़ी है।

7.

वह रहस्य जन्म का जीवन का

रसमयी लालसा, विस्मयी वासना

उष्ण द्रव वसीय वह

मध्यमिका जैसे शरीर से परे किसी ताप में

प्रथम आविष्कार

वह न गंध न रूप न आकार

केवल एक उष्ण तरल एहसास

वाष्प की तरह अब भी जमा जैसे छाती मैं।

8.

मैंने ठुकराया तुम्हारा प्यार

मैंने तुम्हें छीज-छीजकर मरते देखा

मैंने तुम्हारी देह को गलते देखा

मैंने बहुत कामना की

तुम्हें गले लगाने की

पर जब सब कुछ छुट गया

तुम एक दिन विलीन हो गईं

किस वक़्त पता नहीं

मुझे तुम्हारी लाश से क्या मतलब!

मैं तुम्हारा प्यार ठुकरा चुका था

पर एक इच्छा थी

तुम्हें गले लगाता

और हम लोग मगरे तक घूमने चलते एक बार।

9.

दोपहर है

नीम-नील, नीम-सफ़ेद दीवार है

मैं एक पल के लिए उसके इतने नज़दीक़ हूं

कि उसकी सांसें अपनी गर्दन पर महसूस कर सकता हूं

एक उसी पल में

मैं घबरा जाता हूं

अपने-आप से

पीछे हट जाता हूं

अचानक एक आवाज़, दोपहर खींच लेती है।

आगे नहीं…

मैं पीछे हटता जाता हूं!

इसके आगे क्या…

10.

फिर बारिश हुई नदी पर

रात के आखरी-आखरी पहर

सांय-सांय में घुल गई

बूंद-बूंद फिर लहर-लहर

– – –

मैं मिट्टी के इतने पास

तुम्हारे इतने पास

आम की जड़ के इतने पास

जैसे यहीं मिलनी मुझे

युगों से मुझे ढूंढ़ती : तस्क़ीन!

– – –

मैं फिर तुमसे प्यार करना चाहता हूं,

मैं तुम्हारी लासानी मूर्ति बना रहा हूं।

मैं कल इसे तोड़ने का वादा करता हूं,

मैं फिर तुमसे प्यार करना चाहता हूं।

– – –

वहां एक नदी है

गरजती हुई

सफ़ेद

वो एक चट्टान को सदियों से विलीन करने में लगी है

वो चट्टान अब भी है वहां

उस पर हमारे पांव के निशां

वे आत्म-आहुतियां

घुलती जाती हैं एक समग्र इतिहास में

एक पल में

दरवाज़े बनते

रंगाई होती है

सदियों की रुकी चर्चाएं जैसे चल पड़ती हैं

हवा चलने लगती है

प्लास्टिक की बोतल

एक झटके में

जमीन से सौ फुट ऊपर घूमने लगती है

जमने लगती है

फिर धीरे-धीरे ज़मीन पर धूल

बगुले छिप जाते हैं ईमली की कोटरों में

हरी घास के साथ भींगते हैं झींगुर

मैं दूर तक देख सकता हूं अनाकुल मन से

बारिश और सिर्फ बारिश

भींगना और सिर्फ भींगना

मक़बरों की टूटी हुई ईंटें

परित्यक्त मीलों में मशीनें

ट्रकों के टायर – भींगते हैं

भींगती हैं झरबेरियां और मेंहदी

भींगते हैं अंजीर और बबूल

भींगते हैं मैं और तुम

और अपराजिता के फूल!

usman khan

उस्मान ख़ान समकालीन हिंदी कविता के अलहदा और युवा कवि हैं. चर्चाओं और पुरस्कारों की भीड़ से अलहदा… छपाऊ मानसिकता से भी अलहदा... जे.एन.यू. के हिंदी विभाग से मालवा के लोकसाहित्य पर पीएचडी. इनसे usmanjnu@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

Who are we: Kalki Koechlin

A Poem By Kalki Koechlin

We are the people of the world
The collective,
The masses,
The capitalistic, communal fascists,
We are you.

Snap Shot from Wild Tales (2015)

Snap Shot from Wild Tales (2015)

We are ready for action,
For tragedy,
Atrocity, hostility
And fashion.
We are the impersonal.

We love great films
But do not live great lives.
We create drama
But shy away from real life.
We are an army of sheep.

We fight for causes
And stand up in the streets.
We fight for clauses,
Throw stones and bombs
And then build tombs with our feats.

We are an amorphous blob
We are a greedy fat man
Standing in a cue
Unnoticed, a nobody
A slob.

We are nameless
So that we can be shameless.
We are the mob,
The headless god.
We are blameless.

Debates, chat shows, votes of the public
And no opinion of our own
Online indulgence
Typing thoughts
Borrowed from a borrower
Selected, educated
And thoroughly plagiarised thoughts
Do’s and ought’s,
Typed, copied,
Copied, pasted,
Pasted, passed,
Passed in unprinted pages
Of a virtual web
Denser than the dark ages.
Thoughts we copy right,
Thoughts we own
And thoughts we’re not
thinking alone.

Everybody writes about it,
Thinks about it,
Talks about it,
But if somebody is actually doing it,
Nobody gives a shit.

The We.
The fancy lives of the We.
Making news out of lipstick
Travel and choice of ice cream,
All frivolous news
That comes out of our pockets
And leaves a nation starving.

We, the people
We, the classes
We, the businessman,
The poor man
And the ladies who pout with the fat off their asses.

Our self worth
Rests on the opinion of others,
On magazine covers,
On how many more overs,
On frequent lovers.

We, the masses,
The people,
The system,
The supporters,
The obedient payers of taxes.

We are to blame
And we should be ashamed.
We have neighbours,
We have money,
And we have poverty.
We have each other.

We are the problem,
And we are the solution.
We could know who we are,
We could go far,
If we just stopped being so wee.
courtesy- https://www.youtube.com/watch?v=TYoJ3FHsMBA

माइकल जैक्सन का पीटर पैन सिंड्रोम: डॉ. विनय कुमार

माइकल जैक्सन अब इस दुनिया में नहीं है। मगर उसकी जिंदगी की खुली किताब में नये पन्नों का जुड़ना नहीं थमा है। उसे जो लिखना था, लिख चुका, मगर खोज, खुजली और खुन्नस से भरे दिमागों के मालिकान हर दिन कुछ न कुछ जोड़ रहे हैं। अब उसकी जिन्दगी को किताब नहीं ब्लॉग कहा जाना चाहिए जिस पर कोई भी विजिटर कैसी भी प्रतिक्रिया टांकने के लिए स्वतंत्र है। # लेखक Michal jacson.photo

By डॉ. विनय कुमार

उसकी कला के कई चेहरे हैं

माइकल जैक्सन का उद्गम चमत्कारिक था और उसका विकास एक शानदार जादू। अपनी त्वचा में मिट्टी और घास के सबसे गहरे रंग लिये युवा माइकल की आंखें बरसात की उस सुबह की तरह थीं जहां एक तकलीफ भरी गीली रात आते हुए उजाले से मिलती है। शायद यही वजह थी कि वह रात और दिन दोनों के आशिकों का चहेता था। उसकी कला के कई चेहरे हैं – गायकी, संगीत, गीत रचना, नृत्य और अभिनय। इनमें से एक भी चेहरा ऐसा नहीं जिसे आप नज़रअंदाज़ कर सकें। उसकी गायकी के कई मोड़ हैं। उसकी आवाज़ का सफर एक नए झरने के अल्हड़पन से शुरू हुआ, मगर आवेग इतना था कि मुश्किल रास्तों और पथरीली ऊँचाइयों को सर करने में ज़्यादा वक़्त नही लगा । आज भी, आनंद की आदिम अभिव्यक्ति की याद दिलाती उसकी वह विशेष चीख श्रोताओं से एक पल में ही समय और स्थान का बोध छीन लेती है और वे वहाँ पहुँच जाते हैं जहाँ सभ्यता का एक भी चिह्न नहीं- भाषा तक नहीं। माइकल के नृत्य में पश्चिमी नृत्य की यांत्रिकता के बावजूद जंगल का सौंदर्य था। तरह-तरह के अनुशासित फुट मुवमेंट्स करते-करते अचानक वह कोई ऐसा ‘मूव’ पेश करता था कि दर्शक अचरज से और अविश्वास के मारे चीखने लगते थे। वह एक नैसर्गिक अभिनेता था। उसका चेहरा बोलता था। अगर वह सिर्फ अभिनेता भी होता तो असफल तो कतई नहीं होता। वह एक कवि और गीतकार भी था। उसने दूसरों के लिखे गीत भी गाए हैं, मगर खुद भी काफी गीत रचे हैं। कविता के साथ एक अद्भुत बात है। कोई भी कवि अपनी रचना में अभिनय नहीं कर सकता। उसका मानस दिख ही जाता है। माइकल जैक्सन कोई चिंतनशील व्यक्ति नहीं था। भावनाएँ ही उसके जीवन को चलाती रहीं। यह बात उसकी रचनाएँ भी कहती हैं। अपनी कविता ‘मैजिकल चाइल्ड’ में वह एक बच्चे (या खुद) के बहाने सारे बच्चों में अंतर्निहित जादुई संभावनाओं, उनकी त्रासदियों और उनके सपनों का जि़क्र करता है। कविता का अंत इस अपील के साथ होता है कि एक पीड़ारहित विश्व की रचना के लिए अपने भीतर के बच्चे को पाने का जतन करो। एक अन्य कविता में वह मासूम बच्चे को ‘आनंद का संदेशवाहक’ कहता है और उसकी मर्मस्पर्शी छवि को दुनिया बदलने की प्रेरणा का स्रोत मानता है। थैलेसेमिया से ग्रस्त रेयान ह्वाइट नामक एक किशोर बार-बार ब्लड-ट्रांसफ्युजन के कारण एड्स की भेंट चढ़ गया था। माइकल ने उसकी स्मृति में एक बेहद मार्मिक गीत लिखा है। आलोचना के पैमाने से देखें तो उसकी काव्य रचनाओं का कोई महत्व नहीं, मगर जैसी भी हैं क़ाबिले-ग़ौर हैं क्योंकि उन्हें माइकल जैक्सन ने लिखा था ।

माइकल जैक्सन और स्टीवेन स्पीलबर्ग उर्फ पीटर पैन

माइकल जैक्सन एक अद्भुत चरित्र है। वह एक ऐसा आख्यान है जहां पीड़ा के अंधेरों के बावजूद उम्मीद की रोशनी का उत्सव है। आर्थिक अभावों और पिता की महत्वाकांक्षा की वजह से माइकल का बचपन सहज-सामान्य नहीं रहा। ग़़रीबी की मार और पिता द्वारा दी जाने वाली ट्रेनिंग के क्रूर अनुशासन ने जहां उसके बचपन को ज़़ख्मी किया, वहीं परिपक्वता से पहले आई सफलता ने उसके व्यक्तित्व के आंतरिक विकास को बाधित किया। जिस माइकल जैक्सन को दुनिया ने जाना वह एक किशोर था और जो ‘ऑल टाईम ग्रेट पॉप स्टार’ दुनिया से गया, वह भी एक किशोर ही था। उसकी कला, उसकी गायकी तो बदली मगर एक व्यक्ति के रूप में किशोर ही रहा वह। वह खुद को ‘पीटर पैन’ कहता था और उसने ‘पीटर पैन’ की कहानी में वर्णित फैन्टेसी आइलैण्ड ‘नेवरलैन्ड’ के नाम पर अपने फार्म हाउस का नाम ‘नेवरलैन्ड रैन्च’ रखा था।

‘पीटर पैन’ स्कॉट उपन्यासकार-नाटककार जे.एम.बैरी द्वारा रचित एक चरित्र है। यह चरित्र एक शरारती लड़का है जो उड़ सकता है और अपने जादू के ज़ोर से अपने को विकसित और परिपक्व होने से रोक देता है। बैरी के उपन्यास ‘पीटर पैन एन्ड वेन्डी’ का यह नायक खोए हुए बच्चों के नायक के रूप में फैंटेसी आइलैन्ड ‘नेवरलैंड’ पर अपने गैंग के साथ अपने अक्षय बचपन को एन्ज्वाय करते हुए परियों, जलपरियों, नेटिव अमेरिकन्स, लुटेरों और दुनिया के सामान्य बच्चों के साथ इंटरएक्ट करता है। इस चरित्र ने लेखन के अतिरिक्त अन्य कला माध्यमों से जुड़े रचनाकारों को भी आकर्षित किया। ‘पीटर पैन’ की कथा पर उपन्यासों, चित्रों और मूर्तियों के अलावा कुछ फिल्में व म्युजिक वीडियो भी बने। इनमें स्टीवेन स्पीलबर्ग की फिल्म ‘हूक’ भी है। ‘हूक’ का नामकरण ‘पीटर पैन एन्ड वेन्डी’ के खलनायक कैप्टन हूक के नाम पर हुआ है। स्पीलबर्ग की फिल्म में पीटर पैन को एक शादीशुदा-बाल बच्चेदार युवा के रूप में चित्रित किया गया है। वह अपना बचपन और नेवरलैंड के दिन भूल चुका है। फिल्म की कहानी यूं बनती है कि पीटर और उसका परिवार नेवरलैंड के बाल-समूह की नायिका- वृद्धा हो चुकी वेन्डी – से मिलने लंदन जाता है और उसी दौरान कैप्टन हूक पीटर के बच्चों का अपहरण कर नेवरलैन्ड आइलैन्ड पर लेकर चला जाता है। वेन्डी की प्रेरणा से पीटर नेवरलैन्ड जाता है, जहां उसकी खोयी यादें वापस आती हैं और वह खलनायक को पराजित कर अपने परिवार के साथ वास्तविक दुनिया में लौट आता है।

स्पीलबर्ग का जिक्र अकारण नहीं है। ‘पीटर पैन एन्ड वेन्डी’ उसकी मां की पसंदीदा ‘बेड टाइम स्टोरी’ की किताब थी। उसकी मां ने ही उसका परिचय पीटर पैन से कराया था और मात्र 11 वर्ष की उम्र में स्टीवेन ने अपने स्कूल में पीटर पैन पर आधारित एक नाटक का निर्देशन किया था। 1985 में एक बातचीत में स्टीवेन ने क़बूल किया था – ‘‘मैंने हमेशा पीटर पैन की तरह महसूस किया है… उम्र के साथ विकास करना मेरे लिए बहुत मुश्किल रहा है- मैं पीटर पैन सिंड्रोम का शिकार हूं।’’ ‘हूक’ के पहले भी स्टीवेन ने कई बार पीटर पैन की कहानी पर फिल्म बनाने की योजना बनायी थी। वह माइकल जैक्सन को लेकर एक म्युजिक वीडियो भी बनाना चाहता था।

पीटर पैन सिंड्रोम

मनोरंजन जगत की दो-दो हस्तियों से जुड़ा ‘पीटर पैन सिंड्रोम’ मनोचिकित्सकीय शब्दावली में नहीं आता। यह डब्लू.एच.ओ. के इंटरनेशनल क्लासिफिकेशन ऑफ़ डिजीजेज या अमेरिकन सायकाएट्रिक एसोसिएशन के डायग्नॉस्टिक एन्ड स्टैटिस्टिकल मैनुअल ऑफ़ मेंटल डिजार्डर्स में शामिल नहीं है। दरअसल या लोकप्रिय मनोविज्ञान (पोपुलर सायकॉलॅजी) का टर्म (पद) है। यह चिर युवा रहने की इच्छा और जिम्मेवारियों से पलायन का नाम है। किशोरावस्था समाप्त होने के बाद ऐसी मनोदशा आम है, जब हम अपना बचपना भूल नहीं पाते और जवानी अनंत लगती है मगर यथार्थ से टकराव हमें बदल देता है। जिस मनुष्य का मानस इस टकराव को झेलने से खुद को बचाता है वह अपने विकास को अवरुद्ध करता है। कटु वास्तविकताओं से मुठभेड़ और अपनी जय-पराजय का समान भाव से स्वीकार ही हमें परिपक्व करता है।

‘पीटर पैन सिंड्रोम’ एक क्वासी सायकॉलॅजिकल (अर्द्धमनोवैज्ञानिक) शब्दावली भले हो, इसकी जड़ें प्योर सायकॉलॅजी में है। प्रसिद्ध दार्शनिक मनोचिकित्सक कार्ल गुस्ताव जुंग एक आलेख है – सायकॉलॅजी ऑफ़ चाइल्ड आर्किटाइप। इसमें वे ग्रीक मिथकीय चरित्र ‘पुएर एटरनस’ यानी ‘शाश्वत शिशु’ प्रतीक के आधार पर चाइल्ड आर्किटाइप की अवधारणा विकसित करते हैं। पुएर एटरनस शब्द रोमन कवि ऑविड के महाकाव्य ‘मेटामॉरफॉसिस’ की देन है। इसमें वे शिशु ईश्वर ‘इयाकस’ को पुएर एटरनस कहकर प्रशंसित करते हैं। जुंग का आर्किटाइप मानव के मन का ‘आदिम रचना तत्व है। उनका मानना है कि सामूहिक अवचेतन में कई अर्किटाइप्स समाहित होते हैं। इन्हीं अर्किटाइप्स में एक है- पुएर एटरनस। जुंग के अनुसार अर्किटाइप्स बाइपोलर (दो ध्रुवों वाले) होते हैं। एक ध्रुव सकरात्मक होता है और दूसरा नकारात्मक। शाश्वत शिशु का सकारात्मक पहलू नवीनता, विकास की संभावना और भविष्य की आशा को प्रतीकित करता है जबकि नकारात्मक पहलू परिपक्वता से परहेज, जीवन संघर्षों से मुह मोड़ने और समाधान लेकर आनेवाले काल्पनिक जहाज के दिवास्वप्न में डूब रहने को।

माइकल जैक्सन सचमुच एक पीटर पैन था, जो एक नवयुवा की तरह बेहद ग़़ैर दुनियादार तरीके से जीता रहा। उसकी रचनाओं में हमेशा एक नयापन रहा – नवयौवन से आने वाला नयापन, मगर ठोस वास्तविकताओं के समझदार स्वीकार की जगह आवेगों के नशे और नशे के आवेगों में इस हद तक डूबा रहा कि न उसे अपने तन की परवाह रही, न मन की और न ही धन की। वह शाश्वत शिशु के सकारात्मक पहलू की ऊर्जा से रचता तो रहा मगर नकारात्मक पहलू के दबाव में जीवन की आग से चमत्कारिक ढंग से बचने की आशा में झुलसता भी रहा और एक दिन सुपुर्दे ख़ाक हो गया – नाहक। न जाने की उम्र थी और न वजह। माइकल जैक्सन हमारे समय पर हावी अमेरिकी सभ्यता की एक दुखती रग है, जिसपर बार-बार उंगली रखे जाने की ज़रूरत है।

बॉडी डिसमॉर्फिक डिजार्डर

मनोचिकित्सकीय विमर्श में माइकल जैक्सन की उपस्थिति की एक और वजह है। उसने जिस बेरहमी से अपने चेहरे की एक के बाद एक कई सर्जरी कराई वह एक रोचक ख़बर नहीं बल्कि मनोचिकित्सकीय मुद्दा है। एक मनोरोग होता है- बॉडी डिसमॉर्फिक डिजार्डर। पहले इसे ‘बॉडी डिसमॉरफोफोबिया’ भी कहा जाता था। इसमें होता यह है कि ग्रस्त व्यक्ति अपने शरीर की बनावट और अपनी छवि में खोट महसूस करने लगता है। उसे लगता है कि उसके चेहरे या शरीर के किसी अन्य हिस्से में कोई गड़बड़ी है। यह खयाल बार-बार उसके मन में आता है और वह परेशान हो उठता है। वह चिंता और अवसाद से ग्रस्त हो जाता है। किसी विचार के मन में बार-बार आने को आब्सेशन कहते हैं। जहां आबसेशन होता है वहां कंपल्सन यानी बाध्यकारी विचार भी आता है जो व्यक्ति को इस बात के लिए बाध्य करता है कि वह ऐसी कोई हरकत करे जिससे इस त्रासद विचार श्रृंखला से मुक्ति मिले। आपको आए दिन ऐसे लोग मिल जाएंगे जिन्हें अपने रंग से शिकायत है और चेहरे पर तरह-तरह के रासायनिक पदार्थों की मालिश करने में लगे रहते हैं। फेयर एन्ड लवली जैसे क्रीम का बाज़ार बढ़ाने में इस मनोरोग का सहयोग यकीनन मिलता है। कुछ लोग चेहरे के एक दाग़ के पीछे इस क़दर पड़ जाते हैं कि अपने सारे वजूद को दाग़दार कर लेते हैं। अनुमानतः यह रोग 1-2 प्रतिशत आबादी को ग्रसित करता है और ग्रस्त व्यक्ति के जीवन की गुणवत्ता (क्वालिटी ऑफ़ लाइफ) को बुरी तरह प्रभावित करता है। बॉडी डिसमार्फिक डिजार्डर से ग्रस्त व्यक्ति में मेजर डिप्रेशन (गंभीर अवसाद) और सोशल फोबिया के लक्षण भी मिलते हैं। अगर समुचित इलाज न हो तो ग्रसित लोगों में आत्महत्या की दर बढ़ जाती है।

इस रोग के कारणों का ठीक-ठीक पता नहीं। मगर शोधों के अनुसार इसके कारणों में जैविक, मनोवैज्ञानिक एवं सामाजिक-सांस्कृतिक कारकों का सम्मिलित योगदान होता है। आइए इसे माइकल जैक्सन के जीवन के उदाहरण से समझें। वह अश्वेत था और अश्वेतों की तरह उसकी नाक चैड़ी थी और होठ मोटे। यूरोपीय दृष्टिकोण से वह एक कुरूप व्यक्ति था। माइकल ने इस बात का जि़क्र भी किया है कि उसके पिता उसकी मोटी और भद्दी नाक को मसलकर उसे सताया करते थे। गोरों के बीच कामयाबी हासिल करने वाले माइकल को अपने काले रंग, मोटे होठ और चैड़ी नाक से शिकायत होने लगी। वह इस आब्सेशन से इस हद तक परेशान हो गया कि उसने अपने चेहरे की बनावट ही बदल ली। सर्जरी-दर-सर्जरी उसकी नाक पतली होती गयी। सिर्फ नाक ही नहीं होठ भी। उसके चेहरे का रंग भी पहले से साफ होता गया। पूरे प्रसंग पर न्यूयॉर्क की प्रसिद्ध प्लास्टिक सर्जन पामेला लिपिकिन का कहना है कि संभवतः उसे अपनी अफ्रीकी-अमेरिकन छवि से शिकायत थी, इसीलिए उसने अपने चेहरे को कुछ से कुछ बना दिया। प्लास्टिक सर्जरी की भाषा में उसकी नाक को ‘एन्ड स्टेज नोज’ या ‘क्रिपल्ड नोज’ कहते हैं। माइकेल का ऑपरेशन करने वाले सर्जन डा. स्टीफेन हॉफिज कहते हैं कि उसे अपनी अफ्रीकी छवि से शिकायत नहीं थी, दरअसल वह अपने चेहरे को बेहतर शिल्पित देखना चाहता था। माइकल स्वयं इन अफवाहों का खंडन करता रहा। उसने सिर्फ यह माना कि नाक की सर्जरी बेहतर गाने के लिए कराई और विटिलिगो (सफेद दाग) से ग्रस्त चेहरे के दाग़ों को कम करने के चक्कर में अपने चेहरे की ब्लीचिंग की। मगर लिपकिन प्रश्न उठाती हैं- पहले क्या हुआ विटिलिगो या स्कीन ब्लीच? और कहती हैं शायद वह काॅकैशियन दिखना चाहता था।… उसने अपने चेहरे को यूरोपियन स्त्री के चेहरे के क़रीब लाने की कोशिश की।… लिपकिन की इस टिप्पणी को माइकल पर लगे समलैंगिकता के आरोपों से जोड़ कर भी देखा जाता है। कुछ लोगों का मानना है कि माइकल की यौन रुचि को समलिंगी नहीं बल्कि दुविधाग्रस्त मानना चाहिए और यह भी कि शायद खुद उसे अपने जेंडर को लेकर भ्रम था।

माइकल जैक्सन एक ड्रग एडिक्ट भी था। वह तरह-तरह के नशे का तजुर्बा करता रहा। कुछ मनोवैज्ञानिक माइकल की खतरनाक नशाखोरी को ‘खुद से बेहद घृणा’ की आत्मनाशक (सेल्फ डिस्ट्रक्टिव) परिणति मानते थे। और वह गया भी इसी रास्ते। और जब गया तो भारी क़ज़ऱ् में डूबकर। जिस व्यक्ति ने बेहिसाब दौलत कमायी उसकी यह गति? तो क्या वह मैनिया के मरीज़ों की तरह शाहखर्च भी था?

इस पहेली के अधखुले अर्थों के निहितार्थ गहरे हैं

माइकल जैक्सन एक अबूझ पहेली है। मगर इस पहेली के अधखुले अर्थों के निहितार्थ गहरे हैं और उपयोगी भी। जबर्दस्त ख्याति के बावजूद अपनी पहचान को बदलने और खुशी के अनजान और शायद अस्तित्वहीन टापुओं की तलाश में खुद को तबाह करने वाला माइकल हमारे समय का एक एक एद्भुत शिक्षाप्रद प्रतीक है। हमारे समय के लोग खासकर युवा हेयर स्टाइल, हेयर कलर और बॉडी लैंग्वेज से यूरोपीय या अमेरिकन दिखने की कोशिश करते नज़र आ रहे हैं। कॉस्मेटिक सर्जरी का बाज़ार बढ़ता जा रहा है। बाजार हमें अपनी छवि में खोट ढूंढने के लिए लगातार उकसा रहा है। इसकी वजह से हम ‘जैसे हैं’ उसे स्वीकार न करने का फैशन महामारी की शक़्ल ले रहा है। ‘एक-सा’-पन की तरफ यह सामूहिक दौड़ क्या ख़तरनाक नहीं? क्या आपको नहीं लगता कि माइकल जैक्सन अगर अपनी जड़ों से जुड़ा और कला की उदात्तता मात्र से संतुष्ट होता तो उसका जीवन अधिक समृद्ध होता?

भाषा, कपड़े और विधा को दरकिनार कर माइकल की तुलना बिस्मिल्ला ख़ान या रविशंकर से कर के देखें। मानता हूं कि माइकल की कला विस्फोटक थी। मगर यह भी सोचता हूं कि क्या आग का खेल दिखाने वाले जेब में आग लेकर चलते हैं? क्या माचिस से काम नहीं चल सकता? ऐसे सुर लगाने का क्या मतलब जो जीवन को ही बेसुरा कर दे? दुख होता है कि लगभग 25 हजार मनोचिकित्सकों के महादेश अमेरिका में माइकल को प्लास्टिक सर्जन और नशीली दवाओं के सौदागर तो मिले एक भी मनोचिकित्सक नहीं मिला। अगर मिला होता तो बीसवीं सदी में शुरू हुआ यह सुरीला अफ़साना इक्कीसवीं सदी में अभी और आगे जाता!

vinay kumar

डॉ. विनय कुमार मनोवेद माइंड हॉस्पिटल, पटना में मनोचिकित्सक हैं.  हिंदी साहित्य से लेकर साहित्येत्तर सांस्कृतिक रुचियों तक को बहुत नजदीक से परखते हैं. नॉन फिक्शनल हिंदी की अकाल वेला में अद्भुत चमक के अधिकारी हैं. हाल ही आई पुस्तक ‘एक मनोचिकित्सक के नोट्स’ से खासे चर्चित. उनसे dr.vinaykr@gmail.com पर संपर्क संभव है. 

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