Archive for the month “February, 2014”

‘संपूर्ण क्रांति’ और ‘रेलगाड़ी’ के बीच जरुरी अन्तर को ‘बाग़-ए-बेदिल’ में खोजता हमारे जमाने का एक ‘मीर’: चंदन श्रीवास्तव

शराबी की अद्भुत सूक्तियां लिखने वाले कृष्ण कल्पित जी , सद्य प्रकाशित काव्य-संकलन ‘बाग़-ए-बेदिल’ कारण इधर घनघोर चर्चा के केंद्र बने हुए हैं. बहुतेरे लोगों ने उनकी पूर्व-पंक्तियाँ के आधार पर ही मान लिया था कि वे अब प्रकाश में नहीं आयेंगें। शराबी की सूक्तियां नामक कितबिया में वे पहले ही लिख गए थे- कभी प्रकाश में नहीं आता शराबी/ अंधेरे में धीरे धीरे/ विलीन हो जाता है. कविता के प्रति जैसा समर्पण/लगाव इस शराबी के पास है वैसा रेअर ही देखने को मिलता है. और यह रेअरनेस ही वह जिजीविषा है जो उन्हें बार-बार प्रकाश में लाता है. बाग़-ए-बेदिल वाला प्रकाश तो इतना तेज है कि बहुतेरों की आँखें चौंधिया गयी हैं और बहुतेरे ऐसे हैं जो इस तेज में भी बारीकियां पढ़ रहे हैं.

‘बाग़-ए-बेदिल’ पर जे.एन.यू में आयोजित संगोष्ठी में चन्दन श्रीवास्तव एक वक्ता के बतौर आमंत्रित थे. इस संगोष्ठी में उनके कविता-कर्म को गम्भीरता से लेने की जरुरत महसूस की गयी. चन्दन श्रीवास्तव का यह यह लेख इसी प्रक्रिया की शुरूआती कड़ी है. बाग़-ए-बेदिल और कृष्ण कल्पित के कवि-व्यक्तित्व के ऊपर आगे भी लेख दिए जायेंगे।  

बाग़-ए-बेदिल

बाग़-ए-बेदिल

By  चंदन श्रीवास्तव

विश्वविद्यालयी दिनों की ट्रेनिंग की वजह से तबीयत कुछ ऐसी हो चली है कि लफ्ज किताब सुनते ही मन में एक रटी-रटायी पंक्ति गूंजने लगती है- आखिर! इस किताब की पॉलिटिक्स क्या है ? हैरत नहीं कि किताब बाग़-ए-बेदिल हाथ आई तो ऐसा ही हुआ। किताब भारी-भरकम है, आकार से भी और आवाज से भी। अदबी मुआमले की समझ के मामले में अपनी औकात देखी तो भार उठाने की हिम्मत नहीं हुई। सोचा, चलो किसी और के लिखे से काम चलाते हैं। और इसी फिराक में नजर अटकी बाग़ ए बेदिल पर कवि अरुणकमल की टिप्पणी के एक टुकड़े पर कि – “ कल्पित ने अतीत को वर्तमान में ढाल दिया है और वर्तमान को अतीत में ढालकर उसे व्यतीत होने से रोका है, इसलिए हर कविता कई कालों में प्रवाहित होती है। ” कहते हैं बदलाव सृष्टि का नियम है। अपनी इतिहास-प्रदत्त स्थिति के कारण आप उससे सहमत-असहमत हो सकते हैं। सो, अरुणकमल की पंक्ति को पढ़कर लगा कृष्ण कल्पित की कोशिश समय के अनवरत घूमते पहिए को थाम लेने की है। लगा, कृष्ण कल्पित अपने खास समय के भीतर बदलाव के किसी रंग-ढंग से असहमत हैं और ‘कविता के कुरुक्षेत्र’ में उस बदलाव पर जीत हासिल करने के लिए उतरे हैं।

लेकिन, कृष्ण कल्पित का अपने कवि और कविता के बारे में ख्याल ऐसा निष्कर्ष निकालने से रोकता है। अपने कवि-कर्म को लेकर कल्पित साहब का कहना है कि -“ ये कवितायें एक उपेक्षित और दीवार से लगा दिए गए कवि की प्रति-कवितायें हैं।”  और “ इन कविताओं में शब्दों का आयुधों और अस्त्र-शस्त्रों की तरह उपयोग आत्म-रक्षार्थ ही हुआ है..किसी दुश्मन, किसी भूखंड, या कीर्ति को विजित करने के लिए नहीं। हर कवि को अपने लिए एक कवच का निर्माण करना पड़ता है और कविता-साधना तो निश्चय ही किसी निरंतर युद्ध से कम नहीं..। ” आगे परंपरा का निजी-पाठ करते हुए उन्होंने यह भी जोड़ा है कि-“प्रागैतिहासिक काल से ही कविता से तीर-तमंचों का काम लिया जाता रहा है- आत्मरक्षार्थ या मानवता की रक्षा के लिए। ” इस शुरुआती (इस वजह से कच्चे और अधबने) पाठ में अगले अनुच्छेदों तक कोशिश करुंगा कि बाग़-ए-बेदिल को कृष्ण कल्पित के आत्म-वक्तव्य के प्रति ईमानदार रहते हुए पढ़ने की कोशिश करुं और इस निष्कर्ष निकालने की हिम्मत जुटा सकूं कि अतीत को वर्तमान में ढालना या फिर वर्तमान को अतीत में ढालकर उसे व्यतीत होने से रोकना कल्पित की कविता की पॉलिटिक्स के भीतर एक प्रक्रिया है, परिणति कत्तई नहीं।

बाग़ ए बेदिल के अपने पाठ की शुरुआत इस प्रश्न से करें – कृष्ण कल्पित को क्यों लगता है कि उनकी कवितायें एक उपेक्षित और दीवार से लगा दिए गए कवि की प्रति-कवितायें हैं? अपनी भारी-भरकम काया में सैकड़ों कविताओं को समेटने वाली इस किताब का उत्तर होगा एक शिकायत या कह लें फरियाद की शक्ल में सामने आयेगा-

उस देश में जेबकतरों की तरह कवियों ने भी अपने इलाके बांट रखे थेमी लार्ड।

वहां गिरहकटोंपिंडारियों मवालियों कबाड़ियों और हलकटों को कवि कहने का रिवाज थाहुजूर।

औरकवियों से उस देश में अपराधियों का सा सलूक किया जाता थामहोदय!…

कबाड़ीपन और कवि-कर्म के बीच का भेद क्योंकर मिट रहा है ? बाग़-ए-बेदिल का उत्तर है-

‘ यह विचार विपथता इसलिए थी,

कि वह उस जनपद का नहींदस जनपथ का कवि थासार्त्र !

बाग़-ए-बेदिल की कविता विपथता का कारण विपर्यय में खोजती है। ‘ जनपद ’( याद करें पुराने वक्तों के महाजनपदों को, देश से राष्ट्र बनने की हिंसक प्रक्रिया को, मेट्रोपॉलिटनी सार्वभौमिकता से स्थानीयता को बचाये रखने की जुगत को) और ‘दस जनपथ ’( 10 डाऊनिंग स्ट्रीट से निकले लोकतंत्र/आधुनिकता की भारतीय अनुकृति का नया संस्करण) के बीच का विपर्यय। जिससे अपेक्षा थी कि ‘उस जनपद का कवि’होकर रहेगा वह ‘दस जनपथ का कवि’ जिस समय के भीतर बनने को बाध्य हुआ उस समय के लक्षण क्या हैं ? वह समय कौन-सा है जिसमें कवि हलकट बनने को बाध्य और आतुर एक साथ है? बाग़-ए-बेदिल का उत्तर है-

जेपी, लोकतंत्र की आँख से ढलका हुआ आंसू था,

जो अब सूख चला हैपार्थ।

कि जनता आती है’ वाले विशाल मैदान में,

अब बाजीगर और रंडियां घूमते हैं।

दरअस्ल संपूर्ण क्रांति अब एक रेलगाड़ी का नाम हैसार्त्र!

और, ऐसे समय में क्या अघट घट रहा है ?

बाग़-ए-बेदिल की मानें तो-

ब्राह्नणों की फौज से जब घिर गई मायावती,

देख लेना एक दिन उसको बना देंगे सती।

बीवियां फिरती हैं दुनिया भर में कत्थक नाचतीं,

और, भारत मां तुम्हारे घर में बर्तन मांजती,

बुझ गये दीपक तो क्या आओ उतारें आरती,

वाजपेयी को मिला सम्मान भारत-भारती।

एक ऐसे समय में जब मर्यादाओं का भयंकर उलटफेर आंखों के आगे हो, कविता और कबाड़ का, कवि और गिरहकट का अंतर समाप्त हो रहा हो, तो कृष्ण कल्पित के अपने ही शब्दों में मानवता के रक्षार्थ कविता और कवि को क्या करना चाहिए? दूसरे शब्दों में, जब व्यवस्था अपने बाशिन्दों को विज्ञापनी भाषा में समझा रही हो कि दरअसल क्रांति एक रेलगाड़ी का ही नाम है और वह इस तरह कि तुम अपने जनपद से चलकर दस जनपथ और दस जनपथ(और उसके पसारे) से निकलकर अपने जनपद के भीतर अबाध आवाजाही कर सकते हो, और इस तरह, मानवीय मुक्ति के एक नये आख्यान में प्रवेश कर सकते हो, तो कविता, व्यवस्था की इस भाषा के काट में क्या करे ? किन शब्दों से बने कौन-से आयुध लाये ? इस प्रश्न का उत्तर खोजने चलें तो एक रास्ता खुलता है जिसपर चलकर आप कह सकें कि अतीत को वर्तमान में ढालना और वर्तमान को अतीत में ढालकर उसे व्यतीत होने से रोकना दरअसल कृष्ण कल्पित की कविता के लिए एक प्रक्रिया है और परिणति है उस भाषा को हासिल करने की कोशिश करना जो मुक्ति की प्रचलित भाषा की काट में खड़ी हो।

कल्पित इस भाषा को खोजने के लिए बार-बार अतीत की कविता के उस्तादों के पास लौटते हैं। चाहें तो कह लें, शेखावटी, जयपुर, पटना जैसे ‘उस जनपद’ का अपना घर “लुटियन दिल्ली” के जोर से लुट जाने का गम गलत करने के लिए किसी पीर-फकीर-शायर की मजार पर बैठना चाहते हैं। वहां झरने वाली निबौलियों को उठाकर पूरे हिन्दुस्तान की कविता की रिवायत के भीतर बे दर-ओ-दीवार का एक घर बसाना चाहते हैं। उन्हें उम्मीद, वहां से प्रचलित भाषा की काट करने वाली एक भाषा मिल सकेगी।यही वजह रही होगी जो पुस्तक के शीर्षक में आया शब्द बेदिल किताब के हर्फों में एक कहानी लेकर जिन्दा होता है। कहानी कविता के भेष में कुछ यों है कि-

औरंगजेब के बड़े बेटे आजमशाह ने,

बेदिल आजीमाबादी/देहलवी को मिलने के लिए बुलाया

तो बेदिल ने यह मिसरा लिख भेजापार्थ!

दुनिया अगर देहेन्द न जुम्बम ज जाए खीश- मन बस्ता अम हिनाए-किनायत ब जाये खीश

( दुनिया भी अगर दे दो तब भी मैं अपनी जगह से नहीं हिलूंगा क्योंकि मैंने अपने पांवों में सब्र की मेहंदी लगा ली है)

कविता के भीतर इस कथा की पुनर्वासी करके कल्पित एक साथ कई काम करते हैं। एक तो वे आपके मन के भीतर पैठी ऐसी ही अनेक कथाओं के लिए राह खोलते हैं। इस कथा को पढ़कर बिरला ही होगा जिसके मुंह पर यह पंक्ति ना आ जाये- आवत जात पनहिया टूटी बिसर गयोहरिनाम- संतन को कहा सिकरी सो काम। किसी को मिर्जा गालिब का यह शेर भी याद आ सकता है- हजार कस्द करता हूं इस जा से कहीं और जाने का- दिल कहता है तू जा मैं नहीं जाने का। और, बेतरतरीबी के तर्क से मन के किसी कोने में बैठा ‘अंगद का पाँव’ भी याद आ सकता है। तेजरफ्तारी अगर आज के जीवन और जगत को परिभाषित करने वाली वर्चस्वकारी भाषा है तो फिर कृष्ण कल्पित कविता के उस्तादों के पास जाकर वहां से उनके ठहराव ढूंढ़ लाते हैं।जो कोई बेदिल की तरह सब्र की मेहँदी लगाकर ठहरा है, कोई किसी भक्तकवि की तरह रामकथा में रमने की वजह से ठहरा है तो कोई गालिब की तरह नये-पुराने पस-ओ-पेश में पड़कर ठहरा हुआ है। ठहराव का अपना निजी ठौर खोज सकें- इसके लिए कृष्ण कल्पित की कविता कथाओं या कह लें काव्य-पंक्तियों की एक झनकार(शुक्लजी के शब्दों में कहें तो अर्थ और प्रसंग का गर्भत्व) रचती है। कल्पित की कविताओं(बाग़-ए-बेदिल में) के शब्द और पंक्तियां ‘अर्थ’ और ‘प्रसंग’खोजने के क्रम जब ‘आखर’ तलाशती हैं तो एक पूरा सिलसिला कायम हो जाता है, पूरब की कविता के रुप-शिल्प, कथ्य और वस्तु को सुनने-सुनाने का। कवि अपनी तरफ आखर और अरथ की पूरी परंपरा सौंपने को उत्सुक है ताकि पाठक नये सिरे से रचने और लड़ने के लिए तैयार हो सकें।

आखिर को एक बात दो शब्द “पार्थ” और “सार्त्र” पर। बाग ए बेदिल की कविता का स्थापत्य इन दो शब्दों के बिना संभव नहीं। जैसे कबीर की कविता में संबोध्य का चयन(साधो, संत, पांड़े/बांभन) के अनुकूल कविता की वस्तु बदलती है, साथी ही इन शब्दों के आने के साथ मानो विषय की घोषणा हो जाती है, ठीक उसी तरह कृष्ण कल्पित के बाग़-ए-बेदिल में ‘पार्थ’ और ‘सार्त्र’ कविता की बनावट के दो पाट हैं, और अपने नाम के अनुकूल वस्तु को धारण करते हैं। पार्थ, कुरुक्षेत्र यानि भावी महाविनाश की आशंका के बीच किंकर्तव्यविमूढ़ खड़ा पात्र है, कृष्ण उसे कर्तव्य का उपदेश देते हैं- युद्धस्व..। आशंका सार्त्र के साथ भी है। दो विश्वयुद्धों के बीच खड़ा एक चिन्तक जिसकी आंखों के आगे आधुनिकता या कह लें तर्कबुद्धि पर आधारित राज्यसत्ता/विज्ञान/उद्योग का चरित्र उजागर हुआ और आधुनिकता प्रदत्त मानव-मुक्ति का आख्यान हिरोशिमा पर परमाणु बम के धमाके के साथ दम तोड़ गया। पार्थ के सामने अपने समय की मर्यादाओं के भंग होने का संकट खड़ा हुआ था तो सार्त्र के सामने नई मर्यादाओं के भंग होने का संकट, वे मर्यादाएं जिनका वादा था- हमारे चौखटे में रहो, मुक्ति हो जाओगे । आधुनिक और प्राचीन, दोनों ने मुक्ति शब्द के साथ छल किया- इस बात के दो गवाह कृष्ण कल्पित की कविता में‘पार्थ’ और ‘सार्त्र’ हैं। दोनों को हाजिर-नाजिर जान, बाग़-ए-बेदिल कभी पीड़ा, कभी व्यंग्य, कभी पुकार तो कभी ललकार और कई बार हिकारत के स्वर में बोलती है।

जाहिर है, ग्लोबल गांव होने की जिद में पड़ी दुनिया के विस्थापितों/ शापितों की जगतपीड़ा और आत्मपीड़ा में नाभिनाल रिश्ता बैठाने को बेचैन यह यायावर कवि कृष्ण कल्पित अपने ठौर के तौर पर पार्थ और सार्थ को ही चुन सकता था।

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव,  मूलतया छपरा(बिहार) के निवासी, पिछले पंद्रह सालों से दिल्ली में। पहले आईआईएमसी और फिर जेएनयू में पढ़ाई। “उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हिन्दी लोकवृत्त का निर्माण” शीर्षक से पीएचडी के बाद दिल्ली के कॉलेजों में छिटपुट अध्यापन, फिर टीवी चैनल की नौकरी और अब विकासशील समाज अध्ययन पीठ(सीएसडीएस) की एक परियोजना इंक्लूसिव मीडिया फॉर चेंज से जुड़े हैं। इनसे  chandan@csds.in पर संपर्क संभव है। 

( यह कृष्ण कल्पित को समझने की शुरुआती कोशिश है. लिखने वाले ने ना तो उनकी सारी रचनाओं का पाठ किया है और ना ही पढ़ी हुई कविताओं पर पर्याप्त समय देकर सोचा है। अगर बेतरतीबी के भीतर से कोई तरतीब बन सकती हो तो इस कोशिश को भी इसी रुप में देखा जाय)

बाग़-ए-बेदिल, अंतिका प्रकाशन , प्रकाशन वर्ष : 2013, पृ. सं: 512, मूल्‍य : HB 850/-, PB 450/- 
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मास्टर स्टोरी राइटर थे अमरकांत: रविभूषण

 ‘हत्यारे’ और ‘बुड़ान’  इन दोनों कहानियों पर अत्यंत संक्षेप में मैं कहूं कि हत्यारे और बुड़ान के रचनाकाल में लगभग तीस वर्ष का अंतर है और बुड़ान 1991 या 1992 में लिखी गई थी। हत्यारे जब लिखी गई थी तब देश के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू थे। बुड़ान जब लिखी गई तब प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव थे और मनमोहन सिंह की नई अर्थनीति आ चुकी थी। और जब हम इन दोनों कहानियों पर बात कर रहे हैं तो हमारे देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह हैं। इन दोनों कहानियों में दो-दो पात्र हैं। हत्यारे में पात्र का कहीं कोई नाम नहीं है। अगर हम इसी बिंदु को केंद्र में रख कर बात करें कि दोनों पात्रों के नाम अमरकांत ने क्यों नहीं दिए, ये अनाम क्यों है; क्योंकि जब हम नाम दे देते हैं तो वह अपने वजूद में आ जाता है और यदि नाम नहीं देते हैं तो उसका भी एक वजूद होता है लेकिन वह विस्तृत होता है। ‘बुड़ान’ कहानी की दादी सरकार और सरपंच को सरापती है। हत्यारे कहानी में अमरकांत ने सरापा तो कहीं नहीं है लेकिन इतनी सारी चीजें हमारे सामने इकट्ठी रख दी हैं कि हमें लगता है कि कुछ भी छूटता नहीं है। दोनों कहानियां आकार में छोटी हैं और यह बतलाती हैं सब कुछ या बहुत कुछ डूब रहा है। यह ‘रामदास’ वाली कविता हमारे मित्र महेश कटारे जी ने पढ़ी। जो हत्यारे पर लिखी गई थी। अब आप देखिए एक कहानी में हत्या की संस्कृति है और दूसरी कहानी में विकास की संस्कृति है। तो ‘हत्या’ और ‘विकास’ के इस आपसी सम्बन्ध पर भी विचार करने की आवश्यकता है। हत्यारे के दोनों पात्र लुम्पेन हैं और बुड़ान के दोनों पात्रों में सम्भावनाएं हैं। ये बाद में चलकर प्रगतिशील भी हो सकते हैं और लुम्पेन भी हो सकते हैं और महेश कटारे जी ने ठीक ही कहा कि दोनों कहानियों की भाषा सहज और सम्प्रेषणीय है। कहानी-भाषा में एक प्रवाह है और एक जीवंतता है. जो  हत्यारे में कुछ अधिक है। हत्यारे पर मार्तण्ड ने बहुत गंभीर बातें कही हैं। कल बहुत कम समय में मैंने ‘रोड टू सर्फडम’ की चर्चा की थी, जिसका उल्लेख करते हुए उन्होंने प्रश्न किया कि क्या अर्थशास्त्र के डिस्पिलिन से साहित्य को समझना सम्भव है? इस पर मेरा कहना है कि नहीं, हम ऐसा नहीं मानते। कोई भी नहीं मानता। हम जब कल अपनी बात कह रहे थे तो आज के समय पर फोकस कर रहे थे और समयाभाव के कारण आज के समय को भी हमने सही ढंग से रेखांकित नहीं किया था। उसके बाद हम दूसरी चीजों पर आ गए। हमारा कहना केवल इतना ही था कि भारत का जो समय है और पूरे विश्व का जो समय है, इसकी शुरुआत हम वहीं से मानते हैं। संक्षेप में मैं यह कह दूं कि जब हायक ने ‘रोड टू सर्फडम’ (गुलामी का रास्ता) लिखी तब द्वितीय विश्वयुद्ध समाप्त हो रहा था। विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष का जन्म हो रहा था। अमेरिका को द्वितीय विश्वयुद्ध से कोई नुकसान नहीं पहुँचा था। उसके बाद विश्वबैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष की स्थापना के बाद और जब पचास के दशक में बहुत सारे देश स्वतंत्र होने लगे थे -क्या अफ्रीकी, क्या एशियाई और दूसरे देश- तब नई आर्थिक नीतियां चलने लगीं और अमेरिका पूरी तरह से अपने वजूद में आ गया। उसके साथ ही कोल्डवार को भी हम देखें। उसके साथ सत्तर के दशक में जब डालर को सोने से डी-लिंक्ड किया गया उसको देखें। हम उसके बाद सत्तर के दशक में मार्गरेट थैचर और रोनाल्ड रीगन को देखें जहां से थैचरिज्म और रीडनामिक्स शुरु होता है और थैचर ने यह कहा था कि समाज, समाज क्या है! समाज का कोई अस्तित्व नहीं है! और आप सब जानते हैं कि मार्गरेट थैचर के निधन के बाद इंग्लैंड में लोगों ने कहा कि डायन मर गई है। आप देखें कि ये राजनेता हायक और मिल्टन फ्रीडमैन जैसे अर्थशास्त्रियों को कितना सर पर उठाकर रखते थे। मार्गरेट थैचर के हाथ में किताब होती थी हायक की और उनके जो इंटरव्यू हैं, पत्राचार हैं उनमें रोनाल्ड रीगन किस तरह से मिल्टन फ्रीडमैन को महत्त्व दिया करते थे वह देखिए। यह देखने की कोशिश कीजिए कि शिकागो स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स अपने वजूद में कैसे आया और आज भारत के रिजर्व बैंक का जो गवर्नर है ‘रघुराम राजन’ उनके वाशिंगटन के दफ्तर में हायक और रोनाल्ड रीगन की तस्वीरें मौजूद हैं/थी। वह अमरीकी नागरिक हैं। आज भारत के रिजर्व बैंक के गवर्नर हैं। क्यों 1967 से ही इकोनॉमिक्स में नोबेल पुरस्कार दिया जाना आरम्भ हुआ। इस खेल को, तमाशे को, तिकड़मों को और साजिशों को द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद यदि हम देखने की कोशिश करते हैं। तो सवाल का जबाब मिल जाता है. और जैसा कि मशहूर अफ्रीकी उपन्यासकार चिनुआ चेबे ने कहा है कि ‘उपन्यासकार को एक अध्यापक के रूप में होना चाहिए।’ मेरा सवाल दूसरा है और वह सवाल यह है कि एक औपनिवेशिक देश में जिसको एक आधी-अधूरी ही राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त हो जाती है। उसके बाद उसके सामने किस प्रकार की सामाजिक समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं। न्युगी व थ्योंगो ने जो एक लेक्चर दिया था, जिसका समकालीन तीसरी दुनिया में एक अच्छा-खासा अनुवाद आनंद स्वरूप वर्मा ने किया है, उसको देखिए और तब ऐजुकेशन-यूनिवर्सिटी के फील्ड में और बौद्धिक जगत् में जो चीजें चलती हैं और हमारे मानस को जिस तरह अनुकूलित किया जा रहा है,  उसे देखने की कोशिश करें। यह इसलिए भी कि विकास की जो अवधारणा है वह पूरी तरह से आर्थिक विकास से जुड़ जाती है। इसलिए वह मनमोहन सिंह की इकोनॉमिक्स हो या नरेन्द्र मोदी की इकोनॉमिक्स हो, किसी से कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि सारा मामला पूरी तरह से कारपोरेट से ही जुड़ रहा है। इसलिए मैं केवल यह कह रहा था कि आज क्या भाषा, क्या कला, क्या साहित्य, क्या संस्कृति, क्या उत्तर-आधुनिकतावाद, क्या उत्तर संरचनावाद, ’70 के दशक के बाद से आने वाले नए-नए थ्योरीज- इन सारी चीजों पर हम यदि समग्रता में विचार करने की कोशिश करते हैं तो हमें यह पता चल जाता है कि जो अर्थनीति है और जो राजनीति है इनसे इनका जो लगाव, जुड़ाव या झुकाव है वह किस प्रकार है या नहीं है। हम चीजों को आज खण्डित रूप में नहीं देख सकते और इसके लिए हम कहानी में भी चलेंगे। # लेखक

अपनी पत्‍नी के साथ अमरकांत

अपनी पत्‍नी के साथ अमरकांत

BY  रविभूषण

‘हत्यारे’ कहानी पर मार्तण्ड ने बहुत अच्छे ढंग से हिंदी के चार कथालोचकों की चर्चा की और यह बतलाया कि विश्वनाथ त्रिपाठी ने कहा है कि अमरकांत कहानी हत्यारे में ये जो दो लुम्पेन पात्र हैं संघर्ष नहीं करते। आखिर ये लुम्पेन कैरेक्टर आते कहां से हैं। लुम्पेन इकोनॉमी पर जो सबसे अच्छी किताब लिखी है वह सुनीति कुमार घोष ने लिखी है और यह जो लुम्पेन बुर्जुआजी है, यह जो लुम्पेन इकोनॉमी चलती है इससे लुम्पेन पात्रों का कोई सम्बन्ध बनता है या नहीं बनता है। और नेहरू के समय में लुम्पेन पूंजी आज की तरह तो दौड़ नहीं रही थी लेकिन वह थी कि नहीं थी। वह फ्रीडम मूवमेन्ट में थी कि नहीं थी. सुनीति कुमार घोष ने पूरे फ्रीडम मूवमेन्ट के दौरान बीस-तीस से लेकर बाद के दशकों तक इस लुम्पेन कैपटिलिज्म पर बहुत अच्छे ढंग से विचार किया है। अब अगर अमरकांत के पात्र संघर्ष नहीं करते हैं तो क्यों नहीं करते? लुम्पेन हैं, लुम्पेन कैसे संघर्ष करेंगे! यह कथालोचक सोच रहा है। यह ठीक ही कहा गया कि (अमरकांत की कथायात्रा में) यह एक ब्रेक है। मार्तण्ड ने यह अच्छी बात कही कि जो अकहानी है और जो नई कहानी है उसके संधि स्थल पर यह कहानी पूरी तरह से खड़ी है और ’60 के दशक में ही जब अकविता, अकहानी वगैरह का जो दौर चला था और फैशन जब आया था इसमें (हत्यारे में) कुछ लोग उसकी शिनाख्त कर सकते हैं. हत्यारे कहानी में ऐसे कुछ शब्दों, ऐसे कुछ वाक्यों से संकेत निकाले जा सकते है और कह सकते हैं कि बाद में इसको विकसित करते हुए एक दूसरी दिशा में अकहानी के कथाकारों ने जाने की कोशिश की। हिंदी के किसी भी कथालोचक ने, मार्तण्ड ने अभी चार का उल्लेख किया, अमरकांत के संदर्भ में मुक्तिबोध का उल्लेख नहीं किया है। मार्तण्ड ने भी विजयमोहन सिंह का उल्लेख नहीं किया। विजयमोहन सिंह शायद हिंदी के पहले आलोचक हैं जिसने अमरकांत की कहानियों पर विचार करते हुए मुक्तिबोध का दो-तीन बार उल्लेख किया है। लेकिन विजयमोहन केवल उतना ही जिक्र करते हैं. विश्वनाथ त्रिपाठी इतना ही कहते हैं कि अमरकांत के पात्र संघर्ष नहीं करते और राजेन्द्र यादव कहते हैं मनुष्य के अस्तित्व की लड़ाई महत्त्वपूर्ण है; तो खुद राजेन्द्र यादव का जो कथा संसार है और उनका जो चिंतन जगत् है उसकी छायाएं उनकी आलोचनात्मक टिप्पणियों पर कैसे पड़ती हैं उसका मैं यहां जिक्र नहीं करूंगा। यह अलग से विचारणीय है। सुरेन्द्र चौधरी जब कहते हैं कि हत्या नहीं होती तो यह महत्त्वपूर्ण कहानी होती. इसमें अतिनाटकीयता है। परंतु नई कहानी के दौर के और बाद के समय के हिंदी के जितने भी कथालोचक हैं उन्होंने जब हत्यारे कहानी पर कहीं कम, कहीं अधिक जो  भी विचार किया है उन सब को हम ध्यान में रख करके देखें कि इसमें अति नाटकीयता की बात सुरेन्द्र चौधरी भी करते हैं। विजयमोहन भी करते हैं और नामवर यह ठीक ही कहते हैं कि हत्या नहीं होती तो कहानी महत्त्वपूर्ण नहीं होती। लेकिन हिंदी का कोई कथालोचक हत्यारे कहानी के रेशे-रेशे को अलगाते हुए और उसे एक दूसरे से जोड़ते हुए किसी नतीजे पर पहुँचता हुआ मुझे दिखाई नहीं पड़ा है। मार्तण्ड ने ठीक कहा कि खल’नायक लुम्पेन पेटी बुर्जुआ है। मेरा कहना यही है कि लुम्पेन पेटी बुर्जुआ को हम लुम्पेन कैपटिलिज्म से जोड़ सकते हैं या नहीं। हत्यारे कहानी में भले इसकी पूरी चर्चा नहीं हुई हो लेकिन आप यदि यह देखें हत्यारे कहानी में क्या नहीं है। एक मुकम्मल रचना है यह। हिंदी आलोचना के साथ एक सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि जब हम कहानी पर विचार करते हैं तो केवल कहानियां हमारी आंखों के सामने होती हैं। जब कविता पर विचार करते हैं तो कविता हमारे सामने होती है। जब उपन्यास या अन्य साहित्य रूपों पर विचार करते हैं तो वह साहित्य रूप ही हमारे समक्ष प्रमुख रूप से उपस्थित हो जाता है। हम रचनाओं से निकलते और बहते हुए समय को देखने की कोशिश नहीं करते और पचास के दशक के बाद की स्थितियों को देखें तो हम कहीं न कहीं ‘अंधेरे में’ और ‘हत्यारे’ को एक साथ रखकर पाठ करने की आवश्यकता समझते हैं।

हत्यारे कहानी में ये जो दो लुम्पेन पात्र हैं ये कहां खड़े हैं- पहले पान की दुकान पर उसके बाद सड़क पर चलते हुए। शहर तो है ही। बुक स्टॉल- जहां पर एक युवती मैगजीन खरीद रही है और ये भी मैगजीन के पन्ने उलट रहे हैं। बाजार, रेस्तरां ये सब स्थान अलग-अलग दिखाई पड़ेंगे लेकिन मेरा मानना है कि इन स्थानों की प्रकृति पर विचार होना चाहिए। किसी आलोचक ने इन पर ध्यान नहीं दिया है। यह कहानी ऊपर से भले ऐसी लगती हो कि यह हत्यारे की कहानी है। दो लुम्पेन की कहानी है। पर मुझे ऐसा लगता है कि देश उस समय जो था, उससे जुड़ी जो चिंताएं हैं यह उन चिंताओं की कहानी है। इसमें क्या नहीं है! हम कहेंगे बड़ी सावधानी के साथ या बड़ी चतुराई के साथ (यह कहानी लिखी गई है) क्योंकि कहानी की पृष्ठ संख्या अधिक नहीं है। अगर दो-तीन बार ही कोई पाठ कर ले तो इसमें सब कुछ प्रत्यक्ष हो जाता है। इसमें नेहरू हैं। देश के अन्य नेता हैं। गांधी हैं। मंत्री हैं। होम मिनस्टर की चर्चा है। ब्लाकों के सरकारी कर्मचारी हैं। पूंजीपति, मंत्रियों और अफसरों के षडयंत्र की चर्चा है। देश की प्राइम मिनिस्ट्री की बात है। देश से आगे बढ़ करके विश्वशांति की बात कही गई है। अमेरिका के प्रेसिडेंट कैनेडी की चर्चा है। अमेरिका-रूस के सम्बन्ध की चर्चा है। जिसमें हम कोल्डवार को देख सकते हैं, वर्ल्ड पॉलिटिक्स को देख सकते हैं। उस समय का जो द्विध्रुवीय विश्व (बाइपोलर वर्ल्ड) है उसको देख सकते हैं और अभी जब हम इस कहानी पर बात कर रहे हैं तो इस एक ध्रुवीय विश्व अर्थात् यूनीपोलर वर्ल्ड में हम इस कहानी पर बात कर रहे हैं। इसमें एक पात्र जब कहता है कि ‘कल मुझको भी अमेरिका के प्रेसिडेंट केनेडी का तार मिला था।…मुझको अमेरिका बुला रहा है।…मैंने भी क़ुबूल कर दिया है कि मैं राष्ट्रीय विचारों का युवक हूं मैं अभी नहीं आ सकता।’ क्या खिल्ली उड़ाई है अमरकांत ने। तीन पंचवर्षीय योजनाएं हो चुकी थीं इस कहानी के लेखन से पहले। केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी। हिंदी आलोचना तो ऐसा नहीं करती लेकिन उसे ऐसा करना चाहिए कि जो पंचवर्षीय योजनाएं हैं (चीजों को) उसके साथ भी रख करके विचार करना चाहिए क्योंकि केदारनाथ अग्रवाल ने और नागार्जुन जैसे बड़े कवियों ने भी पंचवर्षीय योजनाओं पर कविता की कुछ पंक्तियां दर्ज की हैं। आजादी के बाद आजादी में जो कुछ भी जैसा भी राष्ट्रप्रेम था उसकी पूरी कहानी खिल्ली उड़ाती हुई प्रतीत होती है। एक ओर खिल्ली है और दूसरी और पान की गिलौरी है। सिगरेट का धुआं है। इन दोनों पात्रों को अलग से देखने की जरूरत नहीं है। सड़क के दोनों ओर भव्य दुकानें हैं। बाजार की चहलकदमी है। नेहरू युग में कोई माल (शापिंग माल) नहीं था। ये दोनों वहां से गुजरते हैं। ‘वे अक्सर अपने दाएं और बाएं अत्यधिक नाराजगी से घूरते थे’- यह कहानी का वाक्य है। दाएं भी और बाएं भी। क्यों अंधायुग में प्रहरी दाएं और बाएं चलता है? मैं मानता हूं यह ‘राइट एण्ड लेफ्ट पॉलिटिक्स’ है। कहानी वही नहीं होती जो कहानी वर्णन करती हुई प्रतीत होती है। वह अपने भीतर बहुत सारे संकेतों को शामिल किए हुए होती है। यह पाठक के ऊपर निर्भर करता है, यह कथालोचक के ऊपर निर्भर करता है कि उन संकेतों को पकड़े। उन संकेतों को खोलने की कोशिश करे। तो यह जो पंक्ति है उसे आप देखिए, ‘वे अक्सर अपने दाएं और बाएं अत्यधिक नाराजगी से घूरते थे।’ इसमें एक-एक शब्द कसा हुआ है। चुस्त है कविता की तरह। हमें स्वतंत्र भारत में इसकी (राइट एण्ड लेफ्ट पॉलिटिक्स की) पड़ताल करनी होगी। तब इस कहानी का असली रूप हमारे सामने स्पष्ट हो सकेगा। आश्चर्य की बात है कि मार्तण्ड का भी ध्यान इधर नहीं गया और हिंदी के किसी कथालोचक का भी नहीं कि इसमें शिक्षा जगत्- यूनीवर्सिटी भी इसमें शामिल है। अंग्रेजी का हेड प्रोफेसर दीक्षित यहां मौजूद है। जो चंद्रा को फंसाने की कोशिश कर रहा है। वह बहुत साधारण छात्रा थी उसे उसने टॉप करा दिया। तो यहां पूरा एजुकेशन सिस्टम भी है। जिस समाज में एजुकेशन ऐसा होगा वहां लुम्पेन होंगे कि नहीं होंगे, भारतवर्ष के प्रत्येक विश्वविद्यालय शिनाख्त की जानी चाहिए कि वहां दो-चार ही सही लुम्पेन कैरेक्टर्स हमें नजर आते हैं या नहीं। मार्तण्ड ने बहुत अच्छी बात कही कि गोरा गुरु है सांवला शिष्य है। सांवले ने गोरे से कहा कि तुम ‘हरामी-उल-मुल्क’ के शहंशाह हो। ये जो गुस्सा है, ये जो क्रोध है अमरकांत के यहां जो व्यंग्य में झलकता है वह यहां कहीं-कहीं बेलौस ढंग से नजर आता है। इंग्लिश डिपार्टमेन्ट के हेड प्रोफेसर दीक्षित की बात हमने की। कहानी में यह उल्लेख है कि वह अफसरों और मंत्रियों की चापलूसी करता था। ’60 के दशक के आरम्भिक वर्षों में अफसरों और मंत्रियों की चापलूसी करने वाले कॉलेज और यूनीवर्सिटी के लेक्चरान, रीडरान और प्राफेसरान और आज के समय में उनकी संख्या कितनी बढ़ गई है यह सभी लोग जानते हैं। यहां अवश्य यूनीवर्सिटी के कुछ प्रोफेसरान और छात्र मौजूद होंगे। बड़ी बात यह है कि हम इन सबको अलग-अलग करके नहीं देख सकते। ये ऐजुकेशन सिस्टम, ये सोशल सिस्टम, ये पॉलिटिकल सिस्टम सारे सिस्टम एक दूसरे से जुड़े हुए हैं और हत्यारे कहानी उस समय की भारत वर्ष की व्यवस्था पर पूर्ण रूप से प्रहार करती है। और आज जब इतने वर्षों बाद, लगभग 50 वर्षों बाद इस कहानी का पाठ करते हैं तो हम क्या देखते हैं? हम कहां फंसे हैं? किस भंवर में फंसे हैं हम? इस कहानी में लास्की की चर्चा होती है। एक जमाने में लास्की की किताब, अभी भी कुछ लोग उलट लेते होंगे पॉलिटिकल साइन्स वाले, ‘ग्रामर आफ पॉलिटिक्स’ आदि की धूम मची हुई थी। क्यों होती है लास्की की किताब की चर्चा! अमरकांत ऐसे ही कर देते हैं! आप जो पॉलिटिकल थ्योरीज वहां से ला रहे हो- यह उस पर एक तरह से व्यंग्य है।…ये नामावली प्रस्तुत करना, ये बड़े-बड़े लोग जिन्होंने फूको की पांच किताबें नहीं पढ़ी हैं वे आज फूको, देरिदा वगैरह की बातें करते हैं। यह हिंदी की कहानी है और हिंदी का जो शिक्षित वर्ग है उसकी एकदम खिल्ली उड़ाता हुआ चलता है लेखक, इसलिए यहां लास्की भी मौजूद है। कहानी का आरम्भ होता है क्वार की एक शाम से। भाषा की दृष्टि से देखिए जहां तुलनाएं की गई हैं। एक-एक वाक्य इतना कसा हुआ, मुहावरे की शक्ल ले लेता है। हमारे साथी कैलास बनवासी अभी बोल रहे थे कि जो सरलता है यह छत्तीसगढ़वासियों की विशेषता है। एक अफ्रीकी कथाकार ने लिखा है वहां के लोगों को उद्धृत करते हुए कि गोरे हमारे यहां रात्रि भोजन के लिए आए। उन्होंने रात्रि का भोजन किया और वे हमारा सब कुछ ले गए। चिनुआ चेबे ने यू.आर. अनंतमूर्ति से बात करते हुए एक इंटरव्यू में यह कहा था कि अफ्रीकियों की जो सबसे बड़ी खासियत है वह उनकी सरलता ही है। वह उनकी सज्जनता ही है। यह सरलता और सज्जनता किसी काम की नहीं है। मुझे तो ऐसा लगता है कि जिस तरह कफन कहानी प्रेमचंद की कहानियों में एक अलग किस्म की कहानी है। उसी तरह से अमरकांत की हत्यारे कहानी एक अलग किस्म की कहानी है और यहां किसी ने बताया भी कफन के साथ में ऊपरी धरातल पर ही नहीं कुछ भीतरी धरातल पर इसकी बात की जानी चाहिए। तब हम 1936, 1964 और 2013 में इसको पकड़ सकते हैं। गोरा कहता है,‘मैं सिद्धांतों का आदमी हूं। नेहरू को ट्रंक काल करके आ रहा हूं।’ यह कहा जा सकता है कि ये पात्र कुछ मनोवैज्ञानिक ग्रंथियों से ग्रस्त हैं लेकिन ऐसी बात नहीं है। ये खिल्ली उड़ाते हैं- ‘नेहरू मेरा हाथ पकड़कर रोने लगा। बोला, आज देश भारी संकट से गुजर रहा है। सभी नेता और मंत्री बेईमान और संकीर्ण विचारों के हैं। जो ईमानदार हैं उनके पास अपना दिमाग नहीं है। मेरी लीडरशिप भी कमजोर है। मेरे अफसर मुझको धोखा देते हैं। जनता की भलाई के लिए मैंने पांच साला योजनाएं शुरु कीं, लेकिन ब्लाकों के सरकारी कर्मचारी अपने घरों को भरने में लगे हैं।’ यहां पांच साला योजना की जो चर्चा है वह पूरी तरह से इकोनामी पॉलिसी के तहत है। इतने घोटाले जो दो वर्ष पहले हमें देखने को मिले हैं ये अचानक नहीं हुए हैं। इसकी एक अनवरत श्रृंखला है जो नेहरूवियन पीरियड से हमें देखने को मिलती है। जो संसद में फिरोज गांधी के सवालों से लेकर के आज तक चली आई है। ‘लेकिन मैं उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर सकता!’ यह नेहरू बोलते हैं। नेहरू के समय की समस्त पॉलिसियों पर यह कहानी एक तरह से पुनर्विचार करने के लिए हमें आमंत्रित करती हैं। ‘उसने (नेहरू ने) अंत में कहा- देश को अब केवल आपका ही सहारा है।’ पूरा देश आज लुम्पेन से भरा हुआ है। शायद ही कोई ऐसी पार्टी हो जिसमें लुम्पेन नहीं हों। विचित्र स्थिति है। लुम्पेन कैपिटल जिस तरह से प्रवाहित हो रही है उसमें सब कुछ लुम्पेन हो गया है। सब कुछ उनके हाथ में है। तो क्या इण्डियन डेमोक्रेसी लुम्पेन डेमोक्रेसी है! अनेक सवाल हैं। जो इस कहानी को पढ़ते हुए स्वतंत्र भारत पर गंभीरतापूर्वक विचार करने को हमें आमंत्रित करते हैं। ‘मैं सिद्धांतों का आदमी हूं। नेहरू को ट्रंक काल करके आ रहा हूं।’ सिद्धांत गायब हो गए। नेहरू का जो भी समाजवादी सिद्धांत था वह 37-38 के बाद ही कमजोर होने लगा था और 40 के बाद एक तरह से समाप्त होने लगा था क्योंकि सिद्धांत जितना महत्त्वपूर्ण होता है उससे कहीं ज्यादा महत्त्वपूर्ण होता है- आचरण और व्यवहार। जब सिद्धांत हमारे आचरण में ढलता नहीं, सांसें नहीं लेता तब वह सिद्धांत किताबों में पूरी तरह से सोया हुआ रहता है। यह हमारे कर्म होते हैं जिनसे वह सिद्धांत जीवित होता है। इसलिए यहां पर एक सैद्धांतिक प्रश्न की ओर भी संकेत है. लुम्पेन कह रहा है, ‘मैं सिद्धांतों का आदमी हूं…देश की प्राइम मिस्टरी मुझे मंजूर नहीं। मेरे सामने तो बहुत बड़े-बड़े सवाल हैं। सबसे पहले तो मुझे विश्वशांति कायम करनी है।’ क्या यह कहानी शांति के पक्ष में है। ‘दोनों दांत खोल कर हंसने लगे।’ यहां क्रियाएं देखिए! गति देखिए! दोनों की चाल देखिए! कहानी  की भाषा में एक-एक वाक्य, उनके शब्द विन्यास को पकड़ने की भी यदि हम कोशिश करें (तब इस कहानी को हम सही ढंग से समझ सकते हैं)। ‘अमेरिका के प्रेसीडेंट कैनेडी का एक तार मिला था।’ क्यों अमेरिका के प्रेसिडेंट की चर्चा है इसमें। दूसरे किसी देश के प्रेसिडेंट की चर्चा क्यों नहीं है। यह ऊपरी तौर पर सभी जानते हैं कि नेहरू के समय में भारतवर्ष का जो फॉरेन रिलेशन था, ये कहानी उस फारेन रिलेशन पर हमें थोड़ा सोचने को मजबूर करती है। वह (भारत) सोवियत रूस के साथ था लेकिन अमरीका के साथ भी चीजें चल रही थी। 47-48 लेकर 62-64 तक और उसके बाद तक देखें कि सारी चीजें आरम्भ हो चुकी थीं। कहानी तत्कालीन अमेरिका-रूस संबंधों को लेकर कोल्डवार की भी चर्चा करती है। इन्हीं वजहों से यह कहानी बहुत व्यापक फलक लिए हुए है। साठ के दशक के उत्तरी कहानीकारों की जो चर्चा होती है; नयी कहानी के दौर के सारे कहानीकारों को आप सामने रख लें, उनकी कहानियों को देखें मुझे नहीं लगता कि इतने व्यापक विश्वफलक को लेकर के कहीं चर्चा हुई हो। यह तो हमको खोलना है कहानीकार तो डिटेल्स में जाएगा नहीं। उपन्यासकार डिटेल्स में जा सकता है, कहानीकार नहीं जा सकता। सांवला कहता है, ‘उसने (कैनेडी ने) लिखा है…आप आ जाएंगे तो अमेरिका निश्चित रूप से रूस को युद्ध में हरा देगा।… मैंने भी क़ुबूल कर दिया है कि मैं राष्ट्रीय विचारों का युवक हूं और इस घोर संकट के समय किसी भी हालत में अपने देश को छोड़कर किसी दूसरी जगह नहीं जा सकता!’ आज अपने देश को छोड़ करके हमारी औलादें, हमारी संताने किस प्रकार से चली गई हैं इसे हम देख सकते हैं। अमरकांत यह पहचान रहे थे और  आने वाले समय की भी पहचान इस कहानी में मौजूद है। पात्रों का जो पहनावा है वह, इनकी जो चाल-ढाल है वह, जूते हैं वह, इनके कमीज के ऊपर के खुले हुए जो दो बटन हैं वह, वहां से निकली हुई जो छातियां हैं वह- इस सारे दृश्य को देंखें…एक वाक्य देखिए, ‘उनकी आंखें सिकुड़ गईं, होठों में दृढ़ता आ गई और गर्दन तन गई।…फिर दोनों ने एक-एक सिगरेट सुलगाई और अंत में शंटिंग करने वाले रेल के इंजिन की तरह लापरवाही से धुंआ छोड़ते हुए वहां से चलते बने।’ ये छात्राओं की ओर घूरते हैं। इनसे किसी नैतिकता की उम्मीद नहीं की जा सकती। अब कुछ अनैतिक हो चुका है। स्वतंत्र भारत एक बड़े अर्थ में अनैतिक भारत बन रहा है। कहानीकार की चिंता यही है। गोरा एक लड़की के बारे में कहता है, ‘उस लौंडिया को पहचान रहे हो?’ और जो प्रोफेसर दीक्षित है उसने अपने छात्रों से किताबें लिखवाई हैं और अपने नाम से छपवायी हैं। इस कहानी को लेकर अलग से अगर एक विश्वविद्यालयी शिक्षा का पाठ किया जाए तो यह हम समझते हैं कि आज के समय में यह ज्यादा जरूरी होगा। ‘वह मामूली स्टूडेंट थी, लेकिन मैंने ही उसको टॉप कराया।’ यह कौन कह रहा है? यह प्रोफेसर दीक्षित कहानी के गोरे पात्र से कह रहा है। किससे कह रहा है किस चरित्र से कह रहा है यह यहां विचारणीय है। प्रोफेसर दीक्षित के संपर्क में कोई बुद्धिजीवी नहीं है और प्रोफ़ेसर दीक्षित का केवल यह उद्देश्य है कि वह चंद्रा जो है वह हमारी होनी चाहिए। ‘मैंने उससे कई बार कहा कि तुमको दो वर्ष में ही डॉक्टरेट दिला दूंगा।’ हिंदुस्तान की किसी भी यूनीवर्सिटी की पी.एच.डी. थीसिस लिख कर मिलने वाली डॉक्टरेट पर हम इससे विचार कर सकते हैं। प्रो. दीक्षित कहता है, ‘मैंने हर दर्जे के लिए पाठ्य-पुस्तकें और कुंजियां लिखकर जो लाखों रूपये कमाएं हैं, उनको चंद्रा के चरणों पर न्योछावर करने को तैयार हूं।’  और इसी क्रम में गोरा प्रोफ़ेसर से डरने के सवाल पर कहता है कि ‘सारा देश जिसकी पूजा करता है वह उस पिद्दी से डरेगा।’ सोचिए जरा, लुम्पेन की पूजा कर रहा है सारा देश। गोरा प्रोफ़ेसर से कहता है, ‘तुमने अनगिनत लड़कियों की जिन्दगी इसी तरह चौपट की है…मुझे बाध्य होकर देश की शिक्षा पद्धति में आमूल परिवर्तन करना पड़ेगा। अब आप देखिए कोठारी कमीशन कब आया। इस कहानी के बाद ही या शायद इसी कहानी के आस-पास कोठारी कमीशन आया था। कोठारी कमीशन ने जो प्रस्ताव रखा था या जो चीजें सामने रखी थी उस पर कितना विचार हुआ। (भारतीय शिक्षा आयोग या कोठारी आयोग का गठन 14 जुलाई,1964 में हुआ था. इसमें विश्वविद्यालयी स्वायत्तता पर बल दिया गया था और शिक्षा को सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक परिवर्तनों के लिए शक्तिशाली माध्यम के रूप में विकसित करने की अनुशंसा की गई थी।) इस तरह की बहुत बाते हैं इस कहानी में। शिक्षा पद्धति में आमूल परिवर्तन की बात लुम्पेन बोल रहा है। उसकी बात ऐसी है जो हंसी में उड़ा दी जा सकती है। लेकिन उसकी बात हंसी में उड़ाने के लिए नहीं है। गम्भीरतापूर्वक सोचने के लिए है और कहानीकार ने एक ऐसी भाषा का चयन किया है जिसमें लोगों को थोड़ा आनंद महसूस हो और उसके भीतर जो गंभीर चीजें मौजूद हैं वे भी स्पष्ट होती चलें। सत्य और अहिंसा, जिसकी बात इस देश में आज भी की जाती है, उसी जमाने में अमरकांत ने सामने रखा था- ‘मैं सत्य और अहिंसा के देश का रहने वाला हूं और मेरे सेवाएं सदा निःस्वार्थ होती हैं।’ झूठ, हिंदुस्तान में जितना भी झूठ चल रहा है। जितनी मक्कारी चल रही है और जितनी अधिक हिंसा चल रही है प्रत्येक स्तर पर राज्य के स्तर से लेकर अनेक स्तरों पर आज हम उसे देखें और यही आज का समय है। आज का समय कल के समय से विच्छिन्न नहीं है। आज का समय कल के समय का एक अगला चरण है। यह अगला चरण है, इसे विकसित चरण नहीं कहेंगे। यह जिस रूप में चल रहा था वही आज भी है और सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि एक नवऔपनिवेशिक देश में जो तमाम परतंत्रताओं घिरा हुआ है। जिसमें लूट धोखाधड़ी, झूठ, दंगा-फसाद सारी चीजें चल रही हैं उस नवऔपनिवेशिक देश में कथाकार की और उपन्यासकार की भूमिका क्या होती है- यह इस कहानी को देखा कर पता चलता है. हत्यारे कहानी में बाजार की चर्चा है, ‘उन्होंने बाजार के दो और चक्कर लगाए।…सभी दुकानें रंग-बिरंगी रोशनियों से जगमगा कर रहस्यमय स्वप्नलोक की तरह प्रतीत हो रही थीं।’ बाजार का यथार्थ से ही कोई सम्बन्ध नहीं है। इस कहानी में देश के चहुँमुखी विकास और विश्वशांति की स्थापना की भी बात है। कहानी का एक पात्र कहता है, ‘तुमको होम मिनिस्टर बना देंगे।’ किसी को कैसे मिनिस्टर बनाया जाता है यह उस पर टिप्पणी है। काबिलियत से कोई मिनिस्टर नहीं बनता। हिंदुस्तान में एक से एक शिक्षाविद् मौजूद हैं लेकिन शिक्षा मंत्रालय चाहे वह प्रांतीय सरकार का हो या केंद्र की सरकार का हो आप  वहां किसको देखेंगे। कहानी के अंत में दोनों पात्र एक कमजोर तबके की औरत के पास पहुँचते हैं। वहां उसका भोग करते हैं। उसे पैसा नहीं देते और वहां से भाग जाते हैं यह कहते हुए कि ‘आर्थिक और सामाजिक क्रांति करने का समय आ गया है।’ यह औरत कौन है! आपको यह इंडीविजुअल लग सकती है। पर हमें यह इंडीविजुअल नहीं लगती है। जैसे हमें बुधिया एक ‘इंडीविजुअल कैरेक्टर’ नहीं लगती कफन कहानी में। जिस तरह हमें गोदान की धनिया भी एक ‘इंडीविजुअल कैरेक्टर’ नहीं लगती है। यह सुन कर हो सकता है कि आप नाखुश हों कि इनमें (बुधिया और धनिया जैसे चरित्रों में) भारत माता की झलक मिलती है जब ये चरित्र पूरी तरह से एक देश की बहुत बड़ी जनसंख्या के एक सिंबल के रूप में उपस्थित होते हैं। जिसे कि आप भोग रहे हैं। यह भोगवाद आज बहुत विकृत रूप में बढ़ गया है। यहां केवल एक स्त्री नहीं है। इसका स्त्री पाठ नहीं किया जा सकता। इस स्त्री का एक सामाजिक पाठ (ही) किया जा सकता है। ये जो भोगने की आदत है, संस्कार है जो लुम्पेन में थी वह आज कहीं पढ़े-लिखों में भी है. कहानी में दोनों लुम्पेन युवकों का पीछा करने वालों में से एक फुर्तीबाज व्यक्ति तीर की तरह आता है और उसे चाकू मार दिया गया। उन दो लुम्पेन पात्रों को रोका नहीं जा सका। भारतवर्ष में लुम्पेन को रोका नहीं गया है। किसी सरकार ने लुम्पेन को नहीं रोका है। सबने समान रूप से बढ़ावा दिया है। उसे रोकने वाली जो शक्ति है, घायल होती है। उसे चाकू मार दिया जाता है। उसकी हत्या कर दी जाती है। तो ये कथा-कौशल है। कहानी-कला है जिसमें इतनी बारीकी के साथ, इतनी सघनता के साथ और इतनी कलात्मकता के साथ अमरकांत हमारे समक्ष अनेक अर्थ-छवियों को रखते हुए हमारे समक्ष प्रस्तुत करते हैं। यह उनकी कहानी-कला का विरल उन्मेष है। क्या कारण है कि हिंदी के कहानी आलोचक आज भी ‘दोपहर का भोजन’, ‘डिप्टी कलेक्टरी’ और ‘जिन्दगी और जोंक’ इस तरह की कहानी की चर्चा करते हैं और ‘हत्यारे’ की चर्चा नहीं करते; क्योंकि यहां एक पूरा सिस्टम है और हम सिस्टम पर निशाना नहीं लगाना चाहते। हम सिस्टम पर कुछ बोलना नहीं चाहते। क्योंकि हम सिस्टम पर बोलेंगे तो जाहिर है कि सिस्टम हमको तिरछी निगाह से देखेगा। अमरकांत इस सिस्टम को उस समय सही-सही देखने की कोशिश ही नहीं करते हैं, हमें भी बताते हैं और यह मास्टर स्टोरी राइटर का कमाल हुआ करता है कि उसके पात्र अगर संघर्षशील नहीं बताए जाते तो भी वह उन स्थितियों को, घटनाओं को, चरित्रों को कैसे अपने पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर देता है और पाठकों के मानस को स्वयं स्वतंत्र निर्णय लेने के लिए बाध्य कर देता है। विवश कर देता है क्योंकि हम यदि कहेंगे कि संघर्ष करो तो इस कहने मात्र से स्थितियां ठीक नहीं हो जाएंगी। एक रचनाकार ही दूसरे के मानस को रचनाशील बना देता है और तब ये सारी चीजें एक जगह इकट्ठा करके अमरकांत हमें सोचने विचारने का मौका देते हैं। अगर उन्होंने मौका नहीं दिया होता तो 2013 में ये कहानी चर्चा में क्यों आती।

(जन संस्कृति मंच के कथा समूह के प्रथम आयोजन ‘कथा मंच’ के तृतीय सत्र में आलोचक रविभूषण द्वारा ‘अमरकांत की कहानी हत्यारे और आज का समय तथा पूरन हार्डी की कहानी बुड़ान’ पर इलाहाबाद में दिनांक 22 दिसंबर, 2013 को दिया गया अध्यक्षीय वक्तव्य। लिप्यावतरण- श्रीकांत पाण्डेय।)

अमरकांत की कहानी ‘हत्यारे’ और आज का समय: मार्तण्ड प्रगल्भ

 बात तो करनी है ‘अमरकांत की कहानी ‘हत्यारे’ और आज का समय’ पर और इसी कहानी पर विचार करके मैं आया था। लेकिन कल की कुछ चर्चाएं जो खासतौर से यथार्थवाद के सम्बन्ध में या सत्य के सम्बन्ध में या यथार्थ और रचना के सम्बन्ध में हुई थीं उनके बारे में भी मैं इस कहानी के संदर्भ से कुछ सोच रहा था. जिसे मैं आगे स्पष्ट करूँगा. चर्चा का प्रस्तुत विषय गंभीर तो है ही मनोरंजक भी है। गंभीर क्यूं है इस पर थोड़ा बाद में चर्चा की जाएगी। पहले, मनोरंजक क्यूं है इसकी थोड़ी चर्चा कर ली जाए। आज का जो विषय है, इस विषय के साथ दिक्कत यह है कि आप जहां चाहे इस विषय को फिट कर सकते हैं। समाजशास्त्र का कोई सेमिनार हो, (तो) उसमें भी यह विषय आ जाएगा। दरअसल हुआ क्या है कि आलोचना की जो समाजशास्त्रीय पद्धति है उसने विषयों का टोटा खत्म कर दिया है और इस तरह के शीर्षक की आवाजाही बेरोकटोक चलती रहती है। जैसे, बहुत सारे शोधार्थी इसी तरह के शोध विषय चुन लेते हैं; कोई रचना ले ली और उसमें आज का समय या रचना का समय जोड़ दिया और पूरा एक शोध प्रबंध तैयार हो गया! इसके चलते, इस तरह के विषयों की पुनरावृत्ति बढ़ी है जिससे विषय की गंभीरता एक यांत्रिक पुनरुत्पादन में नष्ट हो जाती है और कई बार हम चीजों को ठेठ समाजशास्त्रीय व्याख्या तक सीमित कर लेते हैं। मानो किसी समय का जो अर्थशास्त्र है उसके बारे में जान लेना (ही विषय को समझने के लिए पर्याप्त) है , कि नेहरू युग के अवसान के समय क्या स्थितियां थीं उसकी थोड़ी चर्चा कर ली जाए और (रचना तथा उन स्थितियों) दोनों में ऐतिहासिक सम्बन्ध जोड़ लिया जाए और इस प्रकार आज के समय में हत्यारे कहानी की सार्थकता सिद्ध हो जाती है। इस पद्धति के चलते जो गंभीर और सारगर्भित सवाल हैं वो ढंक दिए जाते हैं।  # लेखक 

अमरकांत

अमरकांत

रचना और आलोचना के प्रश्न जीवन के प्रश्न होंगे कि नहीं!

By मार्तण्ड प्रगल्भ

हर सचेत और क्रियावान मनुष्य अपने समय की जटिलता को समझना चाहता है। उस समय को समझना चाहता है जिससे उसके अंग-प्रत्यंग-अनुषंग परिस्थिति विशेष में निर्मित हो रहे हैं। मनुष्य के वर्तमान की वर्तमानता (प्रजेन्स ऑफ प्रजेन्ट) क्या है? इस प्रश्न को लेकर वह कई जगह भटकता फिरता है. और ऐसे ही संकट के समय कोई कहानी या कविता या कोई अन्य कलारूप अपने भीतर के अदम्य आकर्षण से उसे अपनी ओर खींच लेते हैं। महान रचनाएं वक्त-बेवक्त ऐसा ही अदम्य आकर्षण पैदा करती हैं। तो सवाल यह है कि ‘हत्यारे’ कहानी का हम कथा आलोचकों-कथाकारों की सभा में क्या महत्त्व है। या हम सरीखों के लिए ‘हत्यारे’ की उपयोगिता क्या है? क्षमा करेंगे, यहां उपयोगिता किसी उपयोगवाद के अर्थ में नहीं है बल्कि मार्क्स जिसे उपयोग-मूल्य कहते हैं उसके अर्थ में है। दरअसल यह कहानी-कला और कथा आलोचना दोनों के लिए गंभीर सवाल है।

कल की चर्चा में समकालीनता और आज के समय के बारे में हमारे समय के महत्त्वपूर्ण आलोचक (रविभूषण) अपनी बात रखते हुए कल कह रहे थे कि 1944 से हमें अपना समय मानना चाहिए। उस साल एक किताब आयी थी- रोड टू सर्फडम; वहां से एक नए ऐतिहासिक युग ‘बाजारवाद की केंद्रीयता’ की शुरुआत होती है और उसको एक विभाजक रेखा माननी चाहिए। चूंकि वे अध्यक्ष हैं, इसलिए मैं क्षमा मांगते हुए कहना चाहता हूं कि यह काल निर्धारण की हेगेलियन पद्धति है, जहां विचार की प्रमुखता से इतिहास का मूल्यांकन किया जाता है। अब 1944 में किताब आयी और वहां से नए समय की शुरुआत हो तब तो उदारतावाद की शुरुआत लास्की आदि से ही हो जाएगी। अगर इतिहास विचारों की क्रमबद्धता, गत्यात्मकता और द्वन्द्वात्मकता में निहित है तो यह हेगेलियन पद्धति है। 44 में शेखर एक जीवनी का दूसरा खण्ड आता है। प्रयोगवाद, तारसप्तक ऐसी बहुत सारी चर्चाएं शुरु होती हैं। उनमें से किसको अपने समय का आधार बनाया जाए यह एक प्रश्न है। दूसरा प्रश्न, क्या अर्थशास्त्र के अनुशासन से चलकर साहित्य के लिए काल निर्धारण सम्भव है? अगर अर्थशास्त्र से इतिहास में परिवर्तन के चरणों को समझना है तो प्रभात पटनायक इसके लिए ज्यादा मुफीद होंगे। साहित्य के आलोचक के लिए ये प्रश्न महत्त्वपूर्ण क्यों हैं और फिर इतिहास निर्माण की जो वास्तविक शक्तियां हैं, जिनके प्रति हम अपनी प्रतिबद्धता भी व्यक्त करते हैं, वे इतिहास के निर्धारक बिंदु होंगे या कोई शिकागो स्कूल निर्धारक बिंदु होगा! कहने का तात्पर्य यह कि जैसे हमारा नया समय हमारी परिस्थितियों के अनुरूप भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन का भी एक नया समय था और वह नक्सलबाड़ी के आंदोलन से शुरु होता है तो इसे भी कोई कह सकता है कि यह हमारा अपना समय है। दृष्टि भेद का अंतर है। बहरहाल, सवाल है- आज का समय से मतलब क्या है? क्या आज की कहानी और कथा आलोचना का समय आज का समय है! और यदि यह सवाल है तो सवाल फिर रचना-प्रक्रिया का होगा अर्थात् प्रश्न आज के कलाकार की रचना-प्रक्रिया का है। यहां रचना-प्रक्रिया से तात्पर्य आज की कहानी की रचना-प्रक्रिया से है। सीधे शब्दों में कहें तो हत्यारे की रचना-प्रक्रिया हम सरीखों के लिए क्यों महत्त्वपूर्ण है। कहानीकार की तरफ से भी, पाठक की तरफ से भी और (ध्यातव्य है कि) आलोचक भी सबसे पहले एक पाठक ही होता है। इस रचना-प्रक्रिया को प्रारम्भिक रूप से आलोचक पाठक की ही हैसियत से समझेगा. कथाकार की तरफ से यह प्रक्रिया थोड़ी भिन्न होगी। इस भिन्नता की प्राथमिक पहचान कथाकार को होगी। लेकिन शीघ्र ही आलोचक पाठक की हैसियत से तटस्थ होगा और कथाकार लेखक की हैसियत से। यह तटस्थता कथाकार और आलोचक दोनों को कहानी के एक वस्तुनिष्ठ आकलन और मूल्यांकन की ओर प्रेरित करेगा। आकलन और मूल्यांकन के इसी क्रम में हत्यारे कहानी और आज के समय के जटिल अंतरसंबंधों की पहचान हम लोग शायद कर पाएं।

बहरहाल, कहानी पाठ की जो सबसे आम पद्धति है- वह समाजशास्त्रीय पद्धति है। जिसमें आप रचना से समाज, समाज से रचना में बराबर आवाजाही करते हैं और यह अच्छी बात भी है। कहानी के ‘आडियन्स’ की भिन्नता से इस तरह की समझ को विकसित करने का और इस समझ के चलते आडियन्स को, पाठक को विकसित करने की प्रक्रिया चलनी चाहिए। जैसे, सन् ’62 में अमरकांत की कहानी ‘हत्यारे’ आती है। यह नेहरू युग के अवसान और उसके मोह भंग का संधिकाल है और अगर हम ध्यान दें तो यह नई कहानी और अकहानी के संधिकाल की भी कहानी है और इस लिहाज खुद यह कहानी अमरकांत की कहानी यात्रा में एक ‘ब्रेक’ की तरह है। दो नायक हैं या खलनायक हैं। खलनायकत्व नायकत्व प्राप्त कर रहा है। दोनों नायकों को यदि गौर से देखें तो एक गोरा है, ऊंचा है। दूसरा सांवला है, ठिगना है। दोनों एक ही तरह की वेशभूषा में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के आस-पास किसी बाजार में टहल रहे होते हैं और उनकी बातचीत जब शुरु होती है तो ठेठ लहज़े में, ‘हलो, सन!..इतना लेट क्यों, बेटे?’ इस तरह की एक बातचीत शुरू होती है। हमारे विमर्शों का जो दबाव है उसकी तरफ से अगर हम इस कहानी में एक संभावना की बात करें तो जो सांवला है वह भिन्न वर्ग का है, कहानी की संभावना है क्योंकि कहानी में कहीं-कहीं स्टेटमेंट्स (बयान) भी ऐसे आते हैं कि ‘तुमको सेक्रेटेरियट का भंगी बनाऊंगा!’ गोरा गुरु है। सांवला चेला है। गुरु उसको शिक्षित करता है। ठीक उसी प्रक्रिया में जैसे घीसू माधव को शिक्षित करता है. हत्यारे कहानी में जब गिलास में दोनों शराब बांटते हैं तो सांवला चुपके से अपनी शराब गोरे के गिलास में डाल देता है। (इस पर गोरा कहता है) ‘लेकिन जब तुम इतनी पी नहीं सकते तो अवसर आने पर घूस कैसे लोगे. जालसाजी कैसे करोगे, झूठ कैसे बोलोगे? फिर देश की सेवा क्या करोगे, खाक!’ सांवला अभी सीख रहा है। औरत के पास जाना अभी तक सीखा नहीं है. और फिर गोरा कहता है, ‘आज तो कुछ रचनात्मक कार्य होना चाहिए!’ तो रचनात्मक लीडरशिप क्या है? रिक्शा मजदूरों की बस्ती की तरफ चलता है। बस्ती के शुरु में ही पान की छोटी सी दुकान है। जिस पर पान-सिगरेट तो मिलती ही है रोजमर्रा की और सारी चीजें भी मिलती हैं, और वे दोनों मजदूरों की बस्ती आरम्भ होते ही जो पहली झोपड़ी है उसमें  घुस जाते हैं। एक महिला चूल्हे पर खाना बना रही होती है। उसके देखते ही गोरा मुस्कुराकर बोला, ‘ये विश्व लोफर संघ के अध्यक्ष हैं। इनको हर तरह से तुम्हें खुश करना है.’ दोनों औरत के साथ सम्बन्ध बनाते हैं। पैसा नहीं देते हैं और जब औरत कहती है, ‘लाइए मैं (पैसे का खुदरा करवा कर) ले आती हूं.’ तो गोरा बोलता है, ‘तुम तो पूंजीपति हो! तुमको किस बात की कमी है।…अरे, तुम देश की महान कार्यकत्री हो, तुम कहाँ कष्ट करोगी?’ और आगे बढ़ता है कहता है, ‘साले जूते निकालकर हाथ में लेलो! सांवला बोला ‘क्यों?’…(गोरा कहता है) ‘भाग साले! आर्थिक और सामाजिक क्रांति करने का समय आ गया है!’ दोनों भागना शुरु करते हैं। औरत बाहर निकल कर कहती है- ‘अरे, लूट लिया हरामी के बच्चों ने!’ मजदूरों की बस्ती से कुछ लोग उसके पीछे दौड़ पड़ते हैं। दोनों अरबी घोड़े की तरह सरपट भागे जा रहे हैं। कभी बाएं घूम जाते हैं। कभी दाएं घूम जाते हैं। इतने में मजदूरों का एक लड़का फुर्ती से सांवले की तरफ तीर की तरह बढ़ता चला जाता है और लगता है उसको पकड़ ही लेगा। ऐसे में गुरु गोरा रुक जाता है। जेब से चाकू निकालकर खोल लेता है और पीछा करते हुए आ रहे मजदूर के पेट में घोंप देता है और फिर भाग जाता है। कोलतारी सड़क पर आगे की स्ट्रीट लाइट में दोनों के सुंदर और पुष्ट शरीर पर पसीने की बूंदें छरछरा रही हैं; यह युद्ध का सिम्बल है ‘सिम्बलाइजेशन ऑफ पॉवर’ है, और वे फिर न जाने कहां अंधेरे में गुम हो जाते हैं. यह पूरी कहानी है। ध्यान दें कि जो नेहरूवियन आदर्शवाद है उसकी खोल के भीतर से जो फासिज्म पैदा हो रहा है यूथ के बीच में, वह उसी आदर्श की भाषा में ही पैदा हो रहा है. फासिज्म के साथ दिक्कत यही है, उसको आना तो हमारी ही भाषा में पड़ेगा। सामाजिक, आर्थिक क्रांति की भाषा में, लेकिन वो रूपवाद है। उसका यथार्थ फासिज्म है। आदर्श के उस रूपवाद का यथार्थ फासीवाद है और इसी फासीवादी टेन्डेन्सी की कहानी ‘हत्यारे’ है। और यह फासीवादी टेन्डेन्सी यूथ में व्याप्त हो रही है, जबकि हमारा देश सबसे नौजवान है, मोदी युवाओं को लेकर बड़े प्रसन्नचित हैं; एक युवा देश के भीतर, खुद युवा वर्ग के भीतर तरह-तरह के विभाजन हैं। इसको अगर ध्यान में न रखा जाएगा तो दिक्कत की बात होगी और अमरकांत की खासियत यही है। उनकी चिंता हमेशा ही परिवर्तनकारी शक्तियों के पहचान में आने वाले संकट को कहानी में रखने की है। बहरहाल, चूंकि मजदूरों की बस्ती में जा करके वह हत्या करता है। इसलिए वहां जा कर कहानी एलीगरी में बदलती है और यह मूल्य-निर्णय शामिल होता है कि फासीवादी चरित्र हमेशा ही वर्किंग क्लास (मजदूर वर्ग) के विरोध में होगा।

 बहरहाल, ये तो कहानी का एक सिंपल पाठ है। लेकिन क्या इसीलिए हत्यारे कहानी हमारे लिए महत्त्वपूर्ण है। फासीवाद के इस नए दौर के चरित्र के बारे में, उपभोक्ता समाज के बनने की प्रक्रिया के बारे में, बहुत सारी बातें इस कहानी को पढ़े बिना ही हम समझ भी रहे थे। क्या जरूरत थी कि इसको पढ़ा जाए! एक सचेत बुद्धिजीवी, एक एक्टीविस्ट जो सचमुच में परिवर्तन लाना चाहता है। जो परिवर्तन चाहता है। यथार्थ में परिवर्तन की गति को पहचानना चाहता है। उनके लिए केवल  कहानी का सामान्य पाठ ही होगा तो यह महत्त्वपूर्ण नहीं होगा।

यहाँ मैं संक्षेप में हिंदी के चार आलोचकों की चर्चा करना चाहूंगा, जिन्होंने ‘हत्यारे’ कहानी के बारे में लिखा है या अमरकांत के बारे में लिखा है। विश्वनाथ त्रिपाठी समाजशास्त्रीय, राजनीति के अपराधीकरण से लेकर अपराध के राजनीतीकरण और स्टूडेन्ट पॉलिटिक्स की वह पूरी प्रक्रिया जो जेपी मूवमेंट के भीतर से निकली है उसके ‘रिप्रजेन्टेशन’ के बतौर हत्यारे कहानी की अच्छी व्याख्या करते हैं। लेकिन वह एक सवाल उठाते हैं कि अमरकांत के पात्र कहीं भी संघर्ष क्यों नहीं करते हैं? अगर समाज में संघर्ष है तो अमरकांत के पात्र संघर्ष करते हुए क्यों नहीं दिखते। अजीब बात यह है कि ठीक यही आलोचना राजेन्द्र यादव भी अमरकांत के बारे में करते हैं कि अमरकांत की कहानी का कोई भी पात्र संघर्ष नहीं करता है। वहां आस्तित्व की समस्या महत्त्वपूर्ण है, आस्था का प्रश्न महत्त्वपूर्ण नहीं है। लेखकीय आस्था एक ओढ़ी हुई चीज है. मनुष्य के अस्तित्व की लड़ाई ज्यादा महत्त्वपूर्ण है और इसलिए अमरकांत अस्तित्ववादी कथाकार हैं। अब विश्वनाथ त्रिपाठी तो यह नहीं कहेंगे कि वे अस्तित्ववादी कथाकार हैं लेकिन हाँ, यह कहेंगे कि संघर्ष करता हुआ पात्र नहीं दिखता है। संघर्ष करते हुए पात्रों को दिखाना चाहिए। समाजवादी यथार्थवादी की जो अपेक्षा है वह अमरकांत के ऊपर विश्वनाथ त्रिपाठी की तरफ से (लागू की जाती है) और राजेन्द्र यादव हत्यारे को अस्तित्ववाद की कहानी मान लेते हैं। ‘हत्यारे’ नाम से सार्त्र की भी एक कहानी है और अगर समय हो तो संक्षेप में सार्त्र की ‘हत्यारे’ कहानी के अस्तित्ववाद का अमरकांत से क्या अंतर है इसे मैं देखना चाहूंगा और वह अंतर अपने अंतिम रूप में किसका अंतर होगा। बहरहाल, द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद का समय है। ब्रिटेन की एक कोर्ट में एक ऐसे केस की सुनवाई होनी है, जिसका जीतना तय है और वह बात यह है कि एक टी.बी. का डाक्टर है। एक दिन उसके पास बहुत अमीर आदमी आता है। लेकिन वह टी.बी. से बुरी तरह ग्रस्त है। बहुत बूढ़ा हो गया है। चल-फिर नहीं पा रहा है। दोनों फेफड़े उसके खराब हो चुके हैं और वह डाक्टर के पास बैठता है। डॉक्टर कहता है अब कोई उपाय नहीं है। तो मरीज बहुत विनती करता है। डॉक्टर कहता है, लगता है बड़े पैसे वाले हो। मरीज स्वीकार करता है तो डाक्टर उसे सलाह देता है कि तुम आज से कुछ खाओ-पीओ मत और अब सिर्फ पानी का सेवन करो और दूर कहीं चले जाओ। छः महीने गुजर जाते हैं। एक दिन अचानक वह आदमी हट्टा-कट्टा, सूटेड-बूटेड डॉक्टर के क्लीनिक में प्रवेश करता है। डॉक्टर पहचान नहीं पाता है। तब मरीज पूरी बात डॉक्टर को फिर से बताता है और डॉक्टर को बहुत सारा पैसा देने की बात कहता है। डॉक्टर चिंतित हो जाता है। वह मेज की दराज में रिवाल्वर निकाल कर अमीर आदमी को गोली मार देता है और उसका फेफड़ा निकाल कर टेबल रख कर पर निरीक्षण करने लगता है और कहता है कि इससे मनुष्य का विज्ञान पर से विश्वास ही उठ जाएगा। इसलिए मनुष्य समाज के कल्याण में उसकी हत्या कर देनी पड़ी और यह केस कोर्ट में गया है और लोग मान रहे हैं कि डॉक्टर जीत जाएगा। यह अस्तित्ववाद की कहानी है। अस्तित्व की समस्या का जो दर्शन फैलाया गया, इतिहास मुक्त व्यक्ति के स्वतंत्र अस्तित्व का प्रश्न, वह सार्त्र की कहानी में है। अमरकांत की कहानी में वह नहीं है।

यहां अमरकांत की कहानी के संदर्भ में संक्षेप में सुरेंद्र चौधरी और नामवर सिंह के पाठों के अंतर के बारे में एक बात करना चाहूंगा। सुरेंद्र चौधरी ने कहा कि हत्यारे कहानी में हत्या नहीं हुई होती तो यह बहुत महत्त्वपूर्ण कहानी होती। क्यों? क्योंकि हत्या वहां अतिनाटकीयता का प्रयोग मात्र है. जिससे कहानी में एक मादक भंगिका तो पैदा हुई है लेकिन वह कुछ कहानी में नया नहीं जोड़ती है और यह अच्छा हुआ कि अमरकांत ने आगे ऐसा प्रयोग नहीं किया। उन्होंने कहा जो परिवर्तनकारी प्रक्रिया है उसमें जो प्रच्छन्न खतरे छुपे हुए हैं वह अमरकांत की कहानी में ज्यादा बेहतर आता अगर वह हत्या नहीं हुई होती। यानि एक नपुंसक, बड़बोली, ऐय्याश युवा पीढ़ी का ज्यादा सही चित्रण हुआ होता अगर ये हत्या नहीं हुई होती। नामवर सिंह ने कहा अगर इस कहानी में हत्या नहीं हुई होती तो यह कहानी इतनी महत्त्वपूर्ण नहीं होती। उन्होंने कहा कि कहानी में हत्यारे के द्वारा की गई हत्या कहानीकार का या रचना का मूल्य-निर्णय है। एक वैल्यू जजमेंट है। अगर रचना की प्रक्रिया में यह वैल्यू जजमेंट (मूल्य-निर्णय) नहीं है, यह मैं अपनी भाषा में बोल रहा हूं एक इंटरव्यू में नामवर सिंह ने चलते हुए यह बात कही थी, तो रचना जो फासिस्ट टेन्डेन्सी दिखाना चाह रही है, जो आज एक अजीब तरह की प्रवृत्ति पैदा हो रही है ,उसे दिखाया नहीं जा सकता. युवाओं के आदर्श का अतीत में स्वतंत्रता आंदोलन का एक पूरा दौर है. पर वह आदर्श दूसरे थे। यह आदर्श दूसरे हैं। इन आदर्शों के रेहटारिक में जो कंटेंट है उसके प्रति मूल्य-निर्णय कीजिएगा कि नहीं यह एक रचना-प्रक्रिया का सवाल है। सुरेंद्र चौधरी के लिए कहानी में हत्या कहानी को अतिनाटकीय बना देती है, दूसरी ओर नामवर सिंह के लिए महत्त्वपूर्ण। दो मार्क्सवादी ओलोचकों की दृष्टि में यह भेद क्यों है? क्या यह यथार्थवाद की दो भिन्न दृष्टियां हैं? क्या यथार्थवाद बीसवीं सदी के साथ गुजरी हुई बात हो गई है! इसका हम सरीखों के लिए क्या कोई महत्त्व नहीं है? यह हमारे लिए भिन्न चर्चा का बिंदु है। यहां मैं अभी तफ्सील नहीं करना चाहूंगा, वक्त कम है। परंतु हमारे समय के एक प्रमुख चिंतक फ्रेडरिक जेम्सन के लिए यह बीती बात नहीं है। इसी साल उनकी एक पूरी किताब यथार्थवाद पर आयी है। यह किताब यथार्थवाद के साथ एक प्रयोग के लिए आमंत्रित करती है और खुद यथार्थवाद के भीतर विकसित होती आयी विरोधी प्रविधियों के द्वन्द्वात्मक चिंतन को विकसित करने का प्रयास करती है। मैं अंग्रेजी में जेम्सन को थोड़ा पढ़ना चाहूंगा अगर आप चाहें तो.

बीसवीं सदीं के इतिहास की आंतरिकता को कैसे समझा जाए इसी क्रम में जेम्सन लिखते हैं, ‘My experiment here claims to come at realism dialectically, not only by taking as its object of study the very antinomies themselves into which every constitution of this or that realism seems to resolve: but above all by grasping realism as a historical and even evolutionary process in which the negative and the positive are inextricably combined, and whose emergence and development at one and the same time constitute its own inevitable undoing, its own decay and dissolution. The stronger it gets, the weaker it gets; winner loses; its success is its failure. And this is meant, not in the spirit of the life cycle (“ripeness is all”), or of evolution or of entropy or historical rises and falls: it is to be grasped as a paradox and an anomaly, and the thinking of it as a contradiction or an aporia. Yet as Derrida observed, the aporia is not so much “an absence of path, a paralysis before roadblocks” so much as the promise of “the thinking of the path.” For me, however, aporetic thinking is precisely the dialectic itself; and the following exercise will therefore be for better or for worse a dialectical experiment.’

(मेरा प्रयोग यथार्थवाद तक द्वंद्वात्मक तरीके से पहुँचने का है. यह प्रयोग यथार्थवाद के इस या उस विरोधाभासी युग्मों के अध्ययन तक ही अपने को सीमित नहीं करता है, वरन् यथार्थवाद को एक ऐतिहासिक और विकासमान प्रक्रिया के रूप में देखने का हिमायती है. इस प्रक्रिया में यथार्थवाद के नकारात्मक और सकारात्मक पक्ष साथ-साथ अंतर्गुम्फित रहते आये हैं। अपने उदय और विकास की इस प्रक्रिया में ही वह अपना क्षय और अपनी मृत्यु भी रचता चलता है। ज्यों-ज्यों वह मजबूत होता है त्यों-त्यों वह कमज़ोर होता चलता है। विजेता पराजित हो जाता है। इसकी जीत में ही इसकी हार शामिल है। जीवन-चक्र के अर्थ में नहीं, उद्विकास के अर्थ में नहीं, किसी एन्ट्रापी के अर्थ में नहीं न ही किसी ऐतिहासिक उत्थान पतन की दास्तान के अर्थ में. बल्कि एक विरोधाभास की तरह अंतर्विरोध के अर्थ में इसे सोचने का प्रयोग. एक द्वंद्वात्मक प्रयोग।)

इस विचारोत्तेजक प्रयोग में हम सब यदि शामिल हों तो हमारी कहानी आलोचना के लिए और शायद उनके लिए भी अच्छा होगा जो आज यथार्थवाद के पीछे डण्डा लिए दौड़ रहे हैं। जी, मेरा इशारा हिंदी कहानी के पिछले 25 सालों के विकास पर बात करने वाले आलोचना के कुछ नए राजकुमारों की तरफ भी है। बहरहाल, यह कहानी फिर कभी।

हत्यारे कहानी में जो मूल्य-निर्णय है वह हत्या की घटना में है। जरूरी नहीं कि हर कहानी में यह मूल्य-निर्णय आये ही। लेखकीय मूल्य-निर्णय कोई अनिवार्यता नहीं है। परंतु अपराध की इस मनोवृत्ति के बारे में, इस फासीवादी प्रवृत्ति के बारे में अगर कहानी के भीतर उसके मजदूर वर्ग का विरोधी होने का निर्णय नहीं होता तो यह कहानी इतनी मूल्यवान नहीं होती। वह पेटी बुर्जुआ की जो एक खास प्रवृत्ति है- नपुंसक, बड़बोली, ऐय्याश युवा पीढ़ी का चरित्र-चित्रण मात्र बन कर रह जाती। ऐसे चरित्रों के भावी विकास का, गहरे खलनायकत्व का उद्घाटन वहां नहीं हो पाता। यह पीड़ा भरी प्रतीक्षा के प्रतिक्रियावादी रूपांतरण की कहानी है। विद्रूप विडंबनाओं के नायक घीसू और माधव लुम्पेन सर्वहारा हैं और हत्यारे कहानी के नायक या खलनायक, यदि कहने की अनुमति दें, तो लुम्पेन पेटी बुर्जुआ हैं। कहानी के भीतर का यह मूल्य-निर्णय दरअसल रचना-प्रक्रिया का एक अहम हिस्सा है।

 हमारे आज के कथालोचक यह दावा कर रहे हैं कि जन-जीवन में जब कोई यूनिंगफाइंग फैक्टर नहीं है तो कहानी के भीतर वह कहां से होगा। किसी यूनिंगफाइंग फैक्टर के बिना कहानी की रचना-प्रक्रिया में कोई मूल्य-निर्णय तो आ ही नहीं सकता। फिर क्या किया जाए! यूनीफाइंग फैक्टर मतलब -विश्वदृष्टि या जीवन दृष्टि। लेकिन यथार्थ के असम्बद्ध होने की चर्चा पहली बार तो नहीं हो रही है। और हम अपने अनुभव से जानते हैं कि समाज के संक्रमण काल में हमेशा ही ऐसी बातें होती रही हैं। ऐसी बातों में हमारे समय के एक प्रमुख चरित्र की ईमानदार स्वीकारोक्ति भी होती है। याद करें कि आधुनिकतावाद की धारा के एक आदि नायक टी.एस. इलियट ‘डीसोसिएशन ऑफ सेंसबिलटी’ की चर्चा किया करते थे। पिछले 20-25 सालों के तीव्र परिवर्तन ने हमारी संवेदनाओं में एक असम्बद्धता तो पैदा की ही है। जैसे इलियट के समय में भी हुई थी। आज हम तेजी से उपभोक्तावादी समाज में बदलते जा रहे हैं। हमारी पिछली पीढ़ी के महान सिनेमाकार और राजनीतिक कार्यकर्ता पियरे पाउलो पासोलिनी ने फासीवाद के नए स्वरूप को उपभोक्तावाद में बदलते देखा था। देख लिया था, इसलिए उनकी हत्या कर दी गई. और फासीवाद के इस आसन्न संकट के काल में पुराने और नए के संधिकाल में हमारी भी चेतना आक्रांत है. इसलिए मानव विरोधी विचारधाराओं के द्वारा चेतना पर छायी इस धुंध को और अधिक मिस्टीफाई (रहस्यात्मक) करने का षडयंत्र रचा जा रहा है। खण्ड-खण्ड पाखण्ड की दृष्टि एक ऐसी ही मानव विरोधी विचारधारा है। ताज्जुब नहीं, इस विचारधारा का पहला हमला यथार्थवाद पर है। ऐसा क्यूं है कि मानव विरोधी विचारधाराओं का पहला हमला समय-समय पर यथार्थवाद के खिलाफ होता है! क्योंकि यथार्थवाद और चाहे जो हो उसके मूल में है मानव-विरोधी मिस्टीफिकेशन को, उसके धुंध को साफ कर देना। डी-मिस्टीफिकेशन यथार्थवाद की एक प्राथमिक शर्त है। जहां से बुर्जुआ सोसायटी के लिए अपने-आप यह शैली खतरनाक सिद्ध हुई है। बहरहाल, उसके अलग-अलग ट्रेडीशन हैं, अंग्रेजी ट्रेडीशन, फ्रेंच ट्रेडीशन खैर! लेकिन सीधे डी-मिस्टीफिकेशन एक महत्त्वपूर्ण काम है। मूल्य-निर्णय का सम्बन्ध क्या इस डी-मिस्टीफिकेशन से है? डी-मिस्टीफिकेशन की यह प्रक्रिया बदलाव की नई ताकतों के प्रति रचना-प्रक्रिया में मूल्यबोध की तरह आती है। लेखक की प्राथमिक संवेदना से लेकर पाठ की प्रक्रिया तक इसका निरंतर विकास होता है। ब्रेख्त के लिए रचना-प्रक्रिया के साथ चलने वाला यह डी-मिस्टीफिकेशन एक क्रियावान, उत्कंठापूर्ण और प्रयोगात्मक भी है. या दुसरे शब्दों में कहें तो सामाजिक संस्थाओं और भौतिक दुनिया के प्रति वैज्ञानिक दृष्टि का उन्मेष है। यथार्थवाद इसी वैज्ञानिक दृष्टि को प्रोत्साहित करता है, प्रयोग के स्तर पर भी। और यह प्रक्रिया त्रिस्तरीय है। पहली, रचना में पात्रों और उसकी काल्पनिक दुनिया के बीच। दूसरी, रचना और पाठक के बीच। तीसरी, रचना-रचनाकार का अपने कच्चे माल और टेक्निक के बीच। यथार्थवाद का यह त्रिआयामी व्यवहार (प्रैक्सिस) परंपरागत अनुकरणों और उनके शुद्ध प्रतिनिधिमूलक केटेगरी को ध्वस्त कर देता है. जिसके प्रभाव में आजकल का अधिकांश दलित लेखन है। फिर बकौल जेम्सन ‘रीडिंग इज ए सिम्बोलिक एक्ट’। इस ‘सिम्बोलिक एक्ट’ के प्रति सजग होना, आत्म सजग होना जरूरी है। यह सजगता एक सचेतन क्रिया है। इस क्रिया में अपने राजनीतिक अवचेतन की संरचना के प्रति सजगता भी शामिल है। दिक्कत यह है कि क्या हमारा लेखन और हमारी आलोचना खुद आत्म सजग है! ‘हत्यारे’ कहानी का पाठ आज के समय में यही चुनौती हमारे समक्ष रखता है। बात सिर्फ रचना के क्लास मोटिफ को उद्घाटित करने या अलग-अलग विमर्शों के  लिहाज से उसकी व्याख्या का नहीं है . अर्थात् रचना के बाहर की दुनिया का प्रतिबिम्ब और उसकी व्याख्या का नहीं है। बल्कि रचना की विकासमान सम्पूर्णता का है। इसीलिए उसकी हिस्टोरीसिटी का है। विषय से विचार तक की यात्रा का खतरा दरअसल हिस्टोरीसिटी के अन्वेषण का खतरा है। अमरकांत की कहानी में यह हिस्टोरीसिटी उसके मूल्य-निर्णय की प्रक्रिया में आयी है। यह हिस्टोरीसिटी न केवल समकालीनता का यूनीफाइंग फैक्टर है वरन् हमारे और रचना के कालांतर का भी एक यूनीफाइंग फैक्टर है। यह रचना से पाठक तक लगातार जारी है. इस अर्थ में यह हिस्टोरीसिटी विद्आउट हिस्ट्री है .और इसी अर्थ में यह वर्तमान की वर्तमानता है। इसी अर्थ में हत्यारे कहानी खुद अमरकांत की कहानी-कला की आलोचना है। उसमें एक ब्रेक है. अमरकांत के कहानी संसार में एक घटना की तरह। हत्यारे कहानी का अंत कुछ इस तरह होता है, ‘झोपड़ियों से कुछ व्यक्ति निकलकर युवकों के पीछे दौड़े। तारकोल की सड़कें जन-शून्य थी। दोनों युवक अरबी घोड़ों की तरह दौड़ रहे थे। वे कभी बाएं घूम जाते, कभी दाएं। पीछा करने वालों में एक फुर्तीबाज व्यक्ति तीर की तरह उनकी ओर बढ़ रहा था।…जो व्यक्ति ‘हाय मार डाला’ कहके लड़खड़ा कर गिर पड़ा। इसके बाद दोनों पुनः तेजी से भाग चले। तब बिजली का खम्भा आया तो रोशनी में उनके पसीने से लथपथ ताकतवर शरीर बहुत सुंदर दिखाई देने लगे। फिर वे न मालूम किधर अंधेरे में खो गए!’ जिस अंधेरे में दोनों न जाने कहां गुम हो गए यह वही अंधेरा है जो मुक्तिबोध के ‘अंधेरे में’ है। जहां वे डोमा जी उस्ताद को देख लेते हैं। हम अपने अंधेरे में क्या देख रहे हैं! यह क्या हमारे मूल्य-निर्णय से तय नहीं होता!

दो अवांतर प्रसंग छोटे-छोटे- एक, हमारा एक कलाकार मित्र अनुपम मूवमेंट में पेंटिंग्स करता है। उसकी एक समस्या है। हालांकि यह कहानी के बाहर का प्रसंग है लेकिन कला का महत्त्वपूर्ण प्रश्न है और यथार्थवाद का भी एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न है। वह कहता है कि हम जिस शैली में अब तक पेंटिंग्स बनाते आए हैं अब यथार्थ उसी शैली में बद्ध होकर हमारे सामने आ रहा है। याद कीजिए मुक्तिबोध की भी यही समस्या थी। वह कहता है कि मैं अपने ही शिल्प में बंधने के चलते यथार्थ को नहीं देख पा रहा हूं- यह जो परिवर्तनशील यथार्थ है। वह अपना एक अनुभव बताता है कि वह एक बार एक स्त्री के जीवन की किसी परिस्थिति पर बड़े भावावेग से एक चित्र बना रहा होता है। पेंटिंग्स पूर्ण नहीं हो पा रही है। वह परेशान है। अचानक इस परेशानी में वह अपना शरीर काटकर खून से पेंटिंग का एक हिस्सा बना देता है और अपने बाल नोचकर पेंटिंग्स में जहां-तहां चिपका देता है और कहता है कि मुझे बहुत शांति मिली है। कलाकार रचना में अपने बॉडीली प्रजेन्स (शरीरी उपस्थिति) को खोजना चाह रहा है। पेंटर पेंटिंग्स में अपनी उपस्थिति खोजने की कोशिश में है। यह बॉडली प्रजेन्स का क्राइसिस कला का एक वास्तविक अनुभव तो है, लेकिन यह मिसप्लेस्ड क्वेश्चन है। यह प्राब्लम मिसप्लेस्ड है क्योंकि पॉलिटिक्स में जैसे वह अपनी प्रजेन्स को आंदोलन के भीतर देख रहा है; रचना, जो प्रोटेस्ट के भीतर से निकलने वाली रचना है इसलिए महत्त्वपूर्ण भी है, के भीतर भी अपना बॉडली प्रजेन्स ढूंढ़ रहा है। राजनीति की दुनिया का कला की दुनिया से जो सम्बन्ध होगा, वह क्या होगा? क्या रचना-प्रक्रिया में जिसको मुक्तिबोध कहते हैं, जब तक तटस्थता नहीं होगी तब तक तदाकारिता सम्भव नहीं है। प्रश्न वहां अटैच होकर के बॉडली प्रजेन्स का, स्वानुभूति का नहीं है प्रश्न डिटैचमेंट का है। यह डिटैचमेंट लग सकता है कि कोई आधुनिकवादी तर्क हो, उपभोक्तावादी सर्जक मन का। खैर, इस पर चर्चा कहीं और।

दूसरा प्रसंग, नामवर सिंह ने हाल-फिलहाल पप्पू यादव की किताब का लोकार्पण किया। पप्पू यादव हत्यारे कहानी के नायक भी हैं। प्रश्न है, उन्होंने हत्यारे कहानी के बारे में कहा कि वहां मूल्य-निर्णय महत्त्वपूर्ण है. यह बात तो सही है कि दुनिया भर में अपराधियों की डायरियां आदि काफी लोकप्रिय हुई है;  उस पर विचार करना एक अलग बात है. लेकिन उसकी किताब का लोकार्पण करना एक राजनीतिक काम है। इसमें आपका मूल्य-निर्णय होगा कि नहीं! यानि रचना और आलोचना के प्रश्न जीवन के प्रश्न होंगे कि नहीं! यह एक महत्त्वपूर्ण सवाल है। शायद इसी अर्थ में प्रेमचंद कहते थे कि हर कोई चाहता है कि मेरा जीवन एक कहानी बन जाए।

मार्तण्ड प्रगल्भ

मार्तण्ड प्रगल्भ

छात्र राजनीति और संस्कृति-कर्म में व्यस्त रहने वाले मार्तण्ड प्रगल्भ जे.एन.यू. के भारतीय भाषा केंद्र में पी.एच.डी. के लिए शोधरत  हैं। उनसे mpragalbha1@gmail.com पर संपर्क संभव है

(जन संस्कृति मंच के कथा समूह के प्रथम आयोजन ‘कथा मंच’ के तृतीय सत्र में कथाकार मार्तण्ड द्वारा ‘अमरकांत की कहानी हत्यारे और आज का समय’ पर इलाहाबाद में दिनांक 22 दिसंबर, 2013 को प्रस्तुत व्याख्यान। लिप्यावतरण- श्रीकांत पाण्डेय।)

रजुआ और लतिका: अमरकांत को याद करते हुए

1st July 1925--17th Feb 2014

1st July 1925–17th Feb 2014

By सुरेन्द्र चौधरी 

तमाम कुशलता के बावजूद ‘परिंदे’ जैनेन्द्र का अतिक्रमण नहीं करती थी. इतना अवश्य था कि लतिका का पिंजरा बड़ा हो गया था, मगर कैच २२ वह तब भी नहीं न बन पाया था. फिर भी नई स्थितियों में स्त्री की यह नियति एक paradox खड़ा करती थी! लतिका को पिंजरे से ज्यादा उसका अपना नैतिक आवेश बाँधता था- इसी बिंदु पर उसकी पहली और आखिरी पहचान संभव है. उसका रक्षा-कवच ही उसका पिंजरा है, जो एक छाया बनकर उसे घेरता है, न स्वयं मिटता है और न उसे मुक्त करता है! कहानी के गुंजलक में एक पारदर्शी मन की यातनाएँ इन्हीं निर्विरोध क्षणों में उसे घेरती हैं.

‘परिंदे’ का डा. मुखर्जी कहता है, ‘वैसे हम सबकी अपनी-अपनी जिद होती है, कोई छोड़ देता है, कुछ लोग आखिर तक उससे छिपकर रहते हैं… कभी-कभी मैं सोचता हूँ मिस लतिका, किसी चीज को न जानना यदि गलत है तो जानबूझ कर न भूल पाना, हमेशा जोंक की तरह चिपके रहना, यह भी गलत है.’ और इस कथन के साथ एक कहानी मेरे दिमाग में कौंधती है, अमरकांत की कहानी ‘जिन्दगी और जोंक’. यह सरल योग-पद नहीं है, यह मैं जानता हूँ. दोनों की जमीन अलग है. समतल पर संक्रमण आसान होता है. मगर जिंदगियाँ सम-असम-तल पर विभाजित हैं, फिर भी मानसिक यात्रा में उन्हें लांघना संभव है. जीवन अपने लिए कैसे-कैसे हेतु गढ़ लेता है! बौद्धिक-अबौद्धिक!! रजुआ के लिए उसका अतीत रायपुर का बरई होने तक सीमित है. अपने नाम की याद उसे आती भी है तो इसी प्रसंग में, जब वह अपनी मौत की खबर गाँव भेजना चाहता है और जब वह अपने जिन्दा होने की खबर गाँव भेजता है. इसके सिवा वह पूर्णतः अतीत-मुक्त है. मगर वर्तमान! अपने वर्तमान के साथ उसकी लड़ाई निरंतर जारी है. एक बलवती जीवनेच्छा उसे परिचालित करती है. इसी में उसकी सारी अपेक्षाएं सीमित हैं- भूख भी, प्रेम भी, परिहास भी!!! आत्मदया के लिए उस अभागे के पास न चेतना है और न अवकाश ही. एक विडम्बना की तरह है उसका अस्तित्व. फिर भी जिन्दा है, जिन्दगी से उसे मोह है. इस मरजीवा पात्र को भूतनाथ की तरह हर बार लेखक अपने तिलिस्म से जिन्दा बाहर आता देखता है. जिन्दगी के साथ उसकी ऐय्यारी दिलचस्प है, मानव इच्छा का विस्तार है.

सुरेन्द्र चौधरी के लेख ‘उत्तरशती की कथा-यात्रा’ का एक अंश
सुरेन्द्र चौधरी, हिंदी कहानी: रचना और परिस्थिति, अंतिका प्रकाशन, गाजियाबाद, २००९, पृष्ठ.२६-२७

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