Archive for the tag “Bollywood”

‘रईस’ की तुलना में ‘काबिल’ अच्छी फिल्म है: तत्याना षुर्लेई

 

“रईस” की तुलना में मैं “काबिल” की ओर हूँ. यह फ़िल्म “रईस” से अच्छी इसलिए है कि “काबिल” यह दिखावा नहीं करता है कि वह कुछ नया और आर्टिस्टिक दिखानेवाला है. दोनों फिल्मों को देखकर फिर से यह दोहराना पड़ेगा कि अगर किसी को बारीक सिनेमा बनाना नहीं आता है तो उसे मुख्यधारा में ही रहना चाहिए. मुख्यधारा और मनोरंजन कोई कमतर जगह नहीं है और ऐसी फिल्मों की बड़ी ज़रुरत है. “काबिल” में कुछ न कुछ कमियां तो हैं लेकिन “रईस” से अच्छी इसलिए लगती है कि यह अपने दर्शकों के प्रति फेयर और फ्रैंक है. इसका ट्रेलर भी किसी को धोखा नहीं देता है. सब को पता है कि यह मनोरंजन के लिए बनी एक व्यावसायिक फ़िल्म है और जिसकी कहानी उम्मीद के मुताबिक ही है. #लेखक

5765250e91641_hrithik-roshan-completes-the-first-schedule-of-sanjay-gupta-s-kaabil

काबिल  पोस्टर

काबिल: मनोरंजन कोई बुरी बात नहीं है

By तत्याना षुर्लेई

फ़िल्म की कहानी रोमांटिक और मासूम प्यार से शुरू होती है, फिर इसमें दारुण दुःख पहुंचाने वाली क्रूरता, हिंसा और अन्याय आते हैं, और अंततः राहत देनेवाला बदला. फ़िल्म का नायक, रोहन भटनागर (ऋतिक रोशन) एक अँधा जवान आदमी है जो एक सुन्दर लड़की, सुप्रिया (यमी गौतम) से प्यार और शादी करता है. सिनेमा में दिखने वाले विकलांग लोगों में अक्सर किसी एक कमी की जगह उन्हें कई असाधारण क्षमताएं दी जाती हैं (न सिर्फ भारतीय फिल्मों में – ऐसा स्टीरियोटाइप दुनिया की बहुत सारी फिल्मों में प्रभुत्व रखता है). रोहन भी इसी तरह का आदमी है – उसको दिखाई नहीं देता है लेकिन इस विकलांगता के प्रतिउत्तर में वह दुसरे लोगों की आवाज़ों को अच्छी तरह नक़ल करता है. रोहन कार्टून का डबिंग करता है और इस काम में इतना प्रतिभावान है कि अकेले ही फ़िल्म के सारे नायकों की अलग-अलग आवाजें देता है. उसकी यह योग्यता बाद में बदला लेने वाले दृश्यों में उनकी बहुत मदद करेगा.

आसपास में रहनेवाले दो अपराधी, अमित (रोहित रॉय) और उसका दोस्त माधव (रोनित रॉय) बार-बार रोहन और सुप्रिया की ख़ुशी के आड़े आते हैं. इनके लिए इस जोड़ी की विकलांगता मजाक उड़ानेवाली बात है. एक दिन वे छेड़-छाड़ से आगे चले जाते हैं और सुप्रिया का बलात्कार करते हैं. अमित का भाई शहर का बड़ा आदमी है इसलिए वह आसानी से भ्रष्ट पुलिस को अपने पक्ष में कर लेता है. भ्रष्ट पुलिस हिंदी सिनेमा का सब से पसंदीदा टॉपिक है जिससे फिल्मवाले अभी तक थके नहीं हैं. लेकिन विषयों का दुहराव और दर्शकों के उम्मीदों पर खरा उतरने वाला प्लॉट मुख्यधारा की सिनेमा के सबसे जरुरी हिस्से हैं.

अपनी पत्नी की मौत के बाद, यह देखकर कि पुलिस कुछ नहीं करेगा, रोहन खुद बदला लेता है और भ्रष्ट पुलिस इंस्पेक्टर से जीतता है. यह प्लॉट बहुत टिपिकल और आसान है – ऐसी फिल्में तो बार-बार बनती हैं, फिर भी हमेशा की तरह वे अपने दर्शकों को अंत में बड़ी राहत देती हैं. “काबिल” में नयी बात यह है कि फ़िल्म की कहानी एक ही तरह के दो दृश्यों से अच्छी तरह खेलती है. उदहारण के लिए रोहन की पत्नी के बलात्कार के केस में इंस्पेक्टर बार-बार बोलता है कि सबूत के बिना वह कुछ नहीं कर सकता है, लेकिन बाद में, बदले वाले दृश्य में, फ़िल्म का नायक भी पुलिस से अपने क्राइम के सारे सबूत छुपाता है. सुप्रिया ने फँसी लगा ली तो रोहन ने माधव को भी फांसी पर लटकाया. सुप्रिया का बलात्कार करने से पहले उसको बिस्तर से बांधा और उसके मुँह में कपड़ा लगाया गया था ताकि वह कुछ बोल न सके, तो ऐसी ही स्थिति लेटाकर अमित की भी हत्या होती है. इस तरह के अलग-अलग आइने में प्रतिबिंबित होने वाले दृश्यों की तरह सारी उल्टी परछाईयाँ फ़िल्म में दिखाई गईं हैं.

रुसी लेखक, अन्तोन चेखव ने एक बार लिखा की नाटक के शुरू में दर्शकों को अगर दीवार में लटकी बन्दुक दिखाई देती है तो इसका मतलब यह है कि कहानी में इसका इस्तेमाल जरुरी है. “काबिल” में इस नियम का प्रयोग बहुत हुआ है. लगभग हर छोटे दृश्य, जैसे साईकिल वाला, या रोहन का पत्नी को घड़ी गिफ्ट करना इत्यादि. पहले तो इन सब का कोई बड़ा मतलब नहीं दिखता है, लेकिन बाद में ये सारे दृश्य वापस आते हैं और नायक अपने बदले वाले दृश्य में इन सब का कोई न कोई प्रयोग करता है.

सबसे अच्छी बात यह है कि मुख्यधारा की दूसरी फिल्मों के विपरीत “काबिल” में जब भी  किसी ऑब्जेक्ट का दुबारा इस्तेमाल है तो दर्शकों को याद दिलानेवाला बोरिंग फ्लैशबैक या ऑफ-स्क्रीन से झुंझला देने वाली आवाजें नहीं आती हैं (बस फ़िल्म के अंत में अंधे लोगों के बारे में रोहन के शब्द दोबारा आए हैं). साथ ही साथ “काबिल” अपने दर्शकों की बुद्धिमत्ता का सम्मान करता है जो कि पॉपुलर फिल्मों में अक्सर नहीं होता है.

ऋतिक रोशन ने “काबिल” से पहले भी विकलांग आदमी का अभिनय किया है. मगर इस बार उसने अच्छी तरह से अपने सबसे बड़े हुनर को अपने नायक की विकलांगता से जोड़ दिया है. ऋतिक का सब से बड़ा कौशल उसका नाच है जो इस बार ड्रीम सीक्वेंस का हिस्सा नहीं है. डांस स्कूल के सीन में ऋतिक फिर से दर्शकों को यह दिखाता है कि वह बॉलीवुड का सब अच्छा डांसर है. पुराने थिएटर में लड़ाई के सीन में नायक के अंधापन के साथ अँधेरा का भी दिलचस्प इस्तेमाल है. यह जरुर है कि नायक का कौशल कभी-कभी कुछ ज़्यादा ही दिखाया गया है जो कि विकलांग आदमी में नहीं होते हैं.

अंधे लोगों की ज़िन्दगी में जो कुछ भी अजीब चीजें, हरकतें सामान्यतः दिखती हैं, फिल्मवालों ने भरसक कोशिश की है कि उनकी व्याख्या प्रस्तुत की जाएँ. शादी की रात, नायक और नायिका के कमरे में जली हुई सारी मोमबत्तियाँ, जो ट्रेलर में भी दिखाई गईं हैं, किसी को अजीब लग सकती हैं. इसीलिए फ़िल्म में उसकी व्याख्या है कि वे क्यों आईं! यहाँ मोमबत्ती फ़िल्म में चेखव वाली चीज़ बन गयी. दिलचस्प बात यह भी है कि इस फ़िल्म में ऋतिक रोशन की दूसरी फिल्मों से अलग दर्शकों को उसके दोनों अंगूठे पुरे समय दिखाई देते हैं. यह निशान कोई विकलांगता नहीं है, बल्कि नायक के भाग्यशाली होने की निशानी है, फिर भी अपनी पुरानी फिल्मों में ऋतिक इसे छुपाता था. चूँकि “काबिल” सामन्य लोगों से अलग दिखने वाले लोगों के शांति से जीने के अधिकार और उनके प्रति होने वाले भेद-भाव के बारे में फ़िल्म है, इसीलिए दूसरों से अपनी भिन्नता दिखाना विकलांगता के पक्ष में एक मज़बूत आवाज़ है. विकलांग नायक का अभिनय करना और खुद दूसरों से कुछ अलग होना अलग-अलग बातें हैं और यहाँ ऋतिक ने फिर से अपनी एक और खासियत का अच्छा इस्तेमाल किया.

फ़िल्म में कमियां ज़रूर हैं और उनमें सब से बड़ी शायद फ़िल्म का आइटम नंबर है. इसकी ज़रुरत बिलकुल नहीं थी, क्योंकि यह गाना और परफॉरमेंस अच्छा नहीं हैं. शायद फिल्मवाले आगे आने वाली अपने नायक की अलग-अलग लड़ाइयों से पहले दर्शकों को थोडा-सा आराम देना चाहते थे, फिर भी अगर ज़रुरत थी तो इसे ज़्यादा अच्छी तरह से करना चाहिए था. सुप्रिया का भूत वाला आईडिया भी ज़्यादा अच्छा नहीं था, इससे फ़िल्म बस ज़्यादा दयनीय बन जाती. नायिका की मौत और उससे पहले उसके प्रति घटित अपराध ही इतने कष्टप्रद हैं कि इससे ज़्यादा कुछ डालने की जरुरत नहीं थी.

फ़िल्म में एक चिंताजनक बात माधव की बहन के प्रति रोहन का व्यवहार है. माधव और उसका दोस्त अमित जब सुप्रिया को छेड़ते थे तो रोहन को मालूम था कि यह महसूस करना कितना कष्टप्रद है. फिर भी अपने बदले वाले क्षण में रोहन माधव की बहन को छेड़ता है. यह ज़रूर है कि रोहन का व्यवहार उतना ख़राब नहीं है जितना अमित और माधव का था. वह बस अमित की आवाज़ का नक़ल करता है और यह दिखाने की कोशिश करता है कि यह सब बुराइयाँ अमित ही करता है. लेकिन, बाद में वह माधव को स्पष्ट करता है कि यह आईडिया उसे यह महसूस करवाने के लिए था कि जब कोई तुम्हारी प्यारी बहन को छेड़ता है तो तुम्हें कैसा लगता है. इस तरह की सोच पूरी दुनिया में बहुत पॉपुलर है– जब एक आदमी दुसरे आदमी की औरत से बदतमीजी करता है तो बदले में उसकी औरत से भी यही बदतमीजी करनी चाहिए. जबकि दोनों मामलों में औरतें एक तरह से बेकसूर होती हैं. इसीलिए आदमियों के झगड़े में उनको घसीटने और दंडित करने का यह आईडिया बहुत खतरनाक है.

अगर फ़िल्म में एक छोटा-सा स्पष्टीकरण यह होता कि अपराधी क्यों यह सब अपराध करते हैं तो यह भी कहानी के लिए और भी अच्छा होता, और आखिर में इतनी लड़ाइयों के बाद नायक के चेहरे पर ज़्यादा निशान दिखने चाहिए थे. मेनस्ट्रीम सिनेमा का हीरो सुपर हीरो की तरह होता है लेकिन फिर भी इतनी पिटाई के बाद हीरो के चेहरे में भी कोई न कोई चोट तो आता ही है. इन कमियों के बावजूद “काबिल” वीकेंड के शाम के लिए बहुत अच्छी फ़िल्म है जिसे देखते समय दर्शक रो सकते हैं, हंस सकते हैं और अंत में राहत महसूस कर सकते हैं.

407990_4198265689669_2114788963_n

तत्याना षुर्लेई पोलैंड की रहने वाली हैं, एक इंडोलॉजिस्ट (भारतीय उपमहाद्वीपीय भाषा और संस्कृति की जानकार)  और फिल्म आलोचक हैं. हिंदी की मशहूर पत्रिकाओं और ब्लॉग्स के लिए लिखती रही हैं. पोलैंड के शहर क्राकोव स्थित जेगिलोनियन विश्वविद्यालय से “द कोर्टसन फिगर इन इंडियन पॉपुलर सिनेमा: ‘ट्रेडिशन, स्टीरियोटाइप, मैनिपुलेशन” नामक विषय पर पीएचडी हैं. वर्तमान में मनिपाल विश्वविद्यालय, कर्नाटक के यूरोपीय अध्ययन संस्थान में पढ़ाती हैं.

The Postmodern mores and Cinematic Expression: Dhiraj Kumar Nite

Tanu Weds Manu Returns (TWMR) is a commercial movie, and all signs are to make it a big money-grossing of this year. That said, let’s proceed. All commercial movies are necessarily an expression of socio-cultural and political proclivity of the movie maker. The logic of Investment shapes technological inputs; but the narrative strategy, cinematography and the conceptualisation of characters are, equally, the product of cultural and political locus of film makers. Let’s call this non-economic aspect of film making as the ethico-political logic and craft logic. The sexist form of cinematic characters are as much guided by the image of target audience shared by film makers as by the sexist discourse i.e., ethico-political logic, which the former often entertains. The movie of our discussion presents an enchanting ethico-political logic; the craft logic and the economic logic accompany the former to make it commercially viable. A superb combination of three distinguishes it from the so-called art movie.@Author

TWMR (2015)

TWMR (2015)

By Dhiraj Kumar Nite

Ethico-Political Logic of Cinematic Expression

TWMR brings two enamouring female characters who do share as much similarity as contrasting attributes. Both are women-in-rebellion in their own rights. They defy the tradition of cultural restraints set on the women by patriarchy. Tanu [Trivedi] embodies as much self-seeking modern conceit as, I suggest, a post-modern autonomist self. She seeks to freely flow in pursuit of a boyishly unrestrained, hedonistically rich and thrilling newness. However, she is bereft of any wishes for financial self-sufficiency. The financial foundation of her sparking adventurous life is the wealth of her parents, the boyfriend and the husband. She recognises dignity in labour, but she keeps herself away from such demanding fact of human life. As a whole her character is altogether novel imagination. She is not Anita (Praveen Boby) of Deewar, who was an equally infectious, iconoclastic discovery of the 1970s. She neither satisfies the definition of modern [bourgeois] womanhood, who is a companion of her male member to support his productive life and perform the role of an emotional anchor. Nor does she fit with the image of a modern female antithesis, who relishes financial self-sufficiency and transformative womanhood. I tempt to look at her as a post-modern womanhood in her status as a female thesis. The refusal to productivist paradigm of modernity is her distinguishing attribute. Abundance of necessaries of humankind to life is conducive to her refusal. At the same time, she does not regardthe female’s virtue in her reproductive function for the manly world. For any association with such considerationwould be a hindrance to realisation of her exploratory self. Marriage is a means than an end in-itself.

Datto, alias Kusum is one of the strongest female characters ever imagined in the Bollywood. She is distant from the retrogressive feudal tradition and the self-seeking moderns [bourgeois] conceit. She is at the cusp of refreshing transcendence. She seeks to win the world that is competitive. She takes pride in her ability of financially supporting the family or socially dependent kith & kin; relishes her agenda [rather than any burden of responsibility] of fostering a web of social relations/network; and commits to resist the latter when it attempts to overwhelm her autonomist, exploratory self. She nurtures the ethic of care, cooperation, and progressive transformation. For instance, in the course of seventh round of the Brhamanical ritual of marriage she enquires on her groom, her beloved if he is well-disposed to the final step. She decides to walk out, for she was not simply reluctant to marry to someone who is still emotionally attached to his first wife. She is careful of and cooperative towards a possibility of consolidation of love between self-deprecating Tanu and unsure Manu. She represents an image of, I tempt to suggest, a post-modern female antithesis. The latter transcends the self of feminist or socialist female antithesis, which was born in modern world and contributed to its progress. She is anyone but Indrani Sinha (Raakhee of Tapasya).

TWMR is decidedly neither a naturalist feature film nor realist. Damn, what to celebrate! It is in the league of some movies made in the recent times, which explore the grey areas of their characters. Dabang’s inspector, Piku’s daughter, Haider’s mother and son, Queen’s Rani: all of them perform their social functions with certain peculiarities. The villains are also grey characters; the hero and heroine also pleasingly indulge in the necessary ‘social vice’. Different classes intersect – at times collide with – eachother here and there. Tanu as a distraught person stumbles across a quiet beggar; the latter kisses her outreached palm and intends to offer a price for such weird thrill that visited him. Disconcerted Tanu moves on. It reminds the penultimate episode of Manto’s story A Woman’s life. In the latter Saugandhi was flustered at her rejection by the customer. Tanu is taken aback by her own realisation of the extent of dissolute condition, of acceptance by a destitute man. All this orchestrates something as much palpably earthly, which one would believe that a natural course of life witnesses; as fantasy for the world to entertain, even if not in the sight to descend soon.Needless to say, the realm of imagining of social characters is perilously fraught with the logic of investment. What is saleable sets the circumference, the limit. Therefore, Tanu and Manu return to each other to produce not just a happy ending, so notoriously characteristics of the Bollywood, but to satisfy the moral compass of the target audience. No explanation is sought for the change of hearts and minds between Tanu and Manu, who were so reasonably disposed to undertake separate strayed journeys till the previous moment. Here, TWMR loses an opportunity to lend us a cult movie. This is a recurrent feature of the story authored by Himanshu Sharma. There was no explanation on offer for the appearance of an uncommon lady, TanuTrivedi, known as batman, in Kanpur city in the prequel movie (TWM). Hobsbawm writes (On History: chapter, Postmodernity and History) that there is an increased tendency of exploring the meaning at the cost of explanation, which we find as a defining trait of the postmodernist literature.

The anti-foundationalist and anti-essentialist approach presents the aesthetics of meaning; of the politics;of the form; of the hierarchy. Let me digress to support my observation with what I borrow from a recent article of a cultural theorist,Fredrick Jameson, ‘The Aesthetics of Singularity’, New Left Review, vol. 92, March-April 2015.1. In our postmodern age we not only use technology, we consume it, and we consume its exchanges, value; its price along with its purely symbolic overtones. Similarly, the form of the work has become the content; and that we consume in such works is the form itself. In the modernist texts the effort is to identify form and content so completely that we cannot really distinguish the two; whereas in the postmodern ones an absolute separation must be achieved before form is folded back into content. Further, there is centrality of the postmodern economy, which is characterised as the displacement of old-fashioned industrial production by finance capital. 2.Only thing capital cannot subsume is the human entity itself, for which the attractive theoretical terms excess and remainder are reserved. The post-human is the final effort to absorb even this indivisible remainder.3.We have not yet entered a whole new era rather a new age of third, globalised stage of capitalism as such. Here, postmodern philosophy is associated with anti-foundationalism and anti-essentialism. This is characterised as the repudiation of any ultimate system of meaning in nature or the universe; and as the struggle against any normative idea of human nature. 4. What further distinguishes it from the old critiques of modernity is the disappearance of all anguish and pathos. Nobody seems to miss god any longer, and alienation in a consumer society does not seem to be a particularly painful or stressful prospect. No one is surprised by the operations of a globalised capitalism. This is called as cynical reason. Even increasing immiseration, and the return of poverty and unemployment on a massive world-wide scale, are scarcely matters of amazement for anyone. So clearly are they the result of our own political and economic system and not of the sins of the human race or the fatality of life on earth. We are so completely submerged in the human world, heideggerian ontic, that we have little time any longer for what he liked to call the question of being. 5. In our time all politics is about real estate. Postmodern politics is essentially a matter of land grabs. … Not to surprise,one protagonist of TWMR is a builder, another is a squatter, and the third is the issue of the location of housing in London between Tanu and Manu than the condition of house.

The craft logic of TWMR is scintillating. Every character is well chiselled. Every cast moulds herself/himself into the concerned social character. The use of close-up camera, not so popular in the Bollywood, demandingly tests calibre of actors. The narrative maintains suspense and well-proportioned subplots till the end. Editing carries pace of the narrative at an enjoyable and captivating scale. Cinematography weaves locales, which the audience would identify with and also chew it. The content, dialogue and body language successfully present a refreshing social drama rather than an electrifying comedy, for which it had immense spice to grow into at the hand of a director like Priyadarshan. Music and the songs are as much to bring out glittering, tormented or repenting inner self as to advance the story line. Finally, Kangana’s dancing effort is the rare occasion,where she bursts out as one actor involved in double roles.

Dhiraj k NiteDhiraj Kumar Nite, A Social Scientist, University of Johannesburg, Ambedkar Univeristy Delhi. You can contact him through dhirajnite@gmail.com

बूढ़ों का वसंत और लोलितागिरी: डॉ. विनय कुमार

सत्तर पार का एक बूढ़ा ‘सुपरस्टार’ है, उसे विश्वास है कि उसे सप्तर्षियों में से एक मान लिया गया है,सो मृत्यु उसे नहीं व्यापेगी।यह बूढ़ा हालांकि मुंह के भीतर नकली दाँत और माथे के ऊपर नकली केश लगाता है, जब तब बीमार पड़ते रहता है, तो भी सोलह साल की लड़की से प्रेम का नाटक करने के लिए हमेशा तैयार रहता है। बूढ़ा प्रयोगों का शौकीन है। उसे लगता है, प्रयोग करते रहने से आदमी हमेशा जवान बना रहता है। अपनी उम्र को जीत लेने का नाटक करते-करते इस बूढ़े ने साबित किया है कि सचमुच उम्र को जीता जा सकता है। वैसे अपनी उम्र को जीतने के लिए यह बूढ़ा एक खास किस्म का शहद भी खाता है। यह शहद पुणे के एक बाग़ में तैयार होता है। यह शहद या तो सिर्फ यह बूढ़ा खाता है या फिर मधुमक्खियों पर राज करने वाली रानी मधुमक्खी, बाकी जो कोई इस शहद को खाना चाहता हो उसे उस क्लब में शामिल होना पड़ेगा जो कि रानी मधुमक्खी का क्लब होता है। यह क्लब अकसर आईपीएल की टीमों के खरीदारों और उनके दोस्तों से बनता है। साठ पार कर चुका एक और बूढ़ा है। यह बूढ़ा ‘सर्वशक्तिमान’ है। इस बूढ़े के पास एक नुस्खा है। बूढ़ा रानी मधुमक्खी के क्लब में शामिल होने का नुस्खा बताता है। इस बूढ़े ने भी उम्र को जीत लिया है।यह बूढ़ा अपने शरीर को सोने से मढ़वा देना चाहता है। सोना मढ़वाये सूट को धारण करने वाला बूढ़ा अपने को रॉकस्टार कहलवाने का शौकीन है, उसे रॉकस्टार कहा भी जा रहा है। साठ साल के इस लोकतंत्र पर इक्कीसवीं सदी में बरस इक्कीसवे बरस की जवानी छा रही है। सारे बूढ़े जवान हो गये हैं, सारे बच्चे भी जवान हो गये हैं, और जो जवान हैं, उनसे कहा जा रहा है कि अब आप चिरयौवन की अनंत आकाशगंगा में टहल लगाने को तैयार हैं। यंगिस्तान कहलाने वाले इस देश में अब कोई नहीं मरता। यहां रोग-शोक-दुःख-मृत्यु कुछ भी नहीं है। यह सब उस दौर की बातें हैं जब ग्रोथ-रेट के साथ किसी पुछल्ले की तरह हिन्दू शब्द जुड़ा होता था। यह ‘हिन्दू’ शब्द उस युग की इकॉनॉमी में इस देश के आदमी को आदिमानव बताने के लिए प्रयोग किया जाता था। आदिमानव ने छलांग लगायी है, अब वह महामानव है या फिर महामानव बनने को तैयार खड़ा है। महामानवत्व के सुखसागर में डूबते उतराते इस माहौल में यह लेख कह रहा है कि भाई साहेब, ये तो एक रोग है…! यह तो सिर्फ एक भूमिका है, पृष्ठभूमि है..आख्यान आगे है। डॉ. विनय कुमार की लेखनी में नयापन क्या है? नयापन वही है जो हिंदी के समकालीन रचनात्मक परिदृश्य से गायब है। नई सूचनाएं, नए ज्ञान ताकि हम बाकी संसार के साथ कदमताल कर सकें! अंग्रेजी या विदेशी साहित्य-लेखन से सहज लोगों के लिए विनय कुमार का लेखन नया नहीं बल्कि एक तरह का दुहराव भी लग सकता है, लेकिन इसे एक तरह की शुरुआत माननी चाहिए। समकालीन हिंदी कथेत्तर गद्य हिंदी का सबसे गरीब संस्करण हो गया है। डॉ. विनय की पुस्तक ‘एक मनोचिकित्सक के नोट्स’ इस गरीबी को कुछ कम ही करता है। प्रस्तुत है इसी पुस्तक से छोटे-छोटे दो गद्यांश। @चंदन श्रीवास्तव 

Sugar Daddy (1976)-Poster

Sugar Daddy (1968)-Poster


By डॉ. विनय कुमार

 चीनी कम होने की निःशब्दता

 
चीनी कम

मादरे-वतन में अगर मनमोहनॉमिक्स की इन्द्रधनुषी छटा का नूर न होता तो हमें ‘प्रिविलेज्ड बूढ़ों के वसंत’ और ‘लोलितागिरी’ पर चर्चा की जरुरत महसूस न होती… ‘निःशब्द’ और ‘चीनी कम’ पर चर्चाएँ कहाँ हो रही हैं? क्या उस भारत में जो अनुसरण करता है या उस छोटे भारत में जो नेतृत्व करता है. जो भारत ‘भूख-भय-भ्रष्टाचार’ की मार से खुद ‘निःशब्द’ है और जिसकी किस्मत में यूँही ‘चीनी कम’ है उसे यह विलासितापूर्ण सहूलियत कहाँ कि प्रेम और विवाह की तरह-तरह की रेसिपि को चटखारे लेकर पढ़े. वृद्ध और युवती के प्रेम, साहचर्य और विवाह का मुद्दा गर्म हो रहा है या गरमाया जा रहा है? सोचने की बात है. सोचने का फैशन न रहने के बावजूद इस पर सोचने की जरुरत है.

वृद्ध का युवती से विवाह भारत के लिए कोई नई बात नहीं है. दक्षिणभोगी नीतिकार कह गए ‘वीरभोग्या वसुंधरा’ और सेनाओं के सहारे वीरता सिद्ध करने वाले सत्तावान हत्यारों को भोग का सिद्धांत मिल गया. महलों के भीतर रानियों के मोहल्ले से लेकर नगर तक बसने लगे. जरा सोचकर देखिये कि कृष्ण की साथ हजार रानियों का खर्चा कैसे चलता होगा. सिर्फ इच्छा की पूर्ति के लिए कृष्ण को प्रजा से कितना वसूलना पड़ता होगा. सत्ता और धन की गोटियों से खेला जाने वाले यह खेल नन्द और यशोदा की विरासत के बूते तो कतई संभव न था.

अब इस मुद्दे को स्त्रियों की दृष्टि से देखें. तरह-तरह के स्वाभाविक और आरोपित सीमाओं के बावजूद स्त्रियाँ सभ्यता-यात्रा में बराबर की भागीदार रही हैं. कल से आज तक जीवन और वर्चस्व की लड़ाइयों में वे अपनी तरह से शरीक रही हैं. हल और हथियार भले ही कम उठाती रही हैं, मगर श्रम के स्वेद और युद्धों के आँसूं और रक्त से कम नहीं भींगती रही हैं. नर और मादा की तरह जंगलों में भटकती मानवजाति ने जब ‘घर’ बनाया तो उनकी भूमिका इस कदर बदली कि उनका मनोविज्ञान पुरुषों से काफी अलग हो गया. घर और तन से चिपके बच्चों ने उन्हें सुरक्षा की आवश्यकता का पाठ पढ़ाया. अन्न और मांस कमाकर लौटे पुरुष को जब भूख और थकान से राहत मिलने लगी तो वह स्त्री को पहले ‘जरुरत’ फिर ‘जायदाद’ की तरह प्यार करने लगा. परिणाम यह हुआ कि स्त्रियाँ ‘कृपाकांक्षिणी’ और ‘सुरक्षाकामिनी’ हो गईं. शायद यही कारण है कि स्त्रियाँ पुरुषों की उम्र से अधिक उनकी सामर्थ्य को अहमियत देने लगीं.

स्त्री के मनोविज्ञान की इस विशिष्ट पहचान के पक्ष में सबसे बड़ा जैविक प्रमाण (बायोलॉजिकल एविडेंस) यह है कि स्त्रियों की यौनिक उत्तेजना का सबलतम कारक है—पुरुष प्रदत्त देखभाल और सुरक्षा. याद करें प्रकाश झा की फिल्म ‘दिल क्या करे’. इस फिल्म की नायिका चलती ट्रेन में बलात्कार की कोशिश करने वाले गुंडों से बचाने वाले अजनबी को थोड़ी ही देर के बाद बेहद ‘निःशब्द’ तरीके से अपनी देह सौंप देती है और यात्रा के अंत में अजनबी के प्रति आँखों से आभार प्रकट करते हुए विदा हो जाती है. इतना कुछ हो जाने के बावजूद अजनबियत बरकरार रहती है. ऐसा क्यों? क्योंकि सिलसिले खतरनाक भी हो सकते हैं. अजनबियत अपने आप में एक सुरक्षा कवच है. इस प्रसंग को सुरक्षा के प्रति स्त्री के मनोवैज्ञानिक (सायकोबायोलॉजिकल) प्रतिक्रिया के रूप में देखें.

अगर स्वतंत्रता पूर्व के भारत की बात करें तो मुग्धाओं के प्रेम की सुविधा सामंतों, सेठों और वाग्वीर ज्ञानिओं के ही भाग्य में थी. लोकतांत्रिक भारत में इसमें ‘प्रिविलेज्ड क्लास’ के नेता और आला अफसर भी शामिल हो गए. अब जबकि उदारीकरण की मीठी छुरी से अच्छी-बुरी पुरानी मान्यताएं हँस-रोकर हलाल हो रही हैं, एक नए सोशल आर्डर को मान्यता दिलाने की कोशिश सर उठा रही हैं. एक फिल्म में सुबह की दौड़ लगाते हुए अमिताभ आते हैं ‘जब तक जाँ में है जाँ तब तक रहे जवां, रोज सुबह से माँगें नई-नई खुशियाँ.’ इस फिल्म में बुढ़ाते जाने के बावजूद वे विवाह नहीं करते. मगर उदार भारत में शताब्दी के महानायक कामनाओं के नदी में ‘निःशब्द’ बहते नज़र आए. ‘निःशब्द’ में थोडा अपराधबोध हुआ और ख्याल-ए-ख़ुदकुशी से उबरे तो तय किया कि तीस पार की कुड़ी से कुड़माई की जाये. इस ढीठ बदलाव के मनोविज्ञान की व्याख्या वैश्वीकरण और उदारीकरण की रोशनी में ही संभव है.

जब पश्चिम में औद्योगिक क्रान्ति हुई तो सत्ता और अर्थ के समीकरण बदले. पुराने सामन्तों और सेठों की जगह उद्यम से उभरे नवधनाढ्यों ने ली. उद्योगों ने पूंजी के नए पहाड़ बनाए, ऐश्वर्य और सुख की नई परिभाषाएँ विकसित कीं और एकदम नए किस्म की कुलीनों की जमात खाड़ी की. उद्यम और उत्पादन बहादुरों की जमात पूंजी के नशे में ‘जब तक है जाँ तब तक लुटें मजा’ की राह पर चल पड़ी. तबसे आज तक यूरोप और उसके सारे उपनिवेश में ‘एन्जॉय योर सेल्फ’ का नारा गूंज रहा है. भोग के प्रयोग ने स्त्रियों के सामने भी यह विकल्प प्रस्तुत किया कि वे चाहें तो अमीर बूढ़ों की सहचरी बन सकती हैं. धन और सत्ता का सुख किसे नहीं चाहिए. स्त्रियाँ अपवाद नहीं हैं. उनमें से कुछ को लगा कि अमीर बूढ़ों के प्रति आकर्षित होना एक सुरक्षित, आरामदेह और शक्ति एवं ऐश्वर्य प्रदान करने वाला बेहतर विकल्प है. यहीं से खड़ी हुई प्रिविलेज्ड प्रेमियों की एक नई जमात. अमेरिका में इस जमात को ‘शुगर डैडीज’ कहा जाता है. अब तो आप मानेगें कि बूढ़ों का यह वसंत ‘ग्लोबलाइजेशन का बाई प्रोडक्ट’ है और उसे फैशन शो की तरह प्रायोजित किया जा रहा है, भारत के नए उद्यम-वीरों के लिए. कुल मिलाकर वृद्ध-युवती साहचर्य का यह फैशन पूंजी के पहाड़ों से उठने वाली पुरानी पछुआ हवा का यह पुरवैया झोंका है.

जो पश्चिम में हो चूका वह भारत में हो रहा है. मगर जो जो भारत में हो रहा है वह पश्चिम में नहीं हो रहा है. पश्चिम में स्त्री-पुरुष संबंधों के समीकरण बदल गये हैं. वहाँ स्त्री सशक्तिकरण का दौर सफल हो चुका है. काफी तादात में स्त्रियाँ ज्ञान, धन, शासन-सत्ता की स्वामिनी हो चुकी हैं. नई रायशुमारियाँ बताती हैं कि अब समृद्ध और सत्तावान प्रौढ़ाएँ भींगती मसों के युवक से प्रेम और विवाह करने लगी हैं. आज नहीं तो कल भारत में यह हो सकता है. ‘चीनी कम’ की सफलता की कामना करने वाले शुगर डैडीज सोच लें.

निःशब्द

हमारे समय में शहरी और कस्बाई भारत में प्रेम पर चर्चा कोई अजूबा नहीं है. महामायावी मीडिया की कृपा से हम तरह-तरह के प्रेम पर होने वाली तरह-तरह की चर्चाओं के अनिवार्य घेरे में हैं. मोनिका-क्लिंटन और जूली-मटुकनाथ जैसी कथाएँ चाट मसाले की तरह हमरे खाने की प्लेटों में अनिवार्य रूप से छिड़की जा रही है और चूँकि हम भूखे नहीं रह सकते इसीलिए उसे चखने को विवश हैं. प्रेम का हो या न हो यह ‘प्रेम’ के अहर्निश उच्चारण से उठने वाले शोर का समय अवश्य है और ऐसे समय में आई है एक फिल्म ‘निःशब्द’. एक ‘टीन’ (युवती) और एक वक्त की मार से छीजे हुए ‘टिन’ (वृद्ध) की प्रेमकथा को लेकर.

इस फिल्म के पहले इस पर चर्चाएँ आईं और खूब आईं, जिनका लब्बोलुआब यह था कि भारत बदल रहा है- इंडिया प्वायज्ड टु बिकम बोल्ड एंड ब्यूटीफुल, देखो तो सही क्या मणिकांचन संयोग है- ओल्ड बिग बी और कमसिन ब्यूटीफुल जिया. सुपरस्टार की लोलितागिरी. जिया देखोगे तो जिया धड़क-धड़क जाएगा. तो ‘निःशब्द’ से पहले आई शब्दों की भीड़ इश्तेहार की तख्तियां उठाये. और जब फिल्म आई तो आई और आकर चली गयी. पटना में मटुक-जूली का तड़का भी भीड़ न बटोर पाया.

दरअसल ‘निःशब्द’ आकर्षण और प्रेम से अधिक त्रासदियों की कथा है. नायिका खंडित परिवार से आती है. पिताओं से भरे समाज में वह पिता के प्रेम से वंचित है. यह अभाव उसके मनोयौनिक (सायकोसेक्सुअल) विकास में अपनी भूमिका निभाता है. चूँकि किसी चीज की इच्छा उसकी कमी से ही पैदा होती है इसलिए उसके अचेतन में पितृपुरुष के लिए चाह का मौजूद होना कोई अजूबा नहीं. यहाँ प्रश्न उठता है कि उसने सहेली के पिता को पिता की तरह क्यों नहीं चाहा. ऐसा इसलिए कि वह पिता-पुत्री के संबंधों के व्याकरण से अनभिज्ञ थी. हर शिशु नर या मादा पैदा होता है. संबंधों की समझ तो परिवार और परिवेश के साथ ‘इंटरएक्शन’ से विकसित होती है. नायिका की समस्या यह है कि जब संयोग उसे अबाधित एकांत में नायक को समझने का अवसर प्रदान करता है और उसके अचेतन में पितृपुरुष को पाने की इच्छा सिर उठाती है तो वह स्वयं को एक पुत्री की तरह अभिव्यक्त नहीं कर पाती क्योंकि उसे वह मनोवैज्ञानिक भाषा ही नहीं पता जिसमें एक पुत्री अपने पिता से बात करती है. उसकी इच्छा उसके बचपन के अभाव से उठती है, मगर व्यक्त होती है युवा भाषा में. यह त्रासदी नहीं तो और क्या है! नायक अपनी तरह की त्रासदी का शिकार है, विवाहित होकर दाम्पत्य प्रेम से वंचित. दाम्पत्य की विडंबना यह है कि वह प्रेमहीन होकर भी संतानवान हो सकता है. नायक तृप्त पिता है मगर एक अतृप्त पुरुष. फिल्म में संयोग उसके अतृप्त पुरुष का कद इतना बढ़ा देता है कि पिता बौना हो जाता है. अतृप्त पुरुष की भाषा के शोर में पिता की भाषा खो जाती है. अगर सही-गलत के पारंपरिक और समाजसम्मत नजरिये से सोचें तो यह दायित्व नायक का ही था कि वह नायिका के हित में सही भाषा में बात करता. क्योंकि नायिका भले ही पुत्री की भाषा नहीं जानती थी, नायक तो पिता की भाषा जानता था. वह निःशब्द की ‘जिया’ के मोह को गुड्डी की ‘जया’ के मोह की तरह भंग कर सकता था. मगर इच्छाओं को बहकाते-दहकाते ग्लोबलाइज्ड समाज में यही, शायद यही हो सकता था. यह त्रासदी नहीं तो और क्या है?

अगर मिथकों पर रत्ती भर भी यकीन करें तो मानना होगा कि भारत शांतनु और ययाति का देश है. स्मरण है कि कमसिन कायालोलुप राजाओं की वासना की वासना को सैद्धांतिक आधार प्रदान करने के लिए लोभी शास्त्रकारों ने सोलह की उम्र को अक्षत सौन्दर्य के भोग का प्रवेशद्वार घोषित कर दिया था. ‘स्वीट सिक्सटीन’ का जूमला तो बहुत बाद की चीज है. आज चिकित्सा विज्ञान सोलह की उम्र को मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से अपरिपक्व मानता है. सोलह और अठारह में फासला ही कितना है. ‘निःशब्द’ के बहाने से ही सही, यहाँ यह कहना होगा कि अठारह वर्षीय युवती के लिए साठ वर्ष के पुरुष के मन में उमड़ा प्रेम उस कंगन की तरह होता है, जिसके सहारे वह पंचतंत्र के बूढ़े शेर की तरह अपने शिकार को फंसाने की कोशिश करता है. मीडिया और जूली को मटुक जी भी ‘निःशब्द’ के नायक की तरह अपने दाम्पत्य-जीवन को असफल बताते हैं. यहाँ उनसे यह पूछना दिलचस्प होगा कि जूलिगिरी उनकी आदत तो नहीं.

‘सठियाना’ एक फब्ती भर नहीं है. बढ़ती उम्र के लोगों की रक्त-नलिकाएं संकरी हो जाती हैं, इस कारन मस्तिष्क में रक्त-संचार कम हो जाता है. कभी-कभी मस्तिष्क में फैली रक्त-नलिकाओं में थक्का बन जाता है और मस्तिष्क के किसी ख़ास हिस्से को रक्त मिलना बंद हो जाता है. अगर यह दुर्घटना मस्तिष्क के ‘फ्रंटल लोब’ नामका हिस्से में घटित होती है, तो ग्रसित व्यक्ति वर्जनाहीन/अनैतिक व्यवहार कर सकता है. ‘जूलियों’ को ‘मटुकों’ से प्यार करने के पहले उनके मस्तिष्क का सीटी स्कैन कराकर देख लेना चाहिए कि ‘फ्रंटल लोब’ सिकुड़ तो नहीं रहा. सनद रहे की छाती में धडकने वाला दिल एक पम्पिंग सेट-भर है, वह दिल जो भावनाओं का केंद्र है, उसका निवास मस्तिष्क में ही होता है.

…साठ और अठारह का अंतराल सिर्फ उम्र का अंतराल नहीं होता, यह उर्जा, क्षमता और भविष्य का अंतराल भी होता है. टेस्टोस्टेरोन नामक पुरुष हार्मोन पच्चीस वर्ष में अपने शिखर पर होता है जबकि साठ वर्ष की उम्र में घाटी में घसीटता दीखता है. प्लैटोनिक प्रेम तो हार्मोन के मदद के बगैर भी शिखर पर पहुँच सकता है, मगर प्लैटोनिक फेज ख़त्म होने के बाद क्या- क्या होगा- यह भी सोचना चाहिए. अब आयें भविष्य पर.

अठारह की उम्र के भविष्य का अर्थ है सुबह के आठ आठ बजे और साठ का समय है शाम के पांच बजे. साठ वाला डूब जाएगा अठारह वाली के दिन कैसे कटेंगें! इसे भी सोचा जाना चाहिए!

vinay kumar

डॉ. विनय कुमार मनोवेद माइंड हॉस्पिटल, पटना में मनोचिकित्सक हैं.  हिंदी साहित्य से लेकर साहित्येत्तर सांस्कृतिक रुचियों तक को बहुत नजदीक से परखते हैं. नॉन फिक्शनल हिंदी की अकाल वेला में अद्भुत चमक के अधिकारी हैं. हाल ही आई पुस्तक ‘एक मनोचिकित्सक के नोट्स’ से खासे चर्चित. उनसे dr.vinaykr@gmail.com पर संपर्क संभव है. 

Om-Dar- Ba-Dar: Excerpts Of Original Script

८०९० के दशक में सिनेमा की मुख्या धारा और सामानांतर सिनेमा से अलग भी एक धारा का एक अपना रसूख़ थायह अलग बात है कि तब इसका बोलबाला अकादमिक दायरों में  ही ज्यादा था। मणि कौलकुमार साहनी के साथसाथ कमल स्वरुप इस धारा के प्रतिनिधि फ़िल्मकार थे।  वैकल्पिक और सामाजिकसंचार साधनों और डिजिटल के इस जमाने में ये निर्देशक फिर से प्रासंगिक हो उठे हैं। संघर्षशील युवाओं के बीच गजब की लोकप्रियता हासिल करने वाले कमल  स्वरूप की  कल्ट फिल्म  ओम दर बदर इधर फिर से जी उठी हैं। अभी हाल ही में एनएफडीसी  ने  इसे डिजिटली  संरक्षित कर एक  एक बड़ा काम किया है। यह कदम एक महान फिल्म को जीवनदान देने जैसा है।  डिजिटली संरक्षित होते ही इसने अपने कमाल दिखाने शुरू कर दिये हैं। पीवीआर ने  इसे  17 जनवरी, 2014 से  पूरे देश में  प्रदर्शित करने  का फैसला किया है।  

आज व्यावसायीक और तथाकथिक सामानांतर फिल्मों का भेद जब अपनी समाप्ति के कगार पर पहुँच चुका हैतब कमल स्वरूप और इनकी कल्ट फिल्म  ओम दर बदर  की विगत महत्ता और योगदान पुनर्समीक्षा की मांग करता है।  इसी कड़ी में यहाँ  ‘ओम दर बदर ‘ की मूल पटकथा के कुछ हिस्से आपसे साझा किया जा रहा है। 

ओम दर बदर पोस्टर

ओम दर बदर पोस्टर

सीन नं. 28: इन्टीरियर/एक्सटीरियर:

                बाबूजी का ग़रीब घर/गली, सुबह  बारिश की पहली हवा  बाबूजी, गायत्री,   छोटा ओम।

                {आंगन में गायत्री पंखों के सामने बैठकर बाल सुखा रही थी। -फिर गंघी करने लगी। बाल झटकी – आइने के सामने खड़ी होकर सफेद बाल ढूंढने लगी। तोड़कर अंगुली में लपेटा – आंगन में फेंका तो धूप आई – जाकर धूप में खड़ी हुई।}

                {अपने कमरे में बाबूजी खाट पर अख़बार ओढ़े सो रहे थे। दीवार पर एक छिपकली थी।}

गायत्री: ओम ! स्कूल कब जायेगा?

                {ओम अंदर कमरे में बैठा भूगोल के नक्शे में बनी नदी में रंग भर रहा था।

ओम: छुट्टी है।

                {गायत्री का कंघी करता हुआ हाथ रुक गया}

गायत्री: क्यों ?

ओम: बरसात होगी।

गायत्री: क्यों ?

ओम: तू कंघी जो कर रही है।

                {बरसात के पहले वाली हवा चली। कैलेन्डर फड़फड़ाने लगे। बाबूजी की बनाई जन्म-पत्रियाँ हवा में उड़ीं। हवा का रुका हुआ झोंका छूट कर उथल-पुथल मचाने लगा। गायत्री – समेटने लगी।

 

सीन नं. 29: एक्सटीरियर:

                {शहर में तूफान के पहले वाला अंधड़ा छाया। साइकिलें हवा में उड़ीं। पेड़ उखड़े। सड़क पर पागल औरत हँसने लगी।}

सीन नं. 30: 28 के समान।

                {ओम शान से आसमान की तरफ देख रहा था। आसमान गरजा तो दीवार की छिपकली बाबूजी के मुंह पर रखे अख़बार पर गिरी। बुरी ख़बरें थीं। बाबूजी डरकर उठ बैठे। पांव में जूते पहले से पहने हुए थे। हाथ बनाई छोटी प्रश्न कुंडलियां हवा में उड़ रही थीं। एक ख़ास चीज़ ढूंढने लगे। अलमारी, तकिये सब छान मारे। आंगन में कुंडलियों के दो राकेट बने हुए थे। खोलकर देखा।

बाबूजी: ओम, तू कमरे में आया था।

ओम: न। 

बाबूजी: तो रॉकेट कौन उड़ा रहा था।

ओम: रूस और अमेरिका।

बाबूजी: गायत्री, दो कुंडलियां नहीं मिल रहीं, हवा में तो नहीं उड़ीं।

                {गुलशन नंदा के उपन्यास में रखी कुंडलियां निकालकर बाबूजी को दी}

गायत्री: मैं पढ़ रही थी।

बाबूजी:     तीस की बीस कर रहा हूं। एक साल के दस मिलेंगे। ख़िज़ाब है।

गायत्री: छि: ! घुट घुट के मरेगी वो। -मेरे भी तो बाल सफेद हो रहे हैं।

बाबूजी: तो चली जा जहां तू समझती है हमेशा: जि़न्दा रहेगी।

                {गायत्री अपमानित होकर अपनी खटिया के किनारे पर जा बैठी। दरवाज़े से गली दिखती थी। वो बाहर गली में निकली। कुछ दूर पहुंचते ही बारिश की पहली बौछार गिरी। बचने को भागी।}

सीन नं. 31: एक्सटीरियर:

                झील में नौका विहार, चांदनी रात, ठंड,   लाल रूमाल डाले आवारा     छोरा और हिप्पन छोरी।

                {लाल रूमाल और काला चश्मा पहने आवारा छोरा और हिप्पन छोरी नाव चला रहे थे}

छोरा: जानती हो प्यार किसे कहते हैं: {ल व्ह} एल.ओ.वी.ई.! लव, लेक ऑफ सॉरो- ओ, ओसियन ऑफ़ टीयर्स- वी, वैली ऑफ डैथ- ई, एण्ड आफ लाईफ। प्यार कोई बाजारू – चीज़ नहीं है जो अमेरिका में बिके।

                {नाव दूर जाकर पानी में डूब गई}

सीन नं. 32: इन्टीरियर/एक्सटीरियर:

                पिक्चर हाल, दिन, बारि गायत्री, जगदीश, दर्शक

                {अन्धेरी में गायत्री को लगा कई जन उसे घूर रहे हैं। जगदीष की नजर की पकड़। जगदीष पर्दे की ओर देखने लगा। वो भी अकेला था। पिक्चर छूटी। भीड़ दरवाजे की तरफ बढ़ने लगी। जगदीश सामने खड़ा था – हकला कर बोला – ‘‘आई लव यू’’ और तेज़ी से पलटकर भागा। गायत्री हक्की बक्की रह गई। भीड़ दरवाज़े के बाहर छूटी तो सीढि़यां उतरते हुए, फुल साइज़ मिरर में अपने को कइयों के बीच अकेला पाई।

सीन नं. 33: एक्सटीरियर:

                सुनसान सड़क, बारि के बाद दोपहर, जगदीश,  गायत्री, ऑटोरिक्शा

                {बारिश के बाद सड़क के दोनों ओर पेड़ धूप में सूख रहे थे। गायत्री अकेली, उदास घर की ओर जा रही थी एक ऑटोरिक्शा कान के पास से सनसनाता हुआ गुजर गया। छाती पर हाथ गया तो चुन्नी गायब।}

          ऑटोरिक्शा – कुश्ती लड़ेगी…….

                { ऑटोरिक्शा के बाहर लाल चुन्नी हवा में लहराई}

                इसके पहले कि चुन्नी जमीन पर गिरती, जगदीश ने साईकल पर बैठे-बैठे चुन्नी को नीचे गिरने से बचा लिया। साईकल पर बैठे-बैठे चुन्नी गायत्री को लौटाई।

जगदीश: आई एम सॉरी। पर कुसूर आपका भी है।

गायत्री: अकेली थी इसलिये।

जगदीश: अकेला मैं भी हूँ।

                {कुछ दूर तक दोनों के बीच तनाव बना रहा। जगदीश ने चुनौती देकर पूछा}

जगदीश: उचक कर कैरियर पर चढ़ सकती हैं आप। लिफ्ट दे रहा हूँ।

                {गायत्री उचक कर बैठ गई। जगदीश के हाथों में हैंडल कांपा। गायत्री मुस्कुराई। साईकल डबल बोझ से चरमरा कर चली।}

सीन नं. 34: एक्सटीरियर:

                बाबूजी के घर की छत और गली, शाम बारि के बाद, जगदीश और गायत्री

                {जगदीश ने गायत्री को घर के बाहर उतारा।}

जगदीश: माय सेल्फ जगदीश, फराम झुमरी तलैया।

                {गायत्री ने छत से जगदीश को जाते हुए देखा जगदीश सामने से आती हुई साईकिल से टकरा कर गिर पड़ा। गायत्री खिलखिलाती हुई सीढि़यों से आंगन में उतरी। ठोकर लगी। वहीं बैठकर सोच में डूब गई।

सीन नं. 35: इन्टीरियर/एक्सटीरियर:

                बाबूजी का घरपिछवाड़े की गली, दोपहर बारिके बाद, जगदीश,  गायत्री

                {गायत्री ने रेडियो पर स्टेशन ढूंढा,  फिर मोढ़े पर बैठ कर आंगन में गायत्री मशीन वाली सुई से कपड़े पर तोता बना रही थी। सामने गली से धोबी अपने गधे के साथ गुजरा। फिर पोस्ट मैन आया।

पोस्टमैन: गायत्री संकर केयर आफ बी संकर-

                {चिट्ठी खोल कर पढ़ने ही वाली थी कि रेडियो पर अपना नाम सुना।}

रेडियो प्रोग्राम:

          और ये खत है इस प्रोग्राम को बेहद चाहने वाले, झुमरी तलैया के जगदीश साहब का – लिखा है कि आज से झुमरी तलैया की बजाय उन्हें अजमेर का माना जाये – लीजिये मान लिया – जगदीष साहब आपने पता तो बदल लिया लेकन आपका मनपसंद गीत पिछले आठ साल से नहीं बदला- आपका फरमाइशी गीत हाजिर है- और हमेशा की तरह इसी गाने को सुनना चाहते हैं- अजमेर से ही जगदीश, गायत्री, ओम, टिंकू, झिंकू, पिंकी, डॉली और उनके मम्मी डैडी-

                {गाना शुरू हुआ। गायत्री ने चिट्ठी पढ़ी}

चिट्ठी: आवाज़ की दुनिया के दोस्तों। मैंने कभी ख्वाब में भी नहीं सोचा था कि फरमाइशी प्रोग्राम में मेरे नाम के साथ जुड़ी लड़की पिक्चर हॉल में मिलेगी। क्या पता इन फरमाइशी प्रोग्राम में जुड़े नामों का सम्बन्ध जन्म-जनमान्तर का हो। कहां मैं झुमरी तलैया और तुम अजमेर….खिड़की खोलो तो मैं दिखूं…………।

                {गायत्री ने खिड़की खोली तो दिल धड़का। नाले के उस पार जगदीश साईकिल की घंटी बजाकर हंस रहा था। गायत्री खिड़की की ओट में हो ली। चिट्ठी को आगे पढ़ा।

चिट्ठी: मेरी साईकिल का ख्याल रखना

                                                तुम्हारा जे.

                {फिर से खिड़की से झांका तो केवल साईकिल खड़ी थी। गायत्री खिड़की से साईकिल का ख्याल रखने लगी।}

कमल स्वरूप

कमल स्वरूप

कमल स्वरुप फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टिट्यूट पुणे के1974 के स्नातक हैं। घासीराम कोतवाल(1976),अरविन्द देसाई की अजीब दास्तान (1978), गाँधी(1982), सलीम लंगड़े पर मत रो (1989),सिद्धेश्वरी (1989)जैसी फिल्मों में सहायक निर्देशकसंवाद लेखकप्रोडक्शन डिजाइनर और शोधार्थी के बतौर इनका रचनात्मक सहयोग रहा है। बतौर निर्देशकनिर्माता कमल स्वरुप ने अभी तक सिर्फ एक फिल्म बनाई है– ओम दर बदर(1988), भारतीय उपमहाद्वीप में अपनी तरह की एक मात्र कल्ट फिल्मफिल्म फेयर पुरस्कार से पुरस्कृत। ओम दर बदर के अलावे कुछ डाक्यूमेंटरी फिल्में भी।  दादा साहेब फाल्के और भारतीय फिल्मइतिहास  के अद्भुत अध्य्येता। दादा साहब फाल्के का महावृतांत  ‘ट्रेसिंग  फाल्के ‘ के नाम से प्रकाशित । इसी साल दादा साहेब फाल्के  रचित एक नाटक  से प्रेरित  डॉक्यूड्रामा  ‘रंगभूमि ‘ का निर्माण।    

बलराज साहनी- जो बात तुझमें है तेरी तस्वीर में नहीं: चंदन श्रीवास्तव

By चंदन श्रीवास्तव

अभिनय महान कहलाएगा बशर्ते अभिनेता किरदार को ऐसे निभाये कि उसका अपना व्यक्तित्व तिरोहित हो जाय, वह ना रहे, निभाया गया किरदार ही रहे। इस पंक्ति को पढ़कर किसी को कबीर याद आ जायें तो क्या अचरज- ‘जब मैं था तब हरि नहीं- अब हरि हैं हम नाहीं ’! अचरज कीजिए कि बलराज साहनी के अभिनय की ऊंचाई को ठीक-ठीक इसी कसौटी पर महान ठहराया जाता है, यह भूलते हुए कि कबीर का समय बलराज साहनी के समय से अलग है, और ठीक इसीलिए 15 वीं सदी के भक्त का अपनी भाव-वस्तु से जो तादात्म्य संभव रहा होगा वह शायद बीसवीं सदी के किसी अभिनेता का अपने किरदार के साथ संभव ना भी हो । आख़िर चेतना का वस्तूकरण, व्यक्तित्व का विघटन, संवेदना का विच्छेद जैसे पद बीसवीं सदी के मनुष्य को समझने-समझाने की गरज से आये थे। अचरज कीजिए कि खुद बलराज साहनी ने भी अपनी तरफ़ से अभिनय की महानता की कसौटी प्रस्तुत करने की कोशिश की तो किरदार के साथ अभिनेता के एकात्म को ज़रुरी शर्त माना, भले ही अभिनय के दौरान उन्हें इससे तनिक अलग भी अनुभव हुआ हो। इस आलेख का विषय बलराज साहनी के इस ‘अलग अनुभव ’ की तरफ़ संकेत मात्र करना है, ताकि इस आम सहमति को तनिक प्रश्नाकुल होकर कुरेदा जा सके कि किरदार से अभिनेता का एकात्म ही अभिनय की महानता की एकमात्र कसौटी है।

बलराज साहनी

बलराज साहनी

                                          1

आम सहमति यही है कि ‘ बलराज साहनी कई चेहरों वाला अभिनेता ’ थे। ‘ कई चेहरों वाला अभिनेता ’ कहने के पीछे मंशा यह बताने की होती है कि “अधिकतर अभिनेता विभिन्न पात्रों के रोल करने पर भी अपने ख़ुद के चेहरे को छिपा नहीं पाते हैं और सही अर्थों में उन पात्रों को साकार करने में असमर्थ रहते हैं..” जबकि बलराज साहनी ने विभिन्न पात्रों की भूमिका इस तरह निभायी कि “ ख़ुद की शख़्सियत को उन पात्रों में उजागर नहीं होने दिया, इसीलिए वे पात्र इतने सजीव होकर होकर साकार हुए। ”(1) । बलराज साहनी के अभिनय के संदर्भ में ‘ कई चेहरों वाला अभिनेता ’ का रुपक इतना प्रभावशाली है कि थोड़े हेर-फेर के साथ हर समीक्षक इस बात को दोहराना जरुरी समझता है। मिसाल के लिए जन्मशती के इस साल में बलराज साहनी के अभिनय की विशेषता को याद करते हुए एक सुधी समीक्षक ने उनकी तुलना यूनान के पौराणिक पात्र प्रोतेउस से की क्योंकि एक तो वह किसी के पकड़ में नहीं आता और आ भी जाय तो “ऐसी रफ़्तार से इतने वास्तविक-से चोले बदलने लगता है कि पकड़नेवाला घबरा कर उसे छोड़ देता है और वह फिर फ़रार हो जाता है। ”(2)कमोबेश ऐसी ही बात अपने इस सहोदर भाई के बारे में भीष्म साहनी भी कहते हैं- “ बलराज की सफलता का राज था कि वे किसी किरदार को निभाते वक्त उसमें अपना दिल ही नहीं, आत्मा भी झोंक देते थे। काबुलीवाला फ़िल्म करते वक्त उन्होंने पठान काबुलीवाला के जीवन को नजदीक से जानने के लिए उसका गहन अध्ययन किया। यही कारण है कि जब आप बलराज की किसी फ़िल्म को याद करते हैं, तो बलराज याद नहीं आते वह किरदार याद आता है। हर किरदार अपने आप में अलग नजर आता है। अभिनेता बलराज गायब हो जाता  है। वह अपनी पहचान को किरदार में घुला देते थे। यह इस कारण होता था क्योंकि वे किरदार से गहरे स्तर पर जुड़ जाते थे. बलराज कहते थे कि एक्टिंग सिर्फ कला नहीं है, यह एक विज्ञान भी है.”(3)

भीष्म साहनी ने जिस बात को संक्षेप में लिखा है, उसका विस्तार बलराज साहनी पर केंद्रित ख्वाजा अहमद अब्बास के एक संस्मरण में मिलता है। इस संस्मरण में अभिनेता बलराज साहनी से जुड़ी कई कहानियां हैं, ऐसी कहानियां जो अभिनय के प्रति बलराज साहनी की निष्ठा का साक्ष्य तो हैं ही, पाठक के मन में अभिनेता बलराज के प्रति श्रद्धा-भाव जगाती हैं। अब्बास साहब लिखते हैं- “ 1945 में इप्टा ने जब फ़िल्म धरती के लाल बनायी, जिसमें सारे के सारे गैर-पेशेवर अभिनेता-अभिनेत्री थे, उसके लिए लंबे-तड़ंगे तथा नफीस बलराज साहनी ने, जो बीबीसी में दो बरस काम करने के बाद कुछ ही अर्सा हुए लंदन से वापस लौटे थे,खुद को ऐसे आधे-पेट खाकर गुजर करते बंगाली किसान में बदला,जैसे वह अकाल के मारे लाखों किसानों में से ही एक हों। वह महीनों तक सिर्फ एक वक्त खाकर गुजारा करते रहे थे ताकि कैमरे के सामने उनकी अधनंगी देह,अपने भूख के मारे होने की गवाही दे। और हर रोज कैमरे के सामने जाने से पहले वह अपनी धोती,समूचे शरीर और चेहरे पर भी,कीचड़ मिले पानी का छिडक़ाव कराते थे ताकि हर तरह से अकिंचनता प्रकट हो। ”(4)

‘दो बीघा ज़मीन’ के बारे में तो ख़ैर, यह बात प्रसिद्ध है ही कि इस फ़िल्म के किरदार को निभाने के लिए बलराज साहनी कई हफ्ते तक कलकत्ता में रिक्शा खींचने वालों की बस्ती में रहे थे। यहां उन्होंने रिक्शा खींचने के लिए खुद को प्रशिक्षित ही नहीं किया था बल्कि रिक्शा खींचने वालों के तौर-तरीके भी सीखे थे। ‘दो बीघा ज़मीन ’ के किरदार को निभाने के लिए बलराज साहनी ने क्या-क्या किया इसका एक ब्यौरा खुद बलराज साहनी की जबानी सुनिए- “बम्बई शहर से बाहर जोगेश्वरी के इलाके में उत्तर प्रदेश और बिहार के भैंसे पालने वाले भैया लोगों की बहुत बड़ी बस्ती है। मैं अगले दिन से वहां के चक्कर लगाने लगा। मैं भैया लोगों के साथ बैठता, उनकी बातें सुनता, उन्हें काम करते हुए देखता। वे कैसे चलते हैं, क्या पहनते हैं, क्या खाते हैं, कैसे उठते-बैठते हैं- यह सब मैं बड़े गौर से देखता और अपने मन में बैठाता। भैया लोगों को सिर पर गमछा लपेटने का बहुत शौक होता है और हर कोई उसे अपने ही ढंग से लपेटता है। मैंने भी एक गमछा खरीद लिया और घर में उसे सिर पर लपेटने का अभ्यास करने लगा। लेकिन वह खूबसूरती पैदा न होती। मेरे सामने यह एक बहुत बड़ी समस्या थी, जिसे हल करने की मैंने पूरी कोशिश की। ‘दो बीघा जमीन’ में मेरी सफलता ज्यादातर इसी अध्ययन का नतीजा है।”(5)

एक बार फिर से प्रसंग पर लौटते हुए बात ख्वाजा अहमद अब्बास के संस्मरण की करें। अब्बास साहब ने तफ्सील से बताया है कि बलराज साहनी द्वारा अभिनीत किरदार अगर प्रसिद्ध हुए तो इसलिए कि उनका अभिनय कौशल “मानव व्यवहार के सहानुभूतिपूर्ण प्रेक्षण और यथार्थवाद के लिए गहरे लगाव,ब्यौरों के प्रति तथा चरित्र व व्यक्तित्व एक एक-एक रग-रेशे के प्रति आश्यचर्यजनक ईमानदारी ” से भरा था। अब्बास साहब लिखते हैं- “काबुलीवाला में,रवींद्रनाथ टैगोर के रचे बहुत ही भोले पठान के प्यारे से पात्र को साकार करने के लिए,उन्होंने रावलपिंडी में गुजरे अपने बचपन की स्मृतियों को फिर से जगाया था,जहां सीमांत क्षेत्र से आने वाले पठान सहज ही और रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा होते थे। इसके अलावा उन्होंने स्थानीय पठानों से संपर्क कर उनसे उनकी बोल-चाल सीखी थी,उनका प्रिय साज़ रबाब बजाना सीखा था और पश्तो के गीत गाना सीखा था। उन्होंने पठानों की हिंदुस्तानी की बोल-चाल की ध्वनि और उसके लालित्य को सीखा था। ..वर्षों तक वह जहां भी जाते थे, उनके चाहने वाले उनका स्वागत काबुलीबाला के बोलने के तरीके की उनकी प्रस्तुति की नकल कर के किया करते थे। ” (6) । इसी तरह इप्टा के नाटक आखिरी शमा में बलराज साहनी द्वारा अभिनीत मिर्जा गालिब के चरित्र के की तैयारी के बारे में अब्बास साहब ने लिखा है कि “इस पात्र की प्रस्तुति को पूर्णतम बनाने में.. उन्होंने अपने दोस्तों से देहली की उर्दू इस तरह सीखी थी, वह इस जुबान में वैसे ही बोल सकते थे, जैसे गालिब बोलते रहे होंगे। उन्होंने मुशाइरा शैली में शाइरी पढ़ने की नफीस कला भी घोंटकर पी ली थी। गालिब के पात्र की उनकी प्रस्तुति इतनी विश्वसनीय तथा जीवंत थी कि गालिब के एक महान पारखी तथा गालिब साहित्य के विद्वान ने कहा था: ‘‘जाहिर है कि महान शायर को मैंने कभी देखा तो नहीं था, पर मैं इतना जरूर जानता हूं कि गालिब ऐसे ही नजर आते,ऐसे ही शायरी पढ़ते और नाटक में चित्रित विभिन्न हालात में उनकी ऐसी ही प्रतिक्रिया रही होती।’’(7)

          2

 बलराज साहनी के अभिनय के बारे में प्रचलित ये सत्यकथाएं क्या एक अभिनेता के कौशल का साक्ष्य मात्र हैं, या इन कथाओं की एक अंदरुनी राजनीति है? क्या इन कथाओं के भीतर एक प्रेरणा यह सिद्ध करने की है कि अभिनय तभी श्रेष्ठ हो सकता है जब अभिनेता निभाये जा रहे किरदार की वास्तविक ज़िंदगी में उतरकर उसके सुख-दुःख को भोगे? दूसरे शब्दों में, क्या बलराज साहनी के अभिनय-कौशल को सिद्ध करने के लिए बहुधा उद्धृत की जाने वाली इन कथाओं के भीतर एक मंशा यह साबित करने की होती है कि यह कलाकार समाजवादी समाज-रचना के सिद्धांतों के प्रति निष्ठावान था और उसकी अभिनय कौशल एक तो इस निष्ठा का ही सबूत है और दूसरे उसका अभिनय-कौशल समाजवादी समाज-रचना की दिशा में किया गया कृत्य होने के नाते महान है ? लग सकता है कि यहां महानता की बड़ी और जटिल कथा का एक छोटे-से वाक्य में लाघवीकरण हो रहा है, मगर ऊपर की कथाओं में इस प्रश्न का उत्तर हां में देने के पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं। मिसाल के लिए, जिस सुधी समीक्षक ने बलराज साहनी के अभिनय कौशल को सराहते हुए उसकी तुलना रुप बदलने वाले पौराणिक पक्षी प्रोतेऊस से की है, उसने लिखा है कि नैचुरल एक्टिंग की यह सिफअत वैसे तो अशोक कुमार और मोतीलाल में भी मौजूद थी, लेकिन “अशोक कुमार और मोतीलाल की सीमा यह थी वे ऊँचे या दरमियानी समाजी दरजे से अलग दिख नहीं पाते थे – उनमें आप उन्हें जो चाहे बना डालिए. उनके चेहरे सिर्फ़ ख़वास के रहे, अवाम के न बन पाए. हिंदी सिनेमा की इस ख़ला को भरा बलराज साहनी ने.” (8)

भीष्म साहनी अपने सहोदर भाई के अभिनय-कौशल को जब याद करते हैं तो यह जोड़ना जरुरी समझते हैं कि “ इससे ( किरदार के साथ एकात्म) बढ़कर भी शायद एक चीज थी, वह था बलराज का सामाजिक सरोकार। वे किसी किरदार को उसके सामाजिक संदर्भो से जोड़ कर देखते थे. उन्होंने मार्क्सवाद के महत्व को स्वीकार किया ”। और अपनी बात की पुष्टि में एक वाक़ये का ज़िक्र करते हैं कि कैसे ‘दो बीघा ज़मीन” की शूटिंग के दौरान बलराज साहनी मुलाकात कलकत्ते में बिहार से आये एक रिक्शेवाले से हुई और उन्होंने उसे फ़िल्म की कहानी सुनाई तो वह यह कहकर रोने लगा कि- “यह तो बिल्कुल मेरी कहानी है. उसके पास भी दो बीघा ज़मीन थी, जो उसने एक जमींदार के पास गिरवी रखी थी और वह उसे छुड़ाने के लिए पिछले पंद्रह साल से कलकत्ता में रिक्शा चला रहा था. हालांकि उसे उम्मीद नहीं थी कि वह उस ज़मीन को कभी हासिल कर पायेगा. इस अनुभव ने उन्हें बदल कर रख दिया। उन्होंने ख़ुद से कहा कि ‘मुझ पर दुनिया को एक गरीब, बेबस आदमी की कहानी बताने की जिम्मेदारी डाली गयी है, और मैं इस जिम्मेदारी को उठाने के योग्य होऊं या न होऊं, मुझे अपनी ऊर्जा का एक-एक कतरा इस जिम्मेदारी को निभाने में खर्च करना चाहिए ’।(9)

और ख्वाजा अहमद अब्बास के जिस संस्मरण का जिक्र आलेख में ऊपर आया है वह तो लिखा ही गया है इस पैरोकारी के साथ कि- “अगर भारत में कोई ऐसा कलाकार हुआ है जो ‘‘जन कलाकार’’ के ख़िताब का हकदार है, तो वह बलराज साहनी ही हैं। उन्होंने अपनी ज़िंदगी के बेहतरीन साल, भारतीय रंगमंच तथा सिनेमा को घनघोर व्यापारिकता के दमघोंटू शिकंजे से बचाने के लिए और आम जन के जीवन के साथ उनके मूल, जीवनदायी रिश्ते फिर से कायम करने के लिए समर्पित किए थे। ” फ़िल्म के पर्दे पर बलराज साहनी का चेहरा ‘ख्वास का नहीं अवाम का चेहरा ’ बन सका तो इसलिए कि ‘उन्होंने मार्क्सवाद के महत्व को स्वीकार किया था ’-  ख्वाजा अहमद अब्बास का उपरोक्त संस्मरण शायद इस बात को सबसे दमदार ढंग से प्रस्तुत करता है। उनका तर्क है- “ बलराज साहनी कोई यथार्थ से कटे हुए बुद्धिजीवी तथा कलाकार नहीं थे। आम आदमी से उनका गहरा परिचय (जिसका पता उनके द्वारा अभिनीत पात्रों से चलता है), स्वतंत्रता के लिए तथा सामाजिक न्याय के लिए जनता के संघर्षों में उनकी हिस्सेदारी से निकला था। उन्होंने जुलूसों में, जनसभाओं में तथा ट्रेड यूनियन गतिविधियों में शामिल होकर और पुलिस की नृशंस लाठियों और गोलियां उगलती बंदूकों को सामना करते हुए यह भागीदारी की थी। गोर्की की तरह अगर जिंदगी उनके लिए एक विशाल विश्वविद्यालय थी, तो जेलों ने जीवन व जनता के इस चिरंतन अध्येता, बलराज साहनी के लिए स्नातकोत्तर प्रशिक्षण का काम किया था। ”(10)

समाजवादी सिद्धांतों के प्रति निष्ठा ने बलराज साहनी को श्रेष्ठ अभिनेता बनने की ज़मीन मुहैया करायी, ऐसा सिर्फ उनके अभिनय को सराहने वाले सुधी समीक्षक ही नहीं बल्कि ख़ुद बलराज साहनी भी मानते हैं, लेकिन किसी घोषणा के अंदाज में नहीं बल्कि उस संयम के साथ जो उनके अभिनय की एक खास पहचान है। वे लिखते हैं- “यह कहना कि कलाकार को हर समय अपनी कला का ही ध्यान रहता है, और देश या समाज की समस्याओं से वे बिल्कुल अलग रहते हैं, बड़ी भारी भूल है। अभिनेता जनता के सामने जीवन नहीं पेश करता,दूसरों के जीवन की तस्वीर पेश करता है। हमलोग फ़िल्म में मैंने एक पढ़े-लिखे बेरोजगार नौजवान का पार्ट अदा किया, दो बीघा जमीन में एक दुःखी किसान का, औलाद में एक घरेलू नौकर का, सीमा में एक विद्वान समाज सेवक का, टकसाल में करोड़पति का और काबुली वाला में एक मुफलिस पठान का। सब रोल एक दूसरे से जुदा थे। अगर मैं किसानों, मजदूरों, पठानों वग़ैरह का जीवन क़रीब से जाकर नहीं देखता तो कभी यह संभव नहीं हो सकता था कि मैं यह पार्ट अदा कर सकता। अगर उन्हें क़रीब से देखना उचित था तो उनके जीवन की आर्थिक सामाजिक और राजनीतिक समस्याओं को जानना और समझना भी मेरा फ़र्ज़ था, तभी मैं उनके दिलों की धड़कनों को अपनी आंखों और अपने शब्दों में अभिव्यक्त कर सकता था, वरना बात अधूरी रह जाती। ” (11)

                                                3

“जीवन की आर्थिक सामाजिक और राजनीतिक समस्याओं को” जाने-समझे बगैर किसी अभिनेता के लिए किरदार को निभा पाना संभव नहीं- इस निष्कर्ष पर बलराज साहनी कैसे पहुंचे ? क्या इस वजह से कि अभिनेता बनने के बावजूद उनका खुद के बारे में ख्याल यही रहा कि वे प्राथमिक रुप से एक साहित्यकार हैं ? शायद हां, क्य़ोंकि वे अपने साहित्यकार होने और अभिनेता होने को अनिवार्य-संबंध की एक कड़ी के रुप में देखते थे। इस बात को अलग-अलग रुपों में उन्होंने स्वीकार किया है कि “अगर मैं साहित्यकार ना होता तो इतना अच्छा अभिनेता नहीं बन पाता..”। (12) । फ़िल्म-अभिनेता बनने के पीछे जो कारण उन्होंने गिनाये हैं उसमें एक है पैसों की तंगी तो दूसरा है, साहित्य की दुनिया से बेवजह ठुकरा दिए जाने का मलाल। अपने बारे में वे किंचित गर्व से बताते हैं कि विलायत(बीबीसी लंदन में एनाऊंसर की नौकरी के लिए) जाने से “पहले मेरी कहानियां ‘हंस’ में बाकायदा प्रकाशित होती रहती थी. मैं उन भाग्यशाली लेखकों में से था, जिनकी भेजी हुई कोई भी रचना अस्वीकृत नहीं हुई थी। ” बीबीसी में नौकरी के दौरान उन्होंने एक भी कहानी नहीं लिखी और जब भारत लौटने पर इस “टूटे अभ्यास” को जारी रखने के लिए  उन्होंने एक कहानी हंस पत्रिका में भेजी तो वह लौटा दी गई। ख़ुद उन्हीं के शब्दों में- “मेरे स्वाभिमान को गहरी चोट लगी. इस चोट का घाव कितना गहरा था, इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि उसके बाद मैंने कोई कहानी नहीं लिखी .चेतन के फ़िल्मों में काम करने के निमन्त्रण ने जैसे इस चोट पर मरहम का काम किया. फ़िल्मों का मार्ग अपनाने का कारण यह अस्वीकृत कहानी भी रही। (13)

फ़िल्मों में अभिनय करते हुए पच्चीस से ज़्यादा बरसों के गुजर जाने के बावजूद अपने बारे में उनकी मान्यता यही रही कि वे प्राथमिक रुप से एक लेखक हैं। अपने “फिल्मी जीवन की पचासवीं वर्षगांठ” पर उन्होंने लिखा कि देश के बंटवारे के काऱण मुझे पिता के धन-दौलत के आश्रय से वंचित रहना पडा और पांवों पर खड़ा होने की मजबूरी ने मुझसे जो कई काम करवाये( मिसाल के लिए फ़िल्म डिवीजन की डाक्यूमेंटरी फ़िल्मों में कमेंटरी बोलना, विदेशी फ़िल्मों की हिन्दी डबिंग में भाग लेना, गुरुदत्त द्वारा निर्देशित फ़िल्म बाजी की पटकथा और संवाद लिखना) और फ़िल्मों में काम करना भी इसी मजबूरी का हिस्सा था। फ़िल्म बाज़ी के सफल होने के बाद इस फ़िल्म के निर्माता चेतन आनंद ने उन्हें एक फ़िल्म की कथा लिखने और उसे निर्देशित करने का न्योता दिया था और उन्होंने लिखा है कि-“आज मुझे अफसोस होता है कि चेतन आनंद की इतनी अच्छी पेशकश मैंने क्यों ना शुक्रगुज़ारी के साथ क़बूल की ” क्योंकि बलराज साहनी के ही शब्दों में- “लेखक और निर्देशक बनना मेरे जैसे आलसी स्वभाव के व्यक्ति को ज़्यादा रास आता। ”(14)

खुद को प्राथमिक तौर पर लेखक मानने वाले बलराज साहनी के लिए साहित्य का उद्देश्य है- “असलियत के सामने आईना रख देना ” यानी जीवन की हू-ब-हू तस्वीर पेश करना। इस सोच के अनुकूल वे नाटको-फ़िल्मों और उनमें किए जाने वाले अभिनय के बारे में भी यही मानते थे कि उसमें कुछ भी ऐसा नहीं किया जाना चाहिए जो “कहीं भी वास्तविकता और असलियत पर अत्याचार ” सरीखा हो। कविताई में जिसे अतिशयोक्ति कहा जाता है, वही फ़िल्मों में मेलोड्रामा कहलाता है- अगर इस पंक्ति को ठीक मानें तो कहा जा सकता है कि बलराज साहनी ने अपने लिए अभिनय की जो निजी कसौटी तय की थी वह हिन्दी फ़िल्मों की इतिहास-प्रदत्त या कह लें स्वभावगत विशेषता यानी मेलोड्रामेटिक बनावट के प्रतिपक्ष में तैयार की हुई कसौटी है। यह अकारण नहीं है कि एक तरफ वे कंपनियों के पेश किए हुए नाटकों को कलात्मकता से शून्य रचना मानते हैं क्योंकि सामूहिक जीवन के मामले में “अंदर से खोखली” और बाहर के सामाजिक जीवन से बहुत गहरे ना जुड़े होने के कारण ऐसी रचना पेश नहीं कर पायीं जिनका “ असलियत से संबंध” हो और अपने दौर की फ़िल्मों को अलिफ़-लैला नुमा “उन्हीं पुराने दकियानूसी नाटकों के रुपांतरण ” मानकर उनके  “दीर्घजीवी होने पर” वह शुबहा करते हैं। अलिफ़-लैला यानी फैंटेसी की दुनिया अगर अपने को अतिशयोक्ति(मेलोड्रामा) में साकार करती हो, तो इसके लिए बलराज साहनी के व्याकरण में कोई जगह नहीं जान पड़ती। कम से कम अपनी तरफ से उन्होंने अभिनय की जो कसौटी प्रस्तुत की है, उसको पढ़कर तो यही लगता है।

गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर से अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए. और फिर शांतिनिकेतन में थोड़े दिन तक अंग्रेज़ी-साहित्य का अध्यापन करने वाले बलराज साहनी अभिनय का प्रतिमान प्रस्तुत करना हो तो शेक्सपीयर के नाटक हैमलेट के तीसरे अंक को याद करते हैं जिसमें नायक हैमलेट बादशाह के दरबार में नाटक पेश करने वाले अभिनेताओं को उपदेश देते हुए कहता है- “देखो स्टेज पर खड़े होकर इस तरह बोलो कि सुनने वालों को रस आये, यह नहीं कि उनके कान फट जायें। तुम अभिनेता हो, ढिंढोरची नहीं। और देखो, हाथ को कुल्हाड़े की तरह मार-मारकर हवा को मत चीरना। अभिनेता को चाहिए कि वह अपने मन को हमेशा काबू में रखे,चाहे उसके अन्दर भावनाओं के तूफान क्यों ना उठ खड़े हों। जो अभिनेता अपनी भावनाओं को क़ाबू में रखकर उन्हें संयम से व्यक्त नहीं कर सकता, उसे चौराहे पर खड़ा करके चाबुक मारना चाहिए।..”

“..और देखो फीके भी मत पड़ जाना। अंडर ऐक्टिंग करना भी अच्छा नहीं होता। ख़ुद अपनी समझ-बूझ को अपना उस्ताद बनाओ और उसी के अनुकूल चलो। अपने चाल-ढाल को, अपने संकतो के शब्दों के अनुकूल बनाओ और शब्दों को संकेतों के अनुकूल और बराबर ख्याल रखो कि कहीं भी वास्तविकता और असलियत पर अत्याचार ना हो। अगर कहीं भी अतिशयोक्ति से काम लिया तो नाटक का सारा मनोरथ ही खत्म हो जाएगा।। याद रखो, सैकड़ों वर्षों से नाटक का मनोरथ एक ही रहा है और भविष्य में भी वही रहेगा- असलियत के सामने आईना रख देना ताकि अच्छाई अपना रुप देख सके, उतार-चढ़ाव भी उस आईने में साफ दिखाई दें..”

उनकी पेशकश में चुनौती है कि – “जरा इन पंक्तियों की कसौटी पर आप अपने देखे हुए नाटकों और फ़िल्मों को परखिए और देखिए कि वे किस हद तक पूरी उतरती हैं..” (15)

                                            4

आलेख के इस आख़िरी भाग में आइए, देखने की कोशिश करें कि क्या बलराज साहनी के सिनेमाई अनुभव के भीतर कोई फांक है, दूसरे शब्दों में क्या उनके सिनेमाई अनुभव का कोई हिस्सा अभिनय के बारे में तय किए गए अपने ही प्रतिमान को नकारता हुआ-सा प्रतीत होता है ? इस सिलसिले में पहली बात “स्वाभाविक अभिनय” से जुड़ती है। भले ही बलराज साहनी की मान्यता यह रही हो कि ‘अभिनय अगर स्वाभाविक हो तो उसे हर कोई पसंद करता है ’(और यह मान्यता बहसतलब है) लेकिन ऐसा कहने के साथ-साथ यह जोड़ना भी ज़रूरी समझते हैं कि “स्वाभाविक अभिनय एक तरह से भ्रांति पैदा करने वाली चीज है, क्योंकि दर्शकों को स्वाभाविक लगने वाला अभिनय करते समय हो सकता है, अभिनेता को कई अस्वाभाविक बातें करनी पड़ें। उसका दृष्टिकोण दर्शक के दृष्टिकोण से भिन्न होता है…”।(16) प्रश्न पूछा जा सकता है कि क्या दृष्टिकोण का यह अलगाव निभाये गए किरदार से दर्शक का एकात्म स्थापित करने में कहीं से बाधक नहीं होता ? और दूसरी बात, कलाकार अगर अपने अभिनय को स्वाभाविक बनाने के लिए कुछ अस्वाभाविक चीजें करता है तो फिर इस अस्वाभाविकता का उस भोगे हुए यथार्थ से क्या रिश्ता है जिसे खुद बलराज साहनी ने अभिनय की प्रामाणिकता के लिए जरुरी माना है ?

इस प्रश्न का सही उत्तर तो खैर हमेशा अनिर्णय की स्थिति में रहेगा कि लोकप्रियता किसी कला की महानता की एकमात्र कसौटी है या नहीं , परंतु यह बात मान ली जानी चाहिए कि कला अगर स्वान्तः सुखाय नहीं है तो फिर उसे लोक-स्वीकृति की तलब हमेशा लगी रहेगी। यह बात कम से कम फ़िल्म सरीखे जन-माध्यम के लिए तो कही ही जा सकती है क्योंकि इसका विराट दर्शक-वर्ग ‘अज्ञातकुलशील’ होता है और फ़िल्म बनाने वाले के सामने हमेशा इस बात की चुनौती होती है कि वह इस ‘ अज्ञातकुलशील ’ दर्शक की रुचि का कोई औसत मान निकालकर उस पर खड़ा उतरने की कोशिश करे। अभिनेता के दृष्टिकोण और दर्शक के दृष्टिकोण में अंतर स्वीकार करने वाले बलराज साहनी जब फ़िल्म की लोकप्रियता के बारे सोचते हैं, तो आश्चर्यजनक तौर पर अभिनय के बारे में तय किए गए अपने ही प्रतिमान से बिल्कुल अलग बात कहते हैं, कुछ ऐसी बात जो असलियत के सामने आईने रखने वाले उनके यथार्थवाद की जगह अतिरंजना और अतिशयोक्ति को प्रतिष्ठित करता प्रतीत होता है। मिसाल के लिए, अभिनय-कला शीर्षक निबंध में एक जगह उनका कहना है-“हम पढ़े-लिखे अभिनेता पुराने अभिनेताओं पर नाक-मुंह चढ़ाते हैं। हम कहते हैं कि उनका अभिनय स्वाभाविक नहीं था, उनमें बनावट होती थी, और वे बात को बहुत ज्यादा बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते थे। लेकिन उनके अभिनय का सही मूल्यांकन करने के लिए हमें यह देखना चाहिए कि उनका दर्शकों पर कैसा प्रभाव पडता था। वे जो भाव अभिव्यक्त करते थे, वे प्रायः सच्चे होते थे, और उनकी अभिनय शैली बहुत प्रभावशाली होती थी। बाल-गंधर्व जैसे अभिनेता अपनी शैली के बहुत बड़े उस्ताद थे। आगा हश्र के नाटक दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देते थे। ” (17)

बात बढ़ा-चढ़ाकर पेश की जाय, सच्चाई तो भी रह सकती है, ऐसी प्रभावशील सच्चाई जो मंत्रमुग्ध कर दे- ऐसा अनुभव बलराज साहनी को कई बार हुआ। इसका एक साक्ष्य उनकी आत्मकथा के शुरुआती कुछ पन्नों पर ही मौजूद हैं। अपने स्कूली दिनों को याद करते हुए वे लिखते हैं उन दिनों मैंने ‘हीर-रांझा’ और ‘अनारकली’ नाम की फिल्में देखी थीं और अनारकली के रुप में अभिनेत्री सुलोचना के सौन्दर्य से अभिभूत हो उठा था। अनारकली को जिन्दा दफ्न करने के दृश्य को याद करके मैं रो उठा था। अनारकली की दर्दनाक मौत की पीड़ा में छटपटाते बलराज की हालत यह थी -“  यदि मुझसे कोई कहता कि यह सब तो सिनेमा के ट्रिक का मामला है और कोई भी ईंट सुलोचना के चेहरे को ढंकने के लिए नहीं रखी गई तो मैं उसे थप्पड़ मार देता, जहां तक मेरा सवाल है, सुलोचना मर चुकी थी और मेरे लिए जीवन में कोई आनंद शेष नहीं रह गया था..लेकिन सुलोचना तो जिन्दा थी और कई फिल्मों में उसने मेरे साथ काम भी किया। जब भी मैं उसके प्रति अपने इस किशोरवय के प्रेम का जिक्र करता तो वह इसे हंसी में उड़ा देती। आज जबकि मैं खुद एक फ़िल्म स्टार हूं तो उसकी इस हंसी का मतलब समझ सकता हूं लेकिन तो भी यह ख्याल मैं अपने दिल से नहीं निकाल पाता कि किसी दिन उससे कहूंगा कि वह सिर्फ मूर्खतापूर्ण आसक्ति भर नहीं था बल्कि प्रेम का मेरा पहला सच्चा अनुभव था..। ” (18)

और दूसरा साक्ष्य है फ़िल्म ‘दो बीघा जमीन” की लोकप्रियता के संबंध में की गई उनकी टिप्पणी। इस फ़िल्म से जुड़ी यादों को बलराज साहनी अपनी “आखिरी सांसों तक सहेजकर” रखना चाहते थे। बावजूद इसके इस फ़िल्म का यथार्थवाद उन्हें खटकता था। उन्हें मलाल रहा कि दो बीघा जमीन को जैसी सराहना बुद्धिजीवियों में मिली वैसी आम जनता के बीच नहीं। और इसकी व्याख्या करते हुए उन्होंने इस फ़िल्म में दो दोष गिनाये हैं। एक तो यह कि इस फ़िल्म का नायक कभी भी “उस अन्याय और अत्याचार के खिलाफ आवाज बुलंद नहीं करता, जिसका उसे सामना करना होता है , ” और दूसरे यह कि “ वह अपने दोस्तों और सहकर्मियों को खुद से दूर कर देता है ” जबकि एक औसत दर्शक जो खुद को हीरो के जूते में रख कर देखना चाहता है। वह कभी भी “ खुद को इस तरह के आत्मपीड़क और अंतर्मुखी हीरो के साथ जोड़ कर देखना ” नहीं चाहेगा। इस दोष का जिम्मेदार वे सारी प्रगतिशील कला और साहित्य की उस आदत को मानते हैं जो “विदेशी मूल्य और वाद पर खड़ा उतरना चाहते हैं ना कि उन मूल्यों पर, जो हमारी अपनी धरती की उपज हैं। दो बीघा जमीन की तकनीक भी विश्व प्रसिद्ध इतालवी निर्देशक की फ़िल्म बाइसिकिल थीफ और उसमें प्रदर्शित किये गये यथार्थवाद से प्रभावित थी। यही वह कारण था कि रूसियों ने भले ही दो बीघा जमीन के बारे में अच्छी बातें कहीं, लेकिन उन्होंने अपनी सारी प्रशंसा और सम्मान राजकपूर की फ़िल्म आवारा के लिए सुरक्षित रख लिया, बल्कि वे आवारा के प्रति दीवाने से हो गये।.. हालांकि हमने उम्मीद की थी समाजवाद के इस मक्का में लोग कहीं ज्यादा सुसंस्कृत और उन्नत कला  को सम्मान देंगे , लेकिन रूसियों को आवारा के प्रति उनकी दीवानगी के लिए कसूरवार नहीं माना जा सकता। खास तौर से यह देखते हुए कि आवारा में कितने बेजोड़ तरीके से भारतीय जीवन की धड़कन को पकड़ा गया है।” (19)

इस विन्दु पर संस्कृति-मनोविज्ञानी सुधीर कक्कड़ की याद आना लाजिमी है जो लिखते हैं कि सिनेमा भारतीय उपमहाद्वीप में रहने वाले लोगों के साझा स्वप्नों(फैंटेसी) का वाहक है और एक ऐसा वैकल्पिक जगत मुहैया कराता है, जहां हम यथार्थ से अपने पुराने संघर्ष को जारी रख सकते हैं। हमारे फ़िल्म-जगत में फ़िल्म दर फ़िल्म स्वप्नों की ऐसी भारी मात्रा में नियमितता आश्चर्य में डालती है। एक तरह से जिंदगी की वास्तविक समस्याओं के ऐसे जादुई हल, भारतीय जनमानस में गहरी जमी ऐसे समाधानों की इच्छा की ओर इशारा करते हैं।.. कोई भी समझदार भारतीय यह नहीं मानता कि सिनेमा में वास्तविक जिंदगी का अंकन होता है। ” (20)

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव,  मूलतया छपरा(बिहार) के निवासी, पिछले पंद्रह सालों से दिल्ली में। पहले आईआईएमसी और फिर जेएनयू में पढ़ाई। “उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हिन्दी लोकवृत्त का निर्माण” शीर्षक से पीएचडी के बाद दिल्ली के कॉलेजों में छिटपुट अध्यापन, फिर टीवी चैनल की नौकरी और अब विकासशील समाज अध्ययन पीठ(सीएसडीएस) की एक परियोजना इंक्लूसिव मीडिया फॉर चेंज से जुड़े हैं। इनसे  chandan@csds.in पर संपर्क संभव है। 

संदर्भ

(1) बलराज-संतोष साहनी समग्र, संपादक डा. बलदेवराज गुप्त, प्रचारक ग्रंथावली परियोजना, हिन्दी प्रचारक संस्थान, वाराणसी में संकलित सुखवीर का बलराज साहनी एक चेहरा, कई चेहरे शीर्षक आलेख।

2. नवभारत टाईम्स में प्रकाशित विष्णु खरे का लेख जो चवन्नी चैप नामक ब्लॉग पर ‘बलराज साहनी पर विष्णु खरे ’ शीर्षक से उपलब्ध है

3 अखरावट ब्लॉगस्पॉट पर भीष्म साहनी की नजर से बलराज साहनी- शीर्षक पोस्ट

4 देखें पुंजप्रकाश ब्लॉग स्पॉट पर जनकलाकार बलराज साहनी- ख्वाजा अहमद अब्बास शीर्षक पोस्ट

5. लाईवहिन्दुस्तान डॉट कॉम पर 5 मई 2012 को प्रकाशित दो ‘ बीघा जमीन की एक तलाश ’ शीर्षक पोस्ट

6. देखें पुंजप्रकाश ब्लॉग स्पॉट पर जन-कलाकार बलराज साहनी- ख्वाजा अहमद अब्बास शीर्षक पोस्ट

7 उपरोक्त, वही

8  चवन्नी चैप नामक ब्लॉग पर विष्णु खरे का आलेख, उपरोक्त

9. अखरावट ब्लॉग सपॉट पर- भीष्म साहनी की नजर से बलराज साहनी शीर्षक पोस्ट

10.( देखें- लाईवहिन्दुस्तान डॉट कॉम पर, उपरोक्त)

11. देखें- बलराज-संतोष साहनी समग्र, संपादक डा. बलदेवराज गुप्त, प्रचारक ग्रंथावली परियोजना, हिन्दी प्रचारक संस्थान, वाराणसी में संकलित ‘फिल्मी-दुनिया ’ नामक निबंध

12  देखें- बलराज-संतोष साहनी समग्र में- सुखबीर का आलेख, उपरोक्त)

13. देखें चवन्नीचैप ब्लागस्पाट पर क्यों अभिनेता बने बलराज साहनी शीर्षक पोस्ट

14. देखें- बलराज-संतोष साहनी समग्र में “अपने फिल्मी जीवन की पचासवीं वर्षगांठ पर ” शीर्षक आलेख

15. देखें बलराज-संतोष साहनी समग्र में सिनेमा और स्टेज नामक निबंध

16.  देखें बलराज-संतोष साहनी समग्र में अभिनय कला नामक निबंध

17. बलराज-संतोष साहनी समग्र में अभिनय-कला नामक निबंध

18. देखें बलराज साहनी- ऐन ऑटोबॉयग्राफी, हिन्द पॉकेट बुक्स, 1979, दिल्ली

19. अखरावट ब्लागस्पॉट पर मेरी निगाह में सिनेमा : बलराज साहनी, सत्यजीत रे, अडूर गोपालकृष्णन नामक पोस्ट

20. अखरावट बलॉगस्पॉट पर सिनेमा पर सुधीर कक्कड़: भारतीय सिनेमा दिवास्वप्नों पर पलता है.. शीर्षक पोस्ट

साभार- नया पथ

Madras Café and the Indian state apparatus: Prabhat Kumar

BY Prabhat Kumar

I watched Shoojit Sircar’s film Madras Café (MC) early this week. Commenting on a film released three-four weeks ago, when we are flooded with new Hindi films every Friday, is a lazy exercise and also involves the risk of going unread. Nevertheless, I am eager to share my thoughts on MC.Madras Cafe

For a person who has a superficial knowledge about the minute factual details regarding Ex-PM Rajiv Gandhi’s assassination in the context of Sri Lankan ethnic strife –involving Sinhala dominated Sri Lankan state, minority Tamil nationalist organization, Indian state apparatus– the film has been an engaging experience. While watching, however, I also somewhat felt irritated for being unable to keep pace with the movie. On an afterthought I have excused myself. Probably it is the film’s shortcoming, not mine. Quite contrary to the generally overstretched Hindi films, MC might be over edited! Audience is bombarded with fast-paced information. Back and forth movement of camera on the scale of the narrative’s time could have been avoided. Notwithstanding these minor flaws, on the whole, it appears to be a good film. A director’s film, indeed, that has got excellent support from his cameraman (especially footage of violence and suffering by civilians) and good assistance from the film’s background scores. At the level of acting the co-producer John Abraham (Indian RAW agent in Sri Lanka) has not done badly with his unchanging expressions. Nargis Faqri, a British war journalist who speaks with American accent, is not very bad either. Characters like by Bala (Prakash Belawadi), the John’s boss in Sri Lanka and the RAW chief in India (Siddharth Basu) were the most impressive and appeared immaculate in their performances. Other characters, even minor ones, like SP (Rajeev Pandey) who taps phone conversations, were looking natural exhibiting a better range of expressions than John.

Slowly, as I emerged from this engaging entertainer, I found that film had grown on me. Although very important in its own right, I was not bothered about facticity of an avowedly fictional political thriller. Instead, the cinematic narrative of a real political event struck a chord: the violence of Sinhala majoritarian nationalism pitted against its Tamil ethnic minority, counter-violence of the Tamil ethno-nationalism, incalculable suffering of the civilians (Tamil as well as non-Tamils) and moreover, the role of Indian state and its security apparatus in the ethnic strife of Sri Lanka, last but not the least, the global network of military-industrial business interests in the security market of nation-states (referred to in passing but far from staying unnoticed). For a person like me, who watches almost all good-bad-ugly Hindi films, it is the sensitive (but safe!) treatment of such subjects that was a new experience.

Before I wanted to pen down my musings, howsoever politically inflated it may appear below, I checked how has this film been reviewed and received in (English) media. I found most of what I have written about MC’s craft above had already been told. However, only a couple of reviews had noticed what I mentioned in the preceding paragraph: the significance of the film’s ‘political’ subject. Reviews dealing with the political side of the film, I feel, have mentioned and lauded only the too obvious (or should I say convenient to comment upon!) a subject: human tragedy of the strife captured by brilliant camera work. Other glaring and not so glaring but certainly inconvenient aspects of the film have gone uncommented.

To be precise, in my opinion, the film does not show, for e.g., early background of the nasty workings of the majoritarian Sinhala nation-state, what actually in the early years Tamil resistance stood for, etc. I will refrain from commenting further on what MC does not cover. After all, MC is essentially an ‘Indian statist narrative’, which tries to be self-consciously realistic by resisting melodrama. John, an Indian army officer, is the sutradhar, the narrator-protagonist. He tells us the story in the capacity of a participant observer, a RAW agent in Sri Lanka. He is sent there to materialise what Indian state could not do politically and officially. John is there (like Rambo!) to curtail the hegemony of LTF (read LTTE) by pitting other Tamil nationalist rivals against Anna (read Prabhakaran). However, he fails because of betrayal by his locally entrenched superior (another RAW official who is coincidentally Tamil). A duty-bound official suffers personal injuries, physical as well as emotional. More importantly perhaps, the sutradhar – the honest Indian citizen is a broken personality who later sank himself into alcohol for his inability to avert a ‘national’ disaster. The primary point of his telling (starting with hackneyed scene of confession to a priest in the Church) is to underline his failure to save his ex-prime minister (Rajiv Gandhi), because of the moles in the state’s own apparatus. There are also other moments, big and small, in the film’s narrative, the political import of which, I believe, could not be ignored. Remember the crucial but brief conversation between ex-intelligence man (played by Dibang) and the protagonist John in Thailand when the actual motive of the planned assassination is told. Through the sutradhar, the audience is told that big business houses of world negotiate through footloose (ex-) diplomats and (ex-) security servicemen for the smooth running and profit of their international enterprise. They function extraterritorially; they buy passage for their business; and directly or indirectly finance killing, warfare, also sale arms (?) to the state or ‘non-state’ actors (here LTTE).

To state the obvious, what is clearly shown in this ‘Indian statist’ narrative is the messy and unapologetic role of the Indian state and its security agencies in the ethnic strife of Sri Lanka. What is more, the film also shows (in the largely nationalist vein) the ‘extra-legal’ global network of military-industrial business interests in the security market of nation-states in which men from Indian establishment may have a clear stake and involvement.

Let me explain. Indian state and its security apparatus are shown to be deeply involved in the extra-legal and extra-territorial activities in the neighbouring region. How security agencies of the big and powerful nation-states, and India is no exception, manoeuvre the political happenings of the region without caring for its tragic human consequences. Military establishments are no exception to corruption, individual greed for money and power. These are issues which are unsurprising to those who engage in some ways or the other, directly or indirectly, with everyday work and practice of the state security agencies. Yet these are also the issues, about which discussion is hardly found to be taking place in public– discussion which could raise questions on its moral-political legitimacy. Probably, a large part of its citizenry (of course those who do not face violence directly) believes in their nation-state’s projected holy self-image; that the nation and its saviour army are too virtuous and sacrosanct to be involved in such acts. Profoundly undemocratic aspect of such involvements is hardly ever talked about in open. On the contrary, such discussions are either systematically discouraged, or take place from the statist perspective where interest of the state-apparatus is projected as the ‘national’ interest. Those who would dare to raise such issues from the non-statist position are received with suspicion in the age of jingoistic nationalism nurtured and propagated by the state and its embedded media. If one talks about India’s diabolic role in sabotaging the democratic upsurge in neighbouring Nepal, if one talks about the possibility of Indian security establishment’s entrenched interest and role in tearing apart the democratic upheaval on its own frontiers, s/he runs the risk of being targeted as ‘anti-national’.

The film, intentionally or unintentionally, brings this issue home. Although told from the perspective of an Indian state official for whom such illegal acts are dirty necessities (for the problem always already exists and initiated by the ‘other’; only way to save the nation is to break the ranks of ‘other’ nation/s operational either in the form of state or waiting-to-be-state!), the film visiblises the darker side of security discourse of the nation-states. It also exposes the transnational nexus of business executives and (retired!) security hawks, a nexus that has clear political consequences not only at the levels of high politics of the nation-state but also for the mass of people in general. MC, apart from being good in terms of its craft, may also be appreciated for this.

However, appreciation of MC as a film, which renders the illegitimate aspects of nation-state and its security apparatus visible on the silver screen, is contingent upon the way the film is received. Critics’ articulation of MC’s reception in public sphere has hardly spelt out this problematic aspect of the movie. A general silence probably reflects consent or at best indifference to such practices of the security state. Tamil nationalist groups have raised political objections. (Some wanted a ban on the film, which is of course unjustified.) But theirs is a populist opposition which accuses the movie for being biased against the (now dead) Tamil militarist-nationalist chief Anna (Prabhakaran) and his fief, the LTTE – a waiting-to-be-state. An opposition which hardly takes into account the issues and problems underlined above.

Prabhat Kumar

Prabhat Kumar

Prabhat Kumar, Assistant Professor of History, Presidency University, Kolkata

शिप ऑफ थीसियस – अनहोनी और होनी की उदास रंगीनियाँ: उदय शंकर

BY उदय शंकर

शिप ऑफ थीसियस । सबसे पहले यह शीर्षक ही दर्शक को जिज्ञासु बनाता है। आनंद गांधी, जो फिल्म के लेखक-निर्देशक हैं, का मानना है कि यह शीर्षक मूलतः एक थॉट-एक्सपरिमेंट है जिसका प्रेरणा-स्रोत ‘शिप ऑफ थीसियस’ नामक एक विरोधाभासी (पैराडॉक्सिकल) गुत्थी है। वह गुत्थी इस रूप में है कि थीसियस ने एक जहाज बनाया था और सौ साल बाद उस जहाज का एक-एक पुर्जा बदल दिया गया। मतलब कि उस जहाज में अब कोई भी पुर्जा ऐसा नहीं बचा था जिसे थीसियस ने उसमें लगाया था। पहला सवाल यहीं पर आता है कि क्या यह 100 साल बाद वाला जहाज भी थीसियस का जहाज है या नया जहाज है? अगर नया है तो वह कौन सा समय, बिन्दु या पुर्जा है जहां से जहाज अपनी पहचान (Identity) का नवीकरण शुरू करता है। एक तरह की उलझन, विरोधाभास जिसका कोई तार्किक उत्तर या निष्कर्ष संभव नहीं है, पैराडॉक्स कहलाता है। किसी पैराडॉक्स का कोई भी निष्कर्ष या उत्तर अपने आप में, ‘पहले अंडा या मुर्गी’ टाइप का, उलझन पैदा करती है। इसी कारण से यह सवाल अस्तित्व के सवाल के आस-पास टीक जाता है और यही वह बिन्दु है जहां आनंद गांधी इस पैराडॉक्स को मानवीय जीवन-जगत के बीच में रख कर देखते हैं। शिप ऑफ थीसियस फिल्म इसी जिज्ञासा के साथ शुरू होती है (जैसा कि आनंद गांधी का कहना है) कि इंसान के शरीर की एक-एक कोशिका 7 साल के बाद बदल जाती है। इस बदलाव के कारण किसी भी इंसान में क्या-क्या परिवर्तन होते हैं? वह आदमी क्या वही रह जाता है या कुछ और हो जाता है? अगर वह कुछ और हो जाता है तो वह क्या है, जैसे अनगिनत सवाल उभरते हैं। इन सवालों का कोई भी तर्कसंगत उत्तर संभव नहीं है। बहुतों का तो यहाँ तक मानना है कि इस तरह के सवाल या बदलाव की कोई भी सम्पूर्ण अभिव्यक्ति भाषा में संभव नहीं है, भाषा में व्यक्त हुये ऐसे जिज्ञासु तेवर को कोई भी आसानी से बचकानी हरकत कह सकता है। इस तरह की जिज्ञासाओं को अनुभूत करने के लिए एक तरह की संवेदना की आवश्यकता होती है। मेरा मानना है कि विरोधाभासी गुत्थियों, जीवन-शैली-प्रक्रिया को दर्शाने के लिए सिनेमा बहुत ही अच्छा माध्यम है। शिप ऑफ थीसियस जीवन की सतत-प्रक्रिया में उभरने वाले विरोधाभास का बखान है, बिना किसी मूल्य-निर्णय के, सिर्फ बखान।

ship of theseus's Poster

ship of theseus’s Poster

शिप ऑफ थीसियस में यह बखान तीन कहानियों के माध्यम से सम्पन्न हुआ है। पहली कहानी नेत्रहीन फोटोग्राफर आलिया (आयदा-अल-काशेफ) की है। नेत्र रूपी अभावात्मक स्थिति को वह कैमेरे से संतुलित करती है। यह संतुलन ही उसकी पहचान (एक अच्छी और प्रशंसित फोटोग्राफर के रूप में) को निर्मित करती है। अभाव उसके लिए रचनात्मकता का स्रोत बन जाती है। वह ‘अपने अनुभव-संसार’ में खुद को सम्पूर्ण महसूस करती है। बाद में जब उसे आँखें और रोशनी वापस मिल जाती है तो वह खुद को असहज महसूस करती है। वह एक दूसरे अभावात्मक स्थिति में चली जाती है, फोटोग्राफी नहीं कर पाती है। भौतिक-अभाव की पूर्ति रचनात्मक-अभाव (पहचान का संकट) के रूप में प्रकट हो जाती है। यहीं पर सवाल खड़ा होता है कि आलिया की असली पहचान क्या है? आँख वापस आने के बाद वाली आलिया पुरानी आलिया से कितनी अलग है, नयी है या वही है? यह एक विरोधाभासी गुत्थी है।

 दूसरी कहानी मैत्रेय(नीरज कबि) नाम के एक श्वेतांबर साधु/भिक्षु की है। जिनके बारे में कहा जाता है कि वे साधु कम शास्त्री ज्यादा हैं। जीव-जंतुओं के अधिकारों और पर्यावरण को बचाने के लिए संघर्ष करते हैं। वे इस संघर्ष में किसी भी तरह के समझौते के लिए तैयार नहीं हैं और यही ‘नैतिक आवेग’ उनकी पहचान है। वे पेट की बीमारी से परेशान हैं लेकिन दवाइयाँ नहीं लेते हैं क्योंकि हर दवा के पीछे जीव-जंतुओं की हिंसा है। यही समस्या आगे जाकर लिवर सिरोसिस में तब्दील हो जाती है जिसका तत्काल इलाज बहुत जरूरी है क्योंकि समस्याएँ विकराल रूप धारण कर कैंसर में तब्दील हो सकती हैं। उनका नैतिक आवेग फिर आड़े आ जाता है और वे समझौता करने के बजाय जीवन को त्यागने का फैसला करते हुये आमरण अनशन की शुरुआत करते हैं। आमरण अनशन और बीमारी दोनों के प्रभाव ने उन्हें एक दिन अंदर से तोड़ दिया, जीने की ललक फिर से पैदा हो गई और डॉक्टर/दवा की सेवा लेने को तैयार हो गए। उनमें लिवर का प्रत्यारोपण (Liver Transplantation) किया जाता है और वे फिर से स्वस्थ्य हो जाते हैं। उनके स्वस्थ होने में जीव-हिंसा का योगदान शामिल हो गया। अब वे ‘श्वेतांबर साधु/भिक्षु’ नहीं रहते हैं। पहली कहानी की तरह ही यहाँ भी एक अभावात्मक स्थिति से दूसरी अभावात्मक स्थिति की ओर यात्रा है। दोनों स्थितियों में उत्पन्न हुये पहचान के संकट का कोई तर्कसंगत जवाब नहीं है, इसीलिए यह कहानी भी एक विरोधभासी-गुत्थी का निर्माण करता है।

तीसरी कहानी नवीन (सोहुम शाह) नामक एक स्टॉकब्रोकर की है। उपर्युक्त दोनों कहानियों से यह कहानी थोड़ी भिन्न है। पहली भिन्नता यह है कि शुरुआती दोनों कहानियों के पात्रों की ‘पहचान-यात्रा’ रचनात्मक-नैतिक पहचान से भौतिक पहचान की पूर्णता को पाने का है। इस कहानी में घटना-क्रम के लिहाज से यह यात्रा विपरीत दिशा में चित्रित है। कहानी का शुरुआती दृश्य ही यह इंगित करता है कि वह अब भौतिक-रूप से एक सम्पूर्ण इंसान है क्योंकि उसमें किडनी का प्रत्यारोपण (Transplantation) संपन्न हो गया है। वह अब स्वस्थ है। इसके बाद ही उसका पेशागत पहचान स्पष्ट होता है कि वह दिन-रात सिर्फ पैसों के बारे में सोचने वाला एक स्टॉकब्रोकर है। उसकी नानी समाजसेविका है, जिसके पास वह आज-कल रहता है। एक दुर्घटना में नानी का पैर टूटता है और वह फिर से अस्पताल वाले माहौल में चला जाता है। नानी उसे हमेशा ताना देती है कि फ्रीडम-फाइटर और समाज-सेविका का नाती अमेरिका का पिट्ठू बना बैठा है। लोगों के सामने वह खुद को अपमानित महसूस करता है। इसी बीच पता चलता है कि डॉक्टरों के गिरोह ने एक मजदूर की किडनी चुरा ली है। संयोग ही है कि जिस दिन नवीन को किडनी लगाई गई थी उसी के एक दिन पहले मजदूर की किडनी चोरी हुयी थी और दोनों का ब्लड-ग्रुप भी एक ही है। नवीन को शक होता है कि कहीं वही किडनी उसे नहीं लगाई गई है। यहाँ से नवीन एक नई पहचानगत यात्रा पर निकलता है। शंका का समाधान जल्द ही हो जाता है और पता चलता है कि मजदूर की किडनी स्टॉकहोम, स्वीडन के एक अमीर आदमी को लगाई गई है। नवीन उस आदमी से मिलने स्टॉकहोम जाता है। इन सारे प्रयासों का लब्बोलुआब यह निकला कि रोता हुआ हारा-पीटा मजदूर फिर से हरा हो जाता है। यहाँ फिर वही सवाल कि स्टॉक-ब्रोकर से कार्यकर्ता बनने की इस यात्रा में नवीन ने जो-जो पहचान पाया उनके बीच में क्या संबंध है? कौन सी पहचान नवीन की सम्पूर्ण पहचान है? संकुचित और अनैतिक संसार के निवासी नवीन का यह कायाकल्प भी एक विरोधाभासी गुत्थी ही है।

तात्कालिक स्फुट विचार 1शिप ऑफ थीसियस एक ऐसी फिल्म है जिसने बॉलीवुड में विद्यमान ‘छवि-समृद्धि के स्टीरियोटाइप’ को तोड़ा है। इस लिहाज से भी यह कुछ अपवाद फिल्मों की श्रेणी में आती है। फिल्म ‘छवि-समृद्धि’ के सबसे आसान तरीके मसलन ‘स्मोक, पिस्टल और सेक्स’ से एक सचेत दूरी बनाती है। यह दूरी और कुछ नहीं बल्कि छवि-अंकन में निष्णात आनंद की एक सचेत रचनात्मक जिम्मेवारी को दिखाता है। जहां आप ‘प्रचलित जनाभिरुचियों’ को सहलाते नहीं हैं बल्कि आप उसे संशोधित-संवर्द्धित और संश्लिष्ट करते हैं। जिसके बाद आपको यह कहने की जरूरत नहीं पड़ती है कि धूम्रपान करने से कर्क रोग होता है या संभोग करने से एड्स होता है।

तात्कालिक स्फुट विचार 2– कला में विचार(Idea) को विचार के रूप में चित्रित करना खतरे से खाली नहीं है। दर्शन का क्षेत्र पहले से ही इसके लिए सुरक्षित है। कला-सिनेमा-साहित्य में विचार को शब्दों-रंगों से रंगना तब-तक सार्थक नहीं कहा जायेगा, जब-तक उसका एक सामाजिक परिप्रेक्ष्य स्पष्ट न हो। आनंद गांधी की फिल्म शिप ऑफ थीसियस  के सन्दर्भ में जो नया विवाद पैदा हुआ है, उसकी समस्या की जड़ मुझे यहीं दिखती है। राइट हियर राइट नाउ, कंटिन्युअम और शिप ऑफ थीसियस देखने के बाद यह कहा जा सकता है कि आनंद का मानना है कि जगत में जो कुछ भी घटता है उसका कोई न कोई लिंक पूरे समाज के साथ जुड़ा होता है और इसी में एक तार्किक सामाजिक सार्थकता भी निहित होती है। यह मान लेने के बाद सम्बद्धता-प्रतिबद्धता का सवाल गौण हो जाता है। मतलब आज हमारा जीना सिर्फ एक विचार का घटित होना भर है। आनंद को इस आइडिया वाले गेम से बाहर निकलना होगा। भरे-पूरे समाज को चित्रित करने के क्रम में घटिया विचार भी परिष्कृत हो जाता है। यह चिंता इसलिए है कि बॉलीवुड में बहुत दिन बाद कोई ‘क्राफ्ट्स मैन’/हुनरमंद निदेशक दिखा है, जरुरत है कि आर्टिस्ट के दर्जे तक कैसे पहुंचा जाये।

1.

किसी फिल्म को लोगों की दृष्टि से बचा ले जाना हो तो उसे आर्ट फिल्म का दर्जा दे दो। शिप ऑफ थीसियस  के संदर्भ में शुरू में ही यह प्रयास दिखा, लेकिन यह सफल होता हुआ नहीं दिख रहा है। क्या आर्ट फिल्म कोई स्पष्ट-परिभाषित पद है? यह अतिप्रचलित पद पता नहीं कब, कैसे और किन फिल्मों के लिए स्थिर हो गया, समझ के परे है। अमेरिका-इंग्लैंड की तर्ज पर यह बॉलीवुड में भी घुस गया। जहां फिल्म-निर्माण एक उद्योग के बतौर स्थापित हुआ, फिल्में सार्वजनिक उपभोग (Mass Consumption) के लिए माल में तब्दील हुयीं। यूरोप में आर्ट फिल्म जैसे पद का प्रचलन नहीं है। क्या इसमें कुछ संकेत छुपे हो सकते हैं? अगर इसे थोड़ा स्पष्ट किया जाय तो ऐसे कहा जा सकता है कि दो तरह की फिल्में होती हैं। एक कंपनी (Producent) की फिल्में होती हैं, दूसरी रचयिता/निर्देशक (Author/Director) की फिल्में होती हैं। दुनिया भर की तमाम क्लासिक फिल्में रचयिता/निर्देशक की फिल्में हैं। शिप ऑफ थीसियस रचयिता/निर्देशक की फिल्म है। किसी कंपनी के हितों को ध्यान में रख कर बनाई गई ‘कमर्शियल फिल्म’ नहीं है। बॉलीवुड और हॉलीवुड में फिल्म को एक कला-माध्यम के रूप में सिर्फ तकनीक और पैसे के संदर्भ में ही देखा-समझा गया है। जिस कला-माध्यम की शुरुआत मैन विद द मूवी कैमरा से हुयी हो, वह कैसे हॉलीवुड और बॉलीवुड में मैन विद द वुमेन, वायलेन्स, स्मोक, सेक्स, पैसा एंड 3डी ग्लासेस हो गया! मैन विद द मूवी कैमरा की परंपरा वाली फिल्मों ने अपनी एक भाषा विकसित की है- दृश्य भाषा (Visual language)। यह भाषा यथार्थ के विवरणों को पकड़ने में बड़ी सहायक हुयी है। फिल्म जैसे दृश्य कला-माध्यम की सबसे बड़ी भूमिका अभी तक कुछ रही है तो वह है यथार्थ के विवरणों को उसकी सम्पूर्ण नग्नता और सुंदरता के साथ सामने ले आना। बेला तार जैसा प्रसिद्ध निर्देशक इसीलिए जाना जाता है। वातावरण की एक-एक हरकत को पकड़ने के लिए वह बहुत समय लेता है, पत्तियाँ अगर टूट कर जमीन पर गिरती हैं तो  हवा चलने के बाद वह फिर से उड़ती भी हैं और इस क्रिया को कैद करने में जितना भी समय लगता है, बेला तार वह समय लेता है। लॉन्ग शॉट/वाइड एंगल के संदर्भ में कैमेरे पर उसकी ऐसी पकड़ दिखती है, मानो एडिटर को बहुत मगज़मारी नहीं करनी पड़ी होगी। कहानी सुनने के आदि हम बॉलीवुड के भावक को यह सब कुछ अजीब लगता है। बेला तार/तारकोव्स्की जैसे निर्देशकों की फिल्मों में वातावरण के विवरणों वाला यथार्थ जैसे ही पर्दे पर दिखता है तो मानो यथार्थ मूर्तिमान हो उठता है और लगता है कि यथार्थ से ज्यादा सुंदर, उदास, हिंसक कुछ हो ही नहीं सकता है। यह वातावरण, जिसमें एक साथ बहुत चीजें घटित हो रही हैं, की बारीकियों को सम्पूर्णता में पकड़ने की कोशिश करना यही एहसास दिलाता है कि दृश्य-श्रव्य कला का इससे बड़ा उत्स कुछ और नहीं हो सकता है और जिसने भी इसे संपूर्णता में पकड़ने की कोशिश की है वह बड़ा कलाकार हुआ है, और साथ ही साथ उस वातावरण में उपस्थित चरित्र (अभिनेता/अभिनेत्री), जो कि लंबे समय तक के लिए सहजता की मांग करता है, की सार्थकता उसके अभिनय-सामर्थ्य से तय होती है। (यह स्थिति प्रयोग-सिनेमा(मणि कौल) के उस प्रस्तावना के विरोध में ठहरती है जहां अभिनय-कौशल को एक बाहरी गुण मानने का आग्रह था।) अकारण नहीं है कि फिल्म-कला के इस पक्ष ने साहित्य को, खासकर कथा-लेखन(Fiction Writing) को ‘बुरी’ तरह प्रभावित किया है। दूर से उदाहरण लेने से अच्छा है कि अपने निर्मल वर्मा को ही देख लिया जाय। उनकी कथा-शैली ऐसी फिल्मों से प्रभावित लगती है। जब वे इस तरह लिखते हैं -‘वह पतझड़ की एक शाम थी। पेड़ों से पत्तियाँ नदारद थीं। आँखों के सामने से कुछ पीली और बहुत सारी सूखी पत्तियाँ उड़ती हुयी चली जाती थीं। पत्तियों की खड़-खड़ से अचानक उसका आत्मचेता मन सचेत होता है और वह सामने से आती हुयी दिखती है।’ शायद असद जैदी ने तो कहीं लिख भी दिया है कि निर्मल वर्मा को पढ़ना ऐसा लगता है मानो आप किसी खराब फिल्म की पटकथा पढ़ रहे हों। क्योंकि यह शैली पर्दे पर ही साक्षात होती है। कथा-लेखन पर इसका असर कितना सही है या कितना गलत है यह बहस का एक अलग विषय हो सकता है। ठीक इसके उलट बॉलीवुड/हॉलीवुड की फिल्मों को कथा-साहित्य ने (पल्प फिक्शन) ने बहुत ही प्रभावित किया है। इस प्रभाव के कारण हम सिनेमा जैसे दृश्य-कला को भी साहित्य के मानदंडों पर ही तौलते रहे हैं और कथानक की बारीकियों को टटोलने में ही अपनी समीक्षक-बुद्धि की इतिश्री समझते रहे हैं। और जहाँ फिल्मों ने कहानियों को प्रभावित किया, वहाँ हम ‘कथानक का ह्रास’ टाइप जुमले फेंक कर उसके विश्लेषण में खुद को न्योछावर करते रहे हैं। शिप ऑफ थीसियस एक ऐसी फिल्म के रूप में हमारे समक्ष चुनौती पेश करती है, जहां से कथा-शिल्प और फिल्म-शिल्प की बहस की शुरुआत हो सकती है। कहानी-कथा के भाषा-शिल्प में बनी फिल्मों की भीड़ में शिप ऑफ थीसियस सिनेमा की भाषा/शैली में तीन कहानियाँ कहती है।

2.

शिप ऑफ थीसियस के अतिप्रचार को भी लोग मुद्दा बना रहे हैं और इसका कारण किरण राव-अमीर खान के समर्थन को बता रहे हैं। यह बात सही है कि किरण राव ने इस फिल्म को एक बड़े प्लेटफॉर्म पर आने का मौका दिया है। लेकिन फिल्म के साथ किरण राव का यह जुड़ाव फिल्म के बन जाने और फिल्मोत्सवों में चर्चा हो जाने के बाद का जुड़ाव है। मैं खुद इस फिल्म की चर्चा कमल स्वरूप जैसे फिल्म निर्देशक से 2 साल पहले से सुनता आ रहा हूँ। कहने का मतलब यह कि किरण राव का इस फिल्म से कोई रचनात्मक जुड़ाव नहीं है। आनंद गांधी का कितना नाम हो रहा है, इससे पहले यह भी देख लेना चाहिए कि एक अच्छी फिल्म से जुड़ने के कारण किरण राव का भी नाम हो रहा है कि नहीं! यहाँ सारे जुड़ाव का मूल स्रोत है शिप ऑफ थीसियस । अगर किरण राव में इतनी क्षमता है कि वे किसी फिल्म को अतिप्रचारित (बौद्धिक खेमों में) करवा सकती हैं, तब तो धोबी घाट को भी वही परिणाम मिलना चाहिए था जो शिप ऑफ थीसियस को मिल रहा है!!

शिप ऑफ थीसियस को सिनेमाघर में लगे अभी एक सप्ताह हुये ही थे कि उसकी पहली कहानी पर आइडिया को चोरी करने का आरोप लगने लगा। पहली कहानी को रंग से महरूम (Bereft Of Colours) नामक एक डिप्लोमा शॉर्ट फिल्म से प्रेरित बताया गया। आनंद इस आरोप को सिरे से नकारते हैं। मैंने भी इस डिप्लोमा फिल्म को देखा और पाया कि पहली कहानी और डिप्लोमा फिल्म में विचार के शुरुआती स्तर पर कुछ समानताएँ हैं। लेकिन दोनों फिल्मों के निष्कर्ष अलग-अलग हैं। अगर विचार की समानता को किनारे रख दें तो इसमें किसी को शक नहीं है कि आनंद की फिल्म डिप्लोमा फिल्म की तुलना में ज्यादा सुंदर/समृद्ध, यथार्थवादी और आगे बढ़ा हुआ कदम है। जैसे पिकासो का वह महत्वपूर्ण चित्र जिसे हम कोरिया में जनसंहार (Massacre in Korea) नाम से जानते हैं, साथ ही साथ लोग यह भी जानते हैं कि यह चित्र फ्रांसिस्को डि गोया  के चित्र तीन मई, 1808 (1814) से प्रभावित है। पूरा का पूरा कम्पोजीशन फ्रांसिस्को डि गोया से उठाया गया है लेकिन पिकासो ने उस फ्रेम को/ कम्पोजीशन को एकदम से एक तीव्रता के साथ समकालीन बना दिया। आनंद गांधी अगर अनजाने में भी उस डिप्लोमा से कुछ लिए होंगे तो भी शिप ऑफ थीसियस की पहली कहानी की कोई भी तुलना (समानधर्मा के सेंस में) डिप्लोमा फिल्म से संभव नहीं है; क्योंकि दोनों फिल्म की अंतश्चेतना में एक तरह का विलगाव है। घटना-स्तर की समानता को ही अगर हम कला में चोरी का मामला बनाते हैं तो परंपरा में संवर्द्धन की गुंजाइश वाली स्थिति से छुटकारा पा लेना होगा। तुर्गनेव ने कहा था कि हमलोग (कहानी लेखक) गोगोल के ओवरकोट से निकले हैं। तुर्गनेव के कहने का साफ संकेत था कि हमारी कहानियों में गोगोल की परंपरा जगमगाती है। परंपरा का एक-एक पड़ाव कलाकृति में दीपदिपाता है और यह सब इसलिए भी होता है कि हर कलाकृति अपने आदिम-रूपों को पाने के लिए लालायित रहती है। इन मानकों के आस-पास जो भी कृति अपनी जगह बनाने में सफल होती है उन्हें हम क्लासिक का दर्जा देते हैं। ऐसी फिल्मों को हम लेखक-निर्देशक की फिल्में कहकर कंपनियों की फिल्मों से अलगाते हैं। किसी भी अच्छी फिल्म/क्लासिक फिल्म की जब हम चर्चा करते हैं तो सुधी समीक्षक सबसे पहले उसमें उसी परंपरा की खोज करते हैं। परंपरा से लेते हुये क्या तोड़ा, क्या जोड़ा, या और कुछ नहीं तो परंपरा का निर्वहन ही किया कि नहीं! इस निर्वहन पर भी लोग आरोप लगा सकते हैं कि निर्देशक ने कहाँ-कहाँ से माल टीपा है। अगर, मैं संवेदनशीलता के तकाजे को भूल जाऊँ तो कह ही सकता हूँ कि शिप ऑफ थीसियस वातावरण के नैराश्य को चित्रित करने के लिए तारकोव्स्की के कैमेरे का इस्तेमाल करता है। दो या तीन जगह आपको साफ-साफ दिखेगा कि दृश्य तारकोव्स्की की फिल्म स्टॉकर (1979) से प्रभावित हैं और मिरर (1975) का वह प्रसिद्ध धान का खेत भी यहाँ मौजूद है। शहरी संरचना को एक सांस्कृतिक बिम्ब के रूप में चित्रित करते समय आनंद गांधी के यहाँ क्रिस्टोफ़ किसलोवस्की भी मौजूद हैं। इसी तरह एक धार्मिक/आध्यात्मिक व्यक्तित्व की दुनिया या उसकी ऊंचाई को दिखाता हुआ अलेखान्द्रो जोदोरोवस्की के होली माउंटेन का रेड टावर भी एक जगह दिखता है। बेला तार भी अपने लॉन्ग शॉट और वाइड एंगल के साथ हैं। आर्टिस्ट (2011) का भी स्पर्श दिख सकता है, पहली कहानी में इस स्पर्श को लोग अनुभव कर सकते हैं। आर्टिस्ट में लोग गूंगे थे, इसलिए इशारों में बात करते थे। तकनीकी साधनों के विकास/आविष्कार ने जब लोगों को जुबान और कान दे दी तो मुख्य पात्र ने जीना स्थगित कर दिया क्योंकि बाकी लोग कहने-सुनने के अभ्यास में व्यस्त हो गए। मुख्य पात्र इस नए आविष्कार के साथ सहज नहीं हो पा रहा था और खुद को समाप्त कर देना ही बेहतर समझा। और विजय आनंद की गाइड(1965) तो है ही। हालांकि, आनंद गांधी का कहना है कि उन्होंने गाइड नहीं देखी है और इसे नहीं मानने का कोई कारण नहीं है। परंपरा का अनुभव/असर कोई प्रत्यक्ष क्रिया नहीं है। फिल्म-निर्माण की प्रक्रिया में यह अनुभव एक सामूहिक अनुभव हो जाता है, जिसके अंत में यह निर्दिष्ट करना भी संभव नहीं होता कि कौन सा असर कहाँ से आया है और यह तब तक चलेगा जब तक वह एक सामूहिक रचना-कर्म बना रहेगा। इन तमाम प्रभावों को उस यात्रा की तरह ही मानता हूँ जहां हर कला-कृति अपने आदिम रूप को पाना चाहती है।उस आदिम रूप को पाने के लिए उसकी एक यात्रा पीछे की तरफ होती है, जिसमें परंपरा के महत्वपूर्ण पड़ाव जगमगाते से दिखते हैं।

यह असर फिल्म का असर नहीं होकर परंपरा का असर है और गाइड का असर साफ-साफ दिखता है। मसलन जब मैत्रेय का एक साथी साधु कहता है –“और आपके गुरु जी बोस्टन में हैं। वो भी हमारे सप्रिय मैत्रेय की तरह साधु कम और शास्त्री ज्यादा हैं। चलो अँग्रेजी बोलने का कुछ तो फायदा हुआ।” याद करें, गाइड का वह दृश्य जहां साधु-पंडित बने राजू और परंपरागत पंडित-पुजारियों के बीच शास्त्रार्थ होता है। परंपरागत पंडित-पुरोहितों द्वारा संस्कृत में पूछे गए सवाल से राजू अवाक रह जाता है, तब पुरोहित लोग उसका मज़ाक उड़ाते हैं कि ‘संस्कृत आती हो तब न’। इसके बाद राजू उनसे अँग्रेजी में सवाल करता है, तो पंडित-पुरोहित अवाक हो जाते हैं, फिर राजू उनका मज़ाक उड़ता है- ‘अँग्रेजी आती हो तब न!!’  दूसरा दृश्य, अन्न-त्याग के बाद जब राजू मरणासन्न है जहां लोगों का मेला लगा हुआ है। अन्न-त्याग के बाद मरणासन्न स्थिति में पहुँचे मैत्रेय के आस-पास वही दृश्य अपने लघु-रूप में मौजूद है। लेकिन इन सब प्रभावों के बावजूद शिप ऑफ थीसियस  आनंद गांधी की फिल्म है, एक निर्देशक-लेखक की फिल्म है क्योंकि अपने निष्कर्षों में यह गाइड से अलग है और यह निष्कर्ष ही आनंद का वैचारिक प्रस्थान है। गाइड में दया-दर्शन का पात्र बना राजू मर जाता है क्योंकि उसे एक विश्वास/आस्था को कायम रखवाना था इसे वह नैतिक जिम्मेवारी की तरह ढोता है लोगों के अंदर से यह आस्था भी अगर खत्म हो जाएगी तो उनकी मानवीय जिजीविषा दम तोड़ देगी। शिप ऑफ थीसियस के मैत्रेय के सत्य-प्रयोग में खुद की जिजीविषा आड़े आ जाती है और जीने का तर्क हावी हो जाता है। भावना पर तर्क की जीत जैसा कुछ। क्योंकि एक जगह मैत्रेय खुद कहता है- “Just cut down the sentimentality a bit. We must address people’s reason more.”

3.

फिल्म-आलोचना, साहित्य-आलोचना एक तरह की संवेदना की मांग करती है। 1980 में जन्मे आनंद गांधी 19 साल की उम्र से ही फिल्मों-धारावाहिकों के लिए लिख रहे हैं। 14 साल की उम्र से ही संस्थागत ज्ञान-अध्ययन क्षेत्र को अलविदा कहकर स्वाध्याय और गुणी-ज्ञानी के संगत में चले जाते हैं। हिन्दुस्तानी-परंपरा के दार्शनिक सवालों से लेकर पश्चिम तक के दार्शनिक गुत्थियों से जूझते रहे हैं, और यह दार्शनिक गुत्थी अपने ‘बालकोचित प्रयासों’ के साथ उनकी सारी फिल्मों में मौजूद रही है। 32 साल की उम्र में शायद ही किसी भारतीय निदेशक ने ऐसा नाम कमाया हो, जैसा आनंद गांधी ने शिप ऑफ थीसियस को बनाते ही हासिल किया है। शिप ऑफ थीसियस को देखते हुये इतना जरूर महसूस होता है कि यह कला के उस दायरे फिल्म है जहां बालकोचित जिज्ञासा सी सरलता और ‘अबोधता’ एक प्राथमिक मांग होती है और आनंद गांधी उस मांग को पूरा करते हैं। आनंद अपने वक्तव्यों में जितने ज्ञानी-मुनि ध्वनित होते हैं, शिप ऑफ थीसियस  में उतने ही मासूम दिखते हैं। उन्हें यह भलीभाँति पता है कि उनकी कहानियों का उत्स कुछ दार्शनिक सवाल हैं लेकिन वे कह कहानी ही रहे हैं और यही रचनात्मक ईमानदारी उन्हें ग्राह्य बनाता है। नहीं तो, प्रयोग-सिनेमा की तरह सतह से उठते देर नहीं लगता आनंद गांधी को। जहां ‘बौद्धिक-प्रलाप’ कहानी की सतह पर ही बजबजाने लगता है, और टेक्स्ट के मूल स्रोत को भी सशंकित कर देता है। आधुनिक रचना-प्रक्रिया का यह स्वाभाविक क्रम रहा है- विचार<थीम<कहानी। शिप ऑफ थीसियस अगर इसी रचना-प्रक्रिया को उदाहृत करता है तो क्या गलत करता है? यह सवाल जरूर वाजिब है कि जिन दार्शनिक गुत्थियों को वह सुलझाने के लिए कहानियाँ कहता है, क्या वह उन गुत्थियों को या उनकी प्रासंगिकता को सार्थक करता है? और कुछ लोगों का मानना है कि वह सार्थक नहीं करता है। क्या इसी से फिल्म या किसी भी कला-रूप को हम खारिज कर सकते हैं?

4.

अब जरा तीनों कहानियों का जायजा लें जिनसे शिप ऑफ थीसियस बनता है या शिप ऑफ थीसियस नामक विरोधाभासी गुत्थी को बखानने के क्रम में जो तीन कहानियाँ कही गई हैं। इस पर थोड़ा सोचने की गुंजाइश श्रद्धेय आलोचक पुरुषोत्तम अग्रवाल ने पैदा कर दी है,  फिल्म देखने के तत्काल बाद फ़ेसबुक के अपने वाल पर उन्होंने प्रतिक्रिया दी “…the film makes a case for organ donation, a very noble thing to do in itself….” क्या सचमुच फिल्म सिर्फ यही कहती है? मुझे लगता है यह स्थितियों के सरलीकरण के अलावा और कुछ नहीं है। तीनों कहानियों में अंगदान के अलावा भी कुछ शानदार चीजें साझा हैं। अंगदान कितना भी महान हो लेकिन वह सिर्फ घटना है। इन तीनों कहानियों में मुझे जो शानदार लगी और साथ ही साथ जो तीनों कहानियों में साझा की गई है, उसका संबंध एक विचार से भी है। वह विचार यह है कि मानसिक रूप से हम अपने समाज के हिस्से नहीं हैं। ऐसे में हमारा अस्तित्व हमेशा दूसरे के मुक़ाबले तय होता है या पहचान पाता है। उस दूसरे से, जिससे हम सार्थक होना चाहते हैं, भौतिक रूप से एक अन्यता (otherness) का संबंध होता है। यही अन्यता मानसिक रूप से अपने समाज-वर्ग-जाति-लिंग-पेशा आदि के संबंध में द्रष्टव्य होता है। भौतिक और मानसिक अन्यता का यह भाव और स्थिति परस्थितियों को विडंबनात्मक बनाती है, जिससे कहानी में contrast पैदा होता है। पहली कहानी की नेत्रहीन फॉटोग्राफर आलिया के संसार में न तो कोई दूसरा फोटोग्राफर है और न ही कोई नेत्रहीन। वह अक्सर आँख वालों की दुनिया से प्रशंसित होती है, एक गैर पेशेवर दुनिया की ओर मुखातिब रहती है। इस भौतिक अन्यता को वह मानसिक अन्यता में भी बरकरार रखना चाहती है। अपने पुरुष दोस्त से उसकी हर तकरार इसी ओर इशारा करती है। जैसे ही आँख वाली दुनिया में वह आँख के साथ शामिल होती है उसकी भौतिक अन्यता समाप्त हो जाती है और यही उसके लिए बेचैनी का सबब है।

जिस सांसारिक मोह-माया से उबरने के लिए मैत्रेय के मंडली के लोगों ने भिक्षुक होना स्वीकार किया, मैत्रेय को छोड़कर सभी लोग वापस उसी माया-मोह में फँसते दिखते हैं। लोग ज्यादा खाने के कारण या ज्यादा खाने के लिए दवाइयाँ खाते हैं। भक्तजनों से ज्यादा सेवा-भाव के लोलुप दिखते हैं। इन तमाम प्रयासों के बावजूद उनके लिए एक सात्विक भाव लिए कोई भक्तमंडली नहीं दिखती है, दिखती भी है तो कुछ ‘घरेलू महिलाओं’ की एक भीड़। मैत्रेय इन साधुओं से एकदम अलग दिखता है। बिना किसी आग्रह-भाव के इनके आस-पास पढ़े-लिखे संभ्रांत से दिखते भक्तों की एक जमात है। जिसमें युवा भी हैं और बुड्ढे भी। डॉक्टर हैं तो वकील भी हैं। यही संभ्रांत सांसारिक तबका उनकी बातों को तवज्जो देता है। पढ़ने लिखने की सामाग्री मुहैया करता है। यहाँ भी दिखता है कि मैत्रेय अपने साधु-जमात से मानसिक रूप से असंपृक्त है, लेकिन भौतिक रूप से उसी समाज का हिस्सा है। इस मानसिक असंपृक्ति को वह संभ्रांत सांसारिक भक्तों के बीच घुलाना चाहता है। यहाँ वह एक तरह का मानसिक लगाव अनुभव करता है। लेकिन इस तरह का मानसिक लगाव कुछ बलिदान भी मांगता है, इसी वेदी पर गाइड के राजू जी को अपनी बलि देनी पड़ी थी।

और अंत में, तीसरी कहानी का नवीन, एक स्टॉक ब्रोकर, शेयर बाज़ार का दलाल, पैसों का लालची। नानी के बहाने समाजसेवियों की जमात में गिर पड़ा है। इस कहानी में आप कह सकते हैं कि नवीन की स्थिति अन्य कहानियों की तुलना में स्वाभाविक नहीं है बल्कि परिस्थितिजन्य है। नवीन के भीतर होने वाले बदलाव को हम देख सकते हैं। यहाँ भी शेयर बाज़ार वाले उसके  संगी-साथी या उनका भरा-पूरा समाज नहीं दिखता है। नवीन के भीतर हुये बदलाव और नानी की संगत ने पहले से विद्यमान मानसिक अन्यता को तीव्रता प्रदान कर दी है। इस तीव्रता के कारण वह मानसिक रूप से अब नानी से संपृक्त महसूस करने लगा है। इस कहानी में पूर्व की दोनों कहानियों की निरंतरता के तत्व की तुलना में विलोम-तत्व(antithesis) ज्यादा प्रभावशाली हैं, ऐसा मुझे लगता है। शुरुआती दोनों कहानियों के पात्रों का यात्रा-क्रम अभावात्मक हैं। भौतिक अभाव पर जीत रचनात्मक और नैतिक अभाव का कारण बनता है। भौतिक अभाव से रचनात्मक और नैतिक अभाव की यात्रा। दूसरे तरीके से कहें तो रचनात्मक-नैतिक समृद्धि से ‘रचनात्मक-नैतिक ह्रास’ की यात्रा। आलिया और मैत्रेय की यात्रा एक ही मायने में सार्थक है कि वे शारीरिक (भौतिक) पूर्णता को पाते हैं, लेकिन यह उनका सम्पूर्ण व्यक्तित्व नहीं बनाता है। नवीन की यात्रा में अभावात्मक स्थिति जैसा कुछ नहीं है। वह एक साथ शारीरिक-सामाजिक-सांस्कृतिक सभी तरह की समृद्धि की ओर अग्रसर है। तीसरी कहानी में सामाजिक परिप्रेक्ष्य का दायरा अन्य दोनों कहानियों के बनिस्पत ज्यादा बड़ा और स्पष्ट है। घटनाओं के जमघट वाला भरा-पूरा संसार और यही वह कारण है कि यह कहानी पूर्व की दोनों कहानियों का विलोम सा लगता है; लेकिन ऐसा भी नहीं है कि यह कहानी कोई निरंतरता भंग करती है क्योंकि तीनों में परिवर्तन, परिवर्तन का परिणाम और परिवर्तन के कारण जैसे सवाल कहीं न कहीं विरोधवासी स्थितियों में डालता है।

5.

फिल्म की तीनों कहानियों को जोड़ने वाला भौतिक सूत्र वह आदमी है जिसने आठ लोगों को जीवन-प्रदान किया है। उसी एक आदमी के आँख, लिवर और किडनी क्रमशः आलिया, मैत्रेय और नवीन को लगाया गया है। इस बिना पर भी यह सिर्फ अंगदान की कहानी नहीं रह जाएगी? क्योंकि यहाँ भी एक विरोधाभास खड़ा होता है कि उस आदमी के अंग, जो अन्य आठ लोगों को लगाया गया है, अन्य लाभार्थियों में लग कर क्या अपने पुराने पहचान से पृथक हो गए हैं या उन्हें नया पहचान मिल गया है? यहाँ भी एक विरोधाभास है। अगर इस फिल्म को सिर्फ अंगदान की कहानी होना होता तो कम से कम उसे पाँच और कहानियाँ कहनी पड़ती। उस महादानी की भी एक कहानी है जो स्वयं फिल्म में साक्षात नहीं है, वैसे ही जैसे फिल्म का निर्देशक भी साक्षात नहीं होता है। वह एक अंधेरे खोह में, जो कभी-कभी बीहड़ का भी आभास दिलाता है, हेडटॉर्च लिए कुछ खोज रहा है। यह खोह या गुफा प्लेटो के के गुफा जैसा भी नहीं है। जहां लोगों का एक समूह है। समूह जंजीर से (अमिताभ वाला जंजीर भी हो सकता है) बंधा है। उन्हें पीछे देखने की इजाज़त नहीं है जबकि प्रकाश-स्रोत उनके पीछे ही है लेकिन वे उसे देख नहीं पा रहे हैं। वे प्रकाश के उद्गम से अंजान अपनी छायाओं को दीवाल पर देखते हैं और उन्हें ही यथार्थ समझ बैठे हैं। इस खोह में वह दानी व्यक्ति अकेला है प्रकाश-स्रोत को खुद ललाट में बांध रखा है और अपनी छाया को साथ लिए आगे बढ़ता जा रहा है। उसने क्या अनुभूत किया यह बताने के लिए वह हमारे बीच नहीं है, लेकिन उसके हाथ में एक कैमरा था और वह अपनी गति-दिशा और गंतव्य के रास्ते को रिकॉर्ड करता जा रहा था। उसने गंतव्य को पाया कि नहीं यह भी हमें मालूम नहीं है। हम सिर्फ उस ‘लक्ष्य’ को पाने की प्रक्रिया से वाकिफ हैं और वह प्रक्रिया इतनी समृद्ध है कि हम उस अधूरी यात्रा को भी उसकी  सचेत और गंभीर संलग्नता के बतौर संज्ञान में लेने को तत्पर हैं। हर ‘सफल यात्रा’ कुछ संज्ञाएँ देकर समाप्त हो जाती है, फिर संज्ञाओं की यात्रा शुरू होती है, मसलन कुछ आविष्कार, कुछ दवाइयाँ, कुछ स्थान और कुछ ‘ज्ञान’ भी। और, हर असफल यात्रा बहुत सारी कहानियाँ देकर हमें भी खुद में साझा कर लेती है, वह हमारे भावनात्मक संसार में एक थाती बनकर बस जाती है। हम सारी कहानियों को समेटने में सफल नहीं हो सकते हैं, क्योंकि वे हमारी क्षमताओं और उम्र के पार होती हैं। बहुत सारी कहानियाँ ऐसी भी होती हैं जो अनकही रह जाती हैं। किसी एक फिल्म में उन सारी कहानियों को समेटना संभव भी नहीं था। शिप ऑफ थीसियस उन्हीं कहानियों में से तीन कहानी को हमारे सामने लाती है और बॉलीवुडीय सिने-अनुभव में एक थाती के रूप में सँजोये जाने वाली फिल्म के रूप में स्थिर/सुरक्षित हो जाती है। कहीं इस फिल्म की एक समीक्षा पढ़ रहा था जिसमें समीक्षक ने यह इच्छा जाहिर की थी कि वह फिल्म के हिन्दी subtitle के लिए खुद को बिना पारिश्रमिक प्रस्तुत करना चाहता है ताकि वह अपनी माँ को यह फिल्म दिखा सके। मेरी माँ न हिन्दी जानती है और न ही अँग्रेजी फिर भी मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि किसी भी बॉलीवुडीय फिल्म से ज्यादा बढ़िया तरीके से वह इस फिल्म को समझ सकती है। क्योंकि, इसकी एक यात्रा पीछे की ओर भी है। जहां वह फिल्म-कला के आदिम रूप को पाने की कोशिश करती है। शिप ऑफ थीसियस की इस यात्रा से उड़ने वाले धूल-कण से निकलने वाली कौंध ने लोगों को कम से कम एक बार आँख मींचने के लिए मजबूर तो कर ही दिया है। दूसरी तरह कहना हो तो जैसे कुमार गंधर्व का कोई गीत आईपॉड में लगाकर उसका ईयरफोन ‘फिल्मी गाने’ के किसी श्रोता के कान में चुपके से ठूंस दिया गया हो।

इति

(इस समीक्षा को लिखवा लिए जाने के लिए अपने अन्यतम मित्र संजय सहाय जी का आभारी हूँ…मित्र रवीश चौधरी से हुयी बात-चीत से बहुत कुछ हासिल किया हूँ और इस लेख में भी बहुलांश इस्तेमाल करने की कोशिश किया हूँ, रवीश जी का भी आभार। )
 उदय शंकर

उदय शंकर

जेएनयू से पीएचडी के लिए शोधरत। तीन खंडों में आलोचक सुरेंद्र चौधरी के रचना संचयन का संपादन। सांस्‍कृतिक आंदोलनों से जुड़ाव। उनसे udayshankar151@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

समाज के हाशिए का सिनेमाई हाशिया: तत्याना षुर्लेई


 सिनेमा के सौ साल के इतिहास में  दलितों  के बारे में ज़्यादा फ़िल्में नहीं हैं। शुरू में ऐसा लगा कि गाँधी जी और उनके तरह के दुसरे सुधारकों की मदद से यह विषय लोकप्रिय होगा लेकिन जल्दी ही ऐसी फ़िल्में मुख्यधारा के विषय से बाहर चली गयीं। क्या भारतीय दर्शक ऐसी फ़िल्मों के लिए तैयार नहीं हैं? मुझे लगता है कि आधुनिक सिनेमा में सब कुछ दिखाया जाता है इसलिए इस विषय से इतना डर ज़्यादा अजीब लगता है। जब हम बॉलीवुड फ़िल्मों की संख्या के बारे में सोचेंगे तो यह देखेंगे कि दलित न सिर्फ़ जाति के वरीयता-क्रम से बाहर हैं बल्कि सिनेमा से भी बाहर हैं। 100 करोड़ से उपर की जनसंख्या वाले देश के सिनेमा में बहुजन-जीवन के स्वाभाविक-चित्रण का अभाव चिंताजनक है और इसका एक बड़ा कारण संभवतः यह है कि बहुजनों का बड़ा हिस्सा अभी भी सिनेमा के उपभोक्ता समुदाय में तब्दील नहीं हुआ है। यह तब तक नहीं बदलेगा जब तक उनकी परिस्थितियों को स्वभाविक तरीके से नहीं दिखाया जाएगा। अगर हम दलित-समस्या पर ही केन्द्रित रहेंगे और सिर्फ़ सुधार के आग्रही के बतौर ही दलितों का चित्रण करेंगे तो वे कभी समाज के स्वाभाविक हिस्से की तरह कभी नहीं दिखेंगे।

अछूत कन्या

अछूत कन्या

समाज के हाशिए का सिनेमाई हाशिया

भारतीय व्यावसायीक फ़िल्मों में दलितों की अनुपस्थिति।

BY तत्याना षुर्लेई

एक पुरानी कहानी है – थाइलैंड में रहनेवाली एक राजकुमारी एक बड़ी नदी में जहाज पर यात्रा करती थी। नदी के किनारे खड़ी भीड़ तालियां बजाकर राजकुमारी और उसके साथ जाने वाले नौकरों का स्वागत करती थी। यह सब देखकर राजकुमारी अतिउत्साह में भीड़ की ओर कुछ ज्यादा ही झुक जाती है और जहाज़ से बाहर गिरकर पानी में डूब जाती है। जहाज़ और किनारे पर खड़े लोगों में से किसी ने उसकी मदद नहीं की। ऐसा क्यों हुआ? इन सारे लोगों में से किसी ने उसकी मदद क्यों नहीं की? राजकुमारी उस जहाज़ में बहुत सारे नौकरों के साथ यात्रा करती थी। उन नौकरों और किनारे पर खड़े लोगों से कोई न कोई तो मछुआरा ज़रूर रहा होगा जिसको अच्छी तरह तैरना भी आता होगा। इसका जवाब बहुत आसान है – राजकुमारी दुसरे लोगों से इतनी ऊपर थी कि किसी को उसको छूना मना था[1]।

अस्पृश्यता के अलग अलग प्रकार होते हैं।  Brian De Palma की फ़िल्म के द्वारा चर्चित ‘अस्पृश्यता’ के अलावा एक और का ज़िक्र करना चाहिए क्योंकि इसके बारे में सब लोगों को पता है। दूसरा मामला भारत से संबंधित है जहाँ एक दुसरे से छू जाना भयावह माना जाता है। दोनों में डर बराबर है मगर आधार अलग। देवी बनी हुई राजकुमारी या खतरनाक माफ़िया से डर और उनकी अस्पृश्यता भारतीय दलितों की अस्पृश्यता से बहुत दूर है।

बहुत सारे सुधारक जो भारत में रहते थे अछूतों की ज़िंदगी को बदलने की कोशिश करते थे लेकिन अजीब बात यह है कि इस काम में उन में से किसी ने फ़िल्म का इस्तेमाल नहीं किया। भारतीय निर्देशकों के लिए भी फ़िल्म अधिप्रचार (PROPAGANDA) के लिए उचित साधन नहीं लगता था। यह भी एक अजीब बात है क्योंकि अधिप्रचार के लिए फ़िल्म सब से अच्छा साधन है। फ़िल्म बनानेवाले लोग समाज सुधारकों के साथ काम नहीं करते थे। इसी प्रकार गाँधी जी जो अछूतों के लिए बहुत काम करना चाहते थे और करते भी थे लेकिन फ़िल्म की मदद से अपने सुधारों के बारे में कुछ नहीं बताते थे। उनके लिए फ़िल्म कभी अच्छी चीज़ नहीं थी और उन्होंने कभी पसंद  भी नहीं किया। उनके लिए फ़िल्में पतनशील पश्चिमी सभ्यता का एक और उदाहरण था या फिर साधारण मनोरंजन का एक छोटा सा साधन जिसका ज़िंदगी में कोई महत्त्व नहीं है। उन्होंने स्वीकार किया कि उन्होंने सिर्फ़ एक फ़िल्म देखी है। यह फ़िल्म 1943 वाली विजय भट्ट की ‘राम राज्य’ थी और शायद इसीलिए उन्होंने कभी नहीं सोचा कि यह मनोरंजन करने वाला, साधारण लोगों का तमाशा अपने पैदाइश से ही वह सब कुछ दिखाता जिसके बारे में वे बताते हैं[2]।

उदाहरण के लिए फ़िल्म की दुनिया में अलग अलग धर्म के लोग साथ साथ रहते हैं और यह बात किसी को कभी अजीब नहीं लगती थी। शुरू से ही ऐसी स्थिति थी कि अक्सर हिंदू धर्म के देवताओं या राजाओं का अभिनय मुसलमान अभिनेता करते थे और मुसलमान के पीरों या सम्राटों का अभिनय हिंदू अभिनेता। यह भी कोई नयी बात नहीं है और न कभी थी कि किसी समय में सब से लोकप्रिय अभिनेता मुसलमान होते हैं और दुसरे समय में हिंदू। ‘तीन खानों’, यानी आमीर खान, शाहरुख़ खान और सलमान खान की लोकप्रियता जो 1990 के दशक में थी, इसका अच्छा उदाहरण हो सकता है। इसी समय में ‘कुछ लोगों’ के लिए ऋतिक रोशन की सम्भावना का हिंदू धर्म से स्पष्ट संबंध था। उन ‘कुछ लोगों’ के लिए ऋतिक तीन खानों से जीतने के लिए आ गया और हिंदू धर्म मुसलमानों से जीतने के लिए[3], लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ऋतिक की लोकप्रियता के अतिरिक्त बाकी तीनों अभिनेता फ़िर भी मशहुर रहे। शाहरुख़ खान के साथ एक ध्यान देने योग्य घटना हुयी जो कि बहुत अच्छा उदहारण है। वह काम करने के बाद बहुत थके होने के कारण एक गाँव के पास गाड़ी में ही सो गया। जब उठा तो उसने गाँववालों की भीड़ देखा। गाँववाले आग्रह कर उसे एक घर में ले गए और वहाँ यज्ञ-वेदी के स्थान पैर  उसने अपनी तस्वीर देखी[4]। एक और ऐसी ही कहानी जिसके बारे में बताना मुझे उचित लगता है अशोक कुमार की है। वह अभिनेता जो विभाजन के बाद अपने स्टुडियो ‘बॉम्बे टाकीज’ में बहुत से मुसलमानों को काम देता था। एक बार वह अपने एक दोस्त के साथ स्टुडियो से घर जा रहा था। रास्ते में मुसलमानों का इलाका पड़ता था, जहाँ एक एक बारत जा रही थी। अशोक के दोस्त को डर लगा की बारत वाले उनके साथ कुछ बुरा बर्ताव करेंगे लेकिन भीड़ के लोगों ने अशोक कुमार को पहचान लिया, उन दोनों को स्वागत किया और उनको सब से अच्छा रास्ता दिखाया। दोस्त आश्चर्यचकित हो गया लेकिन अशोक कुमार ने उसको कहा कि मुझे एक क्षण के लिए भी डर नहीं था क्योंकि कलाकारों की कोई जाति या धर्म नहीं होता है[5]।

स्पष्ट रूप से फिल्मी- दुनिया की स्थिति इतनी अच्छी नहीं थी, जितनी आशोक कुमार के विचार में थी। उदाहरण के लिए देवानन्द धर्म के कारण सुरया से शादी नहीं कर सकता था। सुरया के परिवार ने उसको देव को छोड़ने का हुक्म दिया, क्योंकि देव हिंदु था। कुछ समय बाद सुरया को अफ़सोस हुआ लेकिन फैसला बदलने के लिए देर हो चूका था[6]। इसी तरह जब 1957 में नर्गिस को ‘मदर इंडिया’ में काम मिल गया तो कुछ लोगों को यह अच्छा नहीं लगा। वे नहीं चाहते थे कि देश का प्रतिरूप एक मुसलमान औरत हो[7]। फ़िर भी, हम यह कह सकते हैं कि ये सिर्फ़ छोटे उदाहरण हैं। फ़िल्म की दुनिया में धर्म का उतना महत्त्व नहीं था जैसे मामूली जीवन में।

इन उदाहरणों में हम लोग देख सकते हैं कि फ़िल्म में ‘अनुदारता से लड़ाई और कुछ अलग दुनिया दिखाने की कोशिश’ हमेशा कहानियों की स्तर पर होती थी। फ़िर भी, इसका मतलब यह नहीं है की ऐसी फ़िल्में कभी नहीं बनाई जाती थीं जिनकी कहानियों में अलग-अलग पूर्वाग्रहों से, दुर्गुणों से लड़ाई होती थी (धर्म के क्षेत्र से अलग)! इस तरह हम यह कह सकते हैं कि पहती फ़िल्म जो अस्पृश्यता के बारे में थी जो कि गाँधी जी के सुधार-आन्दोलन से प्रेरित थी Franz Osten की ‘अछूत कन्या’ जो 1936 में बनाई गई। यह फ़िल्म प्रताप नाम के ब्राहमण लड़का और कस्तुरी नाम की अछूत लड़की की एक दारुण प्रेम-कहानी है। कस्तुरी के पिता, जिनका नाम दुखीजा है, एक स्टेशन-मास्टर हैं और प्रताप के पिता की एक दुकान है। दुखीजा ने एक बार प्रताप के पिता की जिन्दगी बचायी और इस घटना से उन दोनों की बहुत अच्छी दोस्ती है। उनका अपने बच्चों की दोस्ती से कोई विरोध नहीं है लेकिन जब प्रताप और कस्तुरी की दोस्ती से प्रेम उत्पन्न होता है तो अचानक उन दोनों की जातियों का अंतर दिखाई देता है। यह अंतर जो पहले बिलकुल प्रकट नहीं था। प्रताप की अपनी जाती की एक लड़की से शादी की जाती है और यह शादी कस्तुरी के लिए कोई चौंकानेवाली या गज़ब बात नहीं है। अछूत लड़की के लिए यह सब इतना स्वाभाविक है कि वह प्रताप की पत्नी – मीरा से दोस्ती करती है। प्रताप के पिता की अछूतों से दोस्ती गाँववालों को पसंद नहीं है और जब इस कारण से उसके साथ दुर्घटना होती है तो दुखीजा उसके लिए जल्दी दवा लाना चाहता है और जाती हुई रेलगाड़ी को रोकता है। दुर्भाग्या से उसको न दवा मिलती है न कोई पुरस्कार मिलता है, बल्कि वह अपने काम से निकाला जाता है। उसके स्थान पर एक जवान लड़का आता है जिसका नाम मनु है। दुखीजा मनु और कस्तुरी की शादी करवाता है। दुर्भाग्यपूर्ण कि लड़की शादी को स्वीकार करती है और कोई फ़रियाद नहीं करती, तब भी जब उसको पता चलता है कि मनु की एक और शादी हो चूकी थी और उसकी पत्नी – कजरी उनके साथ रहने के लिए आ जाती है। कस्तुरी कजरी को दीदी बुलाती है और कभी कोई बुराई नहीं करती है। फ़िर भी मनु की दुसरी पत्नी को बड़ी ईर्ष्या है क्योंकि मनु सिर्फ़ कस्तुरी से प्रेम करता है। मीरा कजरी की सहेली है। पहली मुलाकात में प्रताप की पत्नी कजरी को कहती है कि उसका पति भी सिर्फ़ कस्तुरी से प्यार करता है। कजरी के मन में कस्तुरी को निकलाने की अशुभ राय आती है और दोनों औरतों की चुगली के कारण प्रताप और मनु के बीच बहुत बड़ा झगड़ा होता है। वे दोनों रेल की पटरी पर मार-पीट करते हैं और आनेवाली गाड़ी पैर ध्यान नहीं देते हैं। रेलगाड़ी को रुकवाने के चक्कर में कस्तुरी की मौत होती है। इस लज्जाजनक विषय को दिखाने के लिए, जो पहले किसी से नहीं दिखाया गया, इस फ़िल्म को बहुत सारी प्रशंसाएँ मिली[8]। वास्तव में 1936 में ऐसे विषय के बारे में बताना बहुत बड़ी बहादुरी थी। अफ़सोस की बात सिर्फ़ यह है कि इतने सालों में किसी दुसरे निर्देशक ने कुछ ऐसा नहीं किया। शायद Franz Osten के लिए ऐसी कहानी को दिखाना इतनी मुशकिल बात नहीं थी क्योंकि वह जर्मनी से भारत आया था और जिसके लिए यह विषय कोई बड़ा निषेध नहीं था। हमें फ़िर भी यह स्वीकार करना होगा कि फ़िरंगी होने के बावजूद Osten ने अपने दर्शकों को जो दिखाया उसके लिए उसने भारतीय समाज का बड़ी गहराई से अध्ययन और अनुभव किया। Osten का अनुभव उन स्थानों में अच्छी तरह दिखाई देता है जहाँ फ़िल्म के नायक और नायिका बिना किसी झिझक के अपने उपर आरोपित भाग्य को स्वीकार करते हैं और अपनी खुशी और सन्तुष्ट भविष्य के लिए लड़ाई नहीं करते हैं। दिलचस्प बात यह है कि फ़िल्म अपने दर्शकों को भी बहुत अच्छी लगी। हमें यह भी याद रहना चाहिए कि अच्छी व्यावसायीक फ़िल्म वह होती है जो सब को पसंद हो, सीधे-सादे लोगों को भी जो कि अक्सर बहुत रूढ़िवादी होते हैं। अगर ऐसे दर्शकों को अचानक विवादग्रस्त कहानी देखने की इच्छा होती है और देखने के बाद यह कहानी उनको पसंद है तो इसका मतलब यह है कि वे दर्शक कुछ न कुछ परिवर्तनों के लिए तैयार हैं। हो सकता है कि Osten की फ़िल्म उसी समय में लोगों को इसलिए पसंद थी क्योंकि वे गाँधी जी के दबाव में थे लेकिन यह भी सच है कि फ़िल्म का निषेध बिल्कुल हटा नहीं हुआ। प्रताप और कस्तुरी के बीच में प्रेम है और लड़का अपनी प्रेमिका को अक्सर छूता है। प्रताप के पिता अपनी दुकान की सब चीज़ें कस्तुरी को बेचते हैं। बहुत आश्चर्यचकित बात यह है कि एक क्षण में प्रताप कस्तुरी के साथ गाँव से भागना चाहता है और लड़की के इनकार के बाद भगवान को पूछता है कि उसने उसको भी अछूत क्यों नहीं बनाया! ऐसा उत्कर्षण एकदम नयी बात है जो अक्सर नहीं मिलती है। यह भी बुद्धिमानी वाली बात है जिसकी सहयता से हर दर्शक देख सकता है कि सिर्फ़ अछूत होने से कोई दोष नहीं है, समस्या तब उत्पन्न हो जाती है जहाँ दो जातियों के लोग एक दुसरे से प्रेम करते हैं। शादी के लिए समाज की अनुमति का अभाव फ़िल्म की सिर्फ़ एक कठिनाई है, लेकिन सबसे बहुत महत्त्वपूर्ण कठिनाई तो वह है जो सब को याद दिलाती है कि कई ऐसे निषेध होते हैं जिनको तोड़ना असंभव है। हम देख सकते हैं कि 1936 में भारतीय समाज थोड़े परिवर्तनों के लिए तैयार था लेकिन ज़्यादा नहीं। फ़िल्म में महत्त्वपूर्ण बात यह भी है कि नियमों तोड़ने की सज़ा लड़की को मिलती है। शायद यह उस विचार से संबंधित है कि एक जाति से दुसरी जाति के बीच किसी भी तरह के अतिक्रमण की सज़ा उसको मिलती है जिसकी जाति नीची है।

फिल्म की प्रस्तुतीकरण और पारंपरिक-शैली की परवाह किए बिना ‘अछूत कन्या’ बहुत बहादुर फ़िल्म है। इस बहादुरी का सबुत सबसे पहले यह है कि दुसरी ऐसी फ़िल्म के लिए हमें बहुत इंज़ार करनी पड़ी। 1959 में बिमल राय ने ‘सुजाता’ की फ़िल्म बनाई जो फ़िर से अछूत लड़की और ब्राम्हण लड़के के प्रेम की कहानी है।

उपेन्द्रनाथ चौधरी और उसकी पत्नी चारू की एक छोटी बेटी है जिसका नाम रमा है। जब लड़की की उम्र एक साल की है तो चौधरियों के घर में एक दुसरी लड़की आती है। वह लड़की अनाथ है जिसके माता-पिता आसपास के गाँव में रहते थे। समस्या यह है कि वह लड़की अछूत है इसलिए श्रीमती चौधरी छोटी लड़की की देखभाल के लिए अपनी नौकरानी को हुक्म देती है। श्रीमती चौधरी का डर स्पष्ट है लेकिन इसी समय में आश्चर्य की बात यह है कि उसको अपनी बेटी के अपवित्र हो जाने से डर नहीं है। जबकि अछूत लड़की को वही आया को देती है जो छोटी रामा की देखभाल करती है। आया को भी इस स्थिति में कोई समस्या नहीं है और वह नयी बच्ची की देखभाल करती है यद्यपि छोटी लड़की उसकी जाति से भी नीचे की है, लेकिन ऐसा शायद इसलिए है कि आया को वही करना चाहिए जो मालिक कहते हैं और उसको किसी भी तरह की शिकायत करने का भी अधिकार नहीं है। उपेन्द्रनाथ जल्द ही अपनी पत्नी के व्यवहार से विपरीत अछूत लड़की को स्वीकार करता है और उसका नाम सुजाता रख देता है। चारू को समाज से निकलने का बहुत डर है इसलिए उसको सुजाता से अपने पति के किसी भी तरह के संपर्क बहुत बुरे लगते हैं।

सुजाता को स्वीकार करने में सब से बड़ी बाधा बुढ़ी बुआ – गिरिबाला है। वह बहुत धर्मिक औरत है इसलिए एक पण्डित के साथ चोधरियों के यहाँ आती है। पण्डित के लिए अछूत लड़की से मिलना बड़ा अपमान है। वह समझ नहीं सकता है कि ऐसी बच्ची ऊँची जाति के लोगों को साथ कैसे रह सकती है और वह चौधरियों के घर को छोड़ने का निश्चाय करता है। उसके जाने से पहले जब उपेन्द्रनाथ उसको पूछता है कि उसके विचार में सुजाता और घर के दुसरे लोगों में सचमुच कोई बड़ा अंतर है, पण्डित कहता है कि अछूतों के शरीर से जहरीली हवा निकलती है जो आसपास के लोगों के लिए बहुत खतरनाक है। उपेन्द्रनाथ को यह बहुत मज़ेदार लगता है लेकिन पण्डित कहता है कि विटामिन को भी कोई देख नहीं सकता है पर इसका मतलब नहीं है कि ऐसी कोई चीज़ नहीं होती है।

पण्डित की सोच एक दुसरे पण्डित के विचारों से मिलती-जूलती है। बटुप्रसाद शर्मा शास्त्री बनारस के एक मंदिर में गुरू है और 2007 में बनी स्टालिन कुरूप के एक वृत्तचित्र ‘India Untouched: Stories of a People Apart’ का एक चरित्र। इस पण्डित के मन में भी बहुत सारे अजीब उदहारण होते हैं जिनके अनुसार अछूतों को अपने भाग्ये को स्वीकार करना चाहिए और जीवन को बदलने के बारे में सोचना मना है। पण्डित के अनुसार जिस मनुष्य को हवाई जहाज़ को चलाना नहीं आता है वह उसे नहीं चलाएगा। वैसे ही अछूतों को सिर्फ़ यह करना चाहिए जो परंपरा के अनुसार उनको हमेशा करना था। स्टालिन कुरूप की फ़िल्म में एक और ब्रहमाण है। वह कहता है कि हर व्यक्ति अपने काम करने के लिए पैदा होता है और वह सिर्फ़ वही काम कर सकता है जो उनके पूर्वज शताब्दियों से करते आये हैं। वह ब्राम्हण है, उसको चिंतन करना अच्छी तरह आता है और यह उसके लिए आसान है जब कि दुसरों के लिए असंभव। वैसे ही सफ़ाई करनेवाला या नाई को भी ऐसे ही कौशल आते हैं जिसके बारे में ब्राम्हणों को बिल्कुल ज्ञान नहीं है। कभी कभी पश्चिम के लोगों को यह असंभव लगता है कि 21 शताब्दी में भी लोगों के अंदर इतने पूर्वाग्रह होते हैं! लेकिन, ये दो उदहारण अच्छी तरह दिखाते हैं कि बिमल राय की ‘सुजाता’ का पण्डित कोई अतिरंजित व्यक्ति नहीं है बल्कि भारत में सचमुच में ऐसे लोग हैं जो आज भी इन बेतुकी बातों पर विश्वास करते हैं.

सुजाता चौधरियों के घर में रहकर बड़ी हो जाती है लेकिन यहाँ एक और विरोधाभास दिखाई देता है। चारू लड़की को कभी नहीं छूती और अपने पति को हमेशा घुड़की देती है जब उपेन्द्रनाथ अछूत लड़की के पास जाता है। अजीब बात यह है कि इसी समय में वह अपनी बेटी रामा को सुजाता के साथ खेलने की अनुमति देती है। सुजाता की स्थिति एक उपेक्षिता सी है – वह स्कूल नहीं जाती है, घर पर मता-पिता की देखभाल करती है और उद्यान में फूलों की। सुजाता की इस हालत के बावजूद उसकी सौतेली बहन उसके प्रति कभी बुरा व्यवहार नहीं करती है, फ़िर भी दिलचस्प बात यह है कि रमा को अपनी सौतेली बहन कि स्थिति कभी भी अजीब नहीं लगती है। रमा को मालूम नहीं है कि सुजाता उसकी सौतेली बहन है फ़िर भी वह माता-पिता से कभी नहीं पूछती है कि सिर्फ़ मैं ही स्कूल क्यों जाती हूँ और केवल मेरा ही जन्मदिन क्यों मनाया जाता है! घर के लोग चाहते हैं कि रमा की शादी अधीर से होती। अधीर एक जवान लड़का है जो गिरिबाला के साथ रहता है। जब वह पहली बार चौधरियों के घर आता है तो उसको सुजाता के उपर प्रेम आता है। उसका प्यार बहुत गहरा है और वह तब भी नहीं बदलता है जब उसको पता चलता है कि सुजाता अछूत जाति की लड़की है। अधीर अपने घर को छोड़ने के लिए तैयार है क्योंकि वह सिर्फ़ सुजाता से शादी करना चाहता है। चारू सोचती है कि उसकी सौतेली बेटी ने जानबूझकर अधीर को लुभाया क्योंकि उसको रमा के प्रति ईर्ष्या थी और वह अपनी बहन से प्रतिशोध लेना चाहती थी। सुजाता पर चिल्लाने के समय चारू अचानक सिढ़ियों से गिरती है और उसकी हालत बहुत गंभीर है। चारू के इलाज के लिए रक्त-आधान की ज़रूरत है। दुर्भाग्य से पति, रमा और अधीर का ब्लड-ग्रूप चारू से नहीं मिलता है पर सुजाता का वही है जिसकी जरुरत है। इस तरह सुजाता अपनी सौतेली माँ की जिन्दगी बचा सकती है।

यह दृश्य जहाँ रक्त-आधान चल रहा है बहुत दिलचस्प है क्योंकि हम यहाँ स्पष्ट रूप से देख सकते हैं कि सुजाता के खून के बारे में सुनकर उपेन्द्रनाथ बहुत अश्चार्यचकित हो जाता है। वह आदमी हमेशा सुजाता की रक्षा करता था और पण्डित के पागल विचारों पर हंसता था लेकिन कहीं अंदर में शायद वह भी सचमुच सोचता था कि अलग अलग जातियों के लोगों में ऐसे अंतर होते हैं।

बिमल राय की फ़िल्म अछूतों की पहली फ़िल्म बहुत सालों के बाद बनाई गई लेकिन इसमें भी गाँधी जी के विचारों से स्पष्ट संबंध है। सुजाता अक्सर नदी के किनारे जाती है और वह समय बिताने के लिए उसकी सब से अच्छी जगह है। जब उसको पता चलता है कि वह अछूत जाति की एक लड़की है जिसको चारू और उपेन्द्रनाथ ने गोद में लिया है, वह निराश होकर नदी के पास आती है और तेज़ बारिश में भींग जाती है। वह आत्महत्या करने का निश्चय करती है लेकिन जब पानी की तरफ़ आती है तब उसकी साड़ी का आँचल पास ही खड़ी गाँधी जी की मूर्ती से फँस जाता है। सुजाता मूर्ती की ओर देखती है और बारिश की बूंदें जो गाँधी जी के चेहरे पर बहती हुई आँसू जैसी दिखाई देती हैं।

गाँधी जी एक मात्र सुधारक नहीं है जिनका फ़िल्म में ज़िक्र है। रमा के कॉलेज में एक नाटक दिखाया जाता है जिसे देखने के लिए वह सारे परिवार को बुलाती है। समस्या यह है कि गिरिबाला नहीं चाहती है कि सुजाता भी जाए और वह बेचारी घर पर रहती है। जो नाटक दिखाया जाता है वह रबीन्द्रनाथ ठाकूर का ‘चंदलीका’ है। नाटक देखती हुई गिरिबाला को यह बहुत उचित लगता है कि स्कूल के स्टेज पर खड़े बुद्ध अछूत लड़की के हाथों से पानी लेते हैं और सभी जातियों की बराबरी के बारे में व्याख्यान देते हैं। गिरिबाला यह नहीं देखती है कि नाटक की अछूत लड़की और सुजाता में कोई अंतर नहीं है। यह व्यंग्य ऐसे लोगों के प्रति किया गया जिनके लिए सुधार सिर्फ़ एक प्रचार वाक्य हैं। फ़िर भी फ़िल्म की अंत में गिरिबाला भी यह साबित करती है कि प्यारे अधीर के लिए वह अपने विचारों को छोड़ सकती है। जब अधीर घर को छोड़ना चाहता है तब गिरिबाला सुजाता को स्वीकार करती है और कहती है कि शायद वह सचमुच पुरानी पीढ़ी की मानसिकता की वाहक है, उसे अब युवा विचारों को जगह देनी चाहिए।

अफ़सोस की बात यह है कि वास्तविकता हमको अच्छी तरह दिखाई देती है कि युवा आदर्शवादियों के सब सुधार असफल हुए और बॉलीवुड ने फ़िर से कभी ऐसी कहानी नहीं दिखाई। ‘सुजाता’ ‘अछूत कन्या’ की ही तरह बहुत सुगम फ़िल्म थी इसके बावजूद कि बिमल राय Franz Osten से आगे चला गया और उसने अछूत लड़की का ब्राहमण लड़के से शादी को संभव बनाया। व्यावसायीक सफलता के बावजूद सिनेमा के निर्देशकों को इस विषय से बड़ा डर है। ‘सुजाता’ के समय से भारत में बहुत मजबूत फ़िल्में बनी हैं और बहुत से निषेध टूटे भी हैं। फिर भी, अंतर्जातीय और विधवा विवाह आज भी मामूली दर्शकों को अनुचित लगते हैं।

सिनेमा की मुख्यधारा से अलग रहने वाले निर्देशकों का तरीका कुछ अलग ही होता है इसलिए वे आक्सर व्यावसायीक फ़िल्मों के निर्देशकों से ज़्यादा आज़ाद होते हैं। उनके लिए दर्शकों का ख्याल इतने महत्त्वपूर्ण नहीं हैं लेकिन इसके बावजूद भी हिंदी सिनेमा में, कला फिल्मों, सामानांतर फिल्मों और स्वतंत्र फिल्मों में भी, दलित-समस्याओं के चित्रण का अभाव है। यह बात अजीब लगती है क्योंकि आज़ाद निर्देशकों के लिए औरतों की स्वतन्त्रता, धर्मों के क्षेत्र में लड़ाई या घूसखोरी दिखाने में कोई समस्या नहीं है। जाति के निषेध को तोड़ने की हिम्मत उपर्युक्त सारे क्षेत्रों से ज्यादा चुनौती-पूर्ण है.

बहु-चर्चित निर्देशक श्याम बेनेगल ने, जिन्हें कई-एक राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुके हैं, अपनी पहली फ़िल्म 1974 में बनाई। इस फ़िल्म का नाम ‘अंकुर’ है और यह भी अछूत औरत और ब्राहमण आदमी के रिश्ते की कहानी है। फ़िल्म के नायक सुर्या की शादी बचपन में हो गई है और अब उसे अपनी पत्नी का इंतज़ार करना है। वह अपने पिता जी की जमींदारी के अंतर्गत आने वाले एक छोटे गाँव में जाता है और देखता है कि उसके घर के पास एक सुंदर औरत रहती है। औरत का नाम लक्ष्मी है और वह अछूत है। उसका जीवन बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है क्योंकि उसका पति शराबी है। लक्ष्मी बच्चा चाहती है लेकिन किसी कारण से यह उसके लिए असंभव है। सुर्या चाहता है कि लक्ष्मी उसके लिए काम करे और उसको अपने लिए खाना पकाने की अनुमति देता है जो न सिर्फ़ गाँव वालों के लिए बल्कि लक्ष्मी के लिए भी आश्चर्यजनक है। एक दिन लक्ष्मी का पति कहीं जाता है और लक्ष्मी और सुर्या एक दुसरे के करीब आते हैं। आशिक़ों का संतोष अचानक नष्ट हो जाता है जब सुर्या की पत्नी गाँव में आती है। इसी समय को लक्ष्मी को पता चलता है कि वह माँ बननेवाली है। सुर्या की पत्नी को अच्छी तरह मालूम है कि उसके पति और लक्ष्मी के बीच में क्या है और वह दुसरी औरत को निकलाने की कोशिश करती है। जब सुर्या को बच्चे के बारे में पता चलता है तो वह लक्ष्मी को घर से निकलाता है। इसी समय लक्ष्मी का पति शराब छोड़कर वापस आता है। लक्ष्मी को डर है कि पति बच्चे के बारे में क्या सोचेगा लेकिन बह खुश होकर सुर्या के घर जाता है, यह सोचकर कि शायद उसको काम मिलेगा। ब्राहमण सोचता है कि अछूत आदमी उसको मारने के लिए आ रहा है और मार-पीट शुरू कर देता है। गाँव के दुसरे लोग भी इस मार-पीट में सूर्या को मदद देते हैं। जब लक्ष्मी को पता चलता है तो वह आती है और अपने पति की रक्षा करती है।

यह एक सरल कहानी है जिसमें निरंतर नैतिक शिक्षा नहीं है परन्तु फिल्म-निर्माण के लिहाज से कहानी का बहुत अच्छा चित्रांकन है। फ़िल्म में हम यह देख सकते हैं जो अक्सर पश्चिमी लोगों के लिए समझने में सब से मुश्किल है – क्या भारतीय समाज में अछूतों के प्रति सचमुच इतनी घृणा है जहाँ सेक्स करने और मारने के समय यह अस्पृश्यता खत्म हो जाती है। इस कहानी में सुधार के उपदेश या प्रचार के लिए शायद स्थान नहीं है लेकिन भारतीय समाज के जातिवादी जकड़न और ढोंग पर एक करारे व्यंग्य के कारण, जो कि भारतीय सिनेमा में अक्सर नहीं होता है, इसको याद रखना चाहिए। यह फ़िल्म मामूली दर्शकों के लिए नहीं है लेकिन सिनेमा का एक बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा तो ज़रूर है।

1981 में बनी सत्यजित रायकी ‘सद्गति’ ‘शतरंज के खिलाड़ी के बाद उनकी दुसरी हिंदी फ़िल्म है। दोनों फ़िल्में प्रेमचंद की कहानी पर आधारित हैं। प्रेमचंद की कहानी ‘सद्गति’ ‘चमार’ जाति से आने वाले दुखी नाम के एक व्यक्ति के बारे में है जो अपने बेटी की शादी करवाना चाहता है और इसके लिए ब्राहमण का आशीर्वाद चाहिए ताकि वह घर आकर शुभमुहूर्त निकाल सके। वह अछूत है इसलिए उसको ब्राहमण का बहुत लंबा इंतज़ार करना है। बेचारे आदमी के पास पैसा नहीं है इसलिए ब्राहमण उसको लकड़ी काटने का हुक्म देता है। आदमी भूख के कारण कमज़ोर है इसलिए अच्छी तरह काम नहीं कर सकता है। जब आखिर में ब्राहमण जाने के लिए तैयार है वह देखता है कि दुखी मर गया है। गाँव में रहने वाले अछूत मरे हुए आदमी को लेना नहीं चाहते हैं और ब्राहमण चुपचाप दुखी की लाश को दूर ले जाता है और वापस आने के बाद नहा लेता है और इसी समय जानवर खेत में लेटे हुए लाश को खाते हैं।

फ़िल्म प्रेमचंद की कहानी के बहुत नज़दीक है। अछूत आदमी को अलगअलग हुक्म दिये जाते हैं, इसके बावजूद की उसने भैंसों के लिए घास लाया है। वह सब कुछ करता है बार-बार गाँव के केंद्र में खड़ी हुई रावण की बड़ी मूर्ती के पास जाकर, लेकिन लकड़ी को काटना उसके मौत का कारण बना।

बेचारा दुखी मर जाता है। बाकी अछूतों को इस घटना के बारे में पता चलता है। इसलिए जब ब्राहमण उनके यहाँ आता है और उनको लाश ले जाने की हुक्म देता है तो वे लोग उसको ध्यान नहीं देते हैं। दुखी के समुदाय के लोगों ने लाश नहीं उठाने का फैसला कर एक तरह से ब्राह्मण द्वारा हुए अत्याचार का विरोध करते हैं। यहाँ एक ध्यान देने वाली बात यह है कि दुखी जिस लकड़ी को काट रहा था, वह ऐसी-वैसी लकड़ीनहीं थी। वह ब्राह्मणवाद और जातिवाद का कठोर गट्ठर था और कितने दुखी को उसके लिए मरना पड़ा है।

राय की फ़िल्म और प्रेमचंद की कहानी में असाधारण अनुकूलता है जो थोड़ी सी अश्चार्यजनक है क्योंकि यह लेखक भारत में बहुत लोकप्रिय है। प्रेमचंद की कहानियों के आधार पर फ़िल्म बनाना आसान बात नहीं है क्योंकि वह आमतौर पर समाजिक-दोषों के बारे में लिखता था, लेकिन समाधान नहीं बताता था और ऐसी कहानियां व्यापारिक फ़िल्मों के लिए ज़्यादा अच्छा विषय नहीं है क्योंकि उन फ़िल्मों को स्पष्ट समाधान चाहिए। नायक द्वारा खलनायक का वध जैसी कहानियां।

1991 में बनाई हुई ‘दीक्षा’ एक और बॉलीवुड के बाहर की हिंदी फ़िल्म है जहाँ दलितों का ज़िक्र है। फ़िल्म का आलेख कर्नाटक के लेखक यू. आर. अनंतमूर्ति की कहानी पर आधारित है। 1992 में इस फ़िल्म को हिंदी की सब से अच्छी फ़िल्म के लिए पुरस्कार भी मिला लेकिन फिल्म व्यावसायीक रूप से सफल नहीं हुई। फ़िल्म का नायक एक छोटा ब्राम्हण लड़का है जिसका नाम नानी है। वह गाँव में रहने वाले एक ब्राम्हण का एक बेटा है। नानी के पाँच भाई मर गए हैं इसलिए उसका पिता निश्चय करता है कि उसको पढ़ाई के लिए पण्डित उडूप के यहाँ भेज देगा ताकि भगवान उसको जीवित रखे। पण्डित के दो वरिष्ठ शिष्य हैं जो अक्सर नानी को बहुत कष्ट पहुंचाते हैं, पर पण्डित की एक जवान बेटी यमुना भी है जो विधवा बन गई और वह नानी को अपने बेटे के समान समझती है।

जब पण्डित गाँव से कुछ दिनों के लिए कहीं जाता है तो यमुना और गाँव के अध्यापक के बीच में प्रेम उत्पन्न होता है और विधवा गर्भवती हो जाती है। पण्डित के वरिष्ठ शिष्यों के कारण गाँव के सारे लोगों को पता चलता है कि यमुना माँ बननेवाली है। यमुना पाप से बचने के लिए गर्भपात करवा लेती है। इसके बाद उसका पाप और बड़ा हो जाता है। पण्डित अपने शिष्यों को घर भेज देता है और अपनी जीवित बेटी का अंतिम संस्कार करता है।

यह फ़िल्म विधवाओं की स्थिति के बारे में है लेकिन इसमें अछूतों की स्थिति को भी दर्शाया गया है। पण्डित का नौकर कोगा अछूत है। वह हमेशा ब्राहमण लड़कों की तरह पढ़ना चाहता था। गाँव में रहनेवाले दुसरे अछूत आदमियों के लिए कोगा का व्यवहार उनकी जाति का अपमान है। वे लोग सोचते हैं कि कोगा ब्राहमण बनना चाहता है और यह उनके लिए सब से बड़ा पाप है क्योंकि हर जाति को अपना कर्तव्य करना चाहिए। इसी तरह कोगा दोहरा परित्यक्त बन जाता है, न घर का न घाट का। एक बार अपनी जाति के कारण और दुसरी बार अपने व्यवहार-विचार के कारण जो उसकी जाति के लोगों के विचारों के अनुकूल नहीं है। जब कोगा की बुआ जो उसकी एक ही रिश्तेदार थी मर जाती है अछूत आदमी पण्डित से उसके लिए अंतिम संस्कार की भीख मांगते हैं। शुरू में पण्डित के लिए यह खयाल घृणित लगता है लेकिन बाद में जो कोगा चाहता है वह करता है।

अरुण कौल की इस फ़िल्म में, जैसे पहले बिमल राय की फ़िल्म में, एक बुढ़ी औरत है जो दुसरों को पापी मानती है जबकि अपने व्यवहार में सब से दुराचारी लगती है। जब वह पण्डित को अछूत औरत के लिए अंतिम संस्कार करते हुए देखती है तो इसके बारे में दुसरे ब्राहमणों को बताती है जिसके कारण गाँववाले पण्डित उडूप पैर ध्यान रखना शुरू कर देते हैं। अच्छी बात यह है कि गाँववाले छोटे नानी को नहीं देखते हैं क्योंकि यह लड़का एक मात्र ऐसा व्यक्ति है जिसके लिए कोगा वैसा ही मनुष्य है जैसे गाँव के सब बाकी लोग। नानी के कोगा के प्रति के व्यवहार का आधार बच्चे की ‘दुनियावी अज्ञानता’ है जो अच्छी तरह दिखाता है कि लोगों में अंतर स्वभाविक नहीं होते हैं, बस संस्कृति से संबंधित। नानी कोगा की बुआ के लिए प्रर्थना करता है और नहीं समझता है कि क्यों पण्डित का व्यवहार दुसरों को इतना बुरा लगा! इस छोटे लड़के की संवेदना का एक और बहुत अच्छा उदाहरण है इस दृश्ये में है जब नानी कोगा को लड्डू देता है। अपने काम के लिए कोगा को खाना मिलता है। यमुना उसको चावल देती है ताकि वह भूख से नहीं मरे और काम कर सके लेकिन नौकर को मिठाई देना कुछ और ही इंगित करता है और अच्छी तरह दिखाता है कि छोटा लड़का बड़ों से अच्छी तरह आत्मा की अवश्यकता समझता है। नानी का व्यावहार इसका भी सबूत है कि सब पूर्वाग्रह अंतर्जात नहीं होते हैं पर संस्कृतिक विकास से संबंधित हैं।

छोटे लड़के का खुद से गहरा आकर्षण कोगा के लिए थोड़ा दहशतपूर्ण है। वह वही व्यक्ति है जिसके लिए नियमों के अनुसार व्यवहार करना जरुरी है इसलिए छोटे बच्चों को अधिकारों तोड़ने की अनुमति नहीं देता है। एक दृश्ये में नानी कोगा को तंग करता है और सारा समय उसको छूने की कोशिश करता है। बेचारे कोगा को ऊँचे ताड़ का पेड़ पर चढ़ना चाहिए। कोगा और गाँव के दुसरे अछूतों का व्यवहार यह अच्छी तरह दिखाई देता है कि अछूत लोग खुद से सोचते हैं कि पारंपरिक सोच-विचार से लड़ाई करना उचित बात नहीं है। जिसका कोगा की बुआ की मौत के बाद के दृश्य में ज़िक्र किया गया है, इस में भी कोगा पण्डित से अंतिम संस्कार मांगता है सिर्फ़ इसलिए कि इससे बुआ की आत्मा को शांति मिलेगी। कोगा सोचता है कि उसको यह करना चाहिए क्योंकि वह उसे पुरे जीवन मायूसी देता रहा। इस मायूसी का आधार यह था कि वह अपनी जाति के कर्तव्य नहीं करता था और अलग चीज़ों में दिलचस्पी रखता था। इन सब के कारण वह शायद अच्छा और संवेदनशील आदमी बन गया, लेकिन गाँव में रहनेवाले लोगों के विचार में अच्छा अछूत तो नहीं ही था और इस कारण एक हास्यस्पद व्यक्ति बन गया था।

जैसे पहले ही ज़िक्र किया गया उपर्युक्त तीनों फिल्में पुरस्कारों के बावजूद लोकप्रिय नहीं हुई। लेकिन शायद इन फ़िल्मों के कारण मुख्यधारा विषयक के निर्देशक कुछ सालों के बाद यह सोचने लगे कि इस समस्या को अपने दर्शकों को धीरे-धीरे दिखाना चाहिए। बॉलीवुड फ़िल्मों में उपदेश और नए सवालों को पूछना दो चीजें हैं । कभी पुरी फ़िल्मी कहानी किसी समस्या के बारे में होती है और इस प्रश्न को हल करने के बाद यह दिखाई देती है कि असहिष्णुता से किसनी खत्रा आती है। इसी तरह की फ़िल्म का एक अच्छा उदाहरण अनील शर्मा की ग़दर: एक प्रेम कथा है। यह फ़िल्म भारत-विभाजन के समय एक सिख लड़के और मुसलमान लड़की के प्रेम के बारे में है। लड़की के पिता को इस रिश्ते से तब तक विरोध है जब तक उसकी बेटी की दुर्घटना नहीं होती है। इस के बाद वह सोचने लगता है कि उसके कारण प्यारी बेटी की मौत हो सकती थी और यह सोचने लगता है कि धर्म इतना महत्त्वपूर्ण नहीं है। हम देख सकते हैं कि मुख्य समस्या धर्मों के अंतर का है लेकिन फ़िल्म के अंत में दर्शकों को कहा जाता है कि ऐसे अंतर समाज के लिए ठीक नहीं है।

दूसरी तरह की फ़िल्मों में भी यही होता है जिस में तकरारी बातें बिल्कुल प्राकृतिक होती हैं। ऐसी फ़िल्म का अच्छा उदाहरण मनमोहन देसाई की ‘अमर, अकबर, एंथोनी’ है। इस फ़िल्म की कहानी बॉलीवुड में लोकप्रिय खोया-पाया के सूत्र पर आधारित है। यह बचपन में खोये हुए तीन भाइयों की कहानी है जिन से एक हिंदू परिवार में बड़ा होता है, दुसरा मुसलमान परिवार में और तीसरे को इसाई धर्माचार्य गोद में लेता है। इस फ़िल्म में धर्मों के अंतर के बारे में कोई कुछ नहीं कहता है और सच के प्रकाशन के बाद किसी को अजीब नहीं लगता है कि हर आदमी का अलग धर्म है और अलग धर्म की पत्नी।

कौन सी योजना सही है यह कहना आसान नहीं है इसलिए वे इन दोनों फ़िल्मों में नहीं आती है। लेकिन लगता है कि निषेध को स्वभाविक बनाना तब तक मुमकिन होता है जब तक दर्शक इसके लिए तैयार है इसलिए दलितों के बारे में ऐसी फ़िल्में नहीं होती हैं और उनकी फिल्में तब तक सामने नहीं आएँगी जब तक लोग विशवास नहीं कर लेते कि दलित सचमुच दुसरे लोगों से बराबर हैं।

आशुतोष गोवारिकर की ‘लगान’ की कहानी अवास्तविक दुनिया में चली जाती है लेकिन ऐसी दुनिया बनाकर भी अछूतों को दुसरी जातियों से बराबर होने की अनुमति नहीं दी गई। फ़िल्म एक छोटे गाँव के लोगों के बारे में है जो अंग्रेज़ों से लड़ाई करते हैं। फ़िल्म का नायक – भुवन लगान हटाने के लिए अंग्रेज़ों से क्रिकेट खेल में जीतने की तैयारी करता है। उसका समूह भारतीय समाज का दर्पण है। इसमें अधिकांश हिंदू है लेकिन इसमें भी मुसलमान और सिख हैं। यह और बात है कि इस छोटे गाँव में मुसलमान भी रहते हैं और एक सिख कहीं दूर से अचानक आता है और इसमें कोई आश्चर्य नहीं है क्योंकि फ़िल्म की दुनिया वास्तविक नहीं है। हमको इसके बारे में भी याद करना चाहिए कि सिख और मुसलमान दोनों बहुत अच्छे खिलाड़ी हैं जिनको निकालना बहुत मुश्किल है। उन के द्वारा किए गए दोष उनके कौशल की कमी से नहीं आते हैं बल्कि विरोधियों के छल खेल या अभागी परिस्थितों के परिणाम हैं।

खेल शुरू होने से पहले एक और खिलाड़ी की ज़रूरत है। आसपास के गाँवों में रहनेवाले तैयारी को देखने को लिए आते हैं और उनमें एक अछूत आदमी भी है जिसका नाम कचरा है। एक क्षण में गेंद उसकी तरफ आता है और भुवन कचरा को इसे फेंकने को कहता है। जब कचरा गेंद को फेंकता है तो सब लोग देख सकते हैं कि वह अच्छी तरह गेंद को घुमा सकता है। भुवन कचरा को तुरंत अपने समूह में लेना चाहता है लेकिन जब वह इसके बारे में बताता है तब समूह के बाकी लोग खेलने से इंकार करते हैं। पहले वे भुवन के सब अजीब उद्देश्यों को स्वीकार करते थे लेकिन अछूत के साथ खेलना उनके लिए बहुत बड़ी बात है। भुवन कचरा को छूता है और सब को बताता है कि भारत को इसीलिए इतनी आसानी से उपनिवेश बनाया गया है क्योंकि उनके लोग एक दुसरे को साथ दे नहीं सकते हैं। अंत में कचरा अंतिम खिलाड़ी बन जाता है और खेल में आखिरी दाँव उसे ही खेलना है। उसकी दुगनी ज़िम्मेदारी है – अगर हार जाएगा तो उसका नया स्तर चला जाएगा और वह दुसरों से पहले से ज़्यादा तिरस्कृत होगा। जो गाँववाले हर दुसरे व्यक्ति को माफ़ करते हैं लेकिन कचरा को उसकी जाति के कारण सज़ा मिल सकती है! शायद यह तनाव कचरा के लिए मुश्किल है इसलिए वह असफल हो जाता है। सैभाग्य से भारत को एक और मौका दिया जाता है और इस बार भुवन को आखिरी दाँव खेलना है। भुवन को सफल होने का नसीब मिलना बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। फ़िल्म को बनाने वालों ने अपनी कहानी के बारे में बहुत सोचा और उन्होंने बहुत अच्छी तरह से अछूतों के प्रति आदर दिखाया। भुवन और कचरा दोनों भाग्यशाली थे और इसलिए भारत जीत गया। अगर नायक के कौशल कचरा से बड़े होते तो दर्शक यह सोच सकते थे कि अछूतों को सचमुच विशवास नहीं करना चाहिए क्योंकि मुख्य क्षण में वे निराशाजनक होते हैं!

अंग्रेज़ों से लड़ाई के बारे में बनी फिल्म ‘लगान’ का भुवन आमीर खान बाद में इसी विषय पर बनी एक दुसरी फ़िल्म में भी आ गया। केतन मेहता की ‘मंगल पाण्डे: द राइजिंग’ में अंग्रेज़ लोग सब से पहले जातिवादी हैं। जब एक अंग्रेज़ी दावत के समय भारतीय नौकर से एक गोरी औरत पर शराब छलक जाता है तो उसको बहुत बड़ी सज़ा मिलती है। नौकर को पीटता हुआ अंग्रेज चिल्लाता है कि उसकी गोरी औरत को छूना मना है और उसे कुत्ते कह कर संबोधित करता है। फ़िल्म का नायक मंगल पांडे मार खा रहे नौकर की रक्षा करता है लेकिन बाद की दृश्य में वह भी दुसरों के प्रति तिरस्कार दिखाता है। वह ब्राहमण है जिसको हर सुबह नदी में नहाना है। एक दिन वापस जाने के समय वह सड़क पर सफ़ाई करनेवाले अछूत से टकराता है। मंगल का व्यवहार वैसा ही है जैसा पहले नौकर के प्रति अंग्रेज़ का था और वह भी अछूत को कुत्ते की उपाधि देता है।

हम कह सकते हैं कि फ़िल्म में दिखाए गए अंग्रेज़ लोग गोरी चमड़ी के कारण अक्सर खुद को ज़्यादा अच्छा समझते हैं लेकिन फ़िर भी उनके लिए भारतीय लोगों से सम्पर्क उतना घृणित नहीं है। अंग्रेज़ों के बड़े घरों में सारे भारतीय नौकर काम करते हैं और उनसे खाने या पीने की वस्तु लेने में कभी कोई समस्या नहीं थी।

फ़िल्म सिपाही विद्रोह के बारे में है और इसका मुख्य विषय कारतूस की समस्या है। अंग्रेज़ लोग बड़ी आसानी से भूल जाते थे कि भारतीय सिपाहियों के लिए धर्म कितना महत्त्वपूर्ण है और उनके नियमों की इज्जत नहीं करते थे। 1806 में सिपाही नयी वर्दियों का विरोध करते थे जिनके कारण वे अपनी जाति से निकाल जा सकते थे, 1825 में समुद्र पार करना जो कि समाजिक नियमों के विरुद्ध था और अफगानिस्तान के युद्ध के समय बड़ी समस्या यह थी कि हिंदू सिपाहियों के लिए रोज़ का स्नान असंभव था और उनको मुसलमानों से खाना खरीदना था। कारतूस की समस्या सच में धर्म और संस्कृति के अपराध का सिर्फ़ एक और उदाहरण था।[9]

मंगल का अंग्रेज़ी दोस्त उसको भरोसा दिलाता है कि कारतूस के बारे में जो अफ़वाह होते हैं वे सच नहीं हैं लेकिन जब सब को पता चलता है कि मंगल का अपवित्रीकरण हुआ है तो वह तुरंत अपनी जाति से निकाल जाता है। लगता है कि अंग्रेज़ अच्छी तरह नहीं समझते हैं कि यह बात कितनी महत्त्वपूर्ण है और उनकी अज्ञानता के कारण मनुष्य को समाज के बाहर जीना पड़ता है जो मौत से भी बदतर है। मंगल यह सब कुछ न सिर्फ़ अपने अंग्रेज़ दोस्तों को स्पष्ट करता है बल्कि विदेशी दर्शकों को भी जो कभी इसके बारे में कुछ नहीं जानते हैं या विशवास नहीं करते हैं कि क्या यह सब कुछ सचमुच इतना महत्त्वपूर्ण है!

अपने ऊँचे स्तर को खोने के बाद मंगल हीरा से रिश्ता बनाता है। यह भी स्पष्ट है कि अगर वह शुद्ध ब्राहमण होता तो प्यार के बावजूद वेश्या से करीबी रिश्ता कभी नहीं बनाता। और, यहाँ भी भारत और अंग्रेज़ का अंतर है। विदेशी सिपाहियों के लिए हर वेश्या लालच थामने के लिए होती है, भारतीय या कोई दुसरी वेश्याओं में उनके लिए कोई अंतर नहीं है। केतन मेहता की फ़िल्म अछूतों के प्रति के बुरे व्यवहार का विरोध नहीं करता है और सिर्फ़ यह दिखाता है कि जातियों से अंतर कितने महत्त्वपूर्ण हैं।

इसी साल में बनी हुई आशुतोष गोवारिकर की ‘स्वदेश’ में भी हम पश्चिमी दृष्टि से भारत देख सकते हैं लेकिन यह दृष्टि ‘मंगल पाण्डे: द राइजिंग’ से कुछ अलग है। फ़िल्म के नायक का नाम मोहन है और वह भारत को छोड़कर यू एस ए में रहता है जहाँ नासा में काम करता है। एक दिन वह अपने देश में वापस जाने का निश्चय करता है अपनी आया को ढूढ़ने के लिए। आया एक छोटे गाँव में रहती है जहाँ इंटरनेट नहीं है, बिजली अक्सर चली जाती है और सब लोग वैसे ही जीते हैं जैसे पुराने ज़माने में। गाँव आने के बाद मोहन का व्यवहार पश्चिमी पर्यटक जैसा है – वह काफिले में सोता है, सिर्फ़ बोतल का पानी पीता है और यह नहीं समझ सकता है कि सब लोग इस तरह गाँव में कैसे जी सकते हैं।

गाँववालों में से एक अछूत आदमी – मेला राम रोज़-रोज़ मोहन के लिए खाना लाता है क्योंकि उसको आशा है कि विदेशी मेहमान उसको अपने साथ अमरीका ले जाएगा। मोहन का व्यवहार फ़िर से विदेशी पर्यटक के जैसा है और वह बिना किसी नियंत्रण के गाँव वालों का खाना खाता है। हम यह सोच सकते हैं कि शायद उसको पता नहीं है कि मेला राम कौन-सी जाति से है लेकिन बाद में जब गाँव में रहने वाले बुढ़े लोग मोहन की आलोचना करते हैं फिर भी वह मेला राम से दोस्ती नहीं छोड़ता है। फ़िल्म में अक्सर दिखनेवाले दृश्यों में मोहन, मेला राम और डाकखाने में काम करनेवाला निवारण तीनों एक स्कूटर पर बैठकर कहीं जाते हैं। सच में मोहन बीच में बैठता है जिसके मदद से मेला राम और निवारण का स्पर्श हो नहीं सकता है लेकिन यह फ़िल्म इस उपाय का पहला उदाहरण हो सकता है जिस में कोई समस्या नहीं होता है और फ़िल्म की दुनिया का अनुक्रम प्राकृतिक, स्वाभाविक है। फ़िल्म के गाँव में अछूत दुसरे लोगों से कुछ अलग होते हैं लेकिन इतनी नहीं और अगर कोई उनसे दोस्ती करना चाहता है तो कोई उसका विरोध नहीं करेगा। यह छोटा कदम है लेकिन अच्छी तरह दिखाई देता है कि फ़िल्म वाले धीरे धीरे इस समस्या को दिखाने में साहसी हो रहे हैं।

फ़िल्म में एक और दृश्य है जिस पर हमें ध्यान देना चाहिए। गाँव में सिनेमा आता है और सब अछूत पर्दे की दुसरी ओर में बैठकर दर्पण में प्रतिवर्तन जैसा कुछ देख सकते हैं। यह बड़ी असुविधा नहीं है जब तक कि फ़िल्म को देखने के लिए उपशीर्षकों (Subtitles) की ज़रूरत नहीं है लेकिन ऊँचे और नीचों का ऐसा स्पष्ट विभाजन अपमानजनक है। फिल्म के समय बिजली फिर से चली जाती है और पर्दे के सामने बैठे हुए बच्चे रो पड़ते हैं। मोहन सब को तारे दिखाता है और इस समय गाना गाता है। गाने की पराकाष्ठा में पर्दा हटाया जाता है। मोहन अपना टेलीस्कोप लाता है और सब को तारे और चन्द्र को देखने की अनुमति देता है। सब से महत्त्वपूर्ण बात यह है कि मोहन को जातियों को बराबरी के बारे में कोई भाषण देने की ज़रूरत नहीं है जैसे पहले भुवन को था और सब लोग साथ साथ टेलीस्कोप से देखते हैं बिना किसी शिकायत के। ‘स्वदेश’ अछूतों के बारे में नहीं है लेकिन वो यहाँ भी आ गया है और इस तरह दिखाया गया है कि यह फ़िल्म अब तक की सब से बहादुर फ़िल्म है। यह भी महत्त्वपूर्ण है कि किसी ने इसके लिए फ़िल्म की आलोचना नहीं की और इसका मतलब यह है कि फ़िल्म को बनानेवाले ने कहानी में अच्छी तरह अपने विचार डाल दिए हैं जो मुख्यधारा विषयक फिल्मों के लिए बहुत ही आवश्यक हैं।

चर्चित समाजिक आलोचक, प्रकाश झा ने 1985 में ‘दामूल’ बनाई जिसमें अमीर लोगों द्वारा गरीबों का शोषण दिखाया गया है। फ़िल्म ने उसको मशहूर बनाया और फिल्म को पुरस्कार भी मिले। 2011 में उसने दलितों के बारे में ‘आरक्षण’ बनाई। यह फ़िल्म निचली जातियों की प्रतिरक्षा के बड़े दावों के बावजुद उन्हीं जातियों के बीच में विवादास्पद हो गई।

यह एक युवा– दीपक की कहानी है। बह दलित है इसलिए शिक्षित होते हुए भी उसको काम नहीं मिलता है। प्रतिष्ठित कॉलेज का मुख्य अध्यापक – प्रभाकर अनंद उसको अपने स्कूल में काम देता है क्योंकि वह आदमी सालों से सभी जातियों के गरीब तबके के युवाओं को शिक्षित करने के लिए संघर्षरत है। आरक्षण-निति की मदद से निचली जातियों को स्कूलों और विश्वविद्यालयों में स्थान मिलता है वह प्रभाकर के विचार में बहुत अच्छा समाधान है। फ़िल्म का खलनायक मिथिलेश सिंह है जिसके लिए सिर्फ़ पैसा सबसे महत्वपूर्ण है और जो प्रभाकर को नष्ट करना चाहता है। शुरू में फ़िल्म में आरक्षण की निति के बारे में एक वाद-विवाद है और आरक्षण के फ़ायदे और नुकसान बताये जाते हैं। अफ़सोस की बात यह है कि फिल्म अपने विषय से जल्दी भटक जाती है और हम दुराचार और पैसों से सच्चाई की जीत का अरुचिकर और थकाऊ धर्माचार देखते हैं जिस में ‘दामूल’ की सरलता तो बिलकुल ही नहीं है।

मिथिलेश अपना स्कूल स्थापित करता है और पैसेवाले लोगों को बताता है कि उनके बच्चों को सिर्फ़ उसके स्कूल में ऐसी शिक्षा मिलेगा जिसकी ज़िंदगी में ज़रूरत होगी। धीरे धीरे वह प्रभाकर के स्कूल के अध्यापकों को प्रलोभन देता है। प्रभाकर और दीपक गरीब-बच्चों को गोशाले में पढ़ाते हैं और अंत में जीत जाते हैं क्योंकि परीक्षा में उनके विद्यार्थियों को सब से ऊँचे अंक मिलते हैं। लगता है कि अमिताभ बच्चन ने निश्चय किया है कि अब वह भारीय समाज का अनुभवी परामर्शदाता बन जाए। माननीय अभिनेता का व्यवहार आजकल अक्सर शिष्यों को शिक्षा देनेवाले गुरु जी जैसा है और यह ख़तरनाक बात है क्योंकि इस प्रवृति के कारण उसकी फ़िल्में पहले जैसी अच्छी नहीं हैं। यह बड़ी अफ़सोस की बात है क्योंकि अमिताभ बहुत अच्छा अभिनेता है। ‘आरक्षण’ की चर्चा इसलिए करनी चाहिए क्योंकि फ़िल्म विवादग्रस्त बन गई। अगर लोगों को इस फिल्म में कहानी दिखाने-कहने का तरीका पसंद नहीं आया तो यह आश्चर्य-जनक बात नहीं होती क्योंकि इस क्षेत्र में फ़िल्म बहुत ही खराब है लेकिन दर्शकों की समस्या कुछ और ही थी। दिलचस्प बात यह है कि जिन दर्शकों को इस विषय से सम्बंधित ज़्यादा बहादुर फ़िल्में पहले ही मिल चूकी हैं उन्होंने इस फ़िल्म को देखने के बाद खुद को अपमानित महसूस किया।

निचली जातियों के दर्शकों को सब से खराब यह लगा कि फ़िल्म का नायक सैफ़ अली खान हो गया[10]। ऐसी स्थितियाँ पहले होती थीं और मैंने ‘मदर इंडिया’ का ज़िक्र किया लेकिन इस बार यह कहना मुश्किल है कि दर्शकों को अपमानित क्या लगा? क्या उनको अच्छा लहीं लगा कि अभिनेता मुसलमान है या उसका कुलीन वंश का होना जो कि फ़िल्म के उसके कार्य-भाग से संबंधित नहीं था[11]। सब से दिलचस्प बात यह है कि जिन लोगों को फ़िल्म पसंद नहीं थी वे ऐसे लोग थे जिनकी पक्षधरता का दावा फ़िल्म करती थी। दलितों के विरोध का मतलब यह हो सकता है कि आखिर में उन लोगों को अपनी नीतियों के बारे में पता है और अपनी सुविधा के लिए वे लड़ सकते हैं जो कि अच्छी बात है। फ़िर भी निराशा का कारण थोड़ा सा तकलीफ़देह लगता है अगर हम इस नायक को ध्यान से देखेंगे। दीपक बहुत अच्छा आदमी है लेकिन उसकी एक कमी है और यह ऐसी बात है कि वह बड़ी आसानी से अपना आपा खो सकता है और अकसर निराश होकर अपनी उग्रता का इस्तेमाल करता है। मिथिलेश से टकराना सब के बस की बात नहीं है, दीपक आता है और स्कूल को नष्ट करता है। पहले भी वह अक्सर दुसरों को मार देता है और उसे बोलने का सलीका नहीं है, यह सब नायक का बहुत बड़ा दोष है। दीपक की आक्रामकता का स्पष्टीकरण यह हो सकता है कि पढ़ाई के बावजुद निचली जातियों के लोग हमेशा अपरिष्कृत होंगे और शायद यह अच्छी बात है कि उन लोगों को ऊँचे स्तर का काम नहीं मिलता है क्योंकि वे खतरनाक हैं। दलितों की रक्षा करने के लिए फ़िल्म का ऐसा नायक अजीब लगता है, लेकिन समस्या है कि फ़िल्म के दर्शकों को नायक नहीं, अभिनेता पसंद नहीं था। अगर लोगों को नायक अच्छा नहीं लगता तो उनका क्रोध समझ में आने योग्य होता लेकिन अभिनेता का विरोध करना एक तरह से वही व्यवहार है जैसा दलितों के प्रति वर्षों से हो रहा है।

सब से निराशाजनक यह बात है कि कुछ भारतीय प्रदेशों में फ़िल्म को प्रतिबंधित किया गया और निर्देशक से फ़िल्म के कुछ दृश्यों को काट देने की मांग की गयी जिसका मतलब यह है कि अस्पृश्यता आजकल भी भारत में एक संवेदनशील विषय है। लेकिन अगर अछूतों की रक्षा करने के लिए बनाई हुई फ़िल्म के दृश्ये भी दलितों को अपमानित करते हैं तो दर्शकों का बिगड़ना आश्चर्यजनक बात नहीं है। इस फ़िल्म में प्यार को दिखाने की तरीका भी दिलचस्प है। प्रभाकर की बेटी और दीपक एक दुसरे से कुछ न कुछ प्यार करते हैं लेकिन उनका प्रेम फ़िल्म का मुख्य विषय नहीं है। हम यह बता सकते हैं कि नायक और नायिका की रिश्ता ऐसे उपाय का उदाहरण है जिसके अनुसार फ़िल्म कोई बात इस तरह दिखाता है मानो वे दुनिया के स्वभाविक नियम थे, लेकिन इसमें कुछ ऐसे अंश हैं जो हमको इस तरह से सोचने की इज़ाजत नहीं देती है। सब से पहले दर्शकों को पता नहीं है कि नायक और नायिका के बीच सचमुच प्यार है या सिर्फ़ गहरी दोस्ती, लगता है कि फ़िल्म बनाने वालों को ज़्यादा दिखाने से थोड़ा सा डर था और अगर ऐसा डर इस प्रकार की फ़िल्म में दिखाई देता है तो यह विषय दिखाने से कोई फ़ायदा नहीं है। दीपक और प्रभाकर की बेटी के बीच में अगर प्यार है तो इसे दर्शकों के मन में उतरना चाहिए है नहीं तो इसके होने या न होने से कोई फ़र्क नहीं पड़ता है। व्यभिचार को फ़िल्म में इतना स्थान देना और आरक्षण के बारे में स्पष्ट विचार नहीं दिखाना भी अच्छे सिद्धांत नहीं थे। फ़िल्म का रवैया इतना रक्षात्मक है कि इसे समाजिक समस्याओं में सम्बंधित बताना असंभव है, आप सभी को खुश कर के समस्याओं को संबोधित नहीं कर सकते हैं। निर्देशक को न सिर्फ़ सुधारों के बारे में बताना पर अपनी विचारों को भी दिखाने से डर है। ऐसे ही जगह में वे बहुत गंभीर और आडंबरपूर्ण भाषण डालते हैं जो शुरू में थकाऊ और बाद में हास्यास्पद होते हैं। यह फ़िल्म शायद बॉलीवुड की सबसे बेकार फ़िल्म है और इस कारण सचमुच उसको दिखाने से मना करना चाहिए था।

अंत में एक और विवादास्पद फ़िल्म की ज़िक्र करना उचित लगता है। शेखर कपूर की ‘बैन्डिट क्वीन’ 1994 में बनी हुई है और अछूतों के बारे में नहीं है लेकिन एक और समस्या का अच्छा उदाहरण है। यह फ़िल्म फूलन देवी के जीवन के बारे में माला सेन की किताब पर आधारित है। यह कहानी अच्छी तरह न सिर्फ़ यह दिखाती है कि हर व्यक्ति की ज़िंदगी में समाज की कितनी बड़ी भूमिका होती है लेकिन यह भी कि भारत जैसे देश में जहाँ समाजिक बुनावट इतना उलझा हुआ है कि अपने जीवन को तय करना बहुत मुश्किल है। फ़िल्म की फूलन देवी निचली जाति से है और गरीबी के कारण बचपन में उसकी शादी एक बुढ़े आदमी से हुयी है क्योंकि उसको लड़की के परिवार से बड़े दहेज की ज़रूरत नहीं थी। पति से लुटी हुई लड़की अपने गाँव वापस आती है लेकिन उसकी जीवन पहली जैसी हो नहीं सकती है क्योंकि पति को छोड़ने के बाद बदतहज़ीब हो गई है।

अरुंधती राय[12] एक मजेदार बात कहती है कि शेखर कपूर ने कहा था कि उसने अपने फ़िल्म में सत्य दिखाया फिर भी वह कभी फूलन देवी से मिलने नहीं गया और उस समय फूलन जीवित थी और जब वह अपनी फ़िल्म बनाता था तो उसी समय जेल से आज़ाद भी हुयी थी। निर्देशक अपनी नायिका को नहीं जानता था और उसने फूलन की जीवन की कहानी उससे कभी नहीं सुनी। फूलन की आत्मकथा माला सेन की किताब से कुछ कुछ अलग है और दोनों कपूर की फ़िल्म से बहुत अलग हैं। निर्देशक के लिए बलात्कार, बहुत सारी लूटपाट, गोलियों की आवाज़ सब से महत्त्वपूर्ण लगती हैं। यह सच ज़रूर है कि इन घटनाओं के कारण फूलन के जीवन में बहुत बदलाव आया लेकिन उसके जीवन में आये इन सारे बदलाव के मूल स्रोत इन घटनाओं में नहीं थे। फ़िल्म फूलन के परिवार की समस्याओं के बारे में कुछ नहीं कहता है। उसके जीवन की सारी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं का कारण उसके चाचा का प्रतिशोध था। फ़िल्म देखते हुए कि पश्चिमी दर्शकों के लिए यह समझना मुश्किल है कि फूलन की इन सारी स्थितिओं का मूल उसकी जाति है। जिस गिरोह का नेता निचली जाति में पैदा हुआ विक्रम है और एक तरह से गिरोह की लड़ाइयों का आधार भी है लेकिन लोग सिर्फ़ अलग अलग जातियों के नाम बोलते हैं और इन सब का अर्थ पश्चिमी दर्शकों के लिए स्पष्ट नहीं है। इसी समय दिखाया जाने वाला यौन-शोषण दर्शक का ध्यान मुख्य विषय के विपरीत कर देता है। भारतीय दर्शक के लिए जातियों से संबंधित दुर्व्यवहार को समझना ज़्यादा आसान है लेकिन सिनेमा के इतिहास में पहली बार औरत के प्रति होने वाला क्रूरतम यौन-अपराध दिखाया गया। यह बात गहरी समस्याओं से आगे निकल जाती है और सब से महत्त्वपूर्ण खबर छिप जाती है। भारत में कपूर की फ़िल्म के बारे में लिखने वाले लोग अक्सर इस पर एकाग्र होते हैं कि इस फ़िल्म में पहली बार नंगी औरत दिखाई जाती है। यह सच नहीं है क्योंकि नंगी औरत को हम अंग्रेज़ी वाली गिरीश कर्नाड की ‘उत्सव’ में देख सकते हैं लेकिन निराशाजनक बात यह ज़रूर है कि कपूर की फ़िल्म की लोकप्रियता इसी के कारण हुई है। शायद यह सच है कि ऐसे विवादात्मक दृश्यों को देखने के लिए ही लोग सिनेमा जाते हैं लेकिन कभी कभी याद रखना चाहिए कि अगर ऐसी चीज़ें ज़्यादा होंगी तो दर्शक दुसरे महत्त्वपूर्ण विषय नहीं देख पाएगा और वे विषय नंगे शरीर से शायद ज़्यादा आवश्यक हैं। हिंदी सिनेमा का उदाहरण देकर हमने देखा कि सिनेमा के सौ साल के इतिहास में अछूतों के बारे में ज़्यादा फ़िल्में नहीं हैं। शुरू में ऐसा लगा कि गाँधी जी और उनके तरह के दुसरे सुधारकों की मदद से यह विषय लोकप्रिय होगा लेकिन जल्दी ही ऐसी फ़िल्में मुख्यधारा के विषय से बाहर चली गयीं। क्या भारतीय दर्शक ऐसी फ़िल्मों के लिए तैयार नहीं हैं? मुझे लगता है कि आधुनिक सिनेमा में सब कुछ दिखाया जाता है इसलिए इस विषय से इतना डर ज़्यादा अजीब लगता है। जब हम बॉलीवुड फ़िल्मों की संख्या के बारे में सोचेंगे तो यह देखेंगे कि दलित न सिर्फ़ जाति के वरीयता-क्रम से बाहर हैं बल्कि सिनेमा से भी बाहर हैं। 100 करोड़ से उपर की जनसंख्या वाले देश के सिनेमा में बहुजन-जीवन के स्वाभाविक-चित्रण का अभाव चिंताजनक है और इसका एक बड़ा कारण संभवतः यह है कि बहुजनों का बड़ा हिस्सा अभी भी सिनेमा का उपभोक्ता समुदाय में तब्दील नहीं हुआ है। यह तब तक नहीं बदलेगा जब तक उनकी परिस्थितियों को स्वभाविक तरीके से नहीं दिखाया जाएगा। अगर हम दलित-समस्या पर ही केन्द्रित रहेंगे और सिर्फ़ सुधार के आग्रही के बतौर ही दलितों का चित्रण करेंगे तो वे कभी समाज के स्वाभाविक हिस्से की तरह कभी नहीं दिखेंगे। उपर्युक्त वर्णित सारी फ़िल्मों में से ‘स्वदेश’ और ‘अंकुर’ ने सब से अच्छा काम किया है क्योंकि इन फ़िल्मों में दलितों के प्रति कोई बड़ा पूर्वाग्रह नहीं दिखाया गया है।’अछूत कन्या’ और ‘सुजाता’ में भी दलितों का जैसा चित्रण किया गया है वैसा आज दिखाना असंभव लगता है, इसलिए हमको शायद पुराने जानकारों से फ़िर से ज्ञान लेना पड़ेगा क्योंकि वे अधुनिक निर्देशकों से ज़्यादा बहादुर थे।

[1] http://whatismatt.com/thailand-urban-legends/ (13.01.2012).

[2] U. Woźniakowska, Bollywood, Pragnienie prawdy i tęsknota za    mitem, Kraków 2010, p. 48.

[3] A. Chopra, King of Bollywood, Shah Rukh Khan and the Seductive World of Indian Cinema, New York, Boston 2007, p.     187.

[4] S. Mehta, Pociąg do Bollywood, „National Geographic”, 2, 2005, p. 79.

[5] N. Ghosh, Ashok Kumar. His Life and Times, New Delhi 1995,     p. 67-68.

[6] A. Chowdhury, Dev Anand. Dashing Debonair, New Delhi, 2004,    p. 17-18.

[7] M. Bose, Bollywood. A History, Glouceshire, 2006, p. 205.

[8] R. Dwyer, 100 Bollywood Films, London 2005, p. 12-13.

[9] J. Kieniewicz, Historia Indii, Wrocław 1980, p. 608-610.

[10] http://timesofindia.indiatimes.com

[11] http://www.hindustantimes.com

[12] http://www.sawnet.org/books/writing/roy_bq1.html

Tatiana Szurlej

Tatiana Szurlej

तत्याना षुर्लेई एक Indologist और फिल्म-आलोचक हैं। फिलहाल पोलैंड के शहर क्राकोव सिथत Jagiellonian University में The Courtesan Figure in the Iconography on Indian Popular Cinema:Tradition, Stereotype, Manipulation.   नामक विषय पर पीएचडी के लिए शोधरत हैं।

साभार- हंस फरवरी 2013, सिनेमा के सौ साल 

A Cinematic Framing Of Urban-Polpular cultural Forms: Heroine (2012): Dhiraj K Nite

BY Dhiraj K Nite

The Bollywood has recently benefited from insights of a couple of radical-liberal craftsmen. These craftsmen claim to bring up reflexive realism to the commercial cinema. Madhur Bhandarkar is one of them. The output is a critical narcissistic engagement with the dominant theme of commercial cinema, i.e., the life and culture of wealthy individuals and moneyed professional. Bhandarkar has offered us, thus, an intense movie Heroine. Here, he continues to pour out his critical liberal take on his subject which we have seen him doing in Page 3, Corporate, and Fashion(2008). Very soon I will suggest where he makes departure in his latest venture.

The Heroine’s protagonist, Mahi Arora (Karina Kapoor) yearns for love, company and certainty in her life. She does so in the midst of her pursuit of climbing and remaining at the peak of achievement and success. It is a 19thc bourgeois notion of love, simply another name of a ‘marriage of convenience’ rather than of love. It is contrary to a meaning of love which we find in Sartre’s and Fanon’s work(1952): Love means a person is in the quest for something what s/he likes to have within him/her. Mahi is a celebrity, Bollywood star and a character of the 21st century’s matured professional world. The 19thc bourgeois notion of love descends in Mahi’syearning from the intervention made by her mother. Mahialready had two moments of break up in her youthful life. These moments failed to perturb and rub her professional spirit and the ‘happy-going’ orientation of life. The mother’s intervention reorients her at one stroke. The sharp editing of the movie and its singlefocus do not lend this shift become preachy nor penetrative.

Heroine DVD Cover

Heroine DVD Cover

Hereon, Bhandarkar repeats himself in this movie what he has already created in Fashion(2008). Mahi looks for the combination of aninsuring marital life and professional stability. The goal eludes her while it is testing her patience and emotional depth. She proves herself perturbable, and emotionally vulnerable. She pays price for it. The third moment of break up visits her to take an irreparable toll. The smoke of cigrate, galas of alcohol and half-lit flat accompany her inner turmoil. [The light management is splendid in the movie.] In between Bhandarkar once again reveals to us how individualistic and economistic have become the foundation of marital life of Page 3 couples? How promiscuity not just undercuts the façade of monogamy, but functions as a tool to greasing business transection?

Mahi and her advisors ensure her comeback by exploiting sexual transection with a man of substance. The latter is this time no other than a cricket star, i.e., another Star of our cultural, entertainment industry. Bhandarkar’s take on a nexus between the cricket star and the Bollywood star is astute. Only a flamboyant batsman rather than a destructive bowler could become a part of this nexus. Nonetheless, the character of Mahi does something what is hitherto infrequent to occur in Indian cinema. Before it, we have seen in the movie Gulaland Ishqiyathat a female protagonist deploys her sexual possession to hunt for her worldly pursuit.

Mahi is back in the industry. Sooner than later, she is made to realise that she should prove that she is an actor alongside a Star. She divulges in an Art cinema for an image change and become invulnerable to her mainstream male co-star. Bhandarkr’s momentary take on this matter amuses us with the revelation of the inner world of venerate artists of the Art cinema. Its artist is forthright, even when s/he is not unproblematic.

The main plot tells us that Mahi has learnt to prioritise her career first than any pull of certainty in sexual/marital life. The latter should wait. This maturity, or to call a decision, brings up at her door fourth break-up; a reunion with an erstwhile beloved; and one more round of break-up with him. In fact, the latter break-up follows Mahi’s newly acquired inability to become indulgent in the loving relationship; and that she could undertake only in favour of professional achievement. Finally, she also learnt to generate a sexual scandal around herself to attract viewers to her movie. This has become now an ‘acceptable’ pattern in the industry. After all, our memory is short about this! The scandal brings roaring favour of the viewer to her low-budget woman-centric movie (Annie), and new film offers pack her for next two years.

The door of professional achievement is an open one to her. Like Fashion’s MeghnaMathur, Mahi ends up in Europe. Meanwhile, both have gained solace and certain meaning of life by becoming caring to astruggling professional in the same industry.

Unlike Meghna, Mahi finds genuine pleasure and peace of mind when she quits the industry and merges herself in the crowd and immerses on the street. This is a romantic departure made by Bhandarkar in this movie.The explanation for this difference refers to the realisation made by Mahi how lonely an actress could become in the end of the day in this world of celebrity? How depersonalised and self-serving are participants in that world? This is a truly romantic philosophical input, and it demands suspension of any disbelief against its ‘upside-down’ impact on Mahi.

The focus on a continually evolving persona of Mahi and the application of sharp-edge editing has made the movie absorbing. A viewer may not feel cheated. One would definitely be perplexed by the fact of little search for the root of flicker and fickle in human nature of Mahi. She appears no more than a lurking symptom. Isn’t it her origin in a broken, emotionally drained family in-itself a symptomatic element of something else? However, we are witnessing more and more such characters, who may not be meeting the same end.

The Heroine is a commentary on a nexus among professionals (private lives of men, women and transgender), their profession (economic activity), and entertainment capital. Bhandarkarhighlights how the first two are inextricable in the regime of the third, as we find these in the Bollywood. Here, crockery, duplicity and double-crossing define business transection and are rules of the game. Im/morality submits to the regime of entertainment capital. When Mahi feels disgusted with it, she should become an onlooker and prefer oblivion.

Bhandarkar further brings to us a radical-liberal commentary on the popular cultural forms of urban life. The urban cultural forms include the cinema, fashioning, media channels, and cricketing sport. Glamour, luxury, and boisterous living seem to drive its participants. They value human links to the point when they find them useful to satisfy base desires for money, veneration and carnal sensation. They share few deeper concerns for camaraderie, collective consciousness for love and humanism. Indeed, the collective unconscious predominates. How much the reaction of Mahi in the ways of withdrawal from this devouring collective unconscious is a desirable option to others? Pessimism of Bhandarkar marks it different from what his Fashion and Page 3proposed to us.

Yet, Bhandarkar’s pessimist resolution to the problem does not loom large on the movie. The casts have been eager to step into the director’s frame. They have gratified the close-up camera by sufficiently contorting their facial muscle, and reserving their body language to bring characters on the screen. These sound technical sides of the movie reins pessimism of the resolution from casting any uninviting spell over viewers.

Dhiraj k NiteDhiraj Kumar Nite, A Social Scientist, an emerging film critic,  University of Johannesburg,  Ambedkar Univeristy Delhi. You can contact him through   dhirajnite@gmail.com.

फिल्मी दुनिया की सीख: इब्राहीम जलीस

By इब्राहीम जलीस

पाकिस्तान और भारत में जहां गरीबी और मुफ़लिसी, दुनिया के सारे देशों से कई गुना अधिक है, वहां साधारण आदमियों के लिए सब से अधिक सस्ते प्रकार का मनोरंजन, सिनेमा है। दिन-भर के कामकाज और मेहनत मशक्कत के बाद लोग-बाग जब थके हारे अपने घर वापस लौटते हैं तो घर में एक बीमार और कुरूप बीबी और रोनी सूरत के कुछ बच्चे उनकी दिन-भर की कोफ्त और थकान में और अधिक वृद्धि कर देते हैं। इसी वजह से आम लोग यह चाहते हैं कि वे अपनी बीमार और मरियल बीवी से दूर और मधुबाला के अधिक समीप रहें। ठंडे चूल्हे वाले घर के बजाय आरमदायक फर्नीचर वाले एअरकंडीशन्ड सिनेमाघर में अपना समय किल करें। यदि आप दोपहर से लेकर आधी रात तक पाकिस्तान और भारत के सिनेमाघर पर विहंगम दृष्टि डालें, तो आपको यह महसूस होगा कि सिनेमा घर किसी मुर्दा चूहे की लाश है जिस पर असंख्य चीटियां चिपटी हुई हैं।mughal-e-azam-800

    मैंने न केवल फिल्म बनाने वाले आदमियों-फिल्म निर्माताओं को बहुत समीप से देखा है अपितु फिल्म देखनेवालों का भी बड़ा गहरा मनोवैज्ञानिक अध्ययन किया है और मुझे विश्वास है कि कई अवसरों पर फिल्म देखने वाले फिल्म बनाने वालों से अधिक दिलचस्प और आश्चर्यजनक सिद्ध हुए हैं। मैंने एक बार बड़ी गम्भीरता से विचार किया कि हमारे साधारण गरीब नागरिक सिनेमा के इतने ज्यादा शौकिन क्यों है? वे जब अपने छोटे वेतनों और सीमित आय में अपने दैनिक जीवन के खर्चे पूरे नहीं कर सकते, तो सिनेमा क्यों देखते हैं और सिनेमा देखना उनके लिए क्यों इतना आवश्यक है? क्या यह खेदपूर्ण नहीं है? इन प्रश्नों पर बड़ी देर तक विचार करने के पश्चात में इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि दिनभर कठोर परिश्रम करने के बाद आदमी आराम और मनोरंजन चाहता है। हमारे इन दोनों देशों में साधारण आदमियों के लिए न तो फ्री क्लब हैं और न मुफ्त खेलों के स्टेडियम हैं। ले-दे के पब्लिक गार्डन हैं जहां जाते हुए साधारण आदमी इसलिए डरते हैं कि पुलिस के सिपाही उन्हें जेबकतरे या औरतों का पीछा करने वाले बदमाश घोषित करके पकड़ लेते हैं! रही सड़कें, तो उन पर घूमना-फिरना इसलिए भी मुसीबत बन जाता है कि पुलिस उनका धारा 106 के अंतर्गत आवारगर्दी में चालान कर देती है। क्योंकि उनके कपड़े मैले होते हैं और शक्ल सूरत से वे साफ गरीब आदमी मालूम होते हैं और पुलिस की दृष्टि में हर गरीब आदमी आवारा होता है! अब रहा जाता है घर। घर भला क्या मनोरंजन-स्थल बन सकता है? जबकि घर में और काल कोठरी में यूं भी तनिक सा अन्तर होता है। घर में बीवी का बिस्तर एकमात्र मनोरंजक स्थल है किन्तु इसके भावी परिणाम बड़े भयंकर होते हैं अर्थात हर साल एक बच्चा!

फिर दूसरी बात यह है कि साधारण आदमियों की बीवियां अधिकतया सुन्दर नहीं होतीं। वे अधिकतया काली या सांवली, चेचक-ग्रस्त, गन्दी और कुरूप होती हैं। और इन औरतों की खातिर उन्हें हर महीने कम से कम पचास रूपयों से लेकर अधिकाधिक ढाई सौ रूपयो तक कमाने और उनके इलाज व रख-रखाव पर व्यय करने पड़ते हैं। इसके विपरीत हर रोज केवल नौ आने खर्च करके वह ढाई घन्टे तक हसीन से हसीन एक्ट्रेस को खरीद लेते हैं। कामिनी कौशल केवल नौ आने में अपना सारा सौन्दर्य और कान्ति उनकी सेवा में प्रस्तुत कर देती हैं। नर्गिस अपनी सारी प्रेम कहानी उन के हवाले कर देती है। निम्मी अपने संगीत से उन्हें आनन्दित कर देती है। गीतावाली और कुक्कू उन को प्रसन्न करने के लिए ठुमुक ठुमुक कर और थिरक थिरक कर पर्दे पर नाचती हैं। महमूद,  जानीवाकर उन्हें हँसा-हँसा कर अधमुआ कर देते हैं।

         यह सब केवल ढाई घन्टों के लिए होता है मगर होता है केवल नौ आने में!

    लेकिन दिन भर के सख्त कामकाज और कठोर परिश्रम के बाद ढाई घन्टे का यह हुस्न व इश्क, नाच-रंग और हंसी, दिल्लगी से भरपूर मनोरंजन, उनकी थकी हुई तबियतों और उदास मन को नये सिरे से तर-ओ-ताजा कर देता है। और वह अपने बीवी बच्चों के लिए तो नहीं, कम से कम गीताबाली की खातिर जिन्दा रहने के लिए आत्महत्या करने के उस विचार को त्याग देता है। जो सूदखोर पठान या खानदानी सेठ के कर्जे के लगातार तकादों से तंग आकर सुबह उनके मन में उत्पन्न हुआ था। सिनेमा घर से बाहर निकलते हुए वे मन ही मन में पठान और सेठ को दुत्कारते हैं-

    ‘इन साले की ऐसी की तैसी। आत्महत्या करके क्यों हराम मौत मरें। कर्जा कभी न कभी अदा कर ही देंगे। अगर इस जलील कर्जे की वजह से बेमौत मर गये तो कामिनी कौशल और नर्गिस का हुस्न वहां कहां नजर आएगा। निम्मी और गीतावाली के प्रभावशाली एवं कामोत्तेजक शरीर के मोड़-तोड़ वहां कहां हम देख सकेंगे। लता मंगेशकर किसके लिए नगमों का जादू जगाएगी और रीहाना किसके लिए थिरक-थिरककर नाचा करेगी?’

    हमारी जनता को नित्य कि मुसीबतों और दुखों से भरपूर जिन्दगी को सहारा देने में हमारी फिल्में बड़े आश्चर्यजनक कारनामे अंजाम देती है। मुझे याद है कि मेरा दोस्त रशीद खां ‘गमे-जानां और गमे-दौरां’ दोनो से तंग आकर एक दिन अपने जीवन को खत्म कर देने का पक्का इरादा कर चुका था, किन्तु जब मुझे इस का ज्ञान हुआ तो मैं उस का ‘गम गलत’ करने के लिए उसे एक फिल्म दिखाने को ले गया और उस फिल्म ने उस बेचारे की जान बचा ली। वह फिल्म संयोगवश उसकी जिन्दगी के उतार चढ़ाव से बड़ी मिलती जुलती थी। विषेशतयः इस फिल्म में एक गीत था। जिसके बोल थे-

         इन्सान क्या जो ठोकरें नसीब की न सह सके।

    यह गीत सुनते ही मेरा दोस्त आंखों में आंसू छलकाकर बोला-यार। मैंने मरने का इरादा अब बदल दिया है। अब जिन्दा रहूँगा और जिन्दगी की कठोरताओं के साथ अनवरत रूप से लड़ता रहूंगा। इसके बाद से वह नित्य नसीब की ठोकरे खाता चला जा रहा है, परन्तु चेहरे से बड़ा संतुष्ट प्रतीत होता है और हरदम गुनगुनाता रहता है-

         इन्सान क्या जो ठोकरें नसीब की सह न सके।

    इसके इलावा जब वह अपने आसपास अपने जैसे शोषित-पीड़ित लोगों को रोता और सिसकता हुआ देखता है तो उनकी पीठ पर हाथ मारकर गाते हुए उन्हें परामर्श देता है-

         गाये चला जा, गाये चला जा,

         एक दिन तेरा भी जमाना आएगा।

    मैं अपने यहां के सिनेमाघरों को एक ऐसा स्कूल समझता हूं जहां इन्सान को बड़ी से बडी मुसीबतें बर्दाश्त करने के ओर उसके साथ ही साथ किसी औरत का चुनाव करके उससे मुहब्बत करते रहने, मालदार प्रतिद्वन्द्वि को नीचा दिखाने और अन्त में अपनी प्रेमिका से शादी करने के लाभदायक और रामबाण सबक पढ़ाये और सिखाए जाते हैं!

    किसी की यह आपत्ति बिलकुल ठीक है कि हमारे सिनमा घर, हमारी जनता को एक प्रकार के ‘गुनाह बेलज्जत’ की ओर आकृष्ट कर रहे हैं। लेकिन मेरे ख्याल में यह गुनाह बेलज्जत उस गुनाह बालज्जत के मुकाबले में अधिक बेहतर गुनाह है! यदि हमारे सिनेमाघर न होते, मो मुझे विश्वास है कि हमारी गरीब जनता में शराबखोरी, बलात्कार और शीलहरण जैसी गंदी बीमारियां अधिकता से फैल जातीं। इसका स्पष्ट प्रमाण है कि पिछले दिनों कराची के सिनमा मालिकों ने हड़ताल कर दी थी और सारे सिनेमाघर बन्द हो गये थे, तो उस समय कराची के सारे शराबखाने, ताड़ीघरों और रंडियों के कोठों पर तिल धरने के लिए भी जगह नहीं मिलती थी। उन दिनों शराब-फरोश होटलवालों, ताड़ी विक्रेता और रंडियां दिन-रात अल्लाह मियां से दुआएं मांग रही थीं कि खुदा करे कि सिनेमाघर हमेशा के लिए बंद हो जाएं और हमारे मदिरालय और कोठे इसी तरह दिन होली रात दिवाली मनाते रहे। उन्हीं दिनों की एक घटना मैं आपको बता दूं कि उन दिनों शराबखानों में यह कथन बड़े-बड़े बोड़ों पर लिखकर लगवाये गये थे कि-

         सुबह का भूला शाम को घर लौट आए तो उसे भूला नहीं कहते।

और कोठेवालियां इस तरह की गजल और गीत गा रही थीं-

         वह आयें घर में हमारे खुदा की कुदरत है।

         कभी हम उन को, कभी अपने घर को देखते हैं।

         घर आया मोरा परदेसी,

प्यास मिटी मोरी अंखियन की।

इसके बाद अचानक यह हड़ताल खत्म हो गई। सिनेमा खुल गये तो शराबखाने भी खाली हो गये और रंडियों के कोठे भी विरान हो गये। रंडिया बड़ा चीख चीखकर गाती रहीं-

         रात है तारों भरी छिटकी हुई चांदनी

         ऐसे में आ बालमा प्यार की बातें करें…

         हो प्यार की बातें करें।

लेकिन निम्मी, बीनाराय, सबीहा, नूरजहां, शम्मी, गुलशन आरा, यहां तक की बूढ़ी लीला चिटनिस तक ने लोगों का दामन न छोड़ा और उन्हें बुरी राह पर न जाने दिया, पथ-भ्रष्ट न होने दिया। लोग बाग ‘गुनाह बालज्जत‘  से फिर ‘बाल-बेलज्जत’ की ओर लोट आये। इस प्रकार उनका चरित्र और नैतिकता बुराई की ओर जाते जाते फिर अच्छाई की ओर लौट आई। यह सही है कि सिनेमा देखना साधारण आदमी के लिए और विषेशतया गरीब आदमी के लिए एक फिजूलखर्ची ही है। लेकिन यह उस फिजूलखर्ची से लाख गुना बेहतर है, जो शराब बनकर बह जाती है या फिर ‘बाजार ए हुस्न’ से खरीदी हुई बीमारियों का इंजेक्शन बन जाती है। साधारणतया यदि हम फिल्म देखने के परिणामों को देखे तो ज्ञात होता है कि सिनेमा देखने के इस रोग ने हमारी जनता को एक हल्की सी फिजूलखर्ची में फंसाकर दूसरी कई बड़ी महंगी और तबाह कर देनेवाली बुराइयों से बचा लिया है। कराची के सिनमा-मालिकों ने कुछ दिनों के लिए सिनेमाघरों पर ताले लगाकर हमारी आपकी आंखे खोल दीं और बता दिया कि सिनेमाघरों का अस्तित्व जनता के चरित्र को खराब होने से बचाने के लिए कितना आवश्यक है। यूं तो सिनेमाघर भी जनता के लिए एक झक मारने का स्थान है, किन्तु सिनेमाघरों की हड़ताल के समाप्त होते ही जनता ने ‘शाम ढले खिड़की तले सीटी बजाना छोड़ दिया।’ और उस मार्ग पर आ गई जो रीगल, इरोज, नाज, ताजमहल, प्लाजा, रैक्स, पैराडाइज, निशांत, यहां तक कि बाजार ए हुस्न में से गुजरता हुआ सुपर, राक्सी और नूरमहल सिनेमा तक चला जाता है। लेकिन कोई महबूब-नौरोजी रास्ता नहीं भटकता और सारे महबूब-नौरोजी श्यामा को देख-देख कर केवल आँखें सेंकने पर ही संतोष किए लेते हैं।

हमारे सिनेमाघर दूसरा जो लाभदायक सबक इन्सानों को सिखाते हैं, वह है ‘मुहब्बत का सबक’ या प्रेम का पाठ! हमारे सिनेमाघर इन्सानों को कभी नफरत का सबक या घृणा का पाठ नहीं सिखाते। वर्तमान यूग में जबकि एक इंसान को दूसरे इंसान की मुहब्बत की नितांत आवश्यकता है, हमारे सिनेमाघर बहुत बड़े इंसानी कर्तव्य का पालन कर रहे हैं। यह और बात है कि वहाँ मर्द को सिर्फ औरत से और औरत को सिर्फ मर्द से मुहब्बत करने का सबक सिखाया जाता है। लेकिन यह भी तो खालिस इंसानी मुहब्बत ही हुई। इसके अलावा अगर मर्द औरत से नहीं तो क्या गाय-बकरी से, और औरत मर्द से नहीं तो क्या हाथी-घोड़े से मुहब्बत करेगी!Hum Dono Rangeen - Front

हमारे सिनेमाघरों में मुहब्बत का कोई लंबा, पेचीदा और सब्र की आजमाइश करने वाला सबक नहीं सिखाया जाता बल्कि बहुत संक्षिप्त और बहुत आसान अर्थात ‘चट मुहब्बत पट ब्याह!’ परिणामस्वरूप इन सिनेमाघरों से निकलने के बाद एक मुहल्ले के आमने-सामने घरों में रहने वाली लड़की और लड़का जब बाहर की ओर खुलने वाली खिड़कियाँ खोलती या खोलता है तो दोनों एक-दूसरे को दिलीप कुमार और मधुबाला की तरह बस देखते ही फिदा हो जाते हैं, या एक-दूसरे पर आसक्त हो जाते हैं। इसके एक-दो महीने बाद दोनों में शादी हो जाती है। और यदि शादी नहीं भी हो सकती तो वे दोनों रात्रि के अंधकार में गीतबाली और देवानंद की तरह घर से भाग खड़े होते हैं और लाहौर या दिल्ली में पकड़े जाते हैं और फिर फिल्म ‘दिल की बात’ या ‘हम दोनों’ की तरह दोनों का विवाह हो जाता है। हमारे सिनेमाघरों में चट मुहब्बत और पट ब्याह की सीख इसलिए दी जाती है कि कहीं लोग-बाग क्रोध में आकार सिनेमाघर का फर्नीचर ही न तोड़ दें कि क्यों तुमने संतोष कुमार की शादी सबीहा से नहीं कराई। हमारी जनता न्यायप्रिय होती है। और हर मामले में न्याय चाहती है। इसके अलावा शुरू का एक इस्लामी पहलू यह भी निकलता है कि कुँवारे मर्द और कुँवारी औरत को जन्नत में जगह नहीं मिल सकती। इसलिए हमारे सिनेमाघर जो साधारण गरीब आदमियों को उनकी नित्य की ज़िंदगियों के जहन्नुमों से निकालकर ढाई घंटे के लिए सिनेसंसार के स्वर्ग में ले जाते हैं। वे यह चाहते हैं कि उनके सारे दर्शकगण फिल्मी तर्ज की मुहब्बत और शादियाँ करके दुनिया से सीधे जन्नत चले जाएँ! इस सिलसिले की अंतिम बात यह है कि यदि फिल्म के अंत में शादी न हो तो फिर ‘मजा’ नहीं आता और लोग ‘मजे’ के लिए ही फिल्म देखते हैं! अब भला यह भी क्या बात हुई कि दिलीप कुमार छः बजे शाम से सवा आठ बजे रात तक श्यामा से मुहब्बत करता रहा और आठ बज कर बीस मिनट पर उसको छोड़कर हिमालय पर्वत पर जाकर साधु बन गया–? भला क्या मजा आया! मजा तो तब जब ही है कि नूरजहां और संतोष कुमार रिट्ज़ सिनेमा में शादी करें और हम और आप अपने घर जाकर दाल-रोटी का ‘वलीमा’ खाएँ!Aankhen-7

हमारे सिनेमाघर हमारी जनता को सबसे अधिक महत्वपूर्ण जो सबक पढ़ाते हैं वह है वर्ग-घृणा का सबक अर्थात गरीब का गरीब की मदद करना और अंत में दौलतमंद आदमी को नीचा दिखाने का सबक। आपने हर फिल्म में देखा होगा कि एक गरीब किन्तु स्वस्थ और सुंदर नवयुवक होता है, उस पर एक अमीर और दौलतमंद आदमी की नौजवान लड़की फिदा हो जाती है। इस अमीर लड़की का बाप गरीबों पर बड़ा जुल्म ढाता है तो गरीब नवयुवक उस लड़की से, छेड़खानियाँ कर करके खूब बदला चुकता है और अंत में जब अमीर लड़की मालदार बाप की दौलत को ठोकर मार्कर गरीब नवयुवक की तंग, अंधेरी और गंदी ‘चाल’ में बैठी चूल्हा फूंकते-फूंकते रोने-बिसुरने लगती है तो सिनेमाघर में बैठे हुये सारे दर्शक प्रसन्न होकर ज़ोर-ज़ोर से तालियाँ बजाते हैं, सीटियाँ बजाते हैं और चीखने लगते हैं:-

“वह पट्ठे प्रेमनाथ! खूब बदला लिया है। और मजा चखा साली को।”

और जब अमीर लड़की का बाप अपनी भागी हुई लड़की को ढूँढता-ढूँढता गरीब नौजवान की चाल पर पहुंचता है तो उस चाल के गरीब लौंडे उसकी कार पर पथराव आरंभ कर देते हैं और सिनेमा में सीखिए हुई गालियों की बौछार करते हैं। और जब अमीर बाप अपनी नाज-व-नखरों में पली हुई लड़की को गरीब नौजवान का गंदा अंडर-वेयर और लूँगी ढोते देखता है तो उस पर बरस पड़ता है। लेकिन अमीर लड़की साफ-साफ कह देती है—

‘‘पिता जी! मुझे प्रेम हो गया है। (अर्थात प्रेमनाथ हो गया है।) प्रेम आलीशान कोठियों में अनहीन रहता। प्रेम गरीबों की कुटियाओं में रहता है।”

इस डायलाग पर सिनेमा देखने वाले ‘माजे-गामे’ चीख पड़ते हैं-

“वाह पट्ठी जीवन्द रह।”

इसके बाद जब उसका अमीर बाप सिर झुकाए वापिस जाने लगता है तो सिनेमा के दर्शक लोग घृणा से पुकारते हैं-

“धत्त- हात तेरी पापड़ वाले!”

“नस जा ऐथूँ कमीनियाँ।”

“ढर्रर्र….!”

दरवाजे से बाहर निकलते हुये उसकी भिड़ंत हीरो- गरीब नौजवान से होती है तो अमीर आदमी उसे दस हजार रूपये के नोट देता है। दस हजार रुपया ले ले और लड़की वापिस दे दे! किन्तु स्वाभिमानी गरीब नौजवान (जो केवल दस हजार के बदले में फिल्म के हीरो की भांति काम कर रहा है।) दस हजार रूपये अमीर आदमी के मुँह पर दे मारता है। इस पर गरीब दर्शकों के हर्ष का ठिकाना नहीं रहता। बस उनका कुर्सियाँ तोड़ना शेष रह जाता है।

अब इस सिलसिले में एक रहस्य की बात यह है कि अमीरों के विरुद्ध गरीबों के मन में फिल्मों द्वारा घृणा उत्पन्न करना भी स्वयं अमीरों और सेठों का एक लाभदायक व्यवसाय है। फिल्में केवल अमीर लोग बनाते हैं और एक-एक फिल्म पर लाखों रूपये खर्च करते हैं। ये फिल्मों में अमीर और गरीब की टक्कर और अमीर को गालियाँ और गरीब को विजय इसलिए दिलवाते हैं कि ऐसा करने से लोग अधिक-से-अधिक संख्या में फिल्म देखते हैं और इन्हें खूब मुनाफा होता है। अब इस मुनाफे की खातिर यदि अमीरों को नित्य ढाई घंटे के तीन शो के हिसाब से साढ़े साथ घंटे टक्क गालियाँ पड़ती रहें तो क्या हर्ज है! दौलतमंद आदमी यूँ भी दौलत के मामले में बड़े बेगैरत होते हैं!!

यह आंतरिक रहस्य चाहे कुछ भी क्यों न हो, यह तो एक तथ्य और वास्तविकता है कि हमारे सिनेमाघर शनैः शनैः हमारी जनता में वर्ग-चेतना उत्पन्न करते जा रहे हैं और गरीब इन्सानों को उत्साहित कर रहे हैं कि घबराने की कोई बात नहीं है। एक दिन तुम्हारा भी जमाना आएगा इसलिए गाये चला जा, गाये चला जा! टैक्सी ड्राइवर है तो क्या हुआ, सेठ जी की लड़की को भगा ले आ और अपना मैला-कुचैला लंगोट उससे धुलवा। उससे अपना वर्षों का ठंडा चूल्हा गर्माया करो और फिर खटिया पर लेट कर बड़े आराम से अपनी दौलतमंद महबूबा से कहो-

“मान मेरा एहसान अरी नादान कि मैंने तुझसे किया है प्यार!”

और सिनेमाघर को धन्यवाद दो जिसने तुम्हें जीवन का इतना महत्वपूर्ण सबक सिखाया है, पाठ पढ़ाया है।

मुहब्बत ज़िंदाबाद!

सिनेमा ज़िंदाबाद!

सेठ की लड़की ज़िंदाबाद!

हमारा इश्क़ ज़िंदाबाद!

हम दोनों—ज़िंदाबाद

हमारी  गरीबी….ज़िंदा…नहीं यह गलत हो गया!

Ibrahim Jaleesइब्राहीम जलीस उर्दू के बड़े तरक्कीपसंद अफसानानिगार और व्यंग्यकार रहे हैं। उर्दू में इनका स्थान वही है जो हिन्दी में हरिशंकर परसाई जी का है। इब्राहीम जलीस मूलतः हैदराबाद के रहने वाले थे। लेकिन आज़ादी-विभाजन के समय पाकिस्तान चले गए। पाकिस्तान में उनका ज़्यादातर समय लाहौर और कराची में बीता। वहाँ भी वे तरक्कीपसंद जमात के ही हिस्सेदार रहे । उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं- उल्टी कब्र, नेकी कर थाने में जा, ऊपर शेरवानी अंदर परेशानी, हँसे और फंसे, शगुफ्ता शगुफ्ता और काला चोर आदि। 

अनुवादक- अख्तर वागेश्वरी

नई कहानियाँ , मई 1967 से  साभार 

Post Navigation

%d bloggers like this: