Archive for the month “June, 2013”

श्रीनगर उर्फ काहे का स्वर्ग: उस्मान ख़ान

विश्वविद्यालय की दीवार के किनारे-किनारे मैं चलता रहा। रुमी गेट के थोड़ा ही आगे दीवार पर किसीने मोटे मोटे हरुफ़ में ‘वेलकम तालीबान’ लिखा हुआ था। पढ़कर पहले तो अजीब लगा, फिर उतना भी अजीब नहीं रहा। नौजवान लड़के-लड़कियाँ विश्वविद्यालय की तरफ जा रहे थे। मैं एक झील के किनारे बने बागीचे में जाकर बैठ गया। देखता रहा चीनार, औरतें, आदमी, बच्चे, पहाड़ी।

……यहाँ और भी खराब

BY उस्मान ख़ान

“What is “there” becomes “here” when you reach it; likewise your today disguises itself in the form of tomorrow”. – Bedil[1]

A snap shot from a film by Majid Majidi

A snap shot from a film by Majid Majidi

दिल्ली

पसीने से तरबतर हम दोनों ऑटो  में ही बैठे रहे। लम्पट लड़कों का एक दल मुमताज़ भाई का अभिवादन कर मैदान की ओर चला गया। मुमताज़ भाई ने सिगरेट एक लड़के की ओर बढ़ाई, जो उस दल से कटकर रुक गया था। ‘सादिक कहाँ हैं?’ मुमताज़ भाई ने उस लड़के से पुछा। लड़के ने इतना लम्बा कश खींचा कि एक चैथाई सिगरेट फर से राख हो गई, उसने मैदान की तरफ जाते लड़कों की तरफ देखा। ‘स्टेशन पर ‘काम’ करने गया है।’ उसने जवाब दिया। ‘ये क्या हुआ?’ उसके चोंट खाए दाएं हाथ की तरफ देखते हुए एक मुस्कान उसी के चेहरे पर उभर आई। ‘साले ने खिड़की से कुचल दिया।’ ‘कैसे?’ मुमताज़ भाई ने हैरत और चुटकी लेने के अन्दाज़ में पुछा। ‘चैन खींच रहा था। इतने में पास वाले हरामी ने खिड़की नीचे कर दी। दो-तीन बार ज़ोर-ज़ोर से पटक दी। बहिनचैद!’ मुमताज़ भाई ने धीरे से मुसकुराते हुए, अपने मुँह में जीभ फेरी और आखरी कश के लिए सिगरेट उसकी तरफ बढ़ा दी। ‘वो लोग क्या दारु पीने गए हैं?’ लड़के ने हामी में सिर हिलाया। ‘सादिक भी उनके साथ ही है क्या?’ मुझे लगा मुमताज़ भाई को उसकी बात पर यकीन नहीं हुआ था। ‘पता नहीं।’ कहते हुए लड़के ने सिगरेट का सुलगता ठूँठ नाली में फेंक दिया और मुमताज़ भाई का अभिवादन करता हुआ, मैदान की ओर चल पड़ा। शायद उसे भी कोई फर्क नहीं पड़ा कि पहले उसने क्या कहा था।

हम दोनों गर्मी के मौसम को गाली देते हुए बैठे रहे। लोगों के दल के दल स्टेशन की ओर बढ़े जा रहे थे। कोई किसीको नहीं जानता और सब एक जैसे थे। मुमताज़ भाई के लिए सब सवारी, मेरे लिए सब चरित्र। शहरी, कस्बाई, ग्रामीण। तमील, बंगाली, पंजाबी, बिहारी। धोती, पाजामा, जिंस, फ्रॉक, साड़ी, सलवार। सब अलग और सब एक जैसे। यात्री! मैं भी इसी रेले में उतरने वाला था।

मैं सोचने लगा, उस लड़के के दाएं हाथ के पहुँचे की हड्डी टूट गई थी। कितना भयानक दृष्य रहा होगा। एक लड़का किसी रेल में बैठी औरत के गले से चैन खींच रहा है, उसका हाथ अचानक खिड़की से दबता है, और फिर लगातार खिड़की के प्रहार सहता है। लेकिन अपनी बात कहते वक़्त लड़के के चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी। रिस्क में ही बरकत है, बिना रिस्क लिए बिहार से दिल्ली पहुँचे ये लड़के, जो दिन-रात नशा और चोरी करते हैं, अपना जीवन नहीं बिता सकते। सच, रिस्क में ही बरकत है। ये लड़के हर रोज़ नए रोमांचों से दो-चार होते हैं। मैंने सोचा कि मुमताज़ भाई से पुछूँ, क्या वो लड़का स्कूल जाता है? और फिर अपने ही बेमानी सवाल से लज्जित होकर चुप मार गया। स्कूल! थू!

रेल आने में अभी भी आधा घंटा बाकी था। मैंने सोचा एक सिगरेट और पी जाए। मैं सिगरेट लेने के लिए ऑटो  से निकला। ‘किधर।’ मुमताज़ भाई की आवाज़ थी। ‘सिगरेट ले आता हूँ!’ ‘आँहाँ, रुकिए!’ और खुद आॅटो से निकलकर वह सिगरेट वाले के पास गया और बोला, ‘ओरिजिनल देना हो भाई!’ और उस लड़के ने मुस्कुराकर नीचे रखे एक डिब्बे से सिगरेट निकालकर उसे दी। हम दोनों ने सिगरेट खतम की और मैं, अपना बेग जिसमें मेरे एम.फिल., पीएच.डी. के पोथे रखे थे, लेकर स्टेशन की तरफ चल दिया।

रेल प्लेटफॉर्म पर खड़ी थी। उत्तर संपर्क क्रांति। वही अनजाने चेहरे, जो बाहर हड़बड़ाहट और आष्चर्य का भाव लिए चले जा रहे थे, प्लेटफॉर्म पर भी चले जा रहे हैं। रेल के आगे वाले जनरल डिब्बे में मैं घुस गया। वही हमेशा का हाल, पैर रखने की भी जगह नहीं थी। मैं प्लेटफॉर्म के दूसरी तरफ वाले दरवाजे़ पर जाकर खड़ा हो गया। देखा एक आदमी पास वाले ट्रैक पर बैठा पेप्सी में व्हिस्की मिला रहा है। उसने मेरी ओर देखा। ‘लोगे।’ मैंने मुस्कुराते हुए उसे टाल दिया। ‘कहाँ तक जाना है?’ ‘जम्मू-तवी!’ मैंने कहा। ‘अच्छा जम्मू।’ ‘और आप?’ मैंने पूछा। ‘जहाँ तक ट्रेन जाएगी।’ उसने कहा। ‘उधमपुर।’ मैंने उसकी ओर देखा। उसने सशंकित नज़रों से मेरी ओर देखा। मैंने भी उसकी उपेक्षा की।

मैं रात-भर दरवाज़े के पास सिकुड़कर बैठा रहा और आस-पास वालों के लिए तकिए का काम करता रहा। सुबह होते-होते सिट का एक कोना बैठने के लिए मिल गया। एक स्टेशन पर रेल रुकी और धड़-धड़ करती हुई बुढ़ी औरतों की एक टोली उस डिब्बे में घुस गई। सभी यात्री, जो पहले से आराम की भंगिमा को प्राप्त कर रहे थे। हड़बड़ाने लगे। ये औरतें उड़ीसा की थीं। तीर्थ के लिए जा रही थीं। दो तो इतनी बुढ़ी कि लौटेंगी यह भी कहना मुश्किल लग रहा था। खैर!

जम्मू

रेल ने ठीक समय पर जम्मू उतार दिया। स्टेशन के बाहर जाते ही लगा मैं किसी आर्मी कैम्प में आ गया हूँ, स्टेशन के बाहर बने बागीचे के पास आर्मी के जवान बन्दूक लिए बैठे थे। उनमें से दो चाय पी रहे थे, एक अधेड़ और एक 25-26 साल का जवान। उनके आगे कँटीले तार की फेंस थी। जैसे ही उधर से कुछ हो, इधर से गोली चलाने को मुस्तैद सैनिक।

मैंने स्टेशन के इस आशंका भरे माहौल को पार किया और स्टेशन के बाहर नाले पर लगी चाय की दुकान पर चाय पीने लगा। 7 रुपये की चाय। जैसे-तैसे अपनी भूख दबाते हुए, मैं श्रीनगर जाने वाली गाड़ी के बारे में पुछने लगा। पुछते-पाछते एक गाड़ी मिली – 800 रुपये, इससे कम में भी गाड़ी मिल सकती थी, ये मुझे बाद में पता चला। तो, मैं श्रीनगर की ओर चल दिया। गाड़ी में दो आर्मी कैम्प में काम करने वाले जवान बैठे थे। सादे कपड़े, पहचानना भी मुश्किल कि ये उन्हीं बन्दूकधारियों के हमजोली हैं, जिन्हें देखकर आशंका होती है – अब क्या होगा!

गाड़ी का चालक एक सिक्ख था। मैंने अपनी सिगरेट पीने की इच्छा को गाड़ी रुकने तक दबा देना ही उचित समझा। रास्ते में एक जगह उसने गाड़ी खड़ी की, बाकी लोग खाने लगे, लेकिन अपनी जेब तो हल्की थी। सो, मैंने एक चाय ली और सिगरेट पीने लगा। गाड़ी चालक मुझे घुर कर देखने लगा। ‘जल्दी करलो।’ उसने कहा। जैसे मेरी ही वजह से गाड़ी रुकी हुई थी। ‘दूसरे लोगों को भी आ जाने दीजिए।’ मैंने कहा। वह दुकान के अंदर बैठी सवारियों की ओर बढ़ गया।

जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते जा रहे थे, पंजाबी बोलने वालों से दूर होते जा रहे थे और एक मिश्रित भाषा, जिसमें पंजाबी के शब्द बीच-बीच में उछल आते थे, मेरे कानों में पड़ रही थी। कुछ शब्दश् समझ आते थे, बाकि भाव से काम चलाना पड़ रहा था।

गाड़ी में मेरे दोनों ओर आर्मी के जवान थे। उनमें से एक से बात होने लगी। यह व्यक्ति बंगाल का था, उसे जैसे ही पता चला मैं, प्राध्यापक के साक्षात्कार के लिए जा रहा हूँ। उसने अपने दोस्त का किस्सा सुनाना षुरू कर दिया, कैसे दोनों साथ खेलते थे, साथ पढ़ते थे, फिर उसे रुपया कमाने का शौक हो गया और वह आर्मी में आ गया, उसका दोस्त पढ़ता रहा और आज प्राध्यापक है। उसकी बातों से साफ था कि वह रीतिकालिन कवियों से भी अधिक अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन करने में माहिर था। उसने खुब रुपया कमाया और उड़ाया है, उसका कहना था। हालाँकि मैं देख चुका था, कि वह गाड़ी-चालक से 50 रुपये को लेकर हुज्जत कर रहा था। वह कहने लगा कि उसने वायुयान में भी यात्रा की है, और वो तो आज इस जीप में जा रहा है, जबकि वह चाहता तो आज भी वायुयान में जा सकता था। लेकिन इच्छा ही नहीं हुई। खैर, उसे संतुष्टि थी, कि उसका प्राध्यापक दोस्त आज भी उसकी गालियाँ हँसकर सुनता है।

फिर वही जवाहर टनल, घुप्प अँधेरी टनल, जिसमें घुसते ही कुरोसावा के ड्रिम्स की टनल याद आने लगी। पता नहीं कब वह सैनिक टनल पार कर निकलेगा और फिर पिछे मुड़कर देखेगा – टनल का घुप्प अँधेरा और सुनेगा – फौजी बुटों की टाप। पता नहीं जब इस टनल से आखरी सैनिक बाहर होगा तो वह क्या सोचेगा! इस टनल के उस पार वह क्या कर रहा था?

सड़क गाडि़यों से भरी हुई थी, लग रहा था, लोगों का एक रेला श्रीनगर की ओर जा रहा है। हमारी गाड़ी में पीछे चार लड़के बैठे हुए थे। उम्र – 14-15 साल। उनमें से एक को उलटी हो गई। ये चारों लड़के मध्यप्रदेश से कश्मीर मज़दूरी करने के लिए जा रहे थे। दो पहले से वहाँ काम कर रहे थे और दो पहली बार जा रहे थे। अपने बारे में कुछ भी बोलते हुए वे हिचक रहे थे, जैसे कुछ अनहोनी होने वाली हो। उन लड़कों को देख मेरा मन एक बार और आशंका से भर गया। उलटी करने वाला लड़का सीट पर लेटे-लेटे सो गया था।

पास बैठा जवान भारत के विभिन्न इलाकों में अपनी पोस्टिंग और अनुभव बताता चल रहा था। मैं भी हाँ-हूँ कर रहा था, ताकि मेरा ध्यान बँटा रहे। रास्ते में एक जगह ट्राफिक जाम था। आर्मी के जवान चारों और घुम रहे थे। पहले मुझे लगा कुछ दुर्घटना हो गई है। फिर पता चला, सड़क बनाने के लिए रास्ता साफ किया जा रहा है, जिसके लिए एक बड़ा पेड़ काटा जा रहा था। आर्मी के जवान सड़क साफ करने में मदद कर रहे थे। ज़्यादातर इतने काले कि वहाँ की स्थानीय आबादी से फूल कांट्रास्ट में।

सड़क साफ हुई तो हमारी गाड़ी भी धीरे-धीरे खिसकने लगी। हमारा गाड़ी-चालक वैसे भी बहुत धीरे गाड़ी चला रहा था। पंजाबी पॉप संगीत चलाकर वह धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था। क़ाज़ीगुंड में एक जगह गाड़ी खड़ी कर चालक मेवों की एक दूकान पर चला गया और चाय पीने लगा। पहले ही इतना धीरे-धीरे वह हमें ले जा रहा था, कि लग रहा था ये सफर खतम ही नहीं होगा। किसी अनजाने रास्ते पर चलते हुए यह अक्सर ही लगता है, कि सफर बहुत लम्बा है। हर शहरनुमा जगह पर मुझे लगता था, अब आ गया श्रीनगर, लेकिन नहीं। बाहर रुई के फाहों की तरह की कोई चीज़ उड़ रही थी। बंगाली हमसफर ने कहा, ये अगर नाक में चली गई तो चार घंटे छिंकते रहोगे। मैंने अपनी दूसरी ओर बैठे सैनिक से खिड़की के शीशे ऊपर कर लेने को कहा। उसने शीशा चढ़ा लिया। तब भी एक दो फाहे अंदर आ चुके थे और गाड़ी में बेमुरव्वती से गष्त लगा रहे थे।

एक गाँव में उसने गाड़ी फिर रोक दी। इस बार उसने बिना उतरे ही पिछे मुड़कर दोनों सैनिकों को सलाह दी। यही आखरी गाँव है। इस गाँव में भी चारों तरफ सैनिक खड़े और घुमते दिखाई दे रहे थे। मुझे समझ नहीं आया, वह क्या कहना चाह रहा था। मेरे दाईं तरफ वाला सैनिक नीचे उतर गया और थोड़ी देर में हँसता हुआ अपनी जेब पर हाथ रखे लौट आया। इसके आगे शराब नहीं मिलती है। बंगाली सैनिक ने कहा। मुझे लगा वह मज़ाक कर रहा है। अब तक मुझे गुजरात के बारे में ही यह पता था, कि वहाँ शराब नहीं मिलती है। दूसरा सैनिक कहने लगा, पहले मिलती थी, अभी सब दूकाने तोड़-ताड़ दी है। मुझे बस्ती का वह दृष्य याद आ गया, जब पाकिस्तान में शराब की दूकाने तोड़कर गैलनों शराब नालियों में बहा दी गई थी। बेचारे मण्टो का पाकिस्तान!

धीरे-धीरे गाड़ी फिर खिसकने लगी। देखा एक और टनल लगभग बनकर तैयार हो चुकी है, ये नई टनलें 90 कि.मी. का फासला कम कर देंगी। और सुना रेल के लिए भी एक नया ट्रैक बिछाया जा रहा है, जो सफर को आसान और ट्राफिक को कम कर देगा। और टूरिस्ट और सैनिक।

अपने बंगाली हमसफ़र की बातें सुनते-सुनते, जिसमें पंजाबी पाॅप खुद-ब-खुद घुलता जा रहा था। चालक महोदय को अचानक जाने क्या सुझी, वो कहने लगा, ‘ये झेलम है।’ मुझे उस पर पुरा शक हुआ। और उसके पॉप संगीत को सुनते-सुनते मैं मन ही मन झल्ला चुका था, मुझे लगा कि कहूँ, तो मैं क्या करूँ, कुद जाऊँ, झेलम है! हँह!! मैंने देखा एक नदी है, झेलम ही होगी।

 खै़र, आखिरकार गाड़ी ने मुझे एक चैराहे पर छोड़ा। मैंने एटीएम तलाश किया और कुछ रुपया निकाला, ताकि आगे का काम आराम से चल सके। और एक मिनी बस में बैठ गया, जो मुझे डल गेट उतारने वाली थी।

श्रीनगर

गोधूली बेला का समय था। मैं मिनी बस से एक चैराहे पर उतरकर खड़ा था। एक सिगरेट वाले की दूकान पर पहुँचा, सिगरेट ली और उससे पुछा, ‘यहाँ रात भर रुकने के लिए सस्ता कमरा कहाँ मिलेगा।’ उसने कहा, ‘रुकिए, अभी दिखा देते हैं।’ मैं रुका रहा, 5-7 मिनट में ही एक अधेड़ मोटा-सा आदमी आया, और मुझसे कहने लगा, ‘कितने दिन के लिए चाहिए?’ मैंने कहा, ‘बस रात भर के लिए, इंटरव्यू देने आया हूँ, देकर कल ही चला जाऊँगा।’ उसने एक लड़के को बुलाया, और मेरी तरफ देखकर कष्मीरी में कुछ कहा, पता नहीं वह कश्मीरी भी थी या नहीं।

                रात पुलिया पर उतर आई थी और मैं उस लड़के के साथ पुलिया पर चले जा रहा था। मैंने उससे कहा, ‘सिगरेट पिते हो!’ उसने कहा ‘नहीं, मैं कोई भी नशा नहीं करता।’ ‘ठीक है।’ मैंने कहा। उसका नाम गुलज़ार था। वह एक शिकारे पर मुझे लेकर गया, जो उसी पुलिया के नीचे लगा हुआ था। मैंने देखा शिकारा ठीक है, कमरा भी रहने लायक। फिर वही किराये को लेकर हुज्जत। आखिरकार 300 रुपये में रात भर रहना तय पाया गया।

गुलज़ार को जब पता चला कि मैं विश्वविद्यालय में पढ़ाने के लिए इंटरव्यू देने आया हूँ, तो पहले तो उसे विश्वास नहीं हुआ। वह हैरत से मेरा मुँह देखने लगा। फिर बोला, ‘तुमको तो लड़के पीट देंगे।’ मैंने कहा ‘क्यों?’ बोला, ‘यूनिवर्सिटि के लड़के खराब हैं।’ मैंने कहा, ‘अच्छा!’ फिर उसने बताया कि वह भी 8वें दर्जे में अपने मास्टर को पीट चुका है। और उसके बाद से उसने पढ़ाई भी छोड़ दी अब शिकारा चलाता है और मज़दूरी करता है। उसकी छोटी बहन और भाई पढ़ रहे हैं, लेकिन उसे विश्वास था कि उसका भाई भी किसी मास्टर को पीटकर एक दिन उसके साथ ही काम करने लगेगा। कहने लगा, ‘हमारा भाई हमसे भी ज़्यादा गुस्से वाला है।’

गुलज़ार को चाय पीने का बहुत शौक था। उसने ग्लास भर के चाय बनाई और पीने लगा। मैं लम्बे सफ़र की थकान से चुर था, साबुन, तैल ढुँढ़ने बाज़ार की तरफ जाना चाहता था, लेकिन देखा कि गुलज़ार मुझे जाने नहीं देना चाहता, पहले तो मुझे शक हुआ, पुरा वातावरण ही आशंकापूर्ण था, फिर वह बोला, ‘यहाँ बाज़ार जल्दी बंद हो जाता है, यहाँ का माहौल नहीं पता है तुमको।’ मैंने उसकी बात अनसुनी कर दी और यह कहते हुए कि मैं थोड़ी ही देर में आ जाऊँगा, मैं बाज़ार की तरफ चल दिया। पुलिया पार कर मैं एक चैराहे पर पहुँचा, जहाँ कुछ दूकाने थी। लेकिन तैल का पाउच कहीं नहीं मिला। मैं साबुन लेकर लौट आया। नहाया तो कुछ ताज़गी महसूस हुई। मैंने कहा, ‘खाने के लिए कहाँ जाना चाहिए।’ वह बोला, ‘यहीं रुको, खाना हम लेकर आएगा। क्या खाएगा तुम?’ मैंने कहा, ‘कुछ भी, सादा-सा, चावल-दाल।’ उसने कहा, ‘चटनी भी लेगा।’ मैंने कहा, ‘हाँ, मिल जाए तो।’ बोला, ‘अस्सी रुपये दे दो।’ मैंने उसे सौ रुपये दिये और कहा, ‘अगर तैल का पाउच मिले तो लेते आना।’ वह रुपये लेकर मुझे शिकारे पर ही रहने की हिदायत देता हुआ चला गया। मैं शिकारे के एक कोने में लेटकर, जो बाहर की तरफ खुलता था, सिगरेट जलाकर झील में जलती हुई बत्तियों का प्रतिबिंब देखता रहा। थोड़ी देर में तीन आदमी एक नाव लिए जाल बटोरते हुए पास से गुज़रे। तीनों ही हड्डी के ढाँचे।

गुलज़ार लौटा तो मैंने खाना खाया। और फिर वह भी खाना खाकर जाने लगा। मैंने पुछा ‘कहाँ?’ तो कहने लगा, ‘मज़दूरी।’ मैंने कहा, ‘रात को।’ उसने कहा, ‘हाँ रात भर सवारियाँ आती रहती है, हम काम करता है, नहीं तो घर नहीं चलेगा।’ मुझे लगा, वह मुझ पर ही व्यंग्य कर रहा है।

सुब्ह हुई, सब कुछ रौशन हुआ, तो देखा झील बहुत दूर तक खींची हुई है। मैंने कहा, ‘मैं 2 बजे तक लौट आऊँगा।’ गुलज़ार कहने लगा, ‘रजिस्टर में साइन कर दो, और हमको 4 सौ रुपये और दे दो।’ मैंने ज़्यादा हुज्जत न करते हुए, उससे कहा कि मैं अपना सामान लेकर ही चला जा रहा हूँ, अगर आज ही नहीं लौटा, तो फिर तुम्हारे पास आ जाऊँगा। लेकिन वह लड़का बड़ा हुज्जती था। मैंने उसे टालते हुए अपना बैग उठाया और शिकारा छोड़ दिया।

मैं फिर उसी चैराहे पर पहुँच गया, जहाँ कल मुझे मिनी बस ने उतारा था। पुछने पर पता चला, यहीं से बस मिलेगी, जो सीधे कश्मीर विश्वविद्यालय उतार देगी। मैं बस का इंतज़ार करने लगा। कुछ नौजवान लड़के बस-स्टॉप पर बैठे सिगरेट पी रहे थे। वहीं पास में खड़ा होकर मैं भी सिगरेट पीने लगा। बस आई और मैं उसमें बैठ गया। बस श्रीनगर में घुमती हुई चलने लगी। झील और बागीचों के बीच होटलें, रेस्टोरेंट, घर, दफ़्तर और सैनिक। बस ने मुझे रुमी गेट पर उतार दिया। यह यूनिवर्सिटी का मुख्य द्वार नहीं था। मैंने अंदर जाकर पुछा, तो पहरेदार ने बताया, ‘अभी तो 9 बजा है, 10 बजे तक इंटरव्यू षुरू होगा।’

तब तक मैंने इधर-उधर घुमने की योजना बनाई और निकल पड़ा। विश्वविद्यालय की दीवार के किनारे-किनारे मैं चलता रहा। रुमी गेट के थोड़ा ही आगे दीवार पर किसीने मोटे मोटे हरुफ़ में ‘वेलकम तालीबान’ लिखा हुआ था। पढ़कर पहले तो अजीब लगा, फिर उतना भी अजीब नहीं रहा। नौजवान लड़के-लड़कियाँ विश्वविद्यालय की तरफ जा रहे थे। मैं एक झील के किनारे बने बागीचे में जाकर बैठ गया। देखता रहा चीनार, औरतें, आदमी, बच्चे, पहाड़ी।

फिर देखा 10 बज गई है। तो रुमी गेट से ही फिर विश्वविद्यालय में दाखिल हुआ। साक्षात्कार वाइस चांसलर के दफ़्तर के पास प्रशासन भवन में होना था। वहाँ पहुँचा, तो देखा साक्षात्कार देने के लिए मेरे अलावा और 11 लोग बैठे थे। अलीगढ़ विश्वविद्यालय, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, ग़रज़ कि देश भर से इस विश्वविद्यालय में हिंदी पढ़ाना चाहने वाले नौजवान और अधेड़। कुछ के पास किताबों और लेखों का ऐसा ज़खीरा कि देखते ही लगे कि इन्होंने अपनी उमर इसी काम में झोंक दी है। मैं समझ गया, बेटा तेरी दाल यहाँ नहीं गलनी है। अलीगढ़ से पढ़े एक साहब ने मेरे करीब बैठते हुए मुझसे बड़ी ही शाइस्तगी से हाथ मिलाया और धीरे से पुछा, ‘कहाँ के रहने वाले हैं खान साहब!’ मैंने कहा, ‘मध्यप्रदेश!’ ‘हम जे.एन.यू. गए थे एक बार, लेकिन अपना वाला कोई मिला नहीं।’ मेरे कान में धीरे-धीरे ज़हर घुलने लगा। ‘अब आप से मिलेंगे अगर कभी आए तो!’ मैंने कहा, ‘ठीक है!’ और वहाँ से उठने लगा। उन्होंने फिर अपने नरम हाथों से मेरा हाथ पकड़कर रोका, ‘अपना कांटैक्ट नंबर दीजिए।’ मैंने उन्हें एक फर्जी नंबर थमाया और उठकर दूसरी जगह बैठ गया। देखा मेरे सामने एक सज्जन बैठे हुए थे। साफ़ सफ़ेद कुर्ता-पाजामा, जिस पर भूरे रंग की बंडी। चुटियाधारी ये सज्जन अपने सामने अपनी प्रकाशित सामग्री का ढेर लिए बैठे थे। और ख़ालिस हिंदी में बात कर रहे थे। हजारीप्रसाद द्विवेदी पर उनका शोध-प्रबंध था। मेरे पास बैठे एक व्यक्ति ने बताया कि वह उनके साथ पहले भी एक साक्षात्कार दे चुका है। कहने लगा, ‘उस इंटरव्यू में तो ये धोती-कुर्ता पहनकर आए थे। तब उनसे बात कर एक्सटर्नल ने कहा था, लगता है साक्षात् द्विवेदीजी से ही बात कर रहे हैं।’ सच में, लगता भी होगा। अंतर्वस्तु का पता नहीं, रूप तो वही था।

इंटरव्यू खत्म होते-होते पता चला कि कल श्रीनगर बंद रहेगा। किसने ‘कॉल’ दिया है, पुछने पर कोई कुछ बोला नहीं। तो उसी शाम गाड़ी से जम्मू के लिए निकलना था। इस बीच मैंने खाना खाया और एक बागीचे में जाकर बैठ गया। देखा कुछ लड़कियाँ फूटबॉल खेल रही थीं। दूर से उन्हें देखता मैं सिगरेट पीने लगा। अब जाकर मुझे लग रहा था मैं श्रीनगर में हूँ। सोचने लगा इस जगह के बारे में क्या-क्या सुनता आया था और ये जगह कुछ अलग तो नहीं है। वही परेशानियाँ यहाँ के नौजवानों की आँखों में भी घुम रही हैं, जो दिल्ली के नौजवानों की आँखों में तैरती रहती हैं। फिर ये काहे का अलग से स्वर्ग! दिमाग़ में लगातार एक शेर का मिसरा ए सानी घुमता रहा – ‘चारों तरफ खराब यहाँ और भी खराब।’ ‘चारों तरफ खराब यहाँ और भी खराब।’ लेकिन दिमाग़ पर बहुत ज़ोर देने के बाद भी मिसरा ए उला याद नहीं आ रहा था। शायद मैदान में फूटबॉल खेलती हुई किसी कमसीन को याद था! पर मैं पुछ नहीं पाया…


[1]  डॉ. इक़बाल का अनुवाद

उस्मान ख़ान

उस्मान ख़ान

उस्मान ख़ान समकालीन हिंदी कविता के अलहदा कवि हैं. चर्चाओं और पुरस्कारों की भीड़ से अलहदा…छपाऊ मानसिकता से भी अलहदा..जे.एन.यू. के हिंदी विभाग से मालवा के लोक-साहित्य पर शोधरत हैं. इनसे usmanjnu@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

Museumisation of the Proletarian Past: Dhiraj Kr Nite

The socialist vision of progress and woman’s emancipation compelled the women to become employees and join manly professions, KM points out. Later, the dual currency policy incited the woman to partake in the ‘love making’ activities with Western tourists in order to earn the strong currencies, raise income, and afford western consumption goods in the second market. ‘Like their sisters in the west, they would have burnt their bras, had these been in the shops’. The KM organisers are at their best to express the essence of their ‘eclectic’, patriarchal nationalist world view: the ‘glorious’ capitalist world-view is still subservient to ‘Kulak’ nationalism.

Communist Museum and Eclectic Views of the Velvet Revolution in Prague, Czech Republic

BY Dhiraj Kr Nite
The Velvet revolution in the erstwhile socialist countries in Eastern Europe and its follow-up heralded the end of an era what Hobsbawm described as the short twentieth century. Communist Museum grafted in Prague, the centre of the Velvet revolution, stands as a constant critique of that proletarian past which the revolution was opposed to. I preferred to take a look on ‘Communist’ Museum (KM) than National Museum during my short sojourn in the city of Kafka, Prague, on November 1-3, 2011. My curiosity included a desire to have a comparative understanding of this one with Apartheid Museum in Johannesburg, andgenerally of the museumisation project of Velvet revolution.Prague KM hosts a really small number of artefacts and a decent series of wall-papers and television commentaries over its subject. The subjects range from events of four decades of communist ways to progress, and criticism and fight directed against that.

Marx  from the view of Velvet Revolution in Prague

Marx from the view of Velvet Revolution in Prague

We know that no museums speak on its-own, nor artefacts assembled therein. The two museums of my current discussion are the project expressing variants of democratic polity and their mode of functioning. Apparently, they have not burnt down those disagreeable artefacts; significantly, nor have they declined to have dialogue (which would have been tantamount to banishing) with them in toto. They have opted for disparaging, incarcerating, and sanitising a few elements of the past and present of those societies.This option originates from indomitable confidence, which the new polity finds within it in the current politico-economic conjuncture. At the same time, the strategy of Prague KM is to freeze and hallow communism and left trajectory of the life as a moment. It amounts to, needless to state out, overlooking and overtopping of the dynamism of left trajectory, and its characteristics ability of auto-criticism. After all, no incumbent polity, hitherto known, gave way to the fundamentally new regime in as ‘minimal’ hostile manner as the proletarian polity. Prague KM also enables the Velvet revolution to clean-up the memory, including statues, painting and other artefacts of the dislodged polity from the public space by confining them at one small place.
Prague KM is a project of transmission of ‘eclectic’, patriarchal,nationalist opinions over the time of communist polity, its objective, functioning, and offshoot. Its target audience includes both the future generation and sympathisers of the dislodged polity. At the entry to the museum, it promises to present the dream, the reality, and the nightmare of communist past. The organiser of museum tells us through the first commentary over Marx and Lenin that both of them were mediocre, maniac, megalomaniac, and traitor to their own nations.

Lenin from the view of Velvet Revolution in Prague

Lenin from the view of Velvet Revolution in Prague

Other commentaries lay down a story as follows. The ‘Stalinist’ polity was crass materialism. It denied any place for spiritual, emotional life. However, my cursory walk around the city makes me wonder how have the religious symbols remained intact Prague? KM regards socialism as a fanatic movement of science that was at its best in manufacturing of competitive war machinery. The USSR had glory of, besides the early testing of nuclear and hydrogen bombs, the first intercontinental ballistic missile that was capable of carrying nuclear warheads (1955-56). In contrast, its workshops resisted a meaningful division of labour, and laggard in technological sophistication (in the 1950s). Rather, the proletariat devised powerful ways to oversee every other terrains of social life.The obsolete Marxian doctrine of progress saddled the working people with undue responsibility of excellence and performance, and propaganda war against capitalism and the USA. The children were initiated in auto-didactic learning, burdened with educational task of becoming all-rounder, and made to become indoctrinated social species. The working persons were drawn to excel in sporting and theatrical activities in order to generate glory for the polity at the international arena. The polity patronised art and literary creativity, known as socialist realism. The latter propagated the emancipator feature of proletarian vanguardism. It stressed on the exploitative antisocial element in capitalism and the USA front. It taught the people to sense glory in unboundefficiency and has had little concern for the situation of real income. KM, of course, misses any reference to the actually improved ‘quality of life’ against any threat of its deterioration, which unbound workload caused to labouring people during the early industrial revolution.

Core viewsKey Point of Eclectic, Nationalist Critique; The Divinity did not Disappear under Communism

Prague KM points out that the communist fetishism with industrialism resulted in environment devastation. The unreasonable dozes of chemical and mechanical inputs left over the toxified soil, water and human body. This is an offshoot of the modern mode of resource use seen across the globe; we do not come across any such allusion to this point therein. Disdainfully, KM proclaims that the proletariat turned out privileged in these collectivised units of production.The old property owner-cum-producer, called Kulaks in village localities and had acquired property and natural sound reasoning through centuries of drudgery, were forced to join those production units. The socialist price formation laid down affordable nominal prices of items of consumption, which remained inadequately available on the shop shelf. The ‘second’ (black) market developed of these commodities, where the state patronised personalities and other individuals could access and afford them at competitive prices. The emphasis on self-sufficiency and autarky did not mean the absence of any test for ‘western’ consumer goods. The beneficiaries of the polity enjoyed it through gifts and their abroad visits. The KM presentation refrains from any overt mentioning of the currently placid bourgeois comment: ‘nationalisation, collectivisation or cooperatives bread inefficiency’. One may oops! We may also note circumvention of any concrete class-based depiction of entitlement question and emphasis on foul favouritism and cronies of the polity.Divinity did not disappear
The socialist vision of progress and woman’s emancipation compelled the women to become employees and join manly professions, KM points out. Later, the dual currency policy incited the woman to partake in the ‘love making’ activities with Western tourists in order to earn the strong currencies, raise income, and afford western consumption goods in the second market. ‘Like their sisters in the west, they would have burnt their bras, had these been in the shops’. The KM organisers are at their best to express the essence of their ‘eclectic’, patriarchal nationalist world view: the ‘glorious’ capitalist world-view is still subservient to ‘Kulak’ nationalism.

Recourse to a Love Making Industry for the Strong Currency and Enabling Income

Recourse to a Love Making Industry for the Strong Currency and Enabling Income

The Slogan (Title) of the Photograph is Telling

The Slogan (Title) of the Photograph is Telling

KM emphasises that the Velvet revolutionaries bore the brunt of totalitarian despotic communism, as it was. The latter gained legitimacy over the claims for vanquishing the Nazis and fascism. Despite the propaganda machine against the image of exploited and manoeuvred working-class in capitalist countries and the impending nuclear war from the USA, it cemented its domination through the ‘people militia’. The USSR’s tanks rolled over the unarmed people. In the league of 1968 Prague Spring, the velvet fighters have risked their life to stand for freedom of Czech humanity, and humanness and decency in general. We do not get any glimpse of the participatory nature of some of ‘celebrated’ socialist institutions, including the commune judiciary and factory council.

An Artistic View of Coming to a Fuller Life after the fall of Communist Polity

An Artistic View of Coming to a Fuller Life after the fall of Communist Polity

Artur Szarecki, a Polish PhD researcher at University of Warsaw, has shared his opinion with me on the downfall of socialist polity in Poland. To him, the grievance stemmed from inadequate availability of consumer items in the public cooperative shops to the people, whose working hours were humanly short and who enjoyed sufficient public time. They did not complain about public infrastructure. Secondly, the philosophy of end of dialectics, which was the foundation of one party system, degenerated into a moribund organ; yet, it was unable to fully oversee all shades of activities, such as the second market. The visionary person and beneficiary of the second market looked out for a right to elect leaders to rule and enabling necessary institutions. It means the velvet revolution is a twofold: the right to happily consume, and elect one’s own leaders to rule. These rights have also become the signpost of the People’s Left in our time. The future of this Left, this path of transition, appears bright. Notwithstanding this, Left thoughts have already refashioned itself by internalising some concerns, such as environment regeneration and integral humanism. We, the World Left, for a truly emancipatory and advancing society, are still striving to come up with an integral, organic answer to some of the questions posed in Prague KM, and practice that answer, if any, in our life. Our success on this front would ensure that Left is our immediate future. The World Left refuses to turn out as a museum!

Dhiraj k Nite

Dhiraj Kumar Nite, A Social Scientist, University of Johannesburg,  Ambedkar Univeristy Delhi. You can contact him through   dhirajnite@gmail.com.

सुरेन्द्र चौधरी- विराट ऐतिहासिक संदर्भों से समृद्ध आलोचक: मार्तंड प्रगल्भ

सच्ची आलोचना किस कदर गंभीर वैचारिक संघर्ष का परिणाम होती है इसे सुरेन्द्र चौधरी के लेखन में स्पष्ट ही देखा जा सकता है। रचना के प्रति  जिस संवेदनशीलता की जरूरत होती है और असहमति के क्षणों में भी आलोचना की भाषा में  जो विनम्रता होनी चाहिए इसे भी इनके यहाँ देखा जा सकता है। सुरेन्द्र चौधरी पर बहस एक ऐतिहासिक ज़रुरत है। ज़रुरत है हिंदी की प्रगतिशील आलोचना की एक दूसरी परम्परा से संवाद की। बौद्धिक समाज क्या इसके लिए तैयार है? विचारहीनता और तात्कालिकता के दबाव के बीच हिंदी आलोचना की समृद्ध प्रगतिशील परंपरा क्या सुरेन्द्र चौधरी से संवाद नहीं करेगी? ऐतिह्यता का प्रश्न सुरेन्द्र चौधरी के लेखन का मूल प्रश्न है। इसलिए समकालीनता और तात्कालिकता से उनकी मुठभेड़ ही उनकी आलोचना बनाती चलती है। यह अकारण नहीं कि इतिहास के प्रश्नों से उलझने वाला यह आलोचक साहित्य के आख्यान रूपों पर अपनी विशेष दृष्टि रखता है। पर कविता के संबंद्ध में उनका छिटपुट लेखन किसी भी बड़े काव्य आलोचक के लिए इर्ष्या का कारण बन सकते है।  बहरहाल। 

BY मार्तंड प्रगल्भ 

सबसे पहले डॉ॰ चौधरी की पुस्तक ‘इतिहास: संयोग और सार्थकता’ से उनके कुछ निष्कर्षों-स्थापनाओं को उद्धृत करना चाहता हूँ-

  •  ‘‘स्पष्ट है कि हिंदी साहित्य में आधुनिकता दो महायुद्धों के बीच उत्पन्न अवस्था नहीं है और न वह मात्र ‘मूल्यबोध और विराट विघटन’ के तनाव के बीच की उपलब्धि है। हिंदी में आधुनिकता की प्रतिष्ठा इस ‘विराट विघटन’ के नारे से लगभग 80-90 वर्ष पूर्व हो चुकी थी। हिंदी में आधुनिकता बोध का संस्कार आत्मचेता से अधिक वस्तुसत्य चेता है।’’ (पृ.219 खंड1) (ध्यान दें कि आधुनिकतावाद शब्द का इस्तेमाल न करते हुए भी, आधुनिकता, आधुनिकताबोध के अपने आशयों को यहां मिलाकर प्रयोग किया गया है। परंतु महायुद्धों की चर्चा से स्पष्ट है कि आधुनिकतावाद शब्द के अपने अर्थों में ही इसे पढ़ना चाहिए। इन शब्दों के अपने अर्थ पश्चिमी हैं परंतु डॉ॰ चौधरी भारतीय परिस्थितियों में इसे समझने की कोशिश कर रहे हैं।)
  •  ‘‘भारतीय परिस्थितियों में ‘उदारतावादी चेतना’ चूंकि रोमैंटिक दृष्टिविस्तार का परिणाम थी और बौद्धिक उद्बोध की परिणति थी इसलिए आधुनिक इतिहास में वह अपने ढंग की अकेली है। …भारत में आधुनिकता पश्चिमी राज्यसत्ता की क्रांतिकारी भूमिका से नहीं आई और न वह भारत में उनकी शैक्षणिक नीति से आई। वह भारतीय बुद्धिजीवी के उद्बोध से उत्पन्न हुई। …वस्तुतः भारत में आधुनिकता का उत्थापन अंग्रेजों की प्रत्यवस्थान शक्ति से भारतीय पूंजी के प्रतिरोध से होता है। इस अर्थ में भारतीय पूंजीपति की राष्टीय भूमिका अपने उत्थापन युग में क्रांतिकारी जनहितपरक, और राष्टीय स्वार्थ से अनिवार्यतः प्रेरित रही है। भारतेंदु युग का संपूर्ण साहित्य अपने जन चारित्र्य के व्याख्यान के द्वारा यह स्पष्ट करता है कि इस युग में भारतीय बुद्धिजीवी का स्वार्थ अविकल रूप से भारतीय जनता से जुड़ा हुआ था। इस काल का वर्गसंघर्ष चरित्रतः उपनिवेशविरोधी और आभिजात्यविरोधी है। यही कारण है कि संपूर्ण युग की विचार पद्धति में उपनिवेशविरोध और आभिजात्यविरोध की चिंतासरणि प्रधान है।’’ (पृ.219-20-21,खंड1)
  • ‘‘ऐसा लगता है कि ‘भाग्यवती’ के लेखक ने अकेले भाग्यवती से सारी भूमिकाएं संपन्न करवाने का व्रत ले लिया है, फिर भी इतना तो निश्चित है कि हिंदी उपन्यास साहित्य में भाग्यवती आधुनिक युग की यूलिसिस है।’’ (पृ.222, खंड1) (यूलिसिस और जेम्स ज्वाएस की अपनी पश्चिमी उपस्थिति और आयरलैंड की औपनिवेशित दासता जिस ढंग से अंतर्विरोधी साम्राज्यवादी चरित्र का क्रिटिक है, उसे भारतीय संदर्भों में भाग्यवती से तुलना करना एक प्रमुख वैचारिक प्रस्थान है। ‘माडर्निस्ट’ पेपर में संकलित फ्रेडरिक जेमसन के लेखों में इस आधुनिकतावाद के सहारे साम्राज्यवाद के चरित्र को समझने का प्रयास किया गया है।)
  • ‘‘उदारता की चेतना, मेरी छोटी धारणा के अनुसार, एक विशेष वर्ग की जीवन परिस्थितियों की द्वंद्वात्मकता की मांग है। यह वर्ग अपने प्रारंभिक उत्थापन के युग में निश्चित रूप से क्रियाशील, अथवा प्रगतिशील रहता है। भारतेंदु युग अपनी उदारचेता जीवन-विधा के कारण और विचार सरणि के कारण क्रियाशीलता और प्रगति का युग है। इस युग की सबसे बड़ी विशेषता इसका ‘आधुनिकता बोध’ नहीं है, बल्कि आधुनिकता की मांग को क्रियात्मक पूर्णता देने की तत्परता है। यह युग, जहां एक अभावात्मक परिस्थिति का निषेध करता है (निगेशन ऑफ निगेशन) वहीं इसका अंतर्विरोध सार्थक हो जाता है।’’ (पृ.223,खंड1)
  • ‘‘भारतेंदु युग की सारी परिस्थितियां रोमांटिक धारणा के अनुकूल होकर भी रोमैंटिक उद्बोध में असफल रहीं। इसका एकमात्र कारण राजनीतिक सत्ता का अंतर्विरोध था। भारत उस उत्थान विशेष में औपनिवेशिक व्यवस्था के रूप में परिणति ग्रहण कर रहा था, फलतः भारतीय बुद्धिजीवी उस अदम्य असीमित इच्छाशक्ति के बोध को व्यावहारिक परिणति देने में असमर्थ था। राजनीतिक  परतंत्रता ने भारत के प्रथम आत्मोद्बोध को व्यंग्यात्मक परिणति दे दी। किंतु यह राजनीतिक परतंत्रता देश की प्रथम जागृति को बहुत दिनों तक व्यंग्यात्मक दृष्टिकोण के घेरे में बंधे रहने तक विवश नहीं कर सकी। निर्विशेष राष्टीयता बनकर यह जागृति श्रीधर पाठक, राम नरेश त्रिपाठी और मैथिलीशरण गुप्त के साहित्य में उत्थापित हुई। हिंदी में छायावाद इसी निर्विशेष जागृति का परिणाम है। उसकी अवाचकता का यही रहस्य है। (पृ.226, खंड1)
  •  ‘‘कविता के आश्रय पक्ष की जितनी समृद्ध भक्ति काल के पश्चात छायावाद के उत्थान में देखी जा सकती है वह न इन दो कालों के अंतराल में संभव है और न उसके पश्चात ही। व्यक्ति की इच्छाशक्ति जितने विविध धरातलों पर छायावाद युग में बोध (रियलाइजेशन) ढूंढती है, उतनी किसी परवर्ती उत्थान में नहीं।’’ (पृ. 227, खंड1)
  •  ‘‘प्रसाद ने न केवल गुप्त युग की गाथाएं गाईं, बल्कि उस युग की कला, संस्कृति का दैवीकरण किया। उन्होंने भारतीय इतिहास की गति का अतीत की ओर मोड़ना चाहा…। प्रसाद शात्योब्रां की तरह स्वच्छंदतावाद की प्रतिक्रियात्मक सरणि के अनुगामी है। राजनीतिक धारणा के क्षेत्र में साम्राज्य वैभववादी, धर्म के क्षेत्र में सनातनी और दर्शन के क्षेत्र में सांस्कृतिक स्पर्श के साथ प्रसाद स्वच्छंदतावादी हैं।’’ (पृ.228, खंड1)
  •  ‘‘महादेवी इस धारा की सबसे कमजोर कवयित्री हैं क्योंकि उनका उद्बोध न अतीत की भूमि पर संतुलित हो पाता है और न इतिहास की वर्तमान गति का अनुसरण कर पाता है। अतीत से विच्छुरित और वर्तमान में अप्रतिष्ठित कवयित्री की आत्मा संतुलन के लिए मात्र अवाचक का सहारा लेती रह जाती है। उनका दुखवाद इसलिए (मेरी दृष्टि में) उनके व्यक्तिगत कारणों से अधिक दृष्टिकोण की अस्पष्टता का परिणाम है। महादेवी निरर्थक आत्मचेतना का दैवीकरण करती हैं।’’ (पृ.228, खंड1)
  •  ‘‘पंत जी का रोमैंटिक दृष्टिकोण अपनी ही द्विरूपता के कारण उलझ जाता है। ‘गुंजन’ के उपरांत निरंतर वे पश्चिम और पूर्व के बीच अपनी चेतना का समझौता करने को आकुल हैं। भौतिकता और आध्यात्मिकता उनके लिए समस्याएं (इनिग्मा) उलझनें बन जाती हैं। भावसत्ता और वस्तुसत्ता के बीच कृत्रिम विभाजन करने को वे आकुल हैं। ऐसा कृत्रिम विभाजन निराला ने नहीं किया; महादेवी ने भौतिक धरातल का बलात् निषेध-आग्रह रखा, प्रसाद ने ‘कामायनी’ में इस विरोध का संतुलन कल्पित रूप से कर लिया। पंत जी किसी भी कल्पित भूमि पर ऐसा समझौता कर नहीं पाते, अरविंद के सर्वचेतनवाद की शरण में जाकर भी नहीं। (उदाहरणार्थ ‘कला और बूढ़ा चांद’)। वे चेतना के धरातल पर दो बिंदुओं को सरल रेखा से मिलाना चाहते हैं, यथार्थ अंतर्विरोध बन जाता है। फलतः वे प्रसाद की तरह नव्य श्रेण्यता (निओ क्लासिसिज्म) को स्वीकार करने में भी अक्षम रहते हैं और शुद्ध रोमैंटिक उद्बोधों को भी सहेज नहीं पाते। निराला और प्रसाद से वे इसी अर्थ में न्यून सिद्ध होते हैं।’’ (पृ.231, खंड1)
  • ‘‘मेरी दृष्टि में छायावाद के प्रारंभिक उत्थान में नाटकीय संवादी स्वर नहीं है। यह शुरू होती है बच्चन, भगवती चरण वर्मा, दिनकर और नवीन के साथ। इन कवियों में अधिकांश के पास कोई दृष्टि ही नहीं है, उनके पास केवल प्रतिरोधजन्य नाटकीयता है जो कभी दृष्टि बन ही नहीं सकती। उस अर्थ में इनमें जो सहजता है, उसे विशिष्ट मनोभूमि की सहजता मानने का खतरा केवल साही साहब ले सकते हैं। जितना शक्ति प्रवाह बच्चन और वर्माजी की रचनाओं में नहीं है, उतना साही साहब में है जिसके बहाव में वे साहित्य के सहज विकास के सूत्रों को छोड़कर कैलिडोस्कोपिक विविध्ता में खो जाते हैं।’’ (पृ.233, खंड1) (‘लघु मानव के बहाने हिंदी कविता पर एक बहस’ में उल्लिखित छायावादी विजन के टूटने के संदर्भ में पढ़ा जाए।)
  •  ‘‘चाहे प्रगतिवादी आंदोलन ने साहित्य में कोई महान भूमिका न भी पूरी की हो मगर इतना तो मानना पड़ेगा कि उसने क्षयी रोमांस का रचनात्मक धरातल पर विरोध किया और हिंदी नवलेखन को मध्य वर्ग की पतनशीलता की तस्वीर बन जाने से बहुत हद तक बचा लिया। हिंदी नवलेखन अगर ‘गुनाहों के देवता’ की पूजा और ‘अंधा युग’ के विक्षिप्त बोध से बच सका तो इसका कारण मैं यशपाल, अश्क, नागार्जुन, त्रिलोचन और केदारनाथ अग्रवाल के सशक्त रचनात्मक लेखन को मानता हूँ।’’ (पृ.235, खंड1)
  •  ‘‘तृतीय दशक में रोमैंटिक दृष्टि जिस प्रकार अपनी विशिष्ट असंगतियों के कारण पतनशील हो गई थी। उसकी प्रतिक्रिया की जमीन अलग-अलग है, एक ओर अज्ञेय के साथ व्यक्तित्व का उत्थापन और दूसरी ओर मानववाद की परंपरा के विकास की तत्परता। संपूर्ण चतुर्थ दशक और पंचम दशक में व्यक्तिवाद से मानववाद की टकराहट होती रही और उसकी अनुगूंज साहित्य के क्षेत्र में सुनाई पड़ती रही। इस दरम्यान व्यक्तिवाद न बर्गशां से लेकर सार्त्र तक के नकाब बदले, मगर उसका संकट समाप्त नहीं हुआ।’’ (पृ. 236)
  •  ‘‘1950-60 तक नवलेखन ने एक व्यापक आंदोलन का स्वरूप धारण कर लिया लेकिन इससे यह नहीं मान लेना चाहिए कि नवलेखन पर व्यक्तिवाद का प्रभाव शेष ही नहीं रहा था। कवियों का एक समुदाय ऐसा था जो अब भी बदले हुए स्वर में पुराना राग अलाप रहा था। कहानियों में व्यक्तियों की आत्मकेंद्रता के साथ एक समानान्तर स्वर भी उभरता है जिसे प्रकाश में लाने की आवश्यकता है। यह स्वर हमारे स्वातंत्रयोत्तर नवजागरण से जुड़ा हुआ है। (डॉ॰ नामवर सिंह की शब्दावली में)” (पृ.237, खंड1)

    Surendra Choudhary 13 जून 1933- 09 मई 2001

    Surendra Choudhary
    13 जून 1933- 09 मई 2001

क्या आधुनिक हिंदी साहित्य के इतिहास को देखने की एक नयी दृष्टि का उन्मेष इन उद्धरणों से होकर नहीं जाता? बौद्धिक समाज क्या इसके लिए तैयार है? विचारहीनता और तात्कालिकता के दबाव के बीच हिंदी आलोचना की समृद्ध प्रगतिशील परंपरा क्या सुरेन्द्र चौधरी से संवाद नहीं करेगी? ऐतिह्यता का प्रश्न सुरेन्द्र चौधरी के लेखन का मूल प्रश्न है। इसलिए समकालीनता और तात्कालिकता से उनकी मुठभेड़ ही उनकी आलोचना बनाती चलती है। यह अकारण नहीं कि इतिहास के प्रश्नों से उलझने वाला यह आलोचक साहित्य के आख्यान रूपों पर अपनी विशेष दृष्टि रखता है। पर कविता के संबंद्ध में उनका छिटपुट लेखन किसी भी बड़े काव्य आलोचक के लिए इर्ष्या का कारण बन सकते है।  बहरहाल।

 सुरेंद्र चौधरी के लिए भारतीय इतिहास की धारा जातीयता के निर्माण के प्रश्न से तय होती मालूम होती है। जातीय निर्माण की प्रक्रिया संबंधी यह चिंतन हिंदी में राम विलास शर्मा की देन है। जातीय निर्माण की अवधारणा को भाषा से जोड़ते हुए डॉ॰ शर्मा ने एक किताब लिखी थी-‘भाषा और समाज’। इसमें उन्होंने कुछ महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए थे। लघु जातियों के निर्माण संबंधी अवधारणा को प्रस्तुत करते हुए शर्मा ने बताया था कि किस प्रकार जनपदों के विकास से भिन्न वस्तुगत आधार लेकर मध्यकाल में जातियों का निर्माण हुआ। यह निर्माण हिंदी की भिन्न बोलियों के विकास के साथ हुआ था और दोनों में कापफी सारे संबंध सूत्र उन्होंने खोजे थे। स्तालिन के महाजाति की निर्माण संबंधी धारणा और उसके भाषा विषयक चिंतन का प्रभाव यहां स्पष्ट रूप से लक्षित किया जा सकता है। इसे आधुनिक काल में तथा उससे पहले व्यापारिक पूंजीवाद के साथ जोड़ते हुए महाजाति और राष्ट्रभाषा की अवधारणा डॉ॰ शर्मा ने रखी थी। इतिहास की यह अवधारणा दोषयुक्त है परंतु उसके अपने ऐतिहासिक आधार भी हैं। और इसका एक सिरा राष्ट्रवादी इतिहास लेखन और मार्क्सवादी इतिहास लेखन के घालमेल में खोजा जा सकता है। बहरहाल, नवजागरण और जातीय निर्माण संबंधी प्रक्रिया के चिंतन का एक स्वरूप और उसका प्रभाव ग्रहण चौधरी के लेखन में स्पष्टतया देखा जा सकता है। इसी संदर्भ में औपनिवेशिक चिंतन को एक चुनौती भी मिलती रही है। डॉ॰ चौधरी ने 1857 के महाविद्रोह के बाद चलनेवाली जातीयताओं के नवगठन को औपनिवेशिक प्रशासकीय नीति के लिए एक खतरा माना था। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में लिखा कि उर्दू को इलाकाई जबान बताकर अलगाने की कोशिशें हुईं, बंगाल विभाजन हुआ, मराठा क्षेत्र को तोड़ा गया और उड़ीसा के साथ विभाजक नीति अपनाई गई। ‘‘ऐसी स्थिति में भारत की एकता, कौमियतों की नकार से सिद्ध करने के बजाय उसके सहकार में सिद्ध करने का स्तर जनवादी है।’’ (पृ.122, खंड1) इतिहास में जनवादी मूल्यों की पहचान हमेशा एक चुनौती रही है। रेडिकल इतिहास लेखन कई बार अतिवाद का शिकार होता रहा है। इस अतिवाद के मूल में एक ऐसी इतिहास दृष्टि काम करती है जो नितांत समकालीन विमर्शों का प्रक्षेप अतीत के किसी कालखंड में करता है। ठेठ समकालीन विमर्शों को आधार बनाकर इतिहास की व्याख्याएं  गलत निष्कर्षों तक पहुंच जाती हैं। हिंदी नवजागरण संबंधी चिंतन के साथ यही होता रहा है। सांप्रदायिकता के प्रश्नों से जूझते हुए कुछ विचारक हिंदी नवजागरण को नितांत हिंदू नवजागरण सिद्ध करते हैं। ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य की सीमाओं को ध्यान में न रखने के कारण ही ऐसा होता है। भारतेंदुयुगीन नववैष्णवता को पुनरुत्थानवादी बताना भी ऐसी ही दृष्टि का फल है। वास्तविकता यह है कि जिस वैष्णवता को भारतेंदु भारतीयता का आधार बता रहे थे, वह कोई मध्ययुगीन अवधारणा न थी। धर्मांधता और सांप्रदायिकता के बरक्स यह धर्म और लोक में प्रेम की महत्ता को स्वीकार करते हुए अलगाववादी ताकतों के खिलाफ एक मॉडल था। राज्य और जाति संबंधी पश्चिमी अवधारणा के समानांतर यह राष्ट्र-राज्य के अपने निर्धारक तत्वों को पहचानने की कोशिश थी। डॉ॰ चौधरी ने ‘स्वाधीनता संग्राम और हिंदी साहित्य’ नामक लेख में डॉ॰ राम विलास शर्मा की मान्यताओं से सहमति जताई है। बाद में इस नववैष्णवता के जनवादी स्वरूप की पहचान डॉ॰ नामवर सिंह ने ‘हिंदी नवजागरण की समस्याएं’ नामक अपने लेख में की है। अमेरिकी स्वाधीनता आंदोलन के वक्त जिस प्रकार नव ईसाई विचारधारा की नैतिकता कोई बाधक तत्व नहीं थी और मैक्स बेबर से लेकर व्हिटनी ग्रिसगोल्ड तक इसका समर्थन कर रहे थे, उसी प्रकार भारतेंदु मंडल की वैष्णव नैतिकता ‘क्रिस्तान, मुसलमान और ब्राहम धर्मों के प्रेम मार्ग’ को इस विचारधारा से जोड़ने का जनवादी प्रयास था। और यह अकारण न था कि नववैष्णवता की यह धारा गांधी के ‘हिंद स्वराज’ के लोकचिंतन का आधार भी बना था। पश्चिमी आधुनिकता के मूल्यों में छिपे प्राच्यवादी षड्यंत्र के सामने भारतीयता की पहचान एक समस्या है। ‘हिंद स्वराज’ के सौ वर्ष पूरे होने पर जो चिंतन दोबारा भारतीय आधुनिकता की खोज कर रही है, वह इस नववैष्णवता के महत्व को खारिज नहीं कर सकती। डॉ॰ चौधरी ने लिखा था-‘‘बचकाने किंतु उत्साही मार्क्सवादी को इसे संदर्भ से जोड़ने की जरूरत है। स्वाधीनता आंदोलन और साहित्य की प्रेरक परिस्थितियों का यह ताना-बाना बहुत महत्वपूर्ण है और किसी निर्णायक दिशा के लिए आधार का काम करता है। नववैष्णवता न पुनरुत्थानवादी है, न पुराणपंथी और न वह शुद्ध मध्ययुगीन ही है। उसमें वर्तमान के अनुरूप धार्मिक सहिष्णुता, उदारता और प्रेम मार्ग पर चलकर उस एकता की आकांक्षा है जो उसकी मुक्ति का उपनिवेश और पिछड़ेपन का बायस बन सकती है। धर्म बुद्धि साहस की स्वीकृति और आलस्य त्याग के साथ इस नववैष्णवता का वही संबंध हो सकता है जो कॉलविनवादियों का न्यू इंग्लैंड से बना था।’’ (पृ.125, खंड1)

आगे डॉ॰ चौधरी नववैष्णवता के अंतर्विरोधों को पहचानने के लिए ‘इंदु’ और ‘सरस्वती’ के लेखों का हवाला भी देते हैं। हरिऔध, मैथिलीशरण गुप्त और प्रसाद के विचारों की समीक्षा का आग्रह करते हैं। ‘जनमेजय का नागयज्ञ’ में कृष्ण का मानवता की घोषणा और ‘कंकाल’ में गोस्वामीजी के भाषणों में इस नववैष्णवता के अनुगूंज है। ‘‘आज हम धर्म के जिस ढांचे के शव को घेरकर रो रहे हैं, वह उनका (कृष्ण) धर्म नहीं है।’’ पंडित माध्व प्रसाद मिश्र के लेखों में नववैष्णवता के प्रश्नों पर चिंतन है। ग्रियर्सन की क्रिस्टोमायथी से पहले श्री ब्रहमानंद जी 1897 में निबंधावली में क्रिश्चियन विश्वासों का नववैष्णव संदर्भ दिखाया था। स्वदेश भक्ति का भावना के रसात्मक रूप का नववैष्णवता से क्या संबंध हो सकता है, यह भी डॉ॰ चौधरी की चिंता का विषय है। क्या नववैष्णवता का प्रेमचंद पर भी प्रभाव था या फिर निराला का नववेदांत पुनरुत्थानवादी था? ऐसे प्रश्नों पर फिर से विचार की आवश्यकता है।

विचारधारात्मक अंतर्विरोधों के कौन से सूत्र हिंदी नवजागरण के प्रारंभिक चरण को भाषा के सांप्रदायीकरण की ओर ले जाते हैं, इसे डॉ॰ चौधरी नहीं बताते। भारतेंदुयुगीन राजभक्ति बनाम देशभक्ति के द्वैत को व्याख्यायित न कर डॉ॰ चौधरी इतिहास की मौखिक परंपरा के क्रांतिकारी होने के मिथक को तोड़ने के लिए तत्कालीन पत्रिकाओं में छपे लेखों की ओर जाते हैं और शोध कार्य का आहवान करते हैं।

इस संदर्भ में कुछ बिंदुओं की ओर ध्यान दिलाना आवश्यक है। पहला यह कि डॉ॰ चौधरी का लेख ‘स्वाधीनता संग्राम और हिंदी साहित्य’ अक्टूबर-दिसंबर 1986 की आलोचना में प्रकाशित नामवर सिंह के लेख ‘हिंदी नवजागरण की समस्याएं’ में निकाले गए निष्कर्षों की असहमति में लिखा गया है। नामवर सिंह का मानना है कि हिंदी साहित्य का प्रत्यक्षततः संबंध बांग्ला नवजागरण से है जबकि डॉ॰ चौधरी इसे अनिवार्यतः 1857 के साम्राज्यवाद विरोधी-उपनिवेशवाद विरोधी चरित्र से जोड़ते हैं। नवजागरण और भाषा के संबंध पर नामवर सिंह ने ठोस प्रतिक्रिया दी और उसके सांप्रदायिक आधार की ओर इशारा किया है। इसलिए वहां नववैष्णवता की प्रगतिशीलता के अंतर्विरोधों को भाषा की समस्या से समझने पर बल है। यह बात सुरेंद्र चौधरी नहीं करते हैं। हिंदी नवजागरण में राजनीतिक चिंतन या सत्ता परिवर्तन की अनुगूंज मद्धिम हो जाती है और वह मूलतः सांस्कृतिक नवजागरण हो जाता है। इसलिए ‘स्वत्व निज भारत गहै’ (नामवर इसे आधुनिक शब्दावली में आइडेंटिटी से जोड़ते हैं) के स्वत्व प्राप्ति के राजनीतिक स्वाधीनता वाला पक्ष जरूरी होते हुए भी यहां तथ्यात्मक रूप से परोक्ष ही था। नामवर सिंह ने लिखा है-‘‘राजनीतिक स्वाधीनता इस स्वत्व प्राप्ति की पहली शर्त है। नवजागरण के उन्नायक इस आवश्यकता का अनुभव न करते रहे होंगे, यह सोचना कठिन है, फिर भी तथ्य यही है कि नवजागरणकालीन प्रकाशित साहित्य में राजनीतिक स्वाधीनता का स्पष्ट स्वर कम ही सुनाई पड़ता है। पहले ईस्ट इंडिया कंपनी और फिर महारानी विक्टोरिया के शासन काल में राज के विरुद्ध निश्चय ही किसानों के छिटपुट विद्रोह बराबर होते रहे जिनमें सबसे संगठित और सशक्त सन सत्तावन की राज्यक्रांति है फिर भी समकालीन शिष्ट साहित्य में उसकी गूंज सुनाई नहीं पड़ती-लोक साहित्य भले ही प्रचुर मात्र में मौखिक रूप में रचा गया। यह स्थिति सन सत्तावन के पहले तो थी ही, उसके बाद कम से कम तीन दशकों तक बनी रही। आर्थिक शोषण के खिलाफ जरूर लिखा गया, पुलिस तथा अफसरों के अत्याचार और अन्याय की भी शिकायत की गई, पर राजसत्ता पलटने के विचार को जैसे अंतर्गुहावास दे दिया गया।’’ (हिंदी का गद्यपर्व, नामवर सिंह, पृ.87, राजकमल प्रकाशन, 2010) मानो इसी का जवाब देते हुए सुरेंद्र चौधरी ने लिखा-‘‘जनता के चित्त में स्वदेशी-स्वराज का भाव 1857 की देन है, इसे स्वीकार करने में कठिनाई नहीं होनी चाहिए। संभवतः इसी शक्ति संबल को पहचानकर स्वदेशी की भावना के लिए भारतेंदु युग के कवियों को देश निकाला तो न दिया गया, पर वर्नाकुलर प्रेस पर अनेक बंदिशें डाली गईं। स्वदेशी के प्रति इस राज के रुख ने स्वतंत्रता के राग को बल दिया, इस पर बहस नहीं की जा सकती। …सत्ता परिवर्तन की आकांक्षा नारों में अवश्य प्रकट नहीं हुई। ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ जैसा नारा भारतेंदु युग में न लगा था, मगर सत्ता परिवर्तन को भी गुहावास न दिया गया था।’’ और इसके प्रमाण में डॉ॰ चौधरी ने ‘नागरनैया जाला काले पनिया रे ना!’ जैसे गीतों का उदाहरण दिया है। उन्होंने बताया है कि राज-रजवार और विष्णु सिंह के गीत मगध में गाए जाते थे, बाबू कुंअर सिंह की मुसलमान प्रेमिका के गीत सारे भोजपुर में गाए जाते थे। हरेंद्र देव के काव्य में उसकी आवृत्तियां हैं। फिर अवध बुंदेलखंड से निकलकर सुदूर गया जिले तक इसकी अंतरध्वनियों की पहचान वह करते हैं।

तो क्या हिंदी जाति के साहित्य में 1857 के महाविद्रोह का मूल स्वर भारतेंदु युग में सुनाई पड़ता है? और क्या यह नवजागरण उसी चेतना का विस्तार है? क्या सचमुच हिंदी नवजागरण 1857 में व्यक्त जनजागरण की ही अगली ऐतिहासिक अवस्था है और हिंदी नवजागरण के शिष्ट साहित्य में व्यक्त विचार से नामवर सिंह का क्या अभिप्राय है? क्या भारतेंदु मंडल की विचारधारा 1857 की चेतना से भिन्न स्वर अख्तियार करती है तथा जनसमुदाय की संवेदना 1857 के साथ है? क्या मौखिक परंपरा साम्राज्यवाद उपनिवेशवाद विरोध की राजनीतिक आकांक्षा को कायम रखती है और हिंदी (या बांग्ला या मराठी) नवजागरण के नेताओं या उनके लक्ष्यीभूत श्रोता या पाठक जिस नवनिर्मित मध्यवर्ग से थे, उस मध्यवर्ग का मानस 1857 की मूलभूत चेतना से दूर पड़ता है?

डॉ॰ चौधरी और डॉ॰ नामवर सिंह दो भिन्न दृष्टियों से उस काल को देख रहे हैं। मध्यवर्गीय/भद्रलोक के शिष्ट साहित्य के अंतर्विरोधी या नवजागरण के नेताओं की अंतर्विरोधी यह साफ इशारा करती है कि वहां 1857 के दो प्रमुख गुण सांप्रदायिक एकता और औपनिवेशिक सत्ता के प्रति सचेत वैरभाव (कांसस हास्टेलिटी) का अभाव है। रंजीत गुहा मानते हैं कि ‘यह सचेत वैरभाव संघर्ष में हिस्सा लेनेवालों तक ही सीमित नहीं था’ बल्कि एक कन्पेफडरेट नेशनेलिज्म के जरिए हिंदू मुसलिम संघर्ष के सिद्धंत का समाधान भी था। इसके बदले नवजागरण कालीन नेताओं में और इसलिए साहित्य में भी वैरभाव की जगह ‘कांसस लायलिटी ऑफ द टेक्स्ट’ (देखें, रंजीत गुहा, द इंडियन हिस्टोग्रापफी ऑफ इडियाः ए नाइन्टीन्थ सेंचुरी एजेंडा एण्ड इट्स इम्प्लीकेशंस; सीएसएसएस, कलकत्ता, 1987, पृ.54) मिलता है। देशभक्ति और राजभक्ति की यह विभाजित चेतना जितना भद्रवर्गीय हितों से चालित थी, उतनी ही राष्टीय स्वरूप की निर्मिति में अदरनेस को परिभाषित करने में भी थी। डॉ॰ चौधरी लोकचेतना को 1857 का विकास मानते वक्त इस तथ्य को नजरअंदाज करते हैं। लोक की असंबद्ध यद्यपि प्रतिरोधी विचारधारा को हिंदी नवजागरण का प्रमुख स्वर मान लेना ठीक नहीं मालूम पड़ता। लोक साहित्य में 1857 की वीरता के स्मृति चिन्ह शेष थे। गीत गाए जाते थे परंतु वहां राज के प्रति कोई सचेत वैरभाव नहीं रह गया था। इसके बदले अतीत की मोहक स्मृति ही प्रधान थी। इस गौण धारा को प्रमुखता देने से नवजागरण के संष्लिष्ट चरित्र की व्याख्या उसी अतिरेकवादी उत्साही जनवाद से ग्रसित हो जाती है जिसकी खिलाफत डॉ॰ चौधरी लगातार करते रहे थे।

डॉ॰ चौधरी अगर भाषा और नवजागरण के संबंधों की पड़ताल करते तो शायद इस ओर उनका ध्यान जरूर जाता। 19वीं सदी के उतररार्द्ध का पूरा काल भारतीय राष्टीयता के निर्माण का गर्भकाल था। भारतीय राष्टीयता के तमाम अंतर्विरोधों का उत्स भी यही है। 1920 के दशक में रूप लेनेवाली सांप्रदायिकता और 20वीं सदी में लगातार बदलते राष्ट्रवादी चिंतन की रूपरेखा में अपने प्रारंभिक रूप में यहीं दिखाई पड़ती है। हिंदी और उर्दू राष्टीयताओं को उसके धार्मिक प्रतीकों के साथ पढ़ने की कोशिश हमें नवजागरण के पूरे संदर्भ को समझने पर मजबूर करता है। भारतेंदुयुगीन जातीयता हिंदू-मुसलमान भद्रवर्गीय हितों से चालित था, जहां भाषा को लगातार एक हथियार की तरह इस्तेमाल करते हुए पूरे समुदाय की पीडि़त ग्रंथि (विक्टिम कॉम्प्लेक्स) को निर्मित किया गया और इसी के सहारे जातीय गोलबंदी की गई। उस वक्त राष्टीयता का सवाल अंग्रेजों के विरुद्ध अपने आपको किस प्रकार परिभाषित किया जाए-इस प्रश्न से जुड़ी थी। इसलिए भारतेंदु और अन्य हिंदी आंदोलन के नेताओं के साथ कई उदारपंथी नेता जैसे बिशन नारायण डर (लखनऊ के सम्मानित वकील, भारतीय  राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे तथा उर्दू के शाय तथा  मुसलमानों के मित्र के रूप में प्रसिद्ध और बंगाल के आर्थिक इतिहासकार विक्टोरियन उदारपंथी तथा प्रगतिशील राष्ट्रवादी रोमेश चंद्र दत्त ने लगातार हिंदू-मुस्लिम एकता की बात भी की और राष्ट्र की एकता के हिंदुओं की एकता की भी चर्चा की (देखें, ज्ञानेंद्र पांडेय; दी कन्स्ट्रकशन ऑफ कम्युनलिज्म इन कॉलोनियल नॉर्थ इंडिया, आक्सफोर्ड, 2006, पृ.218)। इस दौर की जातीयता में हिंदू जाति के संगठन और उत्थान का महत्व दिया गया तथा अंडरटोन के रूप में यह पहचान की राजनीति मुसलमानों को सामने रखकर निर्मित की गई। परंतु तब राष्ट्र के उत्थान का मतलब था, अलग-अलग समुदायों का उत्थान। हिंदू-मुसलमान-ईसाई-सिख आदि मिलकर राष्ट्र का निर्माण करते हैं, ऐसा माना जा रहा था। (देखें, वही, पृ. 223) भारतेंदु और सर सैयद अहमद खां के वक्तव्यों में भी इसकी अनुगूंज स्पष्ट ही देखी जा सकती है।

साठ के दशक की पूरी पीढ़ी जिस यातना, संत्रस, संशय, सिनिक, नकार विद्रोह आदि से गुजर रही थी, उसका और उसके कारणों की पड़ताल डॉ॰ चौधरी निरंतर अपने लेखन में करते हैं। डॉ॰ चौधरी ने लगातार नई पीढ़ी और बीच की पीढ़ी के अंतर्विरोधों को रेखांकित किया है। बिचली पीढ़ी के अवसरवाद तथा तटस्थता को नकारकर नवलेखन ने ‘प्रतीक्षा’ के मोहभंग के कारण एक निषेध और नकार की मुद्रा अख्तियार की थी। यह मुद्रा केवल एक भंगिमा मात्र न थी। इस नकार के वस्तुगत कारण थे और रचनात्मक मानस को ये उद्वेलित भी कर रहे थे। एक संवादी आलोचक की भांति इस नई पीढ़ी की रचनाशीलता को संभावनाओं के रूप में समझने की जरूरत थी। डॉ॰ चौधरी इसे पूरा करने की कोशिश करते हैं। स्वातंत्रयोत्तर दो दशकों में लगातार वर्ग संघर्ष की शिथिलता के कारण मध्यवर्गीय लेखक सामान्य जनजीवन से दूर होते गए। इस शिथिलता के साथ भारतीय सत्ता तंत्र की नीतियों और जनतंत्र के पीड़ादायी अनुभव ने एक ऐसी पीढ़ी को जिसने अपनी आंखें नए और स्वतंत्र भारत में खोली थीं, उमस से भर दिया। आजादी के बाद जन आंदोलनों का दौर एक तरह से रुक गया था। इसने कहीं न कहीं मध्यवर्गीय अलगाव का जन्म दिया। प्रतीक्षा और अलगाव के अंतर्विरोध में कुछ लोगों ने आत्म समर्पण कर दिया और अपनी राजनीतिक चेतना गिरवी रख दी। नवलेखन जब अलगाव और अस्तित्व के संकट की घोषणा कर रहा था तो इसे हमारे कुछ पुराने आलोचकों ने अंतर्राष्टीय नारों का प्रभाव कहकर खारिज कर दिया था। लेखन के बीज शब्द के रूप में स्वतंत्रता नई पीढ़ी के लिए महज नारा न था। लेकिन इसे मानवीय अस्तित्व की स्वतंत्रता के व्यापक फलक पर देखने के बजाय तत्कालीन प्रगतिशीलों ने भी अमेरिकी कल्चरल प्रफीडम के शीतयुद्धकालीन विचारधारा का प्रभाव माना और इसे भाववाद की इकहरी संकल्पना में ढालने की कोशिश की। दूसरी ओर, लेखक की स्वतंत्रता के नाम पर रूपवादियों खासकर परिमलवादियों और अज्ञेयवादियों ने इसे बल प्रदान किया। सुरेंद्र चौधरी ने ऐसी स्थिति को अधूरा और भ्रामक मानते हुए नवलेखन को एक बंद पद्धति मानने से इनकार किया था। आलोचना को नई पीढ़ी से बातचीत का दरवाजा खोलना चाहिए। इस मान्यता से वह कभी पीछे नहीं रहे। उन्होंने जोर देकर कहा कि नई पीढ़ी का संकट उतना निजी नहीं था जितना वह उपरी दृष्टि से मालूम पड़ता था। ‘नकार’ की दृष्टि किस ऐतिहासिक संकट में पैदा हो रही थी, उसे समझना जरूरी था। स्थिति को केवल नकारते हुए लड़ा नहीं जा सकता। यह सही था लेकिन नकार की भी एक सच्चाई तो होती ही है। इसी सच्चाई और यंत्रणा के दोहरे दबाव के बीच उस वक्त की रचनादृष्टि सार्थकता पाती है। और ‘‘जो लोग इस दुहरे दबाव को नहीं महसूस करते हैं वे या तो मुहावरे चुराते हैं, या फिर पूरी पीढ़ी के साथ एक व्यावसायिक खेल खेल रहे हैं। हमारी पीढ़ी की रचनात्मक लड़ाई का यह एक आंतरिक आयाम है।’’ (खंड तीन, पृ.146)

स्वतंत्रता के बाद की बिचली पीढ़ी ने देह को लेकर नई पीढ़ी की रचनादृष्टि को ‘ऐय्यास प्रेतों’ की तरह ट्रीट किया था। चौधरी ने देह की इस राजनीति को इसकी ऐतिहासिक भूमिका में समझने का प्रयास किया। उन्होंने स्पष्ट किया, ‘‘हम अदेह राजनीति के धर्मवीर नहीं हैं। चूंकि देह हमें देह हमें दुनिया में गोचर करती है, इंद्रियग्राहय अनुभवों से संपन्न करती है और दुनिया के मूर्त रिश्तों के बीच प्रतिष्ठित करती है, इसलिए हमारी राजनीति देह को नकारती नहीं है…। प्रश्न केवल देह की अमूर्त परिभाषा का नहीं, देह और देह के बीच मूर्त रिश्तों का है। हमारे लिए देह की अनेक यातनाएं हैं, वह हमें मूर्त-अमूर्त सभी देशों में आज गति दे रही है, इसलिए देह को हम अस्पृश्य नहीं मानेंगे। देह का दुरुपयोग करने में जैनेंद्र और अज्ञेय से कमलेश्वर और भारती भिन्न नहीं हैं। … बिचली पीढ़ी के आर्यसमाजी आलोचक देह की राजनीति को तो देखते हैं मगर उसके विस्तार को नहीं देख पाते। यह विस्तार हमें जीवन की वास्तविकताओं से जोड़ता है। देह में ही पेट भी है, इसे हम भूले नहीं हैं! आवेश के शुद्ध भावनात्मक रिश्ते आज की दुनिया में बन पाते हैं, इसमें अगर हमें विश्वास नहीं है तो जिम्मेदारी हमारी है…। चेतना अथवा संस्कारजन्य नैतिकता के सारे नियम देह पर ज्यों के त्यों लागू नहीं किए जा सकते…। देह की अपनी समस्याएं हैं, अपने स्वतंत्र नियम हैं। देह की इन ठोस मूर्त समस्याओं को नजरअंदाज कर उस पर टिप्पणी करना मुझे उचित नहीं मालूम पड़ता।’’ (वही, पृ. 147) देह की इस राजनीति को उस वक्त इतने बड़े परिपे्रक्ष्य में और किसी ने देखा हो, ऐसा मुझे मालूम नहीं। नामवर सिंह ने ‘मुक्ति प्रसंग’ के संदर्भ में लिखा था कि उस कविता में ‘‘बीच-बीच में सेक्स के खुले शब्दों से भद्र रुचि को ध्क्का देने की शोखी या शरारत है।’’ लेकिन इस देह की राजनीति का व्यापक आधार क्या है, इसकी बात उन्होंने भी न की। कापफी समय बाद फ्रेडरिक जेमेसन ने देह की इस राजनीति के ठोस द्वंद्वात्मक समझ को एक भिन्न संदर्भ में पेश किया। उत्तर आधुनिक दौर में ‘देह का आना एक वर्चुअल दुनिया में यथार्थ की विजय है। अपनी संकीर्णता और वस्तुपूजा के बावजूद देह की प्रधानता मोहक वर्चुअल रियलिटी के बीच मानवीय संवेदनाओं के हस्तक्षेप की तरह है। क्या मोहभंग से उपजे आक्रोश के दौर में नई पीढ़ी का स्वप्न को नकारकर देह की सत्ता और उसकी चुनौतियों को खुलकर व्यक्त करना इसी प्रकार का एक प्रयास न था!

नई पीढ़ी के बारे में डॉ॰ चौधरी आशान्वित थे और कृत्रिम भावनात्मक सत्य के बरक्स अपने को ही बार-बार तोड़ते, नकारते और लांघते चलने के क्रम में प्राप्त मानवीय वास्तविकता को महत्वपूर्ण मानते थे। ‘हम कुछ न बनाते हुए भी चीखने को विवश हैं’। घटित का यही मर्म कहीं न कहीं स्पर्श भी करता है और धूमिल ने ता लिखा ही था-‘‘मगर यह वक्त घबराए हुए लोगों की शर्म आंकने का नहीं है।’’ अपने को बार-बार तोड़कर अर्जित सत्य के बारे में बात करते हुए डॉ॰ चौधरी के दिमाग में रघुवीर सहाय की ये पंक्तियां जरूर रही होंगी-

‘‘कुछ होगा, कुछ होगा अगर मैं बोलूंगा

न टूटे न टूटे तिलिस्म सत्ता का

मेरे अंदर का एक कायर टूटेगा टूट

मेरे मन टूट एक बार सही तरह

अच्छी तरह टूट मत झूठ-मूठ उफब मत रूठ

मत डूब सिर्पफ टूट’’ (आत्महत्या के विरुद्ध्द्ध

परंतु बड़े आश्चर्य की बात है कि रघुवीर सहाय की इन कविताओं में उन्हें ‘आत्मीयता’ का स्पर्श नहीं मिला। और ये महज ‘रक्तचापहीन पीली पत्रकारिता’ की कविता जान पड़ी। टूटने से ज्ञात मानवीय सत्य दूसरी जगह उन्हें सपाटबयानी लगी। ऐसी सपाटबयानी ‘‘कल्पित दर्द के रिहटोरिक को तोड़ने का सबसे नाटकीय और तात्कालिक माध्यम बन जाती है। समस्या एक दूसरे स्तर पर फिर भी बनी रह जाती है। सपाटबयानी आवेश के निरंतर अंदाज को तोड़कर अगर कहीं स्थिर हो जाती है तो यह उसकी अशक्यता ही होती है। यह अशक्यता पहले रिहटोरिक को तोड़ती है फिर अपने को तोड़ते चलना उसकी नियति हो जाती है। कोई कवि मुहावरे के लंगड़े दरवाजे से आसानी से फैशन में आ जाता है और कविता को अनुभव की प्रामाणिकता से छलने लगता है…। अपने को ही बार-बार तोड़ते रहने की रघुवीर सहाय की नियति है क्योंकि उन्हें किसी शर्त पर उस जंगल से निकलना स्वीकार्य नहीं है…। मुझे लगता है कि ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ की अधिकांश कविताएं एक अजीब रौ में लिखी गई हैं। उनमें न तो विजयदेव नारायण साही की कविताओं की आत्मीयता है और न राजकमल का वेग।’’ (वही, पृ. 63-69) मतलब इन कविताओं में आत्मीयता नहीं है और परिवेश से संपृक्ति भी नहीं है और टूटना एक मुहावरा भर है-एक रेहटोरिक को तोड़कर दूसरा रेहटोरिक गढ़ना-वास्तविक कर्मक्षेत्र की संवेदना से व्यवस्था को तोड़कर विद्रोही बनना और मुहावरों से युग को तोड़कर आततायी कहलाने का जो अंतर है, उसे आत्महत्या के विरुद्ध की कविताएं साथ-साथ व्यक्त करती हैं। आखिर क्या कारण है कि एक जगह सैद्धंतिक रूप से स्वयं को तोड़ने की महत्ता को स्वीकार करने के बावजूद डॉ॰ चौधरी को दूसरी जगह व्यवस्था को तोड़ने की इच्छा उसमें दिखाई नहीं पड़ी। उसमें आत्मीयता नहीं मिली-वह मिली भी तो विजयदेव नारायण साही की कविता में। कहीं ऐसा तो नहीं था कि पत्रकारिता की भाषा के विरोध ने उन्हें सपाटबयानी के विरोध तक पहुंचा दिया था। अनात्मीयता तथा परिवेश असंपृक्ति के अनुभव के पीछे सपाटबयानी संबंधी धारणा काम कर रही थी। काव्य भाषा संबंधी चिंतन मे ही कहीं कोइ दोष तो नही था!

रघुवीर सहाय की कविताओं में आत्मीयता नहीं मिलने पर डॉ॰ चौधरी ने जो आक्षेप लगाए थे, उसका उत्तर ‘कविता के नए प्रतिमान’ में नामवर सिंह ने दिया भी था। परिवेश को रचनात्मक रूप देने के लिए नाटकीयता कैसे काम करती है और वहां कविता के भीतर का नाटकीय नायक, जो प्राइवेट से ज्यादा सामान्य यथार्थ के किसी निजी साक्षात्कार का एक राजनीतिक व्यक्तित्व के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है। नामवर सिंह ने लिखा था कि आत्महत्या के विरूद्ध की कविताएं ऐसे ही आत्मीय राजनीतिक व्यक्तित्व की कविताएं हैं।

निर्वैयक्तिकता की अपनी घोषणाओं के बावजूद ‘प्रगीतात्मक’ आत्मीयता का बोध और तदनुरूप काव्य भाषा का मोह डॉ॰ चौधरी को ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ की कविताओं में ‘रक्तचापहीन पीली पत्रकारिता के मुहावरों के खतरनाक प्रयास को देख लेती है। 1970 में जब ‘कविता के नए प्रतिमान: विसंगति और विडंबना का सौन्दर्यशास्त्र’ शीर्षक आलेख में डॉ॰ चौधरी ने ‘कविता के नए प्रतिमान’ की समीक्षा की तो फिर से अपनी पुरानी धारणा का ही समर्थन करते हुए लिखा-‘‘पत्रकार की नाटकीय आत्मीयता में सबकुछ एक ‘मैं’ के अधीन होता है। इसमें की कीमियागिरी में घुलनशील तत्व: मैं बने की घोल में सारा तथ्य घुल जाता है-उसकी स्वतंत्रता और वास्तविकता समाप्त हो जाती है। ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ में एक नाटकीय ‘मैं’ का ऐसा ही स्फार है जिसमें तथ्यों की वस्तुनिष्ठता घुलती रहती है। सबकुछ ‘मैं’ के गुंजलक में कैद हो जाता है और सारे करतब के साथ यही ‘मैं’ स्थितियों, घटनाओं और संबंधें पर गुंजलक मारकर बैठा शेष रह जाता है। इतिहास को नचाता हुआ, इतिहास के बीच गतिशील इकाई के रूप में नहीं, सर्वतंत्र स्वतंत्र सत्ता के विस्पफोट के रूप में। इस अनात्म ‘मैं’ का यही रहस्य है जिसकी ओर मैंने इशारा किया था। ‘मैं’ के स्पफार की यह मुद्रा आत्मीय नहीं हो सकती।’’ (खंड1, पृ. 211)

‘कविता के नए प्रतिमान’ की आलोचना उन्होंने दो लेखों में की है। ‘समकालीन कविता: अंधेरे से साक्षात्कार’ शीर्षक लेख में यद्यपि उन्होंने ‘कविता के नए प्रतिमान’ का नाम नहीं लिया है लेकिन विसंगति, विडंबना, नाटकीयता, सपाटबयानी और काव्यभाषा संबंधी नामवर सिंह की स्थापनाओं की आलोचना इसमें है जबकि ‘कविता के नए प्रतिमान: विसंगति और विडंबना का सौन्दर्यशास्त्र’ नामवर सिंह की किताब की समीक्षा है। ‘कविता के नए प्रतिमान’ की इससे अच्छी समीक्षा मेरे देखे में नहीं आई। डॉ॰ चौधरी ने शुरू में ही बताया है कि किस प्रकार छायावाद के ऐतिहासिक पतन पर अपनी दृष्टि केंद्रित न करके नामवर सिंह ने विजयदेव नारायण साही की इस स्थापना का समर्थन किया कि छायावाद का अंतर्विरोध उसके नैतिक विजन के टूट जाने तक सीमित था। उन्होंने आरोप लगाया कि नामवर सिंह ने इसे ज्यों का त्यों स्वीकार करते हुए भावना बुद्धि का एक हीगेलियन डाइलेक्टिक्स गढ़ लिया है। इसी का परिणाम है-काव्य संवेदना का विभाजन। डॉ॰ चौधरी ने लिखा कि नामवर सिंह की इस पुस्तक में ‘‘विवाद शैली के आतंक में इतिहास का परिप्रेक्ष्य डूबता नजर आता है… ‘कविता के नए प्रतिमान’ में जो सबसे बड़ा दोष है, वह परिप्रेक्ष्य के खो जाने का नहीं है, इतिहास के अदृश्य रह जाने का है।’’ (खंड 1, पृ. 206)

‘कविता के नए प्रतिमान’ में इतिहास के अदृश्य रह जाने के कारण नागार्जुन, त्रिलोचन, केदार और सुमन जैसे दूसरे कवि प्रतिमानों के निर्माण से गायब हैं। ‘कविता के नए प्रतिमान’ का परिप्रेक्ष्य निश्चित रूप से मुक्तिबोध हैं लेकिन ‘परिवेश और मूल्य’ में जिस इतिहास को दिखाने की कोशिश नामवर सिंह कर रहे थे, वह उन्हीं के शब्दों में अपूर्ण है और जिसकी क्षतिपूर्ति ‘अंधेरे में पुनश्च’ नामक अध्याय भी नहीं कर पाया। डॉ॰ चौधरी ने यह भी बताया है कि नई कविता के अनुभव संसार की वर्गीय संरचना को लक्ष्य करते हुए मुक्तिबोध ने जो कुछ भी लिखा, उसके बावजूद उनकी भावधारा अपनी विचारधारा से संगत न हो पाई। कला के तीसरे क्षण वाला उनका सिद्धांत उनकी अपनी काव्य प्रक्रिया का अंतर्विरोध भी है। ‘‘कला के जिस तीसरे क्षण को वे संपूर्ण रचनात्मक क्षण सिद्ध करते हैं, क्या वह ‘आत्मपूर्ण तात्कालिकता’ का पर्याय नहीं है। क्या यह ‘आत्मपूर्ण तात्कालिकता सारे कला सत्य को अपने भीतर की परिस्थितियों में या परम स्थिति में फ्रीज नहीं कर देती? सारे विकास को अपने भीतर ही नहीं समेट लेती? यह इतिहास का निषेध है और बर्गशैनियन गुणात्मक काल संरचना से मुक्तिबोध की भावधारा पीडि़त रही। इससे इनकार नहीं किया जाना चाहिए।’’ (खंड 1, पृ. 209)

डॉ॰ चौधरी ने यह भी आरोप लगाया कि विसंगति और विडंबना को जब नामवर सिंह समकालीन इतिहास की मूल लाक्षणिकता के रूप में प्रस्तुत करने लगते हैं तो वह विसंगति और विडंबना को गहरे अर्थ से काटकर फ्राइवालस बना देते हैं। बुर्जुआ सौंदर्यशास्त्र से लड़ने के क्रम में जिन रूपवादी औजारों की सहायता नामवर सिंह लेते हैं, कहीं न कहीं उन औजारों के खुद ही शिकार हो जाते हैं। डॉ॰ चौधरी ने खुद ही लिखा-‘‘कविता के मूल्यांकन में संरचनावादी दृष्टि कहां मार्क्सवादी सौंदर्यशास्त्र से टकराती है, इसे जानना हो तो नामवर की यह पुस्तक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकती है। जिस तरह हीगेलियन द्वंद्ववाद विचारों की गत्यात्मकता पर आश्रित है और कालचाप से आपकी प्रत्यवस्थाएं निर्मित कर उन्हें एक उच्च संश्लेष में बदल लेता है, उसी तरह नामवर का संरचनावादी दृष्टिकोण भी एक कल्पित पूर्णता का संश्लेष बनकर रह जाता है जिसका इतिहास, अनुभव और मानवीय कार्य व्यापारों तथा भावनाओं के मूर्त विश्व से कोई सीधा संबंध नहीं है। … ‘कविता के नए प्रतिमान’ वस्तुतः प्रतिमानों की भीड़ है जिसमें सही प्रतिमान दबा पड़ा रह जाता है।’’ (खंड 1, पृ. 213)

नामवर सिंह पर भाववादी चिंतन के प्रभाव के रूप में कहानी आलोचना संबंधी कुछ निष्कर्ष लगातार डॉ॰ चौधरी की आलोचना के केंद्र में रहे हैं। निर्मल वर्मा के कहानी संग्रह ‘परिंदे’ को नई कहानी की पहली कृति कहना और उसे ‘कालातीत कलादृष्टि’ से विभूषित करना ऐसा ही एक प्रयास था। डॉ॰ चौधरी लिखते हैं कि ‘परिंदे’ संग्रह की कहानियों में ताजगी थी मगर यह ताजगी कतई इस कारण नहीं थी कि निर्मल वर्मा ने इन कहानियों में अपने समय के इतिहास की उस विराट नियति को पहचान लिया था जो मनुष्य को अकेला करती है। ‘‘तमाम कुशलता के बावजूद ‘परिंदे’ जैनेंद्र का अतिक्रमण नहीं करती थी। इतना अवश्य था कि लतिका का पिंजरा बड़ा हो गया था, मगर कैच 22 वह तब भी न बन पाया था। फिर भी नई स्थितियों में स्त्री की यह नियति एक पैराडॉक्स खड़ा करती थी। लतिका को पिंजड़े से ज्यादा उसका अपना नैतिक आवेश बांधता है- इसी बिंदु पर उसकी अपनी पहली और आखिरी पहचान संभव है। … यूरोप की पतनशील परंपरा के आघात को नई कहानी का उद्घोष मानना वैचारिक दिवालियेपन के अतिरिक्त कुछ नहीं कहा जा सकता। बिंब, ध्वनियां, रंग ऐंद्रियबोध को गहरा करते हैं, मगर इससे यथार्थ का ऐतिहय ढांचा कालचाप भी प्राप्त कर लेता है-इसे नहीं माना जा सकता। शायद इस महत्वपूर्ण तथ्य की परीक्षा नहीं की जा सकी। ये विचारधाराएं आंतरिकता को तथ्यबद्ध दायरे से निकालकर जिस अगोचर भावभूमि पर ले जाती हैं, उनका सत्य क्या है। उनका सत्य लौकिक भावभूमि के विरोध में प्रकट हुआ है। यह सत्य जो एक लौकिक भावभूमि को तोड़कर प्रकट हुआ था, किसी कालजयी दृष्टि का परिणाम न था। बल्कि कालचाप से निर्वासित मध्यवर्ग की आत्मचेतना का परिणाम था! उस पर बुर्जुआ विचारधारा का ताजा रंग चढ़ आया।’’ (खंड 2, पृ. 26 व 127-28)

डॉ॰ चौधरी समकालीनता के प्रस्थान बिंदु के रूप में आजादी को रखते हैं। उनके लिए यह आजादी कालगत परिवर्तन के बजाय देश में होने वाला एक परिवर्तन था। यह देशगत परिवर्तन न केवल विभाजन की पीड़ा से ग्रसित था वरन भारतीय जीवन को जो वृहत्तर यथार्थ गांव और शहर की सीमा को तोड़कर राष्ट्रीय धारा में एक होना चाहते थे, वहां गांधीजी की परिकल्पना खंडित हुई थी और निश्चित रूप से गांव और शहर दो भिन्न यथार्थ से रूबरू थे। सुरेंद्र चौधरी ने नेहरू युग के अंतर्विरोधें को अलग-अलग तरीकों से लगातार व्याख्यायित करने की कोशिश की और इसके साथ रचनाशीलता की संलग्नता को चिन्हित भी किया। इन अंतर्विरोधें को पाटने की समस्या ही तात्कालिकता के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती थी। स्वातंत्रयोत्तर हिंदी कहानी में जो तथ्य नई कहानी को कहानी से अलग करता था, वह निश्चित रूप से मध्यवर्ग का आत्मकेंद्रण था। ’62 के राष्ट्रीय हादसे से पहले दशक में निश्चित रूप से एक नवरोमैंटिक उत्थान था (नामवर सिंह के शब्दों में)। मगर जिसे पीड़ाभरी प्रतीक्षा कहा जाता है, उसके इतर इस प्रतीक्षा की सीमाओं को तोड़कर मुक्तिबोध वृहत्तर ऐतिहासिक अंतर्विरोधें से जूझ रहे थे। उनका सिनिकल और संशयवादी होना केवल आवेशजन्य नहीं था। ‘विपात्र’ और ‘क्लाड ईथरली’ की पीड़ा  प्रतिरोध, विद्रोह और स्वतंत्रता की एक पूरी दुनिया को रूपकों में ढालने का प्रयास था। अपने प्रयास में मुक्तिबोध जरूर अकेले थे लेकिन वहां निर्मल वर्मा का अकेलापन नहीं था। डॉ॰ चौधरी जोर देकर कहना चाहते हैं कि नई कहानी की संष्लिष्टता और उसका नयापन जिस रास्ते होकर आजादी के बाद की रचनात्मक परिस्थितियों और उसके अंतर्विरोधें को कैच करने की कोशिश कर रहा था, उसकी दुनिया मुक्तिबोध के रूपकों में ही साकार होती है। जिस प्रकार कविता मुक्तिबोध के यहां सारे रोमैंटिक आवेश उतार देती है, उसी प्रकार कहानीकार मुक्तिबोध के यहां भी भावुकता से उठनेवाली टीस और पीड़ाभरी प्रतीक्षा के बदले आहत नैरंतर्य का संकट केंद्रियता पाता है। नई कहानी की रचनाशीलता के केंद्र में व्यतीत होती व्यवस्था और चरित्रों के प्रति एक व्यथा भरा मोह है जो परिवार-समाज के अंतर्विभाजन के कारण पैदा हुई थी। ‘‘मुझे याद है कि पश्चिम में कथा साहित्य की बहस में जहां जॉर्ज स्पाइनर महाकाव्यात्मक और नाटकीय के बहाने दो सदियों की कथा यात्र के रचनात्मक सार पर बहस कर रहे थे, वहीं मार्क स्पिनका ने डिकेंस और काफ्का की आधुनिकता के केंद्र में परिवार-समाज को रखकर देखा था। ऐसे प्रयत्न अपने यहां न दिखाई पड़े। नामवर जी नई कहानी की बहस में परिवार, समाज को विशेष महत्व देते दिखाई न पड़े। (खंड 2, पृ. 28)

परिवार-समाज की इस केंद्रीयता का कोई कहानीकार था तो वो अमरकांत था। छोटे-छोटे क्रियाकलापों में कितने गहरे भावात्मक अर्थ छिपे रहते हैं, अपनी इसी पहचान के कारण अमरकांत की कहानियां अलग पड़ती हैं। परिवार के भीतर के जीवित रेशों से बनी कहानियां और परिवार के भीतर की भयावहता-दोनों कैसे राष्ट्रीय संदर्भ से जुड़कर भय और त्रास के बावजूद अपने संघर्ष को जीवित रखने की जातीय जिजीविषा से लैस हो सकती है- इसका विश्वास केवल अमरकांत की कहानियां देती हैं। ‘अमरकांत: जीवन की संभावनाओं के लिए संघर्ष’ शीर्षक आलेख नई कहानी के सबसे सशक्त कहानीकार को दुबारा देखने की एक कोशिश है। बड़े ताज्जुब की बात है कि अमरकांत पर कोई स्वतंत्र लेख न तो नामवर सिंह ने उस दौर में लिखा, न ही किसी और ने। डॉ॰ चौधरी का यह लेख उस महती आवश्यकता की पूर्ति करता है।

दूसरे खंड में संकलित डॉ॰ चौधरी के लेख एक बार फिर यह साबित करते हैं कि वह हिंदी के शीर्षस्थ कथा आलोचक हैं। ‘हिंदी कहानीः प्रक्रिया और पाठ’ के साथ कहानी के स्थापत्य को समझने का जो प्रयास उन्होंने शुरू किया था, वह उनके बाद के लेखन में भी लक्षित किया जा सकता है। प्रस्तुत संकलन के लेखों से गुजरते हुए हम लगातार उत्तरशती की कथायात्र करते हैं। इस कथायात्र में समकालीन से जूझते हुए कहानियों का भिन्न भिन्न रचना संदर्भ और उन रचना संदर्भों से झांकते हुए कहानी के स्थापत्य की भिन्न भिन्न भंगिमाएं मिलती हैं। प्रेमचंद के संदर्भ में उन्होंने जिस प्रकार कथावाचन को महत्व दिया था, उसी प्रकार बाद के कहानीकारों के यहां कथावाचक का हासिया किस प्रकार कहानी की रचना परिस्थिति को समृद्ध करता है, उसे भी समझने का प्रयास है। कला और जनवाद के रिश्ते भी डॉ॰ चौधरी के लेखन में निरंतर केंद्रीयता पाते रहे हैं। कथ्य की मार्मिक पहचान केवल नारों से तय नहीं होती। कहानी के भीतर जनवादी आंदोलन की अधिकांश कहानियां गढ़े गए यथार्थ की कहानियां हैं जो निश्चित रूप से यथार्थ के आतंक से पलायन है। अभिधत्मक पहचान और सर्वव्यापी चेतना कलारूपों के लिए मिथकों का आश्रय नहीं लेती। व्यापक और जटिल अनुभवों तक पहुंचने का एक रास्ता मिथकों को तोड़कर भी तय किया जा सकता है। इसके अमरकांत लगातार सिद्ध करते रहे।

सुरेंद्र चौधरी की कथा आलोचना पर विस्तृत बहस की जरूरत है। ये बहस हिंदी कथा आलोचना को नई दिशा दे सकती है। प्रस्तुत आलेख में उन सारे बिंदुओं को समाहित करना संभव नहीं है। खंड दो में मुक्तिबोध, भीष्म साहनी, प्रेमचंद और रेणु की कहानियों की विस्तृत समीक्षा के अलावा मार्क्सवादी सौन्दर्यशास्त्र पर भी एक बहस है। ‘हिंदी व्यंग्य की जातीय परंपरा और परसाई’ शीर्षक आलेख में एक विधा के रूप में व्यंग्य की आवश्यकता और शक्ति-दोनों को पहचानने का भी एक प्रयास है। समाज की विडंबना और उसके अंतर्विरोध जब तर्क की संगति से आगे निकलकर सादृश्यमूलक कल्पना का आधार लेती है तो वह व्यंग्य की बनावट में अपनी पहचान बनाती है। यह व्यंग्य दृष्टि परसाई के यहां अपने आलोचनात्मक यथार्थवाद के कारण ही केवल हास्य का माध्यम नहीं रह जाती। परसाई का व्यक्तित्व अपने युग के आत्मसंशय से ऊपर है। इसलिए वह ओजपूर्ण ढंग से अंतर्विरोधी स्थितियों पर प्रतिक्रिया करता है। एक नैतिक ऊर्जा की मद्धिम आंच में परसाई अपने चरित्रों और परिस्थितियों को पकाते हैं जिससे उनकी शैली तो अलग होती ही है, उसमें नया तासीर भी पैदा होता है। परसाई का व्यंग्य और उनकी गद्यशैली ठेठ अर्थों में हिंदी की जातीय परंपरा का निर्वाह करती है।

’90 के बाद की हिंदी कहानियों में घटना संकुलता के बीच से नई परिस्थितियों का कहानी में सार्थक उपयोग किस प्रकार हो- इस पर डॉ॰ चौधरी विस्तृत विवेचन करते हैं। सांप्रदायिकता जैसी थीम को ले करके फैशनपरक कहानियों का दौर भी चला था। डॉ॰ चौधरी कहते हैं कि तात्कालिकता के मोह में बाजार का गुलाम बनना एक बात है और विराट ऐतिहासिक संदर्भ को कहानियों में ढालना दूसरी बात। मानवीय गरिमा को केंद्र में रखकर लिखी गई दो कहानियों को डॉ॰ चौधरी अपनी समीक्षा का आधार बनाते हैं। प्रियंवद की कहानी ‘वे वहां कैद हैं’ एक पूरी पीढ़ी की दुश्चिंताओं और उलझनों को अपने केंद्र में रखती है। यहां उलझन, दुश्चिंताओं का कारण है या परिणाम-ये तो तय नहीं होता, परंतु तर्क और आवेशजन्य अपराध किस प्रकार मानवीय परिस्थितियों को एक मिथक में बदल देता है-वह पफर्क सामने आया है। छोटे-छोटे प्रसंगों से कैसे बड़ी पृष्ठभूमि का निर्माण होता है-प्रियंवद ने इसे अपनी कहानी कला में साधा है। डॉ॰ चौधरी लिखते हैं-‘‘कहानी के गद्य में प्रियंवद की अपनी अलग पहचान है। संवाद और दृश्य-दोनों इस गद्य से सजीव हो उठते हैं। मनुष्य की जटिल भावनाओं को नैतिक आवर्तों में डालकर देखने की एक विशेष कुशलता उनमें दिखाई पड़ेगी। न्याय और करुणा की सरहदों से एक साथ टकराता हुआ उनका गद्य संसार अथक और अक्षय शक्ति की सूचना देता है। अपनी पीढ़ी के वे अकेले गद्य लेखक हैं जिनमें मुझे ये विशेषताएं लक्षित होती हैं। कविता के मुहावरे में वे नहीं उछालते, जैसा उनके कुछ समकालीन उछालते हैं पर गद्य की पूरी काठी में लिरिक का स्पर्श होता है। (खंड 2, पृ. 265)

दूसरी कहानी है उदय प्रकाश की ‘और अंत में प्रार्थना’। व्यक्तिगत और अवांतर प्रसंगों से सार्वजनिक विडंबना को कैसे सामने लाया जाता है-इसे इस कहानी के संदर्भ में समझा जा सकता है। विषय साधारण ही हो, सारे क्रियाकलाप दैनिक जीवन के ही हों परंतु फिर भी उसमें कलात्मक उन्मेष कैसे हो सकता है-इसे प्रस्तुत कहानी से समझा जा सकता है। विभाजन के प्रेतों से लड़ता हुआ वाकणकर का व्यक्तित्व जिस आत्मसाक्ष्य की पीड़ा से गुजरता है, वह आधुनिक इतिहास में राष्ट्रीयता, वर्ण और ध्र्म तथा पूंजीवादी दुष्चक्र के जटिल संबंधें को कथा के भीतर मूर्त करता है। डॉ॰ चौधरी लिखते हैं-‘‘राज्यसत्ता के चरित्र को परोक्ष रूप से कहानी के गठन के साथ इस ऊंचे स्तर पर उजागर करने वाली कुछ ही कहानियां मैंने पढ़ी हैं। हिंदी कहानियों में किया गया ढेर सारा राजनीतिक लेखन इस स्तर तक नहीं उठता, इसके आसपास तक भी नहीं पहुंचता। उनमें क्रांति की उतावली में पूरी प्रक्रिया का सहज विसर्जन देखा जा सकता है।’’ (खंड 2, पृ. 272)

यह आधी अधूरी रूपरेखा मात्र है एक भुला दिए गए आलोचक के विशाल और सजग आलोचना कर्म का।  सच्ची आलोचना किस कदर गंभीर वैचारिक संघर्ष का परिणाम होती है इसे सुरेन्द्र चौधरी के लेखन में स्पष्ट ही देखा जा सकता है। सुरेन्द्र चौधरी पर बहस एक ऐतिहासिक ज़रुरत है। ज़रुरत है हिंदी की प्रगतिशील आलोचना की एक दूसरी परम्परा से संवाद की। बाकी फिर कभी।

(सुरेन्द्र चौधरी से संबंद्धित सारे उद्धरण अंतिका प्रकाशन से तीन खंडों में प्रकाशित उनके रचना संचयन से लिए गए हैं। विवरण नीचे उपलब्ध है। इस लेख का संशोधित-संपादित अंश अकार में प्रकाशित हो चुका है। मैं इसके लिए अकार का आभारी हूँ।)

मार्तंड प्रगल्भ

मार्तंड प्रगल्भ

मार्तंड प्रगल्भ जे.एन.यू. के भारतीय भाषा केंद्र में पी.एच.डी. के लिए शोधरत  हैं। फिलहाल लिडेन (नीदरलैण्ड) में अध्ययन-प्रवास कर रहे हैं। उनसे mpragalbha1@gmail.com पर संपर्क संभव है।

Published Books Of Surendra Chaudhary: 

  •  Hindi Kahani : Prakriya Aur Path (Hindi), Radhakrishna Prakashan, 1963, 1995
  • Phanishwar Nath Renu, Sahitya Academy, 1987
  • Itihas : Sanyaog Aur Sarthakata(I), Antika Prakashan, 2009
  • Hindi Kahani : Rachana Aur Paristhiti(II), Antika Prakashan, 2009
  • Sadharan Ki Pratigya : Andhere Se Sakshatkar(III), Antika Prakashan, 2009

आत्मकथ्य- मेरे आलोचक का जन्म: सुरेन्द्र चौधरी

राजेन्द्र यादव जी ने इतिहास को बिका हुआ गवाह कहा है। क्या भावी इतिहास को भी हम खरीदा गया गवाह ही छोड़ देंगे? क्या, हम इतिहास को, प्रभुवर्ग को,प्रभुसत्ता को फिर से समर्पित करने जा रहे हैं? घटनाक्रम ने निराशा पैदा की है,पर इस सीमा तक नहीं। दूसरी परम्परा की खोज का खतरा यह है कि खोज के पहले हम उसे प्रभुवर्ग को समर्पित कर देंगे। क्या हिंदी साहित्य की परम्परा प्रभुवर्ग को समर्पित रही है? अगर नहीं, तो उस परम्परा में ही स्वीकृति और स्वतंत्रता की धाराओं की पहचान की जा सकती है? हाँ, शास्त्र और लोक का भेद संस्कृति के ऐतिह्य रूप के निर्धारण के लिए महत्त्वपूर्ण है।

Surendra Choudhary 13 जून 1933- 09 मई 2001

Surendra Choudhary
13 जून 1933- 09 मई 2001

मेरे आलोचक का जन्म

BY सुरेन्द्र चौधरी

 

किसी विचार-व्यवस्था के लिए मैंने लेखन आरम्भ किया हो ऐसा दावा किए बगैर भी कहना चाहूँगा कि मेरी लड़ाई एक व्यवस्था के लिए थी। याद आता है कि सन् 1951में अपने पहले ही लेख में इस प्रश्न से मैं टकराया था। जैनेन्द्र जी की एक लेखमाला ‘आदर्श क्या : संघर्ष कि समन्वय साहित्य सन्देश में प्रकाशित हो रही थी जो उस समय की सबसे बड़ी प्रतिष्ठित आलोचनात्मक पत्रिका थी। मेरा लेख संघर्ष के पक्ष में और समन्वय के विरोध में लिखा गया था। तब मैं इन्टरमीडिएट का विद्यार्थी था। कॉलेज और नगर में इसकी नोटिस ली गई। हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. वासुदेवनन्दन जी ने जानना चाहा था कि क्या यह लेख मेरा ही लिखा है।

उत्साह में व्यवस्था की परवाह नहीं होती। अगर वह किसी का विरोध करता है तो किसी को चुनता भी है। मैंने संघर्ष चुना था। संघर्ष आज भी जारी है। यह संघर्ष अपने आप से भी चलता है। साहित्य और विशेषत: आधुनिक साहित्य की मेरी समझ वस्तुत: मानव-मुक्ति और राष्ट्रीय-मुक्ति की उस पृष्ठभूमि में बनी जिसमें एक नई संस्कृति का जन्म हुआ था। उसमें संघर्ष की अंतर्ध्वनियाँ मेरे युवा मन ने सुनी थीं और मेरी चेतना ने उसे अपना आदर्श बनाया था। अपने पहले लेख में यह प्रस्तावना आकस्मिक नहीं थी।

ये वर्ष मेरी बहु-उन्मुखता के वर्ष थे। पढ़ाई, छात्र-संगठन, फुटबॉल और राजनीति में एक साथ रुचि रखने के कारण लेखन नहीं कर पा रहा था। पढऩा जारी था। यूरो-इंडियन चिन्तन से स्वतंत्र होकर हमारे लिए कला-रूप, सामाजिक संगठन, विश्व-दृष्टि, और क्रान्तिकारी नैतिकता संबंधी प्रश्न नया दबाव पैदा कर रहे थे। यह सब बहुत सचेत रूप से हो रहा था, चाहे बहुत व्यवस्थित न भी रहा हो। प्रगतिशील लेखक संघ 1953 में नए दौर में प्रवेश कर रहा था। मैं उसके जलसों में पहुँच जाता था। अगले दो वर्ष मेरे आलोचक के निर्माण में अहम भूमिका पूरी करते हैं।

आधुनिकता और आधुनिकीकरण के पूरे दौर में अपनी पीढ़ी को समकालीन मानने का सौभाग्य हमें प्राप्त है। साहित्य के अलावा मेरी रुचि दर्शन और अर्थशास्त्र में थी। साहित्य का प्रश्न सांस्कृतिक प्रश्न बन गया था। गोष्ठियों में स्व. राहुल जी के मुँह से यह मैं कई बार सुन चुका था। वे इसे भाषा से भी जोड़ रहे थे। स्वतंत्र भारत के सन्दर्भ में यह सहज ही अनुमेय है।

एम.ए. में मैं स्व. नलिन विलोचन शर्मा जी के सम्पर्क में आ गया था। वे घोषित रूप से मार्क्सवाद-विरोधी आलोचक थे। मेरी अभिरुचि और साहित्यिक रुझान का उन्हें पता था। उन्होंने मुझे नए मार्क्सवादी आलोचकों का साहित्य पढऩे को दिया। यही नहीं यूरोप-अमेरिका के क्लासिक कथाकारों की रचनाएँ पढऩे को दीं। जैनेन्द्र उनके प्रिय लेखक थे। समकालीन कहानीकारों पर कई उत्तेजक रायें देते रहते थे। उनकी कृपा से मुझे लुकाच, हाउजर, काडवेल, वाल्टर-बेंजामिन आदि का प्राय: अनुपलब्ध साहित्य पढऩे को मिला। निश्चित रूप में तब मैं इनकी पारस्परिक असंगतियों को समझ नहीं पा रहा था। मार्क्सवादियों के बीच ढेर-सारी सांस्कृतिक समस्याओं पर विचार आरम्भ हो चुका था। स्व. नलिन जी की कृपा से मुझे वल्गर सोशियालॉजी पर सोवियत यूनियन में चल रही बहस की एक पूरी पुस्तक उपलब्ध हो गई थी।

निश्चित ही अत्यन्त सम्वेदनशील मार्गों से मेरा प्रशिक्षण हो रहा था। सन् 1955-56 में मैं नामवर जी के व्यक्तिगत सम्पर्क में आया। मेरे वर्तमान का निर्माण उनके हाथों हुआ है। वैसे कई व्यावहारिक मुद्दों पर मैं उनकी कार्य-प्रणाली से अलग भी रहा हूँ। मैंने उन दिनों गया को वैचारिक हलचलों का केन्द्र बना रखा था। अपने कॉलेज की हिंदी परिषद के अधिवेशन राष्ट्रीय स्तर पर मैंने किए। श्री अज्ञेय और डॉ. रामविलास जी को छोडक़र प्राय: सभी इस मंच पर आए। श्री यशपाल, जैनेन्द्र, महादेवी वर्मा, डॉ. भगवत शरण उपाध्याय, भैरव प्रसाद गुप्त, डॉ. प्रकाश चंद्र गुप्त, त्रिलोचन के साथ-साथ राजा राधिकारमण, नलिन विलोचन शर्मा, केसरी कुमार, डॉ. जगदीश गुप्त, नामवर सिंह, मार्कण्डेय आदि तमाम लोगों का सहयोग मुझे प्राप्त हुआ।

1955-60 के बीच हिंदी आलोचना एक नए दौर में प्रवेश कर रही थी। मैंने छिटपुट निबन्ध इस दौर में खूब लिखे। ‘लहर’, ‘कल्पना’, ‘ज्योत्स्ना’ और साठ के बाद ‘जनयुग’ और ‘आलोचना’ में ‘लहर’, ‘आधार’ आदि पत्रों के साथ लिख रहा था। ‘लहर’ से सम्पर्क में स्व. मित्र राजकमल के माध्यम से आया था। स्व. प्रकाश जैन और मनमोहिनी ने और ‘आलोचना’ में डॉ. नामवर सिंह ने मुझे काफी छापा। आज भी इनका ऋण मुझ पर है। नामवर जी के कारण मेरी आलोचना दृष्टि का विस्तार हुआ। उन्हीं दिनों मैं विदेशी पत्रिकाओं के सम्पर्क में आया। ये पत्रिकाएँ विश्व-स्तर पर जानी जाती थीं और साहित्य-संस्कृति-विचार के सभी अंगों की ताज़ातर समस्याओं को हल करने में लगी थीं।

मार्क्सवाद के साथ इनके अंतर्विरोध साफ थे। पर ये अंतर्विरोध, सारे के सारे कैटेस्ट्राफिक न थे। कुछ हद तक उनका हल निकाला जा सकता था। नववामपंथी चिन्तन भी सुसंगत हो चुका था। क्लासिकल और सोवियत मार्क्सवाद से यूरोपीय मार्क्सवादियों की कुछ दूरियाँ भी मेरे ध्यान में आने लगी थीं। रोज़र गैरोदी तब तक फ्रेंच पार्टी से निकाले न गए थे। वे तेज़ी से लिख रहे थे। ग्रामशी को खूब पढ़ा जा रहा था। उनके ‘हेगेमनी’ के सिद्धान्त की चर्चा हमारे बीच भी होने लगी थी।

हिंदी में डॉ. रामविलास शर्मा के निबन्ध-संग्रह लगातार आ रहे थे। पुस्तकें भी आई थीं। ‘भाषा और समाज’ एक गम्भीर पुस्तक थी। वे भारतीय सन्दर्भ में हमारे सबसे प्रासंगिक लेखक हो गए थे। कुछ वर्ष पहले की स्थिति उलट गई थी। वे ब्रिटिश आलोचकों की तरह जटिल से जटिल विषय पर अपनी प्रवहमान सरल गद्य-शैली में लिखते थे। उनका प्रभाव गैर-मार्क्सवादियों पर भी पड़ रहा था। शैक्षणिक दुनिया में किसी मार्क्सवादी की बात मानी जाने लगी थी। मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा, पर मेरा मार्ग नामवर जी वाला ही था।

सन् 1963 में मैंने कहानी पर एक पुस्तक लिखी—’हिंदी कहानी : प्रक्रिया और पाठ’। मैं आज भी उसे एक प्रासंगिक पुस्तक मानता हूँ। कथा-संबंधी यह पुस्तक अद्यतन सैद्धान्तिक-व्यावहारिक प्रश्नों से टकराती थी। कहानी की प्रक्रिया पर, विशेष रूप से हिंदी कहानी की प्रक्रिया पर मैंने विस्तार से विचार किया था। तब भी मेरी धारणा थी कि गाथा को कथा में बदलकर कहानी का मार्ग निकाला गया है। यह हिंदीतर भाषाओं (आधुनिक) के लिए भी सच है। ‘पाठ’ को मैं उत्तरआधुनिकता की चर्चा से पहले महत्त्व दे रहा था। वाचिक परम्परा के समानान्तर मैं पाठ के महत्त्व को सिद्ध करना चाह रहा था। आज इस मुद्दे पर खासी बहस देश-विदेश के कथा-साहित्य में चल रही है। थाने की रपट लिखने वाले कुछ लोग कहानी की रपट भी लिख रहे हैं। उनकी शिकायत है कि मैं नैरेटर और नैरेशन की अपनी रट भूल नहीं रहा। वे राबर्ट शोल्ज की ‘फैब्रुलेटर्स’ और फेडरमैन द्वारा सम्पादित ‘सरफिक्शन’ उलट लें। जेराल्ड ग्रैफ का लम्बा लेख ‘द मिथ ऑफ पोस्टमाडर्निस्ट ब्रेक थ्रू’ (‘ट्राइ क्वाटर्ली’ 1973) भी उन्हें इस वापसी के महत्त्व तक ले जाएगा।

‘अस्तित्ववाद और समकालीन हिंदी साहित्य’ विषय पर अपना शोध-प्रबन्ध लिखा और ‘सामयिक’ में डॉ. नामवर सिंह की पुस्तक ‘कविता के नए प्रतिमान’ की लम्बी समीक्षा लिखी। काव्य-भाषा और कविता की संरचना की ओर मेरा ध्यान इसी क्रम में गया। कथा-प्रक्रिया की तरह काव्य-प्रक्रिया को भी मैंने अलग से समझने की चेष्टा की। वैसे कविता पर लिखने का मेरा कोई विचार न था। इस दिशा में मैंने कोई विशेष चेष्टा भी नहीं की।

कथा की ओर मेरी उन्मुखता ने मुझे फिर कहानी-उपन्यासों की दुनिया में ला खड़ा किया। मैंने एक लम्बे अरसे तक लिखना बंद भी कर दिया। हिंदी में कई नए आन्दोलनों की हवा थी। आधुनिकता और समकालीनता का प्रभाव कहीं मिला-जुला था और कहीं विरोधी था। कथा-साहित्य में समकालीनता की कई समस्याएँ थीं। एक विचित्र सहवर्तिता के भीतर समकालीनता अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने के लिए संघर्ष कर रही थी। स्वाभाविक था कि इसमें मेरी दिलचस्पी होती। रेणु पर लिखकर जैसे मैं अपनी ही दृष्टि की सफाई करता रहा। भारतीय साहित्य के निर्माताओं में रेणु की जगह ढूँढ पाने की मेरी चेष्टा ने मुझसे उन पर एक मोनोग्राफ लिखवाया (1988)। इसमें मैंने आधुनिकता और समकालीनता की सरहद पर रेणु के साहित्य का मूल्यांकन किया।

भारत के राजनीतिक संक्रमण को यशपाल, भगवती चरण वर्मा, भीष्म साहनी और रेणु ने अपने-अपने नज़रिए से, गहरी संलग्नता से देखा-परखा था। नागर जी के कई उपन्यासों में शहरी जीवन की संक्रमणशीलता लक्षित हो रही थी। ‘मैला आँचल’ और ‘परती-परिकथा’ में रेणु ने ग्रामीण समाज और जीवन की हलचलों को व्यापक ढंग से चित्रित किया था। उनके राजनीतिक समीकरण बिहार के गाँवों में आज भी थोड़े अंतर के साथ मिल जाएँगे। रेणु ने अपनी राजनीतिक पहचान से ज़्यादा उस नई आर्थिक-सामाजिक प्रक्रिया को पहचाना था जिसका अंतर्विरोध वर्तमान इतिहास की धुरी बन जाता है। गाँव में एक साथ शासन का आधुनिक तंत्र पहुँचता है और सामन्तवाद की वापसी होती है। गाँवों के आधुनिकीकरण की यह बाधा लगभग स्थायी हो गई है।

यह विशेषता रेणु को अधिकांश लेखकों से अलग करती है। मैंने अपने मोनोग्राफ में इसे रेखांकित किया। भूमि समस्या का खूनी आभास उनकी रचनाओं में मिलने लगता है। बहुत-सी पूर्व स्थितियाँ यहाँ आकर खत्म हो जाती हैं, मेरा ध्यान मुख्य रूप से इन खत्म होती स्थितियों की ओर था, क्योंकि उनकी जगह ही नहीं स्थितियाँ भर पातीं। सामन्तवाद की वापसी एक विलक्षण तत्व थी। परिघटनाएँ इसे स्पष्ट कर रही थीं। अपनी पुस्तक में भरसक मैं इन परिघटनाओं के रचनात्मक संयोग पर विचार करना चाह रहा था।

समकालीन कहानियों पर एक पुस्तक लिख रहा हूँ। मेरे मन में एक ही विचार कुण्डली मारकर बैठा है—क्या समकालीन कहानियाँ समकालीनता की सभी ध्वनियाँ प्रकट कर रही हैं? क्या उनमें समकालीन परिस्थिति और प्रसंगों के अलावा कुछ नहीं है? क्या उसमें ‘अन्य’ का विचार केवल लोगों को प्रभावित-आतंकित करने के लिए है। ये नए लेखक क्या अपनी विषय-वस्तु से सचमुच दूर हैं! मुझे ऐसा कभी नहीं लगा। अपनी विषय-वस्तु पर इनकी पकड़ है, चाहे इनकी रचना दृष्टि बहुत व्यापक न भी हो। रचना के शिल्प पर इनकी पकड़ को लेकर अवश्य बहस की जा सकती है।

इतिहास और वर्तमान में एक साथ निबद्ध हमारी कथा का यथार्थ वस्तुत: आधुनिकता के लिए चुनौती है। आधुनिकता ऊपर से नीचे आएगी या वह समानान्तर आगे बढ़ेगी? आधुनिकीकरण की मिली-जुली प्रक्रिया साधक है या बाधक? वह किसके लिए साधक है और किसके लिए बाधक है? आज इस आखिरी प्रश्न का उत्तर देना बहुत कठिन नहीं है। कर्ज़ की व्यवस्था हमेशा-हमेशा उपभोक्ता समाज को जन्म देती है। कर्ज़ की पीने और फाकामस्ती करने की कला हर समाज को नहीं आती!

हमारी रचनाशीलता और रचना के लिए अनुकूल परिस्थिति पर बाज़ार का और बाज़ारू माध्यमों का प्रभाव बड़ा भयानक सिद्ध होगा। पुस्तकें पहुँच से बाहर हो रही हैं। कला-संस्कृति के नाम पर जितने फुटकल आइटम्स परोसे जा रहे हैं वे सूचना से अधिक क्या हैं? क्या सचमुच इनके फुटकल प्रसार से किसी कला-संस्कृति का विस्तार सम्भव है? क्या अभी जो चित्रों की नीलामी हो रही है, वह एक प्रकार के पूँजीनिवेश से भिन्न अहमियत रखती है? ‘जनसत्ता’ में अभी कल इस संबंध में एक रपट छपी है। उसमें कुछ चौंकाने वाली सूचनाएँ हैं। नटराज की मूर्ति का कोई खरीदार न था। पता नहीं, इनमें जो महँगे दामों पर नीलामी हुई, कितनी मूलकृतियाँ हैं। वस्तुओं का दूसरा पक्ष भी है, यह कहकर वस्तु की बजाय संरचना की विशेषता को वास्तविक सिद्ध करने की चेष्टा ने अतियथार्थवाद के सारे प्रकारान्तरों को ध्वस्त किया है, यह हम देख चुके हैं। मैं यह नहीं कहता कि यथार्थ एकात्मक है, मगर क्या रचना में वह केवल अपनी संरचना का विषय मात्र नहीं है, यह हमारे जीवन से उत्प्रेरित वास्तविक गोचर विषय भी है। चरित्र और उसकी स्थितियों में यह यथार्थ अपनी पूरी जटिलता से व्यक्त होता है। हमारी कथात्मक पद्धतियों में शब्द और प्रतीक, वस्तु और विचार, दृश्य और संकेत इस प्रकार अंतर्लयित हैं कि उन्हें अलगाने की स्थिति में यह मौलिकता नष्ट हो जाती है।

यथार्थवाद इस मौलिकता को नष्ट कर रचनात्मक मार्ग नहीं निकाल सकता। परम्परा का यह उपयोग हमें वर्तमान के साक्षात्कार में भी मदद करता है। जीवन की पद्धति पर, भोग-पद्धति पर तकनीकी प्रभाव दुहरे ढंग से प्रतिक्रिया कर रहे हैं। वे हमारे बाहरी जीवन को प्रभावित करते हुए भी हमारी दृष्टि और संस्कार को उस तरह प्रभावित नहीं कर रहे जिस तरह पश्चिमी मनुष्य को कर रहे हैं। परिवार और समाज में आज भी हमारी जड़ें शेष हैं।

यथार्थ गतिशील है। किन्तु यह गति एक समाज से होकर है। इस समाज से होकर ही गति इतिहास बनती है। काल की स्थिति और गति के इस विश्वगत भेद को भुलाकर मानवीय वास्तविकता नष्ट हो जाती है। परकीयता (एलियनेशन) क्या एक सामाजिक अवबोध नहीं है? क्या व्यक्ति एक आकस्मिक घटना भर है? प्रभु और सम्राट के अतिरिक्त क्या और कोई धुरी नहीं है? फिर ऐसे समाजों में कालक्रम में ऐसा भयानक अलगाव कैसे प्रकट हुआ? मानवीय यथार्थ के साथ ये प्रश्न सामाजिक इतिहास और संस्कृति की तमाम पूर्व कल्पनाओं से जुड़े हैं।

परकीयता का कारण वर्तमान यथार्थ में ढूँढना इसलिए भी गलत नहीं है। इसे अस्तित्ववाद की आध्यात्मिक परकीयता से भिन्न करके देखा जाना चाहिए। ये प्रश्न यथार्थवाद के जीवन प्रश्न हैं और तकनीकी समाज में इनके और भी भयानक परिणाम निकलने की सम्भावना बढ़ जाती है। इस दार्शनिक प्रश्न पर ज़्यादा बल देना इस छोटे से आत्मकथ्य में सम्भव नहीं होगा।

इतिहास, साहित्य और संस्कृति के प्रश्न हमारे वर्तमान के लिए सबसे प्रासंगिक हैं। एक स्वतंत्र राष्ट्र का इतिहास और संस्कृति से संबंध स्थापित करने में साहित्य की क्या भूमिका हो सकती है? भारत के भावी इतिहास, संस्कृति में वर्ग, राज्य और जन में किसकी प्रमुख भूमिका होगी? क्या हम इस भूमिका को निर्धारित करने में साहित्य का कोई भविष्य देख रहे हैं? यह ठीक है कि साहित्य परिवर्तन का औज़ार नहीं है, पर वह एक निर्भर रहने योग्य माध्यम है। साहित्य की क्रान्तिकारी भूमिका इसी अर्थ में ग्रहण की जाती है।

राजेन्द्र यादव जी ने इतिहास को बिका हुआ गवाह कहा है। क्या भावी इतिहास को भी हम खरीदा गया गवाह ही छोड़ देंगे? क्या, हम इतिहास को, प्रभुवर्ग को, प्रभुसत्ता को फिर से समर्पित करने जा रहे हैं? घटनाक्रम ने निराशा पैदा की है, पर इस सीमा तक नहीं। दूसरी परम्परा की खोज का खतरा यह है कि खोज के पहले हम उसे प्रभुवर्ग को समर्पित कर देंगे। क्या हिंदी साहित्य की परम्परा प्रभुवर्ग को समर्पित रही है? अगर नहीं, तो उस परम्परा में ही स्वीकृति और स्वतंत्रता की धाराओं की पहचान की जा सकती है? हाँ, शास्त्र और लोक का भेद संस्कृति के ऐतिह्य रूप के निर्धारण के लिए महत्त्वपूर्ण है।

ब्राह्मणवादी विचारधारा और व्यवस्था के सांस्कृतिक स्वरूप को समझने के लिए यह भेद एक मौलिक आयाम भी प्रस्तुत करता है। जनता से इसके अंतर्विरोध कई स्तरों पर प्रकट हुए। साहित्य में उसकी खोज की जानी चाहिए। पर उसे उस तरह नहीं खोजा जा सकता जिस तरह दलित साहित्य की खोज की जा रही है। सामाजिक परिवर्तन के प्रश्न को आर्थिक होड़ में डालकर हम क्या स्वयं उसकी सम्भावनाओं पर प्रश्नचिह्न नहीं लगा रहे। गांधी की नामलेवा व्यवस्था में भी अन्त्यज अपने हाशिए पर ही हैं। सामाजिक न्याय माँगने वाली शक्तियाँ क्या सामाजिक न्याय देंगी भी!

राष्ट्रवाद का जो भी स्वरूप निर्धारित हो, राष्ट्रीयता हमारी वही रहेगी जो इतिहास द्वारा प्रदत्त है। कौमियतों से स्वतंत्र राष्ट्रवाद की उदग्र परिकल्पना ठीक उसी तरह की होगी जिस तरह वर्णों से स्वतंत्र हिन्दू समाज की परिकल्पना। दोनों में एक ही तरह के खतरे निहित होंगे। ऐसे राष्ट्र में भी वर्ण विरोध बढ़ेंगे ही। मुख्यधारा की अवधारणा और परिकल्पना (जनता के राष्ट्र की) क्या पूरी तरह आयत्त है? अगर नहीं तो उसे जनवादी राष्ट्र की धारणा कैसे प्राप्त होगी? इसका आधार भारतीय जीवन और जन में है, पर उसे विकसित करने और मुख्य धारा के रूप में प्रतिष्ठित करने की आवश्यकता दिनोंदिन बढ़ रही है। हम साम्प्रदायिकता के एक भयानक दौर से गुज़र रहे हैं। इस आन्तरिक विरोध से जनवादी और क्रान्तिकारी प्रक्रिया बाधित होती है। मनुष्य की सचेत भूमिकाएँ हर दौर में महत्त्व रखती हैं, आज के दौर में उन्हें भुलाया नहीं जा सकता। उसकी आवश्यकता और बढ़ ही गई है। विश्व केन्द्रीकरण की शक्तियों को नाकाम कर ही जनवादी प्रक्रिया सफल होगी। जैसा कि डॉ. रामविलास शर्मा जी ने लिखा भी है—इजारेदार पूँजी सैन्य केन्द्रीय राज्यसत्ता, केन्द्रीय प्रजातंत्र आदि से हमारी दूरी बढ़ रही है। अंतर्विरोध तीखे हो रहे हैं। (‘क्रान्तिकारी जनवाद का दर्शन और भारत’, साम्य पुस्तिका-9)।

विकासशील देशों के गैर-पूँजीवादी मार्ग पर बढऩे की आर्थिक-राजनीतिक सम्भावनाएँ कम होती जा रही हैं। कुछ तो बाहरी दबावों के कारण और कुछ सोवियत व्यवस्था के नष्ट होने से इस मार्ग की बाधाएँ बहुत बड़ी हो गई हैं। राष्ट्रीय सरकारों पर जनता का जैसा दबाव होना चाहिए, वह नहीं है। उन पर विश्व-बैंक और मुद्राकोष का दबाव ज़्यादा है। आन्तरिक अव्यवस्था से ऐसी सरकारें दिन-ब-दिन ग्रस्त होती जा रही हैं, हमें इसे भूलना नहीं चाहिए। प्रतिरोध सफल न हुआ तो हम एक अधिक जटिल और आतंककारी गुलामी की गोद में गिर सकते हैं। वर्तमान परिस्थितियों में हमें जनता के बीच के अंतर्विरोधों से भी निबटना पड़ेगा।

संस्कृतियों की स्वायत्तता को नष्ट कर एक भावी सभ्यता के सर्वग्रासी रूप की परिकल्पना कैसी लगेगी? वर्तमान पूँजीवादी सभ्यता क्या इसी ओर बढ़ रही है? इतिहास-दर्शन के अनेक प्रश्नकर्ताओं ने सदी के दूसरे दशक में ही इसकी सम्भावना व्यक्त की थी। दो विश्वयुद्धों के बाद पश्चिमी पतनशीलता क्या नव-उपनिवेशवाद से थमी है। मगर यह साझा उपनिवेशवाद कहाँ तक चलेगा? फिलहाल इन नव-उपनिवेशवादी हमलों से विकासशील देश ही त्रस्त नहीं है, कुछ उन्नत पूँजीवादी देश भी परेशान हैं। फ्रांस इसका ताज़ा उदाहरण हैं।

जनवादी क्रान्ति में क्या विकासशील राष्ट्रों की मुक्ति निहित है? यह प्रश्न तमाम पिछड़े हुए किन्तु परिवर्तनकामी राष्ट्रों की समस्या है। भारतीय वामपंथी-जनवादी इस संबंध में क्या सोच रहे हैं यह भी हमसे छिपा नहीं है। पर जनता क्या उनसे स्वतंत्र भी कुछ सोचने के लिए राजनीतिक रूप से तैयार है? ये प्रश्न हमारे लिए निर्णायक प्रश्न हैं।

इन बृहत्तर प्रश्नों के सन्दर्भ में रचना और आलोचना की स्थिति पर विचार करना एक बार फिर ज़रूरी हो गया है। भारतीय नवजागरण के भावी परिणामों पर विचार करने के पहले उसके वर्तमान स्वरूप पर विचार करना ज़रूरी है। क्या यह नवजागरण राष्ट्रीय परिदृश्य में बिखराव—धार्मिक अस्मिता और शोषित राष्ट्रीयता जैसे नारों में—ला रहा है? क्या उसका कोई भी सकारात्मक भविष्य नहीं है? नवजागरण में तो राष्ट्र को जनता की शक्ति मिलनी चाहिए और जनता को राष्ट्र की ऐक्यबद्धता। उपनिवेशवाद के पहले दौर में हमारे नवजागरण को पीछे ठेल दिया गया। क्या नव-उपनिवेशवाद का सांस्कृतिक हमला उसे पीछे ठेलने में समर्थ हो जाएगा? हमारे सामने ये चुनौतियाँ हैं। हर वामपंथी मंच पर यह खुली बहस का विषय है। स्थितियों के साथ संवाद बनाए रखना ज़रूरी है। नवजागरण के तमाम मुद्दे नए सिरे से तय करने की कोशिशें भी चल रही हैं।

लोकजागरण जनता के जनवाद के पक्ष में जाए इसकी संभावनाओं और बाधाओं पर दृष्टि केंद्रित किए बिना बहुत सारी सांस्कृतिक समस्याओं का हल नहीं निकलेगा। इसके लिए साहित्य के नवगठन और पुनर्गठन का महत्त्व क्या है?

आज़ादी हमारे निकटतम इतिहास की सबसे बड़ी घटना है। इसके साथ एक विशाल जनगण का भविष्य जुड़ गया था। उपनिवेशवाद से मुक्ति के इस दौर में अनेक छोटे-बड़े राष्ट्र इस भविष्य से जुड़ गए थे। परिवर्तन की एक अमूर्त भावना जनगण में थी। विकासशीलता को एक नया सन्दर्भ और अर्थ मिल गया था। पर साथ ही यह भी एक तथ्य है कि इस लोकतंत्र की शक्ति को पहचानकर भी उसके व्यावहारिक तर्क अलग-अलग पडऩे लगे थे। समाजवाद की अंतर्ध्वनियाँ सुनाई ज़रूर पड़ती थीं पर उन्हें समर्थित आधार देने वाला कोई बड़ा संगठित वर्ग न था। जनता ने अपना जनतंत्र नेतृत्व को प्राय: समर्पित कर अपनी भूमिका को विराम दिया। राष्ट्रीय पुनर्गठन का समाजवादी लक्ष्य फिर भी तय न हुआ। व्यावहारिक तर्क एकता और संघर्ष की वामपंथी असमंजस्यता का शिकार हुआ। गैर-काँग्रेसवादी कार्यनीति गैर-राजनीतिक गठबन्धन से अधिक कुछ न रही।

जनता के पुनर्गठन का सवाल तय न हो तो कला और संस्कृति के पुनर्गठन का प्रश्न स्वत: कुछ मध्यवर्गीय समूहों तक सीमित हो जाता है। ये मध्यवर्गीय समूह अपने को पिछड़े हुए समाज से अलग-थलग समझते हैं। यही नहीं ये क्रान्ति की क्रान्तिकारी व्याख्या करते हुए यह कार्यभार दूसरों को सौंप देते हैं। परिणाम स्पष्ट है, बहुत-सी ऊँची लहरें समय के साथ गुज़र जाती हैं। एकत्वहीन मध्यवर्गीय समूह हलचल को अपनी स्वतंत्रता मानकर जनवाद और क्रान्ति को किस कदर बदनाम करता है, इसकी मिसालें हमारे यहाँ के अलावा अन्य समाजों में भी मिल जाएँगी।

जनवाद के सन्दर्भ में एक विशेष स्थिति इसलिए भी देखी जा सकती है कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की वर्तमान काँग्रेस ने समाजवाद को एक चीनी तत्व बनाकर छोड़ दिया है।

डॉ. रामविलास शर्मा जी ने साहित्य, परम्परा, जातीयता, इतिहास और विश्व-दृष्टि को लेकर इधर कुछ नए और बड़े सवाल उठाए हैं। अभी इनमें से अधिकांश सवाल बहस के बीच हैं। मगर इन प्रश्नों ने हमें बड़े राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य से जोड़ दिया है। भारतीय साहित्य के इतिहास-दर्शन से ये तमाम प्रश्न जुड़ते हैं। कोई भी मार्क्सवादी विचारक इन प्रश्नों से बचाव नहीं कर सकता। उनका भारतीय मानसिकता की ओर लौटना उस अर्थ में नहीं लिया जा सकता जिस अर्थ में हम ‘हारे को हरिनाम’ कहते हैं। वे सम्पूर्ण मानसिकता को एक रचनात्मक और सृजनात्मक जीवनधारा से द्वन्द्वात्मक रूप में परखने के लिए यह यात्रा करते हैं। संस्कृतियों के अध्ययन की एक नई दृष्टि विकसित करने का श्रेय शर्मा जी के लेखन को जाता है। भारतीय सन्दर्भ में वे अकेले मार्क्सवादी हैं जिन्होंने दो पीढिय़ों का प्रशिक्षण बड़े पैमाने पर किया है। उन्हें कई मुद्दों पर अस्वीकार करने के लिए भी हमें नया कुछ सोचने पर विवश होना पड़ता है।

मेरे दिमाग में भारतीय कृषितंत्र और ग्राम समुदायों के संघटन का एक ऐसा ही मसला फँसा हुआ है। ग्राम-समुदायों को लेकर इधर मार्क्सवादियों के बीच काफी बहस चली है। सन्दर्भ एशियाई उत्पादन-पद्धति का रहा है। क्या भारतीय ग्राम-समुदायों की परिकल्पना महज़ एक उपनिवेशवादी तंत्र की आवश्यकता थी? क्या पितृ-सत्तात्मक-समाज निरंकुश साम्राज्य और निरीह ग्राम-समुदाय स्वयं मार्क्स के लिए समस्या नहीं बने थे? अगर ये ग्राम-समुदाय ही निरंकुश साम्राज्यों का उत्सर्जन करते हैं और स्वयं जड़ रह जाते हैं तो इस जड़ता का रहस्य बहुत अबूझ नहीं रह जाता। इसका यह अर्थ नहीं लिया जाना चाहिए कि इस प्रकार का कृषितंत्र स्वयं गतिहीन था। सामुदायिक सम्पत्ति और बड़े कुटुम्ब-परिवारों की व्यक्तिगत सम्पत्ति को लेकर अभी काफी उलझनें बनी हुई हैं। बहरहाल, कृषितंत्र और कृषि पर आधारित समुदायों के जीवन पर पुरातत्व का भी प्रयत्न अब तक निर्णायक नहीं है।

हिंदी भाषी जाति, लोक जागरण (मध्ययुग) और हिंदी नवजागरण को लेकर शर्मा जी ने बहुत कुछ लिखा है। हिन्दू पुनरुत्थानवादियों के लिए वे एकमात्र चुनौती हैं। चुनौतियाँ निरस्त प्रतिमानों की नहीं होतीं।

समकालीन साहित्य पर मैंने फुटकल बहुत लिखा है, पर लगता है फुटकल लेखन कभी बंद किया जाना चाहिए ताकि थोक लिखने का अवसर बने। अभी तक जो पहचान बनी है वह इस फुटकल लेखन की ही है। कोशिश कर रहा हूँ कि इससे उबरूँ। कुछ पारिवारिक परिस्थितियाँ,  कुछ छोटे शहर की सीमा, चाहकर भी नया लिखने की परिस्थिति कम बनती है और जब बनती है तो बाहर दौडऩा पड़ता है। विश्वविद्यालय का पुस्तकालय अभी अव्यवस्थित ही चल रहा है। इधर अनुदान की राशि में भारी कटौती ने कई समस्याएँ पैदा कर दी हैं। स्तरीय पत्रिकाएँ भी खरीदी नहीं जातीं।

जितनी तैयारी है उतने को भी संयोजित करना चाहूँ तो कुछ वर्ष लग ही जाएँगे। दिमाग में कई छोटी-बड़ी योजनाएँ हैं। अभी कहानी की समकालीनता पर एक छोटी पुस्तक लिखने में लगा हूँ। कुछ मित्र सवाल करते हैं कि क्या कहानी की समकालीनता कोई ऐसा परिदृश्य तैयार करती है कि उस पर गम्भीरता से विचार किया जा सके। मेरे लिए समृद्धि और दरिद्रता दोनों चिन्ता के कारण हो सकते हैं। मेरे लिए इतना आश्वासन पर्याप्त है कि कहानी की समकालीनता हिंदी कहानी की समकालीनता के पक्ष में है। बाहरी बोझ उस पर कम हुआ है। अपनी विषय-वस्तु पर कहानी की पकड़ मज़बूत हुई है। समय की जटिलता के नाम पर अमूर्त कहानियाँ कम लिखी जा रही हैं। हाँ, आरक्षण के सवाल पर कहानीकारों में आपसी अलगाव थोड़ा लक्षित हुआ है। यह पूरे देश की वास्तविकता है और केवल इसे कहानीकारों के बीच के विभाजन के रूप में नहीं देखा जा सकता।

चेखव को जुमलों से मारने वालों पर आज टिप्पणी करने की ज़रूरत नहीं। ज़रूरत है समकालीन कहानी को अपनी आधुनिक पहचान देने की जो हमारे लिए एक निर्णायक प्रश्न है। कला और कहानी के संबंध को उस तरह नहीं देखा जा सकता जिस तरह कला और कविता के संबंध को देखा जा सकता है। अपने विवेचन में भरसक मैं इस विवादास्पद प्रश्न से जूझा हूँ। वैसे अपनी शक्ति को बढ़ा-चढ़ाकर देखने की कोशिश मैंने अब तक नहीं ही की है।

एक छोटी योजना भारतीय मिथक-चक्र पर लिखने की है। किसी जाति या जातियों के समुदाय का विचार-विश्वास मिथकों के अध्ययन से जाना जाता है। इतिहास पूर्व का सांस्कृतिक स्रोत होने के कारण इनका विश्वव्यापी अध्ययन किया गया है और आज भी किया जा रहा है। हमारे देश में मिथकों के कई चक्र हैं जिनसे हमारे उपमहाद्वीप की जीवनविधि में आए परिवर्तनों को समझा जा सकता है। ये विश्वास परलोक संबंधी ही नहीं, इहलोक संबंधी भी हैं। वैदिक-पौराणिक मिथक-चक्रों के साथ उनके लौकिक चक्र भी हैं जो लिखित से अधिक वाचिक परम्पराओं में जीवित हैं। तुलनात्मक रूप से इनका अध्ययन अनेक समानताओं और विरोधों को उजागर करता है।

ब्राह्मणवाद एक व्यवस्था भी है और विचारधारा भी। इन दोनों रूपों में उसके ऐतिहासिक अध्ययन की योजना है। थोड़ा काम किया भी है। वर्तमान सन्दर्भ में तो यह विचारधारा एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। इतिहास के भीतर से वर्तमान तक आकर क्या भावी समाज के लिए यह संकटपूर्ण व्यवस्था साबित होने जा रही है? इन तमाम प्रश्नों से टकराना आज ज़रूरी है। ब्राह्मïणवाद क्या कोई ऐतिह्य उत्तर देने की स्थिति में है? कौन-सी व्यवस्था इसका उत्तर है? क्या भारतीय समाज इस विकल्प के लिए तैयार है? जनवादी व्यवस्था में क्या ये बद्धमूल अंतर्विरोध नष्ट होंगे? ऐसे कुछ मुद्दे क्या विकल्प की व्यवस्था के लिए तय हैं? आलोचनाकर्म की जटिलताओं से खूब परिचित हूँ। मेरे लिए आलोचना एक प्रकार का रचनात्मक विवेक है। सम्वेदना उसकी बुनियादी शर्त है। इस समीकरण के बावजूद आलोचना कठिन होती है। आलोचना का व्यावहारिक पक्ष मज़बूत हो तो सिद्धान्त की व्यवस्था अदृश्य भी छोड़ी जा सकती है। इसे हमारे कुछ मित्र विसर्जनवाद मानते हैं। सिद्धान्त के प्रति अतिरिक्त मोह का कारण क्या झूठी आत्मसजगता से कुछ अधिक है? मेरे कुछ जनवादी मित्र, जो अरसे पहले अपनी सिद्धान्त-प्रियता के लिए प्रसिद्ध थे, आज सबसे उपराम दिखाई पड़ते हैं।

किसी ने ठीक लिखा है कि आलोचक अपने अनुभव के साथ-साथ एक समृद्ध रचनात्मक अनुभव से भी बहुत कुछ सीखता है। बृहत्तर अनुभव-संसार से उसका यह सब कुछ सीखना, जो अपने एकान्त अनुभव से वह नहीं सीख सकता, उसकी दृष्टि को अधिक व्यापक भोग (भाव) के क्षेत्र में उछाल देता है। उसके कर्तव्य में इस दुहरे अनुभव की जटिलताएँ प्रकट होती हैं। ये अनुभव पूरक भी हो सकते हैं और परस्पर विरोधी भी। इन स्थितियों में उसका हल भी उसे ढूँढना पड़ता है। जीवन में, और विशेष रूप से समकालीन जीवन में, जो कुछ आंतरिक और स्फूर्तिदायक है उसकी पकड़ और पहचान सरल क्रिया नहीं होती। हम अनुभव की इन संजटिल चुनौतियों से जूझते हुए उनका कलात्मक और रचनात्मक अर्थ प्राप्त करते हैं।

हमारे अनुभव-संसार में बहुत से मूलगामी महत्त्व के परिवर्तन हुए हैं। पिछले चालीस वर्षों के इन अनुभवों का समकालीन संसार भारत के यथार्थ को समझने के लिए बहुत ही प्रासंगिक है। भारतीय सन्दर्भ में अन्य देशीय यथार्थ को समझने की चुनौतियाँ भी इसी में शामिल हैं। आधुनिकता और समकालीनता की बहुत-सी असंगतियाँ अगर हल की गई हैं तो बहुत-सी नई पैदा भी हो गई हैं। एक सचेत आलोचक के लिए इनकी रचनात्मक पहचान इसलिए भी बहुत ज़रूरी है।

आलोचनात्मक प्रेरणा का रहस्य इस काल की दुहरी बनावट में आज झाँकने से खुलता है। देश बाद में बदलता है काल में इसकी प्राथमिकताएँ पहले ही झाँकने लगती हैं। यह काल के अनुभव को बार-बार पुनर्गठित करने की प्रक्रिया में व्यक्त होती हैं। आज के समाज में यह प्रक्रिया कुछ ज़्यादा ही तेज़ हुई है। और भविष्य में यह कुछ अप्रत्याशित ढंग से प्रकट होती है, इसकी सम्भावनाएँ बढ़ गई हैं। तकनीकी क्रान्ति का यथार्थ पर यह प्रभाव अनिवार्य है। आलोचना कर्म के लिए प्रसंग प्राप्त स्थिति सुखद न हो, पर अनिवार्य है। कलात्मक अनुभव के संबर्द्धन के लिए यह और भी ज़रूरी है। कलात्मक अनुभव का यह योगपद आलोचक को सच्ची परिपक्वता देता है। यह आलोचना का ‘डायलेक्टिक’ गढऩे में उसकी मदद करता है। संकीर्ण द्वन्द्व से उसे उबारता भी है। एक प्रकार के सँकरे डायलेक्टिक की गिरफ्त में आकर यह कलात्मक अनुभव भी व्यर्थ हो सकता है। आवेश सम्वेदना का पर्याय नहीं हो सकता, वैसे जीवन के साधारण अनुक्रम में वही पहले प्रत्यक्ष होता है।

हिंदी आलोचना की कुछ व्यावहारिक समस्याएँ भी हैं। वह एक लम्बे अरसे से परिवर्तन और परम्परा के संक्रमण की पीड़ा झेल रही है। एक पारम्परिक समाज में ऐसी समस्याएँ आकस्मिक नहीं होतीं। परम्परा को जड़ता मानने की आदत से आलोचना को परहेज़ करना चाहिए। परम्परा से गति को शक्ति मिलती है। परम्परा सम्वर्धन है। परिपाटी अलग चीज़ है। वह कुछ तोड़ती नहीं, इसलिए कुछ नया जोड़ती भी नहीं। एक यांत्रिक और निर्धारित मार्ग का अनुगमन-भर करती है। परम्परा नवीनता को लयबद्ध गति की स्वच्छंदता के रूप में आत्मसात करती है। वह केवल लयहीन गति का विरोध करती है। दूसरी परम्परा की खोज करने के बदले यदि हम इस लयबद्ध गति की स्वच्छंदता की खोज करें तो परम्परा के नवीकरण के लिए वह उपयोगी होगा।

मूल्यवान को निरर्थक से अलग करने की यह एक विधि-सम्मत प्रणाली भी है।

रचनाकारों को आलोचक से हमेशा शिकायत रही है। आज यह कोई नई बात नहीं है। अगर कुछ नया है तो वह यह कि आलोचना की मंचबद्धता ने प्रतिबद्धता का एकाधिकार प्राप्त कर लिया है। समस्त क्रान्ति का स्रोत अपने को सिद्ध करने वाले मंच आज अपने अंतर्विरोधों से ही परेशान हैं। रचनाकार इसके लिए कम दोषी नहीं है। मंच लेखक का होता है, कुर्सियाँ आलोचक सँभालता है। प्रतिबद्धता इतनी विवश, इतनी सँकरी नहीं हो सकती। जो हमारे मंच से बाहर के लेखक हैं वे तो लगभग तय मानते हैं कि हमारे रुख में कोई सकारात्मक परिवर्तन होने से रहा। हमारी उदारता भी उन्हें अभिप्राय-मुक्त नहीं मालूम पड़ती।

आलोचक की अविश्वसनीयता एक खतरनाक स्थिति है। वह निर्णायक प्रश्नों को भी संदेहास्पद बना देती है। यही नहीं, रचना की पहचान के लिए भी वह एक द्विविधाजनक मानसिकता तैयार करती है। आलोचना की एक अच्छी पुस्तक पढऩे का अवसर वर्षों बाद आता है। समीक्षाएँ, रचनात्मक पहचान नहीं बना पातीं। लगता है इस मोर्चे पर भयानक सन्नाटा तिर रहा है। रामविलास जी इस सन्नाटे को तोड़ रहे हैं, क्या यही हिंदी आलोचना की एकमात्र गतिविधि है? सुनता हूँ कि हिंदी नवजागरण पर नामवर जी की एक पुस्तक आ रही है। उससे शायद जड़ता थोड़ी टूटे। सन्तोष करने के और भी बहाने ढूँढे जा सकते हैं।

अपने स्वर में उभरती हुई निराशा स्वयं मुझे चौंकाने वाली लगती है। रचना और आलोचना के लिए आज कोई स्थिति निरापद नहीं हो सकती। पर निराशा एक भिन्न स्थिति है। वह समय के आवर्त्त में हमें और अकेला करती है। इसके विपरीत रचना और संघर्ष के व्यावहारिक रिश्ते लेखक की ऊर्जा के स्रोत होते हैं। कुछ ही लेखक यदि उस रिश्ते को जीवित रखते हैं तो उत्सर्जन की सम्भावनाएँ बनी रहती हैं। आलोचना इनका आधार दृढ़ कर सकती है—रचना और संघर्ष को व्यावहारिक बनाने में उसका सर्जनात्मक योगदान हो सकता है।

जीवन-मूल्यों के बीच कहीं गहरी और निर्णयात्मक टकराहट है। पूरे समकालीन भारतीय जीवन और विचारों-विश्वासों में उसकी व्याप्ति देखी जा सकती है। ऐसी स्थिति में अपने ही लिखे पर विश्वास जमाना चाहता हूँ। मैं अपने लिखे पर अमल करता रहा हूँ। इसलिए भी आत्मविश्वास बढ़ा है। वैसे अभी ऐसा कुछ मैंने नहीं लिखा जो मेरी पहचान को एक सार्वजनिक चेहरा दे सके। साठ की उम्र तक पहुँचकर भी ऐसा न हुआ, इसके लिए खुद भी जि़म्मेदार हूँ। पढऩे की मेरी जि़द ने लिखने में बाधा पैदा की है। आज भी जब कुछ पढऩे को मिल जाता है तो लिखना हफ्तों स्थगित रहता है। नोट्स लेने के अलावा कुछ भी लिख नहीं पाता। लिखना सचमुच साधना है।

भारतीय लेखन के सन्दर्भ में हिंदी लेखन पर विचार किया जाए यह एक शुभ स्थिति होगी। अब तक हमने केवल अंतरराष्ट्रीय साहित्य में ही अपनी जड़ों और शाखों की पहचान की है, अब ऐसा भी समय आ गया है कि हम अपनी जड़ों पर भी ध्यान केन्द्रित करें। हमारे साहित्य में जो जनवादी तत्व हैं और प्रगतिशील भविष्य के लिए आवश्यक तत्व हैं—उनको सहेजकर रचनात्मक चित्र का पोषण करें। समकालीन वैचारिक संघर्ष में उनसे हमें असीम मदद मिलेगी।

संबंधों को विजातीय बना देने वाले जिस समय में हम जी रहे हैं और आततायी परकीयता झेल रहे हैं उससे जनता और साहित्य-संस्कृति की मुक्ति के लिए हमें लम्बा रास्ता तय करना है—यह रास्ता संघर्ष का रास्ता है, हमारे उदग्र अभियान का अंग है।

षष्ठिपूर्ति पर पठित, ‘परिवेश’, नवंबर, 1992-अप्रैल, 1993 से साभार

 

Published Books Of Surendra Chaudhary:

  •  Hindi Kahani : Prakriya Aur Path (Hindi), Radhakrishna Prakashan
  •  Phanishwar Nath Renu, Sahitya Academy
  • Itihas : Sanyaog Aur Sarthakata, Antika Prakashan
  • Hindi Kahani : Rachana Aur Paristhiti, Antika Prakashan
  • Sadharan Ki Pratigya : Andhere Se Sakshatkar, Antika Prakashan

 

Decades of Ideological Cold War and Hindi Literature: Surendra Chaudhary

On The Occasion of  Surendra Chaudhary’s Birthday Eve

By Pranay Krishna 

The reproduction of an article here titled ‘Decades of Ideological Cold War and Hindi Literature’ by Surendra Chowdhary, one of the most brilliant progressive critics of Hindi literature of the cold-war period,  shall serve its purpose not only  as a tribute to him but also inspire us to think afresh on the whole issue with the advantage of hindsight. Surendra Chowdhary’s article presents a sketch or a broad outline of how the ideological cold war was played out on the turf of Hindi literature. He correctly underscores the legacy of Indian ‘renaissance’ of 1870s and the impact of October revolution which was inherited by the progressive movement, much before the cold- war set in. It would not have been out of place had he also underlined how the progressive movement reclaimed the legacy of anti- feudal, anti-imperialist thrust of India’ first war of Independence (1857), so eloquently brought about in the critical writings of Rambilas Sharma, whom he holds in very high esteem.
Chowdhary is probably the only critic of his time whose writings in practical criticism are uniformly informed by a ‘third world’ perspective. The dynamics of decolonization are never lost to his critical mind. This location of a critic itself ensures that his perception and treatment of the impact of ideological cold war in Hindi literature is more nuanced. In his own words, “The national root of this cold war was extremely divergent.” He never reduces the creative literary endeavors to world-historical political polarizations. He is also vigilant against single theoretical determinant in literary practices. However, when he mistakes the ‘inner struggle of new poetry’ for a confusion borne out of progressive poets cooperation with the ‘modernists’ for reasons of their being afflicted with personal crises, he somehow tries to reconcile his position with that of R.B Sharma who wanted a very neat division between the modernists and the progressives ignoring the conditions (political, ideological, social, aesthetic and moral) which had initially brought them together in 1940s. ‘Loneliness of a universal order’, ‘estrangement of man’, ‘suffering becoming a personal and permanent condition of man’ etc. as literary slogans was not so marked in the initial rendezvous of progressives and the modernists. As the ideological cold-war intensified, the arena of ‘new poetry’ became a battleground and got increasingly polarised with G.M. Muktibodh and Ageya representing almost opposite poles of literary theory and aesthetics. Given the later progress of Hindi poetry, it is hard to agree with the proposition that out of so called ‘confusion’ alluded to above, the ‘New Poets’ gained an ideological supremacy. In fact, ‘New Poetry’ was never a monolith, a settled terrain. It always remained a battleground and now one can say with reasonable assertion (and caution as well) that the pole represented by G.M. Muktibodh in the battle ultimately paved the way for the later generations of poets.
Chowdhary has nonetheless correctly remarked that the short stories of 1960s reflected a strange combination, a sort of symbiosis of opposing forces, whereby realism combined with personal vision of the world, sometimes bordering on nihilism. He is absolutely correct in identifying late 60s and early 70s as decades when ‘the hitherto suspended class struggle assumes a new proportion unknown in the contemporary India’ which resurrected the ‘progressive movement’. The Naxalbari uprising and the ‘anti-emergency’ movements were the hallmark of this era. Despite his political affiliation with the ‘official left’ of his time, he has the courage to recognise that ‘generally retracting a life of suffering and struggle these left-wing writers and poets showed a genuine concern for the Indian masses.’
Post cold war literary scene in Hindi has been interesting. Sudden realisation of a world without two poles, rise of communal fascist forces in India, unfolding of atrocious neoliberal LPG regime, abstraction of social classes in identitarian terms and a wave of postmodernist discourses, all had their impact on the literary scene of Hindi, yet none could decisively dislodge the general progressive trend which is getting increasingly amalgamated into a broad ‘culture of resistance’. Frustrated ‘aesthetes’ of older generations are showing a tendency of reverting back to the leftovers of the reactionary cultural rhetoric of the cold war era. One of them has gone so far as to express gratitude towards the CIA for bringing ‘other’ (non-left) literature to light.
Chowdhary has concluded this article with these words, “From the New-left to the revisionist-left there is a wide range of critical approaches. This has to be settled soon in order to prevent further confusion and dissension. This is all the more important in the wake of a right-reactionary offensive on all fronts. In the present context it is an ardent task of a Marxist critic to consolidate its rank to combat all sorts of deviations on the left or on the right and to bring together all the democratic, secular and socialist forces in their fight against fascism.” These words are even more relevant today than they were in late 1970s when this article was penned.  
Surendra Choudhary

Surendra Choudhary

Decades of Ideological cold war and hindi literature

BY Surendra chaudhary

The impact of the October Revolution was felt first during the ‘20s when India’s political freedom movement entered a new mass-phase, titled a little towards left and found favour with the new generation of freedom fighters.

A composite struggle was on throughout the third world nations, specially in the colonial and semi colonial nations of Afro-Asia. Not only theoretical problems of historical dimensions touched our horizon, but also the forces of social-political changes swept our consciousness. Lenin very correctly defined the perspective when he said: “the Imperialist war that is being waged for world domination; the division of the spoils for the plunder of small and the weak nations; this horrible, criminal was has ruined all countries, exhausted all peoples and confronted mankind with the alternative- either sacrifice all civilization and perish or throw off the capitalist yoke in the revolutionary way, do away with the rule of the bourgeoisie and win socialism and durable peace.”

The event of October 1917 had triggered a two-fold reaction- one deep inside the capitalist west and the other in the oppressed East. Indeed the development of the later day events created a dialectical situation of many antagonistic sources. Yet, at the same time, this development simplified the socio-political contradiction in a basis manner. It brought before every growing nation the idea of incompatibility of capitalism with freedom. The imperialist and bourgeois ideologues since have taken resource to cold-war ideologies. Ever since then they are trying desperately to combat the growing influence of socialism and Marxism in the Third World.

Literature in general reflected this development of the world events. In Hindi literature a new turn in temper appeared which historically linked itself with the fighting tradition of the bourgeois-national renaissance of 1870s, but at the same time defined a new task ahead, the task of a basic transformation of Indian society.

Premchand opened his novel Karmbhumi(The battle ground) with a composite Indian reality- a  radical oriented mass-movement, sweeping the country against Imperialism on the one hand and the indigenous feudal forces on the other. A historical analysis of the ‘30s will show a fundamentally new perspective in which the reality appeared to give new meaning to human action. Of course a critical study of social meanings cannot entirely replace an understanding of socio-political process in its dialectical complexity.

In 1936 a progressive writer’s Association was formed under the leadership of Shri Premchand, one of the biggest contemporary personalities in the literary world. A movement of national dimension thus started and soon submerged opposing ideas for the time being. Even those who were not Marxists adhered to the idea of a basic social transformation and political independence.

A new content is discerned in literature which not only bears out a radically revolutionary character but also a basically new rationale for such a change. Even in pre-PWA period Premchand had set a tone which was anti-imperialist and anti feudal. His articles and novels on Mahajani Sabhyata had come to be a manifesto of the new movement. The tone set in by Premchand further developed in the newly created situation and assured a widely growing form of revolutionary idea.

Even Jurgen Ruhle, an anti marxist critic wrote, “Premchand’s last and most mature work, the novel Godan(1936) is a stiring, tragic tale of the expropriation of the Indian peasantry through the machinations of capitalist.”(Literature and Revolution). Ruhle calls it ‘a moralizing manner of Indian Realism’. Notwithstanding the moral overtones  in Premchand’s earlier works, we can very definitely say that  he attacked all forms of complex religious and socio-political institutions which frustrated India’s emancipation. The national base of socialist forces both ideological and political-was growing very fast when Premchand dies in 1936. The younger generation of Hindi writers felt very clearly that overall situation was not corresponding to dialectic of historical necessity. There was discontent in the air.

The peasantry and the middle class had entered the political arena as a cohesive force which enlarged both the content and form of our struggle. It was during the mid ‘30s that the level of political participation changed. There was a clear move towards the left. It was here that a bigger involvement was necessitated, political freedom was submerged in social and economic issues. The impact was felt on all ideological as well as emotional disciplines. It was in these years that Hindi literature displayed growing social consciousness in all fields of creative writing.

The years following the second world war were catastrophic in more than one way. The war years further aggravated the situation by creating conditions antagonistic to the wishes of the Indian people. A war economy had falsely developed, bringing a section of the urban middle class to affluence at the cost of the masses laboring day in and day out for their living. Even the lower middle class suffered a major setback during the years of imperialist war. There grew a general aversion towards imperialism India. It was here that the middle classes assumed a new reality. It displayed the contradictions within the Indian society and within the individual in the context of a dialectical unity. Yashpal, Ashk, Nagarjun, B.P.Gupta, Amrit Lal Nagar, Amrit Roy and a host of old and new writers tried to portray this new reality of our society. A host  of a new characters and situations were brought on the literary scene from different walks of life. But the middle class dominated the scene. This stageback of the middle class marked a new social typology in Hindi literature in the 40’s and 50’s. These writers tried to portray individual characters against a fast changing social reality – the socio-political ethos. Subjective individualism was also preferred by a new modernists who sought solace in individual consciousness. They claimed the individual consciousness was the ground of all congnition and utilization of the forces of spirit. They ignored the hurricane of freedom which was continuing to shake the colonial system and its national allies. They were the championship of free world. This free world outlook was an ideological mask for a cold war against socialism.

It was no wonder that S.H. vatsyayana, a former revolutionary and then humanist radical, echoed some of the international slogans on the home front. He attacked the God who had failed but not on explicit political ground. He proclaimed individual liberty as the goal of history. From Shekhar ek jivani(1941) onwards he had shown a predilection for individuation and internality. In 1951 he opted for cultural freedom which according   to him was not only freedom of thought and word, the freedom of belief or inquiry, the freedom of expression, silence and affirmation or denial, but also a freedom for ‘plurality of political system’. In his second novel Nadi ke dwipa(Icelands in the sea) he attempted an allegory which resembled Walter Benjamin’s concept in a remarkable way. If Benjamin analyzed philosophically the paradox of history in order to annihilate it, Vatsyayana did the same. By apotheosizing individual historicity he killed history socially.

The new realist continued to write( with a middle class bias) in the epic strain assimilating the developing features of our life. Yashpal’s Deshdrohi( The Renegade), Ashk’s Girti Diwaren and Garm Rakh  continued the tradition of the old masters with shifts towards urban themes. Here the new realists tried to salvage fiction from dissolution with nothingness and gave it a historical content.

The ‘New Poets’ emerging out of the cataclysm of war and Deeping national crisis, turned to modernism. They made  an anathema of history, relegating it to a pointless position to ultimately annihilate it. This is a paradox of modernism very remarkably pointed out by one of the most outstanding critics of our time, Dr R.B. Sharma. He analyzed modernism the meaning underlying its expressive concerns. He threw a good deal of light on issues involving an overall aesthetic relation of art to reality. His critique of bourgeois cultural and its deepening crisis exposed this ideological cold war.

Bharati’s Andha Yug makes a mythopoetic allegory the facies hipocratia of our blind age. It was here that a deep personal crisis overtook Hindi writers. Did it grow out of the Indian conditions or was it a mere ideological catch? Reason and dream- a growing contradiction within experience – overtook them. Even Marxists suffered this personal crisis. Ageya’s Tarsaptak (’41) was heralded as a major source of all poetic creations in Hindi. G.M. Muktibodh, a rising poet of this generation and an ardent Marxist was caught up in this personal crisis. And it was certainly not less so for Shri Kant Verma. At first this new crisis seemed to threaten only individual writers and poets but gradually it assumed a much wider ideological dimension. It is here that we meet a challenge originating through the machinations of a cold war ideological force.

  The national root of this cold war was extremely divergent. Sometimes it took the form of a personal fight against decisive formal problems and its inherent dialectic. It created a condition for a false polarization of forces. Most of the poets of this generation could not gloss over the irrational moment of this inner turmoil. Surprisingly enough, Muktibodh re-emerged from the depths. But it was too late. Instead of opposing this basic position the progressive poets had cooperated with the New Poets which had given rise to a confusion. Out of this confusion the New Poets’ gained an ideological supremacy.

 The progressive forces continued to fight their way out. They fought hard against a formal and ideological reduction of reality to a nightmare. Dr R.B. Sharma had already exposed this global cold war in an article published in Alochana, a critical quarterly taken over by the ‘New Poets’ for a short period. He had shown very clearly that this ideological conflict had, indeed, deprived literature of a sense of perspective. It had rather confused the basic position of a writer’s creative ability to master reality. It was a hard fight to win. The ‘New Poets’ and their ideologues brought certain inside controversies of the previous periods and tried to extend it to new aesthetic domains. Issues were combined in order to impress upon the general readers and intellectuals the futility of communist order and its anti-humanist character. This national tirade against Marxism brought certain literary issues and overtones involving aesthetics. The Indian partisans of this tirade proclaimed a system of pure categories as opposed to Marxian dialectic.

 Loneliness of a universal order and the estrangement of man from his world came to be literary slogans with the new poets. Suffering became a personal and permanent condition of man. They went so far as to proclaim a total loss of balance. In the name of balancing necessity with contingency they totally discarded pre-arranged libretto and replaced it with a free choice. Their model of a weak human abstraction not only negated the actual course of events, i.e. the historical reality, but also its essential contradictions. They lost everything except a deepening personal crisis.

 A cross-section of ideological configuration of all shades appeared on the literary scene. Existential slogans appeared combined with a left tinge. The suffusion proved to be abortive in the long run but it took the writer’s imagination as a revolutionary weapon. The new and contemporary short stories which appeared during ’60s reflected this strange combination, a sort of symbiosis of opposing forces. In the name of realism combined with personal vision of the world, these new writers of the ’60s created many confusing situations and a new source of schism.

The aesthetic acrobatics of this self-troubled generation of the ’60s took a rather more serious turn during the closing years. It took a personal crisis as the source of all creative functions and thus centered round a depressing reality. Defenseless and naïve they became outsiders. Caught in this helpless and miserable existence, they consumed themselves in their search for a personal way out instead of creatively changing the situation. They lamented the situation tragically.

 But the ’60s proved much more tragic than they could have thought. It brought wars of aggression, famine and deepening economic crisis from the outset. It was anticipated perhaps a few years earlier by Renu’s Maila Anchal. In this novel he has shown a cardinal concern for the rural masses undergoing a massive and painful transformation. He had introduced a manner of realism in literature which was new for his generation of writers by introducing the social conflicts central to his time. He enjoyed considerable moral and intellectual standing among the writers of ’50s but gradually his influence waned.

But for a few individual instances, the younger generation of the late ’60s and early ’70s was in an ideological mess. It had lost all hopes of a resurrection. A nihilist’s concern was perhaps the order of the day. But here a new political phenomenon appears in Indian society which changes the basic temper of time. The hitherto suspended class struggle assumes a new proportion unknown in the contemporary India. This growing class struggle and political turmoil suddenly brought new ideological forces into play. The pessimism injected into personal consciousness thus dispelled itself and sought a new way out.

 A left- wing literature of mutually opposing shades appeared. Some of the left wing poets and writers lurked behind a Dostoevskian shade of nihilism; some behind an activist shade of the New-Left and only a few had stayed before a genuine position of the Indian left. Generally retracting a life of suffering and struggle these left-wing writers and poets showed a genuine concern for the Indian masses. The political existence of the common man assumed a new proportion. Of course in certain cases this concern is overplayed and in certain others the tone is manipulated and tempered with a definitive dramatic purpose. But the overall situation remains in the interest of the really progressive forces which stand for a basic transformation of Indian society.

The great victim of this ideological cold war has been out literary criticism. Instead of democraticizing the feudal and bourgeois traditions of the past, it has taken up position with the bourgeois aesthetics and subjective philosophy of culture. We must, with necessity, go deeper into these underlying ideological problems of meaningful creation. Here the contemporary Marxists differ quite considerably and display a remarkable fancy for heterogeneous strategic and tactical positions often relegating the basic principles of Marxism- Leninism.  From the New-left to the revisionist-left there is a wide range of critical approaches. This has to be settled soon in order to prevent further confusion and dissension. This is all the more important in the wake of a right-reactionary offensive on all fronts. In the present context it is an ardent task of a Marxist critic to consolidate its rank to combat all sorts of deviations on the left or on the right and to bring together all the democratic, secular and socialist forces in their fight against fascism.

Published Books Of Surendra Chaudhary:

  •  Hindi Kahani : Prakriya Aur Path (Hindi), Radhakrishna Prakashan
  •  Phanishwar Nath Renu, Sahitya Academy
  • Itihas : Sanyaog Aur Sarthakata, Antika Prakashan
  • Hindi Kahani : Rachana Aur Paristhiti, Antika Prakashan
  • Sadharan Ki Pratigya : Andhere Se Sakshatkar, Antika Prakashan

Courtesy For Article–  October Revolution: Impact on Indian Literature, edited by Qamar Raʼīs

घोंघा: संजीव कुमार (कहानी बहस के लिए)

इस कहानी के इर्द-गिर्द एक बहस कहानीकारों, आलोचकों और सुधि पाठकों के बीच चल पड़ी है युवा आलोचक आशुतोष कुमार ने अपने फेसबुक वाल पर अभी हाल में ही लिखा है- “संजीव कुमार की कहानी ‘घोंघा’ पर मित्रों में बहस जारी है हिंदी आलोचना के एक नए विमर्श के मुताबिक़ इसके ‘पोर्नोग्राफिक’घोषित हो जाने का खतरा भी है। इस कहानी को जल्दबाजी में न पढ़ियेगा। हमारे सामाजिक मन की बहुत भीतरी तहों में उतर कर उसे विचलित करने का माद्दा इस कहानी में है। लैंगिक, वर्गीय, समाज-आर्थिक प्रतिसंधों (faultiness)  के टकराव का यौन दमित समाज में युवा हो रही पीढ़ी के भावबोध पर कितना विनाशकारी असर हो सकता है,इसे समझना हो तो कहानी पढ़ लीजिये।” सवाल उठाये जा रहें हैं कि इस कहानी में कहन का जो खिलंदड़ा अंदाज़ लिया गया है ,वह  त्रासदी की भीषणता को घटा कर एक मनोरंजक गप्प में बदल देने की समसामयिक  हिकमत का नमूना तो नहीं हो  गया है? कथावाचन की क्लासिकी परम्परा को एक अमानवीय वृत्तांत की रचना के उपकरण के रूप में चित्रित करना क्या कहानी कहने- सुनने के कौतूहल मात्र को संदिग्ध नहीं बना देता ? स्त्री के प्रति सहानुभूति का दावा करती हुयी कहानी स्त्री की असहाय दशा का ग्राफिक चित्रण  कर ती कहीं पाठकों की दमित यौन भावनाओं को उत्प्रेरित करने का बहाना तो नहीं बन रही?

‘घोंघा’ कहानी जिस चुहलबाजी या ‘मनोरंजक’ उठान के साथ शुरू होती है, कहानी उसका निर्वाह नहीं कर पाती क्योंकि कहानी एक ट्रैजिक ‘अंत’ के साथ पाठकों के बीच खुलती है। कहानी अपनी शुरुआत के साथ ही जैसे पाठकों को अपने बीच साधारणीकृत कर लेती है. लेकिन यही शुरुआत कहानी के संपूर्ण प्रभाव में एक विस्मृत पार्श्व बन जाती है. क्लासिकल कहानियों की जो भी स्मृति हमारे कथा-संसार में विद्यमान हैं, उसका बहुलांश कहानी के ऐसे फॉर्म को सहजता प्रदान नहीं करता है. लेकिन एक बात तो स्पष्ट है कि यह कहानी अपने कथात्मक-स्वाद में भले दो स्तरों पर चलती हो लेकिन इन दोनों स्तरों का उत्स कहीं न कहीं एक ही सामाजिक-सच्चाई है. एक सवाल यहाँ वाजिब हो सकता है कि जिस सामाजिक सच्चाई को व्यक्त करने के लिए कहानीकार ने एक लोक-स्वीकृत फॉर्म, जो पाठकों को सहज ही कथा का आनंद देता है, को त्याज्य समझा, वह क्या इतना अनिवार्य था?

सवाल यह भी हो सकता है कि कथावाचकों का संसार क्या सचमुच इतना निष्करुण भी है? यह बात सिर्फ इसलिए नहीं कही जा रही  है कि कथाकार ने कथावाचन के लोकप्रिय अंदाज को विस्मृति के हवाले कर दिया बल्कि इसलिए भी कि चौपालों का कथानायक-कथावाचक ‘जितुआ’ कैसे निष्करुण और स्त्रीविरोधी समाज का प्रतिनिधि कारक के बतौर सामने आता है. 

इस कहानी का महत्व इसलिए भी सुरक्षित होना चाहिए कि यह कहानी एक ऐसे दौर में लिखी गयी है जब कहानीकारों के एक अतिप्रचारित तबके ने भाषा की ‘चुहलता’ के सामने मानों आत्मसमर्पण कर दिया हो. ऐसा नहीं है कि संजीव कुमार में उस ‘चुहलता’ की प्रतिभा नहीं है बल्कि उनके इस प्रतिभा की व्युत्पति एक सामाजिक-वैचारिक अभ्यास की कमानी पर कस कर होती है।
कोई सत्ता-प्रतिष्ठान रचनात्मक-संसार को कैसे गैर रचनात्मक बहसों में उलझाकर व्यक्तिगत लानत-मलानत में खींसे निपोरता है इसका सबसे बड़ा उदाहरण अभी हिन्दी के बौद्धिक समाज में देखने को मिल रहा है। ऊपर से तुर्रा यह कि बहस इस बहाने शुरू हुई कि रचना को देखना चाहिए न कि रचनाकार में पुष्ट उसके वैचारिक व्यक्तित्व को। 
तो इस प्रस्ताव के साथ हम इस कहानी को बहस के लिए प्रस्तावित करते हैं। हमें उम्मीद है कि कहानी विचारोत्तेजक लगेगी और आप भी कुछ टिप्पणीनुमा जोड़ना चाहेंगे। 

आप अपनी टिप्पणी-लेख-समीक्षा को इन पतों पर मेल कर सकते हैं- ashuvandana@gmail.com और  udayshankar151@gmail.com। धन्यवाद। 

Massacre in Korea By Picasso

Massacre in Korea By Picasso

घोंघा

BY संजीव कुमार

उम्र की दूसरी-तीसरी दहाई में अनगिनत बार मैंने वह सपना देखा होगा…

पर मुश्किल यह है कि अभी जब उस सपने से कहानी शुरू करना चाहता हूं, कुछ भी क़ायदे से याद नहीं आ रहा।

ये भी हो सकता है कि हर बार मैं उसे वही सपना समझता होऊं, पर वह वही न होता हो। कुछ अजीबो-ग़रीब चीज़ें हर सपने में एक-सी होती हों, जिनके चलते लगता हो कि सपना वही है। जैसे यह, कि शहर के अपने छात्रावास से निकलते ही मैं गांव की बूढ़ी गंडक नदी के घाट पर पहुंच जाता हूं! जैसे यह, कि गंडक-तट की रेतीली मिट्टी पर पड़े असंख्य घोंघों के बीच मैं बचता-बचाता चलता हूं और साथ में सोचता हूं कि मैं किसे बचा रहा हूं, ख़ुद को या घोंघों को? जैसे यह, कि नदी की सतह समतल न होकर उन्नतोदर है, बीच से उठी हुई! जैसे यह, कि बांध की ढलान पर सलवार-कुर्ते की एक जोड़ी पड़ी है, अपने होने में किसी के न होने को अनायास दर्ज करती। जैसे यह, कि अचानक मुझे पता चलता है, यह बूढ़ी गंडक नदी नहीं, बूढ़ा गंडक समुद्र है!! जैसे यह, कि मैं धरती से आसमान तक फैले डरावने जबड़े जैसी एक लहर से बचने के लिए भागता हूं और घोंघों के कठोर खोल के टूटने-चुभने से मेरे तलवे लहूलुहान होते जाते हैं और रफ़्तार ऐसी कि घोंघों से बस थोड़ी ही तेज़!

तो मुझे यह नहीं कहना चाहिए कि अनगिनत बार मैंने यह सपना देखा होगा। कहना चाहिए कि अनगिनत बार ये चीज़ें मेरे सपनों में आयी होंगी, जोड़-घटाव के अलग-अलग समीकरणों में उलझी।

इनके पीछे भी एक कहानी है। यों तो एक नहीं, अनेकों कहानियां होंगी, पर एक को मैं अपने पूरे होशोहवास में जानता हूं। उस एक कहानी के पीछे भी अनेकों कहानियां होंगी जिन्हें मैं बिल्कुल नहीं जानता।

हमारा कॉलेज गंगा के किनारे था। अंग्रेज़ों का बनवाया हुआ वह परिसर इतना विराट और जटिल था कि मैं विष्वास के साथ नहीं कह सकता कि स्कूल से निकलने के बाद के जो पांच साल मैंने वहां गुज़ारे, उनमें कॉलेज की इमारत के हर कोने को देख पाया होऊंगा। शहर की मुख्य सड़क पर–उसे ‘मेन रोड’ कहा भी जाता था–कॉलेज का प्रवेश-द्वार था, जिससे घुसने के बाद पेड़ों की क़तारों के बीच एक लंबा फ़ासला तय करके ही हम इमारत के भीतर के किसी ठिकाने तक पहुंच पाते थे। हमारा छात्रावास, कई और छात्रावासों के साथ, इसी परिसर में एक तरफ़ था, गंगा के ज़्यादा क़रीब। लेकिन एक ही परिसर के भीतर हमारे गौरवशाली कॉलेज और दयनीय छात्रावास की इमारत के बीच कोई तुलना न थी। दरअसल, उसे इमारत कहना ही अजीब लगता है। वह अंग्रेज़ों के ज़माने की एक फ़ौजी बैरक थी, करकट यानी ऐस्बेस्टाॅस की छत वाली, जिसे छात्रावास में तब्दील करने के बाद बेहतर तो क्या, ज्यों-का-त्यों बनाये रखने की भी कोई कोशिश नहीं की गयी थी। लिखित इतिहास पर भरोसा न करने वाले मेरे ज़्यादातर सहपाठियों का तो मानना था, और इसके लिए मौखिक स्रोतों के अनगिनत साक्ष्य उनके पास थे, कि वह फ़ौजियों की बैरक नहीं, उनका अस्तबल था जिसे छात्रावास में तब्दील करते वक़्त सिर्फ़ इतना किया गया कि हर कमरे के सामने की लोहे वाली बैरियर हटा कर वहां दीवार चुनवा दी गयी और एक दरवाज़ा निकाल दिया गया। इसके अलावा सब कुछ घोड़ों के हिसाब से ही बना रहने दिया गया। करकट की छत के नीचे लगी प्लाई की फॉल्स सीलिंग के बारे में उनका कहना था कि वह तो अंग्रेज़ों के घोड़ों के लिए भी ‘आवश्यक आवश्यकता’ की श्रेणी में आता होगा। वह न होती तो मई-जून के महीनों में, जब करकट की वजह से इन कमरों में अदृश्य आग जल रही होती, घोड़े शर्तिया बग़ावत कर बैठते और अंग्रेज़ों को यह साबित करने में अपने कई इतिहासकारों को झोंकना पड़ता कि चूंकि घोड़ों का सामंतवाद के साथ क़रीबी रिश्ता रहा है, इसलिए इस बग़ावत का मूल चरित्र प्रतिगामी है।

बहरहाल, निहायत घोड़ोपयोगी होते हुए भी हमारा छात्रावास बाहर कहीं किराये का कमरा लेकर रहने की बनिस्पत बहुत आरामदेह था। उसके आसपास खुला-खुला वातावरण था, उत्तर की तरफ़ कुछ क़दम के फ़ासले पर गंगा थी, चारों ओर काफ़ी बड़ी संख्या में पेड़-पौधे थे, और सबसे बड़ी बात कि एक ‘बबजिया’ की देख-रेख में चलने वाला किफ़ायती मेस था जहां 110 रुपये में महीने भर सुबह-शाम का खाना मिल जाता था। जिस मैथिल युवक को ‘बाबा’ के साथ सम्मानसूचक ‘जी’ और अपमानसूचक ‘आ/वा’ लगा कर ‘बबजिया’ कहा जाता था, वही मेस का कर्ताधर्ता और सर्वेसर्वा था। मेस में खाने के हक़दार तो हॉस्टलर्स ही थे, लेकिन आठ-दस बाहर के ग्राहक भी वह बनाये रखता था जिनसे वह उसी खाने के 140 रुपये वसूलता था।

बाहर के ग्राहकों में सिर्फ़ जीतेंद्र था जिससे बबजिया 110 रुपये ही लेता था, या कहिए कि ले पाता था। जीतेंद्र हमारे ही कॉलेज का विद्यार्थी था और हमारे छात्रावास के साथ उसका ऐसा रिश्ता था कि बहुत-से लोग उसे यहीं का अंतेवासी समझते थे। रहता भी पास ही था, उपप्राचार्य की कोठी के आउटहाउस में। प्राचार्य और उपप्राचार्य को कॉलेज के परिसर में ही अंग्रेज़ों के ज़माने की बनी कोठियां मिली हुई थीं। दोनों कोठियां गंगा के ठीक किनारे पर बनी थीं जिनमें पेड़ों और झाड़-झंखाड़ से भरा बड़ा-सा अहाता था। अहाते और गंगा की तरफ़ जाती ढलान के बीच कम्पाउंड वॉल थी जिसे अहाते की तरफ़ से देखो तो खेत की मेड़ से बस थोड़ी ही ऊंची नज़र आती, पर गंगा की तरफ़ से देखने पर उसकी ऊंचाई आठ फीट से कम न थी। प्राचार्य ने तो नहीं, पर उपप्राचार्य ने अपना आउटहाउस किराये पर एक मामा-भांजे को दे रखा था। जीतेंद्र वही भांजा था। उससे उम्र में तीन-चार साल बड़ा उसका मामा शायद ठेकेदारी के धंधे में हाथ-पैर मार रहा था। वह अक्सर सुबह जल्दी निकल कर देर रात लौटता था। इसीलिए हमारे मेस में खाना सिर्फ़ जीतेंद्र खाता था।

लंच और डिनर के समय के अलावा भी जित्तू का काफ़ी वक़्त हमारे छात्रावास में बीतता। बी.ए. अंतिम वर्श के सारे लड़के उसके मित्र थे और वह प्रायः किसी-न-किसी के कमरे में बैठा पाया जाता। ग़रज़ कि हमारा छात्रावास उसकी अड्डेबाज़ी का पसंदीदा ठिकाना था।

इस ठिकाने पर दो चीज़ों को उसकी विशिष्ट पहचान का दर्जा हासिल था। पहली चीज़ थी उसकी हंसी, जो किसी भी तरह की मासूमियत से कोसों दूर थी। हंसते हुए अक्सर उसकी आंखों में एक शैतानी चमक होती जो ऐसे सभी लोगों की आंखों में होती है जिनके भीतर दूसरों को नुकसान पहुंचा कर, या किसी भी तरीक़े से उन्हें मायूसी, हताशा या कुंठा में धकेल कर लुत्फ़ लेने की प्रवृत्ति होती है। लेकिन उसकी पहचान के रूप में स्थापित विशेषता यह नहीं थी। पहचान वाली विशेषता यह थी कि उस हंसी में घोड़ों की हिनहिनाहट और परिंदों के परों की फड़फड़ाहट का विचित्र संयोग था। हिनहिनाहट का संबंध गले से रहा होगा और फड़फड़ाहट का जीभ और होठों से। बल्कि यह कहना ज़्यादा सही होगा कि हिनहिनाहट उसकी हंसी का मूल स्वर था और फड़फड़ाहट उस लार की वल्गा को खींचे रखने का शोर जो हर हंसी के साथ जीतेंद्र के मुंह से बरबस बाहर की ओर चल पड़ती थी। ऐसी हंसी पूरे हॉस्टल  में किसी की नहीं थी। वह कॉरीडोर के कोने वाले कमरे में भी हंस रहा हो तो दूसरे कोने में बैठा बंदा समझ जाता कि जितुआ हंस रहा है। और जितुआ हंस रहा है, मतलब पूरी संभावना है कि उसके आसपास कोई-न-कोई परेशान या चिड़चिड़ा या बग़लें झांकता या मायूस या आहत है।

कॉरीडोर के एक कोने वाले कमरे से दूसरे कोने वाले कमरे तक आवाज़ों के पहुंच जाने का रहस्य यह था कि कमरों में लगी फ़ाॅल्स सीलिंग जगह-जगह से उजड़ चुकी थी और उसके तथा करकट की छत के बीच सभी कमरों को जोड़ता हुआ एक सुरंगनुमा ख़ालीपन था, क्योंकि कमरों के बीच की पार्टीशन वाली दीवार फॉल्स सीलिंग की ऊंचाई तक ही थी। लिहाज़ा किसी एक कमरे से उठती आवाज़ उस सुरंग में घुसने के बाद सभी कमरों में यथायोग्य बंट जाती। बिल्कुल पास के कमरों में उसकी गुणवत्ता उत्तम, थोड़े बाद वाले कमरों में मध्यम और ख़ासे दूर के कमरों में अधम होती।

और इस सुरंग से होकर आती आवाज़ों में से जीतेंद्र की हंसी ही नहीं, उसके गपास्टक की आवाज़ भी एकदम अलग से पहचानी जाती थी। जी हां, यह गपास्टक या कि़स्साग़ोई उसकी दूसरी पहचान थी। वह जहां भी बैठता, वहां धीरे-धीरे पांच-सात लड़के इकट्ठा हो ही जाते, क्योंकि वह एक-के-बाद-एक दिलचस्प कि़स्से इंतहाई सहज और ग़ैरबनावटी अंदाज़ में सुनाता जाता। महमूद और दानिश भी, जो इन दिनों दास्तानगोई की कला को दुबारा ज़िंदा कर रहे हैं, उससे कुछ-न-कुछ सीख सकते थे। वह जो कुछ सुनाता, उसमें आपबीती कितनी होती थी और कितना मनगढ़ंत, कहना मुष्किल है, लेकिन उसका दावा सच का होता और बातें सच्ची लगती भी थीं। यानी वह पत्रकारीय अर्थों में ‘स्टोरी’ सुनाता था जहां झूठ को भी सच के दावे और ढब के साथ पेश किया जाता है, साहित्यिक अर्थों में नहीं जहां हम सच को भी झूठ कह कर परोसते हैं। उसके पास दुनिया का विशाल अनुभव था जो कभी भी निःशेष न होने वाले खज़ाने की तरह उसके साथ चलता था और उसकी बातें सुन कर हम ख़ुद को कुंए का मेढ़क समझने पर मजबूर होते थे। हमारे पास दरी वाले सिनेमाघरों से लेकर पलंग और मसनद वाले सिनेमाघरों तक का तज़ुर्बा नहीं था। हमने कोठों और चकलाघरों का स्वाद नहीं चखा था। हमने ट्रकों में सफ़र करके लाइन-होटलों में रातें नहीं गुज़ारी थीं। हम कभी डब्ल्यू.टी. यात्रा करने के ज़ुर्म में जेल नहीं गये थे। हमने टिकटें ब्लैक में बेच कर उम्दा रेस्तरांओं में मुगऱ्मुसल्लम नहीं उड़ाया था। रहरी यानी अरहर के खेत देखने में कैसे होते हैं, यह हममें से ज़्यादातर को पता नहीं था, फिर भला हम कैसे जानते कि वह कामातुर जोड़ों के लिए अभयारण्य क्यों साबित होता है! निचोड़ यह कि जीतेंद्र के कि़स्से हमारे लिए अवैध और निषिद्ध ज्ञान का भंडार थे।

इस भंडार में यों तो लगभग हर चीज़ हमारे काम की थी, पर सबसे ज़्यादा काम की चीज़ थी उसका कामशास्त्र। उसे हम श्लेष में ‘काम’ की चीज़ कहते, क्योंकि वही हमारी अभावग्रस्तता (या शायद अकालग्रस्तता) और ग़र्ज़मंदी का सबसे अहम संदर्भ था। कहने को हम एक सहशिक्षा महाविद्यालय में पढ़ रहे थे, पर लड़कियां हमारे लिए उतनी ही दुर्लभ थीं जितनी पास वाले ब्वायज़ कॉलेज यानी ‘बंडाश्रम’ के लड़कों के लिए। हिक़ारत में दिये गये इस ‘बंडाश्रम’ नाम के बदले ब्वायज़ कॉलेज के लड़के हमारे बारे में कहने लगे थे कि साले, बात तो ऐसे करते हैं जैसे सहशिक्षा महाविद्यालय में नहीं, सहवास महाविद्यालय में पढ़ते हों। ये करमघट्टू, ताखे पर रखी हुई मिठाई देख-देख के रोज़ इतनी लार टपकाते हैं कि एक दिन जब मिठाई मिलेगी तब पूरी लार ख़त्म हो चुकी होगी, मिठाई घोंटी नहीं जाएगी।

बंडाश्रम वालों की इस बात का उत्तरार्द्ध भले ही शु द्ध खिसियाहट का नमूना हो, ताखे पर रखी हुई मिठाई वाला उपमान ग़लत नहीं था। लड़कियों के साथ हमारा संबंध वैसा ही था जैसा दिन और रात, सूरज और चांद के बीच होता है। कभी क़ायदे से मिल न पाना हमारी कि़स्मत में बदा था। बस, कक्षाएं थीं जो सुबह और शाम की भांति आधे-अधूरे ढंग से हमें पास आने का मौक़ा देती थीं। पता नहीं, कॉलेज के स्थपति ने कितना विराट गल्र्स कॉमन-रूम बनावाया था कि कक्षाओं में बैठी लड़कियों के अलावा बची हुई सारी लड़कियां उस कॉमन-रूम के पेट में समा जाती थीं। क्लास शु रू होने से दो मिनट पहले वे कॉमन-रूम से निकल कर क्लास-रूम के बाहर झंुड में खड़ी हो जातीं। उनके झुंड का रंग-ढंग देख कर मुझे रोयाल चिकेन सेंटर की वे मुर्गियां याद आतीं जो आसिफ़ मियां का हाथ पिंजरे के अंदर जाते ही मुंह दूसरी ओर घुमाये परले कोने में अंड़सने लगती थीं (ज़ाहिर है, उसमें मुर्गे भी होते होंगे, लेकिन मेरी याद में सब मुर्गियां बन कर ही आते)।… टीचर के आने पर उसके पीछे-पीछे वे क्लासरूम में प्रवेश करतीं और आगे की दो ख़ाली क़तारों में जाकर बैठ जातीं। इन क़तारों को उन्हीं के लिए ख़ाली छोड़ा जाता था। फिर क्लास ख़त्म होने पर वे टीचर के पीछे-पीछे क्लास-रूम से निकलती हुई सीधा गल्र्स कॉमन-रूम या किसी और क्लास-रूम की तरफ़ झुंड में बढ़ जातीं। ज़्यादातर लड़कियों को हम उनके राॅल नंबर से जानते थे, क्योंकि हाजि़री लगाने के लिए नाम नहीं, राॅल नंबर पुकारा जाता था। थक-हार कर उसे ही हमने उनके नाम का दर्जा दे दिया था। मिसाल के लिए, हमारे क्लास की तीन निहायत खूबसूरत लड़कियों के नाम थे, 84, 310 और 320। कॉलेज के 99 फ़ीसदी लड़कों को सालों-साल किसी लड़की से दो शब्द बात करने का मौक़ा न मिलता था और यही हाल 99 फ़ीसदी लड़कियों का था। बचे 1 फ़ीसदी लड़के और लड़कियां। तो उनकी बात ही अलग थी! वे हमें अपने शहर तो क्या, इस मत्र्यलोक के ही प्राणी नहीं लगते। उन्हें हम देवलोक का प्रतिनिधि मानते थे। हां, कभी-कभी जब कोई देवता हमारी दुनिया के किसी असुर से इस बात पर पिट जाता कि उसने उस लड़की से बात क्यों की जिसके पिता को असुर विशेष ने अपना ससुर मान लिया है, तब उसका देवत्व हमारे लिए संदेह के घेरे में आ जाता था।

ख़ैर, अकाल की इस चर्चा को यहीं विराम दें, क्योंकि वह हरिकथा की तरह अनंता है और आपके सामने मैं अपने अभावों का रोना रोने नहीं बैठा हूं। मैं तो…

या पता नहीं…

अच्छा, छोडि़ए! मैं क्या करने बैठा हूं, यह ख़ासा बहसतलब हो सकता है, पर फि़लहाल मैं जो कर रहा था, वह चर्चा थी जीतेंद्र की हंसी और कि़स्साग़ोई की। तो उसके कि़स्सों का जादू ही था जो हमें उसके आसपास मंडराने के लिए मजबूर करता था, वर्ना उसकी शैतानी हंसी का निशाना हम सब कभी-न-कभी बन चुके थे। और जब भी कोई उसका निशाना बनता, अविलंब यह क़सम खाता कि इस साले से अब कोई दोस्ती-यारी नहीं रखनी है… लेकिन बमुष्किल चैबीस घंटे बाद वह जितुआ के आसपास मंडराता पाया जाता।

ऐसे ही एक दिन, जब शैतानी हंसी का शिकार बनने के बाद खायी गयी क़सम का स्वाद मेरे मन की जिह्वा से उतरा भी न था, जित्तू ने रात के खाने के बाद और दोस्तों से अलग मुझे पकड़ा।

‘का रे चिकेन! गुस्सा हो?’ कहते हुए उसने मेरे कंधे के पास की गोलाई को बड़े मानीख़ेज़ अंदाज़ में दबाया। यह उसका प्यार जताने का ख़ास तरीक़ा था। उसके ‘चिकेन’ में चिकना होने और सुस्वादु खाद्य पदार्थ होने का अर्थ मिला हुआ था और यह संबोधन उसने ख़ास मेरे लिए सुरक्षित कर रखा था। यह शब्द मुझे सचेत रूप से कभी आपत्तिजनक नहीं लगा, पर शायद मेरे मन में इसने अनजाने ही कोई गांठ डाल दी थी जिसका कहीं-न-कहीं मेरी मोटी मूंछों के साथ संबंध है जिन्हें मैंने उन्हीं दिनों तराशना बंद कर फलने-फूलने के लिए छोड़ दिया था।

बहरहाल, कंधे की गोलाई को उसकी हथेली की पकड़ से आज़ाद कराते हुए मैंने उसे ‘बड़गाहीभाई’ की पदवी से नवाज़ा और कहा कि बताये, बात क्या है। वह पहले तो हिनहिनाती हंसी हंसता रहा, फिर मेरे और पास आकर धीमे से, लगभग बुदबुदाते हुए बोला, ‘आज केतनो गरिया लो भइवा, सब माफ है। हम त अंदर तक सिलाबोर (सराबोर) हैं… पूरा, जबर्दस्त!’

कह कर वह मुस्कुराती आंखें से इस बयान के असर को टटोलने लगा। उसे पता था कि वह गपास्टक का पहला टुकड़ा मेरी ओर उछाल चुका है और अब मेरा उपेक्षापूर्वक वहां से चलते बनना असंभव हो गया है।

असर तो सचमुच हुआ था, पर मैंने कोशिश की कि वह दिखे नहीं। बात को हल्के में लेने वाले अंदाज़ में कहा, ‘बेसी पेल मत। बताओ, का बात है?’

वह फिर हिनहिनाया, जैसे कहना चाहता हो कि लाख छुपाओ, छुप न सकेगा… वग़ैरा। फिर बोला, ‘आजकल धकाधक चल रहलउ हे, भइवा। रात दिन।’ कह कर उसने एक गंदा इशारा किया जिसका मतलब था कि रात-दिन चलने वाली चीज़, और कुछ नहीं, संभोग है।

सुन कर मैं चैंधिया गया होउंगा, क्योंकि वह मेरे चेहरे को देखते हुए, उस चेहरे की ओर तर्जनी से निशाना साधे हुए, इतनी ज़ोर से हिनहिनाया कि दूर खड़े सारे लड़के हमारी ओर देखने लगे। कुछ पलों बाद जब उसका हिनहिनाना रुका, तो हंसी के दबाव में उसकी आंखों से पानी बहने लगा था। ‘ओह, मजा आ गेलउ, भइवा,’ कहते हुए उसने मुझे कंधे से पकड़ा और जो लड़के इस हंसी के चलते समुत्सुक होकर हमारी ओर क़दम बढ़ा चुके थे, उनसे अलग ले चला।

अलग जाते हुए जो बात उसने लगभग फुसफुसाते हुए बतायी, वह इस प्रकार थी।

पिछली रात जब वह अपने मामू के साथ नाइट शो देख कर स्टेशन के पास के सिनेमा हाॅल से कैम्पस की ओर लौट रहा था, एक लड़की सड़क पर अकेली दिखी। मामा-भांजे ने सोचा, शायद पैसे पर चलने वाली है। थोड़ी ठिठोली करने की इच्छा हुई। टोका। लड़की बहुत घबरायी हुई थी। बात करने पर पता चला कि रात के दस बजे स्टेशन पर उतरी थी। सदर अस्पताल जाना है, जहां उसकी मां भर्ती है। पास में पैसे नहीं हैं और पैदल किस रास्ते जाये, उसे समझ नहीं आ रहा।… मामा-भांजे ने एक-दूसरे को देखा, आंखों ही आंखों में बातें हुईं। उपप्राचार्य, जिनकी कोठी के आउटहाउस में वे रहते थे, हफ़्ते भर के लिए सपरिवार बाहर गये हुए थे। इससे अच्छा समय और क्या हो सकता था! तुरंत एक रिक्षा रुकवाया। लड़की से कहा कि वे जहां रहते हैं, वह जगह अस्पताल के पास ही है, साथ आ जाये। लड़की उनके साथ रिक्षे पर बैठ गयी। मामा-भांजा उसे लिये हुए अपने कमरे पर आ गये। कॉलेज के विशाल परिसर में घुसने के बाद से लड़की यही समझती रही कि अस्पताल आ गया है। कमरे में लाने के बाद लड़की को धमका कर दोनों ने अपनी प्यास बुझायी। साथ में एक काम और किया। प्यास बुझाते समय उसके जो कपड़े उतारे थे, उन्हें एक बक्से में बंद कर ताला लगा दिया। लड़की अब बिल्कुल नंगी थी, इसलिए उसके भाग खड़े होने का सवाल ही नहीं था। तब से लगभग चैबीस घंटे गुज़र चुके थे। लड़की इस बीच सोई नहीं थी। उनके बिस्तर के एक कोने में घुटने मोड़े, अपनी देह से ही देह को ढंके बैठी थी, गठरी की तरह। मामू ने सुबह काम पर जाने से पहले इस गठरी को खोला था और उसके बाद से भांजा तीन बार खोल चुका था। हर बार वह लाचार-सी खुल जाती और गिड़गिड़ाती कि उसे एक बार अस्पताल पहुंचा दिया जाए, वह रात को फिर आ जाएगी। हर बार जितुआ उसे आष्वस्त करता कि एक दिन अच्छे-से भोग लेने दे, अगले दिन पहंुचा दिया जाएगा।

सच कहूं तो अब बिल्कुल याद नहीं कि इस बात को सुन कर मुझे कैसा लगा था। अंदर कहीं गुस्से का ज्वार उठा हो और मैंने जितुआ के मुंह पर थूक दिया हो, या दूर-दूर से हमें बातें करते देख रहे दोस्तों को बुला कर जितुआ की हैवानियत के लिए उसे सार्वजनिक रूप से ज़लील किया हो, या चुप रह कर मन-ही-मन संकल्प किया हो कि कल पुलिस को सूचना देकर उसके कमरे पर छापा डलवा दूंगा, या चेहरे पर याचक भाव लाकर उससे कहा हो कि हमरो दिलबा दे न, यार–ऐसा कुछ नहीं हुआ था। शायद जितुआ की हैवानियत के प्रति एक गहरी वितृश्णा और निर्वस्त्र स्त्री-देह की दुर्निवार रूप से सम्मोहक कल्पना के बीच मैं ठिठक गया था। शायद ये सी-साॅ के दो बाज़ुओं की तरह थीं, जिनकी बीच वाली टेक के दोनों ओर अपने पैर जमाये मैं सीधा खड़े रहने की कोशिश कर रहा था। इतना याद है कि छूटते ही कोई प्रतिक्रिया देने के बजाय कुछ क्षण ठहर कर मैंने कहा था, ‘साला, एकदम्मे जंगली है का रे? भाक्!’ और अपने कमरे की ओर चल पड़ा था। पीछे से हंसी के फ़व्वारे के साथ झरते उसके ये शब्द सुनाई पड़े थे, ‘जंगलवा में ई सब कहां मिलता है, भइवा!’

कमरे में लौट कर मैं अपनी मेज़-कुर्सी ठीक से जमा ही रहा था कि वह पीछे से फिर आ पहुंचा। ‘जंगली बनना है, शिशिर?’ इस बार उसका अंदाज़ गंभीर था, ‘सोच ले, भइवा! एक नंबर समान है। बाद में मत बोलना कि साला दोस्त काम नहीं आया। हम त अपना भर कोसिस करते ही हैं कि तू लोग को दुनिया का सब स्वाद चखवा दें।’

बेशक! अभी दो दिन पहले ही उसने हमें सामूहिक रूप से एक स्वाद चखवाया था। ब्लू-फि़ल्म का। उपप्राचार्य उसी दिन सपरिवार बाहर गये थे। उनके निकलते ही जितुआ ने ‘चंदा’ करके रात को अपने कमरे पर ब्लू-फि़ल्म का प्रोग्राम रखा (इससे पहले तक ‘चंदा’ हमारे लिए सरस्वती पूजा से जुड़ी शब्दावली का हिस्सा था)। डेढ़ सौ रुपये में टी.वी. सेट, वी.सी.पी. और कैसेट्स–रात भर के लिए। हम लपक कर और ललक कर इस आयोजन में शरीक हुए थे, एक अभूतपूर्व स्वाद की उम्मीद में खुदबुदाते। जित्तू के कमरे की ओर जाते हुए रास्ते में एक तज़ुर्बेकार साथी ने बताया था कि बेट्टा, जब सीन देखोगे न, त अइसा सांस फुलने लगेगा जइसे आॅक्सीजन कम पड़ गया हो। फस्ट टाइम वाला सब लोग का यही हाल होता है।

और सचमुच, हमारा यही हाल हुआ था।

लेकिन यह मेरे लिए थोड़ा परेशान करने वाली बात थी कि जित्तू ने जब जंगली बनने का न्यौता दिया, तब भी एकाएक मैंने उसी तरह सांसों का फूलना महसूस किया। फेफड़ों में एकाएक जैसे कुछ ज़्यादा जगह बन आयी थी और हवा जाने का रास्ता नाकाफ़ी लगने लगा था। एक मिनट तक मैं उसकी ओर पीठ किये अपनी मेज़ पर किताबें जमाता रहा, फिर एक शब्द में मैंने जवाब दिया, ‘कल।’ मेरी इस असहमत-सी सहमति पर वह फिर हिनहिनाया और कुछ ‘घाघ’ या ‘घुन्ना’ या ‘घोंघा’ जैसा कमेंट मारते हुए रुख़्सत हो गया।

‘हां रे साला, घाघ तो हम हैं,’ मैंने सोचा, ‘कल पता लगेगा। ई जान रहा है कि हम स्वाद के चक्कर में आ रहे हैं? जब लड़की को आजाद करा देंगे, तब समझ में आएगा, केतना घाघ हैं।’ मैंने ख़ुद को विष्वास दिलाया कि कमरे पर चलने का न्यौता पाकर मेरी सांसों का फूल आना, दरअसल, एक मज़लूम को आज़ाद कराने के दुस्साहसिक विचार से उपजे भय और रोमांच का नतीजा था।

वह एक बेचैन रात थी। जितुआ की हैवानियत के बारे में सोच-सोच कर मैं सो नहीं पा रहा था। साले ने पिछले चैबीस घंटे से किसी को क़ैद कर रखा है और वह भी इस हालत में! कल रात से वह अपने लाचार जिस्म पर सात-आठ दफ़े इन दरिंदों की ठोकरें झेल चुकी है।…और यह सिलसिला ऐन उस घड़ी शुरू हुआ है जब वह ऊपर वाले का शुक्र मना रही थी कि उसने आखि़रकार अपने दूत भेज कर उसे मां के पास पहुंचवा ही दिया। कॉलेज के विशाल परिसर में पेड़ों की क़तारों के बीच से गुज़रते हुए और दूर-दूर गलियारों और छात्रावासों के कमरों में जलती लाइटों को देखते हुए उसे तसल्ली हुई होगी कि इतने शांत और शानदार अस्पताल में मौत उसकी मां के आस-पास भी फटकने का साहस नहीं करेगी। शहर का सारा इंतज़ाम कितना ‘निम्मन’ है और लोग कितने ‘सुपातर’, उसने सोचा होगा। और इसके तुरंत बाद वह जैसे पहाड़ की चोटी से अंधेरे खड्ड में गिरी होगी। फिर मन और देह की भयावह पीड़ा से कराहती एक गठरी बन कर बिस्तर के कोने में धंस गयी होगी।

यह सब कुछ मैं शायद इन्हीं शब्दों में नहीं सोच रहा था, पर इतना तो याद है कि शब्दों में ही सोच रहा था। ध्यान जब भी भटक कर किसी और दिशा में जाता, मैं शब्दों और सुचिंतित वाक्यों से हांक कर उसे ग़ुस्से और हमदर्दी की उसी राह पर ले आता। अंततः मैंने तय किया कि कल कंचन’दी के घर से–वह उसी शहर में रहने वाली मेरी मौसेरी बहन थीं–एक जोड़ी कपड़े लेकर आना है, ताकि जितुआ के कमरे पर जाते ही उस लड़की को कपड़े दूं और उसके सदर अस्पताल जाने का इंतज़ाम करूं।

अगले दिन क्लास ख़त्म होते ही मैं कंचन’दी के यहां गया। उन्हें बताया कि नाटक खेलने के लिए सलवार-कुर्ते की एक जोड़ी चाहिए। वे इस शर्त पर कपड़े देने को राज़ी हुईं कि मैं रात का खाना वहीं खाऊं। रात का खाना खाकर अपने झोले में एक सलवार सूट रखे मैं नौ बजे छात्रावास पहुंचा।

जितुआ गेट पर ही मिल गया। वह डिनर के बाद अपने कमरे की ओर जा रहा था। मुझे देखते ही बोला, ‘का भइवा, कहां गायब हो जाते हो? साला दिन भर खोज खोज के तबाह हो गये।’ फिर पास आकर फुसफुसाया, ‘अबहीं चलबे?’

‘चल।’ मैंने कहा और उसके साथ हो लिया।

पिछली बार फूलती हुई सांसों के बीच मैं सिर्फ़ ‘कल’ कह पाया था, इस बार सिर्फ़ ‘चल’। चलते हुए मैंने एक बार अच्छी तरह कंधे से लटके झोले को टटोला। यह अपनी सांसों के फूलने को झुठलाने की कोशिश रही होगी।

कोठी पर पहुंच कर मेरी चाल ख़ुद-ब-ख़ुद धीमी पड़ गयी। जितुआ को मैंने दो क़दम आगे निकल जाने दिया। वह पैंट की जेब में चाभी टटोलता कमरे के दरवाज़े की ओर बढ़ा… पर यह क्या! वहां तो कोई ताला था ही नहीं। हाथ लगाते ही दरवाज़ा खुल गया। ‘अरे! खुलल कैसे है यार? मामू आ गये का?’ कह कर उसने हड़बड़ी में लाइट जलायी।

लाइट ने बताया कि मामू तो नहीं ही आये हैं, लड़की भी नदारद है।

जितुआ सन्न! ‘अरे, कहां गेलउ भइवा?’ वह ऐसे तड़फड़ाने लगा जैसे बिर्हनी के छत्ते में हाथ पड़ गया हो। झटाझट उसने कमरे के सारे कोने-अंतरे तलाश लिये।

मैंने ग़ौर किया, तीन दिन पहले के मुक़ाबले कमरे की रंगत थोड़ी बदली हुई थी। सामान तो अपनी पुरानी जगह पर ही थे–दरवाज़े के ठीक सामने की दीवार के साथ एक स्टोव और दो-चार बर्तन, बांयीं तरफ़ एक चैड़ी-सी चैकी और उस पर बिछा तोशक, फ़ोल्डिंग मेज़ पर कूड़े के ढेर की तरह रखी किताबें, पास ही जस्ते का एक बड़ा-सा बक्सा–पर तोशक को छोड़ कपास का कोई नामोनिशान नहीं था। बिस्तर पर चादर तक न थी और कमरे में आर-पार बंधी रस्सी, जिस पर ढेरों कपड़े टंगे होते थे, ख़ाली पड़ी थी। शायद मामा-भांजे ने सारा कुछ, एहतियातन, बक्से में बंद कर दिया था। उस बक्से पर अभी ताला लटक रहा था।

इन सारे सामानों के बीच वह ‘समान’ कहीं नहीं था। दरवाज़े की आड़ में एक देह भर का जो छोटा-सा गुप्त ठिकाना था, वहां भी नहीं। जितुआ दौड़ कर ग़ुसलख़ाने में झांक आया। वह भी ख़ाली था।

‘ले लोट्टा। लगता है, कमरवा बंद करके जाना भूल गये थे।… लेकिन कपड़ा त सब ताला में बंद है। साली लंगटे भाग गई का?’ कहता हुआ वह बाहर की ओर दौड़ा और फाटक से निकल कर हड़बड़ाया हुआ दोनों तरफ़ देखने लगा, इस दुविधा में कि किधर जाए।

                मैं कमरे के बारामदे पर खड़ा रहा। मुझे संदेह होने लगा था कि कहीं सब कुछ इस साले की कि़स्साग़ोई तो नहीं है! सोचता होगा, ऐसा कोई कि़स्सा बनाने से इसकी मर्दानगी का रुआब जमेगा।… वाह, क्या मर्दानगी है!… अब ये हरामी फाटक के पास से अपने कंधे झुलाये हुए लौटेगा और कहेगा, ‘भाग गेलउ रंडिया। साइद चद्दर-उद्दर कुछ बाहर छूट गेलई होत। ओही लपेट-उपेट के भाग गेलउ।’

उसकी ऐक्टिंग की ओर से मुंह फेर लेने की ग़रज़ से, या शायद किसी अंतःप्रज्ञा के चलते, या शायद यों ही, मैं फाटक से ठीक उल्टी दिशा में देखने लगा जहां पेड़ों और झाड़-झंखाड़ से भरा कोठी का विशाल अहाता था। अहाते के छोर पर खेत की मेड़ से बस थोड़ी ही ऊंची दीवार और आगे गंगा की ढलान। चांदनी रात में यह पूरा विस्तार बहुत रहस्यमय लग रहा था, क्योंकि कोठी की सारी बत्तियां बुझी हुई थीं। सिर्फ़ एक बल्ब था, जितुआ के कमरे का, जो मेरी पीठ के ठीक पीछे था। पर चांदनी में सब कुछ साफ़-साफ़ नज़र आ रहा था, गाछ-वृक्षों की हरीतिमा को छोड़ कर। सांवलापन ओढ़े ये गाछ-वृक्ष ऐसे लग रहे थे जैसे त्रिआयामी परछाईंयों में बदल गये हों। हवा थमी हुई थी। बाउंडरी वाल के आगे तेज़ी से धुंधली पड़ती चांदनी गंगा के विस्तार पर जाकर लगभग लुप्त हो गयी थी। वहां अंधेरा पसरा था और पानी की सरसराहट में सुनायी पड़ता सन्नाटा भी।

आधे मिनट मैं इस रहस्यलोक के किनारे पर खड़ा उसकी चैहद्दियां टटोलने की कोशिश करता रहा। वे जितनी पास थीं, उतनी ही दूर भी।… या शायद वे कहीं थीं ही नहीं। उनके एक साथ पास और दूर होने की अतार्किकता का यही निदान था।

पर उस रहस्यलोक के भीतर कुछ और था जिसने एकाएक मेरा ध्यान खींच कर मुझे हतप्रभ कर दिया और अगले एक-डेढ़ मिनट में वह सब हो गया जिसे बताने के लिए मैं इतने ब्यौरे पार करता यहां तक पहुंचा हूं।

मैंने देखा, दूर किसी मोटे तने की आड़ से झांकती एक गोरी बांह और कमर के कटाव से नीचे का सफ़ेद झक्क अर्द्धचंद्र! वह अपने नंगे जिस्म को एक उम्रदराज़ पेड़ की आड़ में छिपाने की नाकाम कोशिश कर रही थी। जिस्म का जो क़तरा तने से बाहर निकला था, उससे टकरा कर चांदनी जैसे बिखर-बिखर जाती थी। पेड़ कुछ बेतरतीब और विरल झाडि़यों के पीछे था। इसलिए कमर से नीचे की अधगोलाई किसी ढीले-ढाले जाल में उलझी-सी दिख रही थी।

मैं सांसों को संभालता कुछ क्षण रहस्यलोक में छिपे इस सबसे गहरे, किंतु अंशतः अनावृत, रहस्य को देखता रहा। इस बीच उसने तने के पीछे से अपना आधा चेहरा बाहर निकाला और एक आंख से इसी दिशा में देखने लगी जिधर आउटहाउस था, फाटक था और मैं भी। मेरे पीछे बल्ब से रौशन कमरे का दरवाज़ा था, शायद इसीलिए वह समझ न पाई हो कि मैं उसे ही देख रहा हूं। समझ पाती तो तुरंत अपने को छुपा लेने का कोई और जतन करती।

उतनी देर में मैंने अपनी सांसों पर थोड़ा काबू पा लिया था और मुझे याद आ गया था कि मैं इसे देखने नहीं, कपड़े देने आया हूं। मैं बारामदे से उतर कर उस ओर बढ़ गया।

और यही सारी गड़बड़ी की शुरुआत थी। मुझे आगे आता देख वह एकाएक सचेत हुई और वहां से भाग कर पीछे एक केले के पेड़ की आड़ में खड़ी हो गयी। एक कौंध की तरह उसका पूरा नंगा जिस्म दृश्य से होकर गुज़रा। किसी ग्लानि या घबराहट या महज़ एक अपरिचित-सी झेंप के चलते मेरे पैर बारामदे से चार क़दम आगे ही ठिठक गये और मैं कठपुलती की तरह पीछे मुड़ गया, जैसे यह साबित करना हो कि मैंने कुछ नहीं देखा। जितुआ उस समय फाटक के बाहर दाहिनी तरफ़ से लौट कर बाईं तरफ़ जा रहा था। उस पर नज़र पड़ते ही मैं वापस झुरमुट की ओर मुड़ गया।

भाग कर केले की आड़ में उसका जाना, बेशक, ख़ुद को बचाने की कोशिश में एक बेमतलब-सा क़दम था, पर कोई उपाय न देख कर वह लुका-छिपी के खेल में ही बचाव और प्रतिरोध का छद्म संतोश ढूंढ़ रही होगी। यह भी हो सकता है कि केले के नाटे क़द और नीचे को लटके हुए दुकूल-नुमा पत्तों से उसे कुछ ज़्यादा ही उम्मीद रही हो। वहां जाकर शायद उसे महसूस हुआ कि उसकी उम्मीद कितनी ग़लत थी; वह जितना छुप रही थी, उससे ज़्यादा दिख रही थी। मुझे अपनी ओर देखता देख वह स्तनों पर अपने हाथ बांधे पीछे खिसकने लगी। अब वह आड़ से बिल्कुल बाहर थी, पीछे को जाती हुई। उसके बाल बंधे थे। चेहरे से लेकर गर्दन तक का रंग गेहुंआं रहा होगा, तभी वह बहुत साफ़ नज़र नहीं रहा था, पर पूरी देह चांदनी में चमक रही थी।… दो-चार क़दम पीछे जाने के बाद ज़मीन पर गिरी हुई एक सूखी डाल से उसके पैर उलझे। जैसे आत्मरक्षा की कोई युक्ति अचानक सूझ गयी हो, उसने वह मोटी-सी डाल हाथों में उठा ली और उसे ध्यान नहीं रहा… या रहा भी हो… कि ऐसा करने से उसके स्तन पूरी तरह बेबाक हो गये हैं–डुबकी मार कर ऊपर को उठते गोताखोरों की तरह दो भारावनत स्तन…

बचपन के भूगर्भ की किन्हीं परतों में दबा परितृप्त स्पर्ष का एक अहसास मेरी हथेलियों, गालों और होंठों पर बिछलता चला गया।

क्या इसे ही जादुई यथार्थ कहते हैं?

मैं मंत्रविद्ध-सा जड़ हो गया। फिर से यह बात सांसों की धौंकनी में कहीं खो गयी कि मेरे कंधे पर लटकते झोेले में एक जोड़ी कपड़े इसी जादू और रहस्य को ढंकने के लिए हैं। शायद चांदनी का नीम अंधेरा न होता और उसकी देह की चमक ही नहीं, आंखों के डर को भी मैं देख पाता तो यह भूल न होती।… या कौन जाने, यह सिर्फ़ एक लाचारी भरी सफ़ाई हो! कैसे कह सकता हूं कि दिन के उजाले में भी उन आंखों को मैं देख ही पाता! क्या इस वक़्त मैं उसकी देह के अलावा और कुछ भी देख पा रहा था? उमस भरी रात में निस्तब्ध खड़े पेड़, अहाते की ठिगनी चारदीवारी, उसके पार धुंधली पड़ती हुई अंधेरे में गुम जाने वाली ढलान, गंगा के प्रवाह पर कहीं-कहीं रोशनी के कांपते प्रतिबिंब–ये सब मेरी निगाह के दायरे में रह कर भी अदृश्य थे। दृश्य सिर्फ़ एक जिस्म था।

पर यह सब, कुछ गिने-चुने लम्हों की ही बात थी। जब पीछे की ओर चलते हुए अहाते की छोटी-सी दीवार से उसके पैर अटके तो मुझे जैसे होश आया। मैं अपने ठिठके हुए क़दमों को झटक कर आगे लपका और चिल्लाया, ‘अरे, रुको! हम ई कपड़ा…।’ वाक्य बीच में ही छूट गया, क्योंकि मेरे लपकने और चिल्लाने को एक निर्णायक हमला मान कर उसने हाथ में पकड़ी हुई डाल मुझ पर फेंक कर मारी। वह सीधा मेरे चेहरे पर लगी होती अगर हाथों पर रोकते और नीचे झुकते हुए मैं ज़मीन पर न आ गिरा होता। उधर लड़की, शायद जवाबी हमला कर चुकने के बाद की घबराहट में, या मेरी आवाज़ सुन कर पीछे से दौड़े आते हुए जितुआ को देख कर, तेज़ी से पीछे मुड़ी और दो-ढाई फिट ऊंची उस दीवार पर खड़ी हो गयी जिसके बाद गंगा की ढलान शुरू होती थी।

तुरंत उस पार कूद जाने के बजाय वह अगले कुछ सेकेंड वहीं खड़ी रही। शायद पसोपेश में थी कि दूसरी तरफ़ का संसार न जाने कैसा हो। पर यह पसोपेश, निस्संदेह, उसे बेमानी लगा होगा, क्योंकि दुःस्वप्न जैसे इन दो दिनों से ज़्यादा बुरे दिनों की कल्पना भी नामुमकिन थी।

या शायद उन क्षणों में उसकी निगाह दाहिनी ओर के घाट पर, छात्रावास का डिनर निपटाने के बाद तफ़री करते दो-तीन युवकों की ओर चली गयी हो और एक बार को उसने सोचा हो कि उनसे कोई मदद मिल सकती है या नहीं। पर वे उसे, निस्संदेह, एक नग्न स्त्री-देह की मौजूदगी से अनजान, इसीलिए फि़लहाल निश्क्रिय, दरिंदों की तरह नज़र आये होंगे।

या शायद उन क्षणों में उसने सामने, सीधी ढलान के छोर पर, क्रमशः विरल होते दूधिया घोल-जैसी चांदनी में ऊंघती गंगा मैया को एक बार आंख भर कर देखा हो और यह जानते हुए भी, कि इस बात का कोई मतलब नहीं है, ‘रच्छा’ की ‘बिनती’ की हो।

जो भी हो, उठ कर खड़े होते-होते उन क्षणों में मैंने जो देखा, वह मेरी सांसों और शब्दों पर बहुत भारी पड़ रहा था। उसकी पीठ मेरी तरफ़ थी और दीवार के ऊपर जहां वह खड़ी थी, नीम उजाला उसकी देह के आकार में धवल प्रकाश बन गया था।… उघड़ी हुई पीठ से लेकर कमर के कटाव से नीचे के उन्नतोदर विस्तार तक, लगभग स्तब्ध-अवाक् कर देने वाले सौंदर्य का यह भीषण सामना था।… मैंने उखड़ती हुई सांसों के बीच झोले में रखे कपड़े बाहर निकाल लिये और उन्हें हाथों में थामे एक पूरा वाक्य कह डालने की कोशिश की, लेकिन हकलाहट में कुछ बेमेल शब्द ही निकल पाये।…

या शायद वह भी नहीं… बस, कुछ निरर्थक ध्वनियां।

ऐन जिस वक़्त पीछे से भाग कर आता जितुआ मेरे पास तक पहुंचा, लड़की दूसरी तरफ़ कूद गयी और तीर की तरह दौड़ती हुई, मेरी दुःकल्पना की हदों से भी आगे, ढलान पार कर गंगा में समा गयी। शांत लहरों में एक तेज़ हड़कंप हुआ, जैसे दो-तीन बड़े पत्थर एक के बाद एक फेंके गये हों। पर इतना ही। लहरें फिर शांत हो गयीं। दाहिनी ओर के घाट पर बैठे युवक चैंक कर खड़े हो गये और कौतुक से उधर देखने लगे। उन्हें अपनी बांयीं आंख के कोने से जो कुछ दिखा होगा, वह एक पहेली की तरह लग रहा होगा, जिसे वे समझने की कोशिश कर रहे थे।

मैं अब तक दौड़ कर अहाते की दीवार के पास आ गया था। तभी पीछे से जितुआ ने कॉलर पकड़ कर मुझे पेड़ों की आड़ में खींच लिया।

‘भोंसड़ीवाले, सबके नजर में आने का सौख है का?’ वह ग़ुस्से में था।

‘अउ ई का है?’ मेरे हाथ से कंचन’दी का सलवार-सूट खींचते हुए उसने पूछा।

बात समझते उसे देर नहीं लगी।

‘भोंसड़ी के, हम विलेन बनके माल को लें और तू हीरो बनके? एही सोचे थे?… साला, घोंघा!’

शायद मुझे दुबारा कहना चाहिए–बात समझते उसे देर नहीं लगी।

कपड़े मेरे मुंह पर मारते हुए वह अपने कमरे की ओर बढ़ गया। जाते-जाते कहता गया कि तुरंत दफ़ा हो जाऊं, क्योंकि नीचे जिन लड़कों को कुछ गड़बड़ का अंदेशा हुआ है, वे आते ही होंगे।

घाट की ओर से पहेली को हल करने की हलचल लगातार कानों तक आ रही थी। अलबत्ता पानी की हलचल शांत हो गयी थी। गंगा की छाती पर कोई शोर नहीं था।…

क्या उसने इस डर से हाथ-पैर भी नहीं मारे कि कहीं कोई बचाने न आ जाये और कहीं उसकी निर्वस्त्र देह उसके चैतन्य रहते बाहर न निकाल ली जाये?…या क्या पानी की चादर ओढ़ कर उसे इतना सुकून मिला कि पिछले अड़तालीस घंटों से जगी हुई आंखें गहरी नींद में मुंद गयीं?…

भगवान जाने, उसे तैरना आता भी था या नहीं?…

मैं काठ बना कुछ देर पेड़ों के झुरमुट से गंगा को देखता रहा…

पर मेरे पास ज़्यादा समय नहीं था। मुझे दूसरे रास्ते से भाग कर घाट पर खड़े लड़कों में शामिल होना था ताकि इस घटना का कोई सूत्र मुझ तक पहुंचता न लगे।

तेज-तेज़ चलते हुए मैंने सलवार-कुर्ते की जोड़ी को अंदर डाला… और शायद ख़ुद को भी… साला, घोंघा!

संजीव कुमार

संजीव कुमार

संजीव कुमार। युवा आलोचक और कहानीकार। ‘जैनेन्द्र और अज्ञेयः सृजन का सैद्धांतिक नेपथ्य’ पुस्तक के लिए देवीशंकर अवस्थी सम्मान। दिल्ली विश्विद्यालय के देशबंधु कॉलेज में  प्राध्यापक। इनसे sanjusanjeev67@gmail.com पर संपर्क सम्भव है।

कहानी ‘बनास’ से साभार प्रस्तुत है। 

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