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फिल्मी दुनिया की सीख: इब्राहीम जलीस

By इब्राहीम जलीस

पाकिस्तान और भारत में जहां गरीबी और मुफ़लिसी, दुनिया के सारे देशों से कई गुना अधिक है, वहां साधारण आदमियों के लिए सब से अधिक सस्ते प्रकार का मनोरंजन, सिनेमा है। दिन-भर के कामकाज और मेहनत मशक्कत के बाद लोग-बाग जब थके हारे अपने घर वापस लौटते हैं तो घर में एक बीमार और कुरूप बीबी और रोनी सूरत के कुछ बच्चे उनकी दिन-भर की कोफ्त और थकान में और अधिक वृद्धि कर देते हैं। इसी वजह से आम लोग यह चाहते हैं कि वे अपनी बीमार और मरियल बीवी से दूर और मधुबाला के अधिक समीप रहें। ठंडे चूल्हे वाले घर के बजाय आरमदायक फर्नीचर वाले एअरकंडीशन्ड सिनेमाघर में अपना समय किल करें। यदि आप दोपहर से लेकर आधी रात तक पाकिस्तान और भारत के सिनेमाघर पर विहंगम दृष्टि डालें, तो आपको यह महसूस होगा कि सिनेमा घर किसी मुर्दा चूहे की लाश है जिस पर असंख्य चीटियां चिपटी हुई हैं।mughal-e-azam-800

    मैंने न केवल फिल्म बनाने वाले आदमियों-फिल्म निर्माताओं को बहुत समीप से देखा है अपितु फिल्म देखनेवालों का भी बड़ा गहरा मनोवैज्ञानिक अध्ययन किया है और मुझे विश्वास है कि कई अवसरों पर फिल्म देखने वाले फिल्म बनाने वालों से अधिक दिलचस्प और आश्चर्यजनक सिद्ध हुए हैं। मैंने एक बार बड़ी गम्भीरता से विचार किया कि हमारे साधारण गरीब नागरिक सिनेमा के इतने ज्यादा शौकिन क्यों है? वे जब अपने छोटे वेतनों और सीमित आय में अपने दैनिक जीवन के खर्चे पूरे नहीं कर सकते, तो सिनेमा क्यों देखते हैं और सिनेमा देखना उनके लिए क्यों इतना आवश्यक है? क्या यह खेदपूर्ण नहीं है? इन प्रश्नों पर बड़ी देर तक विचार करने के पश्चात में इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि दिनभर कठोर परिश्रम करने के बाद आदमी आराम और मनोरंजन चाहता है। हमारे इन दोनों देशों में साधारण आदमियों के लिए न तो फ्री क्लब हैं और न मुफ्त खेलों के स्टेडियम हैं। ले-दे के पब्लिक गार्डन हैं जहां जाते हुए साधारण आदमी इसलिए डरते हैं कि पुलिस के सिपाही उन्हें जेबकतरे या औरतों का पीछा करने वाले बदमाश घोषित करके पकड़ लेते हैं! रही सड़कें, तो उन पर घूमना-फिरना इसलिए भी मुसीबत बन जाता है कि पुलिस उनका धारा 106 के अंतर्गत आवारगर्दी में चालान कर देती है। क्योंकि उनके कपड़े मैले होते हैं और शक्ल सूरत से वे साफ गरीब आदमी मालूम होते हैं और पुलिस की दृष्टि में हर गरीब आदमी आवारा होता है! अब रहा जाता है घर। घर भला क्या मनोरंजन-स्थल बन सकता है? जबकि घर में और काल कोठरी में यूं भी तनिक सा अन्तर होता है। घर में बीवी का बिस्तर एकमात्र मनोरंजक स्थल है किन्तु इसके भावी परिणाम बड़े भयंकर होते हैं अर्थात हर साल एक बच्चा!

फिर दूसरी बात यह है कि साधारण आदमियों की बीवियां अधिकतया सुन्दर नहीं होतीं। वे अधिकतया काली या सांवली, चेचक-ग्रस्त, गन्दी और कुरूप होती हैं। और इन औरतों की खातिर उन्हें हर महीने कम से कम पचास रूपयों से लेकर अधिकाधिक ढाई सौ रूपयो तक कमाने और उनके इलाज व रख-रखाव पर व्यय करने पड़ते हैं। इसके विपरीत हर रोज केवल नौ आने खर्च करके वह ढाई घन्टे तक हसीन से हसीन एक्ट्रेस को खरीद लेते हैं। कामिनी कौशल केवल नौ आने में अपना सारा सौन्दर्य और कान्ति उनकी सेवा में प्रस्तुत कर देती हैं। नर्गिस अपनी सारी प्रेम कहानी उन के हवाले कर देती है। निम्मी अपने संगीत से उन्हें आनन्दित कर देती है। गीतावाली और कुक्कू उन को प्रसन्न करने के लिए ठुमुक ठुमुक कर और थिरक थिरक कर पर्दे पर नाचती हैं। महमूद,  जानीवाकर उन्हें हँसा-हँसा कर अधमुआ कर देते हैं।

         यह सब केवल ढाई घन्टों के लिए होता है मगर होता है केवल नौ आने में!

    लेकिन दिन भर के सख्त कामकाज और कठोर परिश्रम के बाद ढाई घन्टे का यह हुस्न व इश्क, नाच-रंग और हंसी, दिल्लगी से भरपूर मनोरंजन, उनकी थकी हुई तबियतों और उदास मन को नये सिरे से तर-ओ-ताजा कर देता है। और वह अपने बीवी बच्चों के लिए तो नहीं, कम से कम गीताबाली की खातिर जिन्दा रहने के लिए आत्महत्या करने के उस विचार को त्याग देता है। जो सूदखोर पठान या खानदानी सेठ के कर्जे के लगातार तकादों से तंग आकर सुबह उनके मन में उत्पन्न हुआ था। सिनेमा घर से बाहर निकलते हुए वे मन ही मन में पठान और सेठ को दुत्कारते हैं-

    ‘इन साले की ऐसी की तैसी। आत्महत्या करके क्यों हराम मौत मरें। कर्जा कभी न कभी अदा कर ही देंगे। अगर इस जलील कर्जे की वजह से बेमौत मर गये तो कामिनी कौशल और नर्गिस का हुस्न वहां कहां नजर आएगा। निम्मी और गीतावाली के प्रभावशाली एवं कामोत्तेजक शरीर के मोड़-तोड़ वहां कहां हम देख सकेंगे। लता मंगेशकर किसके लिए नगमों का जादू जगाएगी और रीहाना किसके लिए थिरक-थिरककर नाचा करेगी?’

    हमारी जनता को नित्य कि मुसीबतों और दुखों से भरपूर जिन्दगी को सहारा देने में हमारी फिल्में बड़े आश्चर्यजनक कारनामे अंजाम देती है। मुझे याद है कि मेरा दोस्त रशीद खां ‘गमे-जानां और गमे-दौरां’ दोनो से तंग आकर एक दिन अपने जीवन को खत्म कर देने का पक्का इरादा कर चुका था, किन्तु जब मुझे इस का ज्ञान हुआ तो मैं उस का ‘गम गलत’ करने के लिए उसे एक फिल्म दिखाने को ले गया और उस फिल्म ने उस बेचारे की जान बचा ली। वह फिल्म संयोगवश उसकी जिन्दगी के उतार चढ़ाव से बड़ी मिलती जुलती थी। विषेशतयः इस फिल्म में एक गीत था। जिसके बोल थे-

         इन्सान क्या जो ठोकरें नसीब की न सह सके।

    यह गीत सुनते ही मेरा दोस्त आंखों में आंसू छलकाकर बोला-यार। मैंने मरने का इरादा अब बदल दिया है। अब जिन्दा रहूँगा और जिन्दगी की कठोरताओं के साथ अनवरत रूप से लड़ता रहूंगा। इसके बाद से वह नित्य नसीब की ठोकरे खाता चला जा रहा है, परन्तु चेहरे से बड़ा संतुष्ट प्रतीत होता है और हरदम गुनगुनाता रहता है-

         इन्सान क्या जो ठोकरें नसीब की सह न सके।

    इसके इलावा जब वह अपने आसपास अपने जैसे शोषित-पीड़ित लोगों को रोता और सिसकता हुआ देखता है तो उनकी पीठ पर हाथ मारकर गाते हुए उन्हें परामर्श देता है-

         गाये चला जा, गाये चला जा,

         एक दिन तेरा भी जमाना आएगा।

    मैं अपने यहां के सिनेमाघरों को एक ऐसा स्कूल समझता हूं जहां इन्सान को बड़ी से बडी मुसीबतें बर्दाश्त करने के ओर उसके साथ ही साथ किसी औरत का चुनाव करके उससे मुहब्बत करते रहने, मालदार प्रतिद्वन्द्वि को नीचा दिखाने और अन्त में अपनी प्रेमिका से शादी करने के लाभदायक और रामबाण सबक पढ़ाये और सिखाए जाते हैं!

    किसी की यह आपत्ति बिलकुल ठीक है कि हमारे सिनमा घर, हमारी जनता को एक प्रकार के ‘गुनाह बेलज्जत’ की ओर आकृष्ट कर रहे हैं। लेकिन मेरे ख्याल में यह गुनाह बेलज्जत उस गुनाह बालज्जत के मुकाबले में अधिक बेहतर गुनाह है! यदि हमारे सिनेमाघर न होते, मो मुझे विश्वास है कि हमारी गरीब जनता में शराबखोरी, बलात्कार और शीलहरण जैसी गंदी बीमारियां अधिकता से फैल जातीं। इसका स्पष्ट प्रमाण है कि पिछले दिनों कराची के सिनमा मालिकों ने हड़ताल कर दी थी और सारे सिनेमाघर बन्द हो गये थे, तो उस समय कराची के सारे शराबखाने, ताड़ीघरों और रंडियों के कोठों पर तिल धरने के लिए भी जगह नहीं मिलती थी। उन दिनों शराब-फरोश होटलवालों, ताड़ी विक्रेता और रंडियां दिन-रात अल्लाह मियां से दुआएं मांग रही थीं कि खुदा करे कि सिनेमाघर हमेशा के लिए बंद हो जाएं और हमारे मदिरालय और कोठे इसी तरह दिन होली रात दिवाली मनाते रहे। उन्हीं दिनों की एक घटना मैं आपको बता दूं कि उन दिनों शराबखानों में यह कथन बड़े-बड़े बोड़ों पर लिखकर लगवाये गये थे कि-

         सुबह का भूला शाम को घर लौट आए तो उसे भूला नहीं कहते।

और कोठेवालियां इस तरह की गजल और गीत गा रही थीं-

         वह आयें घर में हमारे खुदा की कुदरत है।

         कभी हम उन को, कभी अपने घर को देखते हैं।

         घर आया मोरा परदेसी,

प्यास मिटी मोरी अंखियन की।

इसके बाद अचानक यह हड़ताल खत्म हो गई। सिनेमा खुल गये तो शराबखाने भी खाली हो गये और रंडियों के कोठे भी विरान हो गये। रंडिया बड़ा चीख चीखकर गाती रहीं-

         रात है तारों भरी छिटकी हुई चांदनी

         ऐसे में आ बालमा प्यार की बातें करें…

         हो प्यार की बातें करें।

लेकिन निम्मी, बीनाराय, सबीहा, नूरजहां, शम्मी, गुलशन आरा, यहां तक की बूढ़ी लीला चिटनिस तक ने लोगों का दामन न छोड़ा और उन्हें बुरी राह पर न जाने दिया, पथ-भ्रष्ट न होने दिया। लोग बाग ‘गुनाह बालज्जत‘  से फिर ‘बाल-बेलज्जत’ की ओर लोट आये। इस प्रकार उनका चरित्र और नैतिकता बुराई की ओर जाते जाते फिर अच्छाई की ओर लौट आई। यह सही है कि सिनेमा देखना साधारण आदमी के लिए और विषेशतया गरीब आदमी के लिए एक फिजूलखर्ची ही है। लेकिन यह उस फिजूलखर्ची से लाख गुना बेहतर है, जो शराब बनकर बह जाती है या फिर ‘बाजार ए हुस्न’ से खरीदी हुई बीमारियों का इंजेक्शन बन जाती है। साधारणतया यदि हम फिल्म देखने के परिणामों को देखे तो ज्ञात होता है कि सिनेमा देखने के इस रोग ने हमारी जनता को एक हल्की सी फिजूलखर्ची में फंसाकर दूसरी कई बड़ी महंगी और तबाह कर देनेवाली बुराइयों से बचा लिया है। कराची के सिनमा-मालिकों ने कुछ दिनों के लिए सिनेमाघरों पर ताले लगाकर हमारी आपकी आंखे खोल दीं और बता दिया कि सिनेमाघरों का अस्तित्व जनता के चरित्र को खराब होने से बचाने के लिए कितना आवश्यक है। यूं तो सिनेमाघर भी जनता के लिए एक झक मारने का स्थान है, किन्तु सिनेमाघरों की हड़ताल के समाप्त होते ही जनता ने ‘शाम ढले खिड़की तले सीटी बजाना छोड़ दिया।’ और उस मार्ग पर आ गई जो रीगल, इरोज, नाज, ताजमहल, प्लाजा, रैक्स, पैराडाइज, निशांत, यहां तक कि बाजार ए हुस्न में से गुजरता हुआ सुपर, राक्सी और नूरमहल सिनेमा तक चला जाता है। लेकिन कोई महबूब-नौरोजी रास्ता नहीं भटकता और सारे महबूब-नौरोजी श्यामा को देख-देख कर केवल आँखें सेंकने पर ही संतोष किए लेते हैं।

हमारे सिनेमाघर दूसरा जो लाभदायक सबक इन्सानों को सिखाते हैं, वह है ‘मुहब्बत का सबक’ या प्रेम का पाठ! हमारे सिनेमाघर इन्सानों को कभी नफरत का सबक या घृणा का पाठ नहीं सिखाते। वर्तमान यूग में जबकि एक इंसान को दूसरे इंसान की मुहब्बत की नितांत आवश्यकता है, हमारे सिनेमाघर बहुत बड़े इंसानी कर्तव्य का पालन कर रहे हैं। यह और बात है कि वहाँ मर्द को सिर्फ औरत से और औरत को सिर्फ मर्द से मुहब्बत करने का सबक सिखाया जाता है। लेकिन यह भी तो खालिस इंसानी मुहब्बत ही हुई। इसके अलावा अगर मर्द औरत से नहीं तो क्या गाय-बकरी से, और औरत मर्द से नहीं तो क्या हाथी-घोड़े से मुहब्बत करेगी!Hum Dono Rangeen - Front

हमारे सिनेमाघरों में मुहब्बत का कोई लंबा, पेचीदा और सब्र की आजमाइश करने वाला सबक नहीं सिखाया जाता बल्कि बहुत संक्षिप्त और बहुत आसान अर्थात ‘चट मुहब्बत पट ब्याह!’ परिणामस्वरूप इन सिनेमाघरों से निकलने के बाद एक मुहल्ले के आमने-सामने घरों में रहने वाली लड़की और लड़का जब बाहर की ओर खुलने वाली खिड़कियाँ खोलती या खोलता है तो दोनों एक-दूसरे को दिलीप कुमार और मधुबाला की तरह बस देखते ही फिदा हो जाते हैं, या एक-दूसरे पर आसक्त हो जाते हैं। इसके एक-दो महीने बाद दोनों में शादी हो जाती है। और यदि शादी नहीं भी हो सकती तो वे दोनों रात्रि के अंधकार में गीतबाली और देवानंद की तरह घर से भाग खड़े होते हैं और लाहौर या दिल्ली में पकड़े जाते हैं और फिर फिल्म ‘दिल की बात’ या ‘हम दोनों’ की तरह दोनों का विवाह हो जाता है। हमारे सिनेमाघरों में चट मुहब्बत और पट ब्याह की सीख इसलिए दी जाती है कि कहीं लोग-बाग क्रोध में आकार सिनेमाघर का फर्नीचर ही न तोड़ दें कि क्यों तुमने संतोष कुमार की शादी सबीहा से नहीं कराई। हमारी जनता न्यायप्रिय होती है। और हर मामले में न्याय चाहती है। इसके अलावा शुरू का एक इस्लामी पहलू यह भी निकलता है कि कुँवारे मर्द और कुँवारी औरत को जन्नत में जगह नहीं मिल सकती। इसलिए हमारे सिनेमाघर जो साधारण गरीब आदमियों को उनकी नित्य की ज़िंदगियों के जहन्नुमों से निकालकर ढाई घंटे के लिए सिनेसंसार के स्वर्ग में ले जाते हैं। वे यह चाहते हैं कि उनके सारे दर्शकगण फिल्मी तर्ज की मुहब्बत और शादियाँ करके दुनिया से सीधे जन्नत चले जाएँ! इस सिलसिले की अंतिम बात यह है कि यदि फिल्म के अंत में शादी न हो तो फिर ‘मजा’ नहीं आता और लोग ‘मजे’ के लिए ही फिल्म देखते हैं! अब भला यह भी क्या बात हुई कि दिलीप कुमार छः बजे शाम से सवा आठ बजे रात तक श्यामा से मुहब्बत करता रहा और आठ बज कर बीस मिनट पर उसको छोड़कर हिमालय पर्वत पर जाकर साधु बन गया–? भला क्या मजा आया! मजा तो तब जब ही है कि नूरजहां और संतोष कुमार रिट्ज़ सिनेमा में शादी करें और हम और आप अपने घर जाकर दाल-रोटी का ‘वलीमा’ खाएँ!Aankhen-7

हमारे सिनेमाघर हमारी जनता को सबसे अधिक महत्वपूर्ण जो सबक पढ़ाते हैं वह है वर्ग-घृणा का सबक अर्थात गरीब का गरीब की मदद करना और अंत में दौलतमंद आदमी को नीचा दिखाने का सबक। आपने हर फिल्म में देखा होगा कि एक गरीब किन्तु स्वस्थ और सुंदर नवयुवक होता है, उस पर एक अमीर और दौलतमंद आदमी की नौजवान लड़की फिदा हो जाती है। इस अमीर लड़की का बाप गरीबों पर बड़ा जुल्म ढाता है तो गरीब नवयुवक उस लड़की से, छेड़खानियाँ कर करके खूब बदला चुकता है और अंत में जब अमीर लड़की मालदार बाप की दौलत को ठोकर मार्कर गरीब नवयुवक की तंग, अंधेरी और गंदी ‘चाल’ में बैठी चूल्हा फूंकते-फूंकते रोने-बिसुरने लगती है तो सिनेमाघर में बैठे हुये सारे दर्शक प्रसन्न होकर ज़ोर-ज़ोर से तालियाँ बजाते हैं, सीटियाँ बजाते हैं और चीखने लगते हैं:-

“वह पट्ठे प्रेमनाथ! खूब बदला लिया है। और मजा चखा साली को।”

और जब अमीर लड़की का बाप अपनी भागी हुई लड़की को ढूँढता-ढूँढता गरीब नौजवान की चाल पर पहुंचता है तो उस चाल के गरीब लौंडे उसकी कार पर पथराव आरंभ कर देते हैं और सिनेमा में सीखिए हुई गालियों की बौछार करते हैं। और जब अमीर बाप अपनी नाज-व-नखरों में पली हुई लड़की को गरीब नौजवान का गंदा अंडर-वेयर और लूँगी ढोते देखता है तो उस पर बरस पड़ता है। लेकिन अमीर लड़की साफ-साफ कह देती है—

‘‘पिता जी! मुझे प्रेम हो गया है। (अर्थात प्रेमनाथ हो गया है।) प्रेम आलीशान कोठियों में अनहीन रहता। प्रेम गरीबों की कुटियाओं में रहता है।”

इस डायलाग पर सिनेमा देखने वाले ‘माजे-गामे’ चीख पड़ते हैं-

“वाह पट्ठी जीवन्द रह।”

इसके बाद जब उसका अमीर बाप सिर झुकाए वापिस जाने लगता है तो सिनेमा के दर्शक लोग घृणा से पुकारते हैं-

“धत्त- हात तेरी पापड़ वाले!”

“नस जा ऐथूँ कमीनियाँ।”

“ढर्रर्र….!”

दरवाजे से बाहर निकलते हुये उसकी भिड़ंत हीरो- गरीब नौजवान से होती है तो अमीर आदमी उसे दस हजार रूपये के नोट देता है। दस हजार रुपया ले ले और लड़की वापिस दे दे! किन्तु स्वाभिमानी गरीब नौजवान (जो केवल दस हजार के बदले में फिल्म के हीरो की भांति काम कर रहा है।) दस हजार रूपये अमीर आदमी के मुँह पर दे मारता है। इस पर गरीब दर्शकों के हर्ष का ठिकाना नहीं रहता। बस उनका कुर्सियाँ तोड़ना शेष रह जाता है।

अब इस सिलसिले में एक रहस्य की बात यह है कि अमीरों के विरुद्ध गरीबों के मन में फिल्मों द्वारा घृणा उत्पन्न करना भी स्वयं अमीरों और सेठों का एक लाभदायक व्यवसाय है। फिल्में केवल अमीर लोग बनाते हैं और एक-एक फिल्म पर लाखों रूपये खर्च करते हैं। ये फिल्मों में अमीर और गरीब की टक्कर और अमीर को गालियाँ और गरीब को विजय इसलिए दिलवाते हैं कि ऐसा करने से लोग अधिक-से-अधिक संख्या में फिल्म देखते हैं और इन्हें खूब मुनाफा होता है। अब इस मुनाफे की खातिर यदि अमीरों को नित्य ढाई घंटे के तीन शो के हिसाब से साढ़े साथ घंटे टक्क गालियाँ पड़ती रहें तो क्या हर्ज है! दौलतमंद आदमी यूँ भी दौलत के मामले में बड़े बेगैरत होते हैं!!

यह आंतरिक रहस्य चाहे कुछ भी क्यों न हो, यह तो एक तथ्य और वास्तविकता है कि हमारे सिनेमाघर शनैः शनैः हमारी जनता में वर्ग-चेतना उत्पन्न करते जा रहे हैं और गरीब इन्सानों को उत्साहित कर रहे हैं कि घबराने की कोई बात नहीं है। एक दिन तुम्हारा भी जमाना आएगा इसलिए गाये चला जा, गाये चला जा! टैक्सी ड्राइवर है तो क्या हुआ, सेठ जी की लड़की को भगा ले आ और अपना मैला-कुचैला लंगोट उससे धुलवा। उससे अपना वर्षों का ठंडा चूल्हा गर्माया करो और फिर खटिया पर लेट कर बड़े आराम से अपनी दौलतमंद महबूबा से कहो-

“मान मेरा एहसान अरी नादान कि मैंने तुझसे किया है प्यार!”

और सिनेमाघर को धन्यवाद दो जिसने तुम्हें जीवन का इतना महत्वपूर्ण सबक सिखाया है, पाठ पढ़ाया है।

मुहब्बत ज़िंदाबाद!

सिनेमा ज़िंदाबाद!

सेठ की लड़की ज़िंदाबाद!

हमारा इश्क़ ज़िंदाबाद!

हम दोनों—ज़िंदाबाद

हमारी  गरीबी….ज़िंदा…नहीं यह गलत हो गया!

Ibrahim Jaleesइब्राहीम जलीस उर्दू के बड़े तरक्कीपसंद अफसानानिगार और व्यंग्यकार रहे हैं। उर्दू में इनका स्थान वही है जो हिन्दी में हरिशंकर परसाई जी का है। इब्राहीम जलीस मूलतः हैदराबाद के रहने वाले थे। लेकिन आज़ादी-विभाजन के समय पाकिस्तान चले गए। पाकिस्तान में उनका ज़्यादातर समय लाहौर और कराची में बीता। वहाँ भी वे तरक्कीपसंद जमात के ही हिस्सेदार रहे । उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं- उल्टी कब्र, नेकी कर थाने में जा, ऊपर शेरवानी अंदर परेशानी, हँसे और फंसे, शगुफ्ता शगुफ्ता और काला चोर आदि। 

अनुवादक- अख्तर वागेश्वरी

नई कहानियाँ , मई 1967 से  साभार 

सिनेमा: अभिव्यक्ति का नहीं अन्वेषण का माध्यम: कमल स्वरुप

By  कमल स्वरुप

भारतीय सिनेमा के सौ होने के उपलक्ष्य में अपने तरह का एकदम अलहदा फिल्म-निर्देशक कमल स्वरुप से  ‘हंस- फरवरी- 2013- हिन्दी सिनेमा के सौ साल’ के लिए  उदय शंकर द्वारा लिया गया एक साक्षात्कार

(८०९० के दशक में सिनेमा की मुख्या धारा और सामानांतर सिनेमा से अलग भी एक धारा का एक अपना रसूख़ था. यह अलग बात है कि तब इसका बोलबाला अकादमिक दायरों में ज्यादा था. मणि कौल, कुमार साहनी के साथसाथ कमल स्वरुप इस धारा के प्रतिनिधि फ़िल्मकार थे. वैकल्पिक और सामाजिकसंचार साधनों और डिजिटल के इस जमाने में ये निर्देशक फिर से प्रासंगिक हो उठे हैं। संघर्षशील युवाओं के बीच गजब की लोकप्रियता हासिल करने वाले इन फिल्मकारों की फिल्में (दुविधा, माया दर्पण और ओम दर बदर जैसी) इधर फिर से जी उठी हैं। आज व्यावसायीक और तथाकथिक सामानांतर फिल्मों का भेद जब अपनी समाप्ति के कगार पर पहुँच चुका है, तब इन निर्देशकों की विगत महत्ता और योगदान पुनर्समीक्षा की मांग करता है।

कमल स्वरुप फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टिट्यूट पुणे के1974 के स्नातक हैं। घासीराम कोतवाल(1976), अरविन्द देसाई की अजीब दास्तान (1978), गाँधी(1982), सलीम लंगड़े पर मत रो (1989), सिद्धेश्वरी (1989)जैसी फिल्मों में सहायक निर्देशक, संवाद लेखक, प्रोडक्शन डिजाइनर और शोधार्थी के बतौर इनका रचनात्मक सहयोग रहा है। बतौर निर्देशकनिर्माता कमल स्वरुप ने अभी तक सिर्फ एक फिल्म बनाई हैओम दर बदर(1988), भारतीय उपमहाद्वीप में अपनी तरह की एक मात्र कल्ट फिल्म, फिल्म फेयर पुरस्कार से पुरस्कृत। ओम दर बदर के अलावे कुछ डाक्यूमेंटरी फिल्में भी। दादा साहेब फाल्के और भारतीय फिल्मइतिहास का अद्भुत अध्य्येता। फ़िलहाल दादा साहब फाल्के का महावृतांत रचने में मशगुल।  

Tracing Phalke By kamal swaroop

Tracing Phalke By kamal swaroop

  • प्रश्न एक: भारतीय सिनेमा की एक सदी बीत गई। तो, सबसे पहला सवाल यही कि सिनेमा क्या है? और इस आलोक में भारतीय-सिनेमा की विशेषताएं क्या हैं?

 कमल स्वरुप– हमारा अधिकांश सिनेमा या तो वास्तविक जीवनकाल का एक संक्षिप्त संस्करण होने का प्रयत्न है या फिर किसी साहित्यिक कृति की जस की तस अनुकृति होने की कोशिश। मैं चाहता हूँ कि ऐसे फिल्मकार हो जो अपनी कृति को सदा सफल और लोकप्रिय मुहावरों में तिरोहित कर देने की जगह सिनेमा को साहित्य के नाट्यकृत पुनरुत्पादन की भूमिका से खुद को अलग कर पाठ,गति, ध्वनि और बिम्ब के सम्बन्ध को पुनर्व्यख्यायित करने का प्रयत्न करें। सिनेमा अभियक्ति का नहीं अन्वेषण का माध्यम है। सिनेमा के वस्तुगत यथार्थ का लेखक के अंतर्जगत, नैतिकता या सौंदर्यशास्त्र से कोई सम्बन्ध नहीं है। ये तत्व यथार्थ को दोष-पूर्ण बनाते हैं। सिनेमा- भावुकता और प्रतीकात्मता से रहित शुद्ध कला कृति है । ऐसा आलें रॉबग्रिए का कहना है और मैं उनसे पूर्णतया सहमत हूँ।

संख्या की दृष्टि से देखा जाए तो भारत दुसरे देशों की तुलना में बहुत आगे है। यूरोप का फिल्म-उद्योग हॉलीवुड के हमले के सामने घुटने टेक चुका है। केवल भारत है जिसका फिल्म-उद्योग आत्मनिर्भर है। किन्तु, सिनेमा की दृष्टि से देखा जाए तो भारतीय फिल्में अभी तक नौटंकी और नाट्य-संगीत से ऊपर नहीं उठी हैं। शायद यही कारण है कि वह अब तक हॉलीवुड से बचा हुआ है।

  • प्रश्न दोः भारतीय सिनेमा राजा हरिश्चंद्रसे शुरू होकर ओमदरबदरसे होते हुए वर्तमान तक आकर आता है. और इस यात्राक्रम में भारतीयसिनेमा मिथक, विज्ञान, और संस्कृति का सम्मिलन लगता है. इन श्रेणियों(synthesis) की अभिव्यक्ति के रूप में सिनेमा को कैसे देखते हैं!! (The movie omdarbadar comingles mythology, science, tradition and creats the existentiality of the present. How do you see film as the expression of the synthesis of these categories !

कमल स्वरुप– आज जो भी मूल्य हैं सब अतीत के हैं। प्रारंभ में फिल्मों का उपयोग दूसरे माध्यमों में प्रकट कलाकृतियों को किसी स्थायी माध्यम में परावर्तित करने का प्रयास था। कथा-कहानियाँ, नाटक या फिर रविवर्मा के पौराणिक चित्र। इन कृतियों के प्रतीकों में समकालीनता को तलाशते हुए उनके राजनैतिक रूपांतरण की कोशिश हुयी। फिर आये ऐतिहासिक आख्यान और संतों के जीवन- चित्र। फिल्में अतीत की स्मृतियों के व्यापक प्रचार-प्रसार का माध्यम बना। फिल्मों में ध्वनि के आगमन के बाद अतीत की उन्हीं मूक कहानियों  को फिर से दोहराया गया, चित्रित किया गया। और, फिर आये सामाजिक समकालीन नाटकों और साहित्यिक कृतियों का फ़िल्मी रूपांतरण।

सिनेमेटोग्रफिक यंत्रों  का अविष्कार और विकास-क्रम अपने आप में एक स्वयंसिद्ध घटना थी।वह कला का माध्यम कब बनी और कैसे बनी ,वह दूसरी बात है लेकिन हमें यह  बात भी नहीं भूलना चाहिये कि सिनेमेटोग्राफी जादूगरों, जांत्रिकों और तांत्रिकों के मिले जुले प्रयत्न थे, उनकी इच्छा शक्ति थी। कुछ लोगों का मानना है कि यह केवल एक प्राकृतिक संयोग भर था। अनेक नए उपन्यासकारों में सिनेमा के प्रति उत्पन हुये आकर्षण का कारण क्या था? वे कैमरे की वस्तुपरकता से नहीं बल्कि उसकी आत्मपरकता और कल्पनात्मक संभावनाओं से प्रभावित हुये थे। वे सिनेमा को अभिव्यक्ति का नहीं, बल्कि अन्वेषण का माध्यम मानते थे। और, उन्हें सर्वाधिक दिलचस्पी उस पदार्थ में हुई जिसे लेखन में व्यक्त करना ज़रा भी संभव नहीं था। दोनों इंद्रियों, आँख और कान पर एक साथ खेल करना। इन बोलते चलचित्रों में कोई आदिम गुण है। वह वर्तमान का हिस्सा है। सनातन वर्तमान का समूचा बल और वेग। सिनेमा, बिम्बों की प्रकृति का नहीं बल्कि उनकी संरचना का सवाल था। ये नयी फ़िल्मी सरंचनाएँ, बिम्बों और ध्वनियों की ये हलचलें दर्शक की समझ में फ़ौरन आ जाती हैं। इनकी ताकत साहित्य से बहुत बड़ी है। यही युग न्यू थियेटर, बाम्बे टाकीज और  प्रभात का था।फिर बने तारे सितारे। उनके प्रजनन के अनुष्ठान, मानों सिनेमेटोग्राफिक मशीन की मूल प्रकृति, मेकेनिकल्स मीन्स ऑफ़ रिप्रोडक्शन को मुंह चिढ़ाते। ये नए फोटोजेनेटिक्स (photo-genetics) पीढियों दर पीढ़ियों का राष्ट्रीय कैलेंडर रचने लगा। कथा केवल उनके प्रेमपुराण थे। हम उनके जन्म-मृत्यु से अपना जीवन नापने लगे। साहित्य-सिनेमा ने इस प्रजनन की निष्ठुरता और असहिष्णुता के सामने घुटने टेक दिए। पूँजी के हाथ एक कालजयी हरम लगा था। इस मादक अग्निस्नान में दर्शक स्वाहा होने लगे। काल की बलि चढ़ा।

मैं अब सीधे ओम दर बदर  पर आना चाहूँगा। कुछ घुमा-फिरा कर। किसी महान रचनाकार के शब्द हैं, जिनका नाम मैं नहीं बताना चाहता हूँ- नक़ल से अक्ल वो रहे सदा। वह फिल्म मेरी कल्पना के टुकड़े थे और मैं भाषा के समान सरचना का आनंद ले रहा था। किन्तु मैं चाहता था कि एक ऐसे संसार का संवाहक बनूँ जो कि न तो बिम्ब है, न ध्वनि। यही वह संसार है जिस तक मैं विभिन दिशाओं से, अनेक सड़कों से होकर पहुँचाना चाहूँगा और वह सत्य मेरे बचपन का दानव होगा। वह उसी दानव से बचने के लिए बुनी गयी कहानी थी। मृत्यु से बचने का मेरा उपहास-जनक अनुष्ठानिक-प्रयत्न और उसका भयावह अंकन। ओम फिल्म नहीं है, वह फिल्मों से पलायन का चित्रण है। मैं सिनेमा के संसार में भाग कर आया था, यथार्थ से छुपने किन्तु मैंने पाया कि सिनेमा मृत्यु भी है और पुनर्जीवन भी और ओम के द्वारा मैं भाग निकला, यह मैं दावे के साथ कहता हूँ। मुझे अपनी मॉक (mock)- मृत्यु का खेल खेलने में खूब मज़ा आया। ओम फिल्म नहीं, खुद को एक झांसा था और न ही मैं कोई फिल्मकार।

Om darbadar(1988)

Om darbadar(1988)

  • प्रश्न तीनः सिनेमा अभिव्यक्ति के सशक्त माध्यम के रूप में क्या हमारे सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन को दिशानिर्धारित करने में सक्षम है? स्वातंत्र्योत्तर भारतीय सामाजिकराजनीतिक परिदृश्य में हस्तक्षेप करने में यह कितना सक्षम हुआ है!! पूरी भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में (एकदो अपवादों को छोड़) कोई भी अच्छी राजनैतिक फिल्म नहीं बन पाई है। इसमें सेंसर बोर्ड की ज़िम्मेदारी है या साहस की कमी?

कमल स्वरुप– मेरे लिए सिनेमा अभिव्यक्ति नहीं कितु अभिव्यक्ति के विभिन्न व्याकरणों की जांच-पड़ताल है। जैसा कि शुरू मैंने में ही कहा कि सिनेमा अन्वेषण है। वैसे भी रियल नारियल है, क्यों और सरपलस (surplus) पैदा किया जाये। हमें ‘भंगी’ फिल्मकारों की ज़रुरत है जो झाड़ू फेरे और इस रियल नारियल के खिलाफ जंग छेड़े। वर्ना पता नहीं लगता नेहरू जी की मुद्रा दिलीप कुमार से आई थी या दिलीप कुमार की नेहरू जी से। नर्गिस मदर इण्डिया पहले बनी या फिर शक्ल समान होने का कोई खानदानी राज़ है।

मज़े की बात है कि फालके खुद स्वदेशी आन्दोलन के हिस्सा थे और तिलक के जीवन से प्रभावित थे। जब उन्होंने लाइफ ऑफ़ क्राइस्ट देखी तो लगा हम अपने भारतीय बिम्ब कब परदे पर देखेंगे। ये विदेशी कल्पनाएँ हमारी चेतना को धीरे धीरे नष्ट कर देंगी। शुरू की फिल्मों के बिम्बों में गूढ़ राजनैतिक संदेश छुपे हुये रहते थे और अंग्रेजों को सेंसर बोर्ड की स्थापना करनी पड़ी थी। पौराणिक आख्यानों के बाद ऐतिहासिक फिल्मों के ज़रिये एक राष्ट्रवादी उतेजना को पैदा किया जाने लगा था। उसके बाद सामाजिक फिल्मों के ज़रिये समाज में व्याप्त रुढ़िवादी रीति-रिवाजो पर प्रहार किये जाने लगे।भक्ति काल के संतो पर बनी सभी फिल्में खूब सफल रहीं । फिल्मों के ज़रिये से एक आत्मविश्वास जगाया जा रहा था।

अब रही बात आज की। सबसे पहले मैंने राजनैतिक फिल्मों की बात कुमार शाहनी से सुनी थी उन दिनों मैं उनकी फिल्म तरंग में काम कर रहा था। वे वामपंथी विचारधारा से जुड़े थे। मैंने समझा कि राजनैतिक फिल्में, सत्ता के शक्ति-संघर्षो की कथा होती है। उसे दर्शाने के लिए वे वामपंथी विचारों का या कहें तो फार्मूला का उपयोग करते थे। फिर जाना कि सत्ता-संघर्ष केवल देश में ही नहीं, यहाँ तक कि परिवार में भी चलती है और वह किसी भी आधार पर हो सकती है।

अब मैं मनाता हूँ कि एक ही बात को विभिन कोणों से देखने पर अलग ही घटना का निर्माण होता है।और, वे सारेदृष्टिकोण अलग-अलग विचारधारा का निर्माण करती हैं जो कि हमारे निजी स्वार्थों से नियंत्रित होती हैं। निजी स्वार्थों से परे जाने के लिए हमे एक वस्तुनिष्ठ विज्ञान का सहारा लेना पड़ता है जो कि एक असम्भव कार्य है। यहाँ पर समानुभूति की अपेक्षा की जा सकती है, जिस की कमी आज हम सब में है। मैंने यह बात केवल घटक में देखी है।

  • प्रश्न चारः समकालीन बॉलीवुड सिनेमा में  तकनीकी  विकास तो झलकता है किन्तु विषयवस्तु के स्तर पर अधकचरापन बारबार उभरकर आता है। बड़े निर्देशकों की फिल्मों में भी! इसे बौद्धिकता के अभाव से जोड़कर देखा जाए या ईमानदारी के अभाव से? एक कलामाध्यम के रूप सिनेमा की   स्वायत्तता को आप कैसे देखते हैं?

कमल स्वरुप– डिजिटल के आने से मुझे लगता है कि हम पहली बार स्वायत्तता को क्लेम कर सकतें हैं। सिनेमा अनुभूति और संवेदना, व्यष्टि और समष्टि के सम्बन्ध का विज्ञान है। विभिन्न नाट्य एवं ललित कलाओ का समिश्रण है। किसी घटना के काल और दिक् के आयामों का रूपांकन है। इस स्तर की सूक्ष्मता का बॉलीवुड में पूर्णतया अभाव है। हमारे यहाँ अब तक प्रोडक्शन डिजाइन (production design) नाम की चीज़ का पता नहीं है। फिल्म का मतलब है स्टार कौन है और इसी बात पर पैसा उठता है। बॉलीवुड की अपनी भाषा है और उसका जीवन से कोई सम्बन्ध या जीवन के प्रति कोई प्रतिबद्धता नहीं है। और उन्हें देखना हमारी आदत बन चुकी है, हमारे काल का निर्णय उसी से होता है। जब आमिर खान चलता है तो सब लड़के उसी जैसे लगने लगते हैं। जब अमिताभ चला था तो सब उसी जैसे लगने लगे थे .

  • प्रश्न पांचः बालीवुड सिनेमा की भाषा पहले उर्दू हुआ करती थी फिर हिन्दीउर्दू का मिलाजुला खूबसूरत रूप। अस्सी के दशक के बाद हिन्दी में बोले गए संवादों को दुबारा अंग्रेजी में दोहराने का चलन बढ़ा जिससे फिल्मों की लंबाई भी अनावश्यक रूप से बढ़ती थी और अब ज्यादातर सिनेमा के नामों में भी अंग्रेजी के नाम जोड़े जाने लगे हैं। ऐसा क्यों हो रहा है?

कमल स्वरुप– बोलती फिल्मों के शुरू होने पर अधिकतर लेखक हिंदी उर्दू से आये थे, अधिकतर लाहौर से। अब तो हिंदी-उर्दू कोई भी नहीं पढ़ता। कुछ लोग एनएसडी से भले आते हैं, पर अब मुंबई में हिंदी-उर्दू नाम मात्र के लिए बची है। धीरे धीरे बोलचाल की भाषा अंग्रेज़ी में बदल रही है। स्क्रिप्ट इंग्लिश में लिखी जा रहीं हैं। सवांद हिंदी में ज़रूर होते हैं पर अधिकतर अंग्रेजी फिल्मो के अनुवाद। हॉलीवुड इस बात को समझ रहा है और अपनी अधिकांश फिल्मों को भारतीय भाषाओं  में डब करके एक नया बाज़ार खड़ा कर रहा है।

  • प्रश्न छः: क्या हिन्दी सिनेमा की दुनिया भी दो हिस्सों में बंट गई हैएक इलीटिस्ट सिनेमा जो मल्टीप्लेक्स में चलता हैदूसरा जो मझोले शहरों और कस्बों में

कमल स्वरुपमल्टीप्लेक्स वाले दर्शक भारतीय फिल्मो में हॉलीवुड या योरोपियन फिल्मो का व्याकरण ढूंढने जाते हैं ,छोटे शहरों के लोग शायद अभी तक उससे परिचित नहीं हैं। पर एक ज़माना था जब यह अंतर नहीं था। हमारा अपना खुद का विकसित व्याकरण था। प्रभात, न्यू थिएटर, राजकमल आदि काफी आगे थे और किसी भी वर्ग के दर्शक से संवाद करने में सक्षम थे.

  • प्रश्न सात: भारतीय सिनेमा के सर्वांगीण के विकास के लिए क्या कुछ होना चाहिए?

कमल स्वरुप– उत्पादन का विकेंद्रीकरण। तत्पश्चात, प्रांतीय कृतियों का अनुवादों के जरिये आदान-प्रदान। नाट्य एवं ललित कलाओं के कर्मियों का एक-जुट मंच, हर शहर-प्रान्त में।साहित्यिक-पत्रिकाओं की तरह सिने-कृतियों का वितरण। हर छोटे शहरमें फिल्मोत्सव और सिने-शिक्षा के शिविर।

  • प्रश्न आठ: ओमदरबदर की परंपरा से प्रभावित युवा निर्देशक सिनेमा के व्याकरण को बदलने की कोशिश कर रहे हैं. क्या इसे सार्थक बदलाव के रूप में देखा जा सकता है?

कमल स्वरुप– कुछ दिन पहले मैंने आनंद गाँधी की Ship of Theseus देखी और उसे अपने काफी करीब पाया। पूर्णतः एक वैचारिक फिल्म, जो की ब्रह्म-विभ्रम की प्रस्तुति के पार जाती है।

Kamal swaroop

Kamal swaroop

साभार – हंस- फरवरी- 2013- हिन्दी सिनेमा के सौ साल

हिन्दी सिनेमा की भाषा- एक के भीतर अनेक: चन्दन श्रीवास्तव

By चन्दन श्रीवास्तव 

Hans-Cover-February-2013

हंस फरवरी-2013- हिन्दी सिनेमा के सौ साल

मौका हिन्दी-दिवस का था, चूंकि हिन्दी-दिवस पर दस्तूर ‘हिन्दी-हित-चिन्ता’ का है सो एक मशहूर दैनिक(हिन्दुस्तान) ने अपने वेबपेज पर‘हिन्दी फिल्में, कितनी हिन्दी’ शीर्षक से एक पोस्ट लगायी। जैसा कि शीर्षक से ही जाहिर है, अख़बार ने इस पोस्ट में बड़े संताप के स्वर में जानना चाहा कि हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री में ‘हिन्दी से भरपूर नाम-दाम कमाने वाले अपने कामकाज और जीवन में हिन्दी को कितना सम्मान देते हैं, कितना अपनाते हैं ? ”

अख़बार की इस ‘हिन्दी-चिन्ता’ में जावेद अख्तर यह कहते हुए शामिल हुए कि “ इधर हमारी फिल्म इंडस्ट्री में अंग्रेजी का बोलबाला है।..ज्यादातर हिंदी फिल्मों में स्क्रिप्ट की जो हालत हो रही है, उससे मैं बहुत दुखी हूं। ” जावेद साहब ने अपने दुःख के दो कारण गिनवाये। एक तो यह कि “आज अंग्रेजी के लोग हिंदी फिल्मों के पटकथा लेखन में अपना योगदान दे रहे है ” जबकि  हिंदी या उर्दू का उन्हें “समुचित ज्ञान” नहीं है। दूसरे, जावेद साहब के हिसाब से हिन्दी फिल्मों की स्क्रिप्ट की दुर्दशा के लिए आज के अभिनेता “ज्यादा जिम्मेदार” हैं क्योंकि “उनकी(सिने-अभिनेता की) सबसे बड़ी परेशानी यह है कि वो हिंदी या उर्दू साहित्य के जरा भी नजदीक नहीं है। उर्दू की बात जाने दें, हिंदी पढ़ने में भी उन्हें खासी दिक्कत होती है। इसका सीधा असर अच्छी स्क्रिप्ट पर पड़ता है।” इन दो वजहों से जावेद अख्तर को लगता है कि बॉलीवुड में “हिंदी फिल्में सही हिंदी में कम ही लिखी जाती हैं। सरल हिंदी में लिखी पटकथा में भी बीच-बीच में अंग्रजी शब्दों का उपयोग जम कर किया जाता है। ऐसी स्क्रिप्ट यहां कम ही देखने को मिलती है, जिसमें अंग्रेजी शब्दों के मोह से बचते हुए शुद्ध हिंदी या उर्दू के शब्दों का उपयोग किया जाता हो।”

जैसे आज कुछ लोगों को ‘हिन्दी सिनेमा’ की ‘हिन्दी’ पर अंग्रेजी का बोलबाला नजर आता है वैसे ही बीते वक्त में कुछ लोगों को हिन्दी सिनेमा के साथ ‘उर्दू’ का जिक्र गवारा ना था। पोस्ट में कही गई जावेद अख्तर की बातों को पढ़कर सिने-इतिहास के गंभीर अध्येता रविकांत(सीएसडीएस स्थित सराय वाले) का वह आलेख याद आया जिसे उन्होंने कभी शिमला स्थित भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान की एक संगोष्ठी में पढ़ा था। “सिनेमा, भाषा, रेडियो: एक त्रिकोणीय इतिहास” शीर्षक इस लेख में छोटा-सा जिक्र आता है कि हिन्दी फिल्मों को बेशुमार अमर गीत देने वाले साहिर लुधियानवी सन् 1960 के दशक में एक दफे बिहार गए थे और किसी मुशायरे में कह दिया था कि हिन्दी फिल्मों की भाषा 97 फीसदी उर्दू है। फिल्मों से जुड़ी पत्रकारिता के मामले में जिस “माधुरी’ ( इसका शुरुआती नामी सुचित्रा था, माधुरी नाम बाद में पडा) पत्रिका को मील का पत्थर माना जाएगा वही साहिर लुधियानवी के पीछे पड़ गई।

पत्रिका के  ‘चले पवन की चाल’ नाम के पन्ने पर एक चिट्ठी छपी। इसके लिखने वाले ने अपना नाम लिखा था ‘फिल्मेश्वर’ और चिट्ठी का शीर्षक था- ‘ हिन्दी और उर्दू के नाम पर नफरत के शोले भड़काने वाले अवसरवादी साहिर के नाम एक खुला पत्र ।’ चिट्ठी दिलचस्प है क्योंकि उसके मुताबिक साहिर फारसी लिपि में लिखे होने के कारण जिसे उर्दू समझ रहे हैं वह दरअसल हिन्दी ही है। इस चिट्ठी का एक अंश है- “यह जानकर वाकई बड़ा आश्चर्य हुआ कि आप समझते हैं कि आपने एक फिल्म में हिन्दी गीत लिखे हैं। लेकिन आपने हिन्दी पर यह अहसान पहली ही बार नहीं किया है। आप इससे पहले भी हिन्दी में ही लिखते रहे हैं। आपने फिल्मों में आने से पहले भी जो कुछ लिखा था, वह हमारी निगाह में तो हिन्दी ही थी..यह जरुर है कि आपने जब वह सब कलमबंद किया था जो फारसी लिपि इस्तेमाल की थी। यूं देखा जाय तो अपनी चितरलेखा के गीत भी आपने अपनी तरफ से चाहे हिन्दी में लिखे हों लेकिन कागज पर उतारा उन्हें फारसी लिपि में ही था।इतनी छोटी सी बात का मतलब आप जैसा बड़ा और दानिशमंद शायर शायद फौरन समझ गया होगा- दो लिपियों से भाषा दो नहीं हो जाती और एक ही लिपि में कई भाषाएं भी लिखी जा सकती हैं। ” वैसे साहिर लुधियानवी को फिल्मेश्वर का यह तर्क गले उतरा होगा ऐसा नहीं लगता क्योंकि भाषा के मामले में साहिर का पक्ष बड़ा साफ है। आजादी के बाद के वक्त में जिस वक्त सरकार को गालिब के मजार के जीर्णोद्धार की फिक्र हुई थी उन दिनों साहिर लुधियानवी ने लिखा था-

जिन शहरों में गूंजी थी गालिब की नवा बरसों- उन शहरों में अब उर्दू बे-नामो निशां ठहरी

आजादि-ए-कामिल का ऐलान हुआ जिस दिन- मातूब जबां ठहरी, गद्दार जबां ठहरी।

जिस अहद-ए-सियासत ने ये जिन्दा जबां कुचली- उस अहद-ए-सियासत को मरहूमों का गम क्यों है

गालिब जिसे कहते हैं उर्दू ही का शायर था- उर्दू पे सितम ढाकर गालिब पर करम क्यों है।

sahir-ludhyanvi

साहिर लुधियानवी

और साहिर ही क्यों, हिन्दी-सिनेमा को केंद्र में रखकर हुए अंग्रेजी-लेखन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यही मानकर चलता है कि हिन्दी-सिनेमा की भाषा मुख्य रुप से उर्दू रही है। इस सोच की एक मिसाल मुकुल केशवन का बहुउद्धृत आलेख- उर्दू, अवध एंड तवायफ- द इस्लामिकेट रुटस् ऑव हिन्दी सिनेमा- है। यह आलेख यही साबित करने के लिए लिखा गया है कि- “ हिन्दी-सिनेमा का महल बहुमंजिला तो है लेकिन इसका स्थापत्य इस्लामी रुपाकारों से प्रेरित है। इन इस्लामी रुपकारों का सबसे प्रकट उदाहरण है उर्दू। विडंबनापूर्ण लेकिन सच बात यह है कि आजाद भारत में उर्दू का आखिरी मजबूत मकाम हिन्दी-सिनेमा ही साबित हुआ, भाषाई हठधर्मिता के सागर में उर्दू का आखिरी स्वर्ग। और जो ऐसा हुआ तो यह सही ही है क्योंकि हिन्दी सिनेमा की काया उर्दू की जबांदानी और लोकाचारी संस्कारों से बनी है। ” इसी बात का एक विस्तार नसरीन मुन्नी कबीर की किताब ‘टॉकिंग फिल्मस्: कॉन्वर्सेशनस् ऑन हिन्दी सिनेमा विद् जावेद अख्तर’  में मिलता है। इसमें जावेद अख्तर एक जगह कहते हैं- “भारत की बोलती फिल्मों ने अपना बुनियादी ढांचा उर्दू फारसी थियेटर से हासिल किया। इसलिए बोलती फिल्मों की शुरुआत उर्दू से हुई। यहां तक कि कलकत्ता का नया थियेटर भी उर्दू के लेखकों का इस्तेमाल करता था। बात यह है कि उत्तर भारत के शहरी इलाके में उर्दू देश के बंटवारे से पहले बोल-चाल की जबान थी और इसे ज्यादातर लोग समझते थे और यह पहले की तरह आज भी बड़ी नफीस जबान है जिसके भीतर हर तरह के जज्बात और ड्रामे की तर्जुमानी की सलाहियत है।”

ऐसा कहते हुए मुकुल केशवन या फिर जावेद अख्तर कुछ बातों की अनदेखी करते हैं। एक तो यही कि हिन्दी-सिनेमा के भीतर एक लंबी कड़ी हिन्दू-धर्मकथाओं पर आधारित फिल्मों की रही है और उनकी संवाद-भाषा आजादी से पहले और बाद में भी संस्कृत की तरफ झुकी रही। इसके लिए ज्यादा उदाहरण ना देते हुए जिस दशक में फिल्म शोले(1975) बनी थी उसी दशक की दो फिल्मों हरिदर्शन(1972) और जय़ संतोषी मां(1975) को याद कर लेना काफी होगा। फिल्म हरिदर्शन में लक्ष्मी विष्णु के वाराह रुप धारण करने पर अचरज में पड़े नारद से कहती हैं- “  प्रभु तो जैसा कारण हो वैसा ही रुप लेकर पापियों के पास जाते हैं। आप उनके प्रिय प्रतिनिधि होकर भी ये नहीं जान पाये।’’ और ‘जय संतोषी मां’ फिल्म की शुरुआती पंक्ति ही है- “संतोषी मां की महिमा अपार है। हर भक्त ने उनकी महिमा का गुणगान अपने अपने ढंग से किया है।इस चित्र की कथा भी कुछ धार्मिक पुस्तकों और लोककथाओं के आधार पर है। आशा है, आप इसे सच्ची भावना से स्वीकार करेंगे।”

दूसरी बात पारसी थियेटर से हिन्दी फिल्मों के रिश्ते से जुड़ी है। हरीश त्रिवेदी ने अपने आलेख- ऑल काईंड ऑव हिन्दी: द इवॉल्विंग लैंग्वेज ऑव हिन्दी सिनेमा- में ध्यान दिलाया है कि पारसी थियेटर के लिए नाटक लिखने वालों में सिर्फ आगा हश्र कश्मीरी का ही नाम नहीं आता, नारायण प्रसाद ‘बेताब’ और पंडित राधेश्याम कथावाचक का भी आता है। नारायण प्रसाद ‘बेताब’ ने अपने नाटकों के लिए जो भाषा नीति बनायी वह उन्हीं के शब्दों में कुछ ऐसी थी-“ना ठेठ हिन्दी ना खालिस उर्दू,जुबान गोया मिली जुली हो- अलग रहे दूध से ना मिश्री, डली-डली दूध में घुली हो । ” बहरहाल, नारायण प्रसाद बेताब की भाषा का एक छोर फारसीनिष्ठ था तो दूसरा छोर संस्कृतिनिष्ठ। वे ‘रुस्तम व सोहराब’के लिए  यह लिख सकते थे- “अगर तुम मादरे-ईरान के फरजंद होते तो मैं कनीज बनकर तुम्हारी खिदमत में अपनी जिंदगी..” तो भीष्म-प्रतिज्ञा के लिए ऐसी भाषा भी गढ़ सकते थे- “जिस स्त्री के पास रुप है हृदय नहीं है, सेवा है प्रेम नहीं है, पुत्र की लालसा है किन्तु पुत्र की ममता नहीं है- उसके पास दया !”  और तीसरी बात थोड़ी महीन है, जिसकी तरफ इतिहासकार विनय लाल ने अपने लेख हिन्दुईज्म एंड बॉलीवुड- अ फ्यू नोटस् में ध्यान दिलाया है। विनय लाल की मानें तो हिन्दी सिनेमा का एक बड़ा हिस्सा हिन्दू-मानस और संस्कृति का झरोखा है। ‘अमर अकबर एंथोनी’, ‘कुली’ और ‘मर्द’ सरीखी हिट फिल्मों के निर्देशक मनमोहन देसाई को विनयलाल ने यह कहते हुए उद्धृत किया है कि मेरी फिल्में महाभारत की कथाओं पर आधारित हैं। विनयलाल की मान्यता है कि हिन्दी फिल्में हिन्दू-धर्म के मिथकों का पुनराख्यान हैं। वे इस कोटि में श्याम बेनेगल की फिल्म कलयुग(1980) को भी ऱखते हैं (क्योंकि इसमें महाभारत की ही कथा के समान दो व्यवसायी घरानों की दुश्मनी को दिखाया गया है) तो  “हम पाँच” (1980) को भी( क्योंकि इसमें पांडव सरीखे पाँच भाइयों की टक्कर दुर्योधन सरीखे जमींदार वीरप्रताप और शकुनि सरीखे उसके लाला मामा की कुटिल चालों से होती है)। और हिन्दी-फिल्मों के कथा-काया के भीतर हिन्दू मिथकों की आत्मा खोजने वाले अकेले विनय लाल ही नहीं हैं, उनसे मिलती-जुलती बात संस्कृति-मनोविज्ञानी सुधीर कक्कड़ भी कहते हैं। सुधीर कक्कड़ की मानों तो हिन्दी फिल्मों के नायकों का छलिया और खिलंदड़ रुप( जैसे फिल्म राजा बाबू में गोविन्दा) कृष्ण के चरित्र पर गढ़ा गया वैसे ही धीरोदात्त रुप( जैसे फिल्म जंजीर में अमिताभ) राम के चरित्र पर।

बात आज के जावेद अख्तर की हो या कल के साहिर लुधियानवी अथवा किसी छद्मनामधारी ‘फिल्मेश्वर’ की – सभी मानकर चलते हैं कि नाम अगर ‘हिन्दी सिनेमा’ है तो जो कथा दर्शक को दिखाई जा रही है उसमें बोली जाने वाली भाषा का रुप जरुरी तौर पर कोई एक ही होगा।‘फिल्मेश्वर’ की नजर में यह भाषा हिन्दी है, साहिर लुधियानवी की नजर में उर्दू और जावेद अख्तर के हिसाब से हिन्दी/उर्दू। हिन्दी फिल्मों के संवाद-पक्ष बारे में प्रगतिशील इदारे में ज्यादातर बातें इसी मान्यता की छांव में होती हैं। बस अन्तर इतना रहता है कि नफासत की नोंक चूंकि वहां ज्यादा ही बारीक होती है इसलिए हिन्दी फिल्मों की भाषा को ‘हिन्दुस्तानी’ कह दिया जाता है, यानि एक ऐसी भाषा जो चले हिन्दी-व्याकरण की पटरियों पर और शब्द ना तो संस्कृत के लादे और ना ही फारसी के। इस भाषा को इंगित करने के लिए कभी इसे ‘आम-फहम’ कहा जाता है तो कभी ‘बोल-चाल’ की भाषा और जोर यह दिखाने पर रहता है कि यह भाषा तद्भव-प्रेमी है- उन्हीं शब्दों को अपने भीतर समेटती है जिसके नक्काशीदार कोने जनता की जुबान पर घिस गए हों, चाहे ये शब्द पूरबिया गांवों के हों, संस्कृत और फारसी के या फिर अंग्रेजी के।

‘हिन्दी फिल्मों के संवाद हिन्दुस्तानी में लिखे जाते हैं या उन्हें हिन्दुस्तानी में होना चाहिए’- यह बात जैसे ही कोई कहता है, बात भाषा से उठकर भारतीय राष्ट्रवाद के मनचीते स्वरुप पर चली आती है। भारत के सेकुलरवाद की कुश्ती ज्यादातर धर्मगत(हिन्दू-मुसलमान) पहचानों से रही और इसी के अनुकूल ‘देश के बंटवारे’ की लहुलुहान चादर ओढ़कर आजादी के शुरुआती दशकों में देश के भावी नागरिक से चाहा यह गया कि- तू हिन्दू बनेगा ना मुसलमान बनेगा, इंसान की औलाद है, इंसान बनेगा-  और इस मुकाम तक पहुंचने के पहले के सोपान के तौर पर सोचा गया कि- हिन्दू-मुसलिम-सिक्ख ईसाई- आपस में हैं भाई-भाई। पीछे से चला आ रहा भाषाई इतिहास-बोध कहता था कि हिन्दी संस्कृत से निकली है, वेद संस्कृत में हैं और वेद चूंकि हिन्दुओं का आदिग्रंथ है इसलिए हिन्दी हिन्दुओं की भाषा है।इस सोच का एक और संस्करण था (और यह ज्यादातर मौन रहा क्योंकि पाकिस्तान बन चुका था और उस राष्ट्र की भाषा उर्दू घोषित हो चुकी थी) जो मन ही मन मानता था कि उर्दू का रिश्ता अरबी से, अरबी का रिश्ता कुरान से और कुरान का अनिवार्य रिश्ता मुसलमान से है। हिन्दू-हिन्दी बनाम मुसलिम-उर्दू के इस तनाव को कैसे साधा जाय- भारतीय सेकुलरवाद की बड़ी चिंता तो यह थी। विकल्प के तौर पर तान अंग्रेजी पर जाकर टूटी क्योंकि पश्चिमी काट की ‘आधुनिकता’ ने पहले से स्थापित कर रखा था कि सारे पौराणिक पहचानों से परे वह जो एक ‘इंसान’ होता है- वह सिर्फ तर्कबुद्धि की भाषा बोलता-लिखता है और तर्कबुद्धि की भाषा अगर कोई है तो अंग्रेजी। नए आजाद देश में यह बात धमाके से कही नहीं जा सकती थी क्योंकि मान्यता यह रही कि राष्ट्र बनना है तो राष्ट्रभाषा होनी ही चाहिए। विकल्प के तौर पर एक प्रत्यय गढ़ा गया ‘साझी संस्कृति’ का और इस साझी संस्कृति को बाकी बातों के अलावा भाषा में भी खोजा गया- एक ऐसी भाषा जिसमें अपनी-अपनी ‘रुढियां’ यानि संस्कृत और अरबी-फारसी खोकर, हिन्दू-मुसलमान दोनों अपनी अभिव्यक्तियों के लिए एक नया घर बना सकें। यह खोज आखिर को जिस भाषा पर खत्म हुई उसे 1930 के दशक में हिन्दुस्तानी कहा जा चुका था और महात्मा गांधी की मेहरबानी से उसकी चाल-ढाल भी तय की जा चुकी थी। आजादी के बाद के शुरुआती दशक में चूंकि बड़ी तेजी से संस्कृतनिष्ठ सरकारी हिन्दी का प्रचलन हुआ, इसलिए हिन्दुस्तानी के कंधे पर एक तमगा और जुड़ा कि यह  हिन्दू-वर्चस्व वाली प्रतिगामी भाषा नहीं है- बल्कि सत्ता के विरोध की भाषा है। सेकुलरवादी सोच की इसी भाषाई प्रसंग के भीतर हिन्दी फिल्मों की भाषा को प्रगतिशील इदारों में ‘हिन्दुस्तानी’ कहकर याद किया गया।

हिन्दी फिल्मों में चलने वाली इस हिन्दुस्तानी भाषा के उदाहरण बहुतेरे हैं, मिसाल के लिए याद करें फिल्म दीवार का वह यादगार संवाद जिसमें शिव की मूर्ति के आगे अमिताभ बच्चन को यह कहते हुए दिखाया गया है- “आज, खुश तो बहुत होगे तुम। देखो, जो आज तक तुम्हारें मंदिर की सीढियां नहीं चड़ा। जिसने आज तक तुम्हारे सामने सर नहीं झुकाया। जिसने आज तक कभी तुम्हारे सामने हाथ नहीं जोड़े। वो आज तुम्हारे सामने हाथ फ़ैलाए खड़ा है। बहुत खुश होगे तुम। बहुत खुश होगे कि आज मैं हार गया। लेकिन तुम जानते हो कि जिस वक्त मैं यहाँ खड़ा हूँ, वो औरत जिस के माथे से तुम्हारे चौखट का पत्थर घिस गया, वो औरत जिस पर ज़ुल्म बढ़े तो उसकी पूजा बढ़ी, वो औरत जो ज़िंदगी भर जलती रही लेकिन तुम्हारे मंदिर में दीप जलाती रही, वो औरत। वो औरत आज ज़िंदगी और मौत के सरहद पर खड़ी है। और.. ये तुम्हारी हार है…।” इस संवाद में जुल्म और जिंदगी सरीखे उर्दू-परंपरा के शब्द आते हैं तो मंदिर और दीप सरीखे हिन्दी-परंपरा के शब्द भी। आगे इसी संवाद में जुर्म और सज़ा जैसे शब्द आते हैं तो सुहागन और विधवा जैसे शब्द भी।

हिन्दी फिल्मों के संवादों की भाषा को हिन्दी-उर्दू-हिन्दुस्तानी अथवा अंग्रेजी के झगड़े से दूर ले जाकर सोचें तो नजर आएगा कि यह एक बहुलस्वरी दुनिया है, नजर आएगा कि ‘हिन्दी फिल्म’ शब्द एक व्युत्तपत्तिमूलक शब्द(जेनरिक टर्म) भर है- एकभाषा के आवरण में बहुभाषा को समेटने वाला शब्द।। हम यह देख पायेंगे कि हिन्दी-सिनेमा के संवाद ‘साझी संस्कृति’ के तकाजे से ही नहीं गढ़े जाते बल्कि कथा में आये पात्र को विश्वसनीय बनाने के लिए भी गढ़े जाते हैं और कथा के पात्रों को गढ़ा जाता है उस ‘औसत दर्शक’ की कल्पना से जो कालक्रम में हमेशा बदलते रहा है। इस कोने से देखें तो पता चले कि फिल्म मुगले-आजम में दिलीप कुमार का अगर उर्दूं-छौंक वाला यह संवाद है कि-‘मुझ पे जुल्म ढाते हुए आपको जरा ये सोचना चाहिए कि मैं आपके जिगर का टुक़ड़ा हूं कोई गैर या कोई गुलाम नहीं’ तो उसके सामने खड़ी दुर्गा खोटे का संस्कृत की कुरुणा से सना यह वाक्य भी – ‘नहीं सलीम नहीं..तुम हमारी बरसों की प्रार्थनाओं का फल हो।’ याद आएगा कि मुगले-आजम की बहुलस्वरी दुनिया में सिर्फ यही नहीं गाया गया कि- ‘जब रात है ऐसी मतवाली तो सुबह का आलम क्या होगा’ बल्कि उसमें किसी का यह स्वर भी शामिल था- ‘मोहे पनघट पर नंदलाल छेड़ गयो रे..। ’ बहुभाषिकता के कोने से देख सकें तो तुलना कर पायेंगे मुगले-आजम में बोले हुए दिलीप कुमार के संवाद( ‘तकदीरें बदल जाती हैं, जमाना बदल जाता है..मगर इस बदलती दुनिया में मोहब्बत जिस इनसान का दामन थाम लेती है वो इनसान नहीं बदलता’) की फिल्म ‘गंगा-जमुना’ में उन्हीं पर फिल्माये हुए गीत से( ‘रुप को मन मा बसई ब त बुरा का होईहैं, कोहू सो प्रीत लगईब त बुरा का होईहैं’)। याद आएगा कि अमिताभ ने अपनी फिल्मों अगर यह कहा है कि ‘मर्द को दर्द नहीं होता’  तो ‘माई नेम ईज एंथोनी गॉनसाल्विस’ भी। हम देख पायेंगे कि हिन्दी फिल्मों में अगर ‘फिरऔनों के गरुर’ को उनके ही महल में अपने पाँव के खून से कुचलती हुई एक ‘पाकीजा’ औरत है तो वह ‘टोपोरी’ भी जो कहता है- ‘आती क्या खंडाला’।

हमें बीते वक्त का अफसोस चाहे जितना हो लेकिन इस अफसोस से हिंदी-सिनेमा की भाषा(ओं) को नहीं पढ़ा जा सकता क्योंकि इस विधा को हमेशा अपने औसत दर्शक का अनुमान ठीक-ठीक लगाना पड़ता है।1990 के दशक के आते-आते हिन्दी-सिनेमा ने ठीक पहचाना कि उसका औसत दर्शक बदल चुका है। मध्यवर्ग का आकार ही नहीं बढ़ा साथ-साथ उसके स्वाद बढ़े हैं और वह अपने स्वाद को महत्वाकांक्षा की भाषा हिंग्लिश में पहचानता है, उस हिंग्लिश को जिसे अख़बारों के समाचार से लेकर टीवी पर चलने वाले विज्ञापनों तक ने गढ़ा है। ऐसे में यह अफसोस क्यों कि ‘हिन्दी फिल्मों पर अंग्रेजी का बोलबाला’ है ?

हिन्दी और उर्दू के नाम पर नफरत के शोले भड़काने वाले अवसरवादी साहिर के नाम एक खुला पत्र

शायरे इन्कलाब,

साहिर लुधियानवी

सबसे पहले आपको इस बात का धन्यवाद कि आपको अपने राष्ट्र की भाषा हिन्दी से प्यार है और इस बात का भी आप हिन्दी साहित्य से प्यार करते हैं। आपने बड़े गर्व के साथ यह फरमाया कि जरुरत पड़ने पर आप हिन्दी में गीत भी लिखते हैं और अपने चित्रलेखा(वह चित्रलेखा जिसे लोगों ने चितरलेखा समझा) के गीतों का उदाहरण भी दिया। यह जानकर वाकई बड़ा आश्चर्य हुआ कि आप समझते हैं कि आपने एक फिल्म में हिन्दी गीत लिखे हैं। लेकिन आपने हिन्दी पर यह अहसान पहली ही बार नहीं किया है। आप इससे पहले भी हिन्दी में ही लिखते रहे हैं। आपने फिल्मों में आने से पहले भी जो कुछ लिखा था, वह हमारी निगाह में तो हिन्दी ही थी..यह जरुर है कि आपने जब वह सब कलमबंद किया था जो फारसी लिपि इस्तेमाल की थी। यूं देखा जाय तो अपनी चितरलेखा के गीत भी आपने अपनी तरफ से चाहे हिन्दी में लिखे हों लेकिन कागज पर उतारा उन्हें फारसी लिपि में ही था।इतनी छोटी सी बात का मतलब आप जैसा बड़ा और दानिशमंद शायर शायद फौरन समझ गया होगा- दो लिपियों से भाषा दो नहीं हो जाती और एक ही लिपि में कई भाषाएं भी लिखी जा सकती हैं। हिन्दुस्तान के जिस प्रदेश में आपका जन्म हुआ उस पंजाब के वारिस ने अपनी पंजाबी भाषा की हीर फारसी लिपि में  लिखी थी, यह भी आप जानते ही होंगे क्योंकि आप जैसे धरती के शायर अपनी संस्कृति की इतनी बात तो जानते ही हैं। जिसे आप आज उर्दू कहते हैं उसके महान कवि गालिब अपने आपको हिन्दी में लिखने वाला कहते थे, यह भी आप उस मुशायरे में  भूले नहीं होंगे जहां आपने हिन्दी साम्राज्यवाद की भयावनी तस्वीर खींची थी

आपने जनता को इस दिन यह भी बताया था कि हिन्दी नाम से जानी-जाने वाली 97 फीसदी फिल्में उर्दू की होती हैं। तो भाईजान, झगड़ा कहां रहा? जिसे आप उर्दू कहते हैं उसे 99.9 फीसदी लोग हिन्दी कहते हैं। तो दोनों एक ही चीज रही न? उन फिल्मों की नामावली अंग्रेजी में होती है तो आपको अंग्रेजी का साम्राज्यवाद नजर नहीं आता? आपको- यानी उस महान आदमी को जिसने साम्राज्यवाद के प्रति विद्रोह का परचम उठा रखा था। नागरी लिपि में आते ही वह साम्राज्यवाद हो गया। उस नागरी लिपि में जिसमें आपके कविता-संग्रह उर्दू लिपि से भी ज्यादा बिके हैं।जब आपके संग्रह नागरी लिपि में छपे थे तो क्या उनका हिन्दी में अनुवाद किया गया था या हू-ब-हू आपके लिखे जैसे ही छापे गए थे और उन्हें हिन्दी के पाठकों ने पूरी तरह समझकर भरपूर रस नहीं लिया था? उनका हिन्दी में प्रकाशन हिन्दी का साम्राज्यवाद नहीं था?

आखिर बात क्या है? हिन्दी और उर्दू की? या हिन्दी और उर्दू के नाम पर संप्रदाय की? इस धर्मनिरपेक्ष राज्य में आजादी के बीस सालों ने इतना तो करिश्मा किया ही है कि हमारे अंदर ही अंदर जो संकुचित भावनाओं की आग फूट रही है, हमने उसे उसके सही नाम से पुकारना बंद कर दिया है और उसे हिन्दी-उर्दू का नाम देकर हम उसे छुपाने की कोशिश करते करते हैं।

आप अपनी भावुक शायरी में कितनी लफ्फाजी करते रहते हों, यह भी सही है यह भी सही है कि आपके दिल में एक दिन इंसान के प्रति प्रेम भरा था।आप सब दुनिया के लोगों को एकसाथ कंधे से कंधा मिलाकर खुशहाली की मंजिल की तरफ बढ़ते हुए देखना चाहते थे। लेकिन दोस्त, आज ये क्या हो गया? इनसान को इनसान के करीब लाने के बजाय आप हिन्दी-उर्दू की आड़ में किस नफरत के शोले से खेलने लगे? सच कहूं तो आज आपकी आवाज से जमाते-इस्लामी की घिनौनी बू आती है। आपने पिछले दिनों वह शानदार गीत लिखा था-

नीले गगन के तले,

धरती का प्यार पले।

यह पत्र लिखते लिखते मुझे उस गीत की याद हो आई। इसलिए आपको देशद्रोही कहने को मन नहीं होता पर मुशायरे में आपकी तकरीर को पढ़कर आपको क्या कहूं यह समझ में नहीं आता। पूरे हिन्दुस्तान की एक पीढ़ी जिसमें पाकिस्तान की भी वही पीढ़ी शामिल की जा सकती है, आपकी कलम पर नाज करती थी, आपके खयालों से( खयालों उर्दू का नहीं हिन्दी का शब्द है, उर्दू में इसे खयालात कहते हैं हुजूरेवाला) प्रभावित थी। आपने उस पीढ़ी की तमाम भावनाओं को अपनी सांप्रदायिकता की एख झलक दिखाकर तोड़ दिया।

जिस भाषा को आप उर्दू कहते हैं और जिसके लिए आज आंध्र, बंगाल,महाराष्ट्र, मैसूर और केरल- सब जगह दूसरी भाषा का दर्जा दिलवाना चाहते हैं वह इन जगहों में भी उतनी ही परदेशन है जितनी पश्चिमी पाकिस्तान में। उर्दू संस्कृति में अपने बच्चों को पालने के लालच में हिन्दुस्तान छोड़ने वाले महान कवि जोश मलीहाबादी तक खुद मानते हैं कि पाकिस्तान में उर्दू का भविष्य डांवाडोल है क्योंकि वह वहां की भाषा नहीं है। पर वे खुश हैं। क्यों?  इसलिए नहीं कि वहां उर्दू पनप रही है बल्कि इसलिए कि वे एक सांप्रदायिक संस्कृति के बीच में पहुंच गए हैं(हालांकि वे अपने को अनीश्वरवादी कहते हैं)। है न कमाल की बात। आपने एक बार लिखा था-

तू हिन्दू बनेगा ना मुसलमान बनेगा

इनसान की औलाद है इनसान बनेगा

लेकिन आपकी आजकल की गतिविधि देखते हुए तो ऐसा लगता है ये आपकी अपनी भावनाएं नहीं थी, आप सिर्फ फिल्म के एक पात्र की भावनाएं लिख रहे थे। आप एक जमाने में वक्त को बदलने की बात लिखा करते थे। फिर भी फिल्मी आवश्यकता के वशीभूत आपने लिखा था-

कल जहां बसती थीं खुशियां-आज है मातम वहां

वक्त लाया था बहारें- वक्त लाया है खिजां

आदमी को चाहिए वक्त से डरकर रहे

कौन जाने किस घड़ी वक्त का बदले मिज़ाज

सारे हिन्दुस्तान में फिल्मोद्योग कम से कम एक ऐसी जगह थी जहां जाति प्रदेश और धर्म का भेदभाव काम के रास्ते में नहीं आता था, मेलजोल के रास्ते में नहीं आता था। और आप इनसानियत के हामी थे। पर आपने इस वातावरण में सांप्रदायिकता का जहर घोल दिया।

लगता है इनसान की औलाद का भविष्य आपकी नजरों में सिर्फ यह है-

तू हिन्दू बनेगा तू मुसलमान बनेगा

शैतान की औलाद है शैतान बनेगा

मैं आखिर में इतनी ही दुआ करना चाहता हूं: खुदा उर्दू को आप जैसे हिमायतियों से बचाये।

फिल्मेश्वर

( यह चिट्ठी माधुरी के 30 जुलाई 1965 के अंक में छपी। चिट्ठी सिने-इतिहासकार रविकांत जी की सहायता से हासिल हुई। प्रस्तुतकर्ता इसके लिए उनका कृतज्ञ है)

5205826_photo3चन्दन श्रीवास्तव,  मूलतया छपरा(बिहार) के निवासी, पिछले पंद्रह सालों से दिल्ली में। पहले आईआईएमसी और फिर जेएनयू में पढ़ाई। “उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हिन्दी लोकवृत्त का निर्माण” शीर्षक से पीएचडी के बाद दिल्ली के कॉलेजों में छिटपुट अध्यापन, फिर टीवी चैनल की नौकरी और अब विकासशील समाज अध्ययन पीठ(सीएसडीएस) की एक परियोजना इंक्लूसिव मीडिया फॉर चेंज से जुड़े हैं। इनसे  chandan@csds.in पर संपर्क संभव है। 

साभार- हंस- फरवरी- 2013- हिन्दी सिनेमा के सौ साल

फिल्मी जादू, फिल्मी धोखा, फिल्मी वास्तविकता -तत्याना षुर्लेई

By तत्याना षुर्लेई

सौ साल के बाद भारतीय सिनेमा अपने बारे में क्या कहता है!!

भारतीय और पश्चिमी सिनेमा में सिद्धांततः कोई बड़ा अंतर नहीं है। दुनिया के हर कोने में सिनेमा का जन्म एक ही चीज के लिए हुआ है- मनोरंजन के लिए। चलती हुई तस्वीरें, जो दुनिया के चित्र खींचने के लिए खोजी गयी, जल्द ही नयी-नयी कहानियाँ बुनने-कहने का बहुत अच्छा औजार बन गयी। भारतीय और पश्चिमी सिनेमा के इतिहास के बीच एक बड़ा अंतर सिनेमा के जन्म के साल को लेकर है। पश्चिम में सिनेमा के सौ साल के वर्षगाँठ की गणना पहली फिल्म दिखाने के बाद से ही हो गयी, जो की एक डाक्यूमेंट्री थी,  यही गणना भारत में पहली काल्पनिक कहानी दिखाने के बाद से होती है। इसका मतलब यह है कि भारतीय सिनेमा अपने दर्शकों के लिए सब से पहले एक मजेदार झूठ है, जिसके लिए वास्तव से बिलकुल अलग दुनिया दिखाना उसका पहला कर्तव्य है। जैसे मैं लिख चुकी हूँ, ‘चलती हुई तस्वीरें या सपनों का कारखानाः सिनेमा क्या है?’ लेख में मैंने बताया था, पश्चिम के लिए, जिनके लिए सिनेमा प्लेटो (Plato का गुफा होता है। उनके लिए फिल्म की दुनिया वास्तव से थोड़ी बेकार होती है। तथापि भारतीय, ‘जिनके लिए वास्तव सिर्फ माया होता है’, सिनेमा में सच ढूँढ़ते हैं। जो भी कारण हो इस साल सिनेमा के वर्षगाँठ को मनाने का, कुछ सारकथन कहने के लिए भारतीय सिनेमा का यह सौंवा साल एक बहुत ही अच्छा मौका है। सिनेमा का त्योहार और शताब्दी-वर्ष ऐसे ही मौके हैं जिनके बहाने सौ साल के निष्पादनों के बारे में सोचने की जरूरत है। पर सिर्फ इन्हीं बारे में नहीं, सिनेमा के भविष्य के बारे में भी। सिनेमा ही बार-बार नहीं बदला है, सारा समय ही बदल रहा है – न सिर्फ नए-नए आविष्कारों के साथ, जिनकी मदद से वह चलता है, बल्कि अपने नए-नए दर्शकों की सहायता से भी, जो कभी भी कुछ नया और अक्सर साहसिक भी देखने के लिए तैयार रहते हैं। लगता है कि सिनेमा आजकल खुद अपने विकास के बारे में सोच रहा है और अपने दर्शकों पर हुए प्रभाव के बारे में भी। सिनेमा का इतिहास लंबा नहीं है लेकिन जो है वह बहुत ही विविधतापूर्ण है इसलिए यह कोई संयोग नहीं है कि सौ साल की वर्षगाँठ के करीब कई ऐसी फिल्में बनाई र्गइं जो अपने बारे में कुछ महत्त्वपूर्ण बातें कहना चाहती हैं।roadmovie

अपने बारे में बताना कोई नई चीज नहीं है – पश्चिम में ही नहीं, भारतीय सिनेमा में भी। फिर भी, आजकल इस विषय को हम पिछले सालों के मुकाबले से ज्यादा देख सकते हैं। आत्मालाप सिनेमा के शुरू में काल्पनिक विषयों के साथ पैदा हुआ लेकिन सच यह है कि इसका विकास आधुनिक समय से संबंधित है। पुराने जमाने में इस पर इतना ध्यान नहीं दिया जा रहा था, क्योंकि एक प्रकार का आत्मालाप सिनेमा के आसपास कहीं हमेशा मौजूद रहता था। शायद सिनेमा के शुरू में आत्मालाप के लिए इसलिए स्थान नहीं था कि इतिहास लंबा न होने के कारण किसी सारकथन की जरूरत नहीं थी। आत्मालाप अलग-अलग रूपों में होता है और इसका अच्छा इस्तेमाल सिर्फ अग्रणी सिनेमा जान-बूझकर कर रहा था। शेष सिनेमा को हमेशा यह बात अच्छी तरह मालूम थी कि उसके द्वारा बनाई हुईं फिल्मों की दुनिया को यथार्थ से अलग नहीं होना चाहिए। इसलिए इन दोनों दुनियाओं के अंतर, जो कभी-कभी होता था, और इनके बीच में जो उसका हस्तक्षेप किया जा रहा था, इसे हमेशा छुपाने की कोशिश की जाती थी। दर्शकों को देखी हुई दुनिया वास्तविक लगती है लेकिन इस वास्तव में कोई न कोई धोखा तो होता ही है। और इस धोखे के मदद से देखी हुई इमारत कभी सिर्फ स्टुडियो में बनाई हुई एक दीवार का टुकड़ा है और कोई सच्ची जगह नहीं है – जैसे पोलैंड के पहाड़ कुणाल कोहली की ‘फना’ में कश्मीर में बदल गए या संजय लीला भंसाली की ‘हम दिल के चुके सनम’ में बुदापेस्त को इटली के एक शहर की भूमिका निभानी पड़ी। उन फिल्मों में ऐसी ही स्थिति होती है जो सिर्फ फिल्मों के बारे में एक कहानी दिखाते हैं और उनकी सच्चाई भी अधूरी होती है। वे कभी कुछ ज्यादा दिखाते हैं लेकिन उतना नहीं और अपने बारे में एक प्रकार के धोखे में रखते हैं। भारतीय सिनेमा के इतिहास में ऐसी फिल्मों की बहुतायत है पर इनमें से तीन मुझे दिलचस्प लगती हैं – देव बेनेगल की ‘रोड मूवी’, पुनीत मल्होत्रा की ‘आइ हेट लव स्टोरीज’ और मिलान लूथरा की ‘डर्टी पिक्चर’। इस चुनाव का पहला कारण यह है कि तीनों फिल्में सौवीं वर्षगाँठ के आसपास बनाई गई हैं (2009, 2010 और 2011 में), तीनो फिल्में सिनेमा के बारे में है और हर एक में दिखाया हुआ सिनेमा कुछ अलग है। इसमें आश्चर्यचकित होने की कोई बात नहीं है – इसलिए कि हर व्यक्ति के लिए सिनेमा कुछ अलग है। किसी को कोई फिल्म अच्छी लगती है, तो किसी को कोई और निर्देशक या अभिनेता पसंद है। इसलिए यह कहना बहुत मुश्किल है कि सिनेमा में सबसे महत्त्वपूर्ण क्या है और फिल्मों का सौ साल में कैसा विकास हुआ। तथापि संभवतः इन तीन फिल्मों के मदद से हमको पता चल जाएगा कि फिल्मों के विचार में भारतीय सिनेमा में सबसे महत्त्वपूर्ण क्या है।

सिनेमा के शुरू में किसी को विश्वास नहीं था कि यह नया आविष्कार, जो चलती हुई तस्वीरें दिखा सकता है, इतना प्रचलित हो जाएगा कि दुनिया के सारे कोनों में पहुँच जाएगा। आज इसमें कोई शक नहीं है कि सिनेमा के बिना हमारी जिंदगी कुछ अधूरी लगती है। दुनिया में शायद कई लोग ऐसे मिल जाएंगे जिन्होंने कभी कोई अखबार या किताब नहीं पढ़ी हो, लेकिन ऐसा व्यक्ति ढूँढ़ना बहुत मुश्किल है जिसने कभी कोई फिल्म नहीं देखी हो। फिर भी शुरू में, जब सिनेमा का विकास मेलों में सस्ते सर्कस के तंबुओं में हो रहा था, पढ़े-लिखे लोग सिर्फ चोरी-चुपके फिल्में देखते थे। पोलैंड के फिल्म सिद्धांतकार करोल इजिकोवस्की (Karol Irzykovsky) ने इस समय पर लिखा था कि सभी लोग फिल्में देखने जाते हैं, लेकिन इसके बारे में बात करने में उनको शर्म आती है। क्यों? इसलिए कि इस समय के सिनेमा के दर्शक सीधे-सादे, अनपढ़ लोग थे जो फिल्मों की मदद से अपने दुख-निराशा को कुछ समय के लिए भूल सकते थे। असल में फिल्मों की शुरुआत ऐसी अद्भुत स्थिति ढ़ूँढने से ही संबंधित है जो वास्तविक दुनिया में कभी नहीं मिलती है। भारत में फिल्मों के जनक दादा साहेब फाल्के और यूरोप में जॉर्ज मेलिएस ऐसे ही जादूगर थे जिन्होंने अपनी फिल्में बड़े-बड़े सपनों की तरह बनाईं। ऐसे सपने जहाँ सच्चा प्यार होता है, सत्य हमेशा जीतता है, लोग चांद के पास जा सकते हैं और लोगों की मदद करने के लिए भगवान जमीन पर आते हैं।

देव बेनेगल की फिल्म देखते हुए ऐसा लगता है जैसे आप सिनेमा के दर्शकों के बीच पहुँच जाते हैं, जैसे सिनेमा के दर्शक ही विषय हैं। ‘रोड मूवी‘ का नायक, जिसका नाम विष्णु है, रेगिस्तान में ट्रक चलाता है। वह जानता है कि उसकी गाड़ी एक गतिशील सिनेमा है लेकिन यह उसके लिए इतना महत्त्वपूर्ण नहीं है। विष्णु के पास आईपॉड है, मोबाइल फोन भी है; घर पर उसके पास कंप्यूटर होगा और उसमें होगी दुनिया की सारी फिल्में। ऐसा पुराना और बेकार सिनेमा उसको शायद थोड़ा हास्यास्पद भी लगता है लेकिन विष्णु का विचार बदलेगा जब वह रेगिस्तान में रहनेवाले लोगों से मिलेगा। उन लोगों से जिनका हर दिन का काम पानी ढूँढ़ना है। विष्णु अपनी गाड़ी की खिड़की से और फिल्म के दर्शक अपनी जगहों से गाँव वालों के थके हुए चेहरे देख सकते हैं। जब नायक के रास्ते में मेला ढूँढ़ने वाला अजनबी आदमी आता है, तो विष्णु को उस आदमी के मदद से पता चलता है कि उसकी पुरानी फिल्में कुछ समय के लिए गरीब लोगों के जीवन को बदल सकती हैं। सब चेहरे जो पहले उदास और थके थे अब बिल्कुल अलग लगते हैं। फिल्म का जादू सब लोगों को प्रभावित करता है।

फिल्म के सबसे सुंदर दृश्य में बूढ़े आदमी की मेले के बारे में भविष्यवाणी सच हो जाती है और जिस जगह पर ट्रक फिल्मों को दिखाने के लिए तैयार है, वहाँ मेला का रेला भी आता है। रेगिस्तान का यह मेला एक बड़ी मरीचिका का रूप ले लेता है, पता नहीं यह सच है या विष्णु और उसके दोस्त नशे में और शायद प्यास से बेहोश हैं। मेला रेगिस्तान में रहने वालों का एक बड़ा सपना है जिसकी शुरुआत विष्णु की फिल्मों ने की है। रूसी दर्शनशास्त्री मिखाइल बाख्तिन (Mikhail Bakhtin) ने मध्ययुगीन यूरोप के कार्निवाल के बारे में लिखते समय अनुभव किया कि बड़े त्योहारों-महोत्सवों के समय रोजमर्रा के सारे नियम-कायदों की हालत पतली हो जाती हैं। साहित्य और फिल्म भी कभी-कभी इसी स्थिति का, इस नियमबदल का इस्तेमाल करते हैं। जिससे इनकी दुनिया की हालत भी उलटी हो जाती है, जैसे  रोड मूवी में। पागल रंगरेलियों की शुरुआत तो सिनेमा से होती है लेकिन बाख्तिन  वाले आनंदोत्सव की तरह सुबह को खत्म नहीं हो जाती है, सिनेमा और मेले के कारण सब लोग बदलते हैं। गाँव वाले ही नहीं, रेगिस्तान वाले डाकू भी। वे अपराधी, जिनके कारण बाकी लोगों के पास पानी नहीं है आनंदोत्सव के समय में जानवरों से मनुष्य हो जाते हैं। जब तक विष्णु का ट्रक रेगिस्तान पर चलेगा और अपनी फिल्में दिखाएगा, तब तक मेला चलता ही रहेगा। आनंदोत्सव के बाद शायद डाकू फिर से जानवर बन जाएँगे, पुलिस किसी को भी मार देगी, लेकिन मेले के अंत से पहले, फिल्मों के जादू के कारण, सब कुछ ‘उल्टा’ और सुरक्षित है।road movie 2

पढ़े-लिखे लोगों को शायद सामान्य सिनेमा में यह बात अच्छी नहीं लगती है कि फिल्मों के जादू के कारण सभी दर्शकों का व्यवहार कभी-कभी बच्चों का जैसा होता है। सामान्य सिनेमा अपने दर्शकों के भावों से अच्छी तरह खेलता है इसलिए फिल्म देखने के समय जोर से हँसना या रोना बहुत आसान होता है। सभी तरह की फिल्मों के दर्शकों को सिर्फ मनोरंजन चाहिए जोकि हर व्यक्ति के लिए अलग हो सकता है। जैसा कि मैंने जिक्र किया है, किसी को रोना अच्छा लगता है तो किसी को हँसना और किसी को डरना भी सबसे अच्छा लग सकता है। और सिनेमा के पास इन सारे दर्शकों के लिए कुछ न कुछ दिलचस्प है ही। तथापि इसी समय पर ज्यादा लोग बोलेंगे कि सिनेमा उनके लिए सिर्फ कला है और बड़े-बड़े निर्देशकों की फिल्मों के अलावा वे कुछ सामान्य नहीं देखते हैं। ऐसा क्यों होता है? क्या इसमें शर्म की बात है कि कभी-कभी हम सबको सामान्य फिल्म की सरल कहानी की जरूरत होती है? आजकल की स्थिति करोल इजिकोवस्की के समय से कुछ अलग है। आज फिल्मों को देखने में कोई शर्म नहीं है – सिर्फ सामान्य फिल्म के अलावा। शायद समस्या यह है कि पढ़े-लिखे दर्शकों को मालूम होता है कि फिल्म की कहानी एक झूठ है, फिर भी यह झूठ उनको इतना धोखा दे सकता है कि वे भी साधारण दर्शकों की तरह आसानी से रोते हैं और डरते हैं कि नायक मर जाएगा।

फिल्म का जादू यह भी है कि बहुत लोग मानते हैं कि पर्दे पर देखी हुई कहानी सच होती है, और अगर नहीं मानते हैं तो देखते समय इसके बारे में अचेत हो जाते हैं क्योंकि फिल्म बहुत अच्छी तरह वास्तविकता को धोखा दे सकती है। फ्रांस के फिल्म सिद्धांतकार, आंद्रे बाजें (Andre Bazin) ने लिखा कि अपने दर्शकों के लिए फिल्म एक खिड़की की तरह होती है, ऐसी खिड़की जिसे खोलने के बाद बाहर की दुनिया दिखाई जा रही हो। इसलिए दर्शकों को लगता है कि फिल्म की कहानी सच है और इसलिए भी आंद्रे बाजें के लिए सबसे अच्छी फिल्में वही थीं जिनकी दुनिया वास्तव से उतनी अलग नहीं थी। लेकिन यह दुनिया कभी कुछ और भी है जो वास्तविकता से अलग होती है। फिर भी दर्शकों के लिए इसमें और यथार्थ में कोई अंतर नहीं है और स्वप्न-चित्र देखने के समय वह उसी तरह प्रतिक्रिया दर्शाता है जैसी यथार्थवादी फिल्म देखने के समय। एक अन्य फिल्म सिद्धांतकार एडगर मोरें (Edgar Morin) ने इसके बारे में लिखा। उसके विचार में ऐसी प्रतिक्रिया इसलिए होती है कि कोई भी फिल्म देखने के समय लोग उसके नायक को अपना परिवर्तित रूप समझते हैं। तथापि इसके लिए एक चीज की जरूरत है – खिड़की पर देखी हुई दुनिया में रहने वालों को पता चलना नहीं चाहिए कि उनको कोई देख रहा है। और यह बात सिनेमा और उसके दर्शकों के लिए भी बहुत महत्त्वपूर्ण है।

फिल्म के दर्शकों को सबसे अधिक मजा झाँकने में आता है। सिनेमा घर के अँधेरे में बैठे हुए लोग एक-दूसरे को नहीं देख सकते हैं, लेकिन वास्तविक दुनिया के लोगों से अदृश्य होकर फिल्म के नायकों की जीवन में घुस जाते हैं। फिल्मों के दर्शक खुद से देखे हुए लोगों के सारे रहस्यों के बारे में जानते हैं, और फिल्म देखते समय यह सब जान लेना सबसे मजेदार क्षण होता है। इसलिए हर सामान्य सिनेमा में सबसे पहले एक नियम की बहुत बड़ी जरूरत है। फिल्म की कहानी के नायकों को ऐसा व्यवहार करना चाहिए जैसे उनको मालूम नहीं था कि उनको कोई देख रहा है। हर फिल्म के अभिनेता-अभिनेत्री को मालूम है कि उनकी फिल्में लोगों के मनोरंजन के लिए बनाई जाती हैं, लेकिन इस जानकरी को पर्दे पर दिखाना फिल्म का सबसे बड़ा पाप है। साथ ही, जब कोई फिल्म अपने बारे में कुछ बताना चाहती है, तब भी यह नियम महत्त्वपूर्ण है, इसलिए ऐसी स्थिति वहाँ ज्यादा प्रचलित है जहाँ फिल्म की दुनिया यथार्थ से दूर नहीं है और दर्शकों को वास्तविक लगती है। ऐसे ही एक पाप का बहुत अच्छा उदाहरण मनोज कुमार की फिल्म ‘पूरब और पश्चिम’ है। फिल्म के शुरू के दृश्य में जब फिल्म का नायक भारत लंदन जाता है तो वह ऑर्फन नाम के हिप्पी से मिलता है, और यह लड़का जब अपने अजीब नाम के बारे में बोलता है तब सीधे कैमरा की तरफ देखता है। उसकी इस भंगिमा को देखकर ऐसा लगता है जैसे वह भारत से नहीं, दर्शकों से बात करना चाहता है। और अगर वह दर्शकों से बात कर सकता है तो इसका मतलब यह भी है कि उसको पता है कि कोई उसे देख रहा है और सारे दृश्य का मतलब यह है कि पर्दे पर चल रही कहानी सच नहीं है। सब भ्रम बर्बाद हो जाता है। कोई निर्देशक अवश्य ही इस भंगिमा का बहुत अच्छा इस्तेमाल कर सकता है, और कभी-कभी इसकी जरूरत भी होती है, जैसे कि डरावनी फिल्मों में। वहाँ जब कोई राक्षस या किसी तरह का विरूप प्राणी सीधे दर्शक की ओर देखता है तो डर से मिलने वाले मनोरंजन में इजाफा हो जाता है क्योंकि इस भंगिमा का मतलब कोई चेतावनी है और दर्शक को लगता है कि अगला बलि-पशु वह हो सकता है।

झाँकने से मजा लेने (दर्शनरति) के बारे में मनोविश्लेषण का सिद्धांत, जिसका जिक्र लउरा मल्वे (Laura Mulvey) ने किया है, डर्टी पिक्चर में अच्छी तरह दिखाई दिया। फिल्म की नायिका, जिसका नाम रेशमा है, अभिनेत्री बनना चाहती है और इसके लिए सब कुछ करने को तैयार है। अभिनेत्री होने के बदले में रेशमा, जिसका नया नाम सिल्क है, नाचती हुई ऐसी लड़की बन जाती है जिसके नृत्य में बहुत ही साहसिक रत्यात्मक मुद्राओं की जरूरत होती है। वह अपनी ख्याति से बहुत खुश है लेकिन इस तरह की ख्याति वास्तव में बहुत कड़वी होती है। अफसोस की बात यह है कि सिल्क और उस प्रकार की सारी औरतों की ऐसी ख्याति सच्ची ख्याति न होकर भी सिनेमा के लिए कोई नई चीज नहीं है। मनोविश्लेषण के आधार पर लउरा मल्वे ने न सिर्फ देखने से आने वाले मजे के बारे में लिखा बल्कि उस शक्ति के बारे में भी लिखा जो देखने से पैदा होती है। कैमरे की आँखें पुरुष की आँखें होती हैं इसलिए औरत का शरीर सिनेमा में महज देखने की वस्तु है। औरत को कुछ करना नहीं चाहिए, सिर्फ अच्छी तरह दिखाई देना चाहिए। भारतीय सिनेमा यह रत्यात्मक मजा भी अपने दर्शकों को देता है, अपनी नायिकाओं को देखने की अनुमाति देता है। यहाँ भी सिनेमाघर के अँधेरे में बैठे हुए आदमी को लगता है कि उसे कुछ ऐसा देखना है जो सभी लोगों के लिए नहीं है, जिसे सामान्य जीवन में देखना अनैतिक है। और कोई नाचती हुई औरत अगर कभी सीधे कैमरे की ओर देखेगी तो इस बार यह कोई फिल्म का पाप नहीं होगा क्योंकि सिनेमाघर में बैठा हुआ हर आदमी सोचेगा कि पर्दे पर दिख रही लड़की सिर्फ उसके लिए नाच रही है। झाँकने से मिलने वाले मनोरंजन का स्थानांतरण हो जाएगा और हर आदमी यह सोच सकेगा कि वह शो का एक हिस्सा है और उसमें भी कामविषयक शक्ति है।the-dirty-picture-wallpaper-06

स्त्री-शरीर को दिखाने का उपक्रम सबसे अच्छी तरह गानों में संभव है। पश्चिम के लोगों को ज्यादातर भारतीय फिल्मों में मौजूद गानों की इतनी उपस्थिति बड़ी अजीब लगती है क्योंकि खास तौर से यूरोप में सांगीतिक फिल्में कभी इतनी लोकप्रिय नहीं थीं, और जो सांगीतिक फिल्में थीं भी, उनकी दुनिया भारतीय फिल्मों से अलग होती थी। यूरोप की अधिकांश सांगीतिक फिल्में किसी न किसी संगीत-नाट्य प्रदर्शन के बारे में होती हैं, संगीत की उपस्थिति ‘तार्किक’ होती हैं, इसलिए फिल्मों का ऐसा नुस्खा, जहाँ हर कहानी में गानों की जरूरत है, पश्चिमी दर्शकों के लिए अस्वीकार्य है। वे लोग नहीं जानते हैं कि कामविषयक मजे के लिए गानों की कितनी बड़ी जरूरत है! पुराने जमाने से ही फिल्मों की अलग, कभी-कभी बहुत दिलचस्प योजनाएँ होती थीं औरतों के शरीर दिखाने के लिए। भारतीय सिनेमा के इतिहास में कभी-कभी ऐसे निर्देशक भी हुए जो नायिकाओं के शरीर को दिखाने के मामले में गानों के मुहताज नहीं थे – और उनमें सबसे प्रसिद्ध नाम शायद राज कपूर का था। उसकी ‘बॉबी’ एक नई और चुस्त कहानी थी लेकिन कुछ दर्शकों को वह सिर्फ डिंपल कपाडिया की बिकनी के कारण अच्छी लगती थी। तथापि कभी औरत का शरीर दिखाना फिल्म को कुछ नुकसान भी पहुँचा सकता है। शेखर कपूर की बैंडिट क्वीन एक बहुत महत्त्वपूर्ण फिल्म थी जो स्त्री-हिंसा को सबको दिखाना चाहती थी। अफ्सोस की बात यह है कि ज्यादा दर्शक सिर्फ सीमा बिस्वास के नंगे शरीर को देखने के लिए सिनेमाघर आ जाते थे और फिल्म जिसका विरोध करना चाहती थी उसने यही सब दर्शकों को दिया। ज्यादा फिल्में सतर्कतापूर्वक अलग-अलग तरीके ढूँढ़ती हैं जो शरीर दिखाने के लिए सबसे उचित हों। सबसे आसान तरीका है वेश्या को नायिका बनाना क्योंकि वेश्याओं के साथ सब कुछ करना उचित है। निस्सन्देह सभी नायिकाएँ वेश्या नहीं हो सकती हैं इसलिए कई फिल्मों में मोहिनी आ गई जोकि बहुत अच्छी योजना थी। इस तरह फिल्म की नायिका बहुत भोली, अच्छी लड़की हो सकती थी लेकिन नायक दूसरी औरत को भी पसंद था जो अच्छी थी पर सुंदर और खतरनाक थी, शराब और सिगरेट पीती थी और नाइट क्लबों में नाचती थी। इस योजना से आइटम नंबर पैदा हुआ जो कामविषयक मजे के लिए भारतीय फिल्मों का शायद सबसे अच्छा आविष्कार भी था। आइटम नंबर वाली औरतें सिर्फ देखने के लिए होती हैं और फिल्म की कहानी से उनका कोई संबंध नहीं होता है। वे शुद्ध मजे के लिए उतारी जाती हैं। नायिका का इस तरह नाचना हमेशा अनुचित था, पर कभी-कभी इसकी जरूरत भी थी इसलिए ड्रीम सिक्वेंस बन गया। इसकी मदद से दर्शक वह सब कुछ देख पाता है जो सिनेमाघर में आकर देखना चाहता है, और नायिका की इज्जत भी सुरक्षित रहती है क्योंकि हर ऐसा दृश्य सिर्फ सपना होता है।The Dirty Picture

डर्टी पिक्चर स्त्री-शरीर को सिनेमा में देखने-दिखाने की योजना को अच्छी तरह निभाती है। डर्टी पिक्चर एक ऐसी स्त्री की कहानी है जो फिल्मों में नाचने का काम करती है, अपने शरीर की खूबसूरती के बल पर दिनों-दिन सफलता की बुलंदियों पर चढ़ती जाती है। लेकिन बढ़ती उम्र की तो शरीर की ‘खूबसूरती’ से जैसे दुश्मनी है। इस तरह एक दिन वह खुद को पराजित महसूस करती है, ठगी सी महसूस करती है। लेकिन यह विडंबना भी दर्शकों के देखने के नजरिए में कोई बदलाब नहीं ला सका। इस फिल्म की कहानी दो स्तरों पर चल रही है। एक स्तर सिल्क का जीवन और उसकी अश्लील फिल्में हैं, दूसरा यह फिल्म है जो सिल्क के बारे में बता रही है। सिल्क के फिल्मों के गानों के हिस्से को देखकर दर्शक बहुत उत्तेजित होते हैं। हम सिनेमाघर में बैठे पुरुषों के चेहरों पर एक खास किस्म की लालसा देख सकते हैं। लेकिन इसी समय डर्टी पिक्चर में दर्शकों के लिए भी वही मजा है और सिनेमाघर के अँधेरे में बैठे दर्शकों के चेहरे पर वही लालसा फिर से वापस आ जाएगी। यह फिल्म एक भोली-भाली नायिका के बारे में है जिसको फिल्मी पेशे ने नष्ट कर दिया। जब तक जवानी और सुंदरता थी, तब तक सारे सपने पूरे लगते थे लेकिन जब जवानी चली गई और शरीर उतना खूबसुरत नहीं रह गया, तब सिल्क ने देखा कि वह सिर्फ शरीर थी। फिल्म वालों के लिए सुंदर शरीर में रहती हुई औरत को ढूँढ़ना महत्त्वपूर्ण नहीं था क्योंकि दर्शकों के लिए सुंदर शरीर ही काफी है। देखने की, झाँकने की इच्छा कितनी मजबूत होती है हम इस फिल्म के ड्रीम सिक्वेंस में भी देख सकते हैं। इसमें सिल्क अपनी फिल्म की नायिका है और उसे अपने शरीर को पहले सी दिखाने की जरूरत नहीं है, लेकिन पता चलता है कि नायिका की यह भूमिका भी उसे इसीलिए प्रदान की गई है कि वह देह-प्रदर्शन की योग्यता रखती है।

भारतीय फिल्में नायिका की इज्जत के बारे में सोचकर भी ड्रीम सिक्वेंस की मदद से इस इज्जत को नष्ट करती हैं। भोग की इच्छा, दर्शनरति की इच्छा इज्जत से बड़ी है और फिल्में अपने दर्शकों पर  निर्भर हैं। अगर कोई सिनेमाघर नहीं आएगा फिल्म देखने के लिए तो नई फिल्में बनाने के लिए पैसा भी नहीं होगा। इसलिए सामान्य फिल्में अपने दर्शकों को वह देती हैं जो उनको सबसे अच्छा लगता है। निस्संदेह, इसका मतलब यह नहीं है कि जिन लोगों के लिए फिल्म में झाँकने का मजा सबसे महत्त्वपूर्ण है वे सब के सब कोई  विकृत लोग हैं। फिर भी, ऐसी स्थिति, जब किसी के लिए फिल्म का सबसे महत्त्वपूर्ण क्षण नंगे शरीर से संबंधित है, खतरनाक हो सकती है। इसलिए मुझे अच्छा लगता है कि आधुनिक फिल्मों में आइटम नंबर धीरे-धीरे गायब हो जाता है और आज की अभिनेत्रियों की साहसिकता नंगे शरीर को दिखाने से नहीं, कहानी के व्यक्तित्व से संबंधित होती है।

अधुनिक दर्शकों की दुनिया फिल्मों से संबंधित है। एक तरफ, फिल्मों की मदद से वे वास्तविकता को भूलना चाहते हैं तो दूसरी तरफ, आज के लोगों की वास्तविकता फिल्म की वास्तविकता है। आइ हेट लव स्टोरीज में ऐसी ही स्थिति है। फिल्म का नायक, जिसका नाम जय है, प्यार से नफरत करता है। ऐसा वह फिल्म स्टुडियो में काम करने के कारण ही सोचता है क्योंकि फिल्में अपने दर्शकों को झूठ दिखाती हैं। जय को अपना विचार बदलना पड़ता है जब धीरे-धीरे उसे पता चलता है कि उसकी जिंदगी में भी कुछ ऐसी चीजें हैं जो फिल्मों से मिलती-जुलती हैं। फिल्म के अंत में एक मजेदार दृश्य में जय सिनेमाघर में आता है और हाथ में फूल पकड़कर अपनी प्रेमिका  को बुलाता है। इसी समय उसको पता चलता है कि पर्दे का नायक यही कर रहा है। संयोग है? नहीं। बहुत फिल्में देखने के बाद ढेर सारे लोग अक्सर बिना किसी इरादे के अपना जीवन फिल्मी बनाने की कोशिश करते हैं। फिल्म में देखी हुई रोमांस वाली छवि अच्छी लगी तो लोग इसे दुहराएँगे, कभी कुछ कहने के लिए फिल्मी संवादों का इस्तेमाल करेंगे क्योंकि उनको लगता है कि शायद उनकी कहानी के अंत में भी वही होगा जो फिल्म के अंत में हुआ। I_Hate_Love_Stories_Movie_BollywoodSargam_talking_491333

आई हेट लव स्टोरीज की मदद से हम भारतीय फिल्मों के भविष्य के बारे में भी सोच सकते हैं। यह फिल्म फिल्म-निर्माण के बारे में है और इसमें उन फिल्मों का जिक्र है जो प्रेम कहानियों के लिए चर्चित रही हैं। फिल्म का निर्माता करन जोहर है जो अपने फिल्मों में स्टार अभिनेताओं के साथ काम करता था जबकि इस फिल्म में उस तरह से स्टार कोई नहीं है – स्टार फिल्म के मुख्य-पात्र के सपने में आता है। एक दृश्य में जब सेट पर गाने की शुटिंग की जा रही है, नायक और नायिका को देखकर मुख्य पात्र सपने में खुद को गाते हुए देख रहा है। गाता हुआ जय और उसकी प्रेमिका वैसी ही दिखाई देती है जैसी करन जोहर की फिल्मों के सारे नायक और नायिकाएँ। लेकिन अंतर यह है कि इस फिल्म का नायक शहरुख खान नहीं है और फिल्म भी थोड़ी सी अलग है। मेरे विचार में यह गाना परिवर्तनों का रूपक है। अब नए-नए अभिनेताओं का समय आ गया है और नई फिल्मों का भी। ऐसी फिल्मों का समय जिसकी नायिका अपने होने वाले पति को छोड़ सकती है – इसलिए नहीं कि वह बुरा है या उसने कुछ उसको किया, वरन इसलिए कि उसकी जिंदगी में कोई नया आ गया है। नए-नए दर्शकों को नई कहानियाँ चाहिए और ऐसा परिवर्तन स्वाभाविक है। फिल्म में शायद सब कुछ हो चुका है और कुछ नया हो नहीं सकता है लेकिन आज भी टीवी या कंप्यूटर जैसे व्यसन के सारे आविष्कारों और इसके विकास के बावजूद फिल्म की जरूरत है और बनी रहेगी। फिल्मों की कला दूसरे कलाओं से जल्दी पुरानी हो जाती है इसलिए नहीं कि नए आविष्कारों से उसका गहरा संबंध है – सबसे पहले इसलिए कि फिल्म खुद के इरादों के दर्शक को पैदा करती है और इसके बाद उसको कहानी देती है। इसके कारण संग्राम देखने के बाद लोगों को विश्वास था कि अशोक कुमार वास्तव में पुलिस वालों को मार देंगे, अमिताभ बच्चन एक कॉमिक्स में सुपर-हीरो बन गए या प्राण के जमाने में कोई माँ अपने बेटे को प्राण का नाम देना नहीं चाहती थी। ‘आई हेट लव स्टोरीज’ के एक दृश्य में ‘रोड मूवी’ की तस्वीर दिखाई देती है जो कि सिनेमा का सबसे अच्छा सारकथन है। फिल्में अलग होती हैं जैसे उनके दर्शक, लेकिन एक चीज वही है जो शुरू में भी थी: अंधेरे में इंतजार करने का यह अद्भुत अहसास दुनिया के सब कोने में एक जैसा है और मुझे आशा है कि यह कभी नहीं बदलेगा।

पहल-91 से साभार

Tatiana szurlejतत्याना षुर्लेई लोकप्रिय हिंदी सिनेमा की शोधार्थी और समीक्षक के रूप में पोलैंड में ख्यात। सिनेमा विषयक तीन लेख हिंदी में लिख  चुकी हैं। इन्होंने  यह लेख विशेष रूप से पहल-91 के लिए लिखा है। केन्द्रीय हिंदी संसथान, आगरा से हिंदी का प्रशिक्षण। फिलहाल पोलैंड के शहर क्राकोव सिथत Jagiellonian University में The Courtesan Figure in the Iconography on Indian Popular Cinema:Tradition, Stereotype, Manipulation. नामक विषय पर पीएचडी के लिए शोधरत हैं। इनसे  tatianaszurlej@yahoo.com पर संपर्क सम्भव है।

चलती हुई तस्वीरें या सपनों का कारखाना : सिनेमा क्या है? : तत्याना षुर्लेई

(भारतीय सिनेमा के सौ साल की अभी खूब चर्चाएँ हैं. लेकिन यह सौ साल इसी साल क्यूँ? जबकि यूरोप में तो यह १९९५ में मनाया जा चुका है. इसके सैद्धांतिक आधार क्या रहे हैं/ क्या हैं? हिंदी में इसकी चर्चा नहीं के बराबर है. सिनेमा यथार्थ है या कल्पना? दस्तावेज है या रूपक? इन्हीं सवालों  को तत्याना बहुत ही बारीकी से इस संक्षिप्त से नोट में हमें बताने की कोशिश करती हैं. तिरछी स्पेल्लिंग इस अंतर-दृष्टि-परक लेख  के लिए उनका आभारी है. साथ ही साथ यह उम्मीद भी कि तत्याना के द्वारा उठाये गए प्रश्नों के आलोक में यह बहस आगे भी चले!)
By तत्याना षुर्लेई
सिनेमा बहुत पुराना आविष्कार नहीं है, उसका जन्म 28 दिसम्बर 1895 को हुआ, जब लिमिएर (Lumière) -बंधु ने पेरिस में अपना नया मशीन दिखाया। एक दिलचस्प बात यह है कि पहला शो ग्रैंड होटल के ‘इंडियन रूम’ मे किया गया। शायद यह जगह एक संकेत था कि आगे चलकर भारत फिल्मों का सब से बड़ा व्यावसायिक केंद्र बन गया। पहले शो के बाद लोगों को पता चला कि यह आविष्कार कितना अच्छा है और सारी दुनिया बंधुओं की चलती हुर्इ तस्वीरें देखना चाहती थी। आस्ट्रेलिया (Australia) जाते हुए लिमिएर-बंधुओं के सहयोगियों ने मुंबई में रुककर, 7 जून 1896 को पहली बार भारत में फिल्मों का शो किया।

 इस शो के बाद पशिचम देशों की ही तरह भारत में भी यह नया आविष्कार लोगों को बहुत अच्छा लगा। कुछ सालों बाद पहली भारतीय फिल्म 19वीं शताब्दी के अंत से पहले बनायी गयी (अलग-अलग स्त्रोतों में पहली भारतीय फिल्म बनने का काल अलग-अलग लिखा जाता है। (1897 साल से 1900 तक)। भारतीय सिनेमा के जनक सखाराम भाटवाडेकर उर्फ सवे दादा  हैं जो महाराष्ट्रा में रहने वाले एक फोटोग्राफर थे. लिमिएर-बंधुओं के मशीन से मोहित होकर उन्होनें एक कैमरा खरीदा और आस-पास में जो भी दिलचस्प लगा उसे अपने कैमरे में कैद करने लगे । इस समय की भारतीय फिल्में पश्चिम से मिलती-जुलती थीं जो कि सिर्फ वास्तविकता दिखा रही थीं।

तथापि भारत और पशिचम के देशों में एक बड़ा अंतर है। यूरोप और इंग्लैंड में सिनेमा का सौ साल  1995 को मनाया जा रहा था। जिसका मतलब यह है कि पशिचम के विचार से पहली फिल्म  लिमिएर-बंधुओं की चलती हुई तस्वीर थी। भारत की सिथति बिल्कुल अलग है। राजा हरिश्चंद्र  के पहले की किसी भी फिल्म को, जिसे सखाराम भाटवाडेकर उर्फ सवे दादा ने या दादा  साहेब  फाल्के ने बनाया था, फिल्म नहीं मानी जाती है. सिनेमा का सौ साल राजा हरिश्चंद्र का सौ साल है  जिसमें पहली बार एक कहानी दिखाया गया. ऐसा अंतर क्यों?  इस सवाल का जवाब ढूँढ़ने के लिए  हमें सब से पहले फिल्म के तत्त्वों के बारे में सोचना चाहिए। अपने इतिहास के आरंभ में फिल्म, सभी  लोगों के लिए , तस्वीर उतारने का नया तरीका माना जाता था। चलती हुई तस्वीरें इसलिए  महत्त्वपूर्ण  मानी गयीं क्योंकि वह दर्शकों को फोटो से ज्यादा वास्तविक लगती थीं। ऐसी तस्वीरें जीवन के प्रलेख मानी जाती थीं, जो सालों बाद पुराने जमाने के बारे में अगली पीढियों को सब कुछ बोलेंगी। इसीलिए, लोग मानते थे कि फिल्मों का भविष्य सिर्फ दस्तावेजीकरण से संबंधित है। आज भी कभी न कभी कहा जाता है कि फिल्मों में दस्तावेजीकरण बहुत आवश्यक है और कुछ लोगों के लिए यह सिनेमा का आधार भी है। फिर भी यहाँ एक समस्या पैदा हो जाती  है, और हम यह सवाल पूछ सकते हैं कि फिल्मों में यथार्थ है क्या? और, ऐसी चीज संभव है? हर फिल्म अपने रचयिता की दृष्टि के आधार पर बनती है और निर्देशक के भावना को दिखाती है। सवे दादा को अपनी पहली फिल्म बनाने से पहले शायद ही किसी कहानी के बारे में सोचना था, या फिर जो कुश्ती दंगल उन्होंने दिखाया, वे दोनों वास्तविक और उनकी –दृष्टि की थीं, कोई यथार्थवाद नहीं। और, इसी तरह  सारी फिल्में  बनाई जाती हैं। वे दर्शकों को सिर्फ वह देखने की अनुमति देती हैं जो उनको दिखाई जाती हैं। लोगों की आँखें वास्तव में फिल्म की आँखें हैं, निर्देशक की आँखें हैं.

सिनेमा के इसी शुरूआती दौर में, एक दूसरा विचार पैदा हुआ, भारत और पशिचम दोनों जगहों पर, जो लिमिएर-बंधु द्वारा बनी फिल्मों से बिल्कुल अलग था। यूरोप के फ्रांस में रहते हुए जॉर्ज मेलियेस(Gorges Méliès s) सिनेमा का एक जादूगर बन गया और भारत में दादा साहब फाल्के ने वही काम किया जो मेलियेस ने फ्रांस में किया। दोनों के लिए फिल्म इसलिए महत्त्वपूर्ण थी कि इसकी मदद से वे अपने दर्शकों को सपने दिखा सकते थे। इसी विचार से यूरोप में भी कुछ लोगों के लिए लिमिएर-बंधू सिर्फ कैमरे का आविष्कारक था,  जबकि असल फिल्में मेलियेस के काम से संबंधित थीं। फिल्म की शुरूआत तब हुई जब इसमें कहानी आ गयी और इस तरह फिल्म का विकास बिलकुल नए रास्ते से होने लगा। सिनेमा के इन शुरूआती महारथिओं ने कभी नहीं सोचा था कि फिल्मों की यह योग्यता सब से महत्त्वपूर्ण हो जायेगी। फिल्में लोगों के लिए सबक भी है तो यथार्थ भी, लेकिन सब से पहले दर्शकों को सपनों की एक दुनिया में ले जाने वाली वह नानी है, जिसकी उम्र सौ साल या उससे ज्यादा हो गयी है, साथ ही साथ सपनों की दुनिया में ले जाने के उसके कौशल में भी इजाफा हुआ है। फिल्मों में कुछ चीजें ऐसी हो सकती हैं जो आसपास वास्तव में नहीं होती हैं और यह सब करतब दर्शकों के लिए कभी-कभी यर्थाथ से ज्यादा आकर्षक होता है। हमने देखा कि चलती हुर्इ तस्वीरें हमेशा कोई न कोई कहानी दिखाती हैं, तो शायद भारत में फिल्मों का इतिहास इसलिए राजा हरिश्चंद्र  के समय से शुरू होता है क्योंकि पहली बार, इसमें दिखाई गयी कहानी लोगों को अदभुत लगी। क्या यही कहानीपन महत्त्वपूर्ण फिल्मों की प्रवीणता है? क्या हमारे प्रश्न का उत्तर यहाँ है?

नहीं। दादा साहब फल्के ने राजा हरिश्चंद्र से पहले भी कुछ ऐसी फिल्में बनायीं थीं, जहाँ जादूगरी से भरी कतरबें थीं जिन्हें लोग वास्तविक दुनिया में नहीं देख पाते। उन सब में शायद कोई कहानी नहीं थी लेकिन अदभुत चीजें थीं इसलिए हम पूछ सकते हैं कि उनकी कोई और फिल्म पहली भारतीय फिल्म क्यों नहीं कही जाती? मुझे लगता है कि ऐसा इसलिए हुआ कि दर्शकों के लिए आज भी इन दो चीजों की अवश्यकता है, पहला कोई अदभुत कहानी, और इसके अतिरिक्त ऐसी दुनिया जो हमारे आसपास नहीं है। अगर भारत में फिल्मों का सौ साल, पहली फीचर फिल्म का सौ साल माना जा रहा है तो इसका मतलब यह भी हो सकता है कि भारतीयों के लिए फिल्म में जो बात सब से महत्त्वपूर्ण है वह यह कि इसमें सपना बुनने की शक्ति है.

यूरोप में कुछ लोगों के लिए सिनेमा का आधार पुराने जमाने के दर्शन से संबंधित है जो प्लेटो की गुफा की तरह है। प्लटो ने जीवन और दुनिया की वास्तविकता के बारे में लिखकर एक ऐसी सिथति का वर्णन किया जहाँ कुछ लोग गुफे में बैठे हैं। वे प्रवेश-द्वार से विमुख होकर बाहर नहीं दीवार को देखते हैं। उन लोगों के पीछे कुछ हो रहा है, वास्तविक दुनिया है, वास्तविक चीजें और वास्तविक जीवन भी। लेकिन लोग जो देख पाते हैं वह केवल इस यर्थाथ की छाया है जो दीवार पर दिखायी जाती है।  यर्थाथ लोगों के पीछे है। और, जिसे वे देख सकते हैं वह यर्थाथ से मिलता-जुलता होकर भी उससे अलग ही है। सिनेमा घर कुछ लोगों के लिए ऐसी ही गुफा है। चित्रपट पर कुछ न कुछ तो दिख जाता है जो सच्चाई जैसा है। लेकिन वास्तव में, दर्शक सिनेमा के परदे पर वैसे ही देख सकते हैं जैसे गुफा में लोग दीवार पर देख सकते हैं, जो कि सच्चाई से बहुत दुर है। फिर भी यूरोप में फिल्म के दर्शकों के लिए यह सब से महत्त्वपूर्ण है कि फिल्म जिंदगी से मिलती-जुलती चीज है। जो फिल्म सपनों की तरह कहानी दिखाती है बहुत लोगों के विचार में वह कोई कला नहीं है। फिल्मों के इतिहास की शुरूआत से ही यह सब से बड़ी समस्या थी। दो तरह के विचारों के बीच टकराहट थी। आज भी उन दोनों विचारों में से एक ऐसा है जो यह मानता है कि फिल्मों को सिर्फ यर्थाथ दिखाना चाहिए और दुसरा यह कि फिल्मों में सब से अच्छी वह दूसरी दुनिया है जो वास्तविक दुनिया से बहुत अलग है।
प्लटो का विचार लेकर हम फिल्मों के बारे में यह कह सकते हैं कि वह दुनिया जो चित्रपट दिखाई जाती है सही नहीं है और वास्तव से कुछ बेकार भी है क्योंकि वास्तव से अच्छा कुछ नहीं हो सकता। भारतीय फिल्मों की सिथति यूरोप से अलग है क्योंकि इसका दर्शनिक आधार भी कुछ और है। भारतीय सिनेमा का दर्शनिक आधार जो कि प्लेटो के गुफे से मिलता-जुलता भी है और अलग भी है। हम कह सकते हैं कि अगर यह सब कुछ जो आसपास है सिर्फ माया है और फिल्मों का यर्थाथ, दुनिया से इतना अलग होता है तो शायद सिनेमा में रचा गया यर्थाथ ही मूल यर्थाथ है। शायद, सिनेमा लोगों के लिए इतना मजेदार इसलिए है क्योंकि जो वे फिल्मों में देखते हैं वह यथार्थ है, माया नहीं। यह तो सिर्फ रूपक है लेकिन इसका एक छोटा दार्शनिक आधार तो हो ही सकता है। भारत का सिनेमा जब सपनों का कारखाना बन गया तब इसे सिनेमा माना गया।

जैसे पहले बताया सब फिल्मों की कोई कहानी होती है और कोई फिल्म शुद्ध यर्थाथ दिखा नहीं सकती। अगर सारी दुनिया माया है तो वास्तविकता ढूंढने के लिए कुछ ऐसा चाहिए था जो लोगों के आसपास से बिलकुल अलग था। इसलिए फिल्मों का इतिहास फाल्के के फिल्म से शुरू हुआ। क्योंकि, सच्चा यर्थाथ सिर्फ कुछ ऐसा ही हो सकता है जिसे दर्शकों के आसपास से विरोध हो। मुझे आशा है कि इस तरह के फिल्मों का अंत कभी नहीं आएगा क्योंकि मनोरंजन और चमत्कार आज भी सिनेमा में बहुत महत्त्वपूर्ण हैं।

 तत्याना षुर्लेई एक Indologist और फिल्म-आलोचक हैं। फिलहाल पोलैंड के शहर क्राकोव सिथत Jagiellonian University में The Courtesan Figure in the Iconography on Indian Popular Cinema:Tradition, Stereotype, Manipulation.    नामक विषय पर पीएचडी के लिए शोधरत हैं।

आभार: प्रकाश के.रे , क्योंकि यह लेख उनके द्वारा शीघ्र सम्पादित स्मारिका/पुस्तक हिदुस्तानी सिनेमा के सौ बरस से उधार माँगा गया है और पत्रिका नेशन फर्स्ट ,जहाँ यह प्रकाशित  हो चुका है .

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