Archive for the month “February, 2017”

‘रंगून’ वंडरलैंड से वंडरलैंड की यात्रा है: तत्याना षुर्लेई

विशाल भारद्वाज की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘रंगून’ दर्शकों के समक्ष आ चुकी है. बहुप्रतीक्षित इसलिए भी कि भारद्वाज हिंदी सिनेमा के सबसे प्रतिभाशाली निर्देशक हैं और एक कला-रूप के साथ-साथ लोकप्रियता के पैमाने पर भी उनका स्ट्राइक रेट अन्य निर्देशकों के बनिस्पत अधिक रहा है. यह समीक्षा उनके लिए है जो फिल्म देख चुके हैं, उनके लिए नहीं जो इसे पढ़कर फिल्म देखने जाएँ या न जाएँ का फैसला करें. विशाल की फिल्म लोगों द्वारा देखे जाने और उस पर गंभीर प्रतिक्रिया के लिए लोगों को उकसाती हैं. विशाल दर्शकों के साथ-साथ फिल्म आलोचकों के भी प्रिय फिल्मकार रहे हैं. फिल्म आलोचक तत्याना षुर्लेई की यह तात्कालिक-प्रतिक्रया इसी की एक कड़ी है. #तिरछीस्पेल्लिंग

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‘रंगून’: वंडरलैंड से वंडरलैंड की यात्रा 

By  तत्याना षुर्लेई

विशाल भारद्वाज की नयी फ़िल्म ‘रंगून’ युद्ध के बारे में है. शुरुआत में दर्शकों को लड़ाई के दो रास्तों के बारे में बताया जाता है, एक महात्मा गाँधी का अहिंसा वाला और दूसरा सुभाष चन्द्र का हिंसा वाला. ऐसा लगता है जैसे फ़िल्म की कहानी कुछ दार्शनिक होने वाली है और इसका आधार ‘युद्ध की वैधता’ होगी. लेकिन फ़िल्म के दुसरे भाग में पता चलता है कि यह देशभक्ति-श्रृंखला वाली फ़िल्म है, जिसमें इतनी सारी चीज़ें डाल दी गई हैं कि नायकों के चरित्र और उनके चारित्रिक बदलाव को दिखाने के लिए ज़्यादा स्थान बचा ही नहीं है. फलस्वरूप फ़िल्म न तो देशभक्ति और गद्दारी के बारे में कोई दिलचस्प कहानी कह पाती है और न ही एक कठिन और नामुमकिन प्यार के बारे में. फिर भी,‘रंगून’ की बुनियाद में एक खुबसूरत आईडिया दिखाई देता है.

फ़िल्म की नायिका, मिस जूलिया (कंगना रानौत) ऐलिस की तरह एक वंडरलैंड जानेवाली है, जहाँ आम दुनिया के नियम बिलकुल नहीं चलते हैं. जंगल के कैम्प में रहनेवाले सिपाहियों को दिलासा देने और उनका मनोरंजन करने के लिए वह सुरक्षित और आरामदेह (कम्फर्टेबल) बॉम्बे से बर्मा जा रही है. यद्यपि लेविस कैरोल की ऐलिस और मिस जूलिया में यही अंतर है कि विशाल भारद्वाज की नायिका वंडरलैंड (बर्मा) जाने से पहले भी एक दुसरे तरह की वंडरलैंड (बॉम्बे) की निवासी है. बम्बइया सपनों का कारखाना वास्तविकता से बहुत अलग है, लेकिन यह अलगाव ही वह कारण है जिसके चलते मिस जूलिया और वहाँ काम करने वाले अन्य लोगों के लिए यह वंडरलैंड सुरक्षित है. फ़िल्म वाले फ़िल्म के सब से अच्छे गाने, ‘जूलिया’ के सीक्वेंस में दिखाते हैं. उनका सिर्फ एक प्यार है, मिस जूलिया और चिंता भी सिर्फ एक है कि मिस जूलिया का नेक्स्ट शॉट और अच्छा हो सकता था. इस दुनिया में बुराइयाँ तो ज़रूर होती हैं लेकिन सब को पता है कि अंत में मास्क पहननेवाली फीयरलेस हीरोइन आ जाएगी और सब को बचा लेगी, पर नए वंडरलैंड में ऐसा नहीं होगा.

विशाल भारद्वाज उन दो अजीब दुनियाओं पर खुद को ज़्यादा केन्द्रित नहीं कर पाया है. यह बात अजीब इसलिए भी है कि ‘रंगून’ की कहानी में यह अच्छी तरह दिखाई देता है कि जूलिया के फ़िल्म या फिल्म-शूटिंग वाले सारे दृश्य क़ुरबानी और देशभक्ति वाले प्लॉट से ज़्यादा अच्छे हैं, ऐसा लगता है जैसे भारद्वाज खुद ही असमंजस में है कि उसको अपनी कहानी से क्या-क्या अपेक्षाएं हैं! फ़िल्म का दूसरा भाग पहले से कमज़ोर है. दुसरे भाग में ट्रेजेडी तो है लेकिन इसके बावजूद भी ये सारी मौतें और डिस्टर्बिंग सीन्स वास्तव में कुछ ख़ास डिस्टर्बिंग नहीं हैं, और ‘तलवार’ वाले प्लॉट में कोई थ्रिल ही नहीं है. सच्चाई यह है कि इस तलवार वाली कहानी में कोई बड़ा सरप्राइज आता ही नहीं है.

‘जूलिया’ गाने के अलावा फ़िल्म में और भी अच्छे गाने हैं जिनमें से खास तौर पर ‘टिप्पा’ और इसका ट्रेन सीक्वेंस बहुत सुन्दर है. इस गाने में लार्स वॉन ट्रायर की ‘डांसर इन द डार्क’ फ़िल्म का बड़ा प्रभाव है लेकिन कहा जाता है कि लार्स वॉन ट्रायर खुद ‘दिल से’ (1998) के ‘चल छैंया छैंया’ गाने के दृश्य से प्रेरित था. जब तक लोग कुछ नया और आर्टिस्टिक वैल्यू निकालते रहेंगे, तब तक प्रेरणा नक़ल नहीं कहलायेगा. और, ‘टिप्पा’ गाना इसी तरह का है. सुंदर दृश्यों के अलावा भी इसका एक अलग महत्व है, दर्शकों को अच्छी तरह से दो वंडरलैंड्स दिखाई देते हैं. बर्मा-यात्रा के पर्यटकीय अंदाज की सुंदरता और चाक-चौबंद सुरक्षा अचानक से खतरे में तब्दील हो जाते हैं. युद्ध की दुनिया में स्वागत आफत की दुनिया में फंसने जैसा है; बर्मा आए हुए लोगों पर लड़ाकू विमानों का हमला शुरू हो जाता है. इस दृश्य के बाद सभी को पता चलता है कि वे अब बिलकुल अलग दुनिया में आ गए हैं. एक ऐसी दुनिया, जहाँ कोई सुपर, फीयरलेस हीरोइन किसी को बचा नहीं सकती है. फिर भी, कुछ समय बाद अपने प्रेमी, नवाब मलिक (शाहिद कपूर) की जान बचाने वाली मिस जूलिया के फ़िल्मी स्टंट वाले सीन यहाँ फिर से बहुत अच्छा और ताजा लगने लगता है और यह फ़िल्म के दुसरे भाग का सब से अच्छा सीक्वेंस है, जिसमें दो वंडरलैंड्स मिल जाते हैं. सपनों की दुनिया में रहनेवाली जूलिया को इसके बावजूद भी हारना था जबकि वह मिशन में शुरू में ही सफल हो गयी थी. मिस जूलिया और क्रूर मेजर हार्डिंग (रिचर्ड मकेब) ने एक क्षण के लिए एक-दुसरे की दुनिया की अदलाबदली कर लेते हैं. मिस जूलिया सुपर-हीरोइन के कपड़े पहनकर नवाब को बचाने की कोशिश करती है, और मेजर हार्डिंग एक्टिंग का इस्तेमाल कर उसको धोखा देता है क्योंकि युद्ध युद्ध होता है, युद्ध के बारे में एक हैप्पी एंड वाली फ़िल्म नहीं. बहरहाल फ़िल्म इंडस्ट्री के बारे में एक फ़िल्म बनाकर भी विशाल भारद्वाज इस टॉपिक का पूरा इस्तेमाल नहीं कर पाया है, हालाँकि उसकी कहानी में यह स्पष्ट है कि फिल्मवाले फ़िल्मी तत्व उसको सब से अच्छे लगते हैं.

जूलिया, नवाब और जापानी सिपाही की जंगल-यात्रा भी फ़िल्म का एक अच्छा हिस्सा है, जिसमें न सिर्फ जूलिया और नवाब का प्यार होता है बल्कि दर्शकों को भी पता चलता है कि युद्ध कितना क्रूर और अमानवीय होता है, साथ ही साथ दोस्त और दुश्मन का विभाजन भी आसान नहीं होता है. लोग अपनी मर्ज़ी से सिपाही नहीं बनते हैं, वे देशभक्त होने के बावजूद भी अपने परिवारों के साथ रहना चाहते हैं. अफ़सोस की बात यह है कि कैम्प में आने के बाद ये सारी दिलचस्प बातें कहीं गायब हो जाती हैं और फ़िल्म में बिलकुल नयी कहानी आ जाती है जिससे भारद्वाज खुद थोड़ा-सा परेशान लगता है. देशभक्ति वाला भाग फ़िल्म का सब से कमज़ोर भाग है और इसमें कई ऐसे तत्व, टुकड़े हैं जो विशाल भारद्वाज के स्टैण्डर्ड से बहुत नीचे के हैं. उदहारण के लिए नवाब के राष्ट्रगीत गाने वाला दृश्य इसी तरह के एक बैड-टेस्ट का उदाहरण है, ऐसा लगता है जैसे यह विशाल भारद्वाज ने नहीं किसी और ने बनाया है. यहीं पुल वाला अंतिम सीक्वेंस भी अच्छा नहीं है. फ़िल्म के तीनों नायक-नायिका इस सीक्वेंस में कागज़ के कठपुतली लगते हैं, इसीलिए इन्हें देखते समय दया नहीं, बल्कि शर्मिंदगी का अहसास होता है.

जिनकी फ़िल्म में बिलकुल ही ज़रुरत नहीं थी, उन सारी चीजों को फिल्म में डालने के कारण कहानी में दिलचस्प और ताजे विचारों के लिए जगह ही नहीं बची थी और यह अफ़सोस की बात भी है क्योंकि ‘रंगून’ में बहुत अच्छे और दिलचस्प चरित्र हैं. मिस जूलिया दो आदमियों के रिश्ते में है जिनमें से एक, रुसी बिलीमोरिया (सैफ अली खान), बॉम्बे वाले, सुरक्षित वंडरलैंड का हिस्सा है, और दूसरा, नवाब मलिक नए और खतरनाक वंडरलैंड का. उनमें से एक का चुनाव करना एक खास ज़िन्दगी का चुनाव करना भी होता, इसलिए मिस जूलिया के लिए यह चयन इतना मुश्किल लगता है.

दुर्भाग्य से मिस जूलिया के चरित्र को विकसित करवा पाने की जगह फ़िल्म में बिलकुल ही नहीं थी, इसलिए वह फिल्म के अंत में वैसे ही भोली लगती है जैसे फिल्म के शुरू में लगती थी. अगर स्क्रिप्ट थोड़ा-सा बेहतर होता तो कंगना रानौत का प्रदर्शन और भी अच्छा होता. यहीं पर सवाल उठता है कि अभिनय-प्रतिभा को दिखाने के लिए अगर स्क्रिप्ट में कोई जगह नहीं है, तो फ़िल्म में अच्छे अभिनेता-अभिनेत्रियों की फिर क्या ही ज़रुरत है? शाहिद कपूर और सैफ अली खान को एक्टिंग के लिए कंगना रानौत से थोड़ा-सा ज़्यादा मौका मिला है, साथ ही यहीं पर एक समस्या भी दिखाई देती है. वे तीनों परदे पर बस आते हैं और बातचीत करते हैं, चरित्र के निर्माण और विकास में योगदान देने वाले स्क्रिप्ट और अभिनय के अभाव में दर्शकों को उन्हें अच्छी तरह पहचानने और समझने का मौका नहीं मिलता है. यही कारण है कि फ़िल्म देखनेवालों के लिए यह कोई बात नहीं है कि वे जीते हैं या मर जाते हैं, क्योंकि उनसे दर्शकों का कोई गहरा संबंध स्थापित ही नहीं हो पाता है.

तीनों मुख्य पात्रों के अतिरिक्त एक बहुत दिलचस्प पात्र मेजर हार्डिंग भी है. वह बिलकुल ताजातरीन और नया खलनायक है, जिसको भारतीय संस्कृति से प्यार है और जो साथ ही साथ भारतीय लोगों के प्रति नस्लवादी व्यवहार भी करता है. लेकिन यहाँ भी उसके चरित्र को दिखाने के लिए फिर से जगह नहीं है. बस अचानक से वह एक क्रूर इंग्लिशमैन बन जाता है, जो सिर्फ यह कहता है कि मैं गोरा हूँ इसलिए हमेशा सही हूँ, या फिर भारतीय लोगों को अपमानित करता है. युद्ध का विषय विशाल भारद्वाज के लिए सहज नहीं था इसलिए जो तत्व देश की आज़ादी की लड़ाई से सम्बंधित हैं, वे सब से कमज़ोर हैं. अगर युद्ध सिर्फ एक पृष्ठभूमि (बैकग्राउंड) होती या भारद्वाज इसे फ़िल्म इंडस्ट्री के परिप्रेक्ष्य में देखता (जो बार-बार कई एक दृश्यों में बहुत अच्छी तरह दिखाता भी है), तो ‘रंगून’ सचमुच बहुत अच्छी हो सकती थी, और उसके एक्टर्स भी यह साबित कर सकते थे कि वे सचमुच में कितने प्रतिभाशाली लोग हैं.

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तत्याना षुर्लेई पोलैंड की रहने वाली हैं, एक इंडोलॉजिस्ट (भारतीय उपमहाद्वीपीय भाषा और संस्कृति की जानकार)  और फिल्म आलोचक हैं. हिंदी की मशहूर पत्रिकाओं और ब्लॉग्स के लिए लिखती रही हैं. पोलैंड के शहर क्राकोव स्थित जेगिलोनियन विश्वविद्यालय से द कोर्टसन फिगर इन इंडियन पॉपुलर सिनेमा: ट्रेडिशन, स्टीरियोटाइप, मैनिपुलेशननामक विषय पर पीएचडी हैं. वर्तमान में मनिपाल विश्वविद्यालय, कर्नाटक के यूरोपीय अध्ययन संस्थान में पढ़ाती हैं.

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What Is Post-Truth: Dhiraj K. Nite

The term of post-truth and post-fact has recently become a commonplace. It is no more confined to the realm of politics, that is, post-truth politics but informs the subjectivity in a wider social life. It seems to constitute the substance of a public sphere of the post-Fordist multitude itself. Our following discussion makes an exposition of its characteristic feature and foundational root. It is, I suggest below, a discourse of the contemporary forms of life. #Author

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Via-franck biancheri

Post-truth: A discourse of the contemporary forms of life

By Dhiraj K. Nite

Post-truth relates to a public sphere. It is characterised by the repeated assertion of a set of opinions, which disregards the contradictory fact and ignores the factual rebuttal. Hence, it is, one and the same time, post-fact:the violation of what Carr (1961) and Ricoeur(1984) consider the scientific method.[i] This public sphere is akin to what Habermas(1989) terms ‘the plebiscitary-acclamatory form of regimented public sphere’.[ii] This is a consuming public rather than rational-critical debating public: the latter is the liberal model of the bourgeois public sphere that puts reason to use for fostering public opinion. The latter normally happens to be a critic of the authorities and calls on the public authority to legitimate itself before public opinion. The latter is brought into play as a critical authority in connection with the normative mandate that the exercise of political and social power be subject to publicity. By contrast, post-truth public opinion is the object to be moulded in connection with a staged display of and manipulative propagation of publicity in the service of persons and institutions: what Habermas simplistically terms ‘non-public opinion’ and ‘quasi-public opinion’(ibid: 236, 247). Post-fact public opinions are currently working in great numbers. The commentators have identified these in the contexts of the victorious campaigns of Trump, Brexit and the role of Russia and Syria in the Aleppo humanitarian crisis. As also the jingoist aggression over the issues, including beef, love jihad, the encounterkilling of IshratJahan, capital punishment of Afjal Guru and YakubMenon (2014),the Bhopal Encounter of six SIMI associates (2016) and the likes, is a similar case in India.

The term of post-truth, however, appears to be the elemental feature of the contemporary public sphere. Furthermore, it is supposed to be connected with the very desire of free people to live in a post-truth world, to express a post-truth tendency and work on a post-truth narrative structure cum strategy. It is an epistemological condition in which the attitude towards the very question of truth has become not merely ambivalent,pragmaticand self-serving. Instead, truth itself has become dispensable in this scheme of post-truth.[iii]Here it is marked out from another Habermasian viewpoint. The latter maintains that in a comparative sense the concept of public opinion is to be retained because the constitutional reality of the social-welfare state must be conceived as a process in the course of which a public sphere that functions effectively in the political realm is realised: that is to say, as a process in which the exercise of social power and political domination is effectively subjected to the mandate of democratic publicity (ibid: 244). Post-truth opinion obviates any distinction between public opinion and non-public opinion or quasi-public opinion, at the first place. Then, it affirms its non-dialogical, cynical reality. It valorises the logic of emotion as the final referent and mocks that of rationalism as well as universalism. Consequently, the terms of post-humanism,[iv] post-fact and the politics of America First, India First and the likes, and the society of spectacle and the polity of control tend to feed each other.[v] All this surpasses the negative connotation, whatsoever, attached to Habermasian term of non-public opinion and regimented cum manipulative public.

The desire of free people to live in a post-fact world is, it could be said, connected with some circumstantial factors, which form the materiality and subjectivity of contemporary forms of life, as these are, from the late twentieth-century.One of them relates to the postmodern criticism of enlightenment and modernity.The postmodern thinking has begun to take hold in the aftermath of the golden era of capitalism (1945-70), the crushing defeat faced by the campaigns for emancipatory cum egalitarian transformation (1967-80), the stifling experience of the existing socialism, and the emergence of a political economic scenario in which no promising alternative of the neo-liberal market economy is imminent.[vi]This thinking challenges, inter alia, the notions of objectivity and universal truth. It advances, among others, the idea of relativism. It reduces a treatise to simply a discourse that is a product of the [decentred] power relationship.[vii]

The post-Fordist forms of life connect to post-truth public sphere. The former includes the pre-eminence of immaterial labour, interactive and communicative labour, affective labour, and the roles of general intellect, social cooperation and virtuosity in the work performance (Virno 2004).[viii]The two emotional tonalities of thepost-Fordist multitude are opportunism and cynicism. Opportunism is marked by unexpected turns, perceptible shocks, permanent innovationand chronic instability (ibid:86). It is now a systemic behaviour caused by structural instability. In the post-Ford era mode of production, that is ajust-in-time method and informatisedaccumulation, opportunism acquires a certain technical importance. It is the cognitive and behavioural reaction of the contemporary multitude to the fact that routine practices are no longer organised along uniform lines; instead, they present a high level of unpredictability. Precisely this ability to manoeuvre among abstract and interchangeable opportunities which constitutes professional quality in certain sectors of post-Fordist production, sectors where the labour process is not regulated by a single particular goal, but by a class of equivalent possibilities to be specified one at a time. The information machine, rather than being a means to a single end, is an introduction to successive and opportunistic elaborations. Opportunism gains in value as an indispensable resource whenever a diffuse communicative action permeates the concrete labour process.

Likewise, cynicism is also connected with the chronic instability of forms of life and linguistic games. For general intellect is now associated withthe loss of the principle of equivalency (ibid:87). Cynics are related to certain cognitive premises and the absence of ‘real equivalence’. This is connected with thenon-dialogical renunciation of an inter-subjective foundation and a standard moral evaluation and abandonment of equality (ibid:88).

Idle talk and curiosity are some of other features of the contemporary multitude.Authentic life to unauthentic life, the world workshop to a world–spectacle: a shift has occurred.[ix] These attitudes have become the pivot of contemporary production in which the act of communication dominates, and in which the ability to manage amid continual innovations is supreme. Curiosity is connected with the autonomy from predefined goals, from limiting tasks, from the obligation of giving a faithful reproduction of the truth (ibid:89). These are connected with post-Fordist virtuosity (praxis, technical skill).

An accentuated taste for difference and the refinement of the principle of individuation constitute the selfof post-Fordist multitude (ibid: 111).The latter resists homogenisation, statistical dehumanisation and monotony of secular liberalism, which they consider as the tools of governmentality. The postmodern thinking serves it when it posits real labour, as opposed to abstract labour, in the shape of ‘the diverse ways of being human or the politics of human belonging’ (Chakrabarty2000: 70).[x]Instead of contributing to social integration, the neoliberal administration acts rather as a disseminating and differentiating mechanism in its endeavour of social control from the 1980s (Hardt and Negri 2001: 340).

Post-Fordism, as also the conservative revolution in the political economy from the 1980s(Piketty 2014),[xi]is characterised by the co-existence of the most diverse productive models. The ex-colonies, ex-socialist economies and the advanced capitalist countries are, for the first time, faced with a similar pattern in the organisation of workplace. The instability defines the latter, which is an expression of casualization, subcontractualisation and regulated informality.[xii]This is the material base of valorisation of difference. It is, however, a misleading assumption to regard this materiality as the prime mover. Instead, the very Fordist multitude had emphasised the desire for the personal autonomy or autonomous self, which had mediated the social unrest in the 1960s and 1970s. Such a desire, in the aftermath of the failure of transformative efforts, shifted to the non-socialist and anti-socialist demands, including the politics of the diverse ways of being human and identitarianism and the verncularisation of labour politics.[xiii]

If the publicness of the general intellect of multitude, it could be said, does not yield to the realm of a public sphere, of political space in which the many can tend to common affairs, then it produces terrifying effects. A publicness without a public sphere, this is the downside of the experience of the post-Fordist multitude. In this context, post-truth has surfaced in the form of a discourse of the contemporary forms of life.

Reference:

[i] EH Carr, 1961. What is History?Cambridge: Cambridge University Press.Paul Ricoeur, 1984. Time and Narrative (Translated by Kathleen McLaughlin and David Pellauer). Chicago: University of Chicago Press,

[ii]JurgenHabermas. 1989/1962.The Structural Transformation of the Public Sphere: an inquiry into a category of bourgeois society (translation by Thomas Burger with the assistance of Frederick Lawrence). Massachusetts: the MIT Press.

[iii] It is grounded in the belief that no system of equivalency is stable and certain for any shceme of universal measurement.

[iv] It refers to the context of biopolitical ontology and its becoming, where the transcendent is unthinkable. In such ontology Value is outside measure, for no system of equivalency is stable and certain. Value and justice seem to be determined by humanity’s own continuous innovation and creation rather than transcendent power or measure (Hardt and Negri 2001: 355). Michael Hardt and Antonio Negri, 2001.Empire.USA: Harvard University Press.

[v] The society of the spectacle – the control of broadcast and the deployment of dominant as celebrities and their views as an advertisement for manufacturing of consent – isa feature of the postmodern world. It rules through the weapon of the passion, fear – desire and pleasure that are intimately wedded to fear. The politics of fear is spread through a kind of superstition, that is, the negation of rationalism. It takes away from a struggle over the imperial constitution of the world order (Hardt and Negri 2001: 322-23).

[vi]DipeshChakrabarty suggests that the Foucauldian term of biopower and biopolitics – life as part of administration – is the final chapter of modernity. https://www.youtube.com/watch?v=23QV66LdPOM.accessed.16February2017. By contrast, biopower and biopolitics are the components of postmodernisation, that is, the control paradigm of government and the society of control, as suggest Hardt and Negri (2001: 318-330, 344-411).

[vii] Michel Foucault, 2008/1976. The History of Sexuality, Vol. I. (Translated by Robert Hurley). Australia: Penguin Group. Colin Gordon, 1980. Power/Knowledge: Selected Interviews and Other Writings 1972-77 of Michel Foucault. New York: Pantheon Books.

[viii] Paolo Virno, 2004. A Grammar of the Multitude: For an analysis of contemporary forms of life. Los Angeles: Semiotext(e).

[ix] For Heidegger, the authentic life finds its adequate expression in labour. The world is a world-workshop, a complex of productive means and goals, the theatre of a general readiness for entering the world of labour. This fundamental connection with the world is distorted by idle talk and curiosity. One who chatters and abandons oneself to curiosity does not work, is diverted from carrying out a determined task, and has suspended very serious responsibility for taking care of things. By contrast, the multitude, passionate aboutan autonomous self from the 1960s, rejects the very fact that labour or work forms the human essence or being-in-the-world, that is, Heideggerian ontic. Thereby they discard the negative connotation attached to the inauthentic life within the productivist paradigm. To them, the authentic life reduced to labour/work is basically a life sentence. Martin Heidegger, 1962. Being and Time (translated by John Macquarrie and Edward Robinson). New York: Harper and Row.

[x]DipeshChakrabarty, 2008/2000. Provincialising Europe: Postcolonial Thought and Historical Difference. Princeton: Princeton University Press.

[xi] Thomas Piketty, 2014. Capital in the Twenty-First Century (translated by Arthur Goldhammer). Cambridge: Harvard University Press.

[xii]PrabhuMohapatra, 2005. ‘Regulated Informality’, in S. Bhattacharya and Jan Lucassen (Eds.), Workers in the Informal Sector. New Delhi: Macmillan.

[xiii]Sabyasachi Bhattacharya and RanaBehal (Eds.), 2016.The Vernacularisation of Labour Politics.New Delhi: Tulika Books.

Dhiraj k Nite

Dr. Dhiraj Kumar Nite, A Social Scientist,  University of Johannesburg, Ambedkar Univeristy Delhi. You can contact him through dhirajnite@gmail.com

‘रईस’ की तुलना में ‘काबिल’ अच्छी फिल्म है: तत्याना षुर्लेई

 

“रईस” की तुलना में मैं “काबिल” की ओर हूँ. यह फ़िल्म “रईस” से अच्छी इसलिए है कि “काबिल” यह दिखावा नहीं करता है कि वह कुछ नया और आर्टिस्टिक दिखानेवाला है. दोनों फिल्मों को देखकर फिर से यह दोहराना पड़ेगा कि अगर किसी को बारीक सिनेमा बनाना नहीं आता है तो उसे मुख्यधारा में ही रहना चाहिए. मुख्यधारा और मनोरंजन कोई कमतर जगह नहीं है और ऐसी फिल्मों की बड़ी ज़रुरत है. “काबिल” में कुछ न कुछ कमियां तो हैं लेकिन “रईस” से अच्छी इसलिए लगती है कि यह अपने दर्शकों के प्रति फेयर और फ्रैंक है. इसका ट्रेलर भी किसी को धोखा नहीं देता है. सब को पता है कि यह मनोरंजन के लिए बनी एक व्यावसायिक फ़िल्म है और जिसकी कहानी उम्मीद के मुताबिक ही है. #लेखक

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काबिल: मनोरंजन कोई बुरी बात नहीं है

By तत्याना षुर्लेई

फ़िल्म की कहानी रोमांटिक और मासूम प्यार से शुरू होती है, फिर इसमें दारुण दुःख पहुंचाने वाली क्रूरता, हिंसा और अन्याय आते हैं, और अंततः राहत देनेवाला बदला. फ़िल्म का नायक, रोहन भटनागर (ऋतिक रोशन) एक अँधा जवान आदमी है जो एक सुन्दर लड़की, सुप्रिया (यमी गौतम) से प्यार और शादी करता है. सिनेमा में दिखने वाले विकलांग लोगों में अक्सर किसी एक कमी की जगह उन्हें कई असाधारण क्षमताएं दी जाती हैं (न सिर्फ भारतीय फिल्मों में – ऐसा स्टीरियोटाइप दुनिया की बहुत सारी फिल्मों में प्रभुत्व रखता है). रोहन भी इसी तरह का आदमी है – उसको दिखाई नहीं देता है लेकिन इस विकलांगता के प्रतिउत्तर में वह दुसरे लोगों की आवाज़ों को अच्छी तरह नक़ल करता है. रोहन कार्टून का डबिंग करता है और इस काम में इतना प्रतिभावान है कि अकेले ही फ़िल्म के सारे नायकों की अलग-अलग आवाजें देता है. उसकी यह योग्यता बाद में बदला लेने वाले दृश्यों में उनकी बहुत मदद करेगा.

आसपास में रहनेवाले दो अपराधी, अमित (रोहित रॉय) और उसका दोस्त माधव (रोनित रॉय) बार-बार रोहन और सुप्रिया की ख़ुशी के आड़े आते हैं. इनके लिए इस जोड़ी की विकलांगता मजाक उड़ानेवाली बात है. एक दिन वे छेड़-छाड़ से आगे चले जाते हैं और सुप्रिया का बलात्कार करते हैं. अमित का भाई शहर का बड़ा आदमी है इसलिए वह आसानी से भ्रष्ट पुलिस को अपने पक्ष में कर लेता है. भ्रष्ट पुलिस हिंदी सिनेमा का सब से पसंदीदा टॉपिक है जिससे फिल्मवाले अभी तक थके नहीं हैं. लेकिन विषयों का दुहराव और दर्शकों के उम्मीदों पर खरा उतरने वाला प्लॉट मुख्यधारा की सिनेमा के सबसे जरुरी हिस्से हैं.

अपनी पत्नी की मौत के बाद, यह देखकर कि पुलिस कुछ नहीं करेगा, रोहन खुद बदला लेता है और भ्रष्ट पुलिस इंस्पेक्टर से जीतता है. यह प्लॉट बहुत टिपिकल और आसान है – ऐसी फिल्में तो बार-बार बनती हैं, फिर भी हमेशा की तरह वे अपने दर्शकों को अंत में बड़ी राहत देती हैं. “काबिल” में नयी बात यह है कि फ़िल्म की कहानी एक ही तरह के दो दृश्यों से अच्छी तरह खेलती है. उदहारण के लिए रोहन की पत्नी के बलात्कार के केस में इंस्पेक्टर बार-बार बोलता है कि सबूत के बिना वह कुछ नहीं कर सकता है, लेकिन बाद में, बदले वाले दृश्य में, फ़िल्म का नायक भी पुलिस से अपने क्राइम के सारे सबूत छुपाता है. सुप्रिया ने फँसी लगा ली तो रोहन ने माधव को भी फांसी पर लटकाया. सुप्रिया का बलात्कार करने से पहले उसको बिस्तर से बांधा और उसके मुँह में कपड़ा लगाया गया था ताकि वह कुछ बोल न सके, तो ऐसी ही स्थिति लेटाकर अमित की भी हत्या होती है. इस तरह के अलग-अलग आइने में प्रतिबिंबित होने वाले दृश्यों की तरह सारी उल्टी परछाईयाँ फ़िल्म में दिखाई गईं हैं.

रुसी लेखक, अन्तोन चेखव ने एक बार लिखा की नाटक के शुरू में दर्शकों को अगर दीवार में लटकी बन्दुक दिखाई देती है तो इसका मतलब यह है कि कहानी में इसका इस्तेमाल जरुरी है. “काबिल” में इस नियम का प्रयोग बहुत हुआ है. लगभग हर छोटे दृश्य, जैसे साईकिल वाला, या रोहन का पत्नी को घड़ी गिफ्ट करना इत्यादि. पहले तो इन सब का कोई बड़ा मतलब नहीं दिखता है, लेकिन बाद में ये सारे दृश्य वापस आते हैं और नायक अपने बदले वाले दृश्य में इन सब का कोई न कोई प्रयोग करता है.

सबसे अच्छी बात यह है कि मुख्यधारा की दूसरी फिल्मों के विपरीत “काबिल” में जब भी  किसी ऑब्जेक्ट का दुबारा इस्तेमाल है तो दर्शकों को याद दिलानेवाला बोरिंग फ्लैशबैक या ऑफ-स्क्रीन से झुंझला देने वाली आवाजें नहीं आती हैं (बस फ़िल्म के अंत में अंधे लोगों के बारे में रोहन के शब्द दोबारा आए हैं). साथ ही साथ “काबिल” अपने दर्शकों की बुद्धिमत्ता का सम्मान करता है जो कि पॉपुलर फिल्मों में अक्सर नहीं होता है.

ऋतिक रोशन ने “काबिल” से पहले भी विकलांग आदमी का अभिनय किया है. मगर इस बार उसने अच्छी तरह से अपने सबसे बड़े हुनर को अपने नायक की विकलांगता से जोड़ दिया है. ऋतिक का सब से बड़ा कौशल उसका नाच है जो इस बार ड्रीम सीक्वेंस का हिस्सा नहीं है. डांस स्कूल के सीन में ऋतिक फिर से दर्शकों को यह दिखाता है कि वह बॉलीवुड का सब अच्छा डांसर है. पुराने थिएटर में लड़ाई के सीन में नायक के अंधापन के साथ अँधेरा का भी दिलचस्प इस्तेमाल है. यह जरुर है कि नायक का कौशल कभी-कभी कुछ ज़्यादा ही दिखाया गया है जो कि विकलांग आदमी में नहीं होते हैं.

अंधे लोगों की ज़िन्दगी में जो कुछ भी अजीब चीजें, हरकतें सामान्यतः दिखती हैं, फिल्मवालों ने भरसक कोशिश की है कि उनकी व्याख्या प्रस्तुत की जाएँ. शादी की रात, नायक और नायिका के कमरे में जली हुई सारी मोमबत्तियाँ, जो ट्रेलर में भी दिखाई गईं हैं, किसी को अजीब लग सकती हैं. इसीलिए फ़िल्म में उसकी व्याख्या है कि वे क्यों आईं! यहाँ मोमबत्ती फ़िल्म में चेखव वाली चीज़ बन गयी. दिलचस्प बात यह भी है कि इस फ़िल्म में ऋतिक रोशन की दूसरी फिल्मों से अलग दर्शकों को उसके दोनों अंगूठे पुरे समय दिखाई देते हैं. यह निशान कोई विकलांगता नहीं है, बल्कि नायक के भाग्यशाली होने की निशानी है, फिर भी अपनी पुरानी फिल्मों में ऋतिक इसे छुपाता था. चूँकि “काबिल” सामन्य लोगों से अलग दिखने वाले लोगों के शांति से जीने के अधिकार और उनके प्रति होने वाले भेद-भाव के बारे में फ़िल्म है, इसीलिए दूसरों से अपनी भिन्नता दिखाना विकलांगता के पक्ष में एक मज़बूत आवाज़ है. विकलांग नायक का अभिनय करना और खुद दूसरों से कुछ अलग होना अलग-अलग बातें हैं और यहाँ ऋतिक ने फिर से अपनी एक और खासियत का अच्छा इस्तेमाल किया.

फ़िल्म में कमियां ज़रूर हैं और उनमें सब से बड़ी शायद फ़िल्म का आइटम नंबर है. इसकी ज़रुरत बिलकुल नहीं थी, क्योंकि यह गाना और परफॉरमेंस अच्छा नहीं हैं. शायद फिल्मवाले आगे आने वाली अपने नायक की अलग-अलग लड़ाइयों से पहले दर्शकों को थोडा-सा आराम देना चाहते थे, फिर भी अगर ज़रुरत थी तो इसे ज़्यादा अच्छी तरह से करना चाहिए था. सुप्रिया का भूत वाला आईडिया भी ज़्यादा अच्छा नहीं था, इससे फ़िल्म बस ज़्यादा दयनीय बन जाती. नायिका की मौत और उससे पहले उसके प्रति घटित अपराध ही इतने कष्टप्रद हैं कि इससे ज़्यादा कुछ डालने की जरुरत नहीं थी.

फ़िल्म में एक चिंताजनक बात माधव की बहन के प्रति रोहन का व्यवहार है. माधव और उसका दोस्त अमित जब सुप्रिया को छेड़ते थे तो रोहन को मालूम था कि यह महसूस करना कितना कष्टप्रद है. फिर भी अपने बदले वाले क्षण में रोहन माधव की बहन को छेड़ता है. यह ज़रूर है कि रोहन का व्यवहार उतना ख़राब नहीं है जितना अमित और माधव का था. वह बस अमित की आवाज़ का नक़ल करता है और यह दिखाने की कोशिश करता है कि यह सब बुराइयाँ अमित ही करता है. लेकिन, बाद में वह माधव को स्पष्ट करता है कि यह आईडिया उसे यह महसूस करवाने के लिए था कि जब कोई तुम्हारी प्यारी बहन को छेड़ता है तो तुम्हें कैसा लगता है. इस तरह की सोच पूरी दुनिया में बहुत पॉपुलर है– जब एक आदमी दुसरे आदमी की औरत से बदतमीजी करता है तो बदले में उसकी औरत से भी यही बदतमीजी करनी चाहिए. जबकि दोनों मामलों में औरतें एक तरह से बेकसूर होती हैं. इसीलिए आदमियों के झगड़े में उनको घसीटने और दंडित करने का यह आईडिया बहुत खतरनाक है.

अगर फ़िल्म में एक छोटा-सा स्पष्टीकरण यह होता कि अपराधी क्यों यह सब अपराध करते हैं तो यह भी कहानी के लिए और भी अच्छा होता, और आखिर में इतनी लड़ाइयों के बाद नायक के चेहरे पर ज़्यादा निशान दिखने चाहिए थे. मेनस्ट्रीम सिनेमा का हीरो सुपर हीरो की तरह होता है लेकिन फिर भी इतनी पिटाई के बाद हीरो के चेहरे में भी कोई न कोई चोट तो आता ही है. इन कमियों के बावजूद “काबिल” वीकेंड के शाम के लिए बहुत अच्छी फ़िल्म है जिसे देखते समय दर्शक रो सकते हैं, हंस सकते हैं और अंत में राहत महसूस कर सकते हैं.

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तत्याना षुर्लेई पोलैंड की रहने वाली हैं, एक इंडोलॉजिस्ट (भारतीय उपमहाद्वीपीय भाषा और संस्कृति की जानकार)  और फिल्म आलोचक हैं. हिंदी की मशहूर पत्रिकाओं और ब्लॉग्स के लिए लिखती रही हैं. पोलैंड के शहर क्राकोव स्थित जेगिलोनियन विश्वविद्यालय से “द कोर्टसन फिगर इन इंडियन पॉपुलर सिनेमा: ‘ट्रेडिशन, स्टीरियोटाइप, मैनिपुलेशन” नामक विषय पर पीएचडी हैं. वर्तमान में मनिपाल विश्वविद्यालय, कर्नाटक के यूरोपीय अध्ययन संस्थान में पढ़ाती हैं.

सीरिया को यहाँ से देखो: माने मकर्तच्यान

सीरिया के बारे में एक भारतीय के रूप में हमें कुछ नहीं पता है. हम भारतीय सचमुच के भारतीय रह नहीं गए हैं. जिनके कारण हमें भारतीय तमगे से नवाजा जाता है वह एलिट भारतीयता है. जिसकी जडें इंग्लैंड,अमेरिका और यूरोप से जुड़ी हैं. यही जडें भारतीय मानस का विश्वबोध विकसित करने में सबसे ज्यादा रोल अदा करती हैं. यह अकारण नहीं हैं कि दक्षिणपंथी ताकतों से लेकर वामपंथी  तक सीरिया के बारे में एकमय राय रखती हैं. सीरिया को यहाँ से देखो मतलब पूरब के नजरिये से देखने का मतलब क्या होता है, इस आर्टिकल से समझा जा सकता है.

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Bulent Kilic/Agence France-Presse — Getty Images

सीरिया में शतरंज

By माने मकर्तच्यान

सीरिया

यह नाम आज दुनिया के कोने-कोने में चर्चा में है. वर्षों से राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय  मीडिया की मुख्य ख़बरों में सीरिया का नाम उछलता रहा है. मध्य एशिया के इस मुल्क की ज़मीन किन शक्तियों के बीच संघर्ष का केंद्र बनी है और सीरिया में हो रही घटनाएँ क्यों विश्व की राजनीति का भविष्य तय करने वाली हैं – इस पेचीदगी को समझने का प्रयास करते हैं.

नक्शे पर सीरिया को देखें तो पाते हैं कि यह देश पूर्वी गोलार्द्ध पर और विभिन्न संस्कृतियों के केंद्र में स्थित है. उत्तर में आर्मीनियाई तोरोस पर्वतमाला ने मध्य पूर्वी के इस देश को माइनर एशिया से पृथक कर दिया है. पश्चिम में भूमध्य सागर तटीय क्षेत्र, पूर्व में मेसोपोटामिया और दक्षिण में अरब रेगिस्तान से यह मुल्क घिरा हुआ है. राजनीतिक मानचित्र के अनुसार पश्चिम में लेबनान, उत्तर में तुर्की, पूर्व में इराक, दक्षिण में जॉर्डन और पश्चिम दक्षिण में इजरायल से उसकी सीमाएं बांधते हैं. आज का सीरियाई अरब गणतंत्र मात्र 70 साल पुराना है लेकिन सीरियाई सभ्यता का आरंभ लगभग 6000 ई.पू. माना जाता है. इसके प्रमाण वहां विश्व प्राचीनतम शहरों जैसे एब्ला, मारी, उगारित आदि में देखने को मिलते हैं. इसकी राजधानी दमिश्क पृथ्वी पर निरंतरता में बसे हुए सबसे पुराने नगरों में से एक है. इस शहर का प्रारंभिक उल्लेख 15वीं शताब्दी ई.पू. मिस्र के फ़िरौन तुतमोस तृतीय के भौगोलिक नक्शे में पाया जाता है. पहाड़ों से घिरे तथा जीवन के लिए आवश्यक जल स्रोत बराडा नदी के नज़दीक होने के कारण इसकी अवस्थिति सामरिक और नागरिक दोनों ही दृष्टियों से महत्वपूर्ण है. देश का व्यापारिक महत्व रखनेवाला दूसरा शहर अल्लेपो है जो कि उतना ही प्राचीन है.

हज़ारों सालों से व्यापारिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और सामरिक चौराहे पर स्थित यह भूखंड शुरु से ही विश्व की विभिन्न शक्तियों से प्रभावित और नियंत्रित होता रहा है. यहीं से विश्व के सभी छोटे-बड़े विजेता गुज़रे हैं. अकाडिनी-सुमेरों से लेकर हित्तियों, मिस्र के फ़िरौन, अश्शूर और आक्मेनिड फ़ारसियों तक यहां आए. सिकंदर के बाद 87 ई.पू. में आर्मीनियाई राजा तिग्रान के साम्राज्य में सीरिया का मिल जाना और आगे 64 ई.पू में रोमन साम्राज्य का इस पर कब्ज़ा हो जाना उल्लेखनीय घटनाएं हैं. इसके उपरांत समय समय पर सेल्जुक तुर्क, क्रूसेडर्स, मंगोल, मिस्र के मामलुक अन्य जातियां यहां तबाही मचाकर गुज़र चुकी हैं.

सीरिया 16वीं सदी से अगली 4 सदियों तक उस्मान तुर्कों के अधीन रहा. 1918 में प्रथम विश्व युद्ध में उस्मानी साम्राज्य की हार के बाद सीरिया एक स्वतंत्र राज्य बनने की उम्मीद में था कि फ्रांस व् ब्रिटेन ने मध्यपूर्व का आपस में बंटवारा कर लिया. सीरिया फ्रांस के नियंत्रण में आ गया. सन् 1920 में हाशमी परिवार के फ़ैज़ल प्रथम के अंतर्गत सीरिया कुछ महीनों के लिए स्वतंत्र राज्य बनकर उभरा. 1936 के सितंबर में सीरिया और फ्रांस के बीच सीरिया की स्वतंत्रता को लेकर एक मसविदे पर दस्तख़त हुए और हाशिम अल-अतास्सी को सीरियाई आधुनिक गणराज्य के प्रथम राष्ट्रपति के रूप में चयनित करने की योजना बनी. हालांकि यह संधि अस्तित्व में कभी नहीं आई क्योंकि फ्रेंच विधानमंडल इस करार की पुष्टि से मुकर गया. सीरियाई राष्ट्रवादियों और अंग्रेज़ों के सतत दबाव में अप्रैल,1946 में फ्रांस को अपनी सेना सीरिया से हटा लेने पर मजबूर होना पड़ा और अंततः उन्होंने सीरियन रिपब्लिकन सरकार के हाथ में देश की सत्ता सौंप दी.

वर्तमान राष्ट्रपति बशर अल-असद के पिता हाफ़िज अल-असद का जन्म निर्धन परिवार में हुआ था. विद्यार्थी रहते हुए ही वे बाथ पार्टी से जुड़ गए थे. आगे चलकर वे सीरियन एयर फोर्स में लेफ़्टिनेंट बन गए. 1963 के सीरिया में तख़्तापलट के उपरांत बाथिस्ट सेना का पुरे सीरिया पर नियंत्रण हो गया और उससे जुड़े हाफ़िज अल-असद सीरियन एयर फोर्स के कमांडर नियुक्त कर दिए गए. 1966 में एक और तख़्तापलट के उपरांत वे रक्षा मंत्री बना दिए गए और अपने देश की राजनीति में बहुत लोकोप्रिय होते चले गए. यही वजह थी कि जब उन्होंने समस्त सीरियन सेना के अध्यक्ष सालाह जदीद को निकाल बाहर किया तो कोई हाय-तौबा नहीं मची. 1970 में वे सीरिया के प्रधानमंत्री बन गए और 71 में राष्ट्रपति पद के लिए चुन लिए गए. उसी अप्रैल में मिस्र के अनवर सादात, लीबिया के मुअम्मर गद्दाफ़ी के साथ हाफ़िज असद ने ‘फेडरेशन ऑफ अरब रिपब्लिक्स’ नाम का संघ बनाने की चेष्टा की. यह समझौता विश्व राजनीति में एक बहुत ही मजबूत गठबंधन का रूप ले सकता था. इस विचार का इन तीनों मुल्कों की जनता में जबरदस्त स्वागत भी हुआ किन्तु यह संघ मात्र पांच वर्षों तक ही चल पाया. और इन तीनों मुल्कों में अनेक मुद्दों पर कभी भी पूरी तरह सहमती नहीं बन पाई. 1982 में हम्मा शहर की घेरेबंदी और विरोधी मुस्लिम ब्रडरहुड के उदय के बीच हम्मा के चालीस हज़ार नागरिकों की हत्या का आरोप भी हाफ़िज असद पर लगा. 1983 के नवंबर में हाफ़िज को हृदयघात हुआ. उसी समय उसके भाई रिफ़ात अल-असद जो तब सीरियन सेना के प्रमुख हुआ करते थे, ने हाफ़िज का तख़्तापलट करने की नाकाम कोशिश की. 1994 में हाफ़िज के सबसे बड़े बेटे की कार दुर्घटना में हुई मौत के उपरांत हाफ़िज अधिक बीमार रहने लगे. इन्हीं परिस्थितियों में 1994 में हाफ़िज के छोटे बेटे बशर अल-असद को सीरिया की राजनीति में लाया गया. जून 2000 में हाफ़िज असद की मृत्यु हो गई किन्तु उसके पहले ही उन्होंने सेना एवं उच्च पदाधिकारियों का समर्थन बशर के पक्ष में सुरक्षित कर लिया था. सत्तांतरण निर्विघ्न रूप से हो गया. असद ने पहले बाथ पार्टी का नेतृत्व संभाला और फिर सीरिया के राष्ट्रपति निर्वाचित कर लिए गए. लेबनान के 2005 के ‘सीडर रिवोल्यूशन’ के बाद वहां की सीरियाई समर्थन वाली सरकार का पतन हो गया और सीरियन सेना को वहां से हटना पड़ा. इससे बशर की साख़ को काफ़ी बट्टा लगा किन्तु फिर भी वह 2007 में दुबारा राष्ट्रपति चुन लिए गए.

अल्पसंख्यक अलावित (शिया मुसलमानों की एक धारा) के प्रभुत्व वाली इस सरकार के अंतर्गत सीरिया आदर्श मुल्क नहीं है, ख़ासकर नागरिक-मानवाधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मामलों में. बावजूद इसके यह अरब दुनिया में एक मात्र बचा हुआ स्वतंत्र धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है. तुर्की और सऊदी अरब के मानवाधिकार-हनन के सामने सीरिया अभी भी शरीफ़ दिखता है. इसके लोकप्रिय, साम्राज्यवाद विरोधी और धर्मनिरपेक्ष सोच का आधार वहां की बाथ पार्टी (सीरियाई सरकार) की नीतियों से प्रेरित है, जिसमें मुस्लिम, ईसाई और द्रूज तीनों ही धर्मों के लोग शामिल हैं. मिस्र और ट्यूनीशिया के विपरीत, सीरिया में राष्ट्रपति बशर अल-असद को बड़ा जनसमर्थन प्राप्त है.

हालांकि हाल के वर्षों में बढ़ती बेरोज़गारी, सामाजिक स्तर और स्थितियों में गिरावट आई है और यह अकारण नहीं है कि वहां बड़े पैमाने पर विरोध प्रकट होते रहे हैं. विशेष रूप से 2006 में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के निर्देश पर मितव्ययिता, वेतन वृद्धि पर रोक, वित्तीय प्रणाली की नियंत्रण मुक्ति, व्यापारिक कानूनों में ‘सुधार’ और निजीकरण जैसी औषधियां पिला देने के उपरांत.

2010 में ह्यूमन राइट्स वॉच के अनुसार मानवाधिकारों के मामलों में सीरिया ‘दुनिया के सबसे ख़राब देशों में था’. सीरियाई अधिकारियों पर लोकतंत्र का ध्वंस करने, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार करने, वेबसाइटों पर रोक लगाने, ब्लॉगर्स को हिरासत में लेने और यात्रा पर प्रतिबंध लगाने जैसे अनेक आरोप लगाये गए. सीरिया के संविधान में लैंगिक समानता का अधिकार है किन्तु आलोचकों का कहना है कि व्यक्तिगत कानून और दंडसंहिता स्त्रियों के अधिकारों को सुरक्षित नहीं रख पाते. यही नहीं, वह पुरुषवादी ’प्रतिष्ठाजन्य हत्याओं’ के प्रति भी नर्म है।

2010 में ही मध्य-पश्चिमी एशिया एवं उत्तरी अफ्रीका में श्रृखंलाबद्ध विरोध-प्रदर्शन का दौर आरंभ हुआ जिसे अरब स्प्रिंग या अरब जागृति नाम से जाना जाता है. ‘अरब स्प्रिंग’ क्रान्ति ने अरब जगत के साथ-साथ समूचे विश्व को हिलाकर रख दिया था. इसकी शुरुआत ट्यूनीशिया में 17 दिसंबर,2010 को मोहम्मद बउजिजी- एक फेरीवाले के आत्मदाह से हुई थी. इस क्रांति की लपटें अल्जीरिया, मिस्र, जॉर्डन, यमन तथा अरब लीग व् इसके आसपास के क्षेत्रों में फैल गई. सीरिया भी उससे अछुता न रहा.

सीरियाई गृह युद्ध

सीरियाई गृहयुद्ध जॉर्डन की सीमा पर सटे एक छोटे से शहर दारा से शुरू हुआ. 17 मार्च,2011 को बशर अल-असद के त्यागपत्र की मांग को लेकर लोग सड़कों पर उतर आए. सीरिया का यह तथाकथित ‘शांतिपूर्ण’ विरोध-प्रदर्शन सीरियन सेना द्वारा बलपूर्वक दबा दिया गया. उसी जुलाई में सेना से टूटे हुए समूहों ने ‘मुक्त सीरियन सना’ के गठन की घोषणा की.

9 नवंबर,2011 तक संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक राष्ट्रपति बशर अल-असद के ख़िलाफ़ विद्रोह के दौरान 3500 से अधिक मौतें हुई, जिसमें से 250 से अधिक सिर्फ़ 2 साल तक के बच्चे थे. कहा जाता है कि अनेक अल्पव्यस्क लड़कों के साथ सुरक्षाबल के अधिकारियों ने सामूहिक बलात्कार भी किया. विरोध की लपटें तेजी से चारों ओर फैल गईं.

अगस्त 2013 में असद सरकार पर अपने नागरिकों के ख़िलाफ़ रासायनिक हथियार इस्तेमाल करने का आरोप लगा. जून में ही व्हाइट होउस ने घोषित किया था कि अमेरिका को इस बात का विश्वास है कि असद ने राष्ट्रपति पद की सीमाओं का उल्लंघन करते हुए अप्रैल में अपनी निरीह जनता पर रासायनिक हथियारों का प्रयोग किया है. हालांकि इस बात का कोई पुख़्ता सबूत वे अब तक नहीं दे पाए हैं. अमेरिकी विदेश सचिव जॉन केरी ने दावा किया कि उनकी यह जानकारी अखंडनीय है. यह भी कहा “दुनिया किसी मुगालते में न रहे, और उन तमाम लोगों पर हर हाल में जिम्मेदारी तय की जाएगी जिन लोगों ने विश्व की सबसे निरीह जनता पर जघन्यतम हथियारों का इस्तेमाल किया है कि इस दुनिया में कुछ भी और नहीं है जो इससे अधिक गंभीर हो!”

बशर अल-असद के इस संभावित अमानवीय कृत्य पर किसी भी तरह की नरमी न बरतते हुए भी यह कहना आवश्यक है कि सीरिया पर 12,192, इराक पर 12,095, अफ़गानिस्तान पर 1,337 बम गिराने वाले और इराक में यूनाइटेड नेशनस असिस्टेंस मिशन फॉर इराक की रिपोर्ट के मुताबिक 2016 में अकेले इराक में 19,266 नागरिकों को बमबारी से मार देने वाले ‘शांति दूत’ और नोबल पुरस्कार विजेता बराक ओबामा और उनके प्रशासन के मुंह से यह उक्ति अशोभनीय लगती है.

बहरहाल, अमेरिका में इज़रायल के तत्कालीन राजदूत माइकल ओरेन ने वॉल स्ट्रीट जर्नल में तब साहित्यिक अंदाज़ में लिखा था कि “असद ने अपनी स्वतंत्रता मांगती जनता पर जो हिंसक हमला किया है वह इज़रायल के इस भय की पुष्टि करता है कि सीरिया के जिस शैतान को हम जान गए हैं वह उस शैतान से भी बदतर है जिसे हम अब तक नहीं जानते”. मई,2011 तक इज़रायल के शीर्ष अधिकारियों- प्रधानमंत्री, रक्षा मंत्री, विदेश मंत्री और राष्ट्रपति सबने सार्वजनिक रूप से घोषित कर दिया था कि वे असद का पतन देखने को आतुर थे. यह उन्होंने ओबामा की ऐसी ही घोषणा के तीन माह पूर्व कर लिया था. तब से सीरिया फिर एक बड़ी त्रासदी झेल रहा है.

किसकी किससे है लड़ाई ?

मुख्य रूप से सीरिया में चार भिन्न संगठनों के बीच युद्ध चला है. सीरियाई सरकार जिसमें अलावितों का बहुमत है. विरोधी दलों जिसमें सुन्नी मुसलमानों का बहुमत है, आइ.एस.आइ.एल या दाएश जो भी कह लें जो सलाफ़ी और वहाबी पंथ को मानने वाले सुन्नी हैं और कुरदीश रोजावा जो आम तौर पर शिया हैं. राष्ट्रपति असद के नियंत्रण में मुख्य रूप से सीरिया का पश्चिमी भाग और तटीय क्षेत्र है. इनका युद्ध सीधे तौर पर आइ.एस.आइ.एल और उन विपक्षी दलों के साथ है, जिसके अनेक घटकों ने मिलकर खुद को मुक्त सीरियन सेना की संज्ञा दे रखी थी. इस सेना का 2012 में एक दूसरे से मतभेद रखते अनेक खण्डों में विभाजन हो गया जिसका एक हिस्सा अतिवादी इस्लामिक संगठनों जैसे कि अल नुसरा/अल कायदा के साथ हो लिया और अन्य हिस्से बिना कट्टर जेहादी बनें असद के ख़िलाफ़ लड़ते रहे.

इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक (आइ.एस.आइ.) के नेता अबू बक्र अल-बग़दादी ने अप्रैल 2013 में सीरिया में अल कायदा समर्थित आतंकवादी समूह में जो कि खुद को जबत अल नुसरा या नुसरा फ्रंट कहते हैं, का विलय किया और खुद को आइ.एस.आइ. के बजाय आइ.एस.आइ.एल (इस्लामिक स्टेट इन इराक एंड द लेवांत) या आइसिस कहने की घोषणा कर दी. हालांकि अल नुसरा फ्रंट के नेता अबू मुहम्मद अल-जव्लानी ने विलय के दावे का खंडन किया था. वैसे एक ही अतिवादी धारा के इन गुटों में विलय होना या न होना बाकियों के लिए कोई ख़ास मायने नहीं रखता है.

इस्लामी राज्य आज विश्व शांति के लिए ख़तरा माना जाता है.आइसिस तीन साल में इराक के बाद अपने आतंकी शिंकजे को सीरिया में फैला लिए और 29 जून,2014 को इस्लामी ख़लीफ़ाई साम्राज्य के निर्माण की घोषणा कर दी तथा विश्व के अनुमानित 1.5 अरब मुसलमानों को भी इस साम्राज्य का सदस्य बता दिया. आइसिस के ख़िलाफ़ कोई एक संयुक्त मोर्चा नहीं लड़ रहा है. रूसी वायु सेना समर्थित सीरियन सरकारी सेना, अमेरिका के नेतृत्व में पाश्चात्य गठबंधन, साथ ही कुर्द, लेबनान, इराक आर इरान के शियाई ताकतें आइसिस नामक भयानक बीमारी के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं. हालांकि पश्चिमी गठबंधन की यह नूरा कुश्ती है या सचमुच की लड़ाई यह भविष्य ही बतायेगा.

गौरतलब है कि जहां आइसिस का प्रभुत्व फैला वहां आतंक मचाना और सैकड़ों हज़ारों आम नागरिकों का कत्ल करना तो सामान्य बात थी. असंख्य युद्ध अपराध तथा विशेष रूप से अल्पसंख्यक येज़ीदियों और कुर्दों का नरसंहार भी किया गया. जनवरी, 2014 से लेकर 25 अप्रैल 2015 तक सिर्फ़ इराक में 28,34,676 लोग विस्थापित कर दिए गए जिसमें बच्चों की संख्या 13 लाख थी. इस्लामिक स्टेट के धर्म-पिता और उनकी ही तरह सलाफ़ी धर्म को मानने वाले सऊदी अरब का मानवाधिकारों का ट्रैक रिकॉर्ड भी घिनौना रहा है किन्तु अमेरिका जैसे उनके मित्र राष्ट्रों को उसपर किसी भी प्रकार की आपत्ति नहीं होती.

बहरहाल सीरिया का उत्तरी भाग रोजावा के नियंत्रण में है, जिसकी कमान कुर्दों की जनतांत्रिक संघ ईकाई वाई.पी.जी.के हाथ में है. गृहयुद्ध के दौरान असद सरकार ने अपनी सेना को रोजावा से हटा लिया था तबसे वहां आइसिस व विद्रोहियों के ख़िलाफ़ स्थानीय कुर्द लड़ाकुओं का युद्ध ज़ारी है. आज के दिन रोजावा और असद सरकार के बीच संबंध एक दूसरे के अस्तित्व के लिए ख़तरनाक नहीं रह गए हैं.

सीरिया और उसके विशाल पड़ोसी राज्य तुर्की के बीच संबंध तनावपूर्ण रहे हैं. इसका मुख्य कारण सीरिया की ओर से कुर्दिश स्वायत्त राज्य की स्थापना का समर्थन और तुर्की बांधों की समस्या है, जो सीरिया के लिए पानी की आपूर्ति में बाधा पहुंचाते हैं. इस गृहयुद्ध के दौरान तुर्की ने सीरियाई सरकार के विद्रोही दलों तथा आइसिस का भी बड़े पैमाने पर समर्थन किया और रोजावा की स्वायत्तता के खि़लाफ़ रहा.

पर इन सबसे बढ़कर बाहरी ताकतों का भिन्न स्तरों पर हस्तक्षेप बेहद महत्वपूर्ण है. सीरिया को लेकर संयुक्त राष्ट्र के वीटो शक्तियों के बीच दो समूहों में बंटवारा हो गया, एक पश्चिमी-अमेरिका के नेतृत्व में ब्रिटेन, फ्रांस, यमन, संयुक्त अरब अमीरात, कतर और 2016 के दिसंबर तक तुर्की सहित का गठबंधन और दूसरा पूर्वी -रूस, सीरिया, चीन, इरान का गठबंधन.

अमेरिका के नेतृत्व में पश्चिमी गठबंधन असद की सरकार को गिराने हेतु आइसिस व विद्रोहियों या विपक्षी दलों का समर्थन और प्रशिक्षण प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से करता रहा जबकि रूस और चीन युद्ध में असद सरकार के समर्थन में खड़े रहे.

15-16 नवम्बर,2015 को जी20 समिट में पुतिन के बयान ने सीरिया के इस गृह युद्ध की शक्ल ही बदल डाली. रूस के राष्ट्रपति ने तुर्की और अमेरिका के गठबंधन पर प्रहार करते हुए कहा कि आइसिस की आमदनी तेल और पट्रोलियम उत्पादों के अवैध व्यापार से होती है. प्रतिदिन तुर्की से इराक तक अंतहीन ट्रकों की शृंखला का खुलासा करने वाले उपग्रह चित्रों के माध्यम से अपनी बात की पुख़्ता करते हुए पुतिन ने कहा कि आइसिस की भिन्न-भिन्न इकाइयों का वित्तपोषण करने वाली ताकतों में 40 देश और उसी जी20 के कुछ सदस्य भी शामिल हैं. साथ ही यह भी कहा कि आइसिस को जड़ से तब तक ख़त्म करने में सफ़ल नहीं होंगे जब तक उनके आर्थिक स्रोतों को काट न दिया जाएं.

30 सितम्बर,2015 को सीरिया की सरकार के अनुरोध पर रूसी वायु सेना सीरिया में घुस गई. सीरियाइ सेना रूस की मदद से न सिर्फ आइसिस के विस्तार को रोकने में सफ़ल हुई, बल्कि उन्हें भारी नुक्सान भी पहुँचाया. तब से अब तक आइसिस ने 4600 वर्गमील भू-भाग और अपने 35,000 लड़ाकुओं को खो दिया है. सीरियाई सेना स्थानीय नागरिक सेनाओं के साथ मिलकर 586 शहरों व् गांवों को आइसिस से मुक्त करा चुकी है.

अगस्त, 2014 में ओबामा की आइसिस के ख़िलाफ़ बमबारी की घोषणा से उनकी विश्व भर में प्रशंसा हुई किन्तु सवाल यह उठता है आइसिस से चल रही इस लड़ाई में अमेरिका तीन सालों से कर क्या रहा था? अमेरिका का खुफिया तंत्र और सैन्य तंत्र अपने जानते दोहरी चाल खेल रहे है. एक तरफ तो आइसिस को हथियारों, प्रशिक्षण और सामरिक साधनों से लैस कर रहे हैं और दूसरी तरफ़ विद्रोही दलों को सीरियन आर्मी तथा आइसिस से लड़ने का प्रशिक्षण भी दे रहे हैं. अमेरिका असद को हटाना चाहता है और आइसिस भी यही चाहता है. चाणक्य की उक्ति ‘शत्रु का शत्रु मित्र’ के अनुसार असद को गिराने में अमेरिका और आइसिस मित्र हो जाते हैं. आइसिस से कोई प्यार न रखते हुए भी चूँकि असद को गिराना अमेरिका की पहली प्राथमिकता है तो आइसिस के साथ वन-नाईट स्टैंड की तर्ज पर हमबिस्तर होने में उन्हें कोई गुरेज नहीं होता. ख़ैर, दो नावों पर सवार होने का नतीजा क्या हो सकता है यह बार-बार भुगतने के बावजूद अमेरिका सीखने को तैयार नहीं दिखता. यह मानना भी संभव नहीं है कि अमेरिकी कांग्रेस और पेंटागन में समन्वय टूट चूका है और दोनों मुक्त रूप से अलग अलग नीतियों पर चल रहे हैं.

सीरियाई युद्ध कैसे उभरा?

सीरियाई युद्ध को समझने के लिए उसकी शुरुआत कहां से हुई और कैसे हुई समझना आवश्यक है. विश्वभर में लोगों को प्राप्त जानकारियां मुख्यधारा के माध्यमों द्वारा प्रचारित ख़बरों के ऊपर टिकी हुई है, जबकि अनेक सूत्रों से यह पता चलता है कि दारा से शुरू हुआ सीरियाई गृहयुद्ध मोसाद (इज़रायल खुफ़िया एजेंसी) और पश्चिमी शक्तियों द्वारा इस्लामी आतंकवादियों को स्थापित करने की एक सोची समझी योजना थी.

पहला महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि पश्चिमी मीडिया द्वारा सामने लाई गई यह ख़बर कि दारा आन्दोलनकारियों पर सीरियाई पुलिस और सशस्त्र बलों ने अंधाधुंध फायरिंग की और निहत्थे ’लोकतंत्र समर्थक’ प्रदर्शनकारियों की हत्याएं की और यह सही भी था किन्तु जिस बात का उल्लेख करना पश्चिमी मीडिया सुविधानुसार भूल गया, वह यह था कि प्रदर्शनकारियों में आतंकवादी निशानेबाज़ और हथियारबंद योद्धा भी थे, जो सोची-समझी रणनीति के तहत सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों दोनों पर गोलियां बरसा रहे थे. यह इस बात से भी साबित होता है कि दारा में मरने वालों में पुलिसकर्मियों की संख्या प्रदर्शनकारियों की तुलना में अधिक थी. और यह ख़बर कोई और नहीं, इज़रायल नेशनल न्यूज़ रिपोर्ट ने प्रसारित की थी, जो कि किसी भी हालत में दमिश्क के पक्ष में प्रचार नहीं करते. इससे यह स्पष्ट होता है कि दारा के आन्दोलन में पुलिसबल शुरुआत में बुरी तरह सशत्र जिहादियों द्वारा घिर गया था, न कि शांत आंदोलनकारियों पर गोलियां बरसा रहा था.

दूसरा महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि दारा के आन्दोलन में बाहरी शक्तियों की संलिप्तता का अंदाजा इस बात से भी लगता है कि यह सारा आन्दोलन दमिश्क या अलेप्पो में, जो कि प्रतिपक्ष के गढ़ हुआ करते थे, से न होकर जॉर्डन की सीमा पर स्थित दारा में हुआ. इन्टरनेट पर उपलब्ध अनेक औपचारिक सूत्रों के अनुसार (अल जजीरा और सी.एन.एन समेत) सीरियाई रेबेल्स को सीआईए द्वारा बड़े पैमाने हथियार उपलब्ध कराए गए थे और यह वर्षों तक जॉर्डन व् तुर्की की सीमा से होता रहा.

 ‘प्रोजेक्ट फॉर दी इन्वेस्टीगेशन ऑफ करप्शन एंड आर्गनाइज़्ड क्राइम’ (ओ.सी.सी.आर.पी) के जुलाई,2016 की रिपोर्ट के अनुसार युक्रेन, बोस्निया, बल्गेरिया, क्रोएशिया, चेक गणराज्य, मोंटेनेग्रो, स्लोवाकिया, सर्बिया और रोमानिया जैसे यूरोपीय देशों ने सैकड़ों टन की संख्या में राइफलों, मोर्टारों, रॉकेट लंचेर्स, टैंक रोधी हथियारों तथा भारी मशीनगनों को जिसकी कुल कीमत 12 लाख यूरो भी (वास्तविक आंकडें भविष्य बताएगा), सऊदी अरब और जॉर्डन व् तुर्की के जरिए सीरियाई लड़ाकुओं और आतंकवादियों के हाथ में थमा दिया. यद्यपि यू.एस. का बराबर कहना यह रहा है कि वे सिर्फ़ सीरियन लड़ाकुओं को चुन चुनकर प्रशिक्षित करते थे, आइसिस को नहीं. पर तथ्यों का कुछ और ही कहना है.

प्रसिद्ध मानवाधिकार समूह एमनेस्टी इंटरनेशनल द्वारा प्रकाशित 44 पृष्ठ के रिपोर्ट के मुताबिक आइसिस के पास अमेरिका-निर्मित भारी शस्त्रागार पाया गया था (जिसकी घोषणा रूस के रक्षा अधिकारियों ने भी बारंबार की है), जो कि इराकी सेना व उन्हीं सीरियन लड़ाकुओं से आइसिस को प्राप्त हुआ था. आइसिस के कब्ज़े में पाए गए हथियारों व गोला-बारूद का ज़खीरा ‘अंततः इस बात को दर्शाता है कि इराक में दशकों तक ग़ैर ज़िम्मेदारी से हथियार सप्लाई किए गए और अमेरिका के नेतृत्व में अधिकृत प्रशासन हथियारों के वितरण तथा स्टॉक को सुरक्षित रूप से प्रबंधन करने में नाकाम रहा.” अमेरिका और उसके गठबंधन में अन्य आपूर्तिकर्ता देशों की सोची-समझी साज़िश के तहत लापरवाही से, गै़र ज़िम्मेदारी या ‘जान बूझकर’ आइसिस के आतंकवादियों को हथियार पकड़ा दिए, यह बहस का मुद्दा है.

इज़रायली खुफिया सूत्रों (देखें देबका, 14अगस्त, 2011) तक ने इसको छिपाया नहीं हैः “शुरुआत से ही नाटो और तुर्की के हाई कमान द्वारा इस्लामी ‘स्वतंत्रता सेनानियों’ को  प्रशिक्षित और हथियारबंद किया गया. अफगान-सोवियत युद्ध से बचे हज़ारों मुजाहिदीनों को सी.आई.ए के इस धर्मयुद्ध में नियुक्त किया गया. इस पूरी योजना को सऊदी अरब और कतर का सक्रिय समर्थन प्राप्त था. आगे चलकर यह तथाकथित इस्लामी स्वतंत्रता सेनानी अल-नुसरा और आइसिस में समन्वित हो गए.” अपनी नाक बचाने के लिए अमेरिका अब चाहे स्वतंत्रता सेनानी जैसी पावन-सी संज्ञाएँ गढ़ता रहे, पर तथ्य यह है कि अमेरिका अपनी समस्त मूर्खताओं समेत अल-नुसरा और आइसिस का पोषण कर रहा था.

पुरस्कृत लेखक मिख़ाइल चोसुदोव्स्की, जो कि ओटावा विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफे़सर रह चुके हैं, और वर्तमान में वैश्वीकरण संबंधी अनुसंधान केंद्र के निदेशक हैं, के अनुसार सीरिया में विरोध प्रदर्शन का ढांचा लीबिया में ही बनाया गया था. “पूर्वी लीबिया में ‘लीबिया इस्लामिक लड़ाकू समूहों’ को ब्रिटिश एमआइ6 और सी.आई.ए का समर्थन पहले से ही प्राप्त था. सीरिया में मीडिया के झूठ और जालसाजी से निर्मित विरोध प्रदर्शन का उद्देश्य धर्मनिरपेक्ष मुल्क को कमज़ोर करना था और मानवोचित उद्देश्य के नाम पर अपनी ग़ैर कानूनी दखलंदाज़ी को ‘संयुक्त राष्ट्र’ से हरी झंडी दिलवाना था”.

तीसरा उल्लेखनीय तथ्य यह है कि जब ओबामा से पूछा गया था कि आइसिस सशक्त बनता जा रहा है तो ओबामा ने उत्तर इस विश्वास के साथ दिया था कि मानो आइसिस पूरी तरह उनके ही नियंत्रण में हो. “मुझे नहीं लगता कि वे कुछ अधिक ताकतवर हो रहे हैं. शुरू से ही हमारा उद्देश्य उन पर नियंत्रण रखना रहा है और हम इसमें सफ़ल रहे हैं….इराक में उनकी बढ़त नहीं हुई है. सीरिया में भी वे बस आयेंगे (असद का अंत कर?) और चले जाएंगे.”

एक तरफ़ अमेरिका का राष्ट्रपति कहता है कि उन्हें नहीं लगता कि आइसिस की बढ़त हुई है और दूसरी तरफ़ उसी अमेरिका का विदेश सचिव स्वीकार करता है कि आइसिस की वृद्धि हुई थी पर उसे रोकने की योजना भी न थी. विकिलीक्स ने हाल ही में संयुक्त राष्ट्र महासभा में सितम्बर,2016 को हुई गुप्त बैठक की रिकॉर्डिंग ज़ारी कर दी है. इसमें अचंभित कर देने वाले तथ्य उभरकर सामने आए हैं. बैठक में अमेरिका के विदेश सचिव जॉन केरी ने सीरियाई सरकार के विद्रोही प्रतिनिधियों को कहा कि उन्हें इस बात का ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि असद अमेरिका के सामने घुटने टेकने के बजाय रूस के पास चला जाएगा- ‘हम जानते थे कि आइसिस की बढ़त हो रही है…हम देख रहे थे…हमने देखा कि यह बड़ी शक्ति के रूप में उभर रहा है और हमें लगा कि असद पर इससे बेतरह दबाव बनेगा और वह हमसे हमारी शर्तों पर समझौता करने पर मज़बूर हो जाएगा लेकिन ऐसा करने के बजाय उसने पुतिन से समर्थन मांग लिया…हमने सीरिया में बल प्रयोग का तर्क खो दिया’.

यदि अमेरिका को सच में आइसिस के पांव कांटने होते तो जून, 2014 में सीरिया से इराक तक ख़ाली रेगिस्तान के बीच से गुजरने वाले आइसिस के सिलसिलेवार टोयोटा ट्रकों के काफ़िलों को बमबारी से उड़ा न डालते? सीरिया के रेगिस्तान जैसा खुला क्षेत्र तो अमेरिका के प्रतिष्ठित जेट लड़ाकू विमानों (एफ़15, एफ22 रेप्टर, एफ6) के लिए सैन्य दृष्टि से गुड़ियों का खेल होता. यही नहीं, 2015 के अक्टूबर में रूसी और अमेरिकी वायु सेनाओं के बीच सीरिया में आपातकालीन स्थिति के दौरान उड़ान पथों को लेकर मार्गदर्शित करने, बमबारी और अन्य गतिविधियों पर हुए समझौते के तहत रूसी वायु सेना को सटीक जानकारी देने के बजाय पश्चिमी गठबंधन की ओर से भ्रमित तथा दुर्व्यवहार करने के अनेक आरोप लगे हैं. इनमें एक आरोप यह था कि अमेरिकी विमान अपनी उड़ान के स्तर से लगभग एक किलोमीटर (0.62 मील) नीचे जाकर रुसी एस.यू 35 लड़ाकू जेट के मार्ग में बाधा पहुंचाते थे. अमेरिकी सैन्य अधिकारियों ने इस पर रुसी अधिकारियों से माफ़ी भी मांगी थी. इससे भी भयानक घटना 17सितंबर को घटी जब देर एज़-ज़ोर में पश्चिमी गठबंधन द्वारा रूसी विमानों को लक्ष्य से गुमराह कर दिए जाने के बाद किए गए उनके हमले में 62 सीरियन सैनिक मारे गए और 100 घायल हुए. हमले से 2 महीने बाद पेंटागन ने लिखित रूप में स्वीकारा कि घटना “खेदजनक त्रुटि” थी. अमेरिका की अत्याधुनिक व् श्रेष्ठतम सैन्य मशीनरी की ऐसी बेहूदा हरकतों पर वहां के रक्षा सचिव को शर्म से डूब मरना चाहिए था.

सीरियाई गृह युद्ध के कारणों में से सबसे मज़बूत और महत्वपूर्ण कयास यह है कि यह सारा खेल तब शुरू हुआ था जब सन् 2000 में अमेरिका समर्थक कतर ने सऊदी अरब, जॉर्डन, सीरिया और तुर्की के जरिए यूरोप तक प्राकृतिक गैस पहुँचाने वाले दस बिलियन डॉलर, 1500 कि.मी. पाइपलाइन के निर्माण करने की घोषणा की. वहां ईरान की भी पाइपलाइन के निर्माण की योजनाएं थीं जो कि इराक और सीरिया के बीच से निकलने वाली थी और रूस को इस पर कोई आपत्ति नहीं थी. रूस ने कतर और तुर्की पाइपलाइन की योजना को अपने अस्तित्व को ख़तरे में डालने वाली नाटो की साजिश बताया. यूक्रेन में 2014 के विद्रोह के पीछे भी यही साजिश थी जहां से रूस के 80% गैस का रास्ता गुजरता था और जिस पर नाटो की निगाहें टिकी हुई थी. युक्रेनियन युद्ध के ठीक पहले अमेरिकी उपराष्ट्रपति बायडेन के पुत्र, केरी परिवार यूक्रेन के सबसे बड़े नेचरल गैस के प्रोडूसर बोर्ड में शामिल कर लिए गए, क्रांति हुई और आख़िर नाटो अपने मिशन में कामयाब हुआ. विकिलीक्स द्वारा हिलरी क्लिंटन के गुप्त कागजों के खुलासे से यह भी स्पष्ट होता है कि लीबिया और सीरिया में यह सारा षड्यंत्र इसलिए भी रचा गया है क्योंकि वे अमेरिकी डॉलर से नाता तोड़ने और पश्चिमी केंद्रीय बैंकिंग के एकाधिकार से मुक्त होना चाहते थे.

बहरहाल, सीरिया के इस युद्ध में रूसी और अमेरिकी सैन्य बलों के बीच कोई सीधा संघर्ष नहीं है. यह तो एक परोक्ष युद्ध है जिसमें पश्चिमी शक्तियों समर्थित विद्रोही दल और उन्हीं शक्तियों द्वारा पोषित आइसिस रूस समर्थित सीरियाई सरकार के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं. इसका जीता जागता उदाहरण अलेप्पो है.

मीडिया का षड्यंत्र

सीरिया के अति प्राचीन और व्यापारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण अलेप्पो शहर को आइसिस से मुक्त कराने की लड़ाई यहाँ उल्लेखनीय है. यह आइसिस की रीढ़ तोड़ देने वाली लड़ाई थी, साथ ही साथ ज़ियोनिस्ट ताकतों के इशारों पर नाचती पश्चिमी मीडिया के विद्रूप चेहरा का पर्दाफ़ाश भी कर दिया. एक-एक करके सी.एन.एन., बी.बी.सी., अल जज़ीरा और तमाम मुख्यधारा के मीडिया के नकाब उतर गए. इसमें ट्विटर और फे़सबूक पर सक्रिय एजेंटों की भी पोल खुल गई.

युद्ध की विषम परिस्थितियों में, जहां बिजली आपूर्ति जैसी समस्याएँ आम बात हैं, वहां चंद ‘मासूम नागरिक’ इंटरनेट सुविधा से परिपूर्ण, दुनिया को सीरियाई सेना और रूस की क्रूरता का ‘आंखों देखा हाल’ दुनिया को दिखाने का कर्तव्य निभा रहे थे. ‘यह मेरा अंतिम विडियो है’…‘अलेप्पो में लोग भाग रहे हैं’…‘कोई अब बचा नहीं, सब मर गए हैं’ आदि आदि हैश-टैग करते पोस्टों को लाखों फे़सबूक व् ट्विटर के योद्धाओं ने मीडिया के हाथों की कठपुतली बनकर उनके झूठ और अफ़वाहों को अंतिम सत्य मान लिया और आगे प्रसारित भी किया. इस पूरी प्रक्रिया में आइसिस नाम का उल्लेख ऐसे नदारद था जैसे इस नाम का कोई संगठन कभी रहा ही न हो. नतीजा यह निकला कि सीरियन व रूसी सेना विश्व भर में निंदनीय बन गई. इतना बड़ा मिथ्या-प्रचार अभियान इस युद्ध में पहली बार देखा गया.

यह बात बिल्कुल सही है कि हर युद्ध में कोलैटरल डैमेज भी होता है और आम नागरिक भी मारे जाते हैं. ऐसा हम प्रथम और द्वितीय महायुद्धों जिसमें हिरोशिमा व नागासाकी भी शामिल हैं, से लेकर इराक और अफगानिस्तान के युद्धों में देख चुके हैं जहाँ विपक्षी लड़ाकुओं के अलावा लाखों की संख्या में निरीह नागरिक मारे गए. और ऐसा कुछ अलेप्पो में भी हुआ होगा किन्तु यह विश्वास कर लेना कि रूस की बमबारी में तो निरीह जनता मारी जाती हैं जबकि अमेरिकी बमबारी में एक ही घर में बैठे सिर्फ़ सक्रिय आतंकवादी मारे जाते हैं और आम जन का बाल भी बांका नहीं होता यह नितांत हास्यास्पद विचार है. किसी भी प्रकार की मानवीय क्षति हमारे वक्त की बड़ी त्रासदी है किन्तु युद्ध में किसी के लिए भी इससे पूरी तरह बचना असंभव है.

तथ्य यह भी बताते हैं कि 16 दिसंबर,2016 को फ्रेंच स्वतंत्र मीडिया एजेंसी ( वोल्टेयरनेट.ओर्ग) की ख़बर के मुताबिक सीरियन विशेष बलों द्वारा अलेप्पो शहर के एक बंकर में 14 नाटो अधिकारी जिंदा पकड़े गए थे. सीरिया के नामी सांसद व् अलेप्पो चैम्बर ऑफ कॉमर्स के निदेशक फ़ारेज शहाबी ने अपने फ़ेसबूक पेज पर पकड़े गए अधिकारियों के नाम व् राष्ट्रीयता को भी साझा किया था, जिसमें 8 सऊदी अरब के अधिकारी थे, एक अमेरिका, एक तुर्क, एक इज़रायली, एक कतर, एक जॉर्डन और एक मोरोको का था. 19 दिसंबर को संयुक्त राष्ट्र में सीरियाई राजदूत बशर जा़फ़री ने इस ख़बर की अधिकारिक रूप से घोषणा भी की थी. यद्यपि कई सूत्रों के अनुसार पश्चिमी गठबंधन के अधिकारियों की संख्या उससे भी अधिक थी- 22 अमेरिकन, 16 एमआई, 6 ब्रिटिश एजेंट्स, 21 फ्रेंच, 7 इज़राइली, 62 तुर्की यानि लगभग 150 ऑफ़िसर और सेना प्रशिक्षक आइसिस के संग अलेप्पो की बमबारी में फंस गए थे. इससे पूर्व रूस क्रूज मिसाइल ’कैलिबर’ के हमले से 30 इजराइली व् पश्चिमी देशों के सैन्य सलाहकारों की मौत की ख़बर भी प्रसारित की गई थी और यदि यह सच है तो अपने एजेंट्स को वहां से बचाने के उद्देश से अमेरिका के विदेश सचिव केरी की चिंता वाजिब थी और मास्को से सैन्य अभियान को स्थगित करने का आग्रह भी स्पष्ट हो जाता है. सवाल यह उठता है कि आख़िर पश्चिमी गठबंधन के यह अधिकारी आइसिस के नियंत्रण वाले अलेप्पो में कर क्या रहे थे ? जबकि सीरियाई सरकार ने उन्हें कोई आमंत्रण दिया भी नहीं था.

इन परिस्थितियों में यह संदेह भी पैदा होता है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षापरिषद् द्वारा अलेप्पो में सात दिन के लिए मानवीय सहायता हेतु युद्धविराम का प्रस्ताव कहीं ‘अपने’ लोगों को बचाने का प्रयास तो नहीं था? बहरहाल रूस और चीन ने इसका विरोध किया था और इसे पारित नहीं होने दिया था. रूस का मानना था कि इस तरह के अल्पकालिक विराम से आतंकवादी हथियारों का पुनर्संग्रहण कर ताकत इकठ्ठा कर सकते हैं और यह किसी भी हालत में वे नहीं होने देंगे.

अलेप्पो में हुए इस भीषण युद्ध के दौरान रूस ने जिस प्रकार आम जन के बीच सहायता पहुंचाई वह उल्लेखनीय है. अलेप्पो के नागरिकों को शहर से बाहर सुरक्षित जगहों पर पहुँचाने और उन्हें यथासंभव चिकित्सकीय व् अन्य सुविधाएं देने के अलावा सीरियन सेना के विरुद्ध लड़ रही मुक्त सीरियन सेना के 6000 से अधिक लड़ाकुओं को भी जो हथियार डालने को राज़ी हो गए थे, उन्हें अपने परिवार सहित अलेप्पो और इड्लिब शहरों के बीच बने विशेष ‘कॉरिडोर’ से सुरक्षित जगह पर पहुंचाया दिया गया. यह पूरी घटना न सिर्फ़ रूसी वायु सेना व् असंख्य ड्रोनों की निगरानी में हुई बल्कि रूसी रक्षा मंत्रालय के वेबसाइट से लेकर रशियन टुडे के फ़ेसबूक पृष्ठ पर लाइव प्रसारित की जा रही थी. निस्संदेह रूसी प्रचारतंत्र भी सिर्फ़ अपने अच्छे कृत्यों का प्रचार प्रदर्शन अपने पक्ष को मज़बूत करने के लिए कर रहा होगा.

इस तथ्य का यहां उल्लेख अनुचित नहीं होगा कि रूस और सीरिया के साथ साथ अलेप्पो में आइसिस पर जीत का श्रेय ईरान को भी जाता है. सीरियाई कुर्दों का आइसिस के ख़िलाफ़ जंग में ईरानी सैन्य सलाहकारों ने मदद ही नहीं प्रशिक्षण भी दिया था.

बहरहाल युद्ध अभी पूरी तरह से ख़त्म नहीं हुआ है और न ही निकट भविष्य में शांति बहाल होने की संभावनाएं दिख रही हैं. किंतु अब तक के इस युद्ध का यह नतीजा अवश्य निकला है कि अलेप्पो में आइसिस के पतन के उपरांत चमत्कारिक रूप से एरडोगन का हृदय परिवर्तन हो गया है और वे रूस और ईरान के साथ तालमेल बिठाने में लग गए हैं.

इसी क्रम में रूस-ईरान-तुर्की की 27 दिसंबर की बैठक से पूर्व 19 दिसंबर को तुर्की की राजधानी अंकारा के एक संग्रहालय में चित्र-प्रदर्शनी के दौरान रूस के राजदूत आंद्रेई कार्लोव की हत्या कर दी गई. हत्या को लेकर अनेक कयास लगाए जा रहे हैं जिसमें यह भी है कि पश्चिमी गठबंधन की यह कोशिश थी कि तुर्की के साथ रूस का समझौता टूट जाए.

फिलहाल रूस-ईरान-तुर्की के बीच समझौते के तहत सीरिया में अधिकारिक रूप से संघर्ष विराम ज़ारी है. अमेरिका सहित अन्य पश्चिमी शक्तियां भी आश्चर्यचकित रूप से चुप हैं. हालांकि हाल ही में अमेरिका के रक्षा सचिव एश कार्टर ने अपने ब्यान में यह घोषित कर दिया है कि “अमेरिका आइसिस से अकेले लड़ रहा है और रूस ने सीरिया में कुछ भी नहीं किया है. सवाल यह उठता है कि जब रूस ने सीरिया में कुछ भी नहीं किया है (अच्छा या बुरा) तो फिर विश्व भर में उसकी निंदा क्यों करवाई जा रही थी? इन सब बातों से साफ़ पता चलता है कि अब तक विश्व में स्वयंभू रहा अमेरिका युद्ध में असद की सफलता और विश्व राजनीति में रूस की बढ़ती प्रभुता से कितना बौखलाया हुआ है.

हंस के दिसंबर,2015 के संपादकीय में उठाया गया सवाल आज भी उतना ही प्रासंगिक है -“..अफ्रीका, मध्य-पूर्व एशिया, पश्चिमी जगत और इज़रायल के बनते-बिगड़ते समीकरणों, कूटनीतिक पेचीदगियों और जटिल अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के बीच एक बड़ा प्रश्न अनुत्तरित रह जाता है. विश्व भर में एक सार्वभौमिक नियम है कि हत्या के लिए हथियार उपलब्ध कराने वाला, प्रशिक्षण और साधन प्रदान करने वाला भी बराबर का दोषी होता है. आइसिस को तो उसके किए की सजा मिलने जा रही है किंतु पश्चिम के इन प्रभुओं को, सऊदी राजशाही को, कतर, तुर्की और इज़रायल को उनके किए की सज़ा कब मिलेगी? यह बड़ा सवाल है.”

ख़ैर, अमेरिकी राष्ट्रपति पद पर एक अल्पशिक्षित बड़बोले और नितांत अभद्र इस नारंगी से जीव के आगमन के साथ ही शांति नोबल पुरुस्कार विजेता ओबामा को अपने किए लाखों वधों की जवाबदेही से छुटकारा मिल जाएगा. आज अचानक ‘ग्लैडिएटर’ फिल्म का एक संवाद याद आ गया – जब रोम का एक सीनेटर अपने क्रूर सम्राट कमोडस के लिए कहता है कि “सम्राट अच्छी तरह जानता है कि रोम क्या है. रोम महज एक भीड़ है. उनको जादू दिखाओ- वे चमत्कृत हो जाते हैं. सम्राट उनके लिए बड़े पैमाने पर मौत लाएगा जिसके लिए वे उसे बेपनाह प्यार करेंगे”.

14859701_1474274785922952_6659694896302909380_oमाने मकर्तच्यान, जेएनयू में शोधरत इंडोलॉजी की छात्रा हैं. आर्मेनिया से आती हैं और वैश्विक गतिविधिओं पर पैनी नज़र रखती हैं. आप उनसे  mane.nare@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

साभार- हंस, फ़रवरी, 2016

A journey in the Eastern Himalaya: Anil Yadav

“The mountains lands, and the Himalaya in particular, are visited by travelers, explorers, climbers, naturalist, pilgrims. These are who people who are evanescent, who come and go and vanish, occasionally giving us their impressions in the books and journals which describe their personal experiences, but they tell us little or nothing about the people who eke out a living on hostile mountain slopes. only a very few people have left enduring and insightful records of their experiences.”#Ruskin Bond
And Anil Yadav is one such traveler, not just a tourist, who brings forth an experience of that untouched, unseen, unheard quarters of Himalayas, that a very few of us have a chance of experiencing, in our whole lifetimes. A journey in the Eastern Himalaya, part of a larger account of travels in northeast India.

himalaya

Himalayan: Adventures, Meditation and Life

On to Namdapha and Tawang

By Anil Yadav

My new-found brother Rupah-da turned me over to Nature’s Beckon in front of the Tinsukhia Railway Station. When the Tata 407 mini-bus finally left—after having waited interminably for flustered passengers arriving from god knows where—fowl stuffed into a wicker-basket underneath a seat cackled. There was a sack of potatoes with a hole in it; potatoes popped out and rolled about on the floor. We were eighteen passengers in all, including a ten-year-old, travelling with a group of experts who worked for Nature’s Beckon, an NGO working to build environmental awareness. Our destination: the jungles of Namdapha on the Changlang plateau in Arunachal Pradesh—Namdapha is the highest peak in the region. These jungles, abutting Burma, rise up from swampy wetlands in the plains to snow-covered mountains and spread over an area of 2,000 square kilometres. There is such geographic diversity here that multiple seasons co-exist over contiguous territory. From the jhapi hats, binoculars, packets of crisps and the keen desire to hear the opinions of strangers on the varieties of forests found in different geographical regions of the world, it was clear everyone had done their homework well.

The young director of Nature’s Beckon, Soumyadeep, tried to lighten the atmosphere with timely jokes and tales of travels in the wild but his narration was stolid, and his manner that of a tour guide in a hurry. No tales were told him in reply. A freshly minted young journalist, Pem Thi Gohain, launched an interrogation: What was my salary break-up at the paper I worked for; and who was the editor brilliant enough to send me on this assignment? I distanced myself from him by speaking in English and by shrinking into myself and looking out the window, pretending to be absorbed in the landscape. It was impossible to tell any more lies.

A tyre punctured in Digboi. The diver propped the vehicle on a makeshift jack built out of a pile of bricks and stood on the side of the road, thumbing down trucks to borrow a tyre-iron from. This was going to take a while and I left for a short walkabout in town. Digboi is full of oil-wells; neighbourhoods are named after the bends in the roads next to which they stand. Small hills are dotted with bungalows from the British era. Each bungalow once occupied by a single British family is now shared by many households. Digboi is a sleepy town; one where from the looks of things a heavy breakfast is all that is needed to send one back to bed.

We left and soon after the driver stopped in Margherita. While the rest of us ate, he went off to have the puncture repaired. Santwana Bharali, aka Poppy, was our tour coordinator. She had an MSc in Botany; her cheeks dimpled prettily when she smiled. On of our co-passengers was a psychology nut.According to him, Poppy had followed the driver to the puncture-repair shop only because she wanted to see the tyre-tube fill up with air and become tumescent. I concurred. But when she opened her purse and paid the mechanic, I silently chided the influence of Freud on the manner in which I had agreed with his assessment of Poppy. Archana Niyog, another co-passenger, was what you might call a homely girl; she was serving food to her fellow passengers, urging each to eat some more.

 The large yellow signboard which marks the beginning of the Stilwell Road flashed past us near the railway crossing in Lido. The road, built during the Second World War at enormous cost in terms of the lives of soldiers and labourers, begins in Jairampur in Arunachal Pradesh, enters Burma, spans Kachin territory and terminates in the Kunming province of China. One of the longstanding demands in the region is the reopening of the Stilwell Road so that trade may flourish, but our relations with China remain rocky.

Lido is a vast colliery. Coal dust rained upon me from impossibly tall heaps in a black billowing mist. It is the practice of open-cast mining which gives the town its mysterious, suspicious air.

The olive-green of battle fatigues became increasingly more concentrated once we entered Arunachal Pradesh. A state of high alertness has become the norm in the state after 1962 when China defeated India in war. We were stopped at every checkpoint for interrogation and for our permits to be examined; it was night by the time we were done. When twilight fell everyone looked up at the sky in complete silence. Perhaps its colour reflected their most inward moods. Afterwards, everyone dozed. Red points of light flickered deep within the forests. To avoid the telltale thwack-thwack of axe on tree trunk, a small hole is drilled and a fire set within. The embers smoulder for many days before the tree finally comes crashing down. In many places forests were being burned down to make way for jhum cultivation. Those fires were much more widespread and malignant. Only two per cent of land in the state is under permanent cultivation; either as small terraced fields or as bigger plots in the lowlands.

The bus entered one of the gates to Namdapha. A shaggy animal bolted across the front of the truck and was spot-lit by its headlamps. Eyes opened wide, shoulder joined shoulder in anticipation and heads came together as everyone peered out the windows. Poppy quacked in a sleep-laden voice ‘Porcupine! Porcupine! I know very well that was a porcupine.’

The hedgehog vanished under the bushes on the side of the road. The ten-year-old found his long-awaited opportunity to lay hands upon his father’s binoculars—so what if it was dark? The mini-bus halted near a waterfall. The air was rank with the odour of swamp deer, of which there must have been a herd nearby. Jain-ul-Abedeen, aka Benu Daku, is an experienced hunter who quit his hereditary profession to become an environmentalist. He said, snorting, ‘They are foolish animals. Once spooked by torches they can’t run. Hunters get them easy.’

It was a four-kilometre hike from the waterfall to the resthouse. Bags on backs, we trooped into the darkness in single file, our path lighted by torches. The drone of crickets vibrated through the forest. On our left was a deep gorge at the bottom of which rushed the Dihang River. The pauses in between the crump-crump of footsteps were defeaning in their silence. In those moments it was easy to imagine the act of measuring time as a joke which man plays to keep himself deluded. Elephant dung, a deer’s hoofprints, tyre marks became mysteries to be deciphered at leisure. Benu shone his light into the gorge, looking for something. He stopped, then said sotto voce, ‘There might be a tigress nearby.’

A commotion followed, which crumpled up our single file and transformed it into a huddle. The effect of torch-light on tigers was discussed in whispers, with books being quoted and their publishers and prices mentioned. This was a serious moment but something seemed out of joint. I don’t know why a thought occurred to me: ‘This is a new profession for Benu. He and Soumyadeep are injecting a dose of excitement into these middle-class nature-lovers so their trip becomes memorable.’

As soon as we reached the rest house, the sweat-soaked trekkers called out to their gods and collapsed, using their backpacks as cushions upon which to straighten their strained backs. Bricks were collected, makeshift stoves hurriedly set up, and rice put on to boil. A safe corner for the women to sleep in was scouted. A whistle went off shrilly and at length; everyone gathered round and the experts answered questions on Namdapha in the dim light of a kerosene lantern.

The tiger and three species of leopard inhabit Namdapha: the common leopard, the clouded leopard and the rare snow leopard. The red panda is also to be found here.

The Namdapha Tiger Reserve was set up because this area is the perfect habitat for felines: it has flowing water, shade and abundant prey. These make up the ideal environmental cycle.

Some creatures such as the flying squirrel, the white hornbill and the howler monkey make the reserve their home because of geographical features which are unique to the area.

Chakma refugees from Bangladesh have been rehabilitated in the Gandhi Gram village located inside the forest. They hunt and eat elephants. Hunting has put the elephant population under stress.

 Lisu refugees from Burma live in the jungle, too. They are skilled at hunting tigers.

Tiger-bone liquor is much in demand in China. Tiger whiskers are used to manufacture sex toys.

The wide expanse of the jungle is manned by just thirteen employees who can’t even manage to shut all the gates of the reserve. There is no electricity and all the drinking water must be brought from the Noa-Dihing River…

After these stark truths were underlined in many different ways, the dancing flames reflected on the walls took on a new meaning. The deep silence of the forest invaded our tired minds. The whistle went off again, shrill and long; rice and flat-bean curry was served. Later, everyone pitched in to wash the dishes in candlelight. Soon I could hear snores.

It was raining in the morning. Binoculars and cameras jumped out of their carrying cases and kept waiting for a long time. Later, we were ferried across the Noa-Dihing in two batches under a steady drizzle. Vimal Gogoi and Mridul Phukan identified birds and animals from their calls. The deep silence of the forest made itself felt once more. In a crowd, one loses the ability to feel because each is trying frantically to communicate something or the other and this takes up all our attention. However, walking underneath the dripping forest canopy on the thick carpet of fallen leaves and sodden mulch, I felt regret: This place had everything but that which I find in a tree standing alone on the side of a road, it couldn’t give me.

Poppy showed us a twig on which grew a layer of what looked like white mould. She said, ‘Look, there is no pollution here. This lichen is proof.’ She picked up a berry from the ground and said in chaste Assamese, ‘The pahu eats the flesh of this fruit and the porcupine its pit. In this manner they help propagate these seeds all over the forest.’

‘This pahu, is it a bird?’ She laughed. I understood I had made yet another mistake in wringing meaning from the Assamese language.

‘Pahu is not a bird. Pahu is Assamese for deer.’ Archana corrected me.

We had climbed from a height of forty metres to two hundred and fifty metres over rocky, uneven terrain. Thin red leeches swarmed up our shoes. They soon began to crawl into our socks and everyone started to look for salt—the best antidote for leeches—which we had all forgotten to bring. Tikendrajit, from Barpeta, had long been scratching his head. A leech had fastened itself to his scalp and was turgid with blood. I pulled it off.

A tribal, Lat Gam Singpho, was accompanying our party as guide. Using his dao he cut green cane into strips and and fashioned himself a hat. When everyone crowded around demanding a hat, he made one for each. A lengthy photo session ensued. The hats which adorned the people’s heads deranged the balance of chemicals within their brains. They capered about spouting gibberish: ‘He hai hua, chi chai chung!’ In those green-cane hats they had found an excuse to express their truest, innermost reactions to the Singpho’s illiteracy and backwardness. Later, all the men took turns to wield the keen Singpho dao on the surrounding trees.

The sun came out in the afternoon and the forest took on new colours. We heard the cracking of bamboo. A small herd of elephants was crashing through, though we saw them only in our imaginations. A sudden shower drenched us in the evening and we didn’t need the services of a boat to cross the Noa-Dihing on our way back. Many other environmentalists came to us at night and—eating chicken curry and rice—gave us much useful information on crocodiles, hornbills and elephants. In one later session, people narrated their experiences of the jungle. Someone was terrified by the sight of an elephant brought up close by his binoculars, another slyly transformed anecdote into personal experience. Archana told us the heartrending story of the death of a calving cow and her attachment to the orphaned calf. Soumyadeep often dreamt of wild elephants surrounding him and of a forest-goddess who would come to his rescue. Lat Gam Singpho, who now lived in the forest, had once been ward boy in a hospital. He had a remarkable story to tell.

‘I can face down a tiger with a dao in hand but ghosts scare me to death. There were some doctors in the hospital who conspired so I would lose my job. They put a new shirt on a corpse and propped it against the wall. A burning cigarette was wedged between its fingers, some loose change was inits pocket and a dao slung from a belt at its waist. The corpse was pointed out to me from afar and I was sent to summon it. When he didn’t hear my calls I put a hand on his shoulder and then took off running. That day, for the first time in my life, I drank a boiling cup of tea in one breath.’

This was the first true story of a tribal wandering about in a jungle of dead souls.

Amid the marathon of snoring, the ten-year-old snuggled up to me and demanded a story. He seemed unhappy and was unable to sleep. I scoured all the corners of my memory but found no tale suitable for a young child—all my stories were rated ‘A’. I first felt a surge of self-pity, then came a glimmer of self-realization: As a child, I would doubt every story I heard. And because I kept neglecting them, kept hating them, they had evaporated from memory. The child said to me, ‘Let’s go for a stroll outside. Maybe you will remember one.’

Outside the resthouse, a furry creature floated across the milky-white beam cast by the flashlight, followed by another—a pair of flying squirrels were playing catch. An entire team of experts tramping about all day hadn’t been able to spot even one. A thin membrane connects the fore and hind legs of the rodent on both sides. Using tree branches as a runway, it gathers speed and launches itself. The membrane fills up with air and the squirrel glides from tree to tree.

My work had been made easy. I adorned the boy’s shoulder with the cloak of a forest-god, slung a Singpho dao around his waist and put him on the back of a flying squirrel. Now he could himself describe the mysteries of the jungles to me.

~

The first batch of one thousand plastic replicas of hornbill beaks had arrived from Delhi which had been distributed in the Nyishi villages around Namdapha. Lat Gam Singpho had a question for Bharat Sundaram, project officer with the Asian Elephant Research and Conservation Centre, Bangalore: ‘Will elephants made out of plastic be distributed among the Chakma refugees living in the west of Namdapha?’ The Chakmas hunt elephants with poisoned arrows. It takes them half an hour to bring down an animal but preparation for the hunt lasts many days.

Young Bharat Sundaram was then on a trek in the Northeast, accompanied by porters laden with provisions and tents. He was tracking footprints and sampling elephant dung to determine their numbers. A nationwide elephant census was underway. The Northeast was a special zone where the very existence of elephants was under threat in many areas; many of their old stomping grounds and corridors of passage had been wiped out. However, it was the hornbill Bharat was interested in because of those traits in the bird which are only expected of humans. Bharat had photographed a Rufous-headed Hornbill in Namdapha. This species of hornbill had never been spotted in India and the event was being treated as a new find.

The hornbill is a colourful, beautiful bird with an extraordinarily large beak. When the female lays eggs, she takes maternity leave of four months. The young emerge from the nest only once they are able to fly. During this time the male guards the nest. He brings food for his wife and children. Some species of hornbill form cooperative societies. Many pairs get together to hatch eggs and to look after the brooding mothers. Pairs mate for life, and remain faithful to each other.

The beauty of the hornbill is its curse. Nagas use their feathers to adorn their headdresses. Many tribes of Arunachal Pradesh, including the Nyishi, use hornbill beaks as ornaments on their crowns. They stalk the male as it returns to the nest with food for its brooding mate and kill it. The flesh of the hornbill and oil extracted from its fat are considered aphrodisiac. Unani hakims, wandering ayurvedic vaids who examine people on roadsides in full view of curious gawkers, quacks of all varieties possess hornbill beaks with which they lure the loveless and the superstitious. This bird is rapidly dwindling in numbers; it is a rare sight even in dense forests.

Forest officers and the World Wildlife Trust of India jointly came up with the idea of plastic beak replicas after a great deal of thought. The beaks distributed in the Nyishi villages had been manufactured in Delhi on order. Each had cost 15 rupees to make. Since one can’t make money off hornbills, they were being distributed gratis. The officers and the NGOs were certain that the tribals would reconcile these plastic toys with their religious beliefs and stop hunting the hornbill. Some organizations felt that plastic is harmful to the environment and the tribals should be given wooden beaks. Even better, they should be trained to carve beaks so that they could find employment.

Some people in the villages had accepted the plastic beaks, but the ones with the original article made fun of them. Now the danger was that the remaining hornbills in the forest would also be wiped out due to this conflict between the villagers. This was why Lat Gam Singpho wanted to pose his question to Bharat Sundaram.

Bharat had also visited Gandhi Gram, the furthest village on India’s frontier, in the far south of Namdapha. Lisu refugees from Burma have been settled there. Anyone who visits with kerosene and sugar is welcomed in the village as an honoured guest. The nearest weekly market is a three-day walk each way. They barter goods with local fish which they hunt with an anesthetic. The Lisu examine the moss growing on rocks standing in the river. From the marks made on the moss by the fishes’ mouth as they graze upon them, they gauge the size of the fish. They then take the leaves of a particular tree which has narcotic properties, grind them and stir the paste into the water. The drugged fish belly-up on the surface. They were not for sale but, yes, they could be bartered for kerosene.

~

The Apatani tribe was yet to come across that important invention known as the wheel in the year Kuru Hasang was born in the Ziro valley. Still, the Apatani are considered to be the most modern among the tribes of Arunachal for having innovated the concepts of fixed—non-jhum—cultivation and irrigation. When Hasang was admitted to the Army School, Bhubaneshwar, in 1963 his father ritually sacrificed an egg on the village border before letting him go out into the limitless, unknown world. Within five years of leaving his village, Hasang was commissioned into the Air Force and became a fighter pilot and flew MIGs. He came back to his village in Arunachal in 1978—once the state was formally formed—having retired as Flight Lieutenant, to try his hand at politics. When I was travelling in the area, the middle-aged Kuru Hasang, after having lost multiple elections, was the chief secretary of the Arunachal Pradesh Congress Committee. His wife ran a medical store in the Hapoli neighbourhood of Ziro.

Many tribes of Arunachal Pradesh, including the Nocte, the Khampti, the Nyishi and the Tagin, have their own tarnished heroes who, because of coincidences, have managed to cram many lives into one. They have vaulted distances which takes the rest of humanity many thousands of years to trudge over. More than sixty tribes live in Arunachal and there are more than fifty known languages. Yet the written history of the area is merely three hundred years old. Every old officer who served in the area has a story which begins: ‘When we first came here, accustomed as we were to the sensations which nudity arouses, we wouldn’t even look at the tribals. And, when we began to look at them, what happened was…’

The state of Arunachal has itself similarly launched headlong into democracy. Before Independence, the region was officially known as ‘Tribal Area’. A few British surveyors would travel in the area accompanied by armed battalions, scouting for opportunities to build roads and lay down railway lines. They wanted to extend trade possibilities for East India Company further into countries in the east. In 1954 the Kameng, Siang, Subansiri, Lohit, Tirap and Tuensang divisions was combined into the North East Frontier Agency (NEFA) which was administered by the Foreign Ministry for a long time. After 1972 Tuensang went to Nagaland and the rest of the divisions coalesced into Arunachal Pradesh. Post 1962, after the debacle with China, the Central government invested blindly in roads and communication networks, and the investment shows. A population of merely nine lakh lives in an area of 78,000 square kilometres but telephone poles stand tall in every jungle. The Army regularly flies sorties from bases in Siliguri and Dibrugarh, ferrying rations, political leaders, officers and soldiers—an exercise that costs an average of 4 crore rupees per day. There are close to one hundred helipads in the state. In all of India, the maximum number of mishaps—mainly due to helicopters losing their way in fog and crashing—in which ministers, chief ministers and pilots have lost their lives have occurred in Arunachal.

I wanted to visit Hapoli and meet Kuru Sangma and his wife. The idea was to conduct a long interview on his memories of the time when he came back to Ziro on his first furlough from the Air Force. But I got distracted and reached Tawang instead.

That day in Bhalukpong, the remains of a poet interred within the soul of a Mahayani Buddhist monk decided to draw breath. All he said was: ‘Tawang will have played for two hours in the light of the new sun by the time dawn breaks over the rest of the world.’ I also had the names of lamas given to me by friends in Benares, those who had gone to Sarnath to study theology and who now lived in monasteries in Arunachal. So, naturally, I set out on a very long, serpentine road which was shrouded in fog and which threaded through a desert of snow and ice. I have never seen more shades of blue in the sky since.

Before Bomdila, I could never have imagined that a Tata Sumo, grinding along in the first and second gears, can be like a faithful horse which responds to its rider’s most urgent wishes, his most fleeting whims. It takes a special set of ears to drive on these remote mountains; ears which can discern the whispers, wails and sobs of an engine underneath its overpowering roar. And it takes a special kind of sensitivity which detaches the accelerator and the brake from the car, makes them part of the driver’s being and transmutes the smallest tremor, the least vibration, instantaneously into crystal-clear thought. It is not without reason that in the couplets and verses inscribed on windscreens and bumpers—usually dismissed as slight and even cheap—the vehicle is often cast in the role of lover or mistress. At their base is the living, breathing relationship between man and machine, and their pact to live and die as one.

Descending from the 6,000-feet-high Nechi Phu pass, many a time I would visualize the Tata Sumo drifting down the gorge like an unmoored kite and children standing at the bottom of the valley, waving, imagining it to be a helicopter. At each instance I would stare hard at the driver: Was I projecting my innermost fear and influencing him in any way? But he was in deep trance. Lost in a time and space where passengers had no existence any longer.

From Bomdila (8,500 feet) an infinite variety of clouds billow and play. Fog descends without warning and obscures the world; when it parts the dazzling Himalaya stands tall and close. Bomdila is the district headquarters of West Kameng district, home to the Monpa, Sherdukpen, Aka, Mijia and Bugun tribes. The dogs of Bomdila are infamous—they roam about on sub-zero nights and can easily take down a man and feed on his flesh. There is an abundance of flora. Some quite lucrative. A truckload of Taxus baccata—from which the anti-cancer chemical Taxol is extracted and exported to Europedelivered to Guwahati fetches enough money to buy a brand-new truck chassis.

There was an old man in Bomdila market who said to me in the manner of one demonstrating an invisible monument: ‘The Chinese had marched down to here during the war.’

I found a place to bed down in a slate-roofed dhaba in the Dirang valley. A wild wind sprang up and whistled as night descended; the temperature dropped sharply and it was difficult to keep one’s feet in that gale outside. I piled two quilts over my sleeping bag but the cold bore into my bones. The mistress of the dhaba allowed me to move my sleeping bag close to the fireplace but before going to bed issued strict instructions to her terrifying mastiff: ‘Keep sharp; no one should go outside!’ I’d make a move to walk out, driven by the desire to view the silvery Himalaya in moonlight, but the dog would bristle, bare its teeth and growl imperiously: ‘A fleeting glimpse, cooling balm to the eyes; or your life. Make up your mind about what you want.’ I’d resign myself and come back to my sleeping bag.

In the morning I made my way to a gompa—established by the Buddhist guru Padmasambhav in the eighth century inside an ancient fort, the Dirang dzong—to look for Lama Nawang Lamsang. In this area, which seems more Tibet than India, Padmasambhav is known as Lopon Rimpoche. Young novice monks were seated in the sanctum sanctorum of that small gompa, reading from ancient scriptures. An elderly monk informed me that monk Lamsang was travelling outside the Dirang valley. After a moment’s thought he opened a battered tin box, took out a very old piece of stone and placing it on my palm, said, ‘This is the heart of a demon which was killed here. After it was killed, the Mon people converted to Buddhism.’

‘How did its heart turn to stone?’

‘What then, if not a stone… It was a demon!’

Now there was no reason for me to doubt that symbol of the victory of Buddhism.

As one travels from Dirang towards Sela Pass, the vegetation thins out, disappears and is replaced by snow-topped granite mountains and in a very few places by densely growing grass which appear soft as mattresses. Hidden in dense fog, Army trucks scream and wail their way up in an ant-crawl; grazing yaks occasionally heave into view; the lack of oxygen makes breathing difficult. The Sela (14,000 feet) is the second-highest motorable pass in the world. These winding high roads, made possible by the prowess of the Border Roads Organization, resemble kite cord wound around one’s fingers and then carelessly tossed aside. To the left, immediately after the Sela gate, was a lake which had frozen inwards from its shores. In the middle was clear blue water which seemed to reflect the universe itself. Some fresh Army recruits were playing with snowballs and taking pictures. From the window of a small, stone-hut teashop near the gate I could see valleys shimmering through gaps in the layers of cloud which covered them. A family made its living from the shop, selling tea to tourists and soldiers. Looking out at the soldiers, the tea-maker said sagely even as vapour billowed from his mouth, ‘The more difficult a place is to reach, the more its beauty is enhanced… But for how long?’

The most reassuring sight in this bleak, mountain desert were the white flags which flapped restlessly in the icy wind. This is a custom in these parts: Whenever one asks for something from the gods he erects a white flag. Perhaps he lives with the conviction that his prayer will some day ride the winds to its intended address.

The driver slipped into a trance once more as the descent commenced. It had rained recently. The water dripping off the rocks and boulders on the sides of the road had pooled in the middle and frozen over, creating strange shapes—mostly in the shape of daggers. Greenery made an appearance after Jaswantgarh. In Jang we stopped in an old Monpa house where a bottle of rum stood next to a kettle of water bubbling on a wood fire. A cat was perched on a stool next to the stove to keep count of the pegs consumed. The valleys which endured the relentless assault of the wind sighed and moaned. The owner of the establishment sat outside; she was convinced that life-threatening cold is enough to ensure honesty.

We caught occasional glimpses of the golden roofs of the Tawang Monastery—one of the most important and famous centres of Mahayana Buddhism—in the falling twilight as our vehicle rounded corners; the Collector had already been contacted and a grand suite booked in the Circuit House.

~

Gulping pure mountain air in the pauses afforded to me by my lungs which struggled in the thin air, I reached the monastery in the afternoon, looking for a Sarnath-returned lama. The prayer-wheel mounted on the front gate was freezing. Teenaged monks were sitting in the lawn in front of the prayer hall, eating porridge. The prayer-flag towering above them was straining in the wind, blowing with sufficient force to sway the sixty-foot pole to which the flag was attached. Behind them was the Tawang Monastery museum. Among the exhibits were an enormous elephant tusk, ancient musical instruments, monks’ belongings, and human skulls covered over with gold and silver leaf and exquisitely carved. There was also a library which included silk-wrapped religious manuscripts seven centuries old. The prayer-hall was awash in the glow of a statue of Buddha that had been brought from Tibet three hundred years earlier. On the walls were murals depicting tantric scenes.

There used to be many legends about how such a massive statue reached Tawang. About half a century earlier, when a strong earthquake jolted the region, the statue split and many new stories added to the legends and fed into them. In 1997, His Holiness Dalai Lama visited Tawang Monastery; under his orders, skilled sculptors were called in from Nepal to restore the Buddha statue. During the restoration, certain documents were recovered from the belly of the statue; from them it was learnt that different parts of Buddha’s body were interred separately in southern Tibet by followers of the Gelugpa sect, which had been brought there on horseback.

I asked the lama in-charge of the museum why so many skulls were displayed. He pointed out Panden Lhamo, the guardian deity and protectoress of Tibet, in a mural and said, ‘Earlier, lamas used them to offer liquor to the deities during tantric worship; but Pepsi or Coke is offered nowadays.’

‘Where do you get that from?’

‘From the general store in the bazaar, of course!’ the lama said, staring at me in astonishment.

After the Potala Palace in Lhasa, Tawang is the oldest monastery in the Mahayana tradition which was established in the seventeenth century by Merag Lama Lodre Gyatso. He is said to have been inspired and guided by his horse to do so. In the Tibetan language, Tawang means ‘chosen by a horse’. Tawang is world famous as a centre of Tantric worship; seventeen monasteries fall under its direct administration. Until not very long ago, collectors from Tibet used to come to the villages in Tawang to collect land tax. For China, Tawang is northern Tibet. It was on this basis that when Arunachal Pradesh became a state in the Indian union, China registered an official protest about India’s claim on certain parts of the area.

That evening in the bazaar I met a red-robed monk astride a motorcycle. He told me that Jaspinder Narula, a Bollywood playback singer of Punjabi origin, would be performing at the Buddha Purnima festival. Udit Narayan—another Bollywood playback singer—had already performed once. He also told me that the actors Shahrukh Khan and Madhuri Dixit had shot scenes for the movie Koyla here.

I asked the monk, ‘Why is multinational Pepsi offered to the gods instead of homebrew?’

He winked, and looking like a man enjoying himself, replied, ‘Buddhism is also a multinational religion, where’s the problem!’

15800097_10210018296288017_8723673239759262081_oAnil Yadav is a vagabond writer and journalist. His book include a collection of short stories Nagar Vadhuyen Akhbar Nahin Padhatin, collection of articles, essays, memoirs and journalistic writings Sonam Gupta Bewafa Nahi Hai and the acclaimed travelogue Woh Bhi Koi Desh Hai Maharaj!  

And this Himalaya’s experiences excerpted here from Himalaya: Adventures, Meditation, Life; An Anthology Edited by Ruskin Bond and Namita Gokhle and published by Speaking Tiger, New Delhi, 2016.  

Dear PM sir, rabi acreage actually fell and not increased !

As opposed to what has been said officially about the positive impact of demonetisation (note ban) on rabi sowing, acreage actually declined in 2016-17 as compared to a normal year. Let us see why this has been so. 

 

Acreage under rabi crops declined in 2016-17 as compared to 2013-14

By Shambhu Ghatak

As opposed to what has been said officially about the positive impact of demonetisation (note ban) on rabi sowing, acreage actually declined in 2016-17 as compared to a normal year. Let us see why this has been so.

On New Year’s Eve, Prime Minister Narendra Modi while addressing the nation post-demonetisation, among other things, said:

“…Friends in the last few weeks, an impression was sought to be created that the agriculture sector has been destroyed. Farmers themselves have given a fitting reply to those who were doing so. Rabi sowing is up by 6 per cent compared to last year. Fertilizer offtake is up by 9 per cent. During this period, the Government has taken care to ensure that farmers do not suffer for want of access to seeds, fertilisers and credit. Now, we have taken some more decisions in the interest of farmers…”.

In short, the PM in his speech tried to convince the people of India that demonetisation had no adverse impact on agricultural production, and gross area sown under rabi crops actually soared up in 2016-17 vis-à-vis last agricultural year. This was possible due to a number of steps undertaken by the government in the period spanning demonetisation (i.e. 8 November, 2016 – 30 December, 2016), said the PM.table-1-gross-sown-area-under-rabi-crops

Source: Economic Survey 2015-16 Statistical Appendix, please click here to access, http://indiabudget.nic.in/es2015-16/estat1.pdf

* Press release: Rabi Crops Sowing Crosses 628 Lakh Hectare, Press Information Bureau, Ministry of Agriculture, 20 January, 2017, please click here to access, http://pib.nic.in/newsite/PrintRelease.aspx?relid=157556

Note: Data on gross sown area under various rabi crops from 2012-13 to 2014-15 has been taken from Economic Survey 2015-16

Based on preliminary reports received from the states by the Ministry of Agriculture and Farmers Welfare as on 20 January, 2017, one could say that the acreage under rabi crops grew from 59.2 million hectares in 2015-16 to 62.8 million hectares in 2016-17 i.e. by 6.1 percent. This is exactly what PM Modi had indicated in his New Year’s Eve speech.

However, if experts are to be believed, then we cannot compare acreage under rabi crops in 2016-17 with that of the previous two years i.e. 2014-15 and 2015-16 during which drought was faced by most Indian states as a result of scanty monsoon rainfall.

Since 2016-17 has been a normal year in terms of monsoon rainfall, so the acreage under rabi crops should ideally be compared with that of a previous normal year — in this case 2013-14.

The gross sown area under rabi crops declined by almost 2.5 percent between 2013-14 and 2016-17 i.e. from 64.4 million hectares to 62.8 million hectares. From table 1 one gets that although acreage under wheat and pulses increased between 2013-14 and 2016-17, the same under rice, coarse cereals and oilseeds declined.

It is worth noting that for the country as a whole, rainfall during the southwest monsoon season (June-September) as a percentage of long period average (LPA) was 92 percent in 2012, 106 percent in 2013, 88 percent in 2014, 86 percent in 2015 and 97 percent in 2016, as per various reports from the India Meteorological Department (IMD).chart-1-foodgrain-production-in-various-years

Source:  First Advance Estimates of Production of Foodgrains for 2016-17 (as on 22 September, 2016), Agricultural Statistics Division, please click here to access,

http://eands.dacnet.nic.in/Advance_Estimate/Advance_Estimate_Eng.pdf

The first advance estimates of foodgrain production for 2016-17, which was released on 22 September, 2016 by the Ministry of Agriculture and Farmers Welfare shows that the kharif foodgrain production has been higher in 2016-17 (i.e. 135.03 million tonnes) as compared to that of corresponding season of the previous four years (see Chart-1). However, the advance estimates of foodgrain production during rabi for the present year is going to be released in February i.e. after the presentation of Union Budget 2017-18. In such a scenario, it is too early to say that demonetisation did not impact rabi sowing adversely.

As per the Arthapedia, www.arthapedia.in [a portal to explain the concepts used in economic policy domain in India, which is managed by the officers of Indian Economic Service (IES)], in an agricultural year (July-June) the Ministry of Agriculture and Farmers Welfare releases four advance estimates, followed by the final estimates of production of major agricultural crops in the country.

The Arthapedia website informs us that the first advance estimates are released in September when kharif sowing is generally over, and it covers only kharif crops. The second advance estimates are released in February next year when rabi sowing is over. The second advance estimates covering kharif as well as rabi crops take into account firmed up figures on kharif area coverage along with available data on crop cutting experiments for yield assessment of kharif crops and tentative figures on area coverage of rabi crops. The third advance estimates incorporating revised data on area coverage for rabi crops and better yield estimates of kharif crops are released in April-May. The fourth advance estimates are released in July-August and by this time fully firmed up data on area as well as yield of kharif crops and rabi crops are expected to be available with the states.

 

References:

Press release: Rabi Crops Sowing Crosses 628 Lakh Hectare, Press Information Bureau, Ministry of Agriculture, 20 January, 2017, please click here to access, http://pib.nic.in/newsite/PrintRelease.aspx?relid=157556

PM’s address to the nation on the eve of New Year 2017, 31 December, 2016, please click here to access, www.pmindia.gov.in/en/news_updates/pms-address-to-the-nation-on-the-eve-of-new-year-2017/?comment=disable

Economic Survey 2015-16 Statistical Appendix, please click here to access, http://indiabudget.nic.in/es2015-16/estat1.pdf

First Advance Estimates of Production of Foodgrains for 2016-17 (as on 22 September, 2016), Agricultural Statistics Division, please click here to access, http://eands.dacnet.nic.in/Advance_Estimate/Advance_Estimate_Eng.pdf

2016 Southwest Monsoon end of season report, India Meteorological Department, please click here to access,

http://reliefweb.int/sites/reliefweb.int/files/resources/20161010_pr_60.pdf

2015 Southwest Monsoon end of season report, India Meteorological Department, please click here to access,

http://www.imdpune.gov.in/Links/endofseasonreport_2015.pdf

2014 Southwest Monsoon end of season report for the state of Uttar Pradesh, India Meteorological Department, please click here to access,

http://amssdelhi.gov.in/Nigam/MCLUCKNOW/Uploads/monsoon_report.pdf

2013 Southwest Monsoon end of season report, India Meteorological Department, please click here to access,

http://www.indiaenvironmentportal.org.in/files/file/endofseasonreport2013-2.pdf

2012 Southwest Monsoon end of season report, India Meteorological Department, please click here to access,

http://www.indiaenvironmentportal.org.in/files/file/endofseasonreport.pdf

Cropping seasons of India- Kharif & Rabi, Arthapedia, please click here to access, www.arthapedia.in/index.php%3Ftitle%3DCropping_seasons_of_India-_Kharif_%2526_Rabi

The mystery of agricultural growth -Himanshu, Livemint.com, 8 December, 2016, please click here to access, http://www.livemint.com/Opinion/on308TI8YoOW5Xlr7YGryJ/The-mystery-of-agricultural-growth.html

Shambhu Ghatak , presently involved with Inclusive Media for Change at CSDS. New Delhi. You can contact him through shambhughatak@gmail.com.

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