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समाज के हाशिए का सिनेमाई हाशिया: तत्याना षुर्लेई


 सिनेमा के सौ साल के इतिहास में  दलितों  के बारे में ज़्यादा फ़िल्में नहीं हैं। शुरू में ऐसा लगा कि गाँधी जी और उनके तरह के दुसरे सुधारकों की मदद से यह विषय लोकप्रिय होगा लेकिन जल्दी ही ऐसी फ़िल्में मुख्यधारा के विषय से बाहर चली गयीं। क्या भारतीय दर्शक ऐसी फ़िल्मों के लिए तैयार नहीं हैं? मुझे लगता है कि आधुनिक सिनेमा में सब कुछ दिखाया जाता है इसलिए इस विषय से इतना डर ज़्यादा अजीब लगता है। जब हम बॉलीवुड फ़िल्मों की संख्या के बारे में सोचेंगे तो यह देखेंगे कि दलित न सिर्फ़ जाति के वरीयता-क्रम से बाहर हैं बल्कि सिनेमा से भी बाहर हैं। 100 करोड़ से उपर की जनसंख्या वाले देश के सिनेमा में बहुजन-जीवन के स्वाभाविक-चित्रण का अभाव चिंताजनक है और इसका एक बड़ा कारण संभवतः यह है कि बहुजनों का बड़ा हिस्सा अभी भी सिनेमा के उपभोक्ता समुदाय में तब्दील नहीं हुआ है। यह तब तक नहीं बदलेगा जब तक उनकी परिस्थितियों को स्वभाविक तरीके से नहीं दिखाया जाएगा। अगर हम दलित-समस्या पर ही केन्द्रित रहेंगे और सिर्फ़ सुधार के आग्रही के बतौर ही दलितों का चित्रण करेंगे तो वे कभी समाज के स्वाभाविक हिस्से की तरह कभी नहीं दिखेंगे।

अछूत कन्या

अछूत कन्या

समाज के हाशिए का सिनेमाई हाशिया

भारतीय व्यावसायीक फ़िल्मों में दलितों की अनुपस्थिति।

BY तत्याना षुर्लेई

एक पुरानी कहानी है – थाइलैंड में रहनेवाली एक राजकुमारी एक बड़ी नदी में जहाज पर यात्रा करती थी। नदी के किनारे खड़ी भीड़ तालियां बजाकर राजकुमारी और उसके साथ जाने वाले नौकरों का स्वागत करती थी। यह सब देखकर राजकुमारी अतिउत्साह में भीड़ की ओर कुछ ज्यादा ही झुक जाती है और जहाज़ से बाहर गिरकर पानी में डूब जाती है। जहाज़ और किनारे पर खड़े लोगों में से किसी ने उसकी मदद नहीं की। ऐसा क्यों हुआ? इन सारे लोगों में से किसी ने उसकी मदद क्यों नहीं की? राजकुमारी उस जहाज़ में बहुत सारे नौकरों के साथ यात्रा करती थी। उन नौकरों और किनारे पर खड़े लोगों से कोई न कोई तो मछुआरा ज़रूर रहा होगा जिसको अच्छी तरह तैरना भी आता होगा। इसका जवाब बहुत आसान है – राजकुमारी दुसरे लोगों से इतनी ऊपर थी कि किसी को उसको छूना मना था[1]।

अस्पृश्यता के अलग अलग प्रकार होते हैं।  Brian De Palma की फ़िल्म के द्वारा चर्चित ‘अस्पृश्यता’ के अलावा एक और का ज़िक्र करना चाहिए क्योंकि इसके बारे में सब लोगों को पता है। दूसरा मामला भारत से संबंधित है जहाँ एक दुसरे से छू जाना भयावह माना जाता है। दोनों में डर बराबर है मगर आधार अलग। देवी बनी हुई राजकुमारी या खतरनाक माफ़िया से डर और उनकी अस्पृश्यता भारतीय दलितों की अस्पृश्यता से बहुत दूर है।

बहुत सारे सुधारक जो भारत में रहते थे अछूतों की ज़िंदगी को बदलने की कोशिश करते थे लेकिन अजीब बात यह है कि इस काम में उन में से किसी ने फ़िल्म का इस्तेमाल नहीं किया। भारतीय निर्देशकों के लिए भी फ़िल्म अधिप्रचार (PROPAGANDA) के लिए उचित साधन नहीं लगता था। यह भी एक अजीब बात है क्योंकि अधिप्रचार के लिए फ़िल्म सब से अच्छा साधन है। फ़िल्म बनानेवाले लोग समाज सुधारकों के साथ काम नहीं करते थे। इसी प्रकार गाँधी जी जो अछूतों के लिए बहुत काम करना चाहते थे और करते भी थे लेकिन फ़िल्म की मदद से अपने सुधारों के बारे में कुछ नहीं बताते थे। उनके लिए फ़िल्म कभी अच्छी चीज़ नहीं थी और उन्होंने कभी पसंद  भी नहीं किया। उनके लिए फ़िल्में पतनशील पश्चिमी सभ्यता का एक और उदाहरण था या फिर साधारण मनोरंजन का एक छोटा सा साधन जिसका ज़िंदगी में कोई महत्त्व नहीं है। उन्होंने स्वीकार किया कि उन्होंने सिर्फ़ एक फ़िल्म देखी है। यह फ़िल्म 1943 वाली विजय भट्ट की ‘राम राज्य’ थी और शायद इसीलिए उन्होंने कभी नहीं सोचा कि यह मनोरंजन करने वाला, साधारण लोगों का तमाशा अपने पैदाइश से ही वह सब कुछ दिखाता जिसके बारे में वे बताते हैं[2]।

उदाहरण के लिए फ़िल्म की दुनिया में अलग अलग धर्म के लोग साथ साथ रहते हैं और यह बात किसी को कभी अजीब नहीं लगती थी। शुरू से ही ऐसी स्थिति थी कि अक्सर हिंदू धर्म के देवताओं या राजाओं का अभिनय मुसलमान अभिनेता करते थे और मुसलमान के पीरों या सम्राटों का अभिनय हिंदू अभिनेता। यह भी कोई नयी बात नहीं है और न कभी थी कि किसी समय में सब से लोकप्रिय अभिनेता मुसलमान होते हैं और दुसरे समय में हिंदू। ‘तीन खानों’, यानी आमीर खान, शाहरुख़ खान और सलमान खान की लोकप्रियता जो 1990 के दशक में थी, इसका अच्छा उदाहरण हो सकता है। इसी समय में ‘कुछ लोगों’ के लिए ऋतिक रोशन की सम्भावना का हिंदू धर्म से स्पष्ट संबंध था। उन ‘कुछ लोगों’ के लिए ऋतिक तीन खानों से जीतने के लिए आ गया और हिंदू धर्म मुसलमानों से जीतने के लिए[3], लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ऋतिक की लोकप्रियता के अतिरिक्त बाकी तीनों अभिनेता फ़िर भी मशहुर रहे। शाहरुख़ खान के साथ एक ध्यान देने योग्य घटना हुयी जो कि बहुत अच्छा उदहारण है। वह काम करने के बाद बहुत थके होने के कारण एक गाँव के पास गाड़ी में ही सो गया। जब उठा तो उसने गाँववालों की भीड़ देखा। गाँववाले आग्रह कर उसे एक घर में ले गए और वहाँ यज्ञ-वेदी के स्थान पैर  उसने अपनी तस्वीर देखी[4]। एक और ऐसी ही कहानी जिसके बारे में बताना मुझे उचित लगता है अशोक कुमार की है। वह अभिनेता जो विभाजन के बाद अपने स्टुडियो ‘बॉम्बे टाकीज’ में बहुत से मुसलमानों को काम देता था। एक बार वह अपने एक दोस्त के साथ स्टुडियो से घर जा रहा था। रास्ते में मुसलमानों का इलाका पड़ता था, जहाँ एक एक बारत जा रही थी। अशोक के दोस्त को डर लगा की बारत वाले उनके साथ कुछ बुरा बर्ताव करेंगे लेकिन भीड़ के लोगों ने अशोक कुमार को पहचान लिया, उन दोनों को स्वागत किया और उनको सब से अच्छा रास्ता दिखाया। दोस्त आश्चर्यचकित हो गया लेकिन अशोक कुमार ने उसको कहा कि मुझे एक क्षण के लिए भी डर नहीं था क्योंकि कलाकारों की कोई जाति या धर्म नहीं होता है[5]।

स्पष्ट रूप से फिल्मी- दुनिया की स्थिति इतनी अच्छी नहीं थी, जितनी आशोक कुमार के विचार में थी। उदाहरण के लिए देवानन्द धर्म के कारण सुरया से शादी नहीं कर सकता था। सुरया के परिवार ने उसको देव को छोड़ने का हुक्म दिया, क्योंकि देव हिंदु था। कुछ समय बाद सुरया को अफ़सोस हुआ लेकिन फैसला बदलने के लिए देर हो चूका था[6]। इसी तरह जब 1957 में नर्गिस को ‘मदर इंडिया’ में काम मिल गया तो कुछ लोगों को यह अच्छा नहीं लगा। वे नहीं चाहते थे कि देश का प्रतिरूप एक मुसलमान औरत हो[7]। फ़िर भी, हम यह कह सकते हैं कि ये सिर्फ़ छोटे उदाहरण हैं। फ़िल्म की दुनिया में धर्म का उतना महत्त्व नहीं था जैसे मामूली जीवन में।

इन उदाहरणों में हम लोग देख सकते हैं कि फ़िल्म में ‘अनुदारता से लड़ाई और कुछ अलग दुनिया दिखाने की कोशिश’ हमेशा कहानियों की स्तर पर होती थी। फ़िर भी, इसका मतलब यह नहीं है की ऐसी फ़िल्में कभी नहीं बनाई जाती थीं जिनकी कहानियों में अलग-अलग पूर्वाग्रहों से, दुर्गुणों से लड़ाई होती थी (धर्म के क्षेत्र से अलग)! इस तरह हम यह कह सकते हैं कि पहती फ़िल्म जो अस्पृश्यता के बारे में थी जो कि गाँधी जी के सुधार-आन्दोलन से प्रेरित थी Franz Osten की ‘अछूत कन्या’ जो 1936 में बनाई गई। यह फ़िल्म प्रताप नाम के ब्राहमण लड़का और कस्तुरी नाम की अछूत लड़की की एक दारुण प्रेम-कहानी है। कस्तुरी के पिता, जिनका नाम दुखीजा है, एक स्टेशन-मास्टर हैं और प्रताप के पिता की एक दुकान है। दुखीजा ने एक बार प्रताप के पिता की जिन्दगी बचायी और इस घटना से उन दोनों की बहुत अच्छी दोस्ती है। उनका अपने बच्चों की दोस्ती से कोई विरोध नहीं है लेकिन जब प्रताप और कस्तुरी की दोस्ती से प्रेम उत्पन्न होता है तो अचानक उन दोनों की जातियों का अंतर दिखाई देता है। यह अंतर जो पहले बिलकुल प्रकट नहीं था। प्रताप की अपनी जाती की एक लड़की से शादी की जाती है और यह शादी कस्तुरी के लिए कोई चौंकानेवाली या गज़ब बात नहीं है। अछूत लड़की के लिए यह सब इतना स्वाभाविक है कि वह प्रताप की पत्नी – मीरा से दोस्ती करती है। प्रताप के पिता की अछूतों से दोस्ती गाँववालों को पसंद नहीं है और जब इस कारण से उसके साथ दुर्घटना होती है तो दुखीजा उसके लिए जल्दी दवा लाना चाहता है और जाती हुई रेलगाड़ी को रोकता है। दुर्भाग्या से उसको न दवा मिलती है न कोई पुरस्कार मिलता है, बल्कि वह अपने काम से निकाला जाता है। उसके स्थान पर एक जवान लड़का आता है जिसका नाम मनु है। दुखीजा मनु और कस्तुरी की शादी करवाता है। दुर्भाग्यपूर्ण कि लड़की शादी को स्वीकार करती है और कोई फ़रियाद नहीं करती, तब भी जब उसको पता चलता है कि मनु की एक और शादी हो चूकी थी और उसकी पत्नी – कजरी उनके साथ रहने के लिए आ जाती है। कस्तुरी कजरी को दीदी बुलाती है और कभी कोई बुराई नहीं करती है। फ़िर भी मनु की दुसरी पत्नी को बड़ी ईर्ष्या है क्योंकि मनु सिर्फ़ कस्तुरी से प्रेम करता है। मीरा कजरी की सहेली है। पहली मुलाकात में प्रताप की पत्नी कजरी को कहती है कि उसका पति भी सिर्फ़ कस्तुरी से प्यार करता है। कजरी के मन में कस्तुरी को निकलाने की अशुभ राय आती है और दोनों औरतों की चुगली के कारण प्रताप और मनु के बीच बहुत बड़ा झगड़ा होता है। वे दोनों रेल की पटरी पर मार-पीट करते हैं और आनेवाली गाड़ी पैर ध्यान नहीं देते हैं। रेलगाड़ी को रुकवाने के चक्कर में कस्तुरी की मौत होती है। इस लज्जाजनक विषय को दिखाने के लिए, जो पहले किसी से नहीं दिखाया गया, इस फ़िल्म को बहुत सारी प्रशंसाएँ मिली[8]। वास्तव में 1936 में ऐसे विषय के बारे में बताना बहुत बड़ी बहादुरी थी। अफ़सोस की बात सिर्फ़ यह है कि इतने सालों में किसी दुसरे निर्देशक ने कुछ ऐसा नहीं किया। शायद Franz Osten के लिए ऐसी कहानी को दिखाना इतनी मुशकिल बात नहीं थी क्योंकि वह जर्मनी से भारत आया था और जिसके लिए यह विषय कोई बड़ा निषेध नहीं था। हमें फ़िर भी यह स्वीकार करना होगा कि फ़िरंगी होने के बावजूद Osten ने अपने दर्शकों को जो दिखाया उसके लिए उसने भारतीय समाज का बड़ी गहराई से अध्ययन और अनुभव किया। Osten का अनुभव उन स्थानों में अच्छी तरह दिखाई देता है जहाँ फ़िल्म के नायक और नायिका बिना किसी झिझक के अपने उपर आरोपित भाग्य को स्वीकार करते हैं और अपनी खुशी और सन्तुष्ट भविष्य के लिए लड़ाई नहीं करते हैं। दिलचस्प बात यह है कि फ़िल्म अपने दर्शकों को भी बहुत अच्छी लगी। हमें यह भी याद रहना चाहिए कि अच्छी व्यावसायीक फ़िल्म वह होती है जो सब को पसंद हो, सीधे-सादे लोगों को भी जो कि अक्सर बहुत रूढ़िवादी होते हैं। अगर ऐसे दर्शकों को अचानक विवादग्रस्त कहानी देखने की इच्छा होती है और देखने के बाद यह कहानी उनको पसंद है तो इसका मतलब यह है कि वे दर्शक कुछ न कुछ परिवर्तनों के लिए तैयार हैं। हो सकता है कि Osten की फ़िल्म उसी समय में लोगों को इसलिए पसंद थी क्योंकि वे गाँधी जी के दबाव में थे लेकिन यह भी सच है कि फ़िल्म का निषेध बिल्कुल हटा नहीं हुआ। प्रताप और कस्तुरी के बीच में प्रेम है और लड़का अपनी प्रेमिका को अक्सर छूता है। प्रताप के पिता अपनी दुकान की सब चीज़ें कस्तुरी को बेचते हैं। बहुत आश्चर्यचकित बात यह है कि एक क्षण में प्रताप कस्तुरी के साथ गाँव से भागना चाहता है और लड़की के इनकार के बाद भगवान को पूछता है कि उसने उसको भी अछूत क्यों नहीं बनाया! ऐसा उत्कर्षण एकदम नयी बात है जो अक्सर नहीं मिलती है। यह भी बुद्धिमानी वाली बात है जिसकी सहयता से हर दर्शक देख सकता है कि सिर्फ़ अछूत होने से कोई दोष नहीं है, समस्या तब उत्पन्न हो जाती है जहाँ दो जातियों के लोग एक दुसरे से प्रेम करते हैं। शादी के लिए समाज की अनुमति का अभाव फ़िल्म की सिर्फ़ एक कठिनाई है, लेकिन सबसे बहुत महत्त्वपूर्ण कठिनाई तो वह है जो सब को याद दिलाती है कि कई ऐसे निषेध होते हैं जिनको तोड़ना असंभव है। हम देख सकते हैं कि 1936 में भारतीय समाज थोड़े परिवर्तनों के लिए तैयार था लेकिन ज़्यादा नहीं। फ़िल्म में महत्त्वपूर्ण बात यह भी है कि नियमों तोड़ने की सज़ा लड़की को मिलती है। शायद यह उस विचार से संबंधित है कि एक जाति से दुसरी जाति के बीच किसी भी तरह के अतिक्रमण की सज़ा उसको मिलती है जिसकी जाति नीची है।

फिल्म की प्रस्तुतीकरण और पारंपरिक-शैली की परवाह किए बिना ‘अछूत कन्या’ बहुत बहादुर फ़िल्म है। इस बहादुरी का सबुत सबसे पहले यह है कि दुसरी ऐसी फ़िल्म के लिए हमें बहुत इंज़ार करनी पड़ी। 1959 में बिमल राय ने ‘सुजाता’ की फ़िल्म बनाई जो फ़िर से अछूत लड़की और ब्राम्हण लड़के के प्रेम की कहानी है।

उपेन्द्रनाथ चौधरी और उसकी पत्नी चारू की एक छोटी बेटी है जिसका नाम रमा है। जब लड़की की उम्र एक साल की है तो चौधरियों के घर में एक दुसरी लड़की आती है। वह लड़की अनाथ है जिसके माता-पिता आसपास के गाँव में रहते थे। समस्या यह है कि वह लड़की अछूत है इसलिए श्रीमती चौधरी छोटी लड़की की देखभाल के लिए अपनी नौकरानी को हुक्म देती है। श्रीमती चौधरी का डर स्पष्ट है लेकिन इसी समय में आश्चर्य की बात यह है कि उसको अपनी बेटी के अपवित्र हो जाने से डर नहीं है। जबकि अछूत लड़की को वही आया को देती है जो छोटी रामा की देखभाल करती है। आया को भी इस स्थिति में कोई समस्या नहीं है और वह नयी बच्ची की देखभाल करती है यद्यपि छोटी लड़की उसकी जाति से भी नीचे की है, लेकिन ऐसा शायद इसलिए है कि आया को वही करना चाहिए जो मालिक कहते हैं और उसको किसी भी तरह की शिकायत करने का भी अधिकार नहीं है। उपेन्द्रनाथ जल्द ही अपनी पत्नी के व्यवहार से विपरीत अछूत लड़की को स्वीकार करता है और उसका नाम सुजाता रख देता है। चारू को समाज से निकलने का बहुत डर है इसलिए उसको सुजाता से अपने पति के किसी भी तरह के संपर्क बहुत बुरे लगते हैं।

सुजाता को स्वीकार करने में सब से बड़ी बाधा बुढ़ी बुआ – गिरिबाला है। वह बहुत धर्मिक औरत है इसलिए एक पण्डित के साथ चोधरियों के यहाँ आती है। पण्डित के लिए अछूत लड़की से मिलना बड़ा अपमान है। वह समझ नहीं सकता है कि ऐसी बच्ची ऊँची जाति के लोगों को साथ कैसे रह सकती है और वह चौधरियों के घर को छोड़ने का निश्चाय करता है। उसके जाने से पहले जब उपेन्द्रनाथ उसको पूछता है कि उसके विचार में सुजाता और घर के दुसरे लोगों में सचमुच कोई बड़ा अंतर है, पण्डित कहता है कि अछूतों के शरीर से जहरीली हवा निकलती है जो आसपास के लोगों के लिए बहुत खतरनाक है। उपेन्द्रनाथ को यह बहुत मज़ेदार लगता है लेकिन पण्डित कहता है कि विटामिन को भी कोई देख नहीं सकता है पर इसका मतलब नहीं है कि ऐसी कोई चीज़ नहीं होती है।

पण्डित की सोच एक दुसरे पण्डित के विचारों से मिलती-जूलती है। बटुप्रसाद शर्मा शास्त्री बनारस के एक मंदिर में गुरू है और 2007 में बनी स्टालिन कुरूप के एक वृत्तचित्र ‘India Untouched: Stories of a People Apart’ का एक चरित्र। इस पण्डित के मन में भी बहुत सारे अजीब उदहारण होते हैं जिनके अनुसार अछूतों को अपने भाग्ये को स्वीकार करना चाहिए और जीवन को बदलने के बारे में सोचना मना है। पण्डित के अनुसार जिस मनुष्य को हवाई जहाज़ को चलाना नहीं आता है वह उसे नहीं चलाएगा। वैसे ही अछूतों को सिर्फ़ यह करना चाहिए जो परंपरा के अनुसार उनको हमेशा करना था। स्टालिन कुरूप की फ़िल्म में एक और ब्रहमाण है। वह कहता है कि हर व्यक्ति अपने काम करने के लिए पैदा होता है और वह सिर्फ़ वही काम कर सकता है जो उनके पूर्वज शताब्दियों से करते आये हैं। वह ब्राम्हण है, उसको चिंतन करना अच्छी तरह आता है और यह उसके लिए आसान है जब कि दुसरों के लिए असंभव। वैसे ही सफ़ाई करनेवाला या नाई को भी ऐसे ही कौशल आते हैं जिसके बारे में ब्राम्हणों को बिल्कुल ज्ञान नहीं है। कभी कभी पश्चिम के लोगों को यह असंभव लगता है कि 21 शताब्दी में भी लोगों के अंदर इतने पूर्वाग्रह होते हैं! लेकिन, ये दो उदहारण अच्छी तरह दिखाते हैं कि बिमल राय की ‘सुजाता’ का पण्डित कोई अतिरंजित व्यक्ति नहीं है बल्कि भारत में सचमुच में ऐसे लोग हैं जो आज भी इन बेतुकी बातों पर विश्वास करते हैं.

सुजाता चौधरियों के घर में रहकर बड़ी हो जाती है लेकिन यहाँ एक और विरोधाभास दिखाई देता है। चारू लड़की को कभी नहीं छूती और अपने पति को हमेशा घुड़की देती है जब उपेन्द्रनाथ अछूत लड़की के पास जाता है। अजीब बात यह है कि इसी समय में वह अपनी बेटी रामा को सुजाता के साथ खेलने की अनुमति देती है। सुजाता की स्थिति एक उपेक्षिता सी है – वह स्कूल नहीं जाती है, घर पर मता-पिता की देखभाल करती है और उद्यान में फूलों की। सुजाता की इस हालत के बावजूद उसकी सौतेली बहन उसके प्रति कभी बुरा व्यवहार नहीं करती है, फ़िर भी दिलचस्प बात यह है कि रमा को अपनी सौतेली बहन कि स्थिति कभी भी अजीब नहीं लगती है। रमा को मालूम नहीं है कि सुजाता उसकी सौतेली बहन है फ़िर भी वह माता-पिता से कभी नहीं पूछती है कि सिर्फ़ मैं ही स्कूल क्यों जाती हूँ और केवल मेरा ही जन्मदिन क्यों मनाया जाता है! घर के लोग चाहते हैं कि रमा की शादी अधीर से होती। अधीर एक जवान लड़का है जो गिरिबाला के साथ रहता है। जब वह पहली बार चौधरियों के घर आता है तो उसको सुजाता के उपर प्रेम आता है। उसका प्यार बहुत गहरा है और वह तब भी नहीं बदलता है जब उसको पता चलता है कि सुजाता अछूत जाति की लड़की है। अधीर अपने घर को छोड़ने के लिए तैयार है क्योंकि वह सिर्फ़ सुजाता से शादी करना चाहता है। चारू सोचती है कि उसकी सौतेली बेटी ने जानबूझकर अधीर को लुभाया क्योंकि उसको रमा के प्रति ईर्ष्या थी और वह अपनी बहन से प्रतिशोध लेना चाहती थी। सुजाता पर चिल्लाने के समय चारू अचानक सिढ़ियों से गिरती है और उसकी हालत बहुत गंभीर है। चारू के इलाज के लिए रक्त-आधान की ज़रूरत है। दुर्भाग्य से पति, रमा और अधीर का ब्लड-ग्रूप चारू से नहीं मिलता है पर सुजाता का वही है जिसकी जरुरत है। इस तरह सुजाता अपनी सौतेली माँ की जिन्दगी बचा सकती है।

यह दृश्य जहाँ रक्त-आधान चल रहा है बहुत दिलचस्प है क्योंकि हम यहाँ स्पष्ट रूप से देख सकते हैं कि सुजाता के खून के बारे में सुनकर उपेन्द्रनाथ बहुत अश्चार्यचकित हो जाता है। वह आदमी हमेशा सुजाता की रक्षा करता था और पण्डित के पागल विचारों पर हंसता था लेकिन कहीं अंदर में शायद वह भी सचमुच सोचता था कि अलग अलग जातियों के लोगों में ऐसे अंतर होते हैं।

बिमल राय की फ़िल्म अछूतों की पहली फ़िल्म बहुत सालों के बाद बनाई गई लेकिन इसमें भी गाँधी जी के विचारों से स्पष्ट संबंध है। सुजाता अक्सर नदी के किनारे जाती है और वह समय बिताने के लिए उसकी सब से अच्छी जगह है। जब उसको पता चलता है कि वह अछूत जाति की एक लड़की है जिसको चारू और उपेन्द्रनाथ ने गोद में लिया है, वह निराश होकर नदी के पास आती है और तेज़ बारिश में भींग जाती है। वह आत्महत्या करने का निश्चय करती है लेकिन जब पानी की तरफ़ आती है तब उसकी साड़ी का आँचल पास ही खड़ी गाँधी जी की मूर्ती से फँस जाता है। सुजाता मूर्ती की ओर देखती है और बारिश की बूंदें जो गाँधी जी के चेहरे पर बहती हुई आँसू जैसी दिखाई देती हैं।

गाँधी जी एक मात्र सुधारक नहीं है जिनका फ़िल्म में ज़िक्र है। रमा के कॉलेज में एक नाटक दिखाया जाता है जिसे देखने के लिए वह सारे परिवार को बुलाती है। समस्या यह है कि गिरिबाला नहीं चाहती है कि सुजाता भी जाए और वह बेचारी घर पर रहती है। जो नाटक दिखाया जाता है वह रबीन्द्रनाथ ठाकूर का ‘चंदलीका’ है। नाटक देखती हुई गिरिबाला को यह बहुत उचित लगता है कि स्कूल के स्टेज पर खड़े बुद्ध अछूत लड़की के हाथों से पानी लेते हैं और सभी जातियों की बराबरी के बारे में व्याख्यान देते हैं। गिरिबाला यह नहीं देखती है कि नाटक की अछूत लड़की और सुजाता में कोई अंतर नहीं है। यह व्यंग्य ऐसे लोगों के प्रति किया गया जिनके लिए सुधार सिर्फ़ एक प्रचार वाक्य हैं। फ़िर भी फ़िल्म की अंत में गिरिबाला भी यह साबित करती है कि प्यारे अधीर के लिए वह अपने विचारों को छोड़ सकती है। जब अधीर घर को छोड़ना चाहता है तब गिरिबाला सुजाता को स्वीकार करती है और कहती है कि शायद वह सचमुच पुरानी पीढ़ी की मानसिकता की वाहक है, उसे अब युवा विचारों को जगह देनी चाहिए।

अफ़सोस की बात यह है कि वास्तविकता हमको अच्छी तरह दिखाई देती है कि युवा आदर्शवादियों के सब सुधार असफल हुए और बॉलीवुड ने फ़िर से कभी ऐसी कहानी नहीं दिखाई। ‘सुजाता’ ‘अछूत कन्या’ की ही तरह बहुत सुगम फ़िल्म थी इसके बावजूद कि बिमल राय Franz Osten से आगे चला गया और उसने अछूत लड़की का ब्राहमण लड़के से शादी को संभव बनाया। व्यावसायीक सफलता के बावजूद सिनेमा के निर्देशकों को इस विषय से बड़ा डर है। ‘सुजाता’ के समय से भारत में बहुत मजबूत फ़िल्में बनी हैं और बहुत से निषेध टूटे भी हैं। फिर भी, अंतर्जातीय और विधवा विवाह आज भी मामूली दर्शकों को अनुचित लगते हैं।

सिनेमा की मुख्यधारा से अलग रहने वाले निर्देशकों का तरीका कुछ अलग ही होता है इसलिए वे आक्सर व्यावसायीक फ़िल्मों के निर्देशकों से ज़्यादा आज़ाद होते हैं। उनके लिए दर्शकों का ख्याल इतने महत्त्वपूर्ण नहीं हैं लेकिन इसके बावजूद भी हिंदी सिनेमा में, कला फिल्मों, सामानांतर फिल्मों और स्वतंत्र फिल्मों में भी, दलित-समस्याओं के चित्रण का अभाव है। यह बात अजीब लगती है क्योंकि आज़ाद निर्देशकों के लिए औरतों की स्वतन्त्रता, धर्मों के क्षेत्र में लड़ाई या घूसखोरी दिखाने में कोई समस्या नहीं है। जाति के निषेध को तोड़ने की हिम्मत उपर्युक्त सारे क्षेत्रों से ज्यादा चुनौती-पूर्ण है.

बहु-चर्चित निर्देशक श्याम बेनेगल ने, जिन्हें कई-एक राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुके हैं, अपनी पहली फ़िल्म 1974 में बनाई। इस फ़िल्म का नाम ‘अंकुर’ है और यह भी अछूत औरत और ब्राहमण आदमी के रिश्ते की कहानी है। फ़िल्म के नायक सुर्या की शादी बचपन में हो गई है और अब उसे अपनी पत्नी का इंतज़ार करना है। वह अपने पिता जी की जमींदारी के अंतर्गत आने वाले एक छोटे गाँव में जाता है और देखता है कि उसके घर के पास एक सुंदर औरत रहती है। औरत का नाम लक्ष्मी है और वह अछूत है। उसका जीवन बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है क्योंकि उसका पति शराबी है। लक्ष्मी बच्चा चाहती है लेकिन किसी कारण से यह उसके लिए असंभव है। सुर्या चाहता है कि लक्ष्मी उसके लिए काम करे और उसको अपने लिए खाना पकाने की अनुमति देता है जो न सिर्फ़ गाँव वालों के लिए बल्कि लक्ष्मी के लिए भी आश्चर्यजनक है। एक दिन लक्ष्मी का पति कहीं जाता है और लक्ष्मी और सुर्या एक दुसरे के करीब आते हैं। आशिक़ों का संतोष अचानक नष्ट हो जाता है जब सुर्या की पत्नी गाँव में आती है। इसी समय को लक्ष्मी को पता चलता है कि वह माँ बननेवाली है। सुर्या की पत्नी को अच्छी तरह मालूम है कि उसके पति और लक्ष्मी के बीच में क्या है और वह दुसरी औरत को निकलाने की कोशिश करती है। जब सुर्या को बच्चे के बारे में पता चलता है तो वह लक्ष्मी को घर से निकलाता है। इसी समय लक्ष्मी का पति शराब छोड़कर वापस आता है। लक्ष्मी को डर है कि पति बच्चे के बारे में क्या सोचेगा लेकिन बह खुश होकर सुर्या के घर जाता है, यह सोचकर कि शायद उसको काम मिलेगा। ब्राहमण सोचता है कि अछूत आदमी उसको मारने के लिए आ रहा है और मार-पीट शुरू कर देता है। गाँव के दुसरे लोग भी इस मार-पीट में सूर्या को मदद देते हैं। जब लक्ष्मी को पता चलता है तो वह आती है और अपने पति की रक्षा करती है।

यह एक सरल कहानी है जिसमें निरंतर नैतिक शिक्षा नहीं है परन्तु फिल्म-निर्माण के लिहाज से कहानी का बहुत अच्छा चित्रांकन है। फ़िल्म में हम यह देख सकते हैं जो अक्सर पश्चिमी लोगों के लिए समझने में सब से मुश्किल है – क्या भारतीय समाज में अछूतों के प्रति सचमुच इतनी घृणा है जहाँ सेक्स करने और मारने के समय यह अस्पृश्यता खत्म हो जाती है। इस कहानी में सुधार के उपदेश या प्रचार के लिए शायद स्थान नहीं है लेकिन भारतीय समाज के जातिवादी जकड़न और ढोंग पर एक करारे व्यंग्य के कारण, जो कि भारतीय सिनेमा में अक्सर नहीं होता है, इसको याद रखना चाहिए। यह फ़िल्म मामूली दर्शकों के लिए नहीं है लेकिन सिनेमा का एक बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा तो ज़रूर है।

1981 में बनी सत्यजित रायकी ‘सद्गति’ ‘शतरंज के खिलाड़ी के बाद उनकी दुसरी हिंदी फ़िल्म है। दोनों फ़िल्में प्रेमचंद की कहानी पर आधारित हैं। प्रेमचंद की कहानी ‘सद्गति’ ‘चमार’ जाति से आने वाले दुखी नाम के एक व्यक्ति के बारे में है जो अपने बेटी की शादी करवाना चाहता है और इसके लिए ब्राहमण का आशीर्वाद चाहिए ताकि वह घर आकर शुभमुहूर्त निकाल सके। वह अछूत है इसलिए उसको ब्राहमण का बहुत लंबा इंतज़ार करना है। बेचारे आदमी के पास पैसा नहीं है इसलिए ब्राहमण उसको लकड़ी काटने का हुक्म देता है। आदमी भूख के कारण कमज़ोर है इसलिए अच्छी तरह काम नहीं कर सकता है। जब आखिर में ब्राहमण जाने के लिए तैयार है वह देखता है कि दुखी मर गया है। गाँव में रहने वाले अछूत मरे हुए आदमी को लेना नहीं चाहते हैं और ब्राहमण चुपचाप दुखी की लाश को दूर ले जाता है और वापस आने के बाद नहा लेता है और इसी समय जानवर खेत में लेटे हुए लाश को खाते हैं।

फ़िल्म प्रेमचंद की कहानी के बहुत नज़दीक है। अछूत आदमी को अलगअलग हुक्म दिये जाते हैं, इसके बावजूद की उसने भैंसों के लिए घास लाया है। वह सब कुछ करता है बार-बार गाँव के केंद्र में खड़ी हुई रावण की बड़ी मूर्ती के पास जाकर, लेकिन लकड़ी को काटना उसके मौत का कारण बना।

बेचारा दुखी मर जाता है। बाकी अछूतों को इस घटना के बारे में पता चलता है। इसलिए जब ब्राहमण उनके यहाँ आता है और उनको लाश ले जाने की हुक्म देता है तो वे लोग उसको ध्यान नहीं देते हैं। दुखी के समुदाय के लोगों ने लाश नहीं उठाने का फैसला कर एक तरह से ब्राह्मण द्वारा हुए अत्याचार का विरोध करते हैं। यहाँ एक ध्यान देने वाली बात यह है कि दुखी जिस लकड़ी को काट रहा था, वह ऐसी-वैसी लकड़ीनहीं थी। वह ब्राह्मणवाद और जातिवाद का कठोर गट्ठर था और कितने दुखी को उसके लिए मरना पड़ा है।

राय की फ़िल्म और प्रेमचंद की कहानी में असाधारण अनुकूलता है जो थोड़ी सी अश्चार्यजनक है क्योंकि यह लेखक भारत में बहुत लोकप्रिय है। प्रेमचंद की कहानियों के आधार पर फ़िल्म बनाना आसान बात नहीं है क्योंकि वह आमतौर पर समाजिक-दोषों के बारे में लिखता था, लेकिन समाधान नहीं बताता था और ऐसी कहानियां व्यापारिक फ़िल्मों के लिए ज़्यादा अच्छा विषय नहीं है क्योंकि उन फ़िल्मों को स्पष्ट समाधान चाहिए। नायक द्वारा खलनायक का वध जैसी कहानियां।

1991 में बनाई हुई ‘दीक्षा’ एक और बॉलीवुड के बाहर की हिंदी फ़िल्म है जहाँ दलितों का ज़िक्र है। फ़िल्म का आलेख कर्नाटक के लेखक यू. आर. अनंतमूर्ति की कहानी पर आधारित है। 1992 में इस फ़िल्म को हिंदी की सब से अच्छी फ़िल्म के लिए पुरस्कार भी मिला लेकिन फिल्म व्यावसायीक रूप से सफल नहीं हुई। फ़िल्म का नायक एक छोटा ब्राम्हण लड़का है जिसका नाम नानी है। वह गाँव में रहने वाले एक ब्राम्हण का एक बेटा है। नानी के पाँच भाई मर गए हैं इसलिए उसका पिता निश्चय करता है कि उसको पढ़ाई के लिए पण्डित उडूप के यहाँ भेज देगा ताकि भगवान उसको जीवित रखे। पण्डित के दो वरिष्ठ शिष्य हैं जो अक्सर नानी को बहुत कष्ट पहुंचाते हैं, पर पण्डित की एक जवान बेटी यमुना भी है जो विधवा बन गई और वह नानी को अपने बेटे के समान समझती है।

जब पण्डित गाँव से कुछ दिनों के लिए कहीं जाता है तो यमुना और गाँव के अध्यापक के बीच में प्रेम उत्पन्न होता है और विधवा गर्भवती हो जाती है। पण्डित के वरिष्ठ शिष्यों के कारण गाँव के सारे लोगों को पता चलता है कि यमुना माँ बननेवाली है। यमुना पाप से बचने के लिए गर्भपात करवा लेती है। इसके बाद उसका पाप और बड़ा हो जाता है। पण्डित अपने शिष्यों को घर भेज देता है और अपनी जीवित बेटी का अंतिम संस्कार करता है।

यह फ़िल्म विधवाओं की स्थिति के बारे में है लेकिन इसमें अछूतों की स्थिति को भी दर्शाया गया है। पण्डित का नौकर कोगा अछूत है। वह हमेशा ब्राहमण लड़कों की तरह पढ़ना चाहता था। गाँव में रहनेवाले दुसरे अछूत आदमियों के लिए कोगा का व्यवहार उनकी जाति का अपमान है। वे लोग सोचते हैं कि कोगा ब्राहमण बनना चाहता है और यह उनके लिए सब से बड़ा पाप है क्योंकि हर जाति को अपना कर्तव्य करना चाहिए। इसी तरह कोगा दोहरा परित्यक्त बन जाता है, न घर का न घाट का। एक बार अपनी जाति के कारण और दुसरी बार अपने व्यवहार-विचार के कारण जो उसकी जाति के लोगों के विचारों के अनुकूल नहीं है। जब कोगा की बुआ जो उसकी एक ही रिश्तेदार थी मर जाती है अछूत आदमी पण्डित से उसके लिए अंतिम संस्कार की भीख मांगते हैं। शुरू में पण्डित के लिए यह खयाल घृणित लगता है लेकिन बाद में जो कोगा चाहता है वह करता है।

अरुण कौल की इस फ़िल्म में, जैसे पहले बिमल राय की फ़िल्म में, एक बुढ़ी औरत है जो दुसरों को पापी मानती है जबकि अपने व्यवहार में सब से दुराचारी लगती है। जब वह पण्डित को अछूत औरत के लिए अंतिम संस्कार करते हुए देखती है तो इसके बारे में दुसरे ब्राहमणों को बताती है जिसके कारण गाँववाले पण्डित उडूप पैर ध्यान रखना शुरू कर देते हैं। अच्छी बात यह है कि गाँववाले छोटे नानी को नहीं देखते हैं क्योंकि यह लड़का एक मात्र ऐसा व्यक्ति है जिसके लिए कोगा वैसा ही मनुष्य है जैसे गाँव के सब बाकी लोग। नानी के कोगा के प्रति के व्यवहार का आधार बच्चे की ‘दुनियावी अज्ञानता’ है जो अच्छी तरह दिखाता है कि लोगों में अंतर स्वभाविक नहीं होते हैं, बस संस्कृति से संबंधित। नानी कोगा की बुआ के लिए प्रर्थना करता है और नहीं समझता है कि क्यों पण्डित का व्यवहार दुसरों को इतना बुरा लगा! इस छोटे लड़के की संवेदना का एक और बहुत अच्छा उदाहरण है इस दृश्ये में है जब नानी कोगा को लड्डू देता है। अपने काम के लिए कोगा को खाना मिलता है। यमुना उसको चावल देती है ताकि वह भूख से नहीं मरे और काम कर सके लेकिन नौकर को मिठाई देना कुछ और ही इंगित करता है और अच्छी तरह दिखाता है कि छोटा लड़का बड़ों से अच्छी तरह आत्मा की अवश्यकता समझता है। नानी का व्यावहार इसका भी सबूत है कि सब पूर्वाग्रह अंतर्जात नहीं होते हैं पर संस्कृतिक विकास से संबंधित हैं।

छोटे लड़के का खुद से गहरा आकर्षण कोगा के लिए थोड़ा दहशतपूर्ण है। वह वही व्यक्ति है जिसके लिए नियमों के अनुसार व्यवहार करना जरुरी है इसलिए छोटे बच्चों को अधिकारों तोड़ने की अनुमति नहीं देता है। एक दृश्ये में नानी कोगा को तंग करता है और सारा समय उसको छूने की कोशिश करता है। बेचारे कोगा को ऊँचे ताड़ का पेड़ पर चढ़ना चाहिए। कोगा और गाँव के दुसरे अछूतों का व्यवहार यह अच्छी तरह दिखाई देता है कि अछूत लोग खुद से सोचते हैं कि पारंपरिक सोच-विचार से लड़ाई करना उचित बात नहीं है। जिसका कोगा की बुआ की मौत के बाद के दृश्य में ज़िक्र किया गया है, इस में भी कोगा पण्डित से अंतिम संस्कार मांगता है सिर्फ़ इसलिए कि इससे बुआ की आत्मा को शांति मिलेगी। कोगा सोचता है कि उसको यह करना चाहिए क्योंकि वह उसे पुरे जीवन मायूसी देता रहा। इस मायूसी का आधार यह था कि वह अपनी जाति के कर्तव्य नहीं करता था और अलग चीज़ों में दिलचस्पी रखता था। इन सब के कारण वह शायद अच्छा और संवेदनशील आदमी बन गया, लेकिन गाँव में रहनेवाले लोगों के विचार में अच्छा अछूत तो नहीं ही था और इस कारण एक हास्यस्पद व्यक्ति बन गया था।

जैसे पहले ही ज़िक्र किया गया उपर्युक्त तीनों फिल्में पुरस्कारों के बावजूद लोकप्रिय नहीं हुई। लेकिन शायद इन फ़िल्मों के कारण मुख्यधारा विषयक के निर्देशक कुछ सालों के बाद यह सोचने लगे कि इस समस्या को अपने दर्शकों को धीरे-धीरे दिखाना चाहिए। बॉलीवुड फ़िल्मों में उपदेश और नए सवालों को पूछना दो चीजें हैं । कभी पुरी फ़िल्मी कहानी किसी समस्या के बारे में होती है और इस प्रश्न को हल करने के बाद यह दिखाई देती है कि असहिष्णुता से किसनी खत्रा आती है। इसी तरह की फ़िल्म का एक अच्छा उदाहरण अनील शर्मा की ग़दर: एक प्रेम कथा है। यह फ़िल्म भारत-विभाजन के समय एक सिख लड़के और मुसलमान लड़की के प्रेम के बारे में है। लड़की के पिता को इस रिश्ते से तब तक विरोध है जब तक उसकी बेटी की दुर्घटना नहीं होती है। इस के बाद वह सोचने लगता है कि उसके कारण प्यारी बेटी की मौत हो सकती थी और यह सोचने लगता है कि धर्म इतना महत्त्वपूर्ण नहीं है। हम देख सकते हैं कि मुख्य समस्या धर्मों के अंतर का है लेकिन फ़िल्म के अंत में दर्शकों को कहा जाता है कि ऐसे अंतर समाज के लिए ठीक नहीं है।

दूसरी तरह की फ़िल्मों में भी यही होता है जिस में तकरारी बातें बिल्कुल प्राकृतिक होती हैं। ऐसी फ़िल्म का अच्छा उदाहरण मनमोहन देसाई की ‘अमर, अकबर, एंथोनी’ है। इस फ़िल्म की कहानी बॉलीवुड में लोकप्रिय खोया-पाया के सूत्र पर आधारित है। यह बचपन में खोये हुए तीन भाइयों की कहानी है जिन से एक हिंदू परिवार में बड़ा होता है, दुसरा मुसलमान परिवार में और तीसरे को इसाई धर्माचार्य गोद में लेता है। इस फ़िल्म में धर्मों के अंतर के बारे में कोई कुछ नहीं कहता है और सच के प्रकाशन के बाद किसी को अजीब नहीं लगता है कि हर आदमी का अलग धर्म है और अलग धर्म की पत्नी।

कौन सी योजना सही है यह कहना आसान नहीं है इसलिए वे इन दोनों फ़िल्मों में नहीं आती है। लेकिन लगता है कि निषेध को स्वभाविक बनाना तब तक मुमकिन होता है जब तक दर्शक इसके लिए तैयार है इसलिए दलितों के बारे में ऐसी फ़िल्में नहीं होती हैं और उनकी फिल्में तब तक सामने नहीं आएँगी जब तक लोग विशवास नहीं कर लेते कि दलित सचमुच दुसरे लोगों से बराबर हैं।

आशुतोष गोवारिकर की ‘लगान’ की कहानी अवास्तविक दुनिया में चली जाती है लेकिन ऐसी दुनिया बनाकर भी अछूतों को दुसरी जातियों से बराबर होने की अनुमति नहीं दी गई। फ़िल्म एक छोटे गाँव के लोगों के बारे में है जो अंग्रेज़ों से लड़ाई करते हैं। फ़िल्म का नायक – भुवन लगान हटाने के लिए अंग्रेज़ों से क्रिकेट खेल में जीतने की तैयारी करता है। उसका समूह भारतीय समाज का दर्पण है। इसमें अधिकांश हिंदू है लेकिन इसमें भी मुसलमान और सिख हैं। यह और बात है कि इस छोटे गाँव में मुसलमान भी रहते हैं और एक सिख कहीं दूर से अचानक आता है और इसमें कोई आश्चर्य नहीं है क्योंकि फ़िल्म की दुनिया वास्तविक नहीं है। हमको इसके बारे में भी याद करना चाहिए कि सिख और मुसलमान दोनों बहुत अच्छे खिलाड़ी हैं जिनको निकालना बहुत मुश्किल है। उन के द्वारा किए गए दोष उनके कौशल की कमी से नहीं आते हैं बल्कि विरोधियों के छल खेल या अभागी परिस्थितों के परिणाम हैं।

खेल शुरू होने से पहले एक और खिलाड़ी की ज़रूरत है। आसपास के गाँवों में रहनेवाले तैयारी को देखने को लिए आते हैं और उनमें एक अछूत आदमी भी है जिसका नाम कचरा है। एक क्षण में गेंद उसकी तरफ आता है और भुवन कचरा को इसे फेंकने को कहता है। जब कचरा गेंद को फेंकता है तो सब लोग देख सकते हैं कि वह अच्छी तरह गेंद को घुमा सकता है। भुवन कचरा को तुरंत अपने समूह में लेना चाहता है लेकिन जब वह इसके बारे में बताता है तब समूह के बाकी लोग खेलने से इंकार करते हैं। पहले वे भुवन के सब अजीब उद्देश्यों को स्वीकार करते थे लेकिन अछूत के साथ खेलना उनके लिए बहुत बड़ी बात है। भुवन कचरा को छूता है और सब को बताता है कि भारत को इसीलिए इतनी आसानी से उपनिवेश बनाया गया है क्योंकि उनके लोग एक दुसरे को साथ दे नहीं सकते हैं। अंत में कचरा अंतिम खिलाड़ी बन जाता है और खेल में आखिरी दाँव उसे ही खेलना है। उसकी दुगनी ज़िम्मेदारी है – अगर हार जाएगा तो उसका नया स्तर चला जाएगा और वह दुसरों से पहले से ज़्यादा तिरस्कृत होगा। जो गाँववाले हर दुसरे व्यक्ति को माफ़ करते हैं लेकिन कचरा को उसकी जाति के कारण सज़ा मिल सकती है! शायद यह तनाव कचरा के लिए मुश्किल है इसलिए वह असफल हो जाता है। सैभाग्य से भारत को एक और मौका दिया जाता है और इस बार भुवन को आखिरी दाँव खेलना है। भुवन को सफल होने का नसीब मिलना बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। फ़िल्म को बनाने वालों ने अपनी कहानी के बारे में बहुत सोचा और उन्होंने बहुत अच्छी तरह से अछूतों के प्रति आदर दिखाया। भुवन और कचरा दोनों भाग्यशाली थे और इसलिए भारत जीत गया। अगर नायक के कौशल कचरा से बड़े होते तो दर्शक यह सोच सकते थे कि अछूतों को सचमुच विशवास नहीं करना चाहिए क्योंकि मुख्य क्षण में वे निराशाजनक होते हैं!

अंग्रेज़ों से लड़ाई के बारे में बनी फिल्म ‘लगान’ का भुवन आमीर खान बाद में इसी विषय पर बनी एक दुसरी फ़िल्म में भी आ गया। केतन मेहता की ‘मंगल पाण्डे: द राइजिंग’ में अंग्रेज़ लोग सब से पहले जातिवादी हैं। जब एक अंग्रेज़ी दावत के समय भारतीय नौकर से एक गोरी औरत पर शराब छलक जाता है तो उसको बहुत बड़ी सज़ा मिलती है। नौकर को पीटता हुआ अंग्रेज चिल्लाता है कि उसकी गोरी औरत को छूना मना है और उसे कुत्ते कह कर संबोधित करता है। फ़िल्म का नायक मंगल पांडे मार खा रहे नौकर की रक्षा करता है लेकिन बाद की दृश्य में वह भी दुसरों के प्रति तिरस्कार दिखाता है। वह ब्राहमण है जिसको हर सुबह नदी में नहाना है। एक दिन वापस जाने के समय वह सड़क पर सफ़ाई करनेवाले अछूत से टकराता है। मंगल का व्यवहार वैसा ही है जैसा पहले नौकर के प्रति अंग्रेज़ का था और वह भी अछूत को कुत्ते की उपाधि देता है।

हम कह सकते हैं कि फ़िल्म में दिखाए गए अंग्रेज़ लोग गोरी चमड़ी के कारण अक्सर खुद को ज़्यादा अच्छा समझते हैं लेकिन फ़िर भी उनके लिए भारतीय लोगों से सम्पर्क उतना घृणित नहीं है। अंग्रेज़ों के बड़े घरों में सारे भारतीय नौकर काम करते हैं और उनसे खाने या पीने की वस्तु लेने में कभी कोई समस्या नहीं थी।

फ़िल्म सिपाही विद्रोह के बारे में है और इसका मुख्य विषय कारतूस की समस्या है। अंग्रेज़ लोग बड़ी आसानी से भूल जाते थे कि भारतीय सिपाहियों के लिए धर्म कितना महत्त्वपूर्ण है और उनके नियमों की इज्जत नहीं करते थे। 1806 में सिपाही नयी वर्दियों का विरोध करते थे जिनके कारण वे अपनी जाति से निकाल जा सकते थे, 1825 में समुद्र पार करना जो कि समाजिक नियमों के विरुद्ध था और अफगानिस्तान के युद्ध के समय बड़ी समस्या यह थी कि हिंदू सिपाहियों के लिए रोज़ का स्नान असंभव था और उनको मुसलमानों से खाना खरीदना था। कारतूस की समस्या सच में धर्म और संस्कृति के अपराध का सिर्फ़ एक और उदाहरण था।[9]

मंगल का अंग्रेज़ी दोस्त उसको भरोसा दिलाता है कि कारतूस के बारे में जो अफ़वाह होते हैं वे सच नहीं हैं लेकिन जब सब को पता चलता है कि मंगल का अपवित्रीकरण हुआ है तो वह तुरंत अपनी जाति से निकाल जाता है। लगता है कि अंग्रेज़ अच्छी तरह नहीं समझते हैं कि यह बात कितनी महत्त्वपूर्ण है और उनकी अज्ञानता के कारण मनुष्य को समाज के बाहर जीना पड़ता है जो मौत से भी बदतर है। मंगल यह सब कुछ न सिर्फ़ अपने अंग्रेज़ दोस्तों को स्पष्ट करता है बल्कि विदेशी दर्शकों को भी जो कभी इसके बारे में कुछ नहीं जानते हैं या विशवास नहीं करते हैं कि क्या यह सब कुछ सचमुच इतना महत्त्वपूर्ण है!

अपने ऊँचे स्तर को खोने के बाद मंगल हीरा से रिश्ता बनाता है। यह भी स्पष्ट है कि अगर वह शुद्ध ब्राहमण होता तो प्यार के बावजूद वेश्या से करीबी रिश्ता कभी नहीं बनाता। और, यहाँ भी भारत और अंग्रेज़ का अंतर है। विदेशी सिपाहियों के लिए हर वेश्या लालच थामने के लिए होती है, भारतीय या कोई दुसरी वेश्याओं में उनके लिए कोई अंतर नहीं है। केतन मेहता की फ़िल्म अछूतों के प्रति के बुरे व्यवहार का विरोध नहीं करता है और सिर्फ़ यह दिखाता है कि जातियों से अंतर कितने महत्त्वपूर्ण हैं।

इसी साल में बनी हुई आशुतोष गोवारिकर की ‘स्वदेश’ में भी हम पश्चिमी दृष्टि से भारत देख सकते हैं लेकिन यह दृष्टि ‘मंगल पाण्डे: द राइजिंग’ से कुछ अलग है। फ़िल्म के नायक का नाम मोहन है और वह भारत को छोड़कर यू एस ए में रहता है जहाँ नासा में काम करता है। एक दिन वह अपने देश में वापस जाने का निश्चय करता है अपनी आया को ढूढ़ने के लिए। आया एक छोटे गाँव में रहती है जहाँ इंटरनेट नहीं है, बिजली अक्सर चली जाती है और सब लोग वैसे ही जीते हैं जैसे पुराने ज़माने में। गाँव आने के बाद मोहन का व्यवहार पश्चिमी पर्यटक जैसा है – वह काफिले में सोता है, सिर्फ़ बोतल का पानी पीता है और यह नहीं समझ सकता है कि सब लोग इस तरह गाँव में कैसे जी सकते हैं।

गाँववालों में से एक अछूत आदमी – मेला राम रोज़-रोज़ मोहन के लिए खाना लाता है क्योंकि उसको आशा है कि विदेशी मेहमान उसको अपने साथ अमरीका ले जाएगा। मोहन का व्यवहार फ़िर से विदेशी पर्यटक के जैसा है और वह बिना किसी नियंत्रण के गाँव वालों का खाना खाता है। हम यह सोच सकते हैं कि शायद उसको पता नहीं है कि मेला राम कौन-सी जाति से है लेकिन बाद में जब गाँव में रहने वाले बुढ़े लोग मोहन की आलोचना करते हैं फिर भी वह मेला राम से दोस्ती नहीं छोड़ता है। फ़िल्म में अक्सर दिखनेवाले दृश्यों में मोहन, मेला राम और डाकखाने में काम करनेवाला निवारण तीनों एक स्कूटर पर बैठकर कहीं जाते हैं। सच में मोहन बीच में बैठता है जिसके मदद से मेला राम और निवारण का स्पर्श हो नहीं सकता है लेकिन यह फ़िल्म इस उपाय का पहला उदाहरण हो सकता है जिस में कोई समस्या नहीं होता है और फ़िल्म की दुनिया का अनुक्रम प्राकृतिक, स्वाभाविक है। फ़िल्म के गाँव में अछूत दुसरे लोगों से कुछ अलग होते हैं लेकिन इतनी नहीं और अगर कोई उनसे दोस्ती करना चाहता है तो कोई उसका विरोध नहीं करेगा। यह छोटा कदम है लेकिन अच्छी तरह दिखाई देता है कि फ़िल्म वाले धीरे धीरे इस समस्या को दिखाने में साहसी हो रहे हैं।

फ़िल्म में एक और दृश्य है जिस पर हमें ध्यान देना चाहिए। गाँव में सिनेमा आता है और सब अछूत पर्दे की दुसरी ओर में बैठकर दर्पण में प्रतिवर्तन जैसा कुछ देख सकते हैं। यह बड़ी असुविधा नहीं है जब तक कि फ़िल्म को देखने के लिए उपशीर्षकों (Subtitles) की ज़रूरत नहीं है लेकिन ऊँचे और नीचों का ऐसा स्पष्ट विभाजन अपमानजनक है। फिल्म के समय बिजली फिर से चली जाती है और पर्दे के सामने बैठे हुए बच्चे रो पड़ते हैं। मोहन सब को तारे दिखाता है और इस समय गाना गाता है। गाने की पराकाष्ठा में पर्दा हटाया जाता है। मोहन अपना टेलीस्कोप लाता है और सब को तारे और चन्द्र को देखने की अनुमति देता है। सब से महत्त्वपूर्ण बात यह है कि मोहन को जातियों को बराबरी के बारे में कोई भाषण देने की ज़रूरत नहीं है जैसे पहले भुवन को था और सब लोग साथ साथ टेलीस्कोप से देखते हैं बिना किसी शिकायत के। ‘स्वदेश’ अछूतों के बारे में नहीं है लेकिन वो यहाँ भी आ गया है और इस तरह दिखाया गया है कि यह फ़िल्म अब तक की सब से बहादुर फ़िल्म है। यह भी महत्त्वपूर्ण है कि किसी ने इसके लिए फ़िल्म की आलोचना नहीं की और इसका मतलब यह है कि फ़िल्म को बनानेवाले ने कहानी में अच्छी तरह अपने विचार डाल दिए हैं जो मुख्यधारा विषयक फिल्मों के लिए बहुत ही आवश्यक हैं।

चर्चित समाजिक आलोचक, प्रकाश झा ने 1985 में ‘दामूल’ बनाई जिसमें अमीर लोगों द्वारा गरीबों का शोषण दिखाया गया है। फ़िल्म ने उसको मशहूर बनाया और फिल्म को पुरस्कार भी मिले। 2011 में उसने दलितों के बारे में ‘आरक्षण’ बनाई। यह फ़िल्म निचली जातियों की प्रतिरक्षा के बड़े दावों के बावजुद उन्हीं जातियों के बीच में विवादास्पद हो गई।

यह एक युवा– दीपक की कहानी है। बह दलित है इसलिए शिक्षित होते हुए भी उसको काम नहीं मिलता है। प्रतिष्ठित कॉलेज का मुख्य अध्यापक – प्रभाकर अनंद उसको अपने स्कूल में काम देता है क्योंकि वह आदमी सालों से सभी जातियों के गरीब तबके के युवाओं को शिक्षित करने के लिए संघर्षरत है। आरक्षण-निति की मदद से निचली जातियों को स्कूलों और विश्वविद्यालयों में स्थान मिलता है वह प्रभाकर के विचार में बहुत अच्छा समाधान है। फ़िल्म का खलनायक मिथिलेश सिंह है जिसके लिए सिर्फ़ पैसा सबसे महत्वपूर्ण है और जो प्रभाकर को नष्ट करना चाहता है। शुरू में फ़िल्म में आरक्षण की निति के बारे में एक वाद-विवाद है और आरक्षण के फ़ायदे और नुकसान बताये जाते हैं। अफ़सोस की बात यह है कि फिल्म अपने विषय से जल्दी भटक जाती है और हम दुराचार और पैसों से सच्चाई की जीत का अरुचिकर और थकाऊ धर्माचार देखते हैं जिस में ‘दामूल’ की सरलता तो बिलकुल ही नहीं है।

मिथिलेश अपना स्कूल स्थापित करता है और पैसेवाले लोगों को बताता है कि उनके बच्चों को सिर्फ़ उसके स्कूल में ऐसी शिक्षा मिलेगा जिसकी ज़िंदगी में ज़रूरत होगी। धीरे धीरे वह प्रभाकर के स्कूल के अध्यापकों को प्रलोभन देता है। प्रभाकर और दीपक गरीब-बच्चों को गोशाले में पढ़ाते हैं और अंत में जीत जाते हैं क्योंकि परीक्षा में उनके विद्यार्थियों को सब से ऊँचे अंक मिलते हैं। लगता है कि अमिताभ बच्चन ने निश्चय किया है कि अब वह भारीय समाज का अनुभवी परामर्शदाता बन जाए। माननीय अभिनेता का व्यवहार आजकल अक्सर शिष्यों को शिक्षा देनेवाले गुरु जी जैसा है और यह ख़तरनाक बात है क्योंकि इस प्रवृति के कारण उसकी फ़िल्में पहले जैसी अच्छी नहीं हैं। यह बड़ी अफ़सोस की बात है क्योंकि अमिताभ बहुत अच्छा अभिनेता है। ‘आरक्षण’ की चर्चा इसलिए करनी चाहिए क्योंकि फ़िल्म विवादग्रस्त बन गई। अगर लोगों को इस फिल्म में कहानी दिखाने-कहने का तरीका पसंद नहीं आया तो यह आश्चर्य-जनक बात नहीं होती क्योंकि इस क्षेत्र में फ़िल्म बहुत ही खराब है लेकिन दर्शकों की समस्या कुछ और ही थी। दिलचस्प बात यह है कि जिन दर्शकों को इस विषय से सम्बंधित ज़्यादा बहादुर फ़िल्में पहले ही मिल चूकी हैं उन्होंने इस फ़िल्म को देखने के बाद खुद को अपमानित महसूस किया।

निचली जातियों के दर्शकों को सब से खराब यह लगा कि फ़िल्म का नायक सैफ़ अली खान हो गया[10]। ऐसी स्थितियाँ पहले होती थीं और मैंने ‘मदर इंडिया’ का ज़िक्र किया लेकिन इस बार यह कहना मुश्किल है कि दर्शकों को अपमानित क्या लगा? क्या उनको अच्छा लहीं लगा कि अभिनेता मुसलमान है या उसका कुलीन वंश का होना जो कि फ़िल्म के उसके कार्य-भाग से संबंधित नहीं था[11]। सब से दिलचस्प बात यह है कि जिन लोगों को फ़िल्म पसंद नहीं थी वे ऐसे लोग थे जिनकी पक्षधरता का दावा फ़िल्म करती थी। दलितों के विरोध का मतलब यह हो सकता है कि आखिर में उन लोगों को अपनी नीतियों के बारे में पता है और अपनी सुविधा के लिए वे लड़ सकते हैं जो कि अच्छी बात है। फ़िर भी निराशा का कारण थोड़ा सा तकलीफ़देह लगता है अगर हम इस नायक को ध्यान से देखेंगे। दीपक बहुत अच्छा आदमी है लेकिन उसकी एक कमी है और यह ऐसी बात है कि वह बड़ी आसानी से अपना आपा खो सकता है और अकसर निराश होकर अपनी उग्रता का इस्तेमाल करता है। मिथिलेश से टकराना सब के बस की बात नहीं है, दीपक आता है और स्कूल को नष्ट करता है। पहले भी वह अक्सर दुसरों को मार देता है और उसे बोलने का सलीका नहीं है, यह सब नायक का बहुत बड़ा दोष है। दीपक की आक्रामकता का स्पष्टीकरण यह हो सकता है कि पढ़ाई के बावजुद निचली जातियों के लोग हमेशा अपरिष्कृत होंगे और शायद यह अच्छी बात है कि उन लोगों को ऊँचे स्तर का काम नहीं मिलता है क्योंकि वे खतरनाक हैं। दलितों की रक्षा करने के लिए फ़िल्म का ऐसा नायक अजीब लगता है, लेकिन समस्या है कि फ़िल्म के दर्शकों को नायक नहीं, अभिनेता पसंद नहीं था। अगर लोगों को नायक अच्छा नहीं लगता तो उनका क्रोध समझ में आने योग्य होता लेकिन अभिनेता का विरोध करना एक तरह से वही व्यवहार है जैसा दलितों के प्रति वर्षों से हो रहा है।

सब से निराशाजनक यह बात है कि कुछ भारतीय प्रदेशों में फ़िल्म को प्रतिबंधित किया गया और निर्देशक से फ़िल्म के कुछ दृश्यों को काट देने की मांग की गयी जिसका मतलब यह है कि अस्पृश्यता आजकल भी भारत में एक संवेदनशील विषय है। लेकिन अगर अछूतों की रक्षा करने के लिए बनाई हुई फ़िल्म के दृश्ये भी दलितों को अपमानित करते हैं तो दर्शकों का बिगड़ना आश्चर्यजनक बात नहीं है। इस फ़िल्म में प्यार को दिखाने की तरीका भी दिलचस्प है। प्रभाकर की बेटी और दीपक एक दुसरे से कुछ न कुछ प्यार करते हैं लेकिन उनका प्रेम फ़िल्म का मुख्य विषय नहीं है। हम यह बता सकते हैं कि नायक और नायिका की रिश्ता ऐसे उपाय का उदाहरण है जिसके अनुसार फ़िल्म कोई बात इस तरह दिखाता है मानो वे दुनिया के स्वभाविक नियम थे, लेकिन इसमें कुछ ऐसे अंश हैं जो हमको इस तरह से सोचने की इज़ाजत नहीं देती है। सब से पहले दर्शकों को पता नहीं है कि नायक और नायिका के बीच सचमुच प्यार है या सिर्फ़ गहरी दोस्ती, लगता है कि फ़िल्म बनाने वालों को ज़्यादा दिखाने से थोड़ा सा डर था और अगर ऐसा डर इस प्रकार की फ़िल्म में दिखाई देता है तो यह विषय दिखाने से कोई फ़ायदा नहीं है। दीपक और प्रभाकर की बेटी के बीच में अगर प्यार है तो इसे दर्शकों के मन में उतरना चाहिए है नहीं तो इसके होने या न होने से कोई फ़र्क नहीं पड़ता है। व्यभिचार को फ़िल्म में इतना स्थान देना और आरक्षण के बारे में स्पष्ट विचार नहीं दिखाना भी अच्छे सिद्धांत नहीं थे। फ़िल्म का रवैया इतना रक्षात्मक है कि इसे समाजिक समस्याओं में सम्बंधित बताना असंभव है, आप सभी को खुश कर के समस्याओं को संबोधित नहीं कर सकते हैं। निर्देशक को न सिर्फ़ सुधारों के बारे में बताना पर अपनी विचारों को भी दिखाने से डर है। ऐसे ही जगह में वे बहुत गंभीर और आडंबरपूर्ण भाषण डालते हैं जो शुरू में थकाऊ और बाद में हास्यास्पद होते हैं। यह फ़िल्म शायद बॉलीवुड की सबसे बेकार फ़िल्म है और इस कारण सचमुच उसको दिखाने से मना करना चाहिए था।

अंत में एक और विवादास्पद फ़िल्म की ज़िक्र करना उचित लगता है। शेखर कपूर की ‘बैन्डिट क्वीन’ 1994 में बनी हुई है और अछूतों के बारे में नहीं है लेकिन एक और समस्या का अच्छा उदाहरण है। यह फ़िल्म फूलन देवी के जीवन के बारे में माला सेन की किताब पर आधारित है। यह कहानी अच्छी तरह न सिर्फ़ यह दिखाती है कि हर व्यक्ति की ज़िंदगी में समाज की कितनी बड़ी भूमिका होती है लेकिन यह भी कि भारत जैसे देश में जहाँ समाजिक बुनावट इतना उलझा हुआ है कि अपने जीवन को तय करना बहुत मुश्किल है। फ़िल्म की फूलन देवी निचली जाति से है और गरीबी के कारण बचपन में उसकी शादी एक बुढ़े आदमी से हुयी है क्योंकि उसको लड़की के परिवार से बड़े दहेज की ज़रूरत नहीं थी। पति से लुटी हुई लड़की अपने गाँव वापस आती है लेकिन उसकी जीवन पहली जैसी हो नहीं सकती है क्योंकि पति को छोड़ने के बाद बदतहज़ीब हो गई है।

अरुंधती राय[12] एक मजेदार बात कहती है कि शेखर कपूर ने कहा था कि उसने अपने फ़िल्म में सत्य दिखाया फिर भी वह कभी फूलन देवी से मिलने नहीं गया और उस समय फूलन जीवित थी और जब वह अपनी फ़िल्म बनाता था तो उसी समय जेल से आज़ाद भी हुयी थी। निर्देशक अपनी नायिका को नहीं जानता था और उसने फूलन की जीवन की कहानी उससे कभी नहीं सुनी। फूलन की आत्मकथा माला सेन की किताब से कुछ कुछ अलग है और दोनों कपूर की फ़िल्म से बहुत अलग हैं। निर्देशक के लिए बलात्कार, बहुत सारी लूटपाट, गोलियों की आवाज़ सब से महत्त्वपूर्ण लगती हैं। यह सच ज़रूर है कि इन घटनाओं के कारण फूलन के जीवन में बहुत बदलाव आया लेकिन उसके जीवन में आये इन सारे बदलाव के मूल स्रोत इन घटनाओं में नहीं थे। फ़िल्म फूलन के परिवार की समस्याओं के बारे में कुछ नहीं कहता है। उसके जीवन की सारी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं का कारण उसके चाचा का प्रतिशोध था। फ़िल्म देखते हुए कि पश्चिमी दर्शकों के लिए यह समझना मुश्किल है कि फूलन की इन सारी स्थितिओं का मूल उसकी जाति है। जिस गिरोह का नेता निचली जाति में पैदा हुआ विक्रम है और एक तरह से गिरोह की लड़ाइयों का आधार भी है लेकिन लोग सिर्फ़ अलग अलग जातियों के नाम बोलते हैं और इन सब का अर्थ पश्चिमी दर्शकों के लिए स्पष्ट नहीं है। इसी समय दिखाया जाने वाला यौन-शोषण दर्शक का ध्यान मुख्य विषय के विपरीत कर देता है। भारतीय दर्शक के लिए जातियों से संबंधित दुर्व्यवहार को समझना ज़्यादा आसान है लेकिन सिनेमा के इतिहास में पहली बार औरत के प्रति होने वाला क्रूरतम यौन-अपराध दिखाया गया। यह बात गहरी समस्याओं से आगे निकल जाती है और सब से महत्त्वपूर्ण खबर छिप जाती है। भारत में कपूर की फ़िल्म के बारे में लिखने वाले लोग अक्सर इस पर एकाग्र होते हैं कि इस फ़िल्म में पहली बार नंगी औरत दिखाई जाती है। यह सच नहीं है क्योंकि नंगी औरत को हम अंग्रेज़ी वाली गिरीश कर्नाड की ‘उत्सव’ में देख सकते हैं लेकिन निराशाजनक बात यह ज़रूर है कि कपूर की फ़िल्म की लोकप्रियता इसी के कारण हुई है। शायद यह सच है कि ऐसे विवादात्मक दृश्यों को देखने के लिए ही लोग सिनेमा जाते हैं लेकिन कभी कभी याद रखना चाहिए कि अगर ऐसी चीज़ें ज़्यादा होंगी तो दर्शक दुसरे महत्त्वपूर्ण विषय नहीं देख पाएगा और वे विषय नंगे शरीर से शायद ज़्यादा आवश्यक हैं। हिंदी सिनेमा का उदाहरण देकर हमने देखा कि सिनेमा के सौ साल के इतिहास में अछूतों के बारे में ज़्यादा फ़िल्में नहीं हैं। शुरू में ऐसा लगा कि गाँधी जी और उनके तरह के दुसरे सुधारकों की मदद से यह विषय लोकप्रिय होगा लेकिन जल्दी ही ऐसी फ़िल्में मुख्यधारा के विषय से बाहर चली गयीं। क्या भारतीय दर्शक ऐसी फ़िल्मों के लिए तैयार नहीं हैं? मुझे लगता है कि आधुनिक सिनेमा में सब कुछ दिखाया जाता है इसलिए इस विषय से इतना डर ज़्यादा अजीब लगता है। जब हम बॉलीवुड फ़िल्मों की संख्या के बारे में सोचेंगे तो यह देखेंगे कि दलित न सिर्फ़ जाति के वरीयता-क्रम से बाहर हैं बल्कि सिनेमा से भी बाहर हैं। 100 करोड़ से उपर की जनसंख्या वाले देश के सिनेमा में बहुजन-जीवन के स्वाभाविक-चित्रण का अभाव चिंताजनक है और इसका एक बड़ा कारण संभवतः यह है कि बहुजनों का बड़ा हिस्सा अभी भी सिनेमा का उपभोक्ता समुदाय में तब्दील नहीं हुआ है। यह तब तक नहीं बदलेगा जब तक उनकी परिस्थितियों को स्वभाविक तरीके से नहीं दिखाया जाएगा। अगर हम दलित-समस्या पर ही केन्द्रित रहेंगे और सिर्फ़ सुधार के आग्रही के बतौर ही दलितों का चित्रण करेंगे तो वे कभी समाज के स्वाभाविक हिस्से की तरह कभी नहीं दिखेंगे। उपर्युक्त वर्णित सारी फ़िल्मों में से ‘स्वदेश’ और ‘अंकुर’ ने सब से अच्छा काम किया है क्योंकि इन फ़िल्मों में दलितों के प्रति कोई बड़ा पूर्वाग्रह नहीं दिखाया गया है।’अछूत कन्या’ और ‘सुजाता’ में भी दलितों का जैसा चित्रण किया गया है वैसा आज दिखाना असंभव लगता है, इसलिए हमको शायद पुराने जानकारों से फ़िर से ज्ञान लेना पड़ेगा क्योंकि वे अधुनिक निर्देशकों से ज़्यादा बहादुर थे।

[1] http://whatismatt.com/thailand-urban-legends/ (13.01.2012).

[2] U. Woźniakowska, Bollywood, Pragnienie prawdy i tęsknota za    mitem, Kraków 2010, p. 48.

[3] A. Chopra, King of Bollywood, Shah Rukh Khan and the Seductive World of Indian Cinema, New York, Boston 2007, p.     187.

[4] S. Mehta, Pociąg do Bollywood, „National Geographic”, 2, 2005, p. 79.

[5] N. Ghosh, Ashok Kumar. His Life and Times, New Delhi 1995,     p. 67-68.

[6] A. Chowdhury, Dev Anand. Dashing Debonair, New Delhi, 2004,    p. 17-18.

[7] M. Bose, Bollywood. A History, Glouceshire, 2006, p. 205.

[8] R. Dwyer, 100 Bollywood Films, London 2005, p. 12-13.

[9] J. Kieniewicz, Historia Indii, Wrocław 1980, p. 608-610.

[10] http://timesofindia.indiatimes.com

[11] http://www.hindustantimes.com

[12] http://www.sawnet.org/books/writing/roy_bq1.html

Tatiana Szurlej

Tatiana Szurlej

तत्याना षुर्लेई एक Indologist और फिल्म-आलोचक हैं। फिलहाल पोलैंड के शहर क्राकोव सिथत Jagiellonian University में The Courtesan Figure in the Iconography on Indian Popular Cinema:Tradition, Stereotype, Manipulation.   नामक विषय पर पीएचडी के लिए शोधरत हैं।

साभार- हंस फरवरी 2013, सिनेमा के सौ साल 

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भाषा में समाया ब्राह्मणवाद: रामजी राय

संस्कृत से शब्द लेते-लेते, ‘संस्कृत के पेट से जनमी हिंदी’, संस्कृत के पेट में समाने लगी। कुछ और ज्यादे बदशक्ल होकर। शब्द भंडार संस्कृत का, वाक्य प्रकार अंग्रेजी का। रंग नारंगी का और ढंग फिरंगी का। मुस्टंडे को क्या चाहिए तो हाथ में एक डंडा। और राष्ट्रीय एकता का डंडा लेकर घूमने लगी हिंदी, अपनों से भी बेगानी बनकर। अब अगर डंडा मारकर आप लोगों को स्वर्ग में ही सही ले जाएं तो कौन जाएगा भला।

By रामजी राय

संस्कृत कौन देस को बानी उर्फ  भाषा में समाया ब्राह्मणवाद

Magura Cave in north western Bulgaria

Magura Cave in north western Bulgaria

कबीर ने कहा ‘संसकीरत है कूप जल भाखा बहता नीर।’ अर्थात संस्कृत जीवित आदमियों की भाषा नहीं है। तुलसी इस झगड़े में पड़ना ही नहीं चाहे– ‘का भाखा का संसकिरत प्रेम चाहिए सांच।’ अर्थात बीच का रास्ता निकाला और सरक लिए। लिखा अवधी में, मंगलाचरण गाया संस्कृत में। हमारी सरकार ने इस बाबत सबसे न्यारा रास्ता अपनाया। जिन 15 जीवित भाषाओं को संवैधानिक दर्जा दिया उनमें से एक संस्कृत भी है। इसका तर्क क्या है यह अपन को आज तक समझ न आया। चलो माना कि यह एक पुरानी शास्त्रीय भाषा है, इसमें हमारी प्राचीन संस्कृति की बेशकीमती धरोहर दबा के रखी हुई है, इसे जाने बगैर हम अपनी जड़ों से कट जाएंगे। फिर तो इसे ढंग से पढ़ने-पढ़ाने का इंतजाम करने से काम नहीं चलेगा। जड़ों से जुड़े रहने के लिए ‘मरों’ से जुड़े रहना भर ही नहीं, उन्हें जीवित मान कर चलना भी जरूरी बना दिया जाएगा?

                लीजिए जनाब, अब संस्कृत में समाचार सुनिए। सुनिए अब आकाशवाणी से देववाणी में समाचार। यह भी अपन को किसी कदर पल्ले नहीं पड़ता कि इसकी क्या जरूरत? वे कौन लोग हैं भई जिनको संस्कृत में खबरें सुनाई जा रही हैं। शायद पितरों को। यहीं आकर निर्मल वर्मा का कहा साफ समझ आता है कि ‘अतीत हमारे यहां व्यतीत नहीं, वह हमेशा जीवित वर्तमान होता है।’

                बचपन से यही सुनते आए हैं कि संस्कृत को किसी ने नहीं जना। यह देवताओं की वाणी है। जिस पुस्तक से संस्कृत का परिचय कराया गया उस पाठ्य-पुस्तक का भी नाम था देववाणी परिचायिका। संस्कृत सीधे देवताओं के मुंह से निकली है जैसे ब्रा से ब्राह्मण। इसलिए इसे किसी ने नहीं जना। बल्कि यही सभी भाषाओं की जननी है। यह जुमला इतना सार्वभौमिक बना दिया गया है कि इसको लेकर दिमाग में कोई और ख्याल ही नहीं आता। हिंदी के परम भाषाविद किशोरी दास बाजपेयी कहते-कहते मर गए लेकिन किसी ने उनकी एक न सुनी कि भैया हिंदी संस्कृत से नहीं निकली है। उसका स्वतंत्र, भिन्न आधार है। नहीं तो संस्कृत में रामः गच्छति और सीता गच्छति अर्थात राम (पुलिंग और सीता (स्त्रीलिंग) दोनों के लिए गच्छति तो वह किस व्याकरण के किस नियम से हिंदी में राम जाता है और सीता जाती है हो जाता है यह कोई हमें बताए। उनको तो किसी ने नहीं बताया। हां उनके जीवन के अंतिम दिनों में एक बार इलाहाबाद में मैंने उनसे यह सवाल उठाया तो बकौल किशोरी दास बाजपेयी “जब कभी अपनी देशी सरकार (राष्ट्रीय सरकार) आएगी तो उसे हमारी बात जरूर समझ में आएगी।” तो क्या यह सरकार विदेशी है? रंग-रूप से भले न सही ढब-ढंग से तो विदेशी ही लगती है। ज्यादा नहीं तो कम से कम भारोपीय के वजन पर यूरोइंडियन तो लगती ही है, आपको शक है?

                भक्ति आंदोलन ने भारतीय भाषाओं, बोलियों को फूलने-फैलने का अवसर मुहैया किया। संस्कृत के एकछल प्रभाव को तोड़ा, उसे कूप जल घोषित किया। यह कुआं कहिए तो ‘ठाकुर का कुआं’ रहा जहां से दूसरा कोई पानी नहीं ले सकता था। वह बंधा पानी था। सरब-सुलभ बहता नीर नहीं। एकनाथ ने कहा “भगवान भाषाओं में भेदभाव नहीं करता। किसी को कम किसी को ज्यादा मान्यता नहीं देता।” लेकिन हमारी सरकार ऐसा करती है, कहती भले नहीं, और यही करते थे अंग्रेज।

                आजाद भारत में जब सरकार के सामने भारतीय भाषाओं की विविधता, उनकी अलग-अलग स्वतंत्र सत्ता को स्वीकृत करने का सवाल आया तो उसने विविधता की जगह मानकीकरण (स्टैंडर्डाइजेशन) पर बल दिया। विविधता को दरकिनार कर उनके एकता के पहलू खोजने के जरिए मानकीकरण करने पर बल देना दरअसल उनकी स्वतंत्र हैसियत को नकारना था। यह भेद-भाव की नीति की उपज थी। इसी नीति के तहत वह संस्कृत को भाषाओं की भाषा का दर्जा देती है। फिर तो आप मानकीकरण में समाए इस भाव के अपने-आप शिकार हो जाते हैं कि कुछ भाषाएं उच्च कुल की हैं, कुछ नीच कुल की और कुछ पिछड़े कुल की। और इस तरह भाषाओं के भीतर अगड़ा-पिछड़ा, दलित भाषाओं का भेद पैदा होने लगता है। और यह हुआ भी है।

                संस्कृत को न केवल जीवित भाषा का दर्जा दिया गया बल्कि अन्य भाषाओं को यह नसीहत भी दी गई कि वे ज्यादा से ज्यादा शब्द संस्कृत से लें। संस्कृत से लेकर अपना शब्द भंडार बढ़ाने को राष्ट्रीय एकता मजबूत बनाने का पर्याय बना दिया गया। और इस हिसाब से हिंदी को सबसे अग्रगणी घोषित किया गया क्योंकि यह माना गया कि हिंदी सीधे संस्कृत के पेट से निकली है। जैसे साझा संस्कृति या कहिए सांस्कृतिक एकता का भार संस्कृत ढोती थी उसी तरह आधुनिक भाषा में राष्ट्रीय एकता का भार हिंदी ढोएगी। इस समूचे चक्कर को बाकायदा संवैधानिक रूप दे दिया गया। इस निर्देश के साथ कि हिंदी अपने शब्द भंडार का विस्तार खास तौर पर संस्कृत के शब्द भंडार से शब्द लेकर करेगी।

                लेकिन हुआ क्या? संस्कृत से शब्द लेते-लेते, ‘संस्कृत के पेट से जनमी हिंदी’, संस्कृत के पेट में समाने लगी। कुछ और ज्यादे बदशक्ल होकर। शब्द भंडार संस्कृत का, वाक्य प्रकार अंग्रेजी का। रंग नारंगी का और ढंग फिरंगी का। मुस्टंडे को क्या चाहिए तो हाथ में एक डंडा। और राष्ट्रीय एकता का डंडा लेकर घूमने लगी हिंदी, अपनों से भी बेगानी बनकर। अब अगर डंडा मारकर आप लोगों को स्वर्ग में ही सही ले जाएं तो कौन जाएगा भला।

                कुछ लोगों को यह हिंदी की अपनी निजी प्रकृति लगती है। लेकिन यह हिंदी की अपनी प्रकृति नहीं है। यह पाई प्रकृति है जिसे हिंदी को ओढ़ा दिया गया है। याद रखिए आप किसी भाषा से सिर्फ शब्द भंडार नहीं ले सकते। उसके साथ आपको कमोबेश उसका समूचा संसार, उसकी संस्कृति, उसका संस्कार भी बरबस लेना पड़ता है। संस्कृत के साथ हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं का बैठाया गया यह रिश्ता एक सोची-समझी नीति का परिणाम है। भाषा के भीतर समाया यह ब्राह्मणवाद है जिसका शिकार सबसे ज्यादा हिंदी हुई है, इससे निजात पाना भाषाओं के प्रति जनतांत्रिक रवैया अपनाने के लिए बेहद जरूरी है। प्रसंगवश यह भी कि इस ब्राह्मणवाद की दूसरी भुजा हिंदू सांप्रदायिकता भी है। इसका भाषाई प्रमाण भी आप देखें तो हिंदी न केवल अपनी बोलियों से दूर जा बैठी बल्कि उर्दू से बैर मोल लेने की हद तक जा पहुंची है। उसी उर्दू से जिसकी वह सहोदर है, जिन्हें कभी एक ही नाम से जाना जाता था। प्रतिक्रिया में उर्दू के भीतर मुल्लावाद ने सर उठाया। वह फारसी होने लगी। आखिर ब्राह्मणवाद, मुल्लावाद भी तो सहोदर हैं।

                जब हमारे शासक वर्ग को यह लगने लगा कि अपने इस रूप में हिंदी बोझ बनने लगी है तो उसमें सुधार के लिए चट उसने दूसरा नुस्खा थमाया। हिंदी को चाहिए कि वह अपना शब्द भंडार अंग्रेजी और अन्य दूसरी भारतीय भाषाओं से भी ले। अन्य भारतीय भाषाओं से भी …. करनी में होना है अंग्रेजी से लेना। और आजकल टीवी धारावाहिकों और अन्य कार्यक्रमों में जिस तरह की हिंदी अख्तियार की जा रही है, उसे लोग हिंगरेजी कहने लगे हैं। तो जनाब अब भी आपको यह मानने में शक है कि हमारा शासक वर्ग मिजाज से यूरोइंडियन है?

                लेकिन जनजीवन के स्तर पर हिंदी ने दूसरा ही रास्ता अख्तियार कर रखा है। हिंदी का बिहारी रूप, बिहारी हिंदी के बतौर तो खासा परिचित है ही। इसी राह पर उसके और भी किसिम-किसिम के रूप आप देख सकते हैं। कहीं बंगाली हिंदी, कहीं मेघालयी और कहीं तमिल हिंदी आदि रूपों में। फिल्मी हिंदी से तो शायद ही कोई अपरिचित हो। अपने जन चरित्र को विकसित करने में हिंदी को किसी बनावटी शुद्ध रूप की चिंता नहीं है। यही उसका मूल स्वभाव रहा है। भक्ति आंदोलन से उपजा हिंदी-उर्दू का यह स्वभाव ही आजादी के दिनों में सबके दुलार का कारण बना था। इससे अलग होकर वह सबके हिकारत का पात्र बन रही है। खुद उनके हिकारत का भी जिनके बीच वह बोली जाती है। अपने इस जीवन-रूप के लिए ‘हिंदी अधिकारियों’, ‘हिंदी सेवकों’, ‘संवैधानिक व्यवस्थाओं’ की मुहताज नहीं है। इसका जीवन-रूप संवैधानिक व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह करके ही विकसित हुआ है। वरना हिंदी सेवकों ने इसे मार डालने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ रखी है।

                भाषा में समाया ब्राह्मणवाद हिंदी तक ही नहीं सीमित है। इसका असर कमोबेश सभी प्रांतीय भाषाओं पर भी है। भाषायी आधार पर राज्यों का गठन एक स्तर पर कमोबेश हुआ। लेकिन यह अंत नहीं है। हर प्रदेश की राज्य भाषा अपने प्रदेश की अन्य दूसरी भाषाओं, बोलियों के साथ भेदभाव बरतती दिखती है। इस प्रक्रिया में उनका भी विकास पथरा रहा है, लेकिन उनका भी जीवनगत रूप दूसरा ही रास्ता अख्तियार कर रहा है, वैसा ही जैसा हिंदी ने अपना रखा है। भारतीय भाषाओं के बीच यह रिश्ता ही भविष्य की एकता का नया आधार है।

                भाषाओं का जनतंत्र जनता के जनतंत्र से सीधे जुड़ा हुआ है। तत्सम के खिलाफ देशज का विद्रोह आज सभी भारतीय भाषाओं, खासकर हिंदी का जीवन-स्रोत है वरना वह राम-प्यारी हो जाएगी।

रामजी राय

रामजी राय

रामजी राय  बहुत कम और तीखा लिखने के साथ-साथ अपनी राजनीतिक सक्रियताओं के लिए जाने जाते हैं। समकालीन जनमत के प्रधान संपादक। जन संस्कृति मंच से जुड़ाव।

आभार-  समकालीन जनमत  (16 जनवरी- 31 जनवरी, 1994)

Shabdanushasan (शब्दानुशासन) – Galauj(गलौज) or Galauca (गलौच) : Ravish K. Chaudhary

Debates presuppose perspectives, the contestation of two different perspectives.A debate has emerged in social media between an editor and a teacher: The contestations of correct usage of words! The editor prescribes what he believes ‘correct’ in accordance with instructions of lexicons and negates the incorrect. The teacher describes what he finds in the current practice of language irrespective of the authority of lexicons.  The contestation is of descriptive vs prescriptive  understanding of language (and grammar). The debate is about shabdanushasan (शब्दानुशासन).

courtesy- Nabu Press

courtesy- Nabu Press

 Galauj(गलौज) or Galauca (गलौच)!

By Ravish K. Chaudhary

A passage from Mahabhasya is worth mentioning.

एवं हि कश्चिद्वैयाकरण आह I कोऽस्य रथस्य प्रवेतेति I सूत आह I आयुष्मन्नहं प्राजितेति I अपशब्द इति I सूत आह I प्राप्तिज्ञो देवानांप्रियो न त्विष्टिज्ञ इष्यत एतद्रूपमिति I वैयाकरण आह I आहो खल्वनेन  दुरूतेन वाध्यामह इति I सूत आह I न खलु वेञः सूतः सुवतेरेव सूतो यदि स्रुवते: कुत्सा  प्रयोक्तव्या दुःसूतेनिति वक्तव्यम् I (Mahabhasya ed. Kielhorn Vol I, 1880, p. 488)

Let’s now read the same in English with little elaboration:

‘ In.this way, as is known, a certain grammarian said : * Who is the pravetr” driver ” of this chariot ?’ The charioteer said : * O long living one, I am the prajitr ** driver ” ‘. The grammarian said : ‘This is an apasabda ” incorrect word”. The charioteer said : ‘Your Honour is praptijna ” one who knows (the outcome of) the application ( of the rules ) “, but not istijna” one who knows the desired usage “. This form (prajitr) is desired ‘. The grammarian said :’ Well, by that Duruta we are pressed hard indeed . The charioteer said: ‘ Certainly, (the word) sitta” charioteer” is not (a derivation) from ( su + utaderived from the verbal base ) veH” to weave “, but suta( is derived) from (the verbal base ) su- ” to set in motion ” only. If your abusive term (had been derived) from sit-, you should have used (the correct form)duhsWa“a bad charioteer “. (Paspasahnika trans: Joshi &Roodbergen University of Poona 1986, p.142)

The passage offers a nice illustration of the point of acceptability and grammaticality. The grammarian who knows the rules (of derivation) is honoured by praptijna.  He is not a person to whom ista(desired) usage is to be asked. The grammarian has no authority on desired usage. Mahabasya suggest that even though the rules of grammar derive what the grammarian has uttered, it is the charioteer whose utterance shall have precedence over the derived word. The grammarian, who only knows Panini’s rule, wrongly believes prajitr to be an apasabda. Indeed the term uttered by the charioteer is desired (isyata etad rupam). The user (of the language), the charioteer in response, to the preaching of grammarian, with a hint of sarcasm, says that the trouble with the grammarian is that he does not know usage.

It is important to find that Mahabhasya prefer the usage of native speaker over the rules of Astadhayayi. It signifies that grammar shall follow the language of native user. Language with its internal dynamics shall mould itself and grammar and lexicons shall follow this flowing current of langauge. Historically, all known languages in its due course have abandoned some words, adopted, formed some new ones, altered some others in its usage or have changed meaning of some of its words. Fluidity is inherent to languages. Languages have adequately borrowed from other languages. Even classical language like Sanskrit and Greek has borrowed from each other. Some examples can be  Pancha (पंच) Pente (Πέντε) Five, Kendra(केद्र) Kentro (κέντρο) Center, Dwi(द्बि) Dio (δύο) Two etc. Mahabhasya also refers to some words of Persian origin which were in use but had become obsolete in time. Some words have reversed its meaning in due course of time. An example is Sanskrit word साहस which is bravery in current use. Earlier the term was used for ‘insulting women’s dignity.  It is possible for a grammarian to derive these words from the rules of language and justify its meaning in the current use? These words are to be used in accordance with the current usage of its native speaker.

Then native users of language use the language with innate competence and not by the instructions of grammarians. The usage of words with this innate competence decides the correct usage of words. In this regard grammarians have no authority. Mahabhasya (81) mentions this view in the passage quoted below:

यल्लोकेऽर्थमुपादाय शब्दान्प्रयुञ्जते, नैषां निर्वृत्तौ यत्नं कुर्वन्ति I ये पुनः कार्या भावा निर्वृत्तौ तावत्तेषां यत्नः क्रियते I तद्यथा-घटेन कार्येकरिष्यन् कुम्भकारकुलं गत्वाऽऽह-कुरू घटं कार्यमनेन करिष्यामीति I न तद्वच्छब्दान्प्रयुयुक्षमाणो वैयाकरणकुलं गत्वाऽऽह्- कुरू शब्दान्प्रयोक्ष्य इति I  तावत्येवार्थमुपादाय शब्दान्प्रयुञ्जते I

(Because, in daily life, having brought to mind different-things(people) use words. They do not put in an effort to make these(words). On the other hand, they do put in an effort to makethings which are karya‘ to be produced . For instance, one whoneeds a pot for some purpose, goes to the house of a potter andsays : ‘ You make a pot. I need a pot for some purpose ‘. (But) one who wants to use words does not go to the house of a grammarian and say : ‘ You make words. I want to use them ‘. (On the contrary,) having brought to mind (a thing), without further ado, he uses words.)

Words are not used by instruction of grammarians. Regarding the origination and the use of words grammar has no authority. No one goes to a grammarian for a word. The (native) speaker who uses the language is the only authority as far as the laukik language is concerned.  No native speaker of a language refers to the lexicons while choosing the words in daily use. Even words of foreign origin have been adopted in languages without the approval of grammarians. English language has adopted words like juggernaut (जगन्नाथ) and satrap of different cultural origin without any grammatical exercise and usage of these words are equally acceptable with words of Greek and Latin origin.

Whether knowledge is the basis of correct usage (शिष्टप्रयोग) or the correct usage (शिष्टप्रयोग)   is the basis of grammatical knowledge has always been the point of contestation. This quest has been in the centre of grammatical studies for time immemorial.  We can infer from the passages, mentioned above, that the early tradition of grammarians suggests correct usage as the basis of grammatical knowledge. That a language and the correct (शिष्ट) use of the language is not dependent upon the knowledge of grammarians. It is the innate competence of the native speakers that make the correct usage. The early traditions of grammarian suggest a prescriptive understanding of language.

 If it is the innate competence of native speakers that decide the correctness of words, then what is शब्दानुशासन all about? If loka prayoga is the pramana in ‘instruction in words’, what does shastra do ? what is grammar good for ? According to Mahabhasya, Shastra provides us dharmaniyama of words used in loka.

लोकतोऽर्थप्रयुक्ते शब्दप्रयोगे शास्त्रेण धर्मनियमः I(Mbh 83)

That the role of shastra is in the dharmaniyama of the words in usage.  What is dharma niyama ? The term dharmaniyama is an ambigious term in the corpora of snaskrit literature. In different context it carries different meanings. It can have multiple connotations depending upon the context. To resolve this we can refer to Kaiyata who is an authority on Mahabhasya with his celebrated tika called Mahabhasya-Pradeep. Kaiyata explains this in following manner: धर्मप्रयोजन इति I लिङादिविषयेण नियोगाख्येन धर्मेण प्रयुक्त्ः इत्यर्थः I i.e. dharma forms the domain of the verb endings called IN,etc. in Panini’s grammar.  That grammar has an assigned role of the analysis.  The earlier tradition, as we can see, assigns the grammarians the role of analyst and not of instructor. The tradition of grammarian in India favours a descriptive understanding of language and grammar.

This is not to say that prescriptive view of language and grammar is the only view available in the tradition of grammarians. BhattojiDikshita’s SiddhantaKaumudi or “Illumination of the established (position)” (17th century) is perhaps the first text in this regard which prescribes the correct usages to the learners of Sanskrit language. The context of this prescription needs explanation. It is important to underline that prescription presupposes something static, already established and unchangeable without having its own dynamics. Surely this not applicable to a language which is active and changing itself by its own inherent dynamics in a given social-cultural context. As discussed earlier, that was case with the language on which Panini and Patanjali were writing sutras and commentary. The language they were dealing with had its regional variants, known to both the scholars. They were even aware of obsolete usage or changed meaning of words. The case with Bhattoji Dikshita was quite different. He was required to teach Sanskrit to   non-native speakers of this particular language. Texts available in the traditions of grammarian were the only means to learn this language. No wonder, prescription of words and rules were inevitable in this particular case.

The prescriptive understanding of language and the attitude of learning correct usage from texts and rules already established has dominated the later Sanskrit traditions.  This attitude has also silently slipped to the grammarians of later Indian languages. Grammarians of later Indian languages, under the dominance of prevalent practice of later Sanskrit grammarians have allowed prescription to be the rule of regulation of their languages without much reflection on the subject. Frequent references to lexicons and grammatical rules to derive words are penchant to align with the tradition of later Sanskrit grammarians without differentiating the context of languages. To some extent it is a  Brahmincal exercise to establish the hierarchy of language, words in use and of the users on the basis of usage. Contrary to this, we can see that for  Panatnjali no word was apraukta as all words have a potential to be used and without the knowledge of a grammarian can be used in different time-space and different regional variants of a language.

In sum, prescription in language cannot be logical if the language is live and dynamic and is actually used by millions of native speaker. It is inherent to the language that its users in due course of time shall modify, alter and change its terms/words/phrases and also the meanings of the words from its present usage. The language in its internal dynamics will change its own shape. It shall borrow, include and exclude words from other languages and alter its form in accordance with its own nature.  Grammarian can not intervene in this process. Any intervention from of a grammarian to prevent this dynamics shall be a futile exercise.  Grammarians are mere spectator and analyst of this dynamics.  The grammarian and lexicons are bound to accept both Galauj(गलौज) or Galauca(गलौच) if found in current use of native speakers.

The very adherence to the correct usage of words has its own problematic from the class perspective. I shall restrain to comment upon that, have heard the editor is anti-Marxist.

ravish

Ravish is an engineering graduate and master in Sanskrith from  JNU. He briefly pursued philosophy at JNU, and is  now an engineering personnel with the ONGC, Mehasana. He has also been involved in the cultural politics. You can contact him through  sampark.ravish@gmail.com.

नाले और रखवाले –एक असाहित्यिक की डायरी: मार्तंड प्रगल्भ

एक साहित्यिक की डायरी’ से तो आप सब परिचित हैं. मुक्तिबोध की इस रचना ने इतनी प्रसिद्धि पाई की असाहित्यिक लोगों ने डायरियां  लिखना ही लगभग बंद कर दिया . इधर एक असाहित्यिक की डायरी हमारे हाथ लगी .इसमें कुछ हालिया घटनाओं और बहसों के हवाले हैं. दिलचस्प लगे तो पढ़ लीजिए . लेकिन याद  रहे , डायरी है , सम्पादकीय नहीं .

By Michele Meister

By Michele Meister

 

By मार्तंड प्रगल्भ

मेरा एक मित्र है . बेरोजगार है. आजकल दिल्ली में मुनिरका की गलियों में गाहे-बगाहे दिख जाता है. बेरोज़गारी और ज़माने की चिंता से थोडा सनकी भी हो चला है. पढ़ा-लिखा है. बतकही का रस जानता है. साहित्य में रुचि है. और सच पूछिए तो हम-आपसे कुछ ज्यादा ही गंभीरता से लेता है साहित्य को. पिछली बार देखा था दिसंबर की ठंढ में. गुस्से से भरा उसका चेहरा अभी भी याद है मुझे. विश्वविद्यालय के गेट पर मिला था. ज़ल्दी में था. कह रहा था इस रेप काण्ड के विरोध में जनता सड़क पर है , संस्कृति-कर्मियों को भी वहाँ होना चाहिए. कला और साहित्य में सत्ता-विरोध और सड़कों पर कलाकारों-साहित्यकारों का सामूहिक प्रतिरोध एक दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि पूरक हैं. कहते-कहते बस आ गयी और वह बस के भीतर गुम हो गया. दूसरे दिन मेरे मोबाइल पर उसका सन्देश मिला था कि अमुक दिन इंडिया गेट पर विरोध प्रदर्शन के लिए ज़रूर आयें. मैंने भी मन में ठान लिया था कि जाऊँगा ही. पर अंत समय में गया नहीं. प्रदर्शन हुआ और लगातार हुआ. किसी और ने फेसबुक पर विरोध-प्रदर्शन की तस्वीरें भी मुझे बाद में दिखायी थीं.

मेरा मित्र परितोष  एक वामपंथी सांस्कृतिक मंच से जुड़ा है. उस दिन के बाद मैंने उसे विश्वविद्यालय के आस-पास फिर देखा नहीं. हांलाकि मेरी बड़ी  इच्छा थी कि मिलता तो कुछ बात करता. इस इच्छा का एक फौरी संदर्भ भी था. एकाध सप्ताह बाद ही एक हिंदी दैनिक ‘घनसत्ता’ के सम्पादक ने उसी सांस्कृतिक संगठन को कोसते हुए एक अजीबोगरीब, लगभग विद्वेषपूर्ण ,सम्पादकीय लिखा था. सम्पादक साहेब का आरोप था कि कोई भी लेखक संगठन वहां दिल्ली की सडकों पर नहीं था! असल में वामपंथी लेखक-सांस्कृतिक संगठनों की मिशनरी  आलोचना और लेखकों के मार्क्सवाद-प्रेम का प्रतिरोध  इनका प्रिय  शगल रहा है. अखबार में आरोप था कि अमुक लेखक संगठन के महासचिव या किसी  अन्य पदाधिकारी का चेहरा या उसका बैनर उन्हें नहीं दिखा. बाद में कुछ दुष्टों  ने अख़बारों और सामाजिक मीडिया में छपी तस्वीरों और रिपोर्टों का हवाला उन्हें दिया. शायद उनके ही अखबार के दीगर संस्करणों की ख़बरों को उनके फेसबुक पर चस्पां किया. पर लाहौर से तुरत-फुरत आये सम्पादक ने इन तस्वीरों में दिख रहे चेहरों को पहचानने से इनकार कर दिया . और उनका ‘मार्क्सवादी’ – विरोध अक्षत बना रहा ! पर अपन जैसे लोगों ने उन्हें कोई महत्व नहीं दिया. बात शायद आई -गई  हो गयी. पर मैं अपने मित्र से मिलना चाहता था. उसके बाद भी लगातार गोष्ठियों, सेमिनारों,काव्य-पाठों और विरोध-प्रदर्शनों वाले उसके सन्देश मेरे मोबाइल पर आते रहे थे ज़रूर. एकाध जगह मैं गया भी था. उसे उन आयोजनों में अतिव्यस्त देख मेरा जी नहीं हुआ उसे टोकने और बतियाने का. बहरहाल परसों शाम (हाँ शाम ही को तो) वह मुझे विश्वविद्यालय के कैंटीन पर दिख गया.

देखता हूँ बड़ी क्षिप्र  गति से वह मेरी ओर ही चला आ रहा है. उसने भी शायद मुझे देख लिया था. आते ही मेरे सामने बैठ गया और एक सिगरेट सुलगा ली. दो कश लेने के बाद अचानक बोल पड़ा ‘आ परितोषाद्विदुषां न साधु मन्ये प्रयोगविज्ञानम् ।बलवदपि शिक्षितानामात्मन्यप्रत्ययं चेतः’. ज्ञान के क्षेत्र में विद्वानों की संतुष्टि ज़रूरी है. बड़े से बड़ा सिद्ध  भी केवल आत्म -प्रमाण  पर विश्वास नहीं कर सकता. कालिदास ने ऐसा कहा है. पर जब विद्वानों के बीच किसी शब्द प्रयोग को लेकर असहमति हो तब?” मैंने सन्दर्भ के प्रति अपनी अनभिज्ञता विस्मय से प्रगट की. कहने लगा अरे ,अभी सन्दर्भ को मारो गोली . तुम क्या कहते हो? मैंने थोडा हकलाते हुए कहा कि महाभाष्यकार के अनुसार तो लोक ही प्रमाण होगा तब. “बस यही तो मैं सोच रहा हूँ”. उसने जैसे मुट्ठियाँ भांजते हुए कहा. परन्तु मैं अब थोडा स्थिर हो चुका था. बात को पकड़ते हुए मैंने भी सवाल फेंका . “लेकिन अगर लोक में भी अनेक प्रयोग मिलें तो.” उसने कहा तो सभी रूप मान्य होंगे. “लेकिन भाषा में निबद्ध ज्ञान -परम्परा के लिए तो इतनी छूट तो भारी पड़ेगी मित्र” मैंने तनिक  मजा लेते हुए कहा. मैंने फिर कहा “और यही वजह है कि व्याकरण-ग्रंथों और कोशों की ज़रुरत होती है”. “इससे मेरा भी इनकार नहीं है. मैं भाषा के मानकीकरण के खिलाफ नहीं हूँ.” वह भी अब विवाद में गंभीर हो चला था. कहने लगा “परन्तु समय-समय पर लोक-प्रयोगों और तदनुरूप साहित्यिक-प्रयोगों के परिवर्तन को व्याकरण ग्रंथों और कोशों में प्रतिबिंबित होना चाहिए. भाषा तो बहता नीर है. बाँधोगे तो या तो सूख जाएगी या फिर उसके वेग से तुम्हारे बने बाँध टूट जाएँगे. और हिंदी जैसी भाषा की जीवन्तता और उसका वेग तो जनपदीय बोलियाँ ही हैं. एक बार उनसे कटे तो गए. संस्कृत के साथ हुआ, प्राकृतों और अपभ्रंशों के साथ हुआ तो कोई आश्चर्य नहीं कि तुम्हारी बंधी-बंधाई , ‘राष्ट्रीय-कृत’ हिंदी के साथ भी वही हो”. वह शायद भाषा –पावित्र्य –संरक्षिणी सभा के किसी सभापति  से भिड़ आया था. मैंने उसकी आँखों में झलकते गुस्से को नज़दीक से देखा और सच पूछिए तो जैसे कोई कड़वी सचाई मुझे भी कंपा गयी. वह कहता गया. “अब देखो भाषा का निर्माण एक सामाजिक प्रक्रिया है. हिंदी के विशाल प्रदेश में बहुसंख्यक जनता जिस भाषा में सोचती-विचारती काम करती है, हिंदी का भविष्य वहां है.”

मेरे दिमाग में हिंदी भाषा के विकास की एक संक्षिप्त रूप-रेखा कौंध गयी. इसी तरह की बातें तो चन्द्रधर शर्मा गुलेरी , प्रेमचंद, हजारीप्रसाद द्विवेदी, किशोरीदास वाजपेयी ,रामविलास जी और राहुल जी जैसे विद्वानों ने भी की थी. उस वक़्त भी भाषा की शुद्धता के पैरोकार हिंदी को संस्कृत की पुत्री बनाने पर तुले थे. संविधान सभा की बहसें भी दिमाग में घूम गयीं. दावं-पेंच, शक्ति सम्बन्ध और ‘राष्ट्रवाद’( सांस्कृतिक  ही न!). हुआ वही जो कुछ लोग चाहते थे. और बदले में मिली रघुवीरी हिंदी! उर्दू से कन्नी काट कर आज़ाद हुए ही थे और अब बाकियों के साथ भी वही सलूक . भाषा की राजनीति से राजनीति की भाषा तय होने लगी थी.  परितोष अपनी ही रौ में था. “एक तरफ बाज़ार है . कार्पोरेट मीडिया और सरकार . उसी  का एक बढती रूप है हमारा बॉलीवुड . दूसरी ओर मजदूरों के विशाल जत्थे हैं . पटना से लेकर अहमदाबाद और लुधियाना-अमृतसर तक, गौहाटी से लेकर मुंबई –सूरत तक. आज गुडगाँव में हैं कल धर्मशाला तो परसों नागपुर. इनकी भाषा क्या है ? हिंदी ही तो है. बन रही है हिंदी इनसे. जो साहित्य इनके बीच से आरहा है , इनके बारे में आ रहा है , इनके प्रति प्रतिबद्ध है. हिंदी भी उनसे ही बन रही है. तो कोशकार क्या करेगा? कोर्पोरेट मीडिया और बॉलीवुड से प्रयोग स्थिर करेगा या संस्कृत में गोते खाएगा या फिर कामगार जनता की तरफ मुंह करेगा. एक ही रास्ता है और वह है जनता की ओर जाने का. इस मामले में कोई आगे नहीं बढ़ता. ले-दे कर सत्तर-अस्सी साल पुराने कोशों की शरण में जाना होता है. और बढे भी कैसे ! जनता से वास्तविक संपर्क हो तब न! और तुर्रा यह कि जनता के संगठन इन्हें भीड़ लगते हैं या फिर तानाशाह ! और कहेंगे कि हम हैं सबसे बड़े लोकतांत्रिक!” वह लगभग हांफ रहा था.

कुछ देर तक हम दोनों चुप रहे . बिना कुछ कहे मैं उठा और चाय लेने कैंटीन के काउंटर की तरफ बढ़ गया. परितोष  ने अचानक कहा “मेरे लिए काली लेना अदरक वाली. अच्छा रुको , मैं भी चलता हूँ.” दोनों चाय लेकर रिंग रोड पर निकल आये . गरमी कुछ कम हो चली थी. पर बीच-बीच में गर्म हवा के झोंके आ जाते थे. छुटियाँ शुरू थी इसलिए भीड़-भाड़ थोड़ी कम हो चली थी. सुबह जो अमलतास के पीले फूल चमकदार और ऐश्वर्य से भरे थे उनमें अधिकांश तो झड़ गए थे . जो बचे थे, मुरझाये थे और ढलते सूरज की किरणों में मन को उदास करने वाले थे. हाँ प्रोफेसरों के क्वाटरों के पीछे आम की छोटी-छोटी अमौरियाँ मन प्रसन्न करने वाली थीं. हमलोग जब कुछ एकांत में निकल आये तो उसने फिर से बात आरम्भ की. “ देखो , बात दरअसल भाषा के प्रति दो भिन्न दृष्टियों की है. एक है भाषा के शुद्धिकरण की , संस्कृतीकरण की, और शुद्ध भाषा के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की. पहली दृष्टि का एक और भेद है जो ऊपर-ऊपर से शुद्धिकरण का विरोधी दीखता है , अपने को शुद्धिवादी कहे जाने पर ऐतराज करता है ,पर है नहीं. यह है बहुभाषावाद. इसे बहुसंस्कृतिवाद या अमेरिकी मल्टीकल्चरलिज़म का ही विस्तार मानो. संसदीय लोकतंत्र का यह नवउदारवादी युग इसी नारे के साथ है और भाषाओं की गैरबराबरी के खिलाफ चलने वाले प्रगतिशील आन्दोलनों को अपने उदार आवरण में पालतू और भ्रष्ट बनाता है. यह भाषाओं की अस्मिता की राजनीति से अपना कारोबार चलाता है और विश्वबाजार को नए-नए दुकान उपलब्ध करवाता है. ठेठ राजनीतिक सन्दर्भ दूं तो भाजपा, कांग्रेस और दक्षिणपंथी क्षेत्रीय दल- मायावती से लेकर नितीश कुमार तक- इस पहली दृष्टि के प्रतीक हैं. इनके लिए लोकतंत्र का नारा सबसे कारगर है. साहित्य में भी लोकतंत्र का नारा लगाने वाले अधिकाँश कलावादी और व्यक्तिस्वातंत्र्य  के वादी यथास्थितिवाद के घोर समर्थक हैं. और भाषा की शुद्धि के भी! और अकारण नहीं कि एक ‘लोकतांत्रिक’ सम्पादक पूरी मानवता को सी.आई.ए का ऋणी मानता है!” वह चलते –चलते रुक गया था. सडक के किनारे पत्थर की एक बेंच थी. किनारा  कुछ-कुछ पहाड़ी घाटी का भ्रम पैदा करता था. नीचे ढलान थी और जो जंगल में गुम हो जाती थी. घाटीनुमा उस अवकाश के उस पार विश्विद्यालय की नौ मंजिली लाइब्रेरी दृष्टि को रोक लेती थी. हवाई जहाज़ लगातार सर के ऊपर से गुजरते रहते . उसकी भयानक गड़गड़ाहट पहले सोने न देती थी. अब भी यदा-कदा जब विचारों की किसी अमूल्य श्रृंखला को भंग कर देती तो मन चिड़चिड़ा  हो उठता था.

उसने जब उस लोकतांत्रिक सम्पादक का ज़िक्र किया तो अचानक से अपन ने सन्दर्भ पा लिया. और शाम से ही मित्र की उद्विग्नता का पूरा चित्र मेरी आँखों में घूम गया. मन ही मन में मुझे उसकी प्रकृति पर हलकी -सी  हँसी आ गई. पर वह पहले की ही  भांति कह रहा था “ और दूसरी दृष्टि है भाषा के जनवाद की.” मैंने उसे बीच में ही टोका. “ देखो तुम जिस राजनीतिक स्वरुप की चर्चा कर रहे हो उससे मैं पूरी तरह सहमत हूँ. भाषाओं के इतिहास में भी संक्रमण के दौर आये हैं. अब जिसे हम भक्तिकाल कहते हैं या ठीक उसके पहले का जो काल है, हजार इसवी के आस-पास का, बहुत बड़ा परिवर्तन हो रहा था पूरे उपमहाद्वीप में . देशी भाषाओं ने धीरे-धीरे संस्कृत –प्राकृत-अपभ्रंश को उनके साहित्यिक भाषा के गौरवमय  आसन से नीचे धकेल दिया. ऐसा नहीं था कि इन देशी भाषाओं का अस्तित्व पहले था ही नहीं. लोग इन्हीं भाषाओं के अपने पुराने –नए रूपों में दुनिया को देखते- समझते थे. पर साहित्य और ज्ञान के लिए इन भाषाओं का प्रयोग वर्जित था. साहित्य और ज्ञान की एक आधिकारिक भाषा थी, लम्बे समय तक वह संस्कृत ही रही बाद में गौण रूप से प्राकृत और अपभ्रंशों को यह आसन मिला. जो लोग यह समझते हैं कि अपभ्रंश से देशी भाषाओं का उद्गम हुआ है , वो बहुत बड़ी भूल करते हैं. ये देशी भाषाओं का बढता दबाव था कि अपभ्रंशों के अलग अलग रूपों में हमें देशीपन के उदाहरण मिलने लगते हैं. इसलिए ‘हिंदी के विकास में अपभ्रंश का योग’ एक भ्रामक इतिहास दृष्टि है. दरअसल होना चाहिए था ‘अपभ्रंश के विकास में हिंदी का योग’. और यह बड़ा परिवर्तन राज्य और काव्य के बदलते रिश्तों और नए सांस्कृतिक वातावरण, अर्थात इस्लाम  की संश्लिष्ट अंतर-क्रियाओं का परिणाम थी. बाबा फरीद और मुल्ला दाउद से लेकर संत कवियों ने देशी भाषाओं में साहित्यिक अभिव्यक्तियाँ की. यह उनके भिन्न सांस्कृतिक पृष्ठभूमि और नए सामाजिक स्तर के कारण प्राप्त आत्मविश्वास का परिणाम थीं. उसके बाद लम्बे समय के परिवर्तनों ने रीतिकाल तक आते-आते साहित्यिक भाषा के रूप में ब्रज को स्थिर कर लिया. खड़ी बोली,हिन्दवी, हिन्दुई ,उर्दू आदि सम्बन्धी विवाद मैं यहाँ दुहराना नहीं चाहता. अंग्रेजी राज में भाषा को लेकर विवाद हुए , राजनीति हुई ,पर कभी ऐसा नहीं था कि जनता की आमफहम भाषा साहित्य से एकदम बाहर रही. भाषा की यह दूसरी परम्परा संस्कृति के शुद्धिकरण के खिलाफ सितारेहिंद,भारतेंदु, अयोध्याप्रसाद खत्री , प्रेमचंद, गुलेरी ,किशोरीदास वाजपेयी ,फिराक, शिवदान सिंह चौहान , रामविलास शर्मा, राहुल सांकृत्यायन आदि के साथ चली आई है. पर इस दूसरी परम्परा के भीतर भी विवाद और मतांतर रहे आये हैं. पर आमतौर पर यह भाषा की प्रगतिशील परम्परा है. इनके आपसी विवाद रोचक और ज़रूरी हैं पर अभी मैं उसमें पड़ना नहीं चाहता.” थोडा रुक कर मैंने फिर शुरू किया “ अस्सी के दशक के आखिर से जो नवउदारवाद आया, संचार माध्यमों में जो व्यापक परिवर्तन हुए उससे परिस्थितियाँ बदल गयी हैं. नयी सदी के दूसरे दशक तक आते-आते तकनीक जब से फेसबुक जैसे माध्यमों तक पहुंची  है, भाषा- प्रयोगों में उथल- पुथल- सी मच गयी है. अभिव्यक्ति अब प्रिंट-पूँजी के भरोसे नहीं है. इस आभासी माध्यम ने अभिव्यक्ति  के नए रास्ते खोल दिए हैं. अभिव्यक्ति  के इस बढ़ते जनाधार ने भाषा की  शुद्धि-चिंताओं को परेशान कर दिया है. मैं इन माध्यमों की सीमाओं को जानता हूँ. पर यह एक प्रगतिशील बात तो हुई ही. मानकीकरण की प्रक्रिया भी ज़रूरी है. और यहाँ मैं तुम्हारी बात से फिर सहमत हूँ कि उस मानकीकरण की प्रगतिशील और जनवादी प्रक्रिया का विकास करना ऐतिहासिक ज़रुरत है.”

इतना लंबा बोलने के बाद मैंने उसकी तरफ देखा तो वह मुस्कुरा रहा था. “ तुमने मेरी बात को ऐतिहासिक सन्दर्भ दे दिया” हंसते हुए परितोष ने कहा. अभी पहली बार उसके चेहरे पर हँसी देख कर सच पूछिये तो मुझे बहुत अच्छा लगा. हमलोग बात करते-करते हॉस्टल के गेट तक आ गये थे. मौन सहमति  से हमारे कदम खुद-ब-खुद कमरे की ओर चल पड़े. मैंने सिगरेट सुलगा ली थी. मेरे मित्र ने इतनी देर से कोई सिगरेट नहीं निकाली थी. इसका मतलब था उसके पास पैसे नहीं हैं. सोचा सिगरेट के साथ रात का खाना भी यहीं मेस में खिलाना होगा. पर यह मुझे अच्छा ही लग रहा था. मैंने उससे सम्पादक के बारे में पूछा. बोला छोडो यार. उन की याद मत दिलाओ. “अब देखो न उसी दैनिक के सम्पादक थे प्रकाश जोशी. राजनीतिक रूप से मैं उन्हें पसंद नहीं करता. पर उन्होंने हिंदी पत्रकारिता को सहज भाषा के पक्ष में रखा. और उनकी क्रिकेट पर लेखनी तो वाकई युगांतकारी है. अफ़सोस! इस तुरत-फुरत वाले बाज़ारू मनोरंजन, और तीन घंटे के मसाला शो ने जब क्रिकेट को ही बदल दिया तो अब उस भाषा का क्या किया जाएगा. वह तो प्रकाश  जी के साथ ही चली गयी.”

हमलोग सिगरेट बुझा कमरे में दाखिल हुए. इस दौरान मेरा मन रामविलास जी को याद कर रहा था. मैंने ‘भारतेंदु युग और हिंदी भाषा की विकास परम्परा’ को आलमारी से निकाल लिया. मैंने उसमें से दो उद्धरण परितोष को पढ़ कर सुनाये. .”दरार आम जनता में नहीं थी.दरार थी उच्च वर्गों में.फिर उन्हीं उच्च वर्गों का सहारा लेकर भाषा समस्या कैसे हल होती.उच्च वर्गों का यह दृष्टिकोण भाषा के परिष्कार के नाम पर उसे जनपदीय बोलियों से और शहरी बोलचाल से दूर ठेल रहा था और यह सिलसिला अंग्रेजी राज के खत्म होने के  पच्चीस साल बाद भी जारी है.” “पच्चीस नहीं साठ साल बाद भी” हंसते हुए उसने कहा. दूसरा उद्धरण यूँ था- “भाषा का परिनिष्ठित होना एक प्रक्रिया है जिसमे अनकों रूपों और प्रयोगों में कुछ छाँट लिए जाते है, शेष छोड़ दिए जाते है…किन्तु जो छोड़ दिए जाते है वो सदा नष्ट नहीं हों जाते वरन बोलियों में बने रहते हैं.आगे चलकर जब लोग बोलियों का अध्ययन करते है तब उन्हें पुराने कोशों,व्याकरणों और लिखित साहित्य में ना पाकर कल्पना करते है कि परिनिष्ठित रूपों के ये अपभ्रंश रूप है जो अशिक्षित लोगों की भाषा में प्रचिलित हों गए हैं”. “ये मारा” उसने लगभग मुझे गले लगाते हुए हवा में मुट्ठियाँ भांजी. मैंने किताब वापस रखते हुए कहा “जानते हो सम्पादक का कॉलम मैंने देखा था. मुझे उसी वक़्त कुछ शंका हुई थी. आजकल तो अखबार में ‘मार्क्सवादी’-  विरोध का जलसा चल रहा है. मुझे लगता है दिसंबर से कोई जख्म  जाग  रहा है. पचास-साठ के दशक में जो बहसे हुई थीं उसकी तलछट सम्पादक ढो रहे  हैं . जनता को भीड़ कहना , वो क्या है मुक्तिबोध की लाइनें…’डार्क मासेज़ ये मॉब हैं.’ है ना. और कलाकार की स्वतंत्रता  और अभिव्यक्ति की इमानदारी, लेखक-सांस्कृतिक संगठनों को तानाशाह बताना , सृजनात्मक लेखन की राह में रोड़ा डालने वाला कहना आदि-आदि. अब ये केवल संयोग नहीं कि तब भी वही खेमा ये सब कह रहा था आज भी वही खेमा ऐसा कह रहा है. कारण तो स्पष्ट है मित्र . मार्क्सवाद की दुनिया भर में जो वापसी हुई है , कुछ लोगों की सत्ता को डरा रही है . सता रही है. अब अगर ऐसा है तो मार्क्सवाद तो जवाब देगा. जनता जबाव देगी. कई बार जबाव सुनकर लोग कहते हैं कि वही पुरानी बात कह रहे हो. पर जानते हो ऐसे लोगों को हॉब्सबाम क्या जबाव देते थे….कहते थे कि साहेब जब लौट-लौट कर वही सवाल कीजियेगा तो जवाब भी तो वही मिलेगा.” हमदोनो ठठाकर हंस पड़े. परितोष ने कहा “ वो मुक्तिबोध की पंक्तियाँ ,जो तुम्हारी फेवरिट हैं , पढने को मन कर रहा है और ऊँची आवाज़ में पढने लगा –

“सब चुप, साहित्यिक चुप और कविजन निर्वाक्

चिन्तक, शिल्पकार, नर्तक चुप हैं

उनके ख़याल से यह सब गप है

मात्र किंवदन्ती।

रक्तपायी वर्ग से नाभिनाल-बद्ध ये सब लोग

नपुंसक भोग-शिरा-जालों में उलझे।

प्रश्न की उथली-सी पहचान

राह से अनजान

वाक् रुदन्ती।

चढ़ गया उर पर कहीं कोई निर्दयी,…

भव्याकार भवनों के विवरों में छिप गये

समाचारपत्रों के पतियों के मुख स्थल।

गढ़े जाते संवाद,

गढ़ी जाती समीक्षा,

गढ़ी जाती टिप्पणी जन-मन-उर-शूल ।

बौद्धिक वर्ग है क्रीतदास,

किराये के विचारों का उद्भास।

बड़े-बड़े चेहरों पर स्याहियाँ पुत गयीं।

नपुंसक श्रद्धा

सड़क के नीचे की गटर में छिप गयी…

धुएँ के ज़हरीले मेघों के नीचे ही हर बार

द्रुत निज-विश्लेष-गतियाँ,

एक स्प्लिट  सेकेण्ड में शत साक्षात्कार।

टूटते हैं धोखों से भरे हुए सपने।

रक्त में बहती हैं शान की किरनें

विश्व की मूर्ति में आत्मा ही ढल गयी.”

और फिर मैंने पढ़ा “कविता में कहने की आदत नहीं, पर कह दूँ

वर्तमान समाज में चल नहीं सकता।

पूँजी से जुड़ा हुआ हृदय बदल नहीं सकता,

स्वातन्त्र्य व्यक्ति का वादी

छल नहीं सकता मुक्ति के मन को,

जन को।“

मेस का टाइम हो चला था. मैंने उससे कहा आज रात यहीं रूक जाओ. उसने इनकार कर दिया. “ नहीं यार , वापस जाऊँगा . कल सुबह ही कबीर कलामंच के साथियों की रिहाई के अभियान को लेकर एक प्रदर्शन है. समय मिले तो सुबह तुम भी आ जाना. कॉफ़ी हॉउस के पास सुबह नौ बजे.” थोडा रुक कर सर को झटक कर बड़े दृढ स्वर में कहता गया . “फासीवादी उभार है. लड़ने के सिवा चारा नहीं.” फिर एकाएक मुस्कुराते हुए बोला-“ जानते हो जब से मैं ने एक  शीर्षक ‘नीर और नाले’ देखा है एक गीत बेइन्तिहाँ याद आ रहा है- ओ दुनिया के रखवाले! सुन दर्द भरे मेरे नाले….” और मैंने कहा “रखवाला कौन है , पता है !” और दोनों ने एक साथ कहा “ यह भी कोई पूछने की बात है कि दुनिया का रखवाला , ‘आतंक’ के विरुद्ध युद्ध छेड़नेवाला , कौन है ! और फिर ठठा कर हंस पड़े.

मार्तंड प्रगल्भ

मार्तंड प्रगल्भ

मार्तंड प्रगल्भ जे.एन.यू. के भारतीय भाषा केंद्र में पी.एच.डी. के लिए शोधरत  हैं। फिलहाल लिडेन (नीदरलैण्ड) में अध्ययन-प्रवास कर रहे हैं। उनसे mpragalbha1@gmail.com पर संपर्क संभव है।

 

 

नीर और क्षीर: आशुतोष कुमार

(प्रभाष  जोशी विचारों से  वामपंथी न थे . लेकिन उन्होंने जनसत्ता के जरिये बौद्धिक और नैतिक साहस को पत्रकारिता के बुनियादी मूल्य के रूप में स्थापित किया . असहमति के साथ संवाद का वातावरण निर्मित किया . यही वज़हें थीं कि जनसत्ता सती -समर्थन के अग्निकुंड में गिर कर भी जीवित रह गया . 

इधर मौजूदा जनसत्ता -सम्पादक ने वामपंथी लेखकों और संगठनों के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है . अखबार के अलावा सामाजिक मीडिया में भी वे वामपक्ष के खिलाफ तर्क -प्रमाण -हीन विद्वेषपूर्ण टिप्पणियाँ लिख -लिखवा रहे हैं . सामाजिक मीडिया में बहस का अवकाश रहता है , इसलिए वहाँ माकूल जवाब मिल जाता है . लेकिन अखबार उनकी मज़बूत जागीर है . वहाँ  वे नाम ले कर हमारे खिलाफ अखबार के आधे पेज का ‘अनंतर’  लिखते हैं , और लगातार अपनी जयजयकार कराते लेख लिखवाते -छापते जाते हैं . 

हमने प्रत्युत्तर उसी हफ्ते भेज दिया था. देर हो गयी है , कह कर अगले हफ्ते छापने का आश्वासन भी हमें मिला . फिर  शब्द- सीमा का हवाला दे कर कहा गया कि लेख वगैर ‘काटछाँट’ के नहीं छप सकता . जनसत्ता बहस का मंच बना रहे , यही सोच कर हमने शब्दसीमा की शर्त भी मंजूर कर ली . अपने लेख को  प्रस्तावित शब्द -सीमा के दायरे में भी ले आये . हमारा आग्रह केवल यह था कि हमारे नाम से  हमारे द्वारा सही किया गया प्रारुप ही छपेगा . लेकिन संपादक महोदय हमारी ‘उम्मीद’ से बढ़ कर ‘कायर’ निकले .वे  खाप – हत्याओं की वकालत करने वाले और  कम्युनिस्टों पर नरभक्षी होने के इलज़ाम लगाने वाले लेख छाप सकते हैं , लेकिन अपनी तर्कपूर्ण आलोचना का सामना नहीं कर सकते. यह हमारे  उसी लेख का अंतिम प्रारूप है . — आशुतोष कुमार )

By Michele Meister

By Michele Meister

By  आशुतोष कुमार 

बहस दो हर्फों के बीच नहीं, भाषा और संस्कृति के बारे में दो नजरियों के बीच है 

 ’गाली -गलौज’ कोशसिद्ध  है , प्रयोगसिद्ध भी .  मैंने ‘ गाली -गलौच ” लिखा. बहुत से लोग लिखते -बोलते हैं . ओम जी के हिसाब से यह गलत है .शिक्षक ऐसी गलती करें  , यह और भी गलत है . गलती कोई भी बताए ,  आभार मानना चाहिए .  निरंतर सीखते रहना शिक्षक की पेशागत जिम्मेदारी है .

जिम्मेदारी या जिम्मेवारी ? कोश या कोष ?

ओम जी को ‘जिम्मेवारी ‘ पसंद है . फेसबुक पर फरमाते हैं , कोश में तो ‘ज़िम्मेदारी’ ही है. फिर भी , अपने एक सहयोगी का  यह ख़याल उन्हें गौरतलब लगता है कि ‘जिम्मेदारी’ का बोझ घटाना हो तो उसे जिम्मेवारी  कहा जा सकता है .  लेकिन इसी तर्ज़  पर हमारा यह कहना  उन्हें बेमानी लगता है कि गलौच बोलने से ‘गाली- गलौज’ लफ्ज़ की  कड़वाहट कम हो जाती है . कि गलौज से गलाज़त झाँकती है,जबकि गलौच से , हद से हद , गले या गालों की मश्क .   भोजपुरी में गलचउर और हिन्दी में  गलचौरा   इसी अर्थ में प्रचलित हैं.  हो सकता है इनका आपस में कोई सम्बन्ध न हो . लेकिन वे एक दूसरे की याद तो दिलाते ही हैं . सवाल बोलचाल में दाखिल दो  प्रचलित शब्दों में से एक को चुनने का है . चुनाव का मेरा तर्क  अगर गलचउर है तो ओम जी का भी गैर -जिम्मेदाराना. (गैर -जिम्मेवाराना नहीं .)

 हिंदी में , तमाम भाषाओं में ,एक दो नहीं, ढेरों ऐसे शब्द होते हैं  जिनके एक से अधिक उच्चारण / वर्तनियाँ प्रचलित हों .  श्यामसुन्दर दास के प्रसिद्द ‘ हिंदी शब्दसागर’ में एक ही अर्थ में शब्दकोष और  शब्दकोश दोनों मौजूद हैं . भाषा में इतनी लोच जरूरी है .यह भाषाओं के बीच परस्पर आवाजाही का नतीजा भी है ,  पूर्वशर्त भी. आवाजाही ओम जी का चहेता  शब्द है .  क्या यह सही शब्द है ? हिंदी के सर्वमान्य वैयाकरण किशोरीदास वाजपेयी  और उनकी रचना ‘ हिंदी शब्दानुशासन ‘ के अनुसार हरगिज नहीं .  उनके लिए राष्ट्रभाषा हिंदी का शब्द है – आवाजाई . वे मानते हैं कि हिंदी का यह शब्द पूरबी बोलियों से प्रभावित है . लेकिन हिंदी की प्रकृति के अनुरूप है. (शब्दानुशासन  , पृ. 522, सं.-1998.)

आचार्य की रसीद के बावजूद  आवाजाई समाप्तप्राय  है,  आवाजाही चालू. हिंदी के सामाजिक  अध्येता  रविकांत  के मुताबिक  भाषाएँ बदचलनी से ही पनपती हैं . शुद्ध हिंदी के हिमायती सुन लें तो कैसा हड़कंप मचे ! हड़कंप ? या  ’भड़कंप’ ? वाजपेयी  जी का शब्द  ’ भड़कंप ‘है . (वही , पृ. 02). आज  सभी  हड़कंप लिखते हैं .  ‘ बदचलनी ‘  चलन बदलने का निमित्त है. समय के साथ  जो चले गा , वही  बचे गा.  चले गा ? या चलेगा ? ‘शब्दानुशासन’ में अधिकतर पहला रूप है . कहीं कहीं दूसरा भी है . क्या मैं किशोरीदास वाजपेयी पर गलत हिंदी लिखने का इल्जाम लगा रहा हूं ? उनका अपमान कर रहा हूँ ?

मैं ने कहा था – अज्ञेय ने भी गाली -गलौच लिखा है . फेसबुक पर मौजूद हिंदीप्रेमी मित्रों ने  मूर्धन्य लेखकों की रचनाओं से ‘गाली -गलौच ‘ के ढेरों उदाहरण पेश कर दिए . आप ने पुस्तकालय की तलाशी ली और संतोष की गहरी प्रसन्न सांस लेते हुए घोषित किया – सब की सब  प्रूफ की गलतियाँ हैं . लेखकों के जीवित रहते छपे  संस्करणों में ‘गलौज’ लिखा  है .

 शोध के लिए किताबों की धूल झाड़ना जरूरी है.     लेकिन अक्ल की धूल झाड़ लेना पहले जरूरी है .  मान भी लें कि बाद की तमाम किताबों के   ढेर सारे संस्करणों में गलौच का आना महज़ प्रूफ की गलती है . लेकिन  सारे के सारे प्रूफ-रीडर एक ही गलती क्यों  करते  हैं? कोई असावधान प्रूफ-रीडर गलौझ या गलौछ क्यों नहीं लिखता ? क्योंकि कोशकारों के अनजाने – अनचाहे गलौच  अपनी जगह बना चुका है .

बेशक  भाषा के मामले में  लोच  की एक लय  होती ही है . बदचलनी की  भी  नैतिकता होती  है . अंग्रेज़ी में इसे  ’पागलपन में छुपी  पद्धति’ कहते हैं .भाषाएँ नयी ‘चाल’ में ढलती हैं .लेकिन  चरित्र और चेहरा उस तरह  नहीं बदलता.  व्याकरण शब्दानुशासन है . अनुशासन शासन नहीं है. अनुसरण भी नहीं है . भाषा के चरित्र और चेहरे की शिनाख्त है .  अंतर्निहित लय की पहचान है . उस के स्व-छंद की खोज है . इसी अर्थ में वह स्वच्छंद भी है , अनुशासित भी. चाल , चरित्र , चेहरा , छंद और लय -इन्ही तत्वों से  भाषा की ‘प्रकृति’ पहचानी जाती है .वैयाकरण  का काम है , भाषा की प्रकृति की पहचान कर भाषा के नीर -क्षीर विवेक को निरंतर जगाये रखना .

 हिंदी की प्रकृति को परिभाषित करनेवाली एक विशेषता यह है कि वह  ’ हिंदी  भाषा -संघ ‘ में शामिल  है . ‘हिन्दी भाषा- संघ’ आचार्य किशोरीदास वाजपेयी की सुविचारित  अवधारणा है. एक भाषा के मातहत अनेक बोलियों का परिवार  नहीं , ‘बराबरी’ पर आधारित  संघ .   ‘संघ’ की सभी  भाषाओं में शब्दों, मुहावरों, भावों , विचारों और संस्कारों की  निरंतर परस्पर आवाजाही  रही है .  लेकिन  इस तरह , कि भाषा विशेष की   प्राकृतिक विशेषताएं प्रभावित न हों .   इन्ही  भाषाओं ने   कुरु जनपद की ‘खड़ी बोली ‘ को  छान -फटक,  घुला -मिला , सजा -संवार  व्यापक जनभाषा का  रूप दिया.  यों ही नहीं  मुहम्मद हुसैन ‘आज़ाद ‘ने उर्दू अदब के बेहद मकबूल इतिहास  ’आबे हयात ‘ की शुरुआत इस वाक्य से की  –”यह बात तो सभी जानते हैं कि उर्दू भाषा का उद्गम ब्रजभाषा है .!” जानते तो लोग यह हैं कि उर्दू / हिन्दी की आधार बोली ब्रजभाषा नहीं .दिल्ली -मेरठ  की बोली है . फिर भी ‘आज़ाद’  ब्रजभाषा को  हिन्दी / उर्दू की गंगा की  गंगोत्री के रूप में रेखांकित करते हैं .   जबकि  जनसत्ता – संपादक को डर है कि  बोलियों के  बेरोकटोक हस्तक्षेप से  हिंदी की  स्वच्छ नदी  गंदे  ’नाले ‘ में बदल जायेगी . कहते हैं -’पंजाबी में कीचड़ को चीकड़ , मतलब को मतबल , निबंध को प्रस्ताव कहते हैं . क्या हम इन्हें भी अपना लें ?’  न अपनाइए . चाह कर भी अपना न सकेंगे . चीकड़ ,  मतबल , अमदी , अमदुर , चहुंपना आदि  भोजपुरी में अनंत काल से प्रचलित हैं .  लेकिन हिंदी  की प्रकृति के अनुरूप नहीं हैं. सो हिंदी के न हो सके . ध्वनि-व्यतिक्रम हिंदी की विशेषता नहीं है .  लोकाभिमुखता , सरलता और मुख -सुख है . आए कहीं से भी  लेकिन चले वे ही  हैं , जो यहाँ के लोगों की उच्चारण- शैली में  ढल गए . कुछ दिन  पहले मेरे ही अदर्शनीय मुँह से  पंजाबी का  ’ हरमनप्यारा ‘ लफ्ज़ सुन कर पाव भर आपका खून बढ़ गया था  .  ’आकर्षण’ के लिए पंजाबी में शब्द है -खींच !खींच में अधिक खींच है या आकर्षण में ? पंजाबी ने हिंदी -संघ की भाषाओं के साथ अधिक करीबी रिश्ता बनाए रखा , इसलिए आज उसके  पास अधिक रसीले – सुरीले शब्द  हैं. हम पहले संस्कृत और अरबी -फारसी और अब अंग्रेज़ी का मुँह ज़्यादा जोहते रहे , सो जोहड़  में पड़े हैं .

 ’गलौच ‘के बारे में एक कयास यह है कि यह पंजाबी से आया  है . पंजाबी में लोग  गलोच  लिखते- बोलते हैं .  हिंदी ने गलोच को अपने हिसाब से ढाल कर चुपचाप  गलौच बना लिया . यानी हिंदी पड़ोसी  भाषाओं की छूत से  नाले में न बदल जायेगी .   आप ‘शुद्धिवादी’  न हों , लेकिन  ’ नाला ‘  खुद एक प्रकार के पवित्रतावादी नज़रिए की ओर इशारा करता है . नाला मतलब अपवित्रता , गन्दगी और  धर्म-भ्रष्टता . भाषा की  पवित्रतावादी दृष्टि हिंदी के ऊपर सांस्कृतिक या भाषाई राष्ट्रवाद के आरोप लगाने वालों का हौसला बढ़ाती है . इसके दीगर खतरे भी हैं .

जनसत्ता ने  मेरे एक  लेख में आये ”कैननाइजेशन ‘ ‘ शब्द को  बदल कर ‘प्रतिमानीकरण ‘ कर दिया  था . इस तरह एक परिचित परिभाषित शब्द की हिंदी तो कर दी गयी , लेकिन इस हिंदी  को समझने के लिए  पहले अंग्रेज़ी शब्द जानना जरूरी है , यह न सोचा गया.  हिंदी का अंग्रेज़ीकरण जितना बुरा है , उतना ही संस्कृतीकरण या अरबी-फारसीकरण. ये सारे ‘करण’  सत्ताओं और स्वार्थों के खेल हैं.  लेकिन भाषा की प्रकृति को कृत्रिम रूप से बदलने की असली प्रयोगशाला शब्द नहीं , वाक्य है.  औपनिवेशिक प्रभाव के चलते अंग्रेज़ी वाक्यविन्यास , मुहावरे , अंदाज़ और आवाज़ ने हिंदी को कुछ वैसा ही  बना दिया है, जैसा   मैकाले ने अंग्रेज़ी शिक्षा के बल पर हिंदुस्तानियों को बनाना चाहा था . ऊपर से भारतीय, लेकिन भीतर से अँगरेज़ .

आपने भी लिखा है –”… (अमुक ) कुमार यह बोले :” मुझे मालूम था कि बात प्रूफ पर आयेगी .”

यह हिन्दी का वाक्य- विन्यास है या  अंग्रेज़ी का ?

 आशुतोष कुमार

आशुतोष कुमार

आशुतोष कुमार.  चर्चित युवा आलोचक.  हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफ़ेसर. जन संस्कृति मंच से जुड़ाव. इनसे  ashuvandana@gmail.com  पर संपर्क संभव है।

मुक्तिबोध: ‘अंधेरे’ के उस महाकवि से बहुत कुछ सीखना बाकी है: रामजी राय

(रचनाओं से अधिक लेखकों की चर्चा करने वाला समाज सही अर्थों में साहित्यिक समाज नहीं कहा जा सकता . लेखक के प्रभा -मंडल का रचनाओं के प्रकाश – वृत्त से अधिक चमकीला हो जाना पढने वाले समाज के बरक्स पूजने वाले समाज की ओर संकेत करता है . अभी शताब्दियों के बहाने अज्ञेय को उनकी तेजी से बढ़ती हुयी अप्रासंगिकता से बचाने की खूब कोशिशें हुईं . लेकिन उनकी कौन सी रचना नए सिरे से उभर कर सामने आयी है ? किन रचनाओं के अलक्षित किन्तु कालजयी महत्व के बारे में हिंदी पाठकों की जानकारी में इज़ाफा हुआ है ? कौन -सी रचनाओं को हिंदी के नए पाठक -समाज की स्वीकृति और सराहना मिली है ?रचना से अधिक व्यक्ति की चर्चा चर्चाकारों के पूजापाठी संस्कारों के अलावा लेखक की रचनात्मक विरासत की कमजोरी की तरफ भी इशारा करता है.

अगले साल मुक्तिबोध की मृत्य के पचास साल पूरे हो रहे हैं . ”अँधेरे में ” के प्रकाशन के भी. इस आधी सदी में हमने अपने लोकतंत्र में इस कविता को क्रमशः उतरते देखा है . जैसे कविता में दर्ज दुस्स्वप्न को फलीभूत होते हुए . इस कविता को फिर से पढ़ने , समझने और इस पर चर्चा करने का यह मुनासिब वक्त है . जरूर चर्चा के दौरान असहमति , आलोचना और विरोध के स्वर भी मुखर हों , क्यंकि बहसों के झंझावात मन ही विचार के फूल खिलते हैं . आशुतोष कुमार )

मुक्तिबोध- हरिपाल जी की कूची से

मुक्तिबोध- हरिपाल जी की कूची से

By रामजी राय

मुक्तिबोध की 1943-44 के बाद की सारी कविताओं  का केंद्र है ‘‘सत्य से सत्ता के युद्ध का रंग’’, खासकर आजादी के बाद की कविताओं का तो जैसे यह एकमात्र केंद्रीय तत्व बन गया। मुक्तिबोध के यहां इसी को आत्मसात और अभिव्यक्त करने का नाम है ‘नई कविता का आत्मसंघर्ष’। यथार्थ में इस संघर्ष के मार्ग की अड़चनें और रुकावटें भी होती हैं। और यथार्थ में वर्ग हैं और वर्गसंघर्ष है सो, कोई भी आत्मसंघर्ष अनिवार्यतः इस वर्ग संघर्ष का अंग है। मुक्तिबोध के यहां साधना नहीं, संघर्ष ही केंद्रीय पद है। वर्गसंघर्ष, आत्मसंघर्ष और चेतना के संघर्ष के त्रिकोणात्मक रूप में।  वैसे ही जैसे “हमारा जीवन त्रिकोणात्मक है- बाह्य जगत अर्थात वर्ग जगत; बाह्य की क्रियाओं और रूपों को आत्मसात करता और उसके विरुद्ध या अनुकूल प्रतिक्रियाएं करता बाल्यकाल से निर्मित होता आ रहा हमारा  अंतर्जीवन;  इन दोनों भुजाओं की आधार-रेखा हमारी अपनी चेतना कि जो चेतना इन दो भुजाओं के बिना अपना स्वरूप और आकार ही स्थापित नहीं कर सकती।”  कलात्मक संघर्ष यही है – तत्व के लिए संघर्ष, दृष्टि विकास का संघर्ष और अभिव्यक्ति को सक्षम बनाने का  संघर्ष। बेशक सापेक्षिक रूप से स्वायत्त अपने गति-नियमों के साथ। इसकी विशद व्याख्या मुक्तिबोध ने  ‘कला का तीसरा क्षण’ नामक निबंध में व अन्यत्र भी  की है।

जितना ही तीव्र है द्वंद्व क्रियाओं -घटनाओं का

बाहरी दुनिया में

उतनी ही तेजी से

भीतरी दुनिया में चलता है द्वंद्व कि

फिक्र से फिक्र लगी हुई है। (अंधेरे में)

भीतर का दूसरा हिस्सा भी

चुप नहीं है

भीतर का दूसरा पक्ष भी

चुप नहीं है

फैलाता आग भरे हमले की धूम

तड़ातड़ टकराने लगी हैं

विचारों की लाठियां

हवाओं में घूम!

खून रंगे माथों को चूम

खयालों की मुंडेर से जोरदार

पत्थरों की खूब बौछार

भयानक! दंगा है भीतरी हिस्सों में तेज,

फेंककर मारी जातीं कुर्सियां

माथों को तोड़ती है मेज

विधान की अंतः सभाओं में

वारदातें सनसनीखेज!!… (चंबल की घाटियां)

  ‘‘साहित्य जीवन की पुनर्रचना होती है’’ और इस पुनर्रचना में रचनाकार के संवेदनात्मक उद्देश्य की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। मुक्तिबोध ने इस संवेदनात्मक उद्देश्य के महत्व और उसे पहचाने  जाने  पर बहुत बल दिया है।  दृष्टि विकास का संघर्ष मुक्तिबोध के आत्म संघर्ष का एक प्रमुख तत्व रहा है। ज्ञान के क्षेत्र में अद्यतन खोजों का आलोचनात्मक नजरिए से विश्लेषण करते हुए अपने सिद्धांत को विकसित और अद्यतन बनाने का संघर्ष मुक्तिबोध के संवेदनात्मक उद्देश्य का अंग है। डा. रामविलास शर्मा का मुक्तिबोध से टकराव खासकर इसी एक बात पर सबसे अधिक है। वे इसे मार्क्सवाद को अद्यतन बनाया जाना नहीं मानते हैं इसीलिए उन्हें रहस्यवाद, अस्तित्ववाद और फ्रायड आदि के साथ मार्क्सवाद का समन्वय दिखता है। इस पर यहां चर्चा की गुंजाइश नहीं है। इस विषय में स्वतंत्र रूप से विचार किया जाना चाहिए। मुक्तिबोध के संवेदनात्मक उद्देश्य से इस या उस वजह से अलगाव में पड़ जाना भाष्यकारों की मूल समस्या रही है। सच-सच बातों को वह सीधे-सीधे कहने को तड़प गया। अपने कहे जानेवालों ने  उस समय भी उनकी अनसुनी की और आज भी अनसुनी छोड़  देना चाहते हैं। आखिर क्यों?

 क्योंकि – ‘जगत-समीक्षा की हुई उसकी, विवेक-विक्षोभ महान उसका, अंधेरे में रहकर भी द्यृति-आकृति-सा भविष्य का नक्शा दिया हुआ उसका’, वे सह नहीं सकते थे। क्योंकि ‘‘वे बहुत असुविधकारक थे, वे मूल्य सत्य थे इस जग के परिवर्तन के, उनसे होता पट-परिवर्तन, यवनिका-पतन मन में जग में’’। ये मूल्य-सत्य सहानुभूतिकर्ता बनने भर की नहीं बल्कि अपने क्रियागत परिणति के लिए  कम से कम सक्रिय कार्यकर्ता बनने की मांग करते हैं।

उसके अपने कहे जानेवाले विभिन्न कारणों से उस कैंड़े के थे नहीं, जिस कैंड़े का वह था कि कह पाते

‘‘नहीं, नहीं, उसको मैं छोड़ नहीं सकूंगा

सहना पड़े जो मुझे भले ही।’’

अंधेरा उसके लिए कविता की टेकनीक नहीं थी, न ही वह उसकी गुप्त पीड़ाओं, चिंताओं या कि उसकी आत्मग्रस्तता से उपजता था (उसकी कविता में मौजूद अंधेरे को उसके प्रशंसकों, आलोचकों ने इन्हीं रूपों में देखा हैं ) वह यथार्थ था, उसके समय और समाज का अंधकार था, जिसे गश खाकर गिरते होरी की आंखों में छाते हुए प्रेमचंद ने देखा था, जिसे निराला ने देखा था –

‘‘…उगलता गगन घन अंधकार

खो रहा दिशा का ज्ञान

स्तब्ध है पवन चार’’

या कि ‘‘गहन है, यह अंधकारा’’ और जिसे मुक्तिबोध ने भी देखा

‘‘चिंता हो गई, कविता पढ़ते ही

उसमें से अंधेरे का भभकारा उमड़ा’’।

चिंता इसलिए भी कि ऐसा नहीं होना था। आजादी मिलने के साथ तो इस अंधेरे को खत्म होते जाना था। लेकिन यह और भी बढ़ता जा रहा है। इस आजादी के साम्राज्यवाद से समझौतापरस्ती की असलियत को दूसरे कई अन्य लोगों ने भी देखा, इसे कहा और लिखा भी। शुरुआती दौर में कम्युनिस्ट पार्टी ने तो इस आजादी को ‘झूठी आजादी’ कहा। प्रगतिशील कवियों ने इस पर कविताएं भी लिखीं। लेकिन  विकसित हो रहे नए यथार्थ की गहनता उन कविताओं में न थी।

सब कुछ के बावजूद आजादी स्वयं में एक नया यथार्थ थी। इसके आकर्षण थे, व्यामोह, झांसे और कुटिलताएं थीं। इस ऐयारी चांदनी के अंदर लोगों की तकलीफें बढ़ रही थीं, गरीब, किसान, मजदूर जगह-जगह इसके खिलाफ आंदोलनों, हड़तालों आदि में उतर रहे थे, सरकार उन्हें पुलिस-दमन के जरिए दबा रही थी लेकिन खुद कम्युनिस्ट पार्टी धीरे-धीरे इस सबसे किनारा कसने लगी थी। पहले सैद्धांतिक स्तर पर फिर व्यवहार में भी। तीसरी पार्टी कांग्रेस के प्रस्ताव में कहा गया: ‘शांति के लिए भारत का संघर्ष घनिष्ठ रूप में भारत की पूर्ण और निर्बंध राष्ट्रीय स्वाधीनता के प्रश्न के साथ जुड़ा हुआ है। इस स्वाधीनता का अर्थ है पहले अंग्रेजों के नियंत्रण से मुक्ति और सामंतवाद को खत्म करना।’ पार्टी की तीसरी कांग्रेस दिसंबर 53-जनवरी 54 में हुई। इसमें गौर करने लायक है प्रस्ताव का पहला हिस्सा। इसमें शासक वर्ग से कम्युनिस्ट पार्टी के समझौते की गंध मिल रही थी, बजरिए विदेश नीति। नेहरू की ‘प्रगतिशील विदेश नीति’ पूर्ण और निर्बंध राष्ट्रीय स्वाधीनता की प्रमुख आधार बन गई । किसी भी देश की विदेश नीति गृहनीति का ही विस्तार होती है। इस नाते थोड़ा संदेह करने के लिए भी गृहनीति की जांच-परख कर लेनी चाहिए थी। दूसरे कि  भारत में साम्राज्यवाद था तो लेकिन प्रत्यक्ष तौर पर नहीं। उसका रूप बदल गया था। इसलिए प्रधान अंतर्विरोध भी बदल गया था। इस प्रस्ताव में ‘तथा सामंतवाद को खत्म करना’कहने के जरिए उस प्रधान बन गए अंतर्विरोध को गौण बना देने की गंध भी मौजूद है। बाद  में यह कहा जाने लगा कि ‘भारत की स्वाधीनता और अर्थतंत्र को सुदृढ़ करने का संसाधन है ’सोवियत संघ और चीन से भारत के संबंध। (चौथी  कांग्रेस, 1956)। साफ-साफ कहा गया कि ‘पूंजीपति वर्ग साम्राज्यवाद का विरोध करता है, राष्ट्रीय अर्थतंत्र पर उसकी पकड़ को ढीला करने की कोशिश करता है लेकिन इसके साथ ही विदेशी पूंजी के और अधिक आयात के लिए सुविधाएं देता है।’रामविलास शर्मा कहते हैं कि यह स्थिति का सही वर्णन है और टिप्पणी करते हैं ‘साम्राज्यवाद से देशी पूंजी के अंतर्विरोध बने हुए हैं, साथ ही विदेशी पूंजी के और अधिक आयात के लिए सुविधाएं भी वह देता है।’लेकिन नतीजा क्या निकला? शासक वर्ग से कम्युनिस्ट पार्टी का साझा। बाद की कथा सबको मालूम है – ‘एक शम्मा थी दलीले शहर सो वह भी खामोश’ – ‘काला समुंदर ही लहराया, लहराया!’ जिसके कि होने में गहन अंशदान तुम्हारा।

यहां एक बात नोट कर लेनी चाहिए कि इसके साथ कम्युनिस्ट पार्टी के अंदर सैद्धांतिक अंतर्विरोध भी बढ़ने लगे और आंतरिक बहसें तेज हो गईं। साथ ही यह भी कि सैद्धांतिक धरातल पर मुक्तिबोध पर भी इसका प्रभाव दिखता है, मुख्यतः विदेश नीति वाले मसले पर। जिसका हवाला मुक्तिबोध संबंधी अपने पुनर्मूल्यांकन वाले लेख में डा. शर्मा ठीक ही देते हैं, लेकिन यह प्रभाव केवल व्यावहारिक धरातल तक ही सीमित है, जीवनानुभवों, संवेदनात्मक अनुभवों के धरातल पर नहीं। वहां स्थिति इसके ठीक उलट है। इस पर चर्चा उचित जगह पर आगे होगी। कुल मिलाकर यह 1947 के बाद का , नया यथार्थ था और इसकी अनिवार्य मांग हो गई, ‘इसका तू शोध कर, इसका तू भाष्य कर।’

‘काली उन लहरों को पकड़कर अंजलि में

जब-जब मैं देखना चाहता हूं-

क्या हैं वे? कहां से आई हैं?

किस तरह निकली हैं

उद्गम क्या, स्रोत क्या

उनका इतिहास क्या

काले समुंदर की व्याख्या क्या, भाष्य क्या’

और मुक्तिबोध इस नए यथार्थ का, इस बाहर-भीतर पसर रहे अंधेरे का उसकी संपूर्णता में निरीक्षण-आत्मनिरीक्षण, उसके मूल कारणों, उससे पैदा हो रहे प्रश्नों, प्रश्नों के कारणों को जानने और उसकी एक-एक लहर का चित्रण करने के काम में दम साधे, पूरे मनोयोग, धीरज और हां, पूरी जिज्ञासा, कहिए जिज्ञासा का पूरी तरह शिकार होकर उतर पड़ते हैं। जिज्ञासा जो ‘बाल्यकाल, नवयौवन और तारुण्य के विभिन्न उषःकालों में हृदय का छोर खींचती हुई, आकर्षण के सुदूर ध्रुव-बिंदुओं से हमें जोड़ देती है।… ‘देखने’ की इच्छा, ‘जानने’ की इच्छा, ‘रहस्य’ की उलझी हुई बातों को सुलझाने की इच्छा, कितनी मनोहर, कितनी दुर्निवार और अदम्य हो सकती है, यह उसी से जाना जा सकता है जो जिज्ञासा का शिकार है। ’सुदूर नेब्युला से लेकर आभ्यांतर निराले लोक तक, अति निकट वर्तमान से लेकर सुदूर अतीत तक, अपने देश से लेकर देश-देशांतर तक की इस साहस और जोखिम भरी जिज्ञासा-यात्रा में ‘सहसा’, ‘अचानक’, ‘यकायक’, ‘अकस्मात’ बहुत कुछ दिखता, लुप्त होता, मिलता, खोता, आता, जाता रहता है। भय और पुलक की चिहुंकन और सिहरन, खतरनाक अघट घटनाओं की थरथरी आदि बहुत कुछ अनुभव के हिस्से बनते रहते हैं। ‘साहित्य और जिज्ञासा’ नाम से उनका एक छोटा-सा लेकिन बहुत बेहतरीन निबंध है। अपने इस निबंध में मुक्तिबोध लिखते हैं, ‘उम्र में बढ़कर, जब हमें ‘ओपीनियन’ बनाने की आदत पड़ जाती है, जब हम बुद्धिमान और बुद्धिवादी बन जाते हैं तब हमारे दिमाग की बाल-कमानी यानी जिज्ञासा पुरानी और घटिया हो जाती है। तब इसे किसी बालक को जरूरत पड़ती है, जो यह टाइमपीस तोड़कर देखे कि उसकी भीतरी बनावट क्या है।

 ‘लेकिन पुराने बालकों में ऐसे लोग भी निकलते हैं, जिनमें जिज्ञासा की तीव्र दृष्टि और आग्रहशीलता के साथ उस ओर यौवनसुलभ श्रम करने की प्रवृत्ति और खोज के आधार पर वृद्धसुलभ अनुभवपूर्ण मत बनाने की शक्ति रहती है। साहित्य इस जिज्ञासा का ऋणि है।’ और हिंदी साहित्य मुक्तिबोध और नागार्जुन की जिज्ञासा का ऋणि रहेगा। मुक्तिबोध की कविताओं में स्वप्न सौंदर्य पर तो कई एक का ध्यान गया है, बल्कि जरूरत से ज्यादा ही और कुछ ने तो इसे उनकी वृत्ति ही मान लिया – ‘स्वप्न उनकी वृत्ति है, वे चीजों को स्वप्न में परिवर्तित किए बगैर समझ ही नहीं पाते’ – और इसके लिए उनकी काफी लानत-मलामत भी की है, लेकिन मुक्तिबोध की इस जिज्ञासा-वृत्ति और इस नाते उनके काव्य सौंदर्य के एक लगभग अछूते पक्ष की तरफ अभी लोगों का ध्यान नहीं गया है।

मुक्तिबोध ने साहित्य और जिज्ञासा नामक अपने इस निबंध में एक और महत्वपूर्ण बात कही है – ‘कहा जाता है कि साहित्य हृदय की भावनाओं से उत्पन्न होता है। इसमें यह और जोड़ देना चाहिए कि भावना जिज्ञासा की पैठ के बिना, उसके द्वारा की जानेवाली तटस्थ तथा तीव्र खोज के, ऊंचा साहित्य उत्पन्न नहीं कर सकती। ध्यान में रखने की बात यह है कि भावना, जिसके प्रति वह है उसके प्रति आकर्षण या विरोध के (बिना) काम नहीं कर सकती। अर्थात, वह पक्ष या विपक्ष में ही काम कर सकती है। किंतु जिज्ञासा के द्वारा की गई यथार्थवादी खोज से प्राप्त ज्ञान के आधार पर, और उसकी सहायता से, चलनेवाली भावना अलग होती है। वह एक चरित्र या स्थिति के विश्लेषण के टुकड़ों को फिर से जोड़कर समन्वय और सामान्यीकरण करती है। किंतु वह इतना करके ही चुप नहीं रहती, चरित्र के विकास के मूल कारणों की खोज करती है, प्रश्नों के कारणों का अनुसंधान और उनका चित्रण करती है। और इस दृष्टि से वह चित्रण और स्थिति दोनों के प्रति अधिक न्याय करती है।’

नए यथार्थ के सर्वेक्षण का यह काम उनकी कविताओं में इस रूप में प्रस्तुत है मानो एक फील्ड वर्क हो, जमीनी सर्वेक्षण –

‘ओ नागात्मन,

संक्रमण-काल में धीर धरो

ईमान न जाने दो!!

तुम भटक चलो

इन अंधकार मैदानों में सर-सर करते…

खोदो, जड़ मिट्टी को खोदो!

ओ भूगर्भशास्त्री,

भीतर का बाहर का

व्यापक सर्वेक्षण कर डालो।’

और सर्वेक्षण इसलिए कि यह एक सामाजिक दायित्व है, जिसे वहन करना है –

‘वे आते होंगे लोग

जिन्हें तुम दोगे

देना ही होगा, पूरा हिसाब

अपना, सबका, मन का, जन का।’

इसीलिए मुक्तिबोध की कविताएं एक ही साथ बाहर और भीतर दोनों तरफ चलती हैं। इस दायित्वबोध के साथ चरित्र, चरित्रों की बाहरी-भीतरी स्थितियां, चरित्रों का विकास, विकास के मूल कारण, प्रश्न, प्रश्नों के कारण, लोग, लोगों की गतिविधि, मनोहर वाद-विवाद, संवाद, बहसें, टकराहटें व उलझाव और इनमें से बदलते जगत का चेहरा, अपनी पूरी प्रक्रिया के साथ चित्रित हैं। मुक्तिबोध के यहां काव्य सौंदर्य, काव्यानुभव, काव्याभिव्यक्ति अर्थात सब कुछ एक प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया से अलग रहकर मुक्तिबोध के काव्य सौंदर्य को नहीं समझा जा सकता। लेनिन ने अपनी किताब ‘भौतिकवाद और अनुभवसिद्ध आलोचना’ में एक जगह लिखा है, ‘सत्य एक प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया से अलग सत्य कुछ नहीं है।’

ऊपर से देखने पर मुक्तिबोध का काव्यशिल्प एक जैसा लगता है। लेकिन एक जैसे लगते काव्यशिल्प के अंदर काफी विविधता है। खोज की यह प्रक्रिया इस विविधता का आधार है। एक ही कविता में जिस तरह कई-कई स्थितियां, कथाएं, कथाओं की उपकथाएं, चरित्र, नाटकीय मोड़, संवाद, मनोहर वाद-विवाद, उद्बोधन, आत्मउद्बोधन आदि हैं, उसी अनुरूप एक ही कविता के अंदर कई शिल्प और भाषा के कई स्तर, कई भंगिमाएं हैं। हर कविता सधी हुई हो सो बात नहीं। कई कविताओं में अटकाव है और अभिव्यक्ति उलझी हुई। कुछ कविताओं में ब्यौरे लंबे हैं, कई जगह अनावश्यक भी। ध्यान देने की बात है कि कई कविताएं किसी दूसरी कविता का पूर्वाभ्यास लगती हैं। उदाहरण के लिए ‘एक टीले और एक डाकू की कहानी’ नामक कविता ‘चंबल की घाटियां’ कविता का पूर्वाभ्यास लगती है, तो कई बार एक कविता की कोई पंक्ति दूसरी किसी कविता में अधिक परिमार्जित-विकसित और संक्षिप्त रूप में आती है, तो कई बार एकाध-दो पंक्तियों में आकर अपनी किसी पूर्व स्थिति, पूर्व संदर्भ का बोध कराती लगती है और कई बार तो कुछ भिन्न तरह से आकर पहले की कविता-स्थिति, अनुभव, निष्कर्ष की समीक्षा के उपर टिप्पणी या उसमें संशोधन-परिवर्तन का आभास देती हुई अपनी नई स्थिति को जताती हुई लगती है। ‘अंधेरे में’  का इस दृष्टि से अध्ययन दिलचस्प होगा। कुल मिलाकर ऐसा लगता है मानो कविताएं एक-दूसरे से मिलकर किसी समग्र को अभिव्यक्त कर रही हों या कि एक में मिलकर कोई एक ही कविता बना रही हों। मुक्तिबोध खुद भी कहते थे कि मैं हर रूप में कविता में, कहानियों में एक बात को अभिव्यक्त कर देने के प्रयास में लगा रहता हूं। इसलिए अपनी ही इतनी काट-छांट, इतना संशोधन, इतना लिखना

‘कि फिर भी वह अधूरा था अधूरा…

केवल भावना से काम चलना खूब था मुश्किल

…हमें था चाहिए कुछ वह

कि जो ब्रह्मांड समझे त्रस्त जीवन को

हमें था चाहिए कुछ वह

कि जो गंभीर ज्योतिःशास्त्र रच डाले

नया दिक्काल-थियोरम बन

प्रकट हो भव्य सामान्यीकरण

मन का

कि जो गहरी करे व्याख्या

अनाख्या वास्तविकताओं

जगत की प्रक्रियाओं की

कि पूरा सत्य

जीवन के विविध उलझे प्रसंगों में

सहज ही दौड़ता आए –

स्मरण में आए –

मार्मिक चोट के गंभीर दोहे सा

कि भीतर से सहारा दे

बना दे प्राण लोहे सा।’

‘यही थी भूमिका हम तुम मिले थे जब।’

इस खोज-यात्रा में मुक्तिबोध ने बहुत कुछ देखा। देखा चमचमातों की धाक है, भीड़ है, भड़क्का, है, जमाना उचक्का है। देखा शोषण की अति मात्रा, स्वार्थों की सुख-यात्रा से, आत्मा से जाते हुए अर्थ और मरी हुई सभ्यता को। दार्शनिक दुखों की गिद्ध सभा और उस दार्शनिक आत्मा को भी देखा, स्वर दबा सिसकते जो जब जीवित थी, जन-उत्पीड़न विभ्राट-व्यवस्था के सम्मुख, छाया जीवन जीकर भी, उदर-शिश्न के सुख भोगती रही, आध्यात्मिक गहन प्रश्न के सुख भोगती रही। जीने से पहले ही समस्याओं के हल को मरते हुए देखा। चंबल की घाटी को देश में बदलते और खतरनाक लूटपाट, आग डकैतियां होते देखा। काले समंदर का पश्चिमी किनारे से नाता और जमाने का चेहरा देखा जहां साम्राज्यवादियों की चलती है; उसकी पैसे की संस्कृति, भारतीय आकृति में बंधकर, दिल्ली को वाशिंगटन और लंदन का उपनगर बनाने पर तुली है और भारतीय धनतंत्री, जनतंत्री बुद्धिजीवी स्वेच्छा से उसी का ही कुली है। देखा बड़े प्रेम से बटन होल में फूल लगाकर, अपने मालिक के ये चाकर खद्दरधारी प्यारे मिस्टर जनरल डायर को, उन्हें लीलने आई नारे भरी खचाखच सड़क पर, मंचों पर से फायर-फायर भौंकते। देखा इस महा कंस से भय खाकर आत्मोत्पत्र सत्य, अनुभव बालक को कचरे के ढेरों, कुओं, बावडि़यों, सुनसान रास्तों पर चुपचाप फेंके जाते और देखा उस अनुभव बालक की आक्रोश मुख-गरिमा का सौंदर्य। देखा उपेक्षित काल-पीडि़त सत्य के समुदाय, असंख्य स्त्री-पुरुष-बालक भटकते हैं। किसी की खोज है उनको, किसी नेतृत्व की, जो सिर्फ इंसान होने की हैसियत चाहते हैं, जैसे आसमान, पेड़ या मैदान एक शानऔर हैसियत रखते हैं, वैसे ही और ठीक उसी ठोस और पक्की बुनियाद पर जो अपने लिए इज्जत तलब करते हैं। बराबरी का हक, बराबरी का दावा, नहीं तो मुठभेड़ और धावा। देखा लड़ाइयां और लड़ाइयों के मोर्चे। और इस भयानक अंधेरे में भी देख लिया देश की गहन मृतात्माओं को दल बांध रात में फासिस्टी जुलूस में चलते, जिसमें नेता और धनपति, अखबारपति, बड़े-बड़े श्रीमुख, प्रकांड आलोचक-कवि-साहित्यकार से लेकर तो शहर के कुख्यात डोमी जी उस्ताद तक को शामिल। देखा किसी जनक्रांति के दमन निमित्त मार्शल लाॅ को लगते। और इस सर्वेक्षण की प्रक्रिया में ही मुक्तिबोध विकसित करते हैं अपनी वह काव्य भाषा जो ‘मानो वह गहरे जनसंकट का प्रसंग हो या युग-युग की अनुभव पीड़ा के विस्फोटों के उत्पन्न ज्वलंत पत्थर कोयले के दुर्धर स्फुलिंग हो।’या कि ‘सत्य से सत्ता के युद्ध का रंग’ हो। खासकर आजादी के बाद और उसमें भी 54 से लेकर 64 तक की कविताओं में युद्ध का यह रंग और अधिक गहरा और सुर्ख होता गया।

यह सर्वेक्षण इतना गहन व विस्तृत, इसका चित्रण और अभिव्यक्ति इतनी यथार्थ है कि इसके जरिए थोड़े ही और श्रम से स्वतंत्र भारत के आज तक का सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहास लिखा जा सकता है।

नए भारत की खोज

एक महत्व की बात घटित हुई, इस प्रक्रिया में गुणात्मक अंतर आ गया – नए यथार्थ की यह खोज नए भारत की खोज में बदल गई।

‘प्रतिष्ठित राज्य-संस्कृति के प्रभावी दृश्य

सुंदर सभ्यता के तुंग स्वर्ण-कलश

सब आदर्श

उनके भाष्यकर्ता ज्ञानवान महर्षि

ज्योतिर्विद, गणितशास्त्री, विचारक, कवि

सभी वे याद आते हैं

प्रतापी सूर्य हैं वे सब प्रखर जाज्वल्य

पर, यह क्या

अंधेरे स्याह धब्बे सूर्य के भीतर बहुत विकराल

धब्बों के अंधेरे विवर-तल में से

उभरकर उमड़कर दल बांध

उड़ते आ रहे हैं गिद्ध

पृथ्वी पर झपटते हैं!

निकालेंगे नुकीली चों से आंखें

कि खएंगे हमारी दृष्टियां ही वे!’

अपनी प्राचीन गौरवशाली सभ्यता और संस्कृति की बेहद सटीक व्याख्या और उसके प्रति बेहद ताकतवर और धारदार नजरिया और कितना रोमांचित और सजग करनेवाला।

‘मन में ग्लानि, गहन विरक्ति… भयानक क्षोभ।’

‘मेरी छांह …खड़ी स्तब्ध

उसके गहन चिंताशील नेत्रों में

विदारक क्षोभमय संतप्त जीवन दृश्य क्रमागत तिर रहे से हैं।

जहां भी डालती वह दृष्टि

संवेदन-रुधिर-रेखा-रंगी तस्वीर तिर आती

गगन में, भूमि पर सर्वत्र दिखते हैं

तड़प मरते हुए प्रतिबिंब

जग उठते हुए द्युति-बिंब

दोनों की परस्पर-गुंथन

या उलझाव लहरीला

व उस उलझाव में गहरे

बदलते जगत का चेहरा।’

इस नजर से ‘अंतःकरण का आयतन संक्षिप्त है’ एक बेहद खूबसूरत और महत्व की कविता है। बहरहाल, अब

‘झूठी है संगति

झूठी हैं बुद्धियां

सब आत्मशुद्धियां झूठी…’

जैसे ‘ब्रह्मराक्षस’ कविता के निरंतर शुद्धि-स्नान पर बेलौस टिप्पणी। कवि के सामने एक ही सवाल रह जाता है

‘कि सारे प्रश्न छलमय

और उत्तर और भी छलमय

समस्या एक

अपने सभ्य ग्रामों और नगरों में

सभी मानव सुखी, सुंदर व शोषणमुक्त कब होंगे!’

और मन में केवल एक जिज्ञासा भरी तड़प

‘हमारे देश भारत में

पुरानी हाय में से

किस तरह से आग भभकेगी

उड़ेंगी किस तरह भक से

हमारे वक्ष पर लेटी हुई विकराल चट्टानें

व इस पूरी क्रिया में से

उभरकर भव्य होंगे, कौन मानव गुण!’

और कवि एक सुचिंतित निष्कर्ष पर पहुंचता हुआ हठात निर्णय लेता है, –

‘सुकोमल काल्पनिक तल पर

नहीं है द्वंद्व

का उत्तर

तुम्हारी स्वप्न वीथी कर सकेगी क्या

बिना संहार के सर्जन असंभव है

समन्वय झूठ है

सब सूर्य टूटेंगे व उनके केंद्र फूटेंगे

उड़ेंगे ब्रह्मांड में सर्वत्र

उनके नाश में तुम योग दो।’

कोई हमदर्दी नहीं, पुराने के साथ पूरी तरह एक रैडिकल रॅप्चर, क्रांतिकारी संबंध विच्छेद के बिना नए भारत का स्वप्न नहीं देखा जा सकता। उसकी खोज और स्थापना नहीं की जा सकती। यह हमारे नवजागरण और स्वतंत्रता आंदोलन के मनीषियों-चिंतकों, नेताओं और रवीन्द्रनाथ, जयशंकर प्रसाद आदि जैसे कवि विभूतियों की आलोचना भी है।

फैंटेसी को काव्यरूप के बतौर अपनाना मुक्तिबोध की मजबूरी थी। इस नए यथार्थ के विस्तृत सर्वेक्षण और उस यथार्थ से प्राप्त नए भारत के स्वप्न को – इतने बड़े आख्यान को, उसके इतिहास, भूगोल, संदर्भ और परिप्रेक्ष्य के साथ – संभव समग्रता में संभवतः किसी अन्य काव्य रूप द्वारा अभिव्यक्त भी नहीं किया जा सकता था। इस काव्य रूप के अपने कुछ नुकसान थे। मुक्तिबोध न केवल इसके प्रति सजग थे बल्कि चित्रण की यथार्थता के प्रति भी वे सजग थे, सजग और प्रतिबद्ध। इस प्रक्रिया में अधिकांशतः हुआ यही है कि यथार्थने – युग के, जग के गहरे विक्षोभों ने, नए सौंदर्यानुभवों के कर्ण कर्कश गद्य ने फैंटेसी की जमीन ही नहीं फाड़ी बल्कि उसे इतना झीना बना दिया कि उसमें से यथार्थ हमेशा झलमलाता रहे। बेशक, मुक्तिबोध की कविताएं हमसे अवश्य ही थोड़े धीरज, हार्दिकता, थोड़े समय और श्रम की मांग करती हैं। प्रसंगवश, व्यक्तित्व और मिजाज के स्तर पर मुक्तिबोध के आदर्श जयशंकर प्रसाद नहीं हैं। अगर कोई है तो सबसे आगे बढ़कर कबीर हैं। इसके प्रमाण मुक्तिबोध की कविताओं में भरे पड़े हैं, कहीं ‘उस चोट के गंभीर दोहे सा’ तो कहीं ‘भीतर कोई बैठा है कबीर मर्मी’ तो कहीं

‘भव्य हजारों साल पुराने ओ बूढ़े उस्ताद

तुम्हारी क्रियावन-वेदना क्या कहना

तुम बाजार में खड़े स्वयं जलती मशाल…

ब्रह्म-रंध्र में गूंजेगा फिर द्रोही-अनहद नाद, ओ बुजुर्ग उस्ताद’

आदि कई रूपों में। ‘भविष्यधारा’ कविता में तो कबीर का जिक्र आने के बाद कविता कुछ इस तरह आगे बढ़ती है जैसे कबीर स्वयं मुक्तिबोध ही हों। भक्तिकाल पर एक नई दृष्टिा डालता, रामचंद्र शुक्ल और हजारी प्रसाद द्विवेदी से भिन्न इतिहास दृष्टि से उसकी व्याख्या और कबीर के समकालीन बतानेवाले लेख को सभी जानते हैं। कबीर की तरह ही मुक्तिबोध भाषा से जिस तरह का काम चाहते हैं, ले लेते हैं।

मुक्तिबोध नए भारत की खोज पर आकर रुकते नहीं, इस विवेक-प्रक्रिया की क्रियागत परिणति के लिए और अधिक जाग्रत, और अधिक बेचैनी से भर उठते हैं। ‘अब न समय है, जूझना ही तय है… फजूल है इस वक्त कोसना खुद को। एकदम जरूरी दोस्तों को खोजूं, पाऊं मैं नए-नए सहचर, सकर्मक सत्-चित्-वेदना-भास्वर।’

‘अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने ही होंगे

तोड़ने होंगे ही मठ और गढ़ सब।’

यहां ‘अभिव्यक्ति’ का अर्थ एक ही रहता है लेकिन संदर्भ और आयाम बहुत हैं। संदर्भ बदलने के साथ इसका रूप भी बदल जाएगा। सामाजिक, राजनीतिक आंदोलन से लेकर तो जनक्रांति तक सब अभिव्यक्ति ही है – जनता की, जनसंघर्षों की, उनके स्तर की। अब नए-नए मित्र और सहचर, एकदम जरूरी दोस्त, सकर्मक सत्-चित्-वेदना-भास्वर इसलिए तो नहीं खोजे जा रहे हैं कि लेखकों का प्रगतिशील या आपको यह न पसंद हो तो कह लीजिए परिमली संगठन बनाना है। बल्कि इसलिए खोजे जा रहे हैं कि जूझना ही तय है, कि इसके बगैर इस यथार्थ अंधेरे को नहीं मिटाया जा सकता, कि नए भारत के स्वप्न को पूरा नहीं किया जा सकता। हमारे जैसे देश और समाज में यह ‘अभिव्यक्ति’ ‘जनक्रांति’ है और यह भी कि यह ‘सशस्त्र जनक्रांति’ है। नामवर सिंह को अन्य परेशानियों के अलावा इस बात से भी परेशानी है कि ‘कोई मुक्तिबोध को एकदम सशस्त्र क्रांति का समर्थक घोषित कर रहा है।’सशस्त्र से पहले ‘एकदम’ शब्द लगाकर नामवर सिंह अपने लिए एक छूट लेते हैं और सशस्त्र क्रांति को खारिज भी कर देते हैं। वे कहना यह चाहते हैं कि अब शांतिपूर्ण क्रांति भी हो सकती है – ‘शांतिपूर्ण संक्रमण।’ ख्रुश्चेव के सोवियत की सत्ता पर आने के बाद से यह सिद्धांत आया और सीपीआई ने इसे मान भी लिया। रामविलास शर्मा नामवर सिंह की परेशानी पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं कि इस जनक्रांति की कहीं कोई व्याख्या नहीं की गई लेकिन मुक्तिबोध की कविताओं में यह क्रांति सशस्त्र अवश्य है, भले ही ‘एकदम सशस्त्र’ न हो। और फिर कविताओं से, कविताओं के वातावरण से यह दिखाते हैं कि यह क्रांति का रूप ही देखते आए थे। यह बिल्कुल सही है। लेकिन वे मूल रूप से (इस बाबत उन्होंने और भी बहुत कुछ कहा है) यह सिद्धांत प्रतिपादित करते हैं कि जहां भी संसदीय जनतंत्र कायम हो गया है, वहां सशस्त्र क्रांति नहीं हुई है। और कहा कि मुक्तिबोध दुनिया में अन्य देशों में चल रहे छापामार युद्धों के आधार पर अपने यहां सशस्त्र क्रांति का चित्र बनाते थे। अर्थात भारत में सशस्त्र क्रांति नहीं होगी। और इस तरह दोनों आलोचक सिद्धांततः एक जमीन पर ही आ खड़े होते हैं, राजनीतिक शब्दावली में इसे सामाजिक-जनवाद कहते हैं। जिसका वर्ग आधार है पेट्टि बुर्जुआ, मध्य वर्ग। अब मुक्तिबोध अपने तीव्र आत्म-संघर्ष के बावजूद कहां व कितनी दूर तक मध्यवर्गी चेतना से ग्रसित थे या मुक्त इनके साथ इस बहस में उलझना फजूल है।

कम्युनिस्ट पार्टी की चौथी  पार्टी कांग्रेस (1956) से शासक वर्ग से साझा का, समझौते का जो रास्ता निकला था, वह ‘शांतिपूर्ण संक्रमण’ के रास्ते से गुजरता हुआ वर्ग संघर्ष और क्रांति की जरूरत से इंकार में अपनी पूर्णता को प्राप्त हो गया है। यही हाल विभाजन के बाद बनी सीपीएम का है। बेशक, उसकी इस यात्रा का सूत्र दूसरा रहा है। शासक वर्ग के चरित्र के इस विश्लेषण से कि वह ‘साम्राज्यवाद का विरोध करता है और राष्ट्रीय अर्थतंत्र पर उसकी पकड़ को ढीला करता है…। ’मुक्तिबोध का संवेदनात्मक ज्ञान तो टकराता ही है, ज्ञानात्मक संवेदन भी टकराता है। पहले ज्ञानात्मक संवेदन को ही लें। मुक्तिबोध ने ‘अंग्रेज गए पर इतनी अंग्रेजी पूंजी क्यों?’ शीर्षक के अंतर्गत प्रकाशित एक टिप्पणी में कहा है, ‘आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि पंडित नेहरू की पंचवर्षीय योजनाओं में भी प्रतिवर्ष 100 करोड़ रुपयों की विदेशी पूंजी निमंत्रित की गई है। पंचवर्षीय योजना के नाम पर औद्योगिक क्षेत्र में भारतीय पूंजीपति, विदेशी पूंजीपतियों (अंग्रेजों और अमरीकियों) से सांठ-गांठ किए हुए हैं।’आगे इस सांठ-गांठ का आर्थिक आंकड़ों के साथ विस्तृत ब्यौरा है। फिर निष्कर्ष निकाला गया है कि – ‘यहां केवल इतना ही कह देना पर्याप्त है कि एकाधिकारवादी स्वदेशी पूंजी विदेशी आर्थिक स्वार्थों से बहुत हद तक मिल गई है, जिसका फल यह है कि भारत में अन्य विदेशी पूंजी तथा ब्रिटिश पूंजी का शिकंजा ढीला होने के बजाय और अधिक कस गया है’( ‘सारथी’ 3 अक्तूबर, 1954)। आगे इसी टिप्पणीमें अपनी कम पूंजी लगाकर भी विदेशी पूंजी द्वारा अपने से कई गुना अधिक देशी पूंजी पर कई तरीके से नियंत्रण किए जाने के तथ्य दिए गए हैं और निष्कर्ष निकाला गया है कि – ‘…यह अपेक्षा कि भारतीय पूंजीपति इस विदेशी शिकंजे का विरोध करेंगे व्यर्थ-सी है। अपने मुनाफे की वृद्धि के लिए भारत-शासन पर निर्णायक प्रभाव रखते हुए वे साम्राज्यवादी पूंजी को बुलाते हैं, उस पूंजी के जूनियर पार्टनर की हैसियत से काम करते हैं और उनसे पूंजीबद्ध हो जाते हैं। पंचवर्षीय योजना ने उनको इस कार्य में अधिक उत्साहित किया है। स्पष्ट बात यह है कि ये कल के राष्ट्रवादी पूंजीपति आज भारत को केवल औपनिवेशिक क्षेत्र बनाए रखने की ओर ही कदम बढ़ा रहे हैं। ’मुक्तिबोध ने बस इसे राजनीतिक अर्थशास्त्रीय सूत्रीकरण करते हुए मात्र यह नहीं कहा है कि ‘वस्तुतः ये विदेशी पूंजी के दलाल हैं’, अन्यथा इस विश्लेषणात्मक टिप्पणी से अर्थ यही निकलता है। अगर यहां ‘कामायनी: एक पुनर्विचार’ में इस पूंजीवाद की जन्मकुंडली पर व्यक्त मुक्तिबोध के विचार को जोड़ दें तो जो चित्र प्रस्तुत होता है वह यह कि दलाली इस पूंजीपति का जन्मचिह्न (बर्थ मार्क) है: ‘शक्तिशाली ब्रिटिश साम्राज्यवाद के भीतर भारतीय पूंजीवाद का जन्म हुआ। इसके भीतर औद्योगिक पूंजीवाद बहुत क्षीण था। बड़े-बड़े करोड़पतियों की आमदनी का जरिया वस्तुतः अनुत्पादनशील लेन-देन और सट्टा (पढि़ए मिस्ट्रीज आॅफ दी बिड़ला हाउस) था। ’ऐसा पूंजीवाद सामंतवाद से लड़ भी नहीं सकता। ‘साम्राज्यवाद के अंर्गत, पूंजीवादी अर्थतंत्र के भीतर, सामंती तत्वों की प्रभाव-छायाएं बड़ी सघन, बहुत लंबी-चैड़ी और विस्तीर्ण रही। …अर्थात, कुल मिलाकर सामंती तत्वों के प्रति जो आमूल परिवर्तनकारी व्यापक उग्र प्रतिक्रिया होनी चाहिए थी, वह न हुई। …राजनीति, समाजनीति के क्षेत्र में इस प्रक्रिया ने गांधीवादी अर्थतंत्र की प्रवृत्ति को जन्म दिया। मशीनों के विरुद्ध, व्यापक औद्योगीकरण के विरुद्ध, राष्ट्र के केंद्रस्थ शासनतंत्र के विपरीत ग्राम प्रजातंत्र की स्थापना के पक्ष का समर्थन करनेवाली एक ऐसी विचारधारा थी, जो भारत की अविकसित, आर्थिक अवस्था को कायम रखना चाहती थी।… भारत के पिछड़े हुए स्वरूप को समाप्त करने के बजाए उस स्वरूप में आदर्शवादी रंग मिलाना चाहती थी। पूंजीवाद ने कुशलतापूर्वक इस विचारधारा का अपने लिए उपयोग कर लिया।…’और इस तरह भारत में ’47 के बाद जो सामाजिक ढांचा बना वह अर्द्ध सामंती और अर्द्ध औपनिवेशिक था। कम्युनिस्ट पार्टी ने सामंतवाद के खिलाफ निशाना साधते हुए इस राजनीतिक-सामाजिक ढांचे को तोड़ने की जगह शासक वर्ग सम समझौते का, उसका पिछलग्गू बनने का रास्ता अपनाया। इस ढांचे को बलपूर्वक तोड़े बगैर भारतीय जनता की मुक्ति और भारत का उनमुक्त विकास संभव नहीं है –

‘इस-उस जमाने के धंसानों में से

उमड़ते हैं अंधेरे के मेघ

मैं एक थमा हुआ मात्र आवेग

रुका हुआ एक जबर्दस्त कार्यक्रम

मैं एक स्थगित हुआ अगला अध्याय

अनिवार्य

आगे ढकेली गई प्रतीक्षित

महत्वपूर्ण तिथि।’(चंबंल की घाटियां)।

इसी कविता में मध्यवर्ग के साथ-साथ कम्युनिस्ट पार्टी की इस समझौतापरस्ती की भी गहरी आलोचना है ऐसा मानना चाहिए – ‘प्रस्तरीभूत मैं गतियों का हिम हूं

बीच ही में टूट गया कोई पराक्रम हूं’

जैसी पंक्तियां कम्युनिस्ट पार्टी की ओर ही इशारा करती हैं। अन्यथा मध्य वर्ग के किस पराक्रम का जिक्र हो सकता है जो बीच ही में टूट गया। फिर तो

‘शिलीभूत भूमि से

सामंजस्यों का घनीभूत जितना

यत्न है तुम्हारा

उतना ही बंजर बनती है दुनिया

उतनी ही जिंदगी उजाड़ बनती।’

यहां ‘अभिव्यक्ति’ से पैदा हुए दूसरे मसले पर भी बात कर ली जाए। अब अगर अभिव्यक्ति के अंदर जनक्रांति तक समाहित है तो यह भी है कि हर समाज, जिसकी अपनी एक विशेष ऐतिहासिक अवस्था, कालखंड है उसकी अपनी एक ‘संपूर्ण अभिव्यक्ति’, ‘परम अभिव्यक्ति’ भी होती है। कविता या अन्य कला रूप में यह ‘परम अभिव्यक्ति’ सापेक्षिक रूप में ही होगी। मुक्तिबोध की कविताओं में इसकी भी व्याख्या नहीं की गई है, जैसे क्रांति की भी नहीं की गई है। लेकिन कविता की इन पंक्तियों – ‘इसीलिए मैं हर गली में

और हर सड़क पर

झांक-झांक देखता हूं हर एक चेहरा

प्रत्येक गतिविधि

प्रत्येक चरित्र

व हर एक आत्मा का इतिहास

हर एक देश व राजनीतिक स्थिति और परिवेश

प्रत्येक मानवीय स्वानुभूत आदर्श

विवेक-प्रक्रिया, क्रियागत परिणति!!

खोजता हूं पठार…पहाड़…समुंदर

जहां मिल सके मुझे

मेरी वह खोई हुई

परम अभिव्यक्ति

आत्म-संभवा।’

– से कुछ अर्थ निकाला जा सकता है। जिसे किसी निरपेक्ष, रहस्यवादी पूर्ण ज्ञान की तलाश होगी, वह समाधि लगाएगा, कुंडनिली जगाएगा या और बहुत कुछ जो होता है करेगा, वह दूसरा इतना कुछ क्यों करने जाएगा। किसी विश्वविद्यालय, फांउडेशन या कि शोध संस्थान ने उसे इसकी नौकरी भी नहीं दे रखी थी। उसने तो यह जिम्मेदारी खुद अपने कंधों पर ले रखी थी, इस दायित्वबोध के नाते कि ‘वे आते होंगे लोग

जिन्हें तुम दोगे

देना ही होगा, पूरा हिसाब

अपना, सबका, मन का, जन का।’

इस खोज के उद्देश्य सामाजिक हैं। इस खोज की प्रक्रिया यथार्थवादी है, वह यह जानता था कि यह विश्व बोधगम्य है, इसे पूरी तरह जाना जा सकता है लेकिन इसे पूरी तरह कभी भी नहीं जाना जा सकता, क्योंकि वह परिवर्तनशील है। वह हिंदी साहित्य में सबसे अधिक वैज्ञानिक आविष्कारों की न केवल जानकारी रखता था बल्कि कविता में उनका उपयोग भी करता था। इसलिए कहा जा सकता है कि उसने इस ‘परम अभिव्यक्ति’ पद का सापेक्षिक रूप में ही प्रयोग किया होगा, शायद लेनिन के शब्दों में यह सोचते हुए कि ‘फिर भी पूर्णता की मांग ज्ञान को पथरा जाने से रोकती है’ – फिर वही यात्रा सुदूर की, फिर वही खोज भरपूर की। इस खोज का संवेदनात्मक उद्देश्य क्रांतिकारी था वह अपने समय की केवल व्याख्या भर नहीं, उससे मुठभेड़ करते हुए इसकी संपूर्णता में यथार्थ अभिव्यक्ति के जरिए उसे बदलने में हिस्सेदार होना चाहता था। स्पष्ट है कविता क्रांति नहीं होती। लेकिन क्रांति की दुर्निवारता, आसन्नता को अपने समय के यथार्थ के रूप में अभिव्यक्त कर पाना, परम अभिव्यक्ति हैं ऐसी अभिव्यक्ति साहित्य जगत में स्वयं एक क्रांति होती है और वास्तविक जगत में होनेवाली क्रांति से अलग भी होती है और एकाकार भी। इस क्रांतिकारी संवेदनात्मक उद्देश्य को अस्मिता की तलाश के जरिए व्याख्यायित नहीं किया जा सकता, उसके क्रांतिकारी महत्व, उसकी सामाजिक उपयोगिता पर पर्दा जरूर डाला जा सकता है।

सन् 1989 मंे इलाहाबाद में ‘कविता के नए प्रतिमान: पुनर्विचार’ से एक व्याख्यानमाला में व्याख्यान देते हुए नामवर सिंह ने कहा, ‘‘कविता के नए प्रतिमान’ में ‘अनुभूति की प्रामाणिकता’, ‘जटिलता’, ‘तनाव’, ‘विसंगति’, ‘विडंबना’, ‘ईमानदारी’ आदि संकल्पनाओं का जो परीक्षण किया था और अनेक की अपर्याप्तता और असंगतियों का जो संकेत किया था वह केवल तार्किक था। ये सभी अमेरिकन ‘नई समीक्षा’ की संकल्पनाएं थीं।…ये अवधारणाएं केवल अपनी साहित्यिक भूमिका ही नहीं निभा रही थीं बल्कि इनकी एक निश्चित राजनीतिक भूमिका भी थी। ‘कविता के नए प्रतिमान’ में यह नहीं कहा गया है। ‘कविता के नए प्रतिमान’ का रूपवाद यह है कि उसमें रूपवाद की आलोचना भी रूपवादी ढंग से की गई है, ऐतिहासिक आधार पर नहीं।’बताया कि ‘शीत-युद्ध के काल में समीक्षा का जो प्रतिमान सबसे अधिक फला-फूला वह था ‘न्यू क्रिटिसिज्म’ (नई समीक्षा)। इस समीक्षा सिद्धांत मंे यह कहा गया कि बड़ी कविता वह है जिसमें विचारधारा न हो, जिसमें ‘पैराडाक्स’ हो, द्वंद्व हो, तनाव हो, कवि कमिट न करे। तो यह है शीत-युद्ध का काव्यशास्त्र। इसकी सारी शब्दावली ‘विचारधारा के इस अंत’ की शब्दावली है। कहा जाने लगा कि ‘नाजीवाद’ के साथ ही यह कम्युनिस्ट विचारधारा का भी अंत हो गया।’अर्थात इस ‘शीत-युद्ध के काव्यशास्त्र’ का उद्देश्य था कम्युनिज्म विरोध। अब जिस ‘कविता के नए प्रतिमान’ के ‘केंद्र’ में मुक्तिबोध हैं, उनका सारा काव्य और समीक्षा सिद्धांत मूलतः इस शीत-युद्ध के सिद्धांत के खिलाफ संघर्ष है। इस संघर्ष में उन्होंने साफ तौर पर यह निष्कर्ष निकाला कि ‘नई कविता के कलेवर पर शीत-युद्ध की छाप है।’ सवाल यह है कि केंद्र की हालत तो यह है लेकिन उसको अपने ‘कविता के नए प्रतिमान’ के केंद्र में रखनेवाले से ऐसी चूक क्यों हुई? सीधे तो नहीं लेकिन प्रकारांतर से नामवर सिंह यह सफाई देते हैं कि ’‘1968 के आसपास भारतीय राजनीति और उसके समानांतर हमारे साहित्य में जो महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए थे, उनकी झलक ’68 में तो मिली थी, पर उसका वेग बाद में प्रकट हुआ। नक्सलबाड़ी आंदोलन चाहे जितना भी दुस्साहसिक रहा हो, उसने हमारी संपूर्ण चेतना को झकझोर दिया। ‘नई कविता’ के बाद हमारा साहित्य बहुत नगराभिमुख हो चला था। ‘अकविता’ जैसे अराजकतावादी आंदोलन महानगरों की चेतना से आक्रांत थे। नक्सलबाड़ी आंदोलन ने पुनः हमारी नगराभिमुख चेतना को गांवों की ओर लौटाने का काम किया। इसी के चलते बड़े-बड़े कवियों के रहते हुए धूमिल जैसे कवि ने गंवई-गांव के ठेठ मुहावरे से सारी ‘नई कविता’ के भाषा के जादू को तोड़ दिया। 1968 के बाद हमारे देश की राजनीति में और साहित्य में एक लड़ाकूपन, एक जुझारूपन आया, अनेक नए कवि एक नई भाषा और एक नई संवेदना लेकर आए। मुझे लगता है कि ‘कविता के नए प्रतिमान’ में जो नहीं था – परिवर्ती परिस्थितियों के कारण मैं उसे अधिक स्पष्टता से देख पाया।’’ और कहा कि जो काम तब नहीं हो पाया अर्थात ‘नई समीक्षा’ का ऐतिहासिक आधार पर खंडन वह ‘कविता की दूसरी परंपरा’ की खोज और स्थापना के लिए जरूरी है।

और इसके लिए आधुनिकतावाद के दो विभाग बनाए ‘पश्चिमी आधुनिकतावाद और दूसरा, उससे अलग ठेठ अपनी जमीन से, अपनी परंपरा से जो लोग अपना विकास कर रहे थे, अपने लिए रास्ता निकाल रहे थे।’पहली धारा में वे थे जो ‘इलियट, पाउंड आदि की आधुनिकतावादी संवेदना के आधार पर कविताएं लिख रहे थे – अज्ञेय, मुक्तिबोध, शमशेर बहादुर सिंह आदि। दूसरे में थे – नागार्जुन, त्रिलोचन, केदारनाथ अग्रवाल।’ और प्रश्न किया कि देखना यह चाहिए कि सार्थक कविता और काव्य मूल्यों का निर्माण किस धारा के अंतर्गत हुआ? अव्वल तो यह विभाजन ही अवसरवादी, सुविधावादी विभाजन है – ‘गलतियां करते ही रहने का धंधा है तुम्हारा’ – मुक्तिबोध, कबीर, प्रेमचंद, निराला की ठेठ परंपरा को विकसित, परिमार्जित और उन्नत करनेवाली धारा के कवि हैं। इस ओर इस लेख में संकेत भी किए गए हैं। स्वयं नामवर सिंह की अन्य दो बातों से भी यही प्रमाणित होता है। नंबर एक कि वे कहते हैं कि ‘कविता की दूसरी परंपरा’ की खोज और स्थापना के लिए ‘नई समीक्षा’ के ऐतिहासिक आधार का खंडन जरूरी है। अगर ऐसा ही है तो ‘कविता के नए प्रतिमान’ में यह काम आप भले नहीं कर पाए, मुक्तिबोध पहले ही यह काम कर गए हैं। उनका समूचा काव्य शीत-युद्ध के काव्य मूल्यों के पीछे छिपे वर्ग मूल्य और राजनीति के खिलाफ ज्वलंत दस्तावेज है। इस तरह, यह काम आपके लिए छूटा हुआ नहीं है।

दूसरी बात, जिस नक्सलबाड़ी के घटित होने के वर्षों-वर्षों बाद उसकी रोशनी में आप जो कुछ देख पाए, उस नक्सलबाड़ी जैसे किसी विद्रोह की दुर्निवारता की पूर्वाभास है मुक्तिबोध की कविता। जिस फैंटेसी में वे विचरण कर रहे थे, वही नक्सलबाड़ी के विद्रोह के रूप में वास्तव हुई – मैं विचरण करता-सा हूं एक फैंटेसी में, सच है यह फैंटेसी कल वास्तव होगी। उसके सपने का आधार बाहर के देशों में हो रहे छापामार युद्ध ही नहीं थे। सबसे पहले वह अपने लोगों के दहाड़ते विक्षोभों, धरती के छाती के अंदर की ज्वालामुखियों की गड़गड़ाहट को बड़े ध्यान से सुन-देख रहा था और इस सबको सामने ले आने के लिए जी-मर रहा था। वह किसी सुदूर, जिसे कभी न कभी तो जरूर होना है अर्थात क्रांति के प्रति निचतिवादी आस्था रखनेवालों में से नहीं, उसकी हर लहर को यथार्थ रूप में हृदयंगम करनेवालों में से था। वह देख रहा था – छिड़ने ही वाली है युगव्यापी एक बहस, होने ही वाली है भारी जद्दोजहद। और ’68 में कम्युनिस्ट पार्टी दो हिस्सों में बंट गई – सीपीआई और सीपीएम के रूप में। लेकिन सीपीएम के अंदर भी भारतीय शासक वर्ग के चरित्र और भारतीय क्रांति के रास्ते को लेकर छिड़ी बहस रुकी नहीं और तेज हो गई – फूट पड़ी नक्सलबाड़ी के विद्रोह की चिंगारी – ‘हठात आंखों के सामने लगा, जैसे भारतवर्ष पर छाए हुए अंधेरे बादल छंट गए हों, दीप्त सूर्यालोक से जगमगा रहा हो मेरा देश भारतवर्ष, जनता का जनवादी भारतवर्ष, समाजवादी भारतवर्ष।’(चारु मजुमदार) और जैसे जादू के जोर से खिंची चल पड़ी दसियों हजार नौजवान कम्युनिस्टों की एक समूची पीढ़ी, जिस पीढ़ी ने स्वेच्छा से रवींद्रनाथ के शब्दों में ‘जीबन आर मृत्यु के पाएर भृत्य बानिए’(जीवन और मृत्यु को पांवों की दासी बनाकर) शहादत कबूल की। मुक्तिबोध नक्सलबाड़ी के अवांगार्द कवि हैं।

जिस तरह नक्सलबाड़ी क्रांति के ठेठ भारतीय रास्ते की, नए भारत की खोज है, उसी तरह ‘परम अभिव्यक्ति की खोज’ नए आधुनिक भारत और भारतीय काव्य मूल्यों की खोज है – इस पर आगे और बात की जानी चाहिए – जिसे नामवर सिंह मुक्तिबोध को ईलियट, पाउंड आदि की आधुनिकतावादी संवेदना के खांचे में रखकर ‘अस्मिता की खोज’ बना डालते हैं और उसके क्रांतिकारी महत्व और सामाजिक उपयोगिता पर पर्दा डाल देते हैं। मुक्तिबोध, नागार्जुन, त्रिलोचन को चर्चा के केंद्र में ले आने का काम भी सबसे आगे बढ़कर नक्सलबाड़ी ने किया, जैसे उन मूल्यों को जिनकी नामवर सिंह ने चर्चा की है और ठीक ही चर्चा की है।

आप की ही बात मान ली जाए कि आपने ‘नई समीक्षा’ के रूपवाद का रूपवादी ‘खंडन’ किया है तब भी विडंबना देखिए कि आप रूपवाद के रूपवादी खंडन में ही फंसे रह गए (यह क्यों हुआ! क्योंकर हुआ!!) जबकि उसने भाववादी शिल्प, ‘बुर्जुआ के ही औजार का उपयोग’ कर 1947 के बाद के नए यथार्थ, नए भारत की खोज की यथार्थ अभिव्यक्ति कर डाली। ‘इससे फर्क नहीं पड़ता कि आपने हथियार किसी डकैत से लिया या किसी और से असल सवाल यह है कि आप उसका कैसा और किसलिए इस्तेमाल करते हैं।’ (लेनिन)। ‘परम अभिव्यक्ति की खोज’ ठेठ अर्थों में आधुनिक नए भारत की खोज है, ‘अस्मिता की खोज’ नहीं।

‘अजीब हुआ

वह भीतर से देदीप्यमान जो रहती थी

भू-गर्भ-गुहा

अब अंधियारी, काली व स्तब्ध

निश्चेतन, जड़, दुःसहा!!

अजीब हुआ!!’

11 सितंबर, 1964। मुक्तिबोध नहीं रहे। लेकिन नए भारत को निर्मित और स्थापित करने का काम अभी भी बाकी है। जो फासिस्ट शक्तियां कल तक अंधेरे में जुलूस निकालकर चलती थीं और जो, 1975 में आपातकाल के रूप में एक बार सामने आई थीं, आज वे खुलेआम देश की छाती पर चढ़ी हुई दिन में भी अंधेर मचाए हुए हैं। वे आधुनिक मानव मूल्यों को, जनतंत्र को, वह चाहे जितना कमजोर ही क्यों न हो, खत्म कर देश पर पूरी तरह (अभी वे इसमें पूरी तरह कामयाब नहीं हो पाई हैं) फासिस्ट शासन थोप देना चाहती हैं। नए आर्थिक सिद्धांत बनाकर देश की स्वतंत्रता और संप्रभुता को साम्राज्यवादियों के हाथों गिरवी रखती जा रही हैं। परिवर्तन की विरोधी, अतीत को व्यतीत न माननेवाली सनातनी शक्तियां यह सब कुछ भारतीयता और भारतीय संस्कृति के नाम पर करना चाहती हैं। उनके अनुसार, ‘हमारे यहां (भारत में) अतीत व्यतीत नहीं होता।’ (निर्मल वर्मा, भारत और यूरोप प्रतिश्रुति के क्षेत्र) वे आधुनिक जीवन मूल्यों के लिए संघर्ष को यूरोप बनाम भारत, भारतीय बनाम पश्चिमी के जाल में उलझाकर रूढि़वादी, प्रतिक्रियावादी जीवन मूल्यों को स्थापित करना चाहती हैं। वे क्रांतिकारी, परिवर्तनकारी नवीन प्रेरणाओं को हर तरह से राष्ट्रीय उन्मादों को पैदा कर मार डालना चाहती हैं। वैचारिक क्षेत्र में तरह-तरह के ‘उत्तरवाद’ मूल रूप से प्रतिक्रियावाद की ही विचारधाराएं हैं। उपभोक्तावाद से संयुक्त अवसरवाद की बाढ़ मुक्तिबोध के समय से कहीं ज्यादा विकराल हुई है। कल तक एकाध-दो फांउडेशन आदि हुआ करते थे, आजकल न जाने कितने फाउंडेशन और ‘स्वयंसेवी संस्थाएं’ हैं, बौद्धिक वर्ग को क्रीतदास बनाने और किराए के विचारों का उद्भाष कराने के लिए। ‘उम्मीद भी पहले-सी चुलबुली लड़की नहीं रही’(विस्वावा शिंबोश्र्का) ऐसे में औरों के साथ-साथ वामपंथी कतारों का एक हिस्सा भी इस उपभोक्तावादी-अवसरवाद में खूब गोते लगा रहा है। इस नाते भी वैचारिक अंधेरा और घना हो रहा है। अंतरराष्ट्रीय-राष्ट्रीय स्थितियां जिस तरह की हैं वे फासिस्ट शक्तियों और विचारों को सुदृढ़ कर रही हैं। आतंकवाद के नाम पर अमरीका का अफगान युद्ध साम्राज्यवादी युद्ध है, इसमें कोई शक नहीं। यह कौन सा मोड़ लेगा यह तय नहीं है लेकिन हमारे अपने देश में इस स्थिति का फायदा उठाकर शासन-सत्ता एक फासिस्ट सत्ता के रूप में उभर आने की पूरी कोशिश कर रही है –

‘साम्राज्यवादियों के बदशक्ल चेहरे

एटमिक धुएं के बादलों-से गहरे

क्षितिज पर छाए हैं

…साम्राज्यवादियों के पैसे की संस्कृति

भारतीय आकृति में बंधकर

दिल्ली को

वाशिंगटन व लंदन का उपनगर बनाने पर तुली है

भारतीय धनतंत्री

जनतंत्री बुद्धिवादी

स्वेच्छा से उसी का ही कुली है

…जन-राष्ट्र-लोकनायक

जन-मुक्ति-आंदोलन

के सिद्ध विरोधी

ये साम्राज्यवादियों की पांत में ही बैठे हैं

जनता के विरुद्ध घोर अपराध कर

फांसी के फंदे की रस्सी से ऐंठे हैं।’

लगभग ऐसा ही है हमारे ‘जमाने का चेहरा’। बेशक, इसके खिलाफ अपने देश में भी और दुनिया के पैमाने पर विरोध की शक्तियां भी पहले के मुकाबले बड़े पैमाने पर गतिशील और लामबंद हो रही हैं। हमें अपने समय और समाज का नए सिरे से भीतर से बाहर तक व्यापक सर्वेक्षण करने, और भी अधिक दृढ़ता से और भी अधिक कठोर आत्म संघर्ष चलाने, ज्ञान के क्षेत्र में अद्यतन खोजों का आलोचनात्मक नजरिए से विश्लेषण करते हुए अपनी विश्वदृष्टि को विकसित और अद्यतन बनाने की जी-तोड़ कोशिश करना बहुत जरूरी है। ‘जो उम्मीद त्याग चुके हैं’ – कहने दो उन्हें जो कहते हैं। हमें जनता की प्रतिरोधी शक्ति, क्रांतिकारी भावना और सामाजिक क्रांति में उम्मीद जगाने वाली अभिव्यक्ति के लिए ही जीना और मरना है। ‘अंधेरे’ के उस महाकवि से हमें आज भी बहुत कुछ सीखना बाकी है।

रामजी राय

रामजी राय

रामजी राय  बहुत कम और तीखा लिखने के साथ-साथ अपनी राजनीतिक सक्रियताओं के लिए जाने जाते हैं। समकालीन जनमत के प्रधान संपादक। जन संस्कृति मंच से जुड़ाव।

स्त्री विमर्श: इससे दयनीय कोई दूसरा विमर्श नहीं है हिंदी में: वीर भारत तलवार

मैं स्त्री सवाल पर आपसे कुछ बातें करना चाहता हूं। दलित विमर्श और आदिवासी विमर्श ऐसा विमर्श है, जो हिंदुस्तान में ही चला,  किस वैश्विक आंदोलन या विचारधारा का अंग नहीं बन पाया। लेकिन स्त्री-विमर्श एक वैश्विक विचारधारा है। लेकिन विडंबना कि  बात यह  है कि हिंदी में जो स्त्री विमर्श चल रहा है, उसका इस वैश्विक विचारधारा से बहुत कम लेना-देना है, नहीं के बराबर है। एक-दो अकादमिक लोगों की बात नहीं करता हूं, जो इस चीज के बारे में ज्यादा जानकारी रखते हैं। हिंदी में जो स्त्री-विमर्श चलता है, जिसमें मैत्रेयी पुष्पा और लता शर्मा और मनीषा और रोहिणी अग्रवाल जैसे लोगों को हम पढ़ते रहते हैं। ये लोग सबसे ज्यादा मुखर हैं स्त्री विमर्श पर, तो लगता है कि स्त्री विमर्श से दयनीय कोई दूसरा विमर्श नहीं है हिंदी में। यानी एक तो इस स्त्री विमर्श का कहीं भी उस वैश्विक विचारधारा के विकास से, उसकी सैद्धांतिकी से जो इतने वर्षों से विकसित हुई है दुनिया में, कुछ भी लेना-देना नहीं है। पश्चिम में नारीवादी आंदोलन की एक लंबी पंरपरा रही है, सैकड़ों वर्ष की। मताधिकार आंदोलन (Suffragist movement) उन्निसवीं सदी से चला आ रहा है। आज वहां इतना जो कुछ भी हासिल किया गया है, लड़ कर किया है, समाज लड़ाई से बदलता है, आंदोलन से बदलता है, सिर्फ कानून बनाने से नहीं बदलता है समाज। इसलिए पश्चिम में स्त्री के अधिकार की चेतना बिल्कुल नीचे तक गई है। हिंदुस्तान में स्त्री-मताधिकार के लिए 1918 ई. में कांग्रेस ने एक बैठक बुलाई और एक प्रस्ताव पारित कर दिया कि स्त्रियों को भी मताधिकार दिया जाएगा और पारित हो गया,  मदन मोहन मालवीय को छोड़कर सबने उसका समर्थन किया। पारित हो गया। यहां किसी स्त्री में यह चेतना जगाने की जरूरत ही नहीं पड़ी कि तुम्हें मताधिकार हासिल करना है और इसके लिए तुम्हें लड़ना है। बैठे-बैठाए सब मिल गया। रावण न मरा, लंका न जली, खुद घर लौट आई जनकनंदिनी। तो इस प्रकार का जहां आंदोलन होगा, वहां कोई चेतना नहीं हो सकती है। स्त्री विमर्श को लेकर इतनी महत्वपूर्ण सैद्धांतिकी का विकास हुआ, 1970 के दशक में ‘सेक्सुअल पॉलिटिक्स’ नाम की एक किताब लिखी गई थी और अभूतपूर्व क्रांतिकारी किताब थी। ये जो स्त्री पुरुष आपस में सेक्स संबंध बनाते है, सेक्स करते हैं, वो सेक्स संबंध असल में एक पावर डिस्कोर्स होता है उसके बीच। पुरुष किस प्रकार से इंटरकोर्स करता है, उसका क्या नजरिया होता है, क्या हरकतें होती हैं उसकी,  कौन से शब्द बोलता है उस समय, किस भाषा में बात करता है, यह सब एक पावर डिस्कोर्स है। पहली बार इतने डिटेल में उन्होंने इस चीज को रखा, कि सेक्स सिर्फ का आनंद नहीं, उसके अहं की तुष्टि का, उसके पुरुषार्थ की तुष्टि का भी आनंद है और वह स्त्री को एक पैसिव चीज समझता है जिसका खंडन बहुत पहले सिमोन द बोउवा कर चुकी थीं- सेकेंड सेक्स लिखकर कि सेक्स में स्त्री पैसिव नहीं होती है। लेकिन पुरुष उसी को मानना चाहता है कि पैसिव ही है। और वो एक पावर डिस्कोर्स करता है। इस तरह की किताब 1970 में लिखी गई। हिंदी में कोई इस चीज की चर्चा नहीं करता कि सेक्सुअल बिहैवियर में हमारा पावर डिस्कोर्स क्या है?DSC_0106

इसी प्रकार से 1980 के दशक में मुझे याद है, जब मैं नारीवादी विचारों की ओर झुका, तो बड़ी महत्वपूर्ण किताब आई थी और हम सब वामपंथी उसको पढ़ते थे, Sheila Rowbotham की किताब थी- Beyond The Fragments. Sheila Rowbotham की किताब थी। Sheila Rowbotham एक यूरोपियन मार्क्सवादी हैं और यूरोपियन मार्क्सवादियों ने नारीवाद को लेकर भी बहुत सारी सैद्धांतिकी का विकास किया। दुर्भाग्य से कुछ भी जानने की जरूरत हम महसूस नहीं करते। उन्होंने एक नई कान्सैप्ट दी। उन्होंने कहा- Prefigurative movement यानी प्रारूप आंदोलन। हम कैसा समाजवाद लाना चाहते हैं, उस समाजवाद में स्त्री-पुरुषों के हम कैसे संबंध बनाना चाहते हैं, उसका प्रारूप आंदोलन हमें करना चाहिए। हम अपने संगठन में पहले उसके प्रारूप का प्रयोग करें, अगर हम उसको लाना चाहते हैं तो। इस  Prefigurative movement की कान्सैप्ट उन्होंने दी थी। हिंदी के नारीवाद में, नारी विमर्श में कहीं भी इस तरह की किसी अवधारणा का जिक्र आपको नहीं मिलेगा।

हिंदी में जो नारी विमर्श है उसकी सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह सिर्फ साहित्यिक दायरे तक सिमटा हुआ है। उसके बाहर कुछ एनजीओ स्त्रियों के नाम पर चल रहे हैं, वो चल रहे हैं, लेकिन कोई नारीवादी आंदोलन उनके बाहर नहीं दिखाई देता है। सामाजिक आंदोलनों से इस चल रहे नारीवादी विमर्श का क्या संबंध है? कोई संबंध नहीं है। इतना बड़ा जो अभी आंदोलन हुआ दिल्ली में 16 दिसंबर के रेपकांड के बाद उसमें स्त्री संगठनों की क्या भूमिका थी? मैं आपको एक तुलनात्मक उदाहरण देता हूं। 1970 के दशक में महाराष्ट्र में मथुरा रेप केस हुआ, एक मशहूर रेपकेस है, जहां पुलिस कान्सटेबल ने मथुरा के साथ रेप किया, एक दलित स्त्री के साथ, और सुप्रीम कोर्ट तक ने बरी कर दिया उन कांस्टेबलों को कि ये लड़की जो है, चरित्रहीन है। उसी के बाद कानून में बदलाव हुआ कि लड़की के चरित्र का सवाल नहीं उठाया जाएगा। इस केस के खिलाफ बड़ी जागृति हुई और उसमें वो सारी जागृति का श्रेय बंबई के नारीवादी संगठनों को था। उन्होंने रेप और ऑपरेशन के खिलाफ एक फोरम बनाया और उस फोरम को आधार बनाके डेढ़ सौ-दो सौ कर्मठ नारीवादी कार्यकर्ताओं ने मिलकर इस आंदोलन को खड़़ा किया जिसका प्रभाव बाद में दिल्ली, कलकत्ता सब जगह पड़ा और 8 मार्च वीमेन्स डे के दिन वह आंदोलन देश में भी फैला। स्त्री संगठनों की वजह से फैला। इस बार दिल्ली में जो आंदोलन हुआ इतना बड़ा, इसमें स्त्री संगठन थी नहीं, फिर भी यह आंदोलन इतना फैल कैसे गया, जबकि महाराष्ट्र का मथुरा केस का आंदोलन इतना नहीं फैला। उसकी बहुत बड़ी वजह थी ये कि वो सिर्फ स्त्री संगठनों का आंदोलन, जिसको कोई राजनीतिक सपोर्ट नहीं था महाराष्ट्र में। लेकिन इस आंदोलन में ये जो भारत की कम्युनिस्ट पार्टी- माले है, इसका जो स्त्री मोर्चा है, ऐपवा, उसकी बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका थी, खासकर उसकी नेता कविता कृष्णन की। तो इस राजनीतिक समर्थन की वजह से यह  आंदोलन इतने बड़े जनांदोलन में बदल गया और पूरे देश में फैला। तो पोलिटिकल सपोर्ट एक मूवमेंट को कितना फैला सकता है, अगर वो मिल जाए उसको, इसका एक बहुत बड़ा उदाहरण है यह मूवमेंट।

बिना स्त्री संगठन के ये हिंदी में नारीवादी विमर्श जो लोग चला रहे हैं, वो कहीं इस आंदोलन के नेतृत्व में नहीं थे, जो कि दिल्ली में हुआ। जुलूस रोज-रोज नहीं निकलते हैं, लेकिन विचारधारात्मक संघर्ष रोज-रोज होता है और होना चाहिए। विचारधारात्मक संघर्ष कई रूपों में होता है। साहित्य में होता है, कला में होता है, संगीत में होता है,  तरह-तरह के सृजनात्मक प्रयोगों में होता है। नारीवादी विमर्श उसी प्रकार का विमर्श है।

महाराष्ट्र में मैं आपको बहुत हाल का उदाहरण दूं। डॉक्टर अंबेडकर की बनाई हुई एजुकेशन सोसाइटी का एक कॉलेज है, कॉलेज ऐंड कॉमर्स ऐंड इक्नोमिक्स, वडाला में। वहां की जो वाइस प्रिन्सिपल हैं डॉक्टर ललिता, उनहोंने एक कैलेंडर बनाया है, जो मेरे पास भेजा गया है और जिसको मैंने सबसे आगे बढ़के आंदोलन का नेतृत्व करने वाले आइसा को भेंट किया। वह कैलेंडर जेंडर इक्विलिटी के सवाल पर उन्होंने बनाया। हर महीने के पेज पर स्त्री से संबंधित मुद्दों को उठाया गया। उसकी क्लिपिंग दी गई और फिर मांग रखी गई और नीचे तारीख दी गई। बारह महीने आपको याद दिलाया जाएगा, स्त्रियों के सवाल पर आपका नजरिया कितना गलत है और क्या होना चाहिए। और उन्होंने एक नारा भी दिया, बहुत अच्छा, जिस प्रकार आइसा ने एक नारा दिया स्त्री आंदोलन के बारे में- बेखौफ आजादी, स्त्री के लिए बेखौफ आजादी होनी चाहिए, जहां भी वो जाए वहां वो सुरक्षित रहे, तो फ्रिडम विदाउट फीयर, उसी प्रकार से उस कैलेंडर में भी एक नारा दिया गया, वो भी उतना ही सही है- वीमेन्स राइट इज ह्यूमन राइट। स्त्री के अधिकार मनुष्य के अधिकार हैं, इस नारे के साथ वो पूरा कैलेंडर है।

अभी महाराष्ट्र में एक कार्यक्रम हुआ, ज्योतिबा फुले की पत्नी सावित्री बाई कविताएं लिखती थीं। स्त्री-चेतना जगाने के लिए, बहुत सारी कविताएं उन्होंने लिखी हैं। उन कविताओं पर महाराष्ट्र की एक स्त्रीवादी कलाकार झेलम परांजपे ने एक नृत्य नाटिका बनाई। हिंदी में किसी नारीवादी कलाकार ने बनाई हो एक भी नृत्य नाटिका इस प्रकार की या एक भी कैलेंडर इस प्रकार का बनाया हो, तो बताइएगा! महाराष्ट्र की एक नारीवादी मित्र कहती हैं कि स्त्री विमर्श तो बहुत हुआ, अब पुरुष विमर्श होना चाहिए। पुरुषों को भी बहुत कुछ बताने-समझाने की जरूरत है। दरअसल उन्हीं को बहुत कुछ समझाने-बताने की जरूरत है। ये बात हंसी की लग ही है आपको, लेकिन ये बात बहुत ही गंभीर है और बहुत वास्तविक है। महाराष्ट्र में जब 80 के दशक में मथुरा रेप केस को लेकर स्त्रीवादी आंदोलन या संगठनों ने आंदोलन किया, उनके बहुत से वामपंथी पुरुष मित्र बहुत प्रभावित हुए और इन वामपंथी पुरुषों ने मैन अगेंस्ट वायलेंस अंगेस्ट वीमेन- स्त्री पर होने वाली हिंसा के विरोधी पुरुषों का संगठन बनाया। काउंसलिंग एक चीज होती है, जो देखिए बहुत जरूरी होती है, और वैचारिक संघर्ष को आगे बढ़ाती है। एक-एक इनडिविजुअल से संपर्क करके स्त्रियों ने रेप के खिलाफ फोरम बनाया। उसमें वो क्या करती थीं? उससे मिलती थीं, उससे बात करती थीं, उसके अंदर की हीनता को दूर करती थीं, उसके अंदर के शर्म को दूर करती थीं, उसके गौरव को जगाती थीं- तुम्हारा कुछ नुकसान नहीं हुआ, तुम्हारे साथ अन्याय हुआ है, अपराध हुआ है, तुम लड़ोगी, हम तुम्हारे साथ हैं, ये सब काउंसलिंग करती थीं उसकी। और ये पुरुष क्या करते थे, जिन पुरुषों ने संगठन बनाया? जो पुरुष औरतों से इस प्रकार बर्बरता से पेश आते हैं, उन पर हिंसा करते हैं, अपनी पत्नियों को पिटते हैं, बलात्कार करते हैं, उनके घर जाकर उन पुरुषों से मिलकर उनकी काउंसलिंग करते थे, कि तुम क्या गलत कर रहे हो? तुमको समझना चाहिए। मैं इसी चीज की बात कर रहा हूं कि एक वैचारिक संघर्ष को आगे ले जाने के लिए पचासों तरीके होते हैं। वो तरीके हिंदी क्षेत्र में, हिंदी के नारी विमर्श में कहां हैं? हम कितनी उथली और सीमित जमीन पर खड़े होकर ज्यादा बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हैं?

हिंदुस्तान में संस्कृति को बदलने की लड़ाई शुरू हुई है 16 दिसंबर के आंदोलन के बाद से। हमारे देश के समाज की जो संस्कृति है, इसमें बहुत गहरी बुनियादी तब्दीलियों की जरूरत है। खासकर संस्कृति की सबसे बड़ी समस्या स्त्री के बारे में नजरिया है। उस नजरिये के बारे में कोई चेतना नहीं है हिंदी के स्त्री विमर्श में। हिंदी का स्त्री विमर्श, कुछ स्त्रियों की जिनका मैंने नाम भी लिया, इनके अपने पूर्वाग्रहों, विश्वासों और इनकी मांगों का एक विस्फोट होकर रह गया है। मैत्रेयी पुष्पा जिस तरह के लेख लिखती हैं और हम उनको पढ़ते रहते हैं, जिस प्रकार की वो आलोचना करती हैं, कौन संस्कृति है जो नारीवादी कहलाएगी? कोई औब्जैकटिव कैरेटेरिया नहीं है। आपको अच्छा लगा और आपके मन में यही बात है, तो वो नारीवादी है। मैत्रेयी पुष्पा ने हिंदी में जो नारीवादी आलोचना लिखी है, उसमें कामायनी को उन्होंने हिंदी की सबसे प्रगतिशील कृति बताया,  जो कामायनी बहुत सारे स्तरों पर सामंती संस्कारों से ग्रस्त कृति है। उस ‘कामायनी’ को आपने साबित कर दिया, आपको वो पसंद आया, आपके नारीवाद के कुछ तर्क हैं जिससे आपको लग गया। तो इसी प्रकार की आलोचना है। जो बुनियादी सवाल है, जो स्त्री की स्थिति को हमारे समाज में नियंत्रित और निर्धारित करते हैं, हिंदी के नारीवादी विमर्श में उनको नहीं उठाया जाता। ये कौन सी संस्थाएं हैं जो हमारे समाज में औरत बनाने का काम करती है? परिवार है, शिक्षा प्रणाली है, राज्य है, कानून है, धर्म है, कलाएं हैं, मीडिया है- ये सारी संस्थाएं हैं समाज की, जो मादा को स्त्री बनाती हैं। आप सभी जानते हैं कि स्त्री पैदा नहीं होती, बनायी जाती है, मार-मार के बनाया जाता है उसको स्त्री। और ये संस्थाएं है जो स्त्री बनाती हैं उसको, स्त्री की स्थिति को तय करती हैं ये। इनकी कोई चेतना हिंदी के नारीवादी विमर्श में अगर हो तो कोई कहीं दिखा दे मुझे।

स्त्री विमर्श का एक बहुत बड़ा सवाल है मर्दवाद। इसकी क्या आलोचना है हिंदी में? मैं आपको बताउंगा कि कैसे अच्छे-अच्छे नारीवादियों ने मर्दवाद को कैसे आत्मसात कर रखा है। मर्दवाद जो स्त्री प्रश्न की एक सबसे बड़ी बुनियादी विरोध की अवधारणा है और उसके साथ स्त्रीत्व के सवाल पर आऊंगा। रोहिणी अग्रवाल हिन्दी की बड़ी नारीवादी आलोचक समझती जाती हैं। उन्होंने कई किताबें लिखी हैं। तस्लीमा नसरीन की एक कविता को उन्होंने उद्धृत किया है कि ये पुरुष जो है न स्त्रियों को खरीद के लाते हैं, घर में उसका मनमाना इस्तेमाल करते हैं और उसके बाद लात मारकर भगा देते हैं उसको। उसने कहा, मेरी भी इच्छा होती किसी लड़के को ऐसे ही लाऊं। और ऐसा ही उसका उपभोग करूं, मेरी बड़ी इच्छा होती है, लड़के खरीदने की, जवान लड़के, छाती पर उगे घने बाल, उन्हें खरीदकर, पूरी तरह रौंदकर, उनके सिकुड़े हुए अंडकोष पर जोर से लात मारके कहूं- भाग साले। ये कविता तस्लीमा नसरीन ने लिखी, एक नारीवादी ने। दूसरी नारीवादी ने आलोचना लिखी- कैसी आग उगलती कविता है, फायर गर्ल है तस्लीमा। अब तो उल्टा खेल खेलने की जरूरत है। पुरुषों को समझ में नहीं आता कि स्त्रियों को ऐसे रौंदकर जब हम लात मारकर भगाते हैं, तो कैसा महसूस होता है। हम उनको महसूस कराएंगे ऐसे। उनकी दुनिया में तभी हाहाकार मचेगा। मगर जरा ठहर के सोचिए कि ये एक स्त्री शोषण के सवाल पर एक तात्कालिक आवेगपूर्ण प्रतिक्रिया, एक उग्र प्रतिक्रिया के अलावा इसमें और क्या है? किस लड़के को खरीदकर ले आएगी तस्लीमा नसरीन? हमें आपको तो नहीं खरीद सकती? किसी कमजोर गरीब घर के, किसी आदिवासी-दलित लड़के को लेके आएगी, क्योंकि लड़कियां भी तो उसी प्रकार की पाते हैं पुरुष। तो आप एक कमजोर और गरीब लड़के को वैसे ही खरीद के ले आओगे, जैसे कमजोर और गरीब लड़कियों को लेकर कोई ले आता है? ये कोई नारीवाद नहीं है। ये एक घटना की प्रतिक्रिया हो सकती है, लेकिन इसी उग्र प्रतिक्रिया में आप उस मर्दवादी अवधारणा को आत्मसात कर ले रही हैं, जो मर्दवादी धारणा शरीर का इस प्रकार का उपभोग करके लात मारके उसको भगा देती है।

मर्द को मुक्त समझना और मर्द के जैसा बनने की कोशिश करना नारीवाद नहीं है। मर्दवाद अपने आप में घृणित चीज है। पुअर बॉय्ज़ डोंट क्राई- लड़के रोते नहीं हैं। हममें से कोई नहीं होगा, जिसने बचपन में एक-दो बार ये वाक्य न सुना हो। खेल से लौट के या झगड़े से घर जब भी हम आते थे, हमारी मां बहने कोई न कोई हमसे जरूर कहता था- ए लड़का होके रोता है। लड़कियों की तरह से रोने बैठ गया। हमें जो मर्द होना सिखाया जाता है बचपन से। ये मर्दवाद सबसे ज्यादा खतरनाक अवधारणा है, नर को मर्द बनाना, मादा को स्त्री बनाना, ये हमारे समाज की संस्कृति की बहुत बुनियादी समस्या है। न लड़के रोते हैं, न लड़कियां रोती हैं, मनुष्य रोता है। मनुष्य होने के कारण हम रोते हैं। ये स्त्री पुरुष का विभाजन सबसे झूठा और मिथ्या विभाजन है। ये उतना ही मिथ्या विभाजन है जितना मिथ्या विभाजन जाति का विभाजन है। तुमी देखो नारी-पुरुष, आमी देखी सिगोई मानुष- तुम हर जगह स्त्रियों और पुरुषों को देख रहे हो, मैं तो सिर्फ मनुष्यों को देख पा रहा हूं।

स्त्री पुरुष की अवधारणा एक झूठी अवधारणा है। दोनों मनुष्य हैं, दोनों ही की जरूरत एक है। दोनों की भावना एक है। शरीर की बनावट से इस चीज में कोई फर्क नहीं पड़ता। इसलिए मैं समझता हूं कि हमारे देश में और पूरी दुनिया में संस्कृति को बदलने की जो लड़ाई है, उसका एक बुनियादी मुद्दा होना चाहिए स्त्री और पुरुष के विभाजन को खत्म करना। जहां भी स्त्री और पुरुष का विभाजन आप देखें, उसका विरोध करें। जिस प्रकार मर्दवाद एक झूठी अवधारणा है, जो नर को खूंखार बनाती है, उसी प्रकार स्त्रीत्व की अवधारणा भी इतनी ही गलत और बेबुनियाद अवधारणा है, जो स्त्री को घुटनाटेकु बनाती है। उन्हें स्त्री-पुरुष बनाके हम उनकी मनुष्यता को उनसे छीन लेते हैं।

आप जानते हैं ये रेप वगैरह जो है कैसे मर्दानगी का काम समझा जाता है। सावरकर ने एक किताब लिखी- Six Golden Epochs of Indian History भारतीय इतिहास के छह स्वर्णिम अध्याय। शिवाजी पर उन्होंने लिखा है कि शिवाजी जैसे महान प्रतापी राजा ने भी कैसी गलतियां कीं, जब उन्होंने मुगलों को हरा दिया और मुगल सेना भाग गई और उन सबकी स्त्रियां हमारे चंगुल में आ गई थीं, तब शिवाजी ने उनको अपने हरम में लाने और सबके साथ आनंद लेने के बजाए उनको मुक्त कर दिया। ये पुरुषार्थ की कमी शिवाजी ने क्यों दिखाई? आप सोचिए कि शिवाजी ने स्त्रियों का आदर किया, मुस्लिम स्त्रियों को, उनको छोड़ दिया, कुछ भी नहीं किया उनके साथ, बल्कि अपने सैनिकों से कहा कि वे इज्जत के साथ इनको घर पहुंचा आएं। तो ये शिवाजी ने पुरुषार्थ का काम नहीं किया! पुरुषार्थ का काम होता अगर वे उन सबसे बलात्कार करवाते अपने सैनिकों से। ये पुरुषार्थ की अवधारणा है! लेकिन ये पुरुषार्थ की अवधारणा हमेशा ऐसी खूंखार नहीं होती है। जो लोग बलात्कार की बात नहीं करते हैं, जो लोग यौन हिंसा की बात नहीं करते हैं, वे भी उतने ही मर्दवादी हैं। समाज में ऐसी संस्थाएं हैं, बहुत सी संस्थाएं, भद्र लोग, हमारे घर के लोग, वो थोड़े कहते हैं कि स्त्रियों से बलात्कार करो या उन पर हिंसा करो। वो कहते हैं- स्त्रियों के साथ अच्छा बर्ताव करना चाहिए। मर्यादा का पालन करना चाहिए और स्त्रियों को भी मर्यादा में ही रहना चाहिए। सबको अपनी मर्यादा का पालन करना चाहिए। ज्यादातर पुरुष समाज जो है यही बात करता है, इससे मर्दवाद में कोई फर्क नहीं पड़ता। ये भी वही बात कह रहे हैं लेकिन बहुत दूसरे तरीके से। मर्दवाद का मतलब ये नहीं कि वो जो बलात्कार करेगा और हिंसा करेगा, खूंखार रूप में तभी वो मर्दवाद होगा, नहीं, वो स्त्री से बहुत अच्छा बर्ताव करते हुए भी….

तुम घर में रहो, काम करो, बाहर भी जाओ, समय पर आ जाया करो बेटे। ज्यादा अंधेरे में बाहर नहीं रहना और देखो दोस्तों के साथ ज्यादा नहीं जाना, तुम आ जाओ घर में, हमलोग सब तुम्हारे साथ हैं। ये भी उसी चीज को बहुत अच्छे ढंग से कह रहे हैं। और बाहर जाओगी तो फिर…..अगर ये हमारी बातें नहीं मानोगी, इस मर्यादा को नहीं मानोगी, तो फिर वही होगा जो बाहर होता है और जिसके लिए वीर सावरकर ने कहा। तो एक ही सिक्के के दोनों पहलू हैं। इसी प्रकार से मैं कहना चाहूंगा कि स्त्रीत्व की धारणा भी उतनी ही बेबुनियाद है, जिसमें बहुत सारी स्त्रियां स्वाभाविक रूप से विश्वास करती हैं। स्त्रियों के अंदर करुणा होती है, स्त्रियां ममतामयी होती हैं। उनके अंदर अपने बलिदान की भावना भरी होती है- ये सब स्त्रियों को बनाया जाता है। इस प्रकार से उनकी मनुष्यता को, उनकी स्वाभाविक आकांक्षाओं को, उनकी स्वाभाविक प्रकृति को उनसे ही छीन लिया जाता है। उनको स्त्री के रूप मे ढाला जाता है। तो यह  मनुष्य की संस्कृति की बहुत बुनियादी समस्या है। और ये खाली समाजवाद के आ जाने से, खाली बुनियादी आधार बदल जाने से हल नहीं हो जाएंगी। संस्कृति की लड़ाई बहुत लंबी लड़ाई है। जब तक आप विचारधारात्मक संघर्ष इस पर नहीं चलाएंगे, आपसे वो कभी हल होने वाली नहीं हैं। माओत्से तुंग का जो आखिरी इंटरव्यू एडगर स्नो ने लिया था 72-73 के आसपास, उसमें उन्होंने माओ से पूछा- चीन में समाजवाद तो आ गया, ये बताइए स्त्री और पुरुष की बराबरी चीन में कब तक आएगी, आपको क्या लगता है? माओत्से तुंग ने कहा- चार-पांच सौ साल से पहले नहीं आने वाली।

मैं समझता हूं कि उसे आप चार-पांच सौ साल से भी ज्यादा सोच सकते हैं। क्योंकि यह संस्कृति की लड़ाई है। स्त्री विमर्श पूरे समाज के लोकतांत्रिक रूपांतरण और समाजवाद की भी एक बहुत बुनियादी लड़ाई है। अगर स्त्री विमर्श इस सवाल का सामना नहीं करता है, दो-चार नहीं होता,  तो वो कितना संकीर्ण रह जाएगा, हम समझ सकते हैं।

प्रो.वीर भारत तलवार

प्रो.वीर भारत तलवार

प्रो.  वीर भारत तलवार,  प्रख्यात हिन्दी आलोचक, जेएनयू में प्राध्यापक। उनसे virbharattalwar@gmail.com पर संपर्क संभव है। 

हैदराबाद में दिये गए व्याख्यान का अंतिम अंश।
साभार समकालीन जनमत 

Tzameti: A Thriller about Thrill: Gazala Meena

 13 Tzameti is an acclaimed and highly talked over  film. This film occupies first position in the list of  Director Anurag Kashyap’s top ten favourite films. Anurag has requested all to watch this great cinema work before dying. Gazala has written this analytical commentary on 13 Tzameti for Tirchispelling.

By Gazala Meena

A thriller about thrill Tzameti (13), the directorial debut of Gela Babluani, spins our senses through lethal rounds of Russian Roulette leaving the irony of chance and the perversion of pleasure to unfold. The narrative, at the onset, engages with desperation; the desperation of a Georgian immigrant Sebastein living in France, who is struggling to make ends meet doing irregular construction jobs and the desperation of Godon, Sebastein’s temporary employer, a morphine addict whose monetary savings are on the verge of exhaustion. While, Sebastein’s immediate dependence is on the payment from Godon; Godon hopes to make a large sum of money by doing something which he defines as “It worked last time. That was last time”. However, Godon is unsure whether the opportunity to do that ‘something’ will come by or not. This ‘something’, an apparent mysterious job is what gives motion and suspense to the narrative involving games; the game of chase and the game of chance (gambling). With Godon dead due to an overdose, an anxious Sebastein steals the letter concerning the mysterious job which is also of immense interest to the police authorities. Following the leads from the letter an oblivious Sebastein embarks on an unknown quest for sudden riches, dodging the authorities on the way. On his arrival to the destination Sebastien, is no longer Sebastein, he is Tzameti, the Georgian word for 13; a number not a living being. To his utter horror the mysterious job unravels as a deadly game of Russian Roullette where expensive bets are placed on and placed by men. A shaken 13 realizing that he is on a one way track, lines up in a circle with other numbers, most of whom are on a high dose of morphine to be able to withstand what is being asked of them, that is, to shoot or get shot; on a stage like setting, a platform walled on three sides, as the audience wait for the bulb to light and the shots to be fired. Between pointing a gun to someone’s head and a gun pointed to one’s own head the players grapple with conflicting emotions: the ethical question of killing someone and the fear of being killed. It’s all a matter of a few minutes before the moment comes when one’s own life and the other’s is not in one’s hand. It all is a matter of chance, luck and fate as the cylinders with bullets less than their capacity are spun and shots are fired. Multiple rounds are played before the unlucky numbers fall to the ground with bloodied heads and the lucky number becomes the sole survivor, disillusioned on what to react to: winning the gamble, having killed people or just being alive. Irony is underlined as 13, which for irrational reasons is considered an unlucky number, turns out to be the lucky sole survivor, however, in the end becomes a victim of greed and is shot and left to die on a moving train.

The director skilfully creates a cold, dark, grim and real world in minimalist fashion and manages to dramatize malicious thrill and helplessness in a contained manner. Throughout the film, the director keeps the camera close to the actors, primarily using close up, medium close up and extreme close up, because it is the actor’s bodies where action takes place. The viewer is put in close proximity of the actors so that he/she is forced to read the gestures and feel the emotional fluctuations. Crafted in black and white this film goes beyond the anticipation, anxiety, adrenaline rush, forcing the viewer to the edge of one’s seat; it compels the viewer to acknowledge the irony of chance, question the nature of entertainment and the mocking limitation of choices and above all forces the viewers to reflect upon the cruel culture of gambling. The quintessential element of this film is its black and white colour which symbolizes a dichotomy. The dichotomy between win and loss, life and death, owner and owned, choice and no choice, “haves” and “have-not”,  thrill seeker and thrill giver, pleasure and pain so on and so forth. Tzameti situates this dichotomy within the context of entertainment, a particular kind involving a game of chance (gambling) which is bloody and brutal in nature.

13 Tzameti (2005)

13 Tzameti (2005)

Gambling on blood sports, like horse racing, dog fights, cock fights, bull fights, and gladiatorial combats has been going on since time immemorial. While, tracing the nature of gambling during various historical periods with their specific social, political and economic structures; the similarity between the outcome, volition and choice of the actors and the similarity between the audience (gamblers/bettors) becomes evident. In slave societies a slave was the personal property of the property owning class (ruler, nobility) and was coerced to participate in gladiatorial bouts; he had no will (he had to play even if he did not want to), neither did he have a choice (he had to kill to stay alive) and the outcome was either life or death. And this cycle would continue until the slave dies. Under feudalism a serf though not the personal property of the property owning class (ruler, nobility, landlords) was ultimately tied to their property for livelihood. A disproportional economic system co-opted the serf into gambling games leaving him with no will and no choice, while the outcome for him was either death or life with temporary and limited material gains. In a capitalist society emerged an unequal economic system which thrives on the exploitation of labour of the working class by the class that owns the means of production. Possessing nothing but their labour (life), the existence of the working class is reduced to the one of instability and uncertainty which propels them into being pawns in a game, without any will or choice, the pleasure of which is the prerogative of the elite few. While the outcome that these pawns are left with is similar to their historical antecedents, that is, either death or temporary and limited material gains. However, this outcome is less a matter of one’s fate, rather it is rooted in the fate designed for them by the existing economic realities.

Tzameti delves into the dynamics of a deadly game of gambling in a capitalist society, where there are two classes of players involved. One is the active participant who plays for his life; and the other, the passive participant who puts enormous amount of money at stake while, playing for the experience of a vulgar thrill. One participates as the actor/entertainer and the other as the audience/entertained. While, one group struggles with ethical questions, mental and emotional trauma and fear of death; the other group’s senses are tickled with the perverse revelry induced by the performance: a performance in which fear and guilt simultaneously dance on ghostly faces to the bone chilling music of rotating cylinders and deafening bang of gun shots and the stage turns red with blood vomiting bodies and faces turn white of those still standing frozen. While one group has nothing to gain (except the so called lucky one who wins an amount of money which comes with an expiry date) but their lives to lose; the other group has money to win/ money to lose; but above all a sadistic pleasure to relish. The film ends with the lead actor, Sebastein, after being shot somehow manages to sit on a window side seat of a moving train, which it seems is taking him to his death. The moving train is symbolic of a cruel system which moves on even with the burden of dead bodies.

 “Gambling is the son of avarice and the father of despair”

 

Gazala Meena

Gazala Meena

Ghazala Meena is a PHD research scholar in School of International Studies in JNU, New Delhi. She is currently residing in  Japan for her research work.

What is Most Terrifying: Paash, Translated By Meera Vishvanathan

(मीरा विश्वनाथन शुरुआत से ही tirchhispelling की सहयोगी रही हैं। पाश की बहुचर्चित कविता ‘सबसे खतरनाक…’ से भारतीय बौद्धिक समाज भलीभाँति परिचित है। आज मज़दूर दिवस है, और मीरा ने खास कर इसी दिन के लिए इस कविता का अनुवाद किया है। जब कोई कविता सबसे अधिक चर्चित और अनूदित हो, वैसे समय में अनुवाद-कार्य बहुत चुनौती-पूर्ण होता है। मीरा ने इस चुनौती को स्वीकार किया है। यह कविता हिंदी से अनुदित है, अंत  में हिंदी पाठ भी दे दिया गया है. tirchhispelling के लिए वे आगे भी इसी तरह से सहयोगी रहेंगी, ऐसा उनका वायदा है। )

Paash With Amarjeet

Paash With Amarjeet

What is Most Terrifying …

 

The loot of labour is not so terrifying

A thrashing by the police is not so terrifying

The fist of greed and betrayal is not so terrifying

To be caught, sleeping or sitting, is bad, it is true

To be bound in frightening silence is bad, it is true

But not the most terrifying of all.

To be silenced in the clamour of deceit

Even while being right, is bad, it is true

To begin to read in a firefly’s light is bad, it is true

To clench one’s teeth and get through time is bad, it is true

But not the most terrifying of all.

What is most terrifying

Is to be filled with stillness, like a corpse,

Without any agitation, to endure it all

To go from home to work

And from work to home again

What is most terrifying

Is the death of our dreams.

What is most terrifying is the watch that runs

Upon your wrist, but stops —

Waiting, for a single glance.

What is most terrifying is the eye that sees

Everything, but remains cold as ice.

Which has forgotten what it means

To view this world with love

Which is enamoured by the fog that rises

From the darkness surrounding things,

Which drinks from the ordinariness of routine

And loses itself in the repetitive cycles of aimlessness.

 What is most terrifying is the moon that rises

Over empty courtyards

After each night of killing

But refuses to burn like chilies thrown into your eyes.

What is most terrifying is the song

That leaps in lamentation,

So as to reach your ears,

Which bellows, like a thug,

At the doors of frightened people.

What is most terrifying is the night that falls

On the skies of living souls

Where only owls cry jackals howl

And whose eternal darkness sticks to the four corners of closed doors

What is most terrifying is the direction in which

The soul’s sun goes down and drowns

And from whose dead sunlight, a single fragment comes

To pierce through your body’s east.

No, the loot of labour is not so terrifying            

A thrashing by the police is not so terrifying

The fist of greed and betrayal is not so terrifying at all.

Meera Visvanathan

Meera Visvanathan

Meera Visvanathan is a student of the Ph.D programme at the Centre for Historical Studies (Jawaharlal Nehru University).

सबसे खतरनाक….

श्रम की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती

ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती
बैठे-सोए पकड़े जाना- बुरा तो है
सहमी-सी चुप में जकड़े जाना बुरा तो है
पर सबसे ख़तरनाक नहीं होता

कपट के शोर में

सही होते हुए भी दब जाना बुरा तो है
किसी जुगनु  की लौ में पढ़ने लग जाना- बुरा तो है
भींचकर जबड़े बस वक्‍़त काट लेना- बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता


सबसे ख़तरनाक होता है

मुर्दा शांति से भर जाना
न होना तड़प का, सब कुछ सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर आना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना

सबसे ख़तरनाक वो घड़ी होती है
तुम्हारी कलाई पर चलती हुई भी जो
तुम्हारी नज़र में रुकी होती है

सबसे ख़तरनाक वह आंख होती है
जो सबकुछ देखती हुई भी ठंडी बर्फ होती है

जिसकी नज़र दुनिया को

मुहब्बत से चूमना भूल जाती है
सबसे ख़तरनाक वो गीत होता है
जो चीजों से उठती अंधेपन की

भाप पर मोहित हो जाती है

जो रोज़मर्रा की साधारणतया को पीती हुई

एक लक्ष्य हीन दोहराव के दुष्चक्र में खो जाती है

 

 

सबसे ख़तरनाक वह चांद होता है
जो हर क़त्ल-कांड के बाद
वीरान हुए आँगनों में चढ़ता है
लेकिन तुम्हारी आंखों में मिर्चों की तरह नहीं पड़ता है

सबसे खतरनाक वह गीत होता है

तुम्हारे कान तक पहुँचने के लिए

जो विलाप को लांघता है

डरे हुये लोगों के दरवाज़े पर जो

गुंडे की तरह हुंकारता है

सबसे खतरनाक वह रात होती है

जो उतरती है जीवित रूह के आकाशों पर

जिसमें सिर्फ उल्लू बोलते गीदड़ हुआते

चिपक जाता सदैवी अँधेरा बंद दरवाज़ों के चौगाठों पर

 

सबसे ख़तरनाक वह दिशा होती है
जिसमें आत्‍मा का सूरज डूब जाए
और उसकी मुर्दा धूप की कोई फाँस
तुम्हारे जिस्‍म के पूरब में चुभ जाये
श्रम की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती ।

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