Archive for the month “January, 2013”

प्रगतिशील आंदोलन के ७५ साल: प्रणय कृष्ण

By प्रणय कृष्ण

स्व.सुरेंद्र चौधरी ने लिखा था,” स्वतंत्रता  और  मुक्ति की इच्छा की जो  लड़ाई सदी भर से चली आ रही थी, उसका एक सुफल भारतीय मानस को यह प्राप्त हुआ था कि उसने अपनी अजेय शक्ति को पहचानने की दिशा में एक कदम और आगे बढ़ाया  था. किसान-मज़दूर और मध्यवर्ग  का विशाल मोर्चा  तैयार हो रहा था……… प्रगतिशील लेखक संघ का विशाल राष्ट्रीय मोर्चा उसी का एक नाभिक था.  ऐसा विशाल मोर्चा सन 1946 के बाद फिर कभी न बना.”(“स्वाधीनता संग्राम और हिंदी साहित्य”(1994) शीर्षक लेख, इतिहासः संयोग और सार्थकता, पृ 128-132)

courtesy: sahmatThose who attendedthe formation conference of the Progressive Writers’ Association in Lucknow.

courtesy: sahmatThose who attendedthe formation conference of the Progressive Writers’ Association in Lucknow.

आज प्रगतिशील लेखक संघ के 75वे साल में उस परिघटना को याद करना आज की परिस्थिति में वैसे विशाल मोर्चे को तैयार करने के कार्यभार के प्रति फिर से समर्पित होना है. यह तब के मुकाबले आज  और भी मुश्किल कार्यभार है. लेकिन इतिहास जब भी कोई चुनौती फेंकता है, मानवेच्छा स्वभावत: उसे स्वीकार करती है. प्रगतिशील लेखक संघ जिस खमीर से पैदा हुआ था , उसका दायरा देश-काल में उस नाम के संगठन से बहुत बडा था. सज्जाद ज़हीर के1936 में बनाए गए संगठन का मह्त्व यह था कि वह पहला महान प्रयास था जिसने इस पूरे दायरे की रचनात्मक-क्रांतिकारी सम्भावना को चरितार्थ करने का सपना दिखाया और उसे हकीकत में बदलने की पुरज़ोर कोशिश की. आज अगर एकाधिक संगठन (प्रलेस,जलेस,जसम और दूसरे भी कई संगठन ) इस दिशा में सक्रिय हैं तो यह उस स्वप्न की विराटता का ही सबूत है, उसके अपूर्ण कार्यभार  का भी और उसके आत्मसंघर्ष का भी. यों ही नहीं है कि जब साहित्य में आधुनिकतावाद और व्यक्ति-स्वातंत्र्य के दबदबे के दौर में त्रिलोचन, केदार,नागार्जुन जैसे बड़े कवि उपेक्षित और अलक्षित किए गए, तो सत्तर के दशक में नक्सलबाड़ी और निरंकुशता विरोधी आन्दोलनों के उभार ने इन्हें फिर केंद्र में ला बिठाया. उनका केंद्र में आना नए जनांदोलनों की चेतनागत ज़रुरत थी. ‘इप्टा’ के स्वर्णिम युग के बाद जन नाट्य मंच, बादल सरकार के तीसरे थियेटर और बिहार के किसान संघर्षों के इलाकों में युवानीति जैसे समूहों ने जगह खाली न रहने दी. जब फिल्मों में बलराज साहनी , ए.के. हंगल, ख्वाजा अहमद अब्बास की पीढी के बाद कमर्शियल सिनेमा की तूती बोल रही थी, तब १९८० के दशक में अचानक ही निहलानी, बेनेगल से लेकर सईद मिर्ज़ा तक न्यू वेव सिनेमा के उन्नायकों की कतार सामने आ गयी. यदि आज चित्रकला की दुनिया के चरम व्यावसायिकता के दौर में हमारे कुछ साथी चित्त प्रसाद, सोमनाथ होड़ और जैन-उल-आबेदीन की विरासत की नए सिरे से आवाज़ दे रहे हैं , तो यह अकारण नहीं है.

पाकिस्तान में तो न केवल कम्युनिस्ट पार्टियां प्रतिबंधित हुईं , बल्कि तरक्कीपसंद तहरीक का हर तरीके से दमन किया गया. बावजूद इसके फैज़ और जालिब जैसे शायर जनता की अंतरात्मा की आवाज़ बन गए. अदब ने वहां वो किया , जो राजनीति नहीं कर सकी. इस्लाम की रामनामी ओढ़ तानाशाह जब जनता को गुमराह कर रहे थे, तो जनता को सजग करने वाले ये कवि ही थे-

ख़तरा है जरदारों को
गिरती हुई दीवारों को
सदियों के बीमारों को
ख़तरे में इस्लाम नहीं

सारी जमीं को घेरे हुए हैं आख़िर चंद घराने क्यों

नाम नबी का लेने वाले उल्फ़त से बेगाने क्यों

ख़तरा है खूंखारों को
रंग बिरंगी कारों को
अमरीका के प्यारों को
ख़तरे में इस्लाम नहीं
(हबीब जालिब )

कहने का मतलब यह कि प्रगतिशील आन्दोलन महज इतिहास नहीं , बल्कि एक जीती-जागती परम्परा है जिसकी ज़रुरत आज के हमारे समाज को और भी ज़्यादा है.

सच कहा जाए तो प्रगतिशील लेखक संघ संगठन से ज़्यादा आन्दोलन था. उसने सामाजिक यथार्थ, इतिहास-दृष्टि और मेहनतकश समुदाय के नेतृत्व में मानव  मुक्ति की विचारधारा को  पूरे उपहादीप के साँस्कृतिक परिवेश का अपरिहार्य और जीवंत अंग बना दिया. देश बंटे, पार्टिया बंटी, लेकिन  यह साँस्कृतिक समझ और उसकी क्रियागत परिणति नाम-रूप बदल-बदल कर अपने वजूद का प्रमाण देती रही. जनता के साथ कंधे से कंधा मिलाकर  लडने वाले कलाकार और लेखक, जनांदोलनो से अपने व्यक्तित्व और कृतित्व को समृद्ध करनेवाले बौद्दिक और यहाँ तक कि जेल जाने से लेकर लडते हुए शहीद हो जानेवाले संस्कृतिकर्मियो की लम्बी कतार  देश की आज़ादी और तक्सीम के बाद भी यदि जारी रही,तो यह इसी आंदोलन की उपलब्धि है, नाम गिनाने की ज़रूरत नहीं.  सबसे बड़ी बात कि इस आन्दोलन के साथ चलनेवालों नें उच्चतम इंसानी मूल्यों की प्रतिष्ठा की, साधारणता में महानता को लक्षित किया, समकालीन और कालजयी की दूरी पाट दी, सभ्यता के जंगलों की परिक्रमा की, अपने रचनाकार व्यक्तित्व में नए के जन्म की प्रसव पीड़ा भोगी-

” आगे-आगे माँ
पीछे मैं;
उसकी दृढ़ पीठ ज़रा सी झुक
चुन लेती डंठल पल भर रुक
वह जीर्ण-नील-वस्त्रा
है अस्थि-दृढ़ा
गतिमती व्यक्तिमत्ता
कर रहा अध्ययन मैं उसकी मज़बूती का
उसके जीवन से लगे हुए
वर्षा-गर्मी-सर्दी और क्षुधा-तृषा के वर्षों से
मैं पूछ रहा –
टोकरी-विवर में पक्षी-स्वर
कलरव क्यों है
माँ कहती –
‘सूखी टहनी की अग्नि क्षमता
ही गाती है पक्षी स्वर में
वह बंद आग है खुलने को।’
(एक अंतर्कथा-२, मुक्तिबोध)

इस पत्रिका के पिछले दो अंको में हमारे दो सम्मानित अग्रजो ने विस्तार से बताया है कि कैसे इस आंदोलन की व्याप्ति साहित्य, सिनेमा, थियेटर,चित्रकला और यहाँ तक कि आज़ाद उपमहाद्वीप के इतिहास-लेखन, मानविकी, दर्शन और सामाजिक विग्यानो तक रही. उन्हें दोहराने की ज़रुरत नहीं.

आज़ादी के बाद जनवादी क्रान्ति के लक्ष्यों की पेचीदगी से वास्तविक सामना हुआ. प्रगतिशील आन्दोलन ने अपनी सामंतवाद और साम्राज्यवाद-विरोधी भूमिका के निर्वाह में अनेक अंतर्विरोधों का सामना किया, तीसरी दुनिया के देशों ,खासतौर पर एफ्रो-एशियाई देशों के लेखकों के अंतर्राष्ट्रीय मोर्चे से जुड़ा, प्रतिक्रया की ताकतों से शीत-युद्ध के दौर में जूझा, उप-महाद्वीप की जनवादी सांस्कृतिक परम्परा का नव-संधान किया,भारतीयता के साम्राज्यवादी-औपनिवेशिक भाष्य पर करारा पलट-वार किया (याद करें रामविलास शर्मा का कृतिव).

किन्तु शीत-युद्ध के बाद की स्थितियां काफी बदली हुई हैं. दुनिया का शक्ति-संतुलन बदला हुआ है. नई साम्राज्यवादी विश्व-व्यवस्था ने विकल्पहीनता के मिथक को गढा, लेकिन उसे तत्काल ही लैटिन अमरीकी मुल्कों से चुनौती मिली. विश्व-पूंजी के मुनाफे दी दर घटते जाने से वह और खूंखार होकर अल्पविकसित और विकास-शील देशों की गरीब जनता पर टूट पडी है. इन देशों के हुक्मरानों ने कारपोरेट हितों में जनता की एकता को तोड़ने के हज़ार हथकंडे अपना लिए हैं. पस्तहिम्मत लोगों की नयी सोच है-‘ इफ यू कांट बीट देम, ज्वायन देम’. लेकिन फिर भी हम भारत में ही देख सकते हैं कि सैकड़ों छोटे-बड़े आन्दोलन फूट पड़े हैं. आदिवासी और किसान बगैर किसी संगठित बैनर के भी व्यवस्था से, कारपोरेट लुटेरों से टकरा जा रहे हैं. लड़ने के तरीके सही हों या गलत,जिनकी जान पर बन आई है, वे सही विकल्प और नेतृत्व का इंतज़ार कहाँ तक करें? क्या ज़रूरी नहीं हो गया है कि प्रगतिशील सांस्कृतिक आन्दोलन उस बौद्धिक, सांस्कृतिक आबोहवा का निर्माण करे जिससे इन तमाम आन्दोलनों का दम न घुटे और वे सही विकल्प की दिशा में अग्रसर हो सकें?

हम नहीं कहते कि इस आन्दोलन में अंतर्विरोध नहीं रहे या नहीं हैं, यह भी नहीं कहते कि वह कभी गतिरुद्ध नहीं हुआ. आन्दोलन ने गलतियां भी कीं और उनसे सीखा भी और कई बार सीख के भुला भी दिया. मुगालते भी पाले और झटके भी खाए. संकीर्णता और उदारतावाद के आत्मघाती दौर भी आए. लेकिन कोइ ज़रुरत तो है इतिहास और समाज की जिसके चलते यह आन्दोलन खुद को टिकाए रख सका है. आज के दौर में तमाम सवाल प्रगतिशील आन्दोलन के समक्ष मुंह बाए खड़े हैं. सांस्कृतिक प्रतिरोध् के कौन से रूप हो सकते हैं? संस्कृति या कला के राजनीतिकरण की दिशा क्या हो सकती है? किस तरह की संस्थाएं हम बना सकते हैं? क्या प्रतिरोधी सांस्कृतिक कर्म का जनांदोलनों से रिश्ता वैसा है जैसा कि कभी रहा था या जैसी आज की परिस्थिति की मांग है?  क्या साहित्य, कला, संगीत, सिनेमा, नाटक या फिर बौद्धिक विमर्शों के क्षेत्र में काम कर रहे लोग व्यवस्था-विरोधी आंदोलनों की चेतना को बड़े पैमाने पर अभिव्यक्त कर पा रहे हैं? देश के गरीबों का एक बहुत बड़ा तबका अपनी-अपनी जाति के बड़े लोगों के पीछे अपने सांस्कृतिक-वैचारिक पिछड़ेपन के कारण घिसट रहा है। जाहिर है यह स्थिति गरीबों  को सचेतन वर्ग के रूप में राजनीतिक रूप से गोलबंद होने से रोकती है। क्या हमारा संस्कृतिकर्म उन वैचारिक और सांस्कृतिक जंजीरों से उन्हें मुक्त करने में कोई भूमिका निभा रहा है जिनमें जकड़े हुए वे अपने ही शोषकों को मजबूत करने को अभिशप्त हैं?जिनके पास संघर्षों के अनुभव हैं उनके पास अभिव्यक्ति के साधन नहीं और जिनके पास अभिव्यक्ति के साधन और कौशल है उनके पास उन अनुभवों का आत्मीय परिचय नहीं। क्या औपनिवेशिक समय से ही मौजूद इस खाईं को हमारा साहित्य पाट पाया है?क्या लेखकों के विचारधारात्मक रूपान्तरण, अंतर्वस्तु और रूप के द्वंद्वात्मक संबंध् तथा संप्रेषण की
समस्या को हमने सुलझा लिया है? यह समस्या कहीं और पेचीदा तो नहीं हो चली है ?

क्या साहित्य और संस्कृति के समाजशास्त्र,उसकी राजनीति और सामाजिकता, संस्कृति विमर्श के समकालीन संदर्भ, साम्राज्यवाद के सांस्कृतिक हमले के दौर में जनभाषाओं की चुनौतियों, साहित्य में वर्ग की अवधरणा को आज के सन्दर्भ में हम परिपक्व सैद्धांतिक स्तर पर सूत्रबद्ध कर पाए हैं? क्या स्त्री , दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक समूहों की अस्मिता के साहित्य के वर्गसार को हम वैचारिक स्तर पर विश्लेषित कर उन्हें गरीब तबकों के संघर्षों की वर्गसचेतन अभिव्यक्ति की दिशा में प्रेरित कर सके हैं? क्या हमने फौरी कार्यभारों के अलावा नागरिक समाज की तमाम संस्थाओं में हस्तक्षेप की किसी दूरगामी योजना के लिए कोइ होमवर्क किया है? इन सवालों पर गंभीरता से सोचें तो कार्यभार हमारे सामने खुद ब खुद स्पष्ट होता चला जाएगा.

यह आन्दोलन इतने उतार -चढ़ाव देख चुका है कि न तो कोई भ्रम इतना बड़ा हो सकता है कि हमें अपनी कमजोरियों से गाफिल कर दे और ना ही कोइ नाउम्मीदी ऐसी हो सकती है जो हमें चुनौतियों से ही विमुख कर दे. बकौल फैज़,

‘यूँ ही हमेशा उलझती रही है ज़ुल्म से ख़ल्क़
न उनकी रस्म नई है, न अपनी रीत नई
यूँ ही हमेशा खिलाये हैं हमने आग में फूल
न उनकी हार नई है न अपनी जीत नई’

Pranay Krishna, Photo By Vijay Kumarप्रणय कृष्‍ण। इलाहाबाद युनिवर्सिटी और जेएनयू से अध्‍ययन। प्रखर हिंदी आलोचक। जन संस्‍कृति मंच के महासचिव।  देवीशंकर अवस्‍थी सम्‍मान  से सम्मानित ।

(यह लेख प्रगतिशील आंदोलन के ७५ साल होने पर ‘पब्लिक एजेंडा’ पत्रिका द्वारा चलाई गई लेखमाला के अंतर्गत प्रकाशित हुआ था. लेखमाला में पहला लेख श्री विश्वनाथ त्रिपाठी का, दूसरा श्री मुरली मनोहर प्रसाद सिंह तथा तीसरा श्री प्रणय कृष्ण का लेख था. यह तीसरा लेख यहाँ दिया जा रहा है)

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LANGUAGE, POLITICS AND HUMAN NATURE: AN INTERVIEW WITH PAOLO VIRNO

Potoperaio

Translated and introduced by K.W. Molin

This interview was conducted in April 2001 as part of Pozzi, Roggero and Borio’s project that then produced the book “Futuro Anteriore”, a transcript of which can be found in Italian here.

Largely still untranslated into English, besides the two texts A Grammar of the Multitude (2004) and Multitude Between Innovation and Negation (2008), semiologist Paolo Virno is no doubt one of the key figures of the Italian post-Marxist strain. Speaking about his past experiences in such way that crosses between veiled ironies, reflections of the day or in retrospect, provocative re-appropriations and non-dialectical negations, this recent lengthy interview moves in a multitude of directions: from his own cultural formation, his involvement in militant activity and in several magazine projects, to the general intellect seen as a tug of war and a call to engage critically with our opponents. Virno spares little effort in analysing life within the changed paradigm brought by the emergence of post-Fordism, particularly in terms of its implications in forcing through a critical scrutiny of trite Marxist categories of class composition.

Translating Virno is no easy task, given the importance he attributes to language, playing around with multiple meanings. It is partly a failure if one wishes exactness. To use one of his own notions, a translation as any other creative act has a potential for ‘innovation’, whether in the doing or in the reception it seeks to expand, as well as an element of ‘negation’.

What has been your path of political and cultural formation, and how did you begin militant activity?

I became politically active in Genoa, where my family lived and I went to high school. Genoa was exposed to Turin’s influence, where the first occupations took place in 1967; then, in the summer of that year, secondary school students mobilised (more lively than those at University, which instead were in contact with traditional party organisations, UGI [Union of Independent Youth] and so on).

As secondary school students we then formed the Sindacato degli Studenti [Union of Students], which in the autumn of 1967 made the first strikes on issues already typical of 1968, the struggle against authoritarianism, solidarity with the Greek students after the coup d’état and whatever else.

So, this was the initiation. Some of those with whom I engaged in politics at the time have had the most diverse destinies: from Carlo Panella who now works for Mediaset in Italy, to Franco Grisolia who is a secretary for Rifondazione [Communist Refoundation Party], a Trotskyite till this day without any alternation (this is what is good about Trotskyites, that they keep up with it!).

The school year 1967-1968 was entirely Genoese, with this type of experience that was important for us like for many others, but done in a working class town of the industrial triangle, thus with relations with the factories of Sanpierdarena: in any case, working class reality weighed immediately on student matters. Instead, in the autumn of 1968, again because of my family’s movement, I came to live in Rome, and not much later I got in contact and relations with the group that later became Potere Operaio [Worker’s Power], which was then essentially based in the capital as the group from the scientific faculties, the one of the base committees at the Fatme factory. Especially the latter, between the autumn of 1968 and the start of 1969, was a mass experience that opened and closed some successful struggles, where the workers took home concrete things on piecework, time, rhythms and so forth.

In Rome Potere Operaio was not yet really called as such, and the decisive experience was then that of La Classe[The Class] from the spring of 1969 in Turin. These are years of Italian history in which there is a historiographical point to make, that is also a theoretical paradigm: while on 1968 you find thousands of voices and another thousand on 1969, you find few, or at least few attentive ones, to what happened between the summer of 1968 and the summer of 1969, which is rather the point of maximum maturity of the basic themes of the Italian revolution. It’s the year of base committees and autonomous disputes in large and medium sized factories. So, in the warm autumn happen the factory councils of 1969 etc., and we know about 1968: whilst this in between season, which is instead the laboratory, even from a theoretical point of view, the most paradoxical, the most complicated to understand, remains in general perfectly ignored, if it wasn’t for those few people who claim a critical tradition. Thus, I made contact with those people in my school’s base committees, which consisted in forms of collective closeness through basic themes, those of La Classe, that is, salary, working hours, this materialism against all histories of consciousness, anti-authoritarianism, raw things, stuff from Frankfurt, ineffable: instead, there was an intellectual radicalism, in reality even theoretical, that was however short-circuited immediately by material conditions. I enter Potere Operaio after the crucial episodes of the spring of 1969 in Turin, after the national convention of the base committees at the end of July, and thus at the end of August 1969 when, after the break with Lotta Continua [Continuous Struggle], it was just about time when Potere Operaio was really forming as an organisation. Like many others, I was struck by this theoretical and cultural openness, the fact that it took seriously the great bourgeois culture, it took seriously negative thinking, it took seriously classical philosophy and the great economy, Keynes, Schumpeter, in a situation in which both culture and the references current in the movement where what they were. Of course this caused some vices (narcissism, and whatever else), and obviously not all comrades of Potere Operaio read those things, this is not the point: but one thing is to pretend to have read Schumpeter or Keynes and another thing is to pretend to have read Mao’s Little Red Book.

Parodic and boastful behaviours have obviously existed there like everywhere else, although to be honest there is also a diversity of quality, which matters, in what people boast about. Thus, there was this openness about Marx and the struggles, in between great philosophy and great economy: Marx against Marxism in short, Marx as a sociological instrument, even empirical. It’s a discourse that then comes back again today, when it was argued within Luogo Comune [Commonsense] and other experiences, even with a certain bitterness, that the most futuristic pages of Marx, like those of “Fragment on Machines”, were achieved but without revolution, without crisis: the general intellect, the centrality of knowledge and communication in the social production of post-Fordism (or however you want to call it) have been achieved, to the extent that those pages become at most a breviary for the sociologist rather than a trendy discourse. But already then there was this consideration of several chapters of Das Kapital and of the Grundrisse and so on as congruous with what was happening day-to-day on a material basis. Besides, years later (skipping the chronological order) I lived in Milan the adventure, experience and luck to substitute Oreste Scalzone for a month in one of those improbable jobs he had, that is, as a subtitute for 150 hours at the Alfa Romeo factory in Arese. For a month I thus substituted the substitute, that is, Oreste. At the time I even carried out an intervention at Alfa Romeo, so I knew well all the vanguards, however those sort of lessons on the first book of Das Kapital (that was there textbook) were a curious thing: one can imagine the reading of the chapter on machines, the chapter on the working day, partly carried out with comrades, partly instead with whatever workers, not particularly politicised ones. This was however a sort of confirmation, some years after this general assumption of the workerist experience (towards the end of 1973), that is, the immediately applicable character or the most advanced pages of Marx to the material conditions of extreme modernity.

I was in Potere Operaio from the start to finish, from August-September 1969 until its dissolving and even beyond. First, in Rome, intervening during the warm autumn in the few Roman medium factories (such as Vox with 2000 workers near Tiburtina), then later with the territorial interventions in the neighbourhoods, with the occupation of houses.

There was the first episode in the autumn of 1971 with quite an ugly operation by Potere Operaio, which did a conference that got radicalised, there were themes of rupture with the crisis like we called it at that time, rupture with the flow of the crisis and forcefulness before there was a resettlement of capitalist organisation, all those things badly summarised at the time in the term ‘insurrection’: thus, there was a sort of political expedition that is the least desirable thing in regards to a reality like that in Turin, one of those quick things, a showdown within the group.

It was thus a thing that I don’t remember with pleasure, however for me it was important this first relationship both with the comrades from Turin and with the visual and perceptive impact of Fiat. This was the autumn of 1971.

I was again in Rome in 1972, I was more or less in the leading structures, in the board and the secretary of the Rome section. From March-April 1972 I was in the national executive. Groups ossified and all these things we know by heart happened. For example, I am not one of those who give a negative judgment on groups.

Give me credit on the fact that I could speak for two hours on the parodies, on the crap, on the recuperation of old models, etc.; having said this, I consider that after 1969 a specific problem was posed concerning political power, not a linear one (to put it in mathematical terms). In the most banal terms, one could say that the problem is to find a political outlet for a movement that for the first time (to say it with Gramsci against Gramsci) does not seek a revolution against Das Kapital but in accordance with Das Kapital: thus, not against misery and backwardness, but against the very relations of capitalist production and against its waged labour. It’s something that is unprecedented and that sought its own political forms; it was perceived as such within the management of trade unions, of FIOM [Federation of Employed Metal Workers], it was a general political debate.

In my opinion, positions like the one of Capanna in Milan (to speak of one of the most famous of the time, then obviously the debate in the middle of the 1970s would be different, it would be a debate about autonomy) were claiming: “no mass political movement, for heaven’s sake”, then they sidelined with the PCI [Italian Communist Party] and did ‘servizio d’ordine’ [stewarding at demonstrations] not much later for the UIL [Italian Union of Labour].

So, there was a problem there, which for me in its best versions has been elaborated and gathered within Lotta Continua and Potere Operaio, and then in a certain measure and in their own way (a manner very different and far from my own) by Avanguardia Operaia [Worker’s Vanguard] and others. However, it seems to me an undue simplification (certainly historically but perhaps even from a political and theoretical point of view), even from a distance of many years, that we passed from the Eden of 1968 assemblies and base committees of the spring of 1969 to the small, barren and inconclusive rituals of groups: on this I would be more cautious and I would remember what was at stake. That then we failed with what was at stake, it is one thing; but that however there was something at stake with its own specificity, with its own discontinuity in regards to the linear development of linear movements, in my opinion it has to be admitted. This comes to my mind in relation to the fact that since 1972 I participated in one of these structures that are a bit funny, ridiculous and often lived ironically within Potere Operaio, that is, the executive branch.

Then there is the Rosolina Congress, the break, and I side with Piperno. I think that the discussion was not about being in favour or against the factory assemblies in Milan, there was a general consensus about them as a central reference in all its organisations, between all comrades, in all debates there was never any doubt; a theoretical and not merely a practical problem of how one does something or doesn’t, related to some specific subjective functions, in particular in regards to the use of violence.

At the time, the problem was: is there already someone in Italy who answers in a satisfying way to this political issue, organisational and even theoretical, that are the functions of rupture or however they want to call them? If it is so, obviously they can be delegated to those who already perform them in a form that is essentially satisfying, on the other hand the problem remains to elaborate how to do them, that is, the forms of these functions.

This was the debate. Of course, whoever claimed that they already existed said: “so then I work directly with the autonomous assemblies, somebody else will think about this”. Others did not think they absolutely didn’t exist, but that the manner in which these rupturing functions were elaborated were within a lineage substantially internal to the old working class movement, that is, a radical continuation of militant antifascism, of the red resistance, if you want an armed struggle for reforms (this could also be done, in the end the problem of the form of struggle matters but it’s not decisive).

Therefore, the debate in Rosolina was about this, and then of course about many other matters: class composition, the proceeding of the crisis, the rapidity of capitalist reorganisation, which of course was the very thing at stake in the Italian revolution.

I think (and this one instead is a historiographical and theoretical point) that in the 20th century there have been two failed revolutions, and those who say, like Tronti or others, that there has been one, the one that everybody knows about of the 1920s, are mistaken. There have been two failed revolutions and nothing can be understood of the century (to use the grandiloquent language Tronti is so fond of) unless you take account of both of them: one is the revolution in the West in the 1920s (in Germany and elsewhere), the other the revolution in its proper sense of the 1960s and 1970s, the first that is against the capitalist mode of production and not against backwardness and pauperism, and of which post-Fordism is substantially the great replication, the counter-revolution.

I’ll explain myself: by revolution I do not mean that many people shouted words of a revolutionary order, the carnival of subjectivity does not interest me. Either one says that all failed revolutions do not exist, and that might be said, it is a form of mental hygiene if you want; or, if the dimension of failed revolution is introduced, it is necessary to have a sober criteria (not attached to the shouting and humming of subjects at the time) of what constitutes a failed revolution.

In my view it is possible to speak of failed revolution, in a sober and objective manner, whenever there is a consistent and long period to time in which there is an impasse in political and social decision, in the places of production, in the popular neighbourhoods and in other delicate state institutions. This long impasse between two opposing social powers did exist in Italy (and sometimes more generally, in certain years and places of the capitalist West).

In this sense I speak of failed revolution, of revolutionary situation: I have absolutely no interest in convictions, in drunkenness, in inebriations, I speak of them in this sense. And for counter-revolution I do not mean a return to the Ancien Régime, a reconstitution of what already was there; I think counter-revolution like an inverted revolution, like something extraordinarily innovative and that, moreover, makes and utilises many of its own pressures, instances, ways of being and inclinations that feed by themselves the revolution.

Since the end of 1972 and beginning of 1973 onwards, I lived and engaged in politics in Milan: I worked at Alfa Romeo and Innocenti, I saw the dissolution of Potere Operaio and participated in the discussion, that was not even a banal discussion: some fragments (the most worthy, the least cramped) were in some way a debate on the prodromes of post-Fordism, or at least the prodromes of capitalism’s exit from Fordism (I remember for example Magnaghi’s contributions to the notion of ‘fabric diffusa’ [dispersed production] that soon after were printed in Quaderni del Territorio [Notebooks on the Territory], even the discussion with Toni).

The debate within Potere Operaio even had its high moments, charged with predictions on this transition. In it there was exactly the weakness and fragility of the political experience: the issue is of course the one of the appropriate time, the right time, if this way out of Fordism happens in an abrupt shift and within times decided by the capitalist side then the social framework, the framework of subjectivity is completely changed and you’ve lost; the problem is to remain within this shift, not to antagonise it in the name of the beauty of assembly lines. In short, the problem was to determine which was the sign of this shift: there is a delicate phase of transition and within it everything is at play. Therefore, I claim that even in the final phase, that is also the most livid and later the most charged of resentments, for many aspects the most detestable, there was a true core of discussion.

Subsequently I remained in Milan to carry out interventions at Innocenti, with the few that remained in Milan with Potere Operaio who had not yet sided with Autonomia, very few people. Then, when there was the second so-called occupation of Fiat, that of February-March 1974, I went to Turin where I had some good friends and good comrades, it was a reality that was more or less standing on its feet as a site of action; and then the struggles and the intervention on auto-reductions and so forth. In the summer or the start of the autumn of 1975 I returned to Rome, at first I thought provisionally, then instead for several reasons I ended up staying.

A mid season began in which there was no longer any organisation, in which there are new cycles of study and reflection, until the autumn of 1976 and the start of 1977. In that period there is actually a reflection back on 1968 and the 1968-1973 cycle, on the fact that the social labour power has another channels of formation, other subjective expressions. This discussion takes place within a group of Roman comrades that worked together for professional reasons; they had set up a centre of research that was called CERPET [Research Centre for Economic and Territorial Programming and Planning]. All these comrades returned to have a public role, make proposals, activities and work in Rome in 1977, but without any organised form. At this point, of course, there was also a modification in the history of Autonomia, which happened around 1975-1976 in Milan and which becomes precisely the new political form of a new class composition; while at the start, in the years between 1973 and 1975, it was something narrower, with more specific reasonings, from 1975 it really becomes the general form of a new class composition consisting in an educated labour power, mental labour, precarious labour, the new social working day. Therefore, the old causes for division within Autonomia go missing and of course you work with them, even if, I repeat, an organising group is missing, an organised subjectivity.

In 1977 you could really see the birth of something new. In this discourse that now we remade even in the 1990s I honestly believe that there isn’t one of those anachronistic dimensions through which you attribute to an earlier moment what you thought subsequently: I think there really was an illumination within the concrete course of the movement, a saying: “behold, this is the overcoming of Fordism, and it’s the overcoming of the Fordism that happens in the form of struggle”.

First the struggles, then the development: 1977 as the birth and debut of post-Fordism, the overcoming of Fordism. Something that however happened several times in the history of capitalist development, the IWW did the struggles in the 1910s, these are unskilled and unstable workers, and in a certain sense they are the outset of that which Taylor and Ford did in the 1920s with the systematic deskilling of labour. There was really an idea of refusal of work, a critique of waged labour, it ceased being the heart of the matter but only in a negative form: that is, there came to emergence, in alto-relievo, dense, positively, the life forms, the forms of existence, the mentalities, the forms of communication of the refusal of work. Therefore, the refusal to work for me has this purely antagonistic character; it showed and secreted its own richness.

The discourse on 1977 were immediately after at the centre of elaboration, in the least ephemeral parts ofMetropoli and, for what concerns Lucio Castellano and me, in those two essays published in the Pre-print section that accompanied the magazine, in actual fact written by Lucio at the end of 1976 and by me in 1978.Metropoli was an elaboration hot off the press, but also of some breath, on those essential things that emerged from the conflictual inauguration of post-Fordism, that was the movement of 1977. In Metropoli there was a leitmotif, crushed of course and rather veiled by the articles on terrorism, that for obvious reasons had more clamour: a fundamental and recurrent theme is for example the ever-increasing centrality of language in the workplace, or the rupture with all mentalities associated with Fordism.

In between Potere Operaio and much earlier than Metropoli there was Linea di Condotta [Line of Conduct], only one issue came out, but it was a significant one for many aspects.

It was significant because it was an extreme attempt, conducted between the autumn of 1974 and the start of 1975, to reconnect together some of the splinters that followed the break-up of Potere Operaio.

Toni and the autonomous, to put it this way, had their highs and lows between 1973 and 1975, and besides the obvious relation of reading each other’s stuff there was no direct relationship. But the part of Potere Operaio that did not choose to be in Autonomia (let’s call it this way, even if on the terms I specified earlier) broke up in turn, in that process of infinite division that in biology is called decomposition (regarding corpses): then, there was Oreste and other comrades in Rome that differentiated their initiative, they tied more and more into a group, a radical fraction of Lotta Continua in Milan, in Sesto San Giovanni, the Magneti Marelli company and so on.

So, with Oreste and these others, some from Rome, there were even some in Turin, the relation was much closer, we had been on the same side in Rosolina, even the personal relation was more intimate and closer. Then, an attempt is made to produce a reflection together, through two or three conferences, meetings, and seminars. It was an attempt to say: “ok, when the weekly magazine ended in December 1973 Potere Operaio effectively doesn’t exist, however there could still be a new political form between us”.

The only issue of Linea di Condotta was located within this discourse, which then goes down in history because some important documents appear that cause Lotta Continua to break up their organisation, and some of these will later be part of Prima Linea [Front Line]. Those documents will be considered (with good reason, but certainly with a retrospective look) the general platform of a path that first with Senza Tregua [Without Respite] but then with Prima Linea reaches extreme conclusions.

The issue of Linea di Condotta, thinking about it, is very heterogeneous, very willing, these comrades’ collective will to make something significant happen is understandable: Magnaghi writes on it, Dalmaviva writes on it, I wrote on it, Daghini wrote on it, and of course it is written on, it goes without saying, by this splinter that soon will do Senza Tregua. This also explains why it is only one issue.

Was Marongiu still there?

I think so, but the paradoxical thing is that the vast majority of the Veneto section doesn’t follow Toni, so they remain at the stage of Potere Operaio. Like it happened to the Turin section, even more the one in Veneto closes itself in a local and regional reality: they carry on, things continue as before, in the University, in the small factories, not in the Petrolchimico factory that has always been the part of Veneto that instead sided with Toni (let’s just say like this to keep it simple).

In 1974, in fact, when you went to Turin there were people from Veneto and Florence. Fuori dalle Linee [Outside the Lines] had just come out.

We took them there. That was a very circumscribed event, there was simply the second occupation of Fiat and we thought to amplify it with this organ, this daily paper. And in addition we went to meet with the collectives from Veneto saying: “for these few days it wouldn’t be bad, with all the flaws political tourism has, if you also come to have a look”. They came very willingly, a bit like it happens on school trips, like it’s now done with Prague (and if Prague and the Fiat occupation were to be put on scales, I honestly don’t know where they would pend, it’s tourism on both sides, even if now it seems the only form of political action), but they only came for a week. In my opinion the not so stupid thing, even for what it’s worth, is that the printers of Potere Operaio in Florence, that until December 1973 had done the weekly magazine, were still ours and still working: it was asked to make a sort of free daily paper for four days that was precisely called Fuori dalle Linee, three or four issues came out. So-called articles (that were often aimless screams) were dictated on the phone to the people from Florence, they were printing them and then taking them to Turin by car to give them for the first round. Instead, those from Veneto kept going and actually stayed; perhaps they were still present through Marongiu in this only issue of Linea di Condotta, maybe not through writing but they felt it as theirs, and at the seminars that preceded the issue of Linea di Condotta, in which Piperno and Oreste attended, comrades from Veneto were most attached to the latter, as well Giairio, Marione, in short the old group. Later it was understood that Linea di Condotta was an end of the end rather than a beginning, and those from Veneto close themselves in their regional reality.

They remained then in this separate and regional dimension until when, I think in 1976 or even in 1977, they move closer to Toni and to Rosso [Red], whilst before they had broken with Toni in 1973 by remaining in the core body of Potere Operaio. So there is this intermediate situation, which corresponds to that year and a half or less in which I stayed in Turin.

As regard, then, the mid period previous to 1977, I’m in Rome since the end of 1975 or beginning of 1976 and I already said: reflections, discussions, no longer an organisational reality, a totally active presence, with total dedication to all the phases of the 1977 movement in Rome, this sense of total discontinuity manifesting itself in subjective forms, forms of production, prediction of post-Fordism, unity of labour and communication, and so forth.

So there was a change of paradigm, but I have to say lived in real time, not one that now or thinking about it in the 1990s one says: “at that time class composition has changed, the paradigm has changed, in actual fact three centuries of modern politics have gone in crisis, that is to say, modern political forms have begun, equivalent to what the 15th century had been as a foundation of political forms”.

It has not been just a reflection in retrospect, in the most part it happened in real time, hence the emotion of 1977, a strong emotion, because emotions that last are always (or at least often) linked to cognitive content, and there you can see really that it’s a change of paradigm.

Metropoli should have grown into a very large magazine, on all the areas of 1977, there are meetings with Toni and so on: then of course things go in a different way. It’s understandable, I’ve also done for several years an organising role and I think (I’ve just defended groups) that within organisation, even in its most tatty forms, light or heavy organisations, there’s always very worthy content; however, it is clear that whoever forms an organisation has the problem of continuity, influence, political struggle, etc., and despite having a radical theory, it’s less willing to gamble on it by ignoring tactical transitions, hegemonic transitions. So, the magazine is then made physically between the group in Rome, those without a party and without an organisation and Oreste, who instead had a small party and organisation, but who says: “I behave like you within the magazine”, something he in fact he did, and likewise those that more or less worked directly like De Feo and others. A magazine that became a media event, and it’s the first issue, because it was seized, because the only underlined articles are those on the 7th April that happened two months previous. Some of us are accused, I was there during the arrests of Oreste and Zagato at the base of Metropoli in Rome on that very 7th April, Piperno eluded the arrest through pure luck two or three times in that same day: he eludes it every time like in those Fernandel movies, he arrives right after the police arrived, from which then the legends, the infinite trickery and superior astuteness; I think that, however, like in the history that is greater than us, often this sort of judgment comes from an astonishing concatenation of strokes of luck.

So, the first issue of Metropoli is obviously concerned with the raids, there’s that article by Piperno, that was even reformist and Anglo-Saxon, that says: “the earlier they pay, the better”, but not in the sense of shooting them on the foot, but rather in the sense of “the earlier institutions correct themselves, the better”; not that this was his way of thinking but he had decided to play the part of the consistent liberal.

Thus, those were the articles, the media event of Metropoli. The second issue of Metropoli, after a year in prison, comes out in 1980, but it is once again patchily put together, with articles sent from prison, an issue not thought in its wholeness. Metropoli exists like an organ of reflection on post-Fordism, on the crisis of the society of work, on the new forms of subjectivity, on the year in which five issues come out, on a monthly basis, and it’s 1981: issues 3, 4, 5, 6 and 7 come out. With all the flaws that are present in spurious situations, in which there are many traces of old paradigms that however coexist with the most vital intuitions, it’s still possible to find the core, the fulcrum of this reflection.

For example, I believe (but of course this is purely biographical) that the stuff that is not so significant, because judgments can differ, but objectively the most relevant, for example in the elaboration of Luogo Comune, have been the continuation, the sharpening, even with greater cultural and theoretical weight, of things that were all already expressed initially within Metropoli.

I go to prison, but late, in a deferred burst: I am arrested with Castellano, Maesano and Pace (who however eludes the arrest, again, I swear, not because of astuteness). We are arrested on 6th June 1979, then they make us come together on 7th April, we find the others again in the Rebibbia yard, we stay a few months there; then there’s the diaspora, that is, the Ministry orders each one of these convicts to a different special prison, because obviously, through lawyers, visits, despite there was a heavy handed regime, that had become a place where we worked out documents, letters to newspapers, we did political campaigns, there were internal struggles.

Then, there’s the diaspora, I go to Novara, Oreste goes to Cuneo, the other goes to Favignana, and the other still to another place. We start going round these special prisons, and we found each other not all but in part in the Palmi prison, inaugurated in the autumn of 1979, a prison only for political prisoners or totally politicised common people, a sort of ‘kesh’. Inside there was a curious situation, even quite spectacular, because everyone meets together. In fact, for the first period with comrades from Red Brigades or with Alunni or those of NAP [Armed Proletarian Cores], it was thought even to take advantage of this situation to set off a larger discussion, of a ‘constituent’ character: however, the problem is also that even there the most compromised among them, like Curcio, were in agreement, they understood they’d lost the key point, that is, the change of paradigm in 1977, the fact that young workers bore no relation to those of 1969; some instead didn’t get it. In any case, there was a general willingness since the start. However, they were in a period of full development of what they called the strategy of annihilation, in short let’s say the massification of armed struggle, and of course it’s too tight a knot this type of tactic, this passage you are going through, to have the mental slenderness to confront such a large discussion.

So, there was a good intention at the start, almost immediately left aside, and instead there was a greater deepening of a bruise in relationships. I was released, after not longer than a year in prison (11 months and a half), because they declassed my offence from composition to participation, and at that point I had already done in abundance preventive detention. Then I stayed out of prison for two years, the true year of Metropoli, the one in which it is a magazine, for better or for worse, but it is a magazine that is worth its name and not for its media appeal. What’s more it sells a lot, it only goes in bookstalls and never sells less than 15.000 copies: something that can be understood for the first issue, but that becomes significant for the subsequent ones.

To sum up briefly, my detention consisted in one year between 1979 and 1980, then two years of freedom in which I curated the continuous series of Metropoli in 1981, then two more years in prison, first-degree sentence to 12 years, a year of house arrest, which is a good way to simplify the transition in some respects towards post-Fordism in general, be it a micro-social aspect, or otherwise a passage from a disciplinary society to a society of control; the acquittal (together with many other accused of the 7th April) was in 1987, the confirmation in 1988.

Life is suspended, like it always happens when one is convicted, even when let on the loose, Italy’s changed, mentalities are completely modified, old forms of commonality and proximity are totally broken. In 1987 it’s decided with other people to try to understand the terms of our comeback, that is, to understand how all of which transformed the country in the years of counter-revolution had created a new type of human, besides of course different forms of production, that could by now begin to express themselves conflictually. It was thought it was reasonable to have an approach to post-Fordism that moved from a mixture (to use archaic terms) of structure and superstructure, the point of indifference, the point of perfect concision between what in jargon are called structure and superstructure. It was about looking for ways of being within dependent labour, judging that contemporary forms of dependent work cannot be understood adequately (in its very being productive as surplus value, of course) solely or principally with economic tools, and in a certain measure not even with merely sociological tools.

Contemporary work, because it produces surplus value and not because disembodied, calls for absolutely large equipment, in which are thrown in the middle its cultural forms, its emotive structures, its ethical and aesthetic convictions.

Paradoxically, post-Fordist subjectivity, to be grasped in its hardest core, among many things even more economically relevant, should have juxtaposed with this broadness of tools. There’s a nice quote by the great French epistemologist, Gaston Bachelard, who had said that the many problems and many paradoxes sparked by quantum mechanics should be treated with the most heterogeneous tools.

Quantum mechanics now requires, in philosophical terms, a Kantian concept, at times a Bergsonian concept, at others it requires a medieval concept, and it’s no big deal if they’re so different between them, the point is that it concerns explaining the one problem for quantum mechanics: as such it’s also for post-Fordist labour-power, for post-Fordist subjectivity (it’s not that this formulation makes me very happy, but it’s to understand each other quicker). This is the experience that brings to the collective book Sentimenti dell’aldiquà [Sentiments before the hereafter], that wants of course to be also a radical critique of weak thought, of Italian postmodernism that has been the ideology of winners, the ideology of the defeat of mass movements. Which however, like all true ideologies, has in itself a grain of truth, only that it’s not only deformed, but most of all apologetic, it tends to think that it’s like this and only it can only remain in such a way. Instead, the issue was to bring back the so-called postmodern thinking to its material basis.

The communication society that Vattimo talks about is the deformed and apologetic transfiguration of a real fact, that is, the surplus value produced through language. Thus, this was the dimension the book dealt with, then as usual the text was poor stuff, the background discussions sometimes are remembered with pleasure. So there’s an attempt to work even with different people, many of the usual ones, that are customary good ones, but also many different people. Seminars, discussions, the magazine, some of us work for Il Manifesto [The Manifesto] and try to make a manifesto within Il Manifesto, that is, to make its irrelevant cultural sections a bit more foolish in comparison with all the previous articles. From this the experience of Luogo Comune was born, four issues come out, but it’s a magazine in which the editorial aspect emerges, the discussion, seminars, etc. There was the obvious risk to make the mistake and say more than one thinks, allow me this play on words, because at times one decides consciously to say more than what would be cautious and prudent to affirm, thus to say more than one thinks, if anything to spark off discussion and self-critique: in reality it was an attempt to loosen up a set of categories that could call to account, this time not in allusive ways like at the end of the 1970s, but fully, precisely biting the live flesh of what’s new, the change of paradigm. And that however could prearrange a renewed organisational politics.

The first point is that whichever organisation, as always, is a culture: whoever does not grasp the materialist and material aspects of culture, that to say, that an idea is much more concrete than an ashtray or even a million euros, risks not understanding the issue of any organisational path. The problem was to produce, even quite artificially, frenetically, fabricating key words (general intellect, language and production, exodus), a mental landscape (what’s more concrete than a mental landscape?), in order to bring together some groups, some militant groups, and some militant groups of intellectuals. And that these could begin to draw some practical paths, with cautious experiments, on citizens’ income, on new forms of production, the modernised factory, non-factory labour, etc. Of course there are some difficulties, it takes long time, you have to hit your head and then try in a different way. But the preliminary condition was this web. We have tried first with various groups of militant intellectuals, but since 1991-1992 we have tried precisely with people from Veneto.

The way I read it (then anyone says and is polemic however they want), those from Veneto had two passages, not one: the first when they broke with the continuity with the 1970s and 1980s, and that for me is crucial, that was a moment of great vivacity that lasted several years, a creative one, they felt like gone past a context that was embittered, full of hatred, nostalgic and continuist, in the open ocean; then, instead, the second passage is much more recent, it’s of the last three years, in which they’ve thrown the workerist tradition out of the window, which is a whole other matter.

Of course, what’s the problem with the workerist tradition?

Like all traditions it deserves to be thrown out of the window, but the point is the following: is there something in it that allows us to think through, with maximum amount of radical critique and realism, a critique of post-1989 capitalism independently of utilising socialist realism?

If so, it is the only tradition of thought that in a certain sense had metabolised the Wall since the 1960s, and that perhaps has at least as many or more things to say now than it had in 1969. Only in this sense I speak in positive terms of the workerist tradition, not for its past, more or less noble but not even much: thus, for this capacity to hold together what others by now consider broken up.

The labour movement should be dropped because there’s been socialism, or viceversa a boorish continuity. The second passage that took place two or three years ago is one I understand, because it’s an overly uncomfortable issue, and above all that risks not giving you anything in concrete terms: it’s the central position, the strongest, the only true one, realistic, important from the point of view of understanding things, but if it doesn’t give you anything in political terms it’s useless. There’s then in fact this missed coincidence between tools that actually are the only ones, not within the world of the left and the extreme left, but rather the absolutely only ones that allow to understand in depth what’s happening in all its subtleties, undertones, complications and paradoxes: if however these tools don’t give you immediately something political, in political and organisational terms, you’re in a very uncomfortable position, you’re a wise naked man that stays for some time in the wind, then after a while someone else says: “well, it doesn’t matter”, and makes the second passage.

The second passage is not to attack the Marxism of the labour movement, we picked on that in Genoa in 1967, if for Marxism you had to mean that thing that was the labour movement, the problem wasn’t that. Their passage is similar to that of PDS [Democratic Party of the Left] (structurally similar, but with different content) in comparison with the workerist tradition, because workerism precisely does not allow them to capitalise anything in the short and medium term.

There’s all this history, even of theoretical production, at times even rather rarefied, we didn’t have problems bringing in Wittgenstein or Heidegger if we needed them, with the usual materialist instrumentalism of saying: “if that is useful for this thing, very well, it’s useful for this thing”.

So, there’s this even rarefied production, this theoretical production that between the end of the 1980s and the beginning of 1990s had however this finalisation that I call organisational, in a broad sense, then if anything they’re organisations totally unknown in comparison with all the known precedents, alright.

In my opinion this ended around 1994. Meanwhile, it’s understood that we haven’t been tenacious, clever and capable enough; however it’s also understood that there’s a real difficulty in Italy because the cycle of post-Fordist development, started off at the end of the 1970s, could now show the other side of the coin, conflict and forms of organisation, in so far as there have been a series of juxtapositions that somehow blocked and detoured it, the fall of the Wall, the crisis of the Italian political system, that for many aspects is a crisis that derives from deeper issues, it’s a crisis of representative democracy, thus something that in a certain sense would interest enormously a mode of thought like ours. However, it takes opposite forms, this crisis feeds other stuff, the party-business, “leghismo” [North Italian federalist right-wing ideology], etc. When, at a certain point, the other side of the post-Fordist coin could or should have shown itself, its conflictual side, this instead made a turn towards the right, or at any rate it remained like buried under the clamour of the crisis of the Italian political system; this, besides our obvious incapacity, at times even little seriousness, has paralysed for a bigger and more consistent reason this possibility to show the new potentials on the political and organisational level of post-Fordist subjectivity. Then there have been other impulses, more recent attempts to organise.

To speak at a personal level, around 1994 there is like the realisation, the seeing for ourselves something that probably could have been understood even a few years earlier: a political and organisational attempt in totally new conditions, as the result of the counter-revolution and putting itself in the extreme; at the border of counter-revolution it hasn’t worked, it stayed like mangled for a combination of reasons. The comrades that then made DeriveApprodi [DriftsArrivals] participate in Luogo Comune, so there’s continuity. From whenLuogo Comune ceases to exist in 1993, one hour more, one hour less, closer or further away, a consistent part of those who made Luogo Comune collaborate or work with DeriveApprodi. There have been many small attempts of political initiative, even very recent ones, but in the whole for me it remains a valid judgment to claim there’s like a freezing, a delay, an inhibition like it happens in dreams, a slumber, and thus a long time before it can be show the other side of post-Fordism positively, conflictually, with the invention of new forms, new paths, new structures and theories of organisation.

Having said this, however, what I did it’s not very clear if it’s not taken into account that since always, and since 1978-1979 more and more centrally and heavily, I was engaged in doing philosophy.

I have always wanted to work on philosophical matters but as a critical Marxist, that is, I always thought that a fundamental problem was to work on a broad materialism, one that is capable of not leaving out of itself fundamental problems like that of language, communication and much more.

Thus, I’ve always worked on these things and of course in an incremental measure, until when they ended up becoming the principal aspect of my activity. It would then be difficult to speak of myself from 1979 onwards without keeping in mind that, even quantitatively, certainly qualitatively, I always dedicated great part of my time to working on philosophical problems and issues, writing and even publishing things where, in my opinion, the problem was born out of the black holes of Marxism, our Marxism, confirmed as outright catastrophic moments in the 1970s, in the overall wealth of the 1970s.

The first things were concerned precisely with this problem: is there a theory of knowledge in Marx? And if this theory of knowledge exists, if it exists or if it existed, does it concern things as they are or is there a way to know the tendency, to know the transformability of the existent? What are the categories to know not only exchange value, but also the leakages from exchanges value?

These were precisely the very first things, that then I placed in the most part in Convenzione e materialismo[Convention and materialism], which basically was written between 1980 and 1982, even if it came out in 1987 for the obvious reason I was in prison, and they later carried on. However, also with an intensity and a centrality to my own time and path, on which I don’t want to dwell on, but that is useful to straighten up right away all that I’ve said. Then, of course, many of these things are intersected, like for example the reflection on a category like that of the multitude, than in the 1600 was opposed to the one of ‘the people’, and from the one of ‘the people’ derive modern political theories. We have said in Luogo Comune: “bear in mind that it’s returning perceptible, pertinent to the current situation, the category of the multitude”.

The category of the multitude is difficult not to conceive and think of it without getting out a series of strictly philosophical questions: what are the linguistic games, the communicative forms of the multitude? What is the category of the individual, of the singular for the many?

The idea of the many makes one think of many singularities that cannot be synthesised in that one that is the State and the sovereign. Well, questions that can be thought (at least as such it seemed to me and as such I could do) through ethical problems and categories, philosophy of language, political philosophy.

Thus, the problem is that there are consistent points in which more theoretical and political reflection ties in with philosophical reflection, but there are also others in which it is not as such. My problem is in the end the one posed by someone who has never been pleasant to us, Engels; at a certain point he took issue to say: “alright, we’ve said some things about materialistic things on production, we’ve said some materialistic things on history: however, shouldn’t materialism have the ambition to cover all the field, thus to cover even the field of science, the field of nature, the field of the senses? Shouldn’t it also be a sensualism, a sensism?”

So, at times they intersect, see the example of the multitude, at other times I dedicated six years to think what could be the materialist status of language, which could be the relation between language and sensible life, which could be the relation between language and the material world. And here we are in certain aspects close and in other aspects far from the kind of political path that I spoke of earlier. I mention these things to say how realistically I divided up my time, especially from a certain point onwards.

There’s an aspect in your analysis that is surely central, that is, about researching the crucial points that are still open or not confronted by a political tradition that is neither exalted nor thrown away, but used to take what we need in order to form a critical re-elaboration in the present and towards the future. Workerism is a category that is here intended in the widest sense. Tronti, for example, claims instead that political workerism ought to be identified with the experience of Quaderni Rossi [Red Notebooks] and of Classe Operaia [Working Class]: after which, with the groups, in his opinion another history begins that has nothing to do with those experiences. In fact, despite there being many and sometimes important discontinuities, there also strong theoretical and political continuities with some paths of the 1970s, and even later ones. In regards to workerism Alquati has formulated a peculiar hypothesis, that is not only historiographical but that could be an important approach precisely in terms of identifying those big crucial points still open today. So, Romano claims that workerism moved within a specific polygon, trying to cope, with differing results, with each of its vertices. A vertex is represented by workers and their subjectivity, something that rarely those interviewed speak even just a little about, or they don’t confront it at all. The second vertex is given by culture, which, in terms of important critical aspects, for many (but certainly not for all) has ended up returning to be a culture that is explicit and humanistic, of Gramscian memory. The third vertex is politics and the political, the great black hole of the workerist experiences, in its multiple attempted pathways. The fourth, finally, is the question about generations and youth. In part you have already said this in your analysis, but to confront the issue in its entirety, which do you think are the bigger open crucial points, central today in the political re-elaboration of the strengths and limits of workerist paths?

The line from Fabrizio De Andrè comes to my mind: ‘if not totally right, almost nothing wrong’. To me it seems that workerism had given a consistency, a rich articulation to Marx’ idea of the general intellect.

This rich articulation can even be retraced, if you want, to some of its own characteristics and solutions: it’s the fundamental score of anything that’s played. For me the fundamental passage has been to work on the crisis (and the ambivalences of this crisis) of the law of value, succeeding in putting into focus quite well, at least in some moments, the double character, in force but not any longer true, of the law of value itself.

Thus, the labour time of the individual (abstract, empty, unqualified, etc.) is not any longer the principal source of the production of wealth, but it is still the unity of measure as it stands. This is a pattern that at times has been like a sort of mad person’s joke repeated more and more schematically; many times, instead, it has been articulated, filled with flesh and blood and it’s a fundamental tool.

And then there’s the general intellect, that as we know Marx mentions once or at most twice in the Grundrisseand who knows what he had in mind, if it was a polemic with Rousseau’s general will or something else entirely: and it’s only an allusion, when instead what was then an allusion is now a positive theory, complete, a general theory. That this theory then might be far away from being sufficient is one thing, but this is a very relevant production. I’m thinking most of all of the moment in which workerism strove not to read anymore the general intellect, like a fixed capital, which is Marx’s version, science and knowledge held in contempt, frozen, clotted in the system of automated machines.

In my opinion workerism, in a certain sense ever since 1969, then in a more conscious way later and in recent years, has instead really tried to think of the general intellect as living labour, and of course not like the erudition of the individual, the single worker may even never have ever read a book in his life, that’s not the point: the matter is that general intellect lives within a cooperative interaction, in very primary way, even more than in the system of machines. This is then a reversal in post-Fordist production even of what is very empirical and visible: the necessity is not to mobilise a particular knowledge, but the generic faculties of the human animal. So, one can speak of the general intellect as being diminished by workerism as intellect in general, the point is precisely that ‘in general’. Meanwhile, it’s been thought as living labour and not fixed capital; not that there is a general intellect as fixed capital, of course, I want to say that the qualifying aspect is the cooperative one, the relational one, the general intellect as an attribute of cooperation.

Without dwelling upon it, in my opinion this is its great strength, in relation to which the scientific term can be used, at any rate charged with realism and charged with effects of truth, with effects of comprehension of the existing.

The point in which workerism instead leaves only black holes is in terms of political theory; this seems to me beyond any doubt. In the course of time, from the 1960s, through the practical revolutionary experiments of the 1970s, then even later and still now, it has even done a good job of destruction, but it never succeeded every time it dared to go beyond.

Of course there have been important attempts, but the limit of workerism is to have never succeeded, not even in the slightest, to think in its entirety the actuality of the general intellect in terms of political theory, that is to say, to think the general intellect (connecting all things, I don’t want myself to also use the word ‘strategic’, it’s only for brevity in writing) as a base for a political theory. There are some things by Tronti, but then he defends himself, in these books, even in La politica al tramonto [Politics at dusk]: in some way he defends, even at the cost of defending Stalin, the fact that he entered the PCI in 1968. Cacciari did not even try this and thus works together with Di Pietro; Tronti, instead, cares about defending himself and so makes this discourse about 20th century politics. However, he puts it in a too generic way and therefore loses the specific point which is instead, eventually even in terms of guilt and workerist responsibility, to not have drawn from the analysis of class composition, its mutations, from the analysis of general intellect, a political theory that was finally a political theory beyond the state, without being a parodic anarchist theory.

There have been all these experiments, even in the 1970s, where there’s been the true setting of practical experiments on the organisational level, and where certainly Autonomia has constituted the general form in which the new proletariat organised. However, every time the thing was fixed in theoretical terms, either there have been terrible aporias that immediately paralysed it, or true returns to the past, true ticks worthy of comparison with general Strangelove on the political terrain. So, on the political terrain, there’s either aporia or Strangelove-ism.

This is said with a very mixed lookout. The thing I understand less in Alquati’s outline is the one on culture: if that remains valid for those who entered the PCI in 1968 then ok, they entered a party that conceived in such manner the relation between intellectuals and politics, so it was automatic that they conformed to it, even if with reservations. As regards instead to the part of workerism that has maintained a more petulant character, more autonomous, more foreign to traditional parties, there have been personal miseries, hitches, incoherence, and compromises, all that you want, but I wouldn’t say that it has reproduced a model of the organic intellectual.

The question is in different terms. The problem some have posed in the second half of the 1950s is the one you’ve highlighted earlier in your analysis, that is how to get out of that closed circle in which Marx, with terrible vision, goes on making a theory of capital and not of a possible exit from it. Facing this large hypothetical knot, some have moved around trying to break with that closed circle not only outside of Marxism, but also outside Marx himself: so there’s been an initial opening towards sociology, phenomenology, but also psychoanalysis and so forth. In actual terms, however, no one has ever posed the question of critically re-appropriating certain disciplinary fields that until then were neglected, such as the objectivism of orthodox Marxism, in a complex political synthesis that would go in the direction of a different science, that in a single enunciation then became working class science. All in all what prevailed, at least generally, even among those who revolved around or sympathised with workerist domains, was instead a model of explicit and humanist culture.

The question of general intellect: in your opinion, how much does it have a capitalist dimension and how much can it be overturned, or is it even in itself a discourse that transforms and moves away from capitalism?

Both of them. The recourse to these generic faculties of the human being is completely a capitalist source of production, knowledge and cognition; and still it’s obviously the only concrete and defined basis for an overturn. With a joke that can be understood within the workerist tradition, it’s what in Luogo Comune was called “the communism of capital”, referred to the socialism of capital that was spoken about in relation to the 1930s, Keynesianism, Fordism, etc., which are the answer to the 1929 crisis and even previously to 1917. The communism of capital means precisely that post-Fordism articulates in its own way that general intellect which would demonstrate how steadily realistic a communist overturn could be.

In the workerist tradition there’s always been this opposition between socialism and communism, not real socialism but an ideal socialism, the application of a universal and equal law of value and so on. However, the exclusive aspects of communism, critique of labour, critique of the State and other things, they seem precisely made but articulated instead in terms of production of surplus value.

In this sense, it’s two-faced. Among many things, I believe that contemporary capitalism, precisely in the post-Fordist sense, has the characteristic of translating in historical, social and even economic terms the most general characteristics of the human animal, which have always been true, also for Homer. So, what has always been true, that the human animal has always been like this, becomes true: that it is a linguistic animal, that it has a certain relation between sensible life and a life that is cognitive and intellectual, that has its own characteristics, that it doesn’t have a specific environment for example, in the same way that a tick has or an alligator or a chimpanzee have, but that has to do with an indeterminate world, in which it never finds its proper way round. These facts, which are even biological, are instead historical and empirical: in this sense they become true, they reveal themselves, they become manifest. It’s precisely what researchers call anthropogenesis: the very genesis of human beings, in their features distinctive from other species, which has always been true of course, only that it never presented itself as a simple concrete phenomenon, empirical, at times even economic. Thus, almost a biological constitution, let’s say, which instead becomes historical determination. This aspect is the great power of post-Fordist capitalism, which however has always been considered the basis of communism. Paradoxically, the idea is that man could live directly and without veils equal to the characteristics of his own species, without the veils of religion, traditional societies or present in the small countryside village where people live in the exact same way for three centuries, but could only live because he is an indefinite animal (so that we can use even a nice definition). Man as an indefinite animal, whilst all other animals have well specified instincts: the tree doesn’t exist for the bird, the branch only exists as a resting place precisely because well defined, the bird always knows what to do. Man is an animal that doesn’t know what he has to do; it’s the only animal that lives within indecision and uncertainty. Is it clear what general things these are? But think about how this living within indecision and uncertainty, this being an indefinite animal, is at the basis of post-Fordism. When people speak about relationality, linguistically, being ready to continuous innovation: what else are they speaking about, if not about the centrality of man as an indefinite animal? To get to the very root of human constitution as such is also the basis of the communist idea, depurated from the concerns of labour movements, from socialist stuff, etc. It’s a tug of war in which the rope belongs to all: this rope can be called general intellect, and when it’s pulled as it happens today almost completely by large businesses, by the production of surplus value, obviously it assumes certain characteristics. That is not to say that this rope remains exactly the same, when one of the two contestants pulls it harder it has certain characteristics, when it’s pulled by the other side it has different ones. To sum it up, this rope is called general intellect. However, post-Fordism sets into motion what has always been man’s underlying condition, its being an indefinite animal, the only indefinite animal, this to me seems realistic.

What can you tell us about Enzo Grillo?

We were friends with him in the 1970s, he was older, but we always stayed together. He was a great friend of De Caro, that we knew less because he was more to himself, instead Enzo was a chatterbox, a man of the dinner table altogether. Enzo is very well read, troubled by the fact that he knew everything and he found it impossible to write. Then I lost sight of him, I don’t think I met him ever again. At some point he really isolated himself, he retired at the age of forty, he went to live outside of Rome, he didn’t send his daughter to school and he was her own teacher. He began making some wonderful translations and he really knew everything. In fact, he tried to organise the dissertations of young people from Potere Operaio who went to University, so that they write thesis on things that to him seemed like they hadn’t been eviscerated and thus could be useful in their whole to working class science. The problem is that when time passes people become embittered, this is part of what makes the indefinite animal.

Grillo and De Caro gave a paper in 1973 at the Serrantini centre in Bologna, entitled “L’esperienza storica della rivista Classe Operaia” [The historical experience of Working Class magazine], and that circulated around mimeographed. From the few fragments that we’ve been able to read it seems like they critiqued that experience, which is in some ways taken up by others, even in the interviews we’re making, that is, a sort of implicit progressivism in certain workerist paths. This does not obviously concern everyone, but if, for example, you look at some aspects of Negri’s path (think of Posse as well as previous elaborations) you see the theory of the multitude (or even before called in different terms) that goes deterministically towards emancipated cooperation and towards which the only problem is the capitalist command that presents itself in the form of a simple parasitic crust, totally unnecessary. This idea of a linear history that always carries on and always improves comes back again.

They didn’t tell us, we’ve already won without noticing! At some point Toni, not that I know them well, should read with less impatience Walter Benjamin’s Theses on the Philosophy of History, which as we know are perfectly anti-progressivist. At times he mutters they’re taken from the Talmud, that’s not right, whereas there’s in it precisely an element of catastrophe as always possible. I wouldn’t call it progressivism, because that really contains the worst of the labour movement…

There’s a sort of objective immanence in the need for a communism destined to actualisation.

It is immanent, however its immanence doesn’t take away the possibility to reverse it at once, paralysis and catastrophe. But even when observing the most sociological thing, that is, one day of work at the Fiat factory in Melfi, you need to bear in mind the possibility of paralysis and catastrophe, that is, the very same things that might develop a radical transformation of existence can instead secrete the most radical evil; when you think about post-Fordist multitude or whatever you want, it’s necessary to introduce the category of ‘evil’ (clearly intended in a certain way), of the negative. So, the problem has been that workerism critiqued the dialectical method, because dialectics were something for cheats; not that Hegel was a cheat, but it was an unreliable tool. The critique of dialectics, however, in my opinion should not have lead to the critique of the negative, that is the possibility of catastrophe, that things might get totally screwed. I think that workerism and not Calvino were one of the few exportable things from Italy in post-Second World War times: it did some steps in this direction, but perhaps not sufficient ones. That is, there is the possibility to think negativity, evil, disaster, mess, the thing from which you can’t get away with, as something that has a non-dialectical form: it’s not that because you critique dialectics you also have to critique the negative. On this, in fact, an issue ofDeriveApprodi will come out on the discourse about the multitude and the negative. The multitude can become fascist. You have to keep in mind that the multitude has within itself the immanence of communism, this can always be said, and I was also speaking about the communism of capital, just to mention how much it became visible to the naked eye…

However that immanence assumed a teleological aspect, an objective destiny of actualisation.

That same immanence is so undirected by necessity that it can result even in radical evil; I obviously use such expressions that I wouldn’t use in public, which are a bit theological expressions and it’s not clear what they mean, but anyhow let’s say the absolute negative, fascism. Marx wrote it in some part (perhaps in a letter to Engels): between the two contestants that confront each other in the long term, on the level of more generations and not merely a few years, it can’t be said if one or the other would win, a catastrophe might well happen. Some thinkers of the 20th century, Marxists but also non-Marxists, took care of it well and it’s a necessary notion. I repeat myself, necessary then even when you judge something that happens in Prague or at the Leoncavallo [Autonomous Social Centre in Milan]. The point to keep in mind is that, beyond the alternatives A and B, there could be paralysis, catastrophe, decomposition, and evil. It is one thing to think of evil in the category of ‘the people’, another thing entirely evil in the category of the multitude, you have to stress the specific forms of evil in the one and the other case, and in relation to the one and the other category: however, it’s evil, there’s this possibility. So, a non-dialectical evil, which would be something to treasure. Cacciari has tried it with those things on negative thought that, in part for a certain cryptic dimension, seemed even to suffer the hypnosis of this great bourgeois notion, like the one of Kierkegaard, Nietzsche, etc.: in his case there was this non-dialectical negative, but then it also married certain forms. There have been various attempts, but certainly there’s an open knot. Sure, Toni probably has this kind of Spinozan optimism, like he says, and of course this allows one to see also many things sometimes, to grasp aspects of tendency, it breaks with all the grief of the traditional labour movement that is always full of nostalgia, that would really like that Fordism would still exist. This attitude of Toni or of other parts of workerism allows getting even faster to the point, but then it does so at a high price.

A personality you’ve been close to is that of Lucio Castellano. How would you situate him?

He was intellectually very upbeat and unconventional. I was saying earlier that in the last Pre-print ofMetropoli, that came out in 1981, but whose texts were actually already there since 1978, there was an essay of his on work and non-work, that was written in the autumn of 1976 and objectively it’s a very convincing and very foreseeing portrait of the main characteristics of post-Fordist labour and, in the immediate, of the 1977 movement. Then, like others, in the end, he had this anxiety on the black hole of political theory, the fact that there wasn’t a political theory. No one looks for the thing in which it’s said “the State, the Counties…”, no, I’m talking precisely about the most important core of political theory, that it didn’t exist: all the analysis of class composition, post-Fordism, the general intellect or still other issues, even before, they didn’t get to the end of a political theory. Of course, this took him to have a critical taste of the proper workerist paradigm. This transitional period we’ve lived in the past 10-15 years, in which many things were understood and many new categories could be proposed, but there was no relevant political consequence, this march in the desert, makes the space for the impossibility to keep going on psychologically: and so either, like it happened even to good comrades, like the younger ones for example from Veneto, you steer towards PDS because you cannot endure this condition, or, on the most solitary and intellectual level, you’re attracted by a change of paradigm that is also basically about letting go the workerist framework and searching for eclectic and somewhat spurious solutions on the terrain of political theory, since this is not given to you by workerism itself. This has been Lucio’s dimension in the beginning of the 1990s. He had finished writing a book just before the accident, it only needed polishing, and that was exactly the problem: if productions works as such, what political theory should correspond to it? There’s a gap: to this wealth of production corresponds no minimally worthy political theory. Wealth meant in all senses of the term, capitalist wealth, wealth as potential for antagonistic subjectivity. To the complex character that really keeps production in itself, the problem is that there’s a disgusting political theory, even in its critical versions. He had written this book, to which some old writings from Metropoli and also Pre-print were added. And then there’s a book about his memories. Then, the relation with Lucio wasn’t so good in the last years, we argued even within Luogo Comune. We did Metropoli together for a long time just between the two of us, because Piperno and Pace in 1981 were given their passports from the police with the proviso that they would go away from the country, because they could have been put on trial for crimes for which France had not extradited them; so, they took their passports and went to France, where they had all the difficulties of the exile. Lucio and me remained here; we did great part of those five issues of the magazine. Then, instead, in the period of Luogo Comune we weren’t any longer in synch, on the contrary there was a strong tendency to quarrel. He accused me of continuism; I instead accused him to simplify his life, in the sense that is made of the passage, the leap. The most complicated thing is actually the least continuist (of course that’s what I was saying), it was necessary to understand how many things had entered, for example, the concept of production, which previously did not belong to the concept of production: one can even say that production has no central relevance, but to see the same thing it’s one possibility. You can say: “lots of things that previously had nothing to do with work have become work”, or you can say: “work has become an inessential dimension”; you can say both things based on the same elements. So, there were some disputes on this. From the point of view of great moments, he has been inside seminars that have produced the collective book Sentimenti dell’aldiquà, then was present as one of the founders of Luogo Comune, he wrote and collaborated in the first issues of DeriveApprodiLuogo Comune kept together people that were very different, something that contributed to its paralysis. However, the great moments like frequenting certain circles of discussion are pretty much more or less the same; even the period of the prison experience was absolutely the same, because we were all accused of the same things, we had the same profile case. Let’s say he worked almost exclusively on this theme of political theory, with the book (edited by Hopefulmonster) Il potere degli altri [The powers of others], then even on that text published posthumously by Manifestolibri [Manifestobooks]. Thus, the same words (general intellect as a political source rather than a fundamental element of production, the very word exodus) were also his own but he gave them a declension that was more anti-workerist than I thought proper, and certainly not for reasons of affection towards that tradition.

A somewhat much more complete question than the previous one. Technical composition, political composition and recomposition are three different categories that often are confused between each other or completely not considered by certain theories. Even in regards to the discourse on the general intellect some people (Toni, for example) end up looking mainly at the pretty static dimension of technical composition, interpreting it immediately as antagonist political composition, thus viewing the capacities to work as immediately revolutionary. Often subjective determinants are completely left to the side, the very ones upon which an analysis of political composition and a continuous path towards recomposition should be centred.

Perhaps this was a flaw (if we can call it this way) that Toni had even in 1969, it’s not something new. It derives from this attitude of his to be hasty, to see a tendency as already actualised and thus certainly to skip passages that make the problem of class composition one that is always tenuous, controversial and reversible. However, in my opinion, out of the necessity of being in France, after the defeat, after prison and then even now, Toni tried in the end to outline the margins of the scenery in its entirety rather than look at the centre of the scene, he tried to determine the field rather than see how it could then be passed through. Thus, he tried to show even the logical borders of the situation in which are in, occupying perhaps less energy than he could in the 1970s to the effective passages of class recomposition, trying to indicate the lodestars of the situation. And on this one can either agree or disagree, but the work done by the magazine Futur Anterieur has been important. The analysis of what they called immaterial labour, cooperation and so on, has been a good path; in parallel and independently from us, they had worked on the linguistic and communicative dimension of labour, with a critique of Habermas that touches upon the problem and distorts it with its own dichotomy. The fact is, they came to a halt there, and the same was for the forces they implicated, for the sort of collaborators not only from France that were in it. In my opinion, his attention is always more directed towards understanding, whether right or wrong, certain lodestars rather than truly confront processes of class recomposition, not addressing and often inhibiting their ambiguity and their character.

Which have been, in your opinion, the central names and authors that can be used to break politically with those closures of Marx’s theory of which we spoke earlier?

If anything the great authors are from the social sciences and from philosophy. I think it’s hard to speak of contemporary production without resorting to even an instrumentalisation of philosophy of language. Either we take ourselves seriously or we don’t: if we don’t take ourselves seriously then it’s simply a joke to say that language has been put to work (or however one wants to say it, this doesn’t matter); if we take ourselves seriously this means that some of the categories should be taken not exactly as they are, but retraced with a work of critique and, of course, even one of modification in who thought more in depth the linguistic experience, such as Saussure and Wittgenstein. However, this is not only a problem given by studies I’ve made and things I’ve written, I don’t want to break it up this way, but it’s a kind of necessary enlargement. There’s the great biology, the current one but also the one of the beginnings of the 20th century, that is important for the characteristics of the human animal as such (I deliberately make use of the term human animal for a materialistic reason): it’s as if this sort of essential core of the human animal had come to light especially with post-Fordism.

The Marxian definition of labour power has for the first time actually become true, which is explained by Marx as such: “the sum of all the physical and intellectual aptitudes” – it should be noted, aptitudes are in potentiality – “existent in the corporeal agent”; this definition in a certain sense has never been completely true until now. Therefore, if it is as such, even biology (in this strong sense, not in the sense of biologies) is important.

Then there’s a critical usage of opponents, often opponents are the best interlocutors. Luhmann can be said to be an opponent, no one can deny it; to me Hannah Arendt is an opponent, but many things can be drawn out from one who thought with her own head like Arendt, in terms of problematising, varying, correcting and conversing with them.

Certainly in philosophy, but even in the social sciences and in critical theory in general, some good opponents are worth more in a certain sense than allies that are either mediocre or with whom you are already in obvious agreement. Of course, the worst thing is an opponent that is innocuous, but a disquieting opponent, an insurmountable opponent gives you great possibilities. The same goes precisely for Hannah Arendt: I read her, I re-read her, there’s not even one sentence that I would subscribe to, but many things come out of this friction. The same of course goes for these philosophers of communication and language, I was already speaking of Wittgenstein and Saussure; the same goes for the biologists that think human beings as an indefinite animal, it’s a great strand. It’s important to choose good opponents. I think is important not Heidegger in general but just the one in Being and Time, that would take everyday life in mass society and analyses it as such, and thus brings out some categories that are truly philosophical categories, which however have apparently little to do with philosophy, like chatter and curiosity: these are good things, of course, to eviscerate against Heidegger himself, again we are speaking about opponents. I’d much rather keep a good list of important opponents.

What do you think about Arnold Gehlen?

Gehlen is important, sure: making use of these biologists like von Uexküll and these others, he elaborates to the greatest extent the idea of the human character as unprepared, indefinite, uncertain and undecided. What is it to post-Fordism? An animal that is indefinite (flexibility, plasticity), undecided (always ready for different alternatives), and so forth.

Courtesy-http://nyxnoctournal.org/2012/09/06/an-interview-to-paolo-virno/

Arirang(2011)- A Self Interrogation by a Legendary : Kim Ki Duk

arirang(Arirang a 2011 South Korean documentary film by Kim Ki-duk. The film addresses a personal crisis Kim went through, sparked by an incident during the filming of his previous film, Dream, where the lead actress nearly died by hanging, and by the departure of a couple of close colleagues.)

By Kim Ki Duk

Arirang Ready? Action! And then the actors begin to recite their lines express different emotions and so on. There are differences between the roles of angels who say good things and roles to bad they say bad things is advantageous for the actors reciting bad parts? prefer to do the good or bad? Actors really like cruel and explosive roles Actors .. Ready? Action! What did you just say? What did you just say? What did you just say? What did you just say? Kim Ki-duk What are you doing? Because now you can not make a movie? What is wrong with you? Now I can not make films. So I take myself. Going back to myself, I confess my life, as a director and as a human being. Around a movie about myself It could be a documentary, a drama or fantasy genre I interpret the characters that I would like the protagonists of my films. I can … take the camera and film There is nothing scheduled but I need to shoot something to be happy So I film myself There is a movie I want to run. is about … an American soldier who fought in the Korean War. after 30 years, before dying, returns to search for the body .. of the person killed. Being old he returns to Korea and goes to a village. Buys Himself a shovel and salt on a mountain. begins to dig around, but can not find the corpse. and about to give up and leave, when he meets a woman. This woman helps him search for the body. He returns to His self from the past, a soldier in the Korean War He takes up to rilfe and starts wearing a uniform Returning to His Old Self. Only then can he find the body. Then he takes the body. Then he lets it go. While still ill, goes to a shaman and meets the spirits of the dead woman. This is the synopsis Trying to make this film I also spoke with Willem Dafoe But the circumstances are not favorable I would do, but for different reasons, I can not. Crying Would not turn into love As if to console me with tears. You can also go But you can not go more Do you like living in a tent in the middle of the countryside? Do you like? Tell me Living in a shack so cold That you have to put a tent in it? Drink all day like this? Kim Ki-duk, tell me Why do you insist on living like this for three years, from 2008? You’re not shooting the film? Give up everything? So you will reduce drinking every day? That’s why they say you are totally depressed. People are so sorry that you are The world-renowned director embittered by betrayals, lies somewhere in the mountains no more contact with the film industry. Why do you do this? Do you think this is right? But why the hell you live like this? In a place where water freezes in cold weather. A wretched place with not even a bathroom in it This you call life? Where are the plates then? What are you? A dog? Eat in a dog bowl Why live like this? Where’s the laundry? It seems that for years do not wash your clothes And what happens to the atlas? What has happened since 2008? And because of the incident in the prison during the filming of “Dream”? And that actress in the scene of the hanging? Have you run away to another cell to cry, and so? It was an accident! Admit that you’re scared You did not expect really, huh? Seeing her hanging there you scared me to death But you climbed a ladder and you saved her. So what’s the problem? Do you think if I had not acted quickly you could kill someone during the filming of a movie? Think of this scares you to death? And then you decided to stop making movies? Due to this shock? Tell me, you bastard! Are you connecting to the internet? Many are waiting for your film Do what you can, whatever it is. You’re so weak? You’ve done 15 films. There Have Been That many incidents of type I hate to see you in this state. Many people are waiting for your movie, baby Whether one person or one of Hundreds, you have to do your job! Instead, you stay locked up here Spend your days … in the wild Do you like living like this? At any time you decide to live like this. Why now? Dude, you’re still young! But thus wasting your time .. I’m not saying do not make sense Maybe you need it. Life was already hard before shooting “Spring, summer, autumn, winter” Just as then it’s time to wonder. But this time going for long Three years have passed now, we are now in 2011. Three long years. People are wondering about you. In many expect your film Think about it. Perhaps you’ve already said everything in these 15 movies. But I do not think That you are so traumatized. Because of the incident ah you dinner in shock, right? Just look at the movies When he was in post-production already wrote his next film. Then shot and edited and wrote the next movie! You wrote, preproducted, edited and produced all by yourself. A lot of work That’s why you run out. And like I’s block Many of your fans want to learn from you. Of course, I know I know you hurt To accept someone who waited hours in the rain to learn something from you and those who desperately begged in the mail … And then, five years later. have left that capitalism sucks And life and you know very well The people come and go. Many Came to Tell You That They respected you, but then they went away in disgust Whether it was your moral values or their personality problems, people can never stay together long. Because everyone has their own dreams persuasion and Choose Their Own Dreams and Desires. Nobody puts friendship first of these things Do you feel hurt because they were like family to you. You know life’s like this When you get close to someone, then you walk away and vice versa. We can not continue eating the same thing. I love the contours. This is life, you said it in many movies The way I see it, you are not living like in the movies. You are not as Determined and resolute as the characters you created. If those people could see you would be sorry for you. In your film there are many strong characters like wild animals. But because you are so I would say “so naive”? Whatever you say I can not give a clear answer I do not care how much you push me I can not I can not say anything What should I say? I should say the accident during the filming of the movie If the result was fatal for someone … would assume that meant the film? Movies are so important? It is natural that I was shocked As director, I was responsible for And I was also the screenwriter and producer I was responsible for everything that could happen. If that had happened. . something actress .. , and if she died for my idea and because of my film? would have been devastating How could I justify it? So many words as on No, it happened, like you said and Actress fainted and then recovered is not even aware of what happened and Despite this I was shocked by what would have happened And as a result of trauma look at my past life, I reflect on how I shot my films And I think to what we should do from now on I was sad and troubled because I am a director Should I continue to do so? What are the movies? If someone died because of images and stories that I have created, would be really terrible! I was shocked by the incident, but I also lived a good time As I had these 15 films, I wanted the realistic detail Several times and It Happened That Almost Got hurt people will drink with you, friend Very good is not a speech. . about being good or bad. Basically .. I need time to think back on my movies After That incident, I can not write anymore. But I still have much to say There are some stunts in that movie And scenes that involve ethical and moral issues. I keep thinking if it is really the case to make films like that In the past, when i finished one Instantly I Worked on the next one, as if I were a car So I started making a movie Each year. I did so. And that’s how I got where I am now awarded at festivals in Venice and Berlin and invited to Cannes. My films were distributed in many countries At the time I was very happy and thankful So what? Friend, you’re depressing. I thought I was through with directing. film, “Dream” was like a dream. The next film was to talk about death. But the meaning of death is changed after the accident. To me death was a doorway to another world of mystical but I understood that death may be a crime … that shatters the dreams of a person , which can shorten the life of a person And then life has become difficult After my first movie “Crocodile” The Death Treated with care. One can not understand death or talk about it easily without having first experienced It can be considered a form of hope Death and only … Now I consider … white turns black. Simple. You write movies, books, poems about death It is processed to give birth to abstract concepts. But death is like a cliff. And like a door that closes A light goes off. Death is … very different from you and now. Making movies with death in the scene … In many films of today die from hammers or axes. And then? A part of me longs to return to filmmaking Immediately Truly “I have to make a movie right now” What if I forgot how? ” there is also this desire in me, you know? A little ‘ Just a little … and I reached the goal I set for myself Winning a Grand Prix in a festival, or reach a worldwide box office records People work and expect results, not so? Something that no Korean film has ever reached It is said that Korean films are improved but none has received as the other Grand Prix in a prestigious festival I do not know why, but Let me be the first to do so. And humanly understandable, after all So I continued to write, pushing me to make films But the obsession has complicated things. I felt stifled and locked, because of this obsession. Before “Dream that I did in 2008, I was not so rushing as fast as a runner on the track! I kept running … no distractions is how I made my 15 films. So, this explains why those films are rough, naive, innocent and very rushed. Immediate. Some critics appreciate others crushed Them Them to part of the public hates Them, the other loves Them I made those movies like crazy But then I realized it was not right I’m not saying I’m right, but there is a difference I have lived and made films with passion. I had never had a decent job before becoming a director I am very happy to be a director, and a respectable one. Worked at the factory at a recycling metall Producing electric devices. Also I did street art. Back then I always felt alone and felt sorry for myself I never thought of getting respect from people. But after he began making films … do not know … I became a so-called “world-class filmmaker.” you know My films are seen in Europe in Latin America in the United States, Russia, in Germany, Eastern Europe. Even in Israel I was really gratified by the fact that my films were seen in the world I was happy and proud Obviously it was not all roses I have also received much criticism Many have criticized both at home and abroad saying that my films are rough does not matter if it deals with themes that touch the heart, for they are still crude How can I explain? It was so … Making films was happy for me to work But suddenly and was like being hit by a hammer. I wished the best for people who had worked with me I offered the opportunity to work for my two assistant directors. One has “Rough Cut ‘on my script The other shot “Beautiful” assistants have become directors and have received many appreciations After “Rough Cut ‘ director Jang Hun has received many offers from major to make movies with them Bu he stayed loyal and Decided to make two more movies with me. I’m grateful for this. But while preparing “Poongsan” the producer and the director of “Rough Cut” left. People would say “treason” That’s what I think too. but I prefer to say .. he left. They left to make their interests Just Like When They Came to me in the first place. For Their Own Gain. It was agreed to without my knowledge with large houses With whom I could talk about it? For months I have been tormented with these thoughts. Those two who let me … in the midst of my shock resulting in a “Dream I was flooded with a lot of doubts about the craft of cinema. Leave it that way. It was wrong. Had they come to talk to me I would have laid off, I did so. But fled like cowards If I had been told clearly that they wanted to make films with big houses and take the opportunity I would not hurt so much famous actors were involved, but they took a chance and they are gone. could not argue on this point This still makes me sick and … in the relations between people … Seems everything made of opportunism Perhaps I behaved That Way too. No, no, not true … I am nothing like that! They are different from me. This sort of thing confused me I thought a lot about how they could do this to me articles Media Were Saying That I Had Been Betrayed by my staff. Many have expressed their sorrow- and wrote to console me. Fearing bad Consequences For Him I wrote to defend the director. I Have Been Praised for Being so compassionately forgiving. But there is one question That saddens me It’s all very sad I do not know what I’m saying .. And the only reason I’m not doing films at this time I’m not sure why I can not manage it. I was shocked .. during the filming of a movie And some people hurt me. people are terrifying. I gave them my heart. There were others like them Like a bolt from the blue. I have been stabbed to the heart And so I lost confidence My role as a director meant little to me It was really sad I thought, ‘This is life? “. certainly was not so Our films tell great stories, right? Watch the TV news – Those are fantastic stories. But They Also show you what horrible things you can do In some news we can understand how people can be exceptional And from there it comes the strength to live. You who ask me questions … These you are also Kim Ki-duk Not the Kim Ki Duk of the Moment Kim Ki Duk You are the spontaniously who watches my life Thank you for these questions Listen to my speeches that sound like moans or justification. Thank you for the opportunity given to me by talking about it. I appreciate that The incredible thing Is that in my life at this moment I feel at home. Why I came here just now? I ‘m really Asking myself this. But part of me knows that I should not My dream is to live and make movies in different Countries Go where there are my fans, make a movie and then leave again. might seem a fantastic But I can not do it if I’m here What am I talking about? In this cabin where there is nobody who I’m talking about? With whom I am confessing? With no one. No one is listening to me. The machine that I did. for coffee The chairs that I have done I think that they listen to my stories. This wicked world My love indifferent Your love has been here But you leave I can not help but cry Arirang Arirang Arariyo Arirang hills Please When I sing this song I can understand all Arirang, Arirang Arirang hills, send me, please Arirang I heard that … read in Chinese characters the word means “self-assertion.” To me Arirang hills are … the hills of life. They go up and down, up and down Arirang They go on go down are back on fall down Then come back to climb Then down They go on go down They go on then back down are back to climb … and go on They live so This is This is Why weeps that crazy? Stop crying, crazy I get depressed. Boys .. And so much fun. I never thought of being a good speaker. Yes, you are! I never thought I’m saying what comes to mind. You see that you are good I’m talking about Profound Experiences of My Life. This body hears You think too much … Basically, I think that the word that sums up my life so far is “loneliness” I did not have any friends My only friend at school was mixed race, people despised him My only friend was the son of an American soldier lost was present in my film “Address Unknown” He was the only one who liked me. Even though I was surrounded by people. I was basically a loner have not been able to go to school Sorta went to work in a factory machines which use them mended by the workers. As the only man, I was alone. propm’o I could not talk to people. I could not get along. So I have had many opportunities to observe their lives How they live and what they say And I struggled just to survive always worked in the factory always slept little and worked 15 years already. In short, my life was lonely and difficult That’s why I WAS Able Those stories to tell. Through your questions, look at my past life. I have no regrets there are not many like me The honors. We Will not Take Them to heaven or hell. People live their lives. And then life ends up as a diary Even if the events are recorded people in the past are no longer here. The fact that he left a mark on world history is not a guarantee of happiness in the hereafter. Do not you think? So that I live in this miserable hovel or do I face a big movie That makes me so happy I can not sleep That Mocks The People I Have Worked with there’s no big difference. We live under the law of inertia (Trägheit) Extend perspective and see that it is always the same thing Some things have value, other-not, but still we give importance I wondered why the I am here, then there’s the family … then there is society Even more up there the nation. And That Is the world above. regulated by the competition that decides winners and losers We consider the nation as a foundation Be loyal to the country you increase national prestige Ironically, artists and athletes based on this The director of a film I received a presidential commendation when I won in Venice and Berlin and a medal from the Order for Cultural Merit I do not know how much benefit it derives from my life. But they award prizes, gives the same community awards. Given this people might be confused and think that I make films to improve the nation’s image. While not these my intentions, this is what appears If I win a prize abroad, my country is a reward People will think it has enhanced the national prestige But if you look at my films carefully are things that embarrass the country All this is ironic. My films describe the chaos of life during different periods of transition in Korea To Say That I improved the image of the country by winning international awards Honestly, I Wonder If They have seen my films. Perhaps They would not give me the medal If They had. Rather weird, right? I’m trying to say that there are artists who work in that system It is inevitable Which Would Reject director to praise for receiving an international award? I accept and use it This is why art is so unique Take my film, for example the story from the life experiences termination When you show them to others There are some art others of the truth or different points of view of life. Still others are touched and grateful. What can I say? And a way to communicate But in essence, what are human beings, life, movies? Do not know the answers We use cameras or digital cameras to make movies employing people, images, and sounds … and in the form of a story come to these films to the public adorn them with good feelings, or contempt and despair in some cases, , or various other emotions … Some people like. others feel struck. Not only movies. Even our lives are steeped in emotion. Modern society is full of people who have lives that look like film The writers will draw inspiration and make us a movie In the city, in every nation, witnessing scenes that reveal the nature of human In a few seconds, let’s take a look at the life of someone and feel contempt Or we find a great and profound life. And so films only provide more extensive and systematic There are expressions of life around us far beyond the movies. I have not made a movie … in three years Sometimes I think I’m good just to continue to live this way Bud then … Also I feel That I am not really living my life. So I bought this camera Mark II. I can only use it to shoot myself. Can I say what I want, without needing a crew to make a film usually takes 30 or 40 people cameras are used huge sets and lighting, but just this is enough room. In the movies we TEND to Intervene too much The real film cameras require more light because of the diaphragm The cameras can shoot instead with natural light. This room can instead shoot with natural light. The camera captures the world as it is but there are too many embellishments. I have been using the Mark to shoot myself I can not make a film then I take myself. Now my life and a documentary. but also a drama Now I am an actor. Here’s what I think are the movies: a truth. There is no need for professional cameras or lights. There is too much preparation to capture a single moment I hate the logistical preparations for a film I’m worried Because They Say That My films are rough and technically poor. Admittedly, some people may think so. but for me it is not really that important. I’m shooting like I was in a drama Some would call it a documentary, but I think it is a drama As a writer I Constantly Think About how to make the film more dramatic, even now Perhaps I cried the first to dramatize the emotions more Maybe I played a little ‘ is not funny? Not having the actors and crew to make a film, get one even so! I want to make a movie now! I’m recovering and I’m playing because I want to make a film I want to make a film To Prove That I am still a director To be honest I forgot all about directing I have forgotten how to direct actors I do not know what is even more a movie captured my imagination and my voice with a camera like this that it is truth, form, or acting Is not this a movie? Sons of bitches. Sons of bitches! Bastards! Damn bastards! Motherfuckers that reveal their instincts playing gangsters. Die by the desire to make the bad guys, right? You want to fuck the world, right? You think I do not know? You masturbate with movies Damn bastards! The villain is the easiest! The easiest, assholes! Damn lousy bastards! You know the bad guys and do it easier, right? You have only to blow all the anger in you. insult, oppress people! Shoot with guns hit with an ax! Am I wrong? Now I’m doing what you call a fucking bastard! Do not brag to play well the role of villain. This only shows that you are evil! Hit the bottle, cut with an ax and shoot bullets! I can do it myself, faces of shit! damn bastards Hey, KJM Ki-duk Have you ever been questioned by your shadow? Your shadow from the sun. As your shadow I ask you something The question is What is the Most important thing in your life? I never thought this to be asked by my shadow. Since you ask me as my shadow. I should answer, right? In my life there is sadism, masochism and self-torture turturing the others, and turturing turtured Being Ourselves At the end, many are content with self-torture, right? I think that life is When like Gazoline enters the engine of a car. The pistons move as input, combustion and exhaust Then the pipe shaft rotates the wheel and the car moves That’s Life The same applies to the principles of electronics. Conductors, semiconductors and conductors That lead, no lead and lead sometimes. The principles of modern electronics. transistors and integrated circuits I think that human life is very similar I understand. Love, hate, contempt, lose, and understanding. These are items related to emotional experiences of people. the Supervisory principles of human There is no reason not to hate, hate honors understanding of human life Even so, we continue to forget it in a shortsighted view we need time to heal from the pain, hatred and to forgive interesting We Keep Ourselves Alive in feeding on plants and animal life. But we always contend mineral resources obtaining nuclear weapons and bombs This serves to human life exists in this world. The principle of the inevitable struggle already exists. Fighting, jealousy, hatred, forgiveness, understanding, and so on .. already exist in nature The struggle there among the trees, animals, minerals. Even the nuclear bomb, right? Where they found a force so devastating? has always been the principle. nuclear explosion, fission and fusion This technology is not different from that which moves men The mechanism of cars or cell phone, all derive from human nature So I think that life is … self-torture, sadism and masochism. self-Turtur, sadism and masochism. Go ahead -That’s why I make films, I want to highlight this. That the white and black are the same color. The Truth Is that we are fighting an inner fight. 8 4 Becomes Becomes Becomes 2 and 2 1. namely me. to the I Am 8. This is our life. l my films are based on these principles. There are people who understand and identify with my films with my thoughts on human life on the order that exists in nature may also share my thoughts. Now when i watch, and remember Mostly I Understand my movies In practice, what I mean … Is that human life is so insignificant. From the point of view of history, a human life and an infinitesimal part. How insignificant are our lives! We are as happy as if we had the whole world I’m not saying it’s wrong. express happiness as if the world was ours But we have never had it all It would not even be possible. The happiness that gives us victory in a race or a big win money positions to achieve high power or receive a prize with honor … These are games for children. I Never Consider this happiness in the light I am concerned most of the food grown in greenhouses We eat plants and animals pumped strength. A food grown with the force stress contains This stress comes directly to our body We live life by releasing the stress from this food People Turtur Each Other and make it even more difficult. I think that is a different order If it’s not like this it’s too tragic to accept. Thank you for your question, and leaving to speak my mind Thank you, Shadow. Shadow of Kim Ki-duk Thank you for making these questions to Kim Ki-duk All the festivals that I attended I miss them all If your film festivals I had not been discovered I would probably be a nobody Only a director … that failed at the box office. But When I Was Discovered I Was Given The Possibility of recognition even in Korea. My films were not successful in Korea, but … Kim Ki-duk … thanks to you, this name is now known. In spite of everything is not enough. The Korean company, and so sad and absent. This wicked world My love indifferent Your love and stayed here But you leave I can not help but cry Arirang Arariyo Arirang hills Send me, please. When the Koreans feel anxious, lonely, sad or want a person singing “Arirang Ari Rang .. And so embarrassing me again with a video camera. Even after 15 movies .. I think it’s the first time confession in this way. It’s the first time. I’m excited and nervous, I do not know what to say I want to make a film. I do not care if they say it’s boring. I do not care if they say they are no longer the same I just want to make a film, I do not care how When I make films I live the happiest moments of my life. But the demons will not let me do it. I really want to make movies I want to talk about the world about people and about what I’ve seen I killed this fruit … to live. The men feed on countless deaths Dead pigs, cows, chickens nourish us with the deaths of plants and animals It is inevitable for men Why is it so sad? Why life is so sad and depressing, every day. Because I am. It’s so cold. How to shoot questions to myself, without knowing the answers and January 4, 2011. I still believe that there is something out there But down there and really for me? It may be over for me? I have to spend the rest of my life in this hut? What … I can see? Honestly, I do not know. that’s waxed World My love indifferent Your love and stayed here But you leave can not help but cry Arirang Arirang Artrang Arirang Aranya Coltine Arirang Please Stop it Kim Ki-duk Stop it Kim Ki-duk Stop, you bastard! I told you to stop, fool! Stupid idiot. You Did not Know That this is life? You Knew it, you stupid bastard! Damn idiot You Do not Know That this is life? Ready! Action! Motherfuckers Traitors! I’m coming to kill you, wait will kill you! will kill me for pointing out scum like you. Ready! Action! This wicked World My love indifferent PAINTINGS PAINTINGS IN 1990 in Cap d’Agde, France Your love and stayed here But you leave I can not help but cry Arirang Artrang Arariyo hills Anrang Please This wicked World My love indifferent Your love and stayed here But you do you vat I can not help but cry I can not help but cry Arirang Arirang Aranya Arirang hills Please Arirang, Arirang, Arariyo SITILO hills Ahrangt please send me My love, I have you forsaken you will hurt your feet before three miles Arirang, Arirang, Arariyo Suil Arirang hills, send me, please My love, I have you forsaken Your feet will hurt the first three miles.

Snapshot from arrirang(2011)

Snapshot from arrirang(2011)

Courtesy http://tosubtitles.com/arirang-2011/1645

New Harvest, A Film By Pallavi Paul: Uday Shankar


 

By  Uday Shankar

Craft is a divine and natural art. A craftsman is not artistic in himself; artistic feat which has been accumulated through talent and practice. To be human is not necessarily to be a craftsman. A sparrow building its nest, creation of bobby by ants and a spider weaving its web are examples of craft. We can become ‘Spiderman’, but not spider itself. This is what is- ‘being human’. We can imitate the action of spider, we can rather think about the process of weaving. This thinking constitutes our art. The knowledge of generations is inherent in us. For whatever art has been accumulated throughout generations, one doesn’t have any sense of greed or personal attachment towards it. Until today, anyone has hardly ever heard a smith proclaiming that a vessel is not saleable; or same for the weaver about a cloth, a goldsmith about ornaments. For them, these constitute their daily bread.

Today, whosoever is not even a tiller of land, he proclaims to have sown seeds in the sky. But even if there can be no fruits in sky or God on land, a poem can come alive and reinforce itself. This poem has the power to bear fruits in sky and God on land. It is like the hope of a technician who breathes to see a night convert to a day. Do modern dreams have creativity? We know to live in the natural rhythm of night and day; we want the moon in night and the sun in day. Why do we let our sight vanish in the shimmering nylon lights of night which dance in an artificial carnal climax and the clear bright lights of the day ?! The absence of creativity in dreams has extended itself in our material lives. We want to fill the rampant absence of creativity with trickery of sorcerers and incorrigible patters of the demented. Some season creates the feeling of conviviality and is universal. But thanks to the prevailing impotent technicians, we have lost that ability of experiencing it. May it be winter or summer, we are beyond guillotining ourselves in tepid waters. We are alive only through our recollections in which we have no formative contribution. Far from adding to them, we are unable to appreciate them. We are engrossed in vile masturbations. That part of life prone to disappearance is craft which has been bequeathed. To define this craft is the study of our art life for which we are absolutely incapable. What will be left of us if what is bequeathed in the form of craft of life is sundered? Will the craft sustain the essence of art and poetry? Can we rescue that indomitable bird that can’t help but be fraught with creativeness?

          The End

Film- Nayi Kheti(New Harwest)
Dirctor- Pallavi Paul
Text- Uday Shankar
English Translation-  Nivedita Yashvant Fadnis 

FromFilm, courtesy-Pallavi Paul

FromFilm, courtesy-Pallavi Paul

नयी खेती (फिल्म)- पल्लवी पॉल

क्राफ्ट दैवीय होता है, नैसर्गिक होता है। क्राफ्ट्समैन कोई ‘हुनरमंद’ आदमी नहीं होता है, ‘हुनर’ जिसे प्रतिभा और अभ्यास से अर्जित किया जाता है। मनुष्य होने की खासियत क्राफ्ट्समैन होना नहीं है। चिड़िया का अपना घोंसला बनाना, चींटियों द्वारा बाँबियों का निर्माण करना या फिर मकड़ी का जाला बुनना, यह सब क्राफ्ट्स के उदहारण हैं। हम स्पाइडर मैन ही बन सकते हैं, स्पाइडर नहीं और यही मनुष्य होना है। हम स्पाइडर की नक़ल उतार सकते हैं, उसके बारे में सोच सकते हैं और यह हमारी कला है, आर्ट है। पीढ़ियों का अभ्यास आपमें अनायास शामिल है। पीढ़ियों के अभ्यास से जो हुनुर आपने ‘अर्जित’  किया है, उसके लिए आपके भीतर कोई लोभ, व्यक्तिगत लगाव नहीं होता है। आज तक शायद ही किसी कुम्हार से यह कहते सुना गया कि यह घड़ा बिकाऊ नहीं है, किसी बुनकर से चादर, सोनार से गहने। यह उनलोगों की रोजी-रोटी का स्वाभाविक धंधा है।

आज की तारीख में जो कहीं से किसान नहीं है कह रहा है कि वह आसमान में धान बो रहा है। लेकिन आसमान में धान या जमीन पर भगवान्  भले नहीं जमें, कविता जरुर उग और जम सकती है और इसी कविता में यह शक्ति भी है कि आसमान में धान और जमीन में भगवान्  दोनों उगवा सकती है। यह उसी तरह है जैसे किसी तकनीशियन का एक पुराना सपना था कि रात दिन हो जाए! क्या आधुनिक सपने रचनात्मकता से रहित हैं!! हम रात और दिन की स्वाभाविक लय में जीना चाहते हैं, हमें रात में चाँद ही चाहिए और दिन में सूर्य। रातों को जगमगाती और कृत्रिम कामोन्माद में थिरकतीं नाइलोन की लाइटों और दिन के  ‘सफ्फाक उजाले’ की समानता को हम अपनी समझदार आँखों से क्यों ओझल हो जाने देते हैं! सपनों में रचनात्मकता का अभाव व्यावहारिक जिंदगियों तक में फ़ैल गया है। खुद की व्यावहारिक जिंदगियों में व्याप्त रचनात्मक अभावों  को हम जादूगरी करामातों और पागलों की बड़बड़ाहट से भरना चाहते हैं। कभी कोई ऋतू एक खुशनुमा अहसास जगाती होगी और जो सार्वभौम भी होती होगी। लेकिन रचनात्मकता से हीन तकनीशियनों की बदौलत यह अहसास भी हमारी हथेलियों से फिसल गया है। अब सर्द क्या गर्म क्या, गुनगुने पानी में गिलोटिन निगलने के हम आदि हो चुके हैं। हम सिर्फ स्मृतियों के सहारे जिन्दा हैं, जिसमें हमारा कुछ भी साझा नहीं है। उसमें कुछ जोड़ना तो दूर,उसे  हम सराह भी नहीं पा रहे हैं क्योंकि हमारी हथेलियों पर सरसों उग आयीं हैं और हम अपने तैलीय हाथों से सिर्फ हस्तमैथुन करना जानते हैं। हमारी जिन्दगी का जो भी हिस्सा जीने लायक है वह एक क्राफ्ट है और वह भी पुरखों का दाय है। इसी क्राफ्ट को व्याख्यायित करना हमारे कला-संसार का अभ्यास है और हम इस मामले में भी खुद को अक्षम पाते हैं। जब पुरखों का दिया यह जीवन-शिल्प भी हमसे छीन जाएगा, क्या बचेगा? क्या क्राफ्ट की व्याख्या में रत हमारी कला, कविता बच पाएगी? क्या हम हारिल पक्षी की उस जीवटता को बचा ले जाएंगे, जो ग्रहण-अर्जन(और सर्जन भी ) की वृति से कभी बाज नहीं आता !!
इत्यलम !!!
फिल्म- नयी खेती (New Harvest) 
नीदेशक- पल्लवी पॉल 
पाठ (Text)- उदय शंकर 

वर्तमान सदी में मार्क्सवाद: गोपाल प्रधान

By  गोपाल प्रधान

courtesy Google

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पूर्वरंग 

सोवियत पतन के बाद का मार्क्सवाद विरोध नए हालात के मद्देनजर धीमा हुआ है और एक ओर अमेरिकी साम्राज्यवाद के विध्वंसक उभार तथा हाल में आर्थिक मंदी की चपेट और दूसरी ओर लातिन अमेरिका में एक के बाद एक देशों में मार्क्सवाद समर्थक दलों की विजय ने मार्क्सवाद को दोबारा प्रासंगिक बना दिया है ।

सोवियत संघ के पतन का धक्का इतना जबर्दस्त था कि एकबारगी उससे संभलने में वक्त लगा । चारों ओर पूँजीवाद के जीत का इतना तगड़ा जश्न मनाया जा रहा था और उत्तर आधुनिकता के ही प्रासंगिक दर्शन रह जाने के इतने बड़े बड़े दावे किए जा रहे थे कि ‘मंथली रिव्यू’ में भी कुछेक प्रतिबद्ध लोगों को छोड़कर किसी की रुचि महसूस नहीं होती थी । इसी दौर में एजाज़ अहमद की किताब ‘इन थियरी’ का प्रकाशन हुआ । एजाज़ अहमद उर्दू साहित्य के विद्वान हैं और उत्तर आधुनिकता, उत्तर औपनिवेशिकता आदि सिद्धांतों का साहित्य से बहुत कुछ लेना देना था इसलिए वे इस सैद्धांतिक बहस में भी कूदे । ज्यादातर साहित्यिक सिद्धांतों पर केंद्रित होने के बावजूद इस किताब में तत्कालीन बहसों में हस्तक्षेप करते हुए क्लासिकीय मार्क्सवादी नजरिया अपनाया गया था । कुछ मामलों में उन्होंने ग्राम्शी पर विचार करते हुए उन्हें भी शास्त्रीय मार्क्सवादी परंपरा में स्थापित करने की कोशिश की ।

इसी समय जब सब कुछ उत्तर हो रहा था तो मार्क्सवाद के भीतर भी तरह तरह की मान्यताएँ घुसाकर उसे भी उत्तर मार्क्सवाद बनाया जा रहा था । मसलन अंतोनियो नेग्री की किताब ‘एंपायर’ आई जिसमें साम्राज्यवाद को नया अवतार ग्रहण किया हुआ बताया गया था । किताब में कहा गया था कि साम्राज्यवाद आज मार्क्सवादियों ने जैसा उसे बताया था वैसा नहीं रह गया बल्कि पुराने जमाने के साम्राज्यों की तरह का हो गया है और उससे लड़ाई भी विविधवर्णी हो गयी है । साफ़ है कि विश्व सामाजिक मंच में जिस तरह भाँति भाँति की शक्तियाँ शामिल हो रही थीं उसी के कारण इस तरह के सिद्धांत भी पेश किए जा रहे थे । पुस्तक में साम्राज्यवाद से लड़ने की माओवादी नीति ‘तीन दुनिया’ के सिद्धांत पर यह कहकर सवाल उठाया गया था कि तीसरी दुनिया में भी एक पहली दुनिया बन गई है और उसी तरह विकसित देशों में भी एक तीसरी दुनिया दिखाई पड़ती है । इस बीच फ़्रांसिस ह्वीन लिखित और 2000 में नार्टन, न्यूयार्क द्वारा प्रकशित मार्क्स की एक जीवनी ‘कार्ल मार्क्स: ए लाइफ़’ भी पश्चिमी देशों में बहुत लोकप्रिय हुई जिसमें व्यक्ति मार्क्स को केंद्र में रखा गया था और कुछ कुछ चरित्र हनन भी करने की कोशिश की गई थी मसलन जेनी मार्क्स के साथ उनकी सेवा के लिए परिवार की ओर से भेजी गईं हेलेन देमुथ के साथ मार्क्स के अवैध संबंधों का संकेत किया गया था लेकिन पुस्तक में दिए गए तथ्य ही मार्क्स की बनिस्बत एंगेल्स की उनसे अधिक करीबी साबित करते थे । बहरहाल कुल के बावजूद किताब में मार्क्स की ‘पूँजी’ को लेकर कुछ नई बातें कहने की कोशिश की गई थी । लेखक ने ‘पूँजी’ को उन्नीसवीं सदी के महाकाय उपन्यासों की तरह पढ़ने की सलाह दी थी । इस किताब की जटिल शैली को लेकर लेखक का कहना था कि मार्क्स ने जिस विषय को व्याख्या के लिए चुना था वही इतना जटिल था कि विषय की जटिलता उनकी शैली में भी चली आई । लेखक के अनुसार मार्क्स का ध्यान वस्तु की बजाए उसके रूप के प्रसार के रहस्योद्घाटन पर था इसलिए नाजुक विषय को स्पष्ट करने की शैलीगत बेचैनी उनकी किताब में दिखाई पड़ती है ।

वैसे भी मार्क्सवाद कोई ऐसा दर्शन नहीं रहा है कि महज तार्किक रूप से सच होने के आधार पर उसकी प्रासंगिकता बनी रहे । इसी बीच लातिन अमेरिकी देशों में नई शुरुआतों की खबरें आने लगीं । ब्राजील में लुला की जीत से और कुछ हुआ हो अथवा नहीं, विश्व आर्थिक मंच के समानांतर विश्व सामाजिक मंच के गठन और उसकी पहलों ने ध्यान खींचना शुरू कर दिया । अमेरिका के सिएटल में हुए प्रदर्शनों से लगा कि यह कोई तात्कालिक परिघटना नहीं है । इन चीजों को कुछ दिनों तक उत्तर आधुनिक व्याख्या के ढाँचे में समेटने की कोशिश होती रही लेकिन जल्दी ही आंदोलनकारियों और प्रतिरोध की ताकतों को मार्क्सवाद पर बात करते हुए सुना जाने लगा । ध्यान रखना होगा कि इस क्रम में मार्क्सवाद में एकदम से कोई नया तत्व नहीं जोड़ा गया बल्कि उसके कुछ पहलुओं को उभारा गया है जो अब तक थोड़ा बहुत उपेक्षित रह गए थे । लेकिन इस दौर के मार्क्सवाद संबंधी विचार विमर्श की एक विशेषता पर ध्यान देना जरूरी है । बीच में मार्क्सवाद का शैक्षणिक रूप बहुत ज्यादा उभारा गया था । उसके मुकाबले इस दौर में आंदोलनों से उसके जुड़ाव को सहज ही महसूस किया जा सकता है ।

नव हेगेलपंथियों से मार्क्स का अलगाव

इस दौरान लिओनार्ड वुल्फ़ की किताब ‘ह्वाई रीड मार्क्स टुडे’ चर्चित हुई । किताब के लेखक यूनिवर्सिटी कालेज लंदन में दर्शन के प्रोफ़ेसर थे और इसका प्रकाशन 2002 में हुआ था । भूमिका में लेखक ने बताया है कि उन्होंने जब मार्क्सवाद पर एक पाठ्यक्रम शुरू किया तो उन्हें उम्मीद नहीं थी कि कोई इसे पढ़ेगा लेकिन अचरज तब हुआ जब अनेक छात्र इसे पढ़ने के लिए आए । इस रुचि का कारण बताते हुए उन्होंने विश्व सामाजिक मंच के जुलूसों में प्रदर्शित एक बैनर का जिक्र किया है जिसमें लिखा था ‘चेंज कैपिटलिज्म विथ समथिंग नाइस’ । इसी इच्छा में वे मार्क्सवाद के लिए जगह देखते हैं । वे मार्क्सवाद को पूँजीवाद की मूलगामी आलोचना के बतौर समझते हैं । पुस्तक में मार्क्स के विचारों के प्रति कोई श्रद्धा नहीं है बल्कि ज्यादातर एक तरह की आलोचना ही है लेकिन किन्हीं प्रसंगों में बिना शक कुछ नई बात कहने की कोशिश की गई है ।

सबसे पहले वे सवाल उठाते हैं कि इक्कीसवीं सदी में मार्क्सवाद में से कितना कुछ बचा रहेगा और उत्तर देते हैं कि हमारी कल्पना से ज्यादा ही । वे मार्क्स की एक सीमा का संकेत करते हैं जिसे हम आगे के तकरीबन सभी विचारकों में दोहराया जाता हुआ पायेंगे । वे कहते हैं कि मार्क्स के लिए प्राकृतिक संसाधन अक्षय थे इसलिए पूँजीवाद की उनकी आलोचना में हम पर्यावरण के विनाश संबंधी प्रसंग उतने नहीं देखेंगे जितने आज दिखाई पड़ते हैं । पुस्तक की सीमा के बतौर वे इस बात को भी शुरू में ही साफ कर देते हैं कि मार्क्स को उन्होंने पारंपरिक तरीके से यानी एंगेल्स की नजर से ही देखा है ।

वुल्फ़ ने पुस्तक की शुरुआत मार्क्स के शुरुआती लेखन के विश्लेषण से की है । इस सिलसिले में ध्यान रखना होगा कि पूँजीवाद की आलोचना अपने जमाने में मार्क्स अकेले ही नहीं कर रहे थे । वुल्फ़ का मकसद अन्य आलोचकों के मुकाबले मार्क्स की विशेषता को उजागर करना है । वे कहते हैं कि मार्क्स को पूँजीवादी समाज मानव विरोधी नजर आता है लेकिन उन्हें लगा कि पूँजीवादी समाज में मजदूरों की बदहाली का सही विश्लेषण नहीं हो रहा है इसीलिए इसका इलाज भी नहीं खोजा जा सका है । उस समय धर्म को लेकर बहुत सारा आलोचनापरक चिंतन हो रहा था । धर्म संबंधी इस समस्त विवेचन को मार्क्स ने सामाजिक आलोचना में बदला और इसके लिए अलगाव की धारणा का उपयोग किया तथा इसके साथ श्रम के अलगाव की बात उठाई । उन्होंने यह भी माना कि उदारवादी समाज में प्राप्त अधिकारों को मजदूरों को प्रदान करने से भी उनकी समस्या का समाधान नहीं हो सकता । धर्म के सवाल से शुरू करने की वजह युवा हेगेलपंथी थे । युवा हेगेलपंथियों में मार्क्स सबसे अधिक फ़ायरबाख के नजदीक थे । फ़ायरबाख ने कहा कि ईश्वर ने मनुष्य को नहीं वरन मनुष्य ने ईश्वर को बनाया है । उनका कहना था कि मनुष्य ने अपने सभी गुणों का सर्वोत्तम रूप कल्पित करके उन्हें ईश्वर में निवेशित कर दिया । उनके अनुसार इसके कारण हम मानवीय गुणों को उनका उचित दाय प्रदान नहीं कर पाते । मार्क्स ने कहा कि ‘धर्म की आलोचना सारत: पूरी हो चुकी’ है । स्वाभाविक रूप से धर्म की आलोचना उस समय की सत्ता की आलोचना भी थी क्योंकि वह सत्ता अपने आपको धर्मसम्मत बताती थी । इसीलिए युवा हेगेलपंथियों की नास्तिकता इतनी खतरनाक मानी गई । बहरहाल मार्क्स फ़ायरबाख के ही विश्लेषण से संतुष्ट नहीं हुए । उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर मनुष्य ने धर्म का आविष्कार ही क्यों किया । इसका उत्तर देने के क्रम में वे इस मान्यता तक पहुँचे कि इस दुनिया की तकलीफों ने धर्म की कल्पना को जन्म दिया है इसलिए धर्म का उच्छेद उन हालात के खात्मे से जुड़ा हुआ है जिन्होंने धर्म और ईश्वर की कल्पना को पैदा किया । इसके बाद वे इस बात पर जोर देते हैं कि मार्क्स ने वास्तविक दुनिया को बदलने में मनुष्य की भूमिका को उजागर करने के लिए अपने समय की दार्शनिक धाराओं का खंडन किया । उनके अनुसार मार्क्स हाब्स से लेकर फ़ायरबाख तक के भौतिकवाद की आलोचना इसलिए करते हैं कि वह दुनिया को बदलने में मनुष्य की भूमिका को मंजूर नहीं करता तो दूसरी ओर हेगेल में अपनी पूर्णता को पहुँचा हुआ भाववाद भी ऐतिहासिकता को स्वीकार करने के बावजूद समस्त बदलाव को महज चिंतन के बदलाव तक सीमित कर देता है । हेगेल की तरह वे मानते हैं कि मनुष्य अपने आपको और दुनिया को सांसारिक गतिविधि के जरिए बदलता है लेकिन उनके विपरीत कहते हैं कि यह बदलाव महज चिंतन के क्षेत्र में नहीं बल्कि वास्तविक दुनिया में होता है । इस गतिविधि का एक महत्वपूर्ण पहलू उत्पादक गतिविधि या श्रम है । अब श्रम का सवाल ही उन्हें अलगाव की अमूर्त धारणा से उसके ठोस रूपों पर विचार करने की ओर ले जाता है । श्रम के अलगाव के कारण मनुष्य अपने अस्तित्व को साकार नहीं कर पाता । श्रम के अलगाव के कारण जो गतिविधि आनंद का स्रोत होनी चाहिए वही तमाम तरह की तकलीफों का स्रोत बन जाती है । मेहनत करने वाला मनुष्य काम की स्थितियों के कारण अपनी मनुष्यता को खोकर महज हाथ और पेट बनकर रह जाते हैं । श्रम माल में बदल जाता है जिसे बाज़ार में खरीदा और बेचा जाता है । श्रमिक का जीवन ही मानो उसके अपने लिए नहीं बल्कि धनी मानी लोगों की जरूरत के मुताबिक चलता हुआ प्रतीत होता है । मार्क्स ने श्रम के अलगाव को इस तरह प्रस्तुत किया कि पूँजीवाद के तहत मनुष्य का सार उसके अस्तित्व से जुदा हो जाता है । मार्क्स के अनुसार मनुष्य सारत: उत्पादक प्राणी होता है लेकिन पूँजीवादी व्यवस्था में उसे अमानवीय स्थितियों में मेहनत करनी पड़ती है ।

इस अलगाव का पहला रूप यह है कि मनुष्य अपनी मेहनत से पैदा हुई चीज से अलग कर दिया जाता है । मार्क्स के अनुसार जिस भी वस्तु के हम दर्शन करते हैं वह मनुष्य की मेहनत के जरिए उस रूप में आई होती है । बात यह है कि संसार के ऐसा होने के बावजूद हम उसे अपनी मेहनत का ही उत्पाद स्वीकार नहीं करते । इस तरह हम अपनी ही बनाई दुनिया में अजनबी की तरह रहते हैं । ये वस्तुएँ सिर्फ़ पराई और रहस्य ही प्रतीत नहीं होतीं बल्कि हम पर राज भी करने लगती हैं । मान लीजिए हम कहते हैं ‘बाज़ार की ताकतें’ और हमारी बनाई हुई चीज होने के बावजूद हम उन्हें इस तरह समझते हैं मानो वे गुरुत्वाकर्षण की शक्ति जैसी कोई चीज हों । इस तरह बाज़ार हम पर शासन करने लगता है ।

अलगाव का दूसरा रूप श्रम विभाजन से पैदा होता है । इसके कारण श्रमिक समूची व्यवस्था को नहीं समझ पाता और अपनी जगह पर अपना काम यांत्रिक तरीके से करता रहता है । इसके कारण मनुष्य मशीनी तरीके से एक ही काम बार बार करता रहता है और उसकी सृजनात्मकता मारी जाती है । इसी से फिर मनुष्य प्रजाति के बतौर हमारे खास गुणों या मानवता से हमारा अलगाव होता है । मनुष्य का अपना खास गुण है सामाजिक रूप से उत्पादक गतिविधि । मार्क्स कहते हैं कि उत्पादन तो अन्य प्राणी भी करते हैं लेकिन मनुष्य स्वतंत्रता पूर्वक अपनी मर्ज़ी के मुताबिक अनपहचाने रास्तों पर चलकर भी उत्पादन करता है । उसके उत्पादित वस्तुओं की विविधता अपार हो सकती है लेकिन पूँजीवाद के तहत मनुष्य की यह उत्पादक आज़ादी मारी जाती है । मेहनत प्रसन्नता की बजाए तकलीफ बन जाती है । मनुष्य की दूसरी विशेषता उत्पादन के मामले में बड़े पैमाने का सहयोग है । इसे सामान्य रूप से हम नहीं महसूस करते लेकिन अगर दूसरे ग्रह से कोई आए तो उसे हमारे उत्पादन और उपभोग में बहुत बड़ा सहकार दिखाई पड़ेगा । हजारों तरह की चीजों को बनाकर हम समूची दुनिया में करोड़ों की संख्या में उसे इस्तेमाल करते हैं । मार्क्स का कहना है कि ये दोनों ही विशेषताएँ पूँजीवादी उत्पादन पद्धति में नष्ट हो जाती हैं और मनुष्य अपनी विशेषता खोकर अन्य प्राणियों की तरह हो जाता है । मनुष्य अपनी स्वतंत्रता का अनुभव काम करते हुए नहीं काम खत्म हो जाने के बाद करता है ।

यह अलगाव दूसरे मनुष्यों से हमारे अलगाव के रूप में भी सामने आता है । हम सामाजिक जीव के रूप में अपना अस्तित्व नहीं समझते बल्कि कमाने और खर्च करने वाले प्राणी की तरह अपने आपको समझने लगते हैं । यह अलगाव यदि पहले मनुष्य पर उसके ही बनाए ईश्वर के शसन के रूप में दिखाई पड़ता था तो पूँजीवादी व्यवस्था में मुद्रा या पूँजी के शसन के रूप में दिखाई पड़ता है । पूँजी एक परदा हो जाती जिसके पीछे हम शायद ही कभी देखते हैं । यही मानव संबंधों को निरूपित करने लगती है । पूँजीवादी समाज में लोग किसी को इसलिए प्यार नहीं करते क्योंकि वह प्यार करने लायक है बल्कि उसके धनी होने पर उससे प्यार किया जाता है । किसी के प्रति श्रद्धा भी उसके गुणों की बजाए उसके धनी होने पर उमड़ती है । जो काम दूसरों के प्रति लगाव के कारण किया जाना चाहिए उन्हें पैसा लेकर किया जाने लगता है ।

इसके बाद वुल्फ़ मार्क्स के परिपक्व दर्शन की ओर मुड़ते हैं और बताते हैं कि इसमें उनके शुरुआती विचारों का विस्तार है । वे ‘अर्थशास्त्र की आलोचना में योगदान’ की भूमिका के बतौर लिखी पंक्तियों को उठाते हैं और बताते हैं कि मार्क्स के अनुसार मानव इतिहास बुनियादी तौर पर मनुष्य की उत्पादक शक्ति के विकास की कहानी है । आर्थिक संरचनाओं में बदलाव भी इसी उत्पादक शक्ति के विकास में सहायक अथवा बाधक होने के आधार पर होता है । किसी आर्थिक संरचना के इस विकास में बाधक बनते ही शासक वर्ग की समाज पर पकड़ कमजोर पड़ने लगती है और सामाजिक क्रांति का दौर शुरू हो जाता है । कुल मिलाकर उक्त किताब में मार्क्स के शुरुआती चिंतन के सिलसिले में ही कुछ नई बातें कही गई हैं । उनके बाद के लेखन को व्याख्यायित करते हुए वे कोई नई बात नहीं करते ।

मार्क्सवाद और समाजवाद 

इसके बाद महत्वपूर्ण किताब रणधीर सिंह की एक वृहदाकार (तकरीबन 1100 पृष्ठों की) पुस्तक ‘क्राइसिस आफ़ सोशलिज्म’ थी जो 2006 में अजंता बुक्स इंटरनेशनल द्वारा प्रकाशित हुई थी । इसमें एक प्रतिबद्ध मार्क्सवादी द्वारा समाजवाद में संकट की बजाए समाजवाद के संकट पर विचार किया गया था । भूमिका में लेखक ने स्वीकार किया है कि इस पुस्तक को एक दशक पहले ही प्रकाशित हो जाना चाहिए था क्योंकि तब इस विषय पर बहस चल रही थी लेकिन उस समय भी लेखक ने छिटपुट लेखों के जरिए वे बातें प्रस्तुत की थीं जो इसमें विस्तार से दर्ज की गई हैं । पुस्तक के लिखने में हुई देरी की वजह बताते हुए उन्होंने लिखा है कि उन्हें आशा थी कि कोई न कोई इस काम को ज्यादा तरतीब से करेगा और उनकी उम्मीद पूरी हुई क्योंकि इसी बीच इस्तवान मेज़ारोस की किताब ‘बीयांड कैपिटल-टुवार्ड्स ए थियरी आफ़ ट्रांजीशन’ प्रकाशित हुई जिससे उन्होंने काफी मदद ली । लेकिन यह रणधीर सिंह की विनम्रता है क्योंकि उनकी किताब का स्वतंत्र महत्व है । मेज़ारोस के काम को हम थोड़ा रुककर देखेंगे ।

पुस्तक के शीर्षक से ही स्पष्ट है कि इसमें समाजवादी निर्माण की समस्याओं पर मार्क्सवादी नजरिए से बात की गई है । इस बात पर जोर देना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि मार्क्सवाद के प्रति सहानुभूति जताने वाले ऐसे भी लोग पैदा हो गए हैं जो किसी स्वप्निल मार्क्सवाद की रचना करके समाजवादी निर्माण के सभी प्रयासों को मार्क्सवाद से विचलन साबित करने लगते हैं । किताब में बल्कि इस तरह के प्रयासों का खंडन ही किया गया है शायद इसीलिए इसका उपशीर्षक ‘नोट्स इन डिफ़ेंस आफ़ ए कमिटमेंट’ है यानी किताब एक प्रतिबद्धता के पक्ष में है । किताब वैसे तो सोवियत संघ के पतन के शुरुआती प्रभाव के विवेचन से शुरू होती है लेकिन  इस किताब का दूसरा अध्याय ‘आफ़ मार्क्सिज्म आफ़ कार्ल मार्क्स’ पहले ही एक पुस्तिका के रूप में छपा था इसलिए सबसे पहले वहीं से । अपनी बात वे यहाँ से शुरू करते हैं कि सोवियत संघ के पतन को मार्क्सवादी सिद्धांत के एक विशिष्ट व्यवहार की असफलता के बतौर देखा और समझा जाना चाहिए न कि इसे समाजवाद और पूँजीवाद के बीच जारी जंग का अंतिम समाधान मान लेना चाहिए । इस बात पर लेखक ने इसलिए भी जोर दिया है क्योंकि रोज रोज सोवियत संघ के पतन को समाजवाद या मार्क्सवाद की असफलता बताने के प्रचार के चलते क्रांतिकारी कार्यकर्ताओं और बुद्धिजिवियों में भ्रम और संदेह फैलता है । यहाँ तक कि जो लोग इसे सिद्धांत के बतौर कारगर मानते थे वे भी सामाजिक प्रोजेक्ट के बतौर इसका कोई भविष्य स्वीकार नहीं करते और सिद्धांत तथा व्यवहार के बीच ऐसी फाँक पैदा करने की कोशिश करने लगे जैसी फाँक मार्क्सवाद में कभी थी ही नहीं ।

पुस्तक का मुख्य विषय न होने के बावजूद लेखक को मार्क्सवाद पर विचार करना पड़ा । वे जोर देते हैं कि मार्क्स ने अन्य दार्शनिकों की तरह चिंतन का कोई अंतिम ढाँचा नहीं निर्मित किया क्योंकि वे ‘दार्शनिक’ या ‘समाजशास्त्री’ होने की बजाए क्रांतिकारी थे । उनका सैद्धांतिक काम एक असमाप्त प्रोजेक्ट है । अन्य विषयों (हेगेल के दर्शन, राजनीतिशास्त्र या राज्य, द्वंद्ववाद या पद्धति) पर प्रस्तावित काम की तो बात ही छोड़िए, खुद अर्थशास्त्र संबंधी काम में भी काफी कुछ बकाया रह गया था जिसे कुछ हद तक एंगेल्स ने निपटाया । रणधीर सिंह के मुताबिक इसके कारण भी मार्क्सवाद की ऐसी समझ बनती है मानो वह समाज को केवल आर्थिक नजरिए से देखता हो । यहाँ तक कि उनके लेखन में सब कुछ एक ही तरह से महत्वपूर्ण नहीं है । उन्हें बहुत सारा लेखन तात्कालिक दबाव में भी करना पड़ा था इसलिए उनके गंभीर काम को अलग से पहचानना चाहिए । उनके चिंतन में विकास भी हुआ है इसलिए शुरुआती और बाद के कामों का महत्व एक जैसा ही नहीं है । वे कहते हैं कि मार्क्स के चिंतन में अर्थशास्त्र से ज्यादा महत्वपूर्ण राजनीति है । आर्थिक ढाँचे का विश्लेषण तो वे व्यवस्था के उस आधार को समझने के लिए करते हैं जिसे क्रांतिकारी राजनीतिक व्यवहार के जरिए बदला जाना है । आर्थिक पहलू पर मार्क्स के जोर को हेगेल के भाववादी दर्शन के विरुद्ध उनके संघर्ष के परिप्रेक्ष्य में भी देखा जाना चाहिए । मार्क्स ने खुद ही अपनी सीमाओं को रेखांकित किया है । उनका लेखन उन्नीसवीं में और ‘दुनिया के एक छोटे से कोने- यूरोप’ में हुआ । रूस के एक संपादक को लिखी चिट्ठी में उन्होंने स्वीकार किया कि “‘पूँजी’ पश्चिमी यूरोप में पूँजीवाद की उत्पत्ति की मेरे द्वारा प्रस्तुत रूपरेखा है ।” वुल्फ़ ने जिस तरह पर्यावरणीय पहलू पर मार्क्स की कमी का संकेत किया था उसी तरह रणधीर सिंह ने भी उसे रेखांकित किया है लेकिन उनका कहना है कि इन सबके बावजूद एक भरपूर मार्क्सवादी सिद्धांत के बारे में सोचा जा सकता है ।

इस नाते रणधीर सिंह मार्क्सवाद के बुनियादी सिद्धांतो को सूत्रबद्ध करते हुए कहते हैं कि भौतिकवाद और द्वंद्ववाद को जिस तरह मार्क्स और एंगेल्स ने समझाया उसे ‘आधिकारिक’ ‘द्वंद्वात्मक भौतिकवाद’ से अलग करके देखना होगा । इसके अनुसार यह दुनिया विकासमान और परिवर्तनशील संदर्भों, संबंधों, अंतर्विरोधों और प्रक्रियाओं का जटिल, बहुस्तरीय समुच्चय है जो अंतर्विरोधों और टकरावों, अनेक अक्सर अंतर्विरोधी घटकों की अंत:क्रिया और आपसी निर्भरता के जरिए विकसित होती है । दुनिया के विकास की इस तस्वीर में न सिर्फ़ परिमाणात्मक बदलाव बल्कि गुणात्मक छलांगें, रूपांतरण और प्रतिरूपांतरण भी समाहित हो जाते हैं जिनमें यथार्थ संरक्षित रहता है और उसे अतिक्रमित भी किया जाता है । मार्क्स का दर्शन पूँजीवाद के यथार्थ को इस तरह विश्लेषित करता है कि वह हमें उसके आगे समाजवाद की ओर जाने की राह दिखाता है । मार्क्स की किताब ‘पूँजी’ उनकी पद्धति के प्रयोग का सबसे बेतरीन नमूना है । इसमें वे आभास से यथार्थ की ओर, रूप से अंतर्वस्तु की ओर, तात्कालिक बाहरी रिश्तों से गहरे अंदरूनी अंतर्संबंधों की ओर जाते हैं और पूँजीवाद की ‘छिपी हुई संरचना’ और ‘आंतरिक मनोविज्ञान’ की खोज करते हैं ताकि उसकी उत्पत्ति और कार्यपद्धति की व्याख्या की जा सके । उनकी पद्धति की प्रामाणिकता इसी बात से सिद्ध है कि उनकी व्याख्या अब भी वैध बनी हुई है ।

ऐतिहासिक भौतिकवाद की व्याख्या करते हुए रणधीर सिंह बताते हैं कि ‘उत्पादन पद्धति को महज व्यक्तियों के भौतिक अस्तित्व के पुनरुत्पादन के बतौर नहीं समझा जाना चाहिए । इसकी बजाए वह उनके जीवन की अभिव्यक्ति का निश्चित रूप, उनकी खास तरह की जीवन पद्धति है ।’ मार्क्स उत्पादन के सामाजिक संबंधों को ‘आधार’ मानते हैं और इस तरह ऐतिहासिक प्रक्रिया में वर्ग संघर्ष की केंद्रीयता की प्रस्तावना कर देते हैं । ‘उत्पादन के हालात के मालिकों का प्रत्यक्ष उत्पादकों के साथ सीधा संबंध—समूची सामाजिक संरचना की छुपी हुई बुनियाद, उसका गहनतम रहस्य है ।’ वैसे तो सामाजिक जीवन और इतिहास की तथाकथित आर्थिक व्याख्या प्लेटो से ही प्रचलित रही थी । मार्क्स की विशेषता यह है कि वे समाज और सामाजिक संरचना को अलग अलग हिस्सों, कारकों, स्तरों या उदाहरणों का जमाजोड़ या मिश्रण नहीं मानते थे । यह एक जटिल और विभेदीकृत ‘संपूर्णता’, विभिन्न हिस्सों की ऐतिहासिक रूप से निर्मित आपसी निर्भरता है जिसमें से लंबे दिनों में एक हिस्से यानी अर्थतंत्र के क्षेत्र के अंतर्विरोध को प्रमुखता प्राप्त होती है (प्रमुख या संरचनागत अंतर्विरोध जिसके साथ ही विभिन्न हिस्सों के अंदरूनी और आपसी अंतर्विरोध भी मौजूद होते हैं) । ये ही उसकी गति, उसके ठोस रूप से अतिनिर्धारित ऐतिहासिक विकास के लिए जिम्मेदार होते हैं जिसमें संपूर्णता हिस्सों के जरिए रूपायित और अभिव्यक्त होती है तथा हिस्से संपूर्ण की छाप का वहन और प्रतिनिधित्व करते हुए भी अपनी अंतर्संबद्धता में वह खास किस्म की एकता बनाते हैं जिसे एक खास समाज या सामाजिक संरचना कहा जा सकता है । निर्धारण का अर्थ मार्क्स की अपनी सोच के हिसाब से विभिन्न प्रक्रियाओं के बीच संवाद अधिक महसूस होता है । इसके बावजूद यह कहना ही होगा कि समाज में आर्थिक पहलू पर जोर ही वह चीज है जो मार्क्सवाद को पारंपरिक समाजशास्त्र से अलगाती है ।

इसके बाद वे ऐतिहासिक भौतिकवाद के ही अंग के बतौर वर्ग की धारणा का जिक्र करते हैं जो न केवल ऐतिहासिक प्रक्रियाओं की व्याख्या के लिए जरूरी है बल्कि मानव मुक्ति की संभावना के लिए भी प्रासंगिक है । राजनीति की समझ के लिए भी वर्ग संघर्ष के गतिविज्ञान पर पकड़ होनी चाहिए । क्रांतिकारी राजनीति के लिए तो जरूरी है ही । लेकिन यह भी किसी किस्म के अपघटन से मुक्त धारणा है क्योंकि मार्क्स पूँजीवाद के खात्मे के लिए सर्वहारा वर्ग के साथ अन्य विक्षुब्ध तबकों को भी एकताबद्ध करने की बात करते हैं । क्रांतिकारी प्रक्रिया में किसानों या निम्न पूँजीपति वर्ग की भूमिका के प्रसंग में यह बात मार्क्स के लेखन में एकाधिक जगहों पर दिखाई पड़ती है । आप कह सकते हैं कि मार्क्स ने मजदूर वर्ग की क्रांतिकारी भूमिका पर कुछ ज्यादा ही जोर दिया था । कारण चाहे जो भी हों सही बात है कि यूरोप के मजदूर वर्ग से उन्हें जो उम्मीदें थीं उन पर वह खरा नहीं उतरा लेकिन रूस की क्रांति ने मजदूर वर्ग में उनके विश्वास की रक्षा की । मजदूर वर्ग की संरचना में काफी बदलाव आए । आर्थिक वैश्वीकरण और तकनीकी बदलावों ने पूँजी की राजनीतिक ताकत में इजाफ़ा किया और मजदूर वर्ग को कमजोर किया । इसके बावजूद सही बात तो यही है कि विश्व पूँजीवाद के साथ लड़ाई में मजदूर वर्ग की निर्णायक भूमिका स्वीकार करनी होगी और समाजवाद में आज भी वास्तविक रुचि मजदूर वर्ग ही ले रहा है । मार्क्स के मुताबिक पूँजीवाद के सताए हुए वर्ग ही समाजवाद के लिए संघर्ष में अग्रणी भूमिका निभाएंगे । असल में मार्क्स के समूचे लेखन और चिंतन के केंद्र में पूँजीवाद का आलोचनात्मक विश्लेषण है जिसके अनुसार उसका पूरी दुनिया में विस्तार होना है, सारी दुनिया में पूँजी का प्रभुत्व होना है । आदिम पूँजी संचय की प्रक्रिया के जरिए एक ओर अकूत ऐश्वर्य और दूसरी ओर चरम दरिद्रता के सृजन का इसका संरचनागत तर्क अपने आपको सभी समाजों में व्यक्त करता है । इस विश्लेषण में नैतिक रोष है, जन्म से लेकर विस्तार के समूचे दौर में उसके मानव विरोधी होने को रेखांकित किया गया है, यहाँ तक कि उसको ‘बर्बर’ बताया गया है ।

यह बात सही है कि मार्क्स ने वृद्धि और विकास की पूँजीवाद की क्षमता को कम करके आँका लेकिन उसकी कार्यपद्धति का उनका वर्णन आँख खोलने वाला है । उनकी यह बात आज भी सही है कि पूँजीवाद सारत: अतार्किक व्यवस्था है और इसका तार्किक निषेध समाजवाद ही है । अगर मार्क्सवाद विज्ञान है तो क्रांति का विज्ञान है । यह केवल क्रांति की बात ही नहीं करता इसमें क्रांति के प्रति निष्ठा भी शामिल हैं जो मार्क्स के अनुसार ‘स्वतंत्र मनुष्य के सम्मान के पक्ष में सभी दिलों का रूपांतरण और सभी हाथ उठाने की क्रिया’ है । मार्क्स के लिए क्रांति दिल और दिमाग दोनों का मसला है । वे ऐसे समाज का सपना देखते थे जहाँ ‘हरेक का स्वतंत्र विकास सबके स्वतंत्र विकास की पूर्वशर्त’ होगा । आजकल मार्क्स के इस सपने से उनके सिद्धांत को अलग करके उन्हें सामान्य मानववादी दार्शनिक में बदला जा रहा है । सभी जानते हैं कि क्रांति के प्रति अपनी निष्ठा के चलते उन्हें जीवन भर कष्ट उठाने पड़े । इसी निष्ठा के चलते उन्होंने फ़्रांस के मजदूरों को क्रांति शुरू न करने की सलाह दी लेकिन जब क्रांति फूट पड़ी तो उसका खुलकर स्वागत किया । उन्होंने अराजक विद्रोहियों की मुखालफ़त की लेकिन अपनी ही पार्टी के उन समाजवादियों की भी आलोचना की जो ‘पुलिस की इजाजत की हदों में ही रहकर काम करते’ थे । अगर उन्होंने भूलें कीं तो उनकी भूलें ऐसे लोगों के निर्भूल होने से बेहतर थीं जो बिना कुछ किए सभी आंदोलनों की भूलें गिनाते रहते हैं ।

मार्क्सवाद के बारे में इस आरंभिक पीठिका के बाद वे यह बताते हैं कि एक हद तक ‘यूटोपियन’ होने के बावजूद मार्क्स कहीं भी भविष्य के समाज के बारे में कोई खाका नहीं खींचते । वे यही कहते हैं कि उस समय के लोग उस समय की समस्याओं का समाधान करेंगे । उन्होंने तो यह भी कहा कि ‘हमारे लिए साम्यवाद कोई ऐसा आदर्श नहीं है जिसके अनुसार यथार्थ अपने आपको समायोजित करे ।’ उनके मुताबिक समाजवाद किसी अध्ययन कक्ष में नहीं बनेगा बल्कि समाज की वास्तविक हलचलों या ऐतिहासिक प्रक्रियाओं से उपजेगा । पूँजीवाद की मार्क्स की आलोचना का केंद्रीय तत्व उत्पादकों से अतिरिक्त मूल्य का अधिग्रहण का तरीका है । इसलिए समाजवाद का मतलब महज पूँजीवादी शोषण, अतिरिक्त मूल्य के अधिग्रहण से मुक्ति नहीं है । यह सब जरूरी तो है लेकिन सब कुछ नहीं है । उत्पादन के साधनों के निजी स्वामित्व का खात्मा और उस पर सामाजिक स्वामित्व तो न्यूनतम शर्त है । इससे तो महज शुरुआत होनी होगी । लेकिन इस नए समाज में भी पूँजीवादी व्यवस्था के ‘जन्म चिन्ह’ बने रहेंगे । उन्हें हल करना उनका कर्तव्य होगा जो उस व्यवस्था में होंगे और मार्क्स को भरोसा था कि वे हमसे उन्नत होंगे क्योंकि हम तो वर्ग विभाजित समाज की पैदाइश हैं । समाजवाद की ओर संक्रमण की समस्याओं पर भी मार्क्स ने बहुत ध्यान नहीं दिया । एक बात लेकिन जरूर उनके लेखन से निकलकर आती है कि समाजवाद एक संक्रमणकालीन अवस्था होगा जो मनुष्य को साम्यवाद की ओर ले जाएगा । वे इस बात पर बल देते हैं कि समाजवाद को पूँजीवाद की तरह अलग किस्म का समाज नहीं मानना चाहिए । ऐसा समाज तो साम्यवाद ही होगा । समाजवाद एक तरह से साम्यवाद की निचली मंजिल हो सकता है । उसे हरेक मामले में पूँजीवाद से भिन्न होना होगा । उसके तहत संपत्ति संबंधों का आमूलचूल रूपांतरण होगा, उत्पादन का मकसद निजी मुनाफ़ा नहीं होगा, अर्थतंत्र पर सिर्फ़ कानूनी नहीं बल्कि वास्तविक सामाजिक नियंत्रण होगा, मानव कल्याण के लिए सामाजिक-भौतिक संसाधनों का जनवादी तरीके से नियोजन होगा । मार्क्स की पूँजीवाद की आलोचना के पीछे मनुष्य के प्रति उनका लगाव है इसलिए समाजवादी समाज को मनुष्य की क्षमता का भरपूर विकास कर सकने वाली व्यवस्था होना होगा । पूँजीवाद मूलत: गलाकाट प्रतियोगिता पर आधारित समाज है जो सिर्फ़ पूँजी के मालिकों के बीच ही नहीं होती वरन वह मनुष्य को भी उसकी अंतर्निहित सामाजिकता के बावजूद लालची और इर्ष्यालु बना देता है इसलिए इसके उलट समाजवाद को भाईचारा का आधान बनना होगा । उसी व्यवस्था में मनुष्य सही तौर पर सामाजिक मनुष्य होगा । मनुष्य अनिवार्यता की दुनिया से स्वतंत्रता की दुनिया की ओर प्रस्थान करेगा ।

समाजवाद की ओर यह संक्रमण दीर्घकालीन होगा । इस दौरान के अर्थतंत्र को लेकर अगर मार्क्स ने महज कुछ सूत्र ही दिए तो राजनीतिक ढाँचे को लेकर और भी कम कहा लेकिन एक पद ‘सर्वहारा की तानाशाही’ को लेकर बहुत विवाद हुए इसलिए उसके बारे में कुछ बातें रणधीर सिंह ने कीं । पहली बात तो यह कि यह सारभूत सामाजिक अंतर्वस्तु के संबंध में दिया गया वक्तव्य है, संक्रमणकालीन समाजवादी समाज में राजनीतिक सत्ता के वर्ग चरित्र का स्पष्टीकरण है क्योंकि मार्क्स की नजर में लोकतांत्रिक रूप से गठित होने के बावजूद बुर्जुआ समाज में राज्य ‘बुर्जुआ की तानाशाही’ ही है । यहाँ सर्वहारा तानाशाही को लोकतंत्र का विरोध नहीं समझना चाहिए बल्कि बुर्जुआ तानाशाही का विरोध समझना चाहिए । वैसे भी मार्क्स ‘राज्य’ को ‘सरकारी मशीनरी’ से अलग मानते थे । मार्क्स ने पेरिस कम्यून को इस तानाशाही का अग्रदूत माना है । तब आखिर पेरिस कम्यून ने क्या किया था ? सार्वजनिक चुनाव में चुने हुए कम्यून ने बुर्जुआजी का पुराना सैन्य-नौकरशाही की मशीनरी खत्म कर दी, संसदवाद की जगह निर्वाचित निकायों के प्रतिनिधियों के लिए बाध्यकारी राय जताने का जनता को अधिकार दिया और प्रभावी स्वशासन का विकल्प उपलब्ध कराया, नियमित सेना और पुलिस को भंग कर दिया और इसकी जगह जनता को हथियारबंद किया, नौकरशाही का खात्मा किया और सभी प्रशासनिक, न्यायिक, शैक्षिक और दीगर पदों पर सार्वभौमिक मताधिकार के आधार पर निर्वाचित अधिकारियों की नियुक्ति का प्रावधान किया, मतदाताओं की माँग पर किसी भी समय उन्हें वापस बुलाने का नियम बनाया, उनकी तनख्वाह को अन्य श्रमिकों के बराबर घोषित किया, पुलिस और पादरियों के राजनीतिक प्रभाव को बंद किया । आगे की उसकी योजना विकेंद्रित राजकीय व्यवस्था स्थापित करने की थी ताकि ‘राष्ट्र सच्चे मायनों में एकताबद्ध हो सके और इसके लिए राजसत्ता को खत्म किया जाना था जो उस एकता का साकार रूप होने का दावा करती थी लेकिन राष्ट्र से स्वतंत्र और ऊपर तथा उसका परजीवी अपशिष्ट बनी हुई थी ।’ इसके अलावे कम्यून ने अपने सदस्यों के लिए ऐसे कायदे बनाए जिससे वे भ्रष्टाचार न कर सकें । तो यही वह राजसत्ता का रूप था जिसे मार्क्स मजदूरों की आदर्श सरकार मानते थे । यह क्रांति राज्य के विरुद्ध लक्षित थी । लेनिन ने इसी के अनुकरण में ‘सारी सत्ता सोवियतों को’ नारा बुलंद किया था ।

समाजवाद के बारे में मार्क्स एंगेल्स के विचारों को समझाने के बाद रणधीर सिंह एक विचार की परीक्षा करते हैं जिसके अनुसार रूस में जो स्थापित हुआ और जिसकी नकल पूर्वी यूरोप के देशों में की गई वह समाजवाद था ही नहीं । इस सवाल पर वे आलोचकों से पूरी सहमति तो नहीं जताते लेकिन इस तथ्य को भी मंजूर करते हैं कि विकृतियाँ बहुत ज्यादा थीं और ऐसे आरोपों के पीछे अवश्य ही प्रचुर अनुभव थे लेकिन यह धारणा सच्ची वाम कतारों पर इस समय जो जिम्मेदारी आ पड़ी है उससे पीछा छुड़ाना है क्योंकि उसे समाजवाद मानकर ही उसकी गलतियों का विश्लेषण किया जा सकता और उन्हें सुधारा जा सकता है ।

समाजवादी निर्माण की एक सैद्धांतिक समस्या का जिक्र करते हुए रणधीर सिंह कहते हैं कि पूँजीवाद के खात्मे के बाद भी बुर्जुआ विचारधारा और सामाजिक अनुकूलनशीलता की ताकत को एक हद तक कम करके आँका गया अर्थात समाजवाद की स्थापना और उसे टिकाए रखने की इच्छा के लिए जरूरी वैचारिक-सांस्कृतिक संघर्ष का महत्व समझने में कमी रह गई । मार्क्स को तो उम्मीद थी कि क्रांति यूरोप के विकसित देशों में पहले होगी लेकिन उन्हीं के लेखन में हमें ऐसे देशों में क्रांति की संभावना भी दिखाई पड़ती है जहाँ आबादी में किसानों की बहुतायत है । वे किसान बहुल समाजों में मजदूर किसान एकता की भी वकालत करते हैं । यह चिंतन पेरिस कम्यून के बाद विकसित हुआ था । यही चीज इतिहास में उनके सिद्धांत के व्यावहारिक प्रयोग में सही साबित हुई और क्रांतियों का गुरुत्व केंद्र पूरब की ओर चला आया । क्रांति की उनकी गौण धारणा ही इतिहास में मुख्य धारणा बनी । उनके सिद्धांत के साथ इतिहास का यह खेल बाद की अनेक परेशानियों की वजह बना । रूस में मजदूर वर्ग विकसित देशों के मजदूर वर्ग के मुकाबले पिछड़ा हुआ था । रूस की क्रांति के बाद बोल्शेविकों को यूरोप में क्रांति के फूट पड़ने की आशा बहुत दिनों तक बनी रही क्योंकि वे इसे रूसी क्रांति को टिकाए रखने के लिए जरूरी समझते थे । लेकिन ऐसा न होने पर उन्हीं पर जिम्मेदारी आ पड़ी कि वे अपने ही देश में इसे आगे बढ़ाने की कोशिश करें । रूसी समाजवाद की अनेक विकृतियों का संबंध घिराव की इस मजबूरी से भी है । संगठन का लेनिनीय सिद्धांत ‘आत्मगत ताकतों का मार्क्सवादी विज्ञान’ है और आज भी क्रांतिकारी संघर्ष की समस्याओं को हल करने के लिए उपयोगी औजार बना हुआ है लेकिन इसमें संगठन में नेतृत्व की भूलों को सुधारने का कोई संस्थाबद्ध ढाँचा मौजूद नहीं है इसलिए गलती के शुरू हो जाने के बाद उसके फ़ैसलों को उलटने की गुंजाइश कम रह जाती है ।

मार्क्स के सिद्धांतों के ‘आर्थिक’ अभिग्रहण से भी समाजवाद के ढहने का संबंध है इसको चिन्हित करते हुए वे लेनिन के बाद सोवियत संघ में समाजवाद को महज आर्थिक उपलब्धियों तक सीमित करके देखने समझने के नजरिए का उल्लेख करते हैं । इसका उदाहरण वे मार्क्सवाद की ऐसी ‘आधिकारिक’ व्याख्या को भी मानते हैं जिसमें भौतिकवाद के तीन सिद्धांत, द्वंद्ववाद के चार नियम और ऐतिहासिक भौतिकवाद के पाँच चरण होते थे । जबकि उनके मुताबिक मार्क्सवाद बहुत ही खुला हुआ दर्शन है । यहाँ तक कि वह अपने सुधार की माँग भी आगामी पीढ़ियों से करता है । इसी सिलसिले में वे कहते हैं कि नव सामाजिक आंदोलनों की चुनौती के समक्ष आज मार्क्सवाद को समृद्ध करने की जिम्मेदारी आन पड़ी है क्योंकि इन आंदोलनों की सैद्धांतिकी मार्क्सवाद विरोधी ‘उत्तर-आधुनिकता’ से निर्मित हुई है और ये कुल मिलाकर सुधारात्मक ही हैं ।

अन्य चीजों के अलावा रणधीर सिंह कुछ बेहद जरूरी सैद्धांतिक सवाल उठाते हैं । समाजवादी प्रोजेक्ट के पतन से एक सवाल पैदा हुआ है जिसका कोई सैद्धांतिक समाधान उन्हें मार्क्सवाद के भीतर नजर नहीं आता । अनुभव से दिखाई पड़ा है कि सत्ता पर कब्जा हो जाने के बाद नए तरह से वर्ग निर्माण की प्रक्रिया शुरू होती है । उनका कहना है कि रूसी और चीनी दोनों ही क्रांतियों के बाद लेनिन और माओ को यह समस्या नजर आई और उन्होंने इसका समाधान खोजने की कोशिश की लेकिन दोनों के ही उत्तर पार्टी ढाँचे के बाहर जाकर अंदर की समस्याओं को हल करने के समान हैं । यह बात माओ की सांस्कृतिक क्रांति में और भी खुलकर व्यक्त होती है । जबकि समस्या यह थी कि संगठन के भीतर ही आत्म सुधार का कोई कारगर तरीका खोजा जाए । उनके मुताबिक यह ऐसी समस्या है जिसका समाधान अभी नहीं पाया जा सका है ।

इसके अलावा लेखक ने इसी सिलसिले में एक ऐसे पहलू को उठाया है जिस पर आम तौर पर ध्यान नहीं दिया जाता । उनका कहना है कि परिस्थितियों और व्यक्ति की भूमिकाओं में द्वंद्वात्मक रिश्ता होता है लेकिन मार्क्सवादी आम तौर पर इसे परिस्थितियों की प्रमुखता में बदल देते हैं । क्रांति के बाद उस प्रक्रिया में शामिल रहे नेताओं की उपस्थिति भी समस्याओं पर काबू पाने में बहुत मदद करती है । रूस के संदर्भ में बोल्शेविक क्रांति के दौरान और बाद में चले गृह युद्ध में नेताओं की पहली खेप का तकरीबन सफ़ाया हो गया था इसलिए स्तालिन तक तो नौकरशाही के विरुद्ध संघर्ष दिखाई देता है लेकिन उनकी मृत्यु के बाद इन्हीं नौकरशाहों का सरकार पर पूरी तरह से कब्जा हो गया । चीन के प्रसंग में भी यही परिघटना सामने आई ।

इस किताब की खासियत यह थी कि इसने प्रतिबद्ध वामपंथी कार्यकर्ताओं को वाहियात किस्म की बातों को परे हटाकर सही मुद्दे को पहचानने में मदद की जो घटनाओं की तीव्रता और दुश्मनों के ताबड़तोड़ हमलों के समक्ष कुछ हद तक किंकर्तव्यविमूढ़ हो गए थे । उस समय तो अनेक लोग यही कहने को महान आविष्कार समझ रहे थे कि मार्क्सवाद में लोकतंत्र की गुंजाइश नहीं है इसलिए विपक्ष न होने से कम्युनिस्ट पार्टी को अपनी गलतियों का पता नहीं चला । रणधीर सिंह ने ठीक ही मजाक उड़ाते हुए लिखा कि क्या इस कमी को दूर करने के लिए कम्युनिस्ट पार्टी अपने को ही विभाजित करके विपक्ष बनाती ! इसी तरह जो लोग कह रहे थे कि पिछड़े देश में क्रांति होने से अथवा एक ही देश में समाजवाद के निर्माण का निर्णय होने से विकृतियों का जन्म हुआ उनके तर्कों को खारिज करते हुए वे कहते हैं कि यह सब विशेष ऐतिहासिक परिस्थितियों के प्रति रूसी कम्युनिस्टों का उत्तर था जिसमें कोई बुनियादी खामी नहीं थी ।

पुरानी कहानी दोबारा

इसके बाद जिस किताब का जिक्र जरूरी है वह छपी तो बहुत पहले थी लेकिन 2008 में आकार बुक्स ने फिर से छापा है । किताब का नाम है ‘हाउ टु रीड कार्ल मार्क्स’ और लेखक अर्न्स्ट फ़िशर हैं । एक लंबी और बेहद उपयोगी भूमिका जान बेलामी फ़ास्टर ने लिखी है । इस भूमिका का वैसे तो स्वतंत्र महत्व है लेकिन पूरी भूमिका के अनुवाद की बजाए हम उसका सार प्रस्तुत करने तक अपने को सीमित रखेंगे । फ़ास्टर बताते हैं कि फ़िशर दूसरे विश्व युद्ध के बाद गठित आस्ट्रिया की अस्थायी सरकार के शिक्षा मंत्री रहे और अनेक वर्षों तक आस्ट्रिया की कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं में से एक रहे थे । इसके बावजूद वे एक स्वतंत्र मार्क्सवादी बुद्धिजीवी की तरह ही रहे । अनेक बार तो पार्टी अनुशासन की सीमा से बाहर निकलकर भी अपनी राय व्यक्त करते रहे थे । 1968 में जब सोवियत संघ ने चेकोस्लोवाकिया पर हमला किया तो उसका विरोध करने के चलते उन्हें पार्टी से 1969 में निकाल दिया गया था । फ़िशर की यह किताब सबसे पहले वियेना में छपी थी । इस भूमिका में वे मार्क्स के विचारों के साथ उनके जमाने से अब तक जो बरताव किया गया है उसकी झाँकी भी प्रस्तुत करते हैं ताकि इस माहौल के भीतर रखकर इस किताब के महत्व को समझा जा सके ।

सबसे पहले वे मार्क्स को पढ़ने की दिक्कतों का जिक्र करते हैं और बताते हैं कि मार्क्स के लेखन की जटिलता के अलावे अगर आप वर्तमान समाज के तर्कों को स्वीकार कर लेते हैं तो उनकी मान्यताओं को समझना मुश्किल होगा । दूसरी कठिनाई यह है कि मार्क्स के विचारों के बारे में अधिकांश लेखन उनके विचारों को न केवल विकृत करता है बल्कि तमाम तरह के दुष्प्रचार से प्रभावित भी है । वे मार्क्स के विरोधियों के लिए सार्त्र का एक वाक्य उद्धृत करते हैं जिसके मुताबिक ज्यादातर आलोचना बात को आगे ले जाने के बदले मार्क्स से पहले के विचारों को ही दोहराती है ।

आलोचनाओं का इतिहास वे शीत युद्ध से शुरू करते हैं जिस दौरान उनके अनुसार सोवियत सत्ताओं और पश्चिमी दुनिया द्वारा एक ही तरह से मार्क्स के विचारों को विकृत किया गया । पश्चिमी दुनिया के विकारों के उदाहरण के बतौर वे ‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’ के दो संस्करणों की भूमिकाओं का जिक्र करते हैं जो क्रमशः 1955 में क्रोफ़्ट के क्लासिक संस्करण की सैमुएल बीअर द्वारा तथा 1967 में पेंगुइन बुक्स संस्करण की ए पी जे टेलर द्वारा लिखी हुई हैं । टेलर ने इस भूमिका से पहले भी एक किताब में मार्क्स के बारे में लिखा था कि उनका सिद्धांत सामाजिक हितों के टकराव का समाधान सोच विचार की बजाए हिंसा के जरिए निकालने की वकालत करता है और कि मार्क्स के अनुसार आदमी का दिमाग सिर्फ़ बाहर के तथ्यों को दर्ज़ करता है । दोनों ने भूमिकाओं के लेखन से पहले ही अपने मार्क्सवाद विरोधी विचारों को जाहिर कर चुके थे । दोनों ही अपनी भूमिकाओं की शुरुआत इस दावे से करते हैं कि मार्क्सवाद धर्म है । इसके बाद उनके तर्क जुदा हो जाते हैं लेकिन वे दोनों ऐतिहासिक भौतिकवाद का ऐसा रूप तैयार करते हैं जिसे आसानी से खारिज किया जा सके । बीअर अपने पाठकों को सूचित करते हैं कि मार्क्स के विचार दो मान्यताओं पर आधारित हैं- 1) आर्थिक निर्धारणवाद या यह विचार कि ‘समाज की आर्थिक संरचना—मानव इच्छा और चिंतन से स्वतंत्र होकर विकसित होता है—(और)सामाजिक जीवन के अन्य क्षेत्रों घटने वाली घटनाओं को निर्धारित करता है’ । 2) यह विचार कि ‘इतिहास का क्रम अनिवार्यतः हिंसक क्रांतियों से भरा हुआ है’ । बीअर के अनुसार मार्क्स का ऐतिहासिक भौतिकवाद सामाजिक अस्तित्व को ‘अलंघनीय नियमों’ में बाँध देता है । वे द्वंद्ववाद को ‘थीसिस- एंटी थीसिस- सिंथीसिस’ के त्रिक में समझने का आग्रह करते हैं । मार्क्स के आर्थिक सिद्धांतों की बुनियाद उनके अनुसार ‘मूल्य का श्रम सिद्धांत’ है जो कीमत के बारे में कुछ भी नहीं बताता । वे ‘शोषण’ को नैतिक शब्दावली मानकर इसकी जगह पर ‘डकैती’ का विकल्प सुझाते हैं । सबसे अधिक उनका गुस्सा मार्क्स के ‘गरीबी की बढ़ोत्तरी के सिद्धांत’ पर उतरता है । वे कहते हैं कि इसका मतलब मार्क्स के मुताबिक मजदूर ‘अधिक वेतन और काम के कम घंटों की लड़ाई जीतने में अक्षम’ हैं । बीअर की आपत्ति यह है कि पूँजीवादी निज़ाम के पिछले सौ सालों में मजदूर यह लड़ाई कई बार जीत चुके हैं । बेरोजगारी के बढ़ने के मार्क्स के अंदेशे को बीअर युद्धोत्तर आर्थिक उछाल का हवाला देकर खारिज करते हैं हालाँकि बीअर के मुकाबले मार्क्स ही सही साबित हो रहे हैं ।

बीअर की भूमिका के बाद वे टेलर की भूमिका के बारे में बताते हैं जो बीअर की भूमिका के बारह साल बाद आई और इसकी आलोचना और भी निर्बंध है । टेलर मार्क्स को महत्वोन्मादी बताते हैं क्योंकि उनके अनुसार मार्क्स हमेशा ही अपने आपको दुनिया का बौद्धिक स्वामी समझते थे तब भी जब उन्हें कोई जानता नहीं था । इसके लिए वे द्वंद्ववादी पद्धति में उनके विश्वास का हवाला देते हैं ।ओ उनकी नजर में भी ‘थीसिस-एंटी थीसिस-सिंथीसिस’ का सरल त्रिस्तरीय ढाँचा था । इसके अनुसार अंत में समाज ऐसी स्थिति में पहुँचेगा जहाँ बिना किसी टकराव के सभी लोग राजी खुशी रहेंगे । उनका कहना है कि बगैर एक भी खोज किए मार्क्स अपने आपको ‘वैज्ञानिक’ कहते हैं । मार्क्स उनकी नजर में समाज के विकास की बजाए महज क्रांति की बात करते हैं जो ‘तीक्ष्ण और तुरंत’ होगी । इतिहास का यह आलम है तो आर्थिक मामलात में तो और भी गड़बड़ी है । उनके अनुसार मार्क्स अतिउत्पादन से पैदा संकट को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मानते थे लेकिन यह तो उस जमाने में सर्वमान्य ‘मूल्य के श्रम-सिद्धांत’ की उपज था । अब यह मान्यता शैक्षिक जगत में अमान्य हो गई है । पूँजीवादी व्यवस्था के आर्थिक अंतर्विरोधों के बढ़ने की ‘भविष्यवाणी’ टेलर के अनुसार गलत साबित हो गई है । पूँजीपतियों की समृद्धि की बढ़त के साथ ही सर्वहारा की समृद्धि भी बढ़ी है । आधुनिक पूँजीवादी व्यवस्था मार्क्स के बताए पूँजीवाद की तरह नहीं रह गई है क्योंकि स्वामित्व और नियंत्रण में अलगाव आया है । टेलर के मुताबिक मुनाफ़ा पूँजीवाद का एकमात्र चालक तो नहीं ही रह गया है, प्रमुख चालक शक्ति भी नहीं है । टेलर कहते हैं कि मार्क्स ने शांतिपूर्ण समाजवादी क्रांति की संभावना जताई थी लेकिन बाद में इसे छोड़ दिया । असल में तो मार्क्स की असली प्रवृत्ति न केवल स्तालिन तक बल्कि हिटलर और मुसोलिनी तक ले जाने वाली है ।

फ़ास्टर के अनुसार दुखद यह है कि सोवियत संघ द्वारा प्रचारित मार्क्सवाद भी इसी तरह मार्क्स की आर्थिक-तकनीकी निर्धारणवादी छवि पेश करता है । इसके विरोध में पश्चिमी जगत के मार्क्सवादी बुद्धिजीवियों द्वारा जो मार्क्सवाद विकसित किया गया वह वर्ग संघर्ष और ऐतिहासिक विकास की वास्तविक द्निया से दूर होने के कारण ज्यादा संरचनावादी था । लुई अल्थूसर ने क्लाड लेवी-स्त्रास के संरचनावाद से प्रेरणा लेकर ‘आधार अधिरचना’ को ऐसी संरचना में बदल दिया जिसमें मनुष्य की कर्ता के बतौर कोई भूमिका ही नहीं रही । इसी को विश्लेषणात्मक मार्क्सवादियों ने आगे बढ़ाया है और सी ए कोहेन ने दावा किया है कि विश्लेषणात्मक दर्शन के औजारों का इस्तेमाल करके आधार-अधिरचना के मुहावरे के विश्लेषण के जरिए मार्क्स के समूचे लेखन को व्याख्यायित किया जा सकता है । अल्थूसर और कोहेन ने मार्क्स की रक्षा के नाम पर लिखी किताबों में ये ढाँचे प्रस्तावित किए हैं । उत्तर मार्क्सवादी के नाम से जो आलोचक सामने आए हैं उनका दावा तो मार्क्स के पार जाने का है लेकिन उनके तर्क उतने ही पुराने हैं जितना खुद मार्क्सवाद । जब भी मार्क्सवादी आंदोलन में भाटा आया है ऐसे विचार कुकुरमुत्ते की तरह प्रकट हो जाते हैं ।

असल में मार्क्स का निर्धारणवादी पाठ प्रथम विश्व युद्ध से पहले ही दूसरे इंटरनेशनल में सामने आ चुका था । तब तक मार्क्स के लेखन का आधा भी प्रकाशित नहीं हुआ था । बाद में प्रकाशित लेखन को असल में सबसे महत्वपूर्ण माना गया है जो 1960-70 के दशकों में ही अंग्रेजी में आ सका । इन्हीं में मार्क्स का मानवतावादी रूप उभरकर आया । इस लेखन का असर 1968 में चरम पर पहुँच गया । संयोग से उसी साल फ़िशर की यह किताब भी छपी । किताब के इस संस्करण के परिशिष्ट में मार्क्स के दो लेखों ‘थीसिस आन फ़ायरबाख’ और ‘ए कंट्रीब्यूशन टु द क्रिटीक आफ़ पालिटिकल इकोनामी’ की भूमिका से आधार-अधिरचना के मुहावरे के अलावा उनकी पद्धति के बारे में पाल स्वीज़ी का एक लेख भी छापा गया है जो उनकी किताब ‘द थियरी आफ़ कैपिटलिस्ट डेवलपमेंट’ का एक हिस्सा है और बेहद उपयोगी है ।

इधर के दिनों में मार्क्सवाद पर जो भी सोच विचार हो रहा है उसकी एक विशेषता मार्क्स के नजरिए में उनके मानववाद पर जोर को रेखांकित करना है । रणधीर सिंह ने भी इस पहलू को उभारा । फ़िशर की इस किताब में मार्क्स के ही लेखन से महत्वपूर्ण अंशों को चुनकर उनकी व्याख्या की गई है । पुस्तक का पहला अध्याय ही है-द ड्रीम आफ़ द होल मैन । स्पष्ट है कि मार्क्स के लेखन के उस हिस्से पर बल दिया गया है जिसमें वे आधुनिक पूँजीवादी खंडित मनुष्य के बरक्स संपूर्ण मनुष्य के सपने को समाजवादी समाज का लक्ष्य घोषित करते हैं । उनके मुताबिक अठारहवीं सदी में मनुष्य का अपने आप से अलगाव समूचे यूरोप का बुनियादी अनुभव था । इसलिए अपने आपसे, अपनी प्रजाति से, आसपास की प्रकृति से मनुष्य के इस अलगाव का खात्मा उस समय के सभी मानववादियों की साझी चिंता थी । उनमें रोमांटिक लोग भी शामिल थे लेकिन समय बीतने के साथ कुछ लोग अतीत को चरम मुक्ति का समय मानकर उसका गुणगान करने लगे जबकि अन्य भविष्य में मनुष्य के इस अलगाव के खात्मे का सपना सँजोए रहे ।

उनके अनुसार मनुष्य श्रम के जरिए ही अपने सार को साकार करता है । लेकिन पूँजीवादी व्यवस्था में यही श्रम, श्रम विभाजन के हवाले हो जाता है । मार्क्स सामाजिक श्रम विभाजन और मैनुफ़ैक्चर में श्रम विभाजन में फ़र्क करते हैं । सामाजिक श्रम विभाजन कृषि या उद्योग जैसा विभाजन है । इसी के भीतर लिंग या आयु के हिसाब से हुआ विभाजन भी आता है । कबीलों के बीच युद्ध में पराजित कबीले के लोगों को गुलाम बनाकर उनसे मेहनत कराने के चलते भी एक तरह का विभाजन हो जाता है । इसी दौर में वस्तु विनिमय की प्रथा सामने आती है । इसके बाद मानसिक और शारीरिक श्रम का अंतर आता है जिसका सबसे बड़ा रूप गाँव और शहर का विभाजन है । ये दोनों ही श्रम विभाजन न सिर्फ़ मनुष्य के भीतर छिपी हुई संभावनाओं को साकार करते हैं बल्कि खास तरह की मानसिक और शारीरिक अपंगता को भी जन्म देते हैं । शहर में उत्पादकों के गिल्ड में भी अलग अलग गिल्डों के बीच का विभाजन बहुत कुछ प्राकृतिक ही होता है । शिल्पी जो कुछ बनाता है उससे उसका अलगाव नहीं होता । वह कोई भी चीज पूरी ही बनाता है । लेकिन मैनुफ़ैक्चर के आगे बढ़ने पर आधुनिक श्रम विभाजन नजर आना शुरू होता है । इसके पहले तक औजार मनुष्य के आदेश मानता था लेकिन आधुनिक उद्योग तो मनुष्य को औजार का गुलाम बना देता है ।

यहीं फ़िशर मार्क्स की एक और बात को रेखांकित करते हैं । उनके मुताबिक भौतिक जीवन मानव अस्तित्व का आधार है न कि उसका उद्देश्य । श्रम अगर आनंद की बजाए भरण पोषण का ही साधन बनकर रह जाता है तो यह मनुष्य की प्रकृति का विरोध है । जब मार्क्स कहते हैं कि मनुष्य के समक्ष आर्थिक स्थितियाँ ऐतिहासिक विकास के एक चरण की बजाए शाश्वत नियम की तरह पेश आती हैं तो वे इन पर विजय पाने की माँग कर रहे होते हैं । वे चाहते हैं कि आर्थिक नियमों के अधीन मनुष्य न रहे बल्कि ये नियम ही परस्पर संबद्ध व्यक्तियों से बनी हुई मानवता के अधीन लाए जाने चाहिए । इस तरह श्रम विभाजन से उत्पादन के साधनों और उत्पाद पर निजी मालिकाना, उत्पादक पर उत्पाद की बरतरी, राज्य, चर्च, कानून जैसी संस्थाओं से व्यक्ति का पराई चीजों की तरह सामना होना आदि पैदा होते हैं और फिर ये ही मिलकर अलगाव नामक स्थिति को जन्म देते हैं । अलगाव के समाज में मनुष्य का अन्य व्यक्तियों के साथ वैसा रिश्ता नहीं रह जाता जैसा दो मनुष्यों के बीच होता है बल्कि उनके बीच मालिक मजदूर, शोषक शोषित, मातहत कमांडर, भिखारी दयावान जैसा आपसी रिश्ता बन जाता है । काम की प्रक्रिया में होने वाला श्रम विभाजन मनुष्य को उसकी मनुष्यता से विलग कर देता है । सबसे आगे बढ़कर सामाजिक श्रम विभाजन में एक व्यक्ति तो वस्तुओं, औजारों, उत्पाद आदि का मालिक बन जाता है जबकि दूसरा इतना अकिंचन हो जाता है कि अपना शरीर छोड़कर उसके पास कुछ नहीं रह जाता और उसे भी बेचना पड़ता है । ऐसा माहौल व्यक्तियों की प्रतिभा को विकास का अवसर देने वाले किसी भी उत्पादक समाज के बनने की संभावना खत्म कर देता है । फ़िशर के मुताबिक अलगाव की समस्या जीवन भर मार्क्स के सोच विचार का विषय बनी रही । अपने अंतिम ग्रंथ पूँजी के तीसरे खंड में मार्क्स अलगाव के खात्मे की संभावना ऐसी स्थिति में देखते हैं जहाँ मनुष्य जरूरत के लिए उत्पादन के फंदे से बाहर निकल जाए ।

वस्तुओं के संसार की कीमत बढ़ने के साथ साथ मानव संसार की कीमत घटने लगती है । वस्तु आखिर है क्या ? वह जो हमारी किसी जरूरत को पूरा करती हो । यही चीज उसका उपयोग मूल्य है । उसका उपयोग मूल्य तभी साकार होता है जब उसका उपभोग हो । यह मूल्य ही विनिमय मूल्य का भी आधार होता है । उपयोग मूल्य के बतौर वस्तुएँ अतुलनीय होती हैं । लेकिन माल के बतौर, उनका विनिमय मूल्य उनमें एक साझी चीज की माँग करता है । विनिमय की दुनिया में वस्तु अपनी गुणवत्ता खो देती है और महज मात्रा में बदल जाती है । वस्तुएँ निश्चित मात्रा की श्रमशक्ति का साकार रूप हो जाती हैं, उनके भीतर मानव श्रम अमूर्त रहता है । माल के भीतर उत्पादन की सामाजिक प्रकृति और उत्पादक की आभासी ‘स्वतंत्रता’ मूर्तिमान रहती है क्योंकि वह चाहे या न चाहे उसे कच्चे माल और मजदूर, मजदूर की औसत उत्पादकता, माँग और पूर्ति, उपभोक्ता की जरूरतों और उसकी क्रय क्षमता- संक्षेप में सब कुछ के लिए समग्र समाज पर निर्भर रहना पड़ता है । इस तरह माल सर्वावेशी सामाजिक उत्पादन की दुनिया में ‘निजी अर्थतंत्र’ के आंतरिक अंतर्विरोध का साकारीकरण हो जाता है । जैसे धार्मिक जगत में मनुष्य के दिमाग से पैदा हुई चीजें उससे आज़ाद होकर सजीव हो जाती हैं, एक दूसरे से और मानव जाति से रिश्ता बनाने लगती हैं उसी तरह मालों की दुनिया में मनुष्य के हाथ से बनी चीजें भी हो जाती हैं । विनिमय की दुनिया में मनुष्यों के बीच तो भौतिक संबंध बनते हैं लेकिन वस्तुओं में सामाजिक संबंध बनते हैं । कोई एक वस्तु अपने मालिक के अनजाने ही सामाजिक हो जाती है । आज मुनाफ़ा कमाती है तो कल घाटा उठाती है, इसकी कीमत में चढ़ाव उतार आता है, कहीं और काम की कोई नई उत्पादक पद्धति लागू होने से इसका मूल्य कम हो जाता है, जब इसके मुकाबले कोई नहीं होता तो इसको फुसलाया जाता है और जब बहुत हो तो खारिज हो जाती है, संकट या युद्ध को जन्म देना तो इसके बाएँ हाथ का खेल है, जिसके पास यह होती है उसे इसका नशा रहता है ।

फ़िशर ने वर्ग और वर्ग संघर्ष की धारणा के सिलसिले में कुछ नई बातें कहने की कोशिश की । इस मसले पर वे अपनी बात यहाँ से शुरू करते हैं कि मार्क्स वर्ग या वर्ग संघर्ष की धारणा के खोजकर्ता या आविष्कारक नहीं थे । वे इस सिद्धांत में मार्क्स के योगदान को निम्नलिखित बातों में देखते हैं :

1 किसी वर्ग की विशेषताओं को निर्धारित करने की कोशिश ।

2 वर्गों की उत्पत्ति का विश्लेषण ।

3 इस तथ्य की पहचान कि किसी निश्चित समय पर किसी वर्ग के हित उत्पादक शक्तियों के विकास और नई सामाजिक संरचना के प्रति उसकी रुझान के मेल में होते हैं जबकि अन्य वर्ग स्थापित पारंपरिक व्यवस्था की रक्षा इसलिए करते हैं क्योंकि वह उनके हितों के मेल में होती है ।

4 यह यकीन कि सर्वहारा अंतिम वर्ग है और उसकी मुक्ति के लिए जरूरी है कि सभी वर्गों का खात्मा हो और वर्गविहीन समाज की स्थापना हो ।

सामाजिक श्रम विभाजन के चलते तमाम तरह के पेशा आधारित समूहों का जन्म हुआ और फिर लंबे दिनों में जटिल प्रक्रिया के तहत इन समूहों से वर्गों का विकास हुआ । वे कहते हैं कि कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र में इस सवाल पर थोड़ी सरलता दिखाई पड़ती है जिसमें आगे चलकर परिष्कार किया गया ताकि समाज की जटिलता को समेटा जा सके और सर्वाधिक महत्वपूर्ण वर्गों की विशेषताओं को परिभाषित किया जा सके । वर्ग कठोर या अपरिवर्तनीय नहीं होते न ही अनादि हैं बल्कि ऐतिहासिक प्रक्रिया की उपज होते हैं । वर्ग साझा विशेष हितों के लिए, जिन्हें ‘सामान्य’ हित के रूप में स्थापित किया जा चुका होता है, अपने विरोधी साझा विशेष हितों के विरुद्ध लड़ाई के क्रम में पैदा होते हैं, वर्ग के रूप में उनके गठन के लिए यह जरूरी होता है, इसी लड़ाई के क्रम में जनता के विभिन्न तबके गठित हो रहे उस वर्ग की ओर खिंच आते हैं और उसमें समाहित हो जाते हैं, इस प्रक्रिया में बने वर्ग निरंतर गतिमान रहते, अनेक टुकड़ों में बँटते रहते और नई स्थितियों में फिर एकताबद्ध होते रहते हैं, वर्गीय हित व्यक्तियों से कमोबेश स्वतंत्र हैसियत बना लेते हैं, विरोधी हित से उनकी शत्रुता बार बार बनती बिगड़ती रहती है । इस तरह वर्ग लगातार गतिमान, संगठित और पुनर्संगठित होते रहते हैं । पूँजीपति और सर्वहारा इसी तरह लंबी प्रक्रिया में गठित वर्ग हैं । मार्क्स पूँजी के तीसरे खंड के बावनवें अध्याय में इस समस्या को उठाते हैं लेकिन उसे पूरा करने से पहले ही उनकी मृत्यु हो गई लेकिन इस अधूरी पांडुलिपि में भी मार्क्स दो नहीं तीन बड़े सामाजिक वर्गों की उपस्थिति चिन्हित करते हैं : पगारजीवी श्रमिक, पूँजीपति और जमींदार जो आय और आय के स्रोतों के मुताबिक एक दूसरे से अलग होते हैं अर्थात पगार, मुनाफ़ा और जमीन का किराया ।

इसके बाद फ़िशर लुई बोनापार्त की अठारहवीं ब्रूमेर में मार्क्स द्वारा राजनीतिक हलचल के बीच प्रकट होने वाली वर्ग की विशेषताओं का चित्रण करते हैं जिसमें सिर्फ़ विरोधी ही नहीं मध्यवर्ती तबकों की भी भूमिका को रेखांकित किया गया है । इसी किताब में मार्क्स ने लिखा था कि वर्ग संघर्ष का सर्वोच्च रूप राजनीतिक पार्टियों के बीच का संघर्ष है । वे बताते हैं कि मार्क्स के विश्लेषण के मुताबिक किसी व्यक्ति की आय या जीवन पद्धति सिर्फ़ उसका ‘क्लास इन इटसेल्फ़’ बताती है । महत्वपूर्ण बात है कि वर्गों का निर्माण वर्ग संघर्ष के दौरान होता है । इस संघर्ष के जरिए ही वह समाजैतिहासिक ताकत बनता है । साफ है कि दो विशाल वर्गों में समाज का अधिकाधिक विभाजन एक प्रक्रिया है लेकिन इसका मतलब मध्यवर्ती वर्गों की अनुपस्थिति नहीं है । यहाँ तक कि मार्क्स पूँजीपति वर्ग में भी बौद्धिकों को अलगाते हैं तभी उनके एक हिस्से के टूटकर मजदूर वर्ग के साथ खड़ा होने की संभावना देखते हैं ।

इसके बाद ऐतिहासिक भौतिकवाद संबंधी अध्याय में वे सबसे पहले व्यक्तियों की संपत्ति (इंडिविडुअल प्रापर्टी) और व्यक्तिगत संपत्ति (प्राइवेट प्रापर्टी) में मार्क्स द्वारा किए हुए भेद का उल्लेख करते हैं । इसमें पहले का मतलब व्यक्तिगत उपभोग के लिए उपलब्ध संपत्ति है तो दूसरे का मतलब ऐसी संपत्ति को निजी बनाना है जो सारत: सामाजिक होती है । यह भेद वे इस बात पर जोर देने के लिए करते हैं कि पूँजीवाद लोगों की व्यक्तिगत संपत्ति से उन्हें बेदखल करके निजी संपत्ति का निर्माण करता है । इसी आधार पर क्रांति के बाद की स्थिति के लिए उनका यह कथन जायज सिद्ध होता है ‘बेदखल करने वालों को बेदखल कर दिया जाता है (एक्सप्राप्रिएटर्स आर एक्सप्राप्रिएटेड)।’

इसी प्रसंग में ‘राजनीतिक अर्थशास्त्र की आलोचना में योगदान’ की प्रसिद्ध भूमिका को उद्धृत करने के बाद वे स्वीकार करते हैं कि इसके यांत्रिक अतिसरलीकरण की गुंजाइश है और ऐसा हुआ भी है । अपूर्व द्वंद्ववादी होने के बावजूद मार्क्स कहीं कहीं यह भ्रम पैदा करने का मौका देते हैं कि मानो इतिहास की संचालक शक्ति मनुष्य नहीं बल्कि श्रम के औजार, मशीन और वस्तुओं की दुनिया है । यही आलोचना आगे चलकर हम टेरी ईगलटन के लेखन में पाएँगे । इस तरह की धारणाओं को वे हेगेल और डार्विन का असर मानते हैं । हालाँकि वे ‘पावर्टी आफ़ फिलासफी’ से यह भी उद्धृत करते हैं कि ‘उत्पादन के सभी औजारों में सबसे शक्तिशाली उत्पादक शक्ति खुद क्रांतिकारी वर्ग होता है ।’ साथ ही ‘होली फ़ेमिली’ से उद्धरण देकर साबित करते हैं कि मार्क्स के लिए इतिहास और कुछ नहीं जीवित मनुष्यों द्वारा अपने मकसद को पाने के लिए किया गया काम है । आखिरकार मार्क्स महज चिंतक नहीं मजदूर आंदोलन के नेता भी थे इसलिए वे समाजवाद के लिए सामाजिक ताकतों को संगठित करने का महत्व भी जानते थे । इसीलिए मार्क्स जब नियमों की बात करते हैं तो उन्हें प्रवृत्तियों की तरह समझा जाना चाहिए ।

फ़िशर का कहना है कि विकास के तथाकथित नियमों की तरह ही आधार अधिरचना का संबंध भी यांत्रिक तरीके से समझा गया है । असल में बौद्धिक उत्पाद भौतिक उत्पादन की तरह नहीं होता बल्कि उसके साथ और उससे निरंतर अंत:क्रिया में होता है । किसी भी समय शासकों के विचार उस समय के प्रभावी विचार होते हैं लेकिन वे ही एकमात्र विचार नहीं होते । मार्क्स बार बार इस बात पर जोर देते हैं कि किसी भी समाज में उसके नाश के बीज निहित रहते हैं । नया समाज पुराने के नकार के बतौर ही पैदा होता है । प्रभावी विचारों के साथ ही साथ विरोधी प्रतिगामी या अग्रगामी विचार भी मौजूद होते हैं और वर्ग संघर्ष केवल आर्थिक नहीं बल्कि राजनीतिक और बौद्धिक लड़ाई भी होता है । चेतना भी सही, गलत और भ्रामक होती है । ठोस स्थितियों के विश्लेषण में हमेशा ही मार्क्स चेतना और सामाजिक अस्तित्व की अंत:क्रिया का चित्रण करते हैं । मार्क्स के मुताबिक ‘लोग अपने इतिहास का निर्माण करते हैं, लेकिन वे अपनी मर्जी के अनुसार उसका निर्माण नहीं करते; वे अपनी चुनी हुई परिस्थितियों में उसका निर्माण नहीं करते, बल्कि ऐसा उन्हें अतीत से प्राप्त, प्रदत्त और मौजूद स्थितियों से सीधे टकराते हुए करना पड़ता है ।’

किताब के अंत में फ़िशर भविष्य के लिए मार्क्सवाद की चार रोचक धाराओं का जिक्र करते हैं:

1 मार्क्सवाद को ऐसा वैज्ञानिक विश्व दृष्टिकोण समझना जिसे इतिहास की द्वंद्वात्मक व्याख्या के लिए लागू किया जा सकता है । यह धारणा मार्क्स की बनिस्बत एंगेल्स के विचारों से ज्यादा प्रभावित है लेकिन एंगेल्स की इस बात को भी ध्यान में रखती है कि हरेक नई खोज के साथ भौतिकवाद को भी बदलना होगा । इसके चलते एंगेल्स के भी विचारों की फिर से परीक्षा हो रही है, उनकी सामान्यताओं को दुरुस्त किया जा रहा है और आधुनिक विज्ञान की कुछेक महत्वपूर्ण खोजों को गैर मार्क्सवादी साबित करने वाले प्रतिबंधों को ढीला किया जा रहा है ।

2 ‘मनुष्य के दर्शन’ के रूप में मार्क्सवाद की परिकल्पना जिसमें अलगाव को बुनियादी धारणा माना जाए । आजकल ज्यादातर मार्क्सवाद का विकास इसी दिशा में हो रहा है ।

3 संरचनावाद से प्रभावित होकर मार्क्स के लेखन को भाषा और मिथ के विश्लेषण के लायक बनाना । यह विकास मार्क्सवाद को अकादमिक बनाने की ओर ले गया ।

4 इतिहास और राजनीतिक पहल के अध्ययन के लिए वैज्ञानिक पद्धति के बतौर उसे विकसित करना । तीसरी दुनिया के देशों में अधिकतर मार्क्सवाद का विकास इसी लक्ष्य की ओर अग्रसर है ।    

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लैटिन अमेरिकी देशों की हलचल

कनाडा के मार्क्सवादी लेबोविट्ज की किताब ‘द सोशलिस्ट अल्टरनेटिव : रीयल ह्यूमन डेवलपमेंट’ अकार बुक्स से छपी 2010 में लेकिन इनकी महत्वपूर्ण किताब ‘बीयांड कैपिटल’ का दूसरा संस्करण 2003 में ही छप गया था । लेबोविट्ज की एक विशेषता यह भी है कि वे मेजारोस की मान्यताओं को सरल भाषा में सुबोध ढंग से प्रस्तुत करते हैं ।

लेबोविट्ज की ‘बीयांड कैपिटल’ की शुरुआत इस सवाल से होती है कि आखिर इक्कीसवीं सदी के पूँजीवाद को समझने के लिए उन्नीसवीं सदी के लेखक को क्यों देखा जाए । उत्तर देते हुए वे बताते हैं कि मार्क्सवाद असल में महज आर्थिक सिद्धांत नहीं हैं । मार्क्सवादी हरेक प्रकार के ऐसे समाज का विरोध करते हैं जो शोषण पर आधारित है और इसीलिए मनुष्य के संपूर्ण विकास में बाधक है । वे पूँजीवाद का विरोध इसलिए करते हैं क्योंकि इस समाज में फ़ैसले मनुष्य की जरूरत के आधार पर नहीं बल्कि निजी मुनाफ़े को ध्यान में रखकर किए जाते हैं । मनुष्य और संसाधनों का पूरा इस्तेमाल नहीं हो पाता क्योंकि उन्हें मनुष्य की जरूरत के अनुसार संयोजित ही नहीं किया जाता । मानव अस्तित्व की बुनियादी शर्त, प्राकृतिक पर्यावरण को निजी मुनाफ़े के लिए नष्ट कर दिया जाता है । ऐसे समाज में न्याय की बात बेमानी है जिसमें उत्पादन के साधनों का स्वामित्व एक बड़ी आबादी को अमानवीय हालात में काम करने के लिए मजबूर कर देता है । यहाँ तक कि जनता को लिंग, नस्ल और राष्ट्रीयता आदि के आधार पर इसीलिए बाँटा जाता है क्योंकि अन्यथा लोगों के बीच आपसी सहयोग पूँजी के लिए फ़ायदेमंद नहीं होगा ।

दूसरी बात यह कि मार्क्स ने पूँजीवाद के गति विज्ञान का अब तक का सर्वोत्तम अध्ययन किया था जो आज हम जो पूँजीवाद के गहरे संकट से रूबरू हैं उन्हें जानना बहुत ही जरूरी है । पूँजीवाद के लिए माल और मुद्रा के साथ ही ऐसे श्रमिक की जरूरत होती है जो अपना श्रम बेचे, वह श्रम जो उसके शरीर में ही अवस्थित है । दूसरे कि इस श्रम को खरीदने वाला पूँजीपति हो । इसके लिए श्रमिक को आज़ाद होना चाहिए । उसका अपने शरीर में निहित इस ताकत पर इतना अधिकार होना चाहिए कि वह इसके मालिक के बतौर इसे बेच सके । उसे उत्पादन के सभी साधनों से भी आज़ाद होना चाहिए ताकि उसके पास अपना शरीर छोड़कर बेचने के लिए और कुछ भी न हो । तीसरी बात कि पूँजीपति को उस श्रम का बाकायदे अधिग्रहण करना चाहिए । पहले भी बाज़ार के जरिए खरीद बिक्री हुआ करती थी लेकिन श्रम शक्ति की बिक्री की खासियत यह है कि जिस चीज का शोषण होना है वह उसके मालिक से अलग कोई वस्तु नहीं होती । इसलिए इसकी बिक्री के साथ ही मजदूर एक तरह से अपने ही शरीर पर अपना अधिकार बेच देता है । मतलब यह भी निकला कि खरीदारी के वक्त उसे सशरीर मौजूद रहना होता है । खरीदार यानी पूँजीपति भी इसकी खरीदारी निजी उपभोग के लिए नहीं करता । उसकी रुचि इससे पैदा होने वाले अतिरिक्त मूल्य में होती है । सिर्फ़ अतिरिक्त मूल्य के लिए ही वह श्रम शक्ति को खरीदता है । यह अतिरिक्त मूल्य उत्पादन के क्षेत्र में पैदा होता है । उत्पादित होने वाली वस्तु भी श्रम पर अधिकार के चलते उसके खरीदार की ही संपत्ति हो जाती है । अतिरिक्त मूल्य का उत्पादन और अधिग्रहण ऐसी कहानी है जो मार्क्स के पाठक आम तौर पर जानते हैं । इसके लिए पूँजीपति काम के घंटे या उत्पादकता बढ़ाता है जिससे निरपेक्ष अतिरिक्त मूल्य का सृजन होता है । लेकिन मार्क्स निरपेक्ष अतिरिक्त मूल्य का ही उद्घाटन नहीं करते बल्कि वे सापेक्ष अतिरिक्त मूल्य का भी रहस्योद्घाटन करते हैं । अपने एक लेख ‘कलेक्टिव वर्कर’ में लेबोविट्ज ने इस पहलू पर जोर दिया है क्योंकि काम के घंटे या उत्पादकता बढ़ाकर जो मुनाफ़ा पूँजीपति कमाता है उसका अन्याय तो प्रत्यक्ष है लेकिन ऐसा न करने से भी जो अतिरिक्त मूल्य पैदा होता है वह सबकी नजर में नहीं आता ।

लेबोविट्ज के अनुसार पूँजीवाद की मार्क्स की आलोचना सिर्फ़ कम या ज्यादा वेतन की नहीं बल्कि स्वयं मजदूरी की है । अगर मजदूर काम के घंटे कम करवाकर मजदूरी में बढ़ोत्तरी करवा लें तो भी मार्क्स की आलोचना खत्म नहीं हो जाएगी । अतिरिक्त मूल्य का हरेक कतरा मार्क्स की नजर में चोरी है । सवाल गुलामी का है उसके रूप का नहीं । मार्क्स के लिए पूँजीवाद में सुधार का कोई माने मतलब नहीं, पूँजीवाद का खात्मा ही एकमात्र विकल्प है । चूँकि यह अंतर्दृष्टि आंदोलनों से अपने आप नहीं उपजती इसलिए पूँजी के तर्क के पार जाने के लिए ‘पूँजी’ का अध्ययन जरूरी है । इसके बगैर यही धारणा बनी रहती है कि मजदूर ने खास मात्रा में अपना श्रम बेचा और इसीलिए शोषण भी सही मजदूरी न मिलने में दिखाई पड़ता है । मार्क्स का जोर पूँजीवाद में सुधार पर नहीं बल्कि उसके निषेध और विनाश पर है ।

लेबोविट्ज कहते हैं कि मार्क्स का ग्रंथ ‘पूँजी’ एकतरफ़ा तौर पर महज पूँजी को सक्रिय दिखाता है और इसके दूसरे पहलू अर्थात मजदूर की स्वतंत्र सक्रियता को उजागर नहीं करता । इसके बरक्स वे मार्क्स के पहले इंटरनेशनल के भाषण से ‘मजदूर वर्ग के राजनीतिक अर्थशास्त्र’ की धारणा को ले आते हैं और मार्क्स के एक सपने का जिक्र करते हैं जिसको आजकल बहुत से विद्वान उद्धृत करते हैं । वह है- आपस में जुड़े हुए उत्पादकों का ऐसा समाज जिसमें सामाजिक संपदा, श्रमशक्ति के खरीदारों को प्राप्त होने की बजाए स्वाधीन तौर पर परस्पर संबद्ध व्यक्तियों द्वारा नियोजित की जाती है जो “सामुदायिक उद्देश्यों के लिए और सामाजिक जरूरत” के मुताबिक उत्पादन करते हैं ।

अपने एक लेख ‘स्पेक्टर आफ़ सोशलिज्म फ़ार द 21 सेंचुरी’ में लेबोविट्ज समाजवाद को तीन चीजों का समुच्चय मानते हैं ।

1- उत्पादन के साधनों पर सामाजिक स्वामित्व: यह चीज राजकीय स्वामित्व से अलग है । इसके लिए गहन लोकतांत्रिकता की जरूरत है जिसमें जनता, उत्पादकों और समाज के सदस्य के बतौर हमारे सामाजिक श्रम के परिणामों के उपयोग के बारे में निर्णय लेगी । सामाजिक संपत्ति की उनकी धारणा में अतीत के संचित श्रम की केंद्रीयता है जिसमें औजार और कौशल शामिल हैं । अतीत का यह संचित श्रम हमें मुफ़्त मिलता है और इसी के साथ सहयोग के उपहार को जोड़ देने से सामाजिक उत्पादक शक्ति प्राप्त होती है । इसी सामाजिक विरासत के लिए लड़ाई एक तरह से वर्ग संघर्ष है । पूँजीवाद इसी विरासत से मनुष्य को अलग करता है और उसे पूँजी में बदलकर हथिया लेता है । इसको वापस हासिल करना और जीवित सामाजिक श्रम तथा अतीत के सामाजिक श्रम को संयुक्त करना समाजवाद के लिए आवश्यक है ।

2- मजदूरों द्वारा उत्पादन का संगठन: मजदूरों द्वारा संगठित उत्पादन से उत्पादकों के बीच नए रिश्तों की बुनियाद पड़ती है जो सहयोग और एकजुटता के होते हैं । इसके लिए मजदूरों को काम की जगह पर चिंतन और कर्म को आपस में जोड़ने की क्षमता विकसित करनी होगी । इससे उनमें निर्णय लेने का आत्म विश्वास आता है ।

3- सामुदायिक जरूरतों और उद्देश्यों की संतुष्टि: यह बात मानव परिवार के सदस्यों के बतौर हमारी जरूरतों और हमारी साझा मानवता को मान्यता देने पर आधारित है । इसके लिए स्वार्थ से ऊपर उठने और समुदाय तथा समाज के बारे में सोचने के महत्व पर जोर देना होगा । जब तक हम निजी लाभ के लिए उत्पादन करते हैं तब तक दूसरों को प्रतिद्वंद्वी या ग्राहक ही समझते हैं यानी दुश्मन या अपने मकसद को पूरा करने का साधन और इसी कारण एक दूसरे से अलग थलग और एकांगी बने रहते हैं । समाजवाद के आरंभिक त्रिक का यह पहलू आचरण में भिन्नता को मानकर एकता स्थापित करने पर बल देता है । इस तरह हम जनता में एकजुटता का निर्माण तो करते ही हैं अपने को भी अलग तरीके से उत्पादित करते हैं ।

एक लेख ‘द इंपोर्टेंस आफ़ सोशलिस्ट एकाउनटेंसी’ में वे मेजारोस की एक नई धारणा ले आते हैं । उनका कहना है कि नया समाजवादी समाज बनाने के लिए नई धारणाओं का निर्माण करना होगा । ये नई धारणाएँ पूँजी की तार्किकता के मुकाबले सामाजिक तार्किकता की स्थापना करेंगी । इस सिलसिले में वे मेजारोस की ‘समाजवादी एकाउनटेंसी’ की धारणा का जिक्र करते हैं जो पूँजी के तर्क में निहित ‘एकाउनटिंग और एडमिनिस्ट्रेशन’ के बरक्स प्रस्तावित किया गया है । इसमें पूँजीवादी व्यवस्था के परिमाण पर जोर के विपरीत गुण पर जोर दिया जाना चाहिए और उत्पादन का लक्ष्य जरूरतों की सीधी संतुष्टि होना चाहिए । इसका दूसरा पैमाना स्वतंत्र समय होना चाहिए जिसे मनुष्य अपने आपको साकार करने के लिए रचनात्मक तरीके से इस्तेमाल करेगा और अनिवार्य श्रम के समय की तानाशाही से आज़ादी हासिल करेगा । इस तरह समाजवादी लेखा जोखा अनिवार्य श्रम समय के निषेध पर आधारित होगा । ‘इतिहास में आगे चलकर स्वतंत्र समय का उत्पादन मुक्ति की अनिवार्य शर्त होगा ।’ यह पूँजीवाद की इस स्थिति के विरोध में होगा जहाँ समय ही सब कुछ होता है, मनुष्य कुछ नहीं होता । समाजवादी लेखा की धारणा की जरूरत पूँजीवादी लेखा और सक्षमता की पूँजीवादी धारणा को तोड़ने के लिए है । स्वतंत्र समय मानव विकास और व्यवहार से जुड़ा हुआ है इसलिए समाजवादी लेखा की धारणा यहाँ आकर परिस्थिति को बदलने के साथ ही खुद को बदलने के क्रांतिकारी आचरण से मिल जाती है । इस तरह यह मानव क्षमता में विकास को भी समाहित करती है । जहाँ पूँजीवादी लेखा उत्पादन के समय को ध्यान में रखता है और मानव क्षमता का मूल्यांकन प्रति इकाई वस्तुओं के उत्पादन में लगे मानव श्रम के हिसाब से  करता है वहीं समाजवादी लेखा मनुष्य के लिए आवश्यक निवेश के आधार पर श्रमिक की क्षमता में विकास का आकलन करता है ।

आज का समाजवाद

हंगरी के मार्क्सवादी चिंतक इस्तवान मेजारोस फ़िलहाल सबसे महत्वपूर्ण माने जाते हैं । उनकी किताब ‘बीयांड कैपिटल’ की चर्चा हम पहले ही कर चुके हैं । किताब का पहला और दूसरा खंड इंग्लैंड में 1995 में मर्लिन प्रेस से छपा था । फिर अमेरिका में मंथली रिव्यू प्रेस से छपा । भारत में 2000 में के पी बागची ने उसे छापा । पहला खंड है ‘द अनकंट्रोलेबिलिटी आफ़ कैपिटल एंड इट्स क्रिटिक’ जिसमें वे पूँजी की अराजकता का विश्लेषण करते हैं । दूसरा खंड ‘कनफ़्रंटिंग द स्ट्रक्चरल क्राइसिस आफ़ द कैपिटल सिस्टम’ है जिसमें वे पूँजी के वर्तमान संरचनात्मक संकट को व्याख्यायित करते हैं । मेजारोस के अर्थशास्त्र संबंधी लेखन को भी पढ़ते हुए ध्यान रखना पड़ता है कि उनका मूल क्षेत्र दर्शन है और इस क्षेत्र की ओर उनका आना वर्तमान समस्याओं को समझने समझाने के क्रम में हुआ है ।

उनकी सबसे बड़ी विशेषता है कुछ नई धारणाओं का उपयोग जिनसे परिचय के बगैर उनके लेखन को समझना मुश्किल है । मसलन वे पूँजीवाद (कैपिटलिज्म) की बजाए पूँजी (कैपिटल) शब्द का प्रयोग बेहतर समझते हैं और दोनों के बीच फ़र्क बताने के लिए यह कहते हैं कि मार्क्स ने अपने ग्रंथ का नाम ‘पूँजी’ यूँ ही नहीं रखा था । ‘बीयांड कैपिटल’ की भूमिका में उन्होंने बुर्जुआ नेताओं, खासकर मार्गरेट थैचर द्वारा टिना (देयर इज नो अल्टरनेटिव) तथा उन्हीं नेताओं द्वारा राजनीति को ‘आर्ट आफ़ पासिबल’ बताने के बीच निहित अंतर्विरोध को रेखांकित किया है । इसी भूमिका में उन्होंने किताब के शीर्षक के तीन अर्थ बताए हैं-

1- मार्क्स ने खुद ही ‘पूँजी’ लिखते हुए इसका मतलब स्पष्ट किया था जिसका अर्थ है सिर्फ़ पूँजीवाद के परे नहीं बल्कि पूँजी के ही परे जाना ।

2 मार्क्स द्वारा ‘पूँजी’ के पहले खंड और उनकी मृत्यु के बाद प्रकाशित शेष दो खंडों तथा ग्रुंड्रीस और थियरीज आफ़ सरप्लस वैल्यू के भी परे जाना क्योंकि ये सभी उनकी मूल परियोजना के शुरुआती दौर तक ही पहुँचे थे और उनके द्वारा सोचे गए काम को पूरी तरह प्रतिबिंबित नहीं करते ।

3 मार्क्सीय परियोजना के भी परे जाना क्योंकि यह उन्नीसवीं सदी के माल उत्पादक समाज के वैश्विक उत्थान की परिस्थितियों को ही व्यक्त करती है और बीसवीं सदी में उसका जो रूप उभर कर सामने आया वह उनके सैद्धांतिक विश्लेषण से बाहर रहा ।

उनके अनुसार पूँजीवाद, पूँजी की मौजूदगी का महज एक रूप है । पूँजीवाद के खात्मे के साथ ही पूँजी का अंत नहीं होता । इसे समाजवाद के लिए संघर्ष से जोड़ते हुए वे कहते हैं कि समाजवाद का काम पूँजी के प्रभुत्व का खात्मा है । इस प्रभुत्व को व्यक्त करने के लिए वे इसे सोशल मेटाबोलिक रिप्रोडक्शन की व्यवस्था कहते हैं जिसका मतलब ऐसी व्यवस्था है जो सामाजिक रूप से चयापचय की ऐसी प्रणाली बना लेती है जो अपने आप इसका पुनरुत्पादन करती रहे । इसे ही वे मार्क्स द्वारा प्रयुक्त पद आवयविक प्रणाली (आर्गेनिक सिस्टम) कहते हैं । पूँजी का यह प्रभुत्व मेजारोस के मुताबिक महज पिछली तीन सदियों के दौरान सामान्य माल उत्पादन की व्यवस्था के रूप में सामने आया है । इसने मनुष्य को ‘अनिवार्य श्रम शक्ति’ के बतौर महज ‘उत्पादन की लागत’ में बदल कर जिंदा श्रमिक को भी ‘विक्रेय माल’ बना देता है । मनुष्यों में आपस में अथवा प्रकृति के साथ उसकी उत्पादक अंत:क्रिया के पुराने रूप उपयोग के लिए उत्पादन की ओर लक्षित होते थे जिसमें कुछ हद तक आत्म निर्भरता होती थी लेकिन पूँजी का आंतरिक तर्क किसी भी मात्रा में न समा सकने वाली मानव आवश्यकताओं तक महदूद रह ही नहीं सकता था । अंत में पूँजीवाद ने आत्म निर्भरता के इसी आधार का नाश करके उपयोग को गणनीय और अनंत ‘विनिमय मूल्य’ की पूजा परक अपरिहार्यता के अधीन कर दिया । इसने अपने आपको ऐसी लौह प्रणाली के रूप में पेश किया जिससे पार पाना संभव नहीं दिखाई देता । लेकिन पूँजीवाद की जिंदगी ही अबाध विस्तार की जरूरतों को अनिवार्यतः पूरा करने पर निर्भर है जिसके कारण इसके सामने अनेक ऐतिहासिक सीमाबद्धताएँ प्रकट होती हैं । इन्हीं सीमाओं को ध्यान में रखते हुए बीसवीं सदी में इसकी अतृप्त लिप्सा पर रोक लगाने की असफल कोशिशें की गईं । इनसे बस एक तरह का मिश्रण ही हो सका कोई संरचनागत समाधान नहीं निकला बल्कि पूँजी लगातार संकटों में ही फँसती गई और इन अवरोधों से उसके अनेक अंतर्विरोध भी सामने आए ।

पूँजीवाद मूलत: विस्तारोन्मुखी और संचयवृत्तियुक्त होता है इसलिए मनुष्य की जरूरतों को संतुष्ट करना इसका ध्येय ही नहीं होता । इसमें पूँजी का विस्तार अपने आप में एक मकसद हो जाता है और इसलिए इस व्यवस्था का निरंतर पुनरुत्पादन इसकी मजबूरी बन जाती है । श्रम से इसकी शत्रुता जन्मजात होती है और निर्णय की प्रक्रिया में श्रमिक की कोई भागीदारी इसके लिए असह्य होती है । चूँकि यह शत्रुता संरचनागत है इसलिए इस व्यवस्था में सुधार या इस पर कोई नियंत्रण असंभव है । सामाजिक जनवाद के सुधारवाद का दिवाला यूँ ही नहीं निकला । सुधारवाद के अंत ने सीधे समाजवाद के लिए क्रांतिकारी आक्रामकता का रास्ता खोल दिया है । सुधारवाद की राजनीति प्रमुख रूप से बुर्जुआ संसदीय सीमाओं के भीतर चलती थी इसलिए इसका एक मतलब संसद के बाहर क्रांतिकारी सक्रियता को ब्ढ़ाना भी है ।

पूँजी की व्यवस्था में तीन अंतर्विरोध मौजूद होते हैं-

1) उत्पादन और उसके नियंत्रण के बीच,2) उत्पादन और उपभोग के बीच, और 3) उत्पादन और उत्पादित वस्तुओं के वितरण के बीच ।

इन अंतर्विरोधों के चलते विघटनकारी और केंद्रापसारी वृत्ति इसका गुण होती है । इसी वृत्ति को काबू में रखने के लिए राष्ट्र राज्य की संस्था खोजी गई लेकिन वह भी इसे नियंत्रित करने में असफल ही रही है । यह समाधान तात्कालिक था इसका पता इसी बात से चलता है कि आजकल हरेक समस्या का समाधान वैश्वीकरण नामक जादू की छड़ी में खोजा जा रहा है । सच तो यह है कि अपनी शुरुआत से ही यह व्यवस्था वैश्विक रही है । इसे पूरी तरह से खत्म करने के लक्ष्य का पहला चरण पूँजीवाद की पराजय है । उनका कहना है कि जिन्हें समाजवादी क्रांति कहा गया वे दरअसल इसी काम को पूरा कर सकी थीं । वे उत्तर पूँजीवादी समाज की ही रचना कर सकी थीं जिसे समाजवाद की ओर जाना था लेकिन इसे ही समाजवादी क्रांति मान लेने से समाजवादी कार्यभार शुरू ही नहीं हो सका ।

इस खंड के पहले ही अध्याय में वे कहते हैं कि हेगेल की आलोचनात्मक धार को फिर से अर्जित किया जाना चाहिए । अपने जीवन में ही हेगेल सत्ता के लिए असुविधाजनक हो गए थे, मरने के बाद तो उन्हें व्यावहारिक रूप से दफ़ना ही दिया गया । इसके लिए वे कहते हैं कि हेगेल की महान उपलब्धियों को ग्रहण करते हुए भी पूँजी को अनादि अनंत की तरह पेश करने के उनके काम की क्रांतिकारी आलोचना करनी होगी । मार्क्स की धारणाओं को समझने के लिए हेगेल को पुनःप्राप्त करने की इस कोशिश की वे तीन वजहें बताते हैं । पहली कि 1840 दशक में मार्क्स के बौद्धिक निर्माण के समय की राजनीतिक और दार्शनिक बहसों के चलते ऐसा करना अपरिहार्य है । असल में 1841 में बर्लिन विश्वविद्यालय में मार्क्स और किर्केगाद ने साथ साथ शेलिंग के हेगेल विरोधी व्याख्यान सुने लेकिन दोनों ने राह अलग अलग अपनाई । उस समय का माहौल ही ऐसा था कि आपको हेगेल के समर्थन या विरोध में खड़ा होना ही पड़ता । दूसरी वजह उनके अनुसार यह है कि जर्मन बुर्जुआ द्वारा हेगेल को पूरी तरह से खत्म कर देने की कोशिश के मद्दे नजर उनकी उपलब्धियों को विकसित करना जरूरी था । हेगेल का समर्थन करते हुए भी मार्क्स ने उनकी समस्याओं को समझा और उसका आलोचनात्मक सार सुरक्षित रखते हुए भी उसका क्रांतिकारी परिवर्तन के लिए सकारात्मक निषेध किया । मजेदार बात यह है कि हेगेल का विरोध न सिर्फ़ पूँजीवाद ने किया जिसने ही जरूरत पड़ने पर उन्हें स्थापित किया था और जरूरत खत्म हो जाने पर उन्हें दफ़ना दिया बल्कि समाजवादी आंदोलन में भी उनके स्वीकार अस्वीकार से इसके उतार चढ़ाव का गहरा रिश्ता रहा है । बर्नस्टाइन के नेतृत्व में हेगेल के द्वंद्ववाद के मुकाबले कांट के विधेयवाद का उत्थान हुआ और दूसरे इंटरनेशनल के सामाजिक जनवाद की राजनीति के पतन तक इसका बोलबाला रहा । असल में हेगेल का दर्शन महत्तर सामाजिक टकरावों के बीच मूलत: विकसित हुआ था और बाद के दिनों में हेगेल द्वारा ही अनुदारवादी समायोजनों के बावजूद संक्रमण की गतिमयता के निशान कभी खत्म नहीं किए जा सके । यहाँ तक कि सोवियत संघ में नौकरशाही के उत्थान के साथ हेगेल के साथ एक तरह का नकारात्मक भाव जोड़ने की कोशिश हुई । तीसरी वजह यह है कि वास्तव में 1848 के क्रांतिकारी माहौल में हेगेल बुर्जुआ वर्ग के लिए लज्जा का विषय हो गए थे और मार्क्सवाद तथा उनके दर्शन के बीच के संपर्कों पर परदा डालना संभव नहीं रह गया था ।

बाद के चिंतकों में वे लुकाच की इसीलिए प्रशंसा करते हैं क्योंकि उन्होंने हेगेल को अपनाने की कोशिश की थी । लुकाच की प्रासंगिकता मेजारोस के मुताबिक इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि सोवियत संघ के बीसवीं सदी में उभरे अंतर्विरोधों के चलते इसकी आलोचनाओं को दोबारा गंभरता से देखने की जरूरत पड़ी है । इस नाते उन्हें ’हिस्ट्री एंड क्लास कांशसनेस’ ऐसा काम लगता है जो सोवियत संघ के जन्म के साथ जुड़ी ऐतिहासिक परिस्थितियों और बाद में हुए राजनीतिक बौद्धिक विकासों के मामले में उसकी समस्याओं की निशानदेही करता है । मेजारोस के अनुसार इस किताब की चर्चा के कारण निम्नांकित हैं-

1 पहली बड़ी समाजवादी क्रांति ‘जंजीर की सबसे कमजोर कड़ी’ में हुई । इससे अनेक सैद्धांतिक सवाल जुड़े हुए हैं । आधिकारिक सोवियत साहित्य में इसे सकारात्मक अर्थ में पेश किया जाता है जबकि लुकाच ने इस शब्दावली का प्रयोग रूस के समाजार्थिक ढाँचे के अत्यधिक पिछड़ेपन पर जोर देने के लिए किया । ध्यातव्य है कि सोवियत समाज की बाद में सामने आने वाली ज्यादातर समस्याओं की जड़ें रूस के इस हालात में हैं । यहाँ हमें क्रांति के बाद उपजे समाज के अंतर्विरोधों और उसके बारे में दार्शनिक सूत्रीकरण के बीच जीवंत संबंध की पहचान मिलती है ।

2 चूँकि लुकाच पश्चिम की असफल क्रांतियों में से एक के भागीदार रहे थे इसलिए इस किताब में अत्यंत प्रतिकूल परिस्थितियों में भी क्रांति की गारंटी करने वाले तत्वों की तलाश मिलती है ।

3 हंगरी की क्रांति असफलता से उन्होंने कुछेक निष्कर्ष निकाले थे जिनमें पार्टी का नौकरशाहीकरण एक मुद्दा है हालाँकि उन्होंने इसे सिर्फ़ नेतृत्व की मसीहाई भाषा में चिन्हित किया लेकिन बाद में रूस में आई विकृतियों के प्रसंग में इसका महत्व स्पष्ट हुआ ।

4 उन्होंने रूसी क्रांति के प्रभाव से बुर्जुआ बुद्धिजीवियों के कम्युनिस्ट आंदोलन में आगमन से पैदा होने वाली समस्याओं को भी उठाया । ये लोग अपने साथ अपना एजेंडा और मकसद लेकर आए थे । हालाँकि बाद में इस विंदु पर अतिरिक्त जोर देकर पश्चिमी मार्क्सवाद की कोटि भी निर्मित की गई लेकिन उसका उद्देश्य लुकाच जैसे बुद्धिजीवियों को मार्क्सवाद से बाहर साबित करके उनके प्रयासों का फ़ातिहा पढ़ना था ।

मेजारोस ने नव सामाजिक आंदोलनों का परिप्रेक्ष्य भी मार्क्सवाद के संदर्भ में उठाया है । पर्यावरण आंदोलन के संदर्भ से वे बताते हैं कि पूँजीवादी विकास के शुरुआती दिनों में उसके अनेक नकारात्मक पहलुओं और प्रवृत्तियों को थोड़ा अनदेखा किया जा सकता था । लेकिन आज उनकी अनदेखी धरती के विनाश की कीमत पर ही संभव है । इसी पृष्ठभूमि में तमाम तरह के पर्यावरणवादी आंदोलन उभरे । पूँजीवादी देशों में सुधारोन्मुख ग्रीन पार्टियों के रूप में ये आंदोलन राजनीति में भी जगह बनाने की कोशिश करते हैं । वे पर्यावरण के विनाश से चिंतित व्यक्तियों को आकर्षित करते हैं लेकिन इसके समाजार्थिक कारणों को अपरिभाषित छोड़ देते हैं । ऐसा उन्होंने शायद व्यापक चुनावी आधार बनाने के लिए किया लेकिन आरंभिक सफलता के बाद जिस तेजी से वे हाशिए पर पहुँच गईं उससे साबित होता है कि पर्यावरण के विनाश के उनके नेताओं द्वारा सोचे गए करणों से अधिक गहरे कारण हैं । असल में आज न केवल विकास के साथ जुड़े हुए खतरे अभूतपूर्व रूप से बढ़ गए हैं बल्कि विश्व पूँजी की व्यवस्था के अंतर्विरोध ही पूरी तरह से परिपक्व हो गए हैं और ये खतरे इस तरह समूची धरती को अपनी जद में ले चुके हैं कि उनका कोई आंशिक समाधान सोचना संभव नहीं रह गया है ।

जिस नई धारणा की चर्चा फ़ास्टर ने पूँजी की चरम सीमाओं की सक्रियता के नाम से किया है उससे संबंधित अध्याय में वे पूँजी के वर्तमान संकट के प्रसंग में चार मुद्दों पर बात करना जरूरी समझते हैं जिन्हें वे एक दूसरे से अलग नहीं मानते बल्कि कहते हैं कि उनमें से हरेक बड़े अंतर्विरोधों का केंद्रविंदु है लेकिन ये सभी मिलकर ही एक दूसरे मारकता को भीषण बना देते हैं । भूमंडलीय पूँजी और राष्ट्र राज्य की सीमाओं के बीच का विरोध कम से कम तीन बुनियादी अंतर्विरोधों से जुड़ा हुआ है- इजारेदारी और प्रतियोगिता के बीच, श्रम की प्रक्रिया के अधिकाधिक समाजीकरण और उसके उत्पाद के भेदभावपरक अधिग्रहण के बीच तथा अबाध रूप से बढ़ते वैश्विक श्रम विभाजन और असमान रूप से विकासशील पूँजी की वैश्विक व्यवस्था के निरंतर बदलते शक्ति केंद्रों द्वारा प्रभुता स्थापित करने की कोशिशों के बीच । इन सबसे मिलकर पैदा हुई बेरोजगारी की समस्या ने विश्व पूँजी व्यवस्था के अंतर्विरोधों और शत्रुताओं को सर्वाधिक विस्फोटक रूप दे दिया है ।

पहले खंड के तेरहवें अध्याय में वे राज्य को उखाड़ फेंकने के समाजवादी कार्यभार के प्रसंग में राज्य के बारे में मार्क्स के राजनीतिक सिद्धांत के मुख्य तत्वों को विंदुवार बताते हैं । यह वर्णन बहुत कुछ पूर्व समाजवादी शासनों के कटु अनुभवों से प्रभावित है इसलिए एक तरह का आदर्शवाद भी इसमें मौजूद है ।

1 समूचे समाज के क्रांतिकारी रूपांतरण के जरिए राज्य का अतिक्रमण करना होगा न कि किसी सरकारी आदेश या तमाम राजनीतिक/प्रशासनिक उपायों के जरिए इसे उखाड़ा जाएगा ।

2 आगामी क्रांति को अगर समाजार्थिक शोषण की सीमाओं में ही कैद होकर नहीं रह जाना है तो उसे केवल राजनीतिक होने की बजाए सामाजिक क्रांति होना होगा ।

3 अतीत की राजनीतिक क्रांतियों ने आंशिकता और सार्विकता के बीच जिस अंतर्विरोध को पैदा किया था तथा ‘नागरिक समाज’ के प्रभावी तबकों के पक्ष में सामाजिक सार्विकता को राजनीतिक आंशिकता के अधीन कर दिया था सामाजिक क्रांति उस अंतर्विरोध को ही खत्म कर देती है ।

4 मुक्ति का सामाजिक अभिकर्ता सर्वहारा इसीलिए होता है क्योंकि पूँजीवादी समाज के शत्रुतापूर्ण अंतर्विरोधों की परिपक्वता के चलते वह सामाजिक व्यवस्था को उखाड़ फेंकने के किए बाध्य होता है और वह अपने आपको समाज पर नई शासक आंशिकता के रूप में थोपने में अक्षम होता है ।

5 राजनीतिक और सामाजिक/आर्थिक संघर्ष द्वंद्वात्मक रूप से एक्ताबद्ध होते हैं और इसीलिए सामाजिक/ आर्थिक पहलू की उपेक्षा राजनीतिक पहलू को उसके यथार्थ से वंचित कर देती है ।

6 समाजवादी कदमों के लिए वस्तुगत परिस्थितियों की गैर मौजूदगी में राजनीतिक सत्ता पर अपरिपक्व अवस्था में कब्जा हो जाने पर आप विरोधी की ही नीतियों को लागू करने लगते हैं ।

7 कोई भी सफल सामाजिक क्रांति स्थानीय या राष्ट्रीय ही नहीं होगी । राजनीतिक क्रांति ही अपनी आंशिकता के चलते इन सीमाओं तक महदूद रह सकती है । इसके विपरीत उसे वैश्विक होना होगा यानी राज्य का अतिक्रमण भी वैश्विक स्तर पर करना होगा ।

किताब का दूसरा खंड ज्यादा मजेदार है जिसमें वे पूँजीवाद के मिथकों को एक एक कर ध्वस्त करते हैं । इसमें कुछ ऐसे लेख भी संकलित कर दिए गए हैं जो हालिया प्रश्नों को लेकर लिखे गए हैं । इसका पहला अध्याय  संपदा के उत्पादन तथा उत्पादन की समृद्धि का विवेचन करता है । इसमें वे वास्तविक जरूरतों की अनदेखी करके उत्पादन में बढ़ोत्तरी करने की पूँजीवादी रवायत के मुकाबले उन जरूरतों की दृष्टि से मनुष्य की उत्पादक क्षमताओं के विकास का वैकल्पिक नजरिया अपनाने की सलाह देते हैं क्योंकि जरूरत और संपदा-उत्पादन में संबंध विच्छेद विकसित और सुविधा संपन्न पूँजीवादी देशों में भी नहीं चल पा रहा व्यापक मानवता की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने की तो बात ही छोड़िए । उत्पादन का वर्तमान उद्देश्य जैसा है वैसा ही सदा से नहीं रहा इस बात के समर्थन में वे मार्क्स को उद्धृत करते हैं जिनके मुताबिक प्राचीन काल में उत्पादन का लक्ष्य संपदा बटोरना नहीं था, बल्कि मानव जीवन उत्पादन का लक्ष्य था । वह स्थिति आज के विपरीत थी जब मानव जीवन का उद्देश्य उत्पादन हो गया है और उत्पादन का लक्ष्य संपदा हो गई है । इस बदलाव के लिए उपयोग मूल्य को विनिमय मूल्य से अलगाना और उसके अधीन लाना जरूरी था । मेजारोस संपदा के उत्पादन के बरक्स उत्पादन की समृद्धि पर जोर देते हैं । इसके बाद वे बताते हैं कि पूँजीवाद असल में बरबादी को बढ़ावा देता है । इसका उदाहरण ‘यूज एंड थ्रो’ की संस्कृति है । अब टिकाऊ चीजों को बनाना उसका लक्ष्य नहीं रह गया है । यहाँ तक कि गुणवत्ता वाली चीजें बनाने के मुकाबले उसका जोर उत्पादन की मात्रा पर होता है । मेजारोस के अनुसार पूँजीवाद उपयोग में निरंतर गिरावट को जन्म देता है । उपयोग की घटती हुई दर पूँजीवादी उत्पादन और उपभोग के सभी बुनियादी पहलुओं, वस्तुओं और सेवाओं, कारखाना और मशीनरी तथा श्रम शक्ति पर नकारात्मक प्रभाव डालती है । इसका ज्वलंत उदाहरण सैन्य औद्योगिक परिक्षेत्र है ।

मार्क्स ने कहा था कि पूँजी जीवंत अंतर्विरोध है इसलिए हमें इसके साथ जुड़ी किसी भी प्रवृत्ति पर सोचते समय उसकी विपरीत प्रवृत्ति को भी ध्यान में रखना चाहिए । मसलन पूँजी की एकाधिकारी प्रवृत्ति का विरोध प्रतियोगिता से होता है, केंद्रीकरण का विरोध बिखराव से, अंतर्राष्ट्रीकरण का राष्ट्रवाद और क्षेत्रीय विशिष्टता से तथा संतुलन का विरोध संतुलन-भंग से होता है । यह भी दिमाग में रखना होगा कि पूँजी की व्यवस्था का विकास असमान होता है इसलिए ये सभी प्रवृत्तियाँ और प्रति प्रवृत्तियाँ एक साथ सभी देशों में नहीं भी प्रकट हो सकती हैं ।

पूँजीवाद ने एक समय मुक्त प्रतियोगिता से जन्म लिया था लेकिन प्रतियोगिता के विध्वंसक होने पर उसे ‘संगठित पूँजीवाद’ की शक्ल दी गई । इसका अर्थ संकट का खत्मा नहीं था लेकिन कुछ मार्क्सवादी विचारकों में भ्रम फैलाने में यह बदलाव कामयाब रहा । फ़्रैंकफ़ुर्त स्कूल के विचारकों ने इसे ही एक नई संरचना मान लिया और मजदूरों को समाहित कर लेने की व्यवस्था की क्षमता को बढ़ा-चढ़ाकर आँकने लगे ।

मार्क्स के पूँजी संबंधी समूची परियोजना की एक झलक देने के लिए मेजारोस ग्रुंड्रीस से एल लंबा उद्धरण देते हैं जिसके मुताबिक ‘बुर्जुआ समाज उत्पादन का सबसे विकसित और सबसे जटिल ऐतिहासिक संगठन है । जिन कोटियों के जरिए इसके रिश्तों को व्यक्त किया जाता है, इसकी संरचना को समझा जाता है वे उन सभी लुप्तप्राय समाजों की संरचनाओं और उत्पादन संबंधों को समझने की अंतर्दृष्टि प्रदान करती हैं जिनके ध्वंसावशेषों और तत्वों से यह निर्मित हुआ है, जिनके कुछेक अविजित अवशेष अब भी इसके साथ लगे लिपटे हुए हैं, जिनके छिपे मानी इसमें पूरी तरह प्रकट हुए हैं ।’ इसके आधार पर वे नतीजा निकालते हैं कि मार्क्स का इरादा सिर्फ़ ‘पूँजीवादी उत्पादन’ की कमियों की गणना करना नहीं था । वे मानव समाज को उन परिस्थितियों से बाहर निकालना चाहते थे जिनमें मनुष्य की जरूरतों की संतुष्टि को ‘पूँजी के उत्पादन’ के अधीन कर दिया गया था ।

किताब के तकरीबन अंत में मेजारोस ने लिखा है कि वर्तमान दौर समाजवाद के लिए रक्षात्मक की बजाए आक्रामक रणनीति का है । इस दौर की शुरुआत की बात करते हुए इसे वे पूँजी के संरचनागत संकट से जोड़ते हैं और इस संकट के लक्षण गिनाते हुए बताते हैं कि 1) यह सार्वभौमिक है, उत्पादन की किसी विशेष शाखा तक महदूद नहीं है 2) इसका प्रभाव क्षेत्र सचमुच भूमंडलीय है, किसी देश विशेष तक सीमित नहीं है 3) यह गीर्घकालीन, निरंतर, स्थायी है, पहले के संकटों की तरह चक्रीय नहीं है 4) इसका प्रकटीकरण रेंगने की गति से हो रहा है, नाटकीय विस्फोट या भहराव की तरह नहीं । वे इसकी शुरुआत 1960 दशक के अंत से मानते हुए तीन घटनाओं का उल्लेख करते हैं जिनमें यह संकट फूट पड़ा था । 1) वियतनाम युद्ध में पराजय के साथ अमेरिकी प्रत्यक्ष आक्रामक दखलंदाजी का खात्मा । 2) मई 1968 में फ़्रांस और अन्य ‘विकसित’ पूँजीवादी केंद्रों में लोगों का ‘व्यवस्था’ के प्रति विक्षोभ का प्रकट होना । 3) चेकोस्लोवाकिया और पोलैंड जैसे उत्तर औद्योगिक मुल्कों में सुधार की कोशिशों का दमन जिनके जरिए पूँजी के संरचनागत संकट की संपूर्णता का अंदाजा लगा । मेजारोस का कहना है कि इन घटनाओं के जरिए उन परिघटनाओं का पता चलता है जो तब से आज तक की तमाम घटनाओं के पीछे कार्यरत रही हैं और वे हैं- 1) ‘महानगरीय’ या विकसित पूँजीवादी देशों के अल्पविकसित देशों के साथ शोषण के संबंध एकतरफ़ा तौर पर निर्धारित होने की बजाए परस्पर निर्भरता से संचालित होने लगे । 2) पश्चिमी पूँजीवादी देशों के अंदरूनी और आपसी अंतर्विरोध और समस्याओं का उभार तेज हो गया । 3) ‘वस्तुत: मौजूद समाजवाद’ के उत्तर औद्योगिक देशों और समाजों के संकट आपसी विवादों के जरिए प्रकट होने लगे ।

समाजवादी आक्रामकता के दौर की राजनीतिक कार्यवाही के लिहाज से वे कहते हैं कि ‘अर्थतंत्र की पुनर्संरचना’ तक अपने आपको सीमित रखने की रणनीति पर दोबारा सोचना चाहिए और उसकी जगह वर्तमान संदर्भ में ‘राजनीति के क्रांतिकारी पुनर्गठन’ के कार्यभार पर बल देना चाहिए । इस लिहाज से गैर-संसदीय कार्यवाही का अपार महत्व है । सच्ची समाजवादी ‘आर्थिक पुनर्संरचना’ की अनिवार्य पूर्वशर्त ‘राजनीति का जनोन्मुखी पुनर्गठन’ है ।

मेजारोस का कहना है कि मार्क्स ने पूँजी के दो मूल्य बताए थे- उपयोग मूल्य और विनिमय मूल्य । पूँजीवाद असल में विनिमय मूल्य की प्रभुता से जुड़ा हुआ है । जबकि मनुष्य की जरूरतें उपयोग मूल्य से जुड़ी हुई हैं इसलिए लेन देन के क्षेत्र में उपयोग मूल्य के विस्तार से पूँजीवाद कमजोर होता है । इसी तत्व को लेबोविट्ज लैटिन अमेरिकी देशों के समाजवादी प्रयोगों में फलीभूत होता हुआ पाते हैं और इसी को वे 21वीं सदी के समाजवाद की संज्ञा देते हैं जो बीसवीं सदी के प्रयोगों से भिन्न है । यही तर्क बहुत कुछ जिजैक का भी है जो ‘अकुपाई वाल स्ट्रीट’ आंदोलन के बाद खासे चर्चित हुए हैं । वे पूँजी के वर्तमान संकट का कारण विनियम मूल्य की बेलगाम बढ़ोत्तरी में देखते हैं ।

ऊपर के विवरण से स्पष्ट है कि रणधीर सिंह द्वारा अपनी किताब मेजारोस को समर्पित करने के बावजूद मेजारोस से उनके सैद्धांतिक विरोध सतही नहीं बल्कि बहुत कुछ बुनियादी हैं । इसकी जड़ दोनों के अनुभव की दुनिया अलग होने में निहित है । रणधीर सिंह तीसरी दुनिया के एक देश में समाजवादी आंदोलन के विकास से जुड़े हुए हैं और यह चीज उनकी सैद्धांतिकी को ठोस जमीन देती है जबकि मेजारोस के लेखन में अमेरिका में उनकी रिहायश और 1956 में हंगरी पर सोवियत हमले की अनुगूँजें सुनी जा सकती हैं ।

मेजारोस की दूसरी महत्वपूर्ण किताब ‘द चैलेंज एंड बर्डेन आफ़ हिस्टारिकल टाइम’ मंथली रिव्यू प्रेस से 2008 में छपी और भारत में इसका प्रकाशन 2009 में अकार बुक्स ने किया । इस किताब का उपशीर्षक ‘सोशलिज्म इन ट्वेंटी फ़र्स्ट सेंचुरी’ है । भूमिका जान बेलामी फ़ास्टर ने लिखी है जिसमें वे बताते हैं कि मेजारोस की सैद्धांतिक अंतर्दृष्टि आज लैटिन अमेरिकी देशों में जारी परिवर्तन के नायकों की वजह से एक भौतिक शक्ति में बदल चुकी है । वेनेजुएला के राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज द्वारा उनकी खुलेआम प्रशंसा को अनेक अखबारों और पत्रिकाओं ने प्रमुखता से प्रकाशित किया । मेजारोस प्रसिद्ध मार्क्सवादी चिंतक जार्ज लुकाच के शिष्य रहे । 1956 में रूसी आक्रमण के बाद उन्होंने हंगरी छोड़ दिया और अमेरिका में दर्शन के प्रोफ़ेसर बने और मार्क्स, लुकाच और सार्त्र पर किताबें लिखीं । 1971 के इर्द गिर्द उन्होंने पूँजी के वैश्विक संकट का सवाल उठाया तथा दर्शन संबंधी काम को किनारे करके इस विषय पर लिखना शुरू किया । फ़ास्टर ने उनके सैद्धांतिक अवदान की चर्चा करते हुए उनके द्वारा प्रयुक्त पदों की नवीनता का जिक्र किया है । उनमें से कुछेक का जिक्र हम पहले कर चुके हैं । एक अन्य धारणा ‘पूँजी की चरम सीमाओं की सक्रियता’ है जो वर्तमान संकट का बड़ा कारण है । वे मेजारोस द्वारा सोवियत संघ को उत्तर पूँजीवादी समाज मानने को भी उनका योगदान मानते हैं जो पूँजी की संपूर्ण व्यवस्था को खत्म न कर सका । ध्यातव्य है कि मेजारोस ऐसा किसी जिम्मेदारी से पीछा छुड़ाने के लिए नहीं बल्कि बेहतर समाजवाद के निर्माण का कार्यभार स्पष्ट करने के लिए करते हैं । वे उनका यह योगदान भी स्वीकार करते हैं कि मेजारोस पूँजी के पूरी तरह से खात्मे की ऐतिहासिक स्थितियों का विवरण देते हैं और सामाजिक अवयव के नियंत्रण की वैकल्पिक व्यवस्था प्रस्तावित करते हैं जिसकी जड़ें ‘सारवान समानता’ में होंगी । भूमिका में मेजारोस की किताब ‘बीयांड कैपिटल’ को मार्क्सीय आलोचना का फलक चौड़ा करने वाला कहा गया है क्योंकि इसमें मानव मुक्ति की मजबूत स्त्रीवादी और पर्यावरणिक धारणाओं को पूँजी की सत्ता के निषेध का अविभाज्य घटक बनाया गया है ।

डेविड हार्वे द्वारा ‘पूँजी’ का अध्ययन

2010 में वर्सो द्वारा प्रकाशित डेविड हार्वे की किताब ‘ए कंपएनियन टु मार्क्स’ कैपिटल’ का जिक्र किए बगैर यह लेख अधूरा ही रहेगा । डेविड हार्वे मूलत: भूगोलवेत्ता हैं और शहरों पर अपने अध्ययन के क्रम में वे सामाजिक विषयों की ओर आए और फिर मार्क्सवाद का व्यवस्थित अध्ययन किया । रुचिपूर्वक वे हरेक साल मार्क्स की ‘पूँजी’ पर अनौपचारिक व्याख्यान देते रहे । यह किताब विद्यार्थियों के लिए ‘पूँजी’ पर दिए गए उनके व्याख्यानों का सुसंपादित संकलन है । किताब में ‘पूँजी’ के सिर्फ़ पहले खंड का सांगोपांग अध्ययन किया गया है शायद इसके पीछे यह आग्रह भी रहा हो कि मार्क्स चूँकि पहला खंड ही अपने जीवन में पूरा कर सके थे इसलिए उसी में उनकी अंतर्दृष्टि सबसे प्रामाणिक रूप से व्यक्त हुई होगी । अपनी किताब को वे महज कंपैनियन इसलिए भी कहते हैं क्योंकि उनका मकसद विद्यार्थियों की रुचि मूल पुस्तक पढ़ने में जगाना था । लेखक की कोशिश अति सरलीकरण से बचते हुए पुस्तक को सुबोध बनाना है इसीलिए लेखक ने व्याख्या संबंधी विवादों को छोड़ दिया है । लेकिन ऐसा भी नहीं कि यह कोई निस्संग व्याख्या है बल्कि विभिन्न तरह के लोगों को लगभग चालीस बरस तक समझाने के क्रम में उपजी है । लेखक शुरुआत माल और विनिमय संबंधी पहले अध्याय से करता है । लेखक हमारा ध्यान सबसे पहले प्रथम वाक्य की ओर खींचता है और बताता है कि इस वाक्य में दो बार ‘प्रकट’ आता है । एक बार यह कि ‘जिन समाजों में पूँजीवादी उत्पादन प्रणाली व्याप्त है वहाँ सामाजिक संपदा ‘मालों के विशाल संचय के रूप में प्रकट होती है’ और दूसरी बार यह कि ‘एक माल उसके प्राथमिक रूप के बतौर प्रकट होता है ।’ लेखक इस बात पर जोर देता है कि ‘प्रकट’ होना और ‘होना’ एक ही नहीं है । यह शब्द मार्क्स की पूरी किताब में अनेक बार आया है जिसका मतलब है कि उनके मुताबिक जो ऊपर से दिखाई दे रहा है उसके नीचे कुछ चल रहा है जो असली है । दूसरी बात यह कि मार्क्स सिर्फ़ पूँजीवादी उत्पादन प्रणाली पर विचार करना चाहते हैं । ये दोनों बातें आगे की बातों को समझने के लिए ध्यान में रखना जरूरी है । माल से बात शुरू करने का लाभ यह है कि सब लोग उसके संपर्क में रोज आते हैं ।

मrर्क्स की ‘पूँजी’ ऐसी किताब है जिसमें दार्शनिकों, अर्थशास्त्रियों, नृतत्वशास्त्रियों, पत्रकारों और राजनीति वैज्ञानिकों के साथ ही तमाम साहित्यकार, परीकथाएँ और मिथक आते रहते हैं । किताब के रूप में इसे पढ़ना अलग तरह का अनुभव है क्योंकि खंडित उद्धरणों से वृहत्तर तर्क के भीतर उनकी अवस्थिति समझ में नहीं आती । सभी तरह के अनुशासनों में दीक्षित लोग इसमें भिन्न अर्थ निकालते हैं क्योंकि यह इतने भिन्न किस्म के स्रोतों की ओर आपका ध्यान ले जाती है । इन स्रोतों को मार्क्स आलोचनात्मक विश्लेषण की धारा से जोड़ते हैं । आलोचनात्मक विश्लेषण का अर्थ पहले के सोच विचार को एकत्र कर उसे नए ज्ञान में बदल देना है । इस किताब में जो धाराएँ मौजूद हैं वे हैं सत्रहवीं से उन्नीसवीं सदी तक मुख्य रूप से इंग्लैंड में विकसित राजनीतिक अर्थशास्त्र की धारा, दार्शनिक गवेषणा की धारा जो ग्रीक दार्शनिकों से शुरू होकर हेगेल तक आती है और इन्हीं के साथ तीसरी धारा काल्पनिक समाजवादियों की धारा है ।

मार्क्स अपनी किताब की समस्याओं के प्रति सचेत थे और भूमिकाओं में उन्होंने इनकी चर्चा की । फ़्रांसिसी संस्करण की भूमिका में उन्होंने स्वीकार किया कि अगर इसे धारावाहिक रूप से छापा जाए तो मजदूर वर्ग के लिए अच्छा होगा लेकिन उन्होंने सावधान भी किया कि इससे पुस्तक की समग्रता को एकबारगी ग्रहण करने में असुविधा होगी । इस किताब में मार्क्स का मकसद राजनीतिक अर्थशास्त्र की आलोचना के जरिए पूँजीवाद की कार्यपद्धति को उद्घाटित करना था । इस लिहाज से उन्होंने दूसरे संस्करण की भूमिका में लिखा कि ‘प्रस्तुति का रूप गवेषणा की पद्धति से अलग होना ही चाहिए । गवेषणा के दौरान विस्तार से सामग्री एकत्र करके उसके विकास के अलग अलग रूपों का विश्लेषण किया जाता है, उनके आपसी संबंधों की छानबीन की जाती है । इस काम के खत्म होने के बाद ही उस विकास की प्रस्तुति संभव होती है ।’ मार्क्स की गवेषणा में यथार्थ की अनुभूति तथा उस अनुभूति का राजनीतिक अर्थशास्त्रियों, दार्शनिकों और उपन्यासकारों द्वारा वर्णन आता है । इसके बाद वे समस्त सामग्री की गहन आलोचना करते हैं ताकि उस यथार्थ की कार्यपद्धति को स्पष्ट करने वाले कुछ सरल किंतु जोरदार धारणाओं को खोज सकें । आम तौर पर मार्क्स किसी परिघटना को समझने के लिए गहरी धारणाओं के निर्माण के लिए उनके सतही आभास के विश्लेषण से शुरुआत करते हैं । इसके बाद सतह के नीचे उतरकर असल में कार्यरत शक्तियों को उद्घाटित करते हैं ।

मार्क्स की इस किताब को पढ़ते हुए उनकी धारणाओं को लेकर पहले उलझन होती है कि आखिर ये धारणाएँ आ कहाँ से रही हैं लेकिन धीरे धीरे आप मूल्य और वस्तु पूजा जैसी धारणाओं को समझना शुरू कर देते हैं । दिक्कत यह है कि किताब के खत्म होने पर पूरा तर्क समझ में आता है इसीलिए लेखक का सुझाव है कि एक बार आद्यंत खत्म कर लेने के बाद दोबारा पढ़ने से यह किताब मज़ा देती है । खासकर शुरू के तीन अध्याय तो बिना कुछ समझ में आए ही बीत जाते हैं । इसके बाद के अध्यायों में ही पता चलता है कि उनके द्वारा निर्मित धारणाओं का उपयोग क्या है ।

मार्क्स माल की धारणा से शुरू करते हैं । उनके लेखन को देखते हुए उम्मीद बनती है कि बात वर्ग संघर्ष से शुरू होनी चाहिए थी लेकिन तीन सौ पन्नों से पहले इस तरह की कोई बात ही नहीं शुरू होती । या फिर मुद्रा से ही शुरू करते । खुद मार्क्स पहले मुद्रा से ही शुरू करना चाहते थे लेकिन अध्ययन के बाद उन्हें लगा कि पहले मुद्रा की व्याख्या करना जरूरी है । श्रम से भी तो शुरू कर सकते थे? कुछ कागजों से पता चलता है कि बीस तीस सालों तक वे इस समस्या से जूझते रहे थे कि शुरू कहाँ से करें । अंत में उन्होंने माल से शुरू किया और इसकी कोई वजह भी नहीं बताई है । मार्क्स ने जिस धारणात्मक औजार का निर्माण किया है वह सिर्फ़ ‘पूँजी’ के पहले खंड के लिए नहीं बल्कि अपने समूचे विश्लेषण के लिए बनाया है ।

अगर आप पूँजीवादी उत्पादन पद्धति को समझना चाहते हैं तो तीनों खंड देखने होंगे और फिर भी एक बात ध्यान में रखना होगा कि जितनी बातें उनके दिमाग में थीं उनका महज आठवाँ हिस्सा ही वे लिख सके थे । अपनी किताब की पूरी योजना उन्होंने कुछ इस तरह बनाई थी-1) सामान्य, अमूर्त निर्धारक जो कमोबेश सभी सामाजिक रूपों में लागू होते हैं—2) वे कोटियाँ जो बुर्जुआ समाज की आंतरिक संरचना की बनावट हैं और जिन पर बुनियादी वर्ग आधारित हैं । पूँजी, पगारजीवी श्रम, भू संपदा । उनका अंतस्संबंध । शहर और देहात । तीन बड़े सामाजिक वर्ग । उनके बीच लेन देन । वितरण । उधारी व्यवस्था (निजी) । राज्य के रूप में बुर्जुआ समाज का संकेंद्रण । उसका अपने साथ संबंध । ‘अनुत्पादक’ वर्ग । कराधान । सरकारी कर्ज़ । सार्वजनिक उधारी । जनसंख्या । उपनिवेश । उत्प्रवास । 4) उत्पादन का अंतर्राष्ट्रीय संबंध । अंतर्राष्ट्रीय श्रम विभाजन । अंतर्राष्ट्रीय विनिमय । निर्यात और आयात । विनिमय की दर । 5) विश्व बाज़ार और संकट । मार्क्स अपनी इस परियोजना को पूरा नहीं कर सके । इनमें से ज्यादातर की समझदारी पूँजीवादी उत्पादन को समझने के लिए बेहद जरूरी है । आप देख सकते हैं कि किताब के पहले खंड में मार्क्स पूँजीवादी उत्पादन पद्धति को सिर्फ़ उत्पादन के नजरिए से समझते हैं । दूसरे खंड (अपूर्ण) में विनिमय संबंधों का परिप्रेक्ष्य अपनाया गया है । तीसरे खंड (अपूर्ण) में पूँजीवाद के बुनियादी अंतर्विरोधों के उत्पाद के बतौर प्रथमत: संकट-निर्माण पर ध्यान केंद्रित किया गया है । उसके बाद ब्याज, वित्त पूँजी पर मुनाफ़ा, जमीन का किराया, व्यापारिक पूँजी पर मुनाफ़ा, कराधान आदि के रूप में अधिशेष का वितरण पर विचार किया गया है ।

मार्क्स की पद्धति द्वंद्ववादी थी जिसे उनके मुताबिक आर्थिक मुद्दों पर पहले लागू नहीं किया गया था । अब दिक्कत यह है कि अगर आप किसी खास अनुशासन में गहरे धँसे हुए हैं तो संभावना ज्यादा इस बात की है कि द्वंद्ववादी पद्धति का इस्तेमाल आपके लिए मुश्किल होगा । द्वंद्ववाद के मुताबिक प्रत्येक वस्तु गति में होती है । मार्क्स भी महज श्रम की नहीं बल्कि श्रम की प्रक्रिया की बात करते हैं । पूँजी भी कोई स्थिर वस्तु नहीं बल्कि गतिमान प्रक्रिया है । जब वितरण रुक जाता है तो मूल्य गायब हो जाता है और पूरी व्यवस्था भहरा जाती है । उनकी किताब में अक्सर वस्तुओं की बजाए उनके आपसी संबंधों का जिक्र दिखाई पड़ता है । आज की तारीख में ‘पूँजी’ के अध्ययन की एक और समस्या है । पिछले तीस सालों से जो नव- उदारवादी प्रतिक्रांतिकारी धारा विश्व पूँजीवाद के क्षेत्र में प्रबल रही है उसने उन स्थितियों को और मजबूत किया है जिन्हें मार्क्स ने 1850-60 के दशक में इंग्लैंड में विखंडित किया था ।

बात दोबारा माल से ही शुरू करते हैं । मालों का व्यापार बाज़ार में होता है । सवाल खड़ा होता है कि आखिर यह आर्थिक लेन देन कैसा है । माल मनुष्य के किसी न किसी अभाव, जरूरत या इच्छा को पूरा करता है । यह हमसे बाहर मौजूद कोई वस्तु होती है जिसे हम अधिग्रहित करते और अपनाते हैं । मार्क्स तुरंत ही घोषित करते हैं कि उन्हें उन जरूरतों की प्रकृति से कोई लेना देना नहीं, उन्हें इससे भी कोई मतलब नहीं कि ये पेट से उपजती हैं या दिमाग से । उन्हें सिर्फ़ इससे मतलब है कि लोग उन्हें खरीदते हैं और इस काम का रिश्ता इस बात से है कि लोग जिंदा कैसे रहते हैं । अब माल तो लाखों हैं जिन्हें मात्रा या गुण के हिसाब से हजारों तरह से वर्गीकृत किया जा सकता है । लेकिन वे इस विविधता को एक किनारे धकेलकर उनको उनके सामान्य गुण में बदलते हैं जिसे वे उपयोगिता के बतौर व्याख्यायित करते हैं । वस्तु का यह ‘उपयोग मूल्य’ उनके समूचे चिंतन में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है । मार्क्स ने कहा था कि सामाजिक विज्ञानों में प्रयोगशाला की सुविधा न होने से हमें अमूर्तन का सहारा लेना पड़ता है । आप देख सकते हैं कि कैसे भिन्न भिन्न वस्तुओं के भीतर से उन्होंने अमूर्तन के जरिए ‘उपयोग मूल्य’ प्राप्त किया । लेकिन जिस तरह के समाज का वर्णन मार्क्स कर रहे थे यानी पूँजीवादी समाज उसमें माल, विनिमय मूल्य के भी भौतिक वाहक होते हैं । हार्वे हमसे वाहक शब्द पर गौर करने को कहते हैं क्योंकि किसी चीज का वाहक होना और वही चीज होने में फ़र्क है । अब मार्क्स एक नई धारणा से हमारा परिचय कराना चाहते हैं ।

जब हम बाज़ार में विनिमय की प्रक्रिया को देखते हैं तो नाना वस्तुओं के बीच विनिमय की नाना दरें और देश काल की भिन्नता होने से एक ही वस्तु की अलग अलग विनिमय दरें दिखाई पड़ती हैं । इसलिए पहली नजर में लगता है कि विनिमय दरें ‘कुछ कुछ सांयोगिक और शुद्ध रूप से सापेक्षिक’ हैं । इससे प्रकट होता है कि ‘अंतर्निहित मूल्य, यानी ऐसा विनिमय मूल्य जो वस्तु के साथ अभेद्य रूप से जुड़ा हुआ, उसमें अंतर्निहित है, का विचार आत्म-विरोधी प्रतीत’ होता है । यहाँ आकर वे कहते हैं कि भिन्न भिन्न वस्तुओं में आपसी विनिमय के लिए जरूरी है कि वे किसी अन्य वस्तु से तुलनीय हों । ‘उपयोग मूल्य के रूप में वस्तुएँ एक दूसरे से गुणात्मक तौर पर अलग होती हैं जबकि विनिमय मूल्य के रूप में उनमें सिर्फ़ मात्रा का भेद हो सकता है और उपयोग मूल्य का एक कण भी बचा नहीं रहता ।’ वस्तुओं की विनिमेयता उनके उपयोग मूल्य पर निर्भर नहीं होती । अब उस तीसरे तत्व का प्रवेश होता है जो इन वस्तुओं के बीच साझा है और वह है कि ये सभी ‘श्रम का उत्पाद’ हैं । मतलब सभी वस्तुएँ अपने उत्पादन में लगे मानव श्रम का वाहक होती हैं । इसके बाद वे पूछते हैं कि आखिर किस तरह का श्रम उनमें साकार हुआ है । यह ठोस-श्रम यानी श्रम-काल तो हो नहीं सकता क्योंकि तब वही वस्तु अधिक कीमती होगी जिसके उत्पादन में ज्यादा समय लगेगा । लोग फिर उस वस्तु को खरीदेंगे जिसे कम समय में बनाया गया होगा । इस समस्या को हल करने के लिए वे मानव श्रम का भी अमूर्तन करते हैं । मूल्य फिर क्या हुआ ? माल में ‘साकार—या—वस्तूकृत—अमूर्त मानव श्रम ।’ तो यह अमूर्त मानव श्रम है श्रम-शक्ति अर्थात समाज की ‘समूची श्रम-शक्ति जो मालों की दुनिया में साकार’ होती है ।

इस धारणा में वैश्विक पूँजीवाद की धारणा शामिल है जिसको उन्होंने ‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’ में पूरी तरह से उद्घाटित किया था । आज का वैश्वीकरण तो उनके समय नहीं था लेकिन वे पूँजीवादी उत्पादन पद्धति की विश्वव्यापी उपस्थिति को भविष्य में साकार होता देख रहे थे । इसी के आधार पर उन्होंने मूल्य को ‘सामाजिक रूप से अनिवार्य श्रम-काल’ के बतौर परिभाषित किया । जिन्होंने रिकार्डो का लेखन देखा है वे समझेंगे कि मार्क्स ‘सामाजिक रूप से अनिवार्य श्रम-काल’ की धारणा के अलावे ज्यादातर उन्हीं का अनुसरण कर रहे थे लेकिन यह छोटी सी बात बहुत बड़ा फ़र्क पैदा कर देती है क्योंकि तुरंत ही सवाल पैदा होता है कि  समाजिक रूप से अनिवार्य क्या है और उसे तय कौन करता है । मार्क्स इसका कोई जवाब तो नहीं देते लेकिन पूरी किताब में यह विषय समाया हुआ है । पूँजीवादी उत्पादन पद्धति में आखिर कौन सी सामाजिक अनिवार्यताएँ नत्थी हैं ? यह हार्वे को बड़ा सवाल लगता है और अनिवार्यताओं के विकल्प खोजने के लिए प्रेरित करता है । मूल्य स्थिर नहीं होता बल्कि तकनीक और उत्पादकता में क्रांति होने पर वे बदलते रहते हैं ।

तकनीक और उत्पादकता के साथ ही वे अन्य कारकों की चर्चा भी करते हैं । इसमें शामिल हैं ‘मजदूरों के कौशल का औसत स्तर, विज्ञान के विकास और उसके तकनीकी प्रयोग का स्तर, उत्पादन प्रक्रिया का सामाजिक संगठन, उत्पादन के साधनों का विस्तार और प्रभाव और प्राकृतिक पर्यावरण की स्थितियाँ ।’ इनकी गणना करना मार्क्स का मकसद नहीं है बल्कि वे महज इस तथ्य पर जोर देना चाहते हैं कि वस्तु का मूल्य स्थिर नहीं होता वरन अनेक कारकों से प्रभावित होता रहता है ।

यहाँ आकर मार्क्स के तर्क में एक पेंच पैदा होता है । वे उपयोग मूल्य की ओर दोबारा लौटते हैं और कहते हैं कि ‘मूल्य बने बगैर भी कोई वस्तु उपयोग मूल्य हो सकती है ।’ हम साँस लेते हैं लेकिन हवा को बोतल में बंद कर अब तक उसे खरीद-बेच नहीं सके हैं । वे यह भी जोड़ते हैं कि ‘माल बने बगैर भी मानव श्रम का कोई उत्पाद उपयोगी हो सकता है ।’ घरेलू अर्थतंत्र में बहुत कुछ माल उत्पादन से बाहर उत्पादित किया जाता है । इसलिए पूँजीवादी उत्पादन पद्धति में सिर्फ़ उपयोग मूल्य नहीं बल्कि दूसरों के लिए उपयोग मूल्य का उत्पादित होना जरूरी है जिसे बाज़ार की मार्फ़त दूसरों तक पहुँचना होता है । मतलब कि माल में उपयोग मूल्य और विनिमय मूल्य होते हैं लेकिन विनिमय मूल्य में निहित ‘मूल्य’ के साकार होने के लिए उसमें उपयोग मूल्य का होना जरूरी है ।

इसके बाद हार्वे अनुभाग 2 की व्याख्या शुरू करते हैं और बताते हैं कि इसमें मार्क्स अनेक जटिल सूत्रों को उठाते हैं और उन्हें महत्वपूर्ण कहकर आपको समझने के लिए आमंत्रित करते हैं । मार्क्स लिखते हैं ‘उपयोग मूल्य दो तत्वों का संश्रय होता है, प्रकृति द्वारा प्रदत्त सामग्री और श्रम ।’ इसलिए मनुष्य जब उत्पादनरत होता है तो प्रकृति के नियमों के अनुसार ही आगे बढ़ सकता है । हार्वे का यह अध्ययन एक हद तक ‘पूँजी’ के प्रति उस आकर्षण का प्रमाण है जो अनेक आर्थिक और अर्थेतर कारणों से पैदा हुआ है । तकरीबन 348 पृष्ठों की इस किताब के कुछेक शुरुआती अंशों का सार हमने महज बानगी के लिए पेश किया है । कुछ हद तक इस व्याख्या में फ़्रांसिस ह्वीन की जीवनी में संकेतित पद्धति का उपयोग किया गया है और कुछ विनिमय मूल्य की प्रभुता की मार्क्स द्वारा की गई पहचान और उससे पैदा होने वाले संकट के आभास के बारे में मार्क्स के विश्लेषण पर जोर के बढ़ने का संकेत है । स्थान की कमी के कारण हम इस विवेचन को आगे विस्तार देने में असमर्थ हैं ।

बढ़ता दबदबा

टेरी ईगलटन की किताब ‘व्हाई मार्क्स वाज राइट’ येल यूनिवर्सिटी से 2011 में प्रकाशित हुई है । पुस्तक का प्रारूप लोकप्रिय किस्म का है और लेखक का इरादा भी आम तौर पर मार्क्सवाद के बारे में प्रचारित भ्रमों का बहुत ही सरल सहज भाषा में खंडन निराकरण है । भूमिका में ईगलटन लिखते हैं कि पूरी किताब एक झटके में इस सवाल के इर्द गिर्द लिखी गई है कि अगर मार्क्सवाद पर लगाए गए सारे आरोप गलत निकले तो? लेकिन लेखक में मार्क्स के प्रति कोई श्रद्धाभाव नहीं है । हम सभी जानते हैं कि उन्होंने मार्क्सवाद से शुरू तो किया लेकिन फिर पश्चिम में जो भी वैचारिकी चली उसके साथ हेल मेल भी किया । उनकी यह किताब भी मार्क्सवाद के बढ़ते हुए प्रभाव का सूचक है ।

ईगलटन सबसे पहले इस आपत्ति पर विचार करते हैं कि मार्क्सवाद औद्योगिक पूँजीवादी समाज की समस्याओं से जुड़ा हुआ था लेकिन अब दुनिया बदल चुकी है इसलिए इस उत्तर औद्योगिक दुनिया में मार्क्सवाद की प्रासंगिकता समाप्त हो गई है । जवाब देते हुए वे कहते हैं कि अगर ऐसा हो जाए तो मार्क्सवादियों से अधिक कोई भी खुश नहीं होगा । मार्क्सवाद तो बहुत कुछ चिकित्सा के पेशे की तरह है जिसका मकसद अपनी ही जरूरत को खत्म करना है । मार्क्सवाद को तभी तक रहना है जब तक उसका विरोधी अर्थात पूँजीवाद है । उनका कहना है कि आज पूँजीवाद खत्म होने की बजाए और भी आक्रामक होकर सामने आया है । जहाँ तक पूँजीवाद का रूप बदलने की बात है मार्क्स भी इस बात को जानते थे कि यह अत्यंत परिवर्तनशील है । मार्क्सवाद ने ही इसके अलग अलग रूपों- व्यापारी, खेतिहर, औद्योगिक, इजारेदार, महाजनी- आदि को पहचाना और अलगाया था । जो पूँजीवाद आज अधिकाधिक अपने शुरुआती रूप में लौटता जा रहा है उसी के समर्थक इसे बदलाव साबित करने पर तुले हुए हैं । हुआ दरअसल यह है कि 70 और 80 के दशक में पूँजीवाद ने अपना रूप बदला था और पारंपरिक औद्योगिक उत्पादन की जगह उपभोक्तावाद, संचार, सूचना प्रौद्योगिकी और सेवा क्षेत्र की उत्तर औद्योगिक संस्कृति सामने आई । लेकिन मार्क्सवादियों के पीछे हटने या पाला बदलने का कारण पूँजीवाद के रूप का बदलाव नहीं बल्कि उसके खात्मे की कल्पित असंभाव्यता थी । उनका कहना है कि आज के पूँजीवाद की आक्रामकता का कारण पूँजी की दुश्चिंता है । यह आत्मविश्वास के कारण नहीं बल्कि भयजनित प्रतिक्रिया है । इसके पीछे दूसरे विश्व युद्ध के बाद आए उछाल का खत्म होना है । इसी भय के कारण पूँजी हलका भी विरोध बर्दाश्त नहीं कर पा रही है । पूँजी की इस नई आक्रामकता के साथ वाम की निराशा ही मार्क्सवाद के अप्रासंगिक होने की घोषणाओं का मूल कारण है । आज की तारीख में मार्क्सवाद को बीते समय की बात कहना ऐसे ही है जैसे आग लगाने वालों की ताकत का मुकाबला न कर पाने के कारण आग बुझाने की व्यवस्था को बेकार कह देना ।

इसके बाद वे दूसरे आरोप की चर्चा करते हैं कि चलिए सिद्धांत तो ठीक है लेकिन व्यवहार ने बेकार की हिंसा को बढ़ावा दिया है । इसके उत्तर में वे आधुनिक समय के युद्धों की हिंसा को सामने रखकर बताते हैं कि उनके मुकाबले समाजवादी देशों की हिंसा कुछ भी नहीं रही है । जैसे पूँजीवाद तमाम खून खराबे के बावजूद अनेक सकारात्मक उपलब्धियों के लिए जाना जाता है वैसे ही समाजवादी समाजों की भी अपनी कमियों के बावजूद उल्लेखनीय उपलब्धियाँ रही हैं । सोवियत रूस में लोकतंत्र की कमी को उन परिस्थितियों में देखा जाना चाहिए जो क्रांति के तत्काल बाद पैदा हुईं । लेकिन समाजवाद ने इससे सीख भी ली है और पूँजीवाद की ताकत को पहचानते हुए बाज़ार समाजवाद जैसी चीज विकसित करने की कोशिशें जारी हैं । हालांकि उनकी खूबियों खामियों की चर्चा भी होती है लेकिन महत्वपूर्ण बात नई दिशा में आगे जाने का खुलापन है । इसके बाद विस्तार से वे इस तरह के प्रयोगों में लोकतंत्र की संभावना पर विचार करते हैं ।

तीसरे आरोप की चर्चा करते हुए वे मार्क्सवाद को निर्धारणवादी साबित करने की कोशिश का जिक्र करते हैं । इसका उत्तर देते हुए वे बताते हैं कि मार्क्स की ज्यादातर मान्यताओं का उत्स उनसे पहले के चिंतकों में मौजूद है । वर्ग संघर्ष की धारणा के साथ उत्पादन संबंध को जोड़कर सामाजिक परिवर्तन का एक खाका प्रस्तुत करना उनका मौलिक योगदान कहा जा सकता है और इसी पर निर्धारणवाद का आरोप भी लगा है । लेकिन खुद मार्क्सवादियों ने इस पर सवाल उठाए हैं । इस मामले में द्वंद्वात्मकता पर जोर देने के बावजूद वे कुछ हद तक इस आरोप को स्वीकार करते हैं लेकिन दूसरे तरह से मार्क्स के सोचने को भी रेखांकित करते चलते हैं । उनका कहना है कि हालाँकि मार्क्स सामाजिक परिवर्तन में उत्पादक शक्तियों की प्रधान भूमिका  देखते हैं लेकिन उत्पादन संबंधों की भूमिका को भी पूरी तरह खारिज नहीं करते । सामाजिक परिवर्तन में मनुष्य की सचेतन कारक के बतौर पहचान भी अनेक मामलों में, उनके मुताबिक, मार्क्स कराते हैं । वे यह भी बताते हैं कि मार्क्स के तईं इतिहास एकरेखीय तरीके से नहीं आगे बढ़ता बल्कि उनके चिंतन में पर्याप्त जटिलता को समाहित करने की गुंजाइश है ।

चौथे आरोप की चर्चा वे इस रूप में करते हैं कि मार्क्स के सपनों का साम्यवाद मनुष्य की प्रकृति को अनदेखा करके गढ़ा गया है । मनुष्य स्वार्थी, संग्रही, आक्रामक और स्पर्धा करने वाला प्राणी होता है । इस बात को भुलाकर मार्क्स साम्यवाद का सपना बुनते हैं । इस आरोप को ईगलटन सिरे से खारिज करते हैं और बताते हैं कि असल में तो मार्क्स पर यह आरोप ज्यादा सही होगा कि वे भविष्य की कोई समग्र रूपरेखा नहीं खींचते । भविष्य को लेकर अटकल न लगाने की मार्क्स की आदत के पीछे ईगलटन एक सचेत कोशिश देखते हैं और वह यह कि ऐसा करने से वर्तमान में करणीय के प्रति उत्साह खत्म हो जाएगा । वे कहते हैं कि भविष्यकथन मार्क्सवादियों का नहीं पूँजीवाद के समर्थकों का पेशा है जो आपके धन की सुरक्षा की गारंटी लिए फिरते हैं । असल में मार्क्स के जमाने में ढेर सारे लोग भविष्य के प्रति अगाध आशा से भरी भविष्यवाणी किया करते थे क्योंकि उन्हें लगता था कि दुनिया को तर्क की ताकत से बदला जा सकता है लेकिन मार्क्स के लिए यह काम वर्तमान के ठोस संघर्षों के जरिए होना था । वे मानते थे कि वर्तमान में ही वे शक्तियाँ होती हैं जो भविष्य का निर्माण करती हैं । मजदूर आंदोलन का काम उन शक्तियों को मुक्त करना है ।

पाँचवें आरोप की चर्चा करते हुए वे मार्क्सवाद द्वारा हरेक समस्या को आर्थिक साबित करने के आरोप का उल्लेख करते हैं । मार्क्स के विरोधी कहते हैं कि कला, धर्म, राजनीति, कानून, नैतिकता, युद्ध आदि को अर्थिक व्यवस्था का प्रतिबिंब माना गया है और इस तरह मार्क्स जिस पूँजीवाद का विरोध कर रहे थे उसी के तर्क से ग्रस्त दिखाई पड़ते हैं । इसके बारे में जवाब देते हुए ईगलटन कहते हैं कि आर्थिक पहलू तो इतना स्पष्ट है कि कोई इसमें कैसे संदेह कर सकता है ! कुछ भी करने से पहले मनुष्य को खाना-पीना होता है । ‘जर्मन आइडियोलाजी’ में मार्क्स लिखते हैं कि पहला ऐतिहासिक कार्य हमारी भौतिक जरूरतों को पूरा करने के साधनों का उत्पादन है, इसके बाद ही कोई और काम किया जा सकता है । संस्कृति का आधार श्रम है । भौतिक उत्पादन के बिना कोई सभ्यता संभव नहीं । लेकिन मार्क्सवाद इतना ही नहीं है । वह कहता है कि इसी से अंतत: सभ्यता का स्वभाव तय होता है । वैसे भी मार्क्स के विरोधी इससे इनकार नहीं करते बस वे अपघटन पर आपत्ति प्रकट करते हैं । वे निर्धारकों की बहुलता पर जोर देते हैं । लेकिन क्या इस बहुलता के भीतर किसी एक की प्रधानता नहीं होती ? इसको मानने से कारकों की बहुलता खंडित नहीं होती । माना जा सकता है कि कोई परिघटना बहुत से कारकों का परिणाम होती है लेकिन उन सबको समान रूप से महत्वपूर्ण माना मुश्किल है । आपत्ति असल में किसी एक की प्रधानता पर नहीं बल्कि प्रत्येक प्रसंग में एक ही कारक की प्रधानता पर है । इतिहास में पैटर्न की मौजूदगी से किसी को कैसे इनकार हो सकता है ? मसलन यूँ ही तो नहीं हुआ कि फ़ासीवाद एक ही समय समूचे यूरोप में उदित हुआ । यह सही नहीं कि मार्क्स के लिए इतिहास का महावृत्तांत प्रगति का है बल्कि अगर है भी तो तकलीफ और कष्ट का है । असल में मार्क्स के लेखन में अन्य तमाम चीजों को आर्थिक में अपघटित नहीं किया गया है बल्कि राजनीति, संस्कृति, विचार, विज्ञान, विचार और सामाजिक अस्तित्व का स्वतंत्र इतिहास है, वे महज अर्थतंत्र की छायाएँ नहीं बल्कि उस पर भी प्रभाव डालने में समर्थ तत्व हैं । ‘आधार’ और ‘अधिरचना’ के बीच एकतरफ़ा संपर्क नहीं होता बल्कि पारस्परिकता होती है । बात यह है कि मनुष्य जिस तरह अपने भौतिक जीवन का उत्पादन करते हैं वह उनके द्वारा सृजित सांस्कृतिक, सामाजिक, राजनीतिक और कानूनी संस्थाओं का रूप तय करता है । ‘निर्धारित’ का अर्थ यहाँ सीमा निश्चित करना है ।

उत्पादन पद्धति सीधे खास तरह की राजनीति, संस्कृति या विचारधारा को पैदा नहीं करती, न ही एक ही तरह के विचारों को जन्म देती है । अगर ऐसा होता तो पूँजीवादी दौर में मार्क्सवाद का जन्म ही असंभव होता । यह कहना ठीक नहीं कि मार्क्स इतिहास की आर्थिक व्याख्या पेश करते हैं बजाए इसके उनके अनुसार इतिहास की चालक शक्ति वर्ग और वर्ग संघर्ष हैं जो मार्क्स के लेखन में आर्थिक से ज्यादा सामाजिक कोटि हैं । मार्क्स ‘सामाजिक’ उत्पादन संबंधों और ‘सामाजिक’ क्रांति की बात करते हैं । सामाजिक कोटि के रूप में वर्ग के निर्धारण में रीति रिवाज, परंपरा, सामाजिक संस्थाएँ, मूल्य मान्यता और सोचने की आदतें शामिल हैं । वे राजनीतिक परिघटना भी हैं । मार्क्स के लेखन से यह भी संकेत मिलता है कि जिस वर्ग का कोई राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं वह सही मायने में वर्ग ही नहीं है । वर्ग के वर्ग सचेत होने में कानूनी, सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक प्रक्रियाएँ मदद करती हैं । असल में तो मार्क्स की पूरी लड़ाई मनुष्य को महज आर्थिक बना देने वाली व्यवस्था से है । इसीलिए उनकी कल्पना के समाज में इतनी प्रचुरता होनी है कि मनुष्य को हर वक्त धन के बारे में न सोचना पड़े ।

छठें आरोप को वे यह कहकर सूत्रबद्ध करते हैं कि विरोधियों के अनुसार मार्क्स परम भौतिकवादी थे । उनके लिए मानवता की आध्यात्मिक उपलब्धियों का कोई मूल्य नहीं था । धर्म को तो उन्होंने खारिज ही कर दिया था । इस तरह उनके चिंतन में ही स्तालिन अथवा परवर्ती कम्युनिस्ट शासकों के अत्याचारों के बीज निहित हैं । उत्तर देते हुए ईगलटन कहते हैं कि मार्क्स इसके बारे में बहुत चिंतित नहीं थे कि दुनिया भौतिक तत्व से बनी है या आत्मा से । असल में तो वे मानते थे कि अमूर्त सरल और निर्गुण होता है जबकि ठोस समृद्ध और जटिल । अठारहवीं सदी ज्ञानोदय के भौतिकवादी चिंतकों के लिए अलबत्ता मनुष्य भौतिक दुनिया का यांत्रिक हिस्सा था । मार्क्स इस तरह की सोच को छद्म चेतना मानते थे क्योंकि यह मनुष्यों को निष्क्रिय स्थिति बना देता था । उनके दिमाग खाली स्लेट समझे जाते थे जिन पर बाहरी दुनिया के इंद्रिय संवेदन की छाप पड़नी थी और इसी से उसके वैचारिक दुनिया का निर्माण होना था । मार्क्स ने इस किस्म के भौतिकवाद से नाता तोड़ा और नए किस्म का भौतिकवाद विकसित किया । उन्होंने ममुष्य को निष्क्रिय मानने वाले भौतिकवाद के मुकाबले उसे सक्रिय तत्व मानकर अपनी बात शुरू की । उनके मुताबिक मनुष्य अपने आस पास के वातावरण को बदलने के क्रम में खुद को भी बदलता जाता है । बहुसंख्यक लोगों की सामूहिक व्यावहारिक गतिविधि के जरिए ही हमारे जीवन को शासित करने वाले विचारों को बदला जा सकता है । मार्क्स के लिए हमारे चिंतन के विषय हमारी ही गतिविधि से बनी दुनिया है । उनके लिए मनुष्य का भौतिक अर्थात शरीर और उसका चिंतन उतने अलग नहीं थे । मनुष्य की वह विशेषता है कि उसमें भौतिक और आध्यात्मिक को अलगाना संभव नहीं । आखिर हमारा मस्तिष्क मांस का एक लोथड़ा भी है । मनुष्य की चेतना को समझने के लिए उसके सार्वजनिक व्यवहार के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं होता ।

सातवाँ संभव आरोप उनके मुताबिक यह हो सकता है कि वर्ग की कोटि बेहद पुरानी पड़ गई है । यहाँ तक कि जिस मजदूर वर्ग को उन्होंने क्रांति और समाजवाद का पुरस्कर्ता माना था उसका भी रूप इतना बदल चुका है कि आज वह मार्क्स की नजर से देखने पर पहचान में ही नहीं आता । उत्तर में ईगलटन बताते हैं कि मार्क्सवाद वर्ग को महज शैली, हैसियत, आय, उच्चारण, पेशा आदि के आधार पर नहीं परिभाषित करता । यह इससे तय होता है कि किसी विशेष उत्पादन पद्धति में आप कहाँ खड़े हैं । मजदूर वर्ग के विलोप की कथा बहुत दिनों से सुनाई पड़ती रही है । वर्गों के संघटक तत्व हमेशा से बदलते रहे हैं । वैसे भी पूँजीवाद विरोधों को धूमिल करता है, पुराने विभाजनों को मिटाकर नए मिश्रित रूपों को जन्म देता है, सिर्फ़ शोषण के मामले में वह समानतावादी होता है । असल में समाजवाद से भी अधिक समता माल उत्पादन में होती है । मार्क्स इसी समरूपता के खिलाफ़ थे । आश्चर्य नहीं कि विकसित पूँजीवाद वर्गविहीनता का धोखा देता है । हालाँकि सबको पता है कि खाई लगातार चौड़ी हो रही है । मार्क्स के लिए मजदूर वर्ग का महत्व यह था कि वह पूँजीवादी व्यवस्था के भीतर मौजूद होता है, उसकी कार्यपद्धति को अच्छी तरह समझता है, राजनीतिक रूप से कुशल और सचेत समूह के बतौर संगठित कर दिया गया है, उसके सफल संचालन के लिए अपरिहार्य है लेकिन उसे बरबाद करने में ही उसका हित है । इसलिए वही उसे हस्तगत करके उसकी उपलब्धियों का सबके फ़ायदे के लिए इस्तेमाल कर सकता है । मजदूर वर्ग में मार्क्स का यकीन लोकतंत्र के प्रति उनकी गहन निष्ठा से उपजा था । मजदूर वर्ग को वे सार्वभौमिक मुक्ति का नायक मानते थे । वर्ग पर मार्क्स का जोर वर्ग की समाप्ति के लिए है । लेकिन इस काम को मजदूर वर्ग अकेले नहीं कर सकता । उसे अन्य वर्गों के साथ संश्रय बनाना पड़ता है । ध्यान देने की बात है कि प्रोलेतेरियत शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा में ऐसी महिलाओं के लिए प्रयुक्त शब्द से हुई है जो संतान पैदा करके ही राज्य की सेवा करती थीं । आज भी वे ही सबसे अधिक उत्पीड़ित हैं । इसी मायने में डेविड हार्वे कहते हैं कि आज दुनिया में सर्वहारा की तादाद अभूतपूर्व रूप से बढ़ गई है । मार्क्स के लिए सर्वहारा का मतलब सभी ऐसे लोगों से था जो पूँजीपति के हाथों अपनी श्रमशक्ति बेचने के लिए मजबूर होते हैं । इसे ऐसे भी कह सकते हैं कि सर्वहारा वे हैं जिन्हें पूँजीवादी व्यवस्था के पतन से सबसे अधिक फ़ायदा होता है । मजदूर वर्ग के खात्मे की घोषणा पहली बार नहीं हो रही है । सेवा, सूचना और संचार क्षेत्र के विस्तार को इसका लक्षण कहा जाता है लेकिन हम देख रहे हैं कि इनसे पूँजीवाद के बुनियादी चरित्र में कोई बदलाव आने की बजाए वह मजबूत ही हो रहा है ।

उनके अनुसार मार्क्स पर आठवाँ आरोप हिंसा को बढ़ावा देने का लगाया जा सकता है । इसी अर्थ में मार्क्सवाद और लोकतंत्र में तालमेल बैठना असंभव बताया जाता है । सही है कि क्रांति का विचार ही हिंसा और अराजकता की तस्वीर पैदा करता है । इसके विरोध में समाज सुधार की कल्पना की जाती है जो शांतिपूर्ण और क्रमिक दिखाई पड़ता है लेकिन अनेक समाज सुधार आंदोलन भी हिंसक रहे हैं । उसी तरह अनेक क्रांतियाँ भी उतनी हिंसक नहीं रही हैं । हिंसा तो प्रतिरोध की तीव्रता के कारण होती है । मार्क्सवादियों की नजर में किसी क्रांति की गहराई का पैमाना हिंसा नहीं होता । राजनीतिक सत्ता पर कब्जे की कार्यवाही तात्कालिक मामला हो सकती है लेकिन क्रांति आम तौर पर दीर्घकालीन प्रक्रिया होती है । जिसमें वैचारिक संघर्ष ज्यादा बड़ी भूमिका निभाता है ।

मार्क्सवाद पर जिस नवें आरोप की कल्पना की जा सकती है वह यह कि वह कठोर राज्य की वकालत करता है । निजी संपत्ति को खत्म करने के बाद समाजवादी क्रांतिकारी तानाशाहों की तरह आचरण शुरू कर देंगे । वे लोगों की निजी स्वतंत्रता का अपहरण कर लेंगे । क्रांति के बाद स्थापित शासनों में ऐसा देखा भी गया है । इस विश्वास का कोई आधार नहीं है कि भविष्य में वे भिन्न व्यवहार करेंगे । उदार लोकतंत्र में खामियों के बावजूद वह तानाशाही से बेहतर है । उत्तर देते हुए ईगलटन कहते हैं कि मार्क्स तो राज्य के ही विरोधी थे । उन्होंने ऐसे समय का सपना देखा था जब राज्य का लोप हो जाएगा । मार्क्स के विरोधी उनके सपने की खिल्ली उड़ा सकते है लेकिन उन पर तानाशाही को प्रोत्साहित करने का आरोप नहीं लगा सकते । असल में उनका सपना पूरी तरह हवाई नहीं था । साम्यवादी समाज में केंद्रीय प्रशासन के अर्थों में राज्य के विलोप की बात उनके कथन का सही अर्थ नहीं प्रतीत होती । किसी भी आधुनिक जटिल संस्कृति में उसकी जरूरत रहेगी । वे तो राज्य के हिंसा के औजार के बतौर इस्तेमाल के विरोधी लगते हैं । कम्युनिस्ट घोषणापत्र में उन्होंने कहा कि साम्यवाद में सार्वजनिक सत्ता का चरित्र राजनीतिक नहीं रहेगा । मार्क्स के समय ढेर सारे अराजकतावादी लोग थे लेकिन उनसे अलग मार्क्स ने कहा कि शायद इसी ऊपर बताए गए अर्थ में राज्य ओझल हो जाएगा । गायब होगा सत्ता का वह अंग जो सामाजिक दमन और एक वर्ग पर दूसरे वर्ग के शासन का उपकरण है । राज्य को मार्क्स निस्संग नहीं समझते और मानते हैं कि सामाजिक हितों के टकराव में वह पक्षपात करता है । खासकर पूँजी और श्रम के टकराव में तो उसकी पक्षधरता खुलकर सामने आ जाती है । राज्य आम तौर पर प्रचलित सामाजिक व्यवस्था में बदलाव की कोशिशों के विरुद्ध उसे सुरक्षा प्रदान करता है । अगर सामाजिक व्यवस्था अन्यायपूर्ण है तो राज्य भी अन्याय का साथ देता है । राज्य के हिंसक होने में शायद ही किसी को संदेह होगा मार्क्स तो बस यह बताते हैं कि यह हिंसा किसकी सेवा में की जाती है । मार्क्स राज्य के बारे में इस मिथक को ध्वस्त करना चाहते थे कि वह शांति और सहयोग को बढ़ावा देता है । राज्य को वे एक पृथक्कीकृत सत्ता मानते थे जो मनुष्य से अलग होकर उसके नाम पर उसके भाग्य का फ़ैसला करती है । मार्क्स खुद लोकतंत्रवादी थे और इसी नाते राज्य के तानाशाही तरीके के विरोध में थे । वैसे भी संसदीय लोकतंत्र, लोकतंत्र की छाया ही होता है । लोकतंत्र को वे महज सांसदों की संपत्ति बनाने की बजाए उसे समूचे समाज और उसकी संस्थाओं में समाया हुआ देखना चाहते थे । वे इसे आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्र तक विस्तारित करना चाहते थे । उनका कहना था कि राज्य को अल्पसंख्या का बहुसंख्या पर शासन होने की बजाए नागरिकों द्वारा अपने आप पर शासन का तरीका होना चाहिए । मार्क्स का मानना था कि राज्य नागरिक समाज से अलग हो गया है और दोनों के बीच विरोध पैदा हो गया है । इसी विरोध को खत्म करना और राज्य को समाज के निकट ले आना मार्क्स का लक्ष्य था । इसी को वे लोकतंत्र कहते और समझते थे जो उनके मुताबिक समाजवाद में अपनी पूर्णता में प्रकट होगा ।

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दसवें आरोप के बतौर वे इस राय का उल्लेख करते हैं कि पिछले चालीस बरसों के सारे क्रांतिकारी आंदोलन मार्क्सवाद की हद से बाहर हुए हैं । नारीवाद, पर्यावरण के आंदोलन, समलिंगी आंदोलन, पशुओं के अधिकार आंदोलन, वैश्वीकरण विरोधी आंदोलन, शांति आंदोलन आदि वर्ग की कोटि से बाहर गए और नई राजनीतिक सक्रियता को जन्म दिया । वाम धारा तो है लेकिन वह उत्तर वर्गीय उत्तर औद्योगिक संसार के लिहाज से चल रहा है । इसका जवाब देते हुए ईगलटन कहते हैं कि नए दौर का सबसे मजबूत आंदोलन तो पूँजीवाद के विरुद्ध खड़ा हुआ है, उसे मार्क्सवाद से विच्छिन्न कैसे माना जा सकता है । जहाँ तक नारीवादी आंदोलन के साथ मार्क्सवाद का संबंध है यह बहुत सीधा सादा नहीं रहा है । अगर कुछ पुरुष मार्क्सवादियों ने स्त्री प्रश्न को सिरे से नकारा है तो कुछ अन्य ने इसे अपनी सैद्धांतिकी में शामिल करने की कोशिश भी की है । कुल मिलाकर नारीवाद में मार्क्सवाद का योगदान महत्वपूर्ण रहा है । इसी वजह से अनेक नारीवादियों ने माना कि पूँजीवाद की समाप्ति के बिना नारी मुक्ति नहीं हो सकती । अन्य अब भी इस विश्वास पर कायम हैं कि शायद पूँजीवाद स्त्री उत्पीड़न का खात्मा कर देगा । हालाँकि पूँजीवाद के स्वभाव में ही मार्क्स स्त्री उत्पीड़न नहीं देखते लेकिन पितृसत्ता और वर्गीय सत्ता एक दूसरे के साथ इस कदर जुड़े हुए हैं कि एक की समाप्ति के बगैर दूसरे की समाप्ति की कल्पना मुश्किल नजर आती है । एंगेल्स की किताब ‘परिवार, निजी संपत्ति और राजसत्ता का उदय’ स्त्री आंदोलन का जरूरी पाठ बनी हुई है । क्रांति के बाद रूसी बोल्शेविकों ने स्त्री मुक्ति के सवाल को पूरी गंभीरता से उठाया और हल करने की कोशिश की । नारीवादी सवालों की तरह ही उपनिवेशवाद विरोधी संघर्षों में मार्क्सवादियों की भागीदारी सिद्धांत और व्यवहार के लिहाज से अतुलनीय रही है । सांस्कृतिक, लैंगिक, भाषाई, भिन्नता, अस्मिता आदि के सवाल राजसत्ता, भौतिक विषमता, श्रम के शोषण, साम्राज्यवादी लूट, जन राजनीतिक प्रतिरोध और क्रांतिकारी रूपांतरण से जुड़े हुए हैं । अगर आप एक से दूसरे को जुदा करेंगे तो सैद्धांतिक भ्रम के अलावा कुछ भी हासिल नहीं होगा ।

चढ़ाव उतार का जायजा

2011 में ही एरिक हाब्सबाम की ‘एबैकस’ से विशालकाय किताब ‘हाउ टु चेंज द वर्ल्ड’ प्रकाशित हुई । पुस्तक का उपशीर्षक है ‘टेल्स आफ़ मार्क्स एंड मार्क्सिज्म’ । साफ है कि इसमें मार्क्स और मार्क्सवाद की कहानी कही गई है । कुल दो खंडों की इस किताब के पहले खंड में मार्क्स और एंगेल्स के लेखन की विशेषताओं को आठ अध्यायों में विवेचित किया गया है । दूसरे खंड के आठ अध्यायों में मार्क्स एंगेल्स की मृत्यु के बाद की मार्क्सवाद की विकास यात्रा को निरूपित किया गया है । इसमें 1956 से 2009 तक लेखक द्वारा मार्क्सवाद के सिलसिले में लिखे लेखों को कुछ को थोड़ा बदलकर, कुछ को विस्तारित करके शामिल किया गया है । इसमें मार्क्स-एंगेल्स और मार्क्सवाद की शास्त्रीय परंपरा के लेखकों के अलावे सिर्फ़ ग्राम्शी को शामिल किया गया है । पुस्तक को पढ़ते हुए यह तथ्य दिमाग में रखना उपयोगी होगा कि वे मार्क्सवाद की लेनिनीय और चीनी परंपरा के प्रति थोड़ा ज्यादा ही आलोचनात्मक रवैया रखते हैं ।

पुस्तक के पहले अध्याय ‘मार्क्स टुडे’ में वे आज के दौर में मार्क्स की लोकप्रियता की एक वजह यह मानते हैं कि सोवियत संघ के आधिकारिक मार्क्सवाद के अंत ने मार्क्स को लेनिनवाद और लेनिन की प्रेरणा से बने समाजवादी निजामों के साथ जुड़ाव से मुक्त कर दिया और इस बात की गुंजाइश बनी कि आज की दुनिया के प्रसंग में मार्क्स की प्रासंगिकता को नई नजर से देखा परखा जाए । दूसरी वजह उनके अनुसार यह है कि 1990 के दशक में उभरने वाली वैश्विक पूँजीवादी दुनिया बहुत कुछ कम्युनिस्ट घोषणापत्र में पूर्वाशयित दुनिया की तरह नजर आई । यह चीज घोषणापत्र की 150वीं वर्षगाँठ के समय ही दिखाई पड़ने लगी थी क्योंकि उसी समय वैश्विक अर्थव्यवस्था में नाटकीय उथल पुथल शुरू हुई थी । उनका कहना है कि निश्चय ही इक्कीसवीं सदी के मार्क्स बीसवीं सदी के मार्क्स से अलग होंगे । पिछली सदी में मार्क्स की जो छवि बनी उसमें तीन तत्वों का योग था । पहला कि जिन मुल्कों में क्रांति एजेंडे पर थी और जिनमें नहीं थी वे अलग अलग थे । इसी से दूसरी चीज यह बनी कि मार्क्स की विरासत दो हिस्सों में बँट गई- सामाजिक-जनवादी और सुधारवादी विरासत तथा रूसी क्रांति से बनी क्रांतिकारी विरासत । तीसरी चीज यानी 1914 से 1940 के बीच उन्नीसवीं सदी के पूँजीवाद और बुर्जुआ समाज के विघटन से यह बात और भी उजागर हुई । तब लगा था कि पूँजीवाद शायद इस झटके से उबर नहीं पाएगा । वह उबरा तो लेकिन पुराने रूप में नहीं । दूसरी ओर सोवियत संघ में जो समाजवाद स्थापित हुआ वह अजेय लगता था । लेकिन ऐसी धारणा बनी कि उत्पादक शक्तियों का पूँजीवाद के मुकाबले तीव्र विकास ही समाजवाद की बरतरी साबित करेगा जो मार्क्स ने शायद नहीं सोचा था । मार्क्स ने यह नहीं कहा था कि पूँजीवाद उत्पादक शक्तियों का विकास करने में अक्षम हो गया है इसलिए खत्म हो जाएगा बल्कि उनके अनुसार अति उत्पादन से पैदा पूँजीवाद का आवर्ती संकट अर्थतंत्र को नहीं चला पाएगा और असमाधेय सामाजिक संकटों को जन्म देगा । सामाजिक उत्पादन के परवर्ती अर्थतंत्र को जन्म देना पूँजीवाद के बस की बात नहीं, ऐसा समाजवाद के तहत ही हो पाएगा । अब बीसवीं सदी का यह समाजवादी ‘माडल’ खत्म हो चुका है और दोबारा उसकी वापसी संभव नहीं है ।

फिर भी लेख के अंत में वे बताते हैं कि अनेक मामलों में मार्क्सवादी विश्लेषण अब भी प्रासंगिक है । पहला तो पूँजीवादी आर्थिक विकास की अबाध वैश्विक गति और अपने सामने आने वाली किसी भी चीज का नाश, भले ही वह इनसे कभी लाभान्वित हुआ हो मसलन परिवार का ढाँचा । दूसरे पूँजीवादी विकास के क्रम में आंतरिक ‘अंतर्विरोधों’ का जन्म जिसमें अनंत तनाव और तात्कालिक समाधान, वृद्धि के साथ जुड़े हुए संकट और बदलाव, अधिकाधिक वैश्विक होते अर्थतंत्र में भयावह केंद्रीकरण शामिल हैं । पुस्तक का दूसरा लेख मार्क्स से पहले के समाजवादियों से उनके संबंध को बताता है । इसके बाद मार्क्स के चिंतन में राजनीति की महत्ता बताने के बाद अलग अलग अध्यायों में उनकी और एंगेल्स की पुस्तकों- कंडीशन आफ़ वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, कम्युनिस्ट मेनिफ़ेस्टो, ग्रुंड्रीस आदि की व्याख्या करने के बाद मार्क्स-एंगेल्स के लेखन के प्रकाशन और संपादन की हालत का वर्णन किया गया है । कह सकते हैं कि किताब का पहला खंड बाद में वर्णित मार्क्सवाद के विकास की पूर्वपीठिका के बतौर लिखा गया है । पुस्तक का दूसरा खंड ‘मार्क्सिज्म’ के नाम से संकलित है और इसमें विभिन्न दौरों में मार्क्सवाद की उठती गिरती किस्मत पर प्रकाश डाला गया है ।

कहानी की शुरुआत से पहले ही यह साफ कर देना होगा कि इन दौरों में जहाँ 1880 से 1914 है वहीं दूसरा दौर सीधे 1929 से 1945 का है । बीच का 1914 से 1929 तक का दौर हो सकता है बिना किसी कारण के छोड़ दिया गया हो लेकिन लेनिन के बाद सोवियत संघ और अन्य मुल्कों में हो रहे विकास के प्रति लेखक की अरुचि की झलक भी इससे मिलती है । उनके वर्णन में तीसरा दौर 1945 से 1983 तक का है । इसके बाद का उतार का दौर 1983 से 2000 तक का है ।

दूसरे खंड की शुरुआत वे इस बात से करते हैं कि मार्क्स के समर्थन और विरोध में इतना कुछ लिखा जा चुका और लिखा जा रहा है कि मौलिकता का दावा करने वाली ढेर सारी किताबों में पुराने तर्कों का ही दोहराव नजर आता है । उनका कहना है कि शुरू में मार्क्स को पूरी तरह से खारिज करने की प्रवृत्ति नहीं थी बल्कि शैक्षिक जगत के लोग भी कुछ क्षेत्रों में उनके योगदान को मान्यता देते थे । वह तो जबसे उनके सिद्धांतों को अमलीजामा पहनाने की कोशिशें शुरू हुईं तबसे समर्थन और विरोध दोनों ही नई ऊँचाई पर जा पहुँचे ।

1880 से 1914 के बीच मार्क्सवाद के प्रभाव का विवरण देते हुए हाब्सबाम इस बात से शुरू करते हैं कि आम तौर पर मार्क्सवाद के समर्थक इतिहासकार जब मार्क्सवाद का इतिहास लिखने बैठते हैं तो सबसे पहले मार्क्सवादियों और गैर मार्क्सवादियों के बीच अंतर करते हैं और गैर मार्क्सवादियों को उसमें से निकाल बाहर करते हैं जबकि उनके अनुसार मार्क्स, फ़्रायड और डार्विन की तरह ही आधुनिक दुनिया की आम संस्कृति में समाए हुए हैं इसके बावजूद कि मार्क्सवाद के प्रभाव का गहरा रिश्ता मार्क्सवादी आंदोलनों से रहा है । यह प्रभाव दूसरे इंटरनेशनल के दिनों से ही महसूस होना शुरू हो गया था । 1880 और 1890 दशक के दौरान मार्क्स के नाम से जुड़े समाजवादी और मजदूर आंदोलनों का विस्तार हुआ और उसी के साथ इन आंदोलनों के भीतर और बाहर मार्क्स के सिद्धांतों का प्रभाव भी बढ़ा । आंदोलन के भीतर अन्य वामपंथी विचारधाराओं से मार्क्सवाद को होड़ करनी पड़ी और अनेक देशों में वह प्रमुख विचार के रूप में स्थापित हुआ । आंदोलनों से बाहर यह प्रभाव कुछ अर्ध और पूर्व मार्क्सवादियों पर दिखाई पड़ा । उनमें से मशहूर नाम इटली में क्रोचे, रूस में स्त्रूवे, जर्मनी में सोमबार्ट तथा शैक्षिक जगत के बाहर बर्नार्ड शा आदि हैं । इसी समय वह प्रवृत्ति भी दिखाई पड़ी जिसके तहत अनेक लोग मार्क्सवाद से अपना नाता तो नहीं तोड़ते थे लेकिन धीरे धीरे जिसे वे ‘जड़सूत्रवाद’ कहते थे उससे दूर चले जाते और उन्हें ही बाद में ‘संशोधनवादी’ बुद्धिजीवी कहा गया । मार्क्स के विचारों का प्रसार इस दौर में मुख्य रूप से यूरोप और प्रवासी यूरोपीयों में दिखाई पड़ता है । भारत में बंगाल के जो क्रांतिकारी 1914 से पहले सक्रिय थे वे बाद में मार्क्सवादी बने । हालाँकि यह दौर मुश्किल से तीस बरसों का है फिर भी हाब्सबाम ने इसे तीन चरणों में बाँटा है । पहला चरण इंटरनेशनल की स्थापना के बाद के पाँच छह बरसों का है जिसमें मार्क्सोन्मुखी समाजवादी और लेबर पार्टियों का जन्म और विस्तार हुआ । इन जन्म एक तरह से अप्रत्याशित रूप से विभिन्न देशों के राजनीतिक पटल पर हुआ और मई दिवस जैसे कार्यक्रमों के जरिए उनकी अंतर्राष्ट्रीय उपस्थिति भी महसूस हुई । पूँजीवाद संकट में था और मजदूर वर्ग में उसके विनाश की आशा पैदा हुई । इसी दौर में 1891 में जर्मन सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ने आधिकारिक रूप से मार्क्सवाद से अपने को जोड़ा । दूसरा चरण 1895 के बाद का है जब विश्व पूँजीवाद का प्रसार होने लगा । इस चरण में जन समाजवादी मजदूर आंदोलनों की बढ़त जारी रही लेकिन इसी समय राष्ट्रीय आधार पर इस आंदोलन में विभाजन भी दिखाई पड़े । 1905 से 1917 तक रूसी क्रांति की प्रक्रिया तीसरा चरण है ।

मार्क्सवाद के विकास का दूसरा दौर फ़ासीवाद के विरोध से निर्मित है जिसे 1929 से 1945 तक लेखक ने माना है । इस दौर में पश्चिमी यूरोप और अंग्रेजी भाषी इलाकों में मार्क्सवाद गंभीर बौद्धिक ताकत के रूप में उभरा । बहरहाल 1920 में क्रांति की लहर के सुस्त पड़ते ही तीसरे इंटरनेशनल का मार्क्सवाद पश्चिमी बौद्धिकों के लिए उतना आकर्षक नहीं रह गया । उसके मुकाबले त्रात्सकीवाद का ज्यादा आकर्षण दिखाई पड़ा लेकिन इसका वास्तविक आंदोलन की दुनिया में कोई खास दखल नहीं बना । कम्युनिस्ट पार्टियाँ ज्यादातर तीसरे इंटरनेशनल से प्रभावित थीं और उनके बुद्धिजीवी सदस्य इस स्थिति से असहज महसूस करते थे । इसी कारण पश्चिम में मार्क्सवाद का विकास बहुत कुछ उसकी मुख्य परंपरा से हटकर हुआ । सिर्फ़ साहित्य और कला के क्षेत्र में एक तरह का वामपंथी अंतर्राष्ट्रीय सहकार मौजूद रहा क्योंकि उसमें सैद्धांतिक प्रश्नों से इतर उस समय के आंदोलनों के प्रति भावनात्मक प्रतिबद्धता अभिव्यक्त हुई । इस क्षेत्र में ‘आधुनिकता’ को लेकर बहस में आधिकारिक वाम के सामने बौद्धिकों ने समर्पण नहीं किया । अपनी देशी बौद्धिकता से कटे बगैर ये बुद्धिजीवी अंतर्राष्ट्रीय वाम संस्कृति के सहभागी बने । फ़ासीवाद विरोध एक ऐसा विंदु था जिसने दुनिया भर में वामपंथी लेखकों कलाकारों को एकजुट किया और उनकी स्वीकार्यता बढ़ाई । इसका बड़ा कारण इस दौर की महामंदी (1929-1933) भी थी । पूँजीवादी संकट के मुकाबले नियोजित समाजवादी उद्योगीकरण ने सोवियत संघ की लोकप्रियता में इजाफ़ा किया और हिटलर को लेकर पूँजीवादी मुल्कों के संदिग्ध रुख के मुकाबले उसकी पराजय में रूस की भूमिका ने तो और भी बड़े पैमाने पर उसके प्रशंसक पैदा किए । 1936 में स्पेनी गणतंत्र के समर्थन में उठी लहर न होती तो वह लड़ाई अनजानी ही रह जाती । फ़ासीवाद के विरोध में कम्युनिस्टों की अग्रणी भूमिका ने उन्हें विश्व शांति आंदोलन में अगुआ बना दिया । इसी दौर में मार्क्सवाद का प्रसार पिछड़े मुल्कों खासकर चीन और भारत में हुआ जो आगामी विकास के लिहाज से महत्वपूर्ण था ।

मार्क्सवाद के प्रभाव का तीसरा दौर हाब्सबाम के अनुसार 1945 से 1983 तक है । इस दौर के आते आते अधिकांश यूरोप में समाजवादी और मजदूर आंदोलनों में मार्क्स के विचार सबसे बड़े प्रेरणा स्रोत हो गए और लेनिन तथा रूसी क्रांति की मार्फ़त बीसवीं सदी की सामाजिक क्रांतियों के लिए चीन से पेरू तक अंतर्राष्ट्रीय दिशा निर्देशक हो गए । दुनिया की एक तिहाई आबादी उन देशों में रहती थी जिनकी सरकारें मार्क्स के विचारों को अपना आधिकारिक मत घोषित करती थीं । इसके अलावा बाकी दुनिया में राजनीतिक आंदोलनों के जरिए ढेर सारे लोग मार्क्सवाद से जुड़े हुए थे । मानवता को प्रभावित करने के मामले में यह हैसियत पहले सिर्फ़ महान धर्मों के संस्थापकों को प्राप्त थी । इस क्रम में उनके विचारों में काफी बदलाव भी किए गए लेकिन उनके मूल निश्चय ही मार्क्स के चिंतन में मौजूद थे । मजे की बात यह है कि उनके नाम पर स्थापित सभी शासन उदार लोकतंत्र के विपरीत लक्षणों से युक्त थे । लेकिन मानवता के इतिहास में यह कोई नई बात नहीं है । बदलाव के सभी प्रस्तोताओं के विचार समय के साथ बदलते हैं । कहने की जरूरत नहीं कि इसाइयत या इस्लाम के नाम पर चल रहे शासन इनके विचारों से कितना दूर हैं । आज के एडम स्मिथ भी 1776 के एडम स्मिथ नहीं हैं । मार्क्स के विचारों का यह दबदबा सौ सालों के व्यापक आंदोलनों का नतीजा है । उनके विचारों का यह प्रभाव पूर्व सामाजिक जनवादी पार्टियों द्वारा उनके प्रभाव से इनकार, सोवियत संघ की बदनामी और स्तालिन के विरुद्ध रूस में ही शासन द्वारा संचालित अभियान के बावजूद बना हुआ है । मार्क्सवाद की इस स्थिति के तीन संभव कारण वे गिनाते हैं । पहला कि मार्क्स की मृत्यु के बाद से ही यह यथास्थिति के लिए खतरनाक मजबूत राजनीतिक आंदोलनों के साथ और 1917 के बाद खतरनाक मानी जाने वाले सत्ताओं के साथ किसी न किसी तरह से जुड़ा रहा है । दूसरे कि मार्क्सवाद यथास्थिति का विरोध करते हुए भी एक बौद्धिक आंदोलन रहा है और 1970 दशक के बाद यथास्थिति का विरोध करके उसकी जगह ‘नया’ समाज या कोई आदर्श ‘पुराना’ समाज बनाने का सपना देखने वाले सभी ‘समाजवाद’ को ही अपना लक्ष्य घोषित करते रहे हैं । पुराने काल्पनिक समाजवादों में से कोई भी मार्क्स की मृत्यु के एक साल बाद नहीं बचा रह गया था इसलिए समाजवाद की कोई भी आलोचना मार्क्सवाद की ही आलोचना मानी जाने लगी । तीसरा कारण बीसवीं सदी में बुद्धिजीवियों में इसके प्रति जबर्दस्त आकर्षण रहा है । उच्च शिक्षा में बढ़ोत्तरी के साथ इनकी संख्या अभूतपूर्व रूप से बढ़ती गई और उनमें थोक के भाव मार्क्सवादी हुए । बहरहाल 1945 के बाद पचीस सालों तक तीन परिघटनाओं का मार्क्सवाद संबंधी बहस पर प्रभाव रहा है-

1) 1956 के बाद सोवियत संघ और अन्य समाजवादी देशों के बीच के रिश्ते 2) ‘तीसरी दुनिया’ और खासकर लैटिन अमेरिकी देशों की घटनाएँ और 3) 1960 दशक के अंतिम दिनों में औद्योगिक देशों के छात्रों की हड़तालें और उनका राजनीतिक रूप से क्रांतिकारी रुख पकड़ना ।

इसी दौर में रूस की घटती लोकप्रियता के बरक्स चीन खासकर माओ का प्रभाव बढ़ा । क्रमश: क्रांति का गुरुत्व केंद्र ‘अल्प विकसित देशों’ या ‘तीसरी दुनिया’ की ओर खिसकता गया । इन देशों का समाजवाद में रूपांतरण सैद्धांतिक रूप से भी ज्यादा बड़ा सवाल बनता गया । इस दौर में पहले के दोनों दौरों की तरह कोई अंतर्राष्ट्रीय कम्युनिस्ट केंद्र नहीं उभरा ।

तीसरा दौर वे 1983 से 2000 तक मानते हैं जब उनके मुताबिक मार्क्सवाद में उतार आया हालाँकि सदी के अंतिम छोर पर उन्हें फिर से एक उभार दिखाई दे रहा है । असल में जो हुआ उसके लक्षण 1980 दशक में ही दिखाई देने लगे थे जब पूर्वी यूरोप के समाजवादी शासनों में संकट प्रकट होने लगे और चीन ने राह बदलनी शुरू की । हालाँकि रूस पर इनकी निर्भरता इतनी अधिक थी कि सोवियत संघ में कम्युनिस्ट पार्टी का शासन ढहते ही पूर्वी यूरोप के मुल्कों में ताश के पत्तों की तरह शासन बिखरने लगे और चीनी शासन को रूस के प्रभाव से कोई सहानुभूति नहीं थी फिर भी पूरी दुनिया के वामपंथियों को इससे झटका लगा क्योंकि समाजवाद के निर्माण का यही एकमात्र गंभीर प्रयास था । वह पूँजीवाद के पुराने और नए केंद्रों की शक्ति को प्रतिसंतुलित करने वाली महाशक्ति था । उसके बाद तो जनाधार वाले वे ही शासन बचे जो ‘तीसरी दुनिया’ में थे ।

मंदी ने दी नई ताकत

उसके बाद तो अमेरिका में खड़े हुए ‘अकुपाई वाल स्ट्रीट’ आंदोलन के साथ ही ढेर सारे लोग मार्क्सवाद की ओर खिंचे आ रहे हैं । मसलन 2012 में डेविड हार्वे की किताब ‘रेबेल सिटीज’ प्रकाशित हुई है जिसमें यूरोप, अमेरिका और दुनिया के अन्य तमाम बड़े शहरों में फूट पड़ने वाले आंदोलनों के नगर आधारित होने के मद्दे नजर शहर के क्रांतिकारी महत्व को समझाने की कोशिश की गई है । हमारे देश में उद्योगीकरण के बाद मजदूर आंदोलन तो जरूर शहर केंद्रित रहे लेकिन नए दौर में बढ़ते हुए नगरीकरण की पृष्ठभूमि में इस परिघटना पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए ।

हाल के दिनों में मार्क्सवाद की ओर रुझान को देखते हुए एक फ़्रांसिसी मार्क्सवादी एलेन बादू ने इस समय को मार्क्सवाद के उभार का तीसरा दौर कहा है । इसके पहले के प्रथम दौर को वे 1792 में फ़्रांसिसी गणतंत्र की स्थापना से लेकर 1871 में पेरिस कम्यून के पतन तक मानते हैं । दूसरा दौर 1917 की रूसी क्रांति से शुरू होकर 1976 में चीन में माओ की सांस्कृतिक क्रांति के खात्मे तक चला था । नई पीढ़ी के लोगों को बदलाव की प्रक्रिया को तमाम किस्म के आंदोलनों के क्षणिक उभार के आगे स्थायी प्रतिरोध की ओर ले जाने का रास्ता मार्क्सवाद के भीतर नजर आ रहा है ।

यूरोप के कुछ देशों में नए तरह की वामपंथी राजनीति के उभार के कारण भी संगठन और आंदोलन के मामले में फिर से सुधारवादी और संघवादी आवाजें सुनाई पड़ने लगी हैं । अनेक लोग जो विरोध की उत्तर आधुनिक धारा के साथ चले गए थे वे भी नए उत्साह के साथ वापसी कर रहे हैं लेकिन स्वभावत: अपने नए और भ्रामक सूत्रीकरणों के साथ । इसीलिए दोबारा सावधानी के साथ अपने को मार्क्सवादी कहने वालों के प्रति नए सिरे से आलोचनात्मक नजरिया अपनाने की जरूरत है ।

साभार- बनास

courtesy Ranjan Anand

courtesy Ranjan Anand

युवा आलोचक गोपाल प्रधान बीएचयू और जेएनयू से शिक्षित-दीक्षित हुये, छात्र-जीवन से  ही वामपंथी-सांस्कृतिक कार्यकर्ता के रूप में सक्रिय रहे हैं। उनकी प्रमुख पुस्तकें  छायावादयुगीन साहित्यिक वाद-विवाद, हिन्दी नवरत्न और चेखव हैं। फिलहाल अंबेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली में अध्यापनरत हैं। उनसे gopaljeepradhan@gmail.com पर संपर्क संभव है।

Hrishikesh Mukherjee’s Parallel Cinema: A fraternal critique of Nehruvian socialism- Dhiraj K Nite

By Dhiraj K Nite

hrishikesh

Hrishikesh Da (1922-2006) was a cinematic craftsman known for pioneering a middle-path between the melodrama and extravagance of mainstream cinema, on the one hand, and, on the other, the shrieking realism of art cinema. He was the most successfulpractitioner of the product of this variously called middle cinema or parallel cinema in the Bollywood. The following commentary briefly surveys his cinematic expression with a view to question the conventional wisdom that parallel cinema was an expression of the Nehruvian socialist ethics on celluloid. It reveals the extent ofHrishiDa’s cinematic efforts as a fraternal critique of the claim made by such ethics, and his technical improvisation in achieving this on celluloid.

Nehruvian socialism, the popular assumption suggests, informed and inspired a variant of cinematic craft, called Parallel cinema. The latter chose the realsocial issue(opposed to melodramatic fantasy) and its socio-political context asa subject of its narrative; adopted a socialist perspective; and minimised crash commercialism in its presentation. Unlike the so-called art cinema, parallel cinema kept an eye open to the demand of Box office. Its cast, location and screenplay, therefore, charged higher costs.

 

The cinemagoer saw HrishiDa continuously developing this particular craft by directing and editing a large number of Hindi movies from the late 1950s and in the subsequent four decades. The prestigious Dada SahebPhalke Award, awarded to him in 1999, was the recognition of his mettle. The popular assumption about his endeavour does not help us understand how distinctive was HrishiDa as a practitioner of this craftsmanship? Nehruvian socialism inspired only certain content of his story. What about his cinematography, narrative style, screenplay, and other aspects of cinema production? He was after all not dependent on theNational Film Development Corporation. He looked out for producers, and took into account the box office. He worked with a specific principle and improvised a specific technique in doing so. What were these?

Narrative strategy

The story often unfolded in flash-back in his presentation. It was only a small element of his narrative strategy in his earliest directorial venture Anuradha (1960). Soon it was to become a hallmark of his craft. It marked a break from his contribution as an assistant to the production by directors,like Bimal Roy. He effectively harnessed the power of this technique in acclaimed movies, like Satyakam (1969: a righteous person), Anand (1970: a wholesome life taller than astronomical time), NamakHraam (1973: a phenomenological path of self-realisation), and Bemisal (1982: the significance of platonic love and inter-subjectivity). His presentation of story in flash-back generated curiosity between viewers. It did not have much emphasis on thrill at the cost of explanation offered for the main plot, and of an idealised resolution prescribed by the director for the problem which the plot concerned itself with. His details related to explanation and resolution, avoided all possibility of turning out preachy. These drew viewers to a secular logic of social development and human action. There, the divine intervention or pursuit did not have constitutive role to perform: which was contrary to the hallmark of commercial cinema. Hrishi Da was at his best in delivering this in movies, like Satyakam and NamakHraam. He lost this touch in his last directorial venture, Jhooth Bole KauwaKaate (1998). The latter appeared as a critique of the new love story of the defiant adolescenton celluloid. Here, Hrishi Da underscored the decision of two adult girl and boy to persuade their parents for the recognition of affectionate relationship between the couple. Here, no explanation was offered for such engaging behaviour of protagonists as opposed to those of defiant adolescents. Hence, viewers found the movie preachy and lacking details. What accounted for this slippage in his technique? Seemingly, the Bollywood saw a shift in favour of functionalism in the 1990s. The ageing Hrishi Da seems to have been a victim of it.

His narrative worked on wholesome comedy in family movies, like Bawarchi(1972), ChupkeChupke (1975) and GolMaal (1979).In his other movies the comedy was a subplot. These movies were acclaimed for noticeable absence of double-meaning dialogue. The latter has taken sway in many current comedy ventures.

Screenplay

His screenplay concerned itself with the main pursuit of Hrishi Da, i.e., explanation for and characterisation of protagonists in his movies. He was at par excellence in Anupama (1966) and Bemisal.The former movie depicted the meaning of life lived through by a reticent, traumatised girl in the midst of plenty. The statement was that pecuniary opulence does not amount to spiritual elevation. In the latter, the sources of vice and virtue in humankind were under his scanner. In his couple of early movies some houses, dwellings and most actors were the same. Locales were as per story and modest budget. Dialogue was sharp, focused, straightforward and Poetic. Lyrics received greater attention than the accompanying instrumental composition. Stories drove lyrics and songs. Therefore, listeners have not remembered songs of his particularly 60s’ movies. On top of everything, he eschewed from absorbing the new pulse of viewers for expensive scenic locale in the 90s, in his comedy venture Jhooth Bole…

Cinematography and film-editing

Cinematography is usually the shoddiest feature in Bollywood. Hrishi Da began his career as a cameraman in the 1940s. Unlike many of his colleagues, he relied on close-up shots, still and straight-angled camera. The former necessitated the fact that the director persuades actors to mould themselves in his frame. Hence, actors were able to exude emotion through facial contortion, voice modulation, and body gesture. He was remarkable in his effort. He worked with actors, like Dharmendra, Sharmila, Amitab, and AmolPalekar. All of them later became well known for their superlative talent. At the stage they joined in the venture of Hrishi Da, they were between the youngsters and bereft of stardom.Notably, Amitab performed some of his socially memorable roles in HrishiDa’s company. One can readily recall Anand, NamakHaraam, Abhiman (1973), Mili (1975), and Bemisal, where Amitab was shore off of his image of angry young man.

Hrishikesh Mukherjee was indisputably the ablest cinematic editor of his time. He performed this job in a large number of movies, including those of Bimal Roy from the 1950s. Here, he was succinct. Once again, his concern for explanation and characterisation defined his editing. His all filmfare awards recognised this particular skill, including for Do BighaZamin(1953: the everyday ways of resistance to depeasantisation and land enclosure) andMadumati(1959) and his greatest directorial venture Anand.

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Ideological Bent

Let’s see how far Nehruvian socialist he was in his details and plot!The characters invariably belonged to the professional class in his narrative. His characters embodied the spirit of new, enterprising, advancing humankind. The latter were a social, public person. Their ideal was an attachment to social progress. Indeed, the latter defined national progress.Such ideal meant in daily life the ethics of social service, fraternal relationship between classes and gender, welfare of underprivileged, and a pleasant contented life for everyone. His movie Anuradha epitomised all of these. Seemingly, Hrishi Da lost this touch in his commercially successful venture Bemisal. Here, Amitab (Dr Sudhir Roy) committed murder of an honest nurse to save dignity of the family of his friend cum well-wisher. But, his image was extenuated from it, and the soul turned out pious without any remorse. Sudhir’s crime was bracketed, like melodramatic revenge committed upon an anti-social person. This was a singular preposterous lapse in his directorial venture. One can see it as his vulnerability to viewers’ appreciation for a hero in negative character on the celluloid in the 1970s on.

The resolution proposed in his movies was pre-eminently an individualist initiative of the protagonist. The character appeared as uniquely eccentric on this front in the movie Satyakam.NamakHraam was possibly an exception, where the source of change lied in social collectivity and ideological awareness. The latter was a schema in his work. Hence, one finds characters evolving, and this very process stands out as the main plot.

He was far from being any propagandist and apologist of Nehruvian socialism. He zeroed in on exposing the perpetuation of many of those problems, which the Nehruvian polity claimed to uproot. Viewers readily remember Anuradhafor the missing medical service in the countryside; Anupamafor bourgeois parental authoritarianism; Satyakamfor the persistence of rotten administrative and cultural life in the form of corruption and ostracization; NamakHraamfor the perpetuation of class exploitation and bourgeois chicanery. His protagonists were dialectical antithesis of those problems, and of the limitation of Nehruvian polity. His characters in Anand and Mili (1975) represented the extraordinary human spirit how to live a full life and radiate envious charm in the surrounding.In this sense, it is folly to reduce HrishikeshDa’s parallel cinema to the alter-ego of Nehruvian socialism. Nor the latter can help us appreciate the craft of parallel cinema and distinctiveness of HrishiDa’s craftsmanship in the very terrain. 

 Dhiraj k NiteDhiraj Kumar Nite, A Social Scientist, an emerging film critic,  University of Johannesburg,  Ambedkar Univeristy Delhi.

फिल्मी जादू, फिल्मी धोखा, फिल्मी वास्तविकता -तत्याना षुर्लेई

By तत्याना षुर्लेई

सौ साल के बाद भारतीय सिनेमा अपने बारे में क्या कहता है!!

भारतीय और पश्चिमी सिनेमा में सिद्धांततः कोई बड़ा अंतर नहीं है। दुनिया के हर कोने में सिनेमा का जन्म एक ही चीज के लिए हुआ है- मनोरंजन के लिए। चलती हुई तस्वीरें, जो दुनिया के चित्र खींचने के लिए खोजी गयी, जल्द ही नयी-नयी कहानियाँ बुनने-कहने का बहुत अच्छा औजार बन गयी। भारतीय और पश्चिमी सिनेमा के इतिहास के बीच एक बड़ा अंतर सिनेमा के जन्म के साल को लेकर है। पश्चिम में सिनेमा के सौ साल के वर्षगाँठ की गणना पहली फिल्म दिखाने के बाद से ही हो गयी, जो की एक डाक्यूमेंट्री थी,  यही गणना भारत में पहली काल्पनिक कहानी दिखाने के बाद से होती है। इसका मतलब यह है कि भारतीय सिनेमा अपने दर्शकों के लिए सब से पहले एक मजेदार झूठ है, जिसके लिए वास्तव से बिलकुल अलग दुनिया दिखाना उसका पहला कर्तव्य है। जैसे मैं लिख चुकी हूँ, ‘चलती हुई तस्वीरें या सपनों का कारखानाः सिनेमा क्या है?’ लेख में मैंने बताया था, पश्चिम के लिए, जिनके लिए सिनेमा प्लेटो (Plato का गुफा होता है। उनके लिए फिल्म की दुनिया वास्तव से थोड़ी बेकार होती है। तथापि भारतीय, ‘जिनके लिए वास्तव सिर्फ माया होता है’, सिनेमा में सच ढूँढ़ते हैं। जो भी कारण हो इस साल सिनेमा के वर्षगाँठ को मनाने का, कुछ सारकथन कहने के लिए भारतीय सिनेमा का यह सौंवा साल एक बहुत ही अच्छा मौका है। सिनेमा का त्योहार और शताब्दी-वर्ष ऐसे ही मौके हैं जिनके बहाने सौ साल के निष्पादनों के बारे में सोचने की जरूरत है। पर सिर्फ इन्हीं बारे में नहीं, सिनेमा के भविष्य के बारे में भी। सिनेमा ही बार-बार नहीं बदला है, सारा समय ही बदल रहा है – न सिर्फ नए-नए आविष्कारों के साथ, जिनकी मदद से वह चलता है, बल्कि अपने नए-नए दर्शकों की सहायता से भी, जो कभी भी कुछ नया और अक्सर साहसिक भी देखने के लिए तैयार रहते हैं। लगता है कि सिनेमा आजकल खुद अपने विकास के बारे में सोच रहा है और अपने दर्शकों पर हुए प्रभाव के बारे में भी। सिनेमा का इतिहास लंबा नहीं है लेकिन जो है वह बहुत ही विविधतापूर्ण है इसलिए यह कोई संयोग नहीं है कि सौ साल की वर्षगाँठ के करीब कई ऐसी फिल्में बनाई र्गइं जो अपने बारे में कुछ महत्त्वपूर्ण बातें कहना चाहती हैं।roadmovie

अपने बारे में बताना कोई नई चीज नहीं है – पश्चिम में ही नहीं, भारतीय सिनेमा में भी। फिर भी, आजकल इस विषय को हम पिछले सालों के मुकाबले से ज्यादा देख सकते हैं। आत्मालाप सिनेमा के शुरू में काल्पनिक विषयों के साथ पैदा हुआ लेकिन सच यह है कि इसका विकास आधुनिक समय से संबंधित है। पुराने जमाने में इस पर इतना ध्यान नहीं दिया जा रहा था, क्योंकि एक प्रकार का आत्मालाप सिनेमा के आसपास कहीं हमेशा मौजूद रहता था। शायद सिनेमा के शुरू में आत्मालाप के लिए इसलिए स्थान नहीं था कि इतिहास लंबा न होने के कारण किसी सारकथन की जरूरत नहीं थी। आत्मालाप अलग-अलग रूपों में होता है और इसका अच्छा इस्तेमाल सिर्फ अग्रणी सिनेमा जान-बूझकर कर रहा था। शेष सिनेमा को हमेशा यह बात अच्छी तरह मालूम थी कि उसके द्वारा बनाई हुईं फिल्मों की दुनिया को यथार्थ से अलग नहीं होना चाहिए। इसलिए इन दोनों दुनियाओं के अंतर, जो कभी-कभी होता था, और इनके बीच में जो उसका हस्तक्षेप किया जा रहा था, इसे हमेशा छुपाने की कोशिश की जाती थी। दर्शकों को देखी हुई दुनिया वास्तविक लगती है लेकिन इस वास्तव में कोई न कोई धोखा तो होता ही है। और इस धोखे के मदद से देखी हुई इमारत कभी सिर्फ स्टुडियो में बनाई हुई एक दीवार का टुकड़ा है और कोई सच्ची जगह नहीं है – जैसे पोलैंड के पहाड़ कुणाल कोहली की ‘फना’ में कश्मीर में बदल गए या संजय लीला भंसाली की ‘हम दिल के चुके सनम’ में बुदापेस्त को इटली के एक शहर की भूमिका निभानी पड़ी। उन फिल्मों में ऐसी ही स्थिति होती है जो सिर्फ फिल्मों के बारे में एक कहानी दिखाते हैं और उनकी सच्चाई भी अधूरी होती है। वे कभी कुछ ज्यादा दिखाते हैं लेकिन उतना नहीं और अपने बारे में एक प्रकार के धोखे में रखते हैं। भारतीय सिनेमा के इतिहास में ऐसी फिल्मों की बहुतायत है पर इनमें से तीन मुझे दिलचस्प लगती हैं – देव बेनेगल की ‘रोड मूवी’, पुनीत मल्होत्रा की ‘आइ हेट लव स्टोरीज’ और मिलान लूथरा की ‘डर्टी पिक्चर’। इस चुनाव का पहला कारण यह है कि तीनों फिल्में सौवीं वर्षगाँठ के आसपास बनाई गई हैं (2009, 2010 और 2011 में), तीनो फिल्में सिनेमा के बारे में है और हर एक में दिखाया हुआ सिनेमा कुछ अलग है। इसमें आश्चर्यचकित होने की कोई बात नहीं है – इसलिए कि हर व्यक्ति के लिए सिनेमा कुछ अलग है। किसी को कोई फिल्म अच्छी लगती है, तो किसी को कोई और निर्देशक या अभिनेता पसंद है। इसलिए यह कहना बहुत मुश्किल है कि सिनेमा में सबसे महत्त्वपूर्ण क्या है और फिल्मों का सौ साल में कैसा विकास हुआ। तथापि संभवतः इन तीन फिल्मों के मदद से हमको पता चल जाएगा कि फिल्मों के विचार में भारतीय सिनेमा में सबसे महत्त्वपूर्ण क्या है।

सिनेमा के शुरू में किसी को विश्वास नहीं था कि यह नया आविष्कार, जो चलती हुई तस्वीरें दिखा सकता है, इतना प्रचलित हो जाएगा कि दुनिया के सारे कोनों में पहुँच जाएगा। आज इसमें कोई शक नहीं है कि सिनेमा के बिना हमारी जिंदगी कुछ अधूरी लगती है। दुनिया में शायद कई लोग ऐसे मिल जाएंगे जिन्होंने कभी कोई अखबार या किताब नहीं पढ़ी हो, लेकिन ऐसा व्यक्ति ढूँढ़ना बहुत मुश्किल है जिसने कभी कोई फिल्म नहीं देखी हो। फिर भी शुरू में, जब सिनेमा का विकास मेलों में सस्ते सर्कस के तंबुओं में हो रहा था, पढ़े-लिखे लोग सिर्फ चोरी-चुपके फिल्में देखते थे। पोलैंड के फिल्म सिद्धांतकार करोल इजिकोवस्की (Karol Irzykovsky) ने इस समय पर लिखा था कि सभी लोग फिल्में देखने जाते हैं, लेकिन इसके बारे में बात करने में उनको शर्म आती है। क्यों? इसलिए कि इस समय के सिनेमा के दर्शक सीधे-सादे, अनपढ़ लोग थे जो फिल्मों की मदद से अपने दुख-निराशा को कुछ समय के लिए भूल सकते थे। असल में फिल्मों की शुरुआत ऐसी अद्भुत स्थिति ढ़ूँढने से ही संबंधित है जो वास्तविक दुनिया में कभी नहीं मिलती है। भारत में फिल्मों के जनक दादा साहेब फाल्के और यूरोप में जॉर्ज मेलिएस ऐसे ही जादूगर थे जिन्होंने अपनी फिल्में बड़े-बड़े सपनों की तरह बनाईं। ऐसे सपने जहाँ सच्चा प्यार होता है, सत्य हमेशा जीतता है, लोग चांद के पास जा सकते हैं और लोगों की मदद करने के लिए भगवान जमीन पर आते हैं।

देव बेनेगल की फिल्म देखते हुए ऐसा लगता है जैसे आप सिनेमा के दर्शकों के बीच पहुँच जाते हैं, जैसे सिनेमा के दर्शक ही विषय हैं। ‘रोड मूवी‘ का नायक, जिसका नाम विष्णु है, रेगिस्तान में ट्रक चलाता है। वह जानता है कि उसकी गाड़ी एक गतिशील सिनेमा है लेकिन यह उसके लिए इतना महत्त्वपूर्ण नहीं है। विष्णु के पास आईपॉड है, मोबाइल फोन भी है; घर पर उसके पास कंप्यूटर होगा और उसमें होगी दुनिया की सारी फिल्में। ऐसा पुराना और बेकार सिनेमा उसको शायद थोड़ा हास्यास्पद भी लगता है लेकिन विष्णु का विचार बदलेगा जब वह रेगिस्तान में रहनेवाले लोगों से मिलेगा। उन लोगों से जिनका हर दिन का काम पानी ढूँढ़ना है। विष्णु अपनी गाड़ी की खिड़की से और फिल्म के दर्शक अपनी जगहों से गाँव वालों के थके हुए चेहरे देख सकते हैं। जब नायक के रास्ते में मेला ढूँढ़ने वाला अजनबी आदमी आता है, तो विष्णु को उस आदमी के मदद से पता चलता है कि उसकी पुरानी फिल्में कुछ समय के लिए गरीब लोगों के जीवन को बदल सकती हैं। सब चेहरे जो पहले उदास और थके थे अब बिल्कुल अलग लगते हैं। फिल्म का जादू सब लोगों को प्रभावित करता है।

फिल्म के सबसे सुंदर दृश्य में बूढ़े आदमी की मेले के बारे में भविष्यवाणी सच हो जाती है और जिस जगह पर ट्रक फिल्मों को दिखाने के लिए तैयार है, वहाँ मेला का रेला भी आता है। रेगिस्तान का यह मेला एक बड़ी मरीचिका का रूप ले लेता है, पता नहीं यह सच है या विष्णु और उसके दोस्त नशे में और शायद प्यास से बेहोश हैं। मेला रेगिस्तान में रहने वालों का एक बड़ा सपना है जिसकी शुरुआत विष्णु की फिल्मों ने की है। रूसी दर्शनशास्त्री मिखाइल बाख्तिन (Mikhail Bakhtin) ने मध्ययुगीन यूरोप के कार्निवाल के बारे में लिखते समय अनुभव किया कि बड़े त्योहारों-महोत्सवों के समय रोजमर्रा के सारे नियम-कायदों की हालत पतली हो जाती हैं। साहित्य और फिल्म भी कभी-कभी इसी स्थिति का, इस नियमबदल का इस्तेमाल करते हैं। जिससे इनकी दुनिया की हालत भी उलटी हो जाती है, जैसे  रोड मूवी में। पागल रंगरेलियों की शुरुआत तो सिनेमा से होती है लेकिन बाख्तिन  वाले आनंदोत्सव की तरह सुबह को खत्म नहीं हो जाती है, सिनेमा और मेले के कारण सब लोग बदलते हैं। गाँव वाले ही नहीं, रेगिस्तान वाले डाकू भी। वे अपराधी, जिनके कारण बाकी लोगों के पास पानी नहीं है आनंदोत्सव के समय में जानवरों से मनुष्य हो जाते हैं। जब तक विष्णु का ट्रक रेगिस्तान पर चलेगा और अपनी फिल्में दिखाएगा, तब तक मेला चलता ही रहेगा। आनंदोत्सव के बाद शायद डाकू फिर से जानवर बन जाएँगे, पुलिस किसी को भी मार देगी, लेकिन मेले के अंत से पहले, फिल्मों के जादू के कारण, सब कुछ ‘उल्टा’ और सुरक्षित है।road movie 2

पढ़े-लिखे लोगों को शायद सामान्य सिनेमा में यह बात अच्छी नहीं लगती है कि फिल्मों के जादू के कारण सभी दर्शकों का व्यवहार कभी-कभी बच्चों का जैसा होता है। सामान्य सिनेमा अपने दर्शकों के भावों से अच्छी तरह खेलता है इसलिए फिल्म देखने के समय जोर से हँसना या रोना बहुत आसान होता है। सभी तरह की फिल्मों के दर्शकों को सिर्फ मनोरंजन चाहिए जोकि हर व्यक्ति के लिए अलग हो सकता है। जैसा कि मैंने जिक्र किया है, किसी को रोना अच्छा लगता है तो किसी को हँसना और किसी को डरना भी सबसे अच्छा लग सकता है। और सिनेमा के पास इन सारे दर्शकों के लिए कुछ न कुछ दिलचस्प है ही। तथापि इसी समय पर ज्यादा लोग बोलेंगे कि सिनेमा उनके लिए सिर्फ कला है और बड़े-बड़े निर्देशकों की फिल्मों के अलावा वे कुछ सामान्य नहीं देखते हैं। ऐसा क्यों होता है? क्या इसमें शर्म की बात है कि कभी-कभी हम सबको सामान्य फिल्म की सरल कहानी की जरूरत होती है? आजकल की स्थिति करोल इजिकोवस्की के समय से कुछ अलग है। आज फिल्मों को देखने में कोई शर्म नहीं है – सिर्फ सामान्य फिल्म के अलावा। शायद समस्या यह है कि पढ़े-लिखे दर्शकों को मालूम होता है कि फिल्म की कहानी एक झूठ है, फिर भी यह झूठ उनको इतना धोखा दे सकता है कि वे भी साधारण दर्शकों की तरह आसानी से रोते हैं और डरते हैं कि नायक मर जाएगा।

फिल्म का जादू यह भी है कि बहुत लोग मानते हैं कि पर्दे पर देखी हुई कहानी सच होती है, और अगर नहीं मानते हैं तो देखते समय इसके बारे में अचेत हो जाते हैं क्योंकि फिल्म बहुत अच्छी तरह वास्तविकता को धोखा दे सकती है। फ्रांस के फिल्म सिद्धांतकार, आंद्रे बाजें (Andre Bazin) ने लिखा कि अपने दर्शकों के लिए फिल्म एक खिड़की की तरह होती है, ऐसी खिड़की जिसे खोलने के बाद बाहर की दुनिया दिखाई जा रही हो। इसलिए दर्शकों को लगता है कि फिल्म की कहानी सच है और इसलिए भी आंद्रे बाजें के लिए सबसे अच्छी फिल्में वही थीं जिनकी दुनिया वास्तव से उतनी अलग नहीं थी। लेकिन यह दुनिया कभी कुछ और भी है जो वास्तविकता से अलग होती है। फिर भी दर्शकों के लिए इसमें और यथार्थ में कोई अंतर नहीं है और स्वप्न-चित्र देखने के समय वह उसी तरह प्रतिक्रिया दर्शाता है जैसी यथार्थवादी फिल्म देखने के समय। एक अन्य फिल्म सिद्धांतकार एडगर मोरें (Edgar Morin) ने इसके बारे में लिखा। उसके विचार में ऐसी प्रतिक्रिया इसलिए होती है कि कोई भी फिल्म देखने के समय लोग उसके नायक को अपना परिवर्तित रूप समझते हैं। तथापि इसके लिए एक चीज की जरूरत है – खिड़की पर देखी हुई दुनिया में रहने वालों को पता चलना नहीं चाहिए कि उनको कोई देख रहा है। और यह बात सिनेमा और उसके दर्शकों के लिए भी बहुत महत्त्वपूर्ण है।

फिल्म के दर्शकों को सबसे अधिक मजा झाँकने में आता है। सिनेमा घर के अँधेरे में बैठे हुए लोग एक-दूसरे को नहीं देख सकते हैं, लेकिन वास्तविक दुनिया के लोगों से अदृश्य होकर फिल्म के नायकों की जीवन में घुस जाते हैं। फिल्मों के दर्शक खुद से देखे हुए लोगों के सारे रहस्यों के बारे में जानते हैं, और फिल्म देखते समय यह सब जान लेना सबसे मजेदार क्षण होता है। इसलिए हर सामान्य सिनेमा में सबसे पहले एक नियम की बहुत बड़ी जरूरत है। फिल्म की कहानी के नायकों को ऐसा व्यवहार करना चाहिए जैसे उनको मालूम नहीं था कि उनको कोई देख रहा है। हर फिल्म के अभिनेता-अभिनेत्री को मालूम है कि उनकी फिल्में लोगों के मनोरंजन के लिए बनाई जाती हैं, लेकिन इस जानकरी को पर्दे पर दिखाना फिल्म का सबसे बड़ा पाप है। साथ ही, जब कोई फिल्म अपने बारे में कुछ बताना चाहती है, तब भी यह नियम महत्त्वपूर्ण है, इसलिए ऐसी स्थिति वहाँ ज्यादा प्रचलित है जहाँ फिल्म की दुनिया यथार्थ से दूर नहीं है और दर्शकों को वास्तविक लगती है। ऐसे ही एक पाप का बहुत अच्छा उदाहरण मनोज कुमार की फिल्म ‘पूरब और पश्चिम’ है। फिल्म के शुरू के दृश्य में जब फिल्म का नायक भारत लंदन जाता है तो वह ऑर्फन नाम के हिप्पी से मिलता है, और यह लड़का जब अपने अजीब नाम के बारे में बोलता है तब सीधे कैमरा की तरफ देखता है। उसकी इस भंगिमा को देखकर ऐसा लगता है जैसे वह भारत से नहीं, दर्शकों से बात करना चाहता है। और अगर वह दर्शकों से बात कर सकता है तो इसका मतलब यह भी है कि उसको पता है कि कोई उसे देख रहा है और सारे दृश्य का मतलब यह है कि पर्दे पर चल रही कहानी सच नहीं है। सब भ्रम बर्बाद हो जाता है। कोई निर्देशक अवश्य ही इस भंगिमा का बहुत अच्छा इस्तेमाल कर सकता है, और कभी-कभी इसकी जरूरत भी होती है, जैसे कि डरावनी फिल्मों में। वहाँ जब कोई राक्षस या किसी तरह का विरूप प्राणी सीधे दर्शक की ओर देखता है तो डर से मिलने वाले मनोरंजन में इजाफा हो जाता है क्योंकि इस भंगिमा का मतलब कोई चेतावनी है और दर्शक को लगता है कि अगला बलि-पशु वह हो सकता है।

झाँकने से मजा लेने (दर्शनरति) के बारे में मनोविश्लेषण का सिद्धांत, जिसका जिक्र लउरा मल्वे (Laura Mulvey) ने किया है, डर्टी पिक्चर में अच्छी तरह दिखाई दिया। फिल्म की नायिका, जिसका नाम रेशमा है, अभिनेत्री बनना चाहती है और इसके लिए सब कुछ करने को तैयार है। अभिनेत्री होने के बदले में रेशमा, जिसका नया नाम सिल्क है, नाचती हुई ऐसी लड़की बन जाती है जिसके नृत्य में बहुत ही साहसिक रत्यात्मक मुद्राओं की जरूरत होती है। वह अपनी ख्याति से बहुत खुश है लेकिन इस तरह की ख्याति वास्तव में बहुत कड़वी होती है। अफसोस की बात यह है कि सिल्क और उस प्रकार की सारी औरतों की ऐसी ख्याति सच्ची ख्याति न होकर भी सिनेमा के लिए कोई नई चीज नहीं है। मनोविश्लेषण के आधार पर लउरा मल्वे ने न सिर्फ देखने से आने वाले मजे के बारे में लिखा बल्कि उस शक्ति के बारे में भी लिखा जो देखने से पैदा होती है। कैमरे की आँखें पुरुष की आँखें होती हैं इसलिए औरत का शरीर सिनेमा में महज देखने की वस्तु है। औरत को कुछ करना नहीं चाहिए, सिर्फ अच्छी तरह दिखाई देना चाहिए। भारतीय सिनेमा यह रत्यात्मक मजा भी अपने दर्शकों को देता है, अपनी नायिकाओं को देखने की अनुमाति देता है। यहाँ भी सिनेमाघर के अँधेरे में बैठे हुए आदमी को लगता है कि उसे कुछ ऐसा देखना है जो सभी लोगों के लिए नहीं है, जिसे सामान्य जीवन में देखना अनैतिक है। और कोई नाचती हुई औरत अगर कभी सीधे कैमरे की ओर देखेगी तो इस बार यह कोई फिल्म का पाप नहीं होगा क्योंकि सिनेमाघर में बैठा हुआ हर आदमी सोचेगा कि पर्दे पर दिख रही लड़की सिर्फ उसके लिए नाच रही है। झाँकने से मिलने वाले मनोरंजन का स्थानांतरण हो जाएगा और हर आदमी यह सोच सकेगा कि वह शो का एक हिस्सा है और उसमें भी कामविषयक शक्ति है।the-dirty-picture-wallpaper-06

स्त्री-शरीर को दिखाने का उपक्रम सबसे अच्छी तरह गानों में संभव है। पश्चिम के लोगों को ज्यादातर भारतीय फिल्मों में मौजूद गानों की इतनी उपस्थिति बड़ी अजीब लगती है क्योंकि खास तौर से यूरोप में सांगीतिक फिल्में कभी इतनी लोकप्रिय नहीं थीं, और जो सांगीतिक फिल्में थीं भी, उनकी दुनिया भारतीय फिल्मों से अलग होती थी। यूरोप की अधिकांश सांगीतिक फिल्में किसी न किसी संगीत-नाट्य प्रदर्शन के बारे में होती हैं, संगीत की उपस्थिति ‘तार्किक’ होती हैं, इसलिए फिल्मों का ऐसा नुस्खा, जहाँ हर कहानी में गानों की जरूरत है, पश्चिमी दर्शकों के लिए अस्वीकार्य है। वे लोग नहीं जानते हैं कि कामविषयक मजे के लिए गानों की कितनी बड़ी जरूरत है! पुराने जमाने से ही फिल्मों की अलग, कभी-कभी बहुत दिलचस्प योजनाएँ होती थीं औरतों के शरीर दिखाने के लिए। भारतीय सिनेमा के इतिहास में कभी-कभी ऐसे निर्देशक भी हुए जो नायिकाओं के शरीर को दिखाने के मामले में गानों के मुहताज नहीं थे – और उनमें सबसे प्रसिद्ध नाम शायद राज कपूर का था। उसकी ‘बॉबी’ एक नई और चुस्त कहानी थी लेकिन कुछ दर्शकों को वह सिर्फ डिंपल कपाडिया की बिकनी के कारण अच्छी लगती थी। तथापि कभी औरत का शरीर दिखाना फिल्म को कुछ नुकसान भी पहुँचा सकता है। शेखर कपूर की बैंडिट क्वीन एक बहुत महत्त्वपूर्ण फिल्म थी जो स्त्री-हिंसा को सबको दिखाना चाहती थी। अफ्सोस की बात यह है कि ज्यादा दर्शक सिर्फ सीमा बिस्वास के नंगे शरीर को देखने के लिए सिनेमाघर आ जाते थे और फिल्म जिसका विरोध करना चाहती थी उसने यही सब दर्शकों को दिया। ज्यादा फिल्में सतर्कतापूर्वक अलग-अलग तरीके ढूँढ़ती हैं जो शरीर दिखाने के लिए सबसे उचित हों। सबसे आसान तरीका है वेश्या को नायिका बनाना क्योंकि वेश्याओं के साथ सब कुछ करना उचित है। निस्सन्देह सभी नायिकाएँ वेश्या नहीं हो सकती हैं इसलिए कई फिल्मों में मोहिनी आ गई जोकि बहुत अच्छी योजना थी। इस तरह फिल्म की नायिका बहुत भोली, अच्छी लड़की हो सकती थी लेकिन नायक दूसरी औरत को भी पसंद था जो अच्छी थी पर सुंदर और खतरनाक थी, शराब और सिगरेट पीती थी और नाइट क्लबों में नाचती थी। इस योजना से आइटम नंबर पैदा हुआ जो कामविषयक मजे के लिए भारतीय फिल्मों का शायद सबसे अच्छा आविष्कार भी था। आइटम नंबर वाली औरतें सिर्फ देखने के लिए होती हैं और फिल्म की कहानी से उनका कोई संबंध नहीं होता है। वे शुद्ध मजे के लिए उतारी जाती हैं। नायिका का इस तरह नाचना हमेशा अनुचित था, पर कभी-कभी इसकी जरूरत भी थी इसलिए ड्रीम सिक्वेंस बन गया। इसकी मदद से दर्शक वह सब कुछ देख पाता है जो सिनेमाघर में आकर देखना चाहता है, और नायिका की इज्जत भी सुरक्षित रहती है क्योंकि हर ऐसा दृश्य सिर्फ सपना होता है।The Dirty Picture

डर्टी पिक्चर स्त्री-शरीर को सिनेमा में देखने-दिखाने की योजना को अच्छी तरह निभाती है। डर्टी पिक्चर एक ऐसी स्त्री की कहानी है जो फिल्मों में नाचने का काम करती है, अपने शरीर की खूबसूरती के बल पर दिनों-दिन सफलता की बुलंदियों पर चढ़ती जाती है। लेकिन बढ़ती उम्र की तो शरीर की ‘खूबसूरती’ से जैसे दुश्मनी है। इस तरह एक दिन वह खुद को पराजित महसूस करती है, ठगी सी महसूस करती है। लेकिन यह विडंबना भी दर्शकों के देखने के नजरिए में कोई बदलाब नहीं ला सका। इस फिल्म की कहानी दो स्तरों पर चल रही है। एक स्तर सिल्क का जीवन और उसकी अश्लील फिल्में हैं, दूसरा यह फिल्म है जो सिल्क के बारे में बता रही है। सिल्क के फिल्मों के गानों के हिस्से को देखकर दर्शक बहुत उत्तेजित होते हैं। हम सिनेमाघर में बैठे पुरुषों के चेहरों पर एक खास किस्म की लालसा देख सकते हैं। लेकिन इसी समय डर्टी पिक्चर में दर्शकों के लिए भी वही मजा है और सिनेमाघर के अँधेरे में बैठे दर्शकों के चेहरे पर वही लालसा फिर से वापस आ जाएगी। यह फिल्म एक भोली-भाली नायिका के बारे में है जिसको फिल्मी पेशे ने नष्ट कर दिया। जब तक जवानी और सुंदरता थी, तब तक सारे सपने पूरे लगते थे लेकिन जब जवानी चली गई और शरीर उतना खूबसुरत नहीं रह गया, तब सिल्क ने देखा कि वह सिर्फ शरीर थी। फिल्म वालों के लिए सुंदर शरीर में रहती हुई औरत को ढूँढ़ना महत्त्वपूर्ण नहीं था क्योंकि दर्शकों के लिए सुंदर शरीर ही काफी है। देखने की, झाँकने की इच्छा कितनी मजबूत होती है हम इस फिल्म के ड्रीम सिक्वेंस में भी देख सकते हैं। इसमें सिल्क अपनी फिल्म की नायिका है और उसे अपने शरीर को पहले सी दिखाने की जरूरत नहीं है, लेकिन पता चलता है कि नायिका की यह भूमिका भी उसे इसीलिए प्रदान की गई है कि वह देह-प्रदर्शन की योग्यता रखती है।

भारतीय फिल्में नायिका की इज्जत के बारे में सोचकर भी ड्रीम सिक्वेंस की मदद से इस इज्जत को नष्ट करती हैं। भोग की इच्छा, दर्शनरति की इच्छा इज्जत से बड़ी है और फिल्में अपने दर्शकों पर  निर्भर हैं। अगर कोई सिनेमाघर नहीं आएगा फिल्म देखने के लिए तो नई फिल्में बनाने के लिए पैसा भी नहीं होगा। इसलिए सामान्य फिल्में अपने दर्शकों को वह देती हैं जो उनको सबसे अच्छा लगता है। निस्संदेह, इसका मतलब यह नहीं है कि जिन लोगों के लिए फिल्म में झाँकने का मजा सबसे महत्त्वपूर्ण है वे सब के सब कोई  विकृत लोग हैं। फिर भी, ऐसी स्थिति, जब किसी के लिए फिल्म का सबसे महत्त्वपूर्ण क्षण नंगे शरीर से संबंधित है, खतरनाक हो सकती है। इसलिए मुझे अच्छा लगता है कि आधुनिक फिल्मों में आइटम नंबर धीरे-धीरे गायब हो जाता है और आज की अभिनेत्रियों की साहसिकता नंगे शरीर को दिखाने से नहीं, कहानी के व्यक्तित्व से संबंधित होती है।

अधुनिक दर्शकों की दुनिया फिल्मों से संबंधित है। एक तरफ, फिल्मों की मदद से वे वास्तविकता को भूलना चाहते हैं तो दूसरी तरफ, आज के लोगों की वास्तविकता फिल्म की वास्तविकता है। आइ हेट लव स्टोरीज में ऐसी ही स्थिति है। फिल्म का नायक, जिसका नाम जय है, प्यार से नफरत करता है। ऐसा वह फिल्म स्टुडियो में काम करने के कारण ही सोचता है क्योंकि फिल्में अपने दर्शकों को झूठ दिखाती हैं। जय को अपना विचार बदलना पड़ता है जब धीरे-धीरे उसे पता चलता है कि उसकी जिंदगी में भी कुछ ऐसी चीजें हैं जो फिल्मों से मिलती-जुलती हैं। फिल्म के अंत में एक मजेदार दृश्य में जय सिनेमाघर में आता है और हाथ में फूल पकड़कर अपनी प्रेमिका  को बुलाता है। इसी समय उसको पता चलता है कि पर्दे का नायक यही कर रहा है। संयोग है? नहीं। बहुत फिल्में देखने के बाद ढेर सारे लोग अक्सर बिना किसी इरादे के अपना जीवन फिल्मी बनाने की कोशिश करते हैं। फिल्म में देखी हुई रोमांस वाली छवि अच्छी लगी तो लोग इसे दुहराएँगे, कभी कुछ कहने के लिए फिल्मी संवादों का इस्तेमाल करेंगे क्योंकि उनको लगता है कि शायद उनकी कहानी के अंत में भी वही होगा जो फिल्म के अंत में हुआ। I_Hate_Love_Stories_Movie_BollywoodSargam_talking_491333

आई हेट लव स्टोरीज की मदद से हम भारतीय फिल्मों के भविष्य के बारे में भी सोच सकते हैं। यह फिल्म फिल्म-निर्माण के बारे में है और इसमें उन फिल्मों का जिक्र है जो प्रेम कहानियों के लिए चर्चित रही हैं। फिल्म का निर्माता करन जोहर है जो अपने फिल्मों में स्टार अभिनेताओं के साथ काम करता था जबकि इस फिल्म में उस तरह से स्टार कोई नहीं है – स्टार फिल्म के मुख्य-पात्र के सपने में आता है। एक दृश्य में जब सेट पर गाने की शुटिंग की जा रही है, नायक और नायिका को देखकर मुख्य पात्र सपने में खुद को गाते हुए देख रहा है। गाता हुआ जय और उसकी प्रेमिका वैसी ही दिखाई देती है जैसी करन जोहर की फिल्मों के सारे नायक और नायिकाएँ। लेकिन अंतर यह है कि इस फिल्म का नायक शहरुख खान नहीं है और फिल्म भी थोड़ी सी अलग है। मेरे विचार में यह गाना परिवर्तनों का रूपक है। अब नए-नए अभिनेताओं का समय आ गया है और नई फिल्मों का भी। ऐसी फिल्मों का समय जिसकी नायिका अपने होने वाले पति को छोड़ सकती है – इसलिए नहीं कि वह बुरा है या उसने कुछ उसको किया, वरन इसलिए कि उसकी जिंदगी में कोई नया आ गया है। नए-नए दर्शकों को नई कहानियाँ चाहिए और ऐसा परिवर्तन स्वाभाविक है। फिल्म में शायद सब कुछ हो चुका है और कुछ नया हो नहीं सकता है लेकिन आज भी टीवी या कंप्यूटर जैसे व्यसन के सारे आविष्कारों और इसके विकास के बावजूद फिल्म की जरूरत है और बनी रहेगी। फिल्मों की कला दूसरे कलाओं से जल्दी पुरानी हो जाती है इसलिए नहीं कि नए आविष्कारों से उसका गहरा संबंध है – सबसे पहले इसलिए कि फिल्म खुद के इरादों के दर्शक को पैदा करती है और इसके बाद उसको कहानी देती है। इसके कारण संग्राम देखने के बाद लोगों को विश्वास था कि अशोक कुमार वास्तव में पुलिस वालों को मार देंगे, अमिताभ बच्चन एक कॉमिक्स में सुपर-हीरो बन गए या प्राण के जमाने में कोई माँ अपने बेटे को प्राण का नाम देना नहीं चाहती थी। ‘आई हेट लव स्टोरीज’ के एक दृश्य में ‘रोड मूवी’ की तस्वीर दिखाई देती है जो कि सिनेमा का सबसे अच्छा सारकथन है। फिल्में अलग होती हैं जैसे उनके दर्शक, लेकिन एक चीज वही है जो शुरू में भी थी: अंधेरे में इंतजार करने का यह अद्भुत अहसास दुनिया के सब कोने में एक जैसा है और मुझे आशा है कि यह कभी नहीं बदलेगा।

पहल-91 से साभार

Tatiana szurlejतत्याना षुर्लेई लोकप्रिय हिंदी सिनेमा की शोधार्थी और समीक्षक के रूप में पोलैंड में ख्यात। सिनेमा विषयक तीन लेख हिंदी में लिख  चुकी हैं। इन्होंने  यह लेख विशेष रूप से पहल-91 के लिए लिखा है। केन्द्रीय हिंदी संसथान, आगरा से हिंदी का प्रशिक्षण। फिलहाल पोलैंड के शहर क्राकोव सिथत Jagiellonian University में The Courtesan Figure in the Iconography on Indian Popular Cinema:Tradition, Stereotype, Manipulation. नामक विषय पर पीएचडी के लिए शोधरत हैं। इनसे  tatianaszurlej@yahoo.com पर संपर्क सम्भव है।

The Mole Man: Interview with Alejandro Jodorowsky

By DAMIEN LOVE
Of all the announcements coming out of Cannes this year, the most unexpected and unlikely was the tantalising, not to say terrifying news that David Lynch has signed up as producer to finally bring to the screen King Shot, the long-rumoured, perpetually stalled movie that will mark the return to directing after 20 years in the wilderness by the 79-year-old Alejandro Jodorowsky.
The unexpected and the unlikely, however, have always been Jodorowsky’s stock-in-trade. Born in 1929 in the Chilean coastal town of Iquique, a place he remembers as overrun with sailors and prostitutes, his unique career has seen him going from staging Samuel Beckett for Mexican peasants to mounting radical theatre happenings in the streets of Paris;1 from creating mime routines for Marcel Marceau (he claims “trapped in a glass box” is one of his), to creating an entire universe in the arcane and loaded comic strips he has written since the mid-Sixties.
Jodorowsky made his first film, an avant-garde adaptation of the surrealist play Fando y Lis, on a shoestring budget in Mexico in 1967, but he earned his place in movie cultdom in 1971, when he arrived in New York carrying the single print of his second movie, the surrealistic Zen western bloodfest, El Topo.2
A low-budget art film he wrote, produced, directed, starred in, edited and composed the music for, El Topo was ridiculed by the Mexican industry while Jodorowsky was making it, but it became a must-see, word-of-mouth hit in New York. Following a debut at the Museum of Modern Art, El Topo played the graveyard shift at the funky, 600-seater Elgin Theatre for almost a year, becoming the first phenomenon of the Big Apple’s midnight movie circuit. Among the hardcore following of acid-heads, students, hippies, hipsters, freaks and faces who made a ritual out of the nightly screenings, its admirers included John Lennon, Yoko Ono, Bob Dylan, Sam Fuller, Peter Fonda and Dennis Hopper.
Jodorowsky and KleinLennon was so enamoured he persuaded his manager, Allen Klein (right, with Jodorowsky), to not only acquire the rights to El Topo, but to put up the $1 million budget for Jodorowsky’s 1973 follow-up, The Holy Mountain, a film that managed the impressive task of being even further-out. 3
These are the films Jodorowsky’s legend rests on, and both are grotesque, haunted warehouses, stuffed with references to religion, the occult, philosophy, psychology, art history and other movies. They could be dismissed as merely addled, pretentious products of their time — were it not for a streak of cruel, ambiguous humour, and the undeniable power of Jodorowsky’s violent imagery and imagination. Whatever else they are, they’re unforgettable.
They have had to be. For decades, both El Topo and The Holy Mountain only existed in audiences’ memories (or in scratched and washed-out pirate prints on the bootleg circuit), as both were purposefully kept out of circulation, purportedly by Klein, following a raging fall-out with the director. The absence clearly helped enhance the films’ already sizable cult mystique, but that was of little comfort to Jodorowsky, who has rarely had easy dealings with the movie industry since.
After years of planning, a long-cherished adaptation of Frank Herbert’s sci-fi saga Dune fell apart in the late 1970s, but not before the mouth-wateringly fantastical ideas Jodorowsky pulled together planted seeds in both the Alien and Star Wars franchises.4 A children’s movie, Tusk, shot in India in 1980 was barely seen.5 1989’s Mexico-shot psychodrama, Santa Sangre6 marked a comeback of sorts, but it was short-lived; 1990’s The Rainbow Thief, starring Peter O’Toole, Omar Sharif and Christopher Lee, wasn’t even granted a theatrical release.7
Across the following decade, there were the odd rumours of film projects — a sequel to El Topo was supposedly in the works — but nothing that ever got much further than storyboards and whispers. It seemed as if Jodorowsky had given up on film, to devote himself entirely to his comics. In 2007, however, he was suddenly, unexpectedly the talk of the movie world again when, having finally settled his differences with Allen Klein, El Topo and The Holy Mountain were given a splashy, pristine, overdue DVD release, and began to mess with the minds of a whole new generation.
The Holy MountainThe success of last year’s DVD releases perhaps helped pave the way to the recent announcement that King Shot — a “metaphysical spaghetti gangster movie” that will pair Nick Nolte with Marilyn Manson — is coming. This interview, however, dates from 1999, when Jodorowsky’s movie career still seemed on indefinite hold. His feud with Klein was still bubbling, but he had, to his evident delight, just regained the rights to El Topo and The Holy Mountain (above) and was preparing for a smaller-scale UK VHS release for both films.
I met the then 70-year-old Jodorowsky in London where, silvering, bearded, dressed in a black suit, black shirt and black shoes and radiating a benign, gentle intensity, he resembled an elegant cross between Klaus Kinski and Kenny Rogers. After the interview, he mentioned, in passing, that he planned to live to 150. Don’t bet against it.
DAMIEN LOVE: So, it’s been almost thirty years now since you made El Topo and sent it out into the world, and now it’s finally being re-released. Why now?
ALEJANDRO JODOROWSKY: Until now, I didn’t have the rights. I needed to wait because Allen Klein, who was the producer in the United States, had all the rights, and he didn’t want to show this picture, because he had argued with me, and that was his weird kind of revenge. He closed the picture, and it was very difficult to find the negative. By a miracle, I found a negative that had been lying in a laboratory in Mexico for 25 years. So that is how we come to have the picture today. At the same time, I was also trying to find the negative for The Holy Mountain, and I did, and then I also found Fando and Lis — all my pictures came back suddenly. When I had the rights, all my pictures suddenly appeared, like they had been waiting for me.
What is your relationship with El Topo now?
When I make a picture, I don’t make a picture like a moviemaker, I make a picture like an artist, or like a human being. For me, back then, it was very important to do it. And now I have changed, it’s not the same. But I still respect that picture completely: it is what it is — but it is not me anymore. When I made the picture, I felt as though the picture was my father, and now I feel as though the picture is my son. I am here to speak about a son — but it is not important for me now. The umbilical line has been cut, it is not me anymore. But I like it, I am not ashamed of it.
Watching the film again so many years later, was there nothing you thought you would liked to have changed about it?
No, it’s impossible. Because when I did it, I was like that. I did not make it with my brain, I made it with my unconscious. It is like a dream, you cannot change a dream. I would change nothing.
Did you ever dream that the film would have the life and impact that it has had?
El TopoI never dreamt it. You have to realise that I made it in Mexico, and Mexico was making very primitive kinds of pictures then, with charros, cowboys and Indians, very industrial. Movies were not an art. Even Bunuel was obliged to make very awful pictures in Mexico, because the industry would not pay to make artistic pictures. When I was making El Topo (right), all the industry was laughing at me and the Establishment was attacking me; it was a big scandal to do that film. I had to do it fighting and all alone. Even the actors sometimes didn’t believe in it; this is why I acted myself. No actor wanted to play El Topo, because they didn’t want to grow a beard and they didn’t want to shave their head, they didn’t want to play a “bad” character, or do this, or do that . . . and so I was obliged to do it myself.
When I went to the United States, I needed to sell it, because I needed to recover the money; if you don’t recover the money you go to jail, because I made the picture on credit. But when we sold the picture, we didn’t sell to the big industry, we sold it to Alan Douglas, who was a hippy producer who had Malcolm X and Jimi Hendrix and who wanted to have El Topo. He knew John Lennon and Yoko Ono, too, and one day he said to John Lennon: “See the pictures you like, show them to your friends.” And John Lennon saw my picture, he liked it, and that was my luck. He showed the picture to the New York intelligentsia, and that was the start of El Topo. But I didn’t know that. One day they invited me to the Bangladesh concert. I went there and after the festival I realised the Beatles liked it . . . I don’t remember all of the names of the people I met there. Sly and the Family Stone were there, too, and they wanted to see me. All them, I became some kind of guru, like some kind of . . . I dunno what. So. Bueno. Now I speak a little English: then I didn’t speak a lot. I was astonished. I didn’t make that picture in order to get famous. I made it because if I didn’t make it, I would die. I needed to do it.
How do you remember John Lennon?
He was a very nice person. And he gave me the money to make The Holy Mountain, through Allen Klein and Apple. He didn’t want anyone to know about it, he did it anonymously. He was a fantastic person, and he really liked what I was doing. One day with John Lennon, he invited me to take tea . . . but, later, when I was shooting Holy Mountain, a Rolling Stone journalist came to interview me on the set. And we were eating and he asked to me — not as part of the interview — “What do you think about the short films John Lennon made?” And I said, “Listen, I don’t like that. To see three hundred asses walking, or a fly going from one part of the body to another for half an hour, that’s not a movie for me.” Bueno. They published that and John and Yoko Ono both got angry. And then I sent them flowers, I said, “I never wanted to suggest . . .” But that was it broken. Our history was broken there. I’ve never told this story, but I am sorry about it. But it was the journalist, so, what can you do? But, still: if you ask me do I like their short pictures, I say . . . No! They are awful! I don’t like them. What can I do?
I believe you had some dealings with George Harrison, too?
With George Harrison, I had an interview in the Plaza hotel in New York, he wanted to play the thief in The Holy Mountain. Bob Dylan also; but at the same time Dylan was also offered Peckinpah, and Dylan said “I feel more Peckinpah.” But Harrison was interested. He read the script and said: “The script was very good, but there is a shot I don’t want to do: You show my bottom on screen, and they are cleaning my bottom. I don’t want to do that.” And I said: “You don’t want to show your bottom? Then I cannot do the picture with you!” And I take a guy, an unknown person from Mexico, and he played the part. Maybe I made the mistake of my life, I don’t know. But at that time I didn’t want to make one single concession, I really wanted to do what I wanted to do. And it was there that my fight with Allen Klein started. He said: “You’re crazy! If Harrison does it, we will get millions! All for one shot!” And I said no, I cannot. And so then he started to hate me.
El Topo became a cult hit, a phenomenon on the late-night New York circuit, and you were soon being approached by all these sorts of people. Were you ever tempted to next make a more commercial kind of film?
No, listen. I don’t have a musical ear. I’m writing all the time, and for twenty years I was listening to the same music, the same record — Celtic harp. So when the Beatles came to me, for me none of that was important. Rock music was not important to me, and all of that “phenomena” thing, that was just all show business. I didn’t want to do that. I think of myself as an artist for the museum. I was very happy when they showed El Topo in the Museum of Modern Art: that was for me. Still, when they were showing El Topo in the Elgin theatre, I wanted to go there, and immediately the owner said, “Jodorowksy’s here” — and there was a cloud of marijuana smoke in there, a cloud, and when I was walking between the public, they were putting marijuana cigarettes in my hand, I took to the stage full of these cigarettes. I put them in my pocket, I spoke with them all, and I went out. But at that time I never smoked anything. But it was very funny. I was suddenly some kind of figure, a maximum figure for the stoners. They actually thought they needed to smoke marijuana to see my picture. It was very funny.
To go back, why did you make El Topo?
Original Spanish poster for El TopoWhy? Because I liked movies at that time — and now I still like them, but it’s impossible to do anything. But movies were the biggest art in the history of humanity, and I wanted to express myself through movies, because for me it is an art. All my life, I never worked — I made art. Your life with art is not to work. I made 100 theatre plays in Mexico, I made Ionesco, Beckett, Strindberg, Shakespeare, all of that; I directed music hall with Maurice Chevalier; I wrote for Marcel Marceau, a lot of pantomime. All my life I was doing these things, and I wanted to make movies the same way, to express myself. This is why I did it. And the industry at that time in Mexico, they had never known something like that. Their thinking was, if they put money into a movie, then they will make a lot of money back, because it is an industrial thing. But when they saw that I was making an art picture, they didn’t want anything to do with me, I was banned from the industry. I was banned completely from their encyclopaedias, I was banned everywhere. It’s only now that they are starting to discover me. I was the enemy, I really was the enemy. And that is why in the United States I am forbidden, too, they don’t show my pictures. Now they have started to show Fando and Lis, my first picture, in San Francisco. But they never opened The Holy Mountain. And now, any time they want to show El Topo, Allen Klein comes in with lawyers and closes the theatre. It is impossible to see El Topo properly in the United States. But the pirate copies, they see all the time. Everyone knows El Topo by pirate, not by a good copy. But now it’s a good copy, because I found that good negative in Mexico.
Where did the story of El Topo come from?
In the beginning it was a fairy story, in the beginning. It is a master who wants to make a tunnel. But it also comes from the success that cowboy pictures have had. But I had been meditating for five years with a Japanese monk at that time, and so I decided not to make a Western but an Eastern, you know, to have a kind of a laugh about the Western, and to give to the Western the style of a fairy tale. When I was a child and I was going to see cowboy pictures, I never felt that I was seeing the history of North America. I thought that the cowboy’s country was a fairy country. I wanted El Topo to be like this: it’s not in the United States; it is a fairy tale; and it is an Eastern. That is what I wanted to do. And have a little laugh also, because for me it is funny sometimes. I make little jokes. I make the cripple — everyone who knows the film knows this story now — but I take two cripples and make one John Wayne out of them, I give them the pants of John Wayne in order to laugh at John Wayne. But in some ways I was making something deeper than that. I was very influenced by the orient at that time.
In the film there is comedy and there is cruelty — does it trouble you if people confuse these two, laugh at the wrong time?
No. Art needs to have ambiguity. I expect every person who sees the picture to have a different reaction. Somebody can be horrified and another can laugh, and at the same time another can experience sorrow. I don’t like pictures that say “This is a comedy; this is a tragedy.” Life is not like that. In life you can laugh in a funeral, you can laugh and you can see how ridiculous a war is, and at the same time you can be affected by this war. I mixed all the styles. This is what I call the Panic Aesthetic, it was very conscious to do that. Also, I was aware of not making an industrial picture. And another thing is, I didn’t want to address myself to the intellect of the viewer, I wanted to go directly to the unconscious. This is what I wanted to do. But for me it was not important, it was fun, it was happiness to make that picture. To make a picture is a big happiness.
What do you remember most about the filming?
That I didn’t have money. I went to someone who rented theatre and opera costumes, and then I took every bandit outfit and I made the costumes there, putting one thing with another. I constructed, I invented as I was shooting. On one hand there was the script, but then I also wanted to find the places that were like in a dream. I travelled through Mexico for a month finding these nice places that were like a dream. Every place in the film was like a dream for me. And then I put the character there, and I started to invent the actions there. The creation happened there, because I didn’t believe in respecting the script as a machine. Because the day of shooting changes the picture, because, you know, another light suddenly appears, something you want to put inside the picture appears, a cloud, something you want. It becomes different. Today, producers are trembling because, today, the picture is really there only to realise a script, that is what a picture is now, and it’s not realised until it is realised by the special-effects people, the company of cars, the coach director . . . In the end, today, the director is like an agent who leads this cargo: when the light is red, he says, “stop,” and when the light is green he says, “go.” It’s a diplomatic job now, being the director. The producer makes the picture and the star makes the picture, and in the end you have a very fun industrial product. But it’s not deeper. It’s an amusing thing. It’s like a cigarette, you smoke it, and then you forget it and you have another cigarette. And then you die of cancer. If you see only that kind picture, you end up with spiritual cancer, because they don’t help you. But you have a lot of fun. Myself, I like a lot the Hong Kong pictures now. Because they are idiots — but they are so fantastic, so different. Sometime they have no limits: no limit in cruelty, no limit in sex, no limit in violence, no limit industrially. They are fantastic idiots.
El Topo is stuffed full of symbolism, it seems practically to beg interpretation and analysis. Is there a danger, though, of over-analysing, missing out by using too much conscious thought and not just going with it?
El TopoWhen I was making this picture, I felt that every shot was important, like my life depended on it. When you listen to a song, you listen once, you listen twice, you listen forty times — so why is it felt that, with a picture, you need to see it only one time? I decided to make in this story images that you cannot understand on only one viewing. I will make a picture that is a dream, that you can see more than once, and every time you see this picture you will see it differently. And then, within that, I made different levels. There is a very intellectual level there, but also a very animalistic level, an instinctive level, a sexual level, an emotional level . . . different levels. When the film first came out, I was accused of killing animals to make it. 8 So I said: “Yes! I kill animals! Yes! I hate women! I hate animals! I love violence!” I said that because, for me, these questions were idiotic. How you can judge a work with that kind of concept? In reality, actually, all the animals in the film had already been killed. They were sick. There was a myxomatosis outbreak, that had killed a lot of rabbits, and I bought these dead rabbits. So, in reality, I didn’t kill animals, but I said that I did. In reality, I don’t hate women, but at that time, I said that I did. “I am a man! A male!” I was demonstrating the cruelty of pictures that are anti-feminist and cruel, but which don’t come out and say that, because they are impotent. My intention was to awake the consciousness: first my consciousness, and then the consciousness of the public. That was my intention, to create a shock, to make pictures that can bring a change to your life. That’s what I wanted to do. And now in my comic books, I am still doing the same thing. I am always making what you call an aesthetic art.
There’s a Stanley Kubrick quote along the lines that the meaning of a film should only begin to become apparent in the hours and weeks after you’ve left the cinema. This is something you’d agree with?
Yes, completely. Completely. Or some years after. Because that is art. But Kubrick made very expensive pictures. This is his way. My way was to make very non-expensive pictures. That is my way. I don’t want millions to do it, I cannot handle the consequences — if you have millions, you have to compromise in the image, don’t you think? I love Kubrick, but sometimes his image is too industrial for me. In another way, I love Fellini, but in the image. I mean, I love how Kubrick is strong, formidable. But I love Fellini in his form because every time the form is so personal, so artistic, so beautiful, because it’s a poor image.
Can you tell me a little about the way you used music in El Topo? There’s the scene where the Colonel is killed, for example, where there’s this very sweet, sad musical theme, completely at odds with what the scene seems to be about.
Soundtrack LP for El TopoFor me the music is not there to accompany, it’s not a pointer. It’s a character. As you realised, sometimes it is contrary to what you are showing. Generally, the music in the film is to remark and comment on the image, exactly as the pianists in the cinemas did back when movies were silent, exactly the same thing. They played piano because the picture was silent. Now I put music in because it makes the picture stronger, but it’s only an accompanying character, a companion, not a real actor, it’s not in the first level. But, it’s very important to me, the sound. In Santa Sangre I acknowledged this, because I have a blind person in the street, at the biggest moment, when the father kills himself. It was 4 o’clock in the morning, and there was a drunk woman and she started to sing something and I put this woman singing in there. It had nothing to do with the guy who was killing himself, but, it is the loneliness, the aloneness of an old woman singing at 4 o’clock in the morning in a public space, completely drunk . . . for me there is something there. In El Topo, though, a lot of the music I made was really there to laugh about the music in cowboy pictures — tarrra -rran-tarra-rann-tarrra. Like a caricature of that.
Tell me about El Topo‘s underwear.
Hah. That came about because . . . all the time in the film, I have black silk underwear. And this is because there was a moviemaker, Erich Von Stroheim you know, and he spent a lot of Hollywood’s money once to assemble an army for a film. And they asked him, “Well the army is good. But why do you have them all in silk underwear? Why spend all this money on something that’s inside their army trousers, that nobody will ever see?” And he said, “Well, yes, but the soldiers feel it.” So from that, I always say that you need to construct a character from the interior. For all the characters, I construct the interior of each person also.
Talking of other infamous moviemakers, is it true that you worked with Dennis Hopper on the editing for The Last Movie?
Yes that’s true. I don’t know how. I had showed El Topo privately around the studios, I showed it to Metro Golden Mayer, Universal. And, all the time, the people at the screenings were enthusiastic, but then, when the salesmen came along, they would say, “We don’t know to sell this picture.” And Dennis Hopper was at one of these private shows, and he liked El Topo a lot. And so he invited me to come to Taos. And in Taos, he had four or six editing machines and twelve editors working. At that time, he didn’t know what to with The Last Movie. And I saw the material, I thought it was a fantastic story. And I said, “I can help.” I was there for two days, and in two days I edited the picture. I think I made it very good. I liked it. But when he went to show it to Hollywood, they didn’t want it, because by then he was in conflict with them. Later, I think that Dennis Hopper decided that he couldn’t use my edit, because he needed to do it himself. And so he destroyed what I did, and I don’t know what he did with it later. I never told that to anybody through the years, but I am sure that if, one day, they found my edit, it was fantastic. Because the material was fantastic. I took out everything that was too much like a love story or too much Marxist politics. For me it was one of the greatest pictures I have ever seen. It was so beautiful, so different. I don’t know what it is like now, how it has been edited, the final thing, I don’t know if he conserved anything of mine. But it was a fantastic film. One thing I do remember from back then, though, was how strong the smell of Dennis Hopper’s underarm perspiration was. It was so strong, and one day — he had I think ten women there — and I put everyone in a line in order for them to smell the perfume of Dennis Hopper. Because he never changed his shirt, for days upon days. He smelled very strong. That I remember.
You said that, for you, the most important thing was the shooting of a picture, and not the picture itself. Does that still hold?
The shooting of the picture, yes. Why? Because that is the most painful and most dramatic moment. Because, how I was doing it back then — and maybe how I will do it again if I make another — the shooting is an adventure. Because I have some kind of structure, I have some kind of system, but then I have the actors, and then I have place, and then the place starts to affect the scenes. For example, in Santa Sangre and The Holy Mountain, I filmed those in reality in the town — I went there, I shot the picture, and then I had to escape because the police came. We bought a police officer to protect the shoot, and he pulled his gun on me while we were shooting, and so then we ran away. But always in shooting, you are mixing dream with reality. In Santa Sangre, there is a person who eats the flesh of an elephant. In reality it was the meat of a cow, and in reality the guy was fighting in order to have these pieces of meat, because where we filmed was among some really poor, poor people. The only thing I put on that actor’s costume was mud, that was all. Everything else was just what it took for him to go and take the meat. I shoot like that. In those kinds of moments, you cannot act as a normal industrial photographer. You need to go to the action, as though you were shooting in a war. It needs to be beautiful, but it needs to be quick, because this scene will happen only once. Also in Santa Sangre, they showed me a person without an ear. He had a false ear. And immediately I invented something there. When you are shooting out in the world, those things are offered to you. And when that happens, it is a very dangerous and very dramatic, marvelous moment. The editing is completely technical. By then you are sure, you have your material, you have nothing to lose.
Santa SangreBut sometimes when I was shooting, I risked my life. On The Holy Mountain and El Topo I risked my life. In Holy Mountain, there is a scene where I made soldiers dance with the soldiers in the house of the charros — and this guy, a charro, a Mexican cowboy, he was drunk, and he pulled a pistol on me, in my face. And he said, “Stop this shoot, or I will kill you.” Everyone went pale. And I, I don’t know how I did it, but I was so angry, I said, “You kill me then, but I will kill you! I will keep shooting! I will do it!” And so, like that, I shot it. I risked my life completely. And also in The Holy Mountain, I started to fall off the mountain. At one point in The Holy Mountain it got so terrible that the photographer couldn’t shoot. I made all the actors jump into the Caribbean Ocean, we jumped into the ocean, and in seconds we were swept far, far away from the boat and so they had to save our lives. And they saved us — but they didn’t shoot! In Santa Sangre (above right), I shot in the streets where all the thieves and the criminals and the drunks are, I went there to shoot. It’s a very . . . you know, you are not you when you are shooting. The person who made those pictures is not me. I was a completely different person when I made these pictures: I would see no one, I would sleep only four hours a day, I didn’t drink, I didn’t take drugs, I didn’t have a woman — nothing. I ate very little. The only thing I did was make the pictures. They are honest pictures. They are good, they are bad — they are something which happened there, which is honest. This is why I like Bunuel, because he was always honest. If he had limits, then he would make a limited picture. He always shot at his eye-level, he never put a shot up here, because he was limited, and he agreed to be limited. Bunuel is honest. I like pictures that are honest. Like some Hong Kong pictures — those filmmakers are honest thieves, they are making business, and they are so honest about it, it’s fantastic. But, say, Spielberg is not honest. I hate Spielberg, because none of his movies are honest. His violence is ill, it’s not honest. He shows an ill violence, as though he was the father of history. He hates Jews, because he is Jewish. He is making business with that, with Europe. He is fascist, because America is the centre of his world. If I can kill Spielberg, I will kill Spielberg.
Leading on from killing Steven Spielberg, has your opinion of David Lynch’s Dune changed at all?
I think David Lynch is a fantastic moviemaker. I was so ill when he made Dune. But when I went to the theatre to see it — always I tell this with great happiness, because I was so jealous — I was dying. I was grey. But then when I went to the theatre and saw the picture, I was so happy, because the picture was so bad! And then I could live again! Because if David Lynch had been able to make Dune as David Lynch, I think I would have died. But when he made a bad Dune, he saved my life. And I love David Lynch, because he saved my life. Also, I love Cronenberg, because he is an auteur, he has his obsession. I like him. He is honest. There are a lot of moviemakers I like, and there are others I hate. But what I hate the most is Spielberg. And second Walt Disney.
Didn’t you used to hate Walt Disney above all others?
Yes. But now it’s Spielberg. I think Spielberg is the son from when Walt Disney fucked Minnie Mouse. And then there was Spielberg. But in terms of industrial pictures, there is a picture that I think is a masterwork, and that is Starship Troopers. That, for me, is the most beautiful cowboy picture I ever seen. It’s fantastic.
Where do you live these days?
In Paris, near the Arc of Triumph.
Is that where you call home?
The only home I have is my shoes. I have no more home. I never feel at home. Or I always feel at home.
Notes

1. It’s perhaps worth noting that, as part of a 1965 performance in Paris entitled “Sacramental Melodrama,” Jodorowsky stood inside a giant plastic vagina, throwing live turtles at his audience.

2. El Topo is difficult to summarise. It starts out like a Sergio Leone rip-off, with Jodorowsky’s black-clad gunslinger coming riding in from the desert with his young son. By the time he sets out on a quest against four mystic gun gurus, however, it’s like Fellini making a Buddhist parable with food poisoning. By the final section, when Jodorowsky’s hero has been transformed into a humbled, bald albino messiah, tunnelling his way through a mountain to save an underground town full of deformed outcasts, it’s like nothing you’ve ever seen.

The Holy Mountain 3. Armed with the bigger budget, The Holy Mountain (right) saw Jodorowsky set his visions free in a fried New Age fable, shot like a Technicolor comic-book. Set in a fetid South American dystopia, Jodorowsky plays guru to a group of would-be immortals — including, apparently, Christ — seeking to scale The Holy Mountain and replace the illuminati at the top. It’s doubtful whether anyone watching this film for the first time has ever had any idea what is actually happening in it, but there’s plenty to see, including a scene depicting a cast of toads and lizards re-enacting the Conquistadors’ conquest of Latin America, in costume.

4. A loose adaptation of Herbert’s epic, budgeted at $20 million in 1975, Jodorowsky’s Dune was to have featured Orson Welles, Salvador Dali, Alain Delon and Mick Jagger among the cast, and a score by Pink Floyd. Dan O’Bannon worked on the script, while the artists H. R. Giger and Jean Giraud (the comic-book artist better known as Moebius) developed designs for the film. O’Bannon and Giger were only the most notable of the aborted Dune talent to reconvene for Alien, and there are persistent rumours that several of the set designs were eerily similar to some later used in Star Wars. Jodorowsky and Moebius themselves recycled and developed elements from the Dune project in their 1980s comic strip saga, The Incal. To Jodorowsky’s anguish, Dune itself was, of course, finally brought to the screen by David Lynch, an avowed fan of Jodorowsky’s work.

5. A tale of girl-meets-elephant and discovers they share an entwined destiny, adapted from Reginald Campbell’s 1930 novel, Poo Lorn of the Elephants.

6. A fever dream of a film, Santa Sangre stars Jodorowsky’s son, Axel, as the son of a circus knife-thrower and female trapeze artist, who gets locked in a Mexican asylum after seeing dad hack off mum’s arms. Escaping twenty years later, he “becomes” his mother’s limbs in her new magic act, but also in her after-hours sex-and-religion-driven murder sprees. A proper Jodorowsky movie: beautiful, grotesque, hypnotic and stomach turning in about equal measure.

7. The result of a particularly fraught shoot (Jodorowsky on O’Toole: “I hated him”), The Rainbow Thief is a whimsical, only slightly unsettling and demented knockabout parable, about a maverick prince (O’Toole) and his sidekick, a thief (Sharif), who live in the city sewers.

8. There are an awful lot of dead rabbits in El Topo.

Bright Lights Film Journal :: The Mole Man: Interview with Alejandro Jodorowsky.

उपनिवेशवाद / साम्राज्यवाद कभी प्रगतिशील नहीं होता (रामविलास शर्मा की याद )- प्रणय कृष्ण

(यह लेख उद्भावना पत्रिका के हाल ही में प्रकाशित रामविलास शर्मा महाविशेषांकसे लिया गया है. प्रकाशित लेख की प्रूफ संबंधी अशुद्धियाँ यहाँ यथासंभव ठीक कर इसे प्रस्तुत किया जा रहा है .)  

BY प्रणय कृष्ण

रामविलास शर्मा के बौद्धिक संघर्ष को महज साहित्य तक सीमित मानकर उसे नहीं समझा जा सकता. उनके काम को भाषा विज्ञान, दर्शन, इतिहास, राजनीतिविज्ञान, अर्थशास्त्र आदि समाजविज्ञानों में बाँट कर देखना-समझना और उससे निष्कर्ष निकालना और भी गलत है. कभी-कभी कुछ अकादमिक विद्वान उनके लिखे-पढ़े को समाजविज्ञान की किसी शाखा की पद्धतियों से बाँध कर उसकी प्रशंसा या निंदा करते हैं. दर-असल उनके लिखे-पढ़े का सम्बन्ध समकालीन समाज-विज्ञानों के अनुभववादी रुझान से कतई नहीं है. उसका सम्बन्ध मार्क्सवाद से ग्रहण की गई उस अध्ययन पद्धति से है जो दृश्यमान को भेदकर वास्तविकता तक पहुँचनेवाली समग्रतावादी पद्धति है. उसमें ‘स्पेश्लाइज़ेशन’ वाला रुझान नहीं है. साम्राज्यवाद-विरोधी मुक्ति-संघर्ष के बौद्धिक-योद्धा के रूप में ही उन्होंने साहित्य से लेकर तमाम क्षेत्रों में अनथक दौड़ लगाई. वे अगर कुछ थे तो भारत के अग्रणी साम्राज्यवाद-विरोधी चिन्तक थे जैसे कि कई अन्य पराधीन रहे देशों के ऐसे ही चिन्तक. फ्रान्ज़ फैनन को आप सांस्कृतिक अध्ययन, जेंडरस्टडीज़, उत्तर-औपनिवेशिक अध्ययन, मनोरोगशास्त्र, सोशल एक्सक्लूज़न, अश्वेत अध्ययन आदि तमाम शाखाओं में पढ़ सकते हैं जिनमें से ज़्यादातर अनुशासन गैर-पारंपरिक हैं, लेकिन अंततः आप उनके साहित्य को उपनिवेशवाद-विरोधी चिंतन की विश्व-धरोहर में ही स्थान देंगे. फैनन से हम कई अर्थों में उनकी तुलना नहीं कर सकते, लेकिन रामविलास शर्मा का लेखन भी उपनिवेशवाद-विरोधी चिंतन की विश्व-धरोहर है. वे तीसरी दुनिया के मुक्ति-संग्रामों के पिछले दौर के तमाम बड़े चिंतकों की तरह ही मार्क्सवाद को पराधीन देशों की मुक्ति का दर्शन मानते थे.

Ram-Vilas-Sharma

बौद्धिक योद्धा की उनकी भंगिमा अकादमिक निस्संगता (और अहम् को भी) चोट पहुंचाने वाली है. डेविड मैकलेनन ने लिखा है, “मार्क्स की मृत्यु के बाद की शताब्दी में समाज-विज्ञानों का जो ज़बरदस्त विकास हुआ है, उसमें इकहरेपन के दो आयाम हैं- लम्बवत (वर्टिकल) अर्थ में वह संकीर्ण ‘विशेषज्ञताओं’ के घेरे में उत्पादित ऐसे विद्वानों का (बौद्धिक) उत्पाद है जो कम से कम के बारे में अधिक से अधिक जानते हैं और क्षैतिज (हारिजान्टल) अर्थ में उसका सम्बन्ध समाज के सतही घटना-प्रपंच से है जो प्रेक्षण और परिमाण के मापन के लिए आसानी से सुलभ हैं.”

ज़ाहिर है कि रामविलास शर्मा का चिंतन इस इकहरेपन के खिलाफ है. वे वस्तुओं की गतिशील अंतर्संबद्धताओं का पता लगाने, उनकी तह तक पहुँचने की कोशिश में इतिहास, दर्शन, समाज, राजनीति, कला-साहित्य और अर्थव्यवस्था का अध्ययन करते हैं, अकादमिक सैर पर निकलने के किसी शौक के चलते नहीं. हर अनुशासन में जाने के पीछे प्रेरणा कहीं भी महज अकादमिक नहीं है. एक ही प्रेरणा है ‘साम्राज्यवाद और सामंतवाद का विरोध’, भारत की आज़ादी के बाद भी औपनिवेशिक अन्यथाकरण को ध्वस्त करते हुए पूरे उप-महाद्वीपीय इतिहास, संस्कृति और जन-जीवन की वास्तविकताओं को वापस पाना, स्वायत्त करना ही उनकी प्रेरणा है, बहुत कुछ एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमरीका के उन उपनिवेशवाद-विरोधी चिन्तकों की तरह जिन्होंने वि-उपनिवेशीकरण के दौर में अपने-अपने देशों-महाद्वीपों के बारे में सारे साम्राज्यवादी चिंतन और तर्क-पद्धति को पलटा. गिरिजा कुमार माथुर की काव्य-पंक्तिया हैं –

मेरी छाती पर रखा हुआ साम्राज्यवाद का रक्त-कलश

मेरी धरती पर फैला हैमन्वंतर बनकर मृत्यु-दिवस

इन्हें ही संदर्भित कर अपने बारे में बोलते हुए ११ जनवरी, 1994 को साहित्य अकादमी में रामविलास जी ने कहा, “गिरिजाकुमार ने एक बात कही थी- ‘साम्राज्यवाद का रक्त-कलश’- यह किसी न किसी रूप में मेरे मन में बराबर रहती है.”

इसीलिए उन्होंने साहित्य की प्रगतिशीलता का पैमाना भी ‘सामंतवाद और साम्राज्यवाद के विरोध’ को बनाया. इसी पैमाने पर उन्होंने हिन्दी के आधुनिक साहित्य को कसा और पुराने साहित्य को भी. इसी आधार पर उन्होंने परम्परा का मूल्यांकन किया. जब साम्राज्यवाद के अधीन भारत नहीं था, तब के साहित्य और सांस्कृतिक जागरण को उन्होंने ‘सामंतवाद के विरोध’ के आधार पर जनजागरण कहा और सामंतवाद के साथ साम्राज्यवाद के विरोध पर आधारित जागरण को ‘नवजागरण’ कहा. भाषा- विज्ञान की तरह रुख करने का कारण भी साम्राज्यवाद का विरोध था. रामविलास शर्मा ने खुद ही कहा है, “भाषा -विज्ञान में काम करने की एक प्रेरणा ये थी की पाश्चात्य विद्वान कहते थे की भारत का कोई भी भाषा परिवार भारत का नहीं है… साम्राज्यवाद कहता है की तुम्हारा कोई भाषाई रिक्थ नहीं है. मैं कहता हूँ कि हमारा भाषाई रिक्थ है, हमारे भाषा-परिवारों के आपसी सम्बन्ध समझे बिना तुम यूरोप की भाषाओं का विकास नहीं समझ सकते.”(11 जनवरी, 1994 को साहित्य अकादमी में दिया गया व्याख्यान) दर्शन शास्त्र के अध्ययन में प्रवृत्त होने का कारण भी यही है. रामविलास जी के शब्दों में,” कुछ लोगों ने दर्शनशास्त्र पर लिखना शुरू किया. सुरेन्द्रनाथ दासगुप्ता ने जो भारतीय दर्शन का इतिहास लिखा है, उसके आरम्भ में उन्होंने बताया है, कैसे यूरोप के लोग कहते हैं कि भारत का कोई दर्शन नहीं है. भारत में देवकथाएं हैं, मिथक हैं, काव्य हैं और धर्म तो हैं ही. लेकिन विवेक-सम्पन्न दर्शन भारत में नहीं है. आपके पास कोई भाषाई रिक्थ नहीं है, कोई दार्शनिक रिक्थ नहीं है.” (उपरोक्त भाषण से) भारतीय अर्थशास्त्र, इतिहास और सामाजिक व्यवस्था के क्षेत्र में उन्होंने जो काम किया वह तो उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद के औचित्य-स्थापन को ध्वस्त करने के लिए सबसे ज़रूरी था. मानव-मुक्ति, तीसरी दुनिया और भारत की मुक्ति के लिए वे जिस एकमात्र विचारधारा को ज़रूरी मानते थे, वह थी मार्क्सवाद. वे यह देख रहे थे कि साम्राज्यवाद के समर्थक,भारत की गुलामी को औचित्यपूर्ण ठहरानेवाले बहुत से विचारकों को मार्क्स की भारत संबंधी आरंभिक धारणाओं, खुद पूंजीवाद को एक ख़ास ऐतिहासिक मोड़ पर प्रगतिशील मानने की उनकी धारणाओं से बल मिल रहा है. ऐसे में उनके लिए सबसे ज़रूरी था कि मार्क्स-एंगेल्स के विचारों का विकास दिखलाकर यह बताएं कि कैसे भारत के बारे में, उसके अर्थतंत्र, समाज-व्यवस्था के बारे में, भारत में औपनिवेशिक हस्तक्षेप के मूल्यांकन के सन्दर्भ में उनके विचार कैसे और क्यों बदले, ताकि कोई उनके विचारों के समृद्ध, और विकसनशील रिक्थ में से कुछ को चुनकर साम्राज्यवाद की प्रगतिशीलता स्थापित न कर सके. हम इस लेख में मुख्यतः रामविलास जी के इसी पक्ष पर अपना ध्यान केन्द्रित रखेंगे, लेकिन मार्क्सवाद से उनकी संलग्नता का एक दूसरा पहलू भी है जो कम महत्वपूर्ण नहीं है. वह पहलू यह है की मार्क्सवाद के स्रोतों में मुख्यतः क्लासिकीय जर्मन दर्शन, फ्रांसीसी समाजवाद और ब्रिटिश राजनीतिक अर्थशास्त्र की चर्चा होती है,लेकिन समग्र मानव-मुक्ति के दर्शन के रूप में उसके सतत विकास के लिए यह आवश्यक है की पूरब की बौद्धिक विरासत का अनुसंधान कर उसे सतत विकासशील मार्क्सवादी विचार-सरणी के वैध स्रोत के रूप में कैसे स्थापित किया जाए. रामविलास जी ने ‘मार्क्स और पिछड़े हुए समाज’ शीर्षक पुस्तक में क्लासिकीय मार्क्सवाद के स्रोतों में पूरब की बौद्धिक विरासत के योगदान को रेखांकित करने की पुरजोर कोशिश की है. मैं नहीं कह सकता की उस पुस्तक से मार्क्स और एंगेल्स के विचारों पर ‘यूरो -केन्द्रिक’ होने के आरोपों का किस हद तक परिहार होता है, लेकिन यह सच है की खुद मार्क्स और एंगेल्स ने जिस विचारधारा को जन्म दिया था, वह समूचे मानव समाज की मुक्ति की विचारधारा थी. उन्होंने अनेकशः अपने लेखन में पूरब में क्रान्ति की सम्भावनाओं को तलाशा था, गो की उन्हें विकसित देशों में समाजवादी क्रान्ति पहले होने की उम्मीद आखिर तक थी, जिसे इतिहास ने सही साबित नहीं किया. उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद से पीड़ित देशों के मार्क्सवादी बहुधा अपने देशों के इतिहास, समाज, दर्शन, साहित्य की समस्याओं पर विचार करते हुए मार्क्सवादी ज्ञान परम्परा को समृद्ध करते रहे हैं. इससे न तो मार्क्सवाद राष्ट्रवाद के मातहत हो जाता है और न ही उसका अंतर्राष्ट्रीयतावाद कहीं से आहत होता है. कुछ गैर मार्क्सवादियों और कुछ भूतपूर्व मार्क्सवादियों ने मार्क्सवाद का भारतीयकरण करने के लिए रामविलास जी की दाद दी है. अब रामविलास जी तो वापस आएँगे नहीं उन्हें यह बताने की मार्क्सवाद कोई ऐसी वस्तु नहीं जिसका ‘भारतीयकरण’, ‘पाकिस्तानीकरण’ या ‘जापानीकरण’ हो सकता हो. वह सार्वभौम मानवता की संपत्ति है. रामविलास जी उसे पिछड़े हुए देशों की मुक्ति के लिए विशेष प्रासंगिक पाते हैं जिनमें भारत भी एक है. उन्हीं के शब्दों में, “गोरे उपनिवेशों के अलावा पराधीन और नीम पराधीन देशों की जनता अपनी आज़ादी के लिए बराबर लड़ती रही. विश्व बाज़ार की बहुसंख्यक जनता पिछड़े हुए देशों की है. जो दर्शन, जो विज्ञान इस जनता को अपनी आज़ादी के लिए लड़ना सिखाता है, अपने पिछड़ेपन से निकलकर नए जीवन का निर्माण करना सिखाता है, उसका नाम मार्क्सवाद है.” (पृष्ठ 2, मार्क्स और पिछड़े हुए समाज) लेकिन पिछड़े हुए देशों के लोगों को, उनके मुक्ति-योद्धाओं और चिंतकों को यह विज्ञान, यह दर्शन उनकी ज़रूरतों के हिसाब से बना-बनाया नहीं मिला था. उन्हें इसे अपने परिस्थितियों में विकसित और समृद्ध करना था और है. मार्क्सवाद विचारों की कोई बंद व्यवस्था नहीं है, वह मार्क्स और एंगेल्स के जीवनकाल में ही पूर्ण नहीं हो गई. आगे के लोगों ने उसका विकास जारी रखा. नाम ही लेना हो तो लेनिन, रोजा लक्ज़मबर्ग, ग्राम्शी, माओ आदि उल्लेखनीय हैं. मार्क्सवाद, मशहूर मार्क्सवादी चिन्तक रणधीर सिंह के शब्द उधार लेकर कहें तो ‘अपूर्ण परियोजना’ (अनफिनिश्ड प्रोजेक्ट) है. मार्क्स-एंगेल्स ने किसी ‘क्लोज्ड सिस्टम’ का निर्माण नहीं किया था. मार्क्सवाद पर शासक वर्ग के लगातार होने वाले हमलों से उसकी रक्षा भे उसके विकास द्वारा ही संभव है.

रामविलास शर्मा के चिंतन की जो दूसरी बात उन्हें अकादमिक बौद्धिकता से अलग करती है, वह है उनकी अपने परिवेश से गहरी सम्बद्धता. उनके पाँव अपनी ही धरती में धंसे हुए हैं जहां से वे दुनिया को समझते हैं. अकादमिक बौद्धिकता के लिए गगनविहारी होना सुलभ है, सम्बद्ध होना दुष्कर. बैसवाड़े की धरती, अवध के लोकजीवन, भारत की किसान और मेहनतकश जनता, हिन्दी भाषा, भारतीय साहित्य, दर्शन, संगीत, कला और इतिहास से उनकी सम्बद्धता उनके विश्व-दृष्टिकोण के विकास में सहायक है, बाधक नहीं. यह सम्बद्धता शताब्दियों से चले आ रहे साम्राज्यवादी और उपनिवेशवादी वैदुश्य द्वारा पराधीन देशों, उनके इतिहास और उनके निवासियों के बारे में पूर्वाग्रहग्रस्त निष्कर्षों से लड़ने में उनकी सहायता करती है. यह सम्बद्धता उन्हें संकीर्ण नहीं बनाती, बल्कि तमाम पराधीन जातियों से ‘दर्द का रिश्ता’ बनाने और ‘मुक्ति का साझा’ करने में सहायक है. रामविलास जी का कहना था की उन्हें याद करने से ज़्यादा महत्वपूर्ण है उन्होंने जो सवाल उठाए हैं, जो मुद्दे उठाए हैं, उनपर विचार किया जाए. आज उनकी जन्मशती के अवसर पर ये मौक़ा है की हम उनको याद करने के ज़रिए उन विराट समस्याओं से रू-ब-रू हों जिन्हें हल करने का उन्होंने अथक प्रयास किया. वे पराधीन भारत में जन्में और जवान हुए और भारत की राजनीतिक आज़ादी के 55 साल देखने के बाद विदा हुए.

रामविलास शर्मा ने भारत में अंग्रेज़ी राज की प्रगतिशील भूमिका मानने से इनकार किया और यही उन्हें सामान्यतः उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद की प्रगतिशील भूमिका के बौद्धिक प्रत्याख्यान के अथक अभियान की ओर ले जानेवाला प्रस्थान-बिंदु है. वास्तव में यह धारणा (यानी उपनिवेशवाद/साम्राज्यवाद की प्रगतिशील भूमिका का नकार) पराधीन देशों के मुक्ति-संघर्षों तथा मार्क्सवादी चिंतन की विकासमान परम्परा की महत्वपूर्ण सैद्धांतिक देन है. मार्क्स-एंगेल्स के लेखन में भी बाद के दिनों में इस धारणा के बीज मिलने शुरू हो गए थे. यह सच है कि कम्यूनिस्ट मेनिफेस्टो सहित मार्क्स क़ी अन्य आरंभिक कृतियों में सामंतवाद और दूसरी प्राचीन उत्पादन पद्धतियों के मुकाबले पूंजीवाद उत्पादन की शक्तियों और संबंधों में लगातार क्रांतिकारी परिवर्तन करते चले जाने के अर्थ में प्रगतिशील बताया गया है. उसकी प्रगतिशीलता का दूसरा पहलू यह था कि वह इतिहास की पहली उत्पादन-व्यवस्था थी जो उन भौतिक परिस्थितियों तथा वर्ग-शक्तियों (सर्वहारा वर्ग) को पैदा कर रहीं थी जो उसका खात्मा करके समाजवाद की स्थापना करेंगी. लेकिन मार्क्स ने जब यह प्रतिपादित किया तो उनके सामने उदाहरण योरप का था, खासतौर पर ब्रिटेन और फ्रांस का जहां (19वीं सदी के मध्य में जबसे उनकी कृतियां मिलना शुरू होती हैं) पूंजीवाद पुराने सामंती सम्बन्धों को मिटाकर एक क्रांतिकारी भूमिका निभा रहा था. यदि यह माना जाए की पूंजीवाद की प्रगतिशीलता का निकष समाजवादी रूपांतरण के अंतिम लक्ष्य के लिए भौतिक परिस्थितियाँ पैदा करना है, तो यह भी मार्क्स और मार्क्सवाद की बहु आयामी प्रस्थापनाओं में से महज एक है जिसका सन्दर्भ 19वीं सदी के योरप में समाजवादी क्रान्ति की मार्क्स की उम्मीद है. वास्तव में 20वीं सदी की समाजवादी -मार्क्सवादी क्रांतियाँ पिछड़े हुए देशों में हुईं. मार्क्स ने ‘पूंजी’ लिखते वक्त भी चेताया था कि वे ‘पश्चिमी योरप में पूंजीवाद के उद्भव का ऐतिहासिक रेखाचित्र प्रस्तुत कर रहे थे और इसे किसी ऐसे ऐतिहासिक-दार्शनिक सिद्धांत के रूप में न समझा जाए जिस पर चलना किसी भी ऐतिहासिक परिस्थिति में सभी जातियों/जनता की नियति हो. लेकिन उसी ‘पूंजी’ में मार्क्स ने पूंजी के गढ़ों से बाहर उसके प्रसार (उपनिवेशवाद सहित) द्वारा मचाई गई भारी तबाही का वर्णन भी किया है. बाद में तो रूस और उसके पिछड़ेपन के सन्दर्भ में उन्ही संकटों पर वे ध्यान केन्द्रित करते हैं जो आज तीसरी दुनिया में हमारी समस्याएं हैं. वे लगातार विकसित और अर्द्ध-विकसित देशों के बीच द्वंद्वात्मक सबंधों पर ध्यान केन्द्रित कर रहे थे जहां पूंजीवाद ने विकसित देशों की छवि में किसी समरूप व्यवस्था को कायम करने के ज़रिए अपना प्रसार नहीं किया, बल्कि विकसित ओर अल्पविकसित क्षेत्रों के बीच ध्रुवीकृत विश्व-व्यवस्था का निर्माण किया. विकसित और अविकसित क्षेत्र द्वन्द्वात्मक अंतर्संबंधों में बंधकर एक सम्पूर्णता का निर्माण ज़रूर करते हैं, लेकिन वे इस व्यवस्था के परस्पर-समान अंग नहीं है और न ही कभी हो पाएंगे. विशेष रूप से 1870 और 1880 के दशकों में मार्क्स पूंजीवाद की सीधे-सीधे प्रगतिशील लगनेवाली तस्वीर से हट कर विचार करते हैं. उनका ध्यान इस दौर में उन अंतर्विरोधों और पेचीदगियों पर ज़्यादा केन्द्रित होता है जिनका सम्बन्ध उस परिघटना से है जिसे हम आज की शब्दावली में ‘पर-निर्भर विकास’ कहते हैं. पूंजीवादी केन्द्रों ने जिस विराट परिधि को पैदा किया, इतिहास की बड़ी तस्वीर में मार्क्स के यहाँ अब उसका महत्त्व बढ़ चला. रामविलास शर्मा ने लगातार मार्क्स और एंगेल्स के विचारों में विकास को दर्शाया कि किस तरह उन्होंने हर परिस्थिति में पूंजीवाद को प्रगतिशील नहीं ठहराया था. मार्क्स को विकासवादी नज़रिए से पढ़ने पर इतना ही समझ में आता है कि अंततः पून्जीवाद पिछली सभी उत्पादन पद्धतियों के सन्दर्भ से (यानी उनके मुकाबले) ज़रूरी, अपरिहार्य और प्रगतिशील है तथा वे तमाम प्राक-पूंजीवादी सामाजिक शक्तियां जो पूंजीवादी विकास के रास्ते में रोड़ा अटकाती हैं, वे वस्तुगत स्तर पर प्रतिक्रियावादी हैं. तीसरी दुनिया के वे मार्क्सवादी जो मार्क्स का विकासवादी पाठ (प्राणिविज्ञान में लामार्क के विकासवाद के समतुल्य) किए जाने से बराबर सावधान करते हैं, उनमें सादर रामविलास शर्मा का नाम लिया जा सकता है. यह भी ध्यान देने की बात है कि मार्क्स और एंगेल्स के विचारों में बदलाव या विकास अकस्मात् पैदा नहीं होते, बल्कि उनके बीज पहले के विचारों में मिल जाते हैं जिन्हें वे अनेक कारणों से बाद में ही विकसित करने का मौक़ा पाते हैं. मार्क्स के लिए कभी भी मानव समाज का विकास पूर्व -निश्चित चरणों में तत्वतः निर्धारित विकास नहीं था.’द जर्मन आइडियोलोजी’ में उनका कहना है, ” आगे का इतिहास पिछले इतिहास का लक्ष्य है……(यह सोचना) शुद्ध अटकलबाजी है, मिथ्या तोड़-मरोड़ है. ‘ग्रुन्द्रिस्से’ में वे कहते हैं कि’पिछले इतिहास की ‘नियति’, ‘लक्ष्य’ उसमें निहित भावी इतिहास के ‘बीज’ या ‘विचार’ जैसे पदों से जो अभिहित किया जाता है वह और कुछ नहीं बल्कि आगे के इतिहास से निकाले गए अमूर्तन मात्र हैं.’ मज़े की बात यह है कि ये वही प्रारम्भिक कृतियाँ है जिनका सर्वाधिक ‘विकासवादी’ पाठ किया जा सकता है, किया जाता रहा है. आगे जब हम देखेंगे कि पूंजीवाद को एक ख़ास ऐतिहासिक मोड़ और योरप के आधुनिक इतिहास के एक ख़ास क्षण में प्रगतिशील बताने वाले कार्ल मार्क्स की इस धारणा को कैसे सभी परिस्थितियों में सही मानने की प्रवृत्ति ने खुद मार्क्सवादी दायरे में उपनिवेशवाद के औचित्य-स्थापन की प्रवृत्ति को जन्म दिया, तब अधिक स्पष्ट होगा कि मार्क्स को पढने में सावधानियां बरतने की बात बारम्बार क्यों याद रखनी ज़रूरी है.

अकारण नहीं कि 21वीं सदी में अपने महाग्रंथ ‘क्रायसिस आफ सोशलिज्म’ में रणधीर सिंह लिखते हैं, “मार्क्स की रचनाओ की समृद्ध, बहु-आयामी रचनाशीलता की अपनी ‘खामोशियाँ’ और ‘खाली जगहें’ भी हैं -साथ ही सारे ही जीवित यथार्थ की तरह विरोधाभास भी. लेकिन इन रचनाओ में ‘खामोशियों’, ‘खाली जगहों’ पर केन्द्रित करते वक्त इनके विभिन्न और विरोधाभासी पहलुओं में से किसी एक को उसके सन्दर्भ और उनके समूचे रचनाकर्म में उसके स्थान की अवहेलना की कीमत पर अलगा कर देखना उनके मार्क्सवाद के प्रति नासमझी है, उसका अन्याथाकरण है.” (रणधीर सिंह, क्रायसिस आफ सोशलिज्म, पृष्ठ-43)

भारत खेतिहरों का देश है, दुनिया की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक है, उसकी मुक्ति की कठिनाइयां अनंत हैं. अपने देश के मेहनत-मजूरी करनेवालों, खेती करनेवालों को, कारीगरों को कब मुक्त इंसानों की तरह जीने और विकास करने का मौक़ा मिलेगा, कब वे मानसिक और भौतिक रूप से आज़ाद होंगे, ये आज़ादी कैसे हासिल होगी, कौन कौन से पहाड़ इस मुक्ति का रास्ता रोके खड़े हैं, यही रामविलास जी की चिंता का विषय था. सामंतवाद और साम्राज्यवाद ही ये पहाड़ हैं जिन्हें हटाए बगैर भारत देश गरीबी, पिछड़ेपन, जहालत, रोज़मर्रा के रोग- शोक से मुक्त नहीं होगा.

पूंजीवाद की प्रगतिशीलता : कब और किसके लिए ?

रामविलास शर्मा शुरू से ही इस बात को लेकर सजग हैं कि उपनिवेशवाद और ख़ास तौर पर भारत में अंग्रेज़ी राज की प्रगतिशीलता का मिथक पश्चिम योरप के सन्दर्भ में पूंजीवादी क्रांतियों की प्रगतिशीलता के मार्क्स के सामाजिक प्रगति के सिद्धांत से उपार्जित दृष्टिकोण है जो मार्क्स के लेखन की समग्रता की नासमझी से पैदा हुआ है.

हमने पहले ही लक्ष्य किया कि पूंजीवाद की प्रगतिशीलता का जो आख्यान मार्क्स की आरंभिक कृतियों में खासतौर पर मिलता है, उसका ख़ास सन्दर्भ है- पूंजीवाद सामंतवाद और अन्य पुरानी उत्पादन पद्धतियों का विनाश कर उत्पादन के साधनों में क्रांतिकारी परिवर्तन लाता है और मुनाफे के लिए उसे लगातार उत्पादन के साधनों में क्रांतिकारी परवर्तन लाते जाना उसकी संरचनागत मजबूरी है. पुरानी उत्पादन पद्धति से पूंजीवाद में रूपांतरण कैसे होता है?पूंजीवादी उत्पादन पद्धति कैसे अस्तित्व में आती है? “विकास के एक ख़ास चरण में, (पुरानी उत्पादन पद्धति) अपने ही विलोप की भौतिक शक्तियों को सामने लाती है. इस क्षण से नई शक्तियां और नया जोश समाज के हृदय में उफान मारता है, लेकिन पुराना ढांचा उन्हें रोकता है.उसका विनाश किया जाना होता है, विनाश किया गया. उसका सफाया (अर्थात) वैयक्तिक और बिखरे हुए उत्पादन के साधनों का सामाजिक रूप से केंद्रीभूत साधनों में रूपांतरण, ढेर सारे लोगों की बौनी संपत्तियों का कुछ लोगों की बड़ी संपत्तियों में रूपांतरण,विशाल जनसँख्या की ज़मीनों का स्वामित्वहरण, जीविका और श्रम के साधनों से उनकी बेदखली, बड़े पैमाने पर जनसँख्या का भयावह और दर्दनाक स्वामित्वहरण पूंजी के इतिहास की भूमिका है.” (पूंजी खंड 1, अध्याय 32) यह लिखते वक्त मार्क्स के सामने उदाहरण है पश्चिमी योरप का, ख़ास कर इंग्लैण्ड और फ्रांस का, वहां सामंतवाद के साथ पूंजीवाद के टकराव का. सच तो यह है कि यदि वे पूंजीवाद कि इस भूमिका को प्रगतिशील बता रहे थे तो निरपेक्ष रूप से नहीं, बल्कि इसलिए कि योरप को सामने रखकर उन्हें पूंजीवाद पुरानी गतिरुद्ध उत्पादन पद्धतियों और समाजवाद के बीच की ज़रूरी कड़ी लगता था. पूंजीवाद अपने मूलभूत अविवेकपूर्ण और अमानवीय रूप में रोज़-ब-रोज़ अभिव्यक्त होते हुए भी एक अधिक विवेकपूर्ण और मानवीय समाज व्यवस्था अर्थात समाजवाद की ओर रूपांतरण के लिए आधार तैयार करता प्रतीत हो रहा था. इंग्लैण्ड और फ्रांस जैसे देशों में समाजीकृत उत्पादन और पूंजीवादी अधिशोषण के बीच अंतर-विरोध, सर्वहारा और पूंजीपति के बेच अंतर्विरोध पूंजीवाद के भीतर विकसित उत्पादक शक्तियों के लिए अवरोध बना हुआ था जिसका समाधान था समाजवाद. पूंजीवाद ने समाजवाद के लिए विकसित उत्पादक शक्तियों के रूप में न केवल भौतिक आधार तैयार कर दिया था, बल्कि ‘अपनी (अर्थात पूंजीवाद की) ही कब्र खोदने वालों’ यानी सर्वहारा वर्ग को भी जन्म दे दिया था. मार्क्स इस दौर में समाजवादी रूपांतरण के लिए वस्तुगत भौतिक आधार पर काफी जोर देते दिखाई देते हैं. इस दौर में वे उत्पादक शक्तियों में भारी इजाफा, उच्च स्तर के विकास को मानव मुक्ति की आधारभूत शर्त मानते हैं क्योंकि इसके बगैर यानी अभाव और गरीबी की सामान्य दशा में ‘व्यक्तिमत्ताओं का उन्मुक्त विकास’ संभव ही नहीं है जो समाजवाद के लिए ज़रूरी है. उत्पादक शक्तियों में, उत्पादन की प्रक्रिया में उच्चतम विकास पूंजीवाद की विकसित अवस्था वाले देशों में ही था. ऐसा विकास पूंजीवाद ही लाया था. वह प्रगतिशील इस मायने में था की उसने समाजवाद के रूप में मनुष्य को ‘ज़रुरत के दायरे’ से मुक्त ‘ आज़ादी के दायरे में’ दाखिल होने की ज़रूरी परिस्थितियाँ तैयार कर दी थीं. मध्य-युगीन, सामंती पद्धतियों के उत्पादन स्तर पर ऐसा सोचना भी संभव न था. कह सकते हैं कि यह सामाजिक क्रान्ति का मार्क्स का मुख्य सिद्धांत है. लेकिन उनके लेखन में आरम्भ में भी और बाद के दौर में और भी अधिक (सामाजिक क्रान्ति) की वैकल्पिक संभावनाएं और परिप्रेक्ष्य मिलते हैं. उनके यहाँ ऐतिहासिक बदलावों का कोई एकरेखीय, सीधा, चरणबद्ध, पूर्व-निर्धारित ढांचा नहीं है. ग्रुन्द्रिस्से में वे पूंजीवाद से पहले के मानवीय अतीत में उत्पादन पद्धतियों की बहुलता को स्वीकार करते हैं जो कि ख़ास स्थानीय, भौगोलिक, नृवंशीय और ऐतिहासिक परिस्थितियों के प्रभाव में विकसित होती दिखाई देती हैं, जिनमें से प्रत्येक का विश्लेषण उसके अपने स्वतंत्र विकास के तर्क और कोटियों में किए जाने की दरकार है. 1880 से 1882 के बीच अपने ‘क्रोनोलाजिकल नोट्स’ में वे पूंजीवाद के आगे के मानवीय भविष्य के लिए भी उसी तरह रास्तों की बहुलता को मान कर चलते हैं. रणधीर सिंह पश्चिम योरप में पूंजीवाद के विकास के अध्ययन से प्राप्त सामाजिक प्रगति के मार्क्स के सिद्धांत को मुख्य मानते हुए उनके द्वारा प्रस्तावित सामाजिक प्रगति या क्रान्ति के वैकल्पिक रास्तों को उसका सहवर्ती (या पूरक) सिद्धांत मानते हैं. इस दूसरे सिद्धांत का सम्बन्ध अपेक्षाकृत पिछड़े हुए देशों, ‘बाधित’ या देर से विकसित हुए, अशास्त्रीय पूजीवादी विकास वाले देशों से है. मार्क्स इस दूसरे सिद्धांत को पूरी तरह से विकसित नहीं कर सके थे. 1945 में ‘जर्मन आइदियालोजी’ में भी जहां वे विकसित जन (देशों की जनता) की क्रांतिकारी संभावनाओं की बात करते हैं वहीं वे अपवादस्वरूप असमतल विकास के परिणामस्वरूप किसी अल्पविकसित देश में भी समाजवादी क्रान्ति के उभार की संभावना देखते हैं. यह अपवाद ही 20वीं सदी में नियम बन गया.

1840 के दशक के आरम्भ से ही मार्क्स का ध्यान जर्मनी के विलंबित पूंजीवाद और वहां संभावित देर से होनेवाली बुर्जुआ क्रान्ति की ओर इस आशा में गया कि वहां की बुर्जुआ क्रान्ति उसके तत्काल बाद संभावित सर्वहारा क्रान्ति की पूर्वपीठिका बनेगी. कम्यूनिस्ट मेनिफेस्टो में उन्होंने लिखा, कम्यूनिस्टों का ध्यान प्रमुख रूप से जर्मनी की ओर है. वह देश बुर्जुआ क्रान्ति के मुहाने पर खडा है जिसका होना योरपीय सभ्यता की अधिक विकसित अवस्था में होने तथा वहां (जर्मनी में) 17वीं सदी के इंग्लैण्ड तथा 18वीं सदी के फ्रांस के मुकाबले कहीं अधिक विकसित सर्वहारा वर्ग के कारण अवश्यम्भावी है. इसलिए भी कि जर्मनी में बुर्जुआ क्रान्ति उसके तत्काल बाद होनेवाली सर्वहारा क्रान्ति की पूर्वपीठिका होगी.” मार्क्स और एंगेल्स ने जिस बुर्जुआ क्रांति की उम्मीद की थी, वह 1848 में हुई भी, दोनों ने उसमें भाग भी लिया, लेकिन डगमगाते कदमों से कुछ दूर आगे बढ़ने पर बुर्जुआ ने समझौता कर लिया और क्रान्ति बुर्जुआ अर्थों में भी असफल रही. जिस विकसित सर्वहारा वर्ग होने के चलते मार्क्स को वहां बुर्जुआ क्रान्ति के तत्काल बाद समाजवादी क्रान्ति की उम्मीद थी, उसी के डर से बुर्जुआ वर्ग ने पुरानी सामंती व्यवस्था के साथ समझौता कर लिया. मार्क्स के लिए इंग्लैण्ड (1649) और फ्रांस (1789) की बुर्जुआ क्रांतियाँ इसीलिए क्रांतियाँ थीं क्योंकि ‘उस समय बुर्जुआ की जीत नई सामाजिक व्यवस्था की जीत थी’. लेकिन जर्मनी के अनुभव से उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि बुर्जुआ वर्ग अब क्रांतिकारी नहीं रह गया था, उसने सामंतवाद से समझौता किया, उसका विनाश नहीं किया क्योंकि आसन्न सर्वहारा क्रान्ति का भय उस पर भारी पडा. इस बिंदु पर मार्क्स और एंगेल्स पूंजीवाद की प्रगतिशीलता के प्रति विश्वासी नहीं रह गए. जर्मनी का पूंजीपति वर्ग खुद अपनी बुर्जुआ-जनतांत्रिक क्रान्ति पूरा करने के भरोसे के काबिल न रहा. मार्क्स एंगेल्स का यह विश्लेषण आगे रूस में बोल्शेविकों के बहुत काम का साबित हुआ जब लेनिन ने ‘लगातार जारी’ क्रान्ति की राजनीतिक लाइन सूत्रबद्ध की जिसके आलोक में उन्होंने फरवरी से अक्टूबर 1917 की क्रान्ति का रास्ता तय किया. चीनी क्रान्ति का प्रारम्भिक चरण माओ की उस नव जनवादी क्रान्ति से शुरू हुआ जिसका नयापन इस बात में ही निहित था कि वह अतीत की उन सफल जनवादी क्रांतियों से भिन्न थी जहां पूंजीपति वर्ग ने योरप में सामंती वर्चस्व का खात्मा कर दिया था. कमज़ोर, ढुलमुल और जनक्रांति की संभावनाओं से भयाक्रांत चीन का पूंजीपति वर्ग यह काम कर ही नहीं सकता था. मार्क्स का यह विश्लेषण कि सामंतवाद -विरोधी कृषि क्रान्ति एक सफल बुर्जुआ क्रान्ति का मूल है और किसी भी सुसंगत और पर्याप्त पूंजीवादी विकास की पूर्व-शर्त है, 20वीं सदी की क्रांतियों के ऐतिहासिक अनुभवों से प्रमाणित है. जहां इन क्रांतियों को मार्क्सवादियों ने नेतृत्व दिया जैसे कि चीन और रूस में,वहां के परिणाम पूंजीवादी विकास की दृष्टि से क्या हुए और जहां खुद बुर्जुआ ही नेतृत्वकारी ताकत बना रहा जैसे कि भारत में, वहां क्या हुए, इसकी तुलना भी मार्क्स के विश्लेषण को ही प्रमाणित करेगी. रूस और चीन में सामंती अवशेष ख़त्म हुए और भारत में अभी भूमि-सुधार आज़ादी के 65 साल बाद न केवल पूरे नहीं हुए, बल्कि अब तो नव- उदारवादी निजाम में भूमि सुधार के जो आधे-अधूरे प्रयास अतीत में किए गए थे, उन्हें पलटा जा रहा है.

1848 में जर्मनी का पूंजीपति वर्ग यदि सामंतवाद को मिटा कर पूंजीवादी- जनतान्त्रिक क्रान्ति भी नहीं कर सका तो इसीलिए कि वह पुराने (सामन्ती और मध्ययुगीन) समाज के खिलाफ नए (पूंजीवादी और आधुनिक) समाज की नुमाइंदगी नहीं कर रहा था, क्योंकि उसका सम्बन्ध खुद उस पुराने सामंती समाज से था और वह उसी पुराने अप्रासंगिक समाज के भीतर अपने हितों का नवीनीकरण चाह रहा था. (समाजवादी जन-क्रान्ति का भूत उसे अलग सता रहा था.) यही मार्क्स ने उसके चरित्र के बारे में कहा. इस परिघटना की ऐतिहासिक, देश-कालगत विशिष्टता को यदि हम थोड़ी देर के लिए आँख से ओझल करके विचार करें तो पूंजीपति वर्ग का यही चरित्र (जिसे मार्क्स ने उक्त प्रसंग में चिन्हित किया) विलंबित विकास वाले औपनिवेशिक तथा उपनिवेशवाद से आज़ाद हुए देशों के पूंजीपति वर्गों की लाक्षणिक विशेषता है. इन देशों के सत्ता संघर्ष में तथा जहां वे सत्ता में हैं वहां जिस किस्म का पूंजीवादी विकास वे लाए हैं, यह चरित्र अभिव्यक्त होता है. मार्क्स ने ‘पूंजी’ के जर्मन संस्करण के पहले भाग की भूमिका (1867) में लिखा था, “हम… न केवल पूंजीवादी उत्पादन के विकास बल्कि उसके अधूरेपन का भी कष्ट भोग रहे हैं. आधुनिक बुराइयों के साथ साथ विरासत में पाई गई बुराइयों का एक पूरा सिलसिला हमें सता रहा है जो कि पुरानी धुरानी उत्पादन पद्धति के निष्क्रिय रूप में जीवित बने रहने से उपजता है, जो राजनीतिक और सामाजिक पुरावशेषों की अपरिहार्य श्रृंखला को लिए-दिए चलता है. हम सिर्फ जीवित ही नहीं, बल्कि मृत का भी कष्ट भोग रहे हैं’ 1848 की जर्मन क्रान्ति को आधी सदी से भी ज़्यादा देर से हुई बताते हुए मार्क्स ने कहा कि योरपीय क्रान्ति से बहुत अलग वह एक पिछड़े देश में योरपीय क्रान्ति की द्वितीयक स्तर (सेकेंडरी आर्डर) की परिघटना थी. उन्होंने लिखा, ” आम जानकारी है कि दूसरे क्रम की बीमारियों का इलाज ज़्यादा मुश्किल होता है, साथ ही वे शरीर को प्राथमिक बीमारी की अपेक्षा ज़्यादा नुक्सान पहुंचाती हैं.” (मार्क्स, ‘पूंजीपति और प्रति-क्रान्ति’ शीर्षक लेख, 11 दिसंबर, 1848, प्रोग्रेस पब्लिशर्स, मास्को, 1972 से 1994 में इन्टरनेट के लिए अनूदित) दर असल पिछड़े हुए देशों में पूंजीवाद की परिघटना विकसित योरपीय पूंजीवाद का द्वितीयक रूप ही है जिसमें सामंती अवशेष बचे रहते हैं और पूंजीपति बुर्जुआ जनतान्त्रिक क्रान्ति के अयोग्य होते हैं, सामन्तवाद के साथ गठजोड़ करते हैं. कुल मिलाकर ऐसी जगहों पर बुर्जुआ जनतांत्रिक क्रान्ति भी सर्वहारा के नेतृत्व में ही संभव होती है समाजवादी रूपांतरण की ओर अग्रसर होती है. ऐसी क्रांतियों में सर्वहारा नेतृत्व में श्रमिक-किसान गठजोड़ भी आवश्यक है. 1848 में जर्मन बुर्जुआ क्रान्ति की असफलता के बाद भी एंगेल्स को 1856 में लिखा,” जर्मनी में सब कुछ सर्वहारा क्रान्ति को किसान युद्ध के किसी दूसरे संस्करण की सहायता मिलने की संभावना पर निर्भर है.” मार्क्स ने कृषि की प्रधानता वाले सभी समाजों में मज़दूर-किसान गठजोड़ बनाने पर लगातार जोर दिया. उन्होंने कभी भी यह तर्क नहीं रखा कि किसी भी ख़ास देश में समाजवाद की विजय उस देश की जनसंख्या में सर्वहारा के बहुमत में होने पर निर्भर है. वे लगातार ऐसी स्थितियों की तलाश में रहे जिनमें मजदूर दूसरे उत्पीडित तबकों के साथ मिलकर सत्ता पर कब्ज़ा कर सकें और समाजवादी रूपांतरण के लम्बे कष्टसाध्य लक्ष्य की ओर बढ़ने का आरम्भ कर सकें. पेरिस कम्यून के तुरंत बाद की विशष्ट स्थितियों में मार्क्स ने मज़दूर-किसान गठजोड़ का जो सैद्धांतिक माडल विकसित किया, वह आज भी पूंजीवादी दुनिया के अल्प-विकसित और विकासशील देशों में समाजवाद के लिए संघर्ष का एक मार्गदर्शक सिद्धांत बना हुआ है. इसे बाद में लेनिन द्वारा रूसी क्रान्ति के रणनीतिक और कार्यनीतिक व्यवहार के बतौर विकसित किया गया और रूस के समाजवादी रूपांतरण की परियोजना का अंग बना. पिछड़े हुए देशों की प्रगति का यही रास्ता मार्क्स-एंगेल्स-लेनिन-माओ के विचारों से निकलता है जिसमें पूंजीवाद और पूंजीपतियों की प्रगतिशीलता की धारणा निहित नहीं है. भारत में भी कम्यूनिस्ट पार्टियों ने इसी रास्ते को अपना मार्ग-निर्देशक माना (भले ही वे व्यवहार के स्तर पर, कार्यनीति के स्तर पर उनमें बहस हो) और उचित ही यह सूत्रबद्ध किया कि भारत एक ‘अर्द्ध औपनिवेशिक, अर्द्ध सामंती’ समाज है जहां कम्यूनिस्ट लोगों का काम जनवादी क्रान्ति करना, फिर समाजवादी रूपांतरण में जाना है. ऐसा कहते ही बहुत से लोगों को यह भी गलतफहमी हो जाती है कि ऐसा कहनेवाले भारत में पूंजीवाद नहीं मानते. वास्तव में ‘ अर्द्ध औपनिवेशिक,अर्द्ध सामंती’ जैसा पद विशेषण है, संज्ञा नहीं. अर्थात भारत में जो पूंजीवाद है वह औपनिवेशिक और सामन्ती विशेषताएं लिए हुए है. ‘सामंती अवशेष’ जैसे पद से ‘अनायास बचा-खुचा, थोड़ा सा रह गया’ जैसा भाव भी कभी कभी लोग ग्रहण करते देखे गए हैं. अवशेष कहने से भाव यह है कि पूंजी के युग में, जो विश्व-व्यापी है, पुरानी व्यवस्था अभी भी ख़ास कर उपनिवेश रहे देशों में पूंजीवाद के साथ साथ, उसके संरक्षण और सहयोग के साथ उसकी विशेषता के बतौर विद्यमान है. वह इसलिए विद्यमान नहीं है कि पूंजीपतियों ने उसे मिटाने का अभियान छेड़ रखा है, लेकिन अभी भी थोड़ी बहुत बची रह गयी है जो समय बीतने के साथ अंतिम रूप से पूंजीपतियों द्वारा ही ख़त्म कर दी जाएगी. इसके उलट औपनिवेशिक विरासत के बतौर वह पूंजीवादी उत्पादन व्यवस्था के भीतर पूंजीपतियों के सहयोग से कायम है, अनायास नहीं. इसी बात पर बल देने के लिए और ‘अवशेष’ शब्द में निहित गलतफहमी की गुंजायश को कम करने के लिए कुछ लोग ‘मज़बूत सामंती अवशेषों’ की बात करते हैं.

रामविलास शर्मा यह जानते थे कि पूंजीवाद और पूंजीपति वर्ग की प्रगतिशीलता मार्क्सवाद में ही निरस्त हो जाने के बाद भी एक ‘कामन-सेन्स’ के रूप में जीवित है, जिसके चलते ही मार्क्स द्वारा न्यू यार्क ट्रिब्यून में 1853 से 1858 के बीच लिखे गए 33 टिप्पणीनुमा ‘भारत संबंधी लेखों’ के एक ख़ास एकांगी पाठ के कारण बहुतों को यह भ्रम लम्बे समय तक (शायद आज भी) रहा है कि अंग्रेज़ी राज या ब्रिटिश पूंजीवाद ने भारत में एक प्रगतिशील भूमिका निभाई और उसके विरुद्ध 1857 का विद्रोह एक प्रतिक्रियावादी कदम था. एक सीमित अर्थ में और कुछ ख़ास प्रसंगों में मार्क्स को भले ही उपनिवेशवाद का एक ‘प्रगतिशील’ पक्ष नज़र आया हो, लेकिन उन्होंने एंगेल्स के साथ बराबर उपनिवेशवाद के खिलाफ प्रतिरोध का सकारात्मक मूल्यांकन किया, उसपर खुशी मनाई. रामविलास शर्मा ने लम्बे समय तक धैर्यपूर्वक पूंजीवाद और पूंजीपति वर्ग की प्रगतिशीलता का प्रत्याख्यान करते हुए मार्क्सवाद के पूर्वी समाजों के बारे में विकसित हुए विचारों के क्रांतिकारी आशयों की भारत के किसी भी अन्य बौद्धिक के मुकाबले विशद व्याख्या की.

अंग्रेज़ी राज की प्रगतिशीलता के मिथक का एक स्रोत यह धारणा थी कि पूंजीवादी विकास की दृष्टि से इंग्लैण्ड एक बढ़ा हुआ देश था और भारत में आधुनिक जनतांत्रिक शासन व्यवस्था, शिक्षा व्यवस्था, प्रगतिशील क़ानून और समाज सुधार, नागरिक अधिकारों की प्रक्रिया को उसने आरम्भ किया. रामविलास शर्मा ने दिखलाया कि 20वीं सदी के पूर्वार्द्ध तक इंगलैंड में अभी भी ज़मींदार वर्ग ही शासन सत्ता के हर क्षेत्र में हावी था. औद्योगिक क्रांति हो जाने के बावजूद, नए और बढ़ाते हुए उत्पादन संबंधों के अनुकूल राजसत्ता और शासन में परिवर्तन नहीं हुआ था और सत्ताधारी नया भूस्वामी वर्ग पुरानी व्यवस्था कायम किए हुए था जिसके खिलाफ औद्योगिक पूंजी के प्रतिनिधि तथा मज़दूर वर्ग अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए लड़ रहे थे. देहातों में ज़मींदार घुस देकर, शराब पिलाकर और आतंक और ह्त्या के बल पर मतदान कराते थे. (जैसा भारत में आज़ादी के 50-60 सालों बाद तक होता रहा है, अंग्रेजों के तथाकथित लोकतांत्रिक शासन के अधीन 200 साल और फिर भारत में काले अंग्रेजों के 50 साल के शासन के बाद भी).सार्वभौम बालिग़ मताधिकार अभी इंग्लैण्ड में लागू न था. अंग्रेज़ी स्रोतों से ही, ख़ास तौर पर पूंजीपतियों के नेता ब्राईट के भाषणों को उद्धृत कर रामविलास शर्मा यह दिखलाते हैं कि 1863 तक भी वहां खेत मजदूरों की स्थिति अर्धदासता की थी, सामंती धाक मौजूद थी और मजदूरों पर दमन भी भरपूर था. इंग्लैण्ड का सत्ताधारी भूस्वामी वर्ग ही भारतीय उपनिवेश के लिए भी नीतियाँ तय कर रहा था. ऐसे में वह कौन से आधुनिक जनतांत्रिक मूल्य भारत में ला रहा था जो वह अपने देश में ही लाने को तैयार न था? मूल रूप से 1957 में लिखी पुस्तक ‘सन सत्तावन की राज्यक्रान्ति और मार्क्सवाद’शीर्षक पुस्तक में रामविलास शर्मा विस्तार के साथ यह सवाल उठाते हैं. प्रसंगवश यह उल्लेख करना ज़रूरी है कि खुद मार्क्स और एंगेल्स के लेखन में इंग्लैण्ड के पूंजीपति वर्ग द्वारा (फ्रांस के ठीक विपरीत) सामंती अभिजात वर्ग के साथ लम्बे समय तक चले मोल-तोल और समझौतों का उल्लेख मिलता है जिसका रामविलास शर्मा ने उपयोग भी किया है. प्रसंगवश यह भी उल्लेखनीय है कि ग्राम्शी ने अपनी ‘प्रिज़न नोटबुक्स’ में दर्ज किया है कि जिस तरह फ्रांस में सामंती ढाँचे को बलपूर्वक उखाड़ फेंका गया, वैसा योरप में पूंजीवाद ने कहीं नहीं किया, बल्कि प्रायः हर जगह सामंती अभिजातवर्ग के साथ पूंजीपतियों के समझौतों की लम्बी श्रृंखला मिलती है. इस पूरे संक्रमण के दौर में आम जनता की कोई भागीदारी नहीं है. यदि वह इस अर्थ में क्रान्ति है कि उसने अंततः सामंतवाद को समाप्त कर नई सामाजिक व्यवस्था कायम की, तो वह हद से हद एक ‘निष्क्रिय क्रान्ति’ (पैसिव रेवोल्यूशन) ही थी. ग्राम्शी यहाँ तक कहते हैं कि आधुनिक योरपीय राज्यों का जन्म सुधारों की छोटी और क्रमिक लहरों से हुआ, न कि फ्रांस की तरह क्रांतिकारी विस्फोट के ज़रिए. ये ‘क्रमिक लहरें’ सामाजिक संघर्षों के संयोजनों, प्रबुद्ध राजशाहियों आदि द्वारा ऊपर से किए गए हस्तक्षेप और जातीय युद्धों के दबाव में उठीं. इनमें से जातीय (राष्ट्रीय) युद्धों की भूमिका ही प्रमुख थी. कहना न होगा कि औपनिवेशिक भारत और ब्रिटिश सम्बन्ध का जैसा विवेचन रामविलास शर्मा ने किया है, वह ग्राम्शी की उपरोक्त प्रस्थापनाओं को सिद्ध करता है,बावजूद इसके कि रामविलास ग्राम्शी की स्थापनाओं का सहारा नहीं लेते और स्वतंत्र विवेचन के ज़रिए इन्हीं निष्कर्षों पर पहुंचते हैं.

पश्चिम योरप के ऐतिहासिक अनुभवों पर आधारित मार्क्स का सामाजिक प्रगति का सिद्धांत और पूर्वी तथा अल्पविकसित देशों के अनुभवों पर आधारित मार्क्स का सामाजिक सिद्धांत, दोनों को रणधीर सिंह जैसे विचारक क्रमशः प्रमुख सिद्धांत और सहवर्ती या पूरक सिद्धांत के रूप में देखते हैं अर्थात दोनों में पहले और बाद का रिश्ता नहीं है, दोनों साथ चलते हैं, यह ज़रूर है कि दूसरा वाला बाद के दिनों में प्रमुखता पाता है और मार्क्स अपने जीवन काल में उसका समग्र सैद्धांतिक निरूपण नहीं कर सके. लेनिन और फिर बाद में माओ इसका विकास करते हैं. दोनों में आपाततः विरोधाभास दीखता है लेकिन सन्दर्भ सहित समझने पर विरोधाभास से ज़्यादा सह्वार्तिता दिखती है. रामविलास शर्मा सह्वार्तिता की जगह इसे मार्क्स और एंगेल्स के विचारों में आए विकास(बदलाव के अर्थ में) की तरह समझते हैं, बहुत कुछ त्योदोर शैनिन (लेट मार्क्स एंड द रशियन रेवोल्यूशन: मार्क्स एंड दि पेरीफेरीज़ आफ कैपिटलिज्म, 1983) की तरह. वे दोनों में विरोध भी देखते हैं. रामविलास शर्मा के शब्दों में, ” पूंजीपति, मजदूर, किसान, पराधीन देश – इन सब के बारे में मार्क्स की धारणाएं परस्पर सम्बद्ध थीं. एक के बारे में धारणा बदली हो, बाकी के बारे में ज्यों की त्यों बनी रही हो, यह संभव नहीं था. (1) पूंजीपति वर्ग भरपूर क्रांतिकारी है, पुरानी व्यवस्था को आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक स्तर पर बदल देता है. विरोधी धारणा- वह भरपूर क्रांतिकारी नहीं है, हर स्तर पर पुरानी व्यवस्था से समझौता करता है. (2) पूंजीवाद ने सर्वहारा क्रान्ति के लिए परिस्थितियाँ तैयार कर दी है, मजदूर वर्ग समाज का बहुसंख्यक भाग है, वह अकेले समाजवादी क्रान्ति संपन्न करेगा. विरोधी धारणा – अभी तो ज़मींदार वर्ग का प्रभुत्व ख़त्म करना है, मजदूर वर्ग समाज का बहुसंख्यक भाग नहीं है, क्रान्ति की सफलता के लिए किसानों का सहयोग ज़रूरी है. (3) किसान अपनी लघु संपत्ति से बंधे हुए हैं, वे प्रतिक्रियावाद के सहायक हैं, इसलिए मजदूरों को अपनी ही ताकत पर भरोसा करना चाहिए. विरोधी धारणा-किसानों में अनेक स्तर हैं, पूंजीवाद लघु संपत्ति वाले किसानों का भी शोषण करता है, किसान-संग्राम सर्वहारा क्रान्ति का सहायक होगा. (4) पराधीन देशों की समाज-व्यवस्था पुरातनपंथी है, विदेशी पूंजीवाद इस व्यवस्था को छिन्न-भिन्न कर के क्रांतिकारी भूमिका निभाता है, इन देशों का की जनता का उद्धार ब्रिटिश मजदूर वर्ग के उत्कर्ष पर निर्भर है. विरोधी धारणा- पूंजीपति पराधीन देशों की लूट का एक हिस्सा मजदूरों में बांटते हैं, ब्रिटिश मज़दूर वर्ग तब तक मुक्त न होगा जब तक आयरलैंड जैसे देश मुक्त न होंगे, ऐसे देशों का मुक्ति संग्राम, केवल ब्रिटेन के नहीं, सारी दुनिया के मजदूरों की मुक्ति के लिए निर्णायक होगा……. सामाजिक विकास संबंधी मार्क्स की धारणाओं में व्यापक परिवर्तन हुआ, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता.” (मार्क्सवाद और पिछड़े हुए समाज, पृ.482-83)

रामविलास जी जिन्हें विरोधी धारणाएं कह रहे हैं, उन्हें उनके सन्दर्भ में रख कर देखने पर विरोध की जगह सहवर्तिता ज़्यादा प्रतीत होगी. फिर इन दोनों सामाजिक प्रगति के सिद्धांतों में पूर्वापर क्रम भी नहीं है. दूसरे के बीज उन कृतियों में मिल जाएंगे जिनका मूल प्रतिपाद्य पहला वाला सिद्धांत है, यह हम इस आलेख में पहले देख चुके हैं, जबकि बाद की कृतियों में भी पहले वाले सिद्धांत की कई बातें विद्यमान हैं. उदाहरण के लिए 1880 के दशक में मार्क्स और एंगेल्स जब रूस में क्रान्ति की संभावना पर विचार करते हैं तो उनके सामने यह प्रश्न था कि वहां के किसानों में जो सामूहिक स्वामित्व की ‘पेजेंट कम्यून’ जैसी व्यवस्था थी, वह रूस में पूंजीवाद द्वारा नष्ट कर दी जाएगी या कि वह व्यवस्था एक उच्चतर स्तर पर समाजवादी रूपांतरण की प्रक्रिया के लिए मार्ग प्रशस्त करेगी, उसे तेज़ कर देगी. मार्क्स के लिए यह विचार का विषय था कि क्या इतिहास ने किसी जनता के लिए कितनी भी बारीक यह संभावना छोडी है कि वह सामंतवाद से सीधे ही साम्यवादी विकास की मंजिल में प्रवेश कर जाए. मार्क्स का विचार था कि ऐसा हो सकता है यदि रूस में क्रान्ति जल्दी हो, कम से कम इतनी जल्दी कि ‘पेजेंट कम्यूनों’ को नष्ट होने से बचाया जा सके. यह बात सामाजिक विकास के उनके दूसरे वाले सिद्धांत के अनुकूल थी. वेरा ज़ेसुलिच को 1881 में लिखे प्रसिद्द पत्र के पहले प्रारूप में उन्होंने लिखा, ‘यदि क्रान्ति समय से हो जाए, यदि वह अपनी सारी ताकत एक जगह केन्द्रित करके……देहाती कम्यून के मुक्त विकास को सुनिश्चित करे, तब वह(कम्यून) खुद-ब-खुद अपेक्षाकृत जल्दी ही रूसी समाज के पुनरुज्जीवन के एक तत्व के रूप में विकसित हो जाएंगे, (यह तत्व) पूंजीवादी व्यवस्था द्वारा दास बना लिए गए देशों की तुलना में (रूस के लिए) फायदे का है.”

यहाँ कहीं भी क्रान्ति की पूर्व-शर्त के बतौर पूंजीवाद की तकनीकी उपलब्धियों या पश्चिम में विजयी क्रान्ति से मिलनेवाली मदद का कोई उल्लेख नहीं है. इस पत्र के चौथे प्रारूप में (जब इसे अंततः ज़ेसुलिच को भेजा गया) इतना और जोड़ते हैं कि देहाती कम्यून के लिए नुकसानदेह प्रभाव जो उसे चारों ओर से उसे घेरे हुए हैं, उन्हें पहले समाप्त करना होगा, तभी उनके स्वतःस्फूर्त विकास की सामान्य स्थितियां सुनिश्चित हो सकेंगी. उधर एंगेल्स स्पष्ट रूप से यह कह रहे थे कि यह संभावना बेशक चरितार्थ हो सकती है, लेकिन इसकी पूर्वशर्त है विकसित योरप में क्रान्ति का होना. आखिरकार कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो के 1882 के रूसी संस्करण की भूमिका में मार्क्स भी इसी जगह आ खड़े होते हैं. भूमिका में लिखा है,” यदि रूसी क्रान्ति पश्चिम में सर्वहारा क्रान्ति की प्रेरक बनती है, ताकि दोनों एक दूसरे की मददगार बन सकें, तब वर्तमान में रूस में भूमि का सामूहिक स्वामित्व कम्युनिस्ट विकास के लिए प्रस्थान बिंदु बन सकता है” यहाँ स्पष्ट ही पिछड़े हुए रूस में मजदूर किसान गठजोड़ पर आधारित समाजवादी क्रान्ति और विकसित योरप में सर्वहारा क्रान्ति की संकल्पनाएँ ठीक ठीक पूरक रूप में मौजूद हैं, विरोधी धारणाओं के बतौर नहीं.यह अलग बात है कि रूसी क्रान्ति योरपीय क्रान्ति को प्रेरित नहीं कर सकी और रूसी क्रान्ति का जहाज़ आरम्भ से ही पूंजीवादी ताकतों की घेरेबंदी, आतंरिक गृहयुद्ध, फासीवादी आक्रमण वगैरह झेलते अकेले ही अप्रत्याशित रास्तों पर आगे बढ़ा, इन परिस्थितियों में उसके भीतर भी तमाम विकृतियां आती गईं और अंततः 70 साल की आयु पूरी कर दुर्घटनाग्रस्त हुआ. उसने 20 वीं सदी की तमाम पिछड़े देशों की क्रांतियों को और पराधीन देशों के मुक्ति संघर्षों को ज़रूर प्रेरित किया. ये अलग बात है कि मार्क्स की सामाजिक प्रगति की वह धारणा जो उनके जीते जी उनकी मुख्य धारणा के सम्मुख गौड़ बनी रही, 20 वीं सदी में वही मुख्य बन गई, लेकिन वाम आन्दोलन के अनेक विश्वस्तरीय नेता इस बात को समझने से इनकार करते रहे. कौत्सकी को रूसी क्रान्ति से ये शिकायत थी कि उसे पूंजीवाद की विकसित अवस्था में पहुँचने से पहले ही करके लेनिन ने गलत किया. ट्राटस्की क्रान्ति के नेताओं में थे लेकिन विकसित योरप में क्रान्ति न होने से निराश वे एक देश में समाजवाद निर्माण की चुनौतियों को स्वीकार करने से ही कतरा गए. इतिहास का निर्माण मनुष्य करते हैं अपने कर्म से, वह पूर्व-निर्धारित रास्तों पर ही नहीं चला करता. वह महानतम सिद्धांतों से भी छल कर सकता है.

उपनिवेशवाद/ साम्राज्यवाद की प्रगतिशीलता का मिथक

ऐतिहासिक रूप से उपनिवेशवाद मुक्त व्यापार के दिनों में योरपीय व्यापारियों ने कायम किये. उपनिवेश पूंजीवादी उत्पादन पद्धति से पहले भी सामंतवाद के भीतर पनपे व्यापारिक पूंजी के आदिम संचयन के लिए कायम हुए. इस आदिम संचयन ने उपनिवेशों में नहीं बल्कि व्यापारिक कंपनियों के गृह देशों में पूंजीवादी क्रान्ति को संभव बनाया.

मार्क्स की निगाह में योरप की औद्योगिक और पूंजीवादी क्रान्ति इसलिए प्रगतिशील थी कि उसने पुरानी सामंती व्यवस्था का खात्मा कर नई सामाजिक व्यवस्था कायम की थी. लेकिन पेंच यह था इसकी कीमत पराधीन देशों ने चुकाई? अकाल, जनसंहार, दमन, लूट, नस्लीय घृणा, साम्प्रदायिक विभाजन और अमानुषिक अत्याचारों का अंतहीन सिलसिला उपनिवेशों में चलाया गया. आर्थिक रूप से उपनिवेशों की इतनी संपदा लूटी गयी कि वे किसी भी तरह के स्वाधीन विकास के काबिल ही न बचे. खुद मार्क्स ने उपनिवेशों से पूंजी के आदिम संचय की बर्बर प्रक्रिया का रोंगटे खड़े कर देनेवाला वर्णन किया है और उसकी कठोरतम भर्त्सना की है. तब आखिर उपनिवेशवाद के प्रगतिशील होने का विमर्श आया कहाँ से? यदि खुद उपनिवेशवादियों के सभ्यता-प्रसार वाला तर्क छोड़ दिया जाए जिससे मार्क्स एंगेल्स की घृणा उत्तरोत्तर बढ़ती ही गई, तब इसका स्रोत कम्यूनिस्ट घोषणापत्र में पूंजीवाद की क्रांतिकारी भूमिका का जैसा मार्क्स ने चित्रण किया, उस धारणा को उपनिवेशवाद पर भी आरोपित करने में निहित है. कम्यूनिस्ट मेनिफेस्टो में योरप के विजयी पूंजीपति वर्ग से अपेक्षा की गई है वह सारी दुनिया को अपनी ही छवि में सिरजेगा. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. विश्व भर में आत्मप्रसार का जो संरचनागत तर्क पूंजीवाद में अन्तर्निहित है वह अमल में बिलकुल दूसरे ही रूप में आया. वह एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमरीका के देशों में गरीबी, भूख, क़र्ज़, विकासहीनता का विकास, अनुद्योगीकरण लाया. पुराने उपनिवेशवाद पर आरूढ़ होकर इजारेदार पूंजी की अवस्था में जो साम्राज्यवाद आया, वह और भी भीषण था जिसने पूरी दुनिया में उत्पादक शक्तियों का अभूतपूर्व विनाश किया. रामविलास शर्मा ने अपने लेखन के छह दशक तक इस पूरी प्रक्रिया को समझाने और हिन्दीभाषी जनता के विचार और अनुभूति का हिस्सा बनाने का अनथक प्रयास किया. उन्होंने विस्तारपूर्वक दिखलाया कि भारत में उपनिवेशवाद और फिर साम्राज्यवाद ब्रिटेन और विश्व-पूंजी की किन किन अवस्थाओं के साथ विकसित हुआ और उसने भारत में क्या परिणाम उत्पन्न किए. रामविलास शर्मा ने लिखा,’ अंग्रेजों ने यहाँ सामूहिक सम्पत्तिवाले कबीलाई ग्राम समाजों का विध्वंस नहीं किया, उन्होंने यहाँ के प्रतिक्रियावादी सामंतों से मिलकर उभरते हुए पूंजीवाद का विनाश किया, इस ऐतिहासिक सत्य को छिपाने का पयत्न बराबर किया जाता है.’ (भारत में अंग्रेज़ी राज, भाग -2, भूमिका, पृ. 12) जिस आत्मविश्वास के साथ रामविलास शर्मा उपनिवेशवाद की प्रगतिशीलता के मिथक को ध्वस्त करते हैं, वह कई महान उपनिवेशवाद- विरोधी योद्धाओं और चिंतकों की बरबस ही याद दिलाता है. अल्जीरिया के मुक्ति योद्धा फ्रैंज़ फैनन ने निर्भीक टिप्पणी की कि उपनिवेशवाद ने प्राक्-आधुनिक समाजों की आत्मालोचना की परंपरा को नष्ट किया और आत्म-विकास की सारी प्रक्रियाओं को अवरुद्ध कर दिया. यदि हम ध्यान रखें कि खुद मार्क्सवाद के भीतर उपनिवेशवाद को प्रगतिशील माननेवाली किस हद तक प्रभावी रही है और बार-बार प्रकट होती रही है, तो हम रामविलास शर्मा के बौद्धिक संघर्ष को ज़्यादा समझ सकते हैं. सेकेण्ड इंटरनेशनल के नायक जिनके प्रतिनिधि बर्नस्टीन सहित कई बड़े नेता थे, साम्राज्यवाद के पुराने उपनिवेशवादी शासन के पक्षपोषक थे. उन्होंने खुली घोषणा की की औपनिवेशिक शासन प्रगतिशील था, कि वह उपनिवेशों में ‘सभ्यता के उच्च स्तर लाया’, और वहां उसने ‘उत्पादक शक्तियों का विकास किया’. उन्होंने यहां तक कहा की ‘उपनिवेशों को खत्म करने का मतलब होगा बर्बरता’. वे तो समाजवाद में भी उपनिवेशों की ज़रुरत मानते थे और इसके लिए उन्होंने ‘पूंजी का समाजवादी आदिम संचय’ जैसे सूत्रीकरण भी किए थे. यह सच है कि लेनिन के महान सैद्धांतिक कार्यों की बदौलत यह सब मूर्खताएं बंद हुईं, लेकिन खासकर योरपीय वामपंथ में लम्बे समय तक बार-बार जोर मारती रहीं. दूसरी ओर खुश्चेव के समय जब पूंजीवादी और समाजवादी खेमों के बीच शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का सिद्धांत आया, तो साथ ही सोवियत कम्यूनिस्ट पार्टी की तरफ से यह उपदेश भी आया कि राष्ट्रीय मुक्ति संग्राम अब ‘नए दौर’ में प्रवेश कर गए हैं. जहां पहले दौर में संघर्ष मुख्यतः राजनीतिक क्षेत्र में था, अब उसका क्षेत्र आर्थिक है और नव-स्वतंत्र देशों को क्रान्ति को आगे बढाने की मुख्य कड़ी के बतौर आर्थिक विकास पर ध्यान देना चाहिए. माओ ने इसका तीखा प्रतिवाद किया. उन्होंने कहा कि यह सारा उपदेश नव-उपनिवेशवाद का पक्षपोषण है क्योंकि यह एशिया, लैटिन अमरीका और अफ्रीका पर नव-उपनिवेशवाद (जिसका प्रतिनिधि अमरीका है) के भीषण हमलों और उनकी लूट पर, साम्राज्यवाद और शोषित राष्ट्रों के बीच तीखे अंतर्विरोध पर पर्दा डालता है और इन महाद्वीपों की जनता के क्रांतिकारी संघर्षों को कुंद करता है. माओ ने कहा कि बेशक नव-स्वतंत्र देश अपना स्वतंत्र आर्थिक विकास करें, लेकिन यह कार्य साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्ष, उन देशों के भीतर साम्राज्य के एजेंटों के खिलाफ राजनीतिक संघर्ष से पृथक नहीं है. (चीनी समाचारपत्र ‘पीपुस डेली’ में 22 अक्टूबर, 1963को प्रकाशित माओ का लेख) ज़ाहिर है कि ख्रुश्चेव के नेतृत्व वाले संशोधनवाद के ऐसे प्रस्ताव भले ही उपनिवेशवाद का प्रत्यक्ष समर्थन न करते हों, लेकिन साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्षों को कमज़ोर कर प्रकारांतर से शोषित देशों को उसे सहन करने के लिए प्रेरित अवश्य करते हैं. लेकिन योरपीय वाम के अकादमिक हल्कों से साम्राज्यवाद का खुला समर्थन भी गाहे-बगाहे होता ही रहता है. इसका एक उदाहरण उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद को मानव समाज के विकास में गुणकारी बतानेवाली बिल वारेन की 1980 में प्रकाशित पुस्तक ‘इम्पीरियालिज्म::पायनियर आफ कैपिटलिज्म’ है जो मार्क्सवादी कोटियों का इस्तेमाल करती है और न्यू लेफ्ट बुक्स से छपी है. इस से यह अंदाज़ होता है कि उपनिवेशवाद के प्रगतिशील होने का मिथक कोई बंद हो चुकी बहस नहीं है.

उपनिवेशवाद की प्रगतिशीलता की धारणा का दूसरा स्रोत दूसरा स्रोत मार्क्स के भारत विषयक आरंभिक लेख हैं, खासतौर पर 1853 वाला लेख. प्रारम्भिक लेखों में मार्क्स ने भारत को एशियाई उत्पादन पद्धति वाला देश, गतिरुद्ध ग्राम समाज और पूर्वी निरंकुशता के लक्षणों वाला देश मानते हुए भारत में अंग्रेज़ी राज को इस जड़ता को तोड़कर प्रगति क बीज बिखेरने वाले ‘इतिहास के अचेतन औजार’की संज्ञा दी. आज भारत के मार्क्सवादी बौद्धिक जानते हैं कि जब मार्क्स भारत के बारे में लिख रहे थे तो पूरब के बारे मे पष्चिमी ज्ञान अत्यंत सीमित था, कि भारत के विशृंखलित, आत्मनिर्भर गाँवों की छवि मार्क्स ने हेगेल से शब्दशः ग्रहण की थी, कि एषिया की परिवर्तनहीन, गतिरुद्ध छवि 19वीं सदी के योरप को हाब्स और मान्टेस्क्यू जैसे ज्ञानोदय के अग्रदूतों से विरासत में मिली थी, कि प्राक्-औपनिवेशिक भारत की कृषि अर्थव्यवस्था उतनी परिवर्तनहीन और स्वायत्त ग्राम-समुदायों वाली न होकर विनियम और विनियोजन के कहीं बडे़ संचारतंत्र के साथ जुड़ी हुई थी, कि कृषि तकनीक शताब्दियों से वैसी गतिरुद्ध न थी, जैसी मार्क्स ने समझा था, कि स्वायत्त ग्राम इकाइयों को केन्द्रीय स्तर पर जल-प्रबंधन से जोड़ने वाले निरंकुष राजतंत्र (हाइड्रालिक स्टेट) की धारणा गलत थी, बल्कि छोटे बाँध, उथले कुएँ, स्थानीय तालाब जो कि पारिवारिक और सामूहिक श्रम से तैयार किए जाते थे, उनकी सिंचाई में उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका थी जितनी कि केन्द्रीय स्तर पर नियोजित जल-प्रबन्धन की, कि भूसंपत्ति का वैसा अभाव न था जैसा मार्क्स ने समझा था और किसानों के अलग-अलग तबकों का अस्तित्व काफी पहले से था, कि एषियाटिक मोड आफ प्रोडक्शन की धारणा भारत के संदर्भ में ‘अप्रामाणिक‘ है, आदि. महत्वपूर्ण बात यह है कि भारतीय समाज के बारे में ये समझ रामविलास शर्मा सन् 1957 में लिखी अपनी पुस्तक ‘सन् सत्तावन की राज्यक्रांति और मार्क्स वाद‘ में ही पूर्वाषित करते हैं, जिस समय तक भारतीय सामंतवाद और मध्यकाल के बारे में मार्क्सवादी इतिहासकारों के महत्वपूर्ण अध्ययन प्रकाशित नहीं हुए थे. रामविलास शर्मा भारत में अंग्रेज़ी राज कायम होने के वक्त एशियाई उत्पादन पद्धति की बात के समर्थन में एक-एक तर्क का विधिवत प्रत्याख्यान करते गए. रामविलास शर्मा ने जोर देकर कहा कि मार्क्स ने एशियाई पद्धति को वैकल्पिक रूप से जगह जगह ‘आदिम साम्यवाद’ भी कहा था और उसका विस्तार उनके मुताबिक़ एशिया तक सीमित नहीं था, बल्कि आयरलैंड तक इसका प्रसार था. मार्क्स के 1853 में लिखे गए पत्र में एशियाई उत्पादन पद्धति की धारणा का सूत्रपात हुआ और मार्क्सवादी हल्कों में यह लम्बे समय तक परिव्याप्त रही. 1960 के दशक में जब इस धारणा का ट्राटस्कीवाद से प्रभावित अध्ययनों में फिर से उभार हुआ तो उन्होंने एक बार फिर’मार्क्स, त्रातास्की और एशियाई समाज’ नामक पुस्तक लिखकर इसका प्रत्याख्यान किया. एशियाई उत्पादन पद्धति को ध्वस्त करना भारत में अंग्रेज़ी राज की प्रगतिशीलता का मुख्य तर्क था और 1857 को प्रतिक्रियावादी कहने का भी. रामविलास शर्मा ने अपने समकालीन भारतीय मार्क्सवादी लेखकों में भी जहां जहां इस तर्क का प्रभाव देखा, उनसे तीखी बहस की.

भारत के बारे में, अंग्रेज़ी राज की प्रगतिशीलता के बारे में मार्क्स और एंगेल्स के बदले हुए विचारों की उन्होंने पूरी उद्धरणी ही तैयार कर दी. उन्होंने आयरलैंड पर मार्क्स के अध्ययन के हवाले से इस बात पर भी जोर दिया कि यदि समाजवादी क्रान्ति की भौतिक और आत्मिक परिस्थिति तैयार करने के अर्थ में पूंजीवाद प्रगतिशील था, तो उपनिवेशवाद इस प्रगतिशीलता में बाधा था क्योंकि उपनिवेशों से लुटे हुए माल का हिस्सा देकर विकसित देशों के मजदूरों को भ्रष्ट किया गया था. आज पूंजी के गढ़ों में क्रान्ति आज तक नहीं हो सकी तो इसका एक बड़ा कारण साम्राज्यवादी लूट में वहां के मजदूर वर्गों को हिस्सा दिया जाना रहा है. मार्क्स और एंगेल्स ने उत्तरोत्तर उपनिवेशवाद-विरोधी प्रतिरोधों का समर्थन किया, चाहे वे प्रतिरोध कितने भी पिछड़े हुए समाजों में हुए हों. 1857 की बगावत मार्क्स ने ही ने ही उसे भारत का ‘राष्ट्रीय विद्रोह’ कहा था. उन्होंने उसका एशिया के उभार के हिस्से के बतौर स्वागत किया जिसकी एक झलक उन्होंने विद्रोह में देखी थी. उन्होंने तो एशिया के जागरण के बगैर किसी विश्वक्रांति को अकल्पनीय माना था और तमाम उपनिवेशवाद-विरोधी संघर्षों का इसी दृष्टिकेाण से दिल खोलकर स्वागत किया था. 2007 में 1857 के संग्राम की150वी वर्षगाँठ की पूर्वबेला में खुद को प्रगतिशील कह्लेवाले कुछ बुद्धिजीवियों ने नए सिरे से अंग्रेज़ी राज की भारत के लिए महत्ता को रेखांकित किया और 1857 को प्रतिक्रियावादी बताया (देखें जून, 2006 का ‘हंस’ का सम्पादकीय या विभूतिनारायण राय अदि के लेख) पुराने और कब के निरस्त किए जा चुके तर्कों के अलावा नई बात उन्होंने जाती की उठाई. अंग्रेज़ी राज को दलितों के लिए गुणकारी बताया मानो अंग्रेज़ी राज की लूट के फलस्वरूप पड़नेवाले अकालों में मारे गए करोड़ों हिन्दुस्तानियों में दलित न रहे हों, मानो 1857 की बगावत के प्रतिशोध में जो गाँव के गाँव अंग्रेजों ने साफ़ कर डाले उनमें दलित न रहते रहे होंगे, मानो जो दस्तकारियाँ और उद्योग उन्होंने नष्ट किए उनमें दलित न रहे होंगे,जबकि बुनकरों सहित तमाम शिल्पकार जातियां दलित ही थीं. 1857 को ये लोग ब्राह्मणवादी षड्यंत्र बताते हैं. पूछा जाना चाहिए कि अवध में सुरंगों की लड़ाई किन जातियों के लोगों ने लड़ी थी, कुंवर सिंह की सेना के ढेरों नायक किन जातियों के थे, यदि पूरा आरा शहर ही बगावत के आरोप में नामजद किया गया था, तो क्या तब के आरा शहर में दलितों की कोई आबादी थी कि नहीं?. अच्छी बात यह हुई कि खुद दलित साहित्य के भीतर से लोगों ने खोज खोज कर दिखला दिया कि इस विद्रोह के दलित, पिछड़े नायक कौन लोग थे, कि आप हमारे हितैषी बन कर भारत की आज़ादी की लड़ाई में हमारे योगदान हमारी दावेदारी को खारिज न करें.

रामविलास शर्मा यह सवाल उठाते रहे कि यदि अंग्रेजों के आगमन से पहले भारत में बड़े पैमाने पर सौदागरी पूंजी संचित थी, तो औद्योगिक पूंजी के युग में भारत के प्रवेश की संभाव्यता से इनकार नहीं किया जा सकता.

एजाज़ अहमद ने इस लेख में पहले उद्धृत साम्राज्यवाद के समर्थन में बिल वारेन की 1980 में प्रकाशित पुस्तक ‘इम्पीरियालिज्म::पायनियर आफ कैपिटलिज्म’ की आलोचना के क्रम में लिखा ” हम यह भी जानते ही हैं कि 18वीं सदी के आरम्भ में, उपनिवेशवाद द्वारा भारत में निर्णायक युद्धों में जीत हासिल करने तथा भारत में राजसत्ता के संघटन से आतंरिक संकट उत्पन्न होने से पहले, भारत में ‘उत्पादक शक्तियां ‘ इतनी पिछड़ी हुई न थीं जितनी कि साम्राज्यवादी इतिहास-लेखन बताता रहा है. भारत में इतिहासतः निर्मित, सामाजिक रूप से स्थिर अनेक वर्ग थे जो प्राक-औपनिवेशिक निर्माण-उद्योगों और वाणिज्य में लगे हुए थे. भारत के पास पारंपरिक रूप से व्यापार और परिवहन की कुशल व्यवस्था थी जिसमें आतंरिक जहाजरानी और सडकों का व्यापक संजाल शामिल था जिसके चलते थोक मालों की व्यापक आवाजाही थी, पर्याप्त स्तर का नगरीकरण था, सामान मुद्रा व्यवस्थाएं थीं, लम्बी अवधि की परिपक्वता वाले भारी निवेश करने की क्षमता वाले वित्तीय घराने थे,देश के सभी महत्वपूर्ण इलाकों में फ़ैली हुई विभिन्न तरीकों के कार्य में दक्ष श्रमशक्ति थी, गैर-खेतिहर उत्पादनों-धातु-उद्योग से लेकर वस्त्र निर्माण, खनन से लेकर पानी के जहाज के निर्माण तक में असाधारण रूप से विकसित कौशल था. इन सब बातों का निश्चय ही यह अभिप्राय नहीं है कि भारत औद्योगिक पूंजीवाद की अवस्था में पहुँच जाने के मुहाने पर खडा था, लेकिन ठीक इसे तर्क से विचार करें तो ऐसा भी कोई सिद्धांत नहीं है जो यह साबित कर सके कि ब्रिटिश कब्जे के अभाव में भारत (या कम से कम उसके कुछ इलाके) (जापान) की मेईजी क्रान्ति के समतुल्य कोई क्रान्ति नहीं कर सकते थे. दोनों ही संभावनाओ के बारे में निश्चित होना मुश्किल है. (एजाज़ अहमद, ‘इम्पीरिअलिज़्म एंड प्रोग्रेस’ शीर्षक अध्याय, ‘लीनिएजेज़ आफ दी प्रेजेंट; शीर्षक पुस्तक, पृष्ठ-12, तूलिका प्रकाशन, मूल लेख का प्रकाशन 1982 में हुआ)

एजाज़ साहब की ऊपर उद्धृत पंक्तियों से जो निष्कर्ष निकलता है,, वे 1957 में रामविलास शर्मा की लिखी हुई पुस्तक ‘सन सत्तावन की राज्यक्रान्ति’ में ‘अंग्रेज़ी राज की प्रगतिशील भूमिका शीर्षक पहले अध्याय के उप-अध्याय ‘ग्राम -समाज और सामंती अराजकता” में मिल जाएंगे. 1982 में एजाज़ अहमद ये बातें इतनी निश्चिंतता के साथ लिख रहे हैं की उन्हें स्रोत बताने की ज़रुरत नहीं क्योंकि भारत में सामंती युग के बारे में अब तक इतनी सामग्री खुद भारतीय इतिहासकारों ने उपलब्ध करा दी थीं की वे अकाट्य रूप से सर्वमान्य थीं. लेकिन 1957 में रामविलास शर्मा इतने निश्चिन्त नहीं हो सकते थे. उनके सामने इतने अध्ययन उपलब्ध नहीं थे. भारतीय इतिहास में सामंती दौर और मध्यकाल के बारे में आर.एस. शर्मा, इरफ़ान हबीब, सतीश चन्द्र या हरबंस मुखिया के अध्ययन उनके सामने नहीं थे. (दूसरी ओर भारत में अंग्रेज़ी राज के आने से पहले उसके पिछड़े होने, उसके पिछड़ेपन को ही अंग्रेज़ी राज कायम होने का कारण मानना और अंततः अंग्रेज़ी राज की प्रगतिशील भूमिका को स्वयंसिद्ध मानना एक तरह का कामनसेंस बना हुआ था.) रामविलास शर्मा ने उक्त उप-अध्याय में इन्हीं निष्कर्षों को ओ मैली द्वारा संपादित 1941 की पुस्तक ‘माडर्न इंडिया एंड दी वेस्ट’,क्रुक की 1897 की पुस्तक ‘द नार्थ वेस्टर्न प्रोविन्सेज़ आफ इंडिया’, एनी बेसेंट की 1926 की पुस्तक ‘इंडिया बांड ऑर फ्री’, राधाकमल मुखर्जी की ‘द इकानामिक हिस्ट्री आफ इंडिया, 1600-1800’, जे. डब्लू. के. की 1865 की पुस्तक ‘अ हिस्ट्री आफ सिपोय वार इन इंडिया’, अवध गैज़ेटीयर, न्यूज़ एंड व्यूज़ फ्राम द यु.एस.एस.आर जैसे स्रोतों से निकाले थे. रामविलास शर्मा लगातार इन निष्कर्षों के लिए नए-पुराने प्रमाणों की समीक्षा करते रहे. उदाहरण के लिए 1981 में’भारत में अंग्रेज़ी राज, भाग- 1 व 2′ के में इन्हीं निष्कर्षों को और अधिक विस्तार से उन्होंने एडम स्मिथ, एडमंड बर्क, बर्नियर, मोरलैंड, इरफ़ान हबीब, दादाभाई नौरोजी, एम.एन राय, जेंक्स, मेरठ में कम्यूनिस्ट नेताओं के बयान और रजनी पाम दत्त की पुस्तकों की आलोचनात्मक समीक्षा करते हुए निकाला है.

यह सच है रामविलास शर्मा भारत में औद्योगिक क्रान्ति की संभावना के बारे में इतने नपे-तुले ढंग से नहीं बोलते और उनका झुकाव यही है कि ऐसा होना संभावित था यदि अँगरेज़ नहीं आए होते तो. रामविलास शर्मा व्यापारिक पूंजीवाद को वास्तविक पूंजीवाद की परिधि से बाहर रखे जाने के खिलाफ हैं. (इन बातों का सैद्धांतिक मूल्य क्या है, कहा नहीं जा सकता) प्रश्न यह नहीं है कि व्यापारिक या सूदखोर पूंजी को पूंजी कहा जाए या नहीं. मार्क्स ने खुद ही इन्हें पूंजीवादी उत्पादन पद्धति से पहले मध्यकाल से प्राप्त पूंजी के दो रूप कहा है (पूंजी, भाग -1, अध्याय 31), पूंजी के ये दोनों रूप बेहद अलग-अलग सामाजिक व्यवस्ताओं में अपनी परिपक्वता प्राप्त कर सकते हैं, लेकिन खुद-ब-खुद पूंजीवादी उत्पादन पद्धति में तब्दील नहीं हो सकते. पूंजी के ये दो रूप पूंजीवादी उत्पादन पद्धति नहीं कहला सकते, ये सामंती उत्पादन पद्धति की विकसित अवस्था में उत्पादित विनिमय योग्य उत्पादन के प्रसार से सम्बन्ध रखते हैं. पूंजीवाद के लम्बे बचपन में ये रूप रहते हैं.छोटे गिल्ड मास्टर, छोटे कारीगर और यहाँ तक कि उजरती मज़दूर भी लम्बे समय में छोटे पूंजीपति बन जाते हैं, लेकिन औद्योगिक पूंजीवाद व्यापारिक पूंजी के धीमे और स्वाभाविक विकास का परिणाम नहीं है. कारीगर श्रेणियां सौदागरी और सूदखोर पूंजी को औद्योगिक पूंजी बनने से सामंती नियम-कानूनों के ज़रिए रोकती हैं. उदाहर्न्स्वरूप मार्क्स ने डा. आइकिन को उद्दृत करते हुए बताया है कि यहाँ तक कि 1794 तक में लीड्स के छोटे वस्त्र उत्पादकों ने एक प्रतिनिधिमंडल भेजकर इंग्लैण्ड की संसद से एक ऐसा क़ानून बनाने की दरखास्त की थी जो किसी भी व्यापारी को उद्योगपति बनने से रोके.

रामविलास शर्मा जब सौदागरी पूंजीवाद को पूंजीवाद की एक अवस्था के रूप में देखे जाने की मांग करते हैं, तो यह भ्रम होता है की वे व्यापारिक, औद्योगिक और महाजनी पून्जीवादों को एक चरणबद्ध स्वाभाविक विकास मानते हैं,लेकिन जैसा कि मार्क्स ने खुद लिखा, सौदागरी और सूदखोर पूंजी सामंती मध्यकाल में विकसित पूंजी के रूप हैं जो औद्योगिक पूंजी में आप से आप परिणत नहीं हो जाते, लेकिन (औद्योगिक पूंजीवाद) के लम्बे बचपन के दौर में अपनी जगह बनाए रहते हैं, जबतक कि सामंती संबंधों का खात्मा करके इन्हें औद्योगिक पूंजी में रूपांतरित नहीं कर लिया जाता. रामविलास शर्मा खुद भी इरफ़ान हबीब के इस विचार से सहमत हैं कि मुग़ल भारत में सौदागरी पूंजी के विकास से लगता है कि भारतीय अर्थतंत्र काफी आगे बढी हुई मंजिल तक पहुँच गया था लेकिन सौदागरी पूंजी अपने ही विकास द्वारा औद्योगिक पूंजी का रूप नहीं ले सकती. शर्मा लिखते हैं, ” मार्क्स की स्थापना सही है, उसके साथ दो बातें और भी सही हैं. सौदागरी पूंजी के अभाव में औद्योगिक पूंजी का जन्म नहीं होता;उसके जन्म के लिए सौदागरी पूंजी का पहले से विद्यमान होना ज़रूरी है. विनिमय के प्रसार से बाज़ार का निर्माण हो जाने पर ही उद्योग-धंधों को पूंजीवादी ढंग से चलाने की ज़रुरत होती है.'(भारत में अंग्रेज़ी राज और मार्क्सवाद, पृष्ठ. 338) हमने पहले भी कहा कि इन प्रस्थापनाओं के सैद्धांतिक मूल्य के बारे में आश्वस्त नहीं हुआ जा सकता. महत्व लेकिन इस बात का है कि रामविलास अंग्रेज़ी राज को भारत की नियति के रूप में स्वीकार नहीं करते. यहाँ सवाल आता है इतिहास संबंधी दृष्टिकोण का. क्या इतिहास में जो घटा उसे नियति मान लिया जाय? क्या इतिहास जैसा घटा उससे भिन्न कुछ हो ही नहीं सकता था? शायद सामाजिक शोध प्राविधि में ऐसे प्रश्नों के लिए स्थान नहीं है. लेकिन जातीय चेतना से कैसे बेदखल करेंगे इन सवालों को?

कुछ विद्वान् अंग्रेज़ी राज की स्थापना के समय भारत के भीतर पूंजीवादी क्रान्ति करनेवाली शक्तियों का अभाव मानते हैं. कुछ अंग्रेज़ी राज की स्थापना और इस अभाव के बीच कार्य-कारण सम्बन्ध जोड़ते हैं. मार्क्स के खुद के विवरण में इस तरह के किसी कार्य-कारण सम्बन्ध का कोई इशारा भी नहीं है. उन्होंने तो पूंजी के बाह्य प्रसार को पूंजी के आदिम संचय की बर्बर प्रक्रिया के रूप में ही दिखाया है. इस प्रक्रिया का कोई सम्बन्ध उपनिवेश बनाए गए देशों में निर्मित किसी ऐतिहासिक ज़रुरत से नहीं था. यह ऐतिहासिक ज़रुरत पूंजी के पश्चिमी गढ़ों की थी – औद्योगिक क्रान्ति संपन्न करने लायक पूंजी इकट्ठा करने की. इस सम्बन्ध को मान्यता देने का मतलब है अंग्रेज़ी राज को भारत की नियति मानना, भारत की औपनिवेशिक लूट, जनसंहार, देशी उद्योग-धंधों, नगरों,व्यापार, कारीगरों, किसानों की तबाही, औपनिवेशिक अकालों में करोड़ों हिन्दुस्तानियों की मौत सब कुछ को भारत की नियति मानना. रामविलास शर्मा ने अगर इस धारणा से जीवन भर संघर्ष किया तो इसी लिए कि यह धारणा 1947 में सत्ता-हस्तांतरण के बाद भी अकादमिक हलकों और भारत के बौद्धिकों के बड़े वर्ग में जमी रही और भारत के नव-उपनिवेशवादी शोषण का औचित्य स्थापन करती रही. भारत के पूंजीवादी-सामंती गठजोड़ को प्रकारांतर से बल प्रदान करती रही. विश्व साम्राज्यवाद के आर्थिक तंत्र पर भारत की निर्भरता को तर्कपूर्ण सिद्ध करती रही. अंग्रेज़ी राज को भारत की नियति मानना, भारत की औपनिवेशिक लूट,जनसंहार, देशी उद्योग-धंधों, नगरों, व्यापार, कारीगरों, किसानों की तबाही, औपनिवेशिक अकालों में करोड़ों हिन्दुस्तानियों की मौत सब कुछ को भारत की नियति मानना. रामविलास शर्मा ने अगर इस धारणा से जीवन भर संघर्ष किया तो इसी लिए कि यह धारणा 1947 में सत्ता-हस्तांतरण के बाद भी अकादमिक हलकों और भारत के बौद्धिकों के बड़े वर्ग में जमी रही और भारत के नव-उपनिवेशवादी शोषण का औचित्य स्थापन करती रही. भारत के पूंजीवादी-सामंती गठजोड़ को प्रकारांतर से बल प्रदान करती रही. विश्व साम्राज्यवाद के आर्थिक तंत्र पर भारत की निर्भरता को तर्कपूर्ण सिद्ध करती रही.

आज जब भूमंडलीकृत भारत की अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र में वैश्विक पूंजी घुसकर लूटपाट कर रही है, सरकारें बहुराष्ट्रीय कंपनियों और साम्राज्यवादी हितों के हिसाब से नीतियाँ तय कर रही हैं, ढाई लाख से अधिक किसान दो दशकों में आत्महत्या कर चुके हों, प्राकृतिक संसाधनों की लूट के लिए लोग बड़े पैमाने पर विस्थापित किए जा रहे हैं, प्रतिरोध करने पर उनका भीषण दमन हो रहा है, वाम शक्तियां राष्ट्रीय स्तर पर हस्तक्षेप की स्थिति में नहीं दिखतीं, वैचारिक कुहासा घनघोर है, तब रामविलास शर्मा के संघर्ष को ज़रूर याद कर लेना चाहिए और साम्राज्यवाद को अपनी ऐतिहासिक नियति मानने से हर भारतवासी को पूरी शक्ति से इनकार कर देना चाहिए, शब्द में भी, कर्म में भी.

 (प्रणय कृष्‍ण। इलाहाबाद युनिवर्सिटी और जेएनयू से अध्‍ययन। प्रखर हिंदी आलोचक। जन संस्‍कृति मंच के महासचिव।  देवीशंकर अवस्‍थी सम्‍मान  से सम्मानित ।)Pranay Krishna, Photo By Vijay Kumar

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