Archive for the month “July, 2014”

रेड सैलूट टू नवारुण दा

नवारुण दा आज हमारे बीच नहीं रहे. नवारुण दा उन विलक्षण लेखकों में से एक थे, जो सचमुच लाल सलाम के अधिकारी हमेशा रहेंगे. उन्हीं की एक छोटी सी कविता और उनके एक आत्म-वक्तव्यनुमा भाषण के साथ उन्हें याद करते हैं. उनकी रचनाएँ और जीवन हमेशा इस विश्वास का संबल रहेगा कि ‘मृत्यु उपत्यका नहीं है मेरा देश’.

लुंपेन का गीत 

हर रात हमारी जुए में
कोई न कोई जीत लेता है चाँद
चाँद को तुड़वा कर हम खुदरे तारे बना लेते हैं

हमारी जेबें फटी हैं
उन्हीं छेदों से सारे तारे गिर जाते हैं
उड़कर चले जाते हैं आकाश में

तब नींद आती है हमारी ज़र्द आँखों में
स्वप्न के हिंडोले में हम काँपते हैं थर-थर
हमें ढोते हुए चलती चली जाती है रात
रात जैसे एक पुलिस की गाड़ी.

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