नामाकूल मुर्गे और मुर्गियों की कलगी: मिखाईल शोलोखोव

मिखाईल शोलोखोव विश्व साहित्य के बड़े नाम और नोबेल पुरस्कार विजेता हैं.  उनका उपन्यास ‘वर्जिन सॉयल अपटर्नड् ‘ सोवियत प्रयासों से शुरू हुयी  साझेदारी खेती ,पशुपालन और उसके इर्द-गिर्द के संघर्ष  एवं जीवन की कहानी है. इसी उपन्यास का एक एक अंश यहाँ प्रस्तुत है.

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आवरण-पृष्ठ : वर्जिन सॉयल अपटर्नड्

कुंवारी भूमि का जागरण 

By मिखाईल शोलोखोव

सुबह नाश्ता करके वह मुर्गियों के बाड़े की और चल दिया. उसे देखकर बूढ़े अकीम बेसख्लेबनोव ने गुस्से में चिल्लाकर पूछा,

“तू सुबह-सबेरे यहाँ क्या कर रहा है?”

“तुम्हें और मुर्गियों को देखने आया हूँ. क्या हाल-चाल है बाबा?”

“अच्छी-खासी जिन्दगी कट रही थी पर अब मत पूछो.”

“क्यों, क्या हो गया?”

“मुर्गियों ने जीना हरम कर दिया है.”

“यह कैसे?”

“तू एक दिन यहाँ रूककर देख, तब समझ जाएगा! नामाकूल मुर्गे दिन भर आपस में लड़ते रहते हैं, उन्हें अलग करते-करते तो मेरी टांगें टूट गयी. मुर्गियों को ही लो, देखने में लग सकता कि जनानी बात है पर ये भी दिन भर एक-दूसरी की कलगी नोचती रहती है. भाड़ में जाए ऐसी नौकरी. आज ही दवीदोव के पास जाकर छुट्टी करने के लिए बोलूँगा और मधुमक्खियों की देख-रेख के लिए भेजने को कहूँगा.”

“बाबा, धीरे-धीरे वे एक दूसरे के आदी हो जायेंगे.”

“जब तक वे आदी होंगे, बुड्ढा कब्र में उतर चूका होगा. भला यह भी मर्दों का काम है? आखिर को मैं भी तो कज्जाक हूँ. तुर्कों की लड़ाई पर जा चुका हूँ. पर यहाँ मुझे मुर्गियों का कमांडर बना दिया है. नौकरी किये दो दिन ही हुए हैं पर बच्चे मेरा पीछा नहीं छोड़ते. जब घर जाता हूँ तो वे चिल्लाने लगते हैं, ‘बुड्ढा मुर्गी-छेड़! अकीम बाबा मुर्गी-छेड़!’ मुझे सबका मान-सम्मान प्राप्त था, पर बुढ़ापे में मुर्गी-छेड़ की उपाधि लेकर मरूँगा क्या? नहीं, मैं बिलकुल नहीं चाहता!”

“अरे छोड़ो भी, अकीम बाबा. बच्चों से क्या लेना?”

“अरे अगर बच्चे ही कहते तो कोई बात नहीं पर कई लुगाइयां भी उनके साथ हो गयी हैं. कल दोपहर खाना खाने जा रहा था. कुएं पर नास्तेन्का दोनेत्स्कोवा पानी खींच रही थी. पूछती है: ‘बाबा, मुर्गियों को संभाल पा रहे हो न? मैं बोला, ‘हाँ-हाँ.’ – बाबा, मुर्गियां अंडे दे भी रही हैं या नहीं?’ मैं बोला, ‘हाँ, कुछेक दे रही हैं पर ज्यादा नहीं.’ और वह कल्मीक घोड़ी पता है क्या बोली हंसकर? ‘देखना, जुताई तक वे एक टोकरी अंडे दे दे नहीं तो तुमसे करवाएंगे मुर्गे का काम.’ ऐसे मजाक सुनने के लिए मैं बुड्ढा हो गया हूँ. और यह नौकरी मुझे बिलकुल पसंद नहीं.”

बुड्ढा कुछ और भी कहना चाहता था पर बाड़े के पास दो मुर्गे भिड़ गए, एक की कलगी से खून की धारा फूट पड़ी और दूसरे की गल-थैली से मुट्ठी भर पंखों का ढेर उड़ा. बुड्ढा अकीम संटी उठाकर उनकी ओर दौड़ पड़ा.

अनुवाद: विनय शुक्ल 

 

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