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समाज के हाशिए का सिनेमाई हाशिया: तत्याना षुर्लेई


 सिनेमा के सौ साल के इतिहास में  दलितों  के बारे में ज़्यादा फ़िल्में नहीं हैं। शुरू में ऐसा लगा कि गाँधी जी और उनके तरह के दुसरे सुधारकों की मदद से यह विषय लोकप्रिय होगा लेकिन जल्दी ही ऐसी फ़िल्में मुख्यधारा के विषय से बाहर चली गयीं। क्या भारतीय दर्शक ऐसी फ़िल्मों के लिए तैयार नहीं हैं? मुझे लगता है कि आधुनिक सिनेमा में सब कुछ दिखाया जाता है इसलिए इस विषय से इतना डर ज़्यादा अजीब लगता है। जब हम बॉलीवुड फ़िल्मों की संख्या के बारे में सोचेंगे तो यह देखेंगे कि दलित न सिर्फ़ जाति के वरीयता-क्रम से बाहर हैं बल्कि सिनेमा से भी बाहर हैं। 100 करोड़ से उपर की जनसंख्या वाले देश के सिनेमा में बहुजन-जीवन के स्वाभाविक-चित्रण का अभाव चिंताजनक है और इसका एक बड़ा कारण संभवतः यह है कि बहुजनों का बड़ा हिस्सा अभी भी सिनेमा के उपभोक्ता समुदाय में तब्दील नहीं हुआ है। यह तब तक नहीं बदलेगा जब तक उनकी परिस्थितियों को स्वभाविक तरीके से नहीं दिखाया जाएगा। अगर हम दलित-समस्या पर ही केन्द्रित रहेंगे और सिर्फ़ सुधार के आग्रही के बतौर ही दलितों का चित्रण करेंगे तो वे कभी समाज के स्वाभाविक हिस्से की तरह कभी नहीं दिखेंगे।

अछूत कन्या

अछूत कन्या

समाज के हाशिए का सिनेमाई हाशिया

भारतीय व्यावसायीक फ़िल्मों में दलितों की अनुपस्थिति।

BY तत्याना षुर्लेई

एक पुरानी कहानी है – थाइलैंड में रहनेवाली एक राजकुमारी एक बड़ी नदी में जहाज पर यात्रा करती थी। नदी के किनारे खड़ी भीड़ तालियां बजाकर राजकुमारी और उसके साथ जाने वाले नौकरों का स्वागत करती थी। यह सब देखकर राजकुमारी अतिउत्साह में भीड़ की ओर कुछ ज्यादा ही झुक जाती है और जहाज़ से बाहर गिरकर पानी में डूब जाती है। जहाज़ और किनारे पर खड़े लोगों में से किसी ने उसकी मदद नहीं की। ऐसा क्यों हुआ? इन सारे लोगों में से किसी ने उसकी मदद क्यों नहीं की? राजकुमारी उस जहाज़ में बहुत सारे नौकरों के साथ यात्रा करती थी। उन नौकरों और किनारे पर खड़े लोगों से कोई न कोई तो मछुआरा ज़रूर रहा होगा जिसको अच्छी तरह तैरना भी आता होगा। इसका जवाब बहुत आसान है – राजकुमारी दुसरे लोगों से इतनी ऊपर थी कि किसी को उसको छूना मना था[1]।

अस्पृश्यता के अलग अलग प्रकार होते हैं।  Brian De Palma की फ़िल्म के द्वारा चर्चित ‘अस्पृश्यता’ के अलावा एक और का ज़िक्र करना चाहिए क्योंकि इसके बारे में सब लोगों को पता है। दूसरा मामला भारत से संबंधित है जहाँ एक दुसरे से छू जाना भयावह माना जाता है। दोनों में डर बराबर है मगर आधार अलग। देवी बनी हुई राजकुमारी या खतरनाक माफ़िया से डर और उनकी अस्पृश्यता भारतीय दलितों की अस्पृश्यता से बहुत दूर है।

बहुत सारे सुधारक जो भारत में रहते थे अछूतों की ज़िंदगी को बदलने की कोशिश करते थे लेकिन अजीब बात यह है कि इस काम में उन में से किसी ने फ़िल्म का इस्तेमाल नहीं किया। भारतीय निर्देशकों के लिए भी फ़िल्म अधिप्रचार (PROPAGANDA) के लिए उचित साधन नहीं लगता था। यह भी एक अजीब बात है क्योंकि अधिप्रचार के लिए फ़िल्म सब से अच्छा साधन है। फ़िल्म बनानेवाले लोग समाज सुधारकों के साथ काम नहीं करते थे। इसी प्रकार गाँधी जी जो अछूतों के लिए बहुत काम करना चाहते थे और करते भी थे लेकिन फ़िल्म की मदद से अपने सुधारों के बारे में कुछ नहीं बताते थे। उनके लिए फ़िल्म कभी अच्छी चीज़ नहीं थी और उन्होंने कभी पसंद  भी नहीं किया। उनके लिए फ़िल्में पतनशील पश्चिमी सभ्यता का एक और उदाहरण था या फिर साधारण मनोरंजन का एक छोटा सा साधन जिसका ज़िंदगी में कोई महत्त्व नहीं है। उन्होंने स्वीकार किया कि उन्होंने सिर्फ़ एक फ़िल्म देखी है। यह फ़िल्म 1943 वाली विजय भट्ट की ‘राम राज्य’ थी और शायद इसीलिए उन्होंने कभी नहीं सोचा कि यह मनोरंजन करने वाला, साधारण लोगों का तमाशा अपने पैदाइश से ही वह सब कुछ दिखाता जिसके बारे में वे बताते हैं[2]।

उदाहरण के लिए फ़िल्म की दुनिया में अलग अलग धर्म के लोग साथ साथ रहते हैं और यह बात किसी को कभी अजीब नहीं लगती थी। शुरू से ही ऐसी स्थिति थी कि अक्सर हिंदू धर्म के देवताओं या राजाओं का अभिनय मुसलमान अभिनेता करते थे और मुसलमान के पीरों या सम्राटों का अभिनय हिंदू अभिनेता। यह भी कोई नयी बात नहीं है और न कभी थी कि किसी समय में सब से लोकप्रिय अभिनेता मुसलमान होते हैं और दुसरे समय में हिंदू। ‘तीन खानों’, यानी आमीर खान, शाहरुख़ खान और सलमान खान की लोकप्रियता जो 1990 के दशक में थी, इसका अच्छा उदाहरण हो सकता है। इसी समय में ‘कुछ लोगों’ के लिए ऋतिक रोशन की सम्भावना का हिंदू धर्म से स्पष्ट संबंध था। उन ‘कुछ लोगों’ के लिए ऋतिक तीन खानों से जीतने के लिए आ गया और हिंदू धर्म मुसलमानों से जीतने के लिए[3], लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ऋतिक की लोकप्रियता के अतिरिक्त बाकी तीनों अभिनेता फ़िर भी मशहुर रहे। शाहरुख़ खान के साथ एक ध्यान देने योग्य घटना हुयी जो कि बहुत अच्छा उदहारण है। वह काम करने के बाद बहुत थके होने के कारण एक गाँव के पास गाड़ी में ही सो गया। जब उठा तो उसने गाँववालों की भीड़ देखा। गाँववाले आग्रह कर उसे एक घर में ले गए और वहाँ यज्ञ-वेदी के स्थान पैर  उसने अपनी तस्वीर देखी[4]। एक और ऐसी ही कहानी जिसके बारे में बताना मुझे उचित लगता है अशोक कुमार की है। वह अभिनेता जो विभाजन के बाद अपने स्टुडियो ‘बॉम्बे टाकीज’ में बहुत से मुसलमानों को काम देता था। एक बार वह अपने एक दोस्त के साथ स्टुडियो से घर जा रहा था। रास्ते में मुसलमानों का इलाका पड़ता था, जहाँ एक एक बारत जा रही थी। अशोक के दोस्त को डर लगा की बारत वाले उनके साथ कुछ बुरा बर्ताव करेंगे लेकिन भीड़ के लोगों ने अशोक कुमार को पहचान लिया, उन दोनों को स्वागत किया और उनको सब से अच्छा रास्ता दिखाया। दोस्त आश्चर्यचकित हो गया लेकिन अशोक कुमार ने उसको कहा कि मुझे एक क्षण के लिए भी डर नहीं था क्योंकि कलाकारों की कोई जाति या धर्म नहीं होता है[5]।

स्पष्ट रूप से फिल्मी- दुनिया की स्थिति इतनी अच्छी नहीं थी, जितनी आशोक कुमार के विचार में थी। उदाहरण के लिए देवानन्द धर्म के कारण सुरया से शादी नहीं कर सकता था। सुरया के परिवार ने उसको देव को छोड़ने का हुक्म दिया, क्योंकि देव हिंदु था। कुछ समय बाद सुरया को अफ़सोस हुआ लेकिन फैसला बदलने के लिए देर हो चूका था[6]। इसी तरह जब 1957 में नर्गिस को ‘मदर इंडिया’ में काम मिल गया तो कुछ लोगों को यह अच्छा नहीं लगा। वे नहीं चाहते थे कि देश का प्रतिरूप एक मुसलमान औरत हो[7]। फ़िर भी, हम यह कह सकते हैं कि ये सिर्फ़ छोटे उदाहरण हैं। फ़िल्म की दुनिया में धर्म का उतना महत्त्व नहीं था जैसे मामूली जीवन में।

इन उदाहरणों में हम लोग देख सकते हैं कि फ़िल्म में ‘अनुदारता से लड़ाई और कुछ अलग दुनिया दिखाने की कोशिश’ हमेशा कहानियों की स्तर पर होती थी। फ़िर भी, इसका मतलब यह नहीं है की ऐसी फ़िल्में कभी नहीं बनाई जाती थीं जिनकी कहानियों में अलग-अलग पूर्वाग्रहों से, दुर्गुणों से लड़ाई होती थी (धर्म के क्षेत्र से अलग)! इस तरह हम यह कह सकते हैं कि पहती फ़िल्म जो अस्पृश्यता के बारे में थी जो कि गाँधी जी के सुधार-आन्दोलन से प्रेरित थी Franz Osten की ‘अछूत कन्या’ जो 1936 में बनाई गई। यह फ़िल्म प्रताप नाम के ब्राहमण लड़का और कस्तुरी नाम की अछूत लड़की की एक दारुण प्रेम-कहानी है। कस्तुरी के पिता, जिनका नाम दुखीजा है, एक स्टेशन-मास्टर हैं और प्रताप के पिता की एक दुकान है। दुखीजा ने एक बार प्रताप के पिता की जिन्दगी बचायी और इस घटना से उन दोनों की बहुत अच्छी दोस्ती है। उनका अपने बच्चों की दोस्ती से कोई विरोध नहीं है लेकिन जब प्रताप और कस्तुरी की दोस्ती से प्रेम उत्पन्न होता है तो अचानक उन दोनों की जातियों का अंतर दिखाई देता है। यह अंतर जो पहले बिलकुल प्रकट नहीं था। प्रताप की अपनी जाती की एक लड़की से शादी की जाती है और यह शादी कस्तुरी के लिए कोई चौंकानेवाली या गज़ब बात नहीं है। अछूत लड़की के लिए यह सब इतना स्वाभाविक है कि वह प्रताप की पत्नी – मीरा से दोस्ती करती है। प्रताप के पिता की अछूतों से दोस्ती गाँववालों को पसंद नहीं है और जब इस कारण से उसके साथ दुर्घटना होती है तो दुखीजा उसके लिए जल्दी दवा लाना चाहता है और जाती हुई रेलगाड़ी को रोकता है। दुर्भाग्या से उसको न दवा मिलती है न कोई पुरस्कार मिलता है, बल्कि वह अपने काम से निकाला जाता है। उसके स्थान पर एक जवान लड़का आता है जिसका नाम मनु है। दुखीजा मनु और कस्तुरी की शादी करवाता है। दुर्भाग्यपूर्ण कि लड़की शादी को स्वीकार करती है और कोई फ़रियाद नहीं करती, तब भी जब उसको पता चलता है कि मनु की एक और शादी हो चूकी थी और उसकी पत्नी – कजरी उनके साथ रहने के लिए आ जाती है। कस्तुरी कजरी को दीदी बुलाती है और कभी कोई बुराई नहीं करती है। फ़िर भी मनु की दुसरी पत्नी को बड़ी ईर्ष्या है क्योंकि मनु सिर्फ़ कस्तुरी से प्रेम करता है। मीरा कजरी की सहेली है। पहली मुलाकात में प्रताप की पत्नी कजरी को कहती है कि उसका पति भी सिर्फ़ कस्तुरी से प्यार करता है। कजरी के मन में कस्तुरी को निकलाने की अशुभ राय आती है और दोनों औरतों की चुगली के कारण प्रताप और मनु के बीच बहुत बड़ा झगड़ा होता है। वे दोनों रेल की पटरी पर मार-पीट करते हैं और आनेवाली गाड़ी पैर ध्यान नहीं देते हैं। रेलगाड़ी को रुकवाने के चक्कर में कस्तुरी की मौत होती है। इस लज्जाजनक विषय को दिखाने के लिए, जो पहले किसी से नहीं दिखाया गया, इस फ़िल्म को बहुत सारी प्रशंसाएँ मिली[8]। वास्तव में 1936 में ऐसे विषय के बारे में बताना बहुत बड़ी बहादुरी थी। अफ़सोस की बात सिर्फ़ यह है कि इतने सालों में किसी दुसरे निर्देशक ने कुछ ऐसा नहीं किया। शायद Franz Osten के लिए ऐसी कहानी को दिखाना इतनी मुशकिल बात नहीं थी क्योंकि वह जर्मनी से भारत आया था और जिसके लिए यह विषय कोई बड़ा निषेध नहीं था। हमें फ़िर भी यह स्वीकार करना होगा कि फ़िरंगी होने के बावजूद Osten ने अपने दर्शकों को जो दिखाया उसके लिए उसने भारतीय समाज का बड़ी गहराई से अध्ययन और अनुभव किया। Osten का अनुभव उन स्थानों में अच्छी तरह दिखाई देता है जहाँ फ़िल्म के नायक और नायिका बिना किसी झिझक के अपने उपर आरोपित भाग्य को स्वीकार करते हैं और अपनी खुशी और सन्तुष्ट भविष्य के लिए लड़ाई नहीं करते हैं। दिलचस्प बात यह है कि फ़िल्म अपने दर्शकों को भी बहुत अच्छी लगी। हमें यह भी याद रहना चाहिए कि अच्छी व्यावसायीक फ़िल्म वह होती है जो सब को पसंद हो, सीधे-सादे लोगों को भी जो कि अक्सर बहुत रूढ़िवादी होते हैं। अगर ऐसे दर्शकों को अचानक विवादग्रस्त कहानी देखने की इच्छा होती है और देखने के बाद यह कहानी उनको पसंद है तो इसका मतलब यह है कि वे दर्शक कुछ न कुछ परिवर्तनों के लिए तैयार हैं। हो सकता है कि Osten की फ़िल्म उसी समय में लोगों को इसलिए पसंद थी क्योंकि वे गाँधी जी के दबाव में थे लेकिन यह भी सच है कि फ़िल्म का निषेध बिल्कुल हटा नहीं हुआ। प्रताप और कस्तुरी के बीच में प्रेम है और लड़का अपनी प्रेमिका को अक्सर छूता है। प्रताप के पिता अपनी दुकान की सब चीज़ें कस्तुरी को बेचते हैं। बहुत आश्चर्यचकित बात यह है कि एक क्षण में प्रताप कस्तुरी के साथ गाँव से भागना चाहता है और लड़की के इनकार के बाद भगवान को पूछता है कि उसने उसको भी अछूत क्यों नहीं बनाया! ऐसा उत्कर्षण एकदम नयी बात है जो अक्सर नहीं मिलती है। यह भी बुद्धिमानी वाली बात है जिसकी सहयता से हर दर्शक देख सकता है कि सिर्फ़ अछूत होने से कोई दोष नहीं है, समस्या तब उत्पन्न हो जाती है जहाँ दो जातियों के लोग एक दुसरे से प्रेम करते हैं। शादी के लिए समाज की अनुमति का अभाव फ़िल्म की सिर्फ़ एक कठिनाई है, लेकिन सबसे बहुत महत्त्वपूर्ण कठिनाई तो वह है जो सब को याद दिलाती है कि कई ऐसे निषेध होते हैं जिनको तोड़ना असंभव है। हम देख सकते हैं कि 1936 में भारतीय समाज थोड़े परिवर्तनों के लिए तैयार था लेकिन ज़्यादा नहीं। फ़िल्म में महत्त्वपूर्ण बात यह भी है कि नियमों तोड़ने की सज़ा लड़की को मिलती है। शायद यह उस विचार से संबंधित है कि एक जाति से दुसरी जाति के बीच किसी भी तरह के अतिक्रमण की सज़ा उसको मिलती है जिसकी जाति नीची है।

फिल्म की प्रस्तुतीकरण और पारंपरिक-शैली की परवाह किए बिना ‘अछूत कन्या’ बहुत बहादुर फ़िल्म है। इस बहादुरी का सबुत सबसे पहले यह है कि दुसरी ऐसी फ़िल्म के लिए हमें बहुत इंज़ार करनी पड़ी। 1959 में बिमल राय ने ‘सुजाता’ की फ़िल्म बनाई जो फ़िर से अछूत लड़की और ब्राम्हण लड़के के प्रेम की कहानी है।

उपेन्द्रनाथ चौधरी और उसकी पत्नी चारू की एक छोटी बेटी है जिसका नाम रमा है। जब लड़की की उम्र एक साल की है तो चौधरियों के घर में एक दुसरी लड़की आती है। वह लड़की अनाथ है जिसके माता-पिता आसपास के गाँव में रहते थे। समस्या यह है कि वह लड़की अछूत है इसलिए श्रीमती चौधरी छोटी लड़की की देखभाल के लिए अपनी नौकरानी को हुक्म देती है। श्रीमती चौधरी का डर स्पष्ट है लेकिन इसी समय में आश्चर्य की बात यह है कि उसको अपनी बेटी के अपवित्र हो जाने से डर नहीं है। जबकि अछूत लड़की को वही आया को देती है जो छोटी रामा की देखभाल करती है। आया को भी इस स्थिति में कोई समस्या नहीं है और वह नयी बच्ची की देखभाल करती है यद्यपि छोटी लड़की उसकी जाति से भी नीचे की है, लेकिन ऐसा शायद इसलिए है कि आया को वही करना चाहिए जो मालिक कहते हैं और उसको किसी भी तरह की शिकायत करने का भी अधिकार नहीं है। उपेन्द्रनाथ जल्द ही अपनी पत्नी के व्यवहार से विपरीत अछूत लड़की को स्वीकार करता है और उसका नाम सुजाता रख देता है। चारू को समाज से निकलने का बहुत डर है इसलिए उसको सुजाता से अपने पति के किसी भी तरह के संपर्क बहुत बुरे लगते हैं।

सुजाता को स्वीकार करने में सब से बड़ी बाधा बुढ़ी बुआ – गिरिबाला है। वह बहुत धर्मिक औरत है इसलिए एक पण्डित के साथ चोधरियों के यहाँ आती है। पण्डित के लिए अछूत लड़की से मिलना बड़ा अपमान है। वह समझ नहीं सकता है कि ऐसी बच्ची ऊँची जाति के लोगों को साथ कैसे रह सकती है और वह चौधरियों के घर को छोड़ने का निश्चाय करता है। उसके जाने से पहले जब उपेन्द्रनाथ उसको पूछता है कि उसके विचार में सुजाता और घर के दुसरे लोगों में सचमुच कोई बड़ा अंतर है, पण्डित कहता है कि अछूतों के शरीर से जहरीली हवा निकलती है जो आसपास के लोगों के लिए बहुत खतरनाक है। उपेन्द्रनाथ को यह बहुत मज़ेदार लगता है लेकिन पण्डित कहता है कि विटामिन को भी कोई देख नहीं सकता है पर इसका मतलब नहीं है कि ऐसी कोई चीज़ नहीं होती है।

पण्डित की सोच एक दुसरे पण्डित के विचारों से मिलती-जूलती है। बटुप्रसाद शर्मा शास्त्री बनारस के एक मंदिर में गुरू है और 2007 में बनी स्टालिन कुरूप के एक वृत्तचित्र ‘India Untouched: Stories of a People Apart’ का एक चरित्र। इस पण्डित के मन में भी बहुत सारे अजीब उदहारण होते हैं जिनके अनुसार अछूतों को अपने भाग्ये को स्वीकार करना चाहिए और जीवन को बदलने के बारे में सोचना मना है। पण्डित के अनुसार जिस मनुष्य को हवाई जहाज़ को चलाना नहीं आता है वह उसे नहीं चलाएगा। वैसे ही अछूतों को सिर्फ़ यह करना चाहिए जो परंपरा के अनुसार उनको हमेशा करना था। स्टालिन कुरूप की फ़िल्म में एक और ब्रहमाण है। वह कहता है कि हर व्यक्ति अपने काम करने के लिए पैदा होता है और वह सिर्फ़ वही काम कर सकता है जो उनके पूर्वज शताब्दियों से करते आये हैं। वह ब्राम्हण है, उसको चिंतन करना अच्छी तरह आता है और यह उसके लिए आसान है जब कि दुसरों के लिए असंभव। वैसे ही सफ़ाई करनेवाला या नाई को भी ऐसे ही कौशल आते हैं जिसके बारे में ब्राम्हणों को बिल्कुल ज्ञान नहीं है। कभी कभी पश्चिम के लोगों को यह असंभव लगता है कि 21 शताब्दी में भी लोगों के अंदर इतने पूर्वाग्रह होते हैं! लेकिन, ये दो उदहारण अच्छी तरह दिखाते हैं कि बिमल राय की ‘सुजाता’ का पण्डित कोई अतिरंजित व्यक्ति नहीं है बल्कि भारत में सचमुच में ऐसे लोग हैं जो आज भी इन बेतुकी बातों पर विश्वास करते हैं.

सुजाता चौधरियों के घर में रहकर बड़ी हो जाती है लेकिन यहाँ एक और विरोधाभास दिखाई देता है। चारू लड़की को कभी नहीं छूती और अपने पति को हमेशा घुड़की देती है जब उपेन्द्रनाथ अछूत लड़की के पास जाता है। अजीब बात यह है कि इसी समय में वह अपनी बेटी रामा को सुजाता के साथ खेलने की अनुमति देती है। सुजाता की स्थिति एक उपेक्षिता सी है – वह स्कूल नहीं जाती है, घर पर मता-पिता की देखभाल करती है और उद्यान में फूलों की। सुजाता की इस हालत के बावजूद उसकी सौतेली बहन उसके प्रति कभी बुरा व्यवहार नहीं करती है, फ़िर भी दिलचस्प बात यह है कि रमा को अपनी सौतेली बहन कि स्थिति कभी भी अजीब नहीं लगती है। रमा को मालूम नहीं है कि सुजाता उसकी सौतेली बहन है फ़िर भी वह माता-पिता से कभी नहीं पूछती है कि सिर्फ़ मैं ही स्कूल क्यों जाती हूँ और केवल मेरा ही जन्मदिन क्यों मनाया जाता है! घर के लोग चाहते हैं कि रमा की शादी अधीर से होती। अधीर एक जवान लड़का है जो गिरिबाला के साथ रहता है। जब वह पहली बार चौधरियों के घर आता है तो उसको सुजाता के उपर प्रेम आता है। उसका प्यार बहुत गहरा है और वह तब भी नहीं बदलता है जब उसको पता चलता है कि सुजाता अछूत जाति की लड़की है। अधीर अपने घर को छोड़ने के लिए तैयार है क्योंकि वह सिर्फ़ सुजाता से शादी करना चाहता है। चारू सोचती है कि उसकी सौतेली बेटी ने जानबूझकर अधीर को लुभाया क्योंकि उसको रमा के प्रति ईर्ष्या थी और वह अपनी बहन से प्रतिशोध लेना चाहती थी। सुजाता पर चिल्लाने के समय चारू अचानक सिढ़ियों से गिरती है और उसकी हालत बहुत गंभीर है। चारू के इलाज के लिए रक्त-आधान की ज़रूरत है। दुर्भाग्य से पति, रमा और अधीर का ब्लड-ग्रूप चारू से नहीं मिलता है पर सुजाता का वही है जिसकी जरुरत है। इस तरह सुजाता अपनी सौतेली माँ की जिन्दगी बचा सकती है।

यह दृश्य जहाँ रक्त-आधान चल रहा है बहुत दिलचस्प है क्योंकि हम यहाँ स्पष्ट रूप से देख सकते हैं कि सुजाता के खून के बारे में सुनकर उपेन्द्रनाथ बहुत अश्चार्यचकित हो जाता है। वह आदमी हमेशा सुजाता की रक्षा करता था और पण्डित के पागल विचारों पर हंसता था लेकिन कहीं अंदर में शायद वह भी सचमुच सोचता था कि अलग अलग जातियों के लोगों में ऐसे अंतर होते हैं।

बिमल राय की फ़िल्म अछूतों की पहली फ़िल्म बहुत सालों के बाद बनाई गई लेकिन इसमें भी गाँधी जी के विचारों से स्पष्ट संबंध है। सुजाता अक्सर नदी के किनारे जाती है और वह समय बिताने के लिए उसकी सब से अच्छी जगह है। जब उसको पता चलता है कि वह अछूत जाति की एक लड़की है जिसको चारू और उपेन्द्रनाथ ने गोद में लिया है, वह निराश होकर नदी के पास आती है और तेज़ बारिश में भींग जाती है। वह आत्महत्या करने का निश्चय करती है लेकिन जब पानी की तरफ़ आती है तब उसकी साड़ी का आँचल पास ही खड़ी गाँधी जी की मूर्ती से फँस जाता है। सुजाता मूर्ती की ओर देखती है और बारिश की बूंदें जो गाँधी जी के चेहरे पर बहती हुई आँसू जैसी दिखाई देती हैं।

गाँधी जी एक मात्र सुधारक नहीं है जिनका फ़िल्म में ज़िक्र है। रमा के कॉलेज में एक नाटक दिखाया जाता है जिसे देखने के लिए वह सारे परिवार को बुलाती है। समस्या यह है कि गिरिबाला नहीं चाहती है कि सुजाता भी जाए और वह बेचारी घर पर रहती है। जो नाटक दिखाया जाता है वह रबीन्द्रनाथ ठाकूर का ‘चंदलीका’ है। नाटक देखती हुई गिरिबाला को यह बहुत उचित लगता है कि स्कूल के स्टेज पर खड़े बुद्ध अछूत लड़की के हाथों से पानी लेते हैं और सभी जातियों की बराबरी के बारे में व्याख्यान देते हैं। गिरिबाला यह नहीं देखती है कि नाटक की अछूत लड़की और सुजाता में कोई अंतर नहीं है। यह व्यंग्य ऐसे लोगों के प्रति किया गया जिनके लिए सुधार सिर्फ़ एक प्रचार वाक्य हैं। फ़िर भी फ़िल्म की अंत में गिरिबाला भी यह साबित करती है कि प्यारे अधीर के लिए वह अपने विचारों को छोड़ सकती है। जब अधीर घर को छोड़ना चाहता है तब गिरिबाला सुजाता को स्वीकार करती है और कहती है कि शायद वह सचमुच पुरानी पीढ़ी की मानसिकता की वाहक है, उसे अब युवा विचारों को जगह देनी चाहिए।

अफ़सोस की बात यह है कि वास्तविकता हमको अच्छी तरह दिखाई देती है कि युवा आदर्शवादियों के सब सुधार असफल हुए और बॉलीवुड ने फ़िर से कभी ऐसी कहानी नहीं दिखाई। ‘सुजाता’ ‘अछूत कन्या’ की ही तरह बहुत सुगम फ़िल्म थी इसके बावजूद कि बिमल राय Franz Osten से आगे चला गया और उसने अछूत लड़की का ब्राहमण लड़के से शादी को संभव बनाया। व्यावसायीक सफलता के बावजूद सिनेमा के निर्देशकों को इस विषय से बड़ा डर है। ‘सुजाता’ के समय से भारत में बहुत मजबूत फ़िल्में बनी हैं और बहुत से निषेध टूटे भी हैं। फिर भी, अंतर्जातीय और विधवा विवाह आज भी मामूली दर्शकों को अनुचित लगते हैं।

सिनेमा की मुख्यधारा से अलग रहने वाले निर्देशकों का तरीका कुछ अलग ही होता है इसलिए वे आक्सर व्यावसायीक फ़िल्मों के निर्देशकों से ज़्यादा आज़ाद होते हैं। उनके लिए दर्शकों का ख्याल इतने महत्त्वपूर्ण नहीं हैं लेकिन इसके बावजूद भी हिंदी सिनेमा में, कला फिल्मों, सामानांतर फिल्मों और स्वतंत्र फिल्मों में भी, दलित-समस्याओं के चित्रण का अभाव है। यह बात अजीब लगती है क्योंकि आज़ाद निर्देशकों के लिए औरतों की स्वतन्त्रता, धर्मों के क्षेत्र में लड़ाई या घूसखोरी दिखाने में कोई समस्या नहीं है। जाति के निषेध को तोड़ने की हिम्मत उपर्युक्त सारे क्षेत्रों से ज्यादा चुनौती-पूर्ण है.

बहु-चर्चित निर्देशक श्याम बेनेगल ने, जिन्हें कई-एक राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुके हैं, अपनी पहली फ़िल्म 1974 में बनाई। इस फ़िल्म का नाम ‘अंकुर’ है और यह भी अछूत औरत और ब्राहमण आदमी के रिश्ते की कहानी है। फ़िल्म के नायक सुर्या की शादी बचपन में हो गई है और अब उसे अपनी पत्नी का इंतज़ार करना है। वह अपने पिता जी की जमींदारी के अंतर्गत आने वाले एक छोटे गाँव में जाता है और देखता है कि उसके घर के पास एक सुंदर औरत रहती है। औरत का नाम लक्ष्मी है और वह अछूत है। उसका जीवन बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है क्योंकि उसका पति शराबी है। लक्ष्मी बच्चा चाहती है लेकिन किसी कारण से यह उसके लिए असंभव है। सुर्या चाहता है कि लक्ष्मी उसके लिए काम करे और उसको अपने लिए खाना पकाने की अनुमति देता है जो न सिर्फ़ गाँव वालों के लिए बल्कि लक्ष्मी के लिए भी आश्चर्यजनक है। एक दिन लक्ष्मी का पति कहीं जाता है और लक्ष्मी और सुर्या एक दुसरे के करीब आते हैं। आशिक़ों का संतोष अचानक नष्ट हो जाता है जब सुर्या की पत्नी गाँव में आती है। इसी समय को लक्ष्मी को पता चलता है कि वह माँ बननेवाली है। सुर्या की पत्नी को अच्छी तरह मालूम है कि उसके पति और लक्ष्मी के बीच में क्या है और वह दुसरी औरत को निकलाने की कोशिश करती है। जब सुर्या को बच्चे के बारे में पता चलता है तो वह लक्ष्मी को घर से निकलाता है। इसी समय लक्ष्मी का पति शराब छोड़कर वापस आता है। लक्ष्मी को डर है कि पति बच्चे के बारे में क्या सोचेगा लेकिन बह खुश होकर सुर्या के घर जाता है, यह सोचकर कि शायद उसको काम मिलेगा। ब्राहमण सोचता है कि अछूत आदमी उसको मारने के लिए आ रहा है और मार-पीट शुरू कर देता है। गाँव के दुसरे लोग भी इस मार-पीट में सूर्या को मदद देते हैं। जब लक्ष्मी को पता चलता है तो वह आती है और अपने पति की रक्षा करती है।

यह एक सरल कहानी है जिसमें निरंतर नैतिक शिक्षा नहीं है परन्तु फिल्म-निर्माण के लिहाज से कहानी का बहुत अच्छा चित्रांकन है। फ़िल्म में हम यह देख सकते हैं जो अक्सर पश्चिमी लोगों के लिए समझने में सब से मुश्किल है – क्या भारतीय समाज में अछूतों के प्रति सचमुच इतनी घृणा है जहाँ सेक्स करने और मारने के समय यह अस्पृश्यता खत्म हो जाती है। इस कहानी में सुधार के उपदेश या प्रचार के लिए शायद स्थान नहीं है लेकिन भारतीय समाज के जातिवादी जकड़न और ढोंग पर एक करारे व्यंग्य के कारण, जो कि भारतीय सिनेमा में अक्सर नहीं होता है, इसको याद रखना चाहिए। यह फ़िल्म मामूली दर्शकों के लिए नहीं है लेकिन सिनेमा का एक बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा तो ज़रूर है।

1981 में बनी सत्यजित रायकी ‘सद्गति’ ‘शतरंज के खिलाड़ी के बाद उनकी दुसरी हिंदी फ़िल्म है। दोनों फ़िल्में प्रेमचंद की कहानी पर आधारित हैं। प्रेमचंद की कहानी ‘सद्गति’ ‘चमार’ जाति से आने वाले दुखी नाम के एक व्यक्ति के बारे में है जो अपने बेटी की शादी करवाना चाहता है और इसके लिए ब्राहमण का आशीर्वाद चाहिए ताकि वह घर आकर शुभमुहूर्त निकाल सके। वह अछूत है इसलिए उसको ब्राहमण का बहुत लंबा इंतज़ार करना है। बेचारे आदमी के पास पैसा नहीं है इसलिए ब्राहमण उसको लकड़ी काटने का हुक्म देता है। आदमी भूख के कारण कमज़ोर है इसलिए अच्छी तरह काम नहीं कर सकता है। जब आखिर में ब्राहमण जाने के लिए तैयार है वह देखता है कि दुखी मर गया है। गाँव में रहने वाले अछूत मरे हुए आदमी को लेना नहीं चाहते हैं और ब्राहमण चुपचाप दुखी की लाश को दूर ले जाता है और वापस आने के बाद नहा लेता है और इसी समय जानवर खेत में लेटे हुए लाश को खाते हैं।

फ़िल्म प्रेमचंद की कहानी के बहुत नज़दीक है। अछूत आदमी को अलगअलग हुक्म दिये जाते हैं, इसके बावजूद की उसने भैंसों के लिए घास लाया है। वह सब कुछ करता है बार-बार गाँव के केंद्र में खड़ी हुई रावण की बड़ी मूर्ती के पास जाकर, लेकिन लकड़ी को काटना उसके मौत का कारण बना।

बेचारा दुखी मर जाता है। बाकी अछूतों को इस घटना के बारे में पता चलता है। इसलिए जब ब्राहमण उनके यहाँ आता है और उनको लाश ले जाने की हुक्म देता है तो वे लोग उसको ध्यान नहीं देते हैं। दुखी के समुदाय के लोगों ने लाश नहीं उठाने का फैसला कर एक तरह से ब्राह्मण द्वारा हुए अत्याचार का विरोध करते हैं। यहाँ एक ध्यान देने वाली बात यह है कि दुखी जिस लकड़ी को काट रहा था, वह ऐसी-वैसी लकड़ीनहीं थी। वह ब्राह्मणवाद और जातिवाद का कठोर गट्ठर था और कितने दुखी को उसके लिए मरना पड़ा है।

राय की फ़िल्म और प्रेमचंद की कहानी में असाधारण अनुकूलता है जो थोड़ी सी अश्चार्यजनक है क्योंकि यह लेखक भारत में बहुत लोकप्रिय है। प्रेमचंद की कहानियों के आधार पर फ़िल्म बनाना आसान बात नहीं है क्योंकि वह आमतौर पर समाजिक-दोषों के बारे में लिखता था, लेकिन समाधान नहीं बताता था और ऐसी कहानियां व्यापारिक फ़िल्मों के लिए ज़्यादा अच्छा विषय नहीं है क्योंकि उन फ़िल्मों को स्पष्ट समाधान चाहिए। नायक द्वारा खलनायक का वध जैसी कहानियां।

1991 में बनाई हुई ‘दीक्षा’ एक और बॉलीवुड के बाहर की हिंदी फ़िल्म है जहाँ दलितों का ज़िक्र है। फ़िल्म का आलेख कर्नाटक के लेखक यू. आर. अनंतमूर्ति की कहानी पर आधारित है। 1992 में इस फ़िल्म को हिंदी की सब से अच्छी फ़िल्म के लिए पुरस्कार भी मिला लेकिन फिल्म व्यावसायीक रूप से सफल नहीं हुई। फ़िल्म का नायक एक छोटा ब्राम्हण लड़का है जिसका नाम नानी है। वह गाँव में रहने वाले एक ब्राम्हण का एक बेटा है। नानी के पाँच भाई मर गए हैं इसलिए उसका पिता निश्चय करता है कि उसको पढ़ाई के लिए पण्डित उडूप के यहाँ भेज देगा ताकि भगवान उसको जीवित रखे। पण्डित के दो वरिष्ठ शिष्य हैं जो अक्सर नानी को बहुत कष्ट पहुंचाते हैं, पर पण्डित की एक जवान बेटी यमुना भी है जो विधवा बन गई और वह नानी को अपने बेटे के समान समझती है।

जब पण्डित गाँव से कुछ दिनों के लिए कहीं जाता है तो यमुना और गाँव के अध्यापक के बीच में प्रेम उत्पन्न होता है और विधवा गर्भवती हो जाती है। पण्डित के वरिष्ठ शिष्यों के कारण गाँव के सारे लोगों को पता चलता है कि यमुना माँ बननेवाली है। यमुना पाप से बचने के लिए गर्भपात करवा लेती है। इसके बाद उसका पाप और बड़ा हो जाता है। पण्डित अपने शिष्यों को घर भेज देता है और अपनी जीवित बेटी का अंतिम संस्कार करता है।

यह फ़िल्म विधवाओं की स्थिति के बारे में है लेकिन इसमें अछूतों की स्थिति को भी दर्शाया गया है। पण्डित का नौकर कोगा अछूत है। वह हमेशा ब्राहमण लड़कों की तरह पढ़ना चाहता था। गाँव में रहनेवाले दुसरे अछूत आदमियों के लिए कोगा का व्यवहार उनकी जाति का अपमान है। वे लोग सोचते हैं कि कोगा ब्राहमण बनना चाहता है और यह उनके लिए सब से बड़ा पाप है क्योंकि हर जाति को अपना कर्तव्य करना चाहिए। इसी तरह कोगा दोहरा परित्यक्त बन जाता है, न घर का न घाट का। एक बार अपनी जाति के कारण और दुसरी बार अपने व्यवहार-विचार के कारण जो उसकी जाति के लोगों के विचारों के अनुकूल नहीं है। जब कोगा की बुआ जो उसकी एक ही रिश्तेदार थी मर जाती है अछूत आदमी पण्डित से उसके लिए अंतिम संस्कार की भीख मांगते हैं। शुरू में पण्डित के लिए यह खयाल घृणित लगता है लेकिन बाद में जो कोगा चाहता है वह करता है।

अरुण कौल की इस फ़िल्म में, जैसे पहले बिमल राय की फ़िल्म में, एक बुढ़ी औरत है जो दुसरों को पापी मानती है जबकि अपने व्यवहार में सब से दुराचारी लगती है। जब वह पण्डित को अछूत औरत के लिए अंतिम संस्कार करते हुए देखती है तो इसके बारे में दुसरे ब्राहमणों को बताती है जिसके कारण गाँववाले पण्डित उडूप पैर ध्यान रखना शुरू कर देते हैं। अच्छी बात यह है कि गाँववाले छोटे नानी को नहीं देखते हैं क्योंकि यह लड़का एक मात्र ऐसा व्यक्ति है जिसके लिए कोगा वैसा ही मनुष्य है जैसे गाँव के सब बाकी लोग। नानी के कोगा के प्रति के व्यवहार का आधार बच्चे की ‘दुनियावी अज्ञानता’ है जो अच्छी तरह दिखाता है कि लोगों में अंतर स्वभाविक नहीं होते हैं, बस संस्कृति से संबंधित। नानी कोगा की बुआ के लिए प्रर्थना करता है और नहीं समझता है कि क्यों पण्डित का व्यवहार दुसरों को इतना बुरा लगा! इस छोटे लड़के की संवेदना का एक और बहुत अच्छा उदाहरण है इस दृश्ये में है जब नानी कोगा को लड्डू देता है। अपने काम के लिए कोगा को खाना मिलता है। यमुना उसको चावल देती है ताकि वह भूख से नहीं मरे और काम कर सके लेकिन नौकर को मिठाई देना कुछ और ही इंगित करता है और अच्छी तरह दिखाता है कि छोटा लड़का बड़ों से अच्छी तरह आत्मा की अवश्यकता समझता है। नानी का व्यावहार इसका भी सबूत है कि सब पूर्वाग्रह अंतर्जात नहीं होते हैं पर संस्कृतिक विकास से संबंधित हैं।

छोटे लड़के का खुद से गहरा आकर्षण कोगा के लिए थोड़ा दहशतपूर्ण है। वह वही व्यक्ति है जिसके लिए नियमों के अनुसार व्यवहार करना जरुरी है इसलिए छोटे बच्चों को अधिकारों तोड़ने की अनुमति नहीं देता है। एक दृश्ये में नानी कोगा को तंग करता है और सारा समय उसको छूने की कोशिश करता है। बेचारे कोगा को ऊँचे ताड़ का पेड़ पर चढ़ना चाहिए। कोगा और गाँव के दुसरे अछूतों का व्यवहार यह अच्छी तरह दिखाई देता है कि अछूत लोग खुद से सोचते हैं कि पारंपरिक सोच-विचार से लड़ाई करना उचित बात नहीं है। जिसका कोगा की बुआ की मौत के बाद के दृश्य में ज़िक्र किया गया है, इस में भी कोगा पण्डित से अंतिम संस्कार मांगता है सिर्फ़ इसलिए कि इससे बुआ की आत्मा को शांति मिलेगी। कोगा सोचता है कि उसको यह करना चाहिए क्योंकि वह उसे पुरे जीवन मायूसी देता रहा। इस मायूसी का आधार यह था कि वह अपनी जाति के कर्तव्य नहीं करता था और अलग चीज़ों में दिलचस्पी रखता था। इन सब के कारण वह शायद अच्छा और संवेदनशील आदमी बन गया, लेकिन गाँव में रहनेवाले लोगों के विचार में अच्छा अछूत तो नहीं ही था और इस कारण एक हास्यस्पद व्यक्ति बन गया था।

जैसे पहले ही ज़िक्र किया गया उपर्युक्त तीनों फिल्में पुरस्कारों के बावजूद लोकप्रिय नहीं हुई। लेकिन शायद इन फ़िल्मों के कारण मुख्यधारा विषयक के निर्देशक कुछ सालों के बाद यह सोचने लगे कि इस समस्या को अपने दर्शकों को धीरे-धीरे दिखाना चाहिए। बॉलीवुड फ़िल्मों में उपदेश और नए सवालों को पूछना दो चीजें हैं । कभी पुरी फ़िल्मी कहानी किसी समस्या के बारे में होती है और इस प्रश्न को हल करने के बाद यह दिखाई देती है कि असहिष्णुता से किसनी खत्रा आती है। इसी तरह की फ़िल्म का एक अच्छा उदाहरण अनील शर्मा की ग़दर: एक प्रेम कथा है। यह फ़िल्म भारत-विभाजन के समय एक सिख लड़के और मुसलमान लड़की के प्रेम के बारे में है। लड़की के पिता को इस रिश्ते से तब तक विरोध है जब तक उसकी बेटी की दुर्घटना नहीं होती है। इस के बाद वह सोचने लगता है कि उसके कारण प्यारी बेटी की मौत हो सकती थी और यह सोचने लगता है कि धर्म इतना महत्त्वपूर्ण नहीं है। हम देख सकते हैं कि मुख्य समस्या धर्मों के अंतर का है लेकिन फ़िल्म के अंत में दर्शकों को कहा जाता है कि ऐसे अंतर समाज के लिए ठीक नहीं है।

दूसरी तरह की फ़िल्मों में भी यही होता है जिस में तकरारी बातें बिल्कुल प्राकृतिक होती हैं। ऐसी फ़िल्म का अच्छा उदाहरण मनमोहन देसाई की ‘अमर, अकबर, एंथोनी’ है। इस फ़िल्म की कहानी बॉलीवुड में लोकप्रिय खोया-पाया के सूत्र पर आधारित है। यह बचपन में खोये हुए तीन भाइयों की कहानी है जिन से एक हिंदू परिवार में बड़ा होता है, दुसरा मुसलमान परिवार में और तीसरे को इसाई धर्माचार्य गोद में लेता है। इस फ़िल्म में धर्मों के अंतर के बारे में कोई कुछ नहीं कहता है और सच के प्रकाशन के बाद किसी को अजीब नहीं लगता है कि हर आदमी का अलग धर्म है और अलग धर्म की पत्नी।

कौन सी योजना सही है यह कहना आसान नहीं है इसलिए वे इन दोनों फ़िल्मों में नहीं आती है। लेकिन लगता है कि निषेध को स्वभाविक बनाना तब तक मुमकिन होता है जब तक दर्शक इसके लिए तैयार है इसलिए दलितों के बारे में ऐसी फ़िल्में नहीं होती हैं और उनकी फिल्में तब तक सामने नहीं आएँगी जब तक लोग विशवास नहीं कर लेते कि दलित सचमुच दुसरे लोगों से बराबर हैं।

आशुतोष गोवारिकर की ‘लगान’ की कहानी अवास्तविक दुनिया में चली जाती है लेकिन ऐसी दुनिया बनाकर भी अछूतों को दुसरी जातियों से बराबर होने की अनुमति नहीं दी गई। फ़िल्म एक छोटे गाँव के लोगों के बारे में है जो अंग्रेज़ों से लड़ाई करते हैं। फ़िल्म का नायक – भुवन लगान हटाने के लिए अंग्रेज़ों से क्रिकेट खेल में जीतने की तैयारी करता है। उसका समूह भारतीय समाज का दर्पण है। इसमें अधिकांश हिंदू है लेकिन इसमें भी मुसलमान और सिख हैं। यह और बात है कि इस छोटे गाँव में मुसलमान भी रहते हैं और एक सिख कहीं दूर से अचानक आता है और इसमें कोई आश्चर्य नहीं है क्योंकि फ़िल्म की दुनिया वास्तविक नहीं है। हमको इसके बारे में भी याद करना चाहिए कि सिख और मुसलमान दोनों बहुत अच्छे खिलाड़ी हैं जिनको निकालना बहुत मुश्किल है। उन के द्वारा किए गए दोष उनके कौशल की कमी से नहीं आते हैं बल्कि विरोधियों के छल खेल या अभागी परिस्थितों के परिणाम हैं।

खेल शुरू होने से पहले एक और खिलाड़ी की ज़रूरत है। आसपास के गाँवों में रहनेवाले तैयारी को देखने को लिए आते हैं और उनमें एक अछूत आदमी भी है जिसका नाम कचरा है। एक क्षण में गेंद उसकी तरफ आता है और भुवन कचरा को इसे फेंकने को कहता है। जब कचरा गेंद को फेंकता है तो सब लोग देख सकते हैं कि वह अच्छी तरह गेंद को घुमा सकता है। भुवन कचरा को तुरंत अपने समूह में लेना चाहता है लेकिन जब वह इसके बारे में बताता है तब समूह के बाकी लोग खेलने से इंकार करते हैं। पहले वे भुवन के सब अजीब उद्देश्यों को स्वीकार करते थे लेकिन अछूत के साथ खेलना उनके लिए बहुत बड़ी बात है। भुवन कचरा को छूता है और सब को बताता है कि भारत को इसीलिए इतनी आसानी से उपनिवेश बनाया गया है क्योंकि उनके लोग एक दुसरे को साथ दे नहीं सकते हैं। अंत में कचरा अंतिम खिलाड़ी बन जाता है और खेल में आखिरी दाँव उसे ही खेलना है। उसकी दुगनी ज़िम्मेदारी है – अगर हार जाएगा तो उसका नया स्तर चला जाएगा और वह दुसरों से पहले से ज़्यादा तिरस्कृत होगा। जो गाँववाले हर दुसरे व्यक्ति को माफ़ करते हैं लेकिन कचरा को उसकी जाति के कारण सज़ा मिल सकती है! शायद यह तनाव कचरा के लिए मुश्किल है इसलिए वह असफल हो जाता है। सैभाग्य से भारत को एक और मौका दिया जाता है और इस बार भुवन को आखिरी दाँव खेलना है। भुवन को सफल होने का नसीब मिलना बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। फ़िल्म को बनाने वालों ने अपनी कहानी के बारे में बहुत सोचा और उन्होंने बहुत अच्छी तरह से अछूतों के प्रति आदर दिखाया। भुवन और कचरा दोनों भाग्यशाली थे और इसलिए भारत जीत गया। अगर नायक के कौशल कचरा से बड़े होते तो दर्शक यह सोच सकते थे कि अछूतों को सचमुच विशवास नहीं करना चाहिए क्योंकि मुख्य क्षण में वे निराशाजनक होते हैं!

अंग्रेज़ों से लड़ाई के बारे में बनी फिल्म ‘लगान’ का भुवन आमीर खान बाद में इसी विषय पर बनी एक दुसरी फ़िल्म में भी आ गया। केतन मेहता की ‘मंगल पाण्डे: द राइजिंग’ में अंग्रेज़ लोग सब से पहले जातिवादी हैं। जब एक अंग्रेज़ी दावत के समय भारतीय नौकर से एक गोरी औरत पर शराब छलक जाता है तो उसको बहुत बड़ी सज़ा मिलती है। नौकर को पीटता हुआ अंग्रेज चिल्लाता है कि उसकी गोरी औरत को छूना मना है और उसे कुत्ते कह कर संबोधित करता है। फ़िल्म का नायक मंगल पांडे मार खा रहे नौकर की रक्षा करता है लेकिन बाद की दृश्य में वह भी दुसरों के प्रति तिरस्कार दिखाता है। वह ब्राहमण है जिसको हर सुबह नदी में नहाना है। एक दिन वापस जाने के समय वह सड़क पर सफ़ाई करनेवाले अछूत से टकराता है। मंगल का व्यवहार वैसा ही है जैसा पहले नौकर के प्रति अंग्रेज़ का था और वह भी अछूत को कुत्ते की उपाधि देता है।

हम कह सकते हैं कि फ़िल्म में दिखाए गए अंग्रेज़ लोग गोरी चमड़ी के कारण अक्सर खुद को ज़्यादा अच्छा समझते हैं लेकिन फ़िर भी उनके लिए भारतीय लोगों से सम्पर्क उतना घृणित नहीं है। अंग्रेज़ों के बड़े घरों में सारे भारतीय नौकर काम करते हैं और उनसे खाने या पीने की वस्तु लेने में कभी कोई समस्या नहीं थी।

फ़िल्म सिपाही विद्रोह के बारे में है और इसका मुख्य विषय कारतूस की समस्या है। अंग्रेज़ लोग बड़ी आसानी से भूल जाते थे कि भारतीय सिपाहियों के लिए धर्म कितना महत्त्वपूर्ण है और उनके नियमों की इज्जत नहीं करते थे। 1806 में सिपाही नयी वर्दियों का विरोध करते थे जिनके कारण वे अपनी जाति से निकाल जा सकते थे, 1825 में समुद्र पार करना जो कि समाजिक नियमों के विरुद्ध था और अफगानिस्तान के युद्ध के समय बड़ी समस्या यह थी कि हिंदू सिपाहियों के लिए रोज़ का स्नान असंभव था और उनको मुसलमानों से खाना खरीदना था। कारतूस की समस्या सच में धर्म और संस्कृति के अपराध का सिर्फ़ एक और उदाहरण था।[9]

मंगल का अंग्रेज़ी दोस्त उसको भरोसा दिलाता है कि कारतूस के बारे में जो अफ़वाह होते हैं वे सच नहीं हैं लेकिन जब सब को पता चलता है कि मंगल का अपवित्रीकरण हुआ है तो वह तुरंत अपनी जाति से निकाल जाता है। लगता है कि अंग्रेज़ अच्छी तरह नहीं समझते हैं कि यह बात कितनी महत्त्वपूर्ण है और उनकी अज्ञानता के कारण मनुष्य को समाज के बाहर जीना पड़ता है जो मौत से भी बदतर है। मंगल यह सब कुछ न सिर्फ़ अपने अंग्रेज़ दोस्तों को स्पष्ट करता है बल्कि विदेशी दर्शकों को भी जो कभी इसके बारे में कुछ नहीं जानते हैं या विशवास नहीं करते हैं कि क्या यह सब कुछ सचमुच इतना महत्त्वपूर्ण है!

अपने ऊँचे स्तर को खोने के बाद मंगल हीरा से रिश्ता बनाता है। यह भी स्पष्ट है कि अगर वह शुद्ध ब्राहमण होता तो प्यार के बावजूद वेश्या से करीबी रिश्ता कभी नहीं बनाता। और, यहाँ भी भारत और अंग्रेज़ का अंतर है। विदेशी सिपाहियों के लिए हर वेश्या लालच थामने के लिए होती है, भारतीय या कोई दुसरी वेश्याओं में उनके लिए कोई अंतर नहीं है। केतन मेहता की फ़िल्म अछूतों के प्रति के बुरे व्यवहार का विरोध नहीं करता है और सिर्फ़ यह दिखाता है कि जातियों से अंतर कितने महत्त्वपूर्ण हैं।

इसी साल में बनी हुई आशुतोष गोवारिकर की ‘स्वदेश’ में भी हम पश्चिमी दृष्टि से भारत देख सकते हैं लेकिन यह दृष्टि ‘मंगल पाण्डे: द राइजिंग’ से कुछ अलग है। फ़िल्म के नायक का नाम मोहन है और वह भारत को छोड़कर यू एस ए में रहता है जहाँ नासा में काम करता है। एक दिन वह अपने देश में वापस जाने का निश्चय करता है अपनी आया को ढूढ़ने के लिए। आया एक छोटे गाँव में रहती है जहाँ इंटरनेट नहीं है, बिजली अक्सर चली जाती है और सब लोग वैसे ही जीते हैं जैसे पुराने ज़माने में। गाँव आने के बाद मोहन का व्यवहार पश्चिमी पर्यटक जैसा है – वह काफिले में सोता है, सिर्फ़ बोतल का पानी पीता है और यह नहीं समझ सकता है कि सब लोग इस तरह गाँव में कैसे जी सकते हैं।

गाँववालों में से एक अछूत आदमी – मेला राम रोज़-रोज़ मोहन के लिए खाना लाता है क्योंकि उसको आशा है कि विदेशी मेहमान उसको अपने साथ अमरीका ले जाएगा। मोहन का व्यवहार फ़िर से विदेशी पर्यटक के जैसा है और वह बिना किसी नियंत्रण के गाँव वालों का खाना खाता है। हम यह सोच सकते हैं कि शायद उसको पता नहीं है कि मेला राम कौन-सी जाति से है लेकिन बाद में जब गाँव में रहने वाले बुढ़े लोग मोहन की आलोचना करते हैं फिर भी वह मेला राम से दोस्ती नहीं छोड़ता है। फ़िल्म में अक्सर दिखनेवाले दृश्यों में मोहन, मेला राम और डाकखाने में काम करनेवाला निवारण तीनों एक स्कूटर पर बैठकर कहीं जाते हैं। सच में मोहन बीच में बैठता है जिसके मदद से मेला राम और निवारण का स्पर्श हो नहीं सकता है लेकिन यह फ़िल्म इस उपाय का पहला उदाहरण हो सकता है जिस में कोई समस्या नहीं होता है और फ़िल्म की दुनिया का अनुक्रम प्राकृतिक, स्वाभाविक है। फ़िल्म के गाँव में अछूत दुसरे लोगों से कुछ अलग होते हैं लेकिन इतनी नहीं और अगर कोई उनसे दोस्ती करना चाहता है तो कोई उसका विरोध नहीं करेगा। यह छोटा कदम है लेकिन अच्छी तरह दिखाई देता है कि फ़िल्म वाले धीरे धीरे इस समस्या को दिखाने में साहसी हो रहे हैं।

फ़िल्म में एक और दृश्य है जिस पर हमें ध्यान देना चाहिए। गाँव में सिनेमा आता है और सब अछूत पर्दे की दुसरी ओर में बैठकर दर्पण में प्रतिवर्तन जैसा कुछ देख सकते हैं। यह बड़ी असुविधा नहीं है जब तक कि फ़िल्म को देखने के लिए उपशीर्षकों (Subtitles) की ज़रूरत नहीं है लेकिन ऊँचे और नीचों का ऐसा स्पष्ट विभाजन अपमानजनक है। फिल्म के समय बिजली फिर से चली जाती है और पर्दे के सामने बैठे हुए बच्चे रो पड़ते हैं। मोहन सब को तारे दिखाता है और इस समय गाना गाता है। गाने की पराकाष्ठा में पर्दा हटाया जाता है। मोहन अपना टेलीस्कोप लाता है और सब को तारे और चन्द्र को देखने की अनुमति देता है। सब से महत्त्वपूर्ण बात यह है कि मोहन को जातियों को बराबरी के बारे में कोई भाषण देने की ज़रूरत नहीं है जैसे पहले भुवन को था और सब लोग साथ साथ टेलीस्कोप से देखते हैं बिना किसी शिकायत के। ‘स्वदेश’ अछूतों के बारे में नहीं है लेकिन वो यहाँ भी आ गया है और इस तरह दिखाया गया है कि यह फ़िल्म अब तक की सब से बहादुर फ़िल्म है। यह भी महत्त्वपूर्ण है कि किसी ने इसके लिए फ़िल्म की आलोचना नहीं की और इसका मतलब यह है कि फ़िल्म को बनानेवाले ने कहानी में अच्छी तरह अपने विचार डाल दिए हैं जो मुख्यधारा विषयक फिल्मों के लिए बहुत ही आवश्यक हैं।

चर्चित समाजिक आलोचक, प्रकाश झा ने 1985 में ‘दामूल’ बनाई जिसमें अमीर लोगों द्वारा गरीबों का शोषण दिखाया गया है। फ़िल्म ने उसको मशहूर बनाया और फिल्म को पुरस्कार भी मिले। 2011 में उसने दलितों के बारे में ‘आरक्षण’ बनाई। यह फ़िल्म निचली जातियों की प्रतिरक्षा के बड़े दावों के बावजुद उन्हीं जातियों के बीच में विवादास्पद हो गई।

यह एक युवा– दीपक की कहानी है। बह दलित है इसलिए शिक्षित होते हुए भी उसको काम नहीं मिलता है। प्रतिष्ठित कॉलेज का मुख्य अध्यापक – प्रभाकर अनंद उसको अपने स्कूल में काम देता है क्योंकि वह आदमी सालों से सभी जातियों के गरीब तबके के युवाओं को शिक्षित करने के लिए संघर्षरत है। आरक्षण-निति की मदद से निचली जातियों को स्कूलों और विश्वविद्यालयों में स्थान मिलता है वह प्रभाकर के विचार में बहुत अच्छा समाधान है। फ़िल्म का खलनायक मिथिलेश सिंह है जिसके लिए सिर्फ़ पैसा सबसे महत्वपूर्ण है और जो प्रभाकर को नष्ट करना चाहता है। शुरू में फ़िल्म में आरक्षण की निति के बारे में एक वाद-विवाद है और आरक्षण के फ़ायदे और नुकसान बताये जाते हैं। अफ़सोस की बात यह है कि फिल्म अपने विषय से जल्दी भटक जाती है और हम दुराचार और पैसों से सच्चाई की जीत का अरुचिकर और थकाऊ धर्माचार देखते हैं जिस में ‘दामूल’ की सरलता तो बिलकुल ही नहीं है।

मिथिलेश अपना स्कूल स्थापित करता है और पैसेवाले लोगों को बताता है कि उनके बच्चों को सिर्फ़ उसके स्कूल में ऐसी शिक्षा मिलेगा जिसकी ज़िंदगी में ज़रूरत होगी। धीरे धीरे वह प्रभाकर के स्कूल के अध्यापकों को प्रलोभन देता है। प्रभाकर और दीपक गरीब-बच्चों को गोशाले में पढ़ाते हैं और अंत में जीत जाते हैं क्योंकि परीक्षा में उनके विद्यार्थियों को सब से ऊँचे अंक मिलते हैं। लगता है कि अमिताभ बच्चन ने निश्चय किया है कि अब वह भारीय समाज का अनुभवी परामर्शदाता बन जाए। माननीय अभिनेता का व्यवहार आजकल अक्सर शिष्यों को शिक्षा देनेवाले गुरु जी जैसा है और यह ख़तरनाक बात है क्योंकि इस प्रवृति के कारण उसकी फ़िल्में पहले जैसी अच्छी नहीं हैं। यह बड़ी अफ़सोस की बात है क्योंकि अमिताभ बहुत अच्छा अभिनेता है। ‘आरक्षण’ की चर्चा इसलिए करनी चाहिए क्योंकि फ़िल्म विवादग्रस्त बन गई। अगर लोगों को इस फिल्म में कहानी दिखाने-कहने का तरीका पसंद नहीं आया तो यह आश्चर्य-जनक बात नहीं होती क्योंकि इस क्षेत्र में फ़िल्म बहुत ही खराब है लेकिन दर्शकों की समस्या कुछ और ही थी। दिलचस्प बात यह है कि जिन दर्शकों को इस विषय से सम्बंधित ज़्यादा बहादुर फ़िल्में पहले ही मिल चूकी हैं उन्होंने इस फ़िल्म को देखने के बाद खुद को अपमानित महसूस किया।

निचली जातियों के दर्शकों को सब से खराब यह लगा कि फ़िल्म का नायक सैफ़ अली खान हो गया[10]। ऐसी स्थितियाँ पहले होती थीं और मैंने ‘मदर इंडिया’ का ज़िक्र किया लेकिन इस बार यह कहना मुश्किल है कि दर्शकों को अपमानित क्या लगा? क्या उनको अच्छा लहीं लगा कि अभिनेता मुसलमान है या उसका कुलीन वंश का होना जो कि फ़िल्म के उसके कार्य-भाग से संबंधित नहीं था[11]। सब से दिलचस्प बात यह है कि जिन लोगों को फ़िल्म पसंद नहीं थी वे ऐसे लोग थे जिनकी पक्षधरता का दावा फ़िल्म करती थी। दलितों के विरोध का मतलब यह हो सकता है कि आखिर में उन लोगों को अपनी नीतियों के बारे में पता है और अपनी सुविधा के लिए वे लड़ सकते हैं जो कि अच्छी बात है। फ़िर भी निराशा का कारण थोड़ा सा तकलीफ़देह लगता है अगर हम इस नायक को ध्यान से देखेंगे। दीपक बहुत अच्छा आदमी है लेकिन उसकी एक कमी है और यह ऐसी बात है कि वह बड़ी आसानी से अपना आपा खो सकता है और अकसर निराश होकर अपनी उग्रता का इस्तेमाल करता है। मिथिलेश से टकराना सब के बस की बात नहीं है, दीपक आता है और स्कूल को नष्ट करता है। पहले भी वह अक्सर दुसरों को मार देता है और उसे बोलने का सलीका नहीं है, यह सब नायक का बहुत बड़ा दोष है। दीपक की आक्रामकता का स्पष्टीकरण यह हो सकता है कि पढ़ाई के बावजुद निचली जातियों के लोग हमेशा अपरिष्कृत होंगे और शायद यह अच्छी बात है कि उन लोगों को ऊँचे स्तर का काम नहीं मिलता है क्योंकि वे खतरनाक हैं। दलितों की रक्षा करने के लिए फ़िल्म का ऐसा नायक अजीब लगता है, लेकिन समस्या है कि फ़िल्म के दर्शकों को नायक नहीं, अभिनेता पसंद नहीं था। अगर लोगों को नायक अच्छा नहीं लगता तो उनका क्रोध समझ में आने योग्य होता लेकिन अभिनेता का विरोध करना एक तरह से वही व्यवहार है जैसा दलितों के प्रति वर्षों से हो रहा है।

सब से निराशाजनक यह बात है कि कुछ भारतीय प्रदेशों में फ़िल्म को प्रतिबंधित किया गया और निर्देशक से फ़िल्म के कुछ दृश्यों को काट देने की मांग की गयी जिसका मतलब यह है कि अस्पृश्यता आजकल भी भारत में एक संवेदनशील विषय है। लेकिन अगर अछूतों की रक्षा करने के लिए बनाई हुई फ़िल्म के दृश्ये भी दलितों को अपमानित करते हैं तो दर्शकों का बिगड़ना आश्चर्यजनक बात नहीं है। इस फ़िल्म में प्यार को दिखाने की तरीका भी दिलचस्प है। प्रभाकर की बेटी और दीपक एक दुसरे से कुछ न कुछ प्यार करते हैं लेकिन उनका प्रेम फ़िल्म का मुख्य विषय नहीं है। हम यह बता सकते हैं कि नायक और नायिका की रिश्ता ऐसे उपाय का उदाहरण है जिसके अनुसार फ़िल्म कोई बात इस तरह दिखाता है मानो वे दुनिया के स्वभाविक नियम थे, लेकिन इसमें कुछ ऐसे अंश हैं जो हमको इस तरह से सोचने की इज़ाजत नहीं देती है। सब से पहले दर्शकों को पता नहीं है कि नायक और नायिका के बीच सचमुच प्यार है या सिर्फ़ गहरी दोस्ती, लगता है कि फ़िल्म बनाने वालों को ज़्यादा दिखाने से थोड़ा सा डर था और अगर ऐसा डर इस प्रकार की फ़िल्म में दिखाई देता है तो यह विषय दिखाने से कोई फ़ायदा नहीं है। दीपक और प्रभाकर की बेटी के बीच में अगर प्यार है तो इसे दर्शकों के मन में उतरना चाहिए है नहीं तो इसके होने या न होने से कोई फ़र्क नहीं पड़ता है। व्यभिचार को फ़िल्म में इतना स्थान देना और आरक्षण के बारे में स्पष्ट विचार नहीं दिखाना भी अच्छे सिद्धांत नहीं थे। फ़िल्म का रवैया इतना रक्षात्मक है कि इसे समाजिक समस्याओं में सम्बंधित बताना असंभव है, आप सभी को खुश कर के समस्याओं को संबोधित नहीं कर सकते हैं। निर्देशक को न सिर्फ़ सुधारों के बारे में बताना पर अपनी विचारों को भी दिखाने से डर है। ऐसे ही जगह में वे बहुत गंभीर और आडंबरपूर्ण भाषण डालते हैं जो शुरू में थकाऊ और बाद में हास्यास्पद होते हैं। यह फ़िल्म शायद बॉलीवुड की सबसे बेकार फ़िल्म है और इस कारण सचमुच उसको दिखाने से मना करना चाहिए था।

अंत में एक और विवादास्पद फ़िल्म की ज़िक्र करना उचित लगता है। शेखर कपूर की ‘बैन्डिट क्वीन’ 1994 में बनी हुई है और अछूतों के बारे में नहीं है लेकिन एक और समस्या का अच्छा उदाहरण है। यह फ़िल्म फूलन देवी के जीवन के बारे में माला सेन की किताब पर आधारित है। यह कहानी अच्छी तरह न सिर्फ़ यह दिखाती है कि हर व्यक्ति की ज़िंदगी में समाज की कितनी बड़ी भूमिका होती है लेकिन यह भी कि भारत जैसे देश में जहाँ समाजिक बुनावट इतना उलझा हुआ है कि अपने जीवन को तय करना बहुत मुश्किल है। फ़िल्म की फूलन देवी निचली जाति से है और गरीबी के कारण बचपन में उसकी शादी एक बुढ़े आदमी से हुयी है क्योंकि उसको लड़की के परिवार से बड़े दहेज की ज़रूरत नहीं थी। पति से लुटी हुई लड़की अपने गाँव वापस आती है लेकिन उसकी जीवन पहली जैसी हो नहीं सकती है क्योंकि पति को छोड़ने के बाद बदतहज़ीब हो गई है।

अरुंधती राय[12] एक मजेदार बात कहती है कि शेखर कपूर ने कहा था कि उसने अपने फ़िल्म में सत्य दिखाया फिर भी वह कभी फूलन देवी से मिलने नहीं गया और उस समय फूलन जीवित थी और जब वह अपनी फ़िल्म बनाता था तो उसी समय जेल से आज़ाद भी हुयी थी। निर्देशक अपनी नायिका को नहीं जानता था और उसने फूलन की जीवन की कहानी उससे कभी नहीं सुनी। फूलन की आत्मकथा माला सेन की किताब से कुछ कुछ अलग है और दोनों कपूर की फ़िल्म से बहुत अलग हैं। निर्देशक के लिए बलात्कार, बहुत सारी लूटपाट, गोलियों की आवाज़ सब से महत्त्वपूर्ण लगती हैं। यह सच ज़रूर है कि इन घटनाओं के कारण फूलन के जीवन में बहुत बदलाव आया लेकिन उसके जीवन में आये इन सारे बदलाव के मूल स्रोत इन घटनाओं में नहीं थे। फ़िल्म फूलन के परिवार की समस्याओं के बारे में कुछ नहीं कहता है। उसके जीवन की सारी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं का कारण उसके चाचा का प्रतिशोध था। फ़िल्म देखते हुए कि पश्चिमी दर्शकों के लिए यह समझना मुश्किल है कि फूलन की इन सारी स्थितिओं का मूल उसकी जाति है। जिस गिरोह का नेता निचली जाति में पैदा हुआ विक्रम है और एक तरह से गिरोह की लड़ाइयों का आधार भी है लेकिन लोग सिर्फ़ अलग अलग जातियों के नाम बोलते हैं और इन सब का अर्थ पश्चिमी दर्शकों के लिए स्पष्ट नहीं है। इसी समय दिखाया जाने वाला यौन-शोषण दर्शक का ध्यान मुख्य विषय के विपरीत कर देता है। भारतीय दर्शक के लिए जातियों से संबंधित दुर्व्यवहार को समझना ज़्यादा आसान है लेकिन सिनेमा के इतिहास में पहली बार औरत के प्रति होने वाला क्रूरतम यौन-अपराध दिखाया गया। यह बात गहरी समस्याओं से आगे निकल जाती है और सब से महत्त्वपूर्ण खबर छिप जाती है। भारत में कपूर की फ़िल्म के बारे में लिखने वाले लोग अक्सर इस पर एकाग्र होते हैं कि इस फ़िल्म में पहली बार नंगी औरत दिखाई जाती है। यह सच नहीं है क्योंकि नंगी औरत को हम अंग्रेज़ी वाली गिरीश कर्नाड की ‘उत्सव’ में देख सकते हैं लेकिन निराशाजनक बात यह ज़रूर है कि कपूर की फ़िल्म की लोकप्रियता इसी के कारण हुई है। शायद यह सच है कि ऐसे विवादात्मक दृश्यों को देखने के लिए ही लोग सिनेमा जाते हैं लेकिन कभी कभी याद रखना चाहिए कि अगर ऐसी चीज़ें ज़्यादा होंगी तो दर्शक दुसरे महत्त्वपूर्ण विषय नहीं देख पाएगा और वे विषय नंगे शरीर से शायद ज़्यादा आवश्यक हैं। हिंदी सिनेमा का उदाहरण देकर हमने देखा कि सिनेमा के सौ साल के इतिहास में अछूतों के बारे में ज़्यादा फ़िल्में नहीं हैं। शुरू में ऐसा लगा कि गाँधी जी और उनके तरह के दुसरे सुधारकों की मदद से यह विषय लोकप्रिय होगा लेकिन जल्दी ही ऐसी फ़िल्में मुख्यधारा के विषय से बाहर चली गयीं। क्या भारतीय दर्शक ऐसी फ़िल्मों के लिए तैयार नहीं हैं? मुझे लगता है कि आधुनिक सिनेमा में सब कुछ दिखाया जाता है इसलिए इस विषय से इतना डर ज़्यादा अजीब लगता है। जब हम बॉलीवुड फ़िल्मों की संख्या के बारे में सोचेंगे तो यह देखेंगे कि दलित न सिर्फ़ जाति के वरीयता-क्रम से बाहर हैं बल्कि सिनेमा से भी बाहर हैं। 100 करोड़ से उपर की जनसंख्या वाले देश के सिनेमा में बहुजन-जीवन के स्वाभाविक-चित्रण का अभाव चिंताजनक है और इसका एक बड़ा कारण संभवतः यह है कि बहुजनों का बड़ा हिस्सा अभी भी सिनेमा का उपभोक्ता समुदाय में तब्दील नहीं हुआ है। यह तब तक नहीं बदलेगा जब तक उनकी परिस्थितियों को स्वभाविक तरीके से नहीं दिखाया जाएगा। अगर हम दलित-समस्या पर ही केन्द्रित रहेंगे और सिर्फ़ सुधार के आग्रही के बतौर ही दलितों का चित्रण करेंगे तो वे कभी समाज के स्वाभाविक हिस्से की तरह कभी नहीं दिखेंगे। उपर्युक्त वर्णित सारी फ़िल्मों में से ‘स्वदेश’ और ‘अंकुर’ ने सब से अच्छा काम किया है क्योंकि इन फ़िल्मों में दलितों के प्रति कोई बड़ा पूर्वाग्रह नहीं दिखाया गया है।’अछूत कन्या’ और ‘सुजाता’ में भी दलितों का जैसा चित्रण किया गया है वैसा आज दिखाना असंभव लगता है, इसलिए हमको शायद पुराने जानकारों से फ़िर से ज्ञान लेना पड़ेगा क्योंकि वे अधुनिक निर्देशकों से ज़्यादा बहादुर थे।

[1] http://whatismatt.com/thailand-urban-legends/ (13.01.2012).

[2] U. Woźniakowska, Bollywood, Pragnienie prawdy i tęsknota za    mitem, Kraków 2010, p. 48.

[3] A. Chopra, King of Bollywood, Shah Rukh Khan and the Seductive World of Indian Cinema, New York, Boston 2007, p.     187.

[4] S. Mehta, Pociąg do Bollywood, „National Geographic”, 2, 2005, p. 79.

[5] N. Ghosh, Ashok Kumar. His Life and Times, New Delhi 1995,     p. 67-68.

[6] A. Chowdhury, Dev Anand. Dashing Debonair, New Delhi, 2004,    p. 17-18.

[7] M. Bose, Bollywood. A History, Glouceshire, 2006, p. 205.

[8] R. Dwyer, 100 Bollywood Films, London 2005, p. 12-13.

[9] J. Kieniewicz, Historia Indii, Wrocław 1980, p. 608-610.

[10] http://timesofindia.indiatimes.com

[11] http://www.hindustantimes.com

[12] http://www.sawnet.org/books/writing/roy_bq1.html

Tatiana Szurlej

Tatiana Szurlej

तत्याना षुर्लेई एक Indologist और फिल्म-आलोचक हैं। फिलहाल पोलैंड के शहर क्राकोव सिथत Jagiellonian University में The Courtesan Figure in the Iconography on Indian Popular Cinema:Tradition, Stereotype, Manipulation.   नामक विषय पर पीएचडी के लिए शोधरत हैं।

साभार- हंस फरवरी 2013, सिनेमा के सौ साल 

दलित विमर्श: सिर्फ अपनी मुक्ति की सोच से उत्पीडि़त समाजों-समुदायों की मुक्ति नहीं हो सकती: वीर भारत तलवार

प्रोफेसर वीर भारत तलवार, हिन्दी के उन चंद आलोचकों में अग्रगण्य हैं, जो सामाजिक-सांस्कृतिक सरोकारों से एक जेनुइन जुड़ाव रखते हैं। हिन्दी की जोड़-तोड़ और छद्म-पूजनपंथी संस्कृति से दूर यह आलोचक आज लोगों के लिए आकर्षण का कारण इसीलिए भी बना है कि दिल्ली में समूहिक बलात्कार की घटनाओं ने इस आलोचक को इतना विचलित कर दिया है कि  वे इधर लगातार अस्मिता-प्रश्नों पर नए सिरे से विचार कर रहे हैं। हिन्दी में जो तीन मूल अस्मिता-विमर्श चलते हैं- दलित-स्त्री-आदिवासी विमर्श, उस पर उन्होंने विस्तार से विचार किया है। हमारी योजना है कि उन तीनों विमर्शों को धारावाहिक रूप में आपके समक्ष प्रस्तुत करूँ।

By वीर भारत तलवार
हमारे देश में इस समय ये जो तीन विमर्श चल रहे हैं। इनमें सबसे जो कारगर और प्रभावशाली विमर्श है, वह तो दलित विमर्श ही है। वो सचमुच एक ऐसा विमर्श है जिसकी एक वास्तविक सत्ता बन चुकी है। और इस विमर्श का महत्व भी बहुत है। इस विमर्श ने हमारे देश में, समाज में एक ऐसे सवाल को खड़ा किया जिस सवाल को लेकर बड़े-बड़े महात्मा आज तक आते रहे और अपनी सारी सदाशयता और अपनी इच्छाओं के बावजूद कुछ नहीं कर सके। वो है जाति का सवाल। जाति का सवाल जिसको लोहिया जी कहते थे कि कोढ़ है इस समाज का, एक ऐसी निराधार अवधारणा है जिसका कोई आधार नहीं है, कोई विवेक सम्मत तर्क नहीं है जिसके पीछे। एक अहंकारपूर्ण मिथ्या चेतना है वो। लेकिन उस चेतना से प्रेरित होकर करोड़ों लोग अपना जीवन जीते हैं, उसमें आस्था रखते हुए। और उस आस्था से प्रेरित होकर दूसरों की जान ले लेते हैं, हत्या करते हैं, हिंसा करते हैं। ऐसी निराधार विवेकहीन अहंकारपूर्ण मान्यता पर पहली बार कारगर ढंग से इस देश में सवाल खड़ा किया दलित विमर्श ने, जिसका श्रेय है बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर को। और ज्योतिबा फुले और सावित्री बाई को। ज्योतिबा फुले का साथ सावित्री बाई का नाम मैं साथ-साथ लेना चाहता हूं, क्योंकि उन्होंने जो कुछ किया, एक साथ मिलके किया। वो सिर्फ ज्योति बा फुले का ही योगदान नहीं था, उसमें सावित्रीबाई का योगदान शामिल है। इसलिए उसे स्वीकार करना चाहिए, जैसे आप मार्क्स-ऐंगल्स बोलते हैं, ऐसे ही ज्योतिबा फुले और सावित्री बाई जो हिंदुस्तान के मेरी नजर में पहले आधुनिक स्त्री-पुरुष थे। उनके संबंध स्त्री-पुरुषों के दृष्टिकोण से एक आदर्श संबंध थे। और जब हम स्त्री-पुरुष के आधुनिक संबंधों के बारे में विचार करते हैं तो हम ज्योति बा फुले और सावित्री बाई की मिसाल सामने रख सकते हैं।

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तो दलित विमर्श ने सबसे महत्वपूर्ण काम किया कि इस देश में जाति के सवाल को इस तरह से खड़ा कर दिया कि उसे कोई भी नजरअंदाज नहीं कर सकता। उससे आंखें नहीं चुरा सकते, उसका जवाब दिए बिना आप आगे नहीं बढ़ सकते। ये बहुत असाधारण बात हुई है। युगांतरकारी बात हुई है। ये दलित जाति का सवाल जो है, आज हमारे देश में देशज आधुनिकता की कसौटी बन चुका है। मॉडर्न आदमी, आधुनिक व्यक्ति कौन है, कल तक हमारे पास इसकी कोई कसौटी नहीं थी, हम पश्चिम की मुताबिक ढलने को ही मॉडेरनिटी समझते थे। लेकिन आज इस देश में एक कसौटी है हमारे पास, जाति प्रथा में विश्वास करते हुए कोई आधुनिक नहीं हो सकता। आप चाहे बाकी कितनी बातें करें, बहुत महीन काटते रहिए आप, लेकिन अगर आप जाति में विश्वास करते हैं, तो आपका सारा पिछड़ापन, आपकी सारी जहालत सामने आ जाएगी। तो ये हमारी देशज आधुनिकता की सबसे बड़ी कसौटी आज बन चुकी है, जिसने जाति प्रथा को निस्सार घोषित कर दिया है। जाति प्रथा खत्म हो चुकी है, ऐसा नहीं है। लेकिन उसी रास्ते पर है वो। और इस दलित विमर्श का बहुत बड़ा योगदान है हिंदी समाज में। और इसके साथ ही दलित विमर्श ने एक और काम किया और उसका भी श्रेय डॉ. अंबेडकर को है, धर्म की आलोचना। जिस धर्म की आलोचना करने वाले कल तक नास्तिक कहलाते थे, और वेदों में सबसे बड़ा पाप नास्तिकता है। और आर्य समाज के इतने बड़े सुधारक थे, दयानंद सरस्वती, जातिप्रथा के भी खिलाफ थे, लेकिन वे भी नास्तिक व्यक्ति को देशनिकाला देने की बात कहते थे। तो जिस देश में धर्म की आस्था पर सवाल करना मुश्किल था, वहां उस देश में धर्म की इतनी विस्तार से आलोचना डॉ.अंबेडकर ने की, जिसको लेकर दलित विमर्श जो हैं, आगे बढ़ा है। ये एक दूसरी विडंबना है कि डॉ. अंबेडकर की विचारधारा के लोगों पर प्रभाव के बावजूद अधिकांश दलित समाज अभी अंधविश्वासों में जी रहा है और धर्म की बहुत सारी कुरितियों में फंसा हुआ है। लेकिन उससे लड़ने का रास्ता भी इसी दलित विमर्श के भीतर है, डॉ. अंबेडकर की विचारधारा के अंदर है। इसके अलावा साहित्य में जो दलित विमर्श हिंदी में हुआ है, मैं दूसरी भाषाओं के विमर्शों के बारे में इतना नहीं जानता हूं। सिर्फ सूचनाएं हैं, वो भी हमारे बजरंग बिहारी तिवारी जी जो इतना अच्छा काम कर रहे हैं, पूरे हिंदुस्तान के विभिन्न प्रदेशों के दलित विमर्श का एक तुलनात्मक अध्ययन वो कर रहे हैं जो हिंदुस्तान में किसी बहुत बड़ी संस्था का काम है। वो अकेले दम पर कर रहे हैं। तो उनके लेखों को जरूर पढ़ना चाहिए उससे कई महत्वपूर्ण उपयोगी जानकारी मिलती है।
तो ये जो दलित साहित्य ने हिंदी में एक और काम किया कि जो हमारी साहित्यिक परंपरा थी, जो कि मुख्य रूप से द्विज आलोचकों की ही बनाई हुई थी। द्विज आलोचकों का उसमें होना बहुत स्वाभाविक है, इसलिए कि इस देश में शिक्षा पर उन्हीं का अधिकार था, जाहिर है कि साहित्य हो, विज्ञान हो, जो भी हो, वो चाहे मार्क्सवाद  और कम्युनिज्म ही क्यों न हो, उसमें द्विज लोग ही सबसे पहले आगे रहते, ये एक स्वाभाविक सी बात थी। तो वो जो परंपरा है जिस पर उनके द्विज संस्कार भी बहुत हावी हैं, उनके द्विज पूर्वाग्रह भी बहुत हावी हैं, और हिंदी साहित्य के बहुत सारी विद्यार्थी इन बातों को जानते हैं, उस परंपरा पर, उस इतिहास पर, उसमें जो मूल्यांकन का क्रम है, उसमें जो जगहें तय हैं साहित्यकारों की, कवियों की, लेखकों की, उस पर दलित साहित्य ने सर्वाधिक सवाल खड़े किए। और ये सवाल किसी हिंदी के आलोचक की तरह से नहीं खड़े किए। उन्होंने  ऐसी भाषा में खड़े किए कि लोग तिलमिला उठे और उसका जवाब देते हुए बना नहीं, तो खीज गए लोग और उनको लगा कि ये तो गाली गलौज की भाषा बोल रहे हैं। मैं ये नहीं कहता कि सारी की सारी आलोचना उनकी वाजिब है और मान ली जानी चाहिए, लेकिन उन्होंने ये सवाल बड़े कारगर तरीके से खड़े किए और हिंदी साहित्य में पहली बार एक खलबली मच गई। जो काम मार्क्सवादी आलोचकों को करना चाहिए था और जिसमें वो चूक गए थे, ऐसे बहुत से सार्थक सवालों को दलित आलोचकों ने, साहित्यकारों ने हिंदी में खड़ा किया। चाहे कबीर को लेके हो, हजारी प्रसाद द्विवेदी को लेके हो, तुलसीदास को, प्रेमचंद को, निराला को, बहुत सी निरर्थक भी बात हो सकती है, लेकिन बहुत से सार्थक सवाल भी उन्होंने खड़े किए और अब आप उससे आंख नहीं चुरा सकते हैं। दलित विमर्श के कारण आज हिंदी में दलित लेखकों की एक स्थिति बनी है जो पहले नहीं थी। दलित लेखकों के किसी हद तक संगठन बने हैं। और किसी हद तक वे एक आवाज बने हैं, जिसको सुना जाता है, जिसको सुनना पड़ता है। दलित विमर्श का हिंदी में बहुत बड़ा योगदान है। इस दलित विमर्श की सफलता तो आप इससे देखिए, कि आज दलित साहित्य को कितना बड़ा बाजार उपलब्ध है, उसके प्रकाशक को, उसके साहित्य को, जो किसी और साहित्य को उपलब्ध नहीं है। दलित लेखकों को छापने के लिए बड़े-बड़े प्रकाशक बड़ी तत्परता से तैयार हो जाते हैं। और उनकी किताबें बाजार में खूब बिकती हैं, कई-कई संस्करण निकल जाते हैं। ये हिंदी में दलित विमर्श की एक सफलता है। दूसरे प्रदेशों के दलित विमर्श की तुलना में हिंदी का दलित विमर्श कैसा है, बहुत सारी बातें नहीं कह सकता मैं। लेकिन जो थोड़ी बहुत सूचनाएं मिली हैं, तमिल, तेलगु, मराठी वगैरह को देखते हुए, तो उससे तो यही लगता है कि हिंदी में उनकी तुलना में दलित साहित्य अभी भी सीमित दायरे में है। और उसका एक उदाहरण यही है कि आज भी हिंदी में यही सवाल दलित विमर्श में महत्वपूर्ण बना हुआ है कि दलित साहित्य कौन लिख सकता है? वो सिर्फ दलित ही लिख सकते हैं या गैरदलित भी लिख सकते हैं। मैं भी एक समय में इसका बड़ा समर्थक रहा कि दलित ही दलित साहित्य लिख सकता है, पर मुझे अब इसमें शंका होती है। मैं समझता हूं कि किसको हम दलित साहित्य कहेंगे, उसका एक आब्जेक्टिव कैरिटेरिया होना चाहिए। न कि आप जाति का पता लगाकर ये पता लगाएंगे कि वो दलित साहित्य है या नहीं। दलित साहित्य किसे माना जाए और किसे नहीं माना जाए, इसकी कुछ वस्तुगत कसौटियां बननी चाहिए। इसके कुछ मापदंड निर्धारित होने चाहिए। और उन्हीं के आधार पर ये तय होना चाहिए कि ये दलित साहित्य है, इस प्रकार के सैद्धांतिकरण में कोई दिलचस्पी दलित लेखक नहीं रखते हैं। इसका कारण क्या है? बहुत से कारण हो सकते हैं। उसमें से एक कारण दलित साहित्य के अपने बाजार को सुरक्षित रखना भी हो सकता है। पर वो एक कारण हो सकता है। दूसरे कारण तो विचारधारात्मक ही हो सकते हैं। लेकिन इस सवाल पर सोचने की जरूरत है। और यही कारण है कि दलित साहित्य के मूल्यांकन के लिए दलित लेखक पूरी तरह से गैर-दलित द्विज आलोचकों की ओर देखते हैं। वो इसी की वजह से है। दलित साहित्य में उपन्यास लिखे जा रहे हैं, कविताएं, कहानियां लिखी जा रही हैं, पर आलोचना का, खासकर दलित साहित्य की आलोचना का उस प्रकार से विकास नहीं हो रहा है। उसके लिए वो फिर उन्हीं लोगों को देखते हैं, जिनसे वो बहुत सहमत नहीं है या जिनको विरोधी समझते हैं। इसका कारण यही है क्योंकि हमारे पास दलित साहित्य को निर्धारित करने वाले मापदंड नहीं हैं। दलित साहित्य का सौंदर्य किस बात में है, उसकी भाषा की ताकत किस बात में है, एक दलित साहित्य की रचना में किस तत्व पर जोर दिया जाना चाहिए? ये सारे सवाल आज के दलित साहित्यकारों की चिंता के विषय नहीं बने हैं। और इसीलिए दलित साहित्य में आलोचना का कोई विकास नहीं हुआ है। जो गैरदलित लेखक हैं, वे दलित साहित्य नहीं लिख सकते हैं। इसलिए नहीं लिख सकते हैं, क्योंकि उनके अनुभवों की एक सीमा है।उन्हें दलित जीवन का वो अनुभव नहीं है। वे सहानुभूति रख सकते हैं, सहानुभूति के साथ साहित्य लिख सकते हैं। ये बात तो दलित लेखक के साथ भी लागू हो सकती है कि अगर वो ऐसे विषय पर लिखना चाहे, युद्ध के विषय पर, और वो स्वयं युद्ध में कभी न गया हो, तो यह उस पर भी लागू होती है। लेकिन देखना यह चाहिए कि जो व्यक्ति उन अनुभवों को हासिल करता है और करने के बाद लिखता है। मुल्कराज आनंद ने ‘अछूत’ उपन्यास लिखा है, बहुत महत्वपूर्ण उपन्यास है। हिंदी में एक लेखक है- मदन दीक्षित, मोरी की ईंट उनका बहुत ही महत्वपूर्ण उपन्यास है, सफाई कर्मचारियों के समाज पर लिखा गया, उतना अच्छा दूसरा कोई उपन्यास नहीं मिलेगा आपको। इतने भीतर के अनुभवों को हासिल करके उन्होंने ये लिखा, लेकिन चूंकि दलित साहित्य की कोई वस्तुगत कसौटी निर्धारित नहीं है, इसलिए उस उपन्यास पर चुप्पी साध ली जाती है, उसके महत्व को स्वीकार नहीं किया जाता, उस पर चुप हो जाते हैं लोग।

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दलित विमर्श की जो सीमाएं हिंदी में दिखाई देती हैं उसमें एक बड़ा महत्वपूर्ण सवाल है कि देश की जो बाकी परिस्थितियां हैं, जो परिवर्तन हो रहे हैं देश में, जो आंदोलन हो रहे हैं देश में, उनके बारे में दलित विमर्श का क्या दृष्टिकोण है? इराक युद्ध है, अफगानिस्तान युद्ध है, भूमंडलीकरण है, बाजारवाद है, बहुराष्ट्रीय कंपनियों का दबदबा है, इन सबके बारे में दलित विमर्श का कोई दृष्टिकोण होगा या नहीं होगा? ये सवाल अभी तक अनुत्तरित है। और इससे भी बड़ा सवाल है कि दलित विमर्श में जो जाति का प्रश्न है, उसका दलित के जीवन के आर्थिक प्रश्न से क्या संबंध है? जाति के प्रश्न का वर्ग के प्रश्न से क्या संबंध है? अभी भी इसको खुलकर और एक स्थापित तथ्य की तरह से स्वीकार नहीं किया गया है। ये कहा गया है कि सामाजिक बेइज्जती मूल समस्या है दलित विमर्श की, गरीबी नहीं। सामाजिक बेइज्जती अखरती है, गरीबी नहीं। गरीब ब्राह्मण की बेइज्जती नहीं होती है, दलित की होती है। ये तर्क बिल्कुल सही है। हिंदुस्तान में जाति प्रथा के आधार पर शोषण की प्रणाली हिंदुस्तान की एक ऐसी मौलिक विशेषता है, जो हमारे जानते और किसी समाज में नहीं दिखाई देती। और यही कारण है कि मार्क्सवाद जो पूरे विश्व के मेहनतकश लोगों के लिए एक मुक्तिकामी दर्शन है और आज भी है, उस मार्क्सवाद को जब हम भारत में  लागू करने की कोशिश करते हैं, तो उसमें ये दलित प्रश्न बाहर रह जाता है। क्योंकि मार्क्सवाद में इसका कोई विवेचन नहीं है। मार्क्सवाद की इस कमी को अंबेडकर के बिना पूरा कर नहीं सकते। हिंदुस्तान में उत्पादन में अतिरिक्त मूल्य के आधार पर होने वाले शोषण के अलावा हिंदुस्तान में शोषण की एक अपनी देशज प्रणाली रही है, जो धर्म, संस्कृति और समाज के आधार पर खड़ी की गई है। उसमें आर्थिक शोषण भी है। और ये जो शोषण की प्रणाली है इसे सबसे पहले बहुत विस्तार के साथ ज्योतिबा फुले ने दिखाया था। ज्योति बा फुले का एक नाटक है- तृतीय रत्न, आज के हर नागरिक को ये नाटक पढ़ना चाहिए। ये नाटक ‘तृतीय रत्न’ और उनकी किताब ‘गुलामगिरी’- ये दो किताबें ऐसी हैं, जो हमें बताती हैं, कि ये जाति के आधार पर शोषण की जो प्रणाली है, जिसे हम ब्राह्मणवाद का नाम देते हैं, ये ऐज ए सिस्टम कैसे काम करता है, ये फंक्शन कैसे करता है, ये सिस्टम है क्या, ये पहली बार ज्योतिबा फुले ने बताया। और अंबेडकर दूसरे व्यक्ति हैं, जिन्होंने इस चीज को एक शास्त्र तक पहुंचा दिया। वैज्ञानिक विवेचन जो समाजवाद के विभिन्न विचारों को लेकर मार्क्स ने किया, एक वैज्ञानिक समाजवाद का दर्शन रखा, वो काम हिंदुस्तान में जाति को लेकर जो शोषण का जो पूरा तंत्र है, उसको अंबेडकर ने सबसे वैज्ञानिक रूप में पेश किया। और इस संदर्भ में भारतीय परिस्थितियों में ये ज्योतिबा फुले और अंबेडकर मार्क्स के जैसे ही हैं हमारे लिए, ये हमें समझ लेना चाहिए। हिंदुस्तान में मार्क्सवादी आधार पर क्रांति करने के लिए फुले और अंबेडकर की विचारधारा को शामिल करके, जोड़कर ही हम आगे बढ़ सकते हैं, इस चीज को बहुत से मार्क्सवादी स्वीकार करने लगे हैं, महसूस करते हैं, लेकिन जो ऑफिसयल मार्क्सिज़्म है, उसमें वो चीज अभी भी आई नहीं है और वो बहुत सारे वैचारिक उहापोह में हैं कि इसको कैसे शामिल किया जाए? जब मार्क्स अपनी विचारधारा के विकास के लिए हेगल जैसे सामंतों के पुरोहित प्रोफेसर से, राज्य के अपने आदमी से उसके दर्शन की विशिष्टताओं को ले सकते थे कि हमारा दर्शन पूर्ण हो, तो हम अंबेडकर और फुले से क्यों नहीं ले सकते? जबकि अंबेडकर और फुले की तो वर्गीय स्थिति वैसी नहीं है, जैसी हिगेल के थी। उनकी तुलना में ये बहुत प्रगतिशील लोग हैं।
तो मित्रो, जाति और वर्ग का सवाल हिंदुस्तान में सामाजिक परिवर्तन के लिए बहुत अहम सवाल है। ये मैं इसलिए कह रहा हूं, क्योंकि जिस तरह अंबेडकर को छोड़कर हिंदुस्तान में सामाजिक परिवर्तन नहीं किया जा सकता, उसी तरह से मैं इतनी ही कड़वी सच्चाई है कि हिंदुस्तान में सामाजिक परिवर्तन करने के लिए सिर्फ अंबेडकर काफी नहीं होंगे, उनसे आगे जाना होगा। और वो आगे जो हम जाएंगे, उसमें मार्क्सवाद हमारी बहुत मदद करता है। देखिए ज्ञान का जो विकास होता है, वो कैसे होता है? ज्ञान कोई एक बनी बनाई स्थिर चीज नहीं है, कि किताबों में बंद कर दिया गया है और ज्ञान उतना ही रहेगा, ऐसा नहीं है। ज्ञान का विकास विभिन्न स्रोतों से होता है। समाज के सामने जो समस्याएं खड़ी होती हैं, उनको समझने के लिए होता है, उन समस्याओं का हल करने के लिए होता है। हिंदुस्तान में अगर हम क्रांति करना चाहते हैं, हम एक समतामूलक समाज कायम करना चाहते हैं तो हमें अंबेडकर और ज्योतिबा फुले और मार्क्स- तीनों के महत्व को समझना होगा, इस वैचारिक विकास को हमें करना होगा, वर्ना हम हिंदुस्तान को नहीं बदल सकते। हम एक समतामूलक समाज नहीं कायम कर सकते।दलित की जो सामाजिक बेइज्जती है, उसके आर्थिक स्रोत भी होते हैं। उसकी जो आर्थिक विवशता है, उसके पास कुछ भी नहीं है। अंबेडकर ने इसी चीज की ओर तो ध्यान खींचा हमारा कि मध्यकाल के संत लोगों ने  लिखा कि ईश्वर के बनाए हुए सब बंदे हैं इसलिए सब बराबर हैं। पर सवाल ईश्वर के बनाए हुए बंदों की समानता का नहीं है। सवाल इस समाज में कायम भौतिक असमानता का है। एक दलित को उन सारे अधिकारों से, संपत्ति के अधिकारों से वंचित करके रखा गया है, सवाल उसके मानवाधिकारों का है। सवाल उसके लोकतांत्रिक-नागरिक अधिकारों का है, सवाल समाज के उत्पादन में उसके हिस्से का है। और ये जो वो वंचित है सब चीजों से, यह भी उसकी सामाजिक बेइज्जती का एक स्रोत है बहुत बड़ा। जिस दलित के पास कुछ भी नहीं होगा, उसकी तो सामाजिक बेइज्जती हर तरह से होगी। जब तक वो आर्थिक रूप से मजबूत नहीं होगा, उसकी आर्थिक मुक्ति नहीं होगी। जब तक एक शोषित वर्ग के रूप में वह मुक्त नहीं होगा, तब तक उसकी बेइज्जती खत्म नहीं होगी। और यहाँ मार्क्स  की  जरूरत हमें पड़ेगी।

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एक आखिरी जो सवाल मैं उठाना चाहता हूँ, इस पर हिंदी का दलित विमर्श नहीं ध्यान देता है । किसी भी उत्पीडि़त समुदाय की मुक्ति के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण सवाल है कि दूसरे उत्पीडि़त समाजों की मुक्ति के बारे में वो क्या सोचता है? कोई भी उत्पीडि़त समाज अगर सिर्फ अपनी मुक्ति के बारे में सोचता है, वो कभी मुक्त नहीं हो सकता, जब तक कि वो दूसरे उत्पीडि़त समाजों की मुक्ति के बारे में भी न सोचे, उनके प्रति एक सही रवैया न रखे, उनके साथ मिलकर चलने को तैयार न हो। ये पांडिचेरी में प्रोफेसर हैं मुरुशेखर साहब, कई लोगों ने उनके एक नाटक की चर्चा की है, बलि का बकरा, तमिल के अच्छे, बहुत अच्छे लेखक हैं, नाटक लिखते हैं- बलि का बकरा। देवी का रथ जो खींचा जाता है वर्ष में एक बार, गांव में ब्राह्मणों के द्वारा, तो उसको खींचते हुए रस्सी टूट गई, रस्सा टूट गया, तो देवी को बहुत कोप आया। देवी अब श्राप देती इस गांव को। तो उससे कैसे बचा जाए? ब्राह्मणों की सभा होती है, तो उस सभा में ये तय होता है, कि देवी के कोप से बचने के लिए, देवी को प्रसन्न करने के लिए अब एक बलि उसको देनी जरूरी है। किसकी बलि दी जाए? सारे ब्राह्मण पीछे हट जाते हैं, छुप जाते हैं। अंत में एक दलित युवक को खोज लिया जाता है इस बलि के लिए। और उस दलित युवक को पकड़ के लाया जाता है कि चलो तुमको गांव के लिए बलि होना है, तभी देवी शांत होंगी। वो मजबूर आदमी, उसका अपने जीवन पर कोई अधिकार नहीं। उसकी पत्नी रोती-कलपती पीछे आती है, कि मेरे पति को छोड़ दो, बहुत कुछ कहती है, लेकिन ब्राह्मणों का दिल नहीं पसीजता है। लेकिन उसके पति के दिमाग में एक बात आती है, वो कहता है, दलित ही की बलि देनी है न, ठीक है, ये मेरी पत्नी है, मैं बोलता हूं इसकी बलि दे दो। मुझे जाने दो। जिस व्यक्ति का अपने जीवन पर कोई अधिकार नहीं है, वह दूसरे के जीवन पर इतना अधिकार जमा रहा है, कि उसकी बलि दे दो!ये जो दूसरा व्यक्ति है, स़्त्री, दलित-स्त्री, इसकी आवाज हमारा दलित विमर्श उसी तरह से नहीं उठाता है। वो उसे इनकार तो नहीं करते हैं, लेकिन वो बहुत कम्फर्टेबुल भी फील नहीं करते। असुविधा महसूस करते हैं। और इसीलिए ये दलित स्त्री विमर्श की आवाज उठेगी। तो दलित समाज, दलित विमर्श अगर दलित स्त्री की मुक्ति के सवाल पर नहीं सोचेगा, उस सवाल को मान्यता नहीं देगा, तो वह अपनी भी मुक्ति नहीं कर सकता। और दुर्भाग्य से हिंदी दलित विमर्श में ये घटना वास्तविक रूप से घटी है कि दलित विमर्श की एक धारा, इतनी स्त्री विरोधी हो चुकी है वो धारा कि मैं समझता हूं कि वो दलित समाज की मुक्ति से भी बहुत दूर हो चुकी। अंबेडकर इतने महत्वपूर्ण व्यक्ति थे, उन्होंने स्त्रियों के सवाल पर बहुत लिखा, फुले ने बहुत लिखा, शाहू ने बहुत लिखा, पेरियार ने बहुत लिखा, मैंने किसी दलित लेखक को नहीं देखा कि उनके साहित्य का विवेचन करे स्त्री के प्रश्न पर। इसलिए स्त्रियों को यह सवाल अलग से उठाना पड़ रहा है। इतनी सी बातें तो मैं दलित विमर्श के बारे में कहना चाहता था।
प्रो.वीर भारत तलवार

प्रो.वीर भारत तलवार

प्रो.  वीर भारत तलवार,  प्रख्यात हिन्दी आलोचक, जेएनयू में प्राध्यापक। उनसे virbharattalwar@gmail.com पर संपर्क संभव है। 
हैदराबाद में दिये गए व्याख्यान का पहला अंश। शेष अगले किश्तों में। 
साभार समकालीन जनमत 

This, that and other cartoons: Prabhat Kumar

by PRABHAT KUMAR

I wish to intervene in the ruckus over usage of Shankar’s cartoon in the NCERT’s political science text book. At the outset I want to clarify my personal impression (although inconsequential!) of the book and the cartoon therein. I feel the textbook in general is pedagogically superior to the previous ones for it does not infantilise young students as lacking critical ability. I also believe, as Aditya Nigam has rightly pointed out, it has accorded Ambedkar the status of a leading political and intellectual figure so far ignored. The cartoon in particular, both in the context of the narrative of the textbook as well as of its production in 1949, is not attacking Ambedkar the crusader of Dalits’ rights.

Having made my personal position explicit, I shall drag the discussion in a direction which may throw some light on the peculiarity of this art-form popularly called cartoon, its reading or misreading and, if possible, on political significance of cartooning in a democratic society. (Sadan Jha in his reply to Aditya Nigam’s post has briefly commented on this.) As a student of history of satirical production in colonial India I have learnt that satire (whether verbal, literary or visual) is a form of humorous discourse; a discourse which simultaneously draws upon many pre-existing narratives and fills them with a well known subject matter which are often multifaceted and contested; it carries and communicates multiple meanings without being bounded by the normal rules of linearity. Structurally, a satirical text is unlikely to remain closed; it is mostly open. It defies closure and mostly remains inimical to communicating a singular meaning. I shall substantiate my arguments on the basis of two cartoons, both made by Shankar. First one is “Constitution”, which we all have seen. The second is “Varnasharam”, which most of us have not seen and is not in high circulation now. It features Ambedkar and deals directly with the question of caste. Let us first read these two cartoons closely.

The cartoon “Constitution” without any accompanying explanatory commentary, needless to say, is easily recognisable to its viewers. For this was a well known and widely discussed subject: the making of Indian constitution and alleged delay in its completion when the country is eagerly waiting to become a sovereign republic. Shankar captures this issue with all its complexity and contradiction. Invoking and drawing from the imagery of the famous phrase “snail’s pace” the cartoon depicts a huge snail named constitution. This snail is like a huge carriage in itself on which a driver is sitting holding a whip and a bridle. A man from behind is also whipping. An ocean of men, women and children, by extension, the entire Indian nation is amusingly looking at this spectacle.

Clearly, Ambedkar, the chairman of the draft committee of Indian constitution, holding a whip and a bridle in each hand and gazing at the snail’s head is shown as the person who like the driver of a (horse or bullock) cart is trying hard to drive fast. Nehru, the executive head of the interim government, is shown as standing beside the snail with a whip in his hand. Nehru’s action has an element of ambiguity. One reading could be that he is gazing down and whipping at the beast with full force. Action of Ambedkar and Nehru together invokes one of the most common sights of driving a cart with lazy or tired horse or bullock not ready to move further and faster: One person sitting on the cart and trying to control the beast while another standing and whipping at them to move ahead. In another reading (if we do not give any significance to Nehru’s gaze and body-action), Ambedkar, the chairman of the drafting committee, is driving the slow-moving cart of constitution and Nehru (the executive head) whipping his subordinate. In the first reading, then, the nation is laughing at the desperation and failure of Nehru and Ambedkar together on the completion of constitution. In the second reading also nation is laughing but here a desperate Nehru is whipping his subordinate minister who is himself trying hard to finish the drafting of constitution. In both the readings what is consistently important is that constitution is like a snail. In the language of the cartoon ‘constitution as snail’ is the organisational principle which holds the cartoon together. In this language what is implicit and insinuated is that a snail cannot move faster even if someone whips it or its driver. If we pay attention to the size of represented object (as size is often crucial in the art of cartoon making which frequently relies on the techniques of exaggeration and diminution), representation of constitution as disproportionately huge snail becomes significant. It adds yet another layer of meaning in the cartoon. For its size is simultaneously suggestive of the irony of the megalomaniacal project. The task of drafting a document like Indian constitution is huge and thus is bound to move with snail’s pace. An Ambedkar or a Nehru could hardly speed up the matter on his own, no matter how much an enthusiastic and impatient nation smirks. Shankar’s “Constitution”, thus, encodes this complex political reality in a single visual frame which remains open in communicating more than one meaning simultaneously.

This cartoon was first published in ‘The Hindustan Times’ in 1933 and was later republished in the Telugu newspaper ‘Krishna Patrika’. Courtesy: Young cartoonist Unnamati Syama Sundar’s Facebook wall. See his M.Phil. dissertation on Telugu cartoons in colonial India submitted at JNU, New Delhi.

Likewise, in the second cartoon Shankar depicts the caste politics with all its nuances and complexities. On the broad and solid foundation of Varnashram rests the sculpture/deity of Hinduism. Riding on the foundation stone are M. K. Gandhi and M. K. Acharya. While Acharya, the orthodox Hindu leader, is shown as painting the deity of Hinduism with dark colour, Gandhi, the reformist Hindu leader, is shown as cleansing its face. Ambedkar, on the contrary, is shown as standing away and hitting at Hinduism’s foundation stone Varnasharam with a hammer. A British man is happily watching this spectacle from a distance.

Varnashram” renders a political subject matter in the language of architecture. Shankar depicts so aptly a constellation of ideology and politics around differently shared sociological reality –Hinduism exists on the huge foundation of varna/caste hierarchy. Needless to say, this view was shared by reformists, conservatives and radicals alike. Difference only lay in their prescription to solve social problem around this issue. In the cartoon each one is shown to be active according to his political conviction. The organising principle of the cartoon is obviously Varnashram. Size of the foundation is vividly depicted as broad and rock-solid which not only withholds the edifice of Hinduism but also placates leaders like Gandhi and Acharya. Gandhi is shown as sanitising Hinduism against Acharya’s opposite attempts. Both are standing on the foundation of varna-heirarchy. Their spatial location in the cartoon is suggestive of their ideological position. Both in their own ways not only had refrained from questioning but had justified the ideology of varnashrama. Ambedkar, who stood for annihilation of caste, is portrayed as hammering at this very rock-solid foundation. His action thus shown, has all the potentials to destroy the discriminatory ideology. (I say potential because, as the graphic shows, his blow has created a jolt but has not yet been able to break it.) Moreover, the cartoon insinuates that as a consequence of his action the edifice of Hinduism is bound to be affected. The visual also instigates another layer of meaning if we relook at the positions of various protagonists in the cartoon. At both the levels, literal as well as symbolic, political action and stand (on varnashrama) of people like Gandhi or Acharya is fragile and threatened by the action of Ambedkar. The British man, by extension the colonial state, is shown to be outside the activity zone. But he is not portrayed as a disinterested bystander rather as the one who is involved with and amused at this spectacle. Varnasharam, thus, simultaneously illustrates a variety of political positions, their mutual relationships with all contradictions on a contested issue of caste and Hindu social reform in humorous manner.

The point of doing a close reading of the two cartoons is to highlight the significance of the art of cartooning which captures a slice of historical-political moment with all its complexity and contradiction and lays bare the multiplicity of positions and polyphony around an issue, without falling prey to linear narrative’s compulsions which communicates a singular and fixed meaning.  In the wake of current controversy what has happened is that the cartoon has been read selectively by privileging one meaning over many others and there has been a refusal to appreciate the fact that critical polyphony is the characteristic feature of the humorous art of cartooning. In principle it is easy to say that critical polyphony, which is and should be so central to the democratic praxis, can only be perceived as dangerous and thus attacked by the practitioners of a politics which is undemocratic and intolerant of differing voices and alternative readings. The matter becomes more complicated in the present context over the reading of the first cartoon “Constitution”. There is no political or moral merit in defending the actions of the votaries of populist Dalit politics (they have been given genuine rebuttal by many Dalit and leftist intellectuals like Hari Narke, Harish Vankhede, etc. I also do not see any good reason to entertain those who clearly infantilise the young students and refer them as impressionable minds. I do want to engage with and pose questions to the intellectual position which has come from a section of Dalit activists like Anoop, and a group of leftist-democratic student and academics (of which I also assume to be a part). In effect, both the groups have basically argued to reconsider its inclusion in the text book (read withdrawal) but not without reasoned discussion and deliberation. Both concede that this cartoon’s original intent in its both contexts, when it was made in 1949 or they way it is reproduced in the text book are important to consider, yet that is not the prime issue now. To phrase it differently, a cartoon may want to speak something but what is important is not the text but its reception. It does not matter what and whether a cartoon can speak for itself, but how certain sections of people may receive or have received it, especially those who have been historically marginalised muted and discriminated and continue to remain so. (Needless to say, reception by right-wing formations, can be comfortably and legitimately dismissed both at moral as well as political level.)

According to the first argumentative position of concerned Dalit activists, thus, the prime issue is not the critical awareness of context and complexity of the cartoon in its entirety but the fear of its selective reading (Ambedkar, the Dalit, is responsible for delay in the drafting of constitution and hence is being whipped by Nehru, the Brahmin) in the extended context of classrooms dominated by upper-caste ethos which may denigrate Ambedkar the icon of lower caste people and cause humiliation of lower caste students. For the second position of left-democratic students and academics too, which acknowledges the context of aroused political consciousness of Dalits and heartily welcomes their ability to make their own assent or dissent in matters of their representation, the prime issue is not the critical awareness of context and complexity of the cartoon in its totality. It fears the same selective reading and reception (even beyond the context of class room) in the additional context of wider public sphere, where anti-Dalit prejudice is so common. Without dismissing this predicament of fear, I cannot help but to think aloud further. Is the authorial/editorial context and intentions of (re)production of cartoon so fragile and redundant that we assume that a reader can only see what h/she wants to see as if the author is dead? Is multiplicity and ambiguities of meaning encoded in the text of cartoon so difficult to be processed by its reader? We all agree over this that the text book does not spoon feed readymade gyan; it encourages critical ability of the students to think on their own especially on matters of caste and gender; it highlights the significance of Ambedkar’s action and ideas. Are we, then, assuming that Dalit students of class XI may lack critical faculty and cannot appreciate the complexity of cartoon and its context; and so will be unable to counter the ridicule of prejudiced upper-caste fellow students in the classroom? Instead of exposing them to counter the unreasonable prejudices on their own, aren’t we being overprotective? How is this stand different from those who undermine or even question their capacity of reasonable thinking? What is the entire point of teaching social sciences? Isn’t it to question the received common sensical understanding and inculcate the ability to fathom the complexity of a subject matter including a deep understanding of multiple entangled and messy contexts of any issue? If this is so, aren’t we doing the opposite and being inconsistent when we brush aside the question of context and intent? Are we also (unconsciously) playing to the gallery of Dalit-populists which is reducing Ambedkar’s critical and radical ideas to a farce?

(Prabhat Kumar is a PhD student, Department of History, SAI, University of Heidelberg.) The article was first published on KAFILA

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