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आदिवासी विमर्श: धर्म, संस्कृति और भाषा का सवाल कहाँ है?: वीर भारत तलवार

BY वीर भारत तलवार 

आदिवासी विमर्श पर मैं विस्तार से बिल्कुल नहीं कहूंगा। हिंदी में जो सबसे नया विमर्श और सबसे कमजोर और थोड़ा सा मुश्किल विमर्श है, वह आदिवासी विमर्श है। आदिवासी विमर्श की स्थिति यह है कि मैं हरिराम जी की किताब देख रहा था कि कितने उपन्यास आदिवासियों पर लिखे गए, जो खुद आदिवासी लेखकों के चार उपन्यास उन्होंने बताए, हो सकता है थोड़ा और खोजा जाए तो पांच-दस हो जाएं, कुछ दूसरे लोगों ने भी आदिवासियों पर उपन्यास लिखे हैं। उनमें से कुछ उपन्यास तो सच पूछिए इतने आदिवासी विरोधी हैं, कि उनको क्या कहा जाए! आदिवासियों पर जो भी उपन्यास लिखे गए हैं, वो खाली रिसर्च करने वाले लोग उनको जानते हैं, उनको कोई पढ़ता नहीं है। कितने लोग पढ़ते हैं आदिवासियों पर लिखे गए उपन्यासों को और खुद आदिवासियों के लिखे उपन्यासों को कितने लोग पढ़ते हैं? पीटर पालीन का उपन्यास कितने लोगों ने पढ़े हैं या मंगल मुंडा का उपन्यास कितने लोगों ने पढ़ा है? अभी हाल में मैंने एक उपन्यास पढ़ा मलयाली भाषा का, नारायण, जो कि इडिकी जिले के हैं और पोस्ट ऑफिस डिपार्टमेंट में काम करते हैं,  उनहोंने ‘कोच्चारती’ एक उपन्यास लिखा। 1998 में छपा है। केरल साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिला है उसको। और वो इतना महत्वपूर्ण उपन्यास है, और मैं समझता हूं कि उसे बहुत कम लोगों ने पढ़ा है। हम अन्य भारतीय भाषाओं की बहुत सारी रचनाओं को नहीं जानते हैं। हमारे देश में इतने महान उपन्यासकार हुए जिन्होंने आदिवासियों पर लिखा, उडि़या में हुए हैं, गोपीनाथ मोहांती के अमृत संतान और प्रजा जैसे उपन्यास। किस्सागो को नोबेल पुरस्कार मिल गया। यह उपन्यास अमृत संतान के आगे कुछ नहीं है। उनके पांच लोगों ने उनको पुरस्कार दे दी और उनको  तख्ती मिल गया। लेकिन हिंदुस्तान में आदिवासियों पर लिखे हुए उपन्यास को हिंदी का साहित्यिक समाज बहुत कम पढ़ता है। अभी मारंगगोड़ा और ग्लोबल गांव के देवता वगैरह की चर्चा चल पड़ी है। वर्ना इससे पहले बहुत कम हैं। ‘धूणी तपे तीर’ की बाजार में जो सफलता है, वो राजस्थान के एक बहुत बड़े आंदोलन से जुड़े होने के कारण है। लेकिन हिंदी में आदिवासी साहित्य को कितना आदरपूर्ण स्थान मिला है, यह उसका सबूत नहीं है।

हिंदी में आदिवासी विमर्श एक कमजोर स्थिति में है। उसके कारण बहुत स्पष्ट हैं। आदिवासी विमर्श करने के लिए आदिवासियों के बारे में जानना बहुत जरूरी है। और आदिवासियों के बारे में जानने के लिए उनके बीच जाना बहुत जरूरी है। हिंदी में प्रणय कृष्ण जैसे बुद्धिजीवी बहुत कम हैं जो आदिवासियों के सवाल को इतनी सहानुभूति और संवेदना के साथ समझने की कोशिश करते हैं। बड़े-बड़े लेखक हैं, जिन्होंने आदिवासियों पर कुछ लिख मारा है, बिना आदिवासी समाज को गहराई से समझे। मैं नाम लेकर कहूंगा कि महाश्वेता देवी का जो साहित्य है, वह आदिवासियों के बारे में सतही साहित्य है । बहुत दूर खड़े रहकर जो चीज दीख जाती है, वह यह कि उनका बड़ा आर्थिक शोषण होता है। वही ये लोग लिख सकते हैं। लेकिन उसमें आदिवासी समाज की आत्मा नहीं है। उसका अंतःकरण नहीं है। एक आदिवासी की मानसिक बनावट आपको कहीं नहीं मिलेगी। इसीलिए हिंदी में आदिवासी विमर्श हिंदी के साहित्यकार लोग नहीं चला सकते, क्योंकि उनको आदिवासी समाज का कोई ज्ञान नहीं है। और जिन लोगों ने लिखा भी है आदिवासी विमर्श के नाम पर, वो क्या लिखते हैं! आदिवासियों के विस्थापन के सवाल पर ही लिखेंगे, इससे ज्यादा नहीं लिखेंगे। दूसरी तरफ वामपंथी हैं जो  विस्थापन का सवाल भी इसलिए उठाते हैं, क्योंकि उनकी उन बहुराष्ट्रीय कंपनियों और स्टेट से नफरत है, जो आदिवासियों को बड़े पैमाने पर विस्थापित कर रही है। अन्यथा, आदिवासियो की जमीन तो पिछले डेढ़ सौ सालों से जा रही है, कानूनी सूराखों की वजह से, कानून का पालन नहीं करने की वजह से। गवर्नर को सारे अधिकार हैं, लेकिन गवर्नर कुछ नहीं करना चाहता। आदिवासी समाज बहुत ज्यादा संकट में फंस चुका है। आज उसके पास समय ही नहीं है अपनी स्थिति को बदलने के लिए, अपने को बचाने के लिए। यह कवि की समस्या नही बनी। आदिवासी विमर्श का विषय नहीं बना। आज जब बहुराष्ट्रीय कंपनियां इतने पैमाने पर उसको उजाड़ रही हैं। आदिवासी लोग इस तरह से विमर्श नहीं करते हैं। आदिवासी के गांव मे समस्या होगी तो वो किसी पहाड़ या अखाड़ा में उनकी  पंचायत बैठेगी, विचार-सभा करेगी। अगर अर्जी देनी है तो अर्जी देंगे, नहीं तो फिर हथियार लेकर लड़ेंगे। आदिवासी विमर्श तो इसी प्रकार से होता है। लेकिन अंग्रेजी में कुछ लोगों ने आदिवासियों पर लिखकर के जो सनसनी और एक चिंता भी फैलाई है, उसमें कुछ पढ़े-लिखे हिंदी के लेखकों ने योगदान किया और थोड़े से पढ़े-लिखे आदिवासियों ने भी। लेकिन ये इस विमर्श के बहुत छोटे दायरे को सूचित करता है।chittaprosad

आदिवासी विमर्श के बहुत सारे मुद्दे अभी तक ठीक से उठाए ही नहीं गए हैं। जैसे आदिवासी संस्कृति का सवाल, आदिवासियों की भाषाओं का सवाल, उनके धर्म का सवाल कभी किसी ने नहीं उठाया। मैं आपको एक उदाहरण दूं, आदिवासी संस्कृति की कोई गहरी जानकारी गैर-आदिवासियों को नहीं है। उनका एक नितांत अलग दृष्टिकोण आदिवासियों की संस्कृति के बारे में बना हुआ है। इसलिए हम उस सवाल को उठा ही नहीं सकते। और मैंने जैसा कहा कि आदिवासी खुद उस प्रकार से विमर्श नहीं करते हैं कि एक विमर्श खड़ा हो। धर्म के सवाल को कभी भी उठाया नहीं गया। एक बुद्धिजीवी थे रामदयाल मुंडा, उन्होंने धर्म के सवाल को उठाया। उसका एक कारण है। रामदयाल मुंडा खुद एक पाहन के बेटे हैं, एक पुजारी के बेटे रहे और धर्म में उनकी बचपन से दिलचस्पी रही। उनके इलाके में खासकर हिंदू धर्म का काफी प्रभाव रहा है। लेकिन फिर भी वह हिंदू की ओर तो नही गए। ये एक अच्छी बात है। उन्होंने आदिवासी धर्म का ही सवाल उठाया। उनका प्रयास था कि हिंदुस्तान के तमाम आदिवासियों को मिलाकर एक उनका अखिल भारतीय धार्मिक स्वरूप खड़ा किया जाए। इसकी वजह थी। वजह यह थी कि हमारा संविधान कहता है कि आदिवासी इस देश के एक विशिष्ट सांस्कृतिक समुदाय हैं। उनका अपना वैशिष्ट्य है। वो एक विशिष्ट सांस्कृतिक समुदाय है, उसका कोई धर्म है भी या नहीं? हिंदुस्तान में सरकार के आदेश से जनगणना होती है उसमें आदिवासी का क्या धर्म लिखाया जाता है? उससे पूछा जाता है कि तुम हिंदू हो कि नहीं? मुसलमान हो, ईसाई हो, सिक्ख हो? नहीं? ठीक है, अन्य हैं। ‘अन्य’ उसका धर्म लिखा जाता है। अगर वो हिंदू नहीं है, इस्लाम नहीं है, सिक्ख नहीं, ईसाई नहीं तो वो ‘अन्य’ हैं। ये ‘अन्य’ क्या है? उसका कोई धर्म नहीं है और वो हिंदुस्तान का एक विशिष्ट सांस्कृतिक समुदाय है!

इस स्थिति को बदलने के लिए रामदयाल ने धर्म के सवाल को उठाया, आदिवासी विमर्श में इन सवालों की चर्चा नहीं होती। धर्म अच्छी चीज है, बुरी चीज है, वो नहीं हम कह रहे हैं। इस संविधान में धर्म का एक अधिकार दिया हुआ है। उस धर्म का अधिकार आदिवासी को है या नहीं। सरकार के पास उसके धर्म की कोई मान्यता है या नहीं, सवाल इसका है। रामदयाल का सवाल यह भी था कि आदिवासी को अपने धर्म में कितना आत्मविश्वास है, क्या वह धर्म को लेकर हीनभाव से ग्रस्त है! यह सवाल उनको सवाल मथता था। इस सवाल की कुछ पेचीदगियां हैं। धर्म को एक राष्ट्रीय रूप देना! उनका सदाशय जो भी रहा हो, लेकिन धर्म को एक राष्ट्रीय रूप प्रदान करना थोड़ा मुश्किल मामला है। चाहे वो आदिवासी के ही मामले में क्यों न हो? और धर्म को लेकर कुछ और देने की कोशिश झारखंड में आरएसएस ने की है। सरना पेड़ों के नीचे उन्होंने बड़े-बड़े जमावड़े लगाने शुरू किए आदिवासियों के, उनके धार्मिक समूहों के रूप में। और ये धर्म को सामूहिक रूप प्रदान करना कभी भी खतरे से खाली नहीं है, इसकी बहुत गलत दिशा है। लेकिन मैंने आपसे बताया कि यह एक सवाल आदिवासी विमर्श में आपको कहीं नहीं मिलेगा। इसी प्रकार उनकी संस्कृति का सवाल नहीं मिलेगा, भाषाओं का सवाल नहीं उठाया जा रहा है।

महाराष्ट्र में आदिवासी बहुत ताकतवर हैं। झारखंड के बाद शायद वहीं ज्यादा ताकतवर हैं। आदिवासियों के बड़े-बड़े साहित्य सम्मेलन होते हैं। अब तक 9 आदिवासी सम्मेलन हो चुके हैं महाराष्ट्र में, 9 आदिवासी सम्मेलन! लेकिन महाराष्ट्र के ज्यादातर आदिवासी मराठी भाषा में अपना साहित्य लिखते हैं। बहुत कम लोग हैं जिन्होंने अपनी आदिवासी भाषा में साहित्य लिखा और जो लिखा वह भी बहुत कम लेखकों ने लिखा। उनकी भाषाओं का सवाल इस विमर्श में कहीं नहीं आया। झारखंड में संथाली साहित्य सम्मेलन होते हैं, विश्व साहित्य सम्मेलन होता है संथालियों का, क्योंकि वो हिंदुस्तान के आसपास के भी कुछ देशों में मौजूद हैं। लेकिन संथालियों को अपनी भाषा पर बहुत गर्व है। संथाली अपनी भाषा में लिखते हैं, संथालियों का सम्मेलन होता है, तो वहां संथाली भाषा के कम से कम 500 प्रकाशन आते हैं। 500 प्रकाशन संथाली भाषा के! हिंदुस्तान के तमाम आदिवासियों ने मिलकर उतना साहित्य नहीं लिखा अपनी भाषा में, जितना अकेले संथालियों ने अपनी संथाली भाषा में लिखा है। ये असमानता तो है। लेकिन भाषाओं का सवाल बहुत महत्वपूर्ण है। सुनीति कुमार चटर्जी जो इतने बड़े भाषाविद् हुए उन्होंने ये भविष्यवाणी कर रखी है कि आदिवासी भाषाएं अपनी मौत मरती जाएंगी, दो-तीन सौ साल में खत्म हो जाएंगी। इसका जवाब आदिवासी विमर्श को देना है कि क्या ये भाषाएं खत्म हो जाएंगी, मर जाएंगी या आदिवासियों के जीवन में उनकी संस्कृति के लिए इसका कोई महत्व है। आदिवासी विमर्श को बड़ी गंभीरता से सोचने की जरूरत है कि अपनी भाषा के बिना वो अपनी संस्कृति को कब तक बचाकर रख सकते हैं?

आदिवासी समाज की एक जो बहुत बड़ी समस्या है, वह है शिक्षित लोगों की अपने समाज और संस्कृति के प्रति हीन भावना। मैं इतने करीब उनके रहा और रांची में देखता हूं कि पढ़े-लिखे आदिवासी हैं जो कॉलेजों से, यूनिवर्सिटी से पढ़कर निकलते हैं, अपनी भाषा नहीं बोलते हैं। अपनी भाषा बोलना नहीं चाहते हैं। जवाहरलाल नेहरू विवि. में कई आदिवासी हैं, झारखंड से आकर पढ़ते हैं। उनहोंने अपना एक संगठन भी बना रखा है- अल्ल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन और उनकी सभाएं करते हैं और टूटी फूटी अंग्रेजी में बोलने की कोशिश करते हैं, जो उनको नहीं आती है। हिंदी भी नहीं बोलना चाहते, हॉल से बाहर निकले ही जिसमें वे आपस में बात करते हैं, वो नहीं बोलते हैं। टूटी-फूटी गलत-सलत अंग्रेजी बोलते हैं और आदिवासी भाषा तो भूलकर नहीं बोलते हैं। ये जो हीनता की भावना है और जो पैदा भी की गई है उनकी भाषाओं के प्रति, उनकी संस्कृति के प्रति, कुछ व्यक्ति के रूप से इससे उबरे हुए लोग जरूर हैं आदिवासी विमर्श में, लेकिन आदिवासियों की सामान्य भावना हीनता की भावना है। एक आत्मसम्मान का आंदोलन, जो अंबेडकर ने दलितों में चलाया और सफल हुए, वो आदिवासियों में अभी तक नहीं है, इसलिए वहां अस्मिता के आंदोलन का बड़ा महत्व है आजकल।

प्रो.वीर भारत तलवार

प्रो.वीर भारत तलवार

प्रो.  वीर भारत तलवार,  प्रख्यात हिन्दी आलोचक, जेएनयू में प्राध्यापक। उनसे virbharattalwar@gmail.com पर संपर्क संभव है। 

हैदराबाद में दिये गए व्याख्यान का दूसरा अंश। शेष अगले किश्त में। 
साभार समकालीन जनमत 

दलित विमर्श: सिर्फ अपनी मुक्ति की सोच से उत्पीडि़त समाजों-समुदायों की मुक्ति नहीं हो सकती: वीर भारत तलवार

प्रोफेसर वीर भारत तलवार, हिन्दी के उन चंद आलोचकों में अग्रगण्य हैं, जो सामाजिक-सांस्कृतिक सरोकारों से एक जेनुइन जुड़ाव रखते हैं। हिन्दी की जोड़-तोड़ और छद्म-पूजनपंथी संस्कृति से दूर यह आलोचक आज लोगों के लिए आकर्षण का कारण इसीलिए भी बना है कि दिल्ली में समूहिक बलात्कार की घटनाओं ने इस आलोचक को इतना विचलित कर दिया है कि  वे इधर लगातार अस्मिता-प्रश्नों पर नए सिरे से विचार कर रहे हैं। हिन्दी में जो तीन मूल अस्मिता-विमर्श चलते हैं- दलित-स्त्री-आदिवासी विमर्श, उस पर उन्होंने विस्तार से विचार किया है। हमारी योजना है कि उन तीनों विमर्शों को धारावाहिक रूप में आपके समक्ष प्रस्तुत करूँ।

By वीर भारत तलवार
हमारे देश में इस समय ये जो तीन विमर्श चल रहे हैं। इनमें सबसे जो कारगर और प्रभावशाली विमर्श है, वह तो दलित विमर्श ही है। वो सचमुच एक ऐसा विमर्श है जिसकी एक वास्तविक सत्ता बन चुकी है। और इस विमर्श का महत्व भी बहुत है। इस विमर्श ने हमारे देश में, समाज में एक ऐसे सवाल को खड़ा किया जिस सवाल को लेकर बड़े-बड़े महात्मा आज तक आते रहे और अपनी सारी सदाशयता और अपनी इच्छाओं के बावजूद कुछ नहीं कर सके। वो है जाति का सवाल। जाति का सवाल जिसको लोहिया जी कहते थे कि कोढ़ है इस समाज का, एक ऐसी निराधार अवधारणा है जिसका कोई आधार नहीं है, कोई विवेक सम्मत तर्क नहीं है जिसके पीछे। एक अहंकारपूर्ण मिथ्या चेतना है वो। लेकिन उस चेतना से प्रेरित होकर करोड़ों लोग अपना जीवन जीते हैं, उसमें आस्था रखते हुए। और उस आस्था से प्रेरित होकर दूसरों की जान ले लेते हैं, हत्या करते हैं, हिंसा करते हैं। ऐसी निराधार विवेकहीन अहंकारपूर्ण मान्यता पर पहली बार कारगर ढंग से इस देश में सवाल खड़ा किया दलित विमर्श ने, जिसका श्रेय है बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर को। और ज्योतिबा फुले और सावित्री बाई को। ज्योतिबा फुले का साथ सावित्री बाई का नाम मैं साथ-साथ लेना चाहता हूं, क्योंकि उन्होंने जो कुछ किया, एक साथ मिलके किया। वो सिर्फ ज्योति बा फुले का ही योगदान नहीं था, उसमें सावित्रीबाई का योगदान शामिल है। इसलिए उसे स्वीकार करना चाहिए, जैसे आप मार्क्स-ऐंगल्स बोलते हैं, ऐसे ही ज्योतिबा फुले और सावित्री बाई जो हिंदुस्तान के मेरी नजर में पहले आधुनिक स्त्री-पुरुष थे। उनके संबंध स्त्री-पुरुषों के दृष्टिकोण से एक आदर्श संबंध थे। और जब हम स्त्री-पुरुष के आधुनिक संबंधों के बारे में विचार करते हैं तो हम ज्योति बा फुले और सावित्री बाई की मिसाल सामने रख सकते हैं।

courtesy- google image

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तो दलित विमर्श ने सबसे महत्वपूर्ण काम किया कि इस देश में जाति के सवाल को इस तरह से खड़ा कर दिया कि उसे कोई भी नजरअंदाज नहीं कर सकता। उससे आंखें नहीं चुरा सकते, उसका जवाब दिए बिना आप आगे नहीं बढ़ सकते। ये बहुत असाधारण बात हुई है। युगांतरकारी बात हुई है। ये दलित जाति का सवाल जो है, आज हमारे देश में देशज आधुनिकता की कसौटी बन चुका है। मॉडर्न आदमी, आधुनिक व्यक्ति कौन है, कल तक हमारे पास इसकी कोई कसौटी नहीं थी, हम पश्चिम की मुताबिक ढलने को ही मॉडेरनिटी समझते थे। लेकिन आज इस देश में एक कसौटी है हमारे पास, जाति प्रथा में विश्वास करते हुए कोई आधुनिक नहीं हो सकता। आप चाहे बाकी कितनी बातें करें, बहुत महीन काटते रहिए आप, लेकिन अगर आप जाति में विश्वास करते हैं, तो आपका सारा पिछड़ापन, आपकी सारी जहालत सामने आ जाएगी। तो ये हमारी देशज आधुनिकता की सबसे बड़ी कसौटी आज बन चुकी है, जिसने जाति प्रथा को निस्सार घोषित कर दिया है। जाति प्रथा खत्म हो चुकी है, ऐसा नहीं है। लेकिन उसी रास्ते पर है वो। और इस दलित विमर्श का बहुत बड़ा योगदान है हिंदी समाज में। और इसके साथ ही दलित विमर्श ने एक और काम किया और उसका भी श्रेय डॉ. अंबेडकर को है, धर्म की आलोचना। जिस धर्म की आलोचना करने वाले कल तक नास्तिक कहलाते थे, और वेदों में सबसे बड़ा पाप नास्तिकता है। और आर्य समाज के इतने बड़े सुधारक थे, दयानंद सरस्वती, जातिप्रथा के भी खिलाफ थे, लेकिन वे भी नास्तिक व्यक्ति को देशनिकाला देने की बात कहते थे। तो जिस देश में धर्म की आस्था पर सवाल करना मुश्किल था, वहां उस देश में धर्म की इतनी विस्तार से आलोचना डॉ.अंबेडकर ने की, जिसको लेकर दलित विमर्श जो हैं, आगे बढ़ा है। ये एक दूसरी विडंबना है कि डॉ. अंबेडकर की विचारधारा के लोगों पर प्रभाव के बावजूद अधिकांश दलित समाज अभी अंधविश्वासों में जी रहा है और धर्म की बहुत सारी कुरितियों में फंसा हुआ है। लेकिन उससे लड़ने का रास्ता भी इसी दलित विमर्श के भीतर है, डॉ. अंबेडकर की विचारधारा के अंदर है। इसके अलावा साहित्य में जो दलित विमर्श हिंदी में हुआ है, मैं दूसरी भाषाओं के विमर्शों के बारे में इतना नहीं जानता हूं। सिर्फ सूचनाएं हैं, वो भी हमारे बजरंग बिहारी तिवारी जी जो इतना अच्छा काम कर रहे हैं, पूरे हिंदुस्तान के विभिन्न प्रदेशों के दलित विमर्श का एक तुलनात्मक अध्ययन वो कर रहे हैं जो हिंदुस्तान में किसी बहुत बड़ी संस्था का काम है। वो अकेले दम पर कर रहे हैं। तो उनके लेखों को जरूर पढ़ना चाहिए उससे कई महत्वपूर्ण उपयोगी जानकारी मिलती है।
तो ये जो दलित साहित्य ने हिंदी में एक और काम किया कि जो हमारी साहित्यिक परंपरा थी, जो कि मुख्य रूप से द्विज आलोचकों की ही बनाई हुई थी। द्विज आलोचकों का उसमें होना बहुत स्वाभाविक है, इसलिए कि इस देश में शिक्षा पर उन्हीं का अधिकार था, जाहिर है कि साहित्य हो, विज्ञान हो, जो भी हो, वो चाहे मार्क्सवाद  और कम्युनिज्म ही क्यों न हो, उसमें द्विज लोग ही सबसे पहले आगे रहते, ये एक स्वाभाविक सी बात थी। तो वो जो परंपरा है जिस पर उनके द्विज संस्कार भी बहुत हावी हैं, उनके द्विज पूर्वाग्रह भी बहुत हावी हैं, और हिंदी साहित्य के बहुत सारी विद्यार्थी इन बातों को जानते हैं, उस परंपरा पर, उस इतिहास पर, उसमें जो मूल्यांकन का क्रम है, उसमें जो जगहें तय हैं साहित्यकारों की, कवियों की, लेखकों की, उस पर दलित साहित्य ने सर्वाधिक सवाल खड़े किए। और ये सवाल किसी हिंदी के आलोचक की तरह से नहीं खड़े किए। उन्होंने  ऐसी भाषा में खड़े किए कि लोग तिलमिला उठे और उसका जवाब देते हुए बना नहीं, तो खीज गए लोग और उनको लगा कि ये तो गाली गलौज की भाषा बोल रहे हैं। मैं ये नहीं कहता कि सारी की सारी आलोचना उनकी वाजिब है और मान ली जानी चाहिए, लेकिन उन्होंने ये सवाल बड़े कारगर तरीके से खड़े किए और हिंदी साहित्य में पहली बार एक खलबली मच गई। जो काम मार्क्सवादी आलोचकों को करना चाहिए था और जिसमें वो चूक गए थे, ऐसे बहुत से सार्थक सवालों को दलित आलोचकों ने, साहित्यकारों ने हिंदी में खड़ा किया। चाहे कबीर को लेके हो, हजारी प्रसाद द्विवेदी को लेके हो, तुलसीदास को, प्रेमचंद को, निराला को, बहुत सी निरर्थक भी बात हो सकती है, लेकिन बहुत से सार्थक सवाल भी उन्होंने खड़े किए और अब आप उससे आंख नहीं चुरा सकते हैं। दलित विमर्श के कारण आज हिंदी में दलित लेखकों की एक स्थिति बनी है जो पहले नहीं थी। दलित लेखकों के किसी हद तक संगठन बने हैं। और किसी हद तक वे एक आवाज बने हैं, जिसको सुना जाता है, जिसको सुनना पड़ता है। दलित विमर्श का हिंदी में बहुत बड़ा योगदान है। इस दलित विमर्श की सफलता तो आप इससे देखिए, कि आज दलित साहित्य को कितना बड़ा बाजार उपलब्ध है, उसके प्रकाशक को, उसके साहित्य को, जो किसी और साहित्य को उपलब्ध नहीं है। दलित लेखकों को छापने के लिए बड़े-बड़े प्रकाशक बड़ी तत्परता से तैयार हो जाते हैं। और उनकी किताबें बाजार में खूब बिकती हैं, कई-कई संस्करण निकल जाते हैं। ये हिंदी में दलित विमर्श की एक सफलता है। दूसरे प्रदेशों के दलित विमर्श की तुलना में हिंदी का दलित विमर्श कैसा है, बहुत सारी बातें नहीं कह सकता मैं। लेकिन जो थोड़ी बहुत सूचनाएं मिली हैं, तमिल, तेलगु, मराठी वगैरह को देखते हुए, तो उससे तो यही लगता है कि हिंदी में उनकी तुलना में दलित साहित्य अभी भी सीमित दायरे में है। और उसका एक उदाहरण यही है कि आज भी हिंदी में यही सवाल दलित विमर्श में महत्वपूर्ण बना हुआ है कि दलित साहित्य कौन लिख सकता है? वो सिर्फ दलित ही लिख सकते हैं या गैरदलित भी लिख सकते हैं। मैं भी एक समय में इसका बड़ा समर्थक रहा कि दलित ही दलित साहित्य लिख सकता है, पर मुझे अब इसमें शंका होती है। मैं समझता हूं कि किसको हम दलित साहित्य कहेंगे, उसका एक आब्जेक्टिव कैरिटेरिया होना चाहिए। न कि आप जाति का पता लगाकर ये पता लगाएंगे कि वो दलित साहित्य है या नहीं। दलित साहित्य किसे माना जाए और किसे नहीं माना जाए, इसकी कुछ वस्तुगत कसौटियां बननी चाहिए। इसके कुछ मापदंड निर्धारित होने चाहिए। और उन्हीं के आधार पर ये तय होना चाहिए कि ये दलित साहित्य है, इस प्रकार के सैद्धांतिकरण में कोई दिलचस्पी दलित लेखक नहीं रखते हैं। इसका कारण क्या है? बहुत से कारण हो सकते हैं। उसमें से एक कारण दलित साहित्य के अपने बाजार को सुरक्षित रखना भी हो सकता है। पर वो एक कारण हो सकता है। दूसरे कारण तो विचारधारात्मक ही हो सकते हैं। लेकिन इस सवाल पर सोचने की जरूरत है। और यही कारण है कि दलित साहित्य के मूल्यांकन के लिए दलित लेखक पूरी तरह से गैर-दलित द्विज आलोचकों की ओर देखते हैं। वो इसी की वजह से है। दलित साहित्य में उपन्यास लिखे जा रहे हैं, कविताएं, कहानियां लिखी जा रही हैं, पर आलोचना का, खासकर दलित साहित्य की आलोचना का उस प्रकार से विकास नहीं हो रहा है। उसके लिए वो फिर उन्हीं लोगों को देखते हैं, जिनसे वो बहुत सहमत नहीं है या जिनको विरोधी समझते हैं। इसका कारण यही है क्योंकि हमारे पास दलित साहित्य को निर्धारित करने वाले मापदंड नहीं हैं। दलित साहित्य का सौंदर्य किस बात में है, उसकी भाषा की ताकत किस बात में है, एक दलित साहित्य की रचना में किस तत्व पर जोर दिया जाना चाहिए? ये सारे सवाल आज के दलित साहित्यकारों की चिंता के विषय नहीं बने हैं। और इसीलिए दलित साहित्य में आलोचना का कोई विकास नहीं हुआ है। जो गैरदलित लेखक हैं, वे दलित साहित्य नहीं लिख सकते हैं। इसलिए नहीं लिख सकते हैं, क्योंकि उनके अनुभवों की एक सीमा है।उन्हें दलित जीवन का वो अनुभव नहीं है। वे सहानुभूति रख सकते हैं, सहानुभूति के साथ साहित्य लिख सकते हैं। ये बात तो दलित लेखक के साथ भी लागू हो सकती है कि अगर वो ऐसे विषय पर लिखना चाहे, युद्ध के विषय पर, और वो स्वयं युद्ध में कभी न गया हो, तो यह उस पर भी लागू होती है। लेकिन देखना यह चाहिए कि जो व्यक्ति उन अनुभवों को हासिल करता है और करने के बाद लिखता है। मुल्कराज आनंद ने ‘अछूत’ उपन्यास लिखा है, बहुत महत्वपूर्ण उपन्यास है। हिंदी में एक लेखक है- मदन दीक्षित, मोरी की ईंट उनका बहुत ही महत्वपूर्ण उपन्यास है, सफाई कर्मचारियों के समाज पर लिखा गया, उतना अच्छा दूसरा कोई उपन्यास नहीं मिलेगा आपको। इतने भीतर के अनुभवों को हासिल करके उन्होंने ये लिखा, लेकिन चूंकि दलित साहित्य की कोई वस्तुगत कसौटी निर्धारित नहीं है, इसलिए उस उपन्यास पर चुप्पी साध ली जाती है, उसके महत्व को स्वीकार नहीं किया जाता, उस पर चुप हो जाते हैं लोग।

Courtesy- google image

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दलित विमर्श की जो सीमाएं हिंदी में दिखाई देती हैं उसमें एक बड़ा महत्वपूर्ण सवाल है कि देश की जो बाकी परिस्थितियां हैं, जो परिवर्तन हो रहे हैं देश में, जो आंदोलन हो रहे हैं देश में, उनके बारे में दलित विमर्श का क्या दृष्टिकोण है? इराक युद्ध है, अफगानिस्तान युद्ध है, भूमंडलीकरण है, बाजारवाद है, बहुराष्ट्रीय कंपनियों का दबदबा है, इन सबके बारे में दलित विमर्श का कोई दृष्टिकोण होगा या नहीं होगा? ये सवाल अभी तक अनुत्तरित है। और इससे भी बड़ा सवाल है कि दलित विमर्श में जो जाति का प्रश्न है, उसका दलित के जीवन के आर्थिक प्रश्न से क्या संबंध है? जाति के प्रश्न का वर्ग के प्रश्न से क्या संबंध है? अभी भी इसको खुलकर और एक स्थापित तथ्य की तरह से स्वीकार नहीं किया गया है। ये कहा गया है कि सामाजिक बेइज्जती मूल समस्या है दलित विमर्श की, गरीबी नहीं। सामाजिक बेइज्जती अखरती है, गरीबी नहीं। गरीब ब्राह्मण की बेइज्जती नहीं होती है, दलित की होती है। ये तर्क बिल्कुल सही है। हिंदुस्तान में जाति प्रथा के आधार पर शोषण की प्रणाली हिंदुस्तान की एक ऐसी मौलिक विशेषता है, जो हमारे जानते और किसी समाज में नहीं दिखाई देती। और यही कारण है कि मार्क्सवाद जो पूरे विश्व के मेहनतकश लोगों के लिए एक मुक्तिकामी दर्शन है और आज भी है, उस मार्क्सवाद को जब हम भारत में  लागू करने की कोशिश करते हैं, तो उसमें ये दलित प्रश्न बाहर रह जाता है। क्योंकि मार्क्सवाद में इसका कोई विवेचन नहीं है। मार्क्सवाद की इस कमी को अंबेडकर के बिना पूरा कर नहीं सकते। हिंदुस्तान में उत्पादन में अतिरिक्त मूल्य के आधार पर होने वाले शोषण के अलावा हिंदुस्तान में शोषण की एक अपनी देशज प्रणाली रही है, जो धर्म, संस्कृति और समाज के आधार पर खड़ी की गई है। उसमें आर्थिक शोषण भी है। और ये जो शोषण की प्रणाली है इसे सबसे पहले बहुत विस्तार के साथ ज्योतिबा फुले ने दिखाया था। ज्योति बा फुले का एक नाटक है- तृतीय रत्न, आज के हर नागरिक को ये नाटक पढ़ना चाहिए। ये नाटक ‘तृतीय रत्न’ और उनकी किताब ‘गुलामगिरी’- ये दो किताबें ऐसी हैं, जो हमें बताती हैं, कि ये जाति के आधार पर शोषण की जो प्रणाली है, जिसे हम ब्राह्मणवाद का नाम देते हैं, ये ऐज ए सिस्टम कैसे काम करता है, ये फंक्शन कैसे करता है, ये सिस्टम है क्या, ये पहली बार ज्योतिबा फुले ने बताया। और अंबेडकर दूसरे व्यक्ति हैं, जिन्होंने इस चीज को एक शास्त्र तक पहुंचा दिया। वैज्ञानिक विवेचन जो समाजवाद के विभिन्न विचारों को लेकर मार्क्स ने किया, एक वैज्ञानिक समाजवाद का दर्शन रखा, वो काम हिंदुस्तान में जाति को लेकर जो शोषण का जो पूरा तंत्र है, उसको अंबेडकर ने सबसे वैज्ञानिक रूप में पेश किया। और इस संदर्भ में भारतीय परिस्थितियों में ये ज्योतिबा फुले और अंबेडकर मार्क्स के जैसे ही हैं हमारे लिए, ये हमें समझ लेना चाहिए। हिंदुस्तान में मार्क्सवादी आधार पर क्रांति करने के लिए फुले और अंबेडकर की विचारधारा को शामिल करके, जोड़कर ही हम आगे बढ़ सकते हैं, इस चीज को बहुत से मार्क्सवादी स्वीकार करने लगे हैं, महसूस करते हैं, लेकिन जो ऑफिसयल मार्क्सिज़्म है, उसमें वो चीज अभी भी आई नहीं है और वो बहुत सारे वैचारिक उहापोह में हैं कि इसको कैसे शामिल किया जाए? जब मार्क्स अपनी विचारधारा के विकास के लिए हेगल जैसे सामंतों के पुरोहित प्रोफेसर से, राज्य के अपने आदमी से उसके दर्शन की विशिष्टताओं को ले सकते थे कि हमारा दर्शन पूर्ण हो, तो हम अंबेडकर और फुले से क्यों नहीं ले सकते? जबकि अंबेडकर और फुले की तो वर्गीय स्थिति वैसी नहीं है, जैसी हिगेल के थी। उनकी तुलना में ये बहुत प्रगतिशील लोग हैं।
तो मित्रो, जाति और वर्ग का सवाल हिंदुस्तान में सामाजिक परिवर्तन के लिए बहुत अहम सवाल है। ये मैं इसलिए कह रहा हूं, क्योंकि जिस तरह अंबेडकर को छोड़कर हिंदुस्तान में सामाजिक परिवर्तन नहीं किया जा सकता, उसी तरह से मैं इतनी ही कड़वी सच्चाई है कि हिंदुस्तान में सामाजिक परिवर्तन करने के लिए सिर्फ अंबेडकर काफी नहीं होंगे, उनसे आगे जाना होगा। और वो आगे जो हम जाएंगे, उसमें मार्क्सवाद हमारी बहुत मदद करता है। देखिए ज्ञान का जो विकास होता है, वो कैसे होता है? ज्ञान कोई एक बनी बनाई स्थिर चीज नहीं है, कि किताबों में बंद कर दिया गया है और ज्ञान उतना ही रहेगा, ऐसा नहीं है। ज्ञान का विकास विभिन्न स्रोतों से होता है। समाज के सामने जो समस्याएं खड़ी होती हैं, उनको समझने के लिए होता है, उन समस्याओं का हल करने के लिए होता है। हिंदुस्तान में अगर हम क्रांति करना चाहते हैं, हम एक समतामूलक समाज कायम करना चाहते हैं तो हमें अंबेडकर और ज्योतिबा फुले और मार्क्स- तीनों के महत्व को समझना होगा, इस वैचारिक विकास को हमें करना होगा, वर्ना हम हिंदुस्तान को नहीं बदल सकते। हम एक समतामूलक समाज नहीं कायम कर सकते।दलित की जो सामाजिक बेइज्जती है, उसके आर्थिक स्रोत भी होते हैं। उसकी जो आर्थिक विवशता है, उसके पास कुछ भी नहीं है। अंबेडकर ने इसी चीज की ओर तो ध्यान खींचा हमारा कि मध्यकाल के संत लोगों ने  लिखा कि ईश्वर के बनाए हुए सब बंदे हैं इसलिए सब बराबर हैं। पर सवाल ईश्वर के बनाए हुए बंदों की समानता का नहीं है। सवाल इस समाज में कायम भौतिक असमानता का है। एक दलित को उन सारे अधिकारों से, संपत्ति के अधिकारों से वंचित करके रखा गया है, सवाल उसके मानवाधिकारों का है। सवाल उसके लोकतांत्रिक-नागरिक अधिकारों का है, सवाल समाज के उत्पादन में उसके हिस्से का है। और ये जो वो वंचित है सब चीजों से, यह भी उसकी सामाजिक बेइज्जती का एक स्रोत है बहुत बड़ा। जिस दलित के पास कुछ भी नहीं होगा, उसकी तो सामाजिक बेइज्जती हर तरह से होगी। जब तक वो आर्थिक रूप से मजबूत नहीं होगा, उसकी आर्थिक मुक्ति नहीं होगी। जब तक एक शोषित वर्ग के रूप में वह मुक्त नहीं होगा, तब तक उसकी बेइज्जती खत्म नहीं होगी। और यहाँ मार्क्स  की  जरूरत हमें पड़ेगी।

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एक आखिरी जो सवाल मैं उठाना चाहता हूँ, इस पर हिंदी का दलित विमर्श नहीं ध्यान देता है । किसी भी उत्पीडि़त समुदाय की मुक्ति के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण सवाल है कि दूसरे उत्पीडि़त समाजों की मुक्ति के बारे में वो क्या सोचता है? कोई भी उत्पीडि़त समाज अगर सिर्फ अपनी मुक्ति के बारे में सोचता है, वो कभी मुक्त नहीं हो सकता, जब तक कि वो दूसरे उत्पीडि़त समाजों की मुक्ति के बारे में भी न सोचे, उनके प्रति एक सही रवैया न रखे, उनके साथ मिलकर चलने को तैयार न हो। ये पांडिचेरी में प्रोफेसर हैं मुरुशेखर साहब, कई लोगों ने उनके एक नाटक की चर्चा की है, बलि का बकरा, तमिल के अच्छे, बहुत अच्छे लेखक हैं, नाटक लिखते हैं- बलि का बकरा। देवी का रथ जो खींचा जाता है वर्ष में एक बार, गांव में ब्राह्मणों के द्वारा, तो उसको खींचते हुए रस्सी टूट गई, रस्सा टूट गया, तो देवी को बहुत कोप आया। देवी अब श्राप देती इस गांव को। तो उससे कैसे बचा जाए? ब्राह्मणों की सभा होती है, तो उस सभा में ये तय होता है, कि देवी के कोप से बचने के लिए, देवी को प्रसन्न करने के लिए अब एक बलि उसको देनी जरूरी है। किसकी बलि दी जाए? सारे ब्राह्मण पीछे हट जाते हैं, छुप जाते हैं। अंत में एक दलित युवक को खोज लिया जाता है इस बलि के लिए। और उस दलित युवक को पकड़ के लाया जाता है कि चलो तुमको गांव के लिए बलि होना है, तभी देवी शांत होंगी। वो मजबूर आदमी, उसका अपने जीवन पर कोई अधिकार नहीं। उसकी पत्नी रोती-कलपती पीछे आती है, कि मेरे पति को छोड़ दो, बहुत कुछ कहती है, लेकिन ब्राह्मणों का दिल नहीं पसीजता है। लेकिन उसके पति के दिमाग में एक बात आती है, वो कहता है, दलित ही की बलि देनी है न, ठीक है, ये मेरी पत्नी है, मैं बोलता हूं इसकी बलि दे दो। मुझे जाने दो। जिस व्यक्ति का अपने जीवन पर कोई अधिकार नहीं है, वह दूसरे के जीवन पर इतना अधिकार जमा रहा है, कि उसकी बलि दे दो!ये जो दूसरा व्यक्ति है, स़्त्री, दलित-स्त्री, इसकी आवाज हमारा दलित विमर्श उसी तरह से नहीं उठाता है। वो उसे इनकार तो नहीं करते हैं, लेकिन वो बहुत कम्फर्टेबुल भी फील नहीं करते। असुविधा महसूस करते हैं। और इसीलिए ये दलित स्त्री विमर्श की आवाज उठेगी। तो दलित समाज, दलित विमर्श अगर दलित स्त्री की मुक्ति के सवाल पर नहीं सोचेगा, उस सवाल को मान्यता नहीं देगा, तो वह अपनी भी मुक्ति नहीं कर सकता। और दुर्भाग्य से हिंदी दलित विमर्श में ये घटना वास्तविक रूप से घटी है कि दलित विमर्श की एक धारा, इतनी स्त्री विरोधी हो चुकी है वो धारा कि मैं समझता हूं कि वो दलित समाज की मुक्ति से भी बहुत दूर हो चुकी। अंबेडकर इतने महत्वपूर्ण व्यक्ति थे, उन्होंने स्त्रियों के सवाल पर बहुत लिखा, फुले ने बहुत लिखा, शाहू ने बहुत लिखा, पेरियार ने बहुत लिखा, मैंने किसी दलित लेखक को नहीं देखा कि उनके साहित्य का विवेचन करे स्त्री के प्रश्न पर। इसलिए स्त्रियों को यह सवाल अलग से उठाना पड़ रहा है। इतनी सी बातें तो मैं दलित विमर्श के बारे में कहना चाहता था।
प्रो.वीर भारत तलवार

प्रो.वीर भारत तलवार

प्रो.  वीर भारत तलवार,  प्रख्यात हिन्दी आलोचक, जेएनयू में प्राध्यापक। उनसे virbharattalwar@gmail.com पर संपर्क संभव है। 
हैदराबाद में दिये गए व्याख्यान का पहला अंश। शेष अगले किश्तों में। 
साभार समकालीन जनमत 

मर्दवाद से छुटकारा पाना एक बड़ी सांस्कृतिक लड़ाई है: वीर भारत तलवार

By वीर भारत तलवार

बेखौफ़ आज़ादी:  Women’s Right is Human’s Right

16 दिसंबर के बलात्कार के बाद देश में और खासकर दिल्ली में व्यापक पैमाने पर जिस जनआंदोलन का उभार हुआ, और उसमें जिस तरह जेएनयू के विद्यार्थियों ने भाग लिया और यहाँ के छात्रसंघ ने जैसी भूमिका निभाई, सबसे पहले मैं उसको सलाम करता हूँ। जेएनयू की इस ऐतिहासिक भूमिका के लिए उसको हमेशा याद किया जाएगा।

यह आंदोलन जो आज हुआ है, और लगातार आगे बढ़ रहा है, इसके महत्व को हम एक दूसरे तरीके से भी समझ सकते हैं। 1970 के दशक में जो मथुरा रेप केस का फैसला हुआ, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा कि लड़की चरित्रहीन थी और उसका बलात्कार नहीं हुआ। इस फैसले के विरोध में 18 जनवरी 1980 को बंबई के कई संगठन सड़कों पर आए और उन्होंने मिल कर ‘फोरम अगेन्स्ट रेप’ नामक एक फोरम बनाया और उसके माध्यम से धीरे-धीरे पूरे देश में आंदोलन फैल गया। 8 मार्च को दिल्ली, कलकत्ता, मद्रास सभी जगह रेप के खिलाफ आंदोलन हुए। इसके साथ ही उसका एक कल्चरल विंग भी था जिसमें स्टडी-ग्रुप वगैरह भी थे और ये रेप के खिलाफ जो फोरम बना, जो इनके सदस्य थे, वे पीड़ित महिलाओं, जिनके साथ रेप हुआ था, उनके पास जाकर उनकी काउन्सलिन्ग करते थे। इस प्रकार उसे एक जन-अभियान का रूप दिया गया था।

आज जो जन-आंदोलन चल रहा है उसमें एक बड़ा और महत्वपूर्ण फर्क है। 1980 में जो आंदोलन बंबई से शुरू हुआ वह मुख्य रूप से महिला-संगठन का आंदोलन था। कुल मिलकर लगभग 150 सक्रिय महिलाएं सामने आई थीं और उन्होंने इस आंदोलन को चलाया था। लेकिन इस बार जो आंदोलन हुआ है यह सिर्फ महिला संगठनों द्वारा संचालित नहीं है, बल्कि महिला संगठन बहुत कम हैं इसमें। यह आंदोलन जिस बड़े पैमाने पर फैला उसका एक बहुत बड़ा कारण हिंदुस्तान की एक बड़ी वामपंथी राजनीतिक पार्टी, उसका एक बड़ा स्त्री संगठन एपवा (APWA) और उसका एक बड़ा विद्यार्थी संगठन आइसा (AISA) है। ये संगठन अगर नहीं होते तो यह आंदोलन आज देशव्यापी रूप नहीं ले पाता। जनाक्रोश को एक संगठित और व्यापक रूप देने के लिए एक राजनीतिक संगठन कितना जरूरी है, यह आज बहुत महत्वपूर्ण है। हमें यह ध्यान में रखना चाहिए कि आज देश में कोई भी राजनीतिक दल ऐसा नहीं है जो इस तरह के आंदोलन को फैलाना चाहता हो, सिवाय इसको भुनाने के। यह एकमात्र संगठन था (AIPWA और AISA), जिसने जनाक्रोश को देखते हुए उसके मूल्यों के लिए इस लड़ाई को फैलाया।DSC_0071

दूसरी बात मैं यह कहना चाहूँगा कि भारत में बदलाव लाने के लिए जो आंदोलन हैं, वह कहाँ से शुरू हो सकते हैं? हिंदुस्तान की सारी राजनीतिक व्यवस्था, जो political class है, जो सिर्फ चुनाव लड़कर सत्ता हासिल करना चाहते हैं, उनकी सीमाएं आज बहुत अच्छी तरह से स्पष्ट हो चुकी हैं। अन्ना हज़ारे का आंदोलन, एक ऐसा आंदोलन था जो बड़ी संभावनाओं के लिए हुआ था, हालांकि उसकी कई सीमाएं भी थीं। वह सभी राजनीतिक दलों के खिलाफ था इसलिए किसी भी राजनीतिक दल ने उसका समर्थन नहीं किया। मैं समझता हूँ कि वामपंथियों को उस आंदोलन को उसकी सीमाओं से मुक्त करके, उसकी अंतर्निहित संभावनाओं का अपने ढंग से विकास करना चाहिए था क्योंकि एक पूरा जनांदोलन बनने की असीम शक्ति उस आंदोलन में थी। दुर्भाग्य से हिंदुस्तान का वामपंथी आंदोलन इस काम से चूक गया। वे भी चूक गए जो आज इस आंदोलन को उठा रहे है, लेकिन यह अच्छी बात है कि आज जो आंदोलन हुआ, वामपंथी संगठन इस काम से नहीं चुके और उसने इस सवाल को उठाया।

एक महत्वपूर्ण दृष्टि से यह सांस्कृतिक आंदोलन है। किसी देश में बदलाव का आंदोलन कहाँ से शुरू होगा यह कहा नहीं जा सकता है। आप सब जानते हैं कि चीनी क्रान्ति का आंदोलन भी 4 मई के एक सांस्कृतिक आंदोलन से ही शुरू हुआ था और संयोग से वहाँ के विद्यार्थियों ने ही 1919 ई. में किया था। मैं वर्तमान आंदोलन के एक सांस्कृतिक रूप को ज्यादा देख पा रहा हूँ। यह एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक आंदोलन है जिसने हमारे देश में जेंडर (Gender) के सवाल को व्यापक पैमाने पर उठाया है। इस सांस्कृतिक आंदोलन के उभरने के साथ-साथ दुश्मन भी तैयार गया है। दो खेमें इस आंदोलन के बाद उभर कर आए हैं। इस आंदोलन के विरोधी खेमों के प्रतिनिधियों ने, चाहे वो शंकरचार्य हों, मोहन भागवत हों या राजनीतिक दलों के नेता भी हों, उन लोगों ने भी अपनी बातें कही हैं। स्त्रियों की लक्ष्मण रेखा खींची है और बताया है कि स्त्रियाँ भी दोषी हैं। महत्वपूर्ण व्यक्तियों द्वारा कहे जाने के बाद भी इस विरोधी खेमे की आवाज़ कमजोर सी लगी है। पर मैं आपसे कहना चाहूँगा कि दुश्मन को आप कमजोर न समझिएगा। उसके पीछे बहुत बड़ी ताकत है जनता की पिछड़ी हुई चेतना, जनता की सोयी सोई हुई चेतना, जिन सवालों पर जनता को कभी सचेत नहीं किया गया है। वह पिछड़ी हुई चेतना ही इन लोगों की सबसे बड़ी ताकत है, उसी के बल पर ये लोग खड़े हैं। ये जो हमारी संस्कृति की प्रथाएँ हैं, हमारी धार्मिक मान-मर्यादाएं हैं, जो सदियों से चली आ रही हैं, ये सब इनकी ताकत हैं। अगर आप इनके खिलाफ लड़ने की हिम्मत रखते हैं तो आपको ये समझकर चलना चाहिए कि दुश्मन बहुत शक्तिशाली है। सामाजिक रूढ़िवाद उसका मुख्य आधार है और इस लड़ाई को अगर हम आगे ले जाएँगे तो निश्चित रूप से समाज में एक ध्रुवीकरण पैदा होगा- इन मूल्यों के खिलाफ और इन मूल्यों के पक्ष में। और, इस तरह इस सांस्कृतिक लड़ाई के दो मुख्य ध्रुव होंगे। एक ओर हिंदुस्तान का युवा-वर्ग होगा और दूसरी ओर हिंदुस्तान की सामंती शक्तियाँ, पुरोहितवाद, सांप्रदायिक और फ़ासिस्ट ताक़तें होंगी और उस लड़ाई के लिए मैं समझता हूँ कि मानसिक रूप से उन लोगों को तैयार होना चाहिए जो इस जनांदोलन में अपनी भूमिका निभा रहे हैं।DSC_0058

आज इस देश में सांस्कृतिक लड़ाई बहुत महत्वपूर्ण हो गई है, खासकर मौजूदा भूमंडलीकरण और बाजारवाद के कारण। ये जो पिछले 10-15 सालों में रेप की संख्या इतनी बढ़ी है उसका एक बहुत बड़ा कारण भूमंडलीकरण और बाजारवाद का माहौल है और उसे उदारीकरण की नीतियों से बढ़ावा मिला है। आज देश में लुटेरी और भ्रष्ट जितनी ताकते हैं, सबको खुली छूट मिली हुई है। आप कुछ भी कर लीजिये कुछ नहीं होगा। कानून की भूमिका सिमटकर लुटेरों की रक्षा करने और उनके खिलाफ जनसंघर्ष उठाने वालों का दमन करने तक ही सीमित रह गई है। इसके अलावा आज देश में कानून की कोई व्यवस्था और भूमिका नहीं रह गई है। लेकिन सांस्कृतिक लड़ाई लड़ने के लिए उसके बदलने तक का इंतजार नहीं करना चाहिए। यह जो एक मार्क्सवादी बहस चलती रहती है कि आधार के ऊपर ही ये चीजें खड़ी हैं और आधार बदलेगा तभी ये बदलेंगी, यह एक बीती हुई बात है। बुनियादी आधार बदलने तक कोई सांस्कृतिक लड़ाई रुकती नहीं है। माओत्से तुंग से किसी ने पूछा था कि चीन में समाजवाद तो आ गया, स्त्री-पुरुष समानता कब कायम होगी? माओत्से तुंग ने कहा था- तीन-चार सौ साल लगेंगे। यह समाजवादी क्रांति के उस सबसे बड़े नेता का कहना था। उन्होंने कोई झूठा आश्वासन नहीं दिया, कोई सब्जबाग नहीं दिखाया, कोई झूठा सपना नहीं दिखाया। समाजवाद आ जाने के बाद भी स्त्री-पुरुष सम्बन्धों में बदलाव आने में 3-4 सौ साल लगेंगे चीन में, क्योंकि बदलना इतना आसान नहीं होता है कि बुनियादी आधार बदला तो संस्कृति भी बदल गई। इसलिए संस्कृति की लड़ाई हमेशा चलनी चाहिए, बुनियादी आधार बदलने का इंतजार नहीं किया जा सकता है। ये जो सांस्कृतिक लड़ाई का सवाल है, स्वाधीनता आंदोलन के संदर्भ में भी ये सवाल उठे थे देश में। रानाडे वैगरह का यही मुख्य विरोध था कि समाज सुधार होने चाहिए, स्त्रियों की दशा में सुधार होना चाहिए, तो तिलक ने कहा- नहीं, पहले अंग्रेजों को भगाओ, पहले हमारा देश आज़ाद हो। हम अंग्रेज़ी क़ानूनों से स्त्रियों की दशा में सुधार नहीं चाहते। हम आज़ाद होंगे तो हम सारी चीजों का सुधार करेंगे। हिंदुस्तान की आज़ादी की लड़ाई से बाहर हुआ किसानों का आंदोलन, जमींदारी प्रथा के खिलाफ आंदोलन, स्त्रियों का आंदोलन। इसलिए बाहर हुआ क्योंकि आज़ादी की लड़ाई इन सवालों को नहीं उठा रही थी। ये सवाल आज़ादी की लड़ाई दौरान भी रहे कि सांस्कृतिक बदलाव की लड़ाई भी साथ-साथ शुरू होनी चाहिए या नहीं? समाजवाद के बारे में भी यह बात सही है। आधार और बुनियादी बदलाव की बहुत बात की जाती है पर लेनिन के इस कथन पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है कि- बहुत सारे सुधार हैं जिनके लिए हमें क्रांति से पहले संघर्ष करने होंगे, कई सुधार क्रांति के बाद भी जारी रखने होंगे, कुछ ही सुधार हैं जो सिर्फ क्रान्ति के बाद शुरू किए जा सकते हैं। उन्होंने बहुत स्पष्ट रूप से देखा कि बहुत से सुधार आंदोलनों के लिए क्रान्ति तक रुकने की जरूरत नहीं है। DSC_0068सौभाग्य से 1980 के आस-पास जब हम जेएनयू आए तो देश में स्त्री-आंदोलन का माहौल था, स्त्रीवादी साहित्य पढ़ा जाता था। आज कितने लोग स्त्रीवादी साहित्य पढ़ते हैं, मैं नहीं जानता हूँ। लेकिन 1980 के दशक में एक बहुत महत्वपूर्ण किताब आई थी।  Sheila Rowbotham की किताब थी- Beyond The Fragments. Sheila Rowbotham एक ब्रिटिश वामपंथी नारीवादी थीं और उन्होंने एक बड़ी बात महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने कहा कि ‘स्त्री-पुरुष संबंध कैसे होंगे समाजवाद के बाद, अगर हमारी इस बारे में कोई अवधारणा है तो उस अवधारणा को साकार करने का प्रयत्त्न समाजवाद आने के बाद ही नहीं होगा, आज से होना चाहिए। समाजवाद को लाने के लिए जो संगठन हैं, जो कम्यूनिस्ट पार्टी है या और भी जो संगठन हैं, उन संगठनों के भीतर सबसे पहले उस स्त्री-पुरुष सम्बन्धों को साकार करो जो तुम समाजवाद के बाद कायम करना चाहते हो। अगर ये नहीं करते हो तो तुम्हारी उन अवधारणाओं की बात झूठी है।’ जो रूप आप कायम करना चाहते हैं उसका प्रारूप हमें पहले दिखाओ। उसे पहले अपने संगठन के अंदर प्रयोग करके दिखाओ जहां तुम्हें पूरी स्वतन्त्रता है। यह Prefigurative Movement यूरोपियन वामपंथी नारीवाद की एक बड़ी महत्वपूर्ण अवधारणा है। यह बात मुझे बड़ी अच्छी लगती है कि आज उस पारिभाषिक नाम का इस्तेमाल किए बिना, लोग इस अवधारणा की बहुत सी बातों के प्रति सचेत हो रहे हैं। यह बड़ी महत्वपूर्ण बात है।

आज इस आंदोलन ने जिन सांस्कृतिक सवालों को जन्म दिया है, उसमें सबसे महत्वपूर्ण सवाल है, स्त्री के प्रति हमारे नजरिए का। इसी प्रकार ये दो खेमे बने हैं इस सांस्कृतिक लड़ाई में, जहां एक तरफ सारी सांप्रदायिकतावादी, फ़ासिस्ट, पुरोहित, सामंतवादी, ब्राह्मणवादी ताक़तें खड़ी हैं और दूसरी तरफ जनवादी आंदोलन से जुड़े हुए वामपंथी, स्त्रीवादी लोग खड़े हैं, तो इन दोनों ताकतों की लड़ाई के बीच जो एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा हुआ है वो है स्त्री के प्रति नजरिए का। पुरोहितपंथी, ब्राह्मणवादी ताक़तें कहती हैं कि स्त्रियों को संरक्षण देने की जरूरत है। वो ये तो नहीं कह सकते कि बलात्कार उचित है, वो कहते हैं कि स्त्रियों को संरक्षण, सुरक्षा देने की जरूरत है। इसीलिए वो अपील करते हैं कि ‘स्त्रियों बाहर मत जाओ। घर में रहो। हम पुरुष लोग हैं, घर में तुम्हें सुरक्षा मिलेगी। तुम बाहर जाकर अपनी सुरक्षा को खतरे में डालती हो?’ यह हमारी संस्कृति का एक बुनियादी सवाल है जो आज उठके खड़ा हुआ है- स्त्री को संरक्षण चाहिए, सुरक्षा चाहिए या आज़ादी चाहिए। स्त्री कहाँ सुरक्षित है, घर में या बाहर में? वे कहते हैं, हमारी सरकार कहती है कि बाहर स्त्रियाँ सुरक्षित नहीं हैं। हम पुलिस वगैरह का इंतजाम कर रहे हैं तब तक आप बाहर कम निकलिए और रात को तो बिलकुल मत निकलिए। ये जो एक सवाल खड़ा है- क्या वाकई स्त्रियाँ घर में सुरक्षित हैं? बहू के पेट में यदि बच्चा आया है तो उसकी जांच कराई जाती है। और अगर भ्रूण में लड़की है तो उसकी हत्या कर दी जाती है। लड़की को आप घर में पैदा नहीं होने देते और आप कहते हैं कि घर में लड़कियां सुरक्षित हैं। अगर वह पैदा हो गई तो पालन-पोषण, पढ़ाई-लिखाई, खाना-पीना सब में लड़कों के साथ उससे भेदभाव किया जाता है। घरेलू हिंसा के खिलाफ वो कहीं जाकर कुछ बोल नहीं सकती है। उसी परिवार में पति बलात्कार करता है, उस बलात्कार की कहीं कोई सुनवाई नहीं है, उसको बलात्कार माना ही नहीं जाता है। घर में बाहर के मुक़ाबले कहीं ज्यादा हिंसा होती है स्त्रियों पर, यह एक सच्चाई है। बाहर के मुक़ाबले घर में स्त्री ज्यादा असहाय है। बाहर उस पर हिंसा हो तो कुछ लोगों को मालूम हो, पुलिस-थाना हो, कुछ आवाज़ उठे। घर में? घर में तो आप सवाल ही नहीं कर सकते है। पति-पत्नी के बीच की बात है, आप कौन हैं बीच में आने वाले? ये एक बंधा हुआ जवाब है। घर में स्त्री बहुत असहाय है अपने ऊपर होने वाली हिंसा के खिलाफ। समाज के सामने हमें इस बात को बार-बार दोहराना पड़ेगा कि स्त्रियाँ घर में और भी ज्यादा असुरक्षित हैं।DSC_0061

यह जो घर है वह एक प्रकार से पुरुष का उपनिवेश है जिसमें वह बाहरी हस्तक्षेप बिलकुल भी बर्दाश्त नहीं करता है और यह उपनिवेश आज से नहीं है, ब्रिटिश भारत में भी यही था। आप 19वीं सदी को याद कीजिये जिसमें स्त्री सुधार के आंदोलन चले थे और सुधारकों ने ब्रिटिश सरकार से कानून बनाने के लिए कहा था। बचपन में ही शादी हो जाती थी तो सुधारकों ने कहा कि 12 वर्ष तक लड़की के साथ intercourse नहीं होना चाहिए। अतः सरकार से कहकर यह कानून बनवाया गया। इसके खिलाफ देशव्यापी आंदोलन हुआ था। क्यों? इसीलिए कि स्त्री का मामला पुरुषों का अपना उपनिवेश है। उनके घर में सरकार दखल नहीं दे सकती है। राष्ट्रवादियों ने कहा- अंग्रेज़ सरकार और चाहे जो कानून बनाए, लेकिन हमारे घर की अंदर की चीजों में दखल नहीं दे सकती है। उनके बारे में कानून नहीं बना सकती है। ये अंग्रेज़ सरकार के खिलाफ लड़ने वाले बहुतों ने कहा। घर हमारा उपनिवेश है। तुम भारत पर कानून चलाओ लेकिन हमारे घर के बाहर। हिन्दी के बड़े-बड़े लेखक प्रताप नारायण मिश्र वैगरह सब इसके खिलाफ थे। किसी ने इसका समर्थन नहीं किया। घर के बारे में जो नजरिया रहा है इसको चुनौती देना, इसको बदल डालना हमारी संस्कृति का एक बड़ा सवाल है। स्त्री की आज़ादी की सुरक्षा, सबकी आज़ादी की सुरक्षा एक सही सवाल है। झूठे सवालों से छुटकारा पाना बहुत जरूरी है। मुक्तिबोध ने कहा था कि-

कि मैं अपनी अधूरी दीर्घ कविता में

सभी प्रश्नोत्तरी की तुंग प्रतिमाएँ

गिरकर तोड़ देता हूँ हथौड़े से

कि वे सब प्रश्न कृत्रिम और

उत्तर और भी छलमय

समस्या एक-

मेरे सभ्य नगरों और ग्रामों में

सभी मानव सुखी, सुंदर व शोषण मुक्त कब होंगे?”

सही सवाल को सामने रखिए और झूठे सवाल को खारिज कीजिए। स्त्री की सुरक्षा एक झूठा सवाल है। सबकी आज़ादी की सुरक्षा एक सही सवाल है। और इसी पर विचार किया जाना चाहिए।

मित्रो! इस आंदोलन को आप इसी रूप में हमेशा नहीं चला सकते। आप रोज-रोज जंतर-मंतर और इंडिया गेट पर जाकर रैलियाँ नहीं कर सकते। तो आज सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इस आंदोलन को हम कैसे जिंदा रखें? एक आंदोलन को लंबे समय तक जिंदा रखने के लिए सबसे महत्वपूर्ण चीज होती है- विचारधारा। विचारधारात्मक संघर्ष ही इस आंदोलन को लंबे समय तक जीवित रख सकता है। इस विचारधारात्मक संघर्ष को आज हमें चलाने की जरूरत है। उन मूल्यों के लिए हमें यह संघर्ष चलाने की जरूरत है जिन्हें हम इस समाज में लाना चाहते हैं, जो हमारे लक्ष्य हैं और ये संघर्ष बहुत सारे रूपों में बहुत सारे मंचों से चलता है। ये संघर्ष साहित्य के मंच से चलेगा। ये संघर्ष वैचारिक गोष्ठियों, सेमीनारों, व्याख्यानों, कला, चित्रों, फिल्मों, गीत, संगीत, नाटक आदि के माध्यम से चलेगा। ये सारे सृजनात्मक रूप हैं विचारधारात्मक संघर्ष को चलाने के लिए। अगर हम इस आंदोलन से पैदा हुए सवालों को और इस आंदोलन को जिंदा रखना चाहते हैं तो हमें विभिन्न विचारधारात्मक रूपों में, विभिन्न सृजनात्मक रूपों में उन मूल्यों की लड़ाई को लड़ना होगा। जहां तक हिन्दी साहित्य की बात है तो उसके उपन्यास, कविता, कहानी आदि में जो स्त्री की नई छवि उभर रही है वह महत्वपूर्ण है। एक ताकतवर स्त्री की छवि। लेकिन हिन्दी साहित्य में जो स्त्री-विमर्श नाम का एक विमर्श चलता है, वह बड़ा ही दरिद्रतापूर्ण विमर्श है। इन सवालों पर हमें उनसे आगे जाने की जरूरत है। मैं आपको एक दूसरा उदाहरण देता हूँ। महाराष्ट्र को आप देखिए कि किस प्रकार सृजनात्मक रूप से वो हमेशा विचारधारात्मक लड़ाई को चलाते रहते हैं। एक और उदाहरण दूँ आपको। सावित्री बाई फुले। ज्योतिबा फुले और सावित्री बाई फुले इस देश में स्त्री-पुरुष सम्बन्धों का पहला आधुनिक उदाहरण हैं। उनके बारे में आपको और भी जानना चाहिए। सावित्री बाई फुले के अंदर जिस प्रकार की चेतना थी, उस चेतना को झेलम परांजपे ने ओडिसी नृत्य के कार्यक्रमों द्वारा अभिव्यक्ति दी। सावित्री बाई फुले की स्त्रीवादी कविताओं को आधार बनाकर नृत्य की कई प्रस्तुतियाँ दीं। महाराष्ट्र में एक संगठन है MAVA (Men against violence against women)। स्त्रियों पर होने वाली हिंसा के विरोधी पुरुषों का संगठन। यह पुरुषों का संगठन है। फोरम अगेन्स्ट रेप में जैसे महिलाएं महिलाओं की counseling करती थीं, उसी प्रकार MAVA के सदस्य उन पुरुषों की counseling करते हैं, जो महिलाओं पर किसी भी प्रकार की हिंसा करते हैं, उनमें चेतना जागते हैं। मुझे नहीं लगता ऐसा कोई दूसरा संगठन होगा। इस प्रकार के सृजनात्मक प्रयासों का हिन्दी क्षेत्र में नितांत अभाव है।DSC_0105

जेएनयू में एक प्रतिध्वनि नाम का संगठन हुआ करता था जो क्रांतिकारी गाने गाया करता था। आज स्त्रियों के सवाल पर गाने वालों का कोई ग्रुप क्यों नहीं बन रहा है? क्यों नहीं स्त्रियों के सवाल पर हमारे इतने प्रतिभाशाली विद्यार्थी गीत लिख रहे हैं? इतनी अच्छी आवाज़ वाले क्यों नहीं गीत गा रहे हैं? इस तरह की सभाओं में हम क्यों नहीं स्त्रीवादी गीत गा सकते हैं? जो लोग चित्र बनाते हैं, स्त्रियों के सवाल पर चित्र बना सकते हैं, जो कवितायें करते हैं, कविता लिख सकते हैं, जो लोग फिल्म बनाते हैं, वो स्त्रियों के सवाल पर फिल्म बना सकते हैं। पचासों सृजनात्मक रूप हैं, जिनके माध्यम से हमें इन मूल्यों के लिए विचारधारात्मक संघर्ष को जारी रखना है। आज हम सबके सामने एक बड़ा सवाल है संस्कृति का, युवा वर्ग के सामने और खासकर युवकों के सामने। स्त्री विमर्श बहुत हुआ अब पुरुष विमर्श की जरूरत है। ज़्यादातर पुरुषों को ही समझने-समझाने की जरूरत है। स्त्री विमर्श का भी अपना महत्व है, उसे खारिज नहीं करना है लेकिन अगर व्यंग्य में भी कहें तो पुरुष विमर्श क्या है, इसे समझ लेना चाहिए। एक बहुत बड़ा सवाल है कि हम अपनी पितृसत्तात्मक मानसिकता को कैसे बदलें? ये युवा वर्ग के सामने, लड़कियों के सामने और लड़कों के सामने भी बड़ा सवाल है। मैं बिलकुल व्यावहारिक और सृजनात्मक रूप से आपके सामने ये प्रश्न कर रहा हूँ। आप सोचकर देखिए अपने व्यवहार में, अपने दृष्टिकोण में, अपने परिवार और दूसरे लोगों के रवैये में पितृसत्तात्मक मानसिकता जो हमें बचपन से अपने घर-परिवार से मिली है, समाज से मिली है, और अपने राज्य से मिलती है लगातार, इसे हम कैसे बदलेंगे?

हर युवती-युवक के सामने ये सवाल है कि जिन जीवन-मूल्यों के लिए हम लड़ रहे हैं, जेंडर-इक्यूलिटी के मूल्यों के लिए हम अपने जीवन में उसको कैसे उतारें? इसका जवाब मुझे नहीं देना है, आप लोगों को देना है। और, जवाब नहीं देना है, इसको साकार जीना है। यहाँ साहित्य के विद्यार्थी बैठे हैं। हमारी भाषा इतनी जेंडर-बायस्ड है कि कहना पड़ता है कि कमियाँ मुझमें भी हैं। मैं कई बार आदमी शब्द का प्रयोग मनुष्य के लिए करता हूँ। आदमीनामा लिखा नज़ीर अकबराबादी ने, वह पुरुषों के लिए है। हम गलत कहते हैं जब हम सबको आदमी कहते हैं। हमारी भाषा इतनी जेंडर-बायस्ड है, इसके बारे में हमें सोचना चाहिए। साहित्य के विद्यार्थियों को इस पर सोचना चाहिए कि हम किस तरह की भाषा का प्रयोग करते हैं, स्त्रियों के बारे में कितने अपशब्द हम कहते हैं। माँ-बहन की गालियों का ही सवाल नहीं है साली, ससुरा, ससुरी। मुझे क्लास में पढ़ाते हुए याद आया कि ये ससुरा, ये साला-साली इसीलिए गाली है। ये सब अत्यंत फूहड़ शब्द ही नहीं अच्छे समझे जाने वाले मुहावरेदार शब्दों में भी ये जेंडर-बायस्ड भाषा काम करती है। जैसा कि बहुत सी स्त्रियों ने कहना शुरू भी किया है यह एक प्रकार का Language Rape है। ये भाषाई बलात्कार है। हम इस प्रकार की भाषा से, इस मानसिकता से कैसे मुक्त होंगे यह महत्वपूर्ण सवाल है।

और अंत में मैं कहना चाहूँगा कि इस आंदोलन को चलाने के लिए, किसी भी आंदोलन को चलाने के लिए उसके जो मूल्य होते हैं वे मूल्य, उसके आदर्श, उसकी जो मांगें हैं, ये किसी न किसी नारे में कॉन्संट्रेट होनी चाहिए। नारे प्रतिनिधित्व करते हैं उन समस्त मांगों का, उन समस्त मूल्यों का, उस सारी चेतना का जिसके लिए हम लड़ रहे हैं। हमें कुछ ऐसे नारे विकसित करने चाहिए जो कि इस विचारधारात्मक संघर्ष को आगे भी ले जाने में बने रहें। वो एक क्रेटेरिया बन जाएँगे लोगों को जाँचने का कि आप इस नारे के साथ हैं अथवा नहीं। आप इस सारे मामले में विश्वास करते हैं या नहीं। तो समस्त चेतना, मूल्यों और संघर्ष को नापने और साथ होने का एक क्रेटेरिया बन जाता है। तो एक नारा जो जेएनयू के छात्रों ने पहले से ही दे रखा है। मुझे बहुत सही लगता है, और वो है- ‘बेखौफ़ आज़ादी’। इस सांस्कृतिक लड़ाई का सबसे प्रमुख नारा ‘बेखौफ़ आज़ादी’ होना चाहिए। ये नारा बहुत महत्वपूर्ण है। इसीलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इस सांस्कृतिक लड़ाई के जो तार राजनीति, प्रशासन, कानून, राज्य आदि से जुड़े हुए हैं, उस पूरे राजनीतिक परिदृश्य को ये नारा समेटता है। बेखौफ़ आज़ादी सिर्फ संस्कृति का सवाल नहीं है, बेखौफ़ राजनीति, लोकतन्त्र का, राज्य का, कानून का, पुलिस का, प्रशासन का हरेक से जुड़ा सवाल है। इसीलिए बेखौफ़ आज़ादी एक सही नारा है इस सांस्कृतिक लड़ाई का। इसके अलावा मैंने और भी नारे खोजने की कोशिश की, आप भी प्रयत्न करें। एक नारा जो मुझे ज्यादा व्यापक लगा और सही भी। मैं कहूँगा कि इस सांस्कृतिक लड़ाई से इस नारे को भी जोड़ा जाए और वो नारा है- Women’s Right is Human Right. स्त्री के अधिकारों का सवाल मानव अधिकारों का सवाल है।ये बात जो कभी दलितों के लिए अंबेडकर ने कही थी। । आज स्त्रियों के साथ होने वाले हर व्यवहार के लिए ये बात लागू है कि स्त्री अधिकार असल में मानव अधिकार हैं। इस नारे का महत्व यह है कि ये जो स्त्री-पुरुष वाला विभाजन है, एक तो प्राकृतिक विभाजन है। कोई स्त्री है, कोई पुरुष है।  लेकिन इस सवाल का मतलब शारीरिक रूप से नहीं है। इसके ऊपर जो हमारी सामाजिक निर्मिति है, ये स्त्री है और ये स्त्रीत्व होता है, ये पुरुष है और ये पुरुषत्व है। इस विभाजन को जड़-मूल से उखाड फेंकने की जरूरत है। ये स्त्री और पुरुष का विभाजन झूठा विभाजन है। बंग्ला में एक गीत है, गीत की पंक्तिया है ‘तुमी देखो नारी-पुरुष, आमी देखी शुद्धई मानुष’। तुम स्त्री और पुरुष मानकर देखते हो, मैं तो सब जगह मनुष्य को देखता हूँ। अतः ये स्त्री के अधिकार नहीं, स्त्री का सवाल है, मानवता का अधिकार है वो, मानवता का सवाल है वो। हमें पूरी मानवता के रूप में उनको उठाने की जरूरत है। आश्चर्य की बात है कि बड़े-बड़े लोग जिन्होंने मर्दवाद को चुनौती दी है। मर्दवाद से जब तक आप छुटकारा नहीं पायेंगे, आप इसी सड़ी-गली संस्कृति से छुटकारा नहीं पा सकते हैं। मर्द होना अलग बात है, मर्दवाद दूसरी बात है। ये मर्दवाद, ये पुरुषत्व, क्या चीज है ये पुरुषत्व ? ‘Boys don’t cry’ लड़के रोते नहीं,  हममें से कोई ऐसा नहीं होगा जिसने बचपन से ये बात न सुनी हो, अपने मां-बाप से, भाई-बहनों से, दोस्तों से- अए लड़का होके रोता है? छिः लड़के नहीं रोते। लड़कियों की तरह रोने बैठ गया। ये क्या बात है? ये कितनी घृणित चेतना है। हमें घृणा होनी चाहिए ऐसे सवालों से, ऐसे वाक्यों से और ऐसे मूल्यों से। मनुष्य रोता है। लड़का और लड़की नहीं रोते हैं। ऐसे सारे मुहावरे, ऐसी सारी भाषा, ऐसे सारे मूल्य जिसमें स्त्री और पुरुष का विभाजन किया गया है, फेंक देने लायक है। वो झूठे हैं, उनको खारिज कर देना चाहिए, ऐसी तमाम चीजों को। हजारी प्रसाद द्विवेदी मर्दवाद के खिलाफ लड़ते हुए उन्होंने ESCAPE में मर्दवाद को दिखाया। उन्होंने दिखाया कि ये जो लोग संन्यास ले लेते हैं ये मर्दवादी धारणा है। ये जो वैराग्य है और ये जो ऐशो-आराम, भोग-विलास है ये सब मर्दवादी धारणाएं हैं। ये जो सेनाएं खड़ी की जाती हैं, बड़े-बड़े मठ खड़े किए जाते हैं, और बड़ा राज्य का काम-धाम चलता है। ये सब मर्दवादी धारणाएं हैं। ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ में उनकी इन मान्यताओं को मैं बहुत महत्वपूर्ण मानता हूँ। लेकिन हजारी प्रसाद द्विवेदी जो इन बातों में मर्दवाद देख सके, वो आज भी हम नहीं देख पाते हैं। द्विवेदी जी कहते हैं कि ‘स्त्री की सफलता पुरुष को बांधने में है लेकिन उसकी सार्थकता पुरुष को मुक्त करने में है‘। ये सफलता और सार्थकता अपनी जगह पे है, लेकिन ये क्या चीज है?  क्यों स्त्री की सफलता ? अगर सफलता और सार्थकता है भी तो सिर्फ स्त्री की क्यों? पुरुष की क्यों नहीं ? हम अगर सफलता और सार्थकताओं में विश्वास करते है तो हमें कहना चाहिए कि मनुष्य की सफलता दूसरे को बांधने में है, लेकिन उसकी सार्थकता दूसरे को मुक्त करने मे हैं। ये मनुष्य का सवाल है। स्त्री ओर पुरुष का जहां भी सवाल उठाया जाएगा आप समझिए कि वो एक झूठा सवाल है और हमें उसका विरोध करना चाहिए। मर्दवाद पुरुषों और लड़कों के लिए एक बड़ा मूल्य बना हुआ है। जिसको Macho Man के द्वारा दिखाया जाता है. इसका असर बच्चों पर, खासकर बहुत साधारण लड़कियों पर, जिनकी चेतना सोई है, वो ऐसे मर्दवादी पुरुषों और लड़कों को बड़ा हीरो मानती हैं। ये मर्दवाद जो आदर्श बना हुआ है समाज में, हमारी सांस्कृतिक लड़ाई के लिए जरूरी है कि हम इस आदर्श को एक गर्हित मूल्य में बदल दें। मर्दवाद एक गर्हित मूल्य है। हर मर्द को इससे छुटकारा पाना चाहिए। हर स्त्री को भी इससे छुटकारा पाना चाहिए। मर्दवाद कोई वांछनीय चीज नहीं है, नितांत अवांछनीय चीज है। सावरकर जो मोहन भागवत वगैरह के पितामह हैं, जिनका उत्तराधिकार इन्हें मिला है, उस वीर सावरकर ने Six Glorious Epochs of Indian History (भारतीय इतिहास के छः स्वर्णिम अध्याय) किताब लिखी उसमें एक जगह उन्होंने शिवाजी के बारे में लिखा है कि ‘शिवाजी ने मुसलमानों पर आक्रमण करके उन्हें मार भगाया और उनकी स्त्रियों को बंदी बना लिया तो शिवाजी ने उन स्त्रियों को बिना बलात्कार किए छोड़ दिया, ये बहुत बड़ी गलती की शिवाजी ने। शिवाजी अपने पुरुषत्व का परिचय नहीं दे पाए।‘ आपने पाकिस्तानी फिल्म ‘खुदा के लिए’ देखी होगी उसमें वो एक लड़की से शादी करता है और उसे लाहौर से रेगिस्तान के किसी इलाके में ले जाता है। लड़का पढ़ा-लिखा है और वो लड़की तो और भी विदेशों में रह चुकी है। वो लड़की की इच्छा का ख्याल रखते हुए उससे शारीरिक संबंध नहीं बनाता है। तब मौलवी लोग कहते हैं कि ‘अरे मर्द बन मर्द, जा उसके साथ सो के आ’। इन्हीं कामों के लिए मर्दानगी रह गई है? यही मर्दानगी है? अखबार (जनसत्ता) मे मैंने एक विज्ञापन देखा, दिल्ली पुलिस का- ‘औरतों को छेड़ना कोई मर्दानगी की बात नहीं हैं’। सही लिखा। लेकिन इसके बाद नीचे और एक चीज लिखी है- ‘उनकी रक्षा करना ही मर्दानगी है‘। मै कहता हूँ इस मर्दवाद पर लानत भेजनी चाहिए। यह एक गर्हित मूल्य है और इससे छुटकारा पाना हमारी सबसे बड़ी सांस्कृतिक लड़ाई है और इस चेतना को विभिन्न सृजनात्मक रूपों, विभिन्न कलात्मक रूपों में अभिव्यक्त करना चाहिए। तो ये दो नारे- Women’s Right is Human’s Right और ‘बेखौफ़ आज़ादी’,  ये दो ऐसे नारे हैं जो इस आंदोलन का प्रतिनिधित्व करते हैं।DSC_0106

एक और बहुत बड़ी चुनौती जो इस आंदोलन के विकास में है जो मैं आपसे कहना चाहूंगा कि इस आंदोलन को छोटे शहरों में ले जाने की जरूरत है, कस्बों में और देहाती इलाकों में ले जाने की जरूरत है। आप जेएनयू में कुछ कर सकते हैं, दिल्ली में भी कर सकते है, लेकिन खुरजा में जाकर करना, भोपाल में जाकर करना, भागलपुर में जाकर करना या जौनपुर में, वहां जाकर करना जहां इनके सांमती संस्कार चलते हैं, जहां स्त्रियां कुछ नहीं कर पाती हैं, लडकियों को बुरी तरह से छेड़ दिया जाता है और तब भी नज़र नीची करके चली जाएंगी, वरना घरवाले भी लड़की की ही पिटाई करेंगे कि तू इधर-उधर क्यों देख रही थी, वहां इन आंदोलनों को, इस चेतना को, इन मूल्यों को ले जाने की ज्यादा जरूरत है. अगर सिर्फ चुनाव जीतना हमारा मकसद नहीं है तो इस आंदोलनों को छोटे शहरों में, कालेजों में, गांवों में वहां के लड़के-लड़कियों के बीच हम कैसे ले जाएं,  अगर हम इसको जिंदा रखना चाहते हैं तो यह भी एक महत्वपूर्ण काम है।

(जेएनयू छात्रसंघ द्वारा आयोजित एक सभा में 23 जनवरी 2013 को दिया गया व्याख्यान )

वीर भारत तलवार

वीर भारत तलवार

प्रो.  वीर भारत तलवार,  प्रख्यात हिन्दी आलोचक, जेएनयू में प्राध्यापक

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