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भारत माता: आनंद कुमारस्वामी

आनंद कुमारस्वामी की एक किताब है ‘ऐसेजइन नेशनल आयडिलिज्म’. जीए नेटसन एंड कंपनी, मद्रास से 1909 में प्रकाशित इस किताब में संकलित एक आलेख का नाम है- माता भारत! आलेख अनूठा है, इस अर्थ में कि उसमें पहली दफे भारतमाता की कथा कही गयी है. 
बंकिमचंद्र ‘वंदे मातरम्’ गीत में भारतमाता का आद्यरूप गढ़ चुके थे, इस आद्यरूप को अबनींद्रनाथ टैगोर की तूलिका ने अपने कैनवस पर मूर्तिमान किया लेकिन, गीत और चित्र से उठनेवाले अर्थों की प्रामाणिक व्याख्या अभी शेष थी. व्याख्या का यही काम भारतीय संस्कृति के मर्मज्ञ आनंद कुमारस्वामी ने अपने ‘माता भारत’ शीर्षक लेख में किया.
 
कुमारस्वामी के आलेख की शुरुआत इन पंक्तियों से होती है- ‘कभी की बात है, एक स्त्री थी- लंबी और गोरी. एकदम निर्मल, धैर्य और कृपा की प्रतिमूर्ति…! ’ आलेख में आगे प्राचीन, मध्यकालीन और आधुनिक भारत का संकेत करते हुए लिखा गया है कि विद्या-बुद्धि के मामले में यह स्त्री विश्वगुरु थी, बहुतों ने उसका हाथ मांगना चाहा और इनमें से एक जिससे उसे रंचमात्र ही प्रेम था, बरसों तक उसकी काया का स्वामी बना रहा. फिर एक और आया, इस अनजान प्रणय-याचक ने वादे किये स्वतंत्रता और शांति के, उसकी संतानों की सुरक्षा के. और, उसने विश्वास करके उसे अपना हाथ सौंप दिया…! 
 
इसके बाद आलेख में सन् 1857 का जिक्र आता है कि स्त्री के कुछ बच्चे नये स्वामी के विरुद्ध उठ खड़े हुए. उन्हें लगा कि उनकी ताकत छिनी जा रही है और उनके आपस के बात-व्यवहार जिन नियम-कायदों से संचालित होते हैं, उनके साथ छेड़छाड़ की जा रही है. भारतमाता की इस कथा में एक नया मोड़ आता है, जब 1857 के बाद के मध्यवर्गीय मानस के दोहरेपन को इंगित करते हुए कुमारस्वामी लिखते हैं कि नये स्वामी से माता ने एक संतान जना और स्वामी खुश था कि वह (एक कन्या का जन्म) उसके रंग-ढंग की होगी, उसके अपने लोगों की कन्या के समान.
 
वह धनवान और रूपवान होगी, उसके अपने लोगों के पुत्र की दुल्हन बनेगी. लेकिन जब इस संतान का जन्म हुआ, तो माता जैसे स्वप्न से जागी और सिर्फ अपनी बेटी की खातिर जीने लगी. बड़ी होती बेटी मां को उसके यौवन के दिनों की याद दिलाती थी. वह विदेशी स्वामी की पक्षधर नहीं थी, तो भी उसमें उस (विदेशी स्वामी) जैसी ऊर्जा और व्यावहारिक मामलों की चतुराई थी. मां चुपके से बेटी को प्राचीन ज्ञान सिखाती और बेटी का हृदय अपने पिता, उसके लोगों और उनके आचार-व्यवहार से दूर होता चला गया. 
 
कथा के आखिर में आता है कि बेटी की आचार-व्यवहार से माता को संतोष था, अब उसके केश उजले हो चले थे, उम्र के हाथों वह कमजोर हो चली थी और एक समय आया जब वह नहीं रही, क्योंकि उसका काम पूरा हो चुका था. बेटी को पिता की निरंकुशता जरा भी बर्दाश्त नहीं थी. 
 
उसे सभी माता कहते थे, और वह अपने से पहले जन्म लेनेवाले बच्चों की भी मां थी, कुमारस्वामी लिखते हैं कि ‘इस माता (क्योंकि उसने कहा कि वह सबकी मां होगी लेकिन ब्याहता किसी की नहीं) ने सब संतानों की मदद की. उसने सबको एक-दूसरे से प्रेम करना और एक-दूजे की मदद करना और अपने को मां पुकारना सिखाया.’ 
 
यह कथा बार-बार याद की जानी चाहिए, क्योंकि आज एक राज्य का मुख्यमंत्री कह रहा है कि भारत माता की जय नहीं बोलनेवालों को इस देश में रहने का अधिकार नहीं है. दूसरे राज्य में एक वरिष्ठ नेता स्कूल-कॉलेज चलानेवाले एक ट्रस्ट का संचालक है. वह नियम बना रहा है कि ट्रस्ट के स्कूल-कॉलेज के प्रवेश फाॅर्म पर भारत माता की जय नहीं लिखा, तो प्रवेश नहीं मिलेगा. 
 
तीसरे राज्य में धर्म की एक संस्था फतवा जारी करती है कि मुसलमान जिस तरह वंदे मातरम् नहीं बोल सकते, इसी तरह भारत माता की जय भी नहीं बोल सकते. जहरबुझी बयानबाजियों के बीच ऐसा लगता है यह 21वीं सदी के दूसरे दशक का नहीं 1930-40 का भारत है, जब एक देश के भीतर धर्म-केंद्रित दो राष्ट्रीयताओं के सिद्धांत ने जोर पकड़ा था. इतिहास दोहराने के आतुर इन बयानवीरों में से क्या किसी को भारतमाता की कथा याद है? 
 
आनंद कुमारस्वामी की भारतमाता की कथा किसी एक धर्म की कथा नहीं है, वह धार्मिकताओं के समाहार की कथा है. इस कथा की पहली सीख है कि अतीत में लौटना नहीं हो सकता और दूसरी सीख है कि भारतमाता स्वयं स्वामिनी (संप्रभु) हैं, सब ही उनकी संतान हैं, सो कोई एक अपने को वारिस बता कर शेष पर भारतमाता के नाम से हुक्म के कोड़े हांकने की निरंकुशता नहीं बरत सकता. # चंदन  श्रीवास्तव 

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भारत माता, चित्रकार-शारदाचरण

माता भारत

By आनंद कुमारस्वामी

कभी की बात है, एक स्त्री थी- लंबी और गोरी. एकदम निर्मल, धैर्य और कृपा की प्रतिमूर्ति ! ना, वह युवती नहीं थीऐसा तो कोई सोच भी नहीं सकता। बीते बरसों में उसकी विद्या-बुद्धि की धूम थी, दुनिया भर से ज्ञानीजन आते, उसके चरणों में बैठते और उसकी सीख दुनिया के कोने-कोने में ले जाते. लेकिन अब उसकी उम्र ढलान पर थी, तनिक थकान हावी होने लगी थी और उसकी आंखों की ज्योति किसी ध्रुवतारे की तरह बस उन्हीं चंद सयानों को राह दिखा पा रही थी जो अब भी आभास के पीछे का यथार्थ देख पाने में सक्षम थे. लेकिन, वह धनी थी और बहुतों ने उसका हाथ मांगना चाहा और इनमें से एक जिससे उसे रंचमात्र ही प्रेम था, बरसों तक उसकी काया का स्वामी बना रहा. फिर एक और आया, इस अनजान प्रणय-याचक ने वादे किए स्वतंत्रता और शांति के, उसकी संतानों की सुरक्षा के. और, उसने विश्वास करके उसे अपना हाथ सौंप दिया..

कुछ समय तक ठीक चला. शांति थी, उपेक्षा से उपजी हुई. उसका नया स्वामी उसके खजाने के धन-दौलत को पाकर संतुष्ट था. लेकिन जल्दी ही उसने अपनी नव ब्याहता और उसकी संतानों में ज्यादा रुचि दिखानी शुरु कर दी और स्वयं से कहा,  “इस स्त्री के आचार-विचार विचित्र जान पड़ते है, ना तो मेरी तरह हैं और ना ही मेरे लोगों की तरह, उसके विचार मेरे विचार से मेल नहीं खाते; लेकिन उसे प्रशिक्षित किया जाएगा, उसे शिक्षा दी जायेगी ताकि जो मैं जानता हूं उसे वह भी जान सके और दुनिया कहे कि मैंने उसके मन को मोड़ कर प्रगति की राह पर लगा दिया है.” वह उसकी पुराचीन ज्ञानराशि को नहीं जानता था, वह उसे दिमाग से सुस्त जान पड़ती थी और अपनी जिस व्यवहारकुशलता पर उसे गर्व था उसकी उसमें कमी जान पड़ती थी.

और ये विचार अभी उसके मन में चल ही रहे थे कि उसके(स्त्री) कुछ बच्चे उसके(नये स्वामी) विरुद्ध उठ खड़े हुए कि उनकी ताकत छिनी जा रही है और उनके आपस के बात-व्यवहार जिन नियम-कायदों से संचालित होते हैं उनके साथ छेड़छाड़ की जा रही है. इन संतानों को भय था कि उनकी प्राचीन विरासत हमेशा के लिए खत्म हो जायेगी. माता को अब भी शांति की आशा थी. उसने अपनी संतानों की पुकार नहीं सुनी बल्कि संतानों के हठ के शमन में मददगार बनी और जल्दी ही फिर शांति छा गई लेकिन जिद्दी बच्चे अपने नये पिता से प्यार नहीं करते थे और वे अपनी माता की बात समझ ना सके. उनके नये पिता ने दूसरा तरीका अपनाया, बच्चों को स्कूल में भेजा जहां उन्हें उसकी भाषा और उसके विचार सिखाये गये, बताया गया कि उसके लोग कितने महान और आत्म-दानी थे, बताया गया कि बिना किसी लाभ या प्राप्ति के उनकी माता को कैसी अशांति और दैन्य से रक्षा की गई है. बच्चों को यह भी सिखाया गया कि वे अपने प्राचीन वैभव  को भूल जायें और नई सीख की ऊंची चोटी पर चढ़ प्राचीन रंग-ढंग को तिरस्कार के भाव से देखें..

लेकिन अब एक और बात हुई, नये स्वामी से माता ने एक संतान जना और स्वामी खुश था कि वह( क्योंकि एक कन्या का जन्म हुआ था) उसके रंग-ढंग की होगी, उसके अपने लोगों की कन्या के समान. वह धनवान और रुपवान होगी, उसके अपने लोगों के पुत्र की दुल्हन बनेगी. लेकिन जब इस संतान का जन्म हुआ तो माता जैसे स्वप्न से जागी और सिर्फ अपनी बेटी की खातिर जीने लगी. बड़ी होती बेटी मां को उसके यौवन के दिनों की याद दिलाती थी. वह विदेशी स्वामी की पक्षधर नहीं थी तो भी उसमें उस(विदेशी स्वामी) जैसी ऊर्जा और व्यवहारिक मामलों की चतुराई थी. माता उससे खूब बातें करतीं, गहरी बातें! विदेशी स्वामी से यह छिपा नहीं था लेकिन उसने यह सब चलने दिया, उसने सोचा कि मैं तो बहुत महान हूं और इस महानता का तकाजा है कि जैसा चल रहा है वैसा चलने दिया जाय. उसने शिक्षक रखे, कन्या को उसने अपने लोगों के रंग-ढंग की शिक्षा दी. लेकिन मां चुपके से बेटी को प्राचीन ज्ञान सिखाती और बेटी का हृदय अपने पिता, उसके लोगों और उनके आचार-व्यवहार से दूर होता चला गया. माता को (इस बाते से) संतोष था, अब उसके केश उजले हो चले थे, उम्र के हाथो वह कमजोर हो चली थी और एक समय आया जब वह नहीं रही क्योंकि उसका काम पूरा हो चुका था. और विदेशी स्वामी भी तनिक थक चला था क्योंकि उसके अपने देश में कलह-कोलाहल था और कहा जाने लगा था कि वह पराये की जमीन पर एक निरंकुश की भांति रह रहा है. इस बात से उसे पीड़ा होती, वह सोचता कि क्या मैंने अपना जीवन दूसरों के हित ही नहीं जीया और क्या ये मजूरे लोग उसकी ताबेदारी के ही लायक नहीं?  लेकिन बेटी दृढ़ से दृढ़तर होती गई, उसे पिता की निरंकुशता जरा भी बर्दाश्त नहीं थी और वह अपने से पहले जन्म लेने वाले बच्चों के बच्चों की भी मां थी, उसे सभी माता कहते थे.  एक दिन संतानों में पुराने दिनों की तरह कोलाहल उठा. उन्होंने कहा कि राजस्व वसूलने और हमारे मस्तिष्क पर सीखे उकेरने वाले इस विदेशी स्वामी की हमें जरुरत नहीं. लेकिन बड़ी सख्ती से उन्हें कुचल दिया गया, कुछ को जेल हुई, कुछ के साथ इससे भी बुरा हुआ क्योंकि पिता पराने रंग-ढंग(दंड और पुरस्कार की नीति पर चलने वाला) का था. उसे लगता मातहत लोगों की जीवन और मृत्यु पर उसका अधिकार नहीं होना अनुचित है. लेकिन बच्चे अब उसकी निरंकुशता सहने को तैयार नहीं थे क्योंकि उसने स्वयं ही भूलवश सिखा दिया था कि राजा-रजवाड़े के दिन अब खत्म हो चुके हैं. उसने स्वतंत्रता के सपने देखना सिखा दिया था.

ये सारी दुश्वारियां उस पर सवार थीं, वह बूढा होकर थक चला था और नवयुवती माता( क्योंकि उसने कहा था कि वह सबकी मां होगी लेकिन ब्याहता किसी की नहीं) ने सब संतानों की मदद की. उसने सबको एक-दूसरे से प्रेम करना और एक-दूजे की मदद करना और अपने को मां पुकारना सिखाया. उसने विदेशी स्वामी को छोड़ दिया और अलग जाकर रहने लगी जहां बच्चे उससे राय-सलाह के लिए आते. और जब तक विदेशी स्वामी इसे रोकता, वह वहां नहीं रहती बल्कि कहीं और चली जाती. ऐसा जान पड़ता कि वह ना यहां है ना वहां बल्कि वह हर जगह है.

यह कहानी अभी समाप्त नहीं हुई है लेकिन अंत दूर नहीं है और उसे देखा जा सकता है..

( ऐसेज इन नेशनल आयडिलिज्म– आनंद कुमारस्वामी, 1909, जी ए नेटसन एंड कंपनी, मद्रास में संकलित एक आलेख और इसका हिंदी अनुवाद चंदन श्रीवास्तव द्वारा किया गया है.  )

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‘निपट मानव, अतर्क्य’ गांधी: चंदन श्रीवास्तव

महात्मा गांधी से प्रभावित अंग्रेजों की ना तो गांधी के जीवित रहते कमी थी और ना ही आज. और, गांधी-कथा का वैचित्र्य देखिए कि गांधी के असर में आये अंग्रेजों को, ब्रिटिश सत्ता से लड़ाई के उन दुश्वार दिनों में भी लगता था कि गांधी को समझना मुश्किल है और यही स्थिति आज भी है, जब भारत आजाद होकर ब्रिटिश-साम्राज्य के अधीन रहे ‘राष्ट्रकुल’ के देशों में प्रेम-भाव से शामिल है. मिसाल के लिए आज की ब्रिटिश संसद के नेता-प्रतिपक्ष जेरेमी कोर्बिन या बीते कल में ब्रिटिश-सत्ता का हिस्सा रहे साहित्यकार-पत्रकार जार्ज ऑरवेल का नाम लिया जा सकता है. #लेखक 

By R.K. Lakshman

By R.K. Lakshman

गांधी: प्रश्न भी, समाधान भी !
जेरेमी कोर्बिन ब्रिटेन की लेबर पार्टी के नये नेता चुने गये हैं. इस साल सितंबर के पूरे महीने हिन्दुस्तानी अखबारों के विदेश से संबंधित पन्नों पर कोरिबन की चुनावी जीत की खूब चर्चा हुई. तकरीबन तीन दशक से ब्रिटेन के हाऊस ऑफ कॉमन्स में सांसद की हैसियत से मौजूद जेरेमी कोर्बिन की जीवन-कथा के अनेक प्रसंग अनायास ही गांधी की याद दिलाते हैं. गांधी के बारे में मशहूर है कि वे भरसक रेलगाड़ी के साधारण डिब्बे में चलना पसंद करते थे और यही हाल कोर्बिन का है. वे साइकिल से चलते हैं, कार नहीं रखी और चुनाव-प्रचार की घड़ी में एक तस्वीर ऐसी भी छपी जिसमें वे ब्रिटेन की भीड़ भरी लेटनाइट बस में जन-साधारण के बीच इस इंतजार में खड़े नजर आये कि कोई सीट खाली हो तो छियासठ साल के अपने बुढ़ापे की थकान को उसपर संयत कर सकें. गांधी ने बैरिस्टरी की पढ़ाई के लिए ब्रिटेन जाने को आतुर अपने बड़े बेटे हरीलाल को रोककर पारिवारिक जीवन में कटुता पैदा की. उन्हें लोगों से कहना पड़ा कि ‘हरीलाल की परेशानी से पार पाना उनके लिए आजादी की लड़ाई लड़ने से ज्यादा कठिन है’. बच्चे की पढ़ाई को लेकर कोर्बिन ने भी अपने पारिवारिक जीवन में कड़वाहट घोली है. पत्नी से उनकी अनबन इस बात को लेकर हुई कि पढ़ाई के लिए बच्चे का नाम किस स्कूल में लिखवायें. पत्नी एक महंगे स्कूल में बच्चे का नाम लिखवाना चाहती थीं जबकि कोर्बिन सरकारी स्कूल में नाम लिखवाने के हक में थे. समाजवाद के अपने सिद्धांत से निजी जीवन में ना डिगने का व्रत लिए बैठे जेरेमी कोर्बिन का इस बात पर पत्नी से मतभेद इतना बढ़ा कि नतीजा तलाक के रुप में सामने आया.
गांधी निजी और सार्वजनिक जीवन में बाकी बातों के साथ-साथ अपनी किफायतशारी के लिए भी जाने जाते हैं.गांधी-प्रेमी बताते हैं कि गांधीजी ने अनेक चिट्ठियां इस्तेमालशुदा लिफाफों की खाली जगह पर लिखी और फाउंटेन पेन आ जाने के बावजूद सैकड़ों चिट्ठियों को लिखने में दावात में डुबोकर लिखनेवाली कलम का ही इस्तेमाल किया कि खर्चा कम पड़ेगा. कम-खर्ची गांधी की राजनीति से इस हद तक बंधी है कि स्वराज्य के मायने तलाशने के लिए 21 वीं सदी में बारंबार पढ़ी जाने वाली उनकी किताब हिन्द-स्वराज में आता है—‘जब तक हम हाथ से आलपिन नहीं बनायेंगे तबतक हम उसके बिना काम चला लेंगे. झाड़-फानूस को आग लगा देंगे. मिट्टी के दीये में तेल डालकर और हमारे खेतों में पैदा हुई रुई की बत्ती बनाकर दीया जलायेंगे. ऐसा करने से हमारी आंखे(खराब होने से) बचेंगी, पैसे बचेंगे, हम स्वदेशी रहेंगे, बनेंगे और स्वराज की धूनी रमायेंगे..’ कोर्बिन की किफायतशारी इस दर्जे की तो नहीं तब भी इतनी तो है ही कि ब्रिटेन के अख़बारों ने उन्हें निजी जरुरत के नाम पर राजकोष से सबसे कम खर्च लेने वाले सांसद के रुप चिह्नित किया . सांसदों के अनाप-शनाप खर्च के दावों और घोटालों से जूझती ब्रिटेन की संसद से जेरेमी कोर्बिन ने साल 2010 में  मई से अगस्त के बीच एक सांसद के रुप में अपने प्रिन्टर के लिए सिर्फ स्याही का खर्चा मांगा था.
जेरेमी कोर्बिन के जीवन-प्रसंगों से गांधी के जीवन-प्रसंगों के बीच तारतम्य बैठाने की यह कोशिश अगर ठीक ना लगे तो यह सोचकर दिल बहलाया जा सकता है कि दोनों के बीच एक रिश्ता फिर  भी बनता है क्योंकि कोर्बिन कोगांधी फाउंडेशन ने दो साल पहले अपने अंतर्राष्ट्रीय शांति सम्मान से नवाजा और प्रशस्ति में कहा कि कहा कि यह सम्मान कोर्बिन को सांसद के रुप में तीस साल तक  ‘सामाजिक न्याय और अहिंसा जैसे गांधीवादी मूल्यों के लिए लगातार कोशिश’ करते रहने के लिए दिया जा रहा है. सम्मान को स्वीकार करते वक्त कोर्बिन ने अपने गांधी-प्रेम में जो कुछ कहा उसमें मार्के की एक बात यह भी शामिल थी कि ‘गांधी उन लोगों में एक हैं जिनको लेकर  लगता है कि हम तो उन्हें जानते हैं लेकिन गांधी को जितना पढ़ो उतना ही मन में यह बोध गहरा होता जाता है गांधी के बारे हम बहुत कम जानते और समझते हैं ’.
जेरेमी कोर्बिन का एक अनौपचारिक रिश्ता जार्ज ऑरवेल से भी बनता है. नौजवान होते कोर्बिन को पिता ने सोलहवें जन्मदिन पर ऑरवेल के लेखों की एक किताब भेंट की थी. यह तो दावा नहीं किया जा सकता कि गांधी की आत्मकथा की समीक्षा के बहाने लिखा गया ‘रिफ्लेक्शन्स ऑन गांधी’ नाम का ऑरवेल का लेख उस किताब में शामिल था या नहीं लेकिन यह जरुर कहा जा सकता है कि गांधी को लेकर जैसा ऊहा-पोह कोर्बिन के भाषण में है कुछ वैसी ही मनोदशा लेख में ऑरवेल की है. ऑरवेल गांधी को शब्द-बद्ध करने के लालच से बच भी नहीं सकते थे. आखिर उनका जन्म इंडियन सिविल सर्विस के एक महकमे(अफीम) में करने वाले नौकरशाह के घर बेटे के रुप में हुआ और खुद भी म्यांमार(तत्कालीन बर्मा) में इंडियन इम्पीरियल पुलिस में एक वक्त तक मुलाजिम थे.( नियति का विधान कहिए कि ऑरवेल का जन्म मोतिहारी में हुआ जहां से गांधी की आंदोलन-भूमि रहे चंपारण की दूरी कायदे से पचास किलोमीटर भी नहीं). गांधी की आत्मकथा को पढ़कर ऑरवेल के मन में वही शंका जागती है जो शासक और संत या कह लें त्याग और भोग के बीच फर्क देखने वाले लोगों के मन में जागा करती है. उनका लेख इस केंद्रीय प्रश्न से शुरु होता है कि गांधी संत हैं या राजनेता. ऑरवेल को लगता है गांधी का मूल्यांकन यह प्रश्न पूछकर होना चाहिए कि इन बुजुर्ग ने चटाई पर पालथी मार, प्रार्थना में डूबकर हासिल की जाने वाली ‘अध्यात्म की शक्ति से ब्रिटिश-साम्राज्य को कहां तक हिलाया और “राजनीति में घुसकर, जो कि स्वभाव से ही ताड़न और छल-छद्म से बंधी है अपने सिद्धांतों के साथ कहां तक समझौता किया.” ऑरवेल को लगता है कि गांधी ने आत्मकथा अपनी संतई के पक्ष में लिखी है क्योंकि वह पाठक को “याद दिलाती है कि इस संत के भीतर बहुत चतुर और समर्थ आदमी छुपा था जो चाहता तो एक सफल वकील, प्रशासक या फिर बनिया बनकर उभरता.” गांधी को संसारी बनाम संन्यासी के द्वैत में देखने के कारण ऑरवेल को इस बात का मलाल है कि पश्चिम की वामधारा की राजनीति में यह मानने का फैशन-सा चल पड़ा है कि गांधी उसके एक तरह से ‘अविभाज्य हिस्से हैं. खासकर, शांतिवादी और अराजकतावादी यह देखकर कि गांधी केंद्रीकरण और राजसत्ता के हिंसाचार के विरोधी थे, उन्हें अपना मान बैठते हैं और गांधी के सिद्धांतों के अ-संसारीपन और मानवता-विरोधी प्रवृतियों की अनदेखी करते हैं.’ कहना मुश्किल है कि पश्चिम की वामधारा की राजनीति से जुड़े कोर्बिन के मन में गांधी के सिद्धांतों के संदर्भ में ऑरवेल द्वारा प्रयुक्त शब्द ‘मानवता-विरोधी’ को पढ़कर क्या प्रतिक्रिया होगी लेकिन अगर यह शब्द आंखों को खटके तो फिर खटक को दूर करने का एक सूत्र ऑरवेल के लेख में ही मौजूद है. गांधी की संतई पर कटाक्ष करते हुए ऑरवेल लिखते हैं- ‘ बेशक, दारु, तंबाकू जैसी चीजों से किसी संत को जरुर ही बचना चाहिए लेकिन संतई ऐसी शै है जिससे मनुष्य-मात्र को बचना चाहिए.’
अगर गांधी के संदर्भ में बहु-प्रयुक्त संत बनाम राजनेता का यही द्वैत विदेश में आज के कोर्बिन और बीते कल के ऑरवेल के लिए गांधी को अबूझ बनाता है तो देश में गांधी की राजनीति के संगी-साथियों या फिर संगी-साथियों से समानान्तर दूरी बनाकर गांधी की राजनीति को साक्षी-भाव से देखने वाले साहित्यकारों को भी. नेहरु ने स्वीकार किया है कि ‘गांधी को समझ पाना बहुत मुश्किल है. कभी-कभी उनकी भाषा एक औसत आधुनिक के लिए तकरीबन अबूझ हो जाती है.’’ ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्जे मैक्डोनाल्ड ने जब वंचित तबकों के लिए पृथक निर्वाचक-मंडल की मंजूरी दी और गांधी ने विरोध में आमरण-अनशन की ठानी तो नेहरु को अचरज हुआ. गांधी के इस फैसले को याद करते हुए उन्होंने लिखा है- “राजनीतिक प्रश्नों पर उनके धार्मिक और भावुक रुख और इस मामले में बार-बार ईश्वर की दुहाई देने को लेकर मुझे  क्रोध आता था. वे तो  यह जताता जान पड़ते थे कि ईश्वर ने उन्हें उपवास के दिन के बारे में संकेत किया है. कितनी खराब बात है यह !.”
‘संत होकर आधुनिक नहीं हुआ जा सकता और चूंकि आधुनिक नहीं हुआ जा सकता इसलिए व्यक्ति-सत्ता को प्रतिष्ठित करने वाली लोकतांत्रिक राजनीति भी नहीं की जा सकती’—इस सोच ने गांधी के संगी-साथियों की आंखों में गांधी को अबूझ बनाया. नेहरु के प्रतिस्पर्धियों में से एक आचार्य कृपलानी की गांधी पर लिखी किताब ‘गांधी: हिज लाइफ एंड थॉट’ के एक अध्याय का शीर्षक ‘वाज गांधीजी माडर्न’ बहुत कुछ यही बताता प्रतीत होता है. कृपलानीगांधी के अन्यतम साथियों में हैं. ‘भारत का भावी प्रधानमंत्री कौन’- इस सवाल पर आजादी की विहान-वेला में जब कांग्रेस के भीतर मतदान हुआ तो सरदार पटेल के बाद आचार्य कृपलानी के पक्ष में सर्वाधिक मत पड़े थे लेकिन गांधीके निर्देश पर दोनों ने नेहरु के पक्ष में अपना नाम वापस लिया था. कहते यह भी हैं कि गांधी के ‘गांव-गणराज्य’ के सपने से कांग्रेस को दूर जाता देखकर उन्होंने पार्टी छोड़ी और अपने को ‘कुजात गांधीवादी’ कहने वाले लोगों की राजनीतिक-धारा में शामिल हुए. जीवन की आखिरी सांस भी उन्होंने साबरमती आश्रम में ली.
नेहरु की पश्चिमी तर्ज की आधुनिकता पर किसी और को कोई शक हो तो हो लेकिन कृपलानी के मन में रंच-मात्र ना था. उन्होंने नेहरु की पश्चिमी काट की आधुनिकता को गांधी की देशज आधुनिकता के बरक्स रखकर चुटकी लेते हुए लिखा है—“जवाहरलाल के सोच की धारा पश्चिमी थी, उनकी जीवन-दृष्टि दोलायमान थी, कभी भारत की तरफ डोल जाती थी तो कभी पश्चिम की तरफ. जन-साधारण के मुहावरे में व्यक्त गांधीजी के विचार पश्चिम से बहुधा प्रभावित होने के बावजूद मुख्य रुप से भारतीय थे.” दिलचस्प यह है कि गांधी को आधुनिक बताने के लिए जब वे दलील देते हैं तो उनका चित्त भी उसी तरह दोलायमान होता है जैसा कि उन्होंने नेहरु के संदर्भ में लक्ष्य किया है और वे गांधी के ‘सत्य’ की खोज को गुण-धर्म में प्रयोगशालाओं की परखनली में खोजे जाने वाले वैज्ञानिकों के सत्य के बराबर मान बैठते हैं, मानो अंतिमत्ता का दावा ना करने भर से प्रयोगशालाओं का सत्य उसी तरह ईश्वर में विश्वास की निष्पत्ति हो जैसे कि गांधी का सत्य.
कृपलानी लिखते हैं कि गांधीजी अरुप ईश्वर के विश्वासी थे लेकिन “क्या ईश्वर में विश्वास तर्कयुक्ति(रैशनलिटी) और विज्ञान(साईंस) के विरुद्ध है? सभी महान वैज्ञानिक नास्तिक हैं. वे मानते हैं कि सब कारणों के एकमात्र कारण जो स्वयं कारणहीन हैं, से विज्ञान का कोई लेना-देना नहीं है. दरअसल, आज के वैज्ञानिकों ने तो कारणता के विचार को ही छोड़ दिया है. वे मात्र परिवर्तन की प्रक्रियाओं को खोजते और पकड़ते हैं. न्यूटन, आईन्सिटीन, जे सी बोस, रमण और कई अन्य ईश्वर में विश्वास के पक्षधर हैं, वे सिर्फ प्रयोगशालाओं के भीतर ईश्वर को लेकर नहीं जाते और उनकी खोज सत्य की खोज थी जो कि गांधी के अनुसार ईश्वर है !” चूंकि विज्ञान का सत्य प्रयोग का विषय है, उसका बारंबार प्रक्रियाबद्ध अनुसंधान किया जाता है, वह अंतरिम ही होता है, अंतिम नहीं और गांधी के सत्य के प्रयोग में भी अनिवार्य रुप से यही गुण मिलते हैं इसलिए गांधी आधुनिक मानव हैं, चिर-पुरातन का साक्ष्य देते महात्मा नहीं— कृपलानी के इस तर्क का एक इस्तेमाल गांधी के अध्येता भीखू पारेख ने भी किया है. इस तर्क की मुश्किल यह है कि अंतिम तौर पर वह आधुनिकता के मूल्यों को विज्ञान से ही सिद्ध मानता है धर्म से नहीं और दूसरे स्वयं गांधी का लिखा-कहा इस स्थापना से मेल नहीं खाता. गांधी सत्य की अपनी तलाश को ईश्वर की अपनी धारणा की अनिवार्य निष्पत्ति बताते हैं.
गांधी के सत्य के बारे में जो बात राजनेता आचार्य कृपलानी और राजनीति-विज्ञानी भीखू पारेख नहीं लक्ष्य कर पाये आश्चर्यजनक तौर पर वह बात गांधी-भावी साहित्यकार जैनेन्द्र ने भांप ली थी. लगभग पाँच दशक पहले छपी किताब ‘अकालपुरुष गांधी’ में जैनेन्द्र के गांधी विषयक सोच-विचार संकलित हैं. किताब की प्रस्तावना के लेखक धर्मवीर ने नोट किया है कि जैनेन्द्र की गिनती हालांकि गांधीवादियों में होने लगी है लेकिन वादी तो क्या जैनेन्द्र अपने को ‘गांधी का अनुयायी कहने में भी संकोच’ करते हैं और जैनेन्द्र की विशिष्टता के उल्लेख में लिखा है कि वे ‘उन चिन्तक साहित्यकारों में हैं जिन्होंने अपनी निजता खोये बिना गांधी-विचार को जांचा परखा है ’. किताब में एक लेख है ‘निपट मानव गांधी’. लेख का शीर्षक अपने आप में इस बात की सूचना है कि लेखक ने गांधी के ऊपर महात्मा का चोला नहीं ओढ़ाया बल्कि उन्हें ‘निपट मानव’ ही मानकर सोच-विचार किया है. गांधी ने स्वयं के किसी अनूठेपन या मौलिकता का दावा नहीं किया लेकिन जैनेन्द्र को गांधी में अनूठापन दिखता है अनूठापन इस बात का कि गांधीको “विज्ञान और शास्त्र ना ढंक पाता है, ना खोल ” पाता है. इसलिए “गांधी को वैज्ञानिक प्रणालियों से पाना अंसभव” है  जैनेन्द्र को लगता है कि गांधी सांसारिक नियमों के अनुसार नहीं हैं. सांसारिकों के बारे में तो “मनस्तत्व विज्ञानी वे नियम प्रस्तुत कर सके हैं जो बता देते हैं कि एक आदमी और सब आदमी क्यों और किन प्रेरणाओं के अधीन विविध वर्तन कर रहे हैं ” लेकिन गांधी बारे में यह नहीं बताया जा सकता. गांधी विरले लोगों में हैं, जैनेन्द्र के शब्दों में—“अतर्क्य पुरुष” जिनकी “कुंजी लाख खोजने पर भी दुनिया की नजर में नहीं चढ़ती ”.
गांधी को अतर्क्य पुरुष क्यों कहा जैनेन्द्र ने ? वे गांधी का ईश्वर विषयक कथन उद्धृत करते हैं—“गांधीजी ने एक बार कहा मेरा सबकुछ ले लो मैं रहूंगा. हाथ काट लो, आँख कान ना रहें तब भी रहूंगा. सिर जाये तब भी कुछ पल रह जाऊं. पर ईश्वर गया कि तब तो मैं उसी दम मरा हुआ हूं.” गांधी का ईश्वर विषयक यह कथन ही उनके अतर्क्य होने का कारण है. जैनेन्द्र के शब्द हैं- “यह बात पढ़ने में चमत्कारी लगती है पर समझ में भी वह बंधकर बैठती है क्या. ईश्वर के मंदिर हों और उसकी पूजा हुआ करे, यहां तक तो ठीक है. इससे आगे नित्य-प्रति के काम से संबंध रखने वाली बुद्धि और तर्क की भाषा इस ईश्वर को अपने में कहां बैठाये. परिणाम यह कि समूचे जीवन की वह नीति जो ईश्वर-पूर्वकता से आरम्भ होती है गांधीजी तक सीमित जान पड़ती है. व्यवहार से गांधी जी की समाज-नीति अनमिल और असिद्ध लग आती है. उसमें तर्क का साफ सूत नहीं मिलता. लौकिक और गांधीजी के बीच का यह भेद मौलिक है. किसी तरह के ऊपरी तर्क से इस भेद को उड़ा देना खतरनाक हो सकता है.”
इस भेद को दुनिया उड़ा देती है इसी कारण गांधी को समझ नहीं पाती—“धर्मवादी और ईश्वरवादी जो संसार को बंधन मानकर उनसे उत्तीर्ण होना चाहता है गांधीजी की तरफ आशा भरी निगाह से देखता है. पर यही पवित्रता का साधक उस समय गांधीजी को नहीं समझ पाता जब वे राजनीति के प्रपंचों में दीखते हैं और तरह तरह के कर्म की विराट योजनाओं का संचालन करते हैं. दूसरी और संसार में(उसके सुधार में) लगे हुए प्रकार-प्रकार के वादी कर्मीजन इस कर्मण्य और प्रतापी पुरुष गांधी को देखकर उत्साहित होते हैं. जो सत्ता उन्हें इष्ट है वह गांधी जी को सिद्ध है. फिर भी राज को लेकर जो तरह-तरह के तंत्रवाद मिलते हैं और समाज के निमित्त से जो समाजवाद और साम्यवाद मिलते हैं,उनमें से किसी एक को छोड़कर किसी दूसरे का समर्थन गांधीजी से नहीं मिलता.” जैनेन्द्र का निष्कर्ष है कि “जीवन के विभक्त दर्शनों के लिए, अध्यात्मवाद और भौतिकवाद के लिए, गांधी एक ही साथ प्रश्न और समाधान हैं. राजनीति और धर्म में भेद है, विग्रह भी है. लेकिन गांधीजी उन दोनों के अभेद हैं और संग्रह हैं. वह जीवित उदाहरण हैं इस सत्य के कि जीवन संयुक्त, समग्र और सिद्ध है तो वहां जहां वह निस्व है…इस मूल निष्ठा को पाकर फिरगांधीजी का बस एक प्रयत्न रहा है. वह यह कि अपने समूचेपन और तन को लेकर उस निष्ठा से तत्सम हो जायें…इस तरह दुनिया में रहकर गांधीजी सदा परीक्षा में हैं और उनके हाथो में राजनीति भी सदा परीक्षा में.”
अद्भुत रुप से जैनेन्द्र के इस गांधी-विवेचन में गांधी के एक आत्म-वक्तव्य की गूंज सुनायी देती है. ‘निपट मानवगांधी’ शीर्षक लेख के लिखे जाने के बरसों पहले यह आत्म-वक्तव्य गांधी ने डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन को उनके प्रश्न के उत्तर के रुप में दिया था. यह छपा ‘कंटेपररी इंडियन फिलॉस्फी’ नाम की किताब में. किताब लंदन में 1936 में डा राधाकृष्णन के संपादन में छपी. छापने का उद्देश्य था “पूरब और पश्चिम के समग्र मानस की श्रेष्ठतर पारस्परिक समझ” बनाना. और इस उद्देश्य की पूरा करने के लिए भारत के तत्कालीन प्रतिनिधि दार्शनिक के तौर पर महात्मा गांधी, रबीन्द्र टैगोर, स्वामी अभेदानंद, हरिदास भट्टाचार्य, के सी भट्टाचार्य, जी सी चटर्जी, आनंद कुमारस्वामी, एन जी दामले, भगवान दास, रास बिहारी दास और सुरेन्द्रनाथ दासगुप्ता समेत पच्चीस चिन्तकों के आलेख छापे गये.  पहला ही तकरीबन 500 शब्दों का आलेख आत्म-वक्तव्य के रुप में गांधी का है. गांधी के इस आत्म- वक्तव्य को महत्वपूर्ण मानने की वजह है इसका परिवेश. गांधी ने यह आत्म-वक्तव्य किसी तात्कालिक राजनीतिक समस्या के दबाव में प्रस्तुत नहीं किया था. ना ही यह वक्तव्य पक्ष-प्रतिपक्ष के वैसे द्वन्द्व का परिणाम है जैसा कि गांधी की किताब हिन्द स्वराज में देखने को मिलता है. हिन्द-स्वराज के पात्र ‘संपादक’ और ‘पाठक’  के वाद-विवाद अपने पैनेपन में भले बेजोड़ लगें लेकिन वहां तर्कों का पैनापन प्रतिपक्षी को तर्क के सहारे ध्वस्त करने की मंशा का परिणाम है, सत्य के भावना-निरपेक्ष अनुसंधान का नहीं. हिन्द-स्वराज में घोषित तौर पर द्वन्द्व पूरब और पश्चिम के बीच है जबकि ‘कंटेपररी इंडियन फिलॉस्फी’ का घोषित उद्देश्य ‘पूरब और पश्चिम के समग्र मानस की श्रेष्ठतर समझ’ बनाना है.
‘कंटेपररी इंडियन फिलॉस्फी’ के लिए राधाकृष्णन ने गांधी से तीन सवाल पूछे थे- (क) आपका धर्म क्या है, (ख) आप धर्म में कैसे प्रवृत्त हुए, और (ग) सामाजिक जीवन पर इसका क्या असर रहा है ? प्रश्नों की प्रकृति से ही संकेत मिलते हैं राधाकृष्णन ने गांधी को धर्मप्राण मानकर सवाल किए. गांधी का उत्तर इसके अनुकूल ही था. गांधी ने पहले सवाल के जवाब में लिखा “मैं धर्म से हिन्दू हूं जो मेरे लिए मानवता का धर्म है और जिसमें मुझे ज्ञात सारे धर्मों का श्रेष्ठतम् शामिल है. ” दूसरे प्रश्न के उत्तर में बताया—“मैं इस धर्म में सत्य और अहिंसा यानी व्यापक अर्थों में प्रेम के रास्ते प्रवृत्त हुआ. यह कहने की जगह कि ‘ईश्वर सत्य है’, हाल-फिलहाल मैंने अपने धर्म को परिभाषित करने के लिए ‘सत्य ईश्वर है’ कहना शुरु किया है… क्योंकि ईश्वर का नकार तो ज्ञात है लेकिन सत्य का नकार नहीं. यहां तक कि मनुष्यों में जो सर्वाधिक अज्ञानी हैं, उनमें भी कुछ सत्य है. हम सब सत्य की कौंध हैं. इस कौंध का सकल-समग्र अनिर्वचनीय -अब तक अज्ञात सत्य, जो कि ईश्वर है. मैं अनवरत प्रार्थना के सहारे रोज ही इसके निकट पहुंचता हूं.” और तीसरे प्रश्न के उत्तर में गांधी ने बिल्कुल उसी शब्द का प्रयोग किया जिसका अपने गांधी-विवेचन में जैनेन्द्र ने किया है.गांधी ने कहा—“ऐसे धर्म के प्रति सच्चा होने के लिए प्रत्येक जीवन की अनवरत-अविराम सेवा में स्वयं को निस्व करना पड़ता है. सत्य का साक्षात्कार जीवन के अनंत सागर में विलीन हुए और इससे तदाकार हुए बिना असंभव है, इसलिए समाज-सेवा से मेरी निवृति नहीं है.”
गांधी नाम की जो पहेली गांधी के अनुगामियों और अध्येताओं के बीच उलझती जाती है, जैनेन्द्र जैसा सरीखा अपनी निजता को बरकरार रखने वाला साहित्यकार उसे सुलझा लेता है. क्या यह भी कवि के रवि से आगे होने का एक साक्ष्य नहीं है !

चंदन श्रीवास्तव

चंदन श्रीवास्तव

मूलतया छपरा (बिहार) के निवासी, पिछले पंद्रह सालों से दिल्ली में। आईआईएमसी और जेएनयू में पढ़ाई। “उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हिन्दी लोकवृत्त का निर्माण” शीर्षक से पीएचडी, दिल्ली के कॉलेजों में छिटपुट अध्यापन, फिर टीवी चैनल की नौकरी और अब विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सीएसडीएस) की एक परियोजना इंक्लूसिव मीडिया फॉर चेंज से जुड़े हैं। इनसे  chandan@csds.in पर संपर्क संभव है। 

ग्लोबल गांव और गायब होता ‘देश’: चंदन श्रीवास्तव

बौद्धिक-दरिद्रता के हिंदी-समय में ‘बौद्धिक’ सी लगने वाली सूचनाएं भी किस तरह आक्रान्त करती हैं यह देखना हो तो रणेंद्र के उपन्यासों यथा, ‘ग्लोबल गांव के देवता’ और ‘गायब होता देश’ के इर्द-गिर्द होने वाली बहुसंख्यक चर्चाओं को देख सकते हैं. चर्चाओं में उफान ऐसा है मानों रेणु के बाद ग्राम्य-अंचल की आत्मा को उकेरने वाला कोई उपन्यासकार हुआ तो बस रणेन्द्र और मैला आँचल के बाद अगर आंचलिकता की सतरंगी चूनर कहीं बुनी गई तो सिर्फ ‘ग्लोबल गांव के देवता में’। इन चर्चाओं के पीछे के मनोविज्ञान को भी समझने की जरुरत है. यह मनोविज्ञान ‘राजनीतिक सहानुभूति’ मात्र को कला का स्थानापन्न मानने का हामी है जबकि हिंदी कथा-साहित्य के एक मूर्धन्य और विश्वसनीय आलोचक सुरेंद्र चौधरी ने कहीं कहा है कि ‘राजनीति को आप सहानुभूति दें, इससे बेहतर ये है कि राजनीति को जीएं, जीने वाले चरित्र गढ़ें, जीने वाली परिस्थितियाँ तैयार करें.’ रणेंद्र संबंधी तमाम चर्चाओं से जो बाते सिरे से गायब दिखती है वे हैं, उपन्यास की बुनावट, आख्यान का निर्वाह और कहानीपन। चंदन श्रीवास्तव अपने इस आलेख में इन्हीं झोलों पर से पर्दा उठाने का काम करते हैं. उपन्यासकार जितनी मेहनत अपने लिपिक-व्यक्तित्व से करवाता है उसका दसवां भी कथा गढ़ने में मदद करने वाली कल्पना के तंतुओं से नहीं करवा पाता है. इन उपन्यासों में कल्पना के तंतुओं का सिरे से स्थगन दिखता है. पठार की किस्सागोई ‘पठार का धीरज’ की भी मांग करती है जबकि रणेन्द्र के दोनों उपन्यास ‘तुरंता-फुरंता’ हरकत से पीड़ित हैं। #तिरछीस्पेल्लिंग 

By उदय शंकर

By उदय शंकर

राजनीतिक नक्शे में गायब होता उपन्यास

By चंदन श्रीवास्तव

कथा को परखना हो तो बेहतर यही है कि नजर कथा पर हो ना कि कथाकार पर। कथाकार पर नजर टिकाकर कथा परखने की कई मुश्किलें हैं, जैसे कथाकार अज्ञात भी हो सकता है और अगर अज्ञात ना हो तो भी झंझट बनी रह सकती है बशर्ते अपने लिखे को लेकर उसका नजरिया हमारे पास मौजूद ना हो।  लेखक अज्ञात ना हो, लिखे को लेकर उसका नजरिया मालूम हो तो भी मुश्किल खत्म नहीं होती। एक कठिनाई तो यही देखने की आन खड़ी होती है कि अपनी लिखाई में कथाकार रचना विषयक अपनी दृष्टि को ठीक-ठीक पिरो पाया है कि नहीं और जो ठीक-ठीक अपनी रचना-दृष्टि को कथाकार कथा में पिरो पाया हो तो भी यह सवाल तो बना ही रहेगा कि खुद कथाकार की रचनादृष्टि को उसकी कथा के बारे में निर्णय देते हुए महत्वपूर्ण क्यों मानें ? लिहाजा, अच्छा तो यही होगा कि ‘ग्लोबल गांव के देवता’ या ‘गायब होता देश’ पढ़ते हुए आप रचनाकार रणेन्द्र को भुलाये रखें लेकिन ये उपन्यास और रणेन्द्र दोनों ऐसा होने नहीं देते। वजह, ‘ग्लोबल गांव के देवता ’ और ‘गायब होता देश’ की संज्ञानात्मक बनावट अपने रचनाकार रणेन्द्र के राजनीतिक मानस की बनावट से एकदम बंधी हुई है। चाहें तो कह लें कि इन उपन्यासों और उपन्यासकार की एक दलील यह भी है कि रचनाकार के राजनीतिक मानस को परखने के साथ उसकी रचना के औचित्य को भी परखना संभव हो जाता है।

दोनों उपन्यासों के रचना-संदर्भ के रुप में रणेन्द्र के राजनीतिक मानस की बनावट को समझने के लिए एक पत्रिका में प्रकाशित उनके साक्षात्कार की पंक्तियां सहायक हो सकती हैं। तहलका पत्रिका ने 31 मार्च 2014 के अंक में रणेन्द्र से प्रश्न किया कि ‘आज आदिवासी समाज के संकट और उनकेसंघर्ष देश के व्यापक समाज के संकट और संघर्षों के प्रतिनिधि लगते हैं, ऐसा क्यों ? रणेन्द्र को इस प्रश्न के उत्तर में अर्थशास्त्री अमित भादुड़ी का एक पद ‘विकास का आतंकवाद’ याद आया और ‘विकास के आतंकवाद’ की अपनी व्याख्या में उन्होंने जो कहा उसका सार-संक्षेप यह कि आजादी के तुरंत बाद नेहरू-महालानोबिस मॉडल की विशालकाय परियोजनाएं आधुनिक तीर्थस्थल बन कर अवतरित हुईं। इस विकास की बलिवेदी पर जिस समुदाय ने सबसे ज्यादा शहादतें दीं वह आदिवासी समुदाय था.1991 के बाद विकास की गति बहुत ज्यादा तेज हो गई है. वैश्वीकृत बाजार में मध्यवर्ग की घोषणाएं आसमान छू रही हैं। अतः सारा लौह अयस्क, बॉक्साइट, तांबा, यूरेनियम आज ही चाहिए. नतीजतन 1991 ईस्वी के पहले कंपनियों को निर्गत खनन पट्टों की संख्या कुछ सौ थी वह बढ़कर आज कुछ हजार हो गई है।  रणेन्द्र को लगता है कि “जितने मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टेंडिंग झारखंड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, मध्य प्रदेश, कर्नाटक आदि राज्यों में हुए हैं, अगर वे जमीन पर उतर गए तो विस्थापन नहीं विपदा आ जाएगी, एक जलजला आ जाएगा।”

‘विकास के आतंकवाद’ के कल और आज में रणेन्द्र फर्क करते हैं। उन्हें लगता है कि जब तक बड़े बांधों, कारखानों, खनन परिसरों के लिए आदिवासी इलाकों में जमीनें जबरिया छीनी जा रही थीं तो मुख्यधारा को कोई फर्क नहीं पड़ रहा था लेकिन “आज तो रियल एस्टेट का दिल भी ‘मोर-मोर’ मांग रहा है. सरकारें स्पेशल इकोनॉमिक जोन के लिए जमीनें अधिगृहीत कर रही हैं और उसे रियल एस्टेट इकोनॉमिक जोन को हस्तांतरित कर रही हैं। न जाने कितने हजार बहुफसली सिंचित कृषि भूमि इस ‘विकास के आतंकवाद’ की अजगरी आंत मे समा गई है और कितनी और निगली जानी बाकी हैं। अब जाकर मुख्यधारा को लघु-सीमांत किसानों का जीवन-आधार, भूख के विस्तार, खेत के जबरिया छीने जाने की पीड़ा की गहराई का अहसास हो रहा है. इन्हीं कारणों से आदिवासी इलाके का संकट और संघर्ष व्यापक समाज के संकट और संघर्ष का प्रतिनिधि बनता लगने लगा है।”

दोनों उपन्यास विकास के आतंकवाद की रणेन्द्र की इस व्याख्या के अनुकूल लिखे गये हैं। यों ‘ग्लोबल गांव के देवता ’ के परिचय के रुप में जिल्द पर छपी पंक्तियों को पढ़कर लग सकता है कि उपन्यास सिर्फ आग और धातु की खोज करनेवाली, धातु पिघलाकर उसे आकार देनेवाली कारीगर असुर जाति के “जीवन का संतप्त सारांश” है क्योंकि उसे “सभ्यता, संस्कृति, मिथक और मनुष्यता सबने मारा है” लेकिन उपन्यास के आखिर के पन्नों पर यह बात बिल्कुल जाहिर हो जाती है कि रचनाकार की मंशा असुर जनजाति के इस ‘शोक-संतप्त सारांश’ को ‘व्यापक समाज के संकट और संघर्ष का प्रतिनिधि’  बनाकर पेश करने की है। उपन्यास के आखिर के पन्नों पर दो मुख्य किरदार इस बात से सहमत हैं कि “ग्लोबल गांव के आकाशचारी देवता और राष्ट्र राज्य दोनों एक दूसरे से घुलमिल गये हैं। दोनों को अलगाना अब मुश्किल है..सामान्य तौर पर इन आकाशचारी देवताओं को जब अपने आकाशमार्ग से या सेटेलाइट की आंखों से छत्तीसगढ़, उड़ीसा, मध्यप्रदेश, झारखंड आदि राज्यों की खनिज संपदा, जंगल या अन्य संसाधन दिखते हैं तो उन्हें लगता है कि अरे, इन पर तो हक हमारा है। उन्हें मालूम है कि राष्ट्र-राज्य तो वे ही हैं, तो हक तो उनका ही हुआ। सो इन खनिजों पर, जंगल में, घूमते हुए लंगोट पहने असुर-बिरजिया, उरांव-मुंडा, आदिवासी, दलित-सदान दिखते हैं तो उन्हें बहुत कोफ्त होती है। वे इन कीड़ों-मकोड़ों से जल्द निजात पाना चाहते हैं। तब इन इलाकों में झाड़ू लगाने का काम शुरु होता है।”

और, उपन्यास की जिद है कि झाड़ू लगाने के काम के महाविस्तार को पाठक पूरे देश में फैला हुआ देखे। अपनी जिद के अनुकूल उपन्यास आखिर के पन्नों पर “अख़बार और पत्रिकाओं की इस तरह की खबरें” सिलेसिलेवार बताता चलता है कि “छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले से होकर बहने वाली एक बड़ी नदी शिवनाथ एक इंडस्ट्री समूह को बेंच दी गयी थी। कई गांवों के लोग, मवेशी, चिरई-चुनमुन, खेत-बघार सब पानी के लिए छछन रहे थे। बोन्दा टीकरा गांव के लोग राजधानी में जाकर अनशन पर बैठे..।” इसके तुरंत बाद उपन्यास में याद दिलाया जाता है कि “मणिपुर की राजधानी इम्फाल से मात्र पन्द्रह किलोमीटर दूर मलोम कस्बे की पिता इरोम नन्दा, मां इरोम सखी की 34 वर्षीया बेटी इरोम शर्मिला, सशस्त्रबल के विशेषाधिकार कानून के विरोध में पिछले लगभग सात वर्षों से आमरण अनशन पर हैं….केरल की सी के जानू, वन विभाग की जिद के कारण तिरपन हजार बेघर आदिवासी परिवारों की लड़ाई की अगुआ, वायन्द जिले के गैरमजरुआ जमीन पर बसने की बात सोचते-सोचते पुलिसिया बर्बरता का शिकार होती है…. महाराष्ट्र कोंकण में बघर तेरह हजार आदिवासी परिवारों की लड़ाई लड़ती सुरेखा दलवी, मध्यप्रदेश रीवां जिले में संघर्ष करती दुवसिया देवी, छिन्दवाड़ा गोंड गांव की दयाबाई..किसकी किसकी कथा कही जाय और कितनी कही जाय। ”

यों तो संघर्षों के इस सिलसिले को उपन्यास में यह बताने के लिए दर्ज किया गया है कि “शायद स्त्री ही स्त्री की व्यथा समझती है” तो भी उपन्यास के आखिर में आयी इन पंक्तियों को चूंकि असुर जनजाति के अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष करते पात्र (ललिता) की जबानी कहलवाया गया है इसलिए यह निष्कर्ष निकालना बेजा ना होगा कि उपन्यास की इच्छा असुर जनजाति के संघर्ष को ‘व्यापक समाज के संकट और संघर्ष का प्रतिनिधि’ मानकर पेश करने की है।

इस बात के संकेत ऊपर उद्धृत रणेन्द्र के साक्षात्कार में भी हैं। मसलन रणेन्द्र को यह तो लगता है कि “आदिवासी, दलित, स्त्री, पिछड़े मुसलमान आदि हाशियाकृत समुदायों अस्मिताओं की अपनी विशिष्ट समस्याएं रही हैं. वे अलग से रेखांकित किए जाने की प्रतीक्षा कर रही थीं पर कई कारणों से उपेक्षित रहीं” लेकिन साथ में वे यह भी जोड़ते हैं कि “अस्मितावादी आंदोलन कोई निश्छल भाव से चलने वाला आंदोलन नहीं है. वैश्विक पूंजीवादी राजनीति उसके पीछे खड़ी है” जिसे ‘सर्वहारा के महाआख्यान’ के खिलाफ खड़ा करने के लिए काफी समर्थ और प्रतिबद्ध विचारक-दार्शनिक मिले। रणेन्द्र को अस्मितावादी आंदोलन ‘अन्य’ या ‘अदर्स’ की पहचान और उसके खिलाफ सैद्धांतिक दर्शन गढ़कर “पूरी ताकत और घृणा” के साथ चलाया जाने वाला अभियान प्रतीत होता है जो कि अंतत “होलोकॉस्ट की ओर” ही ले जाती है। उनका प्रश्न यह है कि “वंचित-शोषित-हाशियाकृत तबकों को अपनी विशिष्ट समस्याओं के रेखांकन के बाद संघर्ष के लिए इकट्ठा एक मंच पर न जुटने दिया जाए तो लाभ किसे है?” अचरज नहीं कि जिस उपन्यास की शुरुआत “बदहाल ज़िंदगी गुज़ारती संस्कृतविहीन, भाषाविहीन, साहित्यविहीन, धर्मविहीन” असुर जनजाति के लिए इस पीड़ा से होती है- “छाती ठोंक ठोंककर अपने को अत्यन्त सहिष्णु और उदार करनेवाली हिन्दुस्तानी संस्कृति ने असुरों के लिए इतनी जगह भी नहीं छोड़ी थी। वे उनके लिए बस मिथकों में शेष थे। कोई साहित्य नहीं, कोई इतिहास नहीं, कोई अजायबघर नहीं। विनाश की कहानियों के कहीं कोई संकेत्र मात्र भी नहीं’ वही उपन्यास अपने आखिर में जिस प्रश्न पर आकर अटकता है वह प्रश्न असुर संज्ञा का लोप कुछ इस भंगिमा के साथ करता है- “क्या मृत्यु का भी कोई आकर्षण है? या नियत पराजय भी आमंत्रित करती है? मैं सोचता रहता। फिर क्यों, न केवल कीकट प्रदेश के बरवे जिले में बल्कि देशके कई-कई राज्यों में हाशिया पर पड़े समुदाय संघर्षरत थे। क्या सभी अपनी अपूर्ण मृत्यु की और बढ़ रहे थे। मेरे अख़बार, पत्र-पत्रिकाएं इस तरह की कई खबरें मुझ तक पहुंचा रही थीं।”

कथा के निभाव के हिसाब से सोचें तो दरअसल इस उपन्यास की दिक्कत भी यही है कि वह शुरु तो होती है “असुर समुदाय की गाथा पूरी प्रामाणिकता व संवेदनशीलता के साथ” बताने के वादे से लेकिन उपन्यासकार ने अपने में कथा के लिए जो राजनीतिक नक्शा तैयार कर रहा है, वह नक्शा इस वादे को पूरा नहीं होने देता। अपने नक्शे के अनुकूल असुर जनजाति के “संतप्त  सारांश” को चूंकि उसे देश के “कई-कई राज्यों में, हाशिए पर पड़े समुदाय” की संघर्ष-गाथा के रुप में भी पेश करना है, सो उपन्यास को शुरुआत से ही एक हड़बड़ी घेर लेती है। सौ पृष्ठों के कलेवर में कथा किसी बुलेट-ट्रेन सी भागती है, कथा को अपनी मंजिल का पता जो है। मंजिल की ओर बुलेट-रफ्तार से भाग रही कथा रास्ते में पड़ने वाले किसी भी ठौर-ठीहे को नजदीक से देखने के लिए उतरने का अवकाश नहीं देती। पाठक कथा के किसी भी अंश पर ठहरे इससे पहले ही कथा का कोई और अंश उसकी आंखों के आगे आ जाता है। यह तेज-रफ्तारी उपन्यास के किसी ब्यौरे को साहित्य के अंश में नहीं बदलने देती और पूरा उपन्यास रचनात्मक तनाव को ना साध पाने के कारण ना तो असुर जनजाति की संवेदनशील कथा बन पाता है ना ही इस कथा को “व्यापक समाज  के  संघर्ष और संकट का प्रतिनिधि”  बना पाता है।

मिसाल के लिए हम यही सवाल करें कि ‘ग्लोबल गांव के देवता ’ असुर समुदाय की भाषा-संस्कृति-धर्म के बारे में पाठक को जिस तरह सूचित करती है? यह प्रश्न पूछा जा सकता है क्योंकि ग्लोबल गांव के देवता की एक टेक है कि ‘मुख्यधारा पूरा निगल जाने में ही विश्वास करती है’ और इसने असुर समुदाय को ‘संस्कृतविहीन, भाषाविहीन, साहित्यविहीन, धर्मविहीन’ बना दिया है। इस प्रश्न का उत्तर उपन्यास में किसी कथा के रुप में हमारे सामने नहीं आता बल्कि इसे एक नृशास्त्रीय या फिर ऐतिहासिक ब्यौरे के रुप में पेश किया गया है। स्कूल टीचर के रुप में असुर जनजाति के एक इलाके में पदस्थापित कथा के नायक को असुर जनजाति का एक पढ़ा-लिखा सदस्य रुमझुम मित्र-भाव से बताता है कि “हम असुर लोग मोटा-मोटी तीन भाग में बंटे हैं.. बीर असुर, अगरिया असुर और बिरिजिया असुर। हालांकि बीर यहां बहादुर के सेंस में नहीं आया  बल्कि जंगल के अर्थ में आया है। लेकिन प्राचीन असरिया बेलीलोन सभ्यता में असुर का अर्थ बलवान पुरुष ही होता है। अपने यहां भी सायणाचार्य असुरों को बलवान प्रज्ञावान शत्रुओं का नाश करने वाला और प्राणदाता पुकारते हैं। ऋग्वेद के प्रारंभ के लगभग डेढ़ सौ श्लोकों में असुर देवताओं के रुप में हैं। मित्र, वरुण, अग्नि, रुद्र, सभी असुर ही पुकारे जा रहे हैं. बाद में यह अर्थ बदलने लगता है और असुर दानव के रुप में पुकारे जाने लगते हैं। ”

“अंगिरा या अंगिरस ऋषि  और अगरिया में एकापन भी ध्यान खींचता है।.. अंगिरा ऋषि भी अपने को आग से उत्पन्न बताते है और अगरियों की भी पैदाइश आग ही से हुई है। यह अंगिरा ही हैं जिन्होंने सबसे पहले आग की खोज की थी। आग की खोज और देवताओं से लड़ाई की कहानी कई जगह प्रचलित है। ग्रीक कथाओं में भी प्रमथ्यू स्वर्ग से आग चुराकर लाता है तो देवता उसे सज़ा देते हैं।सींगबोंगा, सुर देवताओं द्वारा असुरों को सज़ा देने की कथा प्रचलित है किन्तु यह सुर-असुर लड़ाई एक जटिल पहेली है। कभी हमलोग स्थिर में बैठकर इसे सुलझायेंगे। क्या यह पाषाणकालीन लोगों का धातु पिघलाने वाले लोगों से संघर्ष था? सुर में ‘सु’ शामिल है जिसका अर्थ उत्पादन होता है, इसलिए क्या जंगलों को काटकर उत्पादन यानि खेती करने वालों और सखुआ पेड़ के कोयले पर आश्रित लोहा पिघलाने वालों के बीच की लड़ाई है… ”

असुर जनजाति के बारे में उपन्यास में दर्ज इस ब्यौरे को कौन सी बात साहित्य में तब्दील करती है ? चूंकि रणेन्द्र स्वयं भी झारखंड एन्साइक्लोपीडिया(चार खंड) का संपादन कर चुके हैं इसलिए उनसे बेहतर कौन जानता होगा कि असुर जनजाति के बारे में ये सूचनायें समाज-विज्ञान की किताबों में सहज ही उपलब्ध हैं। असुर जनजाति के समाज-वैज्ञानिक ब्यौरे को कथा के किसी पात्र से कहलवा देने भर से वह ब्यौरा साहित्य नहीं बन जाता। साहित्य तो तब बनता जब “मित्र, वरुण, अग्नि, रुद्र, सभी असुर”  पुकारे जाने वाली सत्ताओं के बरक्स असुरों के “दानव के रुप में पुकारे” जाने के बीच जो अर्थ-परिवर्तन या कह लें सत्ता-परिवर्तन घटित होता है इसे उपन्यासकार अपनी कल्पना के जोर से एक जीवंत कथा के रुप में ढालता। असुर जनजाति से संबंधित समाज-विज्ञान के ब्यौरों में ऐसी संभावनाएं पूरमपूर हैं। मिसाल के लिए, वेरियर एल्विन की पुस्तक ‘द अगरिया’ को ही देखा जा सकता है। शरत् चंद्र राय इस पुस्तक की भूमिका में लिखते हैं कि अगरिया जनजाति के मिथकों का अध्ययन बड़ा मनोग्राही है। जनाब अल्विन ने दिखाया है कि कैसे अगरिया समाज के धार्मिक और आर्थिक संरचना तथा सामाजिक संबंधों की बुनियाद मिथक हैं। जीवन और प्रकृति से संबंधित जिन विचारों की भावराशि ने अगरिया-मानस पर अपनी छाप छोड़ी है, उन विचारों का खुलासा इन मिथकों से होता है..। ” अगर कोई समाज-विज्ञानी रणेन्द्र से बहुत पहले असुर जनजाति की एक शाखा अगरिया के धार्मिक-सामाजिक-आर्थिक जीवन-यापन और जीवन तथा प्रकृति विषयक उसके भावराशि का निर्माण में मिथकों की इतनी महत्वपूर्ण भूमिका रेखांकित कर गया है तो फिर ऐसी कौन-सी रचनात्मक बाधा थी जिसने ‘ग्लोबल गांव के देवता’ को अपना घोषित लक्ष्य( असुर जनजाति की प्रामाणिक व संवेदनशील तथा संतप्त गाथा) पूरा करने के लिए इन मिथकों के सहारे अपना आख्यान तैयार करने से रोक दिया ?

ब्यौरे को साहित्य में तब्दील ना कर पाने की एक और मिसाल गौरतलब है। कथा का नायक अपने घर से ढाई तीन सौ किलोमीटर दूर बरबे जिलाके प्रखंड कोयलाबीघा का भंवरापाट में पहाड़ के ऊपर जंगलों के बीच बने आवासीय विद्यालय में नौकरी के लिए पहुंचता है तो मध्यवर्गीय जरुरतों को पूरा करने वाली सुविधाओं से एकदम ही वीरान उस जगह पर उसकी दशा “कब खूँटा उखाड़ूं और भाग निकलूं” की है। लेकिन बाद को उसकी मनोदशा कुछ ऐसे बदलती है-“रहते रहते अपना भौंरापाट स्कूल मुझे अच्छा लगने लगा था। हेडमिस्ट्रेस और टीचर्स अच्छी लगने लगी थीं, और क्लास की बच्चियां अच्छी लगने लगी थीं। साहूजी किरानी की थोड़ी बहुत चालाकी अच्छी लगने लगी। एतवारी तो अच्छी थी ही, उसका आदमी गंदूर भी अच्छा लगने लगा। “कब खूँटा उखाड़ूं और भाग निकलूं” से सबकुछ ‘अच्छा” लगने  की दशा में आये नायक से उम्मीद की जा सकती है कि अब वह असुर जनजाति के रोजमर्रा को नजदीक से देखने की स्थिति में होगा और आत्मीयता की आँख से उस समाज की बातें बता पाएगा। लेकिन नायक की आत्मीय आंखें असुर जनजाति की रोजमर्रा की जिन्दगी के बारे में जो ब्यौरे पाठक को बताती हैं वे ब्यौरे विशिष्टता से खाली हैं, कह लें कि थोड़े से हेरफेर के साथ उन ब्यौरों को किसी भी जनजाति पर फिट किया जा सकता है। जैसे, नायक भंवरापाट में रहते-रहते सबकुछ अच्छा लगने की अपनी मनोदशा में पाठक को बताता है कि “ बैगा-पुजार पाहन, पर्व-त्यौहार, नक्षत्र- काल देख सरना-स्थल पर पूजापाठ करते। पाट देवता, सरना माई, महादनिया महादेव, सिंगबोंगा गांव घर पर प्रसन्न रहते। खेत-खलिहान, गाय-गोरु, बाल-बच्चा, परिवार-टोला सबका कुशल-मंगल हो, यही हर पूजा की कामना होती। गांव के सीमान के देव, दरहा की पूजा कर गांव निश्चिंत होकर सोता..।” नायक की नजर गांव से हटकर घरों के अंदर जाती है तब भी वह इतना ही बता पाता है कि “ बाहर की दीवारों को बड़े जतन से महिलायें लीपती थीं। महिलायें इस समाज में सियानी कहलाती थीं जनानी नहीं। जनानी शब्द कहीं ना कहीं केवल जनन, जन्म देने की प्रक्रिया तक उन्हें संकुचित करता जबकि सियानी शब्द उनकी विशेष समझदारी, सयानेपन को इंगित करता मालूम होता। सियानीमन, महिला लोगों को यह पता रहता था कि घर लीपने वाली काली, पीली सफेद मिट्टियां कहां मिलती हैं, किस टांड़ में, किस दोन में..।” दीवारों को लीपने की पूरी प्रक्रिया के साथ अगर उपन्यास का यह भावपूर्ण हिस्सा जोड़ दें कि “हमारा पूरा ब्रह्नांड हमारी अपनी आकाशगंगा और पूरे कायनात की लाखों करोड़ों अकाशगंगाओं के अनंत ब्रह्रांड सबके सब किसी स्त्री की हथेलियों से घूमेड़ लेकर आदि अनंत काल से नाचते जा रहे हैं” तो भी इस ब्यौरे से असुर जनजाति की स्त्रियों के रोजमर्रा के किसी अदेखे सुख-दुःख की कथा इस ब्यौरे से नहीं निकलती।

‘ग्लोबल गांव के देवता’ असुर जनजाति की शोक-संतप्त कथा कहने के वादे से शुरु होती है और आखिर को एक अर्जी में बदल जाती है, एक ऐसी अर्जी जिसका फैसला उपन्यासकार के अनुसार इतिहास-धारा कब का सुना चुकी है। उदाहरण के तौर पर उपन्यास के आखिर का वह अंश देखा जा सकता है जो प्रधानमंत्री को लिखी एक चिट्ठी के रुप में दर्ज है- “हमारे पूर्वजों ने जंगलों की रक्षा करने की ठानी तो उन्हें राक्षस कहा गया, खेती के फैलाव के लिए जंगल के काटने जलाने का विरोध किया तो दुष्ट दैत्य कहलाये। उनपर आक्रमण हुआ और लगातार खदेड़ा गया।… लेकिन बीसवीं सदी की हार हमारी असुर जाति की अपने पूरे इतिहास में सबसे बड़ी हार थी। इस बार कथा-कहानी वाले सिंगबोंगा ने नहीं टाटा जैसे कंपनियों ने हमारा नाश किया।..बाक्साइट के वैध-अवैध खदान, विशालकाय अजगर की तरह हमारी जमीन को निगलता बढ़ता आ रहा है। हमारी बेटियां और हमारी भूमि हमारे हाथों से निकलती जा रही हैं।.. हम असुर अब सिर्फ आठ नौ हजार ही बचे हैं। हम बहुत डरे हुए हैं.। हम खत्म नहीं होना चाहते।” और उपन्यास में इस चिट्ठी के ठीक आठ पन्नों बाद एक प्रवचननुमा फैसला दर्ज है- “राज्य राष्ट्र की हिंसा का कोई जवाब ही नहीं हो सकता।.. राज्य की नींव में ही केवल हिंसा की ईंटे नहीं लगी हैं बल्कि उसके महल की हिंसा ईंटों से ही चिनाई हुई है।यही एकमात्र संस्था है जिसने हिंसा को भी सांस्थानिक रुप दिया है। उसकी सेना, सशस्त्र बल, पुलिस, सब सैद्धांतिक तौर पर हिंसा के लिए ही प्रशिक्षित हैं..। ”

‘गायब होता देश’  का प्रकाशन-वर्ष(2014) ‘ग्लोबल गांव के देवता से पाँच साल बाद का है। इन पाँच साल में उपन्यासकार ना तो अपनी कथा-भूमि बदल पाया है ना ही कथा को अपने राजनीतिक नक्शे में फिट करने का आग्रह।  कथाभूमि और राजनीतिक आग्रह का एका दोनों उपन्यासों में इतना गहरा है कि ‘गायब होता देश’  को ‘ग्लोबल गांव के देवता’ के विस्तार के रुप में पढ़ा जा सकता है। इस उपन्यास के आरंभ में एक ‘सोना लेकन दिसुम’ नाम का स्वर्ग है और इस स्वर्ग के नष्ट होने से उपजा शोक है।‘ग्लोबल गांव के देवता की तरह ‘गायब होता देश’  में भी स्वर्ग को नष्ट करने वाला राष्ट्र-राज्य ही है, ऐसा राष्ट्र-राज्य जिसने वैश्विक पूंजी से हाथ मिला लिया है। उपन्यास में स्वर्ग इस रुप में आता है- “सोने के कणों से जगमगाती स्वर्णकिरण स्वर्णरेखा, हीरों की कौंध से चौंधियाती शंखनदी, सफेद हाथी श्यामचंद्र और सबसे बढ़कर हरे सोने, शाल-सखुआ के वन, यही था मुंडाओं का सोना लेकन दिसुम। ”

यह स्वर्ग नष्ट हुआ क्योंकि “ इंसान थोड़ा ज्यादा समझदार हो गया। उसने बंदरगाह बनाने, रेल की पटरियां बिछाने, फर्नीचर बनाने मकान बनाने केलिए अंधाधुन्ध कटाई शुरु की। मरांग बुरुबोंगा की छाती की हर अमूल्य निधि धातु-आयस्क उसे आज ही अभी ही चाहिए था। नहीं तो उसे पिछड़ जाने का भय था।इन्हीं जरुरतों से ज्यादा समझदार इंसानों की अंधाधुन्ध उड़ान के उठे गुब्बार बवंडर में सोना लेकन दिसुम गायब होता जा रहा था। ”

सोना लेकन दिसुम के गायब होने का एक साक्षी पत्रकार किशन विद्रोही है और उपन्यास का आरंभ किशन विद्रोही की हत्या की खबर से होता है,, एक ऐसी हत्या जिसकी गुत्थी का सुलझना शेष है “क्योंकि ना तो कोई चैनल ना कोई अखबार पूरी गारंटी से कहने को तैयार था कि हत्या हुई है।” पाठक शुरुआती पन्नों पर किशन विद्रोही के बारे में जान पाता है कि वह “ भूमिहीन मजदूरों द्वारा मठ की जमीन को जोतने के संघर्ष में शामिल ” था और उसे तब लोकनायक जेपी का आशीर्वाद भी हासिल हुआ था। विद्रोही की हत्या की गुत्थी सुलझाने के क्रम में प्रशिक्षु पत्रकार राकेश को डायरी, जेरॉक्स और अखबार के जो पन्ने हासिल होते हैं। इन पन्नों से किशन विद्रोही की त्रासदी की कथा की शुरुआत होती है, यही त्रासदी उपन्यास में ‘सोना लेकन दिसुम’ के गायब होते जाने की तफ्सील भी है।

तफ्सील यों है कि किशनपुर एक्सप्रेस के पत्रकार के रुप में परमवीर चक्र प्राप्त परमेश्वर पाहन की हत्या/मुठभेड़ की गुत्थी सुलझाने के लिए किशन विद्रोही हीराहोतु जाता है और इसी क्रम में उस पर अखबार के प्रबंधन का दबाव बनता है कि वह ऐसी खबरों को ज्यादा तवज्जो नहीं दे। उसे बदलने का उपदेश मिलता है कि ‘केके बदलो यार। समय के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना ही बुद्धिमानी है। प्रोफेशनल लाइफ में अड़ियलपन से काम नहीं चलता। आगे दूर तक देखिए। स्थानीयता में मत उलझिए। राष्ट्रीय दृष्टि से परिघटनाओं का विश्लेषण कीजिए।‘और यह भी कि “पाठक गरीबी, बदहाली,भूख, बेकारी, विस्थापन, आदिवासी-दलितों की कहानियां पढ़-पढ़कर बोर हो गया है। ”

किशन विद्रोही के माध्यम से उपन्यासकार वंचितों की व्यथा-कथा की खोज खबर देने क्रम में यह बताता प्रतीत होता है कि आदिवासियों का संघर्ष कुछ वैसा ही है जैसा कि भारतीय जनता का ब्रितानी साम्राज्यवाद से था- “लग ही नहीं रहा था कि 2000 ईस्वी में हो। लग रहा था कि 13 फरवरी 1832 हो। कप्तान इंपे की बंदूकें गोलियां बरसा रही हों। वीर बुधु भगत के साथ-साथ पूरा सिलगई शहीद हुए जा रहा हो या 9 जनवरी 1900 हो और सईल रकब पर मुंडाओं की बैठकी पर गोलियां बरसायी जा रही हों। गोलियां चल रही थीं जिंदा हंसते गाते इंसान शहीद हुए जा रहे थे।”

इस स्थिति के बरक्स आदिवासियों का संघर्ष किस मुकाम पर है ? उपन्यास आदिवासियों के संघर्ष की व्याख्या के लिए कुछ फार्मूलों की सहायता लेता है जैसे यह कि आदिवासी, आखिर को आदिवासी भर कहां हैं वे तो अगल-अलग पहचानों में बंटे हैं इसलिए उनका संघर्ष टुकड़ों में बंटा है और असफल होने को अभिशप्त है- “अब सौंसार आदिवासी हैं तो का, वीरेन तो मुंडा है,हम संताल हैं,उरांव हैं, खड़िया हैं, खेरवार हैं, लोहरा हैं, हम काहे को उसको लीडर मानें। हम सौंसार हैं तो मिशन लोग के साथ नयं बैठेंगे।” आदिवासी समाज के एका के अभाव की व्याख्या में उपन्यासकार आर्थिक आधार तलाशता है – “दूसरे ही दिन सोलह फ्लैट के लिए बत्तीस ग्राहक। सबके सब आदिवासी साहब सूबा लोग..ऐसन लंबी-लंबी गाड़ी सब में एतना ट्रायबल अफसर एके साथ पहली बार देख रहे थे। सौ किलो- सवा सौ किलो के भी साहब। सरनेम है तिग्गा, तिर्की, खलको, लकड़ा बाकिर कुठुख(उरांव जनजाति की भाषा) में गोठियाने लगे तो लगा सब मुंह फाड़ के भकुआ टाईप देखने..।बाबा! हम तो सोचते थे कि हमहीं पुराना पापी हैं। समाज के गद्दार..खाली नामे भर के आदिवासी है ई लोग बाबा। कल रिजर्वेशन खत्म कर दीजिए तो अपना के आदिवासी कहने में भी शरमाएगा ई लोग। ” उपन्यास के इस अंश पर पहुंचकर पाठक को तहलका पत्रिका में प्रकाशित रणेन्द्र के साक्षात्कार की इन पंक्तियों की याद आ जाय तो क्या अचरज- “वंचित-शोषित-हाशियाकृत तबकों को अपनी विशिष्ट समस्याओं के रेखांकन के बाद संघर्ष के लिए इकट्ठा एक मंच पर न जुटने दिया जाए तो लाभ किसे है ? ” सो, ‘गायब होता देश’ में भी उपन्यासकार की जिद आदिवासियों के संघर्ष को एक व्यापक संघर्ष के हिस्से के रुप में देखने की है और ठीक इसी वजह से उपन्यास आदिवासी जन-जीवन के बारे में कुछ भी ऐसा नहीं बता पाता जो खनन, भूमि-अधिग्रहण या फिर मानवाधिकारों केमुद्दे पर सक्रिय स्वयंसेवी संस्थाओं के प्रकाशनों अथवा आंदोलनधर्मी अखबारों/पत्रिकाओं में ना मिलता हो।

हद तो यह है कि उपन्यासकार आदिवासी जन-जीवन के संघर्ष में ऐतिहासिक निरंतरता दिखाने के लिए जिस जादुई लोक ‘लेमुरिया’ की रचना करता है, उस लेमुरिया के वासी अपने आचारण में या तो वैदिक ऋषियों की छायाप्रति लगते हैं या फिर देश की आजादी के वक्त के मध्यवर्ग की आचार-संहिता के एक वाक्य- ‘सादा जीवन उच्च विचार’ के अनुयायी। आदिवासियों की आदिभूमि लेमुरिया को उपन्यास के तर्क से एक मध्यवर्गीय प्रातमिकताओं को तरजीह देने वाले राष्ट्र-राज्य का एक प्रतिस्थापन्न होना चाहिए था लेकिन लेमुरिया मध्यवर्गीय राष्ट्र-राज्य की एक प्रतिलिपि बनकर रह जाता है। उसमें मध्यवर्गीय राष्ट्रराज्य की सारी चाहनाएं मौजूद हैं। सादा जीवन है, उच्च विचार है, संपदा का संरक्षण और संवर्धन है और इन सबसे बढ़कर है लेमुरिया का उपयोगितावादी ज्ञान-विज्ञान। मिसाल के लिए उपन्यास के इस अंश को देखा जा सकता है-  “सोमेश्वर मामू तो पंडित हैं, वो तो पूरी लंबी-चौड़ी कहानी सुनाने लगेगा लेमुरिया का। कैसे मुंडा लोगों का मूल स्थान समुद्र में समा गया और हमलोगों के पूर्वजों का ढेर ज्ञान भी बिला गया। नयं तो केतना ज्ञानी थे मुंडा लोग।धरती माता, सरना माई, सिंगबोंगा से जो भी सीखा था उसे संजो कर रखे थे। सबकी इज्जत करना,सम्मान करना, कम से कम में संतोष करना और ज्ञान बढ़ाना यही जिंदगी का मकसद था लेमुरिया मुंडाओं का। लेकिन ताकत इक्कठ्ठा करने वाले, धन इक्टठा करने वाले उन्हें अपना दुश्मन मानते थे।… उनकी दूसरी कोशिश थी कि सारे ज्ञान को क्रिस्टल मणि का रुप दे दिया जाय और उन्हें हीरों के रुप में धरती के अंदर छुपा दिया जाय और पानी डूब से बचने का सबसे बड़ा उपाय हमारे पूर्वजों ने किया कि धरती के ऊर्जा केंद्र से दूसरे ऊर्जा केंद्रों के बीच भूमिगत सुरंगे बनायी..।”

यों तो रणेन्द्र ने तहलका पत्रिका के साक्षात्कार में अपनी मजबूरी बतायी थी कि “मेरा जो अनुभव संसार है वह मुख्य रूप से आदिवासी समाज का ही है। यहां समस्याएं इतनी जटिल, जीवन इतना कठिन, दबाव इतना चौतरफा है कि इन्हें चाहकर भी किसी दूसरी विधा में नहीं अंटा सकते ” लेकिन ‘ग्लोबल गांव के देवता’ या फिर ‘गायब होता देश’ नाम के उपन्यास में जो वे अंटा पाये हैं वह आदिवासी समाज की समस्याओं की जटिलता नहीं बल्कि उसकी एक सरलीकृत झांकी भर है, ऐसी झांकी जो कहीं अर्जी, कहीं प्रवचन तो कहीं सपाट फैसले पर आकर रुक जाती है।

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव,  मूलतया छपरा(बिहार) के निवासी, पिछले पंद्रह सालों से दिल्ली में। पहले आईआईएमसी और फिर जेएनयू में पढ़ाई। “उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हिन्दी लोकवृत्त का निर्माण” शीर्षक से पीएचडी के बाद दिल्ली के कॉलेजों में छिटपुट अध्यापन, फिर टीवी चैनल की नौकरी और अब विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सीएसडीएस) की एक परियोजना इंक्लूसिव मीडिया फॉर चेंज से जुड़े हैं। इनसे  chandan@csds.in पर संपर्क संभव है। 

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बूढ़ों का वसंत और लोलितागिरी: डॉ. विनय कुमार

सत्तर पार का एक बूढ़ा ‘सुपरस्टार’ है, उसे विश्वास है कि उसे सप्तर्षियों में से एक मान लिया गया है,सो मृत्यु उसे नहीं व्यापेगी।यह बूढ़ा हालांकि मुंह के भीतर नकली दाँत और माथे के ऊपर नकली केश लगाता है, जब तब बीमार पड़ते रहता है, तो भी सोलह साल की लड़की से प्रेम का नाटक करने के लिए हमेशा तैयार रहता है। बूढ़ा प्रयोगों का शौकीन है। उसे लगता है, प्रयोग करते रहने से आदमी हमेशा जवान बना रहता है। अपनी उम्र को जीत लेने का नाटक करते-करते इस बूढ़े ने साबित किया है कि सचमुच उम्र को जीता जा सकता है। वैसे अपनी उम्र को जीतने के लिए यह बूढ़ा एक खास किस्म का शहद भी खाता है। यह शहद पुणे के एक बाग़ में तैयार होता है। यह शहद या तो सिर्फ यह बूढ़ा खाता है या फिर मधुमक्खियों पर राज करने वाली रानी मधुमक्खी, बाकी जो कोई इस शहद को खाना चाहता हो उसे उस क्लब में शामिल होना पड़ेगा जो कि रानी मधुमक्खी का क्लब होता है। यह क्लब अकसर आईपीएल की टीमों के खरीदारों और उनके दोस्तों से बनता है। साठ पार कर चुका एक और बूढ़ा है। यह बूढ़ा ‘सर्वशक्तिमान’ है। इस बूढ़े के पास एक नुस्खा है। बूढ़ा रानी मधुमक्खी के क्लब में शामिल होने का नुस्खा बताता है। इस बूढ़े ने भी उम्र को जीत लिया है।यह बूढ़ा अपने शरीर को सोने से मढ़वा देना चाहता है। सोना मढ़वाये सूट को धारण करने वाला बूढ़ा अपने को रॉकस्टार कहलवाने का शौकीन है, उसे रॉकस्टार कहा भी जा रहा है। साठ साल के इस लोकतंत्र पर इक्कीसवीं सदी में बरस इक्कीसवे बरस की जवानी छा रही है। सारे बूढ़े जवान हो गये हैं, सारे बच्चे भी जवान हो गये हैं, और जो जवान हैं, उनसे कहा जा रहा है कि अब आप चिरयौवन की अनंत आकाशगंगा में टहल लगाने को तैयार हैं। यंगिस्तान कहलाने वाले इस देश में अब कोई नहीं मरता। यहां रोग-शोक-दुःख-मृत्यु कुछ भी नहीं है। यह सब उस दौर की बातें हैं जब ग्रोथ-रेट के साथ किसी पुछल्ले की तरह हिन्दू शब्द जुड़ा होता था। यह ‘हिन्दू’ शब्द उस युग की इकॉनॉमी में इस देश के आदमी को आदिमानव बताने के लिए प्रयोग किया जाता था। आदिमानव ने छलांग लगायी है, अब वह महामानव है या फिर महामानव बनने को तैयार खड़ा है। महामानवत्व के सुखसागर में डूबते उतराते इस माहौल में यह लेख कह रहा है कि भाई साहेब, ये तो एक रोग है…! यह तो सिर्फ एक भूमिका है, पृष्ठभूमि है..आख्यान आगे है। डॉ. विनय कुमार की लेखनी में नयापन क्या है? नयापन वही है जो हिंदी के समकालीन रचनात्मक परिदृश्य से गायब है। नई सूचनाएं, नए ज्ञान ताकि हम बाकी संसार के साथ कदमताल कर सकें! अंग्रेजी या विदेशी साहित्य-लेखन से सहज लोगों के लिए विनय कुमार का लेखन नया नहीं बल्कि एक तरह का दुहराव भी लग सकता है, लेकिन इसे एक तरह की शुरुआत माननी चाहिए। समकालीन हिंदी कथेत्तर गद्य हिंदी का सबसे गरीब संस्करण हो गया है। डॉ. विनय की पुस्तक ‘एक मनोचिकित्सक के नोट्स’ इस गरीबी को कुछ कम ही करता है। प्रस्तुत है इसी पुस्तक से छोटे-छोटे दो गद्यांश। @चंदन श्रीवास्तव 

Sugar Daddy (1976)-Poster

Sugar Daddy (1968)-Poster


By डॉ. विनय कुमार

 चीनी कम होने की निःशब्दता

 
चीनी कम

मादरे-वतन में अगर मनमोहनॉमिक्स की इन्द्रधनुषी छटा का नूर न होता तो हमें ‘प्रिविलेज्ड बूढ़ों के वसंत’ और ‘लोलितागिरी’ पर चर्चा की जरुरत महसूस न होती… ‘निःशब्द’ और ‘चीनी कम’ पर चर्चाएँ कहाँ हो रही हैं? क्या उस भारत में जो अनुसरण करता है या उस छोटे भारत में जो नेतृत्व करता है. जो भारत ‘भूख-भय-भ्रष्टाचार’ की मार से खुद ‘निःशब्द’ है और जिसकी किस्मत में यूँही ‘चीनी कम’ है उसे यह विलासितापूर्ण सहूलियत कहाँ कि प्रेम और विवाह की तरह-तरह की रेसिपि को चटखारे लेकर पढ़े. वृद्ध और युवती के प्रेम, साहचर्य और विवाह का मुद्दा गर्म हो रहा है या गरमाया जा रहा है? सोचने की बात है. सोचने का फैशन न रहने के बावजूद इस पर सोचने की जरुरत है.

वृद्ध का युवती से विवाह भारत के लिए कोई नई बात नहीं है. दक्षिणभोगी नीतिकार कह गए ‘वीरभोग्या वसुंधरा’ और सेनाओं के सहारे वीरता सिद्ध करने वाले सत्तावान हत्यारों को भोग का सिद्धांत मिल गया. महलों के भीतर रानियों के मोहल्ले से लेकर नगर तक बसने लगे. जरा सोचकर देखिये कि कृष्ण की साथ हजार रानियों का खर्चा कैसे चलता होगा. सिर्फ इच्छा की पूर्ति के लिए कृष्ण को प्रजा से कितना वसूलना पड़ता होगा. सत्ता और धन की गोटियों से खेला जाने वाले यह खेल नन्द और यशोदा की विरासत के बूते तो कतई संभव न था.

अब इस मुद्दे को स्त्रियों की दृष्टि से देखें. तरह-तरह के स्वाभाविक और आरोपित सीमाओं के बावजूद स्त्रियाँ सभ्यता-यात्रा में बराबर की भागीदार रही हैं. कल से आज तक जीवन और वर्चस्व की लड़ाइयों में वे अपनी तरह से शरीक रही हैं. हल और हथियार भले ही कम उठाती रही हैं, मगर श्रम के स्वेद और युद्धों के आँसूं और रक्त से कम नहीं भींगती रही हैं. नर और मादा की तरह जंगलों में भटकती मानवजाति ने जब ‘घर’ बनाया तो उनकी भूमिका इस कदर बदली कि उनका मनोविज्ञान पुरुषों से काफी अलग हो गया. घर और तन से चिपके बच्चों ने उन्हें सुरक्षा की आवश्यकता का पाठ पढ़ाया. अन्न और मांस कमाकर लौटे पुरुष को जब भूख और थकान से राहत मिलने लगी तो वह स्त्री को पहले ‘जरुरत’ फिर ‘जायदाद’ की तरह प्यार करने लगा. परिणाम यह हुआ कि स्त्रियाँ ‘कृपाकांक्षिणी’ और ‘सुरक्षाकामिनी’ हो गईं. शायद यही कारण है कि स्त्रियाँ पुरुषों की उम्र से अधिक उनकी सामर्थ्य को अहमियत देने लगीं.

स्त्री के मनोविज्ञान की इस विशिष्ट पहचान के पक्ष में सबसे बड़ा जैविक प्रमाण (बायोलॉजिकल एविडेंस) यह है कि स्त्रियों की यौनिक उत्तेजना का सबलतम कारक है—पुरुष प्रदत्त देखभाल और सुरक्षा. याद करें प्रकाश झा की फिल्म ‘दिल क्या करे’. इस फिल्म की नायिका चलती ट्रेन में बलात्कार की कोशिश करने वाले गुंडों से बचाने वाले अजनबी को थोड़ी ही देर के बाद बेहद ‘निःशब्द’ तरीके से अपनी देह सौंप देती है और यात्रा के अंत में अजनबी के प्रति आँखों से आभार प्रकट करते हुए विदा हो जाती है. इतना कुछ हो जाने के बावजूद अजनबियत बरकरार रहती है. ऐसा क्यों? क्योंकि सिलसिले खतरनाक भी हो सकते हैं. अजनबियत अपने आप में एक सुरक्षा कवच है. इस प्रसंग को सुरक्षा के प्रति स्त्री के मनोवैज्ञानिक (सायकोबायोलॉजिकल) प्रतिक्रिया के रूप में देखें.

अगर स्वतंत्रता पूर्व के भारत की बात करें तो मुग्धाओं के प्रेम की सुविधा सामंतों, सेठों और वाग्वीर ज्ञानिओं के ही भाग्य में थी. लोकतांत्रिक भारत में इसमें ‘प्रिविलेज्ड क्लास’ के नेता और आला अफसर भी शामिल हो गए. अब जबकि उदारीकरण की मीठी छुरी से अच्छी-बुरी पुरानी मान्यताएं हँस-रोकर हलाल हो रही हैं, एक नए सोशल आर्डर को मान्यता दिलाने की कोशिश सर उठा रही हैं. एक फिल्म में सुबह की दौड़ लगाते हुए अमिताभ आते हैं ‘जब तक जाँ में है जाँ तब तक रहे जवां, रोज सुबह से माँगें नई-नई खुशियाँ.’ इस फिल्म में बुढ़ाते जाने के बावजूद वे विवाह नहीं करते. मगर उदार भारत में शताब्दी के महानायक कामनाओं के नदी में ‘निःशब्द’ बहते नज़र आए. ‘निःशब्द’ में थोडा अपराधबोध हुआ और ख्याल-ए-ख़ुदकुशी से उबरे तो तय किया कि तीस पार की कुड़ी से कुड़माई की जाये. इस ढीठ बदलाव के मनोविज्ञान की व्याख्या वैश्वीकरण और उदारीकरण की रोशनी में ही संभव है.

जब पश्चिम में औद्योगिक क्रान्ति हुई तो सत्ता और अर्थ के समीकरण बदले. पुराने सामन्तों और सेठों की जगह उद्यम से उभरे नवधनाढ्यों ने ली. उद्योगों ने पूंजी के नए पहाड़ बनाए, ऐश्वर्य और सुख की नई परिभाषाएँ विकसित कीं और एकदम नए किस्म की कुलीनों की जमात खाड़ी की. उद्यम और उत्पादन बहादुरों की जमात पूंजी के नशे में ‘जब तक है जाँ तब तक लुटें मजा’ की राह पर चल पड़ी. तबसे आज तक यूरोप और उसके सारे उपनिवेश में ‘एन्जॉय योर सेल्फ’ का नारा गूंज रहा है. भोग के प्रयोग ने स्त्रियों के सामने भी यह विकल्प प्रस्तुत किया कि वे चाहें तो अमीर बूढ़ों की सहचरी बन सकती हैं. धन और सत्ता का सुख किसे नहीं चाहिए. स्त्रियाँ अपवाद नहीं हैं. उनमें से कुछ को लगा कि अमीर बूढ़ों के प्रति आकर्षित होना एक सुरक्षित, आरामदेह और शक्ति एवं ऐश्वर्य प्रदान करने वाला बेहतर विकल्प है. यहीं से खड़ी हुई प्रिविलेज्ड प्रेमियों की एक नई जमात. अमेरिका में इस जमात को ‘शुगर डैडीज’ कहा जाता है. अब तो आप मानेगें कि बूढ़ों का यह वसंत ‘ग्लोबलाइजेशन का बाई प्रोडक्ट’ है और उसे फैशन शो की तरह प्रायोजित किया जा रहा है, भारत के नए उद्यम-वीरों के लिए. कुल मिलाकर वृद्ध-युवती साहचर्य का यह फैशन पूंजी के पहाड़ों से उठने वाली पुरानी पछुआ हवा का यह पुरवैया झोंका है.

जो पश्चिम में हो चूका वह भारत में हो रहा है. मगर जो जो भारत में हो रहा है वह पश्चिम में नहीं हो रहा है. पश्चिम में स्त्री-पुरुष संबंधों के समीकरण बदल गये हैं. वहाँ स्त्री सशक्तिकरण का दौर सफल हो चुका है. काफी तादात में स्त्रियाँ ज्ञान, धन, शासन-सत्ता की स्वामिनी हो चुकी हैं. नई रायशुमारियाँ बताती हैं कि अब समृद्ध और सत्तावान प्रौढ़ाएँ भींगती मसों के युवक से प्रेम और विवाह करने लगी हैं. आज नहीं तो कल भारत में यह हो सकता है. ‘चीनी कम’ की सफलता की कामना करने वाले शुगर डैडीज सोच लें.

निःशब्द

हमारे समय में शहरी और कस्बाई भारत में प्रेम पर चर्चा कोई अजूबा नहीं है. महामायावी मीडिया की कृपा से हम तरह-तरह के प्रेम पर होने वाली तरह-तरह की चर्चाओं के अनिवार्य घेरे में हैं. मोनिका-क्लिंटन और जूली-मटुकनाथ जैसी कथाएँ चाट मसाले की तरह हमरे खाने की प्लेटों में अनिवार्य रूप से छिड़की जा रही है और चूँकि हम भूखे नहीं रह सकते इसीलिए उसे चखने को विवश हैं. प्रेम का हो या न हो यह ‘प्रेम’ के अहर्निश उच्चारण से उठने वाले शोर का समय अवश्य है और ऐसे समय में आई है एक फिल्म ‘निःशब्द’. एक ‘टीन’ (युवती) और एक वक्त की मार से छीजे हुए ‘टिन’ (वृद्ध) की प्रेमकथा को लेकर.

इस फिल्म के पहले इस पर चर्चाएँ आईं और खूब आईं, जिनका लब्बोलुआब यह था कि भारत बदल रहा है- इंडिया प्वायज्ड टु बिकम बोल्ड एंड ब्यूटीफुल, देखो तो सही क्या मणिकांचन संयोग है- ओल्ड बिग बी और कमसिन ब्यूटीफुल जिया. सुपरस्टार की लोलितागिरी. जिया देखोगे तो जिया धड़क-धड़क जाएगा. तो ‘निःशब्द’ से पहले आई शब्दों की भीड़ इश्तेहार की तख्तियां उठाये. और जब फिल्म आई तो आई और आकर चली गयी. पटना में मटुक-जूली का तड़का भी भीड़ न बटोर पाया.

दरअसल ‘निःशब्द’ आकर्षण और प्रेम से अधिक त्रासदियों की कथा है. नायिका खंडित परिवार से आती है. पिताओं से भरे समाज में वह पिता के प्रेम से वंचित है. यह अभाव उसके मनोयौनिक (सायकोसेक्सुअल) विकास में अपनी भूमिका निभाता है. चूँकि किसी चीज की इच्छा उसकी कमी से ही पैदा होती है इसलिए उसके अचेतन में पितृपुरुष के लिए चाह का मौजूद होना कोई अजूबा नहीं. यहाँ प्रश्न उठता है कि उसने सहेली के पिता को पिता की तरह क्यों नहीं चाहा. ऐसा इसलिए कि वह पिता-पुत्री के संबंधों के व्याकरण से अनभिज्ञ थी. हर शिशु नर या मादा पैदा होता है. संबंधों की समझ तो परिवार और परिवेश के साथ ‘इंटरएक्शन’ से विकसित होती है. नायिका की समस्या यह है कि जब संयोग उसे अबाधित एकांत में नायक को समझने का अवसर प्रदान करता है और उसके अचेतन में पितृपुरुष को पाने की इच्छा सिर उठाती है तो वह स्वयं को एक पुत्री की तरह अभिव्यक्त नहीं कर पाती क्योंकि उसे वह मनोवैज्ञानिक भाषा ही नहीं पता जिसमें एक पुत्री अपने पिता से बात करती है. उसकी इच्छा उसके बचपन के अभाव से उठती है, मगर व्यक्त होती है युवा भाषा में. यह त्रासदी नहीं तो और क्या है! नायक अपनी तरह की त्रासदी का शिकार है, विवाहित होकर दाम्पत्य प्रेम से वंचित. दाम्पत्य की विडंबना यह है कि वह प्रेमहीन होकर भी संतानवान हो सकता है. नायक तृप्त पिता है मगर एक अतृप्त पुरुष. फिल्म में संयोग उसके अतृप्त पुरुष का कद इतना बढ़ा देता है कि पिता बौना हो जाता है. अतृप्त पुरुष की भाषा के शोर में पिता की भाषा खो जाती है. अगर सही-गलत के पारंपरिक और समाजसम्मत नजरिये से सोचें तो यह दायित्व नायक का ही था कि वह नायिका के हित में सही भाषा में बात करता. क्योंकि नायिका भले ही पुत्री की भाषा नहीं जानती थी, नायक तो पिता की भाषा जानता था. वह निःशब्द की ‘जिया’ के मोह को गुड्डी की ‘जया’ के मोह की तरह भंग कर सकता था. मगर इच्छाओं को बहकाते-दहकाते ग्लोबलाइज्ड समाज में यही, शायद यही हो सकता था. यह त्रासदी नहीं तो और क्या है?

अगर मिथकों पर रत्ती भर भी यकीन करें तो मानना होगा कि भारत शांतनु और ययाति का देश है. स्मरण है कि कमसिन कायालोलुप राजाओं की वासना की वासना को सैद्धांतिक आधार प्रदान करने के लिए लोभी शास्त्रकारों ने सोलह की उम्र को अक्षत सौन्दर्य के भोग का प्रवेशद्वार घोषित कर दिया था. ‘स्वीट सिक्सटीन’ का जूमला तो बहुत बाद की चीज है. आज चिकित्सा विज्ञान सोलह की उम्र को मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से अपरिपक्व मानता है. सोलह और अठारह में फासला ही कितना है. ‘निःशब्द’ के बहाने से ही सही, यहाँ यह कहना होगा कि अठारह वर्षीय युवती के लिए साठ वर्ष के पुरुष के मन में उमड़ा प्रेम उस कंगन की तरह होता है, जिसके सहारे वह पंचतंत्र के बूढ़े शेर की तरह अपने शिकार को फंसाने की कोशिश करता है. मीडिया और जूली को मटुक जी भी ‘निःशब्द’ के नायक की तरह अपने दाम्पत्य-जीवन को असफल बताते हैं. यहाँ उनसे यह पूछना दिलचस्प होगा कि जूलिगिरी उनकी आदत तो नहीं.

‘सठियाना’ एक फब्ती भर नहीं है. बढ़ती उम्र के लोगों की रक्त-नलिकाएं संकरी हो जाती हैं, इस कारन मस्तिष्क में रक्त-संचार कम हो जाता है. कभी-कभी मस्तिष्क में फैली रक्त-नलिकाओं में थक्का बन जाता है और मस्तिष्क के किसी ख़ास हिस्से को रक्त मिलना बंद हो जाता है. अगर यह दुर्घटना मस्तिष्क के ‘फ्रंटल लोब’ नामका हिस्से में घटित होती है, तो ग्रसित व्यक्ति वर्जनाहीन/अनैतिक व्यवहार कर सकता है. ‘जूलियों’ को ‘मटुकों’ से प्यार करने के पहले उनके मस्तिष्क का सीटी स्कैन कराकर देख लेना चाहिए कि ‘फ्रंटल लोब’ सिकुड़ तो नहीं रहा. सनद रहे की छाती में धडकने वाला दिल एक पम्पिंग सेट-भर है, वह दिल जो भावनाओं का केंद्र है, उसका निवास मस्तिष्क में ही होता है.

…साठ और अठारह का अंतराल सिर्फ उम्र का अंतराल नहीं होता, यह उर्जा, क्षमता और भविष्य का अंतराल भी होता है. टेस्टोस्टेरोन नामक पुरुष हार्मोन पच्चीस वर्ष में अपने शिखर पर होता है जबकि साठ वर्ष की उम्र में घाटी में घसीटता दीखता है. प्लैटोनिक प्रेम तो हार्मोन के मदद के बगैर भी शिखर पर पहुँच सकता है, मगर प्लैटोनिक फेज ख़त्म होने के बाद क्या- क्या होगा- यह भी सोचना चाहिए. अब आयें भविष्य पर.

अठारह की उम्र के भविष्य का अर्थ है सुबह के आठ आठ बजे और साठ का समय है शाम के पांच बजे. साठ वाला डूब जाएगा अठारह वाली के दिन कैसे कटेंगें! इसे भी सोचा जाना चाहिए!

vinay kumar

डॉ. विनय कुमार मनोवेद माइंड हॉस्पिटल, पटना में मनोचिकित्सक हैं.  हिंदी साहित्य से लेकर साहित्येत्तर सांस्कृतिक रुचियों तक को बहुत नजदीक से परखते हैं. नॉन फिक्शनल हिंदी की अकाल वेला में अद्भुत चमक के अधिकारी हैं. हाल ही आई पुस्तक ‘एक मनोचिकित्सक के नोट्स’ से खासे चर्चित. उनसे dr.vinaykr@gmail.com पर संपर्क संभव है. 

केजरीवाल की टोपी या किसान का साफा: चंदन श्रीवास्तव

By चंदन श्रीवास्तव 

अब से पहले इतना जिम्मेदार कहां था सवा अरब लोगों का यह लोकतंत्र? बीस सालों में तीन लाख तीस हजार किसानों के आत्महत्या कर लेने के बाद फिर से एक किसान ने आत्महत्या की है। गजेन्द्र की मौत आत्महत्या के आंकड़े में एक अंक का इजाफा भर होकर रह सकती थी। लेकिन नहीं, गजेन्द्र की आत्महत्या अनंत की और बढ़ती एक संख्या भर होकर नहीं रह सकी। उसकी आत्महत्या से एकाएक सबका जमीर जाग गया है!  सब अपनी भूमिका पूरी जिम्मेदारी से निभा रहे हैं।

By Katrina Miller

By Katrina Miller

विपक्ष जानता है कि सदन में अब सिर्फ सत्तापक्ष शेष बचा है। तो भी, सदन में इस बचे-खुचे विपक्ष को अपनी जिम्मेदारी याद आई। उसने समवेत स्वर में कहा- प्रश्नकाल स्थगित हो, किसान की आत्महत्या पर तुरंत चर्चा करवायी जाय। लेकिन अध्यक्ष का आसन नहीं डोला। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की संसद के अध्यक्ष ने भी संसदीय कार्यवाही की गरिमा निभायी। उसे लगा लोकतंत्र तो क्रियाविधि से चलता है, लोकतंत्र में प्रक्रियाओं का बड़ा ही महत्व है। सो, उसने प्रक्रियाओं के महत्व की रक्षा की, अपनी जिम्मेवारी निभायी।

प्रश्नकाल स्थगित नहीं हुआ तो सदन में रस्म के मुताबिक हल्ला उठा। सदन के रस्म की रक्षा हुई। रस्म के मुताबिक ही सदन बीस मिनट स्थगित रहा। रस्म के मुताबिक ही कुछ ने वाकआऊट किया, कुछ ने अध्यक्ष के आसन के समीप नारेबाजी की। अध्यक्ष शांत-धीर बैठा रहा जैसा कि उसे आसन की गरिमा का ख्याल करते हुए करना चाहिए था। अध्यक्ष ने अपने पद की गरिमा के अनुरुप कहा “किसानों की आत्महत्या का मामला गंभीर है, इसका राजनीतिकरण मत कीजिए। उसे लगा सदन में समूचा विपक्ष किसान की आत्महत्या की राजनीति कर रहा है। सदन में मौजूद सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता को लगा कि प्रश्नकाल तो स्थगित होना ही चाहिए क्योंकि किसानों की आत्महत्या का मुद्दा प्रश्नकाल से ज्यादा महत्वपूर्ण है। सदन फैसला नहीं कर सका कि लोकतंत्र में कौन सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है? वह प्रश्नकाल ज्यादा महत्वपूर्ण है जिसमें प्रश्न पूछने और उत्तर देने की रस्म निभायी जाती है या किसान की आत्महत्या पर चर्चा ज्यादा महत्वपूर्ण है जिसमें रस्म के मुताबिक ही किसानों की आत्महत्या पर सामूहिक रुप से शोक-संताप-संवेदना व्यक्त की जाती है! यह स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान है। स्वस्थ लोकतंत्र किसी भी प्रश्न पर तुरंत निर्णय नहीं देता, वह उत्तरों को स्थगित रखता है।

सदन के स्थगन के बाद कार्यवाही फिर शुरु हुई। इस बार सरकार ने अपनी सफाई दी। गृहमंत्री ने सर्टिफिकेट दिया कि पुलिस अपनी जिम्मेवारी का निर्वाह कर रही थी।गृहमंत्री ने कहा कि पुलिस मुस्तैद थी, किसान गजेन्द्र सिंह को आत्महत्या से बचाने के लिए दिल्ली “पुलिस लोगों को ताली बजाने से रोक रही थी क्योंकि लोग आम आदमी पार्टी की सभा में बात-बात पर ताली बजा रहे थे, शोर मचा रहे थे।” गृहमंत्री का जमीर जाग चुका था। गजेन्द्र की आत्महत्या के बाद उसे यह भी लगा कि देश में बीते सत्तर साल से कुछ ऐसा चल रहा है जो 60 करोड़ से ज्यादा लोगों के विरुद्ध है। उसने सदन से कहा कि ‘हम सबको एक साथ बैठकर सोचना चाहिए कि क्यों देश के साठ फीसदी लोग इस दशा में हैं कि उन्हें अब भी खाद्य-सुरक्षा की जरुरत पड़ती है। गृहमंत्री का यह कहना सरकार के जमीर के जागने का सूचक था। आखिर सरकार एक किसान की आत्महत्या के बाद सोचना चाहती थी कि इस देश के नौ करोड़ किसान परिवारों में से पचास फीसदी से ज्यादा परिवार क्योंकर इज्जत-आबरु के साथ दो जून की रोटी नहीं जुटा सकते ? सरकार ने जो सत्तर सालों में नहीं सोचा उसे अब सोचना चाह रही थी। वह लगातार सोचे जा रही थी, उसे खुद को नैतिक और वैध साबित करने के लिए लगातार सोचते चले जाने का आभास भर देना होता था। हां, सोचने की इस सतत साधना में बस कोई समाधान नहीं दिख रहा था।

सदन से बाहर भी सब अपनी जिम्मेवारियां निभा रहे थे। जैसे कि आम आदमी का नाम जपकर मुख्यमंत्री की गद्दी पर बैठा वह परम ईमानदार नौकरशाह जो अपनी साफ-सुथरी छवि पर इतना मुग्ध था कि अपनी टोपी पर भी अपनी ही फोटो लगाता था, खुद भी पहनता और किसी पवित्र कर्मकांड की तरह शेष सबको पहनाता था। इसी मुख्यमंत्री ने किसानों के हक में एक सभा की थी। इसी सभा में एक किसान गजेन्द्र ने जान दी थी। गजेन्द्र की जान जाने के बाद यह मुख्यमंत्री अपने मंत्रिमंडल समेत किसानों के हक के लिए मंच पर घंटों जमा रहा। भाषण देता रहा। उसे लगा भाषण देने से किसानों के हक की रक्षा होगी। अब उसे लग रहा है कि उससे गलती हुई, वह माफी मांग रहा है। इस मुख्यमंत्री ने देश के लोकतंत्र में बहुत बड़ा योगदान किया है। उसने भूल-गलती-माफी, धरना-प्रदर्शन आदि को एक अपशब्द में बदल डाला है। एक अपशब्द, जिसमें एक ही साथ दो काम सधते हैं। दूसरे के भरोसे को गाली देना संभव हो जाता है और गाली की जिम्मेवारी से जान छुड़ाना भी संभव हो जाता है। इस मुख्यमंत्री ने गजेन्द्र की जान की कीमत दस लाख लगायी है। यह एक जिम्मेदार मुख्यमंत्री की पहचान है। मुख्यमंत्री जानता है, गजेन्द्र जैसा छोटा-मोटा किसान सारी उम्र खेतों में खटनी करे तो भी खेती की लागत और कीमत के हिसाब से दस लाख नहीं कमा सकता। इस पार्टी का एक प्रवक्ता टेलीविजन पर पूरे देश के सामने रो रहा है। गजेन्द्र की मौत ने उसे भीतर तक झकझोरा है, वह लोगों को बताना चाह रहा है कि गजेन्द्र मौत जितनी सच्ची थी, उसके आंसू भी उतने ही सच्चे हैं। वह इस मौत की सच्चाई को मिटाने के लिए पूरी जिम्मेदारी के साथ अपनी आँख से सच्चे आंसू निकाल रहा है।

गृहमंत्री ने पुलिसिया जांच के और मुख्यमंत्री ने मैजिस्ट्रेटी जांच के आदेश दिए हैं। पुलिस जांच करेगी कि आत्महत्या के लिए गजेन्द्र को किसी ने उकसाया तो नहीं था। मैजिस्ट्रेट जांच करेगा कि गजेन्द्र को किसी ने सभा बिगाड़ने के ख्याल से पेड़ पर चढ़ाया तो नहीं था। टेलीविजन चीख रहा है, वह अपनी जिम्मेदारी निभा रहा है। उसका जोर यह बताने पर है कि गजेन्द्र पगड़ी बांधने में पारंगत था, उसकी रौबीली मूंछे भी थीं, वह मरने से ऐन पहले तक हताश कत्तई नहीं था। टेलीविजन बताना चाह रहा है कि वैसे तो इस देश में किसान आत्महत्या कर रहे हैं लेकिन गजेन्द्र वैसे किसानों में नहीं था जो आत्महत्या कर लें। टेलीविजन गजेन्द्र की मौत पर शोक मनाने से पहले यह सुनिश्चित कर लेना चाहता है कि दिल्ली के जंतर-मंतर पर आम आदमी की सभा में जो हुआ वह किसी किसान का आत्महत्या करना ही था।

देश का प्रधानमंत्री, राज्य का मुख्यमंत्री, मंत्रिमंडल और पार्टी प्रवक्ता, मीडिया और उसके दर्शक-पाठक सब सन्न और शोक-संतप्त हैं, अपनी भूमिका निभा रहे हैं। बस, एक किसान है जिसकी मौत इस सजग लोकतंत्र में थामे नहीं थम रही है। शायद, देश मान चुका है कि जैसे जन्म लेने वाले की मृत्य़ु ध्रुव है वैसे ही किसान का आत्महत्या करना भी अटल सत्य है।

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव,  मूलतया छपरा(बिहार) के निवासी, पिछले पंद्रह सालों से दिल्ली में। पहले आईआईएमसी और फिर जेएनयू में पढ़ाई। “उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हिन्दी लोकवृत्त का निर्माण” शीर्षक से पीएचडी के बाद दिल्ली के कॉलेजों में छिटपुट अध्यापन, फिर टीवी चैनल की नौकरी और अब विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सीएसडीएस) की एक परियोजना इंक्लूसिव मीडिया फॉर चेंज से जुड़े हैं। इनसे  chandan@csds.in पर संपर्क संभव है। 

रजनी कोठारी और भारतीय लोकतंत्र: चंदन श्रीवास्तव

रजनी कोठारी : भारतीय लोकतंत्र का पहला पन्ना

By चंदन श्रीवास्तव

दिल्ली विश्वविद्यालय के कंधे पर किसी तिल की तरह चमकता एक संस्थान है विकासशील समाज अध्ययन पीठ यानि सीएसडीएस। यों अकादमिक संस्थानों के नाम और काम में इस देश का आम आदमी खास दिलचस्पी नहीं रखता, और उसे रखना भी क्यों चाहिए। आखिर, अकदामिक संस्थान कोई सरकार तो हैं नहीं कि उसकी जिंदगी के रोजमर्रे को निर्णायक ढंग से प्रभावित करते हों। लेकिन, सीएसडीएस इस मामले में एक अपवाद की तरह है। इस देश का आदमी चाहे और किसी बात में रुचि ना रखे लेकिन बात चुनावों की हो तो वह इसकी चर्चा चटखारे लेकर करता और सुनता है। और बेखटके कहा जा सकता है कि भारत में चलने वाली चुनावी-चर्चा को उसका मुहावरा या कह लें एक पारिभाषिक शब्दकोश देने का काम सीएसडीएस ने किया है।

Source: Illustrated by C R Sasikumar

Source: Illustrated by C R Sasikumar

पार्टियों की हार-जीत आंकड़ा कितनी सीटों तक पहुंचेगा , मतदान का प्रतिशत अगर घटा तो क्यों और बढ़ा तो क्यों, किसी पार्टी को मिले वोटों का प्रतिशत ज्यादा होने के बावजूद उसके सीटों की संख्या क्यों कम रह गई और पार्टियों के बदलते जातिगत-वर्गगत आधार ने वोटों के स्विंग का किसी चुनाव में कैसा खेल खेला- अगर हम चुनावों की चर्चा कुछ ऐसे ही मुहावरों में करते हैं तो इसलिए कि सीएसडीएस ने बीते पचास सालों से भारत में इलेक्शन स्टडी को ना सिर्फ विधागत रुप दिया है बल्कि उसे भारत की राजनीतिक सच्चाइयों को दिखाने वाले एक आईने के रुप में भी स्थापित किया है। आज अगर इलेक्शन स्टडी एक शास्त्र है और इस शास्त्र में अपना-अपना जोर दिखाने वाले खूब सारे ‘शास्त्री’ हैं तो इसलिए कि कभी सीएसडीएस में ही इस विधा का व्याकरण रचा गया था। तो आखिर किसने रचा था यह व्याकरण?

बात आज से तकरीबन पचपन साल पहले की है। तब 1928 में जन्मा का एक नौजवान, जो स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सेदार था और रॉयल इंडियन नेवी विद्रोह (1946) में शिरकत करने के कारण अंग्रेजी-जेल की हवा खा चुका था, सत्ताईस-अट्ठाईस की उम्र में लंदन स्कूल ऑव इकॉनिमिक्स से अर्थशास्त्र की डिग्री लेकर भारत लौटा और एम एस यूनिवर्सिटी वडोदरा में शिक्षक नियुक्त हुआ। वह दौर शिक्षण संस्थानों से लेकर बहस-मुबाहिसे की सार्वजनिक दुनिया तक अर्थशास्त्र के ही दबदबे का दौर था। राजनीति में मान लिया गया था कि देश की सारी समस्याओं का समाधान सही आर्थिक-मॉडल अपनाने से हो सकता है और इसी के अनुरुप तत्कालीन राजनीति अपना भरोसा पंचवर्षीय योजनाओं पर जता रही थी, राष्ट्र-निर्माण के इस दौर में जोर साइंटिफिक टेम्परामेंट के अनुकूल हरकुछ को साईंस में तब्दील करने का था और विश्वविद्यालयों के समाज-विज्ञान के विभाग एडम स्मिथ, रिकार्डो और कार्ल मार्क्स के अर्थशास्त्रीय चश्मे से सारा कुछ देखने-समझने की कोशिश में लगे थे।

वडोदरा में रहते कांग्रेस की स्थानीय राजनीति को इस नौजवान ने गौर से देखा और उसे लगा कि विश्वविद्यालयों में जैसा राजनीति-विज्ञान पढ़ाया जा रहा है, उसके किसी भी सिद्धांत से ना तो इस देश में कांग्रेस के राजनीतिक वर्चस्व की व्याख्या हो सकती है और ना ही कांग्रेस के भीतर चलने वाली उस खींच-तान की जो उसे पार्टी से ज्यादा अलग-अलग हित-समूहों के लोकतांत्रिक संघर्ष का एक प्लेटफार्म बनाती हैं। अपने इस अनुभव को इस नौजवान ने एक लेख का रुप दिया और यह लेख छपा तब के इकॉनॉमिक वीकली( अब इसका नाम इकॉनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली है) में। लेख का शीर्षक था- ‘फार्मस् एंड सब्सटांस ऑव इंडियन पॉलिटिक्स’ यानि भारतीय राजनीति का रुप और अंतर्वस्तु। यह लेख एक लेखमाला में तब्दील होकर पत्रिका के अगले पाँच अंकों तक जारी रहा और इस लेखमाला ने सनसनी मचायी। पंचायती राज, संसदीय व्यवस्था, प्रशासनिक राजनीति, दलीय-व्यवस्था ही नहीं भारतीय लोकतंत्र की दशा और दिशा जैसे शीर्षकों से सोचने वाले लोगों के लिए यह लेख-माला नए सिरे से प्रश्नों को तय करने और उत्तर तलाशने की जमीन साबित हुई। लेख ने तब के समाज-विज्ञानियों का ही नहीं जयप्रकाश नारायण और अशोक मेहता सरीखे राजनेताओं का भी ध्यान खींचा और भारत की राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले पश्चिमी मुल्क के विद्वानों का भी। ऐसे ही एक अमेरिकी विद्वान रिचर्ड पार्क ने अपने एशिया फाऊंडेशन की तरफ से इस नौजवान को सत्तर हजार रुपये दिए यह कहकर कि अपना शोध जारी रखो। लेख साल 1961 में छपा था और अगले दो सालों में इस नौजवान ने रिचर्ड पार्क के दिए इन सत्तर हजार रुपयों को समाज-विज्ञान के क्षेत्र में शोध करने वाली श्रेष्ठ संस्था यानि सीएसडीएस के रुप में तब्दील कर दिया। इस नौजवान का नाम था रजनी कोठारी और सीएसडीएस सरीखी संस्था कायम करने वाले रजनी कोठारी की उम्र तब महज 33 साल की थी।

33 साल की उम्र में एक अकादमिक संस्था की नींव रखने का साहस रजनी कोठारी के भीतर किस आशय से जन्मा होगा ? यह बात सही है कि सेंटर का मुख्य सरोकार शुरुआती दिनों में आधुनिकीकरण की प्रक्रिया को समझने का रहा। यह बात भी सच है कि शुरुआती दिनों में कोठारी किसी उदारवादी की तरह पश्चिमी लोकतंत्र को बहुत अच्छा समझते थे लेकिन उस दौर में ही ये बात साफ हो गई थी कि सेंटर में कार्यरत समाज विज्ञानी आधुनिकीकरण की किसी बंधी-बंधायी परिभाषा से संतुष्ट नहीं है। वे लोग अपने लेखन में ‘विकास’, ‘राष्ट्र-निर्माण’ और ‘सामाजिक परिवर्तन’ जैसे पदों का प्रयोग करते थे लेकिन उनके जेहन में यह बात कौंध रही थी कि एक समाज-विज्ञानी के रुप में उनका काम अमेरिकी विहेवियरलिज्म को भारतीय संदर्भ में अनूदित करना मात्र नहीं है बल्कि भारतीय समाज की अपनी विशेषताओं को समझने के लिए अवधारणा और पद्धति के स्तर पर उचित औजार तलाशने जरुरी हैं। रजनी कोठारी के ही शब्दों में कहें तो – “आर्थिक मॉडल को केंद्रीय मान लेने के कारण उस वक्त ज्ञान के विविध अनुशासनों की सीमाएं धुंधली पड़ रही थीं। अर्थशास्त्र के बर्चस्व ने ज्ञान का एक पदानुक्रम रच दिया था और किसी सामाजिक परिघटना को समझने के लिए किए जाने वाले अनुसंधान के तरीकों पर भी उसका गहरा असर था। मिसाल के लिए, किसी समाज के अजेंडे, मुद्दे और सरोकारों को गढ़ने में राजनीति की भूमिका को दरकिनार करते हुए, सिर्फ तवज्जो आर्थिक गतिविधियों को दी जाती थी। ” और ठीक इसी कारण रजनी कोठारी को लगा कि “ज्ञान के मौजूदा तौर-तरीकों को आलोचना की नजर से देखना जरुरी है।”

रजनी कोठारी की अगुवाई में सीएसडीएस ने आधुनिक भारत को भारतीय पदों में समझना शुरु किया। बौद्धिक और सांस्कृतिक आत्मविश्वास से भरा रजनी कोठारी का माथा इस बात को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था कि आधुनिकता भारत में यूरोप से लाकर रोपी गई कोई चीज है। रजनी कोठारी ने अपने बौद्धिक उपक्रम से आधुनिक भारत को परिभाषित करने वाली तत्कालीन पूर्व-सहमतियों का आधार ही बदल दिया। रजनी कोठारी से पहले भारतीय लोकतंत्र को यूरोपीय देशों में विकसित लोकतंत्र का असहज विस्तार मानने की प्रवृति थी। कुछ ऐसे भी थे जो इस धारणा की काट में यह कह रहे थे कि भारतीय लोकतंत्र एकदम ही अनूठी परिघटना है। इन दो प्रवृतियों से अलग रजनी कोठारी ने साबित किया कि भारतीय समाज का राजनीतिकरण समान रुप से उसके आधुनिकीकरण की परियोजना है। लोकतंत्र नाम की परिघटना हर देश की परिस्थिति के अनुरुप नया रुप लेती है, और उसके नए रुप की किसी और जगह के लोकतंत्र से तुलना तो की जा सकती है ताकि दोनों परस्पर एक-दूसरे के अनुभवों से समृद्ध हो सकें लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि दुनिया में हर जगह लोकतंत्र का स्वरुप एक जैसा होना चाहिए और जहां नहीं है, वहां का लोकतंत्र दोषपूर्ण है। इसी सिलसिले में रजनी कोठारी ने भारतीय राजनीति में जाति की भूमिका को एक नए सिरे से देखना सिखाया, उसे हित-समूह माना ना कि भारतीय लोकतंत्र के पिछडेपन की पहचान और पूरे विश्वासपूर्वक यह साबित किया कि भारतीय राजनीति में जाति-व्यवहार परंपरागत वर्ण-व्यवहार से अलग हितगत प्रतिस्पर्धा का व्यवहार है। इस दौर की उनकी प्रसिद्ध पुस्तकें पॉलिटिक्स इन इंडिया(1970) और कास्ट इन इंडियन पॉलिटिक्स(1973) हैं।

कोठारी की इस सोच ने बौद्धिक जगत में भारी उलट-फेर पैदा किया। वामधड़े के बुद्धिजीवी मानते थे कि सर्वे रिसर्च के नाम पर रजनी कोठारी अपना एक अलग ही अजेंडा बढ़ाने में लगे हैं और नये विचारों के विरोधी हैं। सेंटर चूंकि भारतीय राजनीति के अनुभवगम्य साक्ष्य जुटाने की कोशिश में अपने सर्वेक्षण करता था, सो मार्क्सवादी चिन्तकों में कुछेक को यह बात अटपटी लगती थी।उनकी विचार-योजना में ‘पार्टी’ भारत में क्रांति की अगुआ थी और इसलिए लोगों के विचार, सोच, राजनीतिक पसंद-नापसंद को जानने की खास जरुरत नहीं। दूसरे, कोठारी को यह भी लगता था कि 1960 के दशक में बहुत से मार्क्सवादी बुद्धिजीवी पश्चिम को राजनीतिक और बौद्धिक नवाचार की जन्मभूमि के रुप में देखते थे। तब के दौर में मार्क्सवादी खेमे के बुद्धिजीवियों की सोच में था कि पश्चिम में लोकतंत्र, उदारवाद या फिर मार्क्सवाद का जो अनुभव रहा है, भारत जैसे समाजों को ठीक वैसे ही अनुभवों की नकल करनी चाहिए ताकि एक भारतीय क्रांति की संभावना के बारे में सोचा जा सके। इसी के अनुकूल हाब्स, लॉक और मार्क्स पर राजनीतिक चिन्तन में जोर था। ऐसे बुद्धिजीवियों की सैद्धांतिक बहसों में चुनाव और उससे जुड़े सर्वे पर आधारित निष्कर्ष एकदम से मायने नहीं रखते थे।जबकि सर्वे का उद्देश्य भारतीय यथार्थ की जटिलता की व्याख्या करना था।शब्द के परंपरागत अर्थों में कोठारी राष्ट्रवादी कत्तई ना थे और ना ही पश्चिमी राजनीतिक चिन्तन से पूरी तरह संतुष्ट। वे भारत में राजनीति की भूमिका का अध्ययन करना चाहते थे। चूंकि उनपर विचारधारा का कोई दबाव नहीं था इसलिए वे पश्चिम की आँख से भारतीय राजनीतिक यथार्थ को देखने वाले बुद्धिजीवियों के तर्कदोष देख सके।

भारतीय लोकतंत्र की अपनी समझ को वे आगे और विस्तार दे पायें इसके पहले ही देश के मानस को झकझोर देने वाली घटना घटी। देश में आपात्काल लागू हुआ और रजनी कोठारी के भीतर का डेमोक्रेट एकबारगी स्तब्ध रह गया। उन्होंने अपनी स्थापनाओं पर पुनर्विचार का साहस दिखाया और ‘स्टेट अगेन्स्ट डेमोक्रेसी’ लिखकर भारतीय राजसत्ता के लोकतंत्र-रोधी तत्वों की एक तरह से समीक्षा प्रस्तुत की। गैर-दलीय जिस राजनीति को आज हम जन-आंदोलन और नागरिक संगठनों की राजनीतिक सक्रियता के नाम से जानते हैं उस राजनीति का व्याकरण रजनी कोठारी ने ही तैयार किया। 1970 के दशक में सेंटर राजसत्ता के विरोध की पुरजोर आवाज बनकर उभरा। राजनेता, जन-आंदोलनों से जुड़े लोग, पत्रकार, वकील, बुद्धिजीवी तथा विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं से जुड़े लोग इंदिरा गांधी की ‘इमर्जेंसी’ के विरोध में एकजुट हुए। सेंटर ने इन लोगों को एक प्लेटफार्म प्रदान किया और लोकतंत्र पर जारी बहस का नये सिरे से बौद्धिक दिशा-निर्देशन किया। ‘सेंटर’ ने अब तक अपने को इलेक्शन स्टडी तक ही सीमित रखा था लेकिन अब सेंटर ने चुनाव प्रक्रिया को जमीन पर चलने वाली विचार-प्रक्रियाओं से जोड़कर देखना शुरु किया। कार्यकर्ता और बुद्धिजीवियों के आपसी संवाद का परिणाम ‘लोकायन’ के रुप में सामने आया। मुबाहिसे के मंच के रुप में ‘लोकायन’ देश में सक्रिय नागरिक-सगठनों की नर्सरी साबित हुआ। आज जिन्हें हम सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता के रुप में पहचानते हैं जैसे मेधा पाटकर और वंदना शिवा, वे सब कभी लोकायन के सक्रिय सदस्य थे और वहीं उन्हें अपनी वैकल्पिक राजनीति के बुनियादी मुहावरे मिले।

संक्षेप में कहें तो रजनी कोठारी ज्ञान और कर्म के बीच की दूरी पाटने वाले उन विरली प्रतिभाओं में से एक थे जिनके लिए अंतिम जन का अधिकार लोकतंत्र की परीक्षा की अंतिम कसौटी है और जो स्वयं इस कसौटी पर खड़ा उतरने के लिए सीधी राजनीतिक भागीदारी करने से कभी गुरेज नहीं करते। खुद उन्हीं के शब्दों में- “ विचारों का जगत और राजनीति का जगत आपसे में संबद्ध हैं और एक-दूसरे पर असर डालते हैं। मौजूदा सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था की समीक्षा करने और उसकी समझ बनाने के लिए बुद्धिजीवियों को चाहिए कि वे राजनीतिक प्रक्रियाओं के महत्व को समझें। साथ ही राजनीति के क्षेत्र में जो लोग सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं उन्हें भी विचारों का महत्व समझना चाहिए। मुखामुखम की इस प्रक्रिया में मेरा विश्वास है कि हाब्स, लॉक, मिल और मार्क्स जैसे महान चिन्तकों के राजनीतिक विचार ही प्रासंगिक नहीं होते बल्कि विचारधारा का सवाल भी एक महत्वपूर्ण संदर्भ-बिन्दु बनकर उठ खड़ा होता है। बहरहाल मेरे विचार से बुद्धिजीवियों का काम महज विभिन्न स्तरों पर राजनीति द्वारा निभायी जा रही निर्णायक भूमिका का अध्ययन करना भर नहीं होता बल्कि उन्हें मौजूदा राजनीति की आलोचना भी विकसित करनी पड़ती है। मेरा यह भी कहना है कि बुद्धिजीवी को बहस में अपने आलोचनात्मक विचारों के जरिए योगदान देते हुए राजनीतिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप करना चाहिए। मेरा यह भी विश्वास है कि हमारी सोच में आत्मसमीक्षा और आलोचना का स्थान होना चाहिए। यदि हम आलोचना का स्पेस बंद करते हैं तो राजनीतिक प्रक्रिया और विचार का अंतराल बढ़ता जाएगा। यह एक बुद्धिजीवी के रुप में हमारी भूमिका को सीमित करेगा। ”

भारतीय लोकतंत्र की समझ और शक्ति को अपने विचार और काम से कोसो आगे ले जाने वाले रजनी कोठारी एक समय से उम्र के हाथो मजबूर थे। उनकी बनायी संस्था जब अपने नये अवतार में स्वर्ण-जयंती वर्ष मना रही थी तो लोगों ने उन्हें व्हील-चेयर पर चलते देखा था, भीड़ में एकदम ही अकेला। बरसो बीमार रहने के कारण आवाज इतनी मद्धम हो गई थी कि बात करना हो तो अपने कान उनके चेहरे के पास ले जाना पड़ता था। कभी आने-जाने वाले की भीड़ से भरा रहने वाला उनका दिल्ली वाला मकान लगातार सूना रहने लगा था। वे एक केयरटेकर के भरोसे थे। केयरटेकर खूब देखभाल करता था लेकिन यह भी सच है कि उसे कहीं बाहर जाना हो तो वह सुरक्षा के लिहाज से घर का दरवाजा बाहर से बंद करके जाता था और व्हीलचेयर पर बैठे रजनी कोठारी अपनी शांत-मुद्रा में उसके आने का इंतजार करते रहते थे। बाहर देश में लोकतंत्र का संघर्ष जल-जंगल-जमीन के आंदोलन के रुप में सतत जारी था लेकिन इस संघर्ष को सबसे पहले और सबसे गहरे अर्थों में समझने वाला उम्र के हाथो बेबस अपने कमरे में अकेला अब चुप बैठा रहता था।

ज्ञान को कर्म से जोड़ने वाला भारतीय राजनीति का यह सितारा आज नहीं है तो भी आंदोलनों से जन्मी एक नई-नई पार्टी उसके विचार-सरणि में नये शब्द भरकर दिल्ली विधान सभा का चुनाव लड़ा और जीता है। कौन जानता है, शायद यही रजनी कोठारी की आखिरी इच्छा हो।

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव,  मूलतया छपरा(बिहार) के निवासी, पिछले पंद्रह सालों से दिल्ली में। पहले आईआईएमसी और फिर जेएनयू में पढ़ाई। “उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हिन्दी लोकवृत्त का निर्माण” शीर्षक से पीएचडी के बाद दिल्ली के कॉलेजों में छिटपुट अध्यापन, फिर टीवी चैनल की नौकरी और अब विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सीएसडीएस) की एक परियोजना इंक्लूसिव मीडिया फॉर चेंज से जुड़े हैं। इनसे  chandan@csds.in पर संपर्क संभव है। 

साभार- हंस (मार्च, २०१५ अंक)

रुपकों-प्रतीकों का आख्यान और दिल्ली चुनाव: चंदन श्रीवास्तव

By चंदन श्रीवास्तव

जब जनता जागती है

किसी को लगा यह दीये और तूफान की लड़ाई थी, किसी ने कहा एक कंकड़ पहाड़ से भिड़ गया है, कोई बोल रहा था दसलखा सूट से डेढ़ सौ रुपल्ली का मफलर उलझ गया है। लोग साल भर से दिल्ली में जनता की सरकार देखने को आतुर थे और ज्यों-ज्यों मतदान का दिन नजदीक आ रहा था वे दिल्ली में सरकार बनाने की लड़ाई को रुपकों और प्रतीकों में बाँधकर आपस में बोल-बतिया रहे थे, अपने-अपने मुहावरे में उसके अर्थ निकाल रहे थे। दिल्ली विधान-सभा के चुनाव के नतीजों के अर्थ पार्टियों को हासिल मत-प्रतिशत के विश्लेषण से नहीं बल्कि इन रुपकों और प्रतीकों को समझने से खुलते हैं। कारण यह कि आम आदमी पार्टी ने दिल्ली विधानसभा चुनावों में जो जीत हासिल( कुल मतों का 54 प्रतिशत) की है उस जीत को वह खुद भी चाहे तो अब भविष्य में नहीं दोहरा सकती। आम आदमी पार्टी की इस सुनामी सरीखी जीत को सिर्फ दीया और तूफान या फिर कंकड़ और पहाड़ के रुपक के विश्लेषण के सहारे समझा जा सकता है। यह रुपक दिल्ली के मतदाताओं के मानस के बारे में बताता है। लोगों को लग रहा था कि यह पार्टियों की चुनावी लड़ाई नहीं बल्कि दो शख्शियतों नरेन्द्र मोदी और अरविन्द केजरीवाल की लड़ाई है, एक ऐसी लड़ाई जिसमें सेर की भिड़ंत सवा सेर नहीं बल्कि मामला हाथी के जोर के आगे एक चींटी के अड़ जाने का है। राजनीतिक जोर के मामले में एकदम से गैर-बराबर जान पड़ती इस लड़ाई में लोगों ने उसका साथ दिया जो सबसे निर्बल जान पडा रहा था। नतीजा आपके सामने है- ‘चींटी शक्कर ले चली- हाथी के सर धूलि!’

By Anindito Mukherjee, reuters

By Anindito Mukherjee, reuters

यह जीत दरअसल भारत के अंतिम जन के भीतर पलती उस नैतिकता की जीत है जो अपने मन को सदियों से यह कहकर समझाता आया है कि ‘निर्बल के बल राम’। उत्तर भारत के गांवों में कहते हैं ‘ना अन्हरा गैया(अंधी गाय) के राम रखवईया’। और अपनी इसी नैतिकता के तकाजे से जनता ने आम आदमी पार्टी का साथ दिया क्योंकि अरविन्द केजरीवाल अपनी कथनी और करनी से बीते एक साल से लोगों को जताते-बताते आ रहे थे कि लोकतंत्र में जनता ही जनार्दन होती है। उन्होंने लोगों का विश्वास हासिल हुआ क्योंकि वे निस्संकोच कहते रहे कि केजरीवाल महत्वपूर्ण नहीं है, आम आदमी पार्टी भी महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि लोकतंत्र में जनता और उसकी जरुरतों का ही प्राथमिक तथा अंतिम तौर पर महत्व है। आम आदमी पार्टी का यही संदेश दिल्ली विधानसभा चुनावों में जीत गया है। लोगों ने आम आदमी पार्टी को नहीं बल्कि खुद को वोट दिया है, स्वयं ही को जिताया है।

भाजपा से सबसे बड़ी चूक इसी मोर्चे पर हुई। उसकी मजबूती ही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन गई। फिर से यह बात सच हुई कि जो किसी ने नहीं हारता वह आखिर को खुद ही से हार जाता है। भाजपा मान चुकी थी कि पार्टी नहीं जीतती पार्टी का चेहरा जीतता है। उसका यह विश्वास लाजिम था क्योंकि नरेन्द्र मोदी के चेहरे को आगे करके भाजपा मई महीने से लेकर अब तक लगातार चुनाव जीतती आ रही थी। भाजपा को विश्वास था, जनता खुद से कोई निर्णायक राय नहीं बना सकती बल्कि रणनीतिक कौशल और प्रबंधन के बूते उसे भाजपा के पक्ष में राय बनाने के लिए विवश किया जा सकता है।भाजपा के भीतर यह विश्वास रणनीतिक कौशल के उस्ताद अमित शाह ने भरा था। अपने इसी विश्वास के बूते उसने दिल्ली में अपनी राज्य इकाई को हाशिया पर धकेलते हुए आंदोलनकारी की छवि बना चुकी किरन बेदी को साथ लिया। किरन बेदी ने लोगों से कहा आप एक वोट देंगे तो आपको दो-दो चीजें मिलेंगी। प्रधानमंत्री से विकास मिलेगा, किरने बेदी से सुरक्षा मिलेगी। चूक इस सोच से हुई। इस सोच ने भाजपा को चुनाव लड़ने वाली एक मशीन में तबदील किया । इस सोच ने लोगों को बताया कि भाजपा जनता को जनार्दन नहीं बल्कि प्रजा मानकर चल रही है, प्रजा जो दाता के आगे हाथ पसारे खड़ी रहती है, दाता के भरोसे रहती है। प्रधानमंत्री ने पार्टी की तरफ से प्रचार करते हुए इस सोच में योगदान दिया। उन्होंने अपने को ‘नसीबवाला’ साबित किया। लोगों का लगा प्रधानमंत्री अपने निजी नसीब से ‘देश के नसीब’ को जोड़कर देख रहे हैं।, दिल्ली के लोगों ने प्रजा की तरह नहीं बल्कि स्वतंत्र नागरिक की तरह आचरण किया और देश की किस्मत को किसी एक व्यक्ति की किस्मत से जोड़कर देखने वाली इस सोच को ही हरा दिया।

बिहार और बंगाल में होने वाले अगामी विधानसभा चुनावों के लिए दिल्ली की मतपेटियों से निकला जनादेश महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। इस जनादेश की गूंज देश में एक नई राजनीति की इबारत लिख सकती है। इस जनादेश से बिहार, बंगाल और यूपी सरीखे राज्यों की राजनीति के लिए दो संदेश निकले हैं। एक संदेश यह कि मीडिया केंद्रित राजनीति और मुखड़ा-केंद्रित पार्टी के इस दौर की काट की जा सकती है। लोगों के कंधे पर सहानुभूति के हाथ रखकर उन्हें जताया जा सकता है कि लोग किसी एक पार्टी के बंधुआ नहीं बल्कि सचमुच सत्ता-परिवर्तन की ताकत रखते हैं। दूसरा संदेश यह कि लोगों को सिर्फ विकास भर नहीं चाहिए। लोग रोटी, कपड़ा, मकान, सेहत, शिक्षा तो सरकार से चाहते ही हैं, उनके भीतर एक न्यायबोध भी होता है। वे चाहते हैं कि संसाधनों का बंटवारा न्यायसंगत ढंग से हो। बिहार, बंगाल और यूपी के गैर भाजपा शासित दल इन दो संदेशों के आधार पर अपनी जमीन पर भाजपा के बरक्स विपक्ष का एक कारगर विचार गढ़ सकते हैं। वे दिल्ली के जनादेश से हासिल आत्मविश्वास के सहारे साबित कर सकते हैं कि विपक्ष का विचार अभी धूमिल नहीं पडा। अगर ऐसा होता है तो माना जाएगा कि भारत में लोकतंत्र अब भी पार्टी या व्यक्ति केंद्रित नहीं बल्कि जनता-केंद्रित है!

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव,  मूलतया छपरा(बिहार) के निवासी, पिछले पंद्रह सालों से दिल्ली में। पहले आईआईएमसी और फिर जेएनयू में पढ़ाई। “उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हिन्दी लोकवृत्त का निर्माण” शीर्षक से पीएचडी के बाद दिल्ली के कॉलेजों में छिटपुट अध्यापन, फिर टीवी चैनल की नौकरी और अब विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सीएसडीएस) की एक परियोजना इंक्लूसिव मीडिया फॉर चेंज से जुड़े हैं। इनसे  chandan@csds.in पर संपर्क संभव है। 

चॉकलेटी समय में एक गुलमिर्च: चंदन श्रीवास्तव

दो दिन पहले ही किसी एक अनाम/रहस्मय कथाकार का एक पोस्ट लगाया था- एक मिट्टी दो पौधे: मेघना राव उर्फ गोदावरियम्मा और अमेरिका यादव. इस कथा-अंश को प्राप्त करने की प्रक्रिया के बारे में भी आपको अवगत कराया था. हिंदी का औसत बौद्धिक-समाज (क्रांतिकारी/गैर क्रांतिकारी तमाम) एक अवसरवादी समाज है ,  हमारी इस मान्यता को चन्दन श्रीवास्तव ने ध्वस्त किया है.  उन्होंने बिना इस बात की परवाह किये कि यह रचना किसकी है, किसकी हो सकती , एक बेवाक टिपण्णी भेजी है. हिंदी समाज अब कयास भी लगाने को तैयार नहीं है, उसे किसी का नाम चाहिए ताकि हमारा एक-एक शब्द-वाणी बिना सटीक निशाने के जाया न हो, बिना चापलूसी के तर हुए वापस न आये. हमारा मानना है कि चंदन श्रीवास्तव हिंदी बौद्धिक-वृत्त के उन कुछ चुनिंदा लोगों में से हैं, जिन्होंने अवसरवादी/चेला-चुहुलवादी चकल्लसों के विपरीत अपनी एक नियति तय की है. उनकी आंखें सही अर्थों में पुस्तक पगी हैं,  पुस्तकों से आँखों के पगने का मतलब धूर्त, यारबाजी से तरबतर बौद्धिक ऐय्यारियाँ नहीं होती हैं. चन्दन श्रीवास्तव का लेखन और व्यवहार अक्सर इसे साबित करता है. तिरछीस्पेल्लिंग उनके इस स्टैंड और बौद्धिक त्वरा को लेकर अक्सर आभारी रहेगा. 

ब्रूनो द्यूमों निर्देशित एक धारावाहिक का दृश्य

ब्रूनो द्यूमों निर्देशित एक धारावाहिक का दृश्य

By चंदन श्रीवास्तव 

हिन्दी में साहित्य के स्पेस को पत्रकारिता ने हथिया लिया है। पत्रकारों को कहा जाता है, ऐसी भाषा लिखो कि उसे चबाना नहीं पड़े, मुंह में पड़े और घुल जाये। साहित्यकार से कहा जाता है- पत्रकारों वाली भाषा लिखो क्योंकि पत्रकारिता बढ़ रही है, उस सरीखी भाषा लिखने से साहित्य भी बढ़ेगा, फले-फूलेगा। कुल मिलाकर साहित्य और पत्रकारिता नाम के भाषाई उपक्रम के लिए जोर मुंह में जाते ही घुल जाने वाली भाषा पर होता है..गोया भाषा ना हुई, चॉकलेट हुई!

साहित्य की भाषा पर पड़ते इस दबाव ने साहित्य से विचारशीलता को खत्म किया है.. चॉकलेट तैयार करने की कला खूब परवान चढ़ रही है..ब्लॉग और फेसबुक सरीखे मर्तबान आ गये हैं, चॉकलेट वहां रोज धरे और सजाये जा रहे हैं..इंटरनेट गजब का कारखाना है, चॉकलेट-कर्म में इसने कमाल का इजाफा किया है..

‘तिरछी’ पर लगा यह पोस्ट चॉकलेट चुभलाने की अभ्यस्त होती जा रही हिन्दी की जीभ पर गुलमिर्च रखती है..यह हिन्दी साहित्य के भीतर विचारशीलता की वापसी का उपक्रम है और मजा देखिए कि लेखक ने यह किया है पत्रकारिता(जिन्हें इस शब्द से परहेज है वे यहां मीडिया पढें) की भाषा में ही। सहारा लिया है ईमेल का और सजाया है उसे ब्लॉग के मर्तबान में ही..लेकिन घर में घुसकर, घरऊ बनकर पूरे घर को बदलने की कोशिश है यह…

पहली ही पंक्ति देखिए– “र्स्टेशन शहर के पिछवाड़े है जहां टैक्सी, आटो और रिक्शा स्टैंड है, गांव की तरफ एक छोटा सा बाजार है जहां मिठाई के मर्तबानों, यहां तक की तीखी पकौड़ियों और लोगों के सिरों तक पर गहरे कत्थई हड्डे मंडराते रहते हैं, उन्हें देखते हुए लगता है जैसे भुने हुए चने के दानों को पंख लग गए हों.”

फिलहाल इस एक वाक्य पर सोचें. पोस्ट किए गए कथा-अंश की बनावट में यह वाक्य क्यों महत्वपूर्ण है, इसपर यहां नहीं लिखकर फिलहाल इतना ही सोचना ठीक होगा कि यह एक वाक्य वाक्य चॉकलेटी वृतांतों के विरुद्ध कैसे विचारशीलता को खड़ा करता है, आत्ममुग्ध होने पर विवश करते मीडियाई उपकरणों के बरक्स कैसे आत्म के संघटन का प्रयत्न करता है..

यह वाक्य कुछ-कुछ वैसा ही जैसे कोई कैमरा लेकर चले और पूर्वापर क्रम से ठौर-ठिकानों का भूगोल दिखाये—- शहर..शहर के पिछवाड़े स्टेशन..टैक्सी ऑटो और रिक्शा-स्टैंड… फिर छोटा सा बाजार और बाजार के पार गांव..गांव के संकेत के रुप में बाजार का ठहराव एक दुकान पर..दुकान में मिठाई के मर्तबान..और फिर यहां रंगों का संयोजन— कत्थई हड्डा–भुने हुए चने के दानों को जैसे पंख लगे हों.. और हड्डे का अर्थ विस्तार कुछ ऐसे— ‘तीखी पकौड़ियों पर ही नहीं बल्कि लोगों के सर तक पर मंडराते हैं…’

सिर पर मंडराना एक मुहावरा है- आसन्न खतरे की सूचना..कायदे से हड्डे को मिठाई पर मंडराना था..वह तीखी पकौड़ियों पर ही नहीं बल्कि लोगों के सर पर भी मंडरा रहा है..उसकी शक्ल कैसी है? ऐसी कि जैसे भुने हुए चने को पंख लग गये हैं..एक बार फिर से मुहावरा..(गौर यह भी करें कि मुहावरे झमाके से नहीं, आहिस्ते से आ रहे हैं, बिना किसी पूर्व सूचना के और ऐसा खास मकसद से हो रहा है, लेकिन इस पर अभी नहीं..).

क्या यहां खड़ा हुआ यह पूरा चित्र गांव में समाती जा रही भूख की सूचना है, ग्रामवासिनी भारतमाता की संतानों के क्षुधातुर होते जाने की सूचना..? क्या यह पूरा चित्र इस बात की पेशबन्दी है कि भूख(विपन्नता) से बिलबिलाकर कुछ विप्लवी निकलेंगे(कथा में आया पीलिया का मारा छात्र अमेरिका यादव)?..क्या यह चित्र इस बात की सूचना है कि “रूरल मार्केट को विजिट कर लोगों को कंपनी के उत्पादों से परिचित” कराने का उद्देश्य पूरा करने के लिए “कम्पेन टीम के लड़के रेकी” करके लौट चुके हैं और दरअसल रेकी वाले लड़के और उनसे लगा-बंधा पूरा इंतजाम(प्रबंधन) ही वह हड्डा है जो पूरे रुरल को मार्केट बनाकर उसपर मंडरा रहा है? या, फिर यह चित्र कथा में आगे आने वाले एक और चित्र की सूचना है..इस बात की सूचना कि इदरीस की दुकान पर मेघना राव नाम की एक मिठाई बैठेगी..सौन्दर्य लोलुप पुरुषों का वहां नागिन डांस होगा..मेघना राव नाम की मिठाई पर अमेरिका यादव नाम का हड्डा मंडराएगा, हड्डे के डंक के रुप में एक गोली चलेगी ?

कैमरे से फिल्माने चलेंगे तो परस्पर संबद्ध ये बातें उसकी पकड़ से बाहर निकल जायेंगी..वह एक चित्र-परिवेश खड़ा करके इतनी बातों को बांध नहीं सकता..कुछ चीजों को सिर्फ कलम पकड़ सकती है। मतलब, पहला काम तो लेखक ने छपे हुए शब्द की स्वायत्तता के कोण से किया। चलंत-चित्र की भाषा के दबदबे के आगे झुका नहीं, छवियां बनायी जरुर मगर उतनी और वैसी ही जितनी और जैसे से वह अपना मनचीता अर्थ-आग्रह खड़ा कर सके.

छवि छुपाती है। एक ऐसे दौर में जब सारा कुछ HD फार्मेट में देखा जा रहा..जिस दौर की सबसे बड़ी समस्या चेहरे के पिम्पल्स हैं, जहां जोर ‘स्कॉर’ छुपाने और अपने भीतर के ‘स्टार’ को दिखाने पर है..(एक विज्ञापन में लड़की कहती है, प्लीज मेरे पिक्स अपलोड मत करना, लड़की हाई डिफिनिशन और मेगापिक्सल की ताकत जानती है) .. जब सबकुछ माइक्रोस्कोपिक डेप्थ और टेलिस्कोपिक लेंग्थ में दिखाया जा रहा है ताकि आपकी आंखों से छुपाने के लिए कुछ भी ना रहे( एक विज्ञापन की लाइन है—‘जब छुपाने के लिए कुछ भी नहीं’) , तब भी बहुत कुछ छुपा हुआ है, छुपाया जा रहा है और यह छुपाना अपने आप में आपराधिक है—- दूसरा काम लेखक ने यह खोजने- दिखाने का किया है। जो चीजें इतनी ज्यादा नजर आती हैं कि फिर उनके भीतर का चौंकाऊपन चूक जाता है और ठीक इसी कारण कारण दृश्य बनने की उनके भीतर योग्यता तक नहीं रह जाती, लेखक ने ऐसी चीजों को दृश्यमान किया है, उन्हें चौंकाऊ बनाया है, कह लें जिसे मुर्दा मान लिया गया था उसे जिन्दा किया है। ऐसी चीजों पर छपे निशानों को खोजा है लेखक ने।

यह काम कथा के पहले वाक्य से शुरु हो जाता है.और लगातार चलता है.(इसकी एक चुभती हुई मिसाल है वह पंक्ति जो ‘मिस नार्थ ऑफ फन रिपब्लिक’ प्रतियोगिता के बारे में एक पात्र के जबान से फिसलती है– “गलत है, सरे नौ से गलत भाईजान, इतनी दूर से ककड़ी की बतिया जैसी लड़कियों के रोएं दिखाई दे रहे हैं, वे ठीक से जवान नहीं हो पाई हैं, जरूर उनके वालिदैन ने उमर का गलत सर्टिफिकेट दिया होगा.”)

चीजों को गौर से देखिए, उसपर सिर्फ अपने समय की ही छाप नहीं होती बल्कि अपने समय के छाप के विरोध में भी एक छाप होती है. चीजें अपने स्वभाव के विरुद्ध होने से इनकार करती हैं. शायद यह बताने की कथा-युक्ति है यह।

लेकिन अभी इतना ही… क्योंकि शायद यह कथा किसी भावी उपन्यास का अंशमात्र है

(पुनश्च—सरसरी निगाह से पढ़ा तो भी यह अटका कि कुछ वाक्य विचार का बोझ नहीं संभाल पाये हैं, सो विचार-भार से उनका व्याकरण लचक रहा है. कहीं-कहीं अगले वाक्य में जाने की हड़बड़ी है. इस फेर में अर्थ का संघनन बाधित हो रहा है. मैं मानकर चल रहा हूं, कथाकार कथा कहने का उस्ताद है और पत्रकारिता के अदब में खूब गहरे पगा हुआ, सो, वह अपने इदरीस भाई की कैंची लेकर जरुरी कतर ब्यौंत करके फाइनल प्रिन्ट मंजर-ए-आम करेगा. रफ कट देखकर फिलहाल के चलन के हिसाब से यह फिल्मी गाना याद आ रहा– जब रात है ऐसी मतवाली तो सुब्ह का आलम क्या होगा)

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव,  मूलतया छपरा(बिहार) के निवासी, पिछले पंद्रह सालों से दिल्ली में। पहले आईआईएमसी और फिर जेएनयू में पढ़ाई। “उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हिन्दी लोकवृत्त का निर्माण” शीर्षक से पीएचडी के बाद दिल्ली के कॉलेजों में छिटपुट अध्यापन, फिर टीवी चैनल की नौकरी और अब विकासशील समाज अध्ययन पीठ(सीएसडीएस) की एक परियोजना इंक्लूसिव मीडिया फॉर चेंज से जुड़े हैं। इनसे  chandan@csds.in पर संपर्क संभव है। 

‘संपूर्ण क्रांति’ और ‘रेलगाड़ी’ के बीच जरुरी अन्तर को ‘बाग़-ए-बेदिल’ में खोजता हमारे जमाने का एक ‘मीर’: चंदन श्रीवास्तव

शराबी की अद्भुत सूक्तियां लिखने वाले कृष्ण कल्पित जी , सद्य प्रकाशित काव्य-संकलन ‘बाग़-ए-बेदिल’ कारण इधर घनघोर चर्चा के केंद्र बने हुए हैं. बहुतेरे लोगों ने उनकी पूर्व-पंक्तियाँ के आधार पर ही मान लिया था कि वे अब प्रकाश में नहीं आयेंगें। शराबी की सूक्तियां नामक कितबिया में वे पहले ही लिख गए थे- कभी प्रकाश में नहीं आता शराबी/ अंधेरे में धीरे धीरे/ विलीन हो जाता है. कविता के प्रति जैसा समर्पण/लगाव इस शराबी के पास है वैसा रेअर ही देखने को मिलता है. और यह रेअरनेस ही वह जिजीविषा है जो उन्हें बार-बार प्रकाश में लाता है. बाग़-ए-बेदिल वाला प्रकाश तो इतना तेज है कि बहुतेरों की आँखें चौंधिया गयी हैं और बहुतेरे ऐसे हैं जो इस तेज में भी बारीकियां पढ़ रहे हैं.

‘बाग़-ए-बेदिल’ पर जे.एन.यू में आयोजित संगोष्ठी में चन्दन श्रीवास्तव एक वक्ता के बतौर आमंत्रित थे. इस संगोष्ठी में उनके कविता-कर्म को गम्भीरता से लेने की जरुरत महसूस की गयी. चन्दन श्रीवास्तव का यह यह लेख इसी प्रक्रिया की शुरूआती कड़ी है. बाग़-ए-बेदिल और कृष्ण कल्पित के कवि-व्यक्तित्व के ऊपर आगे भी लेख दिए जायेंगे।  

बाग़-ए-बेदिल

बाग़-ए-बेदिल

By  चंदन श्रीवास्तव

विश्वविद्यालयी दिनों की ट्रेनिंग की वजह से तबीयत कुछ ऐसी हो चली है कि लफ्ज किताब सुनते ही मन में एक रटी-रटायी पंक्ति गूंजने लगती है- आखिर! इस किताब की पॉलिटिक्स क्या है ? हैरत नहीं कि किताब बाग़-ए-बेदिल हाथ आई तो ऐसा ही हुआ। किताब भारी-भरकम है, आकार से भी और आवाज से भी। अदबी मुआमले की समझ के मामले में अपनी औकात देखी तो भार उठाने की हिम्मत नहीं हुई। सोचा, चलो किसी और के लिखे से काम चलाते हैं। और इसी फिराक में नजर अटकी बाग़ ए बेदिल पर कवि अरुणकमल की टिप्पणी के एक टुकड़े पर कि – “ कल्पित ने अतीत को वर्तमान में ढाल दिया है और वर्तमान को अतीत में ढालकर उसे व्यतीत होने से रोका है, इसलिए हर कविता कई कालों में प्रवाहित होती है। ” कहते हैं बदलाव सृष्टि का नियम है। अपनी इतिहास-प्रदत्त स्थिति के कारण आप उससे सहमत-असहमत हो सकते हैं। सो, अरुणकमल की पंक्ति को पढ़कर लगा कृष्ण कल्पित की कोशिश समय के अनवरत घूमते पहिए को थाम लेने की है। लगा, कृष्ण कल्पित अपने खास समय के भीतर बदलाव के किसी रंग-ढंग से असहमत हैं और ‘कविता के कुरुक्षेत्र’ में उस बदलाव पर जीत हासिल करने के लिए उतरे हैं।

लेकिन, कृष्ण कल्पित का अपने कवि और कविता के बारे में ख्याल ऐसा निष्कर्ष निकालने से रोकता है। अपने कवि-कर्म को लेकर कल्पित साहब का कहना है कि -“ ये कवितायें एक उपेक्षित और दीवार से लगा दिए गए कवि की प्रति-कवितायें हैं।”  और “ इन कविताओं में शब्दों का आयुधों और अस्त्र-शस्त्रों की तरह उपयोग आत्म-रक्षार्थ ही हुआ है..किसी दुश्मन, किसी भूखंड, या कीर्ति को विजित करने के लिए नहीं। हर कवि को अपने लिए एक कवच का निर्माण करना पड़ता है और कविता-साधना तो निश्चय ही किसी निरंतर युद्ध से कम नहीं..। ” आगे परंपरा का निजी-पाठ करते हुए उन्होंने यह भी जोड़ा है कि-“प्रागैतिहासिक काल से ही कविता से तीर-तमंचों का काम लिया जाता रहा है- आत्मरक्षार्थ या मानवता की रक्षा के लिए। ” इस शुरुआती (इस वजह से कच्चे और अधबने) पाठ में अगले अनुच्छेदों तक कोशिश करुंगा कि बाग़-ए-बेदिल को कृष्ण कल्पित के आत्म-वक्तव्य के प्रति ईमानदार रहते हुए पढ़ने की कोशिश करुं और इस निष्कर्ष निकालने की हिम्मत जुटा सकूं कि अतीत को वर्तमान में ढालना या फिर वर्तमान को अतीत में ढालकर उसे व्यतीत होने से रोकना कल्पित की कविता की पॉलिटिक्स के भीतर एक प्रक्रिया है, परिणति कत्तई नहीं।

बाग़ ए बेदिल के अपने पाठ की शुरुआत इस प्रश्न से करें – कृष्ण कल्पित को क्यों लगता है कि उनकी कवितायें एक उपेक्षित और दीवार से लगा दिए गए कवि की प्रति-कवितायें हैं? अपनी भारी-भरकम काया में सैकड़ों कविताओं को समेटने वाली इस किताब का उत्तर होगा एक शिकायत या कह लें फरियाद की शक्ल में सामने आयेगा-

उस देश में जेबकतरों की तरह कवियों ने भी अपने इलाके बांट रखे थेमी लार्ड।

वहां गिरहकटोंपिंडारियों मवालियों कबाड़ियों और हलकटों को कवि कहने का रिवाज थाहुजूर।

औरकवियों से उस देश में अपराधियों का सा सलूक किया जाता थामहोदय!…

कबाड़ीपन और कवि-कर्म के बीच का भेद क्योंकर मिट रहा है ? बाग़-ए-बेदिल का उत्तर है-

‘ यह विचार विपथता इसलिए थी,

कि वह उस जनपद का नहींदस जनपथ का कवि थासार्त्र !

बाग़-ए-बेदिल की कविता विपथता का कारण विपर्यय में खोजती है। ‘ जनपद ’( याद करें पुराने वक्तों के महाजनपदों को, देश से राष्ट्र बनने की हिंसक प्रक्रिया को, मेट्रोपॉलिटनी सार्वभौमिकता से स्थानीयता को बचाये रखने की जुगत को) और ‘दस जनपथ ’( 10 डाऊनिंग स्ट्रीट से निकले लोकतंत्र/आधुनिकता की भारतीय अनुकृति का नया संस्करण) के बीच का विपर्यय। जिससे अपेक्षा थी कि ‘उस जनपद का कवि’होकर रहेगा वह ‘दस जनपथ का कवि’ जिस समय के भीतर बनने को बाध्य हुआ उस समय के लक्षण क्या हैं ? वह समय कौन-सा है जिसमें कवि हलकट बनने को बाध्य और आतुर एक साथ है? बाग़-ए-बेदिल का उत्तर है-

जेपी, लोकतंत्र की आँख से ढलका हुआ आंसू था,

जो अब सूख चला हैपार्थ।

कि जनता आती है’ वाले विशाल मैदान में,

अब बाजीगर और रंडियां घूमते हैं।

दरअस्ल संपूर्ण क्रांति अब एक रेलगाड़ी का नाम हैसार्त्र!

और, ऐसे समय में क्या अघट घट रहा है ?

बाग़-ए-बेदिल की मानें तो-

ब्राह्नणों की फौज से जब घिर गई मायावती,

देख लेना एक दिन उसको बना देंगे सती।

बीवियां फिरती हैं दुनिया भर में कत्थक नाचतीं,

और, भारत मां तुम्हारे घर में बर्तन मांजती,

बुझ गये दीपक तो क्या आओ उतारें आरती,

वाजपेयी को मिला सम्मान भारत-भारती।

एक ऐसे समय में जब मर्यादाओं का भयंकर उलटफेर आंखों के आगे हो, कविता और कबाड़ का, कवि और गिरहकट का अंतर समाप्त हो रहा हो, तो कृष्ण कल्पित के अपने ही शब्दों में मानवता के रक्षार्थ कविता और कवि को क्या करना चाहिए? दूसरे शब्दों में, जब व्यवस्था अपने बाशिन्दों को विज्ञापनी भाषा में समझा रही हो कि दरअसल क्रांति एक रेलगाड़ी का ही नाम है और वह इस तरह कि तुम अपने जनपद से चलकर दस जनपथ और दस जनपथ(और उसके पसारे) से निकलकर अपने जनपद के भीतर अबाध आवाजाही कर सकते हो, और इस तरह, मानवीय मुक्ति के एक नये आख्यान में प्रवेश कर सकते हो, तो कविता, व्यवस्था की इस भाषा के काट में क्या करे ? किन शब्दों से बने कौन-से आयुध लाये ? इस प्रश्न का उत्तर खोजने चलें तो एक रास्ता खुलता है जिसपर चलकर आप कह सकें कि अतीत को वर्तमान में ढालना और वर्तमान को अतीत में ढालकर उसे व्यतीत होने से रोकना दरअसल कृष्ण कल्पित की कविता के लिए एक प्रक्रिया है और परिणति है उस भाषा को हासिल करने की कोशिश करना जो मुक्ति की प्रचलित भाषा की काट में खड़ी हो।

कल्पित इस भाषा को खोजने के लिए बार-बार अतीत की कविता के उस्तादों के पास लौटते हैं। चाहें तो कह लें, शेखावटी, जयपुर, पटना जैसे ‘उस जनपद’ का अपना घर “लुटियन दिल्ली” के जोर से लुट जाने का गम गलत करने के लिए किसी पीर-फकीर-शायर की मजार पर बैठना चाहते हैं। वहां झरने वाली निबौलियों को उठाकर पूरे हिन्दुस्तान की कविता की रिवायत के भीतर बे दर-ओ-दीवार का एक घर बसाना चाहते हैं। उन्हें उम्मीद, वहां से प्रचलित भाषा की काट करने वाली एक भाषा मिल सकेगी।यही वजह रही होगी जो पुस्तक के शीर्षक में आया शब्द बेदिल किताब के हर्फों में एक कहानी लेकर जिन्दा होता है। कहानी कविता के भेष में कुछ यों है कि-

औरंगजेब के बड़े बेटे आजमशाह ने,

बेदिल आजीमाबादी/देहलवी को मिलने के लिए बुलाया

तो बेदिल ने यह मिसरा लिख भेजापार्थ!

दुनिया अगर देहेन्द न जुम्बम ज जाए खीश- मन बस्ता अम हिनाए-किनायत ब जाये खीश

( दुनिया भी अगर दे दो तब भी मैं अपनी जगह से नहीं हिलूंगा क्योंकि मैंने अपने पांवों में सब्र की मेहंदी लगा ली है)

कविता के भीतर इस कथा की पुनर्वासी करके कल्पित एक साथ कई काम करते हैं। एक तो वे आपके मन के भीतर पैठी ऐसी ही अनेक कथाओं के लिए राह खोलते हैं। इस कथा को पढ़कर बिरला ही होगा जिसके मुंह पर यह पंक्ति ना आ जाये- आवत जात पनहिया टूटी बिसर गयोहरिनाम- संतन को कहा सिकरी सो काम। किसी को मिर्जा गालिब का यह शेर भी याद आ सकता है- हजार कस्द करता हूं इस जा से कहीं और जाने का- दिल कहता है तू जा मैं नहीं जाने का। और, बेतरतरीबी के तर्क से मन के किसी कोने में बैठा ‘अंगद का पाँव’ भी याद आ सकता है। तेजरफ्तारी अगर आज के जीवन और जगत को परिभाषित करने वाली वर्चस्वकारी भाषा है तो फिर कृष्ण कल्पित कविता के उस्तादों के पास जाकर वहां से उनके ठहराव ढूंढ़ लाते हैं।जो कोई बेदिल की तरह सब्र की मेहँदी लगाकर ठहरा है, कोई किसी भक्तकवि की तरह रामकथा में रमने की वजह से ठहरा है तो कोई गालिब की तरह नये-पुराने पस-ओ-पेश में पड़कर ठहरा हुआ है। ठहराव का अपना निजी ठौर खोज सकें- इसके लिए कृष्ण कल्पित की कविता कथाओं या कह लें काव्य-पंक्तियों की एक झनकार(शुक्लजी के शब्दों में कहें तो अर्थ और प्रसंग का गर्भत्व) रचती है। कल्पित की कविताओं(बाग़-ए-बेदिल में) के शब्द और पंक्तियां ‘अर्थ’ और ‘प्रसंग’खोजने के क्रम जब ‘आखर’ तलाशती हैं तो एक पूरा सिलसिला कायम हो जाता है, पूरब की कविता के रुप-शिल्प, कथ्य और वस्तु को सुनने-सुनाने का। कवि अपनी तरफ आखर और अरथ की पूरी परंपरा सौंपने को उत्सुक है ताकि पाठक नये सिरे से रचने और लड़ने के लिए तैयार हो सकें।

आखिर को एक बात दो शब्द “पार्थ” और “सार्त्र” पर। बाग ए बेदिल की कविता का स्थापत्य इन दो शब्दों के बिना संभव नहीं। जैसे कबीर की कविता में संबोध्य का चयन(साधो, संत, पांड़े/बांभन) के अनुकूल कविता की वस्तु बदलती है, साथी ही इन शब्दों के आने के साथ मानो विषय की घोषणा हो जाती है, ठीक उसी तरह कृष्ण कल्पित के बाग़-ए-बेदिल में ‘पार्थ’ और ‘सार्त्र’ कविता की बनावट के दो पाट हैं, और अपने नाम के अनुकूल वस्तु को धारण करते हैं। पार्थ, कुरुक्षेत्र यानि भावी महाविनाश की आशंका के बीच किंकर्तव्यविमूढ़ खड़ा पात्र है, कृष्ण उसे कर्तव्य का उपदेश देते हैं- युद्धस्व..। आशंका सार्त्र के साथ भी है। दो विश्वयुद्धों के बीच खड़ा एक चिन्तक जिसकी आंखों के आगे आधुनिकता या कह लें तर्कबुद्धि पर आधारित राज्यसत्ता/विज्ञान/उद्योग का चरित्र उजागर हुआ और आधुनिकता प्रदत्त मानव-मुक्ति का आख्यान हिरोशिमा पर परमाणु बम के धमाके के साथ दम तोड़ गया। पार्थ के सामने अपने समय की मर्यादाओं के भंग होने का संकट खड़ा हुआ था तो सार्त्र के सामने नई मर्यादाओं के भंग होने का संकट, वे मर्यादाएं जिनका वादा था- हमारे चौखटे में रहो, मुक्ति हो जाओगे । आधुनिक और प्राचीन, दोनों ने मुक्ति शब्द के साथ छल किया- इस बात के दो गवाह कृष्ण कल्पित की कविता में‘पार्थ’ और ‘सार्त्र’ हैं। दोनों को हाजिर-नाजिर जान, बाग़-ए-बेदिल कभी पीड़ा, कभी व्यंग्य, कभी पुकार तो कभी ललकार और कई बार हिकारत के स्वर में बोलती है।

जाहिर है, ग्लोबल गांव होने की जिद में पड़ी दुनिया के विस्थापितों/ शापितों की जगतपीड़ा और आत्मपीड़ा में नाभिनाल रिश्ता बैठाने को बेचैन यह यायावर कवि कृष्ण कल्पित अपने ठौर के तौर पर पार्थ और सार्थ को ही चुन सकता था।

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव,  मूलतया छपरा(बिहार) के निवासी, पिछले पंद्रह सालों से दिल्ली में। पहले आईआईएमसी और फिर जेएनयू में पढ़ाई। “उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हिन्दी लोकवृत्त का निर्माण” शीर्षक से पीएचडी के बाद दिल्ली के कॉलेजों में छिटपुट अध्यापन, फिर टीवी चैनल की नौकरी और अब विकासशील समाज अध्ययन पीठ(सीएसडीएस) की एक परियोजना इंक्लूसिव मीडिया फॉर चेंज से जुड़े हैं। इनसे  chandan@csds.in पर संपर्क संभव है। 

( यह कृष्ण कल्पित को समझने की शुरुआती कोशिश है. लिखने वाले ने ना तो उनकी सारी रचनाओं का पाठ किया है और ना ही पढ़ी हुई कविताओं पर पर्याप्त समय देकर सोचा है। अगर बेतरतीबी के भीतर से कोई तरतीब बन सकती हो तो इस कोशिश को भी इसी रुप में देखा जाय)

बाग़-ए-बेदिल, अंतिका प्रकाशन , प्रकाशन वर्ष : 2013, पृ. सं: 512, मूल्‍य : HB 850/-, PB 450/- 

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