दंगा भेजियो मौला! उर्फ़ भारतीय मुसलमानों की नियति: संजीव कुमार

कोई तो वजह रही होगी कि अनिल यादव के संकलन ‘नगरवधुएं अख़बार नहीं पढ़तीं’ (2011, अंतिका प्रकाशन, ग़ाजि़याबाद) से पहली बार गुज़रते हुए ‘दंगा भेजियो मौला!’ कहानी पढ़ने से रह गयी! जहां तक याद आता है, कहानी का पहला पृष्ठ पढ़ने के बाद उसे छोड़ दिया था। संभव है, ‘लोककवि का बिरहा’ और ‘नगरवधुएं अख़बार नहीं पढ़तीं’ जैसी चर्चित कहानियों ने, जिनका नाम पहले से सुना हुआ था, पूरा ध्यान अपनी ओर खींच लिया हो और इपंले (इन पंक्तियों के लेखक) को आश्वस्त कर दिया हो कि जब हमें पढ़ ही लिया तो और क्या रक्खा है?

लेकिन यही कुल वजह नहीं रही होगी। पहला पृष्ठ पढ़ने के बाद कहानी छोड़ी गयी, इससे लगता है कि मुख्य कारण कहीं और है। पाठक-पंछी आया तो… पर फंसा नहीं! वह पास आता ही नहीं तो बात और थी। इससे क्या यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि दाने बिखेरने और जाल बिछाने में कहानीकार की ओर से कहीं चूक रह गयी?… जी हां, बहुत घटिया रूपक है।[1] पर आप भी समझते हैं, यहां आशय बस इतना है कि कहानी अगर अपनी शुरुआत से ही पाठक को बांध नहीं लेती तो यह कहानीकार के सामर्थ्य की न्यूनता का प्रमाण है! वह कहानी ही क्या जो पढ़ते चले जाने को बाध्य न कर दे!..

यक़ीन मानिए, कुछ समय पहले तक इपंले ऐसा ही मानता था, पर ‘दंगा भेजियो मौला!’ जैसी कहानियों ने बताया कि ऐसा मानने में कितनी समस्याएं हैं। इपंले जब पाठक को पंछी और पाठ की शुरुआत को दाना बताता है तो वह इस हक़ीक़त पर पर्दा डाल देता है कि पाठकीय योग्यता भी अलग-अलग तरह की होती है। जब वह कहता है कि ‘अपनी शुरुआत से ही जो पाठक को बांध न ले…’ वगैरह, तो वह निहित रूप में स्वयं को एक आदर्श पाठक बता रहा होता है, जिसकी कसौटी पर कहानी की सम्मोहन-क्षमता को कस कर उसके बारे में वस्तुनिष्ठता का दावा करनेवाला एक फ़ैसला सुनाया जा सकता है। जबकि सचाई यह है कि वह ख़ास तरह की शक्तियों और सीमाओं से युक्त पाठक है और कहानी के साथ न बंध पाना, उसे छोड़ कर आगे बढ़ जाना, हो सकता है, कहानी की नहीं, बतौर पाठक खुद उसकी सीमाओं का निदर्शन हो। शब्द जिन भावों/अनुभवों/स्मृतियों को कुरेदना चाहते हैं, हो सकता है, वे इस ‘ख़ास’ पाठक के भीतर नगण्य वा नदारद हों। फिर कुरेदने की कला कितनी भी समर्थ हो, इस पाठक के पक्ष में उससे निकलेगा क्या? इस तरह जो अयोग्यता पाठक की है, उसे उलट कर कहानी और कहानीकार की अयोग्यता बता दिया जाता है। इसे कहते हैं, नाच न जाने, आंगन टेढ़ा! #लेखक

Snapshot from Goodnight Mommy (2015)

Snapshot from Goodnight Mommy (2015)

 

दंगे में आएंगे

By संजीव कुमार

‘दंगा भेजियो मौला!’ कहानी एक दृश्य से शुरू होती है। यह ऐसा दृश्य है जिसकी अपने मन के पटल पर पुनर्रचना कर पाना सीमित अनुभव वाले इपंले सरीखे एक मध्यवर्गीय के लिए थोड़ा मुश्किल है। सिनेमा तो है नहीं कि दृश्य बना-बनाया मिल जाए! कहानी के पाठक को शब्दों से निकाल कर दृश्य की पुनर्रचना करनी होती है और इस काम में उसके अपने अनुभव और स्मृतियों का योगदान होता है। इसीलिए बहुत चित्रात्मक और बिंबधर्मी वर्णन-विवरण भी अलग-अलग पाठक के मन में अलग-अलग बिंब निर्मित करते हैं। साहित्यिक कृतियों के फि़ल्मांतरण के खि़लाफ़ यह एक मज़बूत तर्क रहा है कि इससे अनंत संभावनाओं का निशेध होकर कृति एक निश्चित दृश्यावली में रूढ़/फि़क्स हो जाती है। इस तर्क से बहस हो सकती है, पर वह अभी छेड़नी नहीं है। कहना बस इतना है कि जब हम कहानी के दृश्य की बात करते हैं तो वहां पाठक भी सक्रिय भूमिका में होता है – उसके मन में दृश्य का उभरना जितना शब्दों को बरतने के कहानीकार के कौशल पर निर्भर करता है, उतना ही उसके अपने अनुभव-स्मृतियों की थाती तथा उसी से जुड़ी, शब्दों को दृश्यांतरित करने की योग्यता पर भी।

लगता है, पहली बार ‘दंगा भेजियो मौला!’ पढ़ते हुए इसी थाती और योग्यता पर मामला अटक गया था। इपंले दृश्य को अपने अंदर क़ायदे से रच नहीं पाया, इसीलिए तल्लीनता बनी नहीं और कहानी छूट गयी।

तो ऐसा क्या है इस दृश्य में?

असल में, वह जो भी है, सिर्फ़ इस दृश्य में नहीं, पूरी कहानी में है। ऐसी नारकीय स्थिति और देश तथा समाज के घूरे पर फेंक दिये जाने की नियति, जिसकी कल्पना भी सीमित मध्यवर्गीय अनुभव वाले व्यक्ति के लिए कठिन है। अभी, इस कहानी को पूरा पढ़ चुके होने के बाद भी, मैं उस मुहल्ले की एक आधी-अधूरी तस्वीर ही अपने मन में बना पाता हूं जो पूरे शहर के बरसाती पानी और सीवर लाइनों के उफन कर उल्टी दिशा में बहने से निकले मल-मूत्र की झील बना हुआ है और लंबे समय आधी-आधी मंजि़ल तक इस पानी में डूबे रहनेवाले मकान अक्सर ईंटों के बीच की मिट्टी के गल जाने से भहरा कर गिर पड़ते हैं और उनकी छतों पर खेलते बच्चों की लाशें थोड़ी देर बाद फूल कर उस बजबजाती झील की सतह पर उतरा जाती हैं। मेरे कोश में ऐसे स्मृति-चित्र ही बहुत कम हैं जिन्हें कहानीकार के शब्द कुरेद सकें और जिनकी मदद से मैं ‘अनायास’ अपने अन्दर इस दृश्य को रच सकूं। नहीं हैं, ऐसा तो नहीं कहा जा सकता, पर निस्संदेह कम और कमज़ोर हैं। इसीलिए शब्दों को अपने भीतर दृश्यांतरित करना नामुमकिन नहीं, पर मुश्किल है। मुश्किल से हर पाठक भागता है। सो इपंले भी पहली बार भाग खड़ा हुआ।

पर अच्छी रचना की यह विषेशता होती है कि अगर आप उसके साथ थोड़ी मुश्किल उठाने को तैयार हो जाएं तो वह आपको देश-दुनिया, समाज और राजनीति, मन और भावलोक के किसी ऐसे अज्ञात-अल्पज्ञात हिस्से में ले जाती है जहां से आप अधिक अनुभवी, अधिक परिपक्व होकर लौटते हैं। पाठानुभव जीवनानुभव की कमी को पूरा करने लगता है। ‘दंगा भेजियो मौला!’ ऐसी ही रचना है।

कहानी आपको मुसलमान बुनकरों के एक मुहल्ले में ले जाती है जो नदी के किनारे शहर के निचले हिस्से में बसा है – एक ‘लो लैंड’ जो हर साल महीने-डेढ़ महीने के लिए शहर भर के बरसाती पानी और सीवर से निकले गू-मूत की सड़ती झील में तब्दील हो जाता है और उसके हटने के बाद हैजा, डायरिया जैसी बीमारियां हमला कर देती हैं। हर साल कई महीने इन मुसीबतों से लड़ने के बाद ही वहां सामान्य जि़ंदगी बहाल हो पाती है। महान भारतीय राष्ट्र-राज्य के भीतर एक पराये राष्ट्र की तरह बरता जानेवाला यह मुहल्ला, मोमिनपुरा, अपनी बदहाली के लिए सिर्फ़ घृणा, उपेक्षा और उपहास का विषय है। राज्यतंत्र भी उसकी बदहाली को कम करने के लिए आगे नहीं आता, अलबत्ता बढ़ाने के लिए आता है। ‘हाथ में जल लेकर गंगा-जमुनी तहज़ीब का हवाला देने के दिन कब के लद चुके’ हैं। मोमिनपुरा के बाशिंदे दंगापीडि़त नहीं हैं, पर उनके साथ जो हो रहा है, वह किसी दंगे से कम नहीं:

दंगा तो हो ही रहा है।… सरकार ने अफ़सरों को इधर आने से मना कर दिया है। डॉक्टरों ने इलाज से मुंह फेर लिया है। जो पंप यहां लगने चाहिए, उन्हें नदी में लगाकर पानी इधर फेंका जा रहा है। करघे सड़ चुके हैं, घर ढह रहे हैं, बच्चे चूहों की तरह डूब कर मर रहे हैं। सबको इसी तरह बिना एक भी गोली-छुरा चलाए मार डाला जाएगा। जो बेघर-बेरोज़गार बचेंगे, वे बीमार होकर लाईलाज मरेंगे।’

यों तो मोमिनपुरा का हर साल यही हाल होता है, पर इस साल यह सड़ती झील हटने का नाम नहीं ले रही। पाकिस्तान और डल झील जैसे नामों से नवाज़े जानेवाले इस इलाक़े में ‘म्यूनिसिपैलिटी ने इस साल पानी निकासी के लिए एक भी पंप नहीं लगाया। अफ़सरों ने लिख कर दे दिया, सारे पंप ख़राब हैं, मरम्मत के लिए पैसा नहीं है, सरकार पैसा भेजेगी तो पानी निकाला जाएगा। लोक निर्माण विभाग ने घोषित कर दिया कि हाईवे की पुलिया से हर साल की तरह अगर पानी की निकासी की गई तो जर्जर सड़क टूट सकती है और शहर का संपर्क बाक़ी जगहों से कट सकता है। आपदा राहत विभाग ने ऐलान कर दिया कि यह बाढ़ नहीं, मामूली जलभराव है, इसलिए कुछ करने का प्रश्न ही नहीं पैदा होता।… अस्पतालों ने मोमिनपुरा के मरीजों की भर्ती करने से मना कर दिया कि जगह नहीं है और संक्रमण से पूरे शहर में महामारी का ख़तरा है। पावरलूम की मशीनें और मकानों का मलबा ख़रीदने के लिए कबाड़ी फेरे लगाने लगे। पानी में डूबे मकानों का तय-तोड़ होने लगा। रियल इस्टेट के दलाल समझा रहे थे कि हर साल तबाही लाने वाली ज़मीन से मुसलमान औने-पौने में जितनी जल्दी पिंड छुड़ा लें उतना अच्छा।…

यही है वह मुसलसल, बिना असलहे और बिना शोर-शराबे के चलता दंगा जो शासन-प्रशासन से लेकर शहर की जनता तक एक महामारी की शक्ल में फैले सांप्रदायिक मिज़ाज की अभिव्यक्ति है। अपने मुहल्ले की बदहाली को कम करने की जद्दोजहद में लगे मोमिनपुरा की क्रिकेट टीम के लड़के जब अपनी हर तरह की कोशिश से बेज़ार हो जाते हैं, तब यह ज़हरबुझा सच उनकी रगों में दौड़ जाता है कि न सिर्फ़ एक दंगा लगातार जारी है, बल्कि वह आमने-सामने वाले दंगे से ज़्यादा क्रूर और ख़तरनाक है, क्योंकि आमने-सामने की मारकाट वाले दंगे में कम-से-कम शासन-प्रशासन को इधर का रुख करना पड़ता है। दंगा इस बदहाली से बेहतर इस मायने में ठहरता है कि तब हाकिमों की ओर से, नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं की ओर से थोड़ी मदद मिल जाती है। थके-हारे, हताश और मायूस ये ग्यारह खिलाड़ी एक जुमे को फ़जर की नमाज़ के वक़्त सिज़दा कर एक ही दुआ मांगते हैं: ‘दंगा भेजियो मोरे मौला, वरना हम सब इस नर्क में सड़ कर मर जाएंगे। गू-मूत में लिथड़ कर मरने की जि़ल्लत से बेहतर है कि ख़ून में डूब कर मरें।’ और ‘दो दिन बाद मोमिनपुरा में भरते पानी के दबाव से हाई-वे की पुलिया टूट गई। काली झील कई जगहों से सड़क तोड़ कर उफनाती हुई पास के मोहल्लों और गांवों के खेतों में बह चली। घंटे-घडि़याल-शंखों का समवेत शोर बर्दाश्त के बाहर हो गया।… प्रभातफेरी करनेवालों की अगुवाई में शहर और गांवों से निकले जत्थे मोमिनपुरा पर चढ़ दौड़े। सीवर के बजबजाते पानी में हिंदू और मुसलमान गुत्थमगुत्था हो गये। अल्लाह ने हताश लड़कों की दुआ कबूल कर ली थी।’

इतना विचलित कर देनेवाली और इतने बड़े फलक पर अपनी रौशनी फेंकनेवाली कहानियां पिछले सालों में गिनती की लिखी गई होंगी। भारत के उदारीकरण के साथ-साथ राज्य की मशीनरी से लेकर जनता के एक बड़े हिस्से तक का जो सांप्रदायीकरण हुआ है, या कहें कि इन सभी ठिकानों पर दबे पड़े बहुसंख्यावादी सांप्रदायिक विष-बीज को जिस तरह पनपने, फूलने-फलने का मौक़ा मिला है- जिसके आलोक में ही नरेंद्र मोदी और भाजपा के उभार जैसी परिघटना की व्याख्या हो सकती है – उसकी यह प्रतिनिधि कहानी है। प्रभात पटनायक इसे आज़ादी की लड़ाई से विरासत में मिले साम्राज्यवादविरोधी समावेशी राष्ट्रवाद से बूर्जुआ राष्ट्रवाद की ओर संक्रमण का नतीजा मानते हैं जो कि नवउदारवादी दौर की लाक्षणिक विषेशता है (देखें, ‘विश्वीकरण का दौर और राष्ट्रवाद की दो अवधारणाएं’, लोकलहर, 15-21 जून 2015)। उनके अनुसार, राष्ट्रवाद के इन दो रूपों में अंतर करना इसलिए ज़रूरी है कि इसके बग़ैर हम एक युगांतकारी संक्रमण को समझ नहीं सकते। पहले वाले के लिए मुक्ति की धारणा अहम थी और वह तीसरी दुनिया के अन्य मुक्ति आंदोलनों के साथ एकजुटता पर बल देता था, जबकि दूसरा वाला देश की अंतरराष्ट्रीय ताक़त और औक़ात को बढ़ाने पर बल देता है। पहला वाला जनता को ग़रीबी, भूख, कंगाली से उबारने का लक्ष्य निर्धारित करता था, जबकि दूसरा वाला जीडीपी की देवमूर्ति बनाकर उसे पूजता है और उसके लिए किसानों को बेदख़ल करना, मज़दूरों के अधिकारों में कटौती करना, ग़रीबों के कल्याण की योजनाओं को ख़त्म करना – ऐसी किसी भी चीज़ को जायज़ ठहराता है। लेकिन नवउदारवादी प्रतिज्ञाओं पर खरा उतरनेवाला, राष्ट्रवाद के पहले से दूसरे रूप की ओर यह संक्रमण, जैसा कि प्रभात पटनायक लिखते हैं-

आसान नहीं था। इसलिए भारत जैसे देश में पूंजीवादी राष्ट्रवाद के अपने संपूर्ण रूप में उभरने की एक ज़रूरी शर्त यह है कि वह कोई अतिरिक्त सहारा पकड़ ले। सांप्रदायिक फ़ासीवाद उसका ऐसा ही सहारा है। एक ऐसे समाज में जिसने साम्राज्यवादविरोधी राष्ट्रवाद की मज़बूत उपस्थिति को देखा हो, यूरोपीय ढंग का उत्तर-वेस्टफेलियाई राष्ट्रवाद गढ़ा जाए, इसके लिए एक ख़ास ‘प्रतिक्रांति’ की ज़रूरत होती है, जिसे सबसे अच्छी तरह से ऐसी ताक़तें ही ला सकती हैं जो शुरू से ही साम्राज्यवादविरोधी राष्ट्रवाद के खि़लाफ़ रही हों यानी ‘सांप्रदायिकता’ की, ‘सांप्रदायिक फ़ासीवाद’ की ताक़तें। इसलिए साम्राज्यवादविरोधी राष्ट्रवाद की राख पर बूर्जआ राष्ट्रवाद के फलने-फूलने के लिए विडंबनापूर्ण तरीक़े से सांप्रदायिक फ़ासीवादी ताक़तों का हस्तक्षेप ज़रूरी है। यही भारत में हो रहा है।

यह लेख इसी साल के जून महीने का है और यह मूलतः केंद्र में एक सांप्रदायिक फ़ासीवादी सरकार के आने की व्याख्या करता है, पर यह स्पष्ट है कि यहां जिस प्रक्रिया की बात की गयी है, उसका आग़ाज़ इस मुल्क में उदारीकरण की शुरुआत के साथ हुआ था। 2003 में छपी ‘दंगा भेजियो मौला!’ इसी प्रक्रिया की एक विचलित कर देनेवाली सामाजिक अभिव्यक्ति का चित्र है। मोमिनपुरा स्वर्ग तो कभी न था, पर अब उसे मुकम्मल नर्क बनाने और बनाये रखने में जैसे सारी ताक़तें लगी हुई हैं। बहुसंख्यक सांप्रदायिकता बेहद मुखर और कारगर हो चली है। कहानी इसके कई-कई ब्यौरे देती है, जिनकी विषेशता है कि वे चीज़ों को एक स्थिति के रूप में नहीं, एक घटना-विकास के रूप में, बनते-बढ़ते रुझान के रूप में पेश करते हैं, और उनका निचोड़ इस मार्मिक वाक्य में सिमट जाता हैः

आचमन करने और हाथ में जल लेकर गंगा-जमुनी तहज़ीब का हवाला देने के दिन कब के लद चुके थे। यह शहर अब इस पानी और बस्ती दोनों से छुटकारा पाना चाहता था।

कहानी को पढ़ कर ख़त्म करते हुए आप महसूस करते हैं कि आपने किसी एक शहर के मुसलमानों की नहीं, समग्रता में भारतीय मुसलमान की गति और नियति का साक्षात्कार किया है। मोमिनपुरा या ऐसी किसी भी बस्ती को ‘पाकिस्तान’, ‘मिनी पाकिस्तान’ कहना तो एक क्रूर सांप्रदायिक मज़ाक है, पर मोमिनपुरा जिस शहर का हिस्सा है, वह ‘मिनी हिंदुस्तान’ ज़रूर है – पूरे मुल्क का एक स्याह रूपक – जहां ‘नियम और अनुशासन के साथ हर सुबह और गगनभेदी होती जा रही घंटे-घडि़याल और शंख की ध्वनियों’ के बीच एक मुसलमान बस्ती ‘पवित्र शहर का कमोड’ बने रहने को अभिशप्त है और पूरा शहर उससे छुटकारा पा लेने को आतुर, जिसके लिए ज़रूरी है कि उसके अभिशाप को और गाढ़ा किया जाए। धीमे ज़हर की मौत मरता यह भारतीय मुसलमान किसी भी कोने से मदद की उम्मीद नहीं कर सकता। राज्य और तमाम दूसरी एजेंसियों की थोड़ी भी नज़रे इनायत वह तभी हासिल कर सकता है जब इस धीमे ज़हर की जगह एक विस्फोटक तरीक़े से क़ानून और व्यवस्था की समस्या उठ खड़ी हो। इसीलिए विडंबनापूर्ण ढंग से वह दंगे की कामना करता है।

यहां ऐजाज़ अहमद का एक प्रकाशित व्याख्यान, ‘कम्यूनलिज़्म: चेंजिंग फॉर्मस् ऐंड फार्च्यूनस्’ (दि माक्र्सिस्ट, अप्रैल-जून 2013), याद आता है जहां वे यह बताते हुए, कि पूंजीवाद का हिंस्र लुटेरापन भारत में जाति संरचनाओं और सांप्रदायिक टकरावों के चलते हमेशा से पर्याप्त मुखर रहा है, कहते हैं: ‘ऐसी प्रवृत्तियां नवउदारवादी अतिवाद की शुरुआत से पहले थोड़े नियंत्रण में थीं; अब ऐसे अधिकतर नियंत्रणों को तिलांजलि दे दी गयी है और राज्य, कमोबेश अनिच्छापूर्वक, तभी हस्तक्षेप करता है जब कोई सांप्रदायिक दंगा हो जिसे कि सारतः एक क़ानून और व्यवस्था संबंधी समस्या के रूप में देखा जाता है।’ ‘दंगा भेजियो मौला!’ में मोमिनपुरा की क्रिकेट टीम के लड़के मदद की गुहार लगाने हर जगह जाते हैं, कोई सीधे मुंह बात नहीं करता और तब उन्हें भी समझ आ जाता है कि ये तभी आएंगे जब दंगा होगाः

देर रात गए जब वे अपनी साईकिलें नाव पर लाद कर घरों की ओर लौटते, अंधेरी छतों से आवाज़ें आतीं, ‘‘क्या यासीन मियां, वे लोग कब आएंगे?’’

अंधेरे में लड़के एक-दूसरे को लाचारी से ताकते रहते और नाव चुपचाप आगे बढ़ती रहती। टीम के लड़के दौड़ते रहे, लोग टरकाते रहे और बस्ती पूछती रही। एक रात बढि़याते पानी ने घर लौटते लड़कों से कहा, ‘‘बेटा, अब वे लोग नहीं आएंगे।’’

‘‘काहे?’’ यासीन ने पूछा।

‘‘तजुरबे की बात है, उस दुनिया के लोग यहां सिर्फ़ दो बखत आते हैं। या दंगे में या इलेक्शन में। ग़लतफ़हमी में न रहना कि वे यहां आकर तुम्हारे बदन से गू-मूत पोंछ कर तुम लोगों को दूल्हा बना देंगे।’’

अगले दिन यासीन ने दांत भींचकर हर रात सैकड़ों आवाज़ों में पूछे जानेवाले उस एक सवाल का जवाब नाव पर सफ़ेद पेंट से लिख दिया, ‘‘दंगे में आएंगे।’’ ताकि हर बार जवाब देना न पड़े।

ऐजाज़ अहमद की बात से यहां एक फर्क है। ऐजाज़ नवउदारवादी दौर में राज्य के चरित्र के बदलाव की ही बात करते हैं, पर ‘दंगा भेजियो मौला!’ कई दूसरी एजेंसियों को भी समेटती हुई एक अधिक जटिल तस्वीर सामने रखती है। मदद मांगने निकले लड़के ‘पहले उन नेताओं, समाज सेवियों और अख़बार वालों के पास गये जो दो बरस पहले हुए दंगे के दौरान बस्ती में आए थे और उन्होंने उनके बुजुर्गों को पुरसा दिया था। वे सभी गरदनें हिलाते रहे लेकिन झांकने नहीं आए। फिर वे सभी पार्टियों के नेताजियों, सरकारी अफ़सरों, स्वयंसेवी संगठनों के भाइजियों और मीडिया के भाईजानों के पास गए।’ सबने उन्हें टरका दिया। यहां मामला सिर्फ़ सामाजिक सरोकारों को बलाए-ताक़ रख चुके, जातिवाद और सांप्रदायिकता को नियंत्रित करने की ओर से उदासीन-अनिच्छुक नवउदारवादी राज्य का नहीं है; मामला एक ऐसे सर्वव्यापी नकारात्मक बदलाव का है जिसमें उम्मीद के सभी ठिकाने ध्वस्त हो गये हैं।

ऐसा पहले नहीं था। परिस्थितियां विपरीत थीं, पर इस क़दर नहीं। इसीलिए मोमिनपुरा के लोग शुरू में उम्मीद लगाए रहते हैं। वे समझ नहीं पाते कि आखि़र इस बार पानी का दायरा फैलता ही क्यों जा रहा है और क्यों उनकी मदद से हर किसी ने हाथ खींच लिये हैं। बढ़ता पानी अपनी ‘डभ्भक-डभ्भाक’ आवाज़ में उनसे कुछ कहता है, पर वे समझते नहीं। यह बदले हुए समय को पहचानने में हुई चूक है। उम्मीद के तिनके को कौन छोड़ना चाहता है? आखि़रकार क्रिकेट टीम के लड़के धीरे-धीरे पानी की बात समझने लगते हैं। क्रिकेट टीम के लड़के ही क्यों? क्योंकि वे ही हैं जिन्होंने मल्लाहों के नाव देने से मना कर देने के बाद कहीं से एक नाव का जुगाड़ किया है और मुहल्ले की हाड़ी-बीमारी-मौत जैसी हर मुसीबत में आपात सेवा देने से लेकर मदद की गुहार लगाने की दौड़-धूप तक का सारा काम करते हुए एक बड़े कैनवास पर चीज़ों को रखने-देखने-आंकने की स्थिति में हैं। पानी के साथ उनकी बातचीत को कहानीकार ने एक युक्ति के रूप में इस्तेमाल किया है। यह, दरअसल, गहरी हताशा के क्षणों में सच तक ले जानेवाला आत्मालाप और आत्ममंथन है। इसी मंथन से गुज़रते हुए बिखरे-बिखरे सारे तथ्य एक साथ इकट्ठा होते हैं और उनके बीच से सत्य सहसा फूट पड़ता है, जैसे जिग्सॉ पज़ल के सारे टुकड़े सही ठिकानों पर जुड़ गये हों। पानी की बात समझ कर, यानी तमाम टुकड़ों के जुड़ने से बनी मुकम्मल तस्वीर को देख कर, लड़के ‘दंगा भेजियो मोरे मौला’ की दुआ मांगते हैं और उनकी दुआ कबूल होती है।

‘अल्लाह ने लड़कों की दुआ कबूल कर ली थी’ – कहानी के इस आखि़री वाक्य से लगता है कि लड़के निष्क्रिय याचक भर हैं, पर इससे ठीक पहले के वाक्यों में कहानी सांकेतिक रूप से उनकी सक्रियता की ओर इशारा करती है। ‘दो दिन बाद मोमिनपुरा में भरते पानी के दबाव से हाई-वे की पुलिया टूट गयी।’ भरते पानी का दबाव मोमिनपुरा के वाशिंदों के बढ़ते असंतोष के दबाव का संकेत बन कर आया है। इसका मतलब, पुलिया टूटी नहीं, तोड़ी गयी। यह पुलिया ही थी जिससे होकर हर साल पानी को निकास मिलता था, पर इस साल प्रशासन ने किसी-न-किसी बहाने से इस काम को रोक रखा है। गू-मूत में लिथड़ कर मरते ये घिरे हुए लोग अंततः घिराव को तोड़ देते हैं। ‘घंटे-घडि़याल-शंखों का समवेत शोर बर्दाश्त के बाहर हो गया’ – यह वाक्य पुलिया टूटने की सूचना के बाद का है, पर यह कथाकाल में भी बाद का माना जाए, यह ज़रूरी नहीं। इसे पुलिया तोड़ दिये जाने की पृष्ठभूमि के रूप में भी पढ़ सकते हैं। बर्दाश्त के बाहर हो जाना इस शोर के एकाएक बहुत बढ़ जाने का अर्थ भी देता है – अपने अभिशाप से लड़ते मुसलमानों के खि़लाफ़ साम्प्रदायिक हिंदुओं की जंग का ऐलान – और मोमिनपुरा के बर्दाश्त की सीमा टूटने का अर्थ भी देता है, यानी दूसरी तरफ़ के बढ़ते हुए शक्ति-प्रदर्शन के खि़लाफ़ मुसलमानों की ओर से एक बड़ा इंकार।

ऐसी सांकेतिकता और मितकथन इस कहानी की बड़ी ताक़त है। अनिल यादव के पास बहुत लंबी-लंबी कहानियां भी हैं, जिनके मुक़ाबले ‘दंगा भेजियो मौला!’ बिल्कुल शास्त्रीय अर्थों में ‘शॉर्ट स्टोरी’ है। डिमाई आकार के लगभग छह पृष्ठ। इस मझोले आकार में एक बड़ी बात को रखने की कला जैसी इस कहानी में है, वैसी खुद अनिल अपनी दूसरी कहानियों में अर्जित नहीं कर पाए हैं। पढ़ते हुए आप महसूस करते हैं कि वाचक ज़रूरी ब्यौरे देने में कोई कटौती नहीं कर रहा, लेकिन अपने वर्णनों-विवरणों में कहीं रमने को राज़ी नहीं है; जिस स्याह यथार्थ को वह उकेर रहा है, उसमें रमना एक अपराध है। वेदना में व्यक्ति या तो प्रलाप करता है, या बहुत कम बोल कर काम चलाता है। ‘दंगा भेजियो मौला!’ कम बोलनेवाली कहानी है। लगभग स्तब्ध अभिव्यक्ति जैसा ढब, भाषा की ख़पत में कोई शाहख़र्ची और इत्मीनान नहीं, एकदम ज़रूरत और भावनाओं के गहरे दबाव से निकले शब्द, और उतना ही कहकर आगे बढ़ जाना जितना कहकर लगा कि बात पूरी हो गयी। ऐसा अनुपात-बोध इधर की कहानियों में विरल है। कहानीकार कहीं भी विमर्श को वाचाल ढंग से पेश करने या आरोपित करने को समुत्सुक नहीं है। विरले ही कहीं ‘अभिमत’ के रूप में कोई बात कही गयी है; प्रस्तुति का अधिकांश ‘तथ्य-कथन’ की शक्ल में है। ‘तथ्य’ के पीछे ‘अभिमत’ का बल होता है, या कहें कि तथ्यों के चयन-संयोजन में अभिमत व्यंजित होता है, यह बात अलग है।

कहानी अपनी पूरी संरचना में सुसंगत है। यहां कुछ भी अलग नहीं छिटकता – न दृश्य, न ब्यौरे, न भाषा, न कथा-युक्तियां। इनमें से कोई अपने लिए नहीं है, सभी एक-दूसरे के लिए हैं। भारतीय मुसलमान की जिस अंधकारपूर्ण नियति को कहानीकार सामने रखना चाहता है, वह इस सुसंगत संरचना के कारण एक समग्र प्रभाव के रूप में उभरती है। कहानीकार की ख़ासियत है कि वह अपने सघन गद्य के बीच एकाएक कोई बहुत काव्यात्मक बिंब या उक्ति ला सकता है और बिना उसके आकर्षण में फंसे आगे निकल सकता है। ‘नाव दिन भर बस्ती के दुख ढोती रही’, ‘पानी में डूबे घरों में उन बच्चों की मांओं की सिसकियों की तरह कुप्पियां भभक रही थीं’, ‘…जीवन अचानक शहर की बुनकर बस्ती की खड़कताल से बिदक कर बाढ़ में डूबे, अंधियारे कछारी गांव की चाल चलने लगता’ – ऐसी काव्यात्मक उक्तियां उसके यहां कब आकर बिना कोई अतिरिक्त अवधान पाए निकल जाती हैं, पता भी नहीं चलता। वे गद्य की लय में एकरस हैं। इसीलिए वे अपना अलग वजूद जतलाने की बजाय पिघल कर एक पूरी मनःस्थिति की निर्मिति में शामिल हो जाती हैं। इसी मनःस्थिति के सघन रचाव का परिणाम है कि पानी से बातचीत जैसी ग़ैर-यथार्थवादी युक्ति भी बहुत चुपके से आकर कहानी में घुलमिल जाती है और आपको उसके अनोखेपन का अलग से अहसास नहीं होता। प्रकृति के साथ मनुष्य की बातचीत निविड़ अकेलेपन और गहरी वेदना का चिरपरिचित साक्ष्य रहा है। ‘मेघदूत’ के यक्ष और सूरदास की गोपियों को याद कीजिए। ‘दंगा भेजियो मौला!’ में यह एक समुदाय का अकेलापन है, जिसमें प्रकृति से कुछ कहना-सुनना एक सहज व्यापार की तरह लगता है। पर यह यक्ष और गोपियों के जैसा नहीं है, जिसमें अपने भीतर इकट्ठा भावनाओं का गुबार बाहर निकाल देने के लिए एक संबोध्य ढूंढ़ लिया गया है। कहानी पढ़ते हुए आप अनुभव कर सकते हैं कि यह कहा-सुनी उन पात्रों के भीतर की है और इसी मंथन से किसी विकट सत्य को प्रकट होना है। मोमिनपुरा क्रिकेट क्लब के कुछ लड़के हमेशा नाव पर ही रहने लगे हैं, ताकि रात में गिरनेवाले मकान में फंसे लोगों की जान बचाने के लिए हमेशा तैयार मिलें। ‘दिन बीतने के साथ बदबूदार हवा के झोंकों से नाव झील पर डोलती रही, तीन तरफ़ से बस्ती को घेरे कालोनियों की रोशनियां काले पानी पर नाचती रहीं, हर रात बढ़ते पानी के साथ बादलों से झांकते तारों समेत आसमान और क़रीब आता रहा। सावन बीता, भादों की फुहार में भींगते शहर से घिरे दंड-द्वीप पर अकेली नाव में रहते काफ़ी दिन बीत गए और तब लड़कों के आगे रहस्य खुलने लगे।… पानी, हवा, घंटे-घडि़याल, मर कर उतराते जानवर, गिरते मकान, रोशनियों का नाच, सितारे और चींडियों के झुंड – सभी कुछ न कुछ कह रहे थे। एक रात जब पूरी टीम बादलों भरे आसमान में आंखें गड़ाए प्रभात-फेरी का इंतज़ार कर रही थी, पानी बहुत धीमे से बुदबुदाया, ‘‘दंगा तो हो ही रहा है।’’

एक समूह/समुदाय का भयावह अकेलापन, उस अकेलेपन में चलनेवाला आत्ममंथन और उस आत्ममंथन से उपजा एक सच जो आसपास की हर शै के परस्पर संबंध से निकलनेवाला अर्थ है – इसे इतने संयम और सांकेतिक लाघव के साथ व्यक्त कर पाना हर कहानीकार के बस की बात नहीं हैं।

पीछे संरचना की सुसंगतता की बात की गयी। वह घटकों के अचूक संष्लेश में ही नहीं, कहानी की शुरुआत और अंत की सधी हुई योजना में भी है। कहानी एक दृश्य से शुरू होती है और एक दृश्य के साथ ख़त्म होती है; बीच का लगभग पूरा हिस्सा परिदृश्य का विस्तार है। जिस जगह जाकर वह ख़त्म होती है, वहां आप कहानी का बाक़ायदा अंत होना महसूस करते हैं। यह उन कहानियां की तरह नहीं है जो अपनी तमाम खूबियों के बावजूद अंत की ओर अधर में लटक जाती हैं। उनके उदाहरण फिर कभी। कोई कहानी अपनी पूरी बनावट से अंत संबंधी कैसी अपेक्षाएं जगाती है, और किस तरह की कहानियों में कोई ‘अंत’ ज़रूरी होता है, किनमें नहीं, इस पर भी फिर कभी। फिलहाल इतना ही कि ‘दंगा भेजियो मौला!’ को पढ़ते हुए आप एक बाक़ायदा अंत की अपेक्षा करते हैं और कहानी इस अपेक्षा को पूरा करती है। अनिल यादव की ही ‘लोककवि का बिरहा’ या ‘आर जे साहब का रेडियो’ जैसी कहानियों को पढ़ें तो स्पष्ट हो जाएगा कि कहानी की पूरी उठान से जगनेवाली अपेक्षा के मुक़ाबले कमज़ोर अंत का क्या मतलब होता है; जैसे अपनी दौड़ शानदार ढंग से पूरा करता कोई धावक फि़निश लाइन से ठीक पहले लड़खड़ा कर बैठ जाए!

पता नहीं, इपंले कह पाया या नहीं, पर वह कहना यही चाहता था कि अगर शुरुआत से ही कोई कहानी आपको गिरफ़्त में नहीं ले लेती, तो यह पाठक के रूप में आपकी अयोग्यता की निशानी भी हो सकती है और अगर आप थोड़ी मुश्किल उठाने को तैयार हो जाएं, तो अपनी इस अयोग्यता से उबरा भी जा सकता है।

[1] यों तो हर रूपक में बात को भटका कर अनजान दिशाओं की ओर ले जाने का दुर्गुण होता है, पर यह तो और भी दुष्ट है। दुष्ट माने दोषपूर्ण, जैसे शास्त्रों में वर्णित ‘दुष्ट काव्य’। पाठक अगर पंछी है और कहानीकार बहेलिया, तो पठन का सुख पाठ की गिरफ़्त में आने से पहले तक ही समझना चाहिए। गिरफ़्त में आने के बाद सुख का क्या मतलब? यानी इस रूपक की मानें तो पढ़ना एक सज़ा है (और वह असंगति अलंकार भी यहां कारगर नहीं कि ‘मज़ा इसमें इतना मगर किसलिए है’)! इसीलिए कहा, बहुत घटिया रूपक है। इसे थोड़ा ज़्यादा बोलने की इजाज़त दें तो कमबख़्त अनाप-शनाप बकने लगेगा।

संजीव कुमार

संजीव कुमार

संजीव कुमार। युवा आलोचक और कहानीकार। ‘जैनेन्द्र और अज्ञेयः सृजन का सैद्धांतिक नेपथ्य’ पुस्तक के लिए देवीशंकर अवस्थी सम्मान। दिल्ली विश्विद्यालय के देशबंधु कॉलेज में  प्राध्यापक। इनसे sanjusanjeev67@gmail.com पर संपर्क सम्भव है।

साभार- हंस, सितम्बर, 2015

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