प्लाथ की कवितायें, स्त्री व्यक्तित्व के दुहरे आत्मनिर्वासन की सच्चाई: मार्तंड प्रगल्भ

सिल्विया प्लाथ अमेरिका की लेखिका थीं. ऑस्ट्रियन मूल की पर दो पीढ़ी पहले से अमेरिकी हुए परिवार से प्लाथ की मां आयीं थी और पिता जर्मन थे. १९३२ में जन्मी सिल्विया प्लाथ ने काफी कम उम्र से ही लेखन को गंभीरता से लेना शुरू कर दिया था. पिता यूनिवर्सिटी में जीवविज्ञान के प्रोफेसर और प्रसिद्ध कीटविज्ञानी थे और प्लाथ के जीवनीकार बताते हैं की प्लाथ का उनसे रिश्ता तनाओं भरा था. तीस साल की उम्र में जब प्लाथ का त्रासद अंत हुआ प्लाथ का प्रकाशित-अप्रकाशित विपुल लेखन अस्तित्व में आ चुका था. कवि टेड ह्युग्स के साथ प्लाथ को प्रेम हुआ,उससे शादी हुई और वह दो बच्चों की मां भी बनी. अंत के दिनों में उनका संबंद्ध- विच्छेद हो गया था पर उसका कानूनी साक्ष्य नहीं है. प्लाथ के मित्रों में ज़्यादातर अमेरिकी और इंग्लिश लेखक थे. पहले अमेरिका के स्मिथ कॉलेज में प्लाथ ने अकादमिक एक्सलेंस के साथ दोस्तोवस्की के उपन्यासों में द्विधाविभक्त चरित्रों के ऊपर अपना अंडरग्रेजुएट थीसिस जमा किया, बाद में वजीफे के साथ कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी चली आई. आमतौर पर आलोचकों ने प्लाथ की रचनाओं को ‘आत्म-स्वीकारात्मक कविता’ (कन्फेसनल पोएट्री) को आगे बढ़ाने वाला माना है. अपने छोटे जीवन-काल में प्लाथ को भयानक अवसाद के दौर से भी गुजरना पड़ा था. वह अंतिम दिनों में अनिद्रा और गंभीर अवसाद से जूझ रही थी. प्लाथ ने तीन बार आत्महत्या की कोशिश की. अंतिम बार उसने यह कोशिश ११ फरवरी १९६३ को की. #लेखक

Sylvia Plath

Sylvia Plath

 

व्यक्ति स्वातंत्र्य की त्रासदी और सिल्विया प्लाथ की कविताएँ

By मार्तंड प्रगल्भ

प्लाथ की आरंभिक कविताओं में उसके पसंदीदा कवियों की छाप दिखती है. परन्तु इन कविताओं में भी सिल्विया प्लाथ की एकान्तिक काव्य यात्रा के निशान मिलते हैं. किसी पेंटिंग या प्राकृतिक दृश्य के प्रभाव से या रोज़मर्रा के अन्य जीवनानुभव और उनके संदर्भों से शुरू होने वाली कविताओं में एक धूसर-काली मनोदशा आकार ग्रहण करती है. ये मनोदशाएँ विकृत मानवीय सम्बन्धों के बीच अपने अस्तित्व की तलाश के क्रम में बनने वाली मनोदशाएँ हैं. इन मनोदशाओं में अस्तित्व की सार्थकता अपनी आत्म-पहचान की खोज में बदलती जाती है. दोस्तोवस्की के उपन्यासों में ‘डबल’ या आत्मा की दुई के बारे में प्लाथ का अध्ययन आत्म और उसकी पहचान की ज्ञानात्मक संवेदना के सैद्धांतिक आयाम का पता देती हैं. स्वतंत्र मनुष्य का रूप कैसा होगा, यह प्रश्न नाज़ी होलोकास्ट और द्वितीय विश्वयुद्ध की छाया से आक्रान्त था. स्वतंत्र मनुष्य के बने बनाए मॉडल के ध्वंस के बीच बन रही ये मनोदशाएँ अपनी अभिव्यक्ति का रास्ता तलाशती हुई मिथकीय सन्दर्भों से जुड़ती चली जाती है. ये मिथकीय सन्दर्भ ज़्यादातर प्रेम, मृत्यु और पुनर्जीवन के हैं. धीरे-धीरे मिथकीय चेतना का अनवरत दुहराव प्लाथ के लिए एक बंद घेरे में बदलता गया. एक बंद घेरे वाली एकांतिकता का निर्माण वहां होता है जहाँ अनुभव प्रसूत काव्य संवेदनाएं आत्म की दो विरोधी गतियों से संघर्ष करती हुई इन विरोधी गतियों के अतिक्रमण के लिए स्वयं मिथकीय संवेदना में रूपांतरित होती जाती है. रचनाकार इस चक्र से निकलने के लिए आवेगमय प्रतिक्रियाएं करती है. इन प्रतिक्रियाओं की परिणति जीवन में और रचना के भीतर निर्णय लेने में होती है. प्लाथ की रचनाओं में हम इन निर्णयों को आसानी से पहचान सकते हैं. उसकी काव्य-नायिकाओं की आत्महंता आस्था मृत्यु के निर्णय में परिणत होती है.

फ़ासिस्म की मिथकीय चेतना से संघर्षरत प्लाथ के काव्य की मिथकीयता वस्तुतः एक दूसरे की पूरक बन गयी है. चेतना की इन दो विरोधी धाराओं में मृत्यु के दृश्याभास या स्पेक्टेक्ल का साझा है. ध्वंसावशेष के रूप में वर्तमान व्यक्ति-मुक्ति के बुर्जुआ स्वप्नों का भी ध्वंसावशेष था. व्यक्ति रचनाकार का अंतर्मन मुक्ति के स्वप्नों के पूरा होने से पहले ही उन स्वप्नों के ध्वंसावशेष को अपने सामने यथार्थ पाता है. स्त्री-पुरुष सम्बन्धों में यह ध्वंसावशेष प्रेम के स्वप्न का ध्वंसावशेष है. प्रेम का निर्णय और व्यक्ति-स्वातंत्र्य की आवेगमय कामना दोनों विध्वंस के दुहराव में उलझ जाती है. प्लाथ की काव्य-नायिकाएं इस ध्वंस की त्रासद मनोदशा से संघर्ष करती हैं, निर्णय लेती हैं और बार-बार पराजित होती हैं. प्लाथ के एक आरंभिक सोनेट से इस मनोदशा के निर्माण का कुछ पता मिलता है. इस सानेट की प्रेरणा प्लाथ को इटैलियन चित्रकार ज्योर्जिओ दे सिरीको की एक पेंटिंग से मिली. पेंटिंग का शीर्षक ही कविता का भी शीर्षक है: ‘ध्वंसावशेषों की आपसी बातचीत’. पेंटिंग में दूर-दूर तक फैले पथरीले बियाबान में बिना छत बिना दीवारों का एक कमरा है. कमरे के खम्भे टूट गए हैं. दरवाजा है जिसकी केवल चौखट ही बची है. दरवाजे के दोनों पल्ले समानांतर खुले हैं. दरवाजे की तरफ मुंह किये एक संभ्रांत महिला शास्त्रीय परिधानों में सजी धजी बैठी है. उसकी गर्दन बायीं ओर हलकी सी मुड़ी है और वह एक सूटेड-बूटेड पुरुष की आँखों में देख रही है. पुरुष के ठीक पीछे एक अलमारी है और उससे लगा एक टूटा हुआ खम्भा जिससपर किसी यूनानी हीरो की तस्वीर है जो हुबहू पुरुष की तरह दिखता है और चित्र में उसी मुद्रा में कुछ देख रहा है जिस मुद्रा में वह पुरुष उस संभ्रांत महिला को देख रहा था. प्लाथ की कविता में इस चित्र के निर्माण की फैंटेसी बनती है. चित्र की संभ्रांत महिला प्लाथ की काव्य-नायिका में बदल जाती है. वह स्वयं उस चित्र के ट्रैजिडी का इतिहास पुरुष को बता रही है. दरवाजे के सामने बैठी वह पुरुष को अपने वैनेले आवेश के साथ अपने भव्य घर की पोर्टिको से ‘रौबदार’ गुजरते देख रही थी. वह गुजरता जाता था:

… छिन्न भिन्न करते जाल को

शिष्टाचार के सारे नियमों के जो बवंडर को पीछे

थामे रखते हैं

और बवंडर उसके पीछे विध्वंस करता आ रहा था. शानदार तम्बूरे और मोर नष्ट हो गए, फलों के बाग़ उजाड़ हो गए और अब भव्य दीवारें ढह गयीं हैं. भयानक खंडहरों के ऊपर कौए शोर करते हैं और तुम्हारी तूफानी आँखों की उजाड़ दृष्टि का जादू वैसे ही उड़ान भरता है जैसे पहली किरण के साथ कोई चुड़ैल महल से उड़ जाती है. चट्टानी बियाबान टूटे खम्भों के फ्रेम में जड़ है और


जब तुम कोट और टाई में धीरोदात्त खड़ो हो, मैं बैठी

ग्रेसियन ट्यूनिक और साइकी-नॉट में सजी-धजी

तुम्हारी काली आँखों में जड़वत, नाटक त्रासद हो गया:

हमारी उजाड़ रियासत पर ऐसे कठोर तुषारापात के बीच

शब्दों का कैसा उत्सव इस विनाश को ढँक सकता है?

अन्दर बाहर के इस भयावह बियाबान में प्लाथ की काव्य-नायिकाएं वृहत्तर दुःख और पीड़ा को स्वानूभुत कर उसकी सच्चाई को अपनी पहचान में पक्का करना चाहती हैं. इस पीड़ा या दुःख की चरम परिणति मृत्यु के अनुभव की प्रबल होती आकांक्षा है. जो जिंदा है किसी न किसी तरह से दुःख का कारक भी है. व्यक्ति-अनुभूत पीड़ा और पीड़ित का द्वैध इन काव्य-नायिकाओं की आत्मा में दुई पैदा करती है. जहाँ एक ओर उत्पीड़क संरचना यथार्थ है वहीँ दूसरी ओर व्यक्ति-केंद्रित सच्ची अनुभूति की खोज एकान्तिक उत्पीड़कों/उत्पीड़ितों की पहचान के द्वंद्व में उलझ जाती है. ऐसी स्थिति में पीड़ित के अनुभवों की ईमानदारी और पीड़ित का विरोध ये दोनों ही मृत्यु संदर्भित हो जाते हैं. अंग्रेज़ी दुनिया में अमेरिकी उदार व्यक्तिवाद अपनी सार्थकता के लिए होलोकास्ट की मृतक छाया से व्यक्ति-मुक्ति के वास्तविक प्रश्नों को ढँक देती थी. यह संभव होता था मृत्यु को स्पेक्टेकल बना कर पेश करने से. प्लाथ की काव्य-नायिकाएं इस अमेरिकी जीवन-पद्धति के आक्रामक स्वरुप से भी विद्रोह करती हैं. यह विद्रोह देह-विद्रोह में रूपांतरित होता है. इन नायिकाओं के लिए व्यक्ति स्वातंत्र्य की उदारता उत्पीड़ितों को न केवल आत्मसमर्पण के लिए बाध्य करती है वरन उसे सुखी जीवन का आदर्श मॉडल भी साबित करती है. यह उदारता उन काव्य-नायिकाओं के लिए फासिस्ट हिंसा का ही दूसरा पहलू है. इनका द्विधा-विभक्त आत्म जिस गिरह से बंधा है वह हिंसा की ही गिरह है. सभ्यता के गर्भ में छिपी हिंसा से जुड़ कर वह प्रासंगिक हो उठी है. प्रेम, मातृत्व और घर की ओर वापसी जैसे उनके निर्णय हमेशा द्विधा-विभक्त अनिर्णय के साथ आने से कविता में अतिरिक्त आवेगमय शक्ति के रूप में प्रकट हुए हैं. ‘द स्नोमन ऑन द मूर’ कविता की काव्य-नायिका अपने प्रेमी से निरंतर युद्ध्मान स्थितियों के एक क्षण में विजय की अपनी तीव्र आकांक्षा के साथ विच्छेद को स्वीकार करती है. वह तमतमाई हुई जब कमरे से बाहर बियाबान में निकलती है तो उसका अंतिम क्रोध भरा ताना है- ‘आओ मुझे खोज लो’. उसे विश्वास है कि बाहर के बर्फीले-उजाड़-बियाबान से गुजरते हुए भी वह जीतेगी और एक दिन वह घुटनों के बल उसके सामने बैठा होगा. दुनिया के सफ़ेद किनारे पर खड़ी वह सारे नरक को बुलावा देती है उस उद्दंड आदमी की सत्ता की घेरे-बंदी के लिए. और दूर सामने से आता एक शैतान दीखता है उसे. कोई आग उगलने वाला, क्रोधोन्मत्त और गर्वोन्नत राक्षस नहीं बल्कि संयमी, हृष्ट-पुष्ट, गंभीर और डरावनी कद काठी का वह शैतान लाश की तरह सफ़ेद दिखाई पड़ा. प्रेमविहीन आँखों वाले इस शैतान के क़दमों की धाक से दर्जनों पखेरूओं की लाश हवा में बिखर जाती थी. पर इससे भी बुरी बात यह थी कि उसने


… काँटों जड़ी पट्टी पर झूलते देखा

औरतों की नाचती खोपड़ियाँ

शोक से सूखी जीभों से कलकलाती अपने अपराध:

‘हमारी बुद्धि ने मूर्ख बनाया

राजाओं को, राजाओं के दुर्बल बेटों को: हमारी प्रतिभाओं ने

दरबारों का दिल बहलाया:

उसी शेखी के लिए , हम इन लौह जंघाओं से नथे हैं.’

राज सिंहासन पर विराजमान धंसा हुआ

एक बर्फीले तूफ़ान में, अपने चमकते विजय-चिह्नों के साथ वह शैतान दहाड़ उठा.

कुल्हाड़ी की मार के आवेग से

वह लजा कर पीछे हट गयी: एक सफ़ेद सनसनी! और वह शैतान, चलते हुए

धुंध में खो गया.

विनीत तब, और रोती हुई,

वह लड़की घर की ओर मुड़ गयी, लबालब भरी हुई भली बातों

और नम्र अनुपालन से.

प्लाथ की काव्य-नायिकाओं के लिए घर से संबंद्ध-विच्छेद मृत्यु की स्वीकारोक्ति भी है. पर ये जानती हैं कि यह सब कुछ सच नहीं है. यह सब नैसर्गिक नहीं है. एक गहन संदेह के खिलाफ इन्हें तलाश है किसी विश्वास की, जो दिया हुआ कहीं नहीं है. उसे शुद्ध मस्तिष्क रच नहीं सकता. उसके खिलाफ देह विद्रोह होगा और उसकी सत्ता मिट जायेगी. ‘नैसर्गिक इतिहास’ कविता में यह विश्वास अपने वृहत्तर ऐतिहासिक परिपेक्ष्य में व्यक्त हुआ है. ‘उन्मत्त सम्राट, दिमाग एक उजाड़ देश पर राज करता. मलमल पर सोने वाला और कबाब में धंसे हुए उस सूअर का प्रेम केवल शुद्ध दर्शन में लीन होना था. जब उसकी प्रजा भूखी और नंगी थी वह तारों और फरिश्तों के संग बातें कर रहा था. पर ऐसा वह जारी नहीं रख सकता:


…अपने राजा की दुष्ट दैवीय वायु से तंग ,

धरती से जन्मे वे सामान्य जन एक शरीर में

उठ खड़े हुए और शाही धमनियों को बंद कर दिया…

स्वयं में सर्व शक्तिमान की सत्ता टिक नहीं सकती. सामान्य जन का शरीर उसे एक करेगा और वह विद्रोह करेगा. देहविद्रोह की सत्यता नैसर्गिक है. यहाँ दिमाग शुद्धात्मवादी का प्रतीक भी है. शुद्धात्मवादी दिमाग खुद को ब्रह्म समझने लगता है. उसे लगता है कि बाह्य यथार्थ सारा का सारा उसी के कारण है. ‘एक शुद्धात्मवादी का आत्मवक्तव्य’ शीर्षक कविता का ‘मैं’ शुद्ध नियंत्रण मात्र है. इसकी घोषणा है. यह शुद्ध शक्ति की सर्वव्याप्ति का प्रतीक है. पुरुषसत्ता और उसके अनन्तर फासीवाद की वैयक्तिक सत्ता की आत्म-मुग्धता का उद्घोष है:


मैं

घरों को सिकुड़ने देती हूँ

और पेड़ों को गायब होने

दूर जाते हुए; मेरी नज़रों की लगाम

कठपुतली-जनों को झुलाते हैं

उनको, जो नहीं जानते कि कैसे झूलते हैं,

हंसते हैं, चूमते हैं, और शराब पीते हैं

परन्तु इस निर्णय से अनुभवों की मुक्ति नैसर्गिक है. इतिहास सम्मत है. पर वह कहीं वास्तव में प्राप्य नहीं. ऐसी स्थिति में प्लाथ की कवितायें प्रेम की ओर, उसके विश्वास की ओर लौट आती हैं. इन कविताओं में प्रेम की अवश्यम्भावी विजय का उद्घोष बार-बार होता है. यह रूमानी प्रेम का आवेग, यह भाव जगत का विद्रोह झूठा नहीं है. प्लाथ की कवितायें इस सच की ‘संवाददाता’ हैं:


पत्ती की तश्तरी पर बैठे घोंघे का शब्द?

यह मेरा नहीं है. इसे स्वीकार मत करो.

एक सील्ड डिब्बे में एसिटिक एसिड ?

इसे स्वीकार मत करो. यह सच्चा नहीं है.

अपने सीने में सूरज को धारण किये सोने का छल्ला ?

कई झूठ. कई झूठ और एक विषाद.

…….

आइनों में एक विक्षोभ,

अपने धूसर को चकनाचूर करता सागर-

प्रेम करो, प्रेम करो मेरी ऋतु.

जितना प्रेम पर यह विश्वास सच्चा है उतने ही सच हैं प्रेम के खंडहर. एक मन यह भी विश्वास करता है कि बार-बार अनुभव-जगत का एक सर्वसत्ता के सामने समर्पण एक झूठ है और ‘मृत्यु’ के अनुभव की सच्ची अभिव्यक्ति के बिना प्रेम में आस्था को पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता. सर्वथा स्वतंत्र व्यक्तिगत अनुभवों की तलाश में ये नायिकाएं मिथकीय और धार्मिक अनुभव संसार में विश्वास के लिए जाती हैं. समस्या तब और भी गहरी हो जाती है जब स्वतंत्रता की यह तलाश मिथकीय संवेदना में भी तुष्ट नहीं होती. अतिरेकवादी पूर्णता के दोनों छोर हिंसा के सिवा कुछ भी साझा नहीं रखते. असफलता के बारम्बार अनुभव से आक्रोशित आत्म अपने चरम विरोध से ही प्रेम करने को बाध्य होता है. ‘डैडी’ कविता की काव्य-नायिका कहती है:


हर महिला पूजती है एक फासिस्ट,

चेहरे पर बूट, निर्मम

निर्मम हृदय तुम्हारे जैसे किसी क्रूर का.

इस चरम विरोध से अतिक्रम के लिए, स्त्रीत्व से अतिक्रमण के लिए ये काव्य-नायिकाएं एक बेघर-बार मूल अनुभव की ओर आकर्षित होती हैं. वह बार-बार मरती हैं केवल अपने चरम-विरोधी आत्म से सारा मामला निबटा लेने को. यहाँ भी विरोधी आत्म-युग्म जर्मन-यहूदी आत्म-युग्म से जुड़ कर सभ्यता मूलक हो गया है.


एक इंजिन, एक इंजिन

हवा में एक यहूदी की तरह मुझे उड़ाते हुए.

एक यहूदी को दशाऊ, ऑश्वित्ज़, बेलमेन.

मैंने यहूदी की तरह बात करना शुरू कर दिया.

मैं सोचती हूँ यहूदी होती तो कहीं अच्छा था.

टायरोल की बर्फ, वियना की साफ़ बीयर

बहुत शुद्ध और सच्चे नहीं हैं.

अपनी जिप्सी पुरखिनियों और अपने उजड्ड भाग्य के साथ

और साथ में मेरा टारोक पैक और मेरा टारोक पैक

मैं तनिक तो यहूदी होती.

इस मूल बेघर-बार को पाने के लिए वह बार-बार मरती है. मूल विरोधी/विद्रोही/पीड़ित आत्म को पाने के लिए वह सारी मध्यस्थताओं को निरर्थक साबित करना चाहतीं हैं. वह बार-बार लौट कर अपने मूल में ही उसका विनाश करना चाहती हैं.


मैं दस की थी जब उन्होंने तुम्हें दफनाया.

बीस में मैंने मरने की कोशिश की

और तुम्हारे पास, वापस, तुम्हारे पास वापस लौटने की .

यहाँ तक कि हड्डियाँ भी ऐसा करेंगी मैंने सोचा.

विरोधी/विद्रोही मूल आत्म के खरे रूप में प्राप्त करने की यह तीव्र लालसा ‘लेडी लजारस’ नामक कविता में सबसे स्पष्ट है. लाजरस ईसा की चमत्कारपूर्ण कहानियों में मिलने वाला एक मिथकीय चरित्र है. यहाँ मृत्यु की पृष्ठभूमि में पुनर्जन्म एक स्पेक्टेकल में बदल जाता है. लजारस की बहनों ने लजारस की बीमारी की खबर ईसा को पहुंचाई थी. ईसा ने जान-बूझ कर जाने में देरी की. जब तक पहुंचे तब तक लाजरस को मरे चार दिन बीत चुके थे. ईसा ने उसे पुनर्जीवित कर दिया. इस चमत्कार से यहूदियों का विश्वास ईसा में इतना बढ़ गया की धर्माधिकारिओं ने इस विश्वास को मारने के लिए लजारस को फिर से मृत्युदंड दिया. प्लाथ की काव्य नायिका खुद को स्त्री लाजरस के रूप में पुनर्रचित करती है और उस पुनर्जीवन के चमत्कार से अपने आत्म को मुक्त करने का विश्वास व्यक्त करती है. व्यक्ति स्वातंत्र्य की आत्मगत पहचान की यह कामना बुर्जुआ स्वप्नों की भयानक त्रासदी की अभिव्यक्ति है. यह बुर्जुआ मानवीय सम्बन्धों के ‘वैम्पायर’ को मारने के लिए खुद को मार कर स्वन्त्रत होने की त्रासदी है


क बार फिर मैंने यह किया.

प्रत्येक दस में से एक साल

मैं ऐसा करती हूँ-

जैसे एक चलायमान चमत्कार, मेरा शरीर

एक नाजी लैम्पशेड सा उज्ज्वल

मेरा दाहिना पैर

एक पेपरवेट,

मेरा चेहरा एक लक्षणहीन, महीन

यहूदी लिनेने.

……..

मरना

एक कला है, जैसे बाकी सब.

मैं इसे बखूबी करती हूँ.

मैं इसे करती हूँ इसलिए यह नरक की तरह महसूस होता है.

मैं इसे करती हूँ इसलिए सच महसूस होता है

मेरा अंदाजा है तुम इसे मेरी प्रकृत नियति कहोगे.

……

श्रीमान ईश्वर, श्रीमान लूसिफर

खबरदार

खबरदार.

राख से

मैं अपने लाल केशों के साथ उठती हूँ

और मैं आदमियों को हवा की तरह खाती हूँ.

प्लाथ की कवितायें स्त्री व्यक्तित्व के दुहरे आत्मनिर्वासन की सच्चाई है. एक अप्राप्य, असंभव आत्मिक एकांतिकता का आवेगमय और रोमांटिक दुस्स्वप्न!

मार्तण्ड  प्रगल्भ

मार्तण्ड प्रगल्भ

छात्र राजनीति और संस्कृति-कर्म में व्यस्त रहने वाले मार्तण्ड प्रगल्भ जे.एन.यू. के भारतीय भाषा केंद्र से पी.एच.डी. हैं। उनसे mpragalbha1@gmail.com पर संपर्क संभव है।

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