Archive for the month “July, 2016”

हिन्दू परम्पराओं का राष्ट्रीयकरण: संजीव कुमार

आज तक अपना लिखा हुआ/किया हुआ बताने में ख़ासा संकोच होता रहा. अब सोचता हूँ, बता ही दिया करूं…. साथी बली सिंह की एक कविता है ना–अपनी चर्चा, अपनी तारीफ़ खुद ही करो, और कौन करेगा?…. तो साहिबान, अब छप के आ गयी है वसुधा डालमिया की वो किताब जिसका हम (मैं और योगेन्द्र दत्त) ने अनुवाद किया है. मुश्किल किताब थी. अंदाजा इससे लगाइए कि हमें मिलने से पहले 500 पृष्ठों का एक पूरा अनुवाद, मूल्य चुका कर, डस्टबिन में फेंका जा चुका था.वसुधा जी ने न तो अनुवादक का नाम बताया, न वह अनुवाद दिखाया. बस, ये जानकारी दी कि किताब का कोई वाक्य ही उसके पल्ले नहीं पडा था, यह अनुवादक ने खुद स्वीकार कर लिया था. बहरहाल, हम वह अनुवाद भले न देख पाए हों, अनुवादक का नाम अन्य स्रोतों से ऊपर करने में ज़रूर कामयाब रहे. कभी भंग की तरंग में रहे तो खोल देंगे, और क्या! ….

इपंले की लिखी “अनुवादक की भूमिका” एक छोटी-मोटी समीक्षा की तरह ही है#लेखक 13584646_1005030236280453_1234566605917380552_o

By संजीव कुमार

‘हिन्दू परम्पराओं का राष्ट्रीयकरण: भारतेंदु हरिश्चंद्र और उन्नीसवीं सदी का बनारस’ / अनुवादक की भूमिका

यह किताब हिंदी में कई साल पहले आ जानी चाहिए थी। अंग्रेज़ी में इसे छपे उन्नीस साल हो गए। इस बीच हमारे यहां भारतेंदु युग पर विचारोत्तेजक बहसें न हुई हों, ऐसा नहीं है, पर उनमें इस पुस्तक द्वारा मुहैया कराई गई विपुल सामग्री और अंतर्दृष्टि का शायद ही कोई इस्तेमाल हुआ है। छिटपुट नामोल्लेख की बात अलग है। ऐसा एक उल्लेख मेरी भी स्मृति में है जहां विद्वान आलोचक ने इस किताब की किसी स्थापना पर बात नहीं की, बस इसके मुखपृष्ठ पर छपी तस्वीर (पहला पेपरबैक संस्करण, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस) का ज़िक्र किया, यह बताने के लिए इन दिनों आलोचना में भारतेंदु को बदनाम करने की प्रवृत्ति कैसे बढ़ी है: ‘‘एक ही [आशय है, इसी] प्रवृत्ति के तहत वसुधा डालमिया भारतेंदु हरिश्चंद्र पर केंद्रित अपनी पुस्तक के कवर पर उनको एक बंगाली प्रेमिका को गोद में लेकर बैठा दिखाती हैं।’’ (शंभुनाथ, ‘नवजागरण का पुनर्पाठ’. शंभुनाथ संपा. भारतेंदु और भारतीय नवजागरण, पृ. 192. 2009, दिल्ली: प्रकाशन संस्थान) इससे और कुछ साबित हो या न हो, यह ज़रूर साबित होता है कि विद्वान आलोचक ने कवर से आगे बढ़ने/पढ़ने की ज़हमत नहीं उठाई थी।

अगर हिंदी में यह किताब आज से दसेक साल पहले आ गई होती तो क्या भारतेंदु युग और हिंदी नवजागरण की बहसों में, ख़ास तौर से रामविलास शर्मा की जन्मशती के मौक़े पर, इसका उल्लेख अनिवार्यतः होता? कहना मुश्किल है। इसलिए कि, पीछे उद्धृत विद्वान आलोचक के अनुमान/विश्वास के विपरीत, यह पुस्तक जितनी समृद्ध है, उतनी सनसनीख़ेज़ नहीं, जितनी अंतर्दृष्टिपूर्ण है, उतनी खंडनमंडनात्मक नहीं। मूल्य-निर्णय की जल्दबाज़ी से कोसों दूर यहां विश्लेषण का धैर्य और ठहराव, अतीत की उपलब्ध सामग्री के अधिक अर्थपूर्ण पुनर्विन्यास का यत्न, और इतिहास से सही उत्तर पा सकने के लिए उसके सामने सही सवाल पेश करने की सजगता है। जहां सनसनी नदारद हो, खंडन या मंडन में दिलचस्पी कम हो और मूल्य-निर्णय की आतुरता न हो, ऐसी किताबें हिंदी के वाद-विवाद-संवाद को अधिक आकर्षित नहीं कर पातीं। इसीलिए भरोसे के साथ नहीं कहा जा सकता कि यह पहले भी आ गई होती तो इसने हमारी बहसों को प्रभावित किया होता या आगे प्रभावित कर पाएगी। अलबत्ता, यह बात पूरे भरोसे के साथ कह सकता हूं कि यहां ऐसी जानकारियां और स्थापनाएं हैं जिनसे सूचित-विदित होना, यहां तक कि उत्तेजित-उद्वेलित होना भी, हमारी बहसों के लिए लाभप्रद होगा। ऐसा कहते हुए मुझे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में हुई एक राष्ट्रीय संगोष्ठी याद आ रही है जिसमें मुझे अपने सत्र के सदर साहब से इस बात पर झाड़ खानी पड़ी थी कि मैं भारतेंदु के साहित्यकार-पत्रकार होने के साथ-साथ एक धार्मिक नेता होने जैसा ‘स्वीपिंग रिमार्क’ कैसे दे सकता हूं! सदर की बातों का जवाब देने की कोई परंपरा नहीं है, पर मुझे थोड़े अशालीन तरीक़े से इस परंपरा को तोड़ना पड़ा था और उन्हें सलाह देनी पड़ी थी कि वे अपनी जानकारी किन स्रोतों से दुरुस्त कर सकते हैं।

भारतेंदु एक धार्मिक नेता भी थे, इस बात का संज्ञान लेने से भारतेंदु का क़द घट नहीं जाता और न ही इसकी अनदेखी करने से उनका क़द बढ़ जाता है। तथ्यों के प्रति अपने को खुला रखना और उनके सहसंबंधों के बीच से किसी दौर के गतिशास्त्र को समझने की कोशिश करना इतिहासकार का काम है, न कि व्यक्तियों की क़द-काठी के बारे में आसानी से समझ में आनेवाले फ़ैसले सुनाना। यह बात हिंदी के साहित्यिक-सांस्कृतिक इतिहास-लेखन से संस्कारित मुझ जैसे पाठक को वसुधा डालमिया की किताब पढ़ते हुए ही निर्णायक रूप से समझ में आई। भारतेंदु के समकालीनों से लेकर आज के विद्वानों तक की स्थापनाओं का जायज़ा लेने के बाद उनकी सुचिंतित राय है कि

‘‘भारतेंदु और उनके कामों का आलोचनात्मक मूल्यांकन एक छोर से दूसरे छोर की ओर जाता रहा है – उन पर पुनरुत्थानवादी होने का आरोप लगाने से लेकर उन्हें आधुनिकता के पुरोधा के रूप में सराहने तक, राजभक्त बताने से लेकर आमूल-परिवर्तनवादी बताने तक; हालांकि रामविलास शर्मा के बाद से आधुनिकता के अग्रदूत की भूमिका में उन्हें स्थिर करने की ओर एक निश्चित झुकाव रहा है। यह भूमिका साहित्यिक उत्पादन में भी देखी गयी है और उस राजनीतिक हैसियत में भी जो उन्हें प्राप्त थी। उनके काम के पारंपरिक पहलुओं पर विचार करने का कोई ढांचा प्रकटतः उपलब्ध नहीं है, सिवाय उस ढांचे के जो ‘पुनरुत्थानवादी’ के नकारात्मक अभिप्राय वाले ‘टैग’ ने मुहैया कराया है।’’

इसी चिंता के तहत यह किताब एक ऐसे ढांचे की प्रस्तावना करती है जो भारतेंदु के पारंपरिक और परिवर्तनोन्मुख पहलुओं की एक साथ सुसंगत रूप में व्याख्या कर सके। इस ढांचे में भारतेंदु हिंदुस्तान के उस उदीयमान मध्यवर्ग के एक नेतृत्वकारी प्रतिनिधि के रूप में सामने आते हैं जो पहले से मौजूद दो मुहावरों के साथ अंतरक्रिया करते हुए एक तीसरे आधुनिकतावादी मुहावरे को गढ़ रहा था। ये तीन मुहावरे क्या थे, इनकी अंतरक्रियाओं की क्या पेचीदगियां थीं, सांप्रदायिकता और राष्ट्रवाद के सहविकास में आरंभिक सांप्रदायिकता और आरंभिक राष्ट्रवाद को चिह्नित करनेवाला यह तीसरा मुहावरा किस तरह समावेशन-अपवर्जन की दोहरी प्रक्रिया के बीच हिंदी भाषा और साहित्य को हिंदुओं की भाषा और साहित्य के रूप में रच रहा था और इस तरह समेकित रूप से राष्ट्रीय भाषा, साहित्य तथा धर्म की गढ़ंत का ऐतिहासिक किरदार निभा रहा था, किस तरह नई हिंदू संस्कृति के निर्माण में एक-दूसरे के साथ जुड़ती-भिड़ती तमाम शक्तियों के आपसी संबंधों को भारतेंदु के विलक्षण व्यक्तित्व और कृतित्व में सबसे मुखर अभिव्यक्ति मिल रही थी – यह किताब इन अंतस्संबंधित पहलुओं का एक समग्र आकलन है। यह आकलन हिंदू पहचान के सृदृढ़ीकरण और हिंदू परंपराओं के राष्ट्रीयकरण की जिस प्रक्रिया को चिह्नित करता है, उसे एक साथ मुक्तिकामी भी मानता है और दमनकारी भी। मुक्तिकामी इस अर्थ में कि इसने

“सामाजिक व राजनीतिक मुद्दों की व्यापक राजनीतिक मुखरता के लिए, इन्हें अभिव्यक्त करने में सक्षम लचीली भाषा के विकास के लिए और एक समृद्ध साहित्य के लिए दमनकारी और सर्वव्यापी राजनीतिक सत्ता के विरुद्ध एक देशी सांस्कृतिक व राजनीतिक पहचान की अभिव्यक्ति का रास्ता खोला। यह प्राधिकार में परिवर्तन का द्योतक था जो अब न केवल राजाओं और ब्राह्मणों में बल्कि नवमध्यवर्ग में भी स्थित था।“

और दमनकारी इस अर्थ में कि समावेशी होने के साथ-साथ यह

“अपवर्जी भी था, इसने न केवल मुसलमानों को बेदखल किया बल्कि हिंदू सामाजिक व्यवस्था की कगारों पर बैठे समुदायों को भी बेदखल किया। यहां विभाजक रेखाओं को जान-बूझकर धुंधला छोड़ दिया गया था। फिर भी, अपने तमाम धुंधलेपन के बावजूद ये रेखाएं भेदभावमूलक अंतर की तीव्र सजगता को सामने ला रही थीं।“

कहने की ज़रूरत नहीं कि यहां बल एकतरफ़ा फ़ैसले सुनाने के बजाय चीज़ों के ऐतिहासिक प्रकार्य और गतिशास्त्र को समझने पर है। ध्वस्त करने या महिमामंडित करने की जल्दबाज़ी वसुधा डालमिया के लेखन का स्वभाव नहीं है, मामला भारतेंदु का हो या भारतेंदु पर विचार करनेवाले विद्वानों का। यहां मैं ख़ास तौर से रामविलास शर्मा से संबंधित दो टिप्पणियों को उद्धृत करने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा, जिनमें देखा जा सकता है कि शक्तियों और सीमाओं को रेखांकित करते हुए किस तरह की निरावेग तार्किकता का निर्वाह किया गया हैः

“रामविलास शर्मा के अध्ययनों ([1942]1975, [1953]1984) में कवि के परंपरावादी आकलनों से और अधिक आमूल क़िस्म का प्रस्थान दिखलाई पड़ा। शर्मा पहले व्यक्ति थे जिन्होंने भारतेंदु और उनके समकालीनों की सरल, बोलचाल वाली और जीवंत गद्य शैली की सराहना की, जिसे रामविलास शर्मा स्वयं अपने समकालीनों द्वारा प्रयुक्त होता हुआ देखना चाहते थे; ऐसे समकालीन, जो बाद के भारी-भरकम, अधिक संस्कृतनिष्ठ, और बोलचाल के मुहावरे से अपना संपर्क गंवा चुके गद्य के शिकार हो गये थे। उन्होंने इस भाषा को भारतेंदु के पत्रकारीय कार्य के जनवादी पक्ष के बतौर देखा। उन्होंने पत्रिकाओं को विस्मृति के गर्त से निकालने की ज़रूरत पर बल दिया और अपनी पहली क़िताब के निबंधों में उन लेखों, संपादकीयों तथा टिप्पणियों से बहुतेरे उद्धरण दिये जिन्हें भारतेंदु की गं्रथावलियों में जगह नहीं मिल पायी थी। विवेचित सामग्री के अधिक विस्तृत दायरे ने लेखक और उसके समय के बारे में एक अलग दृष्टि को उभरने का मौक़ा दिया। शर्मा इस तथ्य को रेखांकित करने वाले पहले व्यक्ति थे कि भारतेंदु के संबोध्य पुराने दौर के अभिजन नहीं रह गये थे, क्योंकि पत्रिकाओं में जिन मुद्दों पर चर्चा की गयी थी वे व्यापक जनता के साथ सरोकार रखने वाले मुद्दे थे। भारतेंदु के राजनीतिक रैडिकलिज़्म की सराहना करने वाले पहले व्यक्ति भी शर्मा ही थे।“
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“बलिया व्याख्यान का रामविलास जी द्वारा किया गया विश्लेषण उनके अपने विचार-लोक तक पहुंचने का साधन मुहैया कराता है। वे भारतेंदु के राजनीतिक विचारों की परिपक्वता पर बल देते हैं और उन्हें अपने समय से काफ़ी आगे का मानते हैं। इस रूप में उनके राष्ट्रवाद की पेशबंदी करते हुए शर्मा इस तथ्य की अहमियत को दरकिनार कर देते हैं कि वह राष्ट्रवाद अभी भी बिल्कुल बनती हुई स्थिति में था, कि कई मुद्दे सुलझाये जाने की प्रक्रिया में ही थे। इसके अलावा, अपने पठन के प्रबल राष्ट्रवादी अभिप्रायों का निर्वाह करते हुए, वे व्याख्यान में हिंदू-मुस्लिम एकता की अपील और ‘हिंदू’ को अधिक समावेशी तरीके से इस्तेमाल करने के निवेदन पर ही ग़ौर फ़रमाते हैं। इस तरह वे तेज़ी से अलग होते दो समुदायों के बीच के उन तनावों और वैर-भाव की अनदेखी करते हैं जो उस व्याख्यान में भी दस्तावेज़ीकृत हैं। उस दौर को हिंदू पुनरुत्थानवाद का दौर बताये जाने की कोशिशों को अगर रामविलास शर्मा असंगत बता कर ख़ारिज करते हैं, तो साथ में धार्मिक मुद्दों को भी दरकिनार कर देते हैं और इस तरह भारतेंदु के काम का यह ख़ासा विचारणीय पहलू हाशिये पर चला जाता है।“

पहला अंश जितनी सारगर्भित प्रशंसा का उदाहरण है, दूसरा उतनी ही सारगर्भित आलोचना का, और ग़ौर करने की बात है कि दोनों जगहों पर शैली एक-सी है – सीधी बात कहनेवाली तार्किक शैली, जिसमें कोई भावनात्मक अतिरेक नहीं है।
कुल मिलाकर, इस किताब का हिंदी में आना एकाधिक कारणों से ज़रूरी था। नई सूचनाओं और स्थापनाओं के लिए तो इसे पढ़ा ही जाना चाहिए, साथ ही, हर तथ्य को साक्ष्य से पुष्ट करनेवाली शोध-प्रविधि, हर कोण से सवाल उठानेवाली विश्लेषण-विधि और खंडन-मंडन के जेहादी जोश से रहित निर्णय-पद्धति के नमूने के रूप में भी यह पठनीय है।

अनुवाद के लिहाज से यह किताब, निस्संदेह, बहुत चुनौतीपूर्ण थी। अवधारणात्मक जटिलताओं और लंबी तथा गझिन वाक्य-रचना को हिंदी में लाने में अनुवादक-द्वय के पसीने छूट गये। इसके बावजूद मूल के साथ कितना न्याय हो पाया है, कहना कठिन है। हर बार इस अनुवाद को पढ़ते हुए कुछ-न-कुछ बदल डालने की ज़रूरत महसूस होती है… पर एक असंतुष्ट-सा ही सही, पूर्णविराम लगाना इसके प्रेस में जाने के लिए तो ज़रूरी है! हां, पूर्णविराम लगाते हुए वसुधा डालमिया की एक शैली विशेष को लेकर पाठकों को सचेत करना ज़रूरी है। कई जगह जब वे किसी किताब/लेख/भाषण में आई हुई बातों का सार-संक्षेप प्रस्तुत कर होती हैं तो वाक्य-रचना कुछ इस तरह की होती है कि वह बात स्वयं लेखिका की अपनी बात प्रतीत होने लगती है। ऐसा भ्रम अंग्रेज़ी में पढ़ते हुए नहीं होता, पर हिंदी में उल्था करने पर होता है। मिसाल के लिए, जहां वे भारतेंदु के बलिया भाषण की अंतर्वस्तु के बारे में बताती हैं, वहां आए हुए इन वाक्यों को देखें:

“अंग्रेज़ों की कृपा से और सामान्यतः संसार की उन्नति के चलते कितना सारा तकनीकी ज्ञान सुलभ हो गया था। बावजूद इसके देश की जनता, जिसने पुराने ज़माने में अपने आदिम औज़ारों के साथ आश्चर्यजनक खोजें की थीं, अब चुंगी की कतवार फेंकने की गाड़ी से ज़्यादा कुछ न थी। मौजूदा दौर में उन्नति के लिए एक घुड़दौड़ चल रही थी, और जापानियों को छोड़ भी दें तो अमेरिकी, अंग्रेज़ तथा फ्रांसीसी इस घुड़दौड़ में आगे रहने का पूरा जुगाड़ लगाये हुए थे। यह ऐसा समय नहीं था जब पीछे छूटना किसी भी तरह गवारा हो।… यह शिकायत कि ख़ाली पेट इन चीज़ों के बारे मेें कैसे सोचें, अंततः क़ायल करने वाली न थी।“

ऐसे अंश बहुतेरे हैं। इन्हें पढ़ते हुए सावधान रहना पड़ेगा कि लेखिका अपनी बात नहीं कह रहीं, वे किसी और को, बिना उद्धरण-चिह्नों के, अपने शब्दों में उद्धृत कर रही हैं। यह सावधानी न बरती गई तो संभव है, लेखिका को ऐसी अनेक बातों का आरोप झेलना पड़े जो उनकी नहीं हैं और जो हिंदी की प्रकृति तथा अनुवाद की विकृति के कारण उनकी प्रतीत होती हैं।

SANJIV KUMAR

संजीव कुमार

संजीव कुमार। युवा आलोचक और कहानीकार। ‘जैनेन्द्र और अज्ञेयः सृजन का सैद्धांतिक नेपथ्य’ पुस्तक के लिए देवीशंकर अवस्थी सम्मान। दिल्ली विश्विद्यालय के देशबंधु कॉलेज में  प्राध्यापक। इनसे sanjusanjeev67@gmail.com पर संपर्क सम्भव है।

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