हिन्दू परम्पराओं का राष्ट्रीयकरण: संजीव कुमार

आज तक अपना लिखा हुआ/किया हुआ बताने में ख़ासा संकोच होता रहा. अब सोचता हूँ, बता ही दिया करूं…. साथी बली सिंह की एक कविता है ना–अपनी चर्चा, अपनी तारीफ़ खुद ही करो, और कौन करेगा?…. तो साहिबान, अब छप के आ गयी है वसुधा डालमिया की वो किताब जिसका हम (मैं और योगेन्द्र दत्त) ने अनुवाद किया है. मुश्किल किताब थी. अंदाजा इससे लगाइए कि हमें मिलने से पहले 500 पृष्ठों का एक पूरा अनुवाद, मूल्य चुका कर, डस्टबिन में फेंका जा चुका था.वसुधा जी ने न तो अनुवादक का नाम बताया, न वह अनुवाद दिखाया. बस, ये जानकारी दी कि किताब का कोई वाक्य ही उसके पल्ले नहीं पडा था, यह अनुवादक ने खुद स्वीकार कर लिया था. बहरहाल, हम वह अनुवाद भले न देख पाए हों, अनुवादक का नाम अन्य स्रोतों से ऊपर करने में ज़रूर कामयाब रहे. कभी भंग की तरंग में रहे तो खोल देंगे, और क्या! ….

इपंले की लिखी “अनुवादक की भूमिका” एक छोटी-मोटी समीक्षा की तरह ही है#लेखक 13584646_1005030236280453_1234566605917380552_o

By संजीव कुमार

‘हिन्दू परम्पराओं का राष्ट्रीयकरण: भारतेंदु हरिश्चंद्र और उन्नीसवीं सदी का बनारस’ / अनुवादक की भूमिका

यह किताब हिंदी में कई साल पहले आ जानी चाहिए थी। अंग्रेज़ी में इसे छपे उन्नीस साल हो गए। इस बीच हमारे यहां भारतेंदु युग पर विचारोत्तेजक बहसें न हुई हों, ऐसा नहीं है, पर उनमें इस पुस्तक द्वारा मुहैया कराई गई विपुल सामग्री और अंतर्दृष्टि का शायद ही कोई इस्तेमाल हुआ है। छिटपुट नामोल्लेख की बात अलग है। ऐसा एक उल्लेख मेरी भी स्मृति में है जहां विद्वान आलोचक ने इस किताब की किसी स्थापना पर बात नहीं की, बस इसके मुखपृष्ठ पर छपी तस्वीर (पहला पेपरबैक संस्करण, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस) का ज़िक्र किया, यह बताने के लिए इन दिनों आलोचना में भारतेंदु को बदनाम करने की प्रवृत्ति कैसे बढ़ी है: ‘‘एक ही [आशय है, इसी] प्रवृत्ति के तहत वसुधा डालमिया भारतेंदु हरिश्चंद्र पर केंद्रित अपनी पुस्तक के कवर पर उनको एक बंगाली प्रेमिका को गोद में लेकर बैठा दिखाती हैं।’’ (शंभुनाथ, ‘नवजागरण का पुनर्पाठ’. शंभुनाथ संपा. भारतेंदु और भारतीय नवजागरण, पृ. 192. 2009, दिल्ली: प्रकाशन संस्थान) इससे और कुछ साबित हो या न हो, यह ज़रूर साबित होता है कि विद्वान आलोचक ने कवर से आगे बढ़ने/पढ़ने की ज़हमत नहीं उठाई थी।

अगर हिंदी में यह किताब आज से दसेक साल पहले आ गई होती तो क्या भारतेंदु युग और हिंदी नवजागरण की बहसों में, ख़ास तौर से रामविलास शर्मा की जन्मशती के मौक़े पर, इसका उल्लेख अनिवार्यतः होता? कहना मुश्किल है। इसलिए कि, पीछे उद्धृत विद्वान आलोचक के अनुमान/विश्वास के विपरीत, यह पुस्तक जितनी समृद्ध है, उतनी सनसनीख़ेज़ नहीं, जितनी अंतर्दृष्टिपूर्ण है, उतनी खंडनमंडनात्मक नहीं। मूल्य-निर्णय की जल्दबाज़ी से कोसों दूर यहां विश्लेषण का धैर्य और ठहराव, अतीत की उपलब्ध सामग्री के अधिक अर्थपूर्ण पुनर्विन्यास का यत्न, और इतिहास से सही उत्तर पा सकने के लिए उसके सामने सही सवाल पेश करने की सजगता है। जहां सनसनी नदारद हो, खंडन या मंडन में दिलचस्पी कम हो और मूल्य-निर्णय की आतुरता न हो, ऐसी किताबें हिंदी के वाद-विवाद-संवाद को अधिक आकर्षित नहीं कर पातीं। इसीलिए भरोसे के साथ नहीं कहा जा सकता कि यह पहले भी आ गई होती तो इसने हमारी बहसों को प्रभावित किया होता या आगे प्रभावित कर पाएगी। अलबत्ता, यह बात पूरे भरोसे के साथ कह सकता हूं कि यहां ऐसी जानकारियां और स्थापनाएं हैं जिनसे सूचित-विदित होना, यहां तक कि उत्तेजित-उद्वेलित होना भी, हमारी बहसों के लिए लाभप्रद होगा। ऐसा कहते हुए मुझे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में हुई एक राष्ट्रीय संगोष्ठी याद आ रही है जिसमें मुझे अपने सत्र के सदर साहब से इस बात पर झाड़ खानी पड़ी थी कि मैं भारतेंदु के साहित्यकार-पत्रकार होने के साथ-साथ एक धार्मिक नेता होने जैसा ‘स्वीपिंग रिमार्क’ कैसे दे सकता हूं! सदर की बातों का जवाब देने की कोई परंपरा नहीं है, पर मुझे थोड़े अशालीन तरीक़े से इस परंपरा को तोड़ना पड़ा था और उन्हें सलाह देनी पड़ी थी कि वे अपनी जानकारी किन स्रोतों से दुरुस्त कर सकते हैं।

भारतेंदु एक धार्मिक नेता भी थे, इस बात का संज्ञान लेने से भारतेंदु का क़द घट नहीं जाता और न ही इसकी अनदेखी करने से उनका क़द बढ़ जाता है। तथ्यों के प्रति अपने को खुला रखना और उनके सहसंबंधों के बीच से किसी दौर के गतिशास्त्र को समझने की कोशिश करना इतिहासकार का काम है, न कि व्यक्तियों की क़द-काठी के बारे में आसानी से समझ में आनेवाले फ़ैसले सुनाना। यह बात हिंदी के साहित्यिक-सांस्कृतिक इतिहास-लेखन से संस्कारित मुझ जैसे पाठक को वसुधा डालमिया की किताब पढ़ते हुए ही निर्णायक रूप से समझ में आई। भारतेंदु के समकालीनों से लेकर आज के विद्वानों तक की स्थापनाओं का जायज़ा लेने के बाद उनकी सुचिंतित राय है कि

‘‘भारतेंदु और उनके कामों का आलोचनात्मक मूल्यांकन एक छोर से दूसरे छोर की ओर जाता रहा है – उन पर पुनरुत्थानवादी होने का आरोप लगाने से लेकर उन्हें आधुनिकता के पुरोधा के रूप में सराहने तक, राजभक्त बताने से लेकर आमूल-परिवर्तनवादी बताने तक; हालांकि रामविलास शर्मा के बाद से आधुनिकता के अग्रदूत की भूमिका में उन्हें स्थिर करने की ओर एक निश्चित झुकाव रहा है। यह भूमिका साहित्यिक उत्पादन में भी देखी गयी है और उस राजनीतिक हैसियत में भी जो उन्हें प्राप्त थी। उनके काम के पारंपरिक पहलुओं पर विचार करने का कोई ढांचा प्रकटतः उपलब्ध नहीं है, सिवाय उस ढांचे के जो ‘पुनरुत्थानवादी’ के नकारात्मक अभिप्राय वाले ‘टैग’ ने मुहैया कराया है।’’

इसी चिंता के तहत यह किताब एक ऐसे ढांचे की प्रस्तावना करती है जो भारतेंदु के पारंपरिक और परिवर्तनोन्मुख पहलुओं की एक साथ सुसंगत रूप में व्याख्या कर सके। इस ढांचे में भारतेंदु हिंदुस्तान के उस उदीयमान मध्यवर्ग के एक नेतृत्वकारी प्रतिनिधि के रूप में सामने आते हैं जो पहले से मौजूद दो मुहावरों के साथ अंतरक्रिया करते हुए एक तीसरे आधुनिकतावादी मुहावरे को गढ़ रहा था। ये तीन मुहावरे क्या थे, इनकी अंतरक्रियाओं की क्या पेचीदगियां थीं, सांप्रदायिकता और राष्ट्रवाद के सहविकास में आरंभिक सांप्रदायिकता और आरंभिक राष्ट्रवाद को चिह्नित करनेवाला यह तीसरा मुहावरा किस तरह समावेशन-अपवर्जन की दोहरी प्रक्रिया के बीच हिंदी भाषा और साहित्य को हिंदुओं की भाषा और साहित्य के रूप में रच रहा था और इस तरह समेकित रूप से राष्ट्रीय भाषा, साहित्य तथा धर्म की गढ़ंत का ऐतिहासिक किरदार निभा रहा था, किस तरह नई हिंदू संस्कृति के निर्माण में एक-दूसरे के साथ जुड़ती-भिड़ती तमाम शक्तियों के आपसी संबंधों को भारतेंदु के विलक्षण व्यक्तित्व और कृतित्व में सबसे मुखर अभिव्यक्ति मिल रही थी – यह किताब इन अंतस्संबंधित पहलुओं का एक समग्र आकलन है। यह आकलन हिंदू पहचान के सृदृढ़ीकरण और हिंदू परंपराओं के राष्ट्रीयकरण की जिस प्रक्रिया को चिह्नित करता है, उसे एक साथ मुक्तिकामी भी मानता है और दमनकारी भी। मुक्तिकामी इस अर्थ में कि इसने

“सामाजिक व राजनीतिक मुद्दों की व्यापक राजनीतिक मुखरता के लिए, इन्हें अभिव्यक्त करने में सक्षम लचीली भाषा के विकास के लिए और एक समृद्ध साहित्य के लिए दमनकारी और सर्वव्यापी राजनीतिक सत्ता के विरुद्ध एक देशी सांस्कृतिक व राजनीतिक पहचान की अभिव्यक्ति का रास्ता खोला। यह प्राधिकार में परिवर्तन का द्योतक था जो अब न केवल राजाओं और ब्राह्मणों में बल्कि नवमध्यवर्ग में भी स्थित था।“

और दमनकारी इस अर्थ में कि समावेशी होने के साथ-साथ यह

“अपवर्जी भी था, इसने न केवल मुसलमानों को बेदखल किया बल्कि हिंदू सामाजिक व्यवस्था की कगारों पर बैठे समुदायों को भी बेदखल किया। यहां विभाजक रेखाओं को जान-बूझकर धुंधला छोड़ दिया गया था। फिर भी, अपने तमाम धुंधलेपन के बावजूद ये रेखाएं भेदभावमूलक अंतर की तीव्र सजगता को सामने ला रही थीं।“

कहने की ज़रूरत नहीं कि यहां बल एकतरफ़ा फ़ैसले सुनाने के बजाय चीज़ों के ऐतिहासिक प्रकार्य और गतिशास्त्र को समझने पर है। ध्वस्त करने या महिमामंडित करने की जल्दबाज़ी वसुधा डालमिया के लेखन का स्वभाव नहीं है, मामला भारतेंदु का हो या भारतेंदु पर विचार करनेवाले विद्वानों का। यहां मैं ख़ास तौर से रामविलास शर्मा से संबंधित दो टिप्पणियों को उद्धृत करने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा, जिनमें देखा जा सकता है कि शक्तियों और सीमाओं को रेखांकित करते हुए किस तरह की निरावेग तार्किकता का निर्वाह किया गया हैः

“रामविलास शर्मा के अध्ययनों ([1942]1975, [1953]1984) में कवि के परंपरावादी आकलनों से और अधिक आमूल क़िस्म का प्रस्थान दिखलाई पड़ा। शर्मा पहले व्यक्ति थे जिन्होंने भारतेंदु और उनके समकालीनों की सरल, बोलचाल वाली और जीवंत गद्य शैली की सराहना की, जिसे रामविलास शर्मा स्वयं अपने समकालीनों द्वारा प्रयुक्त होता हुआ देखना चाहते थे; ऐसे समकालीन, जो बाद के भारी-भरकम, अधिक संस्कृतनिष्ठ, और बोलचाल के मुहावरे से अपना संपर्क गंवा चुके गद्य के शिकार हो गये थे। उन्होंने इस भाषा को भारतेंदु के पत्रकारीय कार्य के जनवादी पक्ष के बतौर देखा। उन्होंने पत्रिकाओं को विस्मृति के गर्त से निकालने की ज़रूरत पर बल दिया और अपनी पहली क़िताब के निबंधों में उन लेखों, संपादकीयों तथा टिप्पणियों से बहुतेरे उद्धरण दिये जिन्हें भारतेंदु की गं्रथावलियों में जगह नहीं मिल पायी थी। विवेचित सामग्री के अधिक विस्तृत दायरे ने लेखक और उसके समय के बारे में एक अलग दृष्टि को उभरने का मौक़ा दिया। शर्मा इस तथ्य को रेखांकित करने वाले पहले व्यक्ति थे कि भारतेंदु के संबोध्य पुराने दौर के अभिजन नहीं रह गये थे, क्योंकि पत्रिकाओं में जिन मुद्दों पर चर्चा की गयी थी वे व्यापक जनता के साथ सरोकार रखने वाले मुद्दे थे। भारतेंदु के राजनीतिक रैडिकलिज़्म की सराहना करने वाले पहले व्यक्ति भी शर्मा ही थे।“
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“बलिया व्याख्यान का रामविलास जी द्वारा किया गया विश्लेषण उनके अपने विचार-लोक तक पहुंचने का साधन मुहैया कराता है। वे भारतेंदु के राजनीतिक विचारों की परिपक्वता पर बल देते हैं और उन्हें अपने समय से काफ़ी आगे का मानते हैं। इस रूप में उनके राष्ट्रवाद की पेशबंदी करते हुए शर्मा इस तथ्य की अहमियत को दरकिनार कर देते हैं कि वह राष्ट्रवाद अभी भी बिल्कुल बनती हुई स्थिति में था, कि कई मुद्दे सुलझाये जाने की प्रक्रिया में ही थे। इसके अलावा, अपने पठन के प्रबल राष्ट्रवादी अभिप्रायों का निर्वाह करते हुए, वे व्याख्यान में हिंदू-मुस्लिम एकता की अपील और ‘हिंदू’ को अधिक समावेशी तरीके से इस्तेमाल करने के निवेदन पर ही ग़ौर फ़रमाते हैं। इस तरह वे तेज़ी से अलग होते दो समुदायों के बीच के उन तनावों और वैर-भाव की अनदेखी करते हैं जो उस व्याख्यान में भी दस्तावेज़ीकृत हैं। उस दौर को हिंदू पुनरुत्थानवाद का दौर बताये जाने की कोशिशों को अगर रामविलास शर्मा असंगत बता कर ख़ारिज करते हैं, तो साथ में धार्मिक मुद्दों को भी दरकिनार कर देते हैं और इस तरह भारतेंदु के काम का यह ख़ासा विचारणीय पहलू हाशिये पर चला जाता है।“

पहला अंश जितनी सारगर्भित प्रशंसा का उदाहरण है, दूसरा उतनी ही सारगर्भित आलोचना का, और ग़ौर करने की बात है कि दोनों जगहों पर शैली एक-सी है – सीधी बात कहनेवाली तार्किक शैली, जिसमें कोई भावनात्मक अतिरेक नहीं है।
कुल मिलाकर, इस किताब का हिंदी में आना एकाधिक कारणों से ज़रूरी था। नई सूचनाओं और स्थापनाओं के लिए तो इसे पढ़ा ही जाना चाहिए, साथ ही, हर तथ्य को साक्ष्य से पुष्ट करनेवाली शोध-प्रविधि, हर कोण से सवाल उठानेवाली विश्लेषण-विधि और खंडन-मंडन के जेहादी जोश से रहित निर्णय-पद्धति के नमूने के रूप में भी यह पठनीय है।

अनुवाद के लिहाज से यह किताब, निस्संदेह, बहुत चुनौतीपूर्ण थी। अवधारणात्मक जटिलताओं और लंबी तथा गझिन वाक्य-रचना को हिंदी में लाने में अनुवादक-द्वय के पसीने छूट गये। इसके बावजूद मूल के साथ कितना न्याय हो पाया है, कहना कठिन है। हर बार इस अनुवाद को पढ़ते हुए कुछ-न-कुछ बदल डालने की ज़रूरत महसूस होती है… पर एक असंतुष्ट-सा ही सही, पूर्णविराम लगाना इसके प्रेस में जाने के लिए तो ज़रूरी है! हां, पूर्णविराम लगाते हुए वसुधा डालमिया की एक शैली विशेष को लेकर पाठकों को सचेत करना ज़रूरी है। कई जगह जब वे किसी किताब/लेख/भाषण में आई हुई बातों का सार-संक्षेप प्रस्तुत कर होती हैं तो वाक्य-रचना कुछ इस तरह की होती है कि वह बात स्वयं लेखिका की अपनी बात प्रतीत होने लगती है। ऐसा भ्रम अंग्रेज़ी में पढ़ते हुए नहीं होता, पर हिंदी में उल्था करने पर होता है। मिसाल के लिए, जहां वे भारतेंदु के बलिया भाषण की अंतर्वस्तु के बारे में बताती हैं, वहां आए हुए इन वाक्यों को देखें:

“अंग्रेज़ों की कृपा से और सामान्यतः संसार की उन्नति के चलते कितना सारा तकनीकी ज्ञान सुलभ हो गया था। बावजूद इसके देश की जनता, जिसने पुराने ज़माने में अपने आदिम औज़ारों के साथ आश्चर्यजनक खोजें की थीं, अब चुंगी की कतवार फेंकने की गाड़ी से ज़्यादा कुछ न थी। मौजूदा दौर में उन्नति के लिए एक घुड़दौड़ चल रही थी, और जापानियों को छोड़ भी दें तो अमेरिकी, अंग्रेज़ तथा फ्रांसीसी इस घुड़दौड़ में आगे रहने का पूरा जुगाड़ लगाये हुए थे। यह ऐसा समय नहीं था जब पीछे छूटना किसी भी तरह गवारा हो।… यह शिकायत कि ख़ाली पेट इन चीज़ों के बारे मेें कैसे सोचें, अंततः क़ायल करने वाली न थी।“

ऐसे अंश बहुतेरे हैं। इन्हें पढ़ते हुए सावधान रहना पड़ेगा कि लेखिका अपनी बात नहीं कह रहीं, वे किसी और को, बिना उद्धरण-चिह्नों के, अपने शब्दों में उद्धृत कर रही हैं। यह सावधानी न बरती गई तो संभव है, लेखिका को ऐसी अनेक बातों का आरोप झेलना पड़े जो उनकी नहीं हैं और जो हिंदी की प्रकृति तथा अनुवाद की विकृति के कारण उनकी प्रतीत होती हैं।

SANJIV KUMAR

संजीव कुमार

संजीव कुमार। युवा आलोचक और कहानीकार। ‘जैनेन्द्र और अज्ञेयः सृजन का सैद्धांतिक नेपथ्य’ पुस्तक के लिए देवीशंकर अवस्थी सम्मान। दिल्ली विश्विद्यालय के देशबंधु कॉलेज में  प्राध्यापक। इनसे sanjusanjeev67@gmail.com पर संपर्क सम्भव है।

भारत माता: आनंद कुमारस्वामी

आनंद कुमारस्वामी की एक किताब है ‘ऐसेजइन नेशनल आयडिलिज्म’. जीए नेटसन एंड कंपनी, मद्रास से 1909 में प्रकाशित इस किताब में संकलित एक आलेख का नाम है- माता भारत! आलेख अनूठा है, इस अर्थ में कि उसमें पहली दफे भारतमाता की कथा कही गयी है. 
बंकिमचंद्र ‘वंदे मातरम्’ गीत में भारतमाता का आद्यरूप गढ़ चुके थे, इस आद्यरूप को अबनींद्रनाथ टैगोर की तूलिका ने अपने कैनवस पर मूर्तिमान किया लेकिन, गीत और चित्र से उठनेवाले अर्थों की प्रामाणिक व्याख्या अभी शेष थी. व्याख्या का यही काम भारतीय संस्कृति के मर्मज्ञ आनंद कुमारस्वामी ने अपने ‘माता भारत’ शीर्षक लेख में किया.
 
कुमारस्वामी के आलेख की शुरुआत इन पंक्तियों से होती है- ‘कभी की बात है, एक स्त्री थी- लंबी और गोरी. एकदम निर्मल, धैर्य और कृपा की प्रतिमूर्ति…! ’ आलेख में आगे प्राचीन, मध्यकालीन और आधुनिक भारत का संकेत करते हुए लिखा गया है कि विद्या-बुद्धि के मामले में यह स्त्री विश्वगुरु थी, बहुतों ने उसका हाथ मांगना चाहा और इनमें से एक जिससे उसे रंचमात्र ही प्रेम था, बरसों तक उसकी काया का स्वामी बना रहा. फिर एक और आया, इस अनजान प्रणय-याचक ने वादे किये स्वतंत्रता और शांति के, उसकी संतानों की सुरक्षा के. और, उसने विश्वास करके उसे अपना हाथ सौंप दिया…! 
 
इसके बाद आलेख में सन् 1857 का जिक्र आता है कि स्त्री के कुछ बच्चे नये स्वामी के विरुद्ध उठ खड़े हुए. उन्हें लगा कि उनकी ताकत छिनी जा रही है और उनके आपस के बात-व्यवहार जिन नियम-कायदों से संचालित होते हैं, उनके साथ छेड़छाड़ की जा रही है. भारतमाता की इस कथा में एक नया मोड़ आता है, जब 1857 के बाद के मध्यवर्गीय मानस के दोहरेपन को इंगित करते हुए कुमारस्वामी लिखते हैं कि नये स्वामी से माता ने एक संतान जना और स्वामी खुश था कि वह (एक कन्या का जन्म) उसके रंग-ढंग की होगी, उसके अपने लोगों की कन्या के समान.
 
वह धनवान और रूपवान होगी, उसके अपने लोगों के पुत्र की दुल्हन बनेगी. लेकिन जब इस संतान का जन्म हुआ, तो माता जैसे स्वप्न से जागी और सिर्फ अपनी बेटी की खातिर जीने लगी. बड़ी होती बेटी मां को उसके यौवन के दिनों की याद दिलाती थी. वह विदेशी स्वामी की पक्षधर नहीं थी, तो भी उसमें उस (विदेशी स्वामी) जैसी ऊर्जा और व्यावहारिक मामलों की चतुराई थी. मां चुपके से बेटी को प्राचीन ज्ञान सिखाती और बेटी का हृदय अपने पिता, उसके लोगों और उनके आचार-व्यवहार से दूर होता चला गया. 
 
कथा के आखिर में आता है कि बेटी की आचार-व्यवहार से माता को संतोष था, अब उसके केश उजले हो चले थे, उम्र के हाथों वह कमजोर हो चली थी और एक समय आया जब वह नहीं रही, क्योंकि उसका काम पूरा हो चुका था. बेटी को पिता की निरंकुशता जरा भी बर्दाश्त नहीं थी. 
 
उसे सभी माता कहते थे, और वह अपने से पहले जन्म लेनेवाले बच्चों की भी मां थी, कुमारस्वामी लिखते हैं कि ‘इस माता (क्योंकि उसने कहा कि वह सबकी मां होगी लेकिन ब्याहता किसी की नहीं) ने सब संतानों की मदद की. उसने सबको एक-दूसरे से प्रेम करना और एक-दूजे की मदद करना और अपने को मां पुकारना सिखाया.’ 
 
यह कथा बार-बार याद की जानी चाहिए, क्योंकि आज एक राज्य का मुख्यमंत्री कह रहा है कि भारत माता की जय नहीं बोलनेवालों को इस देश में रहने का अधिकार नहीं है. दूसरे राज्य में एक वरिष्ठ नेता स्कूल-कॉलेज चलानेवाले एक ट्रस्ट का संचालक है. वह नियम बना रहा है कि ट्रस्ट के स्कूल-कॉलेज के प्रवेश फाॅर्म पर भारत माता की जय नहीं लिखा, तो प्रवेश नहीं मिलेगा. 
 
तीसरे राज्य में धर्म की एक संस्था फतवा जारी करती है कि मुसलमान जिस तरह वंदे मातरम् नहीं बोल सकते, इसी तरह भारत माता की जय भी नहीं बोल सकते. जहरबुझी बयानबाजियों के बीच ऐसा लगता है यह 21वीं सदी के दूसरे दशक का नहीं 1930-40 का भारत है, जब एक देश के भीतर धर्म-केंद्रित दो राष्ट्रीयताओं के सिद्धांत ने जोर पकड़ा था. इतिहास दोहराने के आतुर इन बयानवीरों में से क्या किसी को भारतमाता की कथा याद है? 
 
आनंद कुमारस्वामी की भारतमाता की कथा किसी एक धर्म की कथा नहीं है, वह धार्मिकताओं के समाहार की कथा है. इस कथा की पहली सीख है कि अतीत में लौटना नहीं हो सकता और दूसरी सीख है कि भारतमाता स्वयं स्वामिनी (संप्रभु) हैं, सब ही उनकी संतान हैं, सो कोई एक अपने को वारिस बता कर शेष पर भारतमाता के नाम से हुक्म के कोड़े हांकने की निरंकुशता नहीं बरत सकता. # चंदन  श्रीवास्तव 

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भारत माता, चित्रकार-शारदाचरण

माता भारत

By आनंद कुमारस्वामी

कभी की बात है, एक स्त्री थी- लंबी और गोरी. एकदम निर्मल, धैर्य और कृपा की प्रतिमूर्ति ! ना, वह युवती नहीं थीऐसा तो कोई सोच भी नहीं सकता। बीते बरसों में उसकी विद्या-बुद्धि की धूम थी, दुनिया भर से ज्ञानीजन आते, उसके चरणों में बैठते और उसकी सीख दुनिया के कोने-कोने में ले जाते. लेकिन अब उसकी उम्र ढलान पर थी, तनिक थकान हावी होने लगी थी और उसकी आंखों की ज्योति किसी ध्रुवतारे की तरह बस उन्हीं चंद सयानों को राह दिखा पा रही थी जो अब भी आभास के पीछे का यथार्थ देख पाने में सक्षम थे. लेकिन, वह धनी थी और बहुतों ने उसका हाथ मांगना चाहा और इनमें से एक जिससे उसे रंचमात्र ही प्रेम था, बरसों तक उसकी काया का स्वामी बना रहा. फिर एक और आया, इस अनजान प्रणय-याचक ने वादे किए स्वतंत्रता और शांति के, उसकी संतानों की सुरक्षा के. और, उसने विश्वास करके उसे अपना हाथ सौंप दिया..

कुछ समय तक ठीक चला. शांति थी, उपेक्षा से उपजी हुई. उसका नया स्वामी उसके खजाने के धन-दौलत को पाकर संतुष्ट था. लेकिन जल्दी ही उसने अपनी नव ब्याहता और उसकी संतानों में ज्यादा रुचि दिखानी शुरु कर दी और स्वयं से कहा,  “इस स्त्री के आचार-विचार विचित्र जान पड़ते है, ना तो मेरी तरह हैं और ना ही मेरे लोगों की तरह, उसके विचार मेरे विचार से मेल नहीं खाते; लेकिन उसे प्रशिक्षित किया जाएगा, उसे शिक्षा दी जायेगी ताकि जो मैं जानता हूं उसे वह भी जान सके और दुनिया कहे कि मैंने उसके मन को मोड़ कर प्रगति की राह पर लगा दिया है.” वह उसकी पुराचीन ज्ञानराशि को नहीं जानता था, वह उसे दिमाग से सुस्त जान पड़ती थी और अपनी जिस व्यवहारकुशलता पर उसे गर्व था उसकी उसमें कमी जान पड़ती थी.

और ये विचार अभी उसके मन में चल ही रहे थे कि उसके(स्त्री) कुछ बच्चे उसके(नये स्वामी) विरुद्ध उठ खड़े हुए कि उनकी ताकत छिनी जा रही है और उनके आपस के बात-व्यवहार जिन नियम-कायदों से संचालित होते हैं उनके साथ छेड़छाड़ की जा रही है. इन संतानों को भय था कि उनकी प्राचीन विरासत हमेशा के लिए खत्म हो जायेगी. माता को अब भी शांति की आशा थी. उसने अपनी संतानों की पुकार नहीं सुनी बल्कि संतानों के हठ के शमन में मददगार बनी और जल्दी ही फिर शांति छा गई लेकिन जिद्दी बच्चे अपने नये पिता से प्यार नहीं करते थे और वे अपनी माता की बात समझ ना सके. उनके नये पिता ने दूसरा तरीका अपनाया, बच्चों को स्कूल में भेजा जहां उन्हें उसकी भाषा और उसके विचार सिखाये गये, बताया गया कि उसके लोग कितने महान और आत्म-दानी थे, बताया गया कि बिना किसी लाभ या प्राप्ति के उनकी माता को कैसी अशांति और दैन्य से रक्षा की गई है. बच्चों को यह भी सिखाया गया कि वे अपने प्राचीन वैभव  को भूल जायें और नई सीख की ऊंची चोटी पर चढ़ प्राचीन रंग-ढंग को तिरस्कार के भाव से देखें..

लेकिन अब एक और बात हुई, नये स्वामी से माता ने एक संतान जना और स्वामी खुश था कि वह( क्योंकि एक कन्या का जन्म हुआ था) उसके रंग-ढंग की होगी, उसके अपने लोगों की कन्या के समान. वह धनवान और रुपवान होगी, उसके अपने लोगों के पुत्र की दुल्हन बनेगी. लेकिन जब इस संतान का जन्म हुआ तो माता जैसे स्वप्न से जागी और सिर्फ अपनी बेटी की खातिर जीने लगी. बड़ी होती बेटी मां को उसके यौवन के दिनों की याद दिलाती थी. वह विदेशी स्वामी की पक्षधर नहीं थी तो भी उसमें उस(विदेशी स्वामी) जैसी ऊर्जा और व्यवहारिक मामलों की चतुराई थी. माता उससे खूब बातें करतीं, गहरी बातें! विदेशी स्वामी से यह छिपा नहीं था लेकिन उसने यह सब चलने दिया, उसने सोचा कि मैं तो बहुत महान हूं और इस महानता का तकाजा है कि जैसा चल रहा है वैसा चलने दिया जाय. उसने शिक्षक रखे, कन्या को उसने अपने लोगों के रंग-ढंग की शिक्षा दी. लेकिन मां चुपके से बेटी को प्राचीन ज्ञान सिखाती और बेटी का हृदय अपने पिता, उसके लोगों और उनके आचार-व्यवहार से दूर होता चला गया. माता को (इस बाते से) संतोष था, अब उसके केश उजले हो चले थे, उम्र के हाथो वह कमजोर हो चली थी और एक समय आया जब वह नहीं रही क्योंकि उसका काम पूरा हो चुका था. और विदेशी स्वामी भी तनिक थक चला था क्योंकि उसके अपने देश में कलह-कोलाहल था और कहा जाने लगा था कि वह पराये की जमीन पर एक निरंकुश की भांति रह रहा है. इस बात से उसे पीड़ा होती, वह सोचता कि क्या मैंने अपना जीवन दूसरों के हित ही नहीं जीया और क्या ये मजूरे लोग उसकी ताबेदारी के ही लायक नहीं?  लेकिन बेटी दृढ़ से दृढ़तर होती गई, उसे पिता की निरंकुशता जरा भी बर्दाश्त नहीं थी और वह अपने से पहले जन्म लेने वाले बच्चों के बच्चों की भी मां थी, उसे सभी माता कहते थे.  एक दिन संतानों में पुराने दिनों की तरह कोलाहल उठा. उन्होंने कहा कि राजस्व वसूलने और हमारे मस्तिष्क पर सीखे उकेरने वाले इस विदेशी स्वामी की हमें जरुरत नहीं. लेकिन बड़ी सख्ती से उन्हें कुचल दिया गया, कुछ को जेल हुई, कुछ के साथ इससे भी बुरा हुआ क्योंकि पिता पराने रंग-ढंग(दंड और पुरस्कार की नीति पर चलने वाला) का था. उसे लगता मातहत लोगों की जीवन और मृत्यु पर उसका अधिकार नहीं होना अनुचित है. लेकिन बच्चे अब उसकी निरंकुशता सहने को तैयार नहीं थे क्योंकि उसने स्वयं ही भूलवश सिखा दिया था कि राजा-रजवाड़े के दिन अब खत्म हो चुके हैं. उसने स्वतंत्रता के सपने देखना सिखा दिया था.

ये सारी दुश्वारियां उस पर सवार थीं, वह बूढा होकर थक चला था और नवयुवती माता( क्योंकि उसने कहा था कि वह सबकी मां होगी लेकिन ब्याहता किसी की नहीं) ने सब संतानों की मदद की. उसने सबको एक-दूसरे से प्रेम करना और एक-दूजे की मदद करना और अपने को मां पुकारना सिखाया. उसने विदेशी स्वामी को छोड़ दिया और अलग जाकर रहने लगी जहां बच्चे उससे राय-सलाह के लिए आते. और जब तक विदेशी स्वामी इसे रोकता, वह वहां नहीं रहती बल्कि कहीं और चली जाती. ऐसा जान पड़ता कि वह ना यहां है ना वहां बल्कि वह हर जगह है.

यह कहानी अभी समाप्त नहीं हुई है लेकिन अंत दूर नहीं है और उसे देखा जा सकता है..

( ऐसेज इन नेशनल आयडिलिज्म– आनंद कुमारस्वामी, 1909, जी ए नेटसन एंड कंपनी, मद्रास में संकलित एक आलेख और इसका हिंदी अनुवाद चंदन श्रीवास्तव द्वारा किया गया है.  )

The Jawaharlal Nehru University (JNU) Bill: Bhupesh Gupta

The Jawaharlal Nehru University (JNU) was the idea of M.C. Changla during his tenure as education minister. He wanted to set up a university of international standards which would deal with cutting-edge areas of science and technology including agricultural technology. After he placed the bill introducing the idea and initial concept of the university in Rajya Sabha on 1 September 1965, Bhupesh Gupta spoke on the motion. He thought that the idea as articulated by education minister was good but ‘pedestrian’. He wanted the new university to be different from traditional universities granting degrees annually. When JNU finally came in to existence, it reflected more of Bhupesh Gupta’s vision than that of M.C. Changla.  

Central Library- JNU

Central Library- JNU

The Jawaharlal Nehru University (JNU) Bill

By Bhupesh Gupta

Mr. Chairman, Sir, we have heard some speeches, especially from the Congress benches. I do not think it is necessary to talk about this university in order to settle the name of a personality in history. We are told that the name of Pandit Jawaharlal Nehru would be immortalized by this particular university as though that is how we are going to immortalize him; otherwise according to them- it seems to me he would not be immortal. I think this is an entirely wrong approach. It is understandable if honorable members take the opportunity of expressing certain good and nobel sentiments for their leader and for, undoubtedly, a very great man. But we are here discussing the specific proposal for a university, and let us not try to waste much time on the name itself, although points were made about him, or the biographical sketch of Pandit Jawaharlal Nehru was drawn. What we should do here is to look at the problem and examine the question that is before us on merits. We are having another university in Delhi as indeed we should have got one much earlier. Delhi’s requirements of higher education are not squarely met and Delhi certainly deserves to be given a university by the Central Government and arrangements for providing higher education by the Central Government should have been made. That was done naturally, people have suffered and our education has suffered here. Mr. Chairman, therefore I am happy that Delhi will perhaps have a large scope for higher education in humanities, in science and in technology. But it is a pedestrian way in which the Bill has been conceived of by our esteemed friend, Mr. Changla. One should have thought that when you are giving this name to this university and are being guided by certain sentiments which would be cherished, undoubtedly, honestly you would have also introduced some new ground in the matter of approach. But what we have is just a common-place legislation which more or less repeats the picture of the universities that we have in our country. There is nothing particularly new in it, nothing particularly exciting in it. That is what I wish to say.

The very first thing that comes to my mind in this connection is: for whom we are arranging this education. Yes, technological education, scientific education and other educational facilities should be extended. We agree, but preference should be given especially when income disparities continue in the country in a very serious manner, when we find that the young boys and girls coming from the poorer classes do not have opportunity or wherewithal to enter the portals of our university, naturally the question arises whether this university is going to be open for them, those who do not have enough money or whose families do not have enough money or whether it is going to be just another one which will be accessible only to the sons and daughters of the rich. This question is very important and has to be answered and settled from the standpoint of those who need the care of the country most. Still, we talk about Oxford University and so on. I do not know how long it will take- perhaps another five centuries we will require at this rate- in order to forget the Oxford and Cambridge Universities.

Mr. Chairman, let us not go into all these things. These are very pedantic, high-sounding and perhaps very, very attractive to those people who have, in the corner of their hearts, still a lingering admiration for everything that is Anglo-Saxon. I am not one of those people. Certainly, there are a lot of things to be got from every country and England is not excluded from them. But why cannot the problems of our universities be considered from the standpoint of the requirements of our country in the light of the experience about education in the contemporary world? And I think the contemporary world points to one thing and it is this that the type of educational system that we have in Oxford and Cambridge in modern times, with very high-flown expenses and with a different set-up of values and functions of our people or any people for that matters, does not meet the requirements of the situation. That is what I wish to say. Therefore, let us not go into it. Here, Mr. Changla should consider for whom the university is intended. Why should we like more money to be given to this without any assurance given by the Government that this university will particularly cater to the needs of the poorer classes and poorer people?

Mr. Chairman, let us not have Cambridge and Oxford and Princetons and Harvards here; let us create universities and colleges that our people need, that our development needs, for the remaking of our material and cultural being. That is what I say and therefore the first thing is to ensure that the sons of the working people, the worker, the peasants and the middle classes do have the doors of the universities thrown wide open to them. That is the first thing and for that you have to provide not only money but also a different outlook. Money must come; we must have subsidized education; it must be highly subsidized because the investment that you will be making in imparting higher scientific and technical education to the poorer sections of the community will have been repaid in course of time in creative and even constructive labour which would go to the benefit of the entire society. That is now I view this matter. But Mr. Chairman, if the cost of education becomes expensive- from Rs. 125 to Rs. 200- I should like to know how many even of the great officers of the Government would be in a position to send their sons and daughters to these universities. That is what I would like to know. We know of those days when tuition fee in the colleges was Rs. 10. Now, go to the college, one requires to spend Rs. 30. That is the position. Then, we pay the tuition fees and spend on books and other things. Therefore, if Mr. Changla feels and honorable members who expressed good sentiments about Pandit Jawaharlal Nehru feel that he had some socialist ideas and a socialist way of looking at things, let the emphasis be shifted from the upper classes to the classes that are economically at bottom layers of the society. This is the first suggestion.

Secondly, the university should be run on broad basis. I would not like the bureaucratic set-up to come in. The autonomy should be completely guaranteed. I think we can give autonomy in a larger measure to a university of this kind. Since Jawaharlal Nehru’s name is associated with it I feel there should be faculty which educates the students in the spirit of world power. Now, we have got all faculties…we want, therefore, in a university of this kind a special faculty to be created that would impart learning and education in the spirit of the worldwide struggle for peace because nothing today is so noble and great as that one which teaches our younger generation… the struggle that humanities is waging for peace. Therefore, this thing should be there. Let there be a new faculty. Show some originality… There are new faculties to be created. That is matter for the Select Committee to consider. Maybe it is not possible to include everything in a bill. But an indication should be there. That is what I say.

Then Mr. Chairman, I should also like this university to educate students in various matters connected with development of democratic institutions and democracy in the country. This should be a special subject. It should be there in other universities also. Sir, many names are taken here. We find special faculties in a given situation are brought into existence in order to educate the people in special branches of learning so that students may become useful, enlightened citizens when they are educated in world affairs and the affairs of the state. Therefore, I say such suggestions should also be considered.

Some honorable members talked about student indiscipline. Sir, we are elder people. Therefore, we can talk about student indiscipline. But, Mr. Chairman, let us look at the ruling class and at the elders in a particular state from which Pandit Jawaharlal Nehru came. I see the greatest indiscipline going on among those teaching about discipline to the students. Take the example of UP. What is happening there? Among the leaders, as you know, they talk glibly about student indiscipline. Sir, by and large, I do maintain that our student communities in other countries also and we should have no hesitation in extending to the student community as a whole our best feelings and deep appreciation of the manner in which they conduct themselves. There will be some bad people. And where there are not bad people, I should like to know. If you take percentages, you will find much higher percentage of bad people in the Treasury Benches than any college or university in the country. Therefore, let us not talk about this business. Sir, students should have ideals before them. Sir, students should have ideals before them. I should like this university to have a clear faculty, I maintain, for the studies of scientific socialism. And why should it not be there? Everybody talks about socialism. Mr. S.K. Patil talks about socialism. Mr. G.D. Birla talks about socialism. Mr. J.R.D. Tata talks about socialism. Mr. Hridas Mundhra talks about socialism when he gives money to a particular election fund. Everybody these days talks about socialism. But one does not know what it is… So, there should be a faculty for the study of scientific Socialism.

…I know, in the postgraduate courses Marxism is taught but books are always from the united states of America which display no knowledge of Marxism at all. Therefore, Mr. Chairman, I should like a faculty to be created to impart proper education of this kind.

As far as other things are concerned, I do not wish to say anything because we will have another chance I believe when the thing comes back from the select committee. But I think the poor should be kept in view. Noble ideas should be kept in mind. And certainly when Parliament has declared for the establishment of, what they call, socialist state, socialism should be studied as a special subject, as it prevails in this country, in this particular university.

Courtesy
The Penguin  Book of Modern Indian Speeches: 1877 to the Present, 2007
Edited by Rakesh Batabyal

निमित्त: उस्मान ख़ान

एक भविष्य-दृष्टि के साथ देखें या मौजूदा वक्त की निगाह से देखें या बहुत दूर नहीं गए व्यतीत के साये में देखें… कैसे भी देखें यह कहते हुए अफसोस होता है कि हिंदी कहानी बहुत देर से खुद को संदेहास्पद बनाने के आयोजन में मुब्तिला है। कहानी एक सुंदर विधा है और अगर उसे एक स्त्री मानें तब यह कह सकते हैं कि वह इन दिनों अपने रचयिता की जबरदस्ती से आजिज है। यहां मौजूद कवि उस्मान खान का गद्य इस औरत को उसकी आजिजी से आजाद कराने की एक इंकलाबी कोशिश है। गद्य इसे यूं कहा जा रहा है क्योंकि कहानी के मानकों पर यह कहानी पूरी नहीं उतरती। इसकी जिंदगी इसके उन्वान को सही नहीं ठहराती। ‘निमित्त’ का मतलब शब्दकोशों में ‘कारण’, ‘लक्ष्य’, ‘मकसद’ वगैरह बतलाया गया है। इस गद्य में जो घट रहा है, उसका निमित्त जाहिर तौर पर इस गद्य में नहीं मिलेगा। यहां गद्यकार के पास वक्त बहुत कम है और घटनाएं बहुत ज्यादा। जैसे एक छोटे से सफर में कोई हमसफर जब पूरी जिंदगी का सफर जानना चाहता है, तब बयान करने वाली कोशिश ‘क्या घटनाएं हुईं’ यह बताने की होती है, यह बताने की नहीं कि ‘घटनाएं क्यों हुईं’। इस प्रक्रिया में वाग्जाल और विस्तार कम होता है। सुनने वाला इसे संदेह से नहीं देखता, उसे सोचने का रोजगार मिल चुका होता है। संदेहास्पद कहानियों के दौर में ‘निमित्त’ एक ऐसी ही कहानी है— सोचने का रोजगार सौंपती हुई। इसने वह शिल्प नहीं चुना है जो मानकों को पूरा करने के लिए अपनी असलियत से अलग हो जाता है। यह कहानी उन कहानियों की तरह नहीं है, एक पैराग्राफ तक चलकर पढ़ने वाले जिनकी उंगली छोड़ देते हैं। #अविनाश मिश्र 

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Snap Shot from Titas Ekti Nodir Naam (1973)


निमित्त

 By उस्मान ख़ान

‘जी नहीं, आपके कहने से मैं इश्वर या धर्म पर विश्वास नहीं कर सकता! आपका ख़ुदा कैसा जीव है! न सुनता है, न देखता है, न बोलता है। उसे कुछ महसूस नहीं होता। वह खुश नहीं होता, नाराज़ नहीं होता। न्याय-अन्याय से उसे कुछ लेना-देना नहीं। फ़िर भी आपने अपनी ख़ुशी के लिए एक कल्पना-लोक बनाया है, जिसमें आप जो चाहें, हो सकता है। आपको अपनी कमज़ोरियों और कमअक़्ली को छुपाने के लिए एक खोल चाहिए, आपने अपने बाहर एक शक्ति को मान लिया, जो आपकी कमज़ोरी और कमअक़्ली को दूर कर सकती है, आप उसकी शरण में जाते हैं, उससे गुहार करते हैं, उसकी मनुहार करते हैं, वह नहीं सुनता, नहीं ही सुनता। वह हो तो सुने!’

इतना सुनने की देर थी कि बाबा ने मुझे धक्का मारकर घर से बाहर किया। ‘बदतमीज़! हरामख़ोर! भगवान को गाली देता है!’। मैं भी चुपचाप निकल गया। बाबा खुद भी जानता है कि उसने रो-रोकर, गिड़गिड़ाकर भगवान से अपनी पहली बीबी की जान की भीख माँगी थी, और भगवान ने उसकी अनसुनी कर दी थी। बाबा जब भी पहली माँ की बात करता है, भगवान को एक-दो गाली ज़रूर देता है। लेकिन मैं कैसे गाली दे सकता हूँ? भगवान का ठेका तो बाबा का है। बाबा भी ढकोसलेबाज़ है।

मुँह-अँधेरे मैं घर की दीवार से चिपककर सिर झुकाए ऐसे गली पार करता हूँ जैसे कोई उल्का-पिण्ड। तुरंत। मेरे पैर इतनी तेज़ी से उठते हैं जैसे रेल चल रही हो। मैं पूरी कोशिश करता हूँ कि घर में किसी के भी जागने से पहले घर से निकल जाऊँ। पहली बार जब आई ने दरवाज़ा खुला देखा था, तो क्या सोचा होगा! उसने मुझे कुछ कहा नहीं। मुझे पता है, मेरे बाद वही जागती है और सबसे पहला काम दरवाज़ा बंद करने का करती है। रात को भी वह दरवाज़ा अटकाकर सोती है, मैं जब चाहूँ घर आ सकता हूँ!

घर में सब लोग इस बारे में जानते हैं। कोई कुछ कहता नहीं। सबने मेरे इस रूप को स्वीकार कर लिया है। पहले-पहल बाबा कुछ कहते थे, बाद में उन्हें भी कोई फर्क नहीं रह गया। बाबा कभी-कभी मुझे परेशान करने के लिए दरवाज़ा बंद कर देते हैं, मैं भी दरवाज़ा नहीं बजाता। चुपचाप लौट जाता हूँ।

लौट जाता हूँ! कहाँ लौट जाता हूँ? कहीं भी! घर मेरे लिए मजबूरी है, जैसे सोना। मुझे नींद आने लगती है, तो मैं घर आ जाता हूँ। सोता हूँ और फिर निकल जाता हूँ। कहाँ? कहीं भी!

असल में, घर मेरे लिए एक सराय का काम देता है। जश्न हमारे घर में वैसे भी नहीं मनाया जाता और कभी कुछ हँसी-खुशी का मौका होता है, तो मैं अपनी तथाकथित मनहूस सूरत नहीं दिखाता। त्यौहारों पर भी यही स्थिति होती है। सब मुझे भूल गए हैं, ऐसा भी नहीं। पर कोई मुझे याद करना चाहता है, ऐसा भी नहीं। मैं उन्हें कुछ दे नहीं पाया। यानी अपने परिवार को। आई हैं, बाबा है, भैया है, भाभी हैं और उनसे जुड़े तमाम रिश्तेदार हैं। रिश्तेदार अक्सर आते-रहते हैं और अक्सर ही मैं इधर-उधर भटकता अपनी नींद को बहलाता रहता हूँ। भैया की स्थिति भी ऐसी ही है, वह भी घर से भागा फिरता है, जबकि वह कमाता है और कमाना अपने-आप में एक जादू है, जो लोगों को आपकी ओर आकर्षित करता है, आप जितना कमाते हैं, लोग उतना ही आपकी तरफ खींचते चले आते हैं और जहाँ आपने कमाना बंद किया लोगों को आपसे चिढ़ होने लगती है, आई भी जली-कटी सुना देती है, फिर और किसी का क्या कहूँ। हालाँकि मैं भिड़ जाता हूँ, ख़ासतौर पर रिश्तेदारों के साथ, उनसे मुझे और भी कुछ लेना-देना नहीं रहता। मैं उन्हें खरी-खोटी सुनाता हूँ। उनके मुँह पर उनके काले धंधे और धुर्तताओं की बात करता हूँ। वे मुझसे ख़ार खाते हैं। मैं उनसे मज़ा पाता हूँ।

आप सोच रहे होंगे मैं कोई काम क्यों नहीं करता। दरअसल, मैं कोई काम करना नहीं चाहता। काम करने से क्या होता है? काम करने से आज तक किसी को कोई फायदा हुआ है! कुल मिलाकर रुपया कमाने के अलावा काम करने का कोई और मकसद मुझे नज़र नहीं आता। और मैं रुपया कमाना नहीं चाहता। जी नहीं! ऐसा नहीं कि मैं निठल्ला हूँ। मैं पूरा दिन और कभी-कभी पूरी रात भी घुमता रहता हूँ। इस गली से उस गली, इस मुहल्ले से उस मुहल्ले, इस चौक से उस चौक। मैं दिन-भर चलता रहता हूँ। इस शहर का एक-एक हिस्सा मैं माप चुका हूँ। अब यह तो कोई काम नहीं है, और इस काम का कोई रुपया भी नहीं देता। और अगर देता भी, तो मैं लेता नहीं।

फिर आप कहेंगे मैं खाता-पीता कहाँ से हूँ? मैं कुछ छोटे-मोटे काम करता हूँ। फ्री-लांसिंग समझिए! तब भी मुझे घर से लगाव है। पता नहीं मेरा मन यहाँ अटका रहता है। सोने को तो मैं कहीं भी सो सकता हूँ। पर कहीं भी सोने पर बाबा घर ले आते हैं। कभी मुझे समझ नहीं आता कि ये लोग मुझसे चाहते क्या हैं? रुपया! बस यही एक चीज! क्या रुपये के बाहर आदमी का कोई काम नहीं! भैया बोलता है कि मैं अव्यवहारिक हूँ। मैं ध्यान नहीं रखता किसके सामने क्या बोलना चाहिए। मैं मूढ़मगज हूँ। ऐसा भैया का कहना है। मेरा मानना है वह एक हाफ-फ्राई ऑमलेट है, जिसे वास्कोडिगामा ने बनाया था और अब फफूँदा चुका है। वह इन्सान नहीं है। रुपये का भक्त है। एक-एक रुपये का नफ़ा-नुकसान जोड़ता रहता है। उसने अपनी एक दुकान डाल ली है। उसी पर ऐंठता है। और कुछ नहीं। बाबा जानता है कि भैया मकान के चक्कर में उसकी देख-रेख कर रहा है। अगर आज वो मकान भैया के नाम करा दे, तो भैया कल ही उसे घर से निकाल दे। या कम से कम ऊपरवाली कोठरी में डाल दे, जिसमें अभी मैं डला हुआ हूँ!

बाबा मुझे ठीकाने से लगाना चाहता है, लेकिन हार चुका है, एक वह समझ चुका है कि मुझे नहीं समझाया जा सकता। भाभी अब भी समझती है कि मुझे दुनियादारी के काम में लगा सकती है, पर मेरा ख़याल है वह ग़लत समझती है, बल्कि मेरा मानना है कि वह मुझे समझती ही नहीं। उसे मेरी शादी के अलावा कुछ नहीं सूझता। उसे लगता है शादी ही मेरे मर्ज़ का ईलाज है। वैसे मेरा मर्ज़ है क्या?

मैंने कहा कि मैं रुपया नहीं कमाता, इधर-उधर घुमता रहता हूँ, कभी कोई काम मिल जाए तो कर लेता हूँ, वह भी मनमाफिक, मन नहीं हो तो कोई मुझसे काम नहीं करवा सकता, कोई कितना ही बड़ा तीसमारख़ाँ क्यों न हो, कितनी ही नौकरियाँ मैंने ऐसे ही गँवाई है। बाबा ने अब किसी से मेरी नौकरी के बारे में बात करना भी बंद कर दिया है। कभी-कभी अच्छा लगता है कि सभी लोगों ने मेरे इस रूप को स्वीकार कर लिया है।

खै़र! जब मैं सुबह दीवार से चिपककर तेज़कदम गली पार करता हूँ, तो मेरा मकसद सीधे बस-अड्डे की तरफ जाना होता है। बस-अड्डे पर भाई लोग खड़े रहते हैं। इनमें से अधिकतर लड़के अख़बार का इंतज़ार कर रहे होते हैं। अलग-अलग बसों में अख़बारों के बंडल रख दिए जाते हैं और फिर भाई लोग फ्री हो जाते हैं। वे सब मुझे जानते हैं। मैं कभी-कभी उनके साथ भी बैठता हूँ, ख़ासकर ठंड के वक़्त, जब वे लोग टायर जलाकर हाथ तापते हैं। ज़्यादातर लड़के कॉलेज में हैं, एक-दो अनपढ़ हैं और दो, जिन्हें मैं पहले जुड़वा भाई समझता था, पिछले पाँच साल से दसवीं पास करने की कोशिश कर रहे हैं। यही आठ-दस लड़कों का झूंड हर सुबह यहाँ पहुँचता है। ये लोग शोर-गुल मचाते हैं। बसों में सवारियाँ बैठाते हैं, सामान लादते हैं, ग़रज़ कि दिन-भर बस-अड्डे पर अपना टाईम काटते हैं और रुपया कमाते हैं। मुझे पढ़ा-लिखा और सीधा-सादा आदमी समझते हैं, सोचते हैं मुझे दुनिया की ज़्यादा ही फिक्र है। लेकिन जैसा कि उस दिन महेश कह रहा था, मैं कुछ नहीं कर सकता। सोचने से कुछ नहीं होता। शायद उस दिन वह किसी से नाराज़ होगा, और अपना गुस्सा मुझ पर निकाल रहा होगा। वर्ना वह ऐसा क्यों कहता!

मैं हर सुबह दो घंटे इसी बस-अड्डे पर बिताता हूँ। अब ये लोग मुझे हर रोज़ देखने के आदी हो गए हैं। जब शुरू में मैं यहाँ आता था, तो ये लोग मुझे हैरत और शक की नज़र से देखते थे। धीरे-धीरे मुझे जानने लगे, और मुझे अहानीकारक जानकर मेरी उपेक्षा करने लगे। मुझे उनकी उपेक्षा से कोई फर्क नहीं पड़ता।

बसों की आवाज़, लोगों के शोर-गुल के बीच यहाँ सुबह होती है। अलग-अलग दिशाओं में जाने वाले लोग इकट्ठा होने लगते हैं। कुछ लोग रोज़ के मुसाफ़िर हैं, उन्हें भी मैं पहचानता हूँ। फिर भी एक अनजानापन सबके चेहरे पर दिखाई देता है। वे लड़के भी मुझे नहीं जानते, दुकानवाले भी नहीं, मुसाफ़िर भी नहीं। वे सब असल में मुझे सनकी समझते हैं।

वैसे मैं मृदुभाषी हूँ। लेकिन मैं उनकी हाँ में हाँ नहीं मिला सकता। ख़ासतौर पर बुढ़ों में मैं यह बीमारी पाता हूँ। वे चाहते हैं कि मैं उनकी बातें सिर हिलाकर स्वीकार करता जाऊँ, लेकिन ये मुझसे नहीं होता। मैं कैसे काले को सफेद मान सकता हूँ, फिर चाहे कोई महात्मा ही यह बात मुझे क्यों न कहे! पर लोग जब अपने से ही जुदा हैं, तो फिर मुझसे कैसे मिलेंगे! हो ही सकता है, ऐसा मैं सोचता हूँ, क्योंकि कभी-कभी मुझे यह भी लगता है कि यह मेरी हताशा है, जो मुझे ऐसा सोचने पर मजबूर करती है, वर्ना ये लोग तो खुश हैं। अपना काम करते हैं, रुपया कमाते हैं, घर-परिवार देखते हैं, मान-सम्मान पाते हैं। इन्हें बेवजह दुःखी क्यों माना जाए!

हर रोज़ सूरज उस कचरे के ढेर के पीछे से उगता है। कुत्ते उस ढेर पर लोटते रहते हैं। सुअर चरने के लिए आते हैं। ढेर से कचरा निकालकर ठंड में लड़के जलाते हैं।

इस दीवार की टेक लगाए मैं हर रोज़ की योजना तैयार करता हूँ, यानी आज मुझे कहाँ जाना है? किधर घुमना है? मैं झूठ नहीं बोलूँगा, कभी-कभी अपनी धुन में मैं शहर से बाहर भी निकल जाता हूँ। आस-पास के देहातों में चक्कर मारता हूँ। मैंने चाय पी, पोहा खाया और त्रिवेणी की तरफ़ चल दिया। आज का दिन उधर ही गुज़ारने का विचार था। त्रिवेणी उस जगह का नाम क्यों है? मेरी जानकारी में इसीलिए कि कभी वहाँ तीन नालों का संगम होता था, पर समय के कचरे-गंदगी ने उन नालों में बहते प्रसाद जल को काला-बदबूदार बना दिया था और दो नालों पर बस्तियाँ बन चुकी थी। एक नाला बचता था, जो अब भी वहीं स्थिर है, काला-बदबूदार जल बहाता हुआ। पर तब जब ये नाले साफ़ पानी से भरे रहते थे कुछ जोगियों ने अपना मठ इनके किनारे बनाया। आज वह मठ बस्ती के बीच आ गया है। लेकिन मठ की बावड़ी बस्ती से थोड़ी दूर है। मठ के पास काफ़ी जगह है। जिसमें कुछ खेत हैं, दुकाने हैं और एक बाग़ीचा और एक बड़ी बावड़ी है। असल में, त्रिवेणी की तरफ जाने का मतलब इस बावड़ी की तरफ जाना ही है। गर्मियों में बावड़ी के आस-पास इतनी शीतलता रहती है कि सो जाने को मन करता है, पर पूजारी या कभी दुकानवाले आकर उठा देते हैं। और फिर उनसे कौन चिक-चिक करे! पर वे भी मुझे जानते हैं, और अक्सर टोकते नहीं, पर जानते हैं कि मेरी जेब में माताजी के दान-पात्र में डालने के लिए कुछ भी नहीं रहता है; बल्कि भोग वगैरह के वक़्त मैं अक्सर उपस्थित रहता हूँ। शायद इसीलिए उनके मन में मेरे लिए कुछ कलुष है! पर मैं वहाँ पहुँच ही गया।

अभी आठ ही बजे थे। एक माशूक-आशिक पहले ही बरगद के नीचे बैठे थे। मुझे देखकर थोड़ा संभल गए। किताब लेकर ऐसे देखने लगे, जैसे इतिहास या विज्ञान की सबसे गंभीर समस्या पर चिंतामग्न हों। मैंने उनकी उपेक्षा की, और आगे बढ़ गया। देखता क्या हूँ, दूसरे बरगद के नीचे एक और जोड़ा बैठा है। उफ़! इन तोता-मैनाओं ने हर दृश्य ख़राब कर रखा है। कभी-कभी सोचता हूँ नौजवानों की उस मुहिम से जुड़ जाऊँ, जिसमें ऐसे जोड़ों को देखते ही उनके घर फोन कर दिया जाता है, और हीर-राँझे की अच्छी-ख़ासी बेइज़्ज़ती की जाती है। पर, यह क्रूर आनंद मैं मन ही मन लेता रहा। मुझे इन लड़कियों में रुचि नहीं। इन लड़कियों में जान नहीं होती। ये अपने कहे पर टिकी भी नहीं रह सकतीं। मुझे तो लगता है, मौज-मस्ती के लिए ही ये लोग यहाँ आते हैं, या किसी भी ऐसी शांत जगह पर जाते हैं, जहाँ इनकी चहचहाहट कोई न सुने। फिल्मों ने इनके दिमाग़ का सत्यानाश कर दिया है। हर कोई अपने को फिल्मी नायिका या नायक समझता है। वैसे ही चलते-फिरते हैं। बैठते-उठते हैं। हँसते-रोते हैं। कपड़े पहनते हैं। गाने गाते हैं। इन्हें देश-समाज से कुछ लेना-देना नहीं है। एक-दूसरे को छूने-चूमने-भोगने के अलावा इनके पास कोई विषय नहीं है। टॉकिज के बच्चे!

मैं आगे बढ़ता गया। दूसरे के बाद तीसरा जोड़ा मिला। खै़र हुई चौथा जोड़ा नहीं मिला, फिर भी दो और बरगद छोड़कर मैं सातवें बरगद तक पहुँचा। यह बाग़ीचे का आख़री बरगद है। इसके बाद खेतों का सिलसिला शुरू हो जाता है। इस बरगद के बाद, कुछ जगह छोड़कर, जामून और अमरूद के पेड़ लगे हैं, और साथ में ही मिर्च, धनिया और बैंगन-टमाटर, पुदीना-जैसे पौधे-पत्ते लगे रहते हैं। बाग़ीचे का यह कोना ही मुझे सर्वाधिक पसंद है। इधर तक कोई नहीं आता। मैंने थोड़ी देर में तीनों जोड़ों की सुध लेने की सोची। समाज में बेहयाई मुझे पसंद नहीं। जो करना है विधि-विधान से करो। यह क्या कि आज इसका हाथ पकड़े घुम रहे हैं, कल उसका मुँह चूम रहे हैं! यह सब मुझे लफंगई लगती है। लड़का करे या लड़की। मैंने देखा तीनों यथावत् प्रेम-क्रीड़ा में संलग्न हैं। वे मुझे भूल चुके। एक लड़की की खीं-खीं मेरे तन-बदन में आग लगा गई। झुँझलाकर मैंने एक पत्थर उठाया, और पहले बरगद की ओर फेंका। मुझे अचानक इन लोगों पर गुस्सा आने लगा था। पत्थर सीधे लड़की के सिर पर लगा था। लड़की खून-झार हो गई। लड़का दौड़कर मेरी तरफ़ आने लगा। मैं शांत मूरत बनकर बैठा रहा। एक पल के लिए लड़का रुका, फिर पीछे दौड़कर गया। लड़की को देखने लगा। फिर दौड़कर मेरी तरफ़ आया। लड़की की चीख़ सुनकर बीचवाले दोनों जोड़े भाग गए थे। लड़का मेरे पास पहुँचा, ‘भैया, देखिए न दीदी को किसी ने पत्थर मार दिया है!’। मेरी जान में जान आई, मुझे समझ आया कि उसे मुझ पर नहीं किसी और पर शुब्हा है। मैं उसके साथ दौड़कर उस तरफ़ गया। देखा लड़की प्राण त्याग चुकी थी। उसकी सफ़ेद चुनरी लाल हो गई थी। एकबारगी मेरे शरीर में झुनझुनी दौड़ गई। मैंने बोला, ‘यह तो गई!’। लड़का वहाँ से भाग खड़ा हुआ। मैं चिल्लाता रहा, ‘अबे! कहाँ भाग रहा है? क्या कर दिया लड़की का?’ मैंने देखा अब वहाँ कोई नहीं था। मैंने लड़की का चेहरा ग़ौर से देखा। वह मेरी भाभी थी। अब मैं लड़के का चेहरा याद करने लगा, लेकिन मुझे याद नहीं आ रहा था।

मैं धीरे-धीरे उस जगह से दूर निकल गया। मन फिर शांत होने लगा। मुझे नहीं पता कि मैंने इतनी आसानी से यह फैसला कैसे ले लिया! मुझे अपनी आज की योजना में फेर-बदल करना पड़ा। मैं अब शहर के दूसरे कोने की ओर जाना चाहता था। लेकिन, शहर के अंदर से होकर नहीं। मैंने सोचा था कि एक बजे तक गंगानगर पहुँच जाऊँगा। वहीं कुछ खाऊँगा, और फिर शाम वहीं काटूँगा। गंगानगर शहर का बाहरी ईलाक़ा है। यह नगर अभी बस रहा है। जब सरकार ने ग़रीबों के लिए घर बनाने की सोची, तो शहर के बाहर इस कुड़ेदान को चुना। इसके आगे खेत शुरू हो जाते हैं और फिर उबड़-खाबड़ ज़मीन जो जंगल में बदलती जाती है। गंगानगर भी एक बस-अड्डा है। यह एक छोटा बस-अड्डा है। यहाँ से गाँवों की तरफ़ जाने वाली बसें मिलती हैं। बस-अड्डे से थोड़ी दूर सड़क के किनारे एक दुकान है, जहाँ दिन में आपको खाना मिल सकता है। मैं खाना खाकर झरने तक घूमने भी जाऊँगा, और अगर मन हुआ, तो नहा भी लूँगा।

दुकान तक पहुँचते हुए एक बार मेरे पैर लड़खड़ाए, जैसे मुझे चक्कर आ गया हो। मैंने खुद को संभाला और दुकान के बाहर लगी बेंच पर बैठ गया। दुकानवाला मेरा मुँह ताक रहा था। फिर मेरी ओर देखकर मुस्कुराने लगा। मैंने एक दर्दभरी मुस्कान दी। वह मेरे पास आकर बोला, ‘क्या हुआ?’

मैंने कहा, ‘चक्कर आ गया!’ वह फिर मुस्कुराने लगा। ‘अभी तो गर्मी शुरू भी नहीं हुई, अभी से चक्कर खाकर गिरने लग गए!’ अब मैं मुस्कुराया। मैंने खाना खाया और एक लस्सी पी। जान में जान आई। पर, एक फाँस-सी गले में लग रही थी। बार-बार प्यास लग रही थी। आखिर मैं उठकर झरने की तरफ चल दिया।

इस पगडंडी से मैं कई बार झरने की तरफ गया हूँ। मैं देख रहा था, आसमान एकदम साफ़ था। नील। कुछ एकदम सफ़ेद-झक बादलों के टुकड़े थे, जो इधर-उधर खिसक रहे थे, ऐसा लग रहा था जैसे नीले दवात पर रुई के फाहे इधर-उधर तैर रहे हों। अब इस पगडंडी पर मैं अकेला चला जा रहा हूँ। धीरे-धीरे शहर की सब निशानियाँ गुम होती जा रही हैं। तालखेड़ी आ गया। गाँव के किनारे होते हुए मैं आगे बढ़ता जा रहा हूँ। देखता हूँ, पगडंडी पर कुछ लोग अर्थी लिए जा रहे हैं। मैं धीरे चलने लगता हूँ, ताकि उन लोगों से एक निश्चित दूरी बनाए रख सकूँ। पर, कदम अपनी गति पकड़ लेते हैं। मैं उनके करीब पहुँच गया हूँ। उलझन में हूँ, उन लोगों से आगे निकलना ठीक नहीं जान पड़ रहा, पता नहीं क्या सोचने लगें! कहीं कोई झगड़ा न करने लगे! आखिर, मैं उनके पीछे-पीछे चलने लगा। एक-दो लोगों ने मुझे पलटकर देखा, और फिर अपनी गति से चलने लगे। कुछ देर में वे लोग पगडंडी छोड़कर खेत के रास्ते आगे बढ़ गए। मैं झरने की तरफ बढ़ने लगा। झरने के पास जाकर बैठ गया।

शाम हो चुकी थी। दूर-दूर तक पंछियों के झुंड दिखाई दे रहे थे। झरने के पास कुछ पक्षी-दल उतरते, और दाना-पानी करके आगे बढ़ जाते। कुछ ही मिनटों में वह जगह पंछियों के कलरव से भर गई। झरने की आवाज़ पंछियों के शोर-गुल में दब गई। इन पंछियों को मेरे आस-पास भटकने से डर नहीं लग रहा था। मैं मूर्ति की तरह अचल बैठा था। मेरे कंधे, सिर, गोद सब पर पंछी बैठे थे। मैं आँखें बंदकर उनके नाखुनों और चोंच के वार सह रहा था। मुझे इस काम में अद्भूत आनंद मिल रहा था। जैसे, शरीर और दिमाग़ दोनों एक साथ हलके होते जा रहे थे। जीवन का कौन-सा सुकून था, जो इस रास्ते मिलना था! मेरा मन शांति से सराबोर था। इस तरह ताज़ा महसूस हो रहा था, जैसे शरीर श्मशान का धूँआ खाने के बाद नहाने पर करता है। मेरा रोम-रोम धूल रहा था कि एक आदमी ने हाँका लगाया। वह दौड़कर मेरे पास आ गया। मैंने चौंककर उसे देखा। वह हाँफ रहा था। अचरज से मेरी ओर देखते हुए बोला, ‘क्या हो रहा है?’

मैंने पहले अपनी तरफ़ देखा, मेरे शरीर पर जगह-जगह घाव हो गए थे, पर मुझे दर्द नहीं हो रहा था। मेरा शरीर जैसे सुन्न था। दिमाग़ भी कुछ ग्रहण नहीं कर रहा था। मैं उस आदमी को देखता रहा। उसके पीछे नीला आकाश था। मुझे चक्कर-सा आने लगा।

जब जागा तो देखता हूँ, अपने घर में हूँ, मेरी झाड़-फूँक हो रही है। मेरे शरीर के घाव कसक रहे हैं। मैं आई को आवाज़ देता हूँ। आई मेरे पास आकर बैठ जाती है। मेरी नज़र भाभी की माला चढ़ी तस्वीर पर पड़ती है। मैं रोने लगता हूँ। आई मेरे सिर पर हाथ रखती है, और कहती है, ‘सब ठीक हो जाएगा!’ लेकिन मेरी आँखों से आँसू बहे जा रहे हैं, और मैं लगातार कहे जा रहा हूँ, ‘मैं अब रुपया कमाऊँगा!’। एक साधू मेरे पास आकर खड़ा हो जाता है। मैं अपनी बात दोहराए जा रहा हूँ। वह मेरे सिर पर भभूत मलता है। मुझे पसीना आने लगता है। मैं अपनी बात दोहराए जा रहा हूँ। बाबा मेरे पास आकर खड़ा होता है। थोड़ी देर मुझे देखता रहता है, फिर एक ज़ोरदार तमाचा जमाता है, और मैं चुप हो जाता हूँ, उसका मुँह देखने लगता हूँ।

वह एक ऐसा दिन था, जिसने मेरी ज़िन्दगी बदल दी। मैंने भैया के सामने भाभी के साथ हुई दुर्घटना पर दुःख जताया, और अपनी सफ़ाई में यही कहा कि मुझे पता ही नहीं! किसी आवाज़ के पीछे-पीछे मैं झरने तक चला गया था! और, फिर आगे क्या हुआ, मुझे पता नहीं! बात यही थी कि तालखेड़ी का ही कोई आदमी मुझे झरने के पास से उठाकर लाया था, बाद में, गंगानगरवाले दुकानदार से बात करके पता चला कि उसने ही मेरे मामा को सूचित किया था। वह मेरे मामा का पुराना दोस्त है। फिर, मैं एक दिन अस्पताल में भी बेहोश रहा। घर पर भी एक-दो दिन बदहवासी की हालत में रहा।

धीरे-धीरे मेरे घाव भर गए। कई बार सोचा कि भैया या आई को बता दूँ कि भाभी को पत्थर मैंने ही मारा था। पर इससे बात उलझ जाएगी। वे लोग समझ नहीं पाएँगे, और मैं भी समझा नहीं पाऊँगा। अब मैं बस-अड्डे या त्रिवेणी या गंगानगर या शहर-सराय की तरफ नहीं जाता। इधर-उधर भटकना भी मैंने बंद कर दिया है। मन में एक कचोट रहती है, पर कोई तरीका नहीं सूझता, क्या करूँ? जो मैंने किया है, उसका कोई दोष अपने ऊपर नहीं मानता। आखिर, मैंने जान-बूझकर कुछ नहीं किया। मुझे क्या पता था कि पत्थर सीधा जाकर उसको लगेगा! और, वह मेरी भाभी होगी, और, वह भी इतनी कमज़ोर कि एक पत्थर की चोंट भी नहीं झेल पाएगी! भैया दूसरी शादी के लिए गोटी सेट कर रहे हैं। उनकी एक मुहब्बत थी। पिछले ही साल उसके भी पति का देहावसान हो गया। वह भी गली में ही रहती है। आई ने उसकी मौसी से बात की है। हो सकता है, अगले साल मेरे पास फिर से भाभी हो! आई मेरी भी शादी कराना चाहती है। मैंने भी इनकार नहीं किया। जिन रिश्तेदारों को मैं गाली दिया करता था, उनके साथ भी अब तमीज़ से पेश आता हूँ। भगवान को उलटा-सीधा बकना भी मैंने बंद कर दिया है। सब्ज़ी-मंडी में हिसाब देखने का काम पकड़ा है। काम अच्छा है। सुबह-सबेरे सब्ज़ी-मंडी पहुँच जाता हूँ, दिन-भर वहीं फलों और सब्ज़ियों की गंध में कटता है। शाम को सीधे घर पहुँचता हूँ। टी.वी. देखता हूँ। कभी चौक तक घुम आता हूँ। फिर सो जाता हूँ।

भाभी मेरी शादी करवाना चाहती थी। अगर ज़िंदा रहती, तो कितनी खुश होती कि मैं काम-धंधे से लग गया हूँ, और लड़की देखने के लिए उत्सुक हूँ। पर कौन जाने, तब ऐसा होता भी!

आखिर वह दिन भी आया, मेरी शादी हो गई। मैंने जब करुणा का घूँघट उठाया, मेरा दिल धक् करके रह गया। एकबारगी लगा, भाभी है। मैंने खट् से घूँघट छोड़ दिया। दूसरी बार घूँघट उठाने की मेरी हिम्मत नहीं हुई। आखिर करुणा ने ही घूँघट उठा दिया। मैं उसका चेहरा देखकर फुला नहीं समाया। मेरा वहम था, और कुछ नहीं। मैंने करुणा के कंधों को चूमा।

मेरी शादी हो गई थी, पर मैं करुणा से एक दूरी बनाए रहता था। उसके साथ अकेले रहने में मुझे शंकाएँ घेरने लगती थी। वह मेरे अतीत के बारे में कुछ नहीं जानती! मैंने कहाँ-कहाँ खाक छानी है? कैसे-कैसे पापड़ बेले हैं? वह कुछ नहीं जानती! वह मुझसे कुछ जानना भी नहीं चाहती। वह अपने में खुश है। बस उसे एक बच्चा चाहिए, फिर वह और खुश हो जाएगी। मुझे लगता है, उसकी ज़िंदगी में बस खुश होना ही लिखा है। वह हमेशा प्रसन्नचित्त रहती है। मैं भी उसे देखकर खुश होता हूँ। वह चपल है। चंचल है। जीवन से भरी हुई है। फिर भी, कभी-कभी मुझे डरा देती है। रात को जब वह पानी पीने उठती है, मैं उस पर नज़र रखता हूँ। अगर वह गु़सलख़ाने में जाए और ज़्यादा देर लगाए, मुझे आतुरता होने लगती है कि वह क्या कर रही है?

मेरी शंका ठोस होने लगी जब एक दिन मैंने करुणा को कमरे में अकेले कुछ बुदबुदाते सुना। मैं ऐसी बुदबुद अक्सर सुनता रहता था, पर पहली बार मैंने साफ़-साफ़ सुना। यह करुणा की ही बुदबुदाहट थी। मैंने गुसलख़ाने के दरवाज़े पर कान टिका दिए। वह कुछ मंत्र-सा बुदबुदा रही थी। बीच-बीच में मेरा नाम ले रही थी। गुसलख़ाने से अगरबत्ती की गंध आ रही थी। उसकी बुदबुदाहट तेज़ हो रही थी। मेरे मुँह से आवाज़ नहीं निकल रही थी कि एक हल्की-सी आवाज़ निकली, ‘करुणा!’। अंदर से बुदबुद की आवाज़ बंद हो गई। मेरी साँस में साँस आई कि देखता हूँ करुणा बालकनी से झाडू़ निकालती हुई कमरे में खिसकती आ रही है। वह मेरी ओर देखकर हल्के-से मुस्कुराती है, और अपने काम में मगन हो जाती है। मैं गुसलख़ाने का दरवाज़ा खोलता हूँ, अंदर बाल्टी में बूँद-बूँद पानी चू रहा है। मेरा हलक़ सूख रहा था, मैं गु़सलख़ाने का नल कसके बंद कर रसोई की ओर चला गया। आई और भैया रसोई में बैठे भैया की शादी में लगने वाले सामान की लिस्ट तैयार कर रहे थे। मैंने पानी पीया और आई के घुटने पर सिर रख रोने लगा। आई बोली, ‘क्या हुआ?’। मैं कुछ कह न सका। रोना बंदकर चुपचाप आई की गोद में लेट गया।

मैं सोचता हूँ कि अब समय इस बोझ को बढ़ाता ही जाएगा। मैं कभी यह स्वीकार नहीं कर सकूँगा कि मैंने ही भाभी को मारा है, अनजाने में ही सही। उन दिनों की उदासी और खीझ याद करके अब भी मेरा मन भर आता है। पता नहीं, उन दिनों क्या धुन रहती थी। कहीं मन नहीं लगता था। और अब, मन बीच-बीच में बेवजह हड़बड़ाने लगता है। साँस फूलने लगती है।

भैया की शादी हो गई। मेरे और करुणा के पास एक लड़की है। पता नहीं क्यों, आई ने उसका नाम महिमा रख दिया है! महिमा भैया की पहली पत्नी का नाम था। मेरे जीवन में और एक शाश्वत दुःख इस नाम के साथ आ गया। मैं आई को समझा भी नहीं पाया कि क्यों यह नाम नहीं रखना चाहिए! उल्टा मैंने देखा, आई ने जब मुझसे पूछा कि इसका नाम महिमा रख दें, तो मैंने ऐसे सहर्ष स्वीकृति दी, जैसे मैं ख़ुद यही नाम रखने वाला था।

पर इन दो वर्षों ने मुझे पूरी तरह बदल दिया। मेरे बाल सफेद हो गए हैं। चेहरा झुलसा हुआ लगता है। शरीर के पुराने घाव फिर उभर आए हैं। क्या बीमारी है, कुछ पता नहीं चलता! शरीर से मवाद निकलता रहता है। दर्द होता है। हगन-मूतने से भी मोहताज हो गया हूँ। करुणा दिन-रात मेरी देख-भाल में लगी रहती है। महिमा से ज़्यादा बच्चा मैं हो गया हूँ। देखता हूँ, सबको मेरी फिक्र लगी रहती है। भैया जैसा रुपयों का दास, मेरे ईलाज पर अपना सबकुछ लुटा चुका है। पर, मेरा शरीर छीजता जा रहा है। घावों के आस-पास लगता है माँस खींचा रहा है, जैसे घाव का छेद और बढ़ने वाला है। तेज़ दर्द होता है। मैं चीखता रहता हूँ। महिमा का कमरा अलग कर दिया गया है। उसे आई के कमरे में सुला दिया जाता है। नई भाभी मुझसे घृणा-सी करती है। उसका चेहरा देखकर मुझे अपने जीवन से और निराशा हो जाती है। लगता है, मैं मर ही जाऊँगा!

अब सोचने की क्षमता भी जवाब दे रही है। मैं कुछ बुदबुदाता रहता हूँ। कोई समझ नहीं पाता। करुणा भी रुखी और उदास होती जा रही है। बात-बात पर भाभी से झगड़ पड़ती है। कभी मुझे एक-दो दिन आराम भी रहता है। पर, यह आराम शारीरिक होता है। घाव जैसे टीसना कम कर देते हैं। वह भी आखिर थक जाते हैं। लेकिन, दिमाग़ में ख़यालों का अंबार लग जाता है। करुणा का क्या होगा? महिमा का क्या होगा?

कभी एक लाल चुनरी हवा में लहराती दिखती है।

धीरे-धीरे मैं ख़तम हो रहा हूँ।

एक दिन करुणा महिमा का झूला मेरे पलंग के पास डालकर खाना बनाने रसोई चली गई। महिमा थोड़ी देर हँसती रही, फिर चुप हो गई। मैंने पलंग पर लेटे-लेटे ही महिमा को संबोधित कर अपनी बात शुरू की…मैं नहीं जानता, उस दिन मुझे क्या हुआ था। पर न जाने क्यों, मैं अब भी, खुद को गुनाहगार नहीं मान पाता हूँ! आख़िर, वह एक पल का बहाव था। होनी कौन जानता था?…आदमी किन-किन चीज़ों के वश में नहीं होता! वह सोचता कुछ है, कहता कुछ है, करता कुछ है, और, होता कुछ और है! किसका मनचाहा हुआ है दुनिया में!…हाँ, ठीक है, मैं सच्चे मन से मानता हूँ कि मैंने ही भाभी को मारा है। बस!…मुझे लगा मेरे मन से एक बोझ हट गया।

धीरे-धीरे रात घिर आई। दो साल में मेरा हाल यह हो गया था कि अगर कोई मुझे पहली बार देखता, तो बाबा का भाई ही मानता। मेरे सारे बाल पक गए थे। दवाईयाँ खा-खाकर मुँह का स्वाद बिगड़ गया था। हमेशा थूकते रहने की इच्छा होती थी। धीरे-धीरे चारों ओर सन्नाटा पसर गया था। पूरा शहर इस वक़्त सो रहा है। नहीं, पूरा शहर कभी नहीं सोता! लेकिन, जितना सो रहा है, उतनों के सपने हैं, हाँ, ठीक है, सब लोग सपने भी नहीं देख रहे हैं, लेकिन आज रात जो लोग सपने देख रहे हैं, वे सब सुन लें, ‘मैंने ही अपनी भाभी की जान ली है!’।

हमेशा मैं ऐसा नहीं करता, पर आज मैंने दवाई नहीं ली। मैं चुपचाप लेटा था। कभी नींद का बगुला पलकों पर बैठ जाता था और कभी पंख फड़फड़ाकर उड़ जाता था। मेरी नींदे हराम थीं। इसीलिए मुझे दवाई खाकर सोना पड़ता था, पर कभी-कभी, मैं उसे टाल भी देता था। यानी, खिड़की से बाहर फेंक देता था। यह काम सफाई से करना होता था, वर्ना आई, करुणा सब लोग मुझे पचास बातें समझाने लगते, जिनसे मन और कमज़ोर हो जाता है। चाँदनी का एक टुकड़ा खिड़की से कमरे के अंदर गिरा हुआ था। मैं उसी को देख रहा था। करुणा वहीं लेटी थी। करुणा की देह अब भी आकर्षक है। आखिर वह 23 साल की है। कसी हुई। एक बच्चे की माँ होकर भी वह अभी ढिलमढल्ला नहीं हुई है। उसका हँसना कम हो गया है, लेकिन वह आनंद की मूर्ति है। उसे देखकर मन प्रफुल्ल हो जाता है। अचानक चाँदनी के टुकड़े पर एक साया दिखाई दिया। उसने करुणा को हल्के से हिलाया। करुणा जागी, हड़बड़ाई, और पलंग की ओर देखने लगी। मैंने एक पल के लिए आँखें बंद कर लीं, और फिर पलकों की कोर से देखने लगा। करुणा उठकर मेरे पास आई। दो पल मुझे देखा, और फिर मुझे हल्के से हिलाया। मैं ऐसे पड़ा रहा, जैसे बेहोश हूँ। वह आदमी वहीं चाँदनी के टुकड़े पर लेटा हुआ था। करुणा भी उसके पास जाकर लेट गई। मैं उनकी काम-लीला देखता रहा। पता नहीं, मेरे मन को क्या सुख मिल रहा था! मेरी आत्मा तृप्त हो रही थी। मुझे लग रहा था, जैसे मेरे मन पर बरसों से रखा कोई बोझ हट रहा है। थोड़ी देर में देखा चाँदनी के टुकड़े पर अकेली करुणा रह गई थी। लेकिन अब, उसकी देह देखकर मुझे घिन आ रही थी। सारा आकर्षण मुलम्मे की तरह उतर रहा था। मेरे मन में ईर्ष्या पैदा हुई। बदले की भावना। अब मैं करुणा से बदला लेना चाहता था। आखिर उसने मुझे धोखा दिया है। भाभी भी तो धोखा दे रही थी, अनजाने ही उसे सज़ा मिल गई।

मैं अपने घावों के ठीक होने की दुआ करने लगा। मैं चुप था। करुणा मेरी रोज़ की तरह सेवा कर रही थी। जैसे कुछ हुआ ही नहीं। पर अब, उसके हर स्पर्श में मुझे अजीब झनझनाहट महसूस होती थी, जैसे उसका बदन कोई ग़लीज़ चीज़ हो। कभी-कभी मैं उसके हाथ से अपने को बचाने की कोशिश करता था। मुझे लगता है, करुणा को कुछ भान हुआ था। मैं भी सचेत रहने लगा।

धीरे-धीरे मैं ठीक होने लगा। बाल तो सफेद ही रहे, लेकिन घाव भर गए। करुणा का हँसता चेहरा धीरे-धीरे उदास होने लगा। अब उसके खाट पकड़ने की बारी थी। आई ने कहा, ‘तेरी सेवा ने ही उसे थका दिया है। अब तू उसकी तीमारदारी कर!’ मैंने भी उसकी सेवा का बीड़ा उठा लिया। उसे बुखार आ गया था। काम का बोझ तो उस पर बढ़ा ही था। महिमा को जन्म दिया, और फिर मेरी उपचार-व्यवस्था करती रही। फिर घर के काम-काज अलग! और फिर वह आदमी। मेरे मन ने ईर्ष्यामयी क्रूर अट्ठहास किया। वह भी तो मेहनत का काम है!

मुझे महिमा के अपनी बच्ची होने पर शक होना लाज़मी था। मैं दिन-भर उसके चेहरे से अपना और करुणा का चेहरा मिलाता रहता था। मुझे विश्वास हो गया कि वह मेरी लड़की नहीं है। महीनों बाद मैं बाज़ार गया। जब लौटकर आया तो रात गहरा चुकी थी। घर पर सब लोग सो गए थे। दरवाज़ा अटका हुआ था। मैं दरवाज़ा बंद करके अपने कमरे की ओर चल दिया। कमरे में चाँदनी का टुकड़ा वैसे ही पड़ा था। करुणा सो रही थी और महिमा भी। मैंने पास जाकर दोनों को ग़ौर से देखा। मेरे दिमाग़ में उस रात का दृश्य चलने लगा। धीरे-धीरे दिमाग़ पर एक धुन सवार हुई। मैं गुसलख़ाने में गया और वहाँ से कपड़े पीटने की मोगरी ले आया, और माँ-बेटी दोनों को दुनिया से पार कर दिया। मेरे मन में न हैरानी थी, न डर। मैं चाँदनी का टुकड़ा देख रहा था और दो साए।

इस बार भी मुझे सज़ा नहीं हुई। एक आदमी पकड़ा गया, जिसका नाम मनीष था। मैंने सोचा, मुझे अपना जुर्म क़बूल कर लेना चाहिए। पर मेरा मन फिर एक क्रूर अट्ठहास कर उठा। यह आदमी करुणा का प्रेमी था। मैं अपना काम करके कमरे से निकला, और कुछ देर में वो कमरे में घूसा। कमरे की हालत देखकर उसकी चीख़ निकल गई। सारे लोग दौड़े आए। देखा, तो वह आदमी था, और करुणा और महिमा की लाश थी। उसे पकड़कर पुलिस के हवाले कर दिया गया। उसने भी अपना जुर्म क़बूल कर लिया। तब मैंने सोचा, मैं क्यों दूसरे के फटे में पाँव डालूँ! आख़िर, यह सब उसीका किया-धरा था। अगर वह उस रात न आता, तो मैं एक-दो दिन में मर ही जाता। पर, उसी की मेहरबानी कि मैं ज़िंदा हूँ, और दो बच्चों का बाप हूँ। अब मुझे ईश्वर पर दृढ़ विश्वास है। ईश्वर-विरोधी मुझे फूटी आँख नहीं सुहाते। सोचता हूँ, अगर ईश्वर नहीं है, तो इतनी बड़ी दुनिया का नियंता कौन है? कोई शक्ति, कोई बल तो है, जो मुझसे परे है, जो मेरे माध्यम से अपना काम करता है। मेरी आत्मा भी तो उस परम-आत्मा का ही अंश है। मेरे मुँह से जो शब्द निकलते हैं, वह भी तो उस परमपिता के हैं। मेरे हाथों जो कुछ होता है, वही करवाता है। मैं तो निमित्त मात्र हूँ। कर्ता कोई और है! उसकी लीला अपरम्पार है। वह जैसा सोचता है, वैसा ही होता है। उसकी मर्ज़ी के बिना एक पत्ता भी हिलता हो, तो कोई मुझे बता दे! वह सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ है। मैं उसका दास हूँ। जो वह चाहता है, मुझसे करवाता है। मैं निर्बल हूँ। प्रार्थना के अलावा मैं कर ही क्या सकता हूँ!

हे परमपिता, परमेश्वर, परमात्मा! विकल-पीड़ित आत्माओं को शांति दे, शांति दे, शांति दे!!

usman khanउस्मान ख़ान समकालीन हिंदी साहित्य के अलहदा युवा कवि-कथाकार हैं. चर्चाओं और पुरस्कारों की भीड़ से अलहदा… छपाऊ मानसिकता से भी अलहदा... जे.एन.यू. के हिंदी विभाग से मालवा के लोकसाहित्य पर पीएचडी. इनसे usmanjnu@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

साभार- हंस, मई , 2016

द ग्रेट अमेरिकन सर्कस: संजय सहाय

जैसे-जैसे अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव की चर्चा वैश्विक हो रही है, वैसे-वैसे इसकी प्रक्रिया (चुनाव) के  लोकतांत्रिक होने- न होने को लेकर शक जाहिर किया जाने लगा है.  इस चुनावी प्रक्रिया और इसके नियमों-कानूनों की ओर से लगभग अनभिज्ञ होकर हम टीवी में चुनावी डिबेट देखते हुए खुश-नाखुश होते रहते हैं. संजय सहाय का यह लेख अमेरिकी राष्ट्रपति  की चुनावी-प्रक्रिया के अधिकांश पहलुओं को उनके ऐतिहासिक संदर्भों के साथ रखने का प्रयास किया.

By संजय सहाय

अमेरिकी व्यवस्था से प्रभावित व्यक्तियों और दलों द्वारा अपने देश में भी संसदीय प्रणाली को छोड़ राष्ट्रपति (प्रेसीडेंशियल) प्रणाली को लागू करने की अनुशंसा की जारी रही है. अमेरिकन प्रेसीडेंशियल प्रणाली को समझे बिना ही लोग इसे लेकर अति उत्साहित रहते हैं. उनकी समझ से इसमें जनता राष्ट्रपति को सीधे चुनती है. अतः वह राष्ट्रपति की बढ़ी शक्ति को अधिक वैधता प्रदान करती है फिर इस व्यवस्था में राष्ट्रपति और विधायिका दो समानांतर संस्थाएं हो जाती हैं जिससे कि सत्ता के दुरुपयोग पर अंकुश रहता है. साथ ही सरकार में निर्णय जल्दी हो पाते हैं और महाभियोग जैसी अनोखी परिस्थितियों को छोड़ सत्ता में एक निश्चित काल के लिए खासा स्थायित्व रहता है. जबकि प्रधानमंत्री एक विधेयक के न पास हो पाने से ही अल्पमत में आकर कभी भी सत्ता खो सकता है. उधर प्रेसीडेंशियल प्रणाली के विरोधियों का मानना है कि राष्ट्रपतिवाद चुनाव की बाज़ी और दाम दोनों को ऊपर उठा देता है,  ध्रुवीकरण को बढ़ावा देता है साथ ही उसका विद्रूपीकरण भी करता है और अंततः अधिनायकवाद की ओर ले जा सकता है. फिर दो समानांतर सत्ता केंद्रों (राष्ट्रपति और विधायिका की वजह से बार-बार गतिरोध की स्थिति बन सकती है तथा दोनों समानांतर धाराएं असफलताओं के लिए एक-दूसरे पर दोष डालते हुए अपनी जवाबदेही से बचती रह सकती है. आदि-आदि. हालांकि जहां तक अधिनायक की बात है तो चाटुकारिता भरे अपरिपक्व लोकतंत्रों में प्रधानमंत्री भी बड़ी आसानी से अधिनायकवाद बन जाते हैं ऐसा हम पूर्व और वर्तमान दोनों समय में देख सकते हैं.

यह बात सही है कि प्रेसीडेंशियल प्रणाली के अधिकतर मामलों में जनता सीधे राष्ट्रपति का चुनाव करती है किंतु यह बात संयुक्त राज्य अमेरिका पर कतई लागू नहीं होती. अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव की प्रक्रिया अत्यधिक जटिल, लंबी और विश्व में सबसे खर्चीली है. यह प्रक्रिया संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान में निहित है और 12वें, 22वें और 23वें संशोधन द्वारा सुधारी गई है. साथ ही भिन्न राज्यों के कानूनों की वजह से और स्थानीय रिवाजों के कारण समय के साथ इसमें खासा बदलाव आया है. हर चाल साल बाद होने वाले राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद के इन चुनावों में उम्मीदवारी के लिए कम से कम 35 वर्ष की आयु और जन्मजात अमेरिकी नागरिक होना आवश्यक है जो कि पिछले चौदह वर्षों से लगातार संयुक्त राज्य में रह रहा हो. कोई भी राष्ट्रपति अधिकतम दो बार ही राष्ट्रपति रह सकता है. फ्रैंकलिन डिलानो रूजवेल्ट अपवाद रहे जिन्होंने चार प्रेसीडेंशियल चुनाव जीतने का रिकॉर्ड कायम किया था. अमेरिका में किसी भी राष्ट्रपति के लिए अधिकतम दो मियाद की परंपरा एक अलिखित कानून की तरह तब से लागू थी जब जॉर्ज वाशिंगटन ने 1796 में तीसरी बार राष्ट्रपति बनने से इनकार कर दिया था. हालांकि यूलिसिस ग्रांट ने तीसरी बार के लिए प्रयास किए थे किंतु वे सफल नहीं हो पाए थे और निंदा के पात्र भी बने थे. जबकि प्रेसीडेंट मैकिनले की सितंबर, 1901 में हुई हत्या के बाद उपराष्ट्रपति से राष्ट्रपति बने थियोडोर रूजवेल्ट कुल ढाई मियाद तक राष्ट्रपति रहे. फ्रैंकलिन डी.रूजवेल्ट के 1945 में गुज़र जाने के उपरांत संविधान के 22वें संशोधन से किसी एक राष्ट्रपति के लिए अधिकतम दो मियाद का लिखित कानून बन गया. हालांकि यदि 75 प्रतिशत कांग्रेस का समर्थन मिल जाए तो दो मियाद से अधिक भी मिल सकते हैं.

मूलतः दो दलीय राजनीति (डेमोक्रैट्स और रिपब्लिकन) की इस व्यवस्था में राष्ट्रपति चुनाव के लगभग साल-भर पहले से ही जटिल, उबाऊ और खर्चीली प्रक्रिया की शुरुआत होती है. सबसे पहले दोनों प्रमुख दल अपने-अपने राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों में से किसी एक उम्मीदवार का चयन करने के लिए भिन्न राज्यों में जनमत लेते हैं. जनमत के लिए वे किसी भी राज्य में दो में से कोई एक प्रक्रिया चुन सकते हैं. पहला तरीका छोटी-छोटी जनसभाओं जिसे काकस कहते हैं, में आंतरिक मतदान के जरिए वे अपने उम्मीदवारों की लोकप्रियता माप सकते हैं. दूसरा ज्यादा पसंदीदा तरीका प्राइमरीज का है. प्राइमरीज राज्यों के खर्चे और व्यवस्था पर होने वाला गुप्त मतदान है. प्राइमरीज भी दो प्रकार की होती हैं- एक ‘बंद’ जिसमें दल विशेष के रजिस्टर्ड मतदाता ही भाग ले सकते हैं, दूसरी ‘खुली’ हुई जिसमें कोई भी मतदाता आकर मत डाल सकता है. काकस द्वारा हो या प्राइमरीज द्वारा- भिन्न उम्मीदवारों को प्राप्त मतों के अनुपात में ही हर राजनीतिक दल उनके लिए डेलीगेट्स (प्रतिनिधि) मुकर्रर कर सकता है जो जुलाई में होने वाली राष्ट्रीय दलीय महासभा में अपनी पार्टी के अनेक प्रत्याशियों में से किसी एक की राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी तय करते हैं.

1970 से पहले संयुक्त राज्य के ज्यादातर डेलीगेट्स का आवंटन काकस प्रक्रिया में हुए मतदान के आधार पर ही किया जाता था किंतु 1972 के सुधारों के उपरांत अधिकतर राज्यों ने प्राइमरीज व्यवस्था को अपना लिया है. सिर्फ आयोवा, लुजियाना, मिनेसोटा और गेन सहित चैदह राज्यों और चार सं. रा. टेरिटरिज ने ही 2016 के लिए कॉकसेज के माध्यम से डेलीगेट चुने हैं. दोनों प्रमुख दलों की राज्यों की इकाइयों द्वारा इन तमाम प्रक्रियाओं से गुज़रने के बाद, पार्टी विशेष की केंद्रीय समिति यह निर्णय लेती है किस राज्य से कितने डेलीगेट्स के लिए जाएंगे और किस-किस उम्मीदवार के लिए नत्थी कर दिए जाएंगे. ये डेलीगेट्स अपनी-अपनी पार्टियों के सक्रिय कार्यकर्ता होते हैं. कुछ राज्यों में मतों के अनुपातिक न होकर जीतने वाले उम्मीदवार को ‘विनर टेक ऑल’ की तर्ज पर सारे के सारे डेलिगेट्स मिल जाने की व्यवस्था है और फिर इनके ऊपर सुपर डेलीगेट्स सुपर डेलीगेट्स विशेष तौर पर डेमोक्रेटिक पार्टी में अपनी मनमर्जी के डेलीगेट होते हैं. इन्हें किसी के साथ नत्थी नहीं किया जाता और ये अपनी पार्टी के किसी भी उम्मीदवार के पक्ष में अपना वोट दे सकते हैं. ये मूलतः अपनी पार्टी के कद्दावर नेताओं में से चुने जाते हैं और उम्मीदवार के चयन को उलट-पुलट कर सकते हैं. इसी तरह से रिपब्लिकन पार्टी में सुपर डेलीगेट्स तो नहीं होते किंतु तीन डेलीगेट प्रति राज्य के हिसाब से इनकी जगह तय रहती है.

इस जगह पर पहुंचकर हम पाते हैं कि सुपर डेलीगेट्स या ‘विनर टेक ऑल’ जैसे राज्यों के डेलीगेट भ्रष्टाचार की बड़ी संभावनाएं जगाते हैं. बड़े पैमाने पर पैसे और प्रभाव का खेल आरंभ हो जाता है. प्रत्याशियों के साथ सहभोज में 20-30 लाख रुपये प्रति प्लेट के डिनर बिकने लगते हैं. युद्धास्त्रानिर्माताओं, अन्य उद्योगपतियों और धंधेबाजों के लिए खजाने खुल जाते हैं. ताकि चार सालों में वे अपने चुनावी निवेश पर कई गुना मुनाफा कमा लें. इस बात की संभावना भी बनी रहती है कि राज्यव्यापी चुनावों में ज्यादा मत पाने वाला प्रत्याशी भी राष्ट्रपति पद की दौड़ से बाहर कर दिया जाए और खास लोगों का चहेता उस पार्टी का राष्ट्रपति पद को घोड़ा घोषित कर दिया जाए. हिलेरी क्लिंटन जिनके पक्ष में डेलीगेट ज्यादा हैं और बर्नी सैंडर्स जिनको ज्यादा जन समर्थन है-के मामले में कुछ ऐसा ही होता दिख रहा है.

बहरहाल चुनावी वर्ष की गर्मियों में (जुलाई) दोनों प्रमुख राजनैतिक दलों की राष्ट्रीय महासभा में डेलीगेट्स द्वारा अपने-अपने राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी चुन लिए जाने के उपरांत नए सिरे से इस राष्ट्रव्यापी दंगल की शुरुआत होती है. जिसमें टीवी डिबेट्स, चुनावी रणनीतियां, बड़े-बड़े दावे-वादे, राजनीतिक प्रीतिभोज और प्रलोभन- सबकी भूमिका रहती है. किंतु हमारी जनधारणा के विपरीत तब भी इन अमेरिकी चुनावों में जनता अपने राष्ट्रपति को सीधे नहीं चुनती.

अमेरिकी संविधान में राजनीतिक दलों की भूमिका का प्रावधान नहीं है क्योंकि अमेरिका के संस्थापक पिता (फाउंडिंग फादर) जिनमें जेम्स मैडिसन, एलेक्जेंडर हैमिल्टन, जॉन जे, जॉन ऐडम, थॉमस जेफरसन, बेंजामिन फ्रैंकलिन और जॉर्ज वाशिंगटन प्रमुख थे, अमेरिकन राजनीति को पक्षधरता से दूर रखना चाहते थे. संघीय पत्र संख्या 9 और 10 में एलेक्जेंडर हैमिल्टन और जेम्स मैडिसन ने घरेलू घटकवाद से मुल्क को सावधान किया है. अपने शुरुआती दौर में राष्ट्रपति के चुनाव की प्रक्रिया को लेकर बहुत वाद-विवाद हुए. जेम्स विल्सन और जेम्स मैडिसन जैसे नेता राष्ट्रपति का चुनाव सीधे जनमत से चाहते थे लेकिन अमेरिका के दक्षिणी राज्यों में जहां पर गुलाम अधिक थे और मुक्त मतदाताओं की संख्या उत्तरी राज्यों के मुकाबले बहुत कम थी, उससे समस्या पैदा हो रही थी जेम्स मैडिसन इस बात को महसूस करते हुए लिखते हैं- हालांकि राष्ट्रपति चुनाव के लिए एक लोकप्रिय मतदान आदर्श होता लेकिन इस पर सहमति बन पाना असंभव दिख रहा है क्योंकि दक्षिणी राज्यों को ऐसे राष्ट्रपति चुनावों में अपनी भूमिका प्रभावकारी नहीं दिखती.“ अतः 6 सितंबर, 1787 में संवैधानिक महासभा ने इलेक्टोरल कॉलेज का प्रस्ताव पास कर दिया. इसके पहले 1787 की संविधान सभा में नवनिर्मित सं. रा. की राजव्यवस्था को लेकर बहुत तरह के प्रस्ताव आए जिसमें जेम्स मैडिसन द्वारा लिखित और एडमंड रैन्डॉल्फ द्वारा प्रस्तुत वर्जीनिया प्लान लाया गया जिसमें अन्य व्यवस्थागत बातों के अलावा राज्यों की मुक्त आबादी के अनुपात में प्रतिनिधियों की संख्या रखने का प्रस्ताव था. किंतु इस प्लान पर छोटे राज्यों को घोर आपत्ति थी. इसके बाद न्यूजर्सी प्लान पर चर्चा हुई जिसे उसके प्रस्तुतकर्ता के नाम से पैटर्सन प्लान भी कहा जाता है. इसमें प्रत्येक राज्य से एक प्रतिनिधि का प्रावधान था जो संयुक्त राज्य के पूर्व संविधान ‘आर्टिकल्स ऑफ़ कंफेडरेशन’ की तर्ज पर था और जिसे संयुक्त राज्य के मूल 13 राज्यों ने मान्यता दी थी लेकिन इस पर भी जमकर विरोध हुआ खासकर वर्जीनिया प्लान के प्रस्तुतकर्ताओं द्वारा जिसमें जेम्स मैडिसन और रैन्डॉल्फ प्रमुख थे. इसके बाद कनेक्टिकट सुलह के नाम से सहमति बनी जिसमें दो सदनों का प्रस्ताव था. राज्यों को बराबर प्रतिनिधित्व देने वाला ‘सीनेट’ (सीनेटर का कार्यकाल 6 वर्ष होता है और 1/3 सदन का चुनाव हर दूसरे वर्ष होता है.) और जनसंख्या को अनुपातिक प्रतिनिधित्व देने वाला ‘हाउस ऑफ़ रिप्रजेंटेटिव (चुनाव हर दो वर्ष बाद). इसमें बचे हुए पेंच ‘3/5 की सुलह’ के नाम से सुलझा लिए गए. गुलाम प्रथा के समर्थक खेतिहर दक्षिणी राज्य गुलामों की संख्या को जोड़कर हाउस ऑफ़ रिप्रेजेंटेटिव में अपने अनुपातिक प्रतिनिधित्व पर अड़े हुए थे जबकि गुलाम प्रथा के विरोधियों का मानना था कि चूँकि गुलामों को मतदान का अधिकार नहीं है अतः काले गुलामों की संख्या के बहाने गुलाम समर्थक गोर लोग ही कांग्रेस में अपनी संख्या बढ़ा लेंगे. विडम्बना यह रही कि एक काले गुलाम को 3/5 सामान्य नागरिक मानाने का प्रस्ताव गुलाम प्रथा के विरोधियों की तरफ से ही आया और स्वीकृत हो गया. संविधान से यह प्रावधान अमेरिकी गृहयुद्ध के उपरांत 1865 के तेरहवें संशोधन से गुलाम प्रथा की समाप्ति के उपरान्त निकल दिया गया.

इलेक्टोरल कॉलेज में इलेक्ट्रेट की संख्या पर तय हुआ कि दोनों सदनों की संख्या के बराबर ही राष्ट्रपति को चुनने वाले इलेक्ट्रेट की संख्या होगी. आज के दिन दो सीनेटर प्रति राज्य के हिसाब से सौ सीनेटर, हाउस ऑफ़ रिपे्रजेंटेटिव के 435 सदस्यों- कुल संख्या 535 और डिस्ट्रीक्ट ऑफ़ कोलंबिया (वाशिंगटन डीसी) से आते तीन इलेक्ट्रोरेट को लेकर इलेक्टोरल कॉलेज की संख्या कुल 538 होती है. इसमें से कोई भी इलेक्ट्रेट कांग्रेस का सदस्य नहीं हो सकता और न ही वह किसी भी लाभ के पद पर बना व्यक्ति हो सकता है. राष्ट्रपति चुन लिए जाने के उपरांत इलेक्टोरेट की कोई भूमिका नहीं होती.

अमेरिकन आम चुनाव में मतदाता दरअसल इलेक्टोरेट को चुनते हैं जो अपनी पार्टी के राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति द्वय के उम्मीदवारों के साथ नत्थी (Pledged) किए हुए रहते हैं और सुनने में यह बेशक अटपटा लगेगा किंतु मुख्य उम्मीदवारों के साथ-साथ बैलेट पर इनका नाम लिखा हो भी सकता है या नहीं भी हो सकता है. ये इलेक्टर्स अपने राजनीतिक दल के समर्पित कार्यकर्ता होते हैं और अपने दल की राज्य इकाई अथवा केंद्रीय समिति द्वारा नामित/चयनित किए जाते हैं.

नवंबर में हुए राष्ट्रव्यापी मतदान के नतीजे आ जाने के बाद इलेक्टोरल कॉलेज गठित हो जाता है और उसके इलेक्टर्स जिस भी पार्टी के उम्मीदवार द्वय को 270 या उससे अधिक मत दे देते हैं वह राष्ट्रपति निर्वाचित हो जाता है.

नेब्रेस्का और मेन को छोड़ बाकी राज्यों में राष्ट्रपति चुनाव की दौड़ में आगे निकले प्रत्याशी द्वय को ‘विनर टेक ऑल’ की तर्ज पर सारे इलक्टर्स मिल जाते हैं. सन् 2000 के राष्ट्रपति चुनाव में राष्ट्र-भर में अधिक जनमत प्राप्त करने के बावजूद अल गोर के जॉर्ज बुश जूनियर से हार जाने में अन्य कारणों के साथ यह भी एक बड़ा कारण था. कोई आश्चर्य नहीं कि इलेक्टोरल कॉलेज प्रणाली की आवश्यकता और विश्वसनीयता को लेकर अमेरिका में भी गंभीर सवाल उठते रहे हैं. परत-दर-परत जटिलता से भरी यह प्रणाली संसदीय प्रणाली के मुकाबले कोई खास उत्साह नहीं जगा पाती.

बहरहाल राष्ट्रपति प्रणाली हो या संसदीय प्रणाली- नीयत साफ हो तो सब ठीक रहता है किंतु अमूमन ऐसा हो नहीं पाता. आज के दिन लोकतंत्रों के लिए सबसे बड़ा खतरा धन का बढ़ता हुआ प्रभाव है. संयुक्त राज्य में राजनैतिक चंदे जुगाड़ने और उन्हें चुनावों में खर्च करने का जिम्मा पॉलिटिकल एक्शन कमिटियों (पीएसी) के पास रहता है. कोई भी संस्था जो चुनावों में 2600 डॉलर से अधिक प्राप्त या खर्च करती हो उसे यह हैसियत मिल जाती है. सन् 2002 के मकेन-फीनगोल्ड रिफार्म एक्ट के जरिए अमेरिकी चुनावों को धनिकों का चुनाव बनने से रोकने की चेष्टा की गई थी किंतु सिटिजंस यूनाइटेड बनाम फेडरल इलेक्शन कमीशन के चल रहे मुकदमे पर अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने अपने 2010 के फैसले से 2002 के मकेन-फीनगोल्ड रिफार्म एक्ट की उन धाराओं को उलट दिया है जो कॉरपोरेट जगत् और यूनियन द्वारा चुनावों में खर्च करने पर निषेध लगाता था. इसने पी.ए.सी. के समानांतर सुपर पी.ए.सी. संस्थाओं को जन्म दे दिया है. सिटिजंस यूनाइटेड के पक्ष में आए इस फैसले से कॉरपोरेट घरानों और संघों को छूट मिल गई है कि वह अपने खजाने से, स्वतंत्रा रूप से किसी भी पार्टी या प्रत्याशी के पक्ष में कितनी भी दौलत सुपर पी.ए.सी. के जरिए खर्च कर सकते हैं.

2016 के राष्ट्रपति चुनाव में अब तक दलों और प्रत्याशियों द्वारा पांच हजार करोड़ रुपये के बराबर की राशि जुगाड़ी जा सकी है जबकि सूपर पी.ए.सी. की तरफ से इस चुनाव में अब तक सात हजार करोड़ रुपये डाले जा चुके हैं जिसका बड़ा हिस्सा रिपब्लिकन प्रत्याशियों के पक्ष में गया है और यह तब जब अभी दोनों दलों के मुख्य उम्मीदवारों का तय होना बाकी है. ध्यान रहे कि यह खर्च सिर्फ राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति कुल दो पदों के चुनाव पर हो रहा है.

ये सारी स्थितियां अमेरिका सहित विश्वभर के लोकतंत्रों को किस दिशा में ले जा रही हैं इसमें संदेह की गुंजाइश नहीं बचतीलोकतंत्रों को कुबेरतंत्र में बदलने का षड्यंत्र चल रहा है. भारत में भी पिछला लोकसभा चुनाव हम भूले नहीं हैं. देश की सबसे धनी ‘पारटी’ ने खरबों रुपये खर्च कर अब तक का सबसे महंगा चुनाव लड़ा. 5-6 सौ करोड़ रुपये के स्रोत का हिसाब तो वे आज तक नहीं दे पाए हैं. सावधान रहें- विश्वभर के राज्याध्यक्षों के सिंहासन नितंबों सहित नीलामी पर हैं.

sanjay jee

संजय सहाय

 चर्चित कथाकार, फिल्मकार और हंस के संपादक. चित्रकला और फिल्मों में अद्भुत रूचि. आप उनसे  sanjaysahay1@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

साभार- हंस, मई, 2016.

1850-51 के फ्रांस में हिंदुस्तानी की कक्षाएं:गार्सां द तासी

गार्सां द तासी हिंदी-उर्दू में परिचय के मोहताज नहीं हैं. वे हिंदी साहित्य के पहले इतिहासकार के रूप में जाने जाते हैं. इसके अलावा उनके बारे हम बहुत कुछ नहीं जानते हैं. उनके अधिकांश लेख हिंदी और इंग्लिश में अनुदित नहीं हुए हैं. बावजूद इसके उनके सैकड़ों लेख मूल फ़्रांसिसी में उपलब्ध हैं. गार्सां द तासी के  हिंदुस्तान -संदर्भित भाषणों की कड़ी  में से  1857 के  विद्रोह  से संबंधित  एक  भाषण हम पहले भी छाप चुके हैं, इस बार प्रस्तुत  है हिंदुस्तानी  भाषा-साहित्य  के अध्ययन -अध्यापन से  सम्बंधित उनके दो  भाषण . इसके अनुवादक  हैं  किशोर  गौरव .   

औपनिवेशिक हिन्दुस्तानी बौद्धिक-परिवेश के निर्माण पर मैकाले की शिक्षा-नीतियों के प्रभाव के ‘दोष’ मढ़ने वालों के लिए गार्सां द तासी द्वारा उपलब्ध कराये डिटेल्स सिरदर्द का कारण बन सकता है. इधर के भारत-विद्यों ने इस बात को प्रमुखता से रेखांकित करना शुरू कर दिया है कि अंग्रेजों के आने कारण हिन्दुस्तानी बौद्धिक अभ्यास का नैरन्तर्य बाधित ही हुआ. सत्रहंवी शताब्दी के उतर्रार्ध में, बनारस के एक संस्कृत-फ़ारसी विद्वान से प्रसिद्ध फ़्रांसिसी दार्शनिक और चिकित्सक फ्रांस्वा बर्नियर की मुलाकात होती है. बर्नियर उस बनारसी पंडित से संस्कृत के ग्रन्थ फ़ारसी में अनुवाद करवाता है और इसके बदले वह पंडित के लिए देकार्त जैसे दार्शनिकों की रचनाओं का फ्रेंच से फारसी में अनुवाद करता है, जबकि उस समय तक देकार्त के अंग्रेजी अनुवाद भी बमुश्किल मिलते होंगे और खुद देकार्त के मरे मात्र दस साल हुए थे. कहने का तात्पर्य यह कि अंग्रेजों के आने पहले कि जो यह बौद्धिक गतिविधि थी, वह छीजते-छीजते जाने के बावजूद गार्सा द तासी तक उसके वजूद देखने को मिल जाते हैं.

उम्मीद है कि किशोर गौरव, जो कि फ़्रांसिसी अध्ययन केंद्र जेएनयू, नई दिल्ली में पीएचडी के शोध छात्र हैं, आगे भी इसी तरह के अनुवाद उपलब्ध करवाते रहेंगे. तिरछीस्पेल्लिंग उनका आभारी है.

अनुवाद – किशोर गौरव

 By गार्सां द तासी

हिन्दुस्तानी की कक्षा का प्रारम्भिक व्याख्यान

पहला व्याख्यान, ३ दिसंबर १८५०

महोदय,

हमारे सामने मौजूद टेक्स्ट की व्याख्या करने से पहले मैं हिन्दुस्तानी की व्यावहारिक उपयोगिता और इसके मौजूदा साहित्यिक आकर्षणों के बारे में कुछ शब्द कहना चाहूँगा.

इस बात से लोग पूरी तरह वाकिफ नहीं हैं कि हिन्दुस्तानी भारत के सभी प्रान्तों में बोली जाती है – या तो अन्य प्रांतीय ज़बानों के साथ-साथ: जैसे की बंगाल में और मद्रास और बम्बई प्रेसिडेंसी में, या फिर किसी भी अन्य ज़बान के बिना, जैसे की हिन्दुस्तान के उत्तर पश्चिम के प्रान्तों में: बहार (शायद यहाँ इशारा बिहार की तरफ है, हांलाकि भौगौलिक स्तिथि के हिसाब से यह गलत होगा : अनुवादक), इलाहबाद, मालवा, अवध, अजमेर, आगरा, दिल्ली – जिनमे लाहौर और नेपाल को भी जोड़ देना चाहिए, जिस निष्कर्ष पर हम हाल में पेरिस मे पहुंचे हैं. अतः इन प्रदेशों में रहने के लिए और यहाँ तक की उनकी यात्रा करने के लिए भी, जो की हम वर्तमान में काफी सुविधा से और बिना पासपोर्ट की आवश्यकता के कर सकते हैं, मैं यह कहता हूँ की हिन्दुस्तानी जानने की ज़रुरत है. इसीलिए माननीय ईस्ट इण्डिया कंपनी अपने नागरिक और सैनिक सेवाओं मे सिर्फ उन व्यक्तियों को लेती है जो यह भाषा सीख चुके हैं और जिन्होंने इसकी परीक्षा संतोषप्रद तरीके से पास कर ली है.

मगर यह मान लेना गलत होगा कि मात्र अंग्रेज़ ही हिंदुस्तान में रोज़गार पा सकतें हैं. कई अन्य योरोपीय वहाँ सम्मानजनक पदों पर हैं. इसके अलावा अगर हमें हिन्दुस्तानी का ज्ञान हो तो हम वहां आसानी से स्वतंत्र कार्य पा सकतें हैं. व्यापार, जो कि कई योरोपियों के लिए सम्पन्नता का स्रोत है, की बात न भी करें तो वहाँ चिकित्सा में काम किया जा सकता है, चित्रकला में सफलतापूर्वक हाथ आज़माया जा सकता हैं, और सबसे बेहतर, अगर भारतीय, मुस्लिम और अंग्रेज़ी कानूनों की जानकारी के अलावा हमारे पास हिन्दुस्तानी में ज़िरह करने की काबिलियत है तो वकालत के पेशे में सफलता पाया जा सकता है.

एक पादरी बेगम समरू द्वारा सिरधना में बनाये गए खूबसूरत गिरिजाघर में, आगरा और अन्य जगहों के धर्मप्रदेश (Diocese) के कैथोलिक चैपल में हिन्दुस्तानी में भी प्रवचन दे सकता है. यहाँ तक की कलकत्ते में, अंग्रेज़ी चर्च में मतान्तरित भारतीयों के लिए, ‘हिन्दुस्तानी गिरिजाघर’ नामक एक गिरिजा है जिसमे धार्मिक कार्यवाही केवल हिन्दुस्तानी में ही होती है.

यह बात आम जानकारी में नहीं है कि भारतीयों के पास वहाँ के मुख्य शहरों में लिथोग्रफिक छापाखाने हैं और वे वहाँ प्रतिदिन हिन्दुस्तानी रचनाएँ, मौलिक या अनूदित, प्रकाशित करते रहते हैं. अगर हम सिर्फ उत्तर-पश्चिम के प्रान्तों, जिनका हम ज़िक्र कर चुकें हैं, की बात करें तो वहाँ इस साल की पहली जनवरी तक २३ छापखानें मौजूद थें, जहां, केवल १८४९ में ही १४१ विभिन्न रचनाएं प्रकाशित हुई थी. इसी काल में २६ अलग-अलग अखबार प्रकाशित हो रहे थे, जिसमे से २३ हिन्दुस्तानी में, २ फ़ारसी में और एक बांग्ला में थे. अगर हम इन अखबारों में उन अन्य को भी जोड़ दें जो भारत के अन्य प्रान्तों में प्रकाशित होते हैं तो हमें आसानी से कम से कम ५० भिन्न हिन्दुस्तानी अखबारों कि संख्या मिलेगी जो वर्तमान में प्रकाशित हो रहे हैं.

हिन्दुस्तानी ज़ाहिर तौर पर तरक्की कर रही है. इसकी वजह यह है कि पहले की तरह, मात्र आम भाषा व लोकप्रिय काव्य की भाषा होने के बजाये, साथ-साथ, हिन्दुस्तानी शासन की अधिकृत भाषा, राजनयिक पत्रव्यवहार की भाषा, कचहरी और प्रशासन की भाषा भी बन गयी है, जैसा की पहले फ़ारसी हुआ करती थी. यहाँ तक की हिन्दुस्तानी में वैज्ञानिक निबंध भी लिखे जाने लगे हैं, जो की पिछले कुछ सालों तक फ़ारसी में लिखे जाते थे. हिन्दुस्तानी के समकालीन साहित्य की महत्ता को कम कर के नहीं आँका जा सकता और इसके अपने आकर्षण हैं जिससे पूर्व के साहित्यों में उसकी अपनी विशिष्ट जगह है. उदाहरण के लिए हम भारत के उत्तर के पहाड़ों में स्थित शिमला के हिन्दुस्तानी अखबार की सदस्यता ले सकते हैं और पेरिस में डाक के जरिये नियमित तौर पर प्राप्त कर सकते हैं.

हम दिल्ली के एक साहित्यिक सभा के कार्य विवरण (minutes) प्राप्त कर सकते हैं और भारत की पुरानी राजधानी में चल रही अकादमिक गतिविधियों का मासिक ब्योरा ले सकते हैं.

हाल फिलहाल में प्रकाशित होने वाले हिन्दुस्तानी रचनाओं में, काफी सारे विज्ञान की हैं, कुछ कला, कुछ भूगोल, कुछ विधि इत्यादि से सम्बंधित हैं- कुछ मौलिक और कुछ अंग्रेज़ी से अनूदित; कुछ अध्यात्मिक और कुछ विवादित रचनाएँ हैं, जिसमे से एक आगरा से छपा कैथोलिक धार्मिक-पत्र है; कुछ प्राचीन और आधुनिक इतिहास हैं; कुछ धार्मिक और नैतिक रचनाओं के अनुवाद हैं, जैसे कि बुन्यान (Bunyan) की ‘पिल्ग्रिम्स प्रोग्रेस’ (Pilgrim’s Progress), और मेसन (Mason) की ‘सेल्फ नॉलेज’ (Self Knowledge); कुछ उपन्यास, जैसे की ‘रसेलास’ (Rasselas) और ‘कुज़िल बाश’ (Kuzzil Bash) और कुछ काव्य भी, जैसे की गे (Gay) की नीतिकथाएं.

यह ज्ञात है की संस्कृत से बहुत से अनुवाद हिन्दुस्तानी मे उपलब्ध हैं; हालांकि हाल-फिलहाल में उनका प्रकाशन नही हो पाया है; लेकिन अरबी और फ़ारसी से बड़ी संख्या में अनुवादों का प्रकाशन हुआ है जिनमे मुझे कुरआन की हिन्दुस्तानी में टीकासहित अनुवादों की बड़ी संख्या का ज़िक्र करना होगा; एक अरबी शब्दकोष जिसकी  व्याख्याएं हिन्दुस्तानी में हैं; अरबी और फारसी व्याकरण, गुलिस्तान के कई अनुवाद, अलिफ़ लैला (Mille et Une Nuits/ Thousand and One Nights), अखलाक़-ए-जलादी, अखलाक़-ए-मुहचिनी, शाहनामा का संक्षिप्त संस्करण, इब्न खल्लिकां (Ibn Khallican) का जीवनी-शब्दकोष, अबुल्फेदा – बोरदा, आदि.

अंत में, जहाँ तक बात है वास्तव में मौलिक रचनाओं की, मैं ज़िक्र करना चाहूँगा प्रचलित दंतकथाओं – जैसे शकुंतला, लैला और मजनू, इब्राहिम अधम, कला-ओ-कामरूप, हुस्न-ओ-इश्क – पर आधारित कई सुन्दर कविताओं का; यात्रा-वृत्तान्त, इतिहास – जैसे की टीपू के पिता हैदर अली का, जिसे मैसूर के राजा के एक पुत्र ने लिखा है; अनेक गद्यात्मक कथा-कहानियाँ; अंग्रेज़ी भाषा की कोषरचना (Lexicography) और व्याकरण पर हिन्दुस्तानी में कई उपयोगी रचनाएं; अंततः प्रचलित कवियों की रचनाएँ: मोमिन, नासिर, जौक, नासिख और अताश – वे लेखक जिनका समकालीन हिन्दुस्तानी साहित्य पर इस वक़्त काफी प्रभाव है.

     दूसरा व्याख्यान, ४ दिसंबर, १८५१

महोदय,

इस शैक्षिक वर्ष की कक्षा के शुरुआत में अपने नए और पुराने श्रोताओं के बीच खुद को पा कर मैं प्रसन्न महसूस कर रहा हूँ. हिन्दुस्तानी भाषा सीखने का आपका निर्णय उचित है. विश्व में सबसे अधिक व्यापक भाषाओं में से एक – चूँकि हमारे हिसाब से ८ करोड़ से अधिक लोगों द्वारा यह बोली जाती है – यह भाषा राजनैतिक और व्यावसायिक रूप से काफी आकर्षक है; लेकिन साथ ही साथ इसका एक वास्तविक साहित्यिक आकर्षण है, और मुख्यतः इसी नज़रिए से यूरोपीय महाद्वीप में इसका अध्ययन उपयोगी है. इसकी हिन्दू शाखा एक किस्म की सरलीकृत संस्कृत है, कुछ-कुछ जैसे की आधुनिक ग्रीक प्राचीन ग्रीक से और जैसे इतालवी लातिन से सम्बद्ध है. इसकी जानकारी इसलिए एक भारतविद के लिए बहुत काम की है क्योंकि यह अपने आधुनिक रूपों में कभी तो अपने प्राचीन रूपों से विसंगति में है और कभी तो उन्ही का विकसित रूप है. इसकी मुस्लिम शाखा उनके लिए काफी काम की है जिनका वास्ता फ़ारसी से हैं. फ़ारसी और हिन्दुस्तानी का एक ही स्रोत है; लेकिन हिन्दुस्तानी की शब्दावली अधिक सरल है. विश्लेषण करने में, हिन्दुस्तानी पद रचना को लम्बे फ़ारसी पीरियडस (Périodes/Period Sentences: अनु.) पर लागू करके उनका मतलब ज्यादा आसानी से समझा जा सकता है. आप स्वयं ही इन कथनों के कायल हो जायेंगे, चूँकि आप इन सुन्दर भाषाओं से सम्बद्ध हैं: संस्कृत, यूरोप की हमारी सभी भाषाओं की स्रोत और जिसे हम अब यहूदी (Semitic) भाषाओं से भी जोड़ के देख रहे हैं, क्योंकि हमें पता है की ‘Trilitère’ roots की अरबी व्यवस्था गलत है और इनमे से roots की एक बड़ी संख्या वास्तव में monosyllabic (एकाक्षरीय) है जिससे उनका निर्माण संस्कृत में शामिल हो जाता है और  कुछ अरबी और संस्कृत roots की एकरूपता दिखाता है; फ़ारसी, जो कि ऐतिहासिक रचनाओं में समृद्ध है और मुस्लिम थेओसोफों ( Théosophes : ब्रह्मविद्या/ अध्यात्मविद्या से सम्बंधित: अनु.) के अध्यात्म से पुष्ट एक ख़ास साहित्य जिसकी विशिष्टता है.

हिन्दुस्तानी की यह दो शाखाएं : हिन्दू शाखा और मुस्लिम शाखा, एक समृद्ध और भिन्न्तापूर्ण साहित्य प्रस्तुत करती हैं. साथ ही, हिन्दुई में संस्कृत की श्रेष्ठ कृतियों के अनुवाद, या कम से कम नक़ल, उपलब्ध हैं, जबकि उर्दू और दक्खनी में फ़ारसी साहित्य की श्रेष्ठ रचनाओं के पुनरुत्पादन मौजूद हैं.

इस शैक्षिक वर्ष में इन विभिन्न स्कूलों से सम्बद्ध साहित्यिक कृतियों की व्याख्या करने का मुझे अवसर प्राप्त होगा. संस्कृत स्कूल में हम शकुंतला की आकर्षक कहानी, जो की यूरोप में लगभग लोकप्रिय है, और उषा की कहानी, जो कि कम प्रचलित है लेकिन आकर्षण में कमतर नही, पढ़ पाएँगे.

फ़ारसी स्कूल हमें उपलब्ध कराएगा वली, भारत का हफीज, जिसके ग़ज़ल हालांकि थोड़े आडम्बरयुक्त हैं लेकिन वास्तव में फ़ारसी गीतों के सामान सुन्दर हैं. गद्य में हम शेर शाह के इतिहास का एक खंड पढ़ेंगे, जिसमे, अन्य चीज़ों के अलावा हम भारत के पुराने मुस्लिम शासकों के प्रशासन पर अद्भुत जानकारी पाएंगे.

विशुद्ध भारतीय स्कूल में, हिन्दुई, हिंदी और हिन्दुस्तानी, आपको समझाने के लिए मैं “मीर-ओ-माह” नामक कल्पित कथा चुनूंगा, जहां आप ज्ञानप्रद एथ्नोग्रफिक (मानवजाति-विज्ञान संबंधी) विवरण अद्भुत मौलिकता वाले उपमाओं (metaphors) के जरिये पाएंगे. उदहारण के लिए यह रहा एक विवाह का विवरण जो हम इस कथा में पाते हैं:

“विवाह की तैयारियां तुरंत समाप्त कर दी गयीं. जल्दी ही सभी काम निपटा लिए गए. जलसा अविलम्ब शुरू हो गया और संगीत ने इसका एलान कर दिया. सचमुच, दूर से वाद्य यंत्रों की आवाज़ सुनाई दी: आकाश में जैसे वो मिल गया हो. हर्षोल्लास का माहौल था; हर तरफ से हंसी की गूँज संगीत से एकाकार हो गयी. उल्लास का वृक्ष फलित हुआ; वसंत का गुलाब खिल उठा. हिना का पौधा बुरी आत्माओं और बुरे प्रभावों को भगाने के लिए जलाया गया और उसका धुंआ आकाश तक उठा. हृदयों को पुलकित करने वाले उस आनंद में पूरी प्रकृति हिस्सा ले रही थी. पौधों में कलियाँ नहीं फूल खिले हुए थे. मधुरतम संगीत सुनाई पड़ता था. बांसुरी, वीणा, खंजरी  की आवाज़ मजीरों के साथ सुनाई पड़ती थी. यह माहौल इंसान और आत्माओं को मदहोश कर गिरा दे सकता था. नृत्य का आनंद लेने के लिए नर्तकियों को भी बुलाया गया था. सनौवर के वृक्ष की उंचाई वाली ये महिलाएं मनोहारी सुन्दरता के साथ अपने कदम चला रही थी और काफी सराहनीय फुर्ती से घूम रही थी. साथ साथ वह सरसरी निगाह फेकती थी जो बिजली चमकने सी प्रभावी थी.

“इसी समय मीर अपनी मंगेतर तक जाने के लिए अपने घोड़े पर चढ़ा; उसका घोड़ा भागते हुए इतना शोर करता था जैसे यह क़यामत के दिन का शोर हो. वह घोड़ा अपनी गति में सुबह की हवा की बराबरी करता था. राजकुमार अपने युवा मित्रों से घिरा था जो की उसका मंडली के सदस्य थे. किसि को उनके स्वर्ग के साक़ी होने का गुमान भी हो सकता था. शाम में सभी, सोने-जड़े कपड़ों से सजे, जलसे के लिए तैयार थे. अनेकों मशालें अँधेरे को दूर कर रहीं थी और दरवाज़े तथा दीवारें दर्पणों की तरह उनकी चमक को प्रतिबिंबित कर रहे थें. ये मशालें अनार के फूलों कि, या यूँ कहना बेहतर होगा, चमकते हुए तारों कि तरह दिखते थे. रात को दिन में बदल देने वाली आतिशबाजी जलाई गयी; योरोपियों की तरह कागज़ के फूल हवा में लहरा दिए गए जो हर तरफ बिखर गए.

“जब रात का पहला पहर गुज़र गया, माह शिरीन के जैसी एक घोड़े की पीठ पर बैठी. एक नक़ाब के पीछे वो अपना चेहरा छुपाती थी, जैसे पानी की सतह के नीचे चाँद अपनी किरणें छुपाता है. और शहजादा अपनी मंगेतर के घर की तरफ, रास्ते पर सोने बिखेरता बढ़ रहा था. ढोल की आवाज़ सुनाई दी और बिजली खुद ही कडकने लगी, जबकि बिगुल को बेधती हुई ध्वनि फरिश्तों और हूरों के कानों तक पहुंच गयी. अंततः दोनों बारातें जब मिलें  तो माह के महल तक पहुंचे और प्रविष्ट हुए. वहाँ लाजवाब दावत तैयार थी: फिर से नाच शुरू हुए; शराब हाथों-हाथ चल रही थी: ऐस लगता था जैसे आप योरोप के किसी शहर में हो. प्याले में चमकते शराब की रौशनी से सूरज को जलन होती थी. सूर्योदय तक जलसा जारी रहा. जब रात की जगह सुबह का उदय हुआ तब प्रतिज्ञा  और अन्य संस्कार हुए. दुल्हन ने पीले और लाल रंग का नया कपडा पहना. अपने कानो के ऊपर और नीचे के हिस्से पर उसने बालियाँ और झुमके पहन रखे थे, और उसकी नाक पर एक सुन्दर बाली थी. अपने गले में उसने एक मोतियों की माला डाली जो आकाशगंगा के सामान दिखती थी और अपने हाथों में धातु के गहने डाले  जिनका वर्णन नही किया जा सकता, उसकी कलाइओं में कीमती पत्थर के कंगन थे जिनकी चमक दूर-दूर तक आलोकित होती थी, उसके पैरों में खनकते हुए पायल थे. वह पान चबाती थी जो उसके होठों को और सुर्ख कर देता था. कोई दुल्हन इतनी सुन्दर कभी न दिखी होगी. वो चिराग थी और उसके साथी और सहचर उसे रौशनी  की तरह घेरे हुए थे.”

अंत में हम “कलयुग” यानि की अन्धकार-युग – जैसे ग्रीक माइथोलॉजी का लौह युग – का एक काव्यात्मक वर्णन पढेंग; वह वर्णन जो कुछ-कुछ Dryden द्वारा इसी विषय पर लिखी इन पंक्तियों के सामान है:

Mankind is broken loose moral bands;

Nor rights of hospitality remain;

The guest, by him who harbour’d him, is slain:

The son-in-law pursues the father’s life.

The wife the husband murders; he, the wife.

इनमे से कई रचनाएं पद्य में हैं. मगर महोदय, आप यह मत मान बैठिएगा की इस वजह से यह गद्य रचनाओं से बहुत ज्यादा कठिन हैं. अगर पद्य में रचना के सामान्य नियम नहीं माने जाते, अगर हम वहां असामान्य उलट फेर पाते हैं और गद्य से ज्यादा बढ़ा चढ़ा कर पेश किये गए अलंकर पातें हैं, तो भी हमें कमस्कम यह जानने का लाभ होता है की अर्थ (sens) कहाँ ख़त्म होता है क्योंकि enjambements (पद्य की एक पंक्ति से दूसरी पंक्ति तक जारी रहने वाला शब्द या शब्द-समूह:अनु.) वहां स्वीकृत नही होते. सामान्यतः पद्य-पंक्ति के साथ अर्थ (sens) भी खत्म हो जाता है, और, हर हाल में यह दो या तीन पंक्तियों के आगे नही फैला होता.

हिन्दुस्तानी में हम दो लिखावट का इस्तेमाल करते हैं: फ़ारसी लिखावट मुस्लमान-हिन्दुस्तानी के लिए और देवनागरी हिन्दू-हिन्दुस्तानी के लिए, ऐसे ही हम मीटर (Métrique) के लिए दो रीतियों का प्रयोग करते हैं. हिन्दुस्तानी-उर्दू और दक्खनी के लिए हम अरबी मीटर इस्तेमाल करते हैं, सिर्फ उन परिवर्तनों के साथ जो भाषांतर की वज़ह से करने पड़ते हैं; और हिंदी तथा हिन्दुई के लिए संस्कृत का सरलीकृत तरीका प्रयोग करते हैं.

महोदय, जैसा की आप जानते हैं, अरबी लोग पद्य-पंक्ति को एक तम्बू की तरह देखते हैं, और वे उसे इसलिए ‘बैत’ नाम से बुलाते हैं, जिसका अर्थ तम्बू होता है, जिसका आशय है ‘घर’. तम्बू के ‘मिसरा’ नामक दो दरवाज़े होते हैं: यह दो दरवाज़े पद्य-पंक्तियों के दो hemistiches (एक पद्य-पंक्ति का आधा भाग:अनु.) होते हैं, उनको भी मिसरा ही कहते हैं. तम्बू खूंटे (‘rukn’) के द्वारा समर्थित होता है: यह पद्य-पंक्ति के अलग ‘पैर’ (pieds) होते हैं, जिसमे दस प्राथमिक (primitives) और बहत्तर सहायक (secondaires) होते हैं. तम्बू का अंदरूनी हिस्सा विभाजन (फासिला) के द्वारा अलग किया जाता है, और यह मेख (वतद) के द्वारा जोड़ा जाता है, और रस्सी (सबब) के द्वारा. ये वो नाम है जो ‘पैर’ pied के छः बड़े और छोटे उपविभाजनों को दिए जाते हैं.

प्राथमिक और सहायक ‘पैर’ के संयोग से असंख्य मीटर बन जाते है; मगर मुश्किल से २० हैं जो उर्दू और दक्खनी में इस्तेमाल होते हैं. गद्य पंक्तियाँ हमेशा तुकांत में होती हैं. अगर वे hemistiche से तुक में होती हैं, तो हर गद्य-पंक्ति पर तुक बदल जाता है; अगर तुक सिर्फ गद्य-पंक्ति को समाप्त करता है तो यह पूरी कविता के लिए समान ही होता है.

हिन्दू प्रणाली काफी अधिक सरल है. हम वहां सिर्फ सिलेबल (syllabes/syllables) पर ध्यान देते हैं, अंग्रेज़ी की तरह बिना दीर्घता और लघुता का ख्याल किये हुए; और इस भाषा में रिदम की वजह से कई सिलेबल्स को   समेटकर एक कर दिया जाता है और कभी-कभी इसका उल्टा भी करना पड़ता है. इस सिलेबिक ‘पैर’ को ‘मात्रा’ कहते हैं, संस्कृत की तरह.

हिन्दू बोली में, जैसे की मुस्लमान बोली में, गद्य-पंक्तियाँ तुकबंद होती हैं, और, साथ ही, hemistiches हमेशा साथ-साथ तुक में होते हैं. ‘चौपाई’, जो की हिन्दुई में सबसे अधिक इस्तेमाल होनी वाली कविता है, संस्कृत के ‘श्लोक’ के समान है; इसके हर hemistiche में आठ सिलेबल्स होतें हैं. जहाँ तक ‘दोहा’ की बात है, जो अरबी के अलग हुए ‘फर्द’ या ‘बैत’ के सामान है, इसमें १२ या १४ सिलेबल हर hemistiche में होते हैं.

महोदय, जो पद्य हम पढेंगे उनका माप बताने के लिए और जो नियम हमने अभी पढ़े हैं उसी हिसाब से उनका पाठ करने का मैं ख्याल रखूँगा,.

जो भाषा हम पढ़ रहे हैं वो मुख्यतः एक जीवित भाषा है; चूँकि इस वक़्त जब हम पेरिस में वो रचनायें पढ़ रहें है जिनके बारे में मैंने अभी ज़िक्र किया है, तभी भारत में ऐसे सैकड़ों प्रकाशित हो जायेंगे. वास्तव में हिंदुस्तान में जो पम्फलेट, किताबें और पत्र-पत्रिकाएँ छपती हैं उनकी संख्या का अनुमान योरोप में हम नहीं लगा सकते.

पिछले साल मैं आपको बता रहा था की उत्तर पश्चिम के प्रान्तों में, जहाँ भारत की अँगरेज़ सरकार एक बड़ी प्रेसिडेंसी बनाने वाली है, जिसकी राजधानी लाहौर है, और जिसकी एकमात्र भाषा हिन्दुस्तानी है, वहाँ, जनवरी १८५० में भारतीय रचनाएँ प्रकाशित करने वाली २३ लिथोग्रफिक छापाखाने हैं. पिछले वर्ष के दौरान लाहौर में एक नया छापाखाना स्थापित हुआ है जिससे इस साल के 1 जनवरी तक इनकी संख्या २४ तक पहुँच गयी है, जो की निम्न हैं: आगरा में ७, दिल्ली में ५, मेरठ में २, लाहौर में २, बनारस में ४, बरेली में एक, कानपुर में 1, शिमला में 1 और इंदौर में 1. लेकिन भारत का यही एकमात्र हिस्सा नहीं जहाँ हिन्दुस्तानी किताबें और अखबारें छपती हैं. इसी किस्म के अन्य छापाखाने ना सिर्फ वर्तमान के तीन प्रेसिडेनसियों के मुख्य शहरों बल्कि कई अन्य शहरों में भी हैं; और सिर्फ लखनऊ में ही १३ छापाखाने कार्यरत हैं.

मुझे कुछ दिनों पहले भिन्न प्रकार के अनेकों भारतीय रचनाओं – मौलिक और अनूदित- की वृहद सूची प्राप्त हुई है जो की १८५० में उत्तर पश्चिम के प्रान्तों में छपी हैं. महोदय, मैं उनमे से कुछ का, जिनका हमारे लिए, दार्शनिक या साहित्यिक महत्व है, ज़िक्र करना चाहूँगा. इनमे से हैं, अन्य के अलावा, कुरआन के अरबी और उर्दू में कई संस्करण, जिनमे से एक in-18 फॉर्मेट में है; एक मुस्लिम शहादत-ग्रन्थ ; मोहम्मद साहब के चमत्कारों के ऊपर एक कविता; वहाबी संप्रदाय का एक खंडन; हिन्दुओं के अशास्त्रीय (heterodox) संप्रदाय जैनियों के हिंदी में लिखित निबंध; आगरा के नज़ीर, जिसका हाल में देहान्त में हुआ और जिनका शायर के रूप में भारत में काफी रुतबा है, की कविताओं का संकलन; मशहूर अध्यात्मवादी अली हाजी, जिन्होंने, बाकी चीज़ों के अलावा दिलचस्प संस्मरण लिखे थे, जो की अंग्रेज़ी में अनूदित हुयी है, की जीवनी; देबीप्रसाद के द्वारा बनारस से छपा पंजाब का इतिहास, इंदौर के धर्म नारायण के द्वारा सिन्ध्य (sindhya) राजवंश का इतिहास; पद्य में ‘लख्त-ए-जिगर’ यानी की ‘प्रिय पुत्र’ नामक एक नावेल सिकंदराबाद के बाल मुकुंद के द्वारा, जो की, हिन्दू होते हुए भी, जैसा कि इनके नाम से ज़ाहिर है, उर्दू – उत्तर की मुस्लिम-हिन्दुस्तानी – में लिखते हैं.

काव्य सबसे सफलता से विकसित हो रहा है. इसका चिराग, ख़ास साहित्यिक गोष्ठियों, जिनको मुशायरा के नाम से जानते हैं, में रोशन होता है. भारतीयों को ऐसी अकादमिक गोष्ठियों का काफी शौक है; और काव्य के शौक़ीन निश्चित समय पर इनका आयोजन करते हैं, आमतौर पर हर पंद्रह दिन पर और शाम में. जिसके घर पर मुशायरे का आयोजन होता है वो आमतौर पर उसका सभापतित्व करता हैं. अपनी काव्यात्मक प्रतिभा के लिए प्रसिद्ध लोगों को वह बुलाता है, और मुशायरे के लिए, आमतौर पर एक ख़ास मीटर पर एक नज़्म लिखने के लिए आमंत्रित करता है.

मौजूदा सबसे जाने-माने शायरों में दो शासकों का नाम शुमार है: दिल्ली का सुल्तान और अवध का नवाब. किसी समय हिंदुस्तान के मुसलमान शासक सिर्फ फ़ारसी में ही बोलते और लिखते थे; आम भाषा को वह हिकारत की नज़र से देखते थे. मगर, वर्तमान में, अपने प्रजा की तरह, इन्होने अपने खयालात का इज़हार करने के लिए, या बोलकर या लिखकर, हिन्दुस्तानी का प्रयोग करना शुरू कर दिया है. इन दो शाही शायरों में, जिनके बारे में मैं आपको बता रहा हूँ, पहला, बहादुर शाह द्वितीय, जो पोता है शाह आलम का, जो की खुद हिन्दुस्तानी शायरों में गिने जाते हैं और जो पिता है शहजादा दारा का, जो खुद भी अच्छी शायरी करते हैं. इसने शायरी में अपना तखल्लुस ‘ज़फर’ (विजय) रखा है, और जब शायर के तौर पर इनका ज़िक्र होता है तो इसी नाम का इस्तेमाल करते हैं. दूसरे, वाजिद अली शाह, का तखल्लुस है ‘अख्तर’ (सितारा). वो न सिर्फ शायर हैं, बल्कि संगीतकार भी और अपने ग़ज़लों को खुद ही संगीत में ढालतें हैं. इन दो शायरों की नज्मों का हिंदुस्तान में काफी रुतबा है, और चूँकि मैंने उनकी ग़ज़लें पढ़ी हैं मैं यह दावे से कह सकता हूँ की वे इस शोहरत के काबिल हैं. इसलिए, बिना अतिश्योक्ति के हम उनके लिए अरबी की यह जानी-मानी उक्ति कह सकते हैं: “बादशाहों के कथन, कथनों के बादशाह होते हैं.”

325500_321105231234677_1160023941_oकिशोर गौरव, फ़्रांसिसी अध्ययन केंद्र, जेएनयू, दिल्ली में  पीएचडी के शोधार्थी हैं और सामाजिक-राजनीतिक मोर्चों पर भी चिंतनशील रहते हैं. उनसे मोबाइल-8800788583 और ईमेल- kgkishoregaurav@gmail.com पर संपर्क संभव है.

आभार- हंस, अप्रैल, 2016

 

कुबेरतंत्र में भामाशाह की तलाश: संजय सहाय

संजय सहाय जब ‘हंस’ का यह संपादकीय-लेख लिख रहे थे उसी समय विश्व का एक चर्चित फ्रेंच अर्थशास्त्री थॉमस पिक्केटी  भारत के दौरे पर था. अनके जगह उसने इस भ्रम का पर्दाफ़ाश किया कि भारतीय कुलीन तंत्र आम भारतीयों की तुलना में ज्यादा टैक्स पेय करता है. उसने बताया कि जब से नवउदारवाद का झोंका भारतीय जमीन पर आया है तब से यहाँ की सरकार ने टैक्स-देनदारों के आंकड़ों को सार्वजनिक करना बंद कर दिया है. उसने यह भी जोड़ा कि अगर इनकम टैक्स रिटर्न के आंकड़ों को सामने लाया जाएगा तो इसकी गुंजाइश ज्यादा है कि जीडीपी के उछाल के अनुपात में ही गरीबी-अमीरी की खाई और चौड़ी हुयी है.
संजय सहाय अक्सर अपने संपादकीय में चकित करते हैं. काफी मेहनत करते हैं और हिंदी की ‘मुख्य-धारा’ विषयक परिधि से अपने को बाहर कर लेते हैं. कभी चित्रकला, कभी सिनेमा, कभी संगीत , कभी फासिज्म और अब अर्थतंत्र.

कुबेरतंत्र में भामाशाह की तलाश!

By संजय सहाय

बचपन में मां से एक कहानी सुनी थी- हल्दी घाटी की लड़ाई के बाद जब राणा प्रताप जंगल-जंगल भटक रहे थे और बच्चों को घास की रोटी खिला रहे थे तब मेवाड़ के एक बड़े सेठ भामाशाह ने अपनी सारी दौलत लाकर राणा के कदमों में रख दी थी. ऐसे स्वामिभक्त, राजभक्त और त्यागी सेठ के लिए सचमुच आंखों में श्रद्धा छलछला आई थी. हालांकि तबसे लेकर आज तक, कोई ऐसा संवेदनशील, अपने सामाजिक दायित्वों के प्रति सचेत और मानवीय मूल्यों के लिए समर्पित राष्ट्रभक्त सेठ- जिंदा या मुर्दा- कैसा भी, नहीं मिला. हां, उस कथा को सारे सेठ-साहूकारों ने अपने पक्ष में खूब भुनाया. बाद में पता चला कि 1542 में पैदा हुए ओसवाल जाति से संबंधित भामाशाह का साहुकारी या महाजनी से कुछ लेना-देना नहीं था. उनके पिता भारमल राणा सांगा के वक्त रणथम्भौर किले के किलेदार हुआ करते थे और बाद में राणा उदय सिंह के प्रधानमंत्री भी रहे. भामाशाह भी मेवाड़ के जाने-माने लड़ाका, सेनाध्यक्ष, राज-सलाहकार और प्रधानमंत्री रहे. भामाशाह की तरह ही उनके छोटे भाई ताराचंद भी एक कुशल योद्धा और प्रशासक थे जिन्होंने अनेक अवसरों पर राणा की सेनाओं का संचालन किया था. हल्दीघाटी की लड़ाई के उपरांत जब राणा प्रताप को अपनी सेना के पुनर्गठन के लिए धन की आवश्यकता पड़ी तो दोनों राजभक्त भाईयों ने बीस हजार स्वर्ण मुद्राओं और पच्चीस लाख रूपए से राणा की मदद की. यह पैसे उन दोनों भाईयों के उस खजाने का एक हिस्सा भर थे जो उन्होंने समय-समय पर मुगल ठिकानों पर हमला करके लूटा था. इस प्रकार से देखा जाए तो वह सारा धन मेवाड़ राज्य की संपत्ति ही था. कालांतर में भामाशाह ने मेवाड़ राज्य के खजांची और प्रधानमंत्री का पद भी संभाला, और ताराचंद गोदवाड़ के राज्यपाल नियुक्त किए गए. भामाशाह के वंशज अनेक पीढि़यों तक मेवाड़ के राणाओं के प्रधानमंत्री रहे. इसलिए भारतीय संदर्भ में भामाशाह को एक तोंदियल-सा धन्नासेठ मान बैठना उतना ही हास्यास्पद होगा जितना कि जगत सेठों, राकफेलरों, रॉथ्सचाइल्डों, अंबानियों, अडाणियों या जिंदलों को भामाशाह मान बैठना.

अरस्तु का मानना था कि यदि शासक अभिजात वर्ग जनहित को सर्वोपरि मानकर फैसले लेने लगे तो वह शिष्टतंत्र कहलाएगा और जनसाधारण को नज़रअंदाज कर सिर्फ अपने फायदे के लिए फैसले लेने लगे तो वह निरंकुश कुलीनतंत्र में बदल जाएगा. मध्यम वर्गों के हाथों में सत्ता रखने के हिमायती अरस्तु का यह भी मानना था कि एक विशाल मध्यम वर्गों का समूह छोटे से अभिजात वर्ग को निरंकुश कुलीनतंत्र में बदल जाने से रोक सकता है. बहरहाल, शुरू से ही यह स्पष्ट हो गया था कि अभिजात शासक वर्ग के भीतर भी सत्ता सिर्फ धनी लोगों के हाथों में ही सिमट जाती है जो सिर्फ अपने हितों को ध्यान में रख राज्य के नियम बनाते हैं. इस वजह से कुलीन तंत्र की बजाय उसे कुबेरतंत्र कहना अधिक उपयुक्त रहेगा.

समय-समय पर एक भयावह-सी अफवाह उड़ती रहती है कि पूरी दुनिया को दरअसल एक अति धनाढ्य गुप्त पंथ चला रहा है जिसे इल्युमिनाटी कहते हैं. इल्युमिनाटी पश्चिमी यूरोप और उत्तरी अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय बैंकरों, उद्योगपतियों और व्यापारियों का एक कार्टेल है जिसमें रॉथ्सचाइल्ड, रॉकफेलर, मॉर्गन, लज़ार्ड, वारबर्ग, श्राॅडर और शीफ जैसे खानदान जुड़े हैं. अब तो इसमें रूसी और हिंदुस्तानी धनाढ्यों के साथ-साथ अनेक राष्ट्राध्यक्षों के नाम भी गिनाए जाने लगे हैं. अब चूंकि विश्वभर की पूरी दौलत का आधा हिस्सा कुल 62 लोगों के हाथों में निहित है, इस अफवाह को बल मिलता है. 1776 में बवेरिया के एक जर्मन दार्शनिक योहान ऐडम वाइसहोप्ट ने फ्री मेसन पंथ की तर्ज पर ही एक गुप्त समूह की स्थापना की जिसे उसने ऑर्डर ऑफ इल्युमिनाटी की संज्ञा दी थी. इसकी स्थापना में ऐडम को मायर रॉथ्सचाइल्ड का भरपूर सहयोग मिला था. कालांतर में इस समूह को लेकर इतने किस्से प्रचलित हुए कि उसमें से सच और झूठ का फैसला करना नामुमकिन है. इस गुप्त समाज पर अंबेर्तो एको और डैन ब्राउन ने उपन्यास लिखे. 1979 में रोमांचक उपन्यासकार राबर्ट लडलम का बेस्ट सेलर ‘दी मैटरीज़ सर्किल’ भी इल्युमिनाटी, मायर रॉथ्सचाइल्ड जैसे चरित्रों और कुबेरतंत्र के खतरों में खेलता एक रोचक पाठ है. विश्व-व्यवस्था में सचमुच इल्युमिनाटी की कोई भूमिका रही भी या नहीं, या उन्होंने अपने लाभ के लिए तख्तापलट से लेकर जाने-माने राजनेताओं की हत्याएं करवाई अथवा नहीं, पूरी दुनिया की राजनीति और अर्थव्यवस्था को अपनी चेरी बनाकर रखा या नहीं- इस पर कयास लगते रहेंगे, कहानियां बनती रहेंगी. किंतु अंतरात्मा विहीन, विवेकहीन धनकुबेरों के कारनामे जगजाहिर हैं. 18वीं सदी से उभरता यह नव कुबेरतंत्र ग्रीस, कार्थेज, रोम या जापान के प्राचीन कुबेरतंत्रों से इस मामले में भिन्न था कि वे सत्ता और सरकारों का नियंत्रण पर्दे के पीछे रह सुरक्षित दूरी से करने लगे थे. रजवाड़ों को धन-बल-छल से प्रभावित कर लेना बहुत आसान था. लोकतांत्रिक राज्यों में भी ज्यादा कुछ मुश्किल नहीं हुई. अब तो दस-बीस हजार करोड़ के चुनावी चंदे देकर सरकारों पर काबिज हो जाने से ज्यादा सुरक्षित और सस्ता सौदा और क्या हो सकता है? फिर जनता का गुस्सा झेलने के लिए चौड़े सीने वाले नेतागण तो खड़े ही हैं. हालांकि इस लीक से थोड़ा हटकर नव-कुबेर डॉनल्ड ट्रम्प ने सीधे सत्ता पाने के लिए खुद को अमेरिकी राष्ट्रपति पद के लिए प्रस्तुत कर डाला है.

इस क्रूर निरंकुश, स्वार्थी और रोज परिष्कृत होते कुबेरतंत्र का सबसे उपयुक्त उदाहरण रॉथ्सचाइल्ड खानदान है जिसकी शुरूआत 1744 में फ्रैंकफर्ट में जन्मे मायर एमशेल रॉथ्सचाइल्ड से हुई. जर्मन भाषा में रॉथ्सचाइल्ड को रोटशील्ड कहते हैं जिसका अर्थ होता है- लाल रंग की ढाल. एक दरबारी यहूदी होने के नाते मायर रॉथ्सचाइल्ड राजघराने के सदस्यों की संपत्ति का प्रबंधन करता था. बदले में उसे वे सारी सुविधाएं और अवसर मिलते थे जिनसे पृथक-बस्तियों में रहने वाले यहूदी पूरी तरह से वंचित थे. हालांकि मायर एमशील्ड की पैदाइश भी एक घेटो में ही हुई थी. मायर रॉथ्सचाइल्ड का जीवन दर्शन था- ‘मुझे किसी भी देश की मुद्रा पर नियंत्रण दे दो, फिर वहां का कानून कौन बनाता है- मुझे इसकी परवाह नहीं होगी.’ आज के दिन 350 बिलियन डॉलर से अधिक की संपत्ति वाले इस परिवार को अपने रसूख की वजह से शुरूआती दिनों में ही फ्रांसीसी क्रांति में बहुत आर्थिक लाभ हुआ. फिर ऑइस्ट्रियन सेना को बेची गई रसद, वर्दी, घोड़े और युद्ध के साजो-सामान से उन्होंने अकूत संपत्ति अर्जित की. ‘हेशियन’ भाड़े के सिपाहियों से भी उन्होंने खूब धन कमाया और अपने पांच बेटों को फ्रैंकफर्ट, नेपल्स, वियेना, लंदन और पेरिस भेजकर रॉथ्सचाइल्ड बैंकों की स्थापना की. अब पूरी दुनिया उनके इशारों पर नाच रही थी. अनेक लोगों का मानना है कि रॉथ्सचाइल्ड खानदान ने कई राज्याध्यक्षों की हत्याएं करवाईं. इजरायल की स्थापना के पीछे वे सबसे बड़ी ताकत थे. अपने शत्रुओं के दमन के लिए उन्होंने हर तरह के हथकंडों का इस्तेमाल किया. वाटरलू की लड़ाई में नेपोलियन पर वेलिंग्टन की विजय को रॉथ्सचाइल्ड ने अपने चतुर जासूसों की मदद से पहले जान लिया था. उन्होंने फ्रांसीसी कंपनियों के शेयर समय रहते बेच अकूत मुनाफा कमाया. कुछ का तो यहां तक मानना है कि खुद यहूदी होते हुए भी रॉथ्सचाइल्ड कुनबे के लोग ही नात्सी जर्मनी में यहूदियों के सर्वनाश का कारक बने.

इनमें से तथ्य जो भी हो, जितना भी हो, किंतु यह सच है कि इन धन-कुबेरों को कोई फर्क नहीं पड़ता कि युद्ध में कौन जीतता या हारता है, कौन जीता या मरता है. इन्हें हर स्थिति में अपने मुनाफे से ही मतलब रहता है. युद्ध भी यही पैदा करते हैं, उसका साजो-सामान और हथियार भी यही बेचते हैं, फिर घायलों के उपचार में इनकी ही बीमा-कंपनियां और अस्पताल मरहम-पट्टी बेचकर मुनाफा कमाते हैं और घडि़याली आंसू भी इनकी ही दुकानों से खरीदे जा सकते हैं.

हिटलर से बहुत पहले ही लगभग 1910 से अमेरिका के जे.डी. राकफेलर और केलॉग जैसे धनपति ईयूजेनिक विज्ञान के विकास के प्रबल समर्थक और पोषक थे. जिसका उद्देश्य एक ‘स्वामी-प्रजाति’ पैदा करना और निम्न जातियों का खात्मा करना था. रॉथ्सचाइल्ड की तरह राकफेलर ने भी हर तरह के गैरकानूनी और अमानवीय हथकंडे अपनाए. मजदूरों को कुचलने के लिए निजी सेनाओं तक का इस्तेमाल किया. अपने विरोधियों के खात्मे में हर संभव नीचताएं कीं. अपनी चमकदार छवि बनाने के लिए पब्लिक रिलेशन इंडस्ट्री की शुरुआत की. ये तमाम धनकुबेर विश्व भर के मीडिया को अपनी मुट्ठी में कर चुके हैं और अपनी छद्म छवि बनाने से लेकर झूठा इतिहास गढ़ने की सारी तरकीबें आजमाते रहे हैं. सन् 2007 में मणिरत्नम की ‘गुरु’ नाम की फिल्म आई थी जिसमें एक जाने-माने अनैतिक मुनाफाखोर को गांधी और नेहरू से बड़ा जनसेवक बताने का प्रयास किया गया था जबकि तथ्य यह है कि हमारे मुल्क में इन कुबेरों में शायद ही कोई ऐसा मिलेगा जो गर्दन तक गंदगी में न डूबा हुआ हो और जो हर तरह के गैरकानूनी कामों में न लिप्त हो. प्राकृतिक संसाधनों, बिजली और करों की चोरी से लेकर तस्करी और हत्याओं तक.

1936 में डैनियल गुएरिन ने अपनी किताब ‘फासिज्म एंड बिग बिजनेस’ में और बाद में अमेरिकी राष्ट्रपति ड्वाइट आइजनहॉवर ने अपने 1961 के विदाई भाषण में सेना, सैन्य-उद्योग और राजनीति के अपवित्र गठबंधन के खतरों से अपने मुल्क को आगाह किया था. हमारे मुल्क में चूंकि सैन्य उद्योग या उद्योग ही बहुत मामूली-सा है, हम इसकी जगह ‘धंधेबाज’ शब्द का इस्तेमाल कर सकते हैं. सचमुच यह गठबंधन एक अभेद्य लौह त्रिकोण है जिसमें भारी-भरकम चंदे हैं, मुंहमांगी ठीकेदारी है, बिके हुए नेता और अफसर हैं और निरंतर-चिरंतर जारी जंग है. दुर्भाग्य से अमेरिका सहित पूरी दुनिया ने आइजनहॉवर की चेतावनी पर ध्यान नहीं दिया. देते भी कैसे? जब जनचेतना का रखवाला मीडिया भी उन लोगों के कब्जे में हो जो सिर्फ अपनी शर्तों पर युद्ध और शांति चाहते हैं ताकि वे अधिक से अधिक मुनाफा कमा सकें. नोम चोमस्की का भी मानना है कि अमेरिका मूलतः एक कुबेरतंत्र है जो लोकतांत्रिक बनावट का है.

यह स्पष्ट होता जा रहा है कि कुबेरतंत्र के दबावों में लोकतंत्र हार चुका है. जब सरकारों को धंधेबाज नियंत्रित करने लगें, जब अंतरराष्ट्रीय संबंध उनके प्रभाव से बनने-बिगड़ने लगें तो संदेह नहीं रह जाना चाहिए कि हम किस तरह की व्यवस्था में जी रहे हैं. वरना क्या कारण था कि तब जबकि भारत-पाकिस्तान के बीच कोई अधिकारिक सौहार्द्र कायम नहीं हुआ हो और जब हाल-फिलहाल तक विरोधी स्वरों को पाकिस्तान भेज देने की गालियां उगली जा रही हों- ऐसे असहज वक्त में जिंदल महोदय प्रधानमंत्री की रहस्यमयी ‘औचक’ पाकिस्तान यात्रा पर वहां उनकी अगवानी करने को पहले से खड़े थे!

sanjay jee

संजय सहाय

संजय सहाय. चर्चित कथाकार, फिल्मकार और हंस के संपादक. चित्रकला और फिल्मों में अद्भुत रूचि. आप उनसे sanjaysahay1@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

साभार- हंस, फ़रवरी, 2016.

‘निपट मानव, अतर्क्य’ गांधी: चंदन श्रीवास्तव

महात्मा गांधी से प्रभावित अंग्रेजों की ना तो गांधी के जीवित रहते कमी थी और ना ही आज. और, गांधी-कथा का वैचित्र्य देखिए कि गांधी के असर में आये अंग्रेजों को, ब्रिटिश सत्ता से लड़ाई के उन दुश्वार दिनों में भी लगता था कि गांधी को समझना मुश्किल है और यही स्थिति आज भी है, जब भारत आजाद होकर ब्रिटिश-साम्राज्य के अधीन रहे ‘राष्ट्रकुल’ के देशों में प्रेम-भाव से शामिल है. मिसाल के लिए आज की ब्रिटिश संसद के नेता-प्रतिपक्ष जेरेमी कोर्बिन या बीते कल में ब्रिटिश-सत्ता का हिस्सा रहे साहित्यकार-पत्रकार जार्ज ऑरवेल का नाम लिया जा सकता है. #लेखक 

By R.K. Lakshman

By R.K. Lakshman

गांधी: प्रश्न भी, समाधान भी !
जेरेमी कोर्बिन ब्रिटेन की लेबर पार्टी के नये नेता चुने गये हैं. इस साल सितंबर के पूरे महीने हिन्दुस्तानी अखबारों के विदेश से संबंधित पन्नों पर कोरिबन की चुनावी जीत की खूब चर्चा हुई. तकरीबन तीन दशक से ब्रिटेन के हाऊस ऑफ कॉमन्स में सांसद की हैसियत से मौजूद जेरेमी कोर्बिन की जीवन-कथा के अनेक प्रसंग अनायास ही गांधी की याद दिलाते हैं. गांधी के बारे में मशहूर है कि वे भरसक रेलगाड़ी के साधारण डिब्बे में चलना पसंद करते थे और यही हाल कोर्बिन का है. वे साइकिल से चलते हैं, कार नहीं रखी और चुनाव-प्रचार की घड़ी में एक तस्वीर ऐसी भी छपी जिसमें वे ब्रिटेन की भीड़ भरी लेटनाइट बस में जन-साधारण के बीच इस इंतजार में खड़े नजर आये कि कोई सीट खाली हो तो छियासठ साल के अपने बुढ़ापे की थकान को उसपर संयत कर सकें. गांधी ने बैरिस्टरी की पढ़ाई के लिए ब्रिटेन जाने को आतुर अपने बड़े बेटे हरीलाल को रोककर पारिवारिक जीवन में कटुता पैदा की. उन्हें लोगों से कहना पड़ा कि ‘हरीलाल की परेशानी से पार पाना उनके लिए आजादी की लड़ाई लड़ने से ज्यादा कठिन है’. बच्चे की पढ़ाई को लेकर कोर्बिन ने भी अपने पारिवारिक जीवन में कड़वाहट घोली है. पत्नी से उनकी अनबन इस बात को लेकर हुई कि पढ़ाई के लिए बच्चे का नाम किस स्कूल में लिखवायें. पत्नी एक महंगे स्कूल में बच्चे का नाम लिखवाना चाहती थीं जबकि कोर्बिन सरकारी स्कूल में नाम लिखवाने के हक में थे. समाजवाद के अपने सिद्धांत से निजी जीवन में ना डिगने का व्रत लिए बैठे जेरेमी कोर्बिन का इस बात पर पत्नी से मतभेद इतना बढ़ा कि नतीजा तलाक के रुप में सामने आया.
गांधी निजी और सार्वजनिक जीवन में बाकी बातों के साथ-साथ अपनी किफायतशारी के लिए भी जाने जाते हैं.गांधी-प्रेमी बताते हैं कि गांधीजी ने अनेक चिट्ठियां इस्तेमालशुदा लिफाफों की खाली जगह पर लिखी और फाउंटेन पेन आ जाने के बावजूद सैकड़ों चिट्ठियों को लिखने में दावात में डुबोकर लिखनेवाली कलम का ही इस्तेमाल किया कि खर्चा कम पड़ेगा. कम-खर्ची गांधी की राजनीति से इस हद तक बंधी है कि स्वराज्य के मायने तलाशने के लिए 21 वीं सदी में बारंबार पढ़ी जाने वाली उनकी किताब हिन्द-स्वराज में आता है—‘जब तक हम हाथ से आलपिन नहीं बनायेंगे तबतक हम उसके बिना काम चला लेंगे. झाड़-फानूस को आग लगा देंगे. मिट्टी के दीये में तेल डालकर और हमारे खेतों में पैदा हुई रुई की बत्ती बनाकर दीया जलायेंगे. ऐसा करने से हमारी आंखे(खराब होने से) बचेंगी, पैसे बचेंगे, हम स्वदेशी रहेंगे, बनेंगे और स्वराज की धूनी रमायेंगे..’ कोर्बिन की किफायतशारी इस दर्जे की तो नहीं तब भी इतनी तो है ही कि ब्रिटेन के अख़बारों ने उन्हें निजी जरुरत के नाम पर राजकोष से सबसे कम खर्च लेने वाले सांसद के रुप चिह्नित किया . सांसदों के अनाप-शनाप खर्च के दावों और घोटालों से जूझती ब्रिटेन की संसद से जेरेमी कोर्बिन ने साल 2010 में  मई से अगस्त के बीच एक सांसद के रुप में अपने प्रिन्टर के लिए सिर्फ स्याही का खर्चा मांगा था.
जेरेमी कोर्बिन के जीवन-प्रसंगों से गांधी के जीवन-प्रसंगों के बीच तारतम्य बैठाने की यह कोशिश अगर ठीक ना लगे तो यह सोचकर दिल बहलाया जा सकता है कि दोनों के बीच एक रिश्ता फिर  भी बनता है क्योंकि कोर्बिन कोगांधी फाउंडेशन ने दो साल पहले अपने अंतर्राष्ट्रीय शांति सम्मान से नवाजा और प्रशस्ति में कहा कि कहा कि यह सम्मान कोर्बिन को सांसद के रुप में तीस साल तक  ‘सामाजिक न्याय और अहिंसा जैसे गांधीवादी मूल्यों के लिए लगातार कोशिश’ करते रहने के लिए दिया जा रहा है. सम्मान को स्वीकार करते वक्त कोर्बिन ने अपने गांधी-प्रेम में जो कुछ कहा उसमें मार्के की एक बात यह भी शामिल थी कि ‘गांधी उन लोगों में एक हैं जिनको लेकर  लगता है कि हम तो उन्हें जानते हैं लेकिन गांधी को जितना पढ़ो उतना ही मन में यह बोध गहरा होता जाता है गांधी के बारे हम बहुत कम जानते और समझते हैं ’.
जेरेमी कोर्बिन का एक अनौपचारिक रिश्ता जार्ज ऑरवेल से भी बनता है. नौजवान होते कोर्बिन को पिता ने सोलहवें जन्मदिन पर ऑरवेल के लेखों की एक किताब भेंट की थी. यह तो दावा नहीं किया जा सकता कि गांधी की आत्मकथा की समीक्षा के बहाने लिखा गया ‘रिफ्लेक्शन्स ऑन गांधी’ नाम का ऑरवेल का लेख उस किताब में शामिल था या नहीं लेकिन यह जरुर कहा जा सकता है कि गांधी को लेकर जैसा ऊहा-पोह कोर्बिन के भाषण में है कुछ वैसी ही मनोदशा लेख में ऑरवेल की है. ऑरवेल गांधी को शब्द-बद्ध करने के लालच से बच भी नहीं सकते थे. आखिर उनका जन्म इंडियन सिविल सर्विस के एक महकमे(अफीम) में करने वाले नौकरशाह के घर बेटे के रुप में हुआ और खुद भी म्यांमार(तत्कालीन बर्मा) में इंडियन इम्पीरियल पुलिस में एक वक्त तक मुलाजिम थे.( नियति का विधान कहिए कि ऑरवेल का जन्म मोतिहारी में हुआ जहां से गांधी की आंदोलन-भूमि रहे चंपारण की दूरी कायदे से पचास किलोमीटर भी नहीं). गांधी की आत्मकथा को पढ़कर ऑरवेल के मन में वही शंका जागती है जो शासक और संत या कह लें त्याग और भोग के बीच फर्क देखने वाले लोगों के मन में जागा करती है. उनका लेख इस केंद्रीय प्रश्न से शुरु होता है कि गांधी संत हैं या राजनेता. ऑरवेल को लगता है गांधी का मूल्यांकन यह प्रश्न पूछकर होना चाहिए कि इन बुजुर्ग ने चटाई पर पालथी मार, प्रार्थना में डूबकर हासिल की जाने वाली ‘अध्यात्म की शक्ति से ब्रिटिश-साम्राज्य को कहां तक हिलाया और “राजनीति में घुसकर, जो कि स्वभाव से ही ताड़न और छल-छद्म से बंधी है अपने सिद्धांतों के साथ कहां तक समझौता किया.” ऑरवेल को लगता है कि गांधी ने आत्मकथा अपनी संतई के पक्ष में लिखी है क्योंकि वह पाठक को “याद दिलाती है कि इस संत के भीतर बहुत चतुर और समर्थ आदमी छुपा था जो चाहता तो एक सफल वकील, प्रशासक या फिर बनिया बनकर उभरता.” गांधी को संसारी बनाम संन्यासी के द्वैत में देखने के कारण ऑरवेल को इस बात का मलाल है कि पश्चिम की वामधारा की राजनीति में यह मानने का फैशन-सा चल पड़ा है कि गांधी उसके एक तरह से ‘अविभाज्य हिस्से हैं. खासकर, शांतिवादी और अराजकतावादी यह देखकर कि गांधी केंद्रीकरण और राजसत्ता के हिंसाचार के विरोधी थे, उन्हें अपना मान बैठते हैं और गांधी के सिद्धांतों के अ-संसारीपन और मानवता-विरोधी प्रवृतियों की अनदेखी करते हैं.’ कहना मुश्किल है कि पश्चिम की वामधारा की राजनीति से जुड़े कोर्बिन के मन में गांधी के सिद्धांतों के संदर्भ में ऑरवेल द्वारा प्रयुक्त शब्द ‘मानवता-विरोधी’ को पढ़कर क्या प्रतिक्रिया होगी लेकिन अगर यह शब्द आंखों को खटके तो फिर खटक को दूर करने का एक सूत्र ऑरवेल के लेख में ही मौजूद है. गांधी की संतई पर कटाक्ष करते हुए ऑरवेल लिखते हैं- ‘ बेशक, दारु, तंबाकू जैसी चीजों से किसी संत को जरुर ही बचना चाहिए लेकिन संतई ऐसी शै है जिससे मनुष्य-मात्र को बचना चाहिए.’
अगर गांधी के संदर्भ में बहु-प्रयुक्त संत बनाम राजनेता का यही द्वैत विदेश में आज के कोर्बिन और बीते कल के ऑरवेल के लिए गांधी को अबूझ बनाता है तो देश में गांधी की राजनीति के संगी-साथियों या फिर संगी-साथियों से समानान्तर दूरी बनाकर गांधी की राजनीति को साक्षी-भाव से देखने वाले साहित्यकारों को भी. नेहरु ने स्वीकार किया है कि ‘गांधी को समझ पाना बहुत मुश्किल है. कभी-कभी उनकी भाषा एक औसत आधुनिक के लिए तकरीबन अबूझ हो जाती है.’’ ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्जे मैक्डोनाल्ड ने जब वंचित तबकों के लिए पृथक निर्वाचक-मंडल की मंजूरी दी और गांधी ने विरोध में आमरण-अनशन की ठानी तो नेहरु को अचरज हुआ. गांधी के इस फैसले को याद करते हुए उन्होंने लिखा है- “राजनीतिक प्रश्नों पर उनके धार्मिक और भावुक रुख और इस मामले में बार-बार ईश्वर की दुहाई देने को लेकर मुझे  क्रोध आता था. वे तो  यह जताता जान पड़ते थे कि ईश्वर ने उन्हें उपवास के दिन के बारे में संकेत किया है. कितनी खराब बात है यह !.”
‘संत होकर आधुनिक नहीं हुआ जा सकता और चूंकि आधुनिक नहीं हुआ जा सकता इसलिए व्यक्ति-सत्ता को प्रतिष्ठित करने वाली लोकतांत्रिक राजनीति भी नहीं की जा सकती’—इस सोच ने गांधी के संगी-साथियों की आंखों में गांधी को अबूझ बनाया. नेहरु के प्रतिस्पर्धियों में से एक आचार्य कृपलानी की गांधी पर लिखी किताब ‘गांधी: हिज लाइफ एंड थॉट’ के एक अध्याय का शीर्षक ‘वाज गांधीजी माडर्न’ बहुत कुछ यही बताता प्रतीत होता है. कृपलानीगांधी के अन्यतम साथियों में हैं. ‘भारत का भावी प्रधानमंत्री कौन’- इस सवाल पर आजादी की विहान-वेला में जब कांग्रेस के भीतर मतदान हुआ तो सरदार पटेल के बाद आचार्य कृपलानी के पक्ष में सर्वाधिक मत पड़े थे लेकिन गांधीके निर्देश पर दोनों ने नेहरु के पक्ष में अपना नाम वापस लिया था. कहते यह भी हैं कि गांधी के ‘गांव-गणराज्य’ के सपने से कांग्रेस को दूर जाता देखकर उन्होंने पार्टी छोड़ी और अपने को ‘कुजात गांधीवादी’ कहने वाले लोगों की राजनीतिक-धारा में शामिल हुए. जीवन की आखिरी सांस भी उन्होंने साबरमती आश्रम में ली.
नेहरु की पश्चिमी तर्ज की आधुनिकता पर किसी और को कोई शक हो तो हो लेकिन कृपलानी के मन में रंच-मात्र ना था. उन्होंने नेहरु की पश्चिमी काट की आधुनिकता को गांधी की देशज आधुनिकता के बरक्स रखकर चुटकी लेते हुए लिखा है—“जवाहरलाल के सोच की धारा पश्चिमी थी, उनकी जीवन-दृष्टि दोलायमान थी, कभी भारत की तरफ डोल जाती थी तो कभी पश्चिम की तरफ. जन-साधारण के मुहावरे में व्यक्त गांधीजी के विचार पश्चिम से बहुधा प्रभावित होने के बावजूद मुख्य रुप से भारतीय थे.” दिलचस्प यह है कि गांधी को आधुनिक बताने के लिए जब वे दलील देते हैं तो उनका चित्त भी उसी तरह दोलायमान होता है जैसा कि उन्होंने नेहरु के संदर्भ में लक्ष्य किया है और वे गांधी के ‘सत्य’ की खोज को गुण-धर्म में प्रयोगशालाओं की परखनली में खोजे जाने वाले वैज्ञानिकों के सत्य के बराबर मान बैठते हैं, मानो अंतिमत्ता का दावा ना करने भर से प्रयोगशालाओं का सत्य उसी तरह ईश्वर में विश्वास की निष्पत्ति हो जैसे कि गांधी का सत्य.
कृपलानी लिखते हैं कि गांधीजी अरुप ईश्वर के विश्वासी थे लेकिन “क्या ईश्वर में विश्वास तर्कयुक्ति(रैशनलिटी) और विज्ञान(साईंस) के विरुद्ध है? सभी महान वैज्ञानिक नास्तिक हैं. वे मानते हैं कि सब कारणों के एकमात्र कारण जो स्वयं कारणहीन हैं, से विज्ञान का कोई लेना-देना नहीं है. दरअसल, आज के वैज्ञानिकों ने तो कारणता के विचार को ही छोड़ दिया है. वे मात्र परिवर्तन की प्रक्रियाओं को खोजते और पकड़ते हैं. न्यूटन, आईन्सिटीन, जे सी बोस, रमण और कई अन्य ईश्वर में विश्वास के पक्षधर हैं, वे सिर्फ प्रयोगशालाओं के भीतर ईश्वर को लेकर नहीं जाते और उनकी खोज सत्य की खोज थी जो कि गांधी के अनुसार ईश्वर है !” चूंकि विज्ञान का सत्य प्रयोग का विषय है, उसका बारंबार प्रक्रियाबद्ध अनुसंधान किया जाता है, वह अंतरिम ही होता है, अंतिम नहीं और गांधी के सत्य के प्रयोग में भी अनिवार्य रुप से यही गुण मिलते हैं इसलिए गांधी आधुनिक मानव हैं, चिर-पुरातन का साक्ष्य देते महात्मा नहीं— कृपलानी के इस तर्क का एक इस्तेमाल गांधी के अध्येता भीखू पारेख ने भी किया है. इस तर्क की मुश्किल यह है कि अंतिम तौर पर वह आधुनिकता के मूल्यों को विज्ञान से ही सिद्ध मानता है धर्म से नहीं और दूसरे स्वयं गांधी का लिखा-कहा इस स्थापना से मेल नहीं खाता. गांधी सत्य की अपनी तलाश को ईश्वर की अपनी धारणा की अनिवार्य निष्पत्ति बताते हैं.
गांधी के सत्य के बारे में जो बात राजनेता आचार्य कृपलानी और राजनीति-विज्ञानी भीखू पारेख नहीं लक्ष्य कर पाये आश्चर्यजनक तौर पर वह बात गांधी-भावी साहित्यकार जैनेन्द्र ने भांप ली थी. लगभग पाँच दशक पहले छपी किताब ‘अकालपुरुष गांधी’ में जैनेन्द्र के गांधी विषयक सोच-विचार संकलित हैं. किताब की प्रस्तावना के लेखक धर्मवीर ने नोट किया है कि जैनेन्द्र की गिनती हालांकि गांधीवादियों में होने लगी है लेकिन वादी तो क्या जैनेन्द्र अपने को ‘गांधी का अनुयायी कहने में भी संकोच’ करते हैं और जैनेन्द्र की विशिष्टता के उल्लेख में लिखा है कि वे ‘उन चिन्तक साहित्यकारों में हैं जिन्होंने अपनी निजता खोये बिना गांधी-विचार को जांचा परखा है ’. किताब में एक लेख है ‘निपट मानव गांधी’. लेख का शीर्षक अपने आप में इस बात की सूचना है कि लेखक ने गांधी के ऊपर महात्मा का चोला नहीं ओढ़ाया बल्कि उन्हें ‘निपट मानव’ ही मानकर सोच-विचार किया है. गांधी ने स्वयं के किसी अनूठेपन या मौलिकता का दावा नहीं किया लेकिन जैनेन्द्र को गांधी में अनूठापन दिखता है अनूठापन इस बात का कि गांधीको “विज्ञान और शास्त्र ना ढंक पाता है, ना खोल ” पाता है. इसलिए “गांधी को वैज्ञानिक प्रणालियों से पाना अंसभव” है  जैनेन्द्र को लगता है कि गांधी सांसारिक नियमों के अनुसार नहीं हैं. सांसारिकों के बारे में तो “मनस्तत्व विज्ञानी वे नियम प्रस्तुत कर सके हैं जो बता देते हैं कि एक आदमी और सब आदमी क्यों और किन प्रेरणाओं के अधीन विविध वर्तन कर रहे हैं ” लेकिन गांधी बारे में यह नहीं बताया जा सकता. गांधी विरले लोगों में हैं, जैनेन्द्र के शब्दों में—“अतर्क्य पुरुष” जिनकी “कुंजी लाख खोजने पर भी दुनिया की नजर में नहीं चढ़ती ”.
गांधी को अतर्क्य पुरुष क्यों कहा जैनेन्द्र ने ? वे गांधी का ईश्वर विषयक कथन उद्धृत करते हैं—“गांधीजी ने एक बार कहा मेरा सबकुछ ले लो मैं रहूंगा. हाथ काट लो, आँख कान ना रहें तब भी रहूंगा. सिर जाये तब भी कुछ पल रह जाऊं. पर ईश्वर गया कि तब तो मैं उसी दम मरा हुआ हूं.” गांधी का ईश्वर विषयक यह कथन ही उनके अतर्क्य होने का कारण है. जैनेन्द्र के शब्द हैं- “यह बात पढ़ने में चमत्कारी लगती है पर समझ में भी वह बंधकर बैठती है क्या. ईश्वर के मंदिर हों और उसकी पूजा हुआ करे, यहां तक तो ठीक है. इससे आगे नित्य-प्रति के काम से संबंध रखने वाली बुद्धि और तर्क की भाषा इस ईश्वर को अपने में कहां बैठाये. परिणाम यह कि समूचे जीवन की वह नीति जो ईश्वर-पूर्वकता से आरम्भ होती है गांधीजी तक सीमित जान पड़ती है. व्यवहार से गांधी जी की समाज-नीति अनमिल और असिद्ध लग आती है. उसमें तर्क का साफ सूत नहीं मिलता. लौकिक और गांधीजी के बीच का यह भेद मौलिक है. किसी तरह के ऊपरी तर्क से इस भेद को उड़ा देना खतरनाक हो सकता है.”
इस भेद को दुनिया उड़ा देती है इसी कारण गांधी को समझ नहीं पाती—“धर्मवादी और ईश्वरवादी जो संसार को बंधन मानकर उनसे उत्तीर्ण होना चाहता है गांधीजी की तरफ आशा भरी निगाह से देखता है. पर यही पवित्रता का साधक उस समय गांधीजी को नहीं समझ पाता जब वे राजनीति के प्रपंचों में दीखते हैं और तरह तरह के कर्म की विराट योजनाओं का संचालन करते हैं. दूसरी और संसार में(उसके सुधार में) लगे हुए प्रकार-प्रकार के वादी कर्मीजन इस कर्मण्य और प्रतापी पुरुष गांधी को देखकर उत्साहित होते हैं. जो सत्ता उन्हें इष्ट है वह गांधी जी को सिद्ध है. फिर भी राज को लेकर जो तरह-तरह के तंत्रवाद मिलते हैं और समाज के निमित्त से जो समाजवाद और साम्यवाद मिलते हैं,उनमें से किसी एक को छोड़कर किसी दूसरे का समर्थन गांधीजी से नहीं मिलता.” जैनेन्द्र का निष्कर्ष है कि “जीवन के विभक्त दर्शनों के लिए, अध्यात्मवाद और भौतिकवाद के लिए, गांधी एक ही साथ प्रश्न और समाधान हैं. राजनीति और धर्म में भेद है, विग्रह भी है. लेकिन गांधीजी उन दोनों के अभेद हैं और संग्रह हैं. वह जीवित उदाहरण हैं इस सत्य के कि जीवन संयुक्त, समग्र और सिद्ध है तो वहां जहां वह निस्व है…इस मूल निष्ठा को पाकर फिरगांधीजी का बस एक प्रयत्न रहा है. वह यह कि अपने समूचेपन और तन को लेकर उस निष्ठा से तत्सम हो जायें…इस तरह दुनिया में रहकर गांधीजी सदा परीक्षा में हैं और उनके हाथो में राजनीति भी सदा परीक्षा में.”
अद्भुत रुप से जैनेन्द्र के इस गांधी-विवेचन में गांधी के एक आत्म-वक्तव्य की गूंज सुनायी देती है. ‘निपट मानवगांधी’ शीर्षक लेख के लिखे जाने के बरसों पहले यह आत्म-वक्तव्य गांधी ने डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन को उनके प्रश्न के उत्तर के रुप में दिया था. यह छपा ‘कंटेपररी इंडियन फिलॉस्फी’ नाम की किताब में. किताब लंदन में 1936 में डा राधाकृष्णन के संपादन में छपी. छापने का उद्देश्य था “पूरब और पश्चिम के समग्र मानस की श्रेष्ठतर पारस्परिक समझ” बनाना. और इस उद्देश्य की पूरा करने के लिए भारत के तत्कालीन प्रतिनिधि दार्शनिक के तौर पर महात्मा गांधी, रबीन्द्र टैगोर, स्वामी अभेदानंद, हरिदास भट्टाचार्य, के सी भट्टाचार्य, जी सी चटर्जी, आनंद कुमारस्वामी, एन जी दामले, भगवान दास, रास बिहारी दास और सुरेन्द्रनाथ दासगुप्ता समेत पच्चीस चिन्तकों के आलेख छापे गये.  पहला ही तकरीबन 500 शब्दों का आलेख आत्म-वक्तव्य के रुप में गांधी का है. गांधी के इस आत्म- वक्तव्य को महत्वपूर्ण मानने की वजह है इसका परिवेश. गांधी ने यह आत्म-वक्तव्य किसी तात्कालिक राजनीतिक समस्या के दबाव में प्रस्तुत नहीं किया था. ना ही यह वक्तव्य पक्ष-प्रतिपक्ष के वैसे द्वन्द्व का परिणाम है जैसा कि गांधी की किताब हिन्द स्वराज में देखने को मिलता है. हिन्द-स्वराज के पात्र ‘संपादक’ और ‘पाठक’  के वाद-विवाद अपने पैनेपन में भले बेजोड़ लगें लेकिन वहां तर्कों का पैनापन प्रतिपक्षी को तर्क के सहारे ध्वस्त करने की मंशा का परिणाम है, सत्य के भावना-निरपेक्ष अनुसंधान का नहीं. हिन्द-स्वराज में घोषित तौर पर द्वन्द्व पूरब और पश्चिम के बीच है जबकि ‘कंटेपररी इंडियन फिलॉस्फी’ का घोषित उद्देश्य ‘पूरब और पश्चिम के समग्र मानस की श्रेष्ठतर समझ’ बनाना है.
‘कंटेपररी इंडियन फिलॉस्फी’ के लिए राधाकृष्णन ने गांधी से तीन सवाल पूछे थे- (क) आपका धर्म क्या है, (ख) आप धर्म में कैसे प्रवृत्त हुए, और (ग) सामाजिक जीवन पर इसका क्या असर रहा है ? प्रश्नों की प्रकृति से ही संकेत मिलते हैं राधाकृष्णन ने गांधी को धर्मप्राण मानकर सवाल किए. गांधी का उत्तर इसके अनुकूल ही था. गांधी ने पहले सवाल के जवाब में लिखा “मैं धर्म से हिन्दू हूं जो मेरे लिए मानवता का धर्म है और जिसमें मुझे ज्ञात सारे धर्मों का श्रेष्ठतम् शामिल है. ” दूसरे प्रश्न के उत्तर में बताया—“मैं इस धर्म में सत्य और अहिंसा यानी व्यापक अर्थों में प्रेम के रास्ते प्रवृत्त हुआ. यह कहने की जगह कि ‘ईश्वर सत्य है’, हाल-फिलहाल मैंने अपने धर्म को परिभाषित करने के लिए ‘सत्य ईश्वर है’ कहना शुरु किया है… क्योंकि ईश्वर का नकार तो ज्ञात है लेकिन सत्य का नकार नहीं. यहां तक कि मनुष्यों में जो सर्वाधिक अज्ञानी हैं, उनमें भी कुछ सत्य है. हम सब सत्य की कौंध हैं. इस कौंध का सकल-समग्र अनिर्वचनीय -अब तक अज्ञात सत्य, जो कि ईश्वर है. मैं अनवरत प्रार्थना के सहारे रोज ही इसके निकट पहुंचता हूं.” और तीसरे प्रश्न के उत्तर में गांधी ने बिल्कुल उसी शब्द का प्रयोग किया जिसका अपने गांधी-विवेचन में जैनेन्द्र ने किया है.गांधी ने कहा—“ऐसे धर्म के प्रति सच्चा होने के लिए प्रत्येक जीवन की अनवरत-अविराम सेवा में स्वयं को निस्व करना पड़ता है. सत्य का साक्षात्कार जीवन के अनंत सागर में विलीन हुए और इससे तदाकार हुए बिना असंभव है, इसलिए समाज-सेवा से मेरी निवृति नहीं है.”
गांधी नाम की जो पहेली गांधी के अनुगामियों और अध्येताओं के बीच उलझती जाती है, जैनेन्द्र जैसा सरीखा अपनी निजता को बरकरार रखने वाला साहित्यकार उसे सुलझा लेता है. क्या यह भी कवि के रवि से आगे होने का एक साक्ष्य नहीं है !

चंदन श्रीवास्तव

चंदन श्रीवास्तव

मूलतया छपरा (बिहार) के निवासी, पिछले पंद्रह सालों से दिल्ली में। आईआईएमसी और जेएनयू में पढ़ाई। “उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हिन्दी लोकवृत्त का निर्माण” शीर्षक से पीएचडी, दिल्ली के कॉलेजों में छिटपुट अध्यापन, फिर टीवी चैनल की नौकरी और अब विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सीएसडीएस) की एक परियोजना इंक्लूसिव मीडिया फॉर चेंज से जुड़े हैं। इनसे  chandan@csds.in पर संपर्क संभव है। 

कविता की अवांगार्द परंपरा: हरी चरन प्रकाश

मेकिंग इट न्यू : मॉडर्निज़्म इन मलयालम, मराठी ऐन्ड हिन्दी पोएट्री  का प्रकाशन इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ़  एड्वान्सड् स्टडी द्वारा वर्ष 1995 में किया गया है। इसके लेखक ई. वी. रामकृष्णन हैं। भारतीय साहित्य के अध्येताओं के लिए ई. वी. रामकृष्णन एक जाना पहचाना नाम है। 2005 में उनके द्वारा चुनी गई कहानियों (1900-2000) का एक संकलन, साहित्य अकादमी ने प्रकाशित किया है। ई.वी.आर. अंग्रेजी में लिखते हैं।

प्रस्तुत पुस्तक मलयालम, मराठी और हिन्दी की आधुनिकतावादी कविता की सामाजिकी के मूल्यांकन का एक प्रयास है। लेखक का यह मानना है कि भारतीय कविता में आधुनिकतावाद कोई एकनिष्ठ आन्दोलन नहीं रहा है। उन्होंने कविता के उच्च आधुनिकतावादी महानगरीय मुहावरे और अवांगार्द कवियों के आमूलचूल परिवर्तनवादी (रेडिकल) स्वरों के बीच जो वैचारिक द्वन्द है, उसकी पहचान की है। मलयालम, मराठी और हिन्दी की काव्य परम्परा में आधुनिकतावाद के गतिपथ का संधान करते हुए ई. वी. रामकृष्णन ने अय्यप्पा पणिकर, धर्मवीर भारती, दया पवार, नामदेव ढसाल, गजानन माधव मुक्तिबोध, एम. गोविन्दन, दिलीप चित्रे, अरूण कोलतकर, कदमनित्ता रामकृष्णन, के. जी. शंकर पिल्लई, केदारनाथ सिंह और के. सच्चिदानन्दन की काव्यालोचना के जरिये आधुनिक भारतीय कविता में फार्म और कन्टेन्ट की द्वन्दात्मकता पर प्रकाश डाला है। #लेखक 

आधुनिकतावाद का कवित्त विवेक

By हरी चरन प्रकाश

स्थान और मेरी स्वयं की सीमाओं के कारण प्रस्तुत आलेख सम्प्रति मुक्तिबोध पर ही समाप्त करना पड़ा है। परन्तु इसके पूर्व सही सन्दर्भ की स्थापना करने के लिए यह आवश्यक  प्रतीत होता है कि विचाराधीन पुस्तक के इंट्रोडक्शन  तथा उसके संक्षेप में ‘द ट्रजेक्टरी ऑफ़ मॉडर्निज़्म इन इंडियन पोएट्री: एन ओवरव्यू’अध्याय के अंतर्गत (I) टुवर्ड्स मटिअरिलिस्टिक व्यू ऑफ़ मॉडर्निज़्म इन  इंडियन पोएट्री (II) ऐमबिव्अलन्स् ऐज रेजिस्टंस मिथ एंड मॉडर्निज़्म (III) ‘मीनिंग्स चेंज विद चेंजिंग क्वेसचंस फ्रॉम हाइ मॉडर्निज़्म टू द अवांगार्द’ के शीर्षकों के अधीन भारतीय कविता में आधुनिकतावाद की जिन प्रवृत्तियों का परिचय दिया गया है, उसका समुचित उल्लेख किया जाए। शायद यह लिखने की जरूरत नहीं है कि यह अध्यायक्रम हमें पूर्वोक्त कवियों के रचनात्मक विमर्श के बारे में तैयार करता है।

पुस्तक का परिचय देते हुए ई.वी.आर. पहले अपने उदेश्य को स्पष्ट करते हैं। स्वयं उनके कथनानुसार उन्होंने आधुनिकतावाद के आन्दोलन के दृष्टिपथ का संधान करते हुए उसकी महत्वपूर्ण प्रवृत्तियों में जो फर्क है उसे चिह्नित करने का प्रयास किया है। मलयालम, मराठी और हिन्दी के कुछ प्रतिनिधि कवियों की कविता का अध्ययन करते हुए उनकी प्राथमिकता यह रही है कि इन भाषाओं की आधुनिकतावादी साहित्यिक प्रावस्था में इनके बीच जो समांतरता और भेद रहे हैं उन्हें जाना जाए बनिस्बत इसके कि पश्चिमी आधुनिकतावाद और उसके भारतीय प्रतिस्थानी के बीच समरूपता ढूंढ़ने की कवायद की जाय। यहां पर शब्द ‘भारतीय’ के बारे में एक टिप्पणी आवश्यक है। अगर हम ‘भारतीय साहित्य’ के नाम से कोई श्रेणी बनाते हैं तो निश्चित  रूप से उक्त श्रेणी में हम एक समजातीय भाव को अंतर्निविष्ट मानते हैं। साहित्यिक विमर्श में ‘भारतीय साहित्य’ का पद उसी समय से प्रचलित हुआ जब से भारत को एक राष्ट्र के रूप में जाना जाने लगा। उल्लेखनीय है कि औपनिवेशिक काल से ही भारत की सांस्कृतिक और राजनीतिक राष्ट्रीयता की पहचान करने का कार्य आरम्भ हुआ। भारत की सांस्कृतिक पहचान के लिए उसके अतीत को खंगालना जरूरी था, खासतौर से उसके साहित्य को जिसमें वैदिक काल भी शामिल था। आरम्भ से ही एक श्रेणी के रूप में ‘भारतीय साहित्य’ एक प्राच्यवादी अथवा भारतविद्याव्यवसायी संरचना रही है। चूंकि भारतीय साहित्य के बारे में यह दृष्टिकोण प्रधानतः एक आध्यात्मिक परम्परा के पाठीय तत्वज्ञान में गूंथा गया है इसलिए भारतीय भाषाओं की कुछ महत्वपूर्ण साहित्यिक रूपरचना इसकी परिधि से बाहर रही है।

आगे, राजनीति या साहित्य की एक कोटि के रूप में ‘भारतीयता’ की अवधारणा को ‘विदेशी’ से अलग या उसके मुकाबले में प्रस्तुत किया जाता है जबकि इसी ‘विदेशी या अन्यदेशी ’ के मुकाबले नाइजीरिया या तन्जानिया का लेखक ’अफ्रीकन’ पद का प्रयोग करता है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि शब्द ‘भारतीय’ कुछ ऐसे मूल्यों की वकालत करना है जो सम्पूर्ण भारत को यूरोप या अफ्रीका की तरह और उसी वज़न पर एक अलग सांस्कृतिक इकाई मानता है। स्वभावतया, भारतीय भाषाओं के साहित्य के बारे में अंग्रेजी में जो लेखन किया जाता है वह भी इसी वैश्विक और शास्त्रीकृत दृष्टिकोण की पुष्टि करता है। प्रो. ई. वी. रामकृष्णन यहां इस बात को भी स्पष्ट करना चाहते हैं कि उनके अध्ययन का उदेश्य अपेक्षतया सीमित और विनीत है। उन्होंने अपने अध्ययन के लिए जो तुलनात्मक रीति नियोजित की है उसमें भारतीय सभ्यता के एकत्व की महिमामय धारणा के तहत चीजों को नहीं देखा गया है। उन्होंने मात्र एक आंतरिक समीक्षा की है जिसमें यह मूल्यांकित करने का प्रयास किया गया है कि मलयालम, मराठी तथा हिन्दी कविता की प्रवृतियों का समकालीन भारत में, जिन्दगी की जद्दोजहद के संदर्भ में, क्या और कितनी सामाजिक प्रासंगिकता है। ध्यातव्य है कि अपने समाज और साहित्य के संदर्भ में एक कवि की विद्रोही या सिंहासनविरोधी भूमिका उसके उस रचनात्मक संघर्ष का हिस्सा है जिसके द्वारा वह अनुभवों की वैकल्पिक शब्दावली विकसित करता है। इतिहास का महाआख्यान, साहित्य की नवविद्रोही प्रवृत्यिों को तब तक आत्मसात नहीं कर सकता है जब तक कि उन प्रवृत्तियों को पालपोस कर घरेलू न बना दिया जाए। इतिहास का दुरमुट और शास्त्रीकरण में निहित पालतू उपयोगिता, कृतिकारों और कृतियों को काल की तलहटी में कुछ ऐसा जमा देती है कि उनकी वर्तमान प्रासंगिकता को ढूंढ़ना मुश्किल हो जाता है। हमें यह भी ध्यान में रखना है कि राष्ट्रीय और क्षेत्रीय आकांक्षाओं के बीच की दूरी, उत्तर औपनिवेशिक काल की अस्मिता बोधक शब्दावली के कारण कुछ और समस्याजनक हो गई है। इस अध्ययन का बृहत्तर सामाजिक संदर्भ, स्वातंत्र्योतर काल की प्रतियोगी अस्मिताओं की चढ़ा-उपरी से सम्बन्धित है जिसको वर्तमान समय के सांस्कृतिक पाठ में उत्कीर्ण राजनीतिक उपपाठ के संदर्भ में अर्थापित किया जा सकता है।

कुछ समय पूर्व के. एम. जॉर्ज द्वारा सम्पादित ‘कम्परेटिव इन्डियन लिटरेचर’ में भारत की पृथक साहित्यिक परम्पराओं को इतिहासबद्ध करने का प्रयास खास तौर पर दिखा है। किताब की दोनों जिल्दों में राष्ट्रीय और क्षेत्रीय के बीच जो दूरी है उसे पाटने का प्रयास नहीं किया गया है क्योंकि भारतीय साहित्य को पृथक अस्तित्वशाली क्षेत्रीय साहित्य का समुच्यय माना गया है। परन्तु, शिशिर कुमार दास ‘अ हिस्ट्री ऑफ़ इंडियन लिट्रेचर’ में इस सीमारेखा को लांघते हैं। उन्होंने भूलभुलैया जैसे जटिल फलक पर भारत की पृथक-पृथक साहित्यक परम्पराओं को जोड़ने वाले कुछ चैराहे और साथ ही कुछ समान्तर गलियारे खोजे हैं। उनके इस दृष्टिकोण से सहमत होने को दिल चाहता है कि भारतीय साहित्य का इतिहास, भारतीय जन की सम्पूर्ण साहित्यिक गतिविधि का इतिहास है। उनकी छोटी या बड़ी समस्त साहित्यिक परम्पराओं के प्रशासन और परिवर्तन, उनके ह्रास और पुनर्जीवन और उनके उत्थान और पतन का लेखा-जोखा है। किन्तु यहां एजाज अहमद की ‘इन थ्योरी: क्लास,  नेशन्स, लिट्रेचरस’ की बिना पर यह भी कहने का मन होता है कि उपरोक्त  आदर्शीकृत दृष्टिकोण में जो एकतामूलक, एककोषी रूझान है वह भूगोल  दर्शन और राष्ट्र-राज्य की विचारधारा के प्रभाव से जन्मा है। चूंकि किसी भी भारतीय भाषा का साहित्य अपने भाषिक समुदाय के संदर्भ में कुछ निश्चित  ऐतिहासिक काम करता है इसलिए उसकी अर्थवत्ता उसकी उसी  विशिष्टता में स्थित है। अगर अमुक अमुक क्षेत्रीय-भारतीय भाषाओं के महत्वपूर्ण साहित्यिक पाठों को खींच-तान कर राष्ट्रीय साहित्यिक इतिहास का हिस्सा बना भी दिया जाय तो इस बात की प्रबल सम्भावना रहेगी कि उक्त पाठ का जो सहजात सम्बन्ध उसके सामुदायिक संदर्भ के साथ है, वह या तो विस्मृत हो जाए या विरूपित हो जाए।

आधुनिकता के बारे में हमारा दृष्टिकोण अधिकतर उन आंग्ल-अमरीकी आलोचकों द्वारा निर्मित है जो राजनीति और संस्कृति के अन्तर्संबंध को तवज्जो नहीं देते हैं। उनकी साहित्यिक टीकाएं अधिकतर आधुनिकतावाद की बहुलतावादी प्रवृत्तियों को ऐसी अमूर्त संहिताओं में ढालती हैं जो बहुराष्ट्रीय संदर्भों में ही क्रियाशील होती हैं। महानगरीय संस्कृति, पश्चिम का पतन, नवाचार, निर्वासित कलाकार जो एक नई भाषा की खोज में निकला है, जैसी विषयवस्तु आधुनिकता के आंग्ल-अमरीकी विमर्श में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। विस्थापन, अलगाव और निजवाचक पाठ का आख्यान, कला की ऐसी महिमाशाली ईक्षा के इर्दगिर्द बुना जाता है जो सीमान्त से आगे, वियना, पेरिस, लन्दन और न्यूयॉर्क जैसे पारदेशीय नगरों के बीच आवाजाही करना रहता है। परन्तु इस प्रकार का पाश्चात्य आख्यान, भारतीय कविता के आधुनिकतावादी पाठ में मौजूद सामाजिक और राजनीतिक यथार्थ के दृष्टिगत, कतई प्रासंगिक नहीं है। हालाकि यह भी सही है कि आंग्ल-अमरीकन नमूने से प्रेरित आधुनिकतावाद के इस क्षेत्रातीत प्रारूप को उच्च पाठीयता की उस स्वदेशी परम्परा से भी कुछ सहारा मिला है जिसका रूझान शास्त्रीय ज्ञान की सर्वभारतीय/भारतव्यापी प्रणाली में रहा है। एक अवरोपित विश्वबोध, जो लिखने की तकनीक के लिए सात समुन्दर पार से प्रेरणा ग्रहण करता है, परन्तु अपनी रचना के वैधीकरण के लिए संस्कृत काव्यात्मकता की ओर मुड़ कर देखता है, कविता में स्वच्छन्दतावाद/छायावाद के जमाने से प्रचलित है। संस्कृति के आभिजात्यवादी दृष्टिकोण में जो अमूर्त सार्वभौमिकता है वह मनुष्य के सौन्दर्य संसार को उच्चीकृत करके स्वायत्त बना देती है। भारतीय समाज की पूर्वआधुनिक स्थितियों से किसी ज्ञानमीमांसक विच्छेद के अभाव में सौन्दर्यबोध के उपरोक्त उच्चीकरण/विशेषीकरण का प्रभाव यह होता है कि साहित्य के नए मुहावरे, भिन्नता/दूसरेपन को अगली पंक्ति में बिठा देते हैं। प्रो. ई. वी. रामकृष्णन के अनुसार दूसरेपन की यह गण्यमान्यता आधुनिकतावाद के दौर में सामान्य पाठक और साहित्य के बीच बढ़ती हुई दूरी के लिए उत्तरदायी है।

वी. के. गोकाक की ‘कम्परेटिव इंडियन लिटरेचर’ में से उद्धृत करते हुए ई. वी. आर. लिखते हैं कि भारतीय भाषाओं में प्रगतिशील कविता, रूमानी कविता, आधुनिकतावादी कविता, प्रयोगवादी कविता कुछ आगे-पीछे और कुछ साथ-साथ चलती रही है लेकिन मोटे तौर पर यह कहना चाहिए कि प्रयोगवादी कविता बीसवीं शती के पांचवे छठे दशक में पली बढ़ी जबकि प्रगतिशील कविता की चेतना चौथे दशक में विकासमान हुई।

वी. के. गोकाक ने आधुनिक कविता की परम्पराओं में कोई विभेद नहीं किया है। इसके बरअक्स यू. आर. अनन्तमूर्ति, रामचंद्र शर्मा और डी. आर. नागराज द्वारा सम्पादित पुस्तक ‘विभाव: माडर्निज्म इन इंडियन राइटिंग’ में कहा गया है कि भारतीय आधुनिकतावाद का सबसे रोचक पहलू यह है कि इसने रूढि़वादियों (कन्ज़रवेटिव्स) और आमूलचूल परिवर्तनवादियों (रेडिकल्स) दोनों को अपने भीतर जगह दी है और शायद यह यूरोपीय आधुनिकतावाद और भारतीय आधुनिकतावाद की सबसे महत्वपूर्ण और समान  विशिष्टता है।

पूर्वोक्त अभियुक्ति से किंचित असहमत होते हुए ई. वी. आर. उक्त सम्पादकों के इस नज़रिए पर सवाल उठाते हैं कि क्या दक्षिणपन्थी अडिगा और वामपन्थी मुक्तिबोध एक जैसी युक्तियों का उपयोग करते हुए समान मानसिक अवस्थाओं का अन्वेषण करते हैं? अगर एक क्षण के लिए यह मान भी लिया जाए कि वह समान उपकरणों का उपयोग करते हैं तो इससे भारतीय आधुनिकतावाद में किसी अन्तर्निहित एकता की उपस्थिति प्रमाणित नहीं होती है। सभी तरह के प्रयोगशील लेखन को आधुनिकतावाद की एक छतरी के नीचे लाना सही नहीं होगा। अतः यह आवश्यक है कि आधुनिकतावाद के अंतर्गत रूढि़वाद और आमूलचूल परिवर्तनवाद के बीच के फर्क को स्पष्ट किया जाए। तद्नुसार प्रो. ई. वी. रामकृष्णन ने रूढिवादी प्रवृत्तियों के लिए ‘उच्च आधुनिकतावाद’ और आमूलचूल परिवर्तनवादी को निर्दिष्ट करने के लिए ‘अवांगार्द’ शब्द का उपयोग किया है।

यहां पर यह तथ्य भी विचारणीय है कि भारतीय सन्दर्भ में ‘आधुनिकतावाद’ को यह अपयश भी मिला है कि उसका सौन्दर्यात्मक सांचा भारतीय यथार्थ के एक अच्छे-खासे हिस्से से सामंजस्य नहीं बिठा पाता है। यह भी एक तथ्य है हमारी लिखित और मुद्रित शाब्दिकता से अछूता जो दूसरा भारत है, और फिर भी जिसकी एक जोरदार/तगड़ी उपस्थिति है, की अवहेलना कोई भारतीय लेखक नहीं कर सकता है। ई. वी. आर. के इस अध्ययन में यह जताया गया है कि आधुनिकतावादी खित्ते के लेखक वंचित और दलित वर्गों की अनुचारी सामाजिक स्थिति से निर्मित प्रतिसंस्कृति को कैसे सम्बोधित करते हैं। भारतीय भाषाओं में कविता की जो अवांगार्द परम्परा है उसमें अभिव्यक्ति के देशज रूपों का इस्तेमाल करते हुए और इन रूपों के भीतर भारतीय यथार्थ के एक बडे़ हिस्से को ग्रहण कर उसे जगह देते हुए, पाश्चात्य आधुनिकतावाद को देशी आत्मिकता देने का प्रयास किया गया है। अब सवाल यह है कि अवांगार्द किस मायने में उच्च आधुनिकतावाद के मुकाबले रूढि़द्रोही और परिवर्तनकामी है। आंग्ल-अमरीकी आलोचना में अवांगार्द पर कोई चर्चा भूले-भटके ही हुई है क्योंकि आधुनिकतावाद की आमूलचूल परिवर्तनवादी प्रवृतियां (रेडिकल) कान्टीनेन्टल लेखन में ही अधिक नुमायां हैं। हालांकि रेनाल्ट पोगियोलि, आक्तेवियो पाज और ज्यार्ज नोज़लोपि ने नवप्रवर्तनशील या प्रयोगशील आधुनिकतावाद के सभी रूपों को अवांगार्द की श्रेणी में रखा है लेकिन ई. वी. आर का यह मानना है कि पीटर बर्जर की पुस्तक ‘द थ्योरी ऑफ़ द अवांगार्द’ में अवांगार्द की जो रूपरेखा दी गई है वह भारतीय भाषाओं में कविता के आधुनिकत्व पर चर्चा के लिए अधिक उपयुक्त है। बर्जर की थ्योरी रूमानियत और उच्च आधुनिकतावाद के नैरन्तर्य को और अधिक स्पष्ट करती है। यूरोप में बीसवीं शताब्दी के शुरूआती दशकों में जो अवांगार्द आन्दोलन चला उसे बर्जर ऐतिहासिक अवांगार्द कहते हैं और यह ऐतिहासिक अवांगार्द, आधुनिकतावाद के ‘उच्च’ संस्करण के आधारिक सिद्धान्तों को अमान्य करता है। बर्जर ‘उच्च आधुनिकतावाद’ के लिए ‘सौन्दर्यवाद’ शब्द का उपयोग करते हैं और इस प्रकार उच्च आधुनिकतावाद तथा रूमानियत के बीच जो नैरन्तर्य है, उसे रेखांकित करते हैं। बर्जर के अनुसार उन्नीसवीं शती के यूरोप में बुर्जुआजी की राजनीतिक स्थिति मजबूत होने के बाद कलागत संरचनाओं में रूप और अंतर्वस्तु की जो द्वन्दात्मकता थी, वह दिनोदिन रूपाभिसारी होती गई। इसका नतीजा यह हुआ कि कला के क्षेत्र में अंतर्वस्तु का स्थान गौण होता गया और रूप की सौन्दर्यशास्त्रीयता विशेषाधिकारसम्पन्न हो गई। कांट और शिलर की रचनाओं से कुछ ऐसे संकेत मिलते हैं जिनके अनुसार कला के विकासक्रम की सम्पूर्णता उस मुकाम पर होती है जहां वह जीवन के कार्यव्यापार से अलग हो जाती है। कला में सौन्दर्यपरकता के इस स्वायत्त क्षेत्र और सौन्दर्यानुभूति पर उसके असर की जो सामाजिक कीमत अदा करनी पड़ सकती है, उसे अवांगार्द ने पहचाना। इस प्रकार अवांगार्द की प्रस्थापना उस बिन्दु से होती है जहां कला आत्मसमीक्षा की प्रक्रिया से गुजरती है और जहां कला अपने संस्थागत रूप को प्रश्नों से आकुल करती है। इसे अगर उदाहरण के जरिए समझे तो मामला कुछ यूं होगा कि अगर एक  विशिष्ट धार्मिक विचार की आलोचना दूसरे धार्मिक विचार को खड़ा करके की जाए तो यह एक व्यवस्थाजन्य आलोचना होगी लेकिन अगर धर्म की संस्था की ही आलोचना की जाए तो यह आत्मसमीक्षा होगी। अतः बर्जर के अनुसार आधुनिकतावादी सौन्दर्यवाद और अवांगार्द पयार्यवाची नहीं हैं। हालांकि, रूमानियत (छायावाद) अपनी प्रवृतियों में रूपवादी थी लेकिन उसकी विषयवस्तु के जो नैतिक आग्रह थे, उन्होंने कम से कम रूमानियत के शुरूआती दौर में उसके स्वायत्ततापरक दावों का खंडन किया था। वहीं पर उच्च आधुनिकतावाद ने सम्पूर्ण स्वायत्तता के उपक्रम द्वारा अंतर्वस्तु की सारी निशानियां ही मिटा डालीं।

माधव आप्टे द्वारा संपादित पुस्तक ‘मास कल्चर, लैंग्वेज ऐन्ड आर्टस इन इन्डिया’ में संकलित वाल्टर स्पिन्क के निबन्ध में पाश्चात्य और भारतीय कला के अन्तर को विवेचित करते हुए जो बातें कहीं गई हैं यदि उन्हें एक वाक्य में कहने की कोशिश की जाए तो कहा जाएगा कि भारतीय कला स्वभावतया परिवर्धनधर्मी है न कि परिवर्तनकामी। भारतीय राज्याचार का बहुलतावाद और इसके बहुभाषीय चरित्र ने इसके साहित्य में अनेक और भिन्न प्रकार के आन्दोलनों और रीतियों को एक ही समय में परवान चढ़ाया। साहित्यिक विमर्श की यह विविधता अलगाव की मनःस्थिति में रह रहे सौन्दर्यवादी भाव के अकेलेपन का प्रतिरोध करती है। इस प्रतिरोध को समाज के दलित-वंचित वर्गों की जनचेतना के प्रतिसांस्कृतिक दबावों से बल मिलता है। भारत के क्षेत्रीय साहित्य में शास्त्रीकृत और अशास्त्रीकृत रचनात्मकता के बीच जो सम्बन्ध है वह सदा से समस्याग्रस्त रहा है। ई. वी. आर. का आग्रह है कि भारतीय भाषाओं की साहित्यिक परम्पराओं के विकास में परम्परानिष्ठ, पौराणिक विश्वदृष्टि और वास्तविक, लौकिक यथार्थ के प्रवाह तथा इतिहास द्वारा पोषित दृष्टि के बीच का टकराव, निर्णयात्मक महत्व का रहा है। आधुनिक प्रयोगशील लेखन के पूर्व भारतीय भाषाओं का साहित्य अधिकतर एक प्रगतिशील प्रावस्था से गुजरा है। इसी प्रगतिशील प्रावस्था के दौरान भारतीय लेखक ने यह वैचारिकता ग्रहण की कि सौन्दर्यचेतना को अगर जीवन से पृथक कर एक उदात्त लोक में प्रतिष्ठापित कर दिया जाता है तो उसकी एक बड़ी सामाजिक कीमत अदा करनी पड़ती है। इस समझदारी के बावजूद, प्रगतिशील वैचारिकी की रचनात्मक सम्भावना का यथेष्ट परिपोषण इस कारण नहीं हो पाया क्योंकि प्रगतिशील लेखक अन्वेषणात्मक लेखक के प्रति उत्साहित नहीं थे। इसी दरम्यान स्टालिन राज की हिंसा के उजागर होने से उत्पन्न क्षोभ और अपयश, औद्योगीकरण की ओर उन्मुख नये भारत की चिन्तन-दिशा से गांधीवादी विचारधारा की असंगति आदि ने मिलकर एक ऐसा वातावरण उत्पन्न किया जो अभी तक के आदर्शवादी सोच-विचार के सांचे से बाहर जाने के लिए रास्ता ढूंढ़ रह था। यही वह आधुनिकतावादी आवेग था जो मुख्यतया सांस्कृतिक प्रतिरोध के रूप में और साथ ही साथ सामाजिक परिवर्तन के विचार के प्रति दुचित्तेपन के रूप में प्रकट हुआ। नई अकादमियों और शिक्षा संस्थानों की स्थापना तथा लिखित एवं मुद्रित शब्द के बढ़ते हुए प्रभावक्षेत्र के कारण संस्कृति, मुद्रित शब्दों के क्षीरसागर में निवास करने लगी और इस कारण संस्कृति का पारिभाषिक क्षेत्र रोजमर्रा की जिन्दगी से अलग हो गया।

शुरूआती तौर पर अवांगार्द का मुहावरा उच्च आधुनिकतावाद से इसलिए अलग नहीं लगता है क्योंकि दोनों समान रूप से उन पितृसत्तात्मक धारणाओं पर सवाल उठाते हैं जो भारतीय साहित्य में संस्थागत रूतबा प्राप्त कर चुके हैं। अवांगार्द और उच्च आधुनिकतावादी दोनों ही साहित्य धाराएं, राष्ट्रवादी-रूमानी छवि का प्रतिनिधित्व करने वाले केन्द्रीय सत्ताचरित्रों के विरूद्ध थीं। यू. आर. अनन्तमूर्ति, रामचंद्र शर्मा और डी. आर. नागराज द्वारा सम्पादित ‘विभव: मार्डनिज्म इन इंडियन राइटिंग’ का पुनः उल्लेख और उपयोग करते हुए ई. वी. आर. बताते हैं कि इस किताब में ‘टैगोर सिन्ड्रोम’ पर क्या टिप्पणी की गई है। इस टिप्पणी के अनुसार, शैली और विचारधारा दोनों ही स्तरों पर यह जाहिर होता है कि विभिन्न भारतीय भाषाओं के साहित्य के बुजुर्गवारों/पितृमूर्तियों में एक आश्चर्यजनक समानता है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, रूमानी मुहब्बत, प्रकृति, रहस्यवाद, तत्ववादी रूझान और राष्ट्रनिर्माण के आदर्श ने मिलजुल कर टैगोर सिन्ड्रोम की साझी आचारिकता गढ़ी। किन्तु यह पंचामृत कुछ इतना मीठा और पुराना था कि जी भिन्नाने लगा। कालान्तर में जब इस प्रकार की पितृपूजक सत्ता की सांस्कृतिक प्रभुताई असह्य हो गयी तो नई पीढ़ी ने यह दुर्वह बोझ उतार फेंकना चाहा। नई पीढ़ी की इस अवज्ञाकारी हरकत ने ही साहित्य में आधुनिकतावादी आन्दोलन का सूत्रपात किया। ई.वी.आर. आगे बताते हैं कि मलयालम में जी. शंकर कुरूप, कन्नड़ में बेंद्रे, मराठी में रविकिरन मंडल के कविगण, गुजराती में उमाशंकर जोशी और हिन्दी में छायावादी कवियों को कुछ इस प्रकार की प्रतिगामी काव्यात्मत्कता का मूर्तरूप समझा गया जिसे उखाड़ फेंकना आवश्यक था। किन्तु इसी स्थल पर ई.वी.आर. यह भी कहते हैं कि आधुनिकतावादी कविता का घनिष्ठ पाठ यह उजागर करता है कि बहुत सी जगहों पर नई कविता के पैरोकारों/अलमबरदारों ने पितृमूर्तियो की विरासत का अच्छा-खासा पुनर्नियोजन किया है। अमियदेव के बोधक्षम विश्लेषण ‘वाज़ इट आल इन द मैनर ऑफ़ मलर्म: द बंगाली पोइटिक ऑफ़ द 1930’s विद रेफ्फेरेंस टू द पोएट्री’ में यह दिखाया गया है कि बंगाल के आधुनिकतावादी कवियों सुधीन्द्रनाथ, जीवनानन्द दास, बुद्धदेव बोस और अमिय चक्रवर्ती की कविता में कुछ पश्चिमी प्रभाव, कुछ संस्कृत साहित्य से रिश्ता और टैगोर की विरासत के अलग-अलग नकूश मिलते हैं। इससे यह तथ्य रेखांकित होता है कि कवियों का ऐसा घनिष्ठ पाठ जिसमें उनके योगदान की वृहत्तर सन्दर्भों में आंकलित करने की सावधानी बरती गई हो, भारतीय आधुनिकतावादी साहित्य की छिपी हुई रूपरेखा को सामने ला सकता है।

प्रस्तुत अध्ययन का पहला भाग उस बृहत्तर संदर्भ की चर्चा करता है जिसके सापेक्ष दूसरे भाग में विभिन्न कवियों का वर्गीय पाठ और तीसरे भाग में कवियों का व्यक्ति पाठ किया गया है।
पुस्तक के अध्याय (I) में ‘टुवर्ड्स अ मटीअर्अिलिस्टिक व्यू ऑफ़ मॉडर्निज़्म इन इन्डियन पोएट्री’ की शुरूआत करते हुए ई.वी.आर. लिखते हैं कि ‘कविता‘ नामक पत्रिका के माध्यम से बुद्धदेव बोस ने पिछली पीढ़ी के साहित्यकारों के विरूद्ध विद्रोह की अगुआई की। टैगोर उक्त पिछली पीढ़ी के प्रतिनिधि कवि थे जिन्हें ‘कविता’ का पहला अंक भेजते हुए दिनांक 30 सितम्बर 1935 के पत्र में बुद्धदेव बोस ने कहा – “आप एक चीज का संज्ञान लेने के लिए बाध्य हैं- इस अंक की अधिकांश कविताएं गद्य में हैं। मेरा मानना है कि गद्यात्मक कविताओं की जिस शैली का परिचय आपने -‘पुनश्च‘ के माध्यम से दिया है, वह विभिन्न लेखकों के हाथों से गुजरते हुए और भिन्न-भिन्न आकारों में ढलते हुए कविता का स्थाई चिह्न होने वाला है। मेरी व्यक्तिगत धारणा यह है कि भविष्य में गद्यशैली में लिखी र्गइं कविताओं की संख्या पद्य में लिखी गई कविताओं से कम नहीं होगी।”

अंतर्वस्तु को सन्दर्भित किए बिना यहां कविता की ‘गद्यात्मकता’ पर जो जोर दिया गया है उससे यह संकेत मिलता है कि नया कवि कविता के रूपात्मक गुणों को कितना अधिक महत्व देना चाहता है। जब टैगोर ने आधुनिक कवियों की तुलना अघोरपंथियों से की तब जाहिरा तौर पर उनके दिमाग में नई कविता की अंतर्वस्तु उथल-पुथल मचा रही होगी। रूमानी- राष्ट्रवादी या रूमानी- प्रगतिवादी और आधुनिकतावादी के बीच जो बेचैनी भरा सम्बन्ध रहा है उसमें रूप और अंतर्वस्तु का यह द्वन्द एक विग्रही मुद्वा बन जाता है। 1938 में जीवनानन्द दास ने उच्च आधुनिकतावादी मुद्रा, जिसकी अनुगूंज चालीस के दशक में अज्ञेय में सुनाई पड़ती है, अख्तियार करते हुए कहा कि कविता सबके लिए नहीं है और जब तक लोगों के दिल-ओ-दिमाग नए क्षितिजों को ग्रहण नहीं करते हैं तब तक सच्ची कविता को समाज के सम्पूर्ण ढांचे में प्रवेश करने का मार्ग नहीं मिलेगा- अलबत्ता बाजारों और डाकयार्ड के तीसरे दर्जे के कवियों का अनगढ़ महिमान्वयन एक दीगर बात है। लेकिन उपरोक्त समय में ही हम समर सेन के काव्यात्मक अभ्यास से गुजरते हैं जहां हम अवांगार्द की उस संवेदना का प्रथम आभास पाते हैं जो सौन्दर्यवादी आधुनिकतावाद के समानान्तर चलती है। निर्मल घोष द्वारा सम्पादित ‘स्टडीज़ इन मार्ड्न पोएट्री’ में प्रलय कुमार देव ने लिखा कि समर सेन की कविता में ‘‘आत्माभिव्यक्ति से अधिक महत्वपूर्ण है स्व के सामाजीकरण की कोशिश”।

1943 में तार सप्तक का प्रकाशन हिन्दी कविता के लिए एक नया मोड़ थी। तार सप्तक के संपादक अज्ञेय के पिता एक पुरातत्वविद थे जिन्हें काम के सिलसिले में उत्तर भारत में जगह-जगह जाना और रहना पड़ा। परिणामतया, यह हकीकत कि अज्ञेय ने हिन्दी अधिकतर किताबों से सीखी, उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी उनकी अंग्रेजी शिक्षा-दीक्षा है। अज्ञेय द्वारा संपादित ‘प्रतीक’ ने आधुनिकतावाद के मुहावरे को कविता के अगवाड़े पर ला बिठाया। नई कविता का नाम धारण करने वाले इस कुल ने जल्दी ही उस लेखन से किनारा कर लिया जो सामाजिक यथार्थ से गांठ जोड़ कर चल रहा था। अज्ञेय के इस समय में त्रिलोचन शास्त्री, नागार्जुन तथा केदार नाथ अग्रवाल जैसे कवि जो अपने समय के सजीव-सम्मुख यथार्थ से प्रेरक शक्ति प्राप्त कर रहे थे, को पिछवाड़े धकेलने के प्रयास हुए। इस नयी कविता के कवियों ने आंग्ल-अमरीकी और फ्रांसीसी बिम्बवादियों के नक़्शेकदम पर चलते हुए, विश्व की अनुभवातीत झलक दिखाने के लिए यह जरूरी समझा कि कविता के स्थापत्य को सर्वाधिक महत्व दिया जाए। उनकी कविताएं एक ऐसे विश्वव्यापी किन्तु प्रदेशविहीन भूदृश्य पर रची र्गइं जिन्होंने उनके काव्यात्मक अनुभव को इतिहासहीन बना दिया। लेकिन इसी समय के आसपास हिन्दी के अवांगार्द मुहावरे ने गजानन माधव मुक्तिबोध जैसा तेजस्वी प्रवक्ता पाया।

मराठी भाषा में, 1947 में आई मर्डेकर की ‘कही कविता’ को आधुनिकतावाद का शंखनाद कहा जा सकता है। तीस के दशक में मर्डेकर इंगलैण्ड में रह रहे थे और वहां वह बिम्बवाद के प्रभाव में आए। ‘ऐन अन्थोलॉजी ऑफ़ मराठी पोएट्री’ में मर्डेकर की ‘कही कविता’ पर टिप्पणी करते हुए दिलीप चित्रे ने कहा कि किताब का कवर पेज ही स्तब्ध कर देने वाला था। कवर पेज पर एक नंगी पुरूष आकृति का उपहासचित्र था। पौरूषहीन, कमजोर, बीमार, क्लीव और नायकत्व की प्रभा का विपर्यय । अन्दर के पृष्ठ अवसाद से भरे थे। एक परिचयात्मक, उदास कविता जो आत्मनिन्दा से भरी पड़ी थी और जिसमें मराठी के महान संत कवियों की तुलना में स्वयं की तुच्छता का बखान किया गया था। इसके आगे युद्ध, अनास्था, आदर्शहीनता, धर्म का आतंक और बीमारी इत्यादि जैसे अवसादकारी विषयों पर और भी उदास और उजाड़ कविताएं थीं। स्वयं मर्डेकर के लिए यह एक बड़ा परिवर्तन था। मर्डेकर के पहले कविता संग्रह ‘शिशिरागम’ से ‘कही कविता’ की तुलना करते हुए फिलिप एनब्लॉम्ब बाम्बे लिटरेरी रिव्यू में प्रकाशित लेख ‘माडर्निज्म इन बाम्बे: मराठी ऐन्ड इंग्लिश वर्जन‘ में कहते हैं कि मर्डेकर ने एक झटके में न केवल पारंपरिक मराठी सानेट को बाहर का रास्ता दिखा दिया वरन तीस के दशक की प्रबल काव्यशैली के रूप, छंद और शब्द विन्यास के उस सारे तामझाम को खारिज कर दिया जिसका उपयोग उन्होंने कभी ‘शिशिरागम’ नामक कविता में किया था। प्रख्यात आलोचक जी. आर. कामथ ‘अनिरूद्ध’ ने मर्डेकर की इस ‘कही कविता’ को आलोचकों के लिए चुनौती के रूप में पेश करते हुए इसे ‘नया काव्य‘ या ‘नवकविता‘ का नाम दिया। मर्डेकर का परवर्ती मराठी कवियों पर अच्छा-खासा प्रभाव पड़ा। हालांकि उनका विरोध भी कम नहीं हुआ, तब भी और आज भी, किन्तु मराठी कविता में उनकी हैसियत एक अकेले शिखर जैसी है। कुल मिला कर कहना चाहिए कि शैली के प्रति मर्डेकर का व्यामोह उन्हें उच्च आधुनिकतावाद के करीब ले जाता है।

अय्यप्पा पणिकर की ‘कुरूक्षेत्रम‘ का 1960 में प्रकाशन और 1968 में उनके संपादकत्व में ‘केरल कविता‘ का निकलना, मलयालम भाषा में आधुनिकता रचनात्मकता के लिए महत्वपूर्ण घटनाएं हैं। एक टूटी-फूटी दुनिया के लिए उपयुक्त मुहावरा गढ़ने के लिए पणिकर ने स्व की खोज को सबसे महत्वपूर्ण विषयवस्तु बनाया। हालांकि परवर्ती मलयालम कवियों पर पणिकर का प्रभाव बीजस्वरूप रहा लेकिन कविता की भाषा पणिकर के मन-मस्तिष्क पर इस कदर हावी थी, कि आखिरकार वह उच्च आधुनिकतावादी प्रजाति के एक रूपवादी ही माने जाएंगे। इतिहास की प्रक्रिया और सामाजिक स्व के प्रति गहरे अविश्वास ने उन्हें ऐसा उत्कट व्यक्तिवादी बना दिया कि उनका कवि एक विकासमान समाज का संगी-साथी नहीं हो पाया।

साठ के दशक में ही एम. गोविन्दन और उनकी पत्रिका ‘समीक्षा’ ने मुख्यतः मद्रास में रहने वाले लेखकों और चित्रकारों की एक बिरादरी कायम करने में रचनात्मक भूमिका निभाई जिसका भारत के अन्य राज्यों के लेखकों और कलाकारों से संपर्क हुआ। इस संपर्क से अन्य राज्यों में अवांगार्द की जो विभिन्न प्रवृतियां क्रियाशील थीं वे व्यापक रूप से सामने आयीं। इसी समय के आगे-पीछे मराठी में भी तमाम ऐसी लघु पत्रिकाएं मशाल की तरह जलती-बुझती रहीं जिन्होंने अवांगार्द के मुहावरे को गढ़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इनमें ‘शब्द’ नाम की पत्रिका सर्वाधिक प्रभावशाली रही है।

यहां कुछ रूककर हमें काफी पीछे जाना है, ताकि हम भारत की क्षेत्रीय भाषाओं के द्वंद को समझ सकें। क्षेत्रीय भाषाओं का आर्विभाव और विकास, बौद्ध धर्म के प्रचार और प्रसार से जुड़ा नजर आता है। बौद्ध धर्म के आचार्यों और प्रचारकों ने देशी जुबानों और बोलियों को तरजीह दी। इस तरीके से वह पुरोहितों की गूढ़ गुणधर्म वाली उस भाषा का विरोध कर सकते थे जो तत्कालीन हिन्दू वैचारिकता की वाहक थी। जातक कथाओं ने लोक मानस को अभिव्यक्ति के नए आयाम दिए। इस प्रक्रिया ने भूधर्मी भाषा के विकास के साथ-साथ उस भाषा में सांस्कृतिक और साहित्यिक अभिव्यक्ति को विकसित किया। पालि ने संस्कृत का स्थान लिया क्योंकि एक तरफ तो वह बोलियों के इतनी करीब थी कि लोग उसे समझ सकें दूसरी तरफ वह किसी बोली विशेष से इतनी दूर भी थी कि उसे किसी  विशिष्ट स्थानीय मुहावरे में ही समझने की विवषता नहीं थी। मोटे तौर पर पालि के बाद प्राकृत का युग माना जाता है हालांकि पाकृत और पालि एक दूसरे को आच्छादित भी करते हैं। (यों तो 500 ई. पू. से 1000 ई. पू. तक के काल की भाषा को प्राकृत कहते हैं) किन्तु इस पूरे काल को प्रथम प्राकृत-काल, द्वितीय प्राकृत काल और तृतीय प्राकृत काल के रूप में तीन कालों में बांटा जाता है। उसमें प्रथम काल (आरम्भ से ईसवी सन् के आरम्भ तक) की भाषा पालि और शिला लेखी प्राकृत है,  दूसरे काल (ईसवी सन् से लगभग 500 ई. तक) की भाषा का नाम प्राकृत है और तीसरे काल (500 ई. से 1000 ई. तक) की भाषा का नाम अपभ्रंश है। इस अपभ्रंश की करीब सत्ताइस प्रान्तीय किस्में हुई जिनसे अधिकांश भारतीय भाषाएं पैदा हुई। इस सूचना का मन्तव्य केवल इस तथ्य को रेखांकित करना है भारत में क्षेत्रीय भाषाओं का प्रवर्तन उस मिजाज से जुड़ा है जिसके तहत समाज के बडे़ हिस्से ने पाठाधारित पौराणिक विश्वदृष्टि की गूढ़ रूढि़वादिता का सांस्कृतिक प्रतिरोध किया है। इन क्षेत्रीय भाषाओं ने अपनी अलग अस्मिता मध्यकाल के भक्त कवियों की महान रचनाओं द्वारा अर्जित की। भक्ति साहित्य पर किए गए नए अध्ययनों ने यह दिखाया है कि भक्ति आन्दोलन की अन्तरवस्तु क्रान्तिकारी थी और यह बात दीगर है कि बाद में इसकी शक्ति को पहचान कर अभिजाततंत्र ने इसको हथिया लिया। वस्तुतः भक्ति आन्दोलन ने पुराणपंथियों और सामान्य जन के बीच जो वैचारिक विग्रह था उसका समाधान जनसामान्य के पक्ष में किया। संक्षेप में भारतीय इतिहास की नाट्यशाला में जो बार-बार होने वाली परिघटना है वह यही है कि भारत का पण्डितवर्ग पहले जनसामान्य की भाषा और संस्कृति के प्रभाव में आता है फिर बाद में वह उसे अपने हित में अनुकूलित कर लेता है। इस प्रकार अभिजात्य उच्चवर्गीय और उपवर्गीय हैसियतों के बीच जो द्वन्द है उसकी तह में गृहस्वामियों द्वारा किये जाने वाले मालिकाना शोषण-पोषण और उक्त शोषण-पोषण के तले दबे हुए गृहसेवकों की आकांक्षाओं का संघर्ष छिपा है।

इतिहास की इस गली में जाने का उदेश्य केवल यह है कि हम क्षेत्रीय भाषाओं के कवि की बहुसांस्कृतिक पृष्ठभूमि को थोड़ा और समझ सकें और साथ ही साथ उसकी कविता में शास्त्रीय, क्षेत्रीय और विदेशी परम्पराओं का जो तिहरा रिश्ता दिखता है उसे भी समझ सकें। चूंकि यह तीनों परम्पराएं क्षेत्रीय भाषाओं की भाषिक संवेदना में साथ-साथ मौजूद हैं इसलिए अक्सर इनकी संयोजनात्मक प्रकृति, कविता की आधुनिकता के बारे में हमें संकेत दे देती हैं।

भारतीय भाषाओं की कविता में आधुनिकता के विकास के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण योगदान पाश्चात्य प्रभाव का रहा है। वर्ष 1835 और 1857 के बीच भारतीय साहित्य पर पश्चिमी प्रभाव के बारे में लिखते हुए शिशिर कुमार दास कहते हैं कि इस अवधि में जिन लेखकों ने भारतीय साहित्य की रूपरेखा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई वे सभी अपनी मातृभाषा, के साथ-साथ अंगे्रजी और किसी शास्त्रीय भाषा (संस्कृत या फारसी) में प्रवीण थे। इसी दरम्यान लोगों की रूचि गद्य में, खास तौर पर कहानी और उपन्यास में जागृत हुई जिसने साहित्य की दिशा को नए कोण दिए और एक नया पाठकवर्ग उत्पन्न किया जो उत्सुकतापूर्वक अनुदित साहित्य भी पढ़ना चाहता था। इस परिवर्तन के परिणामस्वरूप कविता और साहित्य की अन्य विधाओं के बीच के सम्बन्ध को एक दूसरे सांचे में ढालने की आवश्यकता पड़ी। उस समय तक भारतीय भाषाओं में उपन्यास का या अन्य गद्यरूपों का जो पूर्वोतिहास था उसके दृष्टिगत इस नए पाठकवर्ग के समक्ष, आधुनिक उपन्यासों के कारण अभिरूचि का कोई गंभीर संकट नहीं खड़ा हुआ। इसके विपरीत चूंकि भारतीय भाषाओं में कविता की एक लम्बी, अविच्छिन्न और समृद्ध परम्परा रही है इसलिए कविता के पाठक के समक्ष यह समस्या खड़ी हुई कि वह कविता से क्या उम्मीद करे। एक तरफ उसकी पारम्परिक रूचिसंपन्नता थी तो दूसरी तरफ कविता के नए रूप उससे कुछ अलग अपेक्षा रखते थे। नतीजतन उन्नीसवीं शती के मध्य तक जैसाकि शिशिर कुमार दास कहते हैं, भारतीय भाषाओं में पारम्परिक और पाश्चात्य नमूने की कविताओं के बीच द्वंद की स्थिति रही। परन्तु जैसे-जैसे अभिजातवर्ग पश्चिमी/अंग्रेजी प्रभाव में आता गया, गीत और छोटी कविताओं ने महाकाव्य और खंडकाव्य के मुकाबले ज्यादा जगह बना ली। यहां यह कहना चाहिए तत्कालीन भारतीय बुद्धिजीवी चाहे वह बांग्लाभाषी रवीन्द्रनाथ टैगोर हों या मराठी के विष्णुशास्त्री चिपलुणकर हों, ने इस पश्चिमी प्रभाव को भारतीय मेधा के लिए नवजीवनदायी ही माना। किन्तु यहां यह कहना जरूरी है कि भारतीय भाषा साहित्य पर अंग्रेजी के इस प्रभाव को सर्वभारतीय, क्षेत्रीय और विदेशी परम्पराओं के तिहरे बहुसांस्कृतिक सम्बन्धों की पृष्ठभूमि में ही समझा जा सकता है। व्लादिमिर माकुर अपने निबन्ध ‘कल्चर ऐज ट्रांसलेशन’ में कहते है कि अनुवाद के स्वत्वहारी कार्यकलाप के फलस्वरूप एक मिलते-जुलते सांस्कृतिक इंद्रियबोध की अवतारणा होती है। चूंकि बहुत सी भारतीय भाषाओं में तीस और चालीस के दशक से पहले साहित्यिक समालोचना की कोई विकसित परम्परा नहीं थी इसलिए इन अनुवादों ने कविता के पठन-पाठन के प्रतिमान तय करने का भी काम किया। कहना चाहिए कि हमारे समाज में भाषाओं की विभाजनरेखा थोड़ी तरल है और द्विभाषिता का भी खूब चलन है इसलिए किसी भी भाषा के लिए यह पूरी तरह से संभव नहीं है कि वह किसी समुदायविशेष के आत्मबोध का आख्यान, एकात्मवादी संस्कृतियों की तरह एकात्म स्वरों में रचे। चूंकि हमारे आत्मजगत की संरचना, भाषा के द्वारा होती है इसलिए ‘निज भाषा‘ की यह तरलता भी उन आख्यानों में शब्दित हो जाती है जो हमारे स्व को अभिव्यक्त करने का बीड़ा उठाते हैं। उन्नीसवीं और बीसवीं शती के सन्धिकाल के कवियों में एक ऐसी बेचैनी थी, कला की स्वतंत्रता को सुनिश्चित  करने की ऐसी चाह थी कि उन्होंने रूप, छन्द और विषयवस्तु को लेकर लगातार प्रयोग किए। इन प्रयोगों के पीछे एक आवेग यह भी था कि अपनी भाषा को अंतर्नुवाद्यता के मानकों के करीब पहुंचाया जाए। इन प्रयोगों ने अभिव्यक्ति के कुछ ऐसे ढंग-ढर्रे पैदा किए जिन्होंने विदेशी परम्परा और उसमें निहित अन्यता/दूसरेपन के अनुकूल और प्रतिकूल दोनों किस्म के काव्यानुभव रचे। इस समय का कवि दो दुनियाओं के बीच जिस सुगमता के साथ जी रहा था वह उसके तरलित स्वत्व का घोतक है।

लेकिन जैसे-जैसे अंग्रजी अनुशासन की शिक्षापद्धति का प्रसार होता गया वैसे-वैसे ही पूरी भारतीय शिक्षापद्धति विहित पाठ्यक्रम के इर्द गिर्द संघटित होने लगी। साहित्यिक निदेश में इस औपनिवेशिक आधिपत्य का एक फल यह भी था कि तत्कालीन साहित्यिक विमर्श महान परम्पराओं की ओर उन्मुख हो गया और छोटी परम्पराओं का उपेक्षित ज्ञान साहित्य में प्रवेश नहीं कर सका। विनय हार्डीकर कहते हैं कि तत्समय मराठी में समस्त साहित्यिक गतिविधि उच्च वर्ग तक सीमित थी और कभी कभार जब यह उच्च वर्ग नीचे की ओर ताकता भी था तो इस अहसास के साथ वह ऊंचा है और ऊंचाई से देख रहा है। इस परिदृश्य का ज़ायजा लेते हुए कृष्ण कुमार ‘पॉलिटिकल एजेण्डा ऑफ़ एजुकेशन: ए स्टडी ऑफ़ कॉलोनियलिस्ट ऐन्ड नेशनलिस्ट आईडियाज’ में कहते हैं कि टैगोर की जागरूकता भी, एक सूचनासंपन्न चिंतित बुर्जुआ की चेतना की द्योतक थी और भारतीय गांवों की दुर्दशा को वह एक पराए व्यक्ति की भांति ही देख सकते थे। इन हालात में यह समझा जा सकता है कि उन्नीसवीं और बीसवीं शती के आरम्भ में निम्नवर्ग और स्त्रियों की लेखकीय भागीदारी क्यों इतनी कम रही, हालांकि इसी अवधि में दो नाम, मलयाली कवि कुमारन असन (1873-1924 – एझवा नामक दलित समुदाय से) और ओडि़या कवि गंगाधर महर (1862-1924 – जुलाहा समुदाय से) अपवादस्वरूप सामने आते हैं।

यहां पर थोड़े दुहराव के साथ यह कहना पड़ रहा है कि भारतीय भाषाओं में आधुनिकतावाद के कालक्रम को तब तक सार्थक रीति से नहीं समझा जा सकता जब तक कि मुद्रण के कार्यव्यापार को न समझा जाए। लिखाई के साथ छपाई के गठबंधन ने साहित्यिक रचनात्मकता को राजनीतिक आयाम दिए। बेनीडिक्ट ऐन्डरसन ‘इमेजिन्ड कम्युनिटीज: रिफ्लेक्षन्स आन द ओरीजिन ऐन्ड स्पे्रड ऑफ़ नेशनलिज़्म‘ में कहते है कि मुद्रित होने के लिए तैयार भाषाओं ने उनके बोलने वालो के लिए यह सम्भव बना दिया कि वह राष्ट्रीयता की कल्पना से सिक्त सामुदायिकता का भ्रूण बन सकें। मुद्रण का पूंजीवाद यह सुनिश्चित करता है कि देर या सबेर ऐसा समुदाय आत्मालोचना के लिए प्रस्तुत हो और अपनी प्रवृतियों और वरीयताओं को नए सिरे से निर्धारित करें। भारतीय भाषाओं में साहित्यिक समालोचना का प्रादुर्भाव मुद्रण के इसी पूंजीवाद का उपोत्पाद है। यही वह समय था जब कि भारतीय जन के जीवन के निजी और सार्वजनिक क्षेत्र पुर्नसंयोजित किए जा रहे थे। जो चीजें अनायास ही व्यक्ति के निजी जीवन का अंग मानी जाती थी उन पर राज्य की निगरानी बढ़ रही थी, जिसके फलस्वरूप नागरिक समाज में निजी और सार्वजनिक क्षेत्र की सायास निशानदेही तेजी से हो रही थी। ऐसे में एक व्यक्ति के लिए यह जरूरी हो गया कि वह इन दोनों क्षेत्रों के बढ़ते हुए बंटवारे को समझ कर अपनी जीवन शैली निर्धारित करे।
नागरिक समाज में निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के इस बदलते हुए रिश्ते के आलोक में आधुनिकता की संवेदना के प्रकट होने की व्याख्या की जा सकती है। कहा जा सकता है कि आधुनिकता की संवेदना वह आलोचनात्मक आत्मबोध है जिसके जरिए उस समय का व्यक्ति निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के तत्कालीन रिश्तों का विश्लेषण और उनका पुर्नसंयोजन कर रहा था। वस्तुतः भारतीय भाषाओं में कविता का आधुनिकतावादी मुहावरा राजनीतिक आन्दोलनों और राज्य की समष्टियों से व्यक्ति की वियुक्ति की दावेदारी पेश कर रहा था। वह राजनीतिक समाज की समावेशी चक्की से छिटक कर अपना अस्तित्व बचाए रखना चाहता था। इन अर्थों में आधुनिकतावादी संवेदना, आधुनिकता की ही समीक्षा कर रही थी।

इस काल के साहित्यकारों के लिए आधुनिकता का मतलब था, इतिहास में जागना। इसका मतलब था स्व की ऐसी परिभाषा की खोज जिसके जरिए विस्तारित आख्यानों में स्व को स्थापित किया जा सके। चूंकि साम्राज्यवाद भौगोलिक हिंसा का एक ऐसा उपक्रम था जिसके द्वारा लगभग पूरी पृथ्वी खोजी, नापी और नियंत्रित की जा चुकी थी इसलिए इस काल के राष्ट्रीय कवियों ने इस खोई हुई भूमि को कल्पना के जरिए प्राप्त करना चाहा। हालांकि, अधिकतर राष्ट्रीय कविता इसी मानचित्रण आवेग से उपजी थी परन्तु इनके बीच मलयालम के कुमारन असन और मराठी के केशवसुत जैसे कवि भी थे जिनकी रूमानियत गहरी सामाजिक चेतना से परिष्कृत थी। वह जाति के दंश और आर्थिक असमनाताओं के प्रति सचेत थे और कोई ताज्जुब नहीं कि उनकी कविताओं में मातृभूमि की भावुक वन्दना नहीं है। बाद में प्रगतिशील साहित्यकार जिन्होंने अपने पूर्ववर्तियों की रूमानी देशभक्ति को खारिज किया, कुमार असन और केशवसुत की इस विरासत का आह्वान किया।

राष्ट्रीय रूमानी कविता के अवसान और आधुनिकतावादी कविता के आविर्भाव के बीच अधिकतर भारतीय भाषाओं में प्रगतिशील आन्दोलन का एक महत्वपूर्ण दौर आया। इस दौर पर शिकागो रिव्यू में प्रकाशित लेख “सम कॉन्टेक्स्ट ऑफ़ मॉडर्न इंग्लिश पोएट्री” में टिप्पणी करते हुए विनय धारवाड़कर कुछ ऐसा मानते हैं कि समाजवादी मूल्यों का परचम फहराने वाले प्रगतिशील लेखकों ने बाज औकात भारतीय समाज की एक उजाड़ और निराशाजनक तस्वीर प्रस्तुत की है। प्रगतिशील लेखन ने महाकाव्यात्मक गम्भीरता और प्रगीतात्मकता के बजाय व्यंग्य, विडम्बना और भर्त्सना का रास्ता चुना। इस परिप्रेक्ष्य में प्रगतिशील दौर और साहित्य की आधुनिकतावादी करवट के बीच जो सम्बन्ध है उसका गहरा अध्ययन होना चाहिए। मोटे तौर पर यह माना जाता है कि हिन्दी में प्रयोगवादी रचना प्रगतिशील आन्दोलन की प्रतिक्रिया में हुई है। परन्तु इस संबंध में अमियदेव का यह कहना है कि बंगाली में और शायद हिन्दी में भी तीसरे दशक में प्रगति-प्रयोग की युति रही है जिसमें खंडन-मडन की द्वन्दात्मकता के अलावा संवादात्मक विचार-विनिमय की गुंजाइश रही है। गुजराती, मलयालम और मराठी में 1940 के आसपास प्रगतिशीलता का एक सुपरिभाषित दौर रहा है। गुजराती में उमाशंकर जोशी और सुन्दरम् ने समाजवादी विचार की रेडिकल धारा को गांधी के सुधारवादी कार्यक्रमो के साथ संष्लेषित किया।

यहाँ यह उल्लेख करना उपयुक्त होगा कि तीसरे दशक तक समाज के मध्यवर्ग में यह बात जड़ पकड़ चुकी थी कि साहित्य एक लिखित, मुद्रित और प्रकाशित अवधारणा है। उपरोक्त गतिविधियों के संस्थानीकरण के कारण साहित्य के उत्पादन और वितरण में समाज के कुछ वर्गों का ऐसा वर्चस्व बना जिसके अनुकूल पूरे समाज के साहित्यिक मानक तय किए जाने लगे। क्षेत्रीय भाषाओं का संस्कृतीकरण और पुनरूत्थानवादी प्रवृत्तियां बढ़ीं। के. एम. मुंशी की 1935 में प्रकाशित ‘गुजरात ऐन्ड इट्स लिटरेचर’ की भूमिका लिखते समय महात्मा गांधी ने मध्यम वर्ग की साहित्यिक समझ की सीमाओं की ओर ध्यान खींचते हुए अपनी स्वभावगत साफगोई के साथ कहा ‘‘श्री मुंशी ने हमारी साहित्यिक उपलब्धियों का जो आकलन किया है वह मुझे बहुत वफादार लगता है। स्वभावतया उनका सर्वेक्षण उस भाषा तक सीमित है जो मध्यम वर्ग द्वारा बोली और समझी जाती है। व्यवसायिक मानसिकता के आत्मतृप्त लोगों की भाषा प्रकृतिशः ‘स्त्रैण और विषयासक्त’ रही है। हम लोगों (आमजन) की भाषा के बारे में कुछ नहीं जानते। हम उनकी बोली-बानी नहीं समझते। उनके (आमजन) और हम मध्यवर्गीय लोगों के बीच इतना फासला है कि हम उन्हें नहीं जानते हैं और वह तो हमारी सोच और हमारी वाणी के बारे में और भी कम जानते हैं।”

के. एम. मुंशी के गुजराती साहित्य का इतिहास और रामचन्द्र शुक्ल के हिन्दी साहित्य के इतिहास पर ऐसे पुनरूत्थानवादी आवेग की छाप है जो अतीत को स्मारकीय पदों में ढालने का कार्य करता है। गांधीजी ने ‘उनके और हमारे’ बीच जिस बढ़ती खाई का उल्लेख किया था वह इस बात की द्योतक है कि इस समय तक सामाजिक यथार्थ और राष्ट्रीय नियति के प्रति जनसामान्य और उच्चवर्ग के नजरिए में फर्क आ गया था। इसका असर भाषा पर भी पड़ा जिसके तहत साहित्यिक भाषा एक ऐसी  विशिष्ट इकाई हो गई जो अकलात्मक बोली और भाषा से अलग है। प्रगतिशील लेखकों ने इस अवस्था को इसी समय पहली बार एक विचारधारात्मक घटना के रूप में पहचाना। हालांकि अपने समय में अवांगार्द ने भी यह पहचान अपने तरीके से की। जहां प्रगतिशीलों ने समस्त पूर्वकालिक भारतीय कविता को वर्तमान के लिए महत्वहीन पाया वहीं कविता के अवांगार्द मुहावरे ने परम्परा का अन्वेषण कर के उसे एक संघर्ष-स्थल के रूप में प्रस्तुत किया।

एज़ाज अहमद ’इन थ्योरी’ में कहते हैं कि पारम्परिक सम्पत्तिशाली और नए व्यवसायिक वर्ग, दोनों के ही पेटी-बुर्जुआ अपनी शिक्षा-दीक्षा और व्यवसायिक महत्वाकांक्षाओं की गतिकी के कारण अंग्रेजी और पाठीय परम्पराओं की ओर आकर्षित हुए। उच्च आधुनिकतावाद के महानगरीय मुहावरे और उसमें ‘प्रगतिवाद’ के विरूद्ध जो विरोधाभाव है उसे उक्त संदर्भ के साथ ध्यान में रखना चाहिए। साथ ही जान फ्रो की यह टिप्पणी भी दिमाग के एक कोने में रखने लायक है कि आधुनिकतावाद, यथार्थवादी सौन्दर्य दृष्टि के इतना विरूद्ध भी नहीं है क्योंकि वह यथार्थवाद की आन्तरिक विसंगतियों का समापनकाण्ड है। वस्तुतः अमियदेव द्वारा उल्लिखित प्रगति-प्रयोग युति को उच्चारोही मध्यम वर्ग और शेष समाज के बीच होने वाले इसी व्यवहार-व्यापार के संदर्भो में देखना चाहिए। इस बात के बावजूद कि प्रगतिशील आन्दोलन ने साहित्य का जनभाषीय संस्कार किया, यह बात अपनी जगह सही है कि भाषा के भीतर अधिपति और उपवर्गीय तत्वों का जो अंतर्विरोध था उसे यह आन्दोलन पूरी तरह सुलझा नहीं पाया। आधुनिक समाज में लेखक और पाठक के बीच सम्बन्धों की जो समस्याजनक प्रकृति है उसे न समझने के कारण प्रगतिशील आन्दोलन ने इस बात की आवश्यकता नहीं समझी कि सौन्दर्यशास्त्र का नया विधान रचा जाए ताकि अनुभूति और अभिव्यक्ति के लिए नए तरीके चलन में आ सकें। इसी के साथ एज़ाज अहमद का यह कथन भी महत्वपूर्ण है कि भारतीय भाषाओं के साहित्य के लिए यथार्थ से मुठभेड़ निर्णायक सिद्ध हुई क्योंकि जहां साहित्य के बहुत से अन्य रूप आए और गए, यथार्थवाद बना रहा क्योंकि दुनिया को समझने का इसका तरीका उस ऐतिहासिक क्षण के साथ जुड़ा जब भारतीय समाज अपने पहले बुर्जुआ उथल-पुथल से गुजरते हुए खुद की वर्गसंरचना और पूंजीवादी प्रकार का गृहप्रबन्धन करते हुए अपनी वर्गचेतना की निर्मिति कर रहा था।

कुल मिलाकर, एक प्रगतिशील रचनाकार, साहित्यिक रूपाकारों में अन्तर्निहित सौन्दर्यपरक रचनान्तरणों की गतिकी को सन्दर्भित किए बिना, साहित्य को लेखक और समाज के साझे विश्वास की अभिव्यक्ति मानता था जबकि उच्च आधुनिकतावादी, सामाजिक इतिहास को इतना अस्त-व्यस्त और अव्यवस्थित मानते हैं कि उससे किसी नैतिक आध्यात्मिक या सौन्दर्यात्मक आयाम की उत्पत्ति हो ही नहीं सकती। दूसरी तरफ अवांगार्द लेखक इतिहास के प्रति नाउम्मीद नहीं है भले ही आधुनिक बुर्जुआ समाज, कला और मानवता के लिए किसी आशा का संचार न करता हो। यथार्थवाद और अवांगार्द के बीच लम्बी लम्बी बहसे हुई हैं, जिनमें ब्लाख, लुकाच, ब्रेख्त, बेजामिन और अदोर्नो ने जम कर भाग लिया है। लुकाच ने जेम्स ज्वायस के मुकाबले टॉमस मान को तरजीह दी है क्योंकि ज्वायस के अवांगार्द लेखन को उन्होंने जीवन और यथार्थ से रिक्त पाया। इसके विपरीत ब्रेख्त और अर्दोनो ने अपने-अपने तरीके से अवांगार्द लेखन का बचाव किया। ब्रेख्त ने लुकाच को जवाब देते हुए कहा कि बालजक या टाल्स्टाय की यथार्थवादी रचना पद्धति अपनी समस्त संभावनाओं को निचोड़ कर निढाल हो चुकी है इसलिए अब सर्वहारा के लिए असाधारण और जोखिम भरी रचना करने से नहीं डरना चाहिए बशर्ते कि वह यथार्थ स्थितियों से व्यवहार करती और जूझती हो। ब्रेख्त ने कला में अन्वेषण और प्रयोग की आवश्यकता पर बल दिया क्योंकि एक कलाकार को बीसवीं सदी के पूंजीवादी समाज में हो रहे सामाजिक परिवर्तनों से जूझना है।

लूकाच की ‘द मीनिंग ऑफ़ कन्टेमपरेरी रीअलिज़्म’ की समीक्षा करते हुए अदोर्नो ने रूप की प्रमुखता पर बल दिया है। जेम्स ज्वायस, काफ्का और बेकेट ने रूप के जिन नियमों का वरण किया है वे सभी उनकी सामाजिक अंतर्वस्तु से गहरे और सौन्दर्यपरक रीति से जुडे़ हुए हैं। इन बहसों का जिक्र इसलिए प्रासंगिक है कि इनके जरिए हमे उन मुद्दों को समझने में मदद मिलती है जो प्रगतिशीलता और प्रयोगवाद के द्वन्दात्मक/संवादात्मक रिश्तों की पड़ताल से जुडे़ हैं।

चूंकि हिन्दी में आधुनिकतावाद को प्रगतिशीलता के विरोध में परिभाषित किया गया है इसलिए अज्ञेय जैसे उच्च आधुनिकतावाद के हामी-हिमायती की बौद्धिक स्थापनाओं को करीब से जानना जरूरी होगा। अज्ञेय ने कला को अपूर्णता के विरूद्ध एक विद्रोह माना है। अपने विनिबिन्ध ‘संस्कृति और परिस्थिति’ में वह कहते हैं कि हमारी जीवन शैली ही नहीं हमारा जीवन ही बदल गया है। जिन्दगी न शहरी रह गई है और न ग्रामीण, इसका ढांचा ही खो गया है। इसे जोड़ने वाला कुछ नहीं बचा है। वह एक कामगार की विच्युतावस्था की बात करते हैं परन्तु साथ में यह कहते हैं कि उसकी विच्युति, उसके अलगाव की समस्या, सांस्कृतिक ज्यादा है और आर्थिक कम। जब वह यह कहते हैं कि आर्थिक दशा या जीवनस्तर में सुधार किसी राष्ट्रीय या अन्तर्राष्ट्रीय संस्कृति को जन्म नहीं देगी, तो वह प्रगतिवादियों को जवाब दे रहे होते हैं। जब वह कहते हैं कि संस्कृति का तत्व आलोचनात्मक आस्वाद के रोपण और पोषण से प्राप्त होता है और उसे मशीन, प्रचार, भाषण और बहसों द्वारा विकसित नहीं किया जा सकता है तब वह इलियट की अनुगूंज पैदा करते हैं। महान शास्त्रीय रचनाओं में खोने और उन्हें पाने के लिए सख्त दिमागी प्रशिक्षण की आवश्यकता है। वर्गभेद का विस्तार एक लेखक के लिए आवश्यक नहीं है, क्योंकि दुःख, अधूरेपन का त्रास और पीड़ा, सर्वव्यापी और वर्गातीत है। अज्ञेय, जोर देकर कहते हैं कि एक अधिकांशतया अनपढ़ समाज जिसमें अधिकतर शिक्षा विदेशी भाषा में दी जाती है, के लेखक से यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि वह जनसामान्य के लिए या उनके बारे में लिखे।

अज्ञेय का सतत दृष्टिकोण यह रहा है कि आभिजात्य मूल्यों का एक ऐसा रूपस्वी शरण्य कायम किया जाए जिसके जरिए एक उदात्त संस्कृति लोक को सीमांकित और सुरक्षित किया जा सके। अज्ञेय के संस्कृति, भाषा और निजता सम्बन्धी सरोकार, सामान्य जीवन से उनके अलगाव को सत्यापित करते हैं। उनकी संस्कृतनिष्ठ भाषा जिसमें किसी भी हिन्दी भाषाभाषी क्षेत्र की बोलीबानी का अभाव है, उनके इस अलगाव को और पुष्ट करती है। जिस समय वह आधुनिक सामाजिक परिवेश की नुक्ताचीनी करते हैं जिसके कारण यह अजनबीयत पैदा होती है उस समय वह इस बात को नहीं मानते हैं कि सामाजिक परिवर्तन के जरिए संप्रेषण की समस्या को हल किया जा सकता है। अज्ञेय के लिए कविता एक शाब्दिक निर्मिति है जो आधुनिक समाज से त्रस्त लोगों को पनाह देती है। उनकी कविता में बारम्बार प्रयुक्त होने वाले रूपक यथा नदी, नाव, यात्री, मार्ग और द्वीप उनकी तबियत के रूमानी रूझान की ओर इशारा करते हैं। उनके आधुनिकतावाद को अस्तित्ववादी विचारों की मध्यस्थता भी प्रभावित करती है क्योंकि वह एक इतिहासेतर, आत्मनिष्ठ स्थल जिस पर अस्तित्ववादी सौन्दर्यचेतना की पदचाप है, को अधिमान्यता देते हैं। अज्ञेय के कृतित्व में आत्मनिष्ठा की रूमानी विरासत, अजनबीयत का बोध और आत्मचेतना के चरम क्षणों के प्रति अस्तित्ववादी रूचि सहयात्री बन कर सामने आती है। इसके मूल में अज्ञेय की वह दृष्टि है जिसके तहत स्व एक ऐसा एकाकी, समाजच्युत आभ्यांतर स्थल है जो सामाजिक अंतर्व्यवहार और तर्कजन्य वाक् से अलग और कटा हुआ है। लोथार लुत्से की ‘हिन्दी राइटिंग इन पोस्ट कोलोनियल इंडिया: अ स्टडी इन द अस्थेटिक्स ऑफ़ लिटरेरी प्रोडक्शन’ में छपे हुए एक इंटरव्यू में अज्ञेय कहते हैं कि उनके जैविक स्व और उनके पंडित-कवि के बीच अंतःसंघर्ष की स्थिति है। नई कविता और अस्तित्ववाद में अज्ञेय की कविता की यौक्तिक विशेषता पर प्रकाश डालते हुए राम विलास शर्मा दिखाते हैं कि कैसे अज्ञेय तमाम स्रोतों से भावना और दार्शनिक अन्तरदृष्टि बटोर कर उन्हें अपनी भावात्मक संरचना का अंग बनाते हैं। अज्ञेय छांट-छांट कर ऐसे विचार चुनते हैं जो उनके अनुकूल और प्रिय हैं। फलस्वरूप, उनकी सारग्रही प्रतिभा वेदान्त, जेन, बौद्धधर्म और अस्तित्ववाद में कोई विभेद करने का कष्ट नहीं करती है। उनकी कल्पना अमूर्तन के संदर्भमुक्त संसार में विहार करती है। उनकी पांडित्यपूर्ण और र्निवैयक्त्कि वैश्विक वाणी, विभिन्न विचार प्रणालियों को बिना उनके ऐतिहासिक सन्दर्भ और प्रत्ययात्मक सहारे के समावेशित करती है। उनकी यह आवाज सद्य और सदैव परिवर्तनशील वर्तमान के लिए प्रतिबद्ध है। दूसरी तरफ मुक्तिबोध जैसे कवि हैं जो अपनी कला को जीवन के प्रवाह से संशोधित और विशेषित होने देते हैं और इस प्रकार समय और इतिहास का अपने अंतर्विरोधो के साथ के साथ संवाद बनाते हैं। अवांगार्द का यह जो संवादात्मक स्वभाव है वह उसे उच्च आधुनिकतावाद की प्रतिपाद्य मुद्राओं से अलग करता है।

अज्ञेय के उच्च आधुनिकतावाद ने एक पूरी पीढ़ी के हिन्दी के काव्यानुरागियों की पाठकीय संवेदना के संस्कार में बीजभूमिका निभाई है। कुछ यही भूमिका मराठी में सुरेश जोशी और मलयालम में अय्यप्पा पणिकर ने निभाई है। हालांकि अज्ञेय, जोशी और पणिकर बुर्जुआ संस्कृति के आलोचक हैं परन्तु उनकी यह रूपवादी दृष्टि कि साहित्य की संरचना सामाजिक व्यवहार से बाहर और ऊपर है, अप्रत्यक्ष रूप से उन्हें उस संस्कृति के पाले में खड़ी कर देती है जिसके वे घोषित रूप से आलोचक हैं। यह वह संस्थानीकृत, द्वीपीय साहित्यिक संस्कृति है जिसे अवांगार्द के मुहावरे ने अतिक्रमित किया है। मुक्तिबोध, दिलीप चित्रे और सच्चिदानन्दन जैसे कवि पूरी तरह से आश्वस्त हैं कि कोई भी सौन्दर्यपरक तथ्य ऐसा नहीं है जो सामाजिक इतिहास के बृहत्तर संदर्भों की पोटली से बाहर हो। साहित्यिक गतिविधियों के संस्थानीकरण के प्रति उपरोक्त आत्मालोचक चेतना, रूप और अंर्तवस्तु के प्रति अवांगार्द के कलाकार की दृष्टि को परिवर्तित करती है। अवांगार्द की आकांक्षाओं में साहित्यिक क्षेत्र के बढ़ते लोकतंत्रीकरण (जो सम्भव हुआ क्षेत्रीय भाषाओं में मुद्रण, पठन और पाठन की वृद्धि से) और नए रूपविधान का आवेग साफ-साफ झलकता है। औपनिवेशिक काल से पहले भी और खासकर भारतीय इतिहास के संक्रमणकालीन समयो में सनातन धर्म और साधारण धर्म के बीच जो अन्तःसंघर्ष रहा है वह भारतीय भाषाओं के साहित्यिक विमर्श का आवश्यक लक्षण रहा है। भक्तिकालीन कविता इसका अन्यतम उदाहरण हैं जिसके प्रति आधुनिकतावादी कवियो का विचित्र और कदाचित अनूठा आकर्षण रहा है।

कुमकुम सांगरी, मीराबाई पर किए गए अध्ययन में यह दर्शाती हैं कि कैसे भक्ति के उदार और विसम्मत रूपांकनों ने उच्च हिन्दूवाद के तत्वज्ञान (माया और कर्म आदि) का चुनिंदा प्रयोग करके ऐसे इंद्रियातीत मूल्य के सृजन का प्रयास किया जो लौकिक-भौतिक जीवन की दैनन्दिनी में रचे-बसे हुए हों और सबकी पहुंच के अन्दर हों। औपनिवेशिक काल में उच्चवर्ग और जनसामान्य में सामाजिक स्तर पर जो विभाजन रहा है उसने सामाजिक यथार्थ और राष्ट्रीय नियति को समझने के अलग-अलग रास्तों को जन्म दिया। पश्चिमी शिक्षा दीक्षा से लैस जिस उच्चवर्ग ने बुद्धिवादी और विकासवादी विचारों से प्रेरणा ग्रहण की वही वर्ग अपनी घरेलू जिन्दगी, परिवार और समुदाय के परम्परागत मानको के अनुसार जी रहा था। सांस्कृतिक रूप से दोहरे दबाव अपनाता और झेलता हुआ यह वर्ग एक दोहरे भाषा संसार को भी उसी तरह भोग और भुगत रहा था।

यह दोहरापन समाज की सत्तासंरचना में भी था। एक तरफ इस उच्च या मध्यमवर्गीय शिक्षित नागरिक वर्ग के जीवन के अन्तर्विरोध सरकार से निभाने वाले संबंधों के कारण पैदा हुए तो दूसरी तरफ जनता के उपवर्गों से निभाने वाले कामकाजी सम्बन्ध भी इसका एक कारक थे। इस अन्तर्विरोध से उत्पन्न सत्ता के ढांचे की अभिव्यक्ति शास्त्रीकृत परम्परा की पाठीयता और रंगकलाओं की वाचिक और मौखिक उपस्थिति के बीच विद्यमान और अनसुलझे तनाव में हुई। कोई आश्चर्य नहीं कि भक्ति साहित्य में विद्रोह और समर्पण के बीच जो तनाव है उसने उच्च आधुनिकतावादी और अवांगार्द दोनों किस्म के कवियों को बहुत आकृष्ट किया है क्योंकि तनाव, सत्ता के दो छोरों से संवाद करने में काव्य की प्रतिभा की मदद करता है।

स्वतंत्रता के बाद भाषिक आधार पर राज्यों का जिस प्रकार पुनर्गठन हुआ उसको क्षेत्रीय बुद्धिजीवियो का पूर्ण समर्थन मिला। यह समझा गया कि क्षेत्रीय भाषाओं के बौद्धिक वर्ग ने आजादी के बाद सत्ता-व्यवस्था में बढे़ केन्द्रोन्मुखी झुकाव का प्रतिकार क्षेत्रीय भाषिकता के माध्यम से प्राप्त सांस्कृतिक प्रतिरोध के द्वारा किया। इस पूरी प्रक्रिया का दिलचस्प परिणाम यह है कि राष्ट्रीय संस्कृति के बरअक्स देशी संस्कृतियों का उठान हुआ जो अपनी अनन्यता और दूसरों की अन्यता के प्रति अतिरिक्त रूप से सचेत रहने लगीं। इस सांस्कृतिक-साहित्यिक परिघटना के परिणामस्वरूप भारतीय संवेदना टुकड़ों में बंटने लगी। यह बंटवारा इस बात पर बहुत कुछ निर्भर था कि किसी लेखक की स्थानिकता क्या है। उदाहरण के लिए यदि अंग्रेजी में लिखने वाले व्यक्ति के लिए यह लगभग तय है कि उसका पाठक पश्चिमी रंग में रंगा हुआ अभिजातवादी प्रवृत्तियों का व्यक्ति होगा तो नतीजतन उसमें उस आत्मालोचन की प्रक्रिया धीमी होगी जो अवांगार्द का पारिभाषिक लक्षण है। उच्च आधुनिकतावाद और अवांगार्द का फर्क लेखन में रूपविधान की प्रस्तुति और उसके पाठक के बीच सम्बन्धों की शर्तों के अनुसार समझा जा सकता है। कहने की आवश्यकता नहीं कि एक तैयार पाठक के मन-मस्तिष्क में किसी पाठ का अर्थ खुलना और बनना उस पाठ में मौजूद प्रत्यक्षीकरण की शर्तों के द्वारा संचालित होता है। उच्च आधुनिकतावादी पाठ की लाक्षणिकता एक स्थिर असांसारिकता का अनुभवात्मक क्षेत्र रचती है।

ब्रेख्त ने बुर्जुआ रंगमंच के बारे में कहा है कि उसके द्वारा चित्रित लोग कथित ‘शाश्वत मानव’ की अवधारणा से बंधे हुए हैं। इस रंगमंच की कहानियां सर्वव्यापी किस्म की स्थितियां रचती हैं जिनमे एक ‘मनु’, चाहे जिस कालखंड या युग का मनुष्य हो अपने को अभिव्यक्त कर सकता है। इसकी सारी घटनाएं एक संकेत-सूत्र हैं और इस संकेत सूत्र का एक ‘शाश्वत’ उत्तरगान है, जो अपरिहार्य है, स्वाभाविक है और बिना किसी हस्तक्षेप के शुद्ध-विशुद्ध मानवीय है। ई.वी.आर. कहते हैं कि ब्रेख्त के उपरोक्त विचार कमोबेश उच्च आधुनिकतावादी रचनाओं के नाटकीय प्रभाव पर भी लागू होते हैं।

उक्त क्षेत्रातीत दृष्टि के विपरीत एक दूसरी दृष्टि भी है जिसमें यह विचार कि मनुष्य परिवेश का कार्यक्रम है और परिवेश मनुष्य का कार्यक्रम है, उस अनुभवात्मक क्षेत्र में समावेशित है जो पाठ/रचना के शाब्दिक विन्यास में पैबस्त है। इस दृष्टि के समर्थन में ब्रेख्त के विचार प्रासंगिक हैं जब वह कहते हैं कि कला के नए सिद्धान्तों की स्थापना और चित्रण/वर्णन के नए तरीकों को प्रस्तुत करने के लिए हमें बदलते हुए युग की मांगों की पहचान से शुरूआत करनी चाहिए जबकि समाज के पुनर्निमाण की आवश्यकता और सम्भावना आँखों के सामने मंडरा रही हो। मनुष्य के कार्यव्यापार की हर घटना का संज्ञान लेना चाहिए और चीजों को देखने के लिए सामाजिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।

कहना चाहिए कि कला के प्रति उपरोक्त दृष्टिकोण जिस आत्मालोचना को सम्भव बनाता है उसके जरिए हम अपने परिवेश के ऐतिहासिक सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक पहलुओं को न तो किसी बहाने से देखते हैं और न मनुष्य से अलग मानते हुए देखते हैं बल्कि हमारी दृष्टि का गठन मनुष्य के द्वारा होता है और मनुष्य का गठन हमारी दृष्टि के द्वारा होता है।

उपरोक्तानुसार ही अवांगार्द की सौन्दर्य चेतना जीवन की उस अन्तर्वस्तु से निर्धारित होती है जिसे सामाजिक परिवर्तन की गत्यात्मकता को समझ कर ही पाया जा सकता है। वस्तुतः उच्च आधुनिकतावाद और अवांगार्द आधुनिकतावाद के भीतर दो अलग सामाजिकस्थल और विरोधी राजनीतिक प्रवृत्तियो को दर्शाने वाले पद हैं। हालांकि यहां यह कहना जरूरी है कि कोई भी रचना पूरी तरह उच्च आधुनिकतावादी या अवांगार्दी नहीं हो सकती है। सच तो यह है कि आधुनिकतावादी कविता के तेवरो को केवल समाज और समाजेतर के सन्दर्भ में ही नहीं समझा जा सकता है। आधुनिकतावादी कवि ने पौराणिक आख्यानों के साथ जो गठबंधन किया है, उसे विवेचित किए बिना अवांगार्द और उसके बीच के फर्क को सूक्ष्मतः समझना मुश्किल है। कहने की आवश्यकता नहीं कि पौराणिक आख्यान भारतीय कल्पनाप्रणाली का चिरंजीवी आकर्षण है और इस हेतु उन भारतीय आधुनिक कवियों की चर्चा करनी होगी जिन्होंने आधुनिकता को पौराणिक आख्यानों के रसायन से रचा है।

‘ऐमबिव्अलन्स ऐज़ रिजिसटन्स्: मिथ ऐन्ड मॉडर्निज़्म’ के अध्याय में पुराणगर्भित आधुनिकतावाद को खोलते हुए ई.वी.आर., टेरी ईगलटन की ‘द आईडियोलाजी ऑफ़ द अस्थेटिक’ का उल्लेख करते हैं। टेरी ईगलटन का अभिमत है कि पौराणिक कथा, आधुनिकतावाद और एकाधिकारी पूंजी में पेचीदा सम्बन्ध है। जैसे ही लैस-ए-फ़ैअः अर्थव्यवस्था एक अधिक क्रमबद्ध पूंजीवादी प्रणाली में प्रवेश करती है वैसे ही व्यक्तिवादी अहं जीवन के नए अनुभवों का वाहक बनने के लिए अपर्याप्त हो जाता है। व्यक्ति से इतर और उसके विरूद्ध संसार का ऐसा स्वायत्त, स्वनियमित ढांचा खड़ा हो जाता है जो किसी आदत की तरह प्राकृतिक प्रतीत होता है। यह एक ऐसी कभी न बदलने वाली और सदैव बदलने वाली अजीब दुनिया हो जाती है जिसमें आदिम रूपों का विलय नफीस आकारों में हो जाता है। इसमें भी खास तौर से औपनिवेषीकरण की अधीनता में जी रहे व्यक्ति के स्वैरकल्पना (फन्तासी) और भ्रांति के ऐसे मायाजाल में जा गिरने की सम्भावना रहती है जहां से यथार्थवादी साहित्य के बजाय आधुनिकतावादी साहित्य प्रियतर लगता है।

यहां पर यह उल्लेख करना उपयुक्त होगा कि पश्चिमी रचनाओं/पाठ के संपर्क में आने के बहुत पहले से भारतीय कविगण काव्य रचना के लिए पौराणिक आख्यानों का उपयोग कर रहे थे किन्तु कविता के आधुनिकतावादी दौर में पौराणिक गाथाओं की व्याख्या उत्तर औपनिवेशिक सन्दर्भों और उनके विश्ववैचारिक ढांचे के अन्तर्गत की जाने लगी।

पौराणिक तौर तरीके का इस्तेमाल करके एक आधुनिकतावादी कवि, प्राचीन और समकालीन के बीच सतत तुलनीयता का आवाहन करता है और इसके जरिए उस सांस्कृतिक पुनःप्राप्ति को कायम रखना चाहता था जो स्वतंत्रता संग्राम में चलने वाले राष्ट्रवादी विमर्श का महत्वपूर्ण हिस्सा था। परन्तु एक निस्सीम और नवीकरणीय अतीत के प्रति इस आग्रह के साथ इतिहास के प्रति दुचित्तेपन की मानसिकता भी जुड़ी थी। पुराण के उपयोग द्वारा भारतीय कवि, इतिहास की एकरेखीय, प्रगतिशील और नियामक अवधारणा के विरूद्ध अपना अविश्वास दर्शाने के साथ-साथ उस सर्वभारतीय सांस्कृतिक अनुभव का भी आवाहन कर सकता था जिसका अभी तक भारतीय राष्ट्रीय विचारधारा ने विमर्शात्मक उपयोग नहीं किया था। प्राचीन का अर्वाचीन चेतना के साथ यह संयोग जिस सीमा तक पश्चिमी नमूनो और रीतियों के अनुसार किया गया उस सीमा तक किसी प्रामाणिक भारतीय स्व की खोज स्वतः अप्रमाणित हो जाती है। इस मामले में आधुनिकतावादी कवियों का दुचित्तापन उनके काव्य में पूरी तरह से प्रकट होता है। एक तरफ तो वह इतिहास के अन्दर वैधता प्राप्त करना चाहता है दूसरी तरफ वह पौराणिक काव्यात्मकता का आवाहन करते हुए अद्भुत और अपरिमेय को साधना चाहता है। अतः कविता में आधुनिकतावादी ऐहिक मुहावरे और प्राचीन साहित्य की पवित्र परम्पराओं के बीच क्रियाशील द्वन्दात्मकता के परिपे्रक्ष्य में धर्मवीर भारती का ‘अन्धा युग’ और अय्यप्पा पणिकर की ‘कुरूक्षेत्रम’ का विवेचन आवश्यक है।

‘अन्धायुग’ एक ऐसे महायुद्धोत्तर समाज के बारे में है जो कुलहन्ता-भातृहन्ता हिंसा के प्रभाव से बाहर निकलने में असमर्थ है। अन्धता इस नाटक का केन्द्रीय रूपक है जो साफतौर पर इशारा करता है कि हमारी नैतिक कल्पना, उत्तर औपनिवेशिक सामाजिक यथार्थ से सामंजस्य बिठाने में असमर्थ है। नाटक पर टिप्पणी करते हुए नेमिचन्द जैन ने कहा है कि प्रत्येक व्यक्ति यहां तक कि कृष्ण भी मानसिक एवं नैतिक अन्धता से ग्रस्त हैं जिसके कारण न केवल जीत, हार से अधिक दुःखदायी हो जाती है बल्कि वह आगे और विघटन का रास्ता तैयार करते हुए सभ्यता और संस्कृति को विध्वंस की ओर ले जाती है। भारती के नाटक की यह भविष्यदर्शी विनाशलीलामय दृष्टि एक ऐसा उपकरण हो जाती है जिसके जरिए उत्तर औपनिवेशिक इतिहास की अवसाद रेखाओं को उन प्रश्नचिह्नों में रूपांतरित कर दिया जाता है, जो एक नवजात समाज में स्वतंत्रता और उत्तरदायित्व के केन्द्रीय मुद्दों को सम्बोधित करते हैं।

नाटक के पौराणिक ढांचे में विनयस्त उपरोक्त भविष्यदर्शी मनोरूप, समाज की आदर्शवादी वाग्मिता का निषेध करता है। विदुर का ज्ञान बेकार हो जाता है। युयुत्सु की आत्महत्या और अश्वत्थामा का हत्यारापन, शाश्वत घोषित किए गए मूल्यों को अपनी वेदना से बींधते हैं। सत्य के प्रति युयुत्सु की प्रतिबद्धता उसे अपने लोगों (कौरवों) से विलग कर देती है और पांडवो का साथ देने के फलस्वरूप उसके हिस्से में तिरस्कार आता है। युधिष्ठिर एक ऐसे सिंहासन पर बैठते हैं जो अन्धता का उत्तराधिकारी है। ऐसे माहौल में अपने भाइयों के विरोध में सत्य के लिए लड़ने वाला युयुत्सु का नायकत्व निरर्थक सिद्ध होता है। अन्ततोगत्वा वह कृष्ण और उनके प्रभामंडल को अस्वीकृत करता है। सत्यवादी युधिष्ठिर के अर्धसत्य का मारा हुआ अश्वत्थामा, बदले और हिंसा का ऐसा भीषण दृश्य रचता है कि पृथ्वी का अपना जीवनतत्व खतरे में पड़ जाता है। अभिशप्त अमरत्व का घाव लिए वर्तमान और भविष्य में भटकता हुआ अश्वत्थामा भी कृष्ण को अस्वीकार करता है।

ई.वी.आर. के अनुसार कृष्ण के प्रति धर्मवीर भारती की चित्तवृत्ति आरम्भ से अंत तक उभयभावी रही है। जहां एक तरफ नाटक में कोरस गाने वाले, कृष्ण की सर्वव्यापी सर्वज्ञ दैवीयता का गान करते हैं वहीं नाटक का पाठ ऐसे वृतान्तों से भरा पड़ा है जो कृष्ण को एक तिकड़मी राजनयिक और एक असफल ईश्वर के रूप में दर्शाते हैं। इस दृष्टि से कृष्ण की मृत्यु के अंतिम क्षण महत्वपूर्ण हैं जहां वह एक शिकारी के बाण से मरते हैं और इस तरह से उनके देवत्व की प्रतिमा खंडित हो जाती है। पर उनका मृत्यु पूर्व का बयान जिसमे वह मृत्यु को एक रूपान्तरण मात्र मानते हैं और सारे उत्तरदायित्वों के आदान-प्रदान की घोषणा करते हैं, उन्हे एक दैवी आभा से प्रकाशित कर देता है। कीर्तिजैन यह संकेत करती हैं कि ईश्वर की इस तस्वीर पर ईसाई धर्म दर्शन का प्रभाव है। ई.वी.आर. का कहना है कि कृष्णरूप का इस तरह ईसारूप में विकसित होना भारती के दुचित्तेपन के एक कौतूहलजनक आयाम को उद्घाटित करता है। भारती की द्विविधा यह है कि जहां वह समस्त सर्वव्यापी शक्ति संरचनाओं पर अविश्वास करते हैं वहीं दूसरी तरफ पौराणिक आख्यान का उपयोग यह दर्शाता है कि भारतीय मानस/अनुभव का एक हिस्सा ऐसा भी है जो इन सारभूत संरचनाओं का समर्थन करता है। अन्धा युग अवसाद और अविश्वास का नाटक है, परन्तु नाटक का पुराणबद्ध ढांचा राष्ट्रीय परिपे्रक्ष्य मे मोहभंग के इस केन्द्रीय अनुभव को व्यक्त भी करता है और उसका प्रतिरोध भी करता है। उसी तरह, जैसे कृष्ण के चरित्रचित्रण के माध्यम से भारती जिस बात की पैरवी करते हैं, उसका विरोध भी करते हैं।

यहां यह जान लेना उपयुक्त होगा कि चालीस के दशक के अन्त तक पश्चिम में आधुनिकतावाद की प्रेरणाशक्ति समाप्तप्राय थी। भारत में टी. एस. इलियट की अध्ययनीयता की समीक्षा करते हुए पी. पी. रवीन्द्रन ने यह कहा है कि भारत में टी. एस. इलियट की स्थिति उस समय मजबूत हुई है जब पश्चिम में उनका प्रभाव काफी कुछ क्षीण हो चला था। इलियट के अधिकतर भारतीय अनुवादक, कवि थे, जैसे हिन्दी में धर्मवीर भारती और मलयालम में अय्यप्पा पणिकर। यद्यपि आधुनिकतावादी काव्यात्मक संवेदना पर इलियट का प्रभाव विस्तृत अध्ययन का विषय है तथापि इस प्रसंग में उल्लेखनीय है कि भारतीय कवियों ने पहले के ऐहिक इलियट और बाद के धार्मिक इलियट के बीच फर्क किया है और साथ ही एक ही कवि में दो भिन्न और विपरीत अनुभव-वृत्तियों की उपस्थित ने इन्हें मुग्ध भी किया है। यह बेमतलब नहीं कि भारती के अन्धायुग में इहलोक और पुण्यलोक में संगति बैठाने का प्रयास किया गया है। मराठी कवि मर्डेकर पर इलियट के प्रभाव का उल्लेख करते हुए चंध्राशेखर जहांगीरदार ने अपने निबन्ध ‘मर्डेकर ऐन्ड टी. एस. इलियट’ में कहा है कि जिस तरह से मर्डेकर ने अतीत और वर्तमान, पुराण और इतिहास तथा संतकाव्य और आधुनिकतावाद के बीच संवाद और सम्बन्ध कायम किया है, उस पर इलियट की बौद्धिक छाप है।

भारतीय कवियों द्वारा इलियट का स्वागत आगे चलकर 1950 के दशक में यूरोपीय अस्तित्ववादी कवियों यथा सार्त्र, बेने, कामू और काफ्का के सत्कार से मंडित हुआ। भारती के अंधायुग में युयुत्सु की आत्महत्या और अश्वथामा का अविवेकी हत्यारापन कुछ अस्तित्ववादी सवाल उठाते हैं। परन्तु भारती इन सवालों को उनकी परिणति तक इसलिए नहीं पहुंचा पाते क्योंकि वह स्वतंत्रता और उत्तरदायित्व के अस्तित्ववादी दृष्टिकोण को अपने नाटक के केन्द्र में नहीं स्थापित कर पाए। वस्तुतः हताशा का जो मनोभाव, निजता के संकट से उपजता है वह पणिकर की कविता में अधिक स्पष्टता के साथ दिखाई पड़ता है।

सितम्बर 1960 में प्रकाशित कविता ‘कुरूक्षेत्रम’ में पणिकर ने भगवत गीता की आरम्भिक पंक्तियों को सुभाषित की तरह प्रयुक्त किया है। कुरूक्षेत्र का यह रूपक स्व को एक संघर्षस्थली के रूप में प्रस्तुत करता है। इसके पूर्व 1950 में टी. एस. इलियट पर प्रकाशित एक लेख में पणिकर ने जोर देकर यह कहा था कि रूप और छन्द की बजाय भावानुकूल लय और अनुनाद कविता की रचना करते हैं। पणिकर के अनुसार, एक लेखक के लिए यह जरूरी है कि वह अपने वैयक्तिक और सार्वजनिक स्व को, दिग्काल से बंधे संसार के सापेक्ष सत्यों की समग्रता के भावनात्मक बोध के साथ, समन्वित करे। आगे आधुनिक मलयाली कविता के बारे में लिखते हुए पणिकर कहते हैं कि कवि की विचारधारा कविता की वाक्यरचना में मूर्त होती है। हर कविता का अपना एक सच्चा प्रामाणिक रूप होता है जिसे अंतर्वस्तु से स्वतंत्र होकर विचरने वाले किसी छन्द के अनुरूप नहीं ढाला जा सकता है।

ई.वी.आर ने पणिकर की कुछ पंक्तियों के अंगे्रजी अनुवाद के माध्यम से उनके मानस की प्रस्तुति की है। जीवन की जटिलता के सम्मुख सारे दर्शन व्यर्थ हैं। पणिकर बिलबिलाती, झगड़ती भीड़ के आधुनिक यथार्थ के बाद शांत और सुरम्य वातावरण भी रचते हैं। रूमानी भावनाओं की शब्दावली को कुछ इस तरह पुनर्गठित करते हैं कि रूमानियत की विश्वदृष्टि को प्रश्नांकित किया जा सके। महापौरूष के आख्यानों के जरिए महापौरूष की अवधारणाओं पर सवाल उठाते हैं। स्पष्ट है कि अनुरोध और प्रतिरोध का यह द्वंद कवि और उसके संसार के बीच एक दुचित्तेपन का आभास देता है।

‘मीनिंग्स चेन्ज विद चेन्जिंग क्वेसचन्स: फ्राम हाइ मॉडर्निज़्म टू द अवांगार्द’ के अन्तर्गत ई.वी.आर. ने कई भारतीय कवियों और कविताओं के माध्यम से भारतीय साहित्य में अवांगार्द के आर्विभाव और विकास का विवेचन किया है। ई.वी.आर. के अनुसार पौराणिकता पणिकर के कुरूक्षेत्रम की संरचना को बाहरी तौर पर ही स्थापित करती है। एक रणस्थली के रूप में कुरूक्षेत्रम का केन्द्रीय रूपक उस जनसंकुल संसार से सम्बन्धित है जहां बलात गढ़ा गया संश्लेषण व्यक्ति के स्व के विरूद्ध एक संकट बन कर आता है। यह वह समय था जब सामाजिक आन्दोलनों का रूपान्तरण नौकरशाही के संस्थापन में हो रहा था। नवोदित राज्य में शक्ति का केन्द्रीकरण और लोकप्रिय आन्दोलनों के नौकरशाही का उपकरण बन कर अपभ्रष्ट हो जाने के कारण एक ऐसा वैचारिक संकट उत्पन्न हो गया, जिससे शुरूआती दौर के आधुनिकतावादी कवियों ने कला की स्वायत्तता का दावा करके निपटना चाहा।

पीटर बर्जर की किताब ‘थ्योरी ऑफ़ अवांगार्द’ में इस मत की वकालत की गई है कि आधुनिकतावाद को, परम्परागत लेखकीय तकनीकों पर हमला समझा जाए और अवांगार्द लेखन को कला के संस्थानीकरण पर किया गया प्रहार माना जाए। पीटर बर्जर की उक्त किताब की भूमिका में जोखेन शुल्टे-सास टिप्पणी करते हैं कि एक बुर्जुआ समाज में कला की स्थिति उभयभावी और डांवाडोल होती है। एक तरफ आधुनिक समाज की शास्त्रीय-रूमानी कला समाज मे व्याप्त अजनबीयत का विरोध करती है और भविष्य में कुछ आदर्शों की प्राप्ति करना चाहती है, वहीं दूसरी तरफ चूंकि यह कला पृथक और स्वायत्त होने का दावा करती है इसलिए वह समाज में न्यस्त और व्याप्त अभावों का निरा मुआवजा अदा करके वास्तविक संघर्ष से किनारा कर लेती है। इस तरह से कला यथास्थिति का प्रतिरोध करती है और पोषण भी। वस्तुतः आधुनिकतावादी या सौन्दर्यवादी कला की प्राधानिक विशिष्टता यह है कि यह अपने ही साज़ सामान पर ध्यान बटोरने में लगी रहती है। भारती और पणिकर की आधुनिकतावादी रचनाएं अपनी शैलीगत  विशिष्टताओं की ओर ध्यान खींचती हैं। यहां भाषा स्वयं में एक मूल्य हो जाती है। सौंदर्य क्षेत्र को सामाजिक यथार्थ से स्वतंत्र रूप से परिभाषित करने के कारण उच्च आधुनिकतावाद उस तर्ज और अन्दाज को नहीं समझ पाया जिसके तहत कला एक बुर्जुआ समाज में क्रियाशील थी। इसका एक कारण यह भी था कि पूर्वअवांगार्द काल में कला के संस्थान को उतनी पर्याप्त ऐतिहासिकता के साथ परिभाषित नहीं किया गया था जो आधुनिकतावादी कलाकार को उसके दृष्टिपथ पर साफ-साफ दिखाई पड़ सके।

बीसवीं सदी के छठे और सातवें दशक में अवांगार्द लेखन ने भारतीय कविता में अपनी उपस्थिति का अहसास करया। महत्वपूर्ण बात यह है कि इसी अवधि में गजानन माधव मुक्तिबोध की कविता की क्रांतिकारी सम्भावना का मूल्यांकन हुआ। दलित कविता की सुगबुगाहट इसी समय से हुई। इस काल में मलयालम, हिन्दी और मराठी के अनेक लेखकों ने कला के संस्थानीकरण की अवधारणात्मक समझ विकसित की। सौन्दर्यपरक आधुनिकतावाद से अवांगार्द अथवा टेरी ईगलटन के शब्दों में ‘क्रांतिकारी आधुनिकतावाद’ की ओर हुए इस बदलाव को अनेक कविताओं के नक्शे-कदम पर चलकर समझा जा सकता है।

गोकि ई. वी. रामकृष्णन ने हिन्दी, मराठी और मलयालम कविताओं के माध्यम से ही आधुनिकतावाद की पड़ताल करने की मंशा शुरू में ही जाहिर कर दी थी, तथापि इस अध्याय में उन्होंने गुजराती के सीतान्शु यशस्चंद्रा की कवितावली जो मगन नाम के एक चरित्र के बारे में है, की विस्तृत चर्चा की है। मगन की अषक्त और अनायकोचित मुद्राएं मध्यवर्गीय मूल्यों की आलोचना और उपहास करते हुए शहरीपन के बेहूदेपन और भयावहता को उजागर करती है। (ई.वी.आर. ने निसीम इज्कील और मीनाक्षी मुखर्जी द्वारा अंग्रेजी मे अनुदित ‘मगन्स इन्सोलन्स’ नामक कविता मे से कुछ उद्वरणों का प्रयोग किया है जिसका पदच्छेद मैंने हिन्दी में किया है।)

यह कविता मगन की इस घोषणा के साथ आरम्भ होती है कि

वह जीना चाहता है। इस बात से गुजराती विद्वज्जन भौचक्के रह जाते हैं क्योंकि उन्होंने सदैव साहित्य को जीवन से अलग करके देखा है। वे मगन से कहते हैं कि वह साहित्य के पवित्र मंदिर को छोड़ दें। ऐसा कहते ही एक चमत्कार हुआ। सरस्वती देवालय से निकली और बोली जहां मगन जाएगा वहीं वह जाएगीं। उनके पीछे-पीछे प्रयोग देवी, सुश्री यथार्थ सब उस देवालय को छोड़ने को आमादा हुईं। मजबूरन विद्वज्जन ने कहा अरे! विध्नक ठहर और उस कोने में सड़। लेकिन मगन तो मगन ही है, उसने कहा कि वह प्यार करना चाहता है। इस पर उसे स्टेट बैंक की तिजोरी के सामने खड़ा कर दिया जाता है और उसे प्यार के करारे ‘बंडल‘ दिखाए जाते हैं, किन्तु मगन कहता है कि यह प्यार नहीं है। तब उसे जुतियाने और गरियाने वाली भाषा में पूछा जाता है कि अबे यह प्यार नहीं है तो क्या है? सारे बडे़ लोगों ने, पुरस्कार विजेताओं और पदकधारियों ने इसी स्त्रोत से अपनी कहानियों, कविताओं और नाटकों के लिए प्यार लिया है। अन्ततोगत्वा एक दिन मगन को पुरस्कार मिलता है और मंच उससे अपेक्षा करता है कि मूर्ख मगन भी कुछ कहे तो वह कहता है, (पुरस्कार प्राप्त करने के बाद) मैं जीना चाहता हूं, मैं प्यार करना चाहता हूं, मैं एक कविता लिखना चाहता हूं।

यहां यह उल्लेखनीय है कि अवांगार्द लेखन पूर्ववर्ती लेखकीय कला को अमान्य नहीं करता है, वह तो कला की उस संस्थानकता पर सवाल उठाता है जो जिन्दगी की जद्दोजहद से अलग है। शास्त्रीय आधुनिकता का एक लक्ष्य यह है कि वह मानवता, सत्य और आनंद जैसे मूल्यों को जीवन से बाहर कर कला की कक्षा में स्थापित कर देती है। सीतांशु की आपत्ति भी यही है कि इन मूल्यों को किसी आदर्श लोक में कैद न किया जाए। वस्तुतः धर्मवीर भारती और अय्यप्पा पणिकर ने जिस प्रकार जीवन के वास्तविक व्यवहार से कला को स्वतंत्र किया, उसी से वह रास्ता निकला जिसकी वजह से अवांगार्द लेखन ने यथार्थ का आलोचनापरायण बोध कराया।

सितांशु की पूर्वोक्त कविता में सामान्य भाषा का ओज है। बीसवीं शती के छठे और सातवें दशक में दलित कवियों ने अत्याचार और शोषण के विरूद्ध कविता की सामान्य भाषा को नए आयाम दिए। दलित कवि नामदेव ढसाल के बारे में दिलीप चित्रे लिखते हैं कि ढसाल ने यह दिखाया कि भावात्मक ऊर्जा को संघटित करने और उसे व्यक्त करने के लिए आक्रोष को तर्जोअंदाज की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है।

प्रतिवाद को स्वर देने वाले कवियों में शायद ढसाल अकेले ऐसे कवि हैं जो अंडरवर्ल्ड (अधोलोक) के बारे में एक अंतरंग व्यक्ति की तरह बात करते हैं। वह इस नरक के बारे में किसी बुर्जुआ पर्यटक की तरह नहीं बोलते वरन इसकी तमाम ध्वनियों को व्यक्त करते हैं। यहां यह याद रखने योग्य है कि भारत में आधुनिकीकरण की प्रक्रिया संदर्भयुक्त से संदर्भमुक्त की ओर गतिमान रही है, जैसा कि धर्मवीर भारती और अय्यप्पा पणिकर के पाठ से पता चलता है कि उनकी रचनाएं सार्वभौमिक और शाश्वत पर कुछ अधिक ही बल देती हैं। हिन्दू पौराणिक आख्यानों के उपयोग के फलस्वरूप उनकी रचनाओं से जो संकेत उभर कर आते हैं वह एक सर्वभारतीय राष्ट्रवादी विमर्श की पुष्टि करते हैं जबकि स्वयं उनकी अनुभवसामग्री ऐसे किसी भी वैधीकरण (अभिषेक) का विरोध करती है। दलित लेखक जन्म, जाति, लिंग और धर्म के सन्दर्भों पर बल देते हैं क्योंकि एक दलित, संस्कृति तथा उसके सामाजिक बोझ और अपने दलितपन को अलग करके नहीं रह सकता है। यह सवाल ‘मैं कौन हूं‘ एक दलित के लिए कोई तत्वज्ञानद सवाल नहीं है बल्कि आवश्यक रूप से राजनीतिक है। हिन्दू पौराणिकता में जिस तरह का  आदर्शीकृत लावलश्कर है वह वास्तविक मानवीय मानकों पर दुःख और पीड़ा की अभिव्यक्ति में बाधा पहुंचाता है। अतः यह अकारण नहीं है कि वाल्मीकि को संबोधित एक कविता में दलित कवि दया पवार उनके जन्म की विपरीत परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए यह पूछते हैं कि रामराज्य की प्रशंसा करते समय क्या उन्हें शूद्रों की चीख सुनाई नहीं दी। इस महाकवि को महाकवि कैसे माने? यदि एक भी पंक्ति वह इस उत्पीड़न के विरूद्ध लिखते तो हम उनका नाम छाती पर लिख लेते।

अम्बेडकर द्वारा 1956 में बौद्ध धर्म को ग्रहण करना दलित साहित्य के उदय के लिए एक बड़ी और महत्वपूर्ण घटना थी। एक ऐसी सामाजिक पहचान का वरण, जिसका गठन पारम्परिक और प्रचलित हिन्दू शास्त्रीयता से बाहर हुआ हो, निष्चय ही साहित्य पर अपेक्षित प्रभाव डालने वाली थी। दलित साहित्य का अवांगार्द रूप इसी घटना के बाद प्रकट हुआ। पुराण से इतिहास की ओर जाने वाले दलित साहित्य में समकालीन इतिहास की पुनर्रचना एक ऐसी भाषा में की जाती है जो उच्चआधुनिकतावाद के अभिजात्यवादी मुहावरे को स्वीकार नहीं करती है। दया पवार की कविता ‘बुद्ध’ में कवि, बुद्ध को अजन्ता और एलोरा की गुफाओं में नहीं देखता है वरन झोपड़ी से झोपड़ी तक चलते हुए और लोगों के दुःख हरते हुए देखता है।

आधुनिकतावादी कविताओं के समग्र मूल्यांकन के लिए उच्चआधुनिकतावाद और अवांगार्द लेखन के विभेद को समझना आवश्यक है। आधुनिकतावाद के शुरूआती दौर में उच्च आधुनिकतावाद अथवा सौन्दर्यात्मक आधुनिकतावाद ने मनुष्य की एक ऐसी अमूर्त अवधारणा प्रस्तुत की जिसमें एक शानदार राष्ट्रीय वितान के तले वर्ग, जाति, धर्म, क्षेत्र और लिंग के भेद ढंक जाते हैं। पौराणिकता की प्रणाली ही ऐसी है कि वह जीवन को उसकी ऐतिहासिक अंतर्वस्तु से निःशेष करते हुए, व्यक्तिगत अनुभव को राजनीतिरहित कर देती है। समाज के दलित और वंचित वर्गों के लिए स्वतंत्रता और अस्मिता की तलाश इतिहास से आरम्भ होती है। बीसवी सदी के पांचवे और छठे दशक में प्रवेश के समय भारतीय आधुनिकतावादी यूरोपीय आधुनिकतावादियों से प्रेरित थे, खास तौर से फ्रांसीसी सिम्बालिस्ट से तथा इलियट और पाउन्ड से। इसके बाद के भारतीय अवांगार्द कलाकार लोक प्रेरणा हेतु लातीनी, अमरीकी और अफ्रीकी लेखकों की ओर देखते थे। इस परिवर्तन के पीछे यह अहसास था कि वे तीसरी दुनिया के वासी हैं और यूरोपीय ढांचा उनके लिए कारगर नहीं है क्योंकि उत्तर औपनिवेशिक काल की अपेक्षाओं के तहत उन्हें अपनी सामाजिक अस्मिता को पुनर्परिभाषित करना है। अवांगार्द लेखक को राष्ट्रीय एजेन्डे की अपर्याप्तता और सीमा दिख रही थी।

छठे दशक के अन्त तक औपचारिक शिक्षा के प्रसार के कारण, शिक्षा से सुलभ हुई सामाजिक गतिविधियों में समाज के नए वर्गों का प्रवेश हुआ। चूंकि इन नवशिक्षित वर्गों का जीवनानुभव प्रचलित आभिजात्य मानदण्डों से मेल नहीं खाता था, इसलिए इस काल के लेखकों ने साहित्यिक भाषा और सामान्य भाषा के अंतर को ध्वस्त करते हुए पाठक और पाठ के रिश्ते को नए सिरे से ढाला। खासतौर से तलछट के संसार को अभिव्यक्ति देने वाली नामदेव ढसाल की भाषा। ढसाल ने एक अद्भुत जारज बोली का प्रयोग किया जिसके द्वारा उन्होंने उस  विशिष्ट और अनुभवसिद्ध स्थितियों को देखा-परखा जो उस स्थल और समय से वास्ता रखती थीं, जिनकी अच्छी तरह से शिनाख्त की जा सकती थी।

मलयालम की अवांगार्द कविता में ईसा और बुद्ध समकालीन इतिहास के दुःख-दर्द को संप्रेषित करने वाले केन्द्रीय रूपकों की शक्ल अख्तियार कर लेते हैं। चूंकि मलयालम में ईसा सम्बन्धी गद्य लेखन का अच्छा-खास इतिहास रहा है इसलिए इस परम्परा के गद्य की पद्यात्मक संभावनाओं की खोज के. आर. रामकृष्णन, के. जी. शंकर पिल्लई और के. सच्चिदानंदन की अनेक कविताओं में की गई है। जहां उच्च आधुनिकता के कवि अय्यप्पा पणिकर के ‘कुरूक्षेत्रम्’ में पद्यात्मक वाक्य-रचना का अनुनादी संगीत है वहीं छठे और सातवें दशक के अवांगार्द लेखन की रचनात्मक संरचना अधिक गद्यात्मक है। यह गद्यात्मकता उस जैविक एवं व्युत्पत्तीय दृष्टिकोण को अस्वीकृत करती है जिसके तहत कविता की एक स्वप्रयोजनपरक दुनिया को मान्यता दी जाती है। मनुष्य की दुःखद नियति की बौद्ध अवधारणा अथवा आत्मकथात्मक स्व पर बल देने वाली गद्यात्मकता का वहन करता हुआ टुकड़ा-टुकड़ा यथार्थ, स्थानीय बोलचाल की भाषा में या संकर जनभाषा के द्वारा अवांगार्दी भारतीय कविता की वाक्य-रचना में प्रवेश करता है। इस संदर्भ में के. जी. संकर पिल्लई की लम्बी मलयालम कविता ‘बंगाल’ (1972) का उल्लेख किया जा सकता है। यहां बंगाल उस वामपंथी क्रांतिकारी चेतना का द्योतक शब्द है जो इस अवधि में व्यवस्थावादी शक्तियों के विरूद्ध लामबन्द हो रही थी। यह कविता, धृतराष्ट्र का नाटकीय एकालाप है जिसमें उसकी अन्धता उस आत्म-विभाजन को रेखांकित कर रही हैं जो छठे दशक के अंतिम वर्षों में और सातवें दशक की शुरूआत में सतह पर आ गई थी। चरित्र रूपांतरण के द्वारा धृतराष्ट्र पुरानी व्यवस्था का संरक्षक बन कर प्रकट होता है और क्रांतिकारी आन्दोलन के प्रतिनिधि संजय से पूछता है बंगाल की क्या खबर है? यह कविता जोड़-जाड़ (मोंताज) की विधियों से गुजरती है जिसमें संष्लेषण के प्रयासों को नकारा गया है। यह जोड़-जाड़ विभक्तमना भारतीय समाज की अभिव्यक्ति है। अन्धा राजा धृतराष्ट्र उस विजन की असफलता का साररूप है जो एक बहुलतावादी समाज की जमीनी हकीकतों को नहीं देख पाया। इस कविता में भारती के अन्धा युग के पौराणिक रूपक को भारतीय समय की राजनीतिक अफरा-तफरी के संदर्भ में इतिहास के पन्नों पर फिर से रचा गया है।

हिन्दी के श्रीकान्त वर्मा की कविताओं में, खास तौर से उनकी मगध श्रृंखला की कविताओं में इतिहास उन रूपकों को उपलब्ध कराता है जो औपनिवेशिक संस्कृति के अवषेषों से पीडि़त आत्मबोध की जटिलता को उधेड़ने और खोलने का काम करते हैं। पराजय और पलायन के प्रतिबिम्ब इन कविताओं को कोंचते रहते हैं। विनय धारवड़कर ने वर्मा की कविता ‘खैबर‘ के बारे में कहा है कि ‘खैबर’ का जिज्ञासु-व्यक्तित्व संदेही स्वभाव का है, यहां तक कि उसमें अनास्था का भी कुछ तत्व है। वह उस इतिहास के प्रति कड़वाहट और क्रोध से भरा हुआ है जिसे वह परे ढकेलना चाहता है, वह एक स्थानीय क्रांतिकारी है जिसे प्राचीन और आधुनिक इतिहास ने जीत लिया है। ई.वी.आर कहते हैं कि ‘खैबर’ के बारे में की गई उक्त टिप्पणी ‘मगध’ श्रंखला की कविता में वर्णित खोज और तलाश की केन्द्रीय विषयवस्तु पर भी लागू होती है। खैबर में कवि पूछता है कि जब हर तरफ दुःख और द्वन्द है तो यह नए शिलान्यास क्यों किए जा रहे हैं।
मगध में कवि कहता है;

तुम भी तो मगध को ढूंढ रहे हो
बंधुओं
यह वह मगध नहीं है
तुमने जिसे पढ़ा है किताबों में,
यह वह मगध है
जिसे तुम
मेरी तरह
गंवा चुके हो

वर्मा की कविताओं में समकालीन यथार्थ से व्याकुल होने का सतत भाव है। उनकी कविताओं में अतीत की गर्त में खोए हुए राज्यों मगध, कलिंग, उज्जैन, हस्तिनापुर और कोसल में कुछ ऐसी अनोखी और पुरावृत्तीय आभा है जो किसी मुद्राशास्त्रज्ञ (न्यूमिसमैटिस्ट) के संग्रह में होती है। किन्तु वर्मा की कविता में सामाजिक दिशाभ्रम की प्रतीति के साथ कोई ऐसा आदर्शवादी आग्रह नहीं जुड़ा है जो उनकी तलाश की प्रतिगामी रूझान पर रोक लगा सके। वोले सोयिन्का के शब्दों में कहें तो ‘एक रचनात्मक सरोकार जो वास्तविकता की संकल्पना या विस्तार, शुद्ध-विशुद्ध आख्यान के परे जाकर करता है’ के अभाव में वर्मा की कविताएं उत्तर औपनिवेशिक समाज की थकान को ही केवल उजागर करती हैं। हालांकि यह बात अपनी जगह सही है कि यह थकान समकालीन भारत का एक गहरा यथार्थबोध है और इस सीमा तक वर्मा की कविताओं के स्वर प्रामाणिक रूप से भारतीय हैं। सामाजिक दिशाभ्रम की राजनीतिक अन्तर्वस्तु जिसका वह चित्रण कर रहे हैं, से वह भलीभांति अवगत हैं यह उनकी निम्न कविता की पंक्तियों में आने वाले इतिहास के बिम्बों में देखा जा सकता है।  तीसरा रास्ता नामक कविता मगध संग्रह से-

मगध में शोर है कि मगध में
शासक नहीं रहे
जो थे
वे मदिरा, प्रमाद और आलस्य के कारण इस लायक
नहीं रहे
कि उन्हें हम मगध का शासक कह सकें
लगभग यही शोर है।
अवन्ती में,
यही कोसल में,
यही
विदर्भ में
कि शासक नहीं रहे
जो थे
उन्हें मदिरा, प्रमाद और आलस्य ने
इस
लायक नहीं
रखा
कि उन्हें हम अपना शासक कह सकें
तब हम क्या करें?

इस क्षुब्ध प्रश्न के पीछे समाज की पुनर्संरचना करने की कवि की ताकत की सीमा और इससे उत्पन्न द्विविधा का भाव है। मलयालम में सच्चिदानंदन की अनेक कविताओं में सरोकार और मुठभेड़ के बीच की इस जमीन पर पैर रखने की कोशिश की गई है। उनकी कविता ‘बर्तोल्त ब्रेख्त और गौतम बुद्ध’ में कवि-नाटककार और संत के बीच एक चुनौतीपूर्ण मुलाकात दर्षाई गई है। ब्रेख्त- जानना चाहते हैं कि बुद्ध का ज्ञान भूख से मर रहे एक बच्चे के लिए क्या अहमियत रखता है? ब्रेख्त महसूस करते हैं कि पुराने उत्तर नए समय के लिए अनुपयोगी हैं क्योंकि कोई उत्तर सर्वकालिक नहीं होता। इसके प्रतिउत्तर में बुद्ध कवि को जीवक नामक भिक्षु की कहानी सुनाते हैं जो एक पागल हाथी पर चढ़ कर उसके कानों में अहिंसा का उपदेश उड़ेले दे रहा था। उस समय भला हो उस शिकारी का जिसने जीवक को रक्तरंजित निर्वाण से बचाया और साथ ही उन्हें जीवित रहने का रहस्य बताया। यहीं पर बुद्ध ब्रेख्त से कहते हैं कि ब्रेख्त जो कह रहे हैं वह अर्द्धसत्य है क्योंकि वस्तुतः बदलते सवालों के साथ उत्तरों के मायने बदल जाते हैं। अवांगार्दी लेखन के लिए बुद्ध की प्रासंगिकता स्पष्ट हो जाती है, यदि सन्दर्भनिष्ठ उत्तरों के प्रति उनके आग्रह को हम इतिहास की रेशा-रेशा  विशिष्टताओं की ओर लौटने की तरह देखें। वस्तुतः उत्तर देने वाले से उसकी व्याख्या की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। यह व्याख्या बदले हुए समय के पूर्वपक्ष और उत्तरपक्ष के हवाले कर देनी चाहिए।

उम्बर्टो इको के इस कथन कि विचारधारा वह विश्वास-व्यवस्था है जिसमें स्वयं का प्रतिवाद करने और वैकल्पिक विश्वास-व्यवस्था, की पहचान करने की जगह ही नहीं होती, के साथ ई. वी. रामकृष्णन, मुक्तिबोध के दरवाजे पर ‘द अनअचीव्ड अब्सोल्यूट एक्सप्रेशन‘ एन्ड द मॉर्डनिटी ऑफ़ मुक्तिबोध’ कहते हुए आवाज लगाते हैं।

संक्रमणकालीन समाजों में अक्सर एक कवि से अपेक्षित होता है कि वह एक आलोचक की भूमिका भी निभाए। इस कवि-आलोचक को विचारों के उस वातावरण को तैयार करना पड़ता है जिसके तहत उसकी रचनाओं का पाठ सम्भव होता है। गजानन माधव मुक्तिबोध एक ऐसे ही कवि-आलोचक थे। समाज के अन्तर्विरोध और सामाजिक व्यवहार के दोगलेपन के बारे में उनका आधारिक अनुभव हिन्दी कविता के प्रचलित रूपों और रूपात्मक संभावनाओं में अंटने वाला नहीं था। 1944 के ‘तारसप्तक’ में छपे उनके वक्तव्य में उनके इस असन्तोष का स्पष्ट उल्लेख है।
आक्टेवियो पाज़ ने एक जगह कहा है कि आधुनिकता की माप-तौल औद्योगिक प्रगति से नहीं वरन् आलोचना और आत्मालोचना की क्षमता से होती है। मुक्तिबोध में आलोचना और आत्मालोचना की यही क्षमता, उनकी आधुनिकता और समकालीन रचनाकारों से उनकी भिन्नता को परिभाषित करती है। इससे इस बात की भी समझ पैदा होती है कि क्यों 1960 के बाद के कवियों पर उनका उल्लेखनीय प्रभाव पड़ा। काव्यरूपों को खोलने की प्रक्रिया में उन्हें उस काव्य परम्परा के आवश्यक तत्वों को विघटित करना पड़ा जिसने काफी हद तक उनके स्व और संवेदना का गठन किया था। ‘तारसप्तक‘ (1944) के वक्तव्य में वह हमें बताते हैं कि कैसे वह समकालीन हिन्दी कविता के सौन्दर्यवादी आदर्शों और मानवीय यथार्थ जैसा कि टालस्टाय और कुछ मराठी लेखकों की कृतियों में व्यक्त हुआ, के बीच, खींचा-तानी के शिकार होते रहे। लेखक की प्रवजन प्रवृत्ति पर बल देते हुए वह कहते हैं कि लेखक को शुद्धतः निजी और व्यक्तिगत से ऊपर उठना है ताकि वह आधुनिक संसार की बहुलता और विविधता का साक्षात्कार कर सके। मुक्तिबोध यह मानते हैं कि काव्यमय जीवन हमारे दैनिक जीवन का आवश्यक हिस्सा है इसलिए कविता के मूल्य सामान्य जीवन के मूल्यों का खंडन नहीं कर सकते हैं। सौन्दर्यात्मक सवाल इसीलिए प्रासंगिक हैं क्योंकि वास्तविक जीवन में उनकी आचरणात्मक हिस्सेदारी है। मुक्तिबोध ने उस समय यह लिखा कि प्रसाद, पन्त और महादेवी का जमाना बीत चुका है, उनकी कल्पनाशक्ति  और उनकी रहस्यात्मक अनुभूतियां पुरानी पड़ चुकी हैं।

उल्लेखनीय है कि मुक्तिबोध का विद्रोह पूरी हिन्दी काव्य परम्परा के विरूद्ध नहीं था बल्कि रूमानियत के उस संस्करण के विरूद्ध था जिसके बारे में एक अच्छी खासी उदारचरित संरक्षणवादी सहमति बन गई थी। टैगोर की गीतांजलि और भारतीय दर्शन में अहंब्रह्मास्मि की तत्वज्ञानी अवधारणा से प्रेरणा प्राप्त करते हुए छायावादी कवियों ने कविता को एक नया प्रगीतात्मक स्वर दिया जिसमें स्वरूप की और विश्वरूप की एकता पर बल दिया गया था। करीने शोमेर ‘महादेवी वर्मा ऐन्ड द छायावाद, एज़ ऑफ़ माडर्न हिन्दी पोएट्री’ में टिप्पणी करती हैं कि छायावादियों के लिए प्रत्येक मनुष्य में कुछ ऐसा है जिसे घटाया या कम नहीं किया जा सकता है और यह कुछ अनन्तः महत्वपूर्ण है।

वस्तुतः छायावादी कविता का सारतत्व यह है कि वह कविता के लिए एक अमूर्त, आत्मनिष्ठ और आभ्यांतरिक लोक की रचना करती है। इस सिलसिले में अपने निबन्ध ‘आधुनिक हिन्दी कविता में यथार्थ’ में महादेवी वर्मा और हरिवंश राय ‘बच्चन’ की तुलना करते हुए मुक्तिबोध कहते हैं कि महादेवी के आंसू हमें द्रवित नहीं करते हैं, जबकि बच्चन की ‘निशानिमंत्रण’ हमें रूलाती है, क्योंकि महादेवी ने दुःखवाद का कल्ट बना लिया जो उनकी कल्पना से उत्पन्न है, इसके विपरीत बच्चन स्वयं रोया है, खुद, तब वह दूसरों को रूला सका। छायावाद की शैल्पिक शब्द-योजना में यह कूवत ही नहीं रही कि वह नई संवेदना के आधारभूत अंतर्द्वंद्वों  को संप्रेषित कर सके। मध्यकालीन भक्त कवियों पर लिखे निबन्ध में मुक्तिबोध यह दर्शाते हैं कि किस प्रकार यह कवि व्यथा और उत्पीड़न के मानवीय यथार्थ से परिचित और प्रेरित थे। यह भी कि आधुनिक भारतीय कवि को भक्ति काव्य के माध्यम से वह पूर्व औपनिवेशिक परम्परा उपलब्ध है जो वंचित वर्गों के दुःख और उत्पीड़न से पहचान कायम कर चुकी थी। अलबत्ता, जब इस भक्ति परम्परा ने जात-पात से परे अपना प्रभाव क्षेत्र बनाया तब उच्चवर्ग ने जातिभेद को बल देने के लिए इस परम्परा का हरण कर लिया। वर्तमान में भी नए साहित्यिक आन्दोलनों की क्रान्तिकारी सम्भावनाओं का यही हश्र हो रहा है कि शासकवर्ग ने उन्हें यथास्थिति के हित में अनुकूलित कर लिया है। छायावाद और आधुनिकतावाद के साथ यही हुआ और मुक्तिबोध ने इस तरह की कथनी और करनी से विद्रोह किया।

जयशंकर प्रसाद की ‘कामायनी‘ पर मुक्तिबोध का प्रबन्ध, भारतीय कविता की एक केन्द्रीय परम्परा से उनकी पसन्दगी और नापसन्दगी का रिश्ता सामने लाता है। वह प्रसाद के कल्पनात्मक विस्तार, प्रवाह और उनकी आह्वानक ताकत से प्रभावित हैं। वह किसी शोध-विचार को काव्यरूप में प्रस्तुत करने की प्रसाद की योग्यता के भी कायल हैं लेकिन मुक्तिबोध प्रसाद की उस विश्वदृष्टि को खारिज करते हैं जो छायावादी कविता के आभिजात्यवादी और तत्वज्ञानी मिजाज का प्रतिनिधित्व करती है। मुक्तिबोध कामायनी के मनु को उन सामंती मूल्यों का मूर्तिमान रूप मानते हैं जो समकालीन इतिहास की समस्याओं के प्रति उच्चवर्ग के रवैये का बोध कराता है। मुक्तिबोध कहते हैं कि प्रसाद का मनु उसी सामाजिक वर्ग का है जिसका अंग और अंश प्रसाद हैं। कामायनी का मनु, वेदों का मनु नहीं है।

ई.वी.आर. के अनुसार प्रसाद की कामायनी उस प्रगीतात्मक और आत्मविष्लेषक स्व की आभ्यांतरिकता की खोज का प्रयास है जो अपनी निजता की स्थापना भव्य कल्पनाप्रवण प्रश्नों के द्वारा करती है। मनुष्य के उद्गम और उसकी पूर्णता की आकांक्षा की निजी पौराणिकी रच कर प्रसाद उस पीढ़ी को स्वर दे रहे थे जो कला और कल्पना की मूल्यवत्ता का सम्मान करती है और यह विश्वास करती है कि इनके द्वारा मानवीय सीमाओं के परे जाया जा सकता है, मानव जीवन को बदला जा सकता हैं। करीने शोमेर कहती हैं कि ‘कामायनी’ महज़ पुरावृतांतवाद का अभ्यास नहीं है, वरन् इसके जरिए एक ऐसी विश्वदृष्टि बनाने-चुनने की कोशिश की गई है जो आधुनिक हिन्दू बुद्धिजीवी के अन्तर्विरोधों का समाधान कर सके, ऐसा बुद्धिजीवी जो आधुनिक पश्चिम के इहलौकिक दृष्टिकोण और उस धार्मिक (पारलौकिक) दृष्टिकोण के बीच फंसा है जिसकी अब वह साख नहीं रही।

लगभग दो दशकों तक कामायनी से मुक्तिबोध की संलग्नता इस तथ्य को सत्यापित करती है कि मुक्तिबोध उन्हीं अन्तर्विरोधों की अनुक्रिया कर रहे थे जिनके समाधान के लिए प्रसाद प्रयत्नशील थे। मुक्तिबोध ने ‘कामायनी’ को किसी ऐतिहासिक या वैदिक काव्य के परिप्रेक्ष्य में नहीं देखा वरन् उन्होंने उसे एक ऐसी कविता के रूप में देखा जो स्वैरकल्पना (फन्तासी) के माध्यम से समकालीन जीवन की समस्याओं को सम्बोधित कर रही है। चूंकि मुक्तिबोध ने अपनी कविता में इसी प्रकार की कल्पना का उपयोग किया था इसलिए वह यह जानते थे कि कामायनी की विस्तृत काव्यगत संरचना, वह आवश्यक कथाबद्ध ढांचा है जो कवि और उसकी कलावस्तु के बीच में वाजिबी फासला पैदा करती है। मुक्तिबोध यह आवश्यक समझते हैं कि कामायनी की कलागत विशेषता और उसके स्थापत्यिक गुण को उस प्रतिगामी और प्रतिक्रियावादी जीवन दृष्टि से अलग किया जाए जो रचना में मूर्तित होती है। चूंकि कामायनी छायावादी काव्योत्कर्ष का अहम प्रतिनिधित्व करने वाली रचना है अतः उसके अंतर में रूपात्मक प्रवीणता और वैचारिक आकाशीयता के बीच जो विग्रह है वह समकालिक इतिहास की चुनौतियों का सामना करने में हिन्दी की मुख्यधारा की काव्यपरंपरा की गहरी खिंची सीमाओं की ओर इंगित करता है। जहां प्रसाद विभाजित स्व के पुनर्संघटन के लिए भारतीय तत्वज्ञानी परम्पराओं की ओर देखते हैं वहीं मुक्तिबोध ऐसे उपचार को बेकार समझते हैं। अतः प्रसाद की कल्पना और मुक्तिबोध की कल्पना में कोई गहरा मेलजोल नहीं है।

अज्ञेय द्वारा समर्थित आधुनिकतावादी शैली की तर्कणा आंग्ल-अमरीकी साहित्यिक प्रतिष्ठान द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्तों पर आधारित थी। रिल्के, वैलेरी, ज्वायस, इलियट और यीट्स वगैरह ने कल्पना की स्वायत्तता और स्वांतः सुखाय कलादृष्टि पर बल दिया है। लेकिन बीसवी सदी के पांचवे दशक तक इस प्रकार की सौन्दर्याभिरूचि या उच्च आधुनिकतावाद भारतीय साहित्यिक गृहस्थी का अंग बन चुके थे ओर छठे दशक तक बहुत से भारतीय विश्वविद्यालयों ने इन्हें अपने पाठ्यक्रम में शामिल कर लिया था। इस प्रकार आधुनिकतावाद की अंतर्हित मुक्तकारी शक्तियों को वशवर्ती बनाया जा चुका था और एक प्रतिपक्षी संस्कृति के रूप में उसकी वैधता का क्षरण हो चुका था। यह अनायास नहीं कि मुक्तिबोध ने रूमानियत के छायावादी रूप और उच्च आधुनिकतावाद के शास्त्रीकृत संस्करण से दूरी बनाने की कोशिश की क्योंकि यह दोनों ही सामाजिक-राजनीतिक क्षेत्र में यथास्थिति की पुष्टि करने लगे थे। मुक्तिबोध ने अपने निबन्ध ‘नयी कविता और आधुनिक भाव-बोध’ में इस बात पर अफसोस जताया है कि हम आधुनिकतावाद की तस्वीर केवल यूरोप और अमरीका में देखते हैं, जिसके फलस्वरूप अनेक भारतीय कवि पश्चिमी काव्य को भारतीय परिधान में प्रस्तुत करने लगे हैं। मुक्तिबोध कहते हैं कि भारतीय कवियों को अफ्रीका, एशिया और लातीनी अमरीका के नवोदित समाजों से प्रेरणा ग्रहण करनी चाहिए जहां सामाजिक परिवर्तन और पुनर्रचना के लिए किए जा रहे संघर्ष ने एक नई चेतना पैदा की है।

मुक्तिबोध आश्वस्त थे कि यूरो-अमरीकन उच्च आधुनिकतावाद भारतीय यथार्थ के समन्वेषण के लिए भारतीय साहित्यकार को कोई उपयोगी ढांचा उपलब्ध नहीं करा सकता है। इस बात के दृष्टिगत कि मुक्तिबोध इन विचारों को पांचवे दशक में ही अभिव्यक्ति दे रहे थे, यह सम्भव है कि वह आधुनिक हिन्दी कविता में क्रान्तिकारी प्रवृत्ति का सचेत पोषण कर रहे थे।
पेंगुइन से प्रकाशित ‘न्यू राइटिंग इन इण्डिया’ में आदिल जस्सावाला मुक्तिबोध को अंग्रेजी में अनुदित करने में आई समस्या का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि उन्हें अनुदित करने में वही दिक्कत होती है जैसे डायलन टामस को किसी विदेशी भाषा में अनुदित करने में होती हैं। हिन्दी की ध्वनि का पूर्ण उपयोग करते हुए मुक्तिबोध की कविताएं हिन्दू पौराणिकता और लोक कथाओं से भरी पड़ी हैं। इसके साथ ही वह बेबीलोनिया, असीरिया और ग्रीक सभ्यताओं से भी कुछ न कुछ ग्रहण करते हैं।

उक्त स्थिति में स्वाभाविक है कि मुक्तिबोध छोटे प्रगीतात्मक उच्वारों की तुलना में लंबे तारतम्यात्मक वर्णनविधान को अधिक पसन्द करते थे क्योंकि इस तर्जे कलाम में लगातार विकसित होते हुए स्व को धारित करने लायक आख्यानात्मक अवकाष मिल जाता था। ‘तार सप्तक’ के द्वितीय संस्करण में उन्होंने कहा भी कि उनकी समस्या यह नहीं है कि अंतर्वस्तु की कमी है और रूप की समृद्धि है बल्कि समस्या यह है कि अंतर्वस्तु की बहुतायत है और रूप अपर्याप्त है। जुस्तजू इस बात की है कि कैसे अंतर्वस्तु की विविधता को समेट कर इसकी रूप रचना की जाए। अव्यक्त स्व की मनोवेदना मुक्तिबोध को जीवनभर सालती रही। उनकी ‘अंधेरे में‘ का अन्त निम्न पंक्तियों से होता है:

खोजता हूं पठार… पहाड़… समुन्दर
जहां मिल सके मुझे
मेरी वह खोयी हुई
परम अभिव्यक्ति अनिवार
आत्म – सम्भवा

व्यक्त होने और करने की यह कठिनाई उन औपनिवेशिक जटिलताओं से उपजी थी जो अभिव्यक्ति के रास्ते में अवरोध की तरह खड़ी थीं। इसका मतलब यह था कि मुक्तिबोध अपने अनुभवों के उस राजनीतिक मर्म के लिए जगह पैदा करें जिसके लिए मुख्यधारा की हिन्दी कविता में अब तक कोई गुंजाइश नहीं थी। मुक्तिबोध ‘नयी कविता और आधुनिक भाव बोध’ में कहते हैं कि हमारी जिन्दगियों की खंड-खंड अवस्था के कारण नई कविता केवल द्रुत-क्षणिक बिम्ब बना पाती है। मुक्तिबोध देख सकते थे कि उनके यंत्रणाग्रस्त अन्तस की गहरी बेचैनी एक विभाजित समाज की आन्तरिक हिंसा को प्रतिबिम्बित करती थी। ‘चांद का मुंह टेढ़ा है‘ क्योंकि चांद का मुंह टेढ़ा होना उक्त समाज की कुटिलता, दिशाभ्रम और अधोगति का प्रतीक है।

अपनी कविता में मुक्तिबोध प्रतिरोध की एक ऐसी चाक्षुष भाषा की संरचना करते हैं जो संसार का निरूपण करने वाले तमाम सुव्यवस्थित और तार्किक तरीकों को चुनौती देती है। इस सम्बन्ध में ध्यातव्य है कि रूमानियत की छायावादी शैली और उच्च आधुनिकतावाद के शास्त्रीय संस्करण दोनों में ही, उस रूपरीति और बुद्धिवाद को वरीयता दी गई की जो प्राचीन भारतीय दर्शन और नैतिकता की विरासत का समर्थन करते प्रतीत होते थे। किन्तु जिस प्रकार भक्ति आन्दोलनों ने प्राचीन, शास्त्रीय और आभिजात्यवादी विश्वदृष्टि के विरोध में एक प्रतिव्यवस्था खड़ी की थी वैसे ही मुक्तिबोध ने एक ऐसे क्रान्तिकारी आधुनिकतावाद के पोषण का प्रयास किया जो समकालीन इतिहास की विकृतियों को पकड़ने में उनकी घेरेबंद, व्यूहित कल्पना की मदद कर सके।
मुक्तिबोध की कविता के भूदृश्य में प्राचीन खंडहर, परित्यक्त सूनी बावलियां, निर्जन उबड़-खाबड़ पठार, गैर आबाद घाटियां और अन्धेरी संकरी गलियां हैं। इस जमीन की खौफनाकी खुद मुक्तिबोध के अस्तित्व के संकट का बयान करती है। नेमिचन्द जैन को भेजे गए उनके बहुत से खतों में, इस बैरी दुनिया में सम्मान के साथ जीने की उनकी इच्छा और संघर्ष को देखा-पढ़ा जा सकता है। इन खतों में वह अन्धेरा डरावना पाताल है जिसमें वह जी रहे हैं, जहां उनकी आत्मा पर सांप रेग रहे हैं, जहां मन की सारी दुरवस्थाएं प्रेत के आकार में तब्दील होती हैं। इस भूमिगत मनोभूमि का दुःस्वप्न अतिप्रकृत यथार्थवादी (सररिअलिस्टिक) बिम्बो के द्वारा उनकी कविता ‘ब्रह्मराक्षस’ में प्रकट हुआ हे। ‘तीसरा क्षण’ नामक निबन्ध में उन्होंने रचनात्मक कर्म में स्वैर अथवा विलक्षण कल्पना (फैन्टेसी) के तत्व पर विस्तार से लिखा है। वह कहते हैं कि काव्यकर्म का सर्वोच्च क्षण अथवा तीसरा क्षण उस समय घटित होता है जब सामाजिक यथार्थ से प्रेरित पूर्वोक्त कल्पना शब्दों में मूर्तित होती है और भाषा में इंद्रियसंवेद्य रूप ग्रहण करती है। यहां यह कहना कदाचित अप्रासंगिक न होगा कि रामविलास शर्मा ने पराविद्या में मुक्तिबोध की रूचि और जासूसी कथासाहित्य में उनकी दिलचस्पी को कुछेक उन प्रभावों में से माना है जिन्होंने मुक्तिबोध की कविता के मुहावरे को गढ़ा है।

यहां यह जानना भी उपयुक्त होगा कि यद्यपि अतिप्रकृत यथार्थवाद (सररियलिज्म) प्रथम विश्वयुद्ध के बाद यूरोपीय अनुभवों से उपजा था तथापि इसने लातिनी-अमरीकी और अफ्रीकी लेखकों को भी खूब प्रभावित किया था। ‘ड्राइंग द लाइन: आर्ट ऐन्ड कल्चरल आईडेनटिटी इन लेटिन अमरीका’ में ओरियाना बड्डे और वलेरी फ्रेज़र ने यह कहा है कि अनेक लातीनी-अमरीकी देशों में खोई हुई मासूमियत के निमित्त, अतीत की ललकित याद (नॉस्टेल्जिया ), प्राचीन कलाओं के रहस्यात्मक संकेत-सूत्र और नमूनागरी की रिवाज़ी ताकत, के कुछ राजनीतिक आयाम रहे हैं। यूरोप द्वारा इन देशों को जीतने और कब्जियाने से पहले का कालखण्ड यद्यपि इन देशों के वर्तमान निवासियों के जीवन के लिए अजनबी ही था तथापि लुप्त अतीत के प्रति उनकी जो कलात्मक आसक्ति थी, वह लातीनी अमरीकी संस्कृति की यूरोप की संस्कृति से अलग पहचान कायम करने में समर्थ थी। अतीत की इस सांदर्भिकता में औपनिवेशिक विग्रह की जानकारी अतर्निहित थी। इन स्रोतों की ओर लौटना दो बातों का परिचायक है, प्रथमतः कलात्मक प्रस्तुति की प्रचलित और मान्य परम्पराओं की अस्वीकृति और द्वितीयतः देशी संस्कृति की विशेष पहचान की दावेदारी।
मुक्तिबोध द्वारा कविता में अतिप्रकृत यथार्थवादी तारतम्यात्मकता का उपयोग भारतीय अनुभूति के पूर्व औपनिवेशिक स्रोतों की ओर लौटने का एक प्रयास है। मनोवैज्ञानिक स्तर पर समझा जाए तो यह देशी संस्कृति की आद्यरूपा छवियों की ओर वापस आना है। पश्चिम के पारम्परिक साहित्य या मुख्यधारा की भारतीय कविता की खुराक पर पले दिल-ओ-दिमाग को पूर्वऔपनिवेशिक भारत की यह स्वैरकल्पना कुछ विचित्र और विचलित लग सकती है, परन्तु इस कल्पना की मूल्यवत्ता पर बल देकर मुक्बिोध एक ऐसी चाक्षुष भाषा को गढ़ते हैं जो आधुनिकतावादी विरासत से हमारा आमना-सामना कराती है। बड्डे और फ्रेज़र यह बताते है कि तीसरी दुनिया के जो देश सांस्कृतिक स्वाधीनता की छोटी-बड़ी लड़ाइयों में फंसे थे उनके विद्रोह की आंतरिक भाषा को अतिप्रकृत यथार्थवाद वैधता प्रदान करता था। कविता ‘ब्रह्मराक्षस’ हमें यह समझने में मदद कर सकती है कि कैसे मुक्तिबोध भारतीय स्थिति की  विशिष्टताओें को अतिप्रकृत यथार्थवाद में संयोजित करते हैं। अनुष्ठान और स्वप्न की जादुई दुनिया का सृजन करके कविता एक प्रागैतिहासिक वातावरण का आह्वान करती है। ब्रह्मराक्षस एक पैशाचिक, पौराणिक और प्रातिभासिक आकृति है जो मुक्ति की आशा के बिना, प्राश्चित करने के लिए अभिशप्त है। कविता शुरू होती है शहर के उस ओर खंडहर की तरफ परित्यक्त सूनी बावड़ी से, जिसे घेर रखा है खूब उलझी हुई डालों ने। उसी बावड़ी की अबूझ सिहराती-सिहराती गहराइयों में बैठा हुआ ब्रह्मराक्षस अपनी पाप-छाया को धोने के लिए लगातार देह को साफ कर रहा है। पर यह मैल छूटती नहीं है। तो वह उच्चारता है कोई अनोखा स्तोत्र, कोई क्रुद्ध मन्त्रोच्चार अथवा उमड़ता है शुद्ध संस्कृत गालियों का ज्वार। अगर किसी तिरछी होकर गिरती हुई रवि-रश्मि के उड़ते हुए परमाणु उस तक पहुंचते हैं तो वह समझता है कि सूरज ने उसे सलाम भेजा है। अगर भूली भटकी चांदनी की कोई किरण बावड़ी की दीवार से टकराती है तो वह समझता है कि चंद्रमा ने उसे गुरूपद पर अभिषिक्त कर दिया है। ब्रह्मराक्षस ने सारी विद्या पढ़ ली है; सुमेरी -बैबीलोनी जनकथाओं से मधुर वैदिक श्रृचाओं तक, सारे सूत्र, छन्द मंत्र थियोरम, सब प्रमेयों तक और मार्क्स, एंजेल्स, रसेल, ट्वायनबी, हीडेग्गर, स्पेंगलर सात्र्र और गान्धी को आत्मसात कर इनका नया व्याख्यान करता हुआ वह अहर्निष नहाते हुए खुद से जूझ रहा है। अंधेरी सीढि़यों पर चढ़ते-उतरते और चोटिल होते हुए उसे लगता है कि बुरे और अच्छे के बीच के संघर्ष से भी उग्रतर है अच्छे और उससे अधिक अच्छे के बीच का संगर। दो असंगत संसारों के उलझे हुए गणित के रण में अंततः उसका अंत हुआ। इस अतिक्रांत अंतगति के समय में कवि उसका षिष्य होने की इच्छा व्यक्त करता है ताकि वह उसके अधूरे काम को पूरा कर सके और उसकी वेदना के स्त्रोत तक पहुंच सके।

निबन्ध ‘तीसरा क्षण’ में मुक्तिबोध कहते हैं कि भाषा एक सामाजिक परिसम्पत्ति है और हर शब्द के पीछे एक अर्थपरम्परा है जो सामुदायिक जीवन से जुड़ी हुई है। मष्तिष्क को अस्थिर करने वाले वित्रास को एक काव्यपदार्थ में, उसी कला द्वारा परिणत किया जा सकता है जो कला सामाजिक वैधता को अपना प्रतिमान बनाती हो। भावोन्माद और आत्मसंशय के पाताललोक से बाहर निकलने के लिए ब्रह्मराक्षस एक ऐसे गुरू की खोज में है जो उसे उक्त सामाजिक वैधता के संधान के लिए मुक्त कर सके। मुक्तिबोध की आधुनिकता इस तथ्य में निहित है कि वह आधुनिक भारतीय की निजता के संकट को एक बृहत्तर सामाजिक-राजनीतिक और ज्ञानमीमांसक संकट के अंग के रूप में देखते हैं।

मुक्तिबोध की कविता ‘अंधेरे में’ इस संकट की स्पष्टतर अभिव्यक्ति है। इस प्रसंग में एक घटना उल्लेख्य है। वर्ष 1962 में मुक्तिबोध की एक पुस्तक ‘भारत: इतिहास और संस्कृति’ को मध्य प्रदेश सरकार ने माध्यमिक शिक्षा के पाठ्यक्रम में शामिल कर लिया था लेकिन पुस्तक तुरन्त ही विवादों का शिकार हो गई है और सम्पादकों तथा लेखकों के एक वर्ग ने भी इसका खासा विरोध किया। मुक्तिबोध को सफाई का कोई मौका दिए बिना सरकार ने पुस्तक पर प्रतिबंध लगा दिया। इस घटना ने मुक्तिबोध को बहुत विचलित किया। हरिशंकर परसाई के अनुसार मुक्तिबोध ने इस सब को फासिस्ट शक्तियों के आर्विभाव के रूप में देखा। इसके अलावा मुक्तिबोध यह देख सके कि जिस विभाजित स्व के कारण अर्थपूर्ण अभिव्यक्ति बाधित होती है वह वस्तुतः समाज की अंगभंग सांस्कृतिक संवेदना की उपज है।

‘अंधेरे में’ का लम्बा सिलसिलेवार आख्यान कवि के स्व को संघर्ष और द्वंद के क्षेत्र के रूप में चिह्नित करता है। सामाजिक दशा और मनःस्थिति से उत्पन्न भय और मुठभेड़ के रूपक कविता को कोंचते-कुरेदते रहते हैं। कवि के जीवन के अंधेरे में विचरने वाली एक अदृश्य आकृति लाल-लाल कुहरे के श्वास-प्रश्वास से भरी एक तिलस्मी खोह में रहती है। गजब है यह आजानु भुज, सौम्य-सुन्दर सन्देहार्थक आकृति।

वह रहस्यमय व्यक्ति
अब तक न पायी गयी मेरी अभिव्यक्ति है
पूर्ण अवस्था वह
निज-सम्भावनाओं, निहित प्रभावों, प्रतिमाओं की,
मेरे परिपूर्ण का अविर्भाव
हृदय में रिस रहे ज्ञान का तनाव वह,
आत्मा की प्रतिमा

परन्तु यह अनभिव्यक्त स्व, उसका फटेहाल रूप, उसकी रक्त रंजित काया, ये सब, भय, पश्चाताप और दुश्चिंता की खोह में फंसे हुए तड़प रहे हैं। यहां यह याद करना प्रासंगिक होगा कि सरकारी नौकरी करने के सिलसिले में उन्हें अपनी वामपंथी प्रतिबद्धता को छिपाना पड़ा था। एक आविष्ट स्व जो रूग्ण परछाइयों के भीतर चला जाता है, एक प्रताडि़त स्व जिसके पीछे सत्ता पड़ी हुई है, एक ही कलाकार का रूप हैं, जो अपने विभिन्न स्वों को उस एकात्मकता में संघटित करने में असफल है जो परम अभिव्यक्ति को सम्भव बनाती है। कविता में अनेक स्थल ऐसे हैं जिनमें सड़कों और गलियों में हो रहे जनान्दोलनों के चित्र हैं और उन आन्दोलनों को निमर्मतापूर्वक कुचले जाने के दृश्य हैं। इन्हीं सड़कों को रौंदता हुआ गुजरता है, एक भुतहा जुलूस जिसमें हमकदम हैं प्रतिष्ठित पत्रकार, आबदार वर्दीधारी, प्रकाण्ड आलोचक और विचारक, जगमगाते कविगण और मंत्री, उद्योगपति और एक कुख्यात हत्यारा। यह जुलूस उस सामाजिक परिवेश के दुःस्वप्नात्क वैरभाव को सामने लाता है जिसमें कवि सांस ले रहा है। ऐसे वातावरण में अपनी बात कहना कितना मुश्किल और खतरनाक हो जाता है। अपनी बात कहने के लिए कवि को सारे मठ और गढ़ तोड़ने होंगे, पहुंचना होगा दुर्गम पहाड़ों के उस पार… तब कहीं मिलेगा झील के सुनील जल में कांपता हुआ अरूण कमल, परम अभिव्यक्ति के क्षण का वह प्रतीक जिसे कवि सारी उम्र खोजता रहा है। कवि की यह यात्रा उन मूल्यों को अस्वीकृत करती है जो समाज के मध्यवर्ग ने उस पर थोपे हैं। कविता के चौथे हिस्से में उस अपराध-बोध का स्वीकारोद्गार है जहां कवि इस सामाजिक अस्वस्थता का उत्स अपनी आत्मपरकता में भी पाता है। मुक्तिबोध ने यहां खुद को छेद-खोद डाला है-

लो-हित-पिता को घर से निकाल दिया,
जन-मन-करूणा-सी माँ को हंकाल दिया,
स्वार्थों के टेरियार कुत्तों को पाल लिया,
भावना के कर्तव्य-त्याग दिये,
हृदय के मन्तव्य-मार डाले!
बुद्धि का भाल ही फोड़ दिया,
तर्कों के हाथ उखाड़ दिए,
जम गए, जाम हुए, फंस गए,
अपने ही कीचड़ में धंस गए!!
विवेक बघार डाला स्वार्थों के तेल में
आदर्श खा गए!
अब तक क्या किया
जीवन क्या जिया,
ज्यादा लिया और दिया बहुत-बहुत कम
मर गया देश, अरे, जीवित रह गये तुम

यह आत्मसमीक्षा, आधुनिकतावाद के पालक पोषक लक्षणों के विरोध का एक प्रयास है। कविता के एक अन्य हिस्से में कवि स्वयं को इस सामाजिक दुरवस्था के लिए जिम्मेदार ठहराता है। मुक्तिबोध बल देकर कहते हैं कि एक कवि के रूप में उनकी सच्ची पहचान किसी पृथक और निजी हैसियत में नहीं है वरन् सामूहिक-सामाजिक शक्ति के एक ऐसे अंग के रूप में है जो इतिहास को फिर से सक्रिय कर सकता है।

वस्तुतः ‘अंधेरे में’ उस आत्मिक शून्य के बारे में कही गई कविता है जो उदार मानवतावादी (लिबरल हयुमनिज़्म- बहुत मोटे तौर पर एक वह साहित्यिक अवधारणा जिसमें राजनीतिक प्रतिबद्धता पर बल नहीं दिया जाता है और मानव स्वभाव को नियत तथा सतत माना जाता है जिसके फलस्वरूप किसी साहित्यिक रचना को किसी कालखंड की सामाजिक-राजनीतिक कक्षा में स्थापित करने की आवश्यकता नहीं होती है। संक्षिप्त और मार्मिक ढंग से कहें तो यह पूछने की आवश्यकता नहीं है कि बन्धु आप की लोकेशन क्या है?) विचारधारा के ह्रदय में जगह बनाए हुये थी और जिससे बहुत से भारतीय बुद्धिजीवी प्रभावित थे। इससे अलग मुक्तिबोध कहते हैं;

कविता में कहने की आदत नहीं पर कह दूं,
वर्तमान समाज में चल नहीं सकता
पूंजी से जुड़ा हुआ हृदय बदल नहीं सकता,
स्वातन्त्र्य व्यक्ति का वादी
छल नहीं सकता मुक्ति के मन को, जन को।

उदार मानवतावादी वाग्मिता की सुविधा यह है कि एक उत्तरऔपनिवेशिक समाज में जो परस्पर–विरोधी आवेग जन्म लेते और पनपते हैं उनकी अनदेखी की जा सकती है और कुछ हद तक तथा कुछ जोर-जबरदस्ती के साथ उनमें परस्पर-अनुकूलता भी दिखाई जा सकती है। राज्यसत्ता से चोट खाए हुए मुक्तिबोध देख सकते थे कि इस तरह का छद्म मेल-मिलाप आगे चल कर व्यक्ति और समाज को छिन्न-भिन्न करने का काम ही करेगा। परम अभिव्यक्ति की खोज, उनका एक ऐसा प्रयास है जिसके जरिए वह स्वयं को अपने ऐतिहासिक सन्दर्भों की भौगोलिकी में स्थापित कर रहे थे। कविता के आखिरी हिस्से में वह बताते हैं;

इसीलिए मैं हर गली में
और हर सड़क पर
झांक-झांक देखता हूं हर एक चेहरा,
प्रत्येक गतिविधि
प्रत्येक चरित्र
व हर एक आत्मा का इतिहास,
हर एक देश व राजनैतिक परिस्थिति
प्रत्येक मानवीय स्वानुभूत आदर्श
विवेक-प्रक्रिया, क्रियागत परिणति!!

मुक्तिबोध के सामने यह बिल्कुल स्पष्ट है कि अव्यक्त निजस्व का प्रत्यादान (वसूलयाबी), परिवेश की  विशिष्ट यथार्थता और जिए गए जीवन के गुणावगुण की अनुभूति से ही होता है। मुक्तिबोध की आधुनिकता में, कला के इस कौशल की पहचान है कि कला, व्यक्ति और समाज के बीच मध्यस्थीय हस्तक्षेप करके अभिव्यक्ति के ऐसे प्रवाहशील मुहावरे को प्राप्त कर सकती है जहां सौन्दर्यशास्त्र और नीतिशास्त्र की समस्याओं में परस्पर अनन्यता नहीं होगी, जहां यह दोनों कोई द्विध्रुवीय संकल्पनाएं नहीं होंगी।

मैंने यह सोचा था कि इस प्रस्तुति में मैं अपनी ओर से कुछ नहीं कहूंगा क्योंकि किसी भी किताब के बारे में यह बड़ी आसानी से कहा जा सकता है कि उसमें क्या नहीं है और क्या होना चाहिए तथापि दो-एक बातें पूछने का मन होता है। पहली यह कि, जब पौराणिकी के आह्वान को आधुनिकतावाद से जोड़ा गया तो क्या धर्मवीर भारती के साथ थोड़ा उल्लेख इस संदर्भ में दिनकर की प्रासंगिकता का होना चाहिए या नहीं। दूसरा यह है कि भारतीय पौराणिकता का आह्वान करना वही नहीं है जो ग्रीक या रोमन पौराणिकता का आह्वान है क्योंकि भारतीय पौराणिक परम्परा अभी भी जीवित है और किसी मृत परम्परा का पुरातात्विक, अकादमिक अवशेष नहीं है। इस अन्तर के काव्यात्मक प्रतिफलन को स्पष्ट करने का अवकाश होना चाहिये।

उक्त के अलावा ‘अंधेरे में’ गांधी की जटिल उपस्थिति के बारे में और पणिक्कर के ‘कुरूक्षेत्रम्’ में गांधी होने के दर्द की जो झलक है अगर उसके बारे में भी ई.वी.आर. कुछ कहते तो अच्छा होता।

इस किताब में अन्य ऐसे अध्याय हैं जिन्हें मैं प्रस्तुत नहीं कर सका। ‘द डायलॉजिक इमेजिनेशन इन मोड़ें मराठी दलित राइटिंग’। ‘द सर्च फार अ द्रविड़ियन पोअटिक: नेटीविज़्म- मॉर्डनिज़्म कन्जंक्ट इन मलयालम पोएट्री। ‘रिक्लेमिंग द पेरीफरल वायसेज़: द डिसीडेन्ट सेन्सीबिलिटी इन केदारनाथ सिंह पोएट्री। ब्लैक एक्सक्लेमेशन्स एन्ड सैवेज साइलेन्सेज़: द पोएट्री ऑफ़ दिलीप चित्रे। लिविंग ऑफ़ द फाल्ट लाइन: द पोएट्री ऑफ़ सच्चिदानंदन।

ई.वी.आर. की इस कृति में ग्रंथन का प्रयास बहुत अधिक दिखता है। उद्धरणों के प्रति लेखक का अतिरिक्त रूझान और कुछ स्थलों पर भाषा की सूत्रात्मकता के कारण आलोचना की सुगमता भी प्रभावित हुई है।

उपर्युक्त दो पंक्तियों के बावजूद मैं पुनः यह स्पष्ट करना चाहूँगा कि मेरे द्वारा इस पुस्तक की प्रत्यालोचना का कोई प्रयास नहीं हुआ है। मेरा यह आलेख 243 पृष्ठों की ‘मेकिंग इट न्यू’ का न केवल संक्षिप्त वरन् आंशिक प्रस्तुतीकरण है जिसके कारण कुछ जरूरी कड़ियाँ मुझसे छूट गई हैं। इसके अलावा इस बात के भी दृष्टिगत कि कदाचित हिन्दी कविता में आधुनिकतावाद के उत्तरवर्ती लक्षणों, उच्च आधुनिकतावाद और अवांगार्द पर अन्य भारतीय भाषाओं की साहित्यधारा के परिप्रेक्ष्य में तुलनात्मक अध्ययन कम ही हुआ है, प्रो. रामकृष्णन के इस कार्य का समग्र मूल्याकन हिन्दी के अधिकारी, विद्वानों द्वारा किया जाना अपेक्षित प्रतीत होता है।

हरी चरन प्रकाश हिंदी के वरिष्ठ कथाकार हैं, तीन कहानी-संग्रह और एक उपन्यास प्रकाशित। लखनऊ में रहते हैं और उनसे +919839311661  पर  संपर्क संभव है।

साभार-पाखी, दिसम्बर, 2015

Lal Salaam Vidhrohiji : Pallavi Paul

A tribute to Vidrohi

By Pallavi Paul

Yesterday, as i was looking out a window of an old house in Ballygunge, Kolkata- my phone buzzed. I ignored it.  I was in the middle of telling a friend how happy i was to be away from Delhi for sometime. How the sights and smells of a different city were rejuvenating. The feeling of not having a ‘special connection’ with anyone or anything here felt liberating.

Much later, i opened the message from my friend Uday. ‘Vidrohiji passed away’, he wrote. Just three words.  In our conversations with him, Vidrohiji had often spoken about his death. We had revisited the scenario over and over again. Like a dream or a film – it had a grand setting. He had told us “Now that you are recording me, i know that i will say goodbye in the most glorious way possible. Very few people can say that about their death, while they are still alive.” On another day he had said to us, “As my fame has increased, so have the dangers. Now what i need is guarantee. Your records are guarantee against that largest threat of being killed. I say to my enemies, that if you want to kill me – then shoot me in the eyes. Because i will keep staring back at you till my last breath. Your records will help me stare back at them even after i am gone.”
In his imagination, Vidrohiji was never going to just die. He would have to be killed. So, Uday’s short message seemed anti-climactic. Unable to attribute the prosaicness of death to him i called Uday. Almost as if sharing our confusion would make the absurdity seem manageable. As the phone rang on the other end, i thought to myself that Vidrohiji would have been delighted seeing me like this . Almost like a little child he would have revelled in my concern. To him, each instance of people fussing over him or wanting to take care of him was a victory of the resistance. “My friends are from all ages and all parts of the world”, he would say. “And the Vidrohi that they love is far more beautiful than this Vidrohi. Their Vidrohi keeps challenging me day and night. He grows more beautiful with each slogan, each poem, each public meeting, each demonstration and each prison term. As he accrues more and more comrades I look on,  trying to catch up.”

Ramashankar Yadav 'Vidrohi'

Ramashankar Yadav ‘Vidrohi’

The beauty of the other Vidrohi dawned on me this morning as i woke upto several people ‘s Facebook messages, some blogposts and even a newspaper report. Along with it also came the realisation that i had no special claim on him. He was everybody’s. Between the years 2012-2014, i met him almost every week. Most days i would film him. Hear him and  watch him with greed. I wanted to remember every word, every gesture, every conversation. I knew every line on his face, the shape of his fingers, his gurgling laughter, his frail frame, his fiery but failing eyes, his smoker’s cough, his unwashed clothes, his silver hair, his anger, his crumbling teeth. In his poetry however there was nobody as courageous, loving, handsome and desirable as him. He wasn’t a poet of despair, but of pride and fire.
During our time together he spoke about his childhood in Sultanpur, his love for his grandmother, his encounter with radical left politics, JNU, the emergency, his marriage. One day as i was recording him talking about his fear of being forgotten, the battery of my camera ran out. That was the first day i saw Vidrohiji feel angry with me. Irritated by me telling him to stop- he said, “when you had asked me to meet you today should you have not done anything to make sure you had a backup for your battery.” Even as i was finding a way to both apologise to him and  explain that i had just one battery, he added, “but experimental people like us are like this only. I prefer working with people like you that than  hi-fi professionals. Because they are scared to break away from conventions. To you people convention doesn’t matter much, so you make mistakes.”
The last time i met Vidrohiji was almost a year back.Some months ago he had called me from someone’s phone at JNU. and asked me to come and see him. I had promised  that i would , but couldn’t  make it. He did not remind me. A week after the day we were supposed to meet i went looking for him, i couldn’t find him. Someone told me that they had seen Vidrohiji leaving the campus some time ago. I couldn’t call any number to tell him that i had come. Our meeting was deferred, but i didn’t know for how long.
 Always surrounded by students, comrades and opponents, he probably would have not even thought of me in his last moments. I will, however,  always regret that i was in another city, unable to bid farewell, unable to see him shout slogans at his last protest march, unable to see him shine with pride as students would implore him to say one of his poems. “Vidrohiji please, the one about your grandmother in Mohenjodaro. The one where you speak about yourself as a bomb, the one about the barricade.” He would always take those opportunities and speak of them as gifts.
Today as i try and make sense of his absence, i am happy that he circulates all around us in all kinds of records. He desire to stare back into the eyes of those who try and silence voices of dissent, stays alive in those records. I am happy that his prophecy about his death being glorious and not going unnoticed has come true.  As i think about his passing repeatedly, i break into a smile thinking that his ambition in death was to become the “left handed  ghost of Julius Ceaser” . Finally, what i am happy about is that he will never die again.
Lal Salaam Vidhrohiji
I will miss you.

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