नींबू पानी पैसा : शंकर हल्दर

यह स्तम्भ  (घुसपैठिये)दिल्ली और आसपास की कामगार बस्तियों के तरुण-युवा लेखकों की प्रतिनिधि रचनाएं आप तक पहुंचाएगा. ये लेखक और इनका लेखन बने-बनाए खांचों में नहीं समाते. ‘घुसपैठिये’ स्तम्भ के लेखक अभी-अभी जवान हुए हैं या हो रहे हैं. एकाध को छोड़कर इसके सभी संभावित लेखकों की उम्र २0 वर्ष के अंदर ही है। लेकिन इन सब में कुछ सामान्य विशेषताएँ भी हैं. सभी की आर्थिक-सामाजिक पृष्ठभूमि लगभग समान हैं। इससे भी बड़ी विशेषता यह है कि इनके लिए बचपन की किताबें कागजों से उतनी नहीं बनती हैं जितनी उनके संघर्ष, मोहल्लों, माहौल और जगह से बनती हैं. उनकी लिखाई में वे जगहें आपको सुरक्षित मिलेंगी। आप शायद महसूस करें कि साहित्य के उत्पादक और उपभोक्ता, अभिलेखन/रिकाॅर्डिंग और सृजन, कि़स्सा और तथ्य के बीच के अंतर यहाँ धुंधले पड़ जाते हैं साहित्य के सुरक्षित-आरक्षित डिब्बे में घुस आये इन घुसपैठियों को आप कैसे बरतेंगे, यह आप ही को तय करना है.

बाल दिवस के अवसर पर प्रस्तुत  हैं, शंकर हल्दर की कहानी ‘नींबू पानी पैसा’.

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नींबू पानी पैसा

 BY शंकर हल्दर  

पाँच साल हो गए पर कर्ज अभी तक दूर नहीं हुआ, राम चाचा की यह चिंता हर रोज़ उनकी लुंगी उतार देती है। इसी चिंता के साथ एक दिन वे मंदिर जाते हैं और भगवान से बोलते हैं, ‘हे भगवान तू मेरा कर्जा दूर कर दे मैं तेरे को एक नहीं एक हजार नारियल चढ़ाऊँगा; पर तेरे मंदिर में तो इतनी जगह ही नहीं! इसलिए मैं आपको नींबू-पानी चढ़ाऊंगा। गंगाजल या नारियल तो सभी चढ़ाते ही हैं।’

भगवान चिल्ला कर बोले, ‘चुप हो जा मानव! सब हमारी पूजा करते हैं, हमे प्यार करते हैं, गंगाजल चढ़ाते हैं और तू नींबू-पानी चढ़ाएगा? हम तुझे श्राप दे देंगे!’ ‘अरे नहीं भगवान नहीं, मेरे पास पहले से ही बहुत साँप है कल ही मुझे एक अनाकोंडा ने काट लिया था।’ ‘अरे बुद्धू, मैं श्राप बोल रहा हूँ श्राप, कभी लंबा न हो पाओ वैसा वाला श्राप दे देंगे।’ भगवान फिर से चिल्लाये।

राम चाचा बोले, ‘भगवान ये कौन-सा साँप हैं? कोई नयी कंपनी का साँप है क्या?’ ‘अरे मूर्ख, श्राप, श्राप.. जो एक ऋषि ने हनुमान को दिया था।’ ‘अरे नहीं, भगवान मुझे वह वाला श्राप नहीं देना, आप जो कहोगे मैं वही करूंगा।’ ‘पहले वादा कर! तू कभी भी हम पर नींबू-पानी नहीं चढ़ाएगा।’ भगवान बोले।

राम चाचा भगवान को टोक कर फिर से बोले, ‘नींबू-पानी की जगह क्या चढाऊं?’ ‘अब तू हमें गंगाजल चढ़ाएगा और नारियल की जगह कहीं नारियल का छिलका मत चढ़ा दियो, वरना हम तुझे श्राप दे देंगे। अब बोल, तेरी इच्छा क्या है?’ ‘भगवान मुझ पर बहुत कर्ज़ है।’ भगवान बीच में ही टोक कर बोले, ‘अरे तू खुद ही दुनिया पर कर्ज़ है, तेरे पे क्या कर्ज़ होगा? चल बोल।’ राम चाचा ने वही बात फिर से दोहरायी, ‘भगवान मुझ पर बहुत कर्ज़ है, इसलिए मुझे पैसे चाहिए। आप हमारी कॉलोनी में एक दिन के लिए पैसों की बारिश करवा दो।’

भगवान ने राम चाचा की यह इच्छा पूरी कर दी। घर के बाहर से अचानक आवाज़ आई, ‘राम चाचा बाहर आ कर देखो, पैसो की बारिश हो रही है।’  बाहर सच में पैसो की बारिश हो रही है। उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। वे सबके साथ गरबा डांस करने लगते हैं पर डांस करते-करते उनकी लुंगी फट जाती है। छत पर एक झण्डा लगा था। वे उसी झंडे को लुंगी बना लेते हैं।

राम चाचा नीचे आकर पैसे लपेटने लगे तभी एक अम्मा बोली, ‘अरे राम, लुंगी की जगह यह झण्डा क्यों पहन लिया? देश भक्त बन रहे हो क्या?’ तभी एक बुढ़िया बोली, ‘अरे छोड़, जो कभी राम भक्त नहीं बना वह देश भक्त कैसे बनेगा? बॉर्डर पर जाते ही इसके पैर कांपने लगेंगे। आज से इसे हम राम की जगह इंडियन लुंगी मैन बुलाएँगे।’ ‘अरे बुढ़िया चुप, ज्यादा बचर-बचर नहीं करो, वर्ना हम सब कुछ भुला कर कोई क्राइम कर देंगे। और अम्मा, तुम एक दिन की मेहमान हो इसीलिए अपना एक दिन तो सही से गुजारो; वरना हम अभी ही तेरा स्वर्गवास करा देते हैं। पैसों की इतनी अच्छी बारिश करवायी है, लूटना है तो पैसा लूटो ना, हमारी इज्जत काहे लूटती हो? अगर फिर से बचर-बचर की तो सड़े हुए टमाटर की चटनी में तुम दोनों को फ़ेक देंगे।’

कॉलोनी के सभी लोग पैसे लूट रहे थे। बाल्टी में, बर्तन में, चादर में। अपनी कागज की बोरी लिए राम चाचा भी आ गए और उसमें पैसे इकट्ठे करने लगे। वे पैसे इकट्ठे करते-करते थक गए। उन्होंने देखा कि हरीलाल की पोटली पैसों से भर गयी है। राम चाचा हरीलाल से बोले कि ‘अरे हरीलाल, जल्दी जा कर देख! तेरी बीबी चने का आटा खा कर मर गयी है।’  ‘मेरी बीबी चने का आटा खाकर कैसे मर सकती है?’ हरी लाल ने पूछा। ‘अरे धरती पर बोझ बनी तेरी बीवी ने उस चने का आटा खा लिया था जिसमें चूहे ने मूत रखा था और उस चूहे को डायबिटिज थी।’ हरीलाल पैसों की अपनी पोटली छोड़ सांढ़ की तरह घर की ओर भागा। घर जाकर देखता है तो उसकी बीवी छुपम-छुपाई की खेल रही है। हरीलाल को राम चाचा पर बहुत गुस्सा आया।

हरीलाल राम चाचा के पास भागता है पर हरी लाल का रास्ता काटने के बजाय एक काली बिल्ली हरीलाल को ही काट लेती है। तब तक राम चाचा पैसों की पोटली ले कर नौ-दो-ग्यारह हो चुके होते हैं।

राम चाचा चौक पर जाते हैं। वहां उन्हे गज़ब का नज़ारा दिखता है। चौक पर बस भीड़ ही भीड़ है। लोग पैसों के लिए लोग लड़-झगड़ रहे हैं। लोग जानवरों की तरह पैसे लूट रहे थे, सारी गाड़ियां जाम हो गयी थीं। बस वाला ड्राईवर तो पागल ही हो गया था, उसने अपनी कमीज खोल कर उसमें पैसे इकट्ठे करने लगा।

एक पेड़ पर हजार-हजार के दो नोट लटके हुए हैं और रुपयो को लेने के लिए एक आदमी पेड़ चढ़ता है लेकिन दूसरा आदमी उसकी पैंट खींच कर नीचे गिरा देता है। एक टीन वाले घर के ऊपर हजार का एक नोट है। एक हाथी जैसा आदमी उस छत चढ़ता है। उसका पैर फिसल जाता है और उसके गले की हड्डी टूट जाती है।

मीडिया भी आ जाती है। मीडिया की लड़की कैमरे में बोलने लगी, ‘आप देख सकते हैं इधर का नज़ारा, बस इसी कॉलोनी में पैसों की बारिश हो रही है और इन पैसों को लूटने के लिए लोग पागल हुए जा रहे हैं। क्या यह सच  है या एक चमत्कार? वह लड़की एक आदमी से पूछती है, ‘ये पैसे लुटते हुए आपको कैसा महसूस हो रहा है? पैसों की यह बारिश कैसे हो रही है?’

राम चाचा अपने दोस्त तिहाई लाल के साथ खड़े यह सब देख रहे थे, ‘टीवी पर मुझे जाना चाहिए था लेकिन यह मुच्छड़ बोल रहा है। मेहनत करें हम और अंडा खाए फकीर।… अरे तिहाई लाल, तू पैसे नहीं लूट रहा है।’ तिहाई लाल बोला, ‘ओये तू पैसे लूटने की बात कर रहा है? वहाँ मेरे बीबी बिजली के खंबे की तार से फेवीकोल की तरह चिपकी पड़ी है और स्पाइडर मैन की तरह जाल बुन कर पैसे लूट रही है और किसी को भी खंभे पर चढ़ने नहीं दे रही है।’

‘कैसे? बिजली के खंभे पर कैसे किसी को चढ़ने नहीं दे रही है? राम चाचा पूछे। ‘अरे जिस मोजे को मैंने चार साल से नहीं धोया, उसी मोजे को मेरी बीबी ने कमर में बाँध रखा है।’ ‘लगता है तेरी बीबी आज स्पाइडर मैन का रिकार्ड तोड़ देगी!’ ‘अरे, स्पाइडर मैन का रिकार्ड बना ही कब था? जो मेरी बीबी उसे तोड़ देगी? तिहाई लाल बोला। ‘अरे तूने ‘स्पायडर मैन टू’ नहीं देखी क्या? आखिरी सीन में जब वह ट्रेन रोकता है तो उसकी चड्डी खुल जाती है।’ ‘तो इसमें रिकार्ड क्या है?’ तिहाई लाल ने आश्चर्य व्यक्त किया। ‘रिकार्ड है, स्पाइडर मैन ने चड्डी खोलने का रिकार्ड बनाया है।’ ‘चल ये सब छोड़, क्या तू जानता है कि मेरी छत इतनी बड़ी है कि उस पर पैसों का हिमालय पर्वत बन चुका है। मुझे तो नेशनल बैंक का एवार्ड मिलना चाहिए। लेकिन तुम तो लोगों के पैसों की पोटलियाँ चुरा रहा है? क्या मैंने तुझे इसी दिन के लिए पाला था? तिहाई लाल बोला ने ताना मारा।

‘अरे तूने मुझे कहाँ पाला है? मुझे तो अमेरिकन कुत्ते ने पाला था और उस एहसान का कर्ज मैं अभी तलक चुका रहा हूँ।’ तिहाई लाल ने पूछा, ‘कैसे?’ ‘अरे क्या तुझे याद नहीं जब तेरे अमेरिकन कुत्ते की नई-नई शादी हुई थी तो वह मेरी लूँगी चुरा कर भाग गया था। बदले में मैंने उसकी बीबी की पाँच रूपये वाली साड़ी फाड़ दी थी, बाद मे पता चला कि वह पाँच रुपये की नहीं पाँच हजार की थी। उस साड़ी का कर्ज मैं अभी तक चुका रहा हूँ।’

तिहाई लाल बोला, ‘माफ करना मैंने तेरे लाल जख्म को फिर से हरा कर दिया। चल यह सब छोड़, पैसे की बारिश की खुशी में आज मैंने एक शानदार पार्टी रखी है। तू जरूर अईयो। डिनर में बम के पकौड़े, सीमेंट की दाल और मिर्च के रसगुल्ले हैं।’ राम चाचा बोले, ‘ठीक है। मैं जरूर आऊँगा।

राम चाचा के पास पैसों की तीन पोटलियाँ जमा हो गई थी। जमीन पर सिर्फ सिक्के पड़े थे। नोट का नामोनिशान नहीं था। मंदिर के छत के ऊपर हजार-हजार के बहुत सारे नोट गिरे थे। राम चाचा मंदिर की छत पर चढ़ गए और जैसे ही नोट उठाया, भगवान की आवाज आई, ‘अबे मानव रुक जा, भगवान का पैसा चुराता है? तूझे श्राप दे दूँगा!’ राम चाचा बोले, ‘आप भी न भगवान… कितनी बार बोलूं कि मेरे पास पहले से ही बहुत साँप हैं, कल ही मुझे एक अजगर ने काट लिया था।’ भगवान बोले, ‘पर मानव, तूने तो मुझे बोला था कि एनाकोंडा ने काटा है।’ ‘हाँ एनाकोंडा ही था, बस उसका सर नेम अजगर था। मेरी चेककप रिपोर्ट में लिखा था।’ ‘ठीक है ठीक है। पर मंदिर से पैसा मत चुरा वरना तूझे श्राप दे देंगे।’ राम चाचा अब चिल्ला कर बोले, ‘भगवान, समझते नहीं हो और जज्बाती हो जाते हो। सुबह-शाम उतारता हूँ आरती, फिर बोलते हो, अच्छी नहीं है अगरबत्ती।’

भगवान बोले, ‘अरे दुनिया के आठवें अजूबे, तूझसे तो बोलना ही बेकार है। पर अगर तूने मंदिर से पैसा उठाया तो हम तुझे दण्ड देंगे।’ ‘तो फिर मैं पैसे कहाँ से लूँ? जमीन पर सिर्फ सिक्के पड़े हैं। अपनी शादी में क्या मैं सिक्के इस्तेमाल करूंगा? पंडित दक्षिणा माँगेगा तो क्या मै पंडित को दक्षिण अमेरिका भेज दूँगा?’ राम चाचा एक सांस में भी बोल गए। भगवान बोले, ‘पर तेरी तो शादी हो चुकी थी न? और तेरी बीबी मर भी गई है!’ ‘वह मेरे बीबी ही थी, एक दिन ढोकला खा ली और मर गई।’ ‘कैसे?’ ‘अरे उस ढोकले को बिल्ली ने आँख मारी थी।’ ‘और वह दूसरी कौन है? जो नर्क में सजा काट रही है।’

राम चाचा बोले, ‘वह मेरी दूसरी बीबी है, उसे मच्छरों से नफरत होने लगी थी। एक दिन एक मच्छर उसके मुंह में सुसु करके भाग गया, उसे मलेरिया हो गया और वह भी गुजर गई।’ भगवान बोले, ‘पापी, तू उसका श्राद्ध करने के बजाय यहाँ पैसों की बारिश में नाच रहा है। मैं अभी बारिश बंद कर देता हूँ।’

 ‘भगवान, नहीं-नहीं, पैसो की बारिश बंद मत करो। मैं उन दोनों का श्राद्ध कर दूँगा।’ यह कह वे घर की ओर चल पड़े, रास्ते में जहाँ पर भी पैसे दिखते जेबों में भर लेते। तभी उन्हें बहुत ज़ोर की बाथरूम लग जाती है। भागते हुए घर जाते हैं। पर घर के सामने हरीलाल खड़ा रहता है। ‘तुम्हारी इतनी हिम्मत कि मुझसे झूठ बोलो? अब तो मैं तुम्हें छोडूंगा नहीं।’ राम चाचा बोले, ‘पहले पकड़ तो सही!’ ‘क्या कहा?’ ‘अरे हरी लाल, भड़क मत, अपनी पोटली ले और मुझे जाने दे!’ लेकिन हरीलाल ने राम चाचा की हड्डी-पसली तोड़ डाली और राम चाचा की पोटली भी छीन लिया।

राम चाचा को काफी चोट आई। इंडियन लूँगी फट कर सिर्फ लंगोटी रह गई। बिना कपड़ों के उन्हें कुछ भी अच्छा नही लग रहा था। इसलिए अपनी दादी का घाघरा-चोली पहन लिए। बाथरूम गए तो देखा कि वहाँ पर 500 का नोट पड़ा है। लैट्रिन में हाथ डालकर कर पैसा उठा लिया। जैसे ही घर से बाहर निकले तो सभी लोग हंसने लगे। ‘यह क्या? घाघरा-चोली क्यों पहन रखा है? चाची की याद आ गई क्या?’ लोगों की बातें राम चाचा को मिर्ची की तरह लगी। बीबी के बक्से में रखी साड़ी पहन कर फिर से बाहर आ गए। अब वे साड़ी के आँचल में पैसे बटोरने लगे।

राम चाचा की गली मे ही चिंटूलाल, पिंटूलाल मिले। चिंटूलाल बोला, ‘अरे राम चाची झाड़ू लगा रही हो क्या?’ ‘मैं चाची नहीं, चाचा हूँ।’ ‘तो चाची की साड़ी क्यों पहन रखी है?’ ‘यह तो 3015 का फैशन है, तुम क्या जानो इस फैशन को।’

तभी गली के सारे लोग भागते हुए दिखे तो राम चाचा ने पूछा, ‘चिंटूलाल, ये सब भाग क्यों रहे हैं?’ ‘उधर रंगीला पागल होकर टीवी टावर पर चढ़ गया है।’ सभी लोग रंगीला को देखने चले गए। इतने में रानी मौसी गली से आती हुई दिखाई दी, जिसके कंधे में पैसे से भरी थैली लटक रही थी। यह देख राम चाचा का मन ललच गया। वे उसकी थैली छीनने लगे। रानी मौसी चिलल्लाने लगी, ‘बचाओ-बचाओ….।’ पर लोग तो रंगीला को देखने गए थे। रानी मौसी कहने लगी, ‘अरे राम हमें मत छेड़ो वरना हम अपनी बड़ी बहन से शिकायत कर देंगे। वह पीट-पीट कर करेली की चटनी बना देगी।’ ‘हाँ हाँ, वह तो जापान से जूडो कराटे सीख कर आई है ना, मैं तो सिर्फ आपका हालचाल पूछ रहा हूँ। आपके बच्चे ठीक ठाक हैं न? आप तो यूंही भड़क गयी। अरे, आप तो बहुत अच्छा गाना गाती हैं।’ ‘तुम्हें गाने की पड़ी है, वहाँ रंगीला टावर पर चढ़ कर मरने वाला है।’ ‘अरे वह तो हर दूसरे दिन मरने का बहाना करता रहता है। आज ज्यादा पी लिया होगा।’ अपनी थैली से पैसे निकालते हुए रानी मौसी बोली, ‘पैसा लोगे क्या?’ राम चाचा अपनी साड़ी के पल्लू को फैलाते हुए बोले, ‘देख, मैंने भी पैसे लूटे हैं।’

रानी मौसी चली जाती है, राम चाचा सोचते हैं कि चलो, बहुत पैसे जमा हो गए, अब घर चलते हैं। राम चाचा रात भर खूब सोचते हैं। अब तो मेरे पास पैसों की बहुत सारे पोटलियाँ हो गई हैं, आधे पैसों से अपनी पत्नियों का श्राद्ध करूंगा और आधे से अपना कर्जा दूँगा। बाकी पैसे से मैं एक अच्छी लूँगी सिलवाऊंगा। यही सब सोचते हुए राम चाचा सो गए।

अगली सुबह राम चाचा उठते ही पहले मंदिर जाते हैं। राम चाचा मंदिर पहुँचते ही भगवान प्रकट होकर बोले, ‘अरे मूर्ख मानव, पुरुष होकर नारियों का वस्त्र पहनता है। घर जा, पहले ढंग के वस्त्र पहन कर आ।’ राम चाचा भागते हुए घर आए और इंडियन लूँगी खोजने लगे। राम चाचा ने अपनी फटी हुई इंडियन लूँगी को ही पहन लिया और सोचने लगे कि भगवान पर कुछ चढ़ाना भी तो होगा। चलो नींबू-पानी ले लेता हूँ। अपनी फटी हुई इंडियन लूँगी पहन और हाथ में नींबू-पानी का ग्लास ले मंदिर की ओर चल पड़े। राम चाचा ने जैसे ही शिवलिंग पर नींबू-पानी चढ़ाया तभी भगवान प्रकट होकर बोले, ‘मानव तेरा यह दु:साहस? कल ही तुझे चेतावनी दी थी कि मुझे नींबू-पानी पसंद नहीं है, उसके बावजूद तू नींबू-पानी लाया है।’

राम चाचा बोले, ‘अरे भगवान, मेरी पड़ोसन गंगा का मोटर खराब हो गया है इसलिए उसने जल नहीं दिया और इस नींबू-पानी मे मैंने घी और शक्कर डाला है, बहुत अच्छा है, पीकर तो देखो।’ भगवान बोले, ‘अरे मानव हम नदी वाले गंगाजल की बात कर रहे हैं। तेरी गंगा की नहीं, अपनी गंगा की। जा मानव, हम तूझे श्राप देते हैं कि कल पैसों की जो बारिश हुयी है, वे सारे पैसे गायब हो जाएंगे।’

सुनते ही राम चाचा की लूँगी ऊतर गई और हाथ से नींबू-पानी का ग्लास छूट गया। वे घर की तरफ भागे। घर जाकर देखे तो पोटलियाँ पड़ी थीं लेकिन पैसे गायब थे। फिर अपनी पड़ोस वाली गंगा से पूछा, ‘अरे गंगा, कल तूने जो पैसे लूटे थे वे पैसे कहा हैं? गंगा ने कहा, ‘अंदर पोटली में। ‘तो जाओ अंदर, देखो पैसे हैं या मेरी तरह ही गायब तो नहीं हो गये हैं?’ गंगा ने अंदर जाकर देखा कि पोटली खुली पड़ी थी और सारे पैसे गायब थे। गंगा शोर मचाते हुए बाहर आकर बोली, ‘मेरे भी सारे पैसे गायब हैं।’

राम चाचा ने देखा कि तिहाई लाल भागते हुए आ रहा है, पास आकर हाँफते हुए बोला, ‘पता है, मेरे पैसों का हिमालय पर्वत गायब हो गया है। अब मुझे नेशनल बैंक का एवार्ड नहीं मिलेगा।’ इतने में अम्मा फूट-फूट कर रोते हुए आई। राम चाचा ने पूछा, ‘अब क्यों रो रही हो?’ अम्मा बोली, ‘कल हमरा बेटवा नाले मे छलांग मार-मार कर जो पैसे लूटे थे वे सब गायब हो गये हैं।

सभी के पैसे गायब हो गए थे। राम चाचा यही सोच रहे थे कि अब तो मेरा कर्ज भी दूर नही हो पाएगा। मेरी बीबी उधर श्राद्ध के लिए तड़पती रहेगी और इधर मै तड़पता रहूँगा।

शंकर हल्दर

शंकर हल्दर

जन्म- 09/03/2003. पिछले तीन सालों से अंकुर किताबघर के नियमित रियाजकर्ता. किसी भी पत्र-पत्रिका में प्रकाशित होने वाली पहली रचना. पता: बी-458, सावदा-घेवरा जे.जे. कॉलोनी, दिल्ली- 110081. मोबाइल न. 9654653124.

साभार: हंस, जनवरी, 2016

 

आत्महंता की डायरी और बेकशिंस्कि का घर: मग्दालेना जेबाउकोव्स्का

बीसवीं-इक्कीसवीं सदी के विश्वस्तरीय, चर्चित, पोलिश चित्रकार ज़्जिसुअव बेकशिंस्कि का जीवन उनकी कृतियों की तरह ही सर्रियलिस्ट-स्पर्श लिए हुए अविश्वसनीय जान पड़ता है. उन्नीस सौ अंठानवे में उनकी पत्नी की मृत्यु की होती है. उन्नीस सौ निन्यानवे के क्रिसमस की पूर्वसंध्या के अवसर पर उनका इकलौता पुत्र तोमष, जो कि बहुत ही लोकप्रिय रेडियो उद्घोषक, संगीत-पत्रकार और अनुवादक था, आत्महत्या कर लेता है. सत्रह बार चाक़ू से गोदा गया बेक्शिन्स्कि का मृत शरीर इक्कीस फ़रवरी, दो हजार पाँच को उनके ही फ्लैट में पाया जाता है. यह धत् कर्म उनके ही केयरटेकर के नाबालिग पुत्र द्वारा किया गया था. मग्दालेना जेबाउकोव्स्का ने अपनी पुस्तक बेक्शिन्स्कि: एक दोहरी तस्वीर‘ (The Beksinskis: Double Portrait[i]) में बखूबी इन दृश्यों को जगह दी है. पोलिश इंडोलॉजिस्ट तत्याना षुर्लेई ने इसी किताब के शुरूआती हिस्से को यहाँ अनुदित की है.

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बेकशिंस्कि के परिवार के चित्र

By मग्दालेना जेबाउकोव्स्का 

आत्महंता की डायरी और बेकशिंस्कि का घर

एक चिट्ठी 

प्रिय एवा! एक बुरी खबर है। तोमेक[ii] मर गया। क्रिसमस की पूर्व संध्या पर उसने आत्महत्या कर ली और क्रिसमस के दोपहर, करीब तीन बजे मुझे उसकी लाश मिली। मैं पहले ही तुमको इस संबंध में लिख चुका हूँ कि अगस्त या इससे पहले से ही रेड अलर्ट था, और अब इस तरह इसकी समाप्ति हुयी।

अभियोजन पक्ष के कार्यालय के समक्ष जाने से पहले ही मैंने सारे भौतिक सबूतों को छुपा दिया है। क्योंकि, कागज़ के एक टुकड़े पर तोमेक ने लिखा कि मेरे लिए कंप्यूटर में एक चिट्ठी और डिक्टाफोन में एक मैसेज है।  डॉक्टर के आने से पहले ही मैंने कॉपी को सुरक्षित रख कंप्यूटर से चिट्ठी को हटाया, फिर कागज़ के टुकड़े और डिक्टाफोन को जेब में छुपाया। क्योंकि, मुझे डर था कि पुलिस सब कुछ अपने कब्जे में ले लेगा और बाद में अलग-अलग अंजान लोग इसे सुनेंगे, पढ़ेंगे और इसके बारे में पीएचडी लिखेंगे। मुझे लगता है कि मैंने जो किया अच्छा किया। हालांकि, पुलिस और अभियोजन पक्ष वाली औरत यह समझ नहीं सकती थी कि उसने क्यों कोई चिट्ठी नहीं छोड़ा। उन लोगों के बीच सब से बड़ा शक इसी एक बात से पैदा हुआ।

वास्तव में, इस चिट्ठी से मुझे अधिक वस्तुगत जानकारी मिली। जैसे कि, किसको क्या देना चाहिए और कौन-से काम पुरे करने हैं। मैं यह चिट्ठी उनको दिखा सकता था, लेकिन इसे पढ़ने के लिए मेरे पास समय नहीं था। और, टेप इतना व्यक्तिगत था कि इसे सिर्फ मैंने सुना, शायद एक और बार सुनकर इसको नष्ट करूंगा, जैसी उसकी इच्छा थी। उसकी यह भी प्रार्थना थी कि उसकी टेप वाली डायरी को (सुनने या न सुनने के बाद), जिसमें बहुत सारे टेप हैं, भी नष्ट करूँ।

जोशा की मौत के बाद, पहली बार मुझे एक अजीब-सी खुशी का अहसास हुआ कि यह सब होने के पहले ही वह मर गई, क्योंकि यह उसके लिए असहनीय होता। मैं ज़्यादा सहनशील हूँ, वैसे भी अंत में यहाँ किसी का रहना जरुरी है।

सिर्फ़ मुझे मालूम था कि तोमेक के लिए जीवन मुश्किल था। अहंवादी और अहंकारी होने के बावजूद, कोई अपनी नियति खुद नहीं चुनता। लेकिन, मुझे लगता है कि यह जो कुछ भी हुआ, अच्छा हुआ।

टेप पर दर्ज उसका अंतिम संदेश यही था कि जिस दुनिया में उसको जीना पड़ता है इससे वह कितना निराश है। उसे हमेशा एक अलग दुनिया चाहिए थी, जहां के नियम सीधे होते हैं, दोस्ती हमेशा सही होती है या ऐसा कुछ…।

इस मैसेज का अंत लगभग इस तरह था, “मैं जानता हूँ कि मेरी दुनिया कल्पना की दुनिया है, लेकिन उन इकतालीस सालों में मैं भी शायद एक कल्पना था। मैं कल्पना की दुनिया में जा रहा हूँ, क्योंकि मैं सिर्फ़ वहाँ ही खुश रह सकता हूँ। हाथ जोड़कर तुमसे विनती करता हूँ कि मुझे जगाना मत।”

उसने याकूब की सीढ़ी वाला टीशर्ट पहना था, और मुझे नहीं मालूम कि इसका कोई प्रतीकात्मक अर्थ था या नहीं!

उसे डर था कि नींद की गोलियां जब तक उसे मारेगी, उससे पहले मैं आ जाऊंगा! इसलिए, उसने टेप के संदेश में कहा कि तेईस दिसम्बर से उसने कुछ नहीं खाया है ताकि गोलियां जल्दी से अपना काम करें, और गोलियों के डिब्बे को बाहर के कूड़ेदान में फेंका ताकि डॉक्टर को पता न चल सके  कि उसने क्या खाया है!

वह तेईस तारीख की शाम को ही यह करना चाहता था। लेकिन, उसे याद आया कि वह हर शुक्रवार को घर आकर अखबार में छपे टीवी-कार्यक्रम के विवरणों में से पसंदीदा फिल्मों को चिन्हित करता है। ताकि, बाद में उसे देख सके और इसके लिए प्रसारण के समय उन्हें रिकॉर्ड करना चाहिए। वह जानता था कि इस दिन अगर वह नहीं आएगा तो मैं परेशान होकर चेक करूंगा कि क्या हुआ। इसलिए चौबीस दिसम्बर को दोपहर दो बजे मेरे पास आ गया और ऐसी फिल्मों को मार्क किया जो सिर्फ उसके लिए दिलचस्प हो सकती थीं, क्योंकि मुझे वेस्टर्न पसंद नहीं हैं। यह सब कुछ मुझे दिलासा देने के लिए था ताकि मैं कुछ अनुमान न करने लगूँ, और सच में उसका यह प्रयास सफल हुआ।

गोलियाँ खाने के बाद रिकॉर्ड हुए टेप से पता चला कि उसने गोलियों को चौबीस तारीख को दोपहर के तीन बजकर पाँच मिनट पर खाया। मैं चौबीस घंटे बाद वहाँ पहुँचा। वहाँ पहुँचने से पहले मैं कुछ परेशान था क्योंकि उसकी अच्छी दोस्त, अनया ओर्तोदोक्स[iii] ने फोन की और बतायी कि जब वह मेरे घर से अपने घर वापस गया था तभी अनया ने तोमेक से बात की थी और उसे लगा कि तोमेक की तबियत ठीक नहीं है। इसलिए वह बोली कि मैं उसके पास जाऊँ या उसको अपने यहाँ बुलाऊँ।

चूँकि, तोमेक ने मुझसे कहा था कि बीमार होने की वजह से वह दो दिनों के लिए फोन को स्विच ऑफ करेगा, ताकि उसकी तबीयत में सुधार हो। शुरू में मुझे लगा कि सच में उसने यह किया। अनया से बातचीत करने के बाद मैंने तोमेक को फोन किया लेकिन सिर्फ ऑटोमेटिक और रिकॉर्ड स्वर ही सुनाई देते थे, उसका मोबाइल फोन बंद था। मैं वहाँ गया और बार-बार दरवाजे की घंटी बजाता रहा। अब मुझे याद नहीं है, लेकिन यह शायद दोपहर चार बजकर पचास मिनट या पाँच बजकर दस मिनट था। उसने दरवाजा नहीं खोला और मेरे पास चाभी नहीं थी (अगले दिन मुझे पता चला कि उसने मेरे घर में अपनी चाभियों को दिनुव[iv] से खरीदी गयी एक चीनी मिट्टी के गमले में रखा है, अन्य दूसरी चीजों के नीचे) तो मैंने सोचा कि उसने नींद की गोली खाकर और कानों में इअरफ़ोन लगा सो रहा है। दरवाजे तोड़ना मैंने ज़रूरी नहीं समझा। दूसरे दिन मुझे उसकी चाभियाँ मिली और जब मैं तोमेक के पास पहुंचा तो वह बहुत समय से मरा हुआ था। हाँ, ऐसा ही था। ठीक है, अगर तुमको कुछ और जानना चाहिए तो लिखो! सभी को नमस्कार।

ज़्जिसुअव।

वारसा: रविवार, 26 दिसम्बर, 1999, दोपहर 4:07।

***

घर

हर किसी को यह घर धोखा देता था, जो उसे पूरी तरह जानने और समझने की कोशिश करता था। उसने किसी को भी घर की पूरी तस्वीर उतारने की अनुमति नहीं दी। सिर्फ अहाते की ओर से अंदर प्रवेश पाने वाली टूटी हुई सीढ़ियों की, या बगीचे की ओर से झाड़ियों के बीच से ऊँचे उठे हुए सड़े बरामदे की, या एक दीवार पर लकड़ी के हिले हुए रेलिंग की और उपेक्षित अहाते की ही, जहाँ ऊँची छत वाला एक छोटा कुआँ था, तस्वीर खींचना संभव था। एसेनबह की दवाई की दुकान के पीछे छुपा यह घर सड़क से दिखाई नहीं देता था और पेड़ों के पीछे होने के कारण पुओव्येत्स्कि नदी की ओर से भी दिखाई नहीं देता था। शुरू-शुरू में यह घर बॉयलर के वर्कशॉप होने के रहस्य की रक्षा करता था।

हेनरिक वनिएक, ज़्जिसुअव बेकशिंस्कि का दोस्त, को यकीन है कि यह घर, बीच में एक छोटे अहाते के साथ, एक वर्ग की संकल्पना पर आधृत है; जिसमें बाहर से कोई सीधा प्रवेश-द्वार नहीं था। इसे देखकर उसे एन्फ़िलैड की याद आती है जिसमें एक कमरे से दूसरे कमरे तक जाने का रास्ता घुमावदार होता है।

लेकिन यह असम्भव है क्योंकि लकड़ी का यह घर, जिसके छत धातु के प्लेटों से बने थे, अन्य इमारतों के बगल में U आकार में खड़ा था। जो, सामने या अन्दर से एक मंजिली हवेली जैसा था और ऊपर-ऊपर से देखने पर किसी ग्रामीण घर जैसा आभासित होता था।

अतिथियों को यह घर अव्यवस्थित लगता था। मेहमान अंधेरे गलियारे में पहुँचते ही जगह और समय के बारे में भूल जाते थे। लोग स्टूडियो से बाथरूम जाना चाहते थे तो बरामदे में पहुँचते थे। बच्चे के कमरे में जाना चाहते थे और ज़ोफ़िया के कमरे में पहुँच जाते थे। रसोईघर से कोठार जाने या तोमष के कमरे से स्तनिसुआवा दादी के कमरे जाने की प्रक्रिया अक्सर घर के सभी सदस्यों को परेशान करती थी। स्टूडियो के दरवाजे को ढूँढने की प्रक्रिया में अचानक एक आलमारी सामने आ जाती थी, जिसमें प्लास्टर की ढेर सारी खोपड़ियाँ होती थीं।

बाथरूम जाने के रास्ते को ज़्जिसुअव ने छोटी-छोटी बल्बों से सजाया था, रात के समय यह सजावट मदद करने की बजाय परेशानी का सबब बन जाती थी। एक बार बेकशिंस्कि ने वनिएक को बताया कि गलियारे में लगे बल्ब उसके सपनों के जटिल मामले का एक हिस्सा है।

घर के लिए नवीनीकरण कोई मतलब नहीं रखता था, जैसे, दीवारों को अंदर और बाहर से रंगना, बरामदे के टूटे हुए रेलिंग को ठीक करना। घर को इसकी परवाह नहीं थी कि लिविंग रूम को स्टूडियो, और बेडरूम को तोड़कर दो नए कमरे बना दिए गए थे, दूर के कमरों में किरायेदार रहते थे। धीरे-धीरे झड़ते प्लास्टर के कारण दीवारें अपनी नंगी होती लकड़ियों को गोचर करती हुयीं घर की अगोचरता को लगभग नष्ट कर रही थीं।

सनोक शहर के इसी घर में बेकशिंस्कि परिवार की पाँच पीढ़ियाँ रहती थीं। सिर्फ सड़क के नाम अलग-अलग थे। गलिसिया (ऑस्ट्रियन-हंगरियन कब्जे के समय) के ज़माने में  सड़क का नाम ‘ल्वोव्सका’ था, दूसरे गणतन्त्र में ‘यागिएलोनियन’ हो गया, इसी तरह जर्मनी के कब्जे के समय इसका नाम ‘एडोल्फ हिटलर मार्ग’ और साम्यवादी ज़माने में ‘श्वियेरचेव्स्कि[v] मार्ग’।

बेकशिंस्कि परिवार का घर अब नहीं है। बीसवीं शताब्दी के सत्तर के दशक के अंत में उसे नष्ट कर दिया गया।

बेकशिंस्कि परिवार भी अब नहीं है। परिवार के अंतिम सदस्य ज़्जिसुअव की 2005 में हत्या कर दी गयी।

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Tatiana Szurlej

अनुवादक तत्याना षुर्लेई ,  एक  Indologist और फिल्म-आलोचक हैं। हंस, पाखी, पहल, अकार आदि हिंदी-पत्रिकाओं के लिए लिखती रही हैं। पोलैंड के शहर क्राकोव स्थित Jagiellonian University से  ‘The Courtesan Figure in Indian Popular Cinema : Tradition, Stereotype, Manipulation’ विषय पर पीएचडी की हैं। इनसे  tatiana.szurlej@gmail.com पर संपर्क संभव है.

 

[i] Magdalena Grzebałkowska, Beksińscy. Portret podwójny, Wydawnictwo Znak, Kraków 2014

[ii] पोलिश भाषा में लोगों के मूल नाम के अलग-अलग प्रकार हो सकते हैं जिनका इस्तेमाल परिवार या दोस्तों से किया जाता है। इसलिए मूल नाम तोमष (Tomasz) से तोमेक (Tomek) या तोमेचेक (Tomeczek) के प्रकार होते हैं, ज़ोफ़िया (Zofia) से ज़ोशा (Zosia), ज़्जिसउअव (Zdzisław) से ज़्जिसेक (Zdzisek), आदि।

[iii] अनया ओर्तोदोक्स (Anja Orthodox) क्लोस्तेर्केलर (Closterkeller) नाम के पोलिश बैंड की गायिका है।

[iv] दिनुव (Dynów) दक्षिण-पूर्व पोलैंड का छोटा शहर है।

[v] जनरल करोल श्वियेरचेव्स्कि (Karol Świerczewski) रेड आर्मी और पोलिश आर्मी का सैनिक, कम्युनिस्ट कार्यकर्ता।

Something deeply disturbing about Bob Dylan: Sandip K Luis

After the announcement of noble literature award to Bob Dylan in 2016, there has been a hue and cry among the intelligentsia both in praise and criticism of it. It is being argued by the ‘for Dylan’ group that the noble literature award to Dylan symbolizes the ‘return of sixties’, while its critic held the point that it is being ‘romantic’ by those who unconsciously trying to bring sixties in to the mainstream. However, it should be noted that Dylan became famous for his participation and songs in civil rights and anti war  movements in America.

Joan Baez and Bob Dylan

Joan Baez and Bob Dylan

Noble laureate Dylan and Return of Sixties?  

By Sandip K Luis

Yes, there is something deeply disturbing about Bob Dylan’s bagging of the literature-Nobel, that too for “having created new poetic expressions within the great American song tradition”. I hardly know anything about “THE great American song tradition”, but I am pretty sure that such nationalistic justifications – let alone mere claim of ‘new expressions WITHIN’ – cannot be the central concerns here (if that is the case then I expect the same in judging scientific contributions as well).

The radical intellectuals everywhere are more than happy because Dylan is not simply anyone who just fought for civil rights and the peace of humanity, but the very icon, perhaps ‘the icon’, of that golden era of youth counterculture and agitations called “The Sixties”. Yes, I am also very much for civil rights and the global peace, but wait dear; we are not discussing the Peace-Nobel here, right? That will amount to an insult of comparing Dylan with Obama.

If it is for the ‘literary’ contributions of Dylan, that too by surpassing the more identifiable literary personalities like Murakami or Ngugi Thiongo (well, “Times they are a-changin”), I want to know what is really ‘literary’ in him. To admit the truth, I have hardly bothered to listen to Dylan, finding his lyrics, along with the music, too cheesy optimistic and slick minded. But when it is all about the Sixties its “flower-power”, what else you expect?

If one is seriously concerned about the real literal quality of the Sixties-music, then there is only one option left; Dylan’s one and only rival, LEONARD COHEN. But Cohen, with the dim-lit interior of his prayer-like-songs scripted through years of labour, uttered in haunting whispers and sardonic sniggers, is not ‘political’ or ‘popular’ like that of his friendly-adversary Dylan (this is even true in the case of Cohen’s seemingly ‘political’, but not very ‘popular’, songs like ‘The Partisan’ or ‘Democracy’). To religiously enter his shadowy world and to bear the weight of his words, you have to undo yourself like him.

But knowing very well that nothing can satisfy this nihilistic soul, who hauntingly said that ‘the crumbs of love you offer me are the crumbs I left behind’ (‘Avalanche’), my point is not at all that the Nobel should have given to Cohen – after all, c’mon, it just the Nobel. Rather it is a Cohenian view, with all its cynicism and contempt, on Dylan’s recognition, if not his literary or musical merits. The point is simple. Everywhere people are excited about “the Return of the Sixites” in art, culture and politics (justifications vary from the ‘Kiss of Love’ wave in India to the ‘Spring Revolutions’ in the Middle East). But by giving the Nobel to ‘The Icon of the Sixites’; one thing is assured for sure. The Sixties can no longer be a subculture to worth its name, not simply because it is now revered at par with Obama’s contributions to the global peace, but more because of the following reason. The integration of the Sixties to the mainstream and its equation with the American culture are now perfectly complete with Dylan’s Nobel.

But nihilism is nothing but the hope unalloyed. Perhaps this might also be an occasion to hope and work for a ‘Sixties’ we never had; a ‘Sixties with Leonard Cohen’. Hence his song: “Now the wheels of heaven stop / you feel the devil’s riding crop / Get ready for the future: it is MURDER…” (‘The Future’ by L. Cohen)

Sandip K. Luis is pursuing his PhD from SAA, JNU, New Delhi

Satyajit Ray Interviews Andrzej Wajda: A Tribute to Wajda

During the Film Festival in Delhi (1965), we (Film Fare) invited Satyajit Ray to interview Polish Director Andrej Wajda. Although Ray was the interviewer, Wazda occasionally came up with the question as the conversation veered round to technique. The interview was, therefore, an exchange of ideas between two great directors. Well-known Polish critic B. Michalech acted as interpreter.

Satyajit Ray With Wajda

Satyajit Ray Interviews Andrzej Wajda

 

Ray- what are you working on now, Mr. Wajda?

Wajda- Going slow actually. I’m engaged at the moment in making a historical film. Not quite my cup of tea, though.

Ray- Why, then are you making it?

Wajda- Well, it’s based on a very popular book, well known in Poland, very dear to poles. After three years of waiting, doing nothing, I feel the need to be in touch with my audience again.

Ray- Oh yes, I understand that. Was “Generation” your first film?

Wajda- My first independent film. I mean, made entirely by me: my very first feature film.

Ray- I saw it in Venice, out of competition. Wonderful, I thought.

Wajda- Now, Mr. Ray, I have a question for you.

Ray- Out with it.

Wajda- You being the… well, the best known and the most brilliant director of Indian films, do you think it is possible, I mean in the future, taking a long perspective, to make films independently, films like the ones you made without the support, the strong support of some national organisation like State.

Ray- Well, I make my films without the support of any national organisation. There is no question of such support the way I make films. They are financed by private producers and distributors. As for my first film “Pather Panchali,” of course, I started with my own money, and then because funds run out, we had shelved it and actually thought of giving it up. And then somebody who had some influence with Government, persuaded them to take it up and they took it up. I mean the West Bengal Government.

Wajda- My question, I’m afraid, is more delicate. You see, for us you are the only man who is practising a sort of an excellent national cinema, truly national, and therefore I put it to you: Do you think that the way you are doing it this sort of cinema can develop in India- not only a cinema which Indian in name but which is practically a sort of national cinema?

Ray- Well, theoretically it is possible. I mean just the way I make films it is possible for another person to make films. You need first of all a man with the same sort of urge and with a certain degree of talent, also a certain degree of tenacity.

Wajda- Obstinacy…

Ray- Obstinacy, yes. Let’s put it this way. There is no bar, of course, if his films succeed. But supposing he makes one film, and if that is a failure at the box office- it may be an artistic success- and if he keeps on making failure financially, then it is difficult for him to make any headway, because after all, he depends on the producers, his backers, his distributors.

Wajda- But do you think there are a group of men in India, in any centre, who try to make the sort of films you have been making?

Ray- Well, I can speak about my own home state, Bengal. There are a number of young directors who engaged after “Pather Panchali”. Because I was new director and my films was a success, some distributors who had not backed young people, new people, before, now began backing them, and some of them have been reasonably successful. Oh, yes, there is such a young group in Bengal. Some haven’t succeeded as well as others, so they have to wait long for another contract. But there is backing for at least some people. There isn’t a big a big movement yet, not really, but there are people who are wanting to back them. It’s a healthy sign.

Wajda- Yes, but is the state itself interested in encouraging this sort of good and important- I mean socially and artistically important-productions? Does the state have an interest in encouraging such productions?

Ray- The state itself is not in a position to directly encourage them. Now we have this President’s Award in India which is an all India thing. Awards are supposed to be given to significant films. But of course they are chosen by committee all of whose members may not be experts, you see. Well, Government also gives a cash prize and a medal, and if the film gets a prize, it can get better distribution if it can be revived. On the strength of the prize, it can have a fresh start, you know.

Also there was some talk of forming a financial corporation which would be backing certain scripts which were thought suitable, but it hasn’t so far worked…but it’s in the air. It’s being considered. May I put a question to you? How many films have you made so far-five, six?

Wajda- Ten.

Ray- Let’s see… “Generation,” “Kanal,” “Ashes and Dimonds,” “Lotna,” “Samson”…

Wajda- “Sorcerers”… another made in Siberia- “Lady Macbeth of Minsk.” Then, of course, a sketch for a French film…

Ray- Oh yes, yes….

Wajda- “Lost on the Frontiers” which was a very nice sketch but I am sorry now that this subject has been put into a new film, because it is the subject of an old film. And then the film I am making now is in two parts… I mean from the production point of view it is even more than two films.

Ray- Only one film was in colour….or were there others?

Wajda- Only one… “Lotna.”

Ray- Do you like working in colour?

Wajda- It is certainly very interesting but one is handicapped by poor quality of laboratories in Poland and then not only the labs, but also the quality of the colours themselves. One can never foresee if it will work or not. So I am a little afraid of colour at this stage. Maybe because I am an artist, I am more sensitive to colour. For normal colour production, we may be all right. But my requirements are not so easily satisfied.

Ray- Well, it is more or less the same with me. I have made one colour film. Of course this was special because it was all outdoors, all location. But I was worried because processing facilities were not adequate in India and it had all to be processed not in Calcutta but in Bombay. But I was quite surprised with the results which wouldn’t have been as good had we shot in studio. We don’t have the lights, etc. But outdoors was a different matter. And I had this special kind of a story- I wrote the story specially for the films.

Wajda- Reverting to colour. We have another difficulty. In our climate the differences in colour during the day are enormous, unlike India where you have approximately the same intensity of light the whole day.

Ray- Now in Delhi? (Laughter)

Wajda- Yes. We have in Poland, during the day, ten or even twenty colour changes.

Meeting Contingencies

Ray- Well! I will tell you how we shot the film in Darjeeling, way up in the hills. I knew there would be differences in colour because there would be clouds, there would be mist, there would be sun, there would be morning and evening. The shooting had to meet all contingencies. It was a two-hour-long story, two hours continuous, unbroken time you see…I had scenes, mist scenes and cloudy scenes and sunny and shadowy scenes. We’d be shooting a sunny scene-and then the mist would come and we would all run with the camera and take another part of another scene. That’s how it was shot.

In a way it was easy because there was no chance of costume involved. Everything happened within the radius of, say, one square  mile. As soon as we felt there were clouds coming up, we changed, folded up there, and went over the next spot for that part of the scene. And so on.

Wajda- Weather back home is so capricious. A solution would be to use several cameras simultaneously as some time, Kurosawa does in black and white. Yes, because the difference between one take and another can be sometimes quite terrible. It’ is necessary to eliminate then afterwards. Eight or ten cameras very well placed, in a carefully thought out way, could well be the solution for a good colour film.

Ray- Tell me, Mr. Wajda, do you always make films of your own choice? I mean your own subject, your own cast and everything. You have complete freedom, I suppose?

Wajda- The initiative is mine. But after the script has been chosen and accepted by me, the last word is a committee’s which has to approve of it. In a way, I have complete freedom, although someone else has the last word. This is understandable because the state being the producer has at one stage to interfere and to say yes or no. But once production starts, I am complete master. There is no interference. I may even change a lot of things, departing from the original script. Ray- Can you really?

Wajda- Yes. From the script, from the approved script, I can change a sequence here, an entire scene there…

Ray- And they see the finished film?

Wajda- The committee does, yes. But of course when the film is finished the situation is much better because the money has been expended (laughter). This is more serious, so practically nobody interferes then.

 Ray- Have you ever had to completely abandon an idea because it wasn’t approved?

Wajda- Yes, some of them. For the ten films I have made in my career. I had 35 scripts. In a way I suppose I have more experience in making scripts (laughter) than of actually making films. But not all of them, of course, have been abandoned because the committee didn’t approve of them. Some I abandoned myself. Unfortunately in Poland we do not have professional script-writers and sometimes one comes across a very good idea which cannot be well expressed in a script.

Ray- Yes.

Wajda- …And therefore I do the scripting myself, though I am not always satisfied with my own work. Sometimes is happens that the script is not bad, the idea is good, but still there is a lack of good actors for some particular characters. Here again we are handicapped because we do not have good professional film actors, only theatre actors playing in films. And always the choice is limited and then everything depends on the goodwill of an actor or of a theatre. In Warsaw, for instance, there are 20 dramatic theatres. And Warsaw is not a very big town, about a million of population.

Ray- How many takes do you shoot normally? I often have to do with just one. It’s a question of raw stock-which is rationed here.

Wajda- We try to adopt the same method. Of course, one has to have a certain idea of the shape the film is going to take. But there is a certain pleasure in shooting much more than the final requirements. The pleasure of making a film is repeated thrice-firstly, when you are writing the script; secondly, when you are editing it.

Ray- Yes. Even if you shooting with a clear cut idea in your mind, at the cutting stage there are always small things you can do.

Wajda- Right.

Ray- It is not rigid, never rigid, particularly in dialogue scenes.

Wajda- I agree.

Ray- When you are cutting back and forth you can do a lot and you can control and modify the acting.

Wajda- Yes.

Ray- So there is still a lot left, but again here in Bengal we have to be very disciplined because we can’t be spending too much. That would be disastrous. Ours is a small market.

Wajda- But you have never used some popular stars of India?

Ray- I have not used the biggest stars, but one of them whom I introduced for the first times is now a very big star, but he is still making films for me. Another I introduced has now gone to Bombay; she too is now a big star. It’s like you see. As soon as they begin acquiring mannerism, I am a little afraid of using them.

Wajda- Now may I ask you about rehearsals? I have a double technique. For young inexperienced actors, I usually do not rehearse very much because here the only thing which matters is a certain —

Ray- A certain freshness, exactly…

Wajda- But for experienced actors, rehearsals are good. For the young actor who lacks the technique it is very difficult to get a good performance during rehearsal and to continue it when shooting.

Rehearsing Without Props

Ray- Do you find, as I do sometimes, that it is a difficult to rehearse a film scene as a stage scene in a drawing room…you know, I find that unless I am surrounded with the right props on the set I can’t rehears, I get no inspiration.

Wajda- This sort of rehearsal, if you call it rehearsal, with the actors is very useful in the beginning. More in the nature of a free discussion with the actors.

Ray- Yes.

Wajda- Just to reconstruct some characters, indicate the general line they are following. But then, of course I feel it is not useful, it is not effective, except maybe for a film which is entirely based on dialogue, which is quite a different thing.

Ray- Yes, particularly if you are planning fairly long takes where the actors have sustain the scene, it can be quite a problem.

Wajda- Yes, but so long as the actors are not in costume and in the place where the shooting is going to be done, they are for the director a little dead, a little…(Laughter).

Ray- Exactly… It’s the same with me. That’s why I put the question.

Wajda- You see, there is a very natural interaction of all the elements on the set.

Ray- Exactly. Do you agree with, for instance, Antonioni, when he says that an actor is nothing but a puppet in the director’s hands? That the actor will have to do exactly as he says, he shouldn’t be given any initiative of his own?

Wajda- I am sharply against it.

Ray- Ah, yes. You know of course that Antonioni said this…

Wajda- Yes, yes, of course…

Ray- I think Antonioni lies when he says that.

Wajda (laughing)Maybe Antonioni thinks he can influence actors because his principal actress is his wife and therefore he has a very strong influence on her. If one were to make a film in this way one would be tapping only half the possibilities of a good performance. The actor’s own interpretation of the character gives fullness to his performance. I suppose to call actors puppets is a reaction against the star system. Films are made to suit stars. Of course, sometimes it works as in the cases of Paul Newman and Marlon Brando. All the films they have made are made round them, and still it works.

Ray- Yes it’s like a concerto.

Wajda- But I myself am interested in making this sort of film.

Ray- Because the artists get an excessive prominence, it is not part of general pattern. They stick out, you see….

Published in Film Fare, 1965

 

ब्रिटिश पुलिस के सेवार्थ थी, टैगोर की बुद्धिमत्ता: जॉर्ज लूकाच

किसी देश या भाषा की वैचारिक क्षमता और ऊर्जा इस बात पर निर्भर है कि उसमें वैचारिक संवाद-विवाद-विरोध की जनतांत्रिक क्षमता किस हद तक है । हमारे यहां जिस तरह बात-बेबात मामूली सी असहमतियों से मारकाट की नौबत आ जाती है उससे यही सिद्ध होता है कि हम अभी जनतांत्रिक संवाद से बहुत दूर हैं – अधिकांश में तो जूतों से ही सोचते हैं और उन्हीं से संवाद करते हैं । जूते प्रतीकात्मक ही हैं क्योंकि औजारों का अत्याधुनिक इस्तेमाल भी हो ही रहा है । ऐसे में टैगोर जैसे भारतीय आइकन के उपन्यास “घरे-बाइरे” के बहाने उनका विश्व-प्रसिद्ध समीक्षक जॉर्ज लूकाच द्वारा किया मूल्यांकन बहुत प्रासंगिक है । सहमति-असहमति का सवाल नहीं, सवाल बहस के जनतांत्रिक अधिकार का है ।….

बंगाल में यूरोप के उदारपंथ समर्थित तथाकथित नवजागरणवादियों और राधाकांत देव जैसे तथाकथित राष्ट्रवादी प्रतिक्रियावादियों के बीच लंबी बहस और संघर्ष चला था जिसमें अंग्रेजों का पक्ष साफ था। स्वयं टैगोर के पूर्वज इसमें थे। अंग्रेज स्वाधीनता आंदोलन का दमन करते हुए उदारवादियों के खुलकर पक्ष में ऐसे ही नहीं खड़े थे।

नोबल का पूरा प्रसंग इससे जुड़ा है कि कैसे 1912 में टैगोर 100 कविताएँ लेकर लंदन गए जो ट्यूब में खो गईं और बाद में सामान में मिलीं। कैसे फटाफट येट्स ने उनका अनुवाद किया /कराया और जबर्दस्त भूमिका लिखी। कैसे साहित्य और सत्ता सर्कल में प्रचार हुआ और 1913 में नोबल मिला। स्वयं येट्स को भी तब तक यह सम्मान नहीं मिला था। …नोबल के बाद प्रकाशन और पाठकों में क्या क्रांतिकारी बदलाव आता है, यह अलग से बताने की बात नहीं है।
तो यह सब पूर्व-निर्धारित ही था।

1915 में ही घरे-बाइरे बंगला में उसी साल प्रकाशित हुआ जिस साल उन्हें किंग जार्ज पंचम का नाइट बनाया गया। उपन्यास का तुरत-फुरत अनुवाद किया-कराया गया। इसका यूरोप में उन बुद्धिजीवियों ने जमकर स्वागत किया जो भारत के यथार्थ को टैगोर के रोमांटिक नजरिए से देखना चाहते थे या उससे अनजान थे। आज भी बाहर के अधिकांश भारत-प्रेमी भारत को अधकचरे अध्यात्म, योग, जादू-टोनों, वैज्ञानिक चमत्कारों के दिलफरेब किस्सों के माध्यम से समझना-समझाना चाहते हैं।

लेकिन यूरोप के प्रबुद्ध बुद्धिजीवियों ने अब जाकर सारे संदर्भ को पहचान कर इसकी भर्त्स्ना की।

लूकाच जर्मन बुद्धिजीवियों का इसी संदर्भ में हवाला दे रहे हैं और इसीलिए उनके तेवर इतने उग्र हैं। उन जैसे तमाम लोगों को इस घटनाक्रम और रचनाक्रम पर दुखद आश्चर्य हुआ था।  @अनुवादक-  करण सिंह चौहान 

Tagore with Victoria  (1924)

Tagore with Victoria (1924)

 

टैगोर का गांधी उपन्यास:  “घरे बाइरे” की समीक्षा

By जॉर्ज लूकाच

जर्मनी के “बौद्धिक भद्रलोक” के बीच टैगोर  की बेहद प्रतिष्ठा एक ऐसा सांस्कृतिक कलंक है जो बार-बार और अधिक वेग से घटित हो रहा है । यह इस “बौद्धिक भद्रलोक” के पूर्ण सांस्कृतिक पराभव का प्रमाण है । यह प्रतिष्ठा इस बात का भी संकेत है कि इस वर्ग ने वास्तविक और फर्जी के बीच भेद करने वाली अपनी पुरानी क्षमता पूरी तरह खो दी है ।

जहाँ तक टैगोर का सवाल है, वह एक लेखक और विचारक के रूप में एकदम महत्वहीन व्यक्ति है । उसके पास न तो कोई रचनात्मक क्षमता है, उसके चरित्र भी एकदम इकहरे हैं, उसकी कथाएं सपाट और अनाकर्षक हैं और उसकी संवेदनात्मकता मामूली और निस्सार है । वह अपनी रचनाओं की निस्तेजता और नीरसता को उपनिषदों और भगवद्‍गीता की जूठन को उसमें ठूंसकर प्रासंगिक बने रहने की कोशिश करता है ।  समकालीन जर्मन पाठक का विवेक इतना भोथरा हो चुका है कि वह पाठ और उद्धरण तक में अंतर करने में असमर्थ है । यही कारण है कि भारतीय दर्शन की यह तुच्छ जूठन उसके रचयिता के प्रति हिकारत जगाने की जगह उसे दूरांत से आए गहन और गूढ़ ज्ञान के रूप में प्रतिष्ठित करती है । जब जर्मनी की शिक्षित जनता ज्ञान के सस्ते विकल्पों को स्वीकार कर रही है, जब वह स्पेंगलर और क्लासिकल दर्शन के बीच, ईवर्स और हॉफमान या पो के बीच फर्क करने में अक्षम हो गई है तो भला वह भारत जैसे सुदूर के देश में वह फर्क कैसे कर सकती    है ? टैगोर भारतीय फ्रेनसन है जिसे वह अपनी विनीत निस्सारता में याद करता है – हालांकि उसकी रचनात्मकता फ्रेनसन से भी नीचले स्तर की है । फिर भी यह कहना होगा कि उसकी महान सफलता आज की जर्मन मानसिकता के लक्षण को समझने में सहायक अवश्य हो सकती है ।

टैगोर की इस तीखी अस्वीकृति के जवाब में उसकी अंतर्राष्ट्रीय ख्याति ( जो केवल ब्रिटेन तक सीमित है) का हवाला दिया जा सकता है । अंग्रेज बूर्जुआजी के पास टैगोर को धन और प्रसिद्धि (नोबल पुरस्कार) देने के अपने कारण हैं – वह भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में अपने बौद्धिक कारिंदे को इनाम बख्श रहे हैं । ब्रिटेन के लिए प्राचीन भारत के  ज्ञान की जूठन, संपूर्ण समर्पण का सिद्धांत और हिंसा की भर्त्सना (वह भी स्वाधीनता आंदोलन के संदर्भ में ) का ठोस और स्पष्ट अर्थ है । जितना अधिक टैगोर की प्रसिद्धि होगी उतना ही कारगर तरीके से उसके देश के स्वाधीनता आंदोलन के विरोध में उसकी प्रचार पुस्तिकाओं का असरदार इस्तेमाल   होगा ।

टैगोर का यह उपन्यास कोई रचना नहीं प्रचार पुस्तिका ही है जिसमें निंदा के बहुत ही फूहड़ साधनों का उपयोग किया गया है । जितना ही टैगोर इस निंदा को  घिनौनी “बुद्धिमत्ता” से ढक प्रस्तुत करता है , एक पूर्वाग्रह-मुक्त पाठक के लिए वह और भी घॄणास्पद प्रतीत होता है । टैगोर भारतीय स्वाधीनता संग्राम के प्रति अपनी नपुंसक घृणा को “विश्वमानवतावाद” के दर्शन में छुपाकर पेश करता है ।

उपन्यास का बौद्धिक टकराव हिंसा के सवाल से जुड़ा है । लेखक राष्ट्रीय आंदोलन की शुरूआत का चित्रण करता है – ब्रिटिश उत्पादों का बहिष्कार, उन्हें भारतीय बाजार से खदेड़ने और उनकी जगह भारतीय वस्तुओं को लाने के प्रयास । और टैगोर महाशय असली मुद्दे पर आ जाते हैं – क्या इस आंदोलन में हिंसा का प्रयोग नैतिक रूप से जायज है ? वास्तविकता यह है कि भारत एक शोषित और गुलाम देश है । लेकिन टैगोर की इस सवाल में कोई दिलचस्पी नहीं है । वह आखीरकार एक दार्शनिक, एक नैतिकतावादी है जिसका सरोकार “नैतिक सत्य” हैं । यानी ब्रिटिश को अपनी तरह से होश में आने दो क्योंकि उनके द्वारा की गई हिंसा उनकी आत्मा को बेचैन कर देगी । टैगोर का काम भारतीयों को आध्यात्मिक रूप से बचाना है, उनकी आत्माओं को हिंसा के खतरों आदि से बचाना है । वह लिखता है –“ जो सत्य के लिए मरता है वही अमर होता है, और अगर सारे लोग भी सत्य के लिए मारे जाएं तो मानवता के इतिहास में अमर हो जाएंगे ।“

यह और कुछ नहीं भारत की अनंतकाल  तक गुलामी का मार्ग है । इससे भी अधिक बेशर्मी से टैगोर का यह दृष्टिकोण उन तरीकों में व्यक्त होता है जिसमें वह अपने पात्रों को गढ़ता है । जिस आंदोलन को वह दिखाता है वह बौद्धिकों के लिए एक रोमांटिक आंदोलन है । बिना इस तुलना को हद से आगे ले जाए हुए हमें भिन्न परिस्थितियों में पैदा हुए इटली के कार्बोनारी आंदोलन और रूस के नरोदनिकों की याद दिलाता है । रोमांटिक स्वप्नदर्शिता, विचारधारात्मक बड़बोलापन और जिहादी भाव इनकी खूबी थी । लेकिन यह टैगोर की असत्य प्रचार पुस्तिका का प्रारंभ-बिंदु है । वह इन साहसी रोमांटिकों, पवित्र आदर्शवाद और बलिदान की भावना से प्रेरित आंदोलनकारियों को मात्र दुस्साहसिकों और अपराधियों में बदल देता है । उसका नायक, जो एक मामूली भारतीय भद्रलोक से है इस सिद्धांत को प्रतिपादित करता है  जब वह इन “देशभक्त” अपराधी गिरोहों की अतिशय ज्यादतियों से अंदर-बाहर से नष्ट हो जाता है । वह स्वयं भी इन “देशभक्तों” की हैवानियत से शुरू हुई लड़ाई में मारा जाता है । टैगोर के अनुसार वह राष्ट्रीय आंदोलन का विरोधी नहीं था बल्कि वह तो देश के उद्योग को बढ़ावा देना चाहता था । वह देशी आविष्कारों के प्रयोग करता रहता है । वह देशभक्तों के नेता ( जो गांधी का विरूप प्रतीत होता है ) को शरण देता है । लेकिन जब ये मामले उसकी बर्दाश्त से बाहर चले जाते हैं  तो वह “देशभक्तों” की हिंसा के शिकार लोगों के पक्ष में हो जाता है और इसके लिए अपने साधनों और ब्रिटिश पुलिस की शक्ति का इस्तेमाल करता है ।

यह प्रचारात्मक, खोखली लफ्फाजी भरा पूर्वाग्रहयुक्त लेखन उपन्यास को कलात्मक दृष्टि से भी दरिद्र बनाता है । उपन्यास में नायक का विरोधी कोई वास्तविक विरोधी नहीं है बल्कि घटिया किस्म का दुस्साहसिक है । उदाहरण के लिए वह राष्ट्रीय हित के बहाने नायक की पत्नी से बड़ी धनराशि ऐंठ लेता है और उसे चोरी करने पर भी मजबूर कर देता है, लेकिन उस पैसे को राष्ट्रीय आंदोलन को न देकर अपने भोग-विलास में बर्बाद करता है । यह स्वाभाविक है कि ऐसे आदमी की असलियत को देखकर उसके अनुयायी उससे अलग हो जाते हैं ।

लेकिन टैगोर की रचनात्मक क्षमता एक ढंग की प्रचार-पुस्तिका भी तैयार नहीं कर सकी । उसके पास बातों को विश्वसनीय और प्रभावशाली बनाने की कल्पनाशक्ति तक नहीं है जैसी कि उदाहरण के लिए एक हद तक दास्तोवस्की के पास थी कि उसने अपने प्रतिक्रांतिकारी उपन्यास “पॉजैस्ड” को भी पठनीय बना दिया । टैगोर की कहानी के “आध्यात्मिक” पक्ष को यदि भारतीय ज्ञान के अधकचरे टुकड़ों से अलगा दिया जाय तो वह एक बेहद अनगढ़ पैटी बुर्जुआ गूदड़ बनेगा । अंततः मामला “घर के स्वामी” की प्रतिष्ठा की “समस्या” पर आ टिकता है – कि कैसे एक “अच्छे और ईमानदार” आदमी की पत्नी को एक रोमांटिक दुस्साहसी ने बहका लिया और कि कैसे वह असलियत समझ पश्चाताप में अपने पति से आन मिली ।

यह छोटी सी बानगी “महान आदमी” की छवि बनाने के लिए काफी है जिसे जर्मन बुद्धिजीवियों ने भगवान ही बना दिया । इस तरह की ध्वंसात्मक आलोचना के विरुद्ध उसके भक्तगण उसके “अधिक व्यापक” अन्य लेखन का उल्लेख करेंगे । हमारी दृष्टि में, किसी बौद्धिक प्रवृत्ति का महत्व इस बात से तय होता है कि वह अपने समकालीन ज्वलंत सवालों पर क्या रवैय्या अपनाती है । किसी भी सिद्धांत या दृष्टिकोण की मूल्यवत्ता या निस्सारता ( और उसे अपनाने वाले लोगों की भी) इस बात से तय होती है कि वह अपने जमाने के लोगों के दुख-तकलीफों और आशा-आकांक्षाओं के बारे में क्या कहते हैं । कोरे हवाई सिद्धांत के आधार पर “स्वयं में” ज्ञान का निर्णय नहीं हो सकता ( न हाथीदांत की मीनारों में) । जब वह मनुष्य को राह दिखाने का दावा करता है तो असलियत उजागर हो जाती है । टैगोर महोदय अपने उपन्यास में यही करते दिखाई पड़ते हैं । जैसा कि हम पहले कह आए हैं, उसकी तमाम “बुद्धिमत्ता” ब्रिटिश पुलिस की सेवार्थ लगी है । इसलिए, क्या यह जरूरी है कि हम इस “बुद्धिमत्ता” के अवशिष्ट पर अधिक ध्यान दें ?

स्रोतः  *  जॉर्ज लूकाच के निबंध और समीक्षाएं, मर्लिन प्रैस, लंदन, १९८३

** बर्लिन की पत्रिका “ Die rote Fahne” में १९२२ में पहली बार छपी ।

*** अंग्रेजी में हसन और हिन्दी में करण सिंह चौहान (http://straythoughts-karan.blogspot.com/) द्वारा  अनूदित।

हिन्दू परम्पराओं का राष्ट्रीयकरण: संजीव कुमार

आज तक अपना लिखा हुआ/किया हुआ बताने में ख़ासा संकोच होता रहा. अब सोचता हूँ, बता ही दिया करूं…. साथी बली सिंह की एक कविता है ना–अपनी चर्चा, अपनी तारीफ़ खुद ही करो, और कौन करेगा?…. तो साहिबान, अब छप के आ गयी है वसुधा डालमिया की वो किताब जिसका हम (मैं और योगेन्द्र दत्त) ने अनुवाद किया है. मुश्किल किताब थी. अंदाजा इससे लगाइए कि हमें मिलने से पहले 500 पृष्ठों का एक पूरा अनुवाद, मूल्य चुका कर, डस्टबिन में फेंका जा चुका था.वसुधा जी ने न तो अनुवादक का नाम बताया, न वह अनुवाद दिखाया. बस, ये जानकारी दी कि किताब का कोई वाक्य ही उसके पल्ले नहीं पडा था, यह अनुवादक ने खुद स्वीकार कर लिया था. बहरहाल, हम वह अनुवाद भले न देख पाए हों, अनुवादक का नाम अन्य स्रोतों से ऊपर करने में ज़रूर कामयाब रहे. कभी भंग की तरंग में रहे तो खोल देंगे, और क्या! ….

इपंले की लिखी “अनुवादक की भूमिका” एक छोटी-मोटी समीक्षा की तरह ही है#लेखक 13584646_1005030236280453_1234566605917380552_o

By संजीव कुमार

‘हिन्दू परम्पराओं का राष्ट्रीयकरण: भारतेंदु हरिश्चंद्र और उन्नीसवीं सदी का बनारस’ / अनुवादक की भूमिका

यह किताब हिंदी में कई साल पहले आ जानी चाहिए थी। अंग्रेज़ी में इसे छपे उन्नीस साल हो गए। इस बीच हमारे यहां भारतेंदु युग पर विचारोत्तेजक बहसें न हुई हों, ऐसा नहीं है, पर उनमें इस पुस्तक द्वारा मुहैया कराई गई विपुल सामग्री और अंतर्दृष्टि का शायद ही कोई इस्तेमाल हुआ है। छिटपुट नामोल्लेख की बात अलग है। ऐसा एक उल्लेख मेरी भी स्मृति में है जहां विद्वान आलोचक ने इस किताब की किसी स्थापना पर बात नहीं की, बस इसके मुखपृष्ठ पर छपी तस्वीर (पहला पेपरबैक संस्करण, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस) का ज़िक्र किया, यह बताने के लिए इन दिनों आलोचना में भारतेंदु को बदनाम करने की प्रवृत्ति कैसे बढ़ी है: ‘‘एक ही [आशय है, इसी] प्रवृत्ति के तहत वसुधा डालमिया भारतेंदु हरिश्चंद्र पर केंद्रित अपनी पुस्तक के कवर पर उनको एक बंगाली प्रेमिका को गोद में लेकर बैठा दिखाती हैं।’’ (शंभुनाथ, ‘नवजागरण का पुनर्पाठ’. शंभुनाथ संपा. भारतेंदु और भारतीय नवजागरण, पृ. 192. 2009, दिल्ली: प्रकाशन संस्थान) इससे और कुछ साबित हो या न हो, यह ज़रूर साबित होता है कि विद्वान आलोचक ने कवर से आगे बढ़ने/पढ़ने की ज़हमत नहीं उठाई थी।

अगर हिंदी में यह किताब आज से दसेक साल पहले आ गई होती तो क्या भारतेंदु युग और हिंदी नवजागरण की बहसों में, ख़ास तौर से रामविलास शर्मा की जन्मशती के मौक़े पर, इसका उल्लेख अनिवार्यतः होता? कहना मुश्किल है। इसलिए कि, पीछे उद्धृत विद्वान आलोचक के अनुमान/विश्वास के विपरीत, यह पुस्तक जितनी समृद्ध है, उतनी सनसनीख़ेज़ नहीं, जितनी अंतर्दृष्टिपूर्ण है, उतनी खंडनमंडनात्मक नहीं। मूल्य-निर्णय की जल्दबाज़ी से कोसों दूर यहां विश्लेषण का धैर्य और ठहराव, अतीत की उपलब्ध सामग्री के अधिक अर्थपूर्ण पुनर्विन्यास का यत्न, और इतिहास से सही उत्तर पा सकने के लिए उसके सामने सही सवाल पेश करने की सजगता है। जहां सनसनी नदारद हो, खंडन या मंडन में दिलचस्पी कम हो और मूल्य-निर्णय की आतुरता न हो, ऐसी किताबें हिंदी के वाद-विवाद-संवाद को अधिक आकर्षित नहीं कर पातीं। इसीलिए भरोसे के साथ नहीं कहा जा सकता कि यह पहले भी आ गई होती तो इसने हमारी बहसों को प्रभावित किया होता या आगे प्रभावित कर पाएगी। अलबत्ता, यह बात पूरे भरोसे के साथ कह सकता हूं कि यहां ऐसी जानकारियां और स्थापनाएं हैं जिनसे सूचित-विदित होना, यहां तक कि उत्तेजित-उद्वेलित होना भी, हमारी बहसों के लिए लाभप्रद होगा। ऐसा कहते हुए मुझे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में हुई एक राष्ट्रीय संगोष्ठी याद आ रही है जिसमें मुझे अपने सत्र के सदर साहब से इस बात पर झाड़ खानी पड़ी थी कि मैं भारतेंदु के साहित्यकार-पत्रकार होने के साथ-साथ एक धार्मिक नेता होने जैसा ‘स्वीपिंग रिमार्क’ कैसे दे सकता हूं! सदर की बातों का जवाब देने की कोई परंपरा नहीं है, पर मुझे थोड़े अशालीन तरीक़े से इस परंपरा को तोड़ना पड़ा था और उन्हें सलाह देनी पड़ी थी कि वे अपनी जानकारी किन स्रोतों से दुरुस्त कर सकते हैं।

भारतेंदु एक धार्मिक नेता भी थे, इस बात का संज्ञान लेने से भारतेंदु का क़द घट नहीं जाता और न ही इसकी अनदेखी करने से उनका क़द बढ़ जाता है। तथ्यों के प्रति अपने को खुला रखना और उनके सहसंबंधों के बीच से किसी दौर के गतिशास्त्र को समझने की कोशिश करना इतिहासकार का काम है, न कि व्यक्तियों की क़द-काठी के बारे में आसानी से समझ में आनेवाले फ़ैसले सुनाना। यह बात हिंदी के साहित्यिक-सांस्कृतिक इतिहास-लेखन से संस्कारित मुझ जैसे पाठक को वसुधा डालमिया की किताब पढ़ते हुए ही निर्णायक रूप से समझ में आई। भारतेंदु के समकालीनों से लेकर आज के विद्वानों तक की स्थापनाओं का जायज़ा लेने के बाद उनकी सुचिंतित राय है कि

‘‘भारतेंदु और उनके कामों का आलोचनात्मक मूल्यांकन एक छोर से दूसरे छोर की ओर जाता रहा है – उन पर पुनरुत्थानवादी होने का आरोप लगाने से लेकर उन्हें आधुनिकता के पुरोधा के रूप में सराहने तक, राजभक्त बताने से लेकर आमूल-परिवर्तनवादी बताने तक; हालांकि रामविलास शर्मा के बाद से आधुनिकता के अग्रदूत की भूमिका में उन्हें स्थिर करने की ओर एक निश्चित झुकाव रहा है। यह भूमिका साहित्यिक उत्पादन में भी देखी गयी है और उस राजनीतिक हैसियत में भी जो उन्हें प्राप्त थी। उनके काम के पारंपरिक पहलुओं पर विचार करने का कोई ढांचा प्रकटतः उपलब्ध नहीं है, सिवाय उस ढांचे के जो ‘पुनरुत्थानवादी’ के नकारात्मक अभिप्राय वाले ‘टैग’ ने मुहैया कराया है।’’

इसी चिंता के तहत यह किताब एक ऐसे ढांचे की प्रस्तावना करती है जो भारतेंदु के पारंपरिक और परिवर्तनोन्मुख पहलुओं की एक साथ सुसंगत रूप में व्याख्या कर सके। इस ढांचे में भारतेंदु हिंदुस्तान के उस उदीयमान मध्यवर्ग के एक नेतृत्वकारी प्रतिनिधि के रूप में सामने आते हैं जो पहले से मौजूद दो मुहावरों के साथ अंतरक्रिया करते हुए एक तीसरे आधुनिकतावादी मुहावरे को गढ़ रहा था। ये तीन मुहावरे क्या थे, इनकी अंतरक्रियाओं की क्या पेचीदगियां थीं, सांप्रदायिकता और राष्ट्रवाद के सहविकास में आरंभिक सांप्रदायिकता और आरंभिक राष्ट्रवाद को चिह्नित करनेवाला यह तीसरा मुहावरा किस तरह समावेशन-अपवर्जन की दोहरी प्रक्रिया के बीच हिंदी भाषा और साहित्य को हिंदुओं की भाषा और साहित्य के रूप में रच रहा था और इस तरह समेकित रूप से राष्ट्रीय भाषा, साहित्य तथा धर्म की गढ़ंत का ऐतिहासिक किरदार निभा रहा था, किस तरह नई हिंदू संस्कृति के निर्माण में एक-दूसरे के साथ जुड़ती-भिड़ती तमाम शक्तियों के आपसी संबंधों को भारतेंदु के विलक्षण व्यक्तित्व और कृतित्व में सबसे मुखर अभिव्यक्ति मिल रही थी – यह किताब इन अंतस्संबंधित पहलुओं का एक समग्र आकलन है। यह आकलन हिंदू पहचान के सृदृढ़ीकरण और हिंदू परंपराओं के राष्ट्रीयकरण की जिस प्रक्रिया को चिह्नित करता है, उसे एक साथ मुक्तिकामी भी मानता है और दमनकारी भी। मुक्तिकामी इस अर्थ में कि इसने

“सामाजिक व राजनीतिक मुद्दों की व्यापक राजनीतिक मुखरता के लिए, इन्हें अभिव्यक्त करने में सक्षम लचीली भाषा के विकास के लिए और एक समृद्ध साहित्य के लिए दमनकारी और सर्वव्यापी राजनीतिक सत्ता के विरुद्ध एक देशी सांस्कृतिक व राजनीतिक पहचान की अभिव्यक्ति का रास्ता खोला। यह प्राधिकार में परिवर्तन का द्योतक था जो अब न केवल राजाओं और ब्राह्मणों में बल्कि नवमध्यवर्ग में भी स्थित था।“

और दमनकारी इस अर्थ में कि समावेशी होने के साथ-साथ यह

“अपवर्जी भी था, इसने न केवल मुसलमानों को बेदखल किया बल्कि हिंदू सामाजिक व्यवस्था की कगारों पर बैठे समुदायों को भी बेदखल किया। यहां विभाजक रेखाओं को जान-बूझकर धुंधला छोड़ दिया गया था। फिर भी, अपने तमाम धुंधलेपन के बावजूद ये रेखाएं भेदभावमूलक अंतर की तीव्र सजगता को सामने ला रही थीं।“

कहने की ज़रूरत नहीं कि यहां बल एकतरफ़ा फ़ैसले सुनाने के बजाय चीज़ों के ऐतिहासिक प्रकार्य और गतिशास्त्र को समझने पर है। ध्वस्त करने या महिमामंडित करने की जल्दबाज़ी वसुधा डालमिया के लेखन का स्वभाव नहीं है, मामला भारतेंदु का हो या भारतेंदु पर विचार करनेवाले विद्वानों का। यहां मैं ख़ास तौर से रामविलास शर्मा से संबंधित दो टिप्पणियों को उद्धृत करने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा, जिनमें देखा जा सकता है कि शक्तियों और सीमाओं को रेखांकित करते हुए किस तरह की निरावेग तार्किकता का निर्वाह किया गया हैः

“रामविलास शर्मा के अध्ययनों ([1942]1975, [1953]1984) में कवि के परंपरावादी आकलनों से और अधिक आमूल क़िस्म का प्रस्थान दिखलाई पड़ा। शर्मा पहले व्यक्ति थे जिन्होंने भारतेंदु और उनके समकालीनों की सरल, बोलचाल वाली और जीवंत गद्य शैली की सराहना की, जिसे रामविलास शर्मा स्वयं अपने समकालीनों द्वारा प्रयुक्त होता हुआ देखना चाहते थे; ऐसे समकालीन, जो बाद के भारी-भरकम, अधिक संस्कृतनिष्ठ, और बोलचाल के मुहावरे से अपना संपर्क गंवा चुके गद्य के शिकार हो गये थे। उन्होंने इस भाषा को भारतेंदु के पत्रकारीय कार्य के जनवादी पक्ष के बतौर देखा। उन्होंने पत्रिकाओं को विस्मृति के गर्त से निकालने की ज़रूरत पर बल दिया और अपनी पहली क़िताब के निबंधों में उन लेखों, संपादकीयों तथा टिप्पणियों से बहुतेरे उद्धरण दिये जिन्हें भारतेंदु की गं्रथावलियों में जगह नहीं मिल पायी थी। विवेचित सामग्री के अधिक विस्तृत दायरे ने लेखक और उसके समय के बारे में एक अलग दृष्टि को उभरने का मौक़ा दिया। शर्मा इस तथ्य को रेखांकित करने वाले पहले व्यक्ति थे कि भारतेंदु के संबोध्य पुराने दौर के अभिजन नहीं रह गये थे, क्योंकि पत्रिकाओं में जिन मुद्दों पर चर्चा की गयी थी वे व्यापक जनता के साथ सरोकार रखने वाले मुद्दे थे। भारतेंदु के राजनीतिक रैडिकलिज़्म की सराहना करने वाले पहले व्यक्ति भी शर्मा ही थे।“
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“बलिया व्याख्यान का रामविलास जी द्वारा किया गया विश्लेषण उनके अपने विचार-लोक तक पहुंचने का साधन मुहैया कराता है। वे भारतेंदु के राजनीतिक विचारों की परिपक्वता पर बल देते हैं और उन्हें अपने समय से काफ़ी आगे का मानते हैं। इस रूप में उनके राष्ट्रवाद की पेशबंदी करते हुए शर्मा इस तथ्य की अहमियत को दरकिनार कर देते हैं कि वह राष्ट्रवाद अभी भी बिल्कुल बनती हुई स्थिति में था, कि कई मुद्दे सुलझाये जाने की प्रक्रिया में ही थे। इसके अलावा, अपने पठन के प्रबल राष्ट्रवादी अभिप्रायों का निर्वाह करते हुए, वे व्याख्यान में हिंदू-मुस्लिम एकता की अपील और ‘हिंदू’ को अधिक समावेशी तरीके से इस्तेमाल करने के निवेदन पर ही ग़ौर फ़रमाते हैं। इस तरह वे तेज़ी से अलग होते दो समुदायों के बीच के उन तनावों और वैर-भाव की अनदेखी करते हैं जो उस व्याख्यान में भी दस्तावेज़ीकृत हैं। उस दौर को हिंदू पुनरुत्थानवाद का दौर बताये जाने की कोशिशों को अगर रामविलास शर्मा असंगत बता कर ख़ारिज करते हैं, तो साथ में धार्मिक मुद्दों को भी दरकिनार कर देते हैं और इस तरह भारतेंदु के काम का यह ख़ासा विचारणीय पहलू हाशिये पर चला जाता है।“

पहला अंश जितनी सारगर्भित प्रशंसा का उदाहरण है, दूसरा उतनी ही सारगर्भित आलोचना का, और ग़ौर करने की बात है कि दोनों जगहों पर शैली एक-सी है – सीधी बात कहनेवाली तार्किक शैली, जिसमें कोई भावनात्मक अतिरेक नहीं है।
कुल मिलाकर, इस किताब का हिंदी में आना एकाधिक कारणों से ज़रूरी था। नई सूचनाओं और स्थापनाओं के लिए तो इसे पढ़ा ही जाना चाहिए, साथ ही, हर तथ्य को साक्ष्य से पुष्ट करनेवाली शोध-प्रविधि, हर कोण से सवाल उठानेवाली विश्लेषण-विधि और खंडन-मंडन के जेहादी जोश से रहित निर्णय-पद्धति के नमूने के रूप में भी यह पठनीय है।

अनुवाद के लिहाज से यह किताब, निस्संदेह, बहुत चुनौतीपूर्ण थी। अवधारणात्मक जटिलताओं और लंबी तथा गझिन वाक्य-रचना को हिंदी में लाने में अनुवादक-द्वय के पसीने छूट गये। इसके बावजूद मूल के साथ कितना न्याय हो पाया है, कहना कठिन है। हर बार इस अनुवाद को पढ़ते हुए कुछ-न-कुछ बदल डालने की ज़रूरत महसूस होती है… पर एक असंतुष्ट-सा ही सही, पूर्णविराम लगाना इसके प्रेस में जाने के लिए तो ज़रूरी है! हां, पूर्णविराम लगाते हुए वसुधा डालमिया की एक शैली विशेष को लेकर पाठकों को सचेत करना ज़रूरी है। कई जगह जब वे किसी किताब/लेख/भाषण में आई हुई बातों का सार-संक्षेप प्रस्तुत कर होती हैं तो वाक्य-रचना कुछ इस तरह की होती है कि वह बात स्वयं लेखिका की अपनी बात प्रतीत होने लगती है। ऐसा भ्रम अंग्रेज़ी में पढ़ते हुए नहीं होता, पर हिंदी में उल्था करने पर होता है। मिसाल के लिए, जहां वे भारतेंदु के बलिया भाषण की अंतर्वस्तु के बारे में बताती हैं, वहां आए हुए इन वाक्यों को देखें:

“अंग्रेज़ों की कृपा से और सामान्यतः संसार की उन्नति के चलते कितना सारा तकनीकी ज्ञान सुलभ हो गया था। बावजूद इसके देश की जनता, जिसने पुराने ज़माने में अपने आदिम औज़ारों के साथ आश्चर्यजनक खोजें की थीं, अब चुंगी की कतवार फेंकने की गाड़ी से ज़्यादा कुछ न थी। मौजूदा दौर में उन्नति के लिए एक घुड़दौड़ चल रही थी, और जापानियों को छोड़ भी दें तो अमेरिकी, अंग्रेज़ तथा फ्रांसीसी इस घुड़दौड़ में आगे रहने का पूरा जुगाड़ लगाये हुए थे। यह ऐसा समय नहीं था जब पीछे छूटना किसी भी तरह गवारा हो।… यह शिकायत कि ख़ाली पेट इन चीज़ों के बारे मेें कैसे सोचें, अंततः क़ायल करने वाली न थी।“

ऐसे अंश बहुतेरे हैं। इन्हें पढ़ते हुए सावधान रहना पड़ेगा कि लेखिका अपनी बात नहीं कह रहीं, वे किसी और को, बिना उद्धरण-चिह्नों के, अपने शब्दों में उद्धृत कर रही हैं। यह सावधानी न बरती गई तो संभव है, लेखिका को ऐसी अनेक बातों का आरोप झेलना पड़े जो उनकी नहीं हैं और जो हिंदी की प्रकृति तथा अनुवाद की विकृति के कारण उनकी प्रतीत होती हैं।

SANJIV KUMAR

संजीव कुमार

संजीव कुमार। युवा आलोचक और कहानीकार। ‘जैनेन्द्र और अज्ञेयः सृजन का सैद्धांतिक नेपथ्य’ पुस्तक के लिए देवीशंकर अवस्थी सम्मान। दिल्ली विश्विद्यालय के देशबंधु कॉलेज में  प्राध्यापक। इनसे sanjusanjeev67@gmail.com पर संपर्क सम्भव है।

भारत माता: आनंद कुमारस्वामी

आनंद कुमारस्वामी की एक किताब है ‘ऐसेजइन नेशनल आयडिलिज्म’. जीए नेटसन एंड कंपनी, मद्रास से 1909 में प्रकाशित इस किताब में संकलित एक आलेख का नाम है- माता भारत! आलेख अनूठा है, इस अर्थ में कि उसमें पहली दफे भारतमाता की कथा कही गयी है. 
बंकिमचंद्र ‘वंदे मातरम्’ गीत में भारतमाता का आद्यरूप गढ़ चुके थे, इस आद्यरूप को अबनींद्रनाथ टैगोर की तूलिका ने अपने कैनवस पर मूर्तिमान किया लेकिन, गीत और चित्र से उठनेवाले अर्थों की प्रामाणिक व्याख्या अभी शेष थी. व्याख्या का यही काम भारतीय संस्कृति के मर्मज्ञ आनंद कुमारस्वामी ने अपने ‘माता भारत’ शीर्षक लेख में किया.
 
कुमारस्वामी के आलेख की शुरुआत इन पंक्तियों से होती है- ‘कभी की बात है, एक स्त्री थी- लंबी और गोरी. एकदम निर्मल, धैर्य और कृपा की प्रतिमूर्ति…! ’ आलेख में आगे प्राचीन, मध्यकालीन और आधुनिक भारत का संकेत करते हुए लिखा गया है कि विद्या-बुद्धि के मामले में यह स्त्री विश्वगुरु थी, बहुतों ने उसका हाथ मांगना चाहा और इनमें से एक जिससे उसे रंचमात्र ही प्रेम था, बरसों तक उसकी काया का स्वामी बना रहा. फिर एक और आया, इस अनजान प्रणय-याचक ने वादे किये स्वतंत्रता और शांति के, उसकी संतानों की सुरक्षा के. और, उसने विश्वास करके उसे अपना हाथ सौंप दिया…! 
 
इसके बाद आलेख में सन् 1857 का जिक्र आता है कि स्त्री के कुछ बच्चे नये स्वामी के विरुद्ध उठ खड़े हुए. उन्हें लगा कि उनकी ताकत छिनी जा रही है और उनके आपस के बात-व्यवहार जिन नियम-कायदों से संचालित होते हैं, उनके साथ छेड़छाड़ की जा रही है. भारतमाता की इस कथा में एक नया मोड़ आता है, जब 1857 के बाद के मध्यवर्गीय मानस के दोहरेपन को इंगित करते हुए कुमारस्वामी लिखते हैं कि नये स्वामी से माता ने एक संतान जना और स्वामी खुश था कि वह (एक कन्या का जन्म) उसके रंग-ढंग की होगी, उसके अपने लोगों की कन्या के समान.
 
वह धनवान और रूपवान होगी, उसके अपने लोगों के पुत्र की दुल्हन बनेगी. लेकिन जब इस संतान का जन्म हुआ, तो माता जैसे स्वप्न से जागी और सिर्फ अपनी बेटी की खातिर जीने लगी. बड़ी होती बेटी मां को उसके यौवन के दिनों की याद दिलाती थी. वह विदेशी स्वामी की पक्षधर नहीं थी, तो भी उसमें उस (विदेशी स्वामी) जैसी ऊर्जा और व्यावहारिक मामलों की चतुराई थी. मां चुपके से बेटी को प्राचीन ज्ञान सिखाती और बेटी का हृदय अपने पिता, उसके लोगों और उनके आचार-व्यवहार से दूर होता चला गया. 
 
कथा के आखिर में आता है कि बेटी की आचार-व्यवहार से माता को संतोष था, अब उसके केश उजले हो चले थे, उम्र के हाथों वह कमजोर हो चली थी और एक समय आया जब वह नहीं रही, क्योंकि उसका काम पूरा हो चुका था. बेटी को पिता की निरंकुशता जरा भी बर्दाश्त नहीं थी. 
 
उसे सभी माता कहते थे, और वह अपने से पहले जन्म लेनेवाले बच्चों की भी मां थी, कुमारस्वामी लिखते हैं कि ‘इस माता (क्योंकि उसने कहा कि वह सबकी मां होगी लेकिन ब्याहता किसी की नहीं) ने सब संतानों की मदद की. उसने सबको एक-दूसरे से प्रेम करना और एक-दूजे की मदद करना और अपने को मां पुकारना सिखाया.’ 
 
यह कथा बार-बार याद की जानी चाहिए, क्योंकि आज एक राज्य का मुख्यमंत्री कह रहा है कि भारत माता की जय नहीं बोलनेवालों को इस देश में रहने का अधिकार नहीं है. दूसरे राज्य में एक वरिष्ठ नेता स्कूल-कॉलेज चलानेवाले एक ट्रस्ट का संचालक है. वह नियम बना रहा है कि ट्रस्ट के स्कूल-कॉलेज के प्रवेश फाॅर्म पर भारत माता की जय नहीं लिखा, तो प्रवेश नहीं मिलेगा. 
 
तीसरे राज्य में धर्म की एक संस्था फतवा जारी करती है कि मुसलमान जिस तरह वंदे मातरम् नहीं बोल सकते, इसी तरह भारत माता की जय भी नहीं बोल सकते. जहरबुझी बयानबाजियों के बीच ऐसा लगता है यह 21वीं सदी के दूसरे दशक का नहीं 1930-40 का भारत है, जब एक देश के भीतर धर्म-केंद्रित दो राष्ट्रीयताओं के सिद्धांत ने जोर पकड़ा था. इतिहास दोहराने के आतुर इन बयानवीरों में से क्या किसी को भारतमाता की कथा याद है? 
 
आनंद कुमारस्वामी की भारतमाता की कथा किसी एक धर्म की कथा नहीं है, वह धार्मिकताओं के समाहार की कथा है. इस कथा की पहली सीख है कि अतीत में लौटना नहीं हो सकता और दूसरी सीख है कि भारतमाता स्वयं स्वामिनी (संप्रभु) हैं, सब ही उनकी संतान हैं, सो कोई एक अपने को वारिस बता कर शेष पर भारतमाता के नाम से हुक्म के कोड़े हांकने की निरंकुशता नहीं बरत सकता. # चंदन  श्रीवास्तव 

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भारत माता, चित्रकार-शारदाचरण

माता भारत

By आनंद कुमारस्वामी

कभी की बात है, एक स्त्री थी- लंबी और गोरी. एकदम निर्मल, धैर्य और कृपा की प्रतिमूर्ति ! ना, वह युवती नहीं थीऐसा तो कोई सोच भी नहीं सकता। बीते बरसों में उसकी विद्या-बुद्धि की धूम थी, दुनिया भर से ज्ञानीजन आते, उसके चरणों में बैठते और उसकी सीख दुनिया के कोने-कोने में ले जाते. लेकिन अब उसकी उम्र ढलान पर थी, तनिक थकान हावी होने लगी थी और उसकी आंखों की ज्योति किसी ध्रुवतारे की तरह बस उन्हीं चंद सयानों को राह दिखा पा रही थी जो अब भी आभास के पीछे का यथार्थ देख पाने में सक्षम थे. लेकिन, वह धनी थी और बहुतों ने उसका हाथ मांगना चाहा और इनमें से एक जिससे उसे रंचमात्र ही प्रेम था, बरसों तक उसकी काया का स्वामी बना रहा. फिर एक और आया, इस अनजान प्रणय-याचक ने वादे किए स्वतंत्रता और शांति के, उसकी संतानों की सुरक्षा के. और, उसने विश्वास करके उसे अपना हाथ सौंप दिया..

कुछ समय तक ठीक चला. शांति थी, उपेक्षा से उपजी हुई. उसका नया स्वामी उसके खजाने के धन-दौलत को पाकर संतुष्ट था. लेकिन जल्दी ही उसने अपनी नव ब्याहता और उसकी संतानों में ज्यादा रुचि दिखानी शुरु कर दी और स्वयं से कहा,  “इस स्त्री के आचार-विचार विचित्र जान पड़ते है, ना तो मेरी तरह हैं और ना ही मेरे लोगों की तरह, उसके विचार मेरे विचार से मेल नहीं खाते; लेकिन उसे प्रशिक्षित किया जाएगा, उसे शिक्षा दी जायेगी ताकि जो मैं जानता हूं उसे वह भी जान सके और दुनिया कहे कि मैंने उसके मन को मोड़ कर प्रगति की राह पर लगा दिया है.” वह उसकी पुराचीन ज्ञानराशि को नहीं जानता था, वह उसे दिमाग से सुस्त जान पड़ती थी और अपनी जिस व्यवहारकुशलता पर उसे गर्व था उसकी उसमें कमी जान पड़ती थी.

और ये विचार अभी उसके मन में चल ही रहे थे कि उसके(स्त्री) कुछ बच्चे उसके(नये स्वामी) विरुद्ध उठ खड़े हुए कि उनकी ताकत छिनी जा रही है और उनके आपस के बात-व्यवहार जिन नियम-कायदों से संचालित होते हैं उनके साथ छेड़छाड़ की जा रही है. इन संतानों को भय था कि उनकी प्राचीन विरासत हमेशा के लिए खत्म हो जायेगी. माता को अब भी शांति की आशा थी. उसने अपनी संतानों की पुकार नहीं सुनी बल्कि संतानों के हठ के शमन में मददगार बनी और जल्दी ही फिर शांति छा गई लेकिन जिद्दी बच्चे अपने नये पिता से प्यार नहीं करते थे और वे अपनी माता की बात समझ ना सके. उनके नये पिता ने दूसरा तरीका अपनाया, बच्चों को स्कूल में भेजा जहां उन्हें उसकी भाषा और उसके विचार सिखाये गये, बताया गया कि उसके लोग कितने महान और आत्म-दानी थे, बताया गया कि बिना किसी लाभ या प्राप्ति के उनकी माता को कैसी अशांति और दैन्य से रक्षा की गई है. बच्चों को यह भी सिखाया गया कि वे अपने प्राचीन वैभव  को भूल जायें और नई सीख की ऊंची चोटी पर चढ़ प्राचीन रंग-ढंग को तिरस्कार के भाव से देखें..

लेकिन अब एक और बात हुई, नये स्वामी से माता ने एक संतान जना और स्वामी खुश था कि वह( क्योंकि एक कन्या का जन्म हुआ था) उसके रंग-ढंग की होगी, उसके अपने लोगों की कन्या के समान. वह धनवान और रुपवान होगी, उसके अपने लोगों के पुत्र की दुल्हन बनेगी. लेकिन जब इस संतान का जन्म हुआ तो माता जैसे स्वप्न से जागी और सिर्फ अपनी बेटी की खातिर जीने लगी. बड़ी होती बेटी मां को उसके यौवन के दिनों की याद दिलाती थी. वह विदेशी स्वामी की पक्षधर नहीं थी तो भी उसमें उस(विदेशी स्वामी) जैसी ऊर्जा और व्यवहारिक मामलों की चतुराई थी. माता उससे खूब बातें करतीं, गहरी बातें! विदेशी स्वामी से यह छिपा नहीं था लेकिन उसने यह सब चलने दिया, उसने सोचा कि मैं तो बहुत महान हूं और इस महानता का तकाजा है कि जैसा चल रहा है वैसा चलने दिया जाय. उसने शिक्षक रखे, कन्या को उसने अपने लोगों के रंग-ढंग की शिक्षा दी. लेकिन मां चुपके से बेटी को प्राचीन ज्ञान सिखाती और बेटी का हृदय अपने पिता, उसके लोगों और उनके आचार-व्यवहार से दूर होता चला गया. माता को (इस बाते से) संतोष था, अब उसके केश उजले हो चले थे, उम्र के हाथो वह कमजोर हो चली थी और एक समय आया जब वह नहीं रही क्योंकि उसका काम पूरा हो चुका था. और विदेशी स्वामी भी तनिक थक चला था क्योंकि उसके अपने देश में कलह-कोलाहल था और कहा जाने लगा था कि वह पराये की जमीन पर एक निरंकुश की भांति रह रहा है. इस बात से उसे पीड़ा होती, वह सोचता कि क्या मैंने अपना जीवन दूसरों के हित ही नहीं जीया और क्या ये मजूरे लोग उसकी ताबेदारी के ही लायक नहीं?  लेकिन बेटी दृढ़ से दृढ़तर होती गई, उसे पिता की निरंकुशता जरा भी बर्दाश्त नहीं थी और वह अपने से पहले जन्म लेने वाले बच्चों के बच्चों की भी मां थी, उसे सभी माता कहते थे.  एक दिन संतानों में पुराने दिनों की तरह कोलाहल उठा. उन्होंने कहा कि राजस्व वसूलने और हमारे मस्तिष्क पर सीखे उकेरने वाले इस विदेशी स्वामी की हमें जरुरत नहीं. लेकिन बड़ी सख्ती से उन्हें कुचल दिया गया, कुछ को जेल हुई, कुछ के साथ इससे भी बुरा हुआ क्योंकि पिता पराने रंग-ढंग(दंड और पुरस्कार की नीति पर चलने वाला) का था. उसे लगता मातहत लोगों की जीवन और मृत्यु पर उसका अधिकार नहीं होना अनुचित है. लेकिन बच्चे अब उसकी निरंकुशता सहने को तैयार नहीं थे क्योंकि उसने स्वयं ही भूलवश सिखा दिया था कि राजा-रजवाड़े के दिन अब खत्म हो चुके हैं. उसने स्वतंत्रता के सपने देखना सिखा दिया था.

ये सारी दुश्वारियां उस पर सवार थीं, वह बूढा होकर थक चला था और नवयुवती माता( क्योंकि उसने कहा था कि वह सबकी मां होगी लेकिन ब्याहता किसी की नहीं) ने सब संतानों की मदद की. उसने सबको एक-दूसरे से प्रेम करना और एक-दूजे की मदद करना और अपने को मां पुकारना सिखाया. उसने विदेशी स्वामी को छोड़ दिया और अलग जाकर रहने लगी जहां बच्चे उससे राय-सलाह के लिए आते. और जब तक विदेशी स्वामी इसे रोकता, वह वहां नहीं रहती बल्कि कहीं और चली जाती. ऐसा जान पड़ता कि वह ना यहां है ना वहां बल्कि वह हर जगह है.

यह कहानी अभी समाप्त नहीं हुई है लेकिन अंत दूर नहीं है और उसे देखा जा सकता है..

( ऐसेज इन नेशनल आयडिलिज्म– आनंद कुमारस्वामी, 1909, जी ए नेटसन एंड कंपनी, मद्रास में संकलित एक आलेख और इसका हिंदी अनुवाद चंदन श्रीवास्तव द्वारा किया गया है.  )

The Jawaharlal Nehru University (JNU) Bill: Bhupesh Gupta

The Jawaharlal Nehru University (JNU) was the idea of M.C. Changla during his tenure as education minister. He wanted to set up a university of international standards which would deal with cutting-edge areas of science and technology including agricultural technology. After he placed the bill introducing the idea and initial concept of the university in Rajya Sabha on 1 September 1965, Bhupesh Gupta spoke on the motion. He thought that the idea as articulated by education minister was good but ‘pedestrian’. He wanted the new university to be different from traditional universities granting degrees annually. When JNU finally came in to existence, it reflected more of Bhupesh Gupta’s vision than that of M.C. Changla.  

Central Library- JNU

Central Library- JNU

The Jawaharlal Nehru University (JNU) Bill

By Bhupesh Gupta

Mr. Chairman, Sir, we have heard some speeches, especially from the Congress benches. I do not think it is necessary to talk about this university in order to settle the name of a personality in history. We are told that the name of Pandit Jawaharlal Nehru would be immortalized by this particular university as though that is how we are going to immortalize him; otherwise according to them- it seems to me he would not be immortal. I think this is an entirely wrong approach. It is understandable if honorable members take the opportunity of expressing certain good and nobel sentiments for their leader and for, undoubtedly, a very great man. But we are here discussing the specific proposal for a university, and let us not try to waste much time on the name itself, although points were made about him, or the biographical sketch of Pandit Jawaharlal Nehru was drawn. What we should do here is to look at the problem and examine the question that is before us on merits. We are having another university in Delhi as indeed we should have got one much earlier. Delhi’s requirements of higher education are not squarely met and Delhi certainly deserves to be given a university by the Central Government and arrangements for providing higher education by the Central Government should have been made. That was done naturally, people have suffered and our education has suffered here. Mr. Chairman, therefore I am happy that Delhi will perhaps have a large scope for higher education in humanities, in science and in technology. But it is a pedestrian way in which the Bill has been conceived of by our esteemed friend, Mr. Changla. One should have thought that when you are giving this name to this university and are being guided by certain sentiments which would be cherished, undoubtedly, honestly you would have also introduced some new ground in the matter of approach. But what we have is just a common-place legislation which more or less repeats the picture of the universities that we have in our country. There is nothing particularly new in it, nothing particularly exciting in it. That is what I wish to say.

The very first thing that comes to my mind in this connection is: for whom we are arranging this education. Yes, technological education, scientific education and other educational facilities should be extended. We agree, but preference should be given especially when income disparities continue in the country in a very serious manner, when we find that the young boys and girls coming from the poorer classes do not have opportunity or wherewithal to enter the portals of our university, naturally the question arises whether this university is going to be open for them, those who do not have enough money or whose families do not have enough money or whether it is going to be just another one which will be accessible only to the sons and daughters of the rich. This question is very important and has to be answered and settled from the standpoint of those who need the care of the country most. Still, we talk about Oxford University and so on. I do not know how long it will take- perhaps another five centuries we will require at this rate- in order to forget the Oxford and Cambridge Universities.

Mr. Chairman, let us not go into all these things. These are very pedantic, high-sounding and perhaps very, very attractive to those people who have, in the corner of their hearts, still a lingering admiration for everything that is Anglo-Saxon. I am not one of those people. Certainly, there are a lot of things to be got from every country and England is not excluded from them. But why cannot the problems of our universities be considered from the standpoint of the requirements of our country in the light of the experience about education in the contemporary world? And I think the contemporary world points to one thing and it is this that the type of educational system that we have in Oxford and Cambridge in modern times, with very high-flown expenses and with a different set-up of values and functions of our people or any people for that matters, does not meet the requirements of the situation. That is what I wish to say. Therefore, let us not go into it. Here, Mr. Changla should consider for whom the university is intended. Why should we like more money to be given to this without any assurance given by the Government that this university will particularly cater to the needs of the poorer classes and poorer people?

Mr. Chairman, let us not have Cambridge and Oxford and Princetons and Harvards here; let us create universities and colleges that our people need, that our development needs, for the remaking of our material and cultural being. That is what I say and therefore the first thing is to ensure that the sons of the working people, the worker, the peasants and the middle classes do have the doors of the universities thrown wide open to them. That is the first thing and for that you have to provide not only money but also a different outlook. Money must come; we must have subsidized education; it must be highly subsidized because the investment that you will be making in imparting higher scientific and technical education to the poorer sections of the community will have been repaid in course of time in creative and even constructive labour which would go to the benefit of the entire society. That is now I view this matter. But Mr. Chairman, if the cost of education becomes expensive- from Rs. 125 to Rs. 200- I should like to know how many even of the great officers of the Government would be in a position to send their sons and daughters to these universities. That is what I would like to know. We know of those days when tuition fee in the colleges was Rs. 10. Now, go to the college, one requires to spend Rs. 30. That is the position. Then, we pay the tuition fees and spend on books and other things. Therefore, if Mr. Changla feels and honorable members who expressed good sentiments about Pandit Jawaharlal Nehru feel that he had some socialist ideas and a socialist way of looking at things, let the emphasis be shifted from the upper classes to the classes that are economically at bottom layers of the society. This is the first suggestion.

Secondly, the university should be run on broad basis. I would not like the bureaucratic set-up to come in. The autonomy should be completely guaranteed. I think we can give autonomy in a larger measure to a university of this kind. Since Jawaharlal Nehru’s name is associated with it I feel there should be faculty which educates the students in the spirit of world power. Now, we have got all faculties…we want, therefore, in a university of this kind a special faculty to be created that would impart learning and education in the spirit of the worldwide struggle for peace because nothing today is so noble and great as that one which teaches our younger generation… the struggle that humanities is waging for peace. Therefore, this thing should be there. Let there be a new faculty. Show some originality… There are new faculties to be created. That is matter for the Select Committee to consider. Maybe it is not possible to include everything in a bill. But an indication should be there. That is what I say.

Then Mr. Chairman, I should also like this university to educate students in various matters connected with development of democratic institutions and democracy in the country. This should be a special subject. It should be there in other universities also. Sir, many names are taken here. We find special faculties in a given situation are brought into existence in order to educate the people in special branches of learning so that students may become useful, enlightened citizens when they are educated in world affairs and the affairs of the state. Therefore, I say such suggestions should also be considered.

Some honorable members talked about student indiscipline. Sir, we are elder people. Therefore, we can talk about student indiscipline. But, Mr. Chairman, let us look at the ruling class and at the elders in a particular state from which Pandit Jawaharlal Nehru came. I see the greatest indiscipline going on among those teaching about discipline to the students. Take the example of UP. What is happening there? Among the leaders, as you know, they talk glibly about student indiscipline. Sir, by and large, I do maintain that our student communities in other countries also and we should have no hesitation in extending to the student community as a whole our best feelings and deep appreciation of the manner in which they conduct themselves. There will be some bad people. And where there are not bad people, I should like to know. If you take percentages, you will find much higher percentage of bad people in the Treasury Benches than any college or university in the country. Therefore, let us not talk about this business. Sir, students should have ideals before them. Sir, students should have ideals before them. I should like this university to have a clear faculty, I maintain, for the studies of scientific socialism. And why should it not be there? Everybody talks about socialism. Mr. S.K. Patil talks about socialism. Mr. G.D. Birla talks about socialism. Mr. J.R.D. Tata talks about socialism. Mr. Hridas Mundhra talks about socialism when he gives money to a particular election fund. Everybody these days talks about socialism. But one does not know what it is… So, there should be a faculty for the study of scientific Socialism.

…I know, in the postgraduate courses Marxism is taught but books are always from the united states of America which display no knowledge of Marxism at all. Therefore, Mr. Chairman, I should like a faculty to be created to impart proper education of this kind.

As far as other things are concerned, I do not wish to say anything because we will have another chance I believe when the thing comes back from the select committee. But I think the poor should be kept in view. Noble ideas should be kept in mind. And certainly when Parliament has declared for the establishment of, what they call, socialist state, socialism should be studied as a special subject, as it prevails in this country, in this particular university.

Courtesy
The Penguin  Book of Modern Indian Speeches: 1877 to the Present, 2007
Edited by Rakesh Batabyal

निमित्त: उस्मान ख़ान

एक भविष्य-दृष्टि के साथ देखें या मौजूदा वक्त की निगाह से देखें या बहुत दूर नहीं गए व्यतीत के साये में देखें… कैसे भी देखें यह कहते हुए अफसोस होता है कि हिंदी कहानी बहुत देर से खुद को संदेहास्पद बनाने के आयोजन में मुब्तिला है। कहानी एक सुंदर विधा है और अगर उसे एक स्त्री मानें तब यह कह सकते हैं कि वह इन दिनों अपने रचयिता की जबरदस्ती से आजिज है। यहां मौजूद कवि उस्मान खान का गद्य इस औरत को उसकी आजिजी से आजाद कराने की एक इंकलाबी कोशिश है। गद्य इसे यूं कहा जा रहा है क्योंकि कहानी के मानकों पर यह कहानी पूरी नहीं उतरती। इसकी जिंदगी इसके उन्वान को सही नहीं ठहराती। ‘निमित्त’ का मतलब शब्दकोशों में ‘कारण’, ‘लक्ष्य’, ‘मकसद’ वगैरह बतलाया गया है। इस गद्य में जो घट रहा है, उसका निमित्त जाहिर तौर पर इस गद्य में नहीं मिलेगा। यहां गद्यकार के पास वक्त बहुत कम है और घटनाएं बहुत ज्यादा। जैसे एक छोटे से सफर में कोई हमसफर जब पूरी जिंदगी का सफर जानना चाहता है, तब बयान करने वाली कोशिश ‘क्या घटनाएं हुईं’ यह बताने की होती है, यह बताने की नहीं कि ‘घटनाएं क्यों हुईं’। इस प्रक्रिया में वाग्जाल और विस्तार कम होता है। सुनने वाला इसे संदेह से नहीं देखता, उसे सोचने का रोजगार मिल चुका होता है। संदेहास्पद कहानियों के दौर में ‘निमित्त’ एक ऐसी ही कहानी है— सोचने का रोजगार सौंपती हुई। इसने वह शिल्प नहीं चुना है जो मानकों को पूरा करने के लिए अपनी असलियत से अलग हो जाता है। यह कहानी उन कहानियों की तरह नहीं है, एक पैराग्राफ तक चलकर पढ़ने वाले जिनकी उंगली छोड़ देते हैं। #अविनाश मिश्र 

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Snap Shot from Titas Ekti Nodir Naam (1973)


निमित्त

 By उस्मान ख़ान

‘जी नहीं, आपके कहने से मैं इश्वर या धर्म पर विश्वास नहीं कर सकता! आपका ख़ुदा कैसा जीव है! न सुनता है, न देखता है, न बोलता है। उसे कुछ महसूस नहीं होता। वह खुश नहीं होता, नाराज़ नहीं होता। न्याय-अन्याय से उसे कुछ लेना-देना नहीं। फ़िर भी आपने अपनी ख़ुशी के लिए एक कल्पना-लोक बनाया है, जिसमें आप जो चाहें, हो सकता है। आपको अपनी कमज़ोरियों और कमअक़्ली को छुपाने के लिए एक खोल चाहिए, आपने अपने बाहर एक शक्ति को मान लिया, जो आपकी कमज़ोरी और कमअक़्ली को दूर कर सकती है, आप उसकी शरण में जाते हैं, उससे गुहार करते हैं, उसकी मनुहार करते हैं, वह नहीं सुनता, नहीं ही सुनता। वह हो तो सुने!’

इतना सुनने की देर थी कि बाबा ने मुझे धक्का मारकर घर से बाहर किया। ‘बदतमीज़! हरामख़ोर! भगवान को गाली देता है!’। मैं भी चुपचाप निकल गया। बाबा खुद भी जानता है कि उसने रो-रोकर, गिड़गिड़ाकर भगवान से अपनी पहली बीबी की जान की भीख माँगी थी, और भगवान ने उसकी अनसुनी कर दी थी। बाबा जब भी पहली माँ की बात करता है, भगवान को एक-दो गाली ज़रूर देता है। लेकिन मैं कैसे गाली दे सकता हूँ? भगवान का ठेका तो बाबा का है। बाबा भी ढकोसलेबाज़ है।

मुँह-अँधेरे मैं घर की दीवार से चिपककर सिर झुकाए ऐसे गली पार करता हूँ जैसे कोई उल्का-पिण्ड। तुरंत। मेरे पैर इतनी तेज़ी से उठते हैं जैसे रेल चल रही हो। मैं पूरी कोशिश करता हूँ कि घर में किसी के भी जागने से पहले घर से निकल जाऊँ। पहली बार जब आई ने दरवाज़ा खुला देखा था, तो क्या सोचा होगा! उसने मुझे कुछ कहा नहीं। मुझे पता है, मेरे बाद वही जागती है और सबसे पहला काम दरवाज़ा बंद करने का करती है। रात को भी वह दरवाज़ा अटकाकर सोती है, मैं जब चाहूँ घर आ सकता हूँ!

घर में सब लोग इस बारे में जानते हैं। कोई कुछ कहता नहीं। सबने मेरे इस रूप को स्वीकार कर लिया है। पहले-पहल बाबा कुछ कहते थे, बाद में उन्हें भी कोई फर्क नहीं रह गया। बाबा कभी-कभी मुझे परेशान करने के लिए दरवाज़ा बंद कर देते हैं, मैं भी दरवाज़ा नहीं बजाता। चुपचाप लौट जाता हूँ।

लौट जाता हूँ! कहाँ लौट जाता हूँ? कहीं भी! घर मेरे लिए मजबूरी है, जैसे सोना। मुझे नींद आने लगती है, तो मैं घर आ जाता हूँ। सोता हूँ और फिर निकल जाता हूँ। कहाँ? कहीं भी!

असल में, घर मेरे लिए एक सराय का काम देता है। जश्न हमारे घर में वैसे भी नहीं मनाया जाता और कभी कुछ हँसी-खुशी का मौका होता है, तो मैं अपनी तथाकथित मनहूस सूरत नहीं दिखाता। त्यौहारों पर भी यही स्थिति होती है। सब मुझे भूल गए हैं, ऐसा भी नहीं। पर कोई मुझे याद करना चाहता है, ऐसा भी नहीं। मैं उन्हें कुछ दे नहीं पाया। यानी अपने परिवार को। आई हैं, बाबा है, भैया है, भाभी हैं और उनसे जुड़े तमाम रिश्तेदार हैं। रिश्तेदार अक्सर आते-रहते हैं और अक्सर ही मैं इधर-उधर भटकता अपनी नींद को बहलाता रहता हूँ। भैया की स्थिति भी ऐसी ही है, वह भी घर से भागा फिरता है, जबकि वह कमाता है और कमाना अपने-आप में एक जादू है, जो लोगों को आपकी ओर आकर्षित करता है, आप जितना कमाते हैं, लोग उतना ही आपकी तरफ खींचते चले आते हैं और जहाँ आपने कमाना बंद किया लोगों को आपसे चिढ़ होने लगती है, आई भी जली-कटी सुना देती है, फिर और किसी का क्या कहूँ। हालाँकि मैं भिड़ जाता हूँ, ख़ासतौर पर रिश्तेदारों के साथ, उनसे मुझे और भी कुछ लेना-देना नहीं रहता। मैं उन्हें खरी-खोटी सुनाता हूँ। उनके मुँह पर उनके काले धंधे और धुर्तताओं की बात करता हूँ। वे मुझसे ख़ार खाते हैं। मैं उनसे मज़ा पाता हूँ।

आप सोच रहे होंगे मैं कोई काम क्यों नहीं करता। दरअसल, मैं कोई काम करना नहीं चाहता। काम करने से क्या होता है? काम करने से आज तक किसी को कोई फायदा हुआ है! कुल मिलाकर रुपया कमाने के अलावा काम करने का कोई और मकसद मुझे नज़र नहीं आता। और मैं रुपया कमाना नहीं चाहता। जी नहीं! ऐसा नहीं कि मैं निठल्ला हूँ। मैं पूरा दिन और कभी-कभी पूरी रात भी घुमता रहता हूँ। इस गली से उस गली, इस मुहल्ले से उस मुहल्ले, इस चौक से उस चौक। मैं दिन-भर चलता रहता हूँ। इस शहर का एक-एक हिस्सा मैं माप चुका हूँ। अब यह तो कोई काम नहीं है, और इस काम का कोई रुपया भी नहीं देता। और अगर देता भी, तो मैं लेता नहीं।

फिर आप कहेंगे मैं खाता-पीता कहाँ से हूँ? मैं कुछ छोटे-मोटे काम करता हूँ। फ्री-लांसिंग समझिए! तब भी मुझे घर से लगाव है। पता नहीं मेरा मन यहाँ अटका रहता है। सोने को तो मैं कहीं भी सो सकता हूँ। पर कहीं भी सोने पर बाबा घर ले आते हैं। कभी मुझे समझ नहीं आता कि ये लोग मुझसे चाहते क्या हैं? रुपया! बस यही एक चीज! क्या रुपये के बाहर आदमी का कोई काम नहीं! भैया बोलता है कि मैं अव्यवहारिक हूँ। मैं ध्यान नहीं रखता किसके सामने क्या बोलना चाहिए। मैं मूढ़मगज हूँ। ऐसा भैया का कहना है। मेरा मानना है वह एक हाफ-फ्राई ऑमलेट है, जिसे वास्कोडिगामा ने बनाया था और अब फफूँदा चुका है। वह इन्सान नहीं है। रुपये का भक्त है। एक-एक रुपये का नफ़ा-नुकसान जोड़ता रहता है। उसने अपनी एक दुकान डाल ली है। उसी पर ऐंठता है। और कुछ नहीं। बाबा जानता है कि भैया मकान के चक्कर में उसकी देख-रेख कर रहा है। अगर आज वो मकान भैया के नाम करा दे, तो भैया कल ही उसे घर से निकाल दे। या कम से कम ऊपरवाली कोठरी में डाल दे, जिसमें अभी मैं डला हुआ हूँ!

बाबा मुझे ठीकाने से लगाना चाहता है, लेकिन हार चुका है, एक वह समझ चुका है कि मुझे नहीं समझाया जा सकता। भाभी अब भी समझती है कि मुझे दुनियादारी के काम में लगा सकती है, पर मेरा ख़याल है वह ग़लत समझती है, बल्कि मेरा मानना है कि वह मुझे समझती ही नहीं। उसे मेरी शादी के अलावा कुछ नहीं सूझता। उसे लगता है शादी ही मेरे मर्ज़ का ईलाज है। वैसे मेरा मर्ज़ है क्या?

मैंने कहा कि मैं रुपया नहीं कमाता, इधर-उधर घुमता रहता हूँ, कभी कोई काम मिल जाए तो कर लेता हूँ, वह भी मनमाफिक, मन नहीं हो तो कोई मुझसे काम नहीं करवा सकता, कोई कितना ही बड़ा तीसमारख़ाँ क्यों न हो, कितनी ही नौकरियाँ मैंने ऐसे ही गँवाई है। बाबा ने अब किसी से मेरी नौकरी के बारे में बात करना भी बंद कर दिया है। कभी-कभी अच्छा लगता है कि सभी लोगों ने मेरे इस रूप को स्वीकार कर लिया है।

खै़र! जब मैं सुबह दीवार से चिपककर तेज़कदम गली पार करता हूँ, तो मेरा मकसद सीधे बस-अड्डे की तरफ जाना होता है। बस-अड्डे पर भाई लोग खड़े रहते हैं। इनमें से अधिकतर लड़के अख़बार का इंतज़ार कर रहे होते हैं। अलग-अलग बसों में अख़बारों के बंडल रख दिए जाते हैं और फिर भाई लोग फ्री हो जाते हैं। वे सब मुझे जानते हैं। मैं कभी-कभी उनके साथ भी बैठता हूँ, ख़ासकर ठंड के वक़्त, जब वे लोग टायर जलाकर हाथ तापते हैं। ज़्यादातर लड़के कॉलेज में हैं, एक-दो अनपढ़ हैं और दो, जिन्हें मैं पहले जुड़वा भाई समझता था, पिछले पाँच साल से दसवीं पास करने की कोशिश कर रहे हैं। यही आठ-दस लड़कों का झूंड हर सुबह यहाँ पहुँचता है। ये लोग शोर-गुल मचाते हैं। बसों में सवारियाँ बैठाते हैं, सामान लादते हैं, ग़रज़ कि दिन-भर बस-अड्डे पर अपना टाईम काटते हैं और रुपया कमाते हैं। मुझे पढ़ा-लिखा और सीधा-सादा आदमी समझते हैं, सोचते हैं मुझे दुनिया की ज़्यादा ही फिक्र है। लेकिन जैसा कि उस दिन महेश कह रहा था, मैं कुछ नहीं कर सकता। सोचने से कुछ नहीं होता। शायद उस दिन वह किसी से नाराज़ होगा, और अपना गुस्सा मुझ पर निकाल रहा होगा। वर्ना वह ऐसा क्यों कहता!

मैं हर सुबह दो घंटे इसी बस-अड्डे पर बिताता हूँ। अब ये लोग मुझे हर रोज़ देखने के आदी हो गए हैं। जब शुरू में मैं यहाँ आता था, तो ये लोग मुझे हैरत और शक की नज़र से देखते थे। धीरे-धीरे मुझे जानने लगे, और मुझे अहानीकारक जानकर मेरी उपेक्षा करने लगे। मुझे उनकी उपेक्षा से कोई फर्क नहीं पड़ता।

बसों की आवाज़, लोगों के शोर-गुल के बीच यहाँ सुबह होती है। अलग-अलग दिशाओं में जाने वाले लोग इकट्ठा होने लगते हैं। कुछ लोग रोज़ के मुसाफ़िर हैं, उन्हें भी मैं पहचानता हूँ। फिर भी एक अनजानापन सबके चेहरे पर दिखाई देता है। वे लड़के भी मुझे नहीं जानते, दुकानवाले भी नहीं, मुसाफ़िर भी नहीं। वे सब असल में मुझे सनकी समझते हैं।

वैसे मैं मृदुभाषी हूँ। लेकिन मैं उनकी हाँ में हाँ नहीं मिला सकता। ख़ासतौर पर बुढ़ों में मैं यह बीमारी पाता हूँ। वे चाहते हैं कि मैं उनकी बातें सिर हिलाकर स्वीकार करता जाऊँ, लेकिन ये मुझसे नहीं होता। मैं कैसे काले को सफेद मान सकता हूँ, फिर चाहे कोई महात्मा ही यह बात मुझे क्यों न कहे! पर लोग जब अपने से ही जुदा हैं, तो फिर मुझसे कैसे मिलेंगे! हो ही सकता है, ऐसा मैं सोचता हूँ, क्योंकि कभी-कभी मुझे यह भी लगता है कि यह मेरी हताशा है, जो मुझे ऐसा सोचने पर मजबूर करती है, वर्ना ये लोग तो खुश हैं। अपना काम करते हैं, रुपया कमाते हैं, घर-परिवार देखते हैं, मान-सम्मान पाते हैं। इन्हें बेवजह दुःखी क्यों माना जाए!

हर रोज़ सूरज उस कचरे के ढेर के पीछे से उगता है। कुत्ते उस ढेर पर लोटते रहते हैं। सुअर चरने के लिए आते हैं। ढेर से कचरा निकालकर ठंड में लड़के जलाते हैं।

इस दीवार की टेक लगाए मैं हर रोज़ की योजना तैयार करता हूँ, यानी आज मुझे कहाँ जाना है? किधर घुमना है? मैं झूठ नहीं बोलूँगा, कभी-कभी अपनी धुन में मैं शहर से बाहर भी निकल जाता हूँ। आस-पास के देहातों में चक्कर मारता हूँ। मैंने चाय पी, पोहा खाया और त्रिवेणी की तरफ़ चल दिया। आज का दिन उधर ही गुज़ारने का विचार था। त्रिवेणी उस जगह का नाम क्यों है? मेरी जानकारी में इसीलिए कि कभी वहाँ तीन नालों का संगम होता था, पर समय के कचरे-गंदगी ने उन नालों में बहते प्रसाद जल को काला-बदबूदार बना दिया था और दो नालों पर बस्तियाँ बन चुकी थी। एक नाला बचता था, जो अब भी वहीं स्थिर है, काला-बदबूदार जल बहाता हुआ। पर तब जब ये नाले साफ़ पानी से भरे रहते थे कुछ जोगियों ने अपना मठ इनके किनारे बनाया। आज वह मठ बस्ती के बीच आ गया है। लेकिन मठ की बावड़ी बस्ती से थोड़ी दूर है। मठ के पास काफ़ी जगह है। जिसमें कुछ खेत हैं, दुकाने हैं और एक बाग़ीचा और एक बड़ी बावड़ी है। असल में, त्रिवेणी की तरफ जाने का मतलब इस बावड़ी की तरफ जाना ही है। गर्मियों में बावड़ी के आस-पास इतनी शीतलता रहती है कि सो जाने को मन करता है, पर पूजारी या कभी दुकानवाले आकर उठा देते हैं। और फिर उनसे कौन चिक-चिक करे! पर वे भी मुझे जानते हैं, और अक्सर टोकते नहीं, पर जानते हैं कि मेरी जेब में माताजी के दान-पात्र में डालने के लिए कुछ भी नहीं रहता है; बल्कि भोग वगैरह के वक़्त मैं अक्सर उपस्थित रहता हूँ। शायद इसीलिए उनके मन में मेरे लिए कुछ कलुष है! पर मैं वहाँ पहुँच ही गया।

अभी आठ ही बजे थे। एक माशूक-आशिक पहले ही बरगद के नीचे बैठे थे। मुझे देखकर थोड़ा संभल गए। किताब लेकर ऐसे देखने लगे, जैसे इतिहास या विज्ञान की सबसे गंभीर समस्या पर चिंतामग्न हों। मैंने उनकी उपेक्षा की, और आगे बढ़ गया। देखता क्या हूँ, दूसरे बरगद के नीचे एक और जोड़ा बैठा है। उफ़! इन तोता-मैनाओं ने हर दृश्य ख़राब कर रखा है। कभी-कभी सोचता हूँ नौजवानों की उस मुहिम से जुड़ जाऊँ, जिसमें ऐसे जोड़ों को देखते ही उनके घर फोन कर दिया जाता है, और हीर-राँझे की अच्छी-ख़ासी बेइज़्ज़ती की जाती है। पर, यह क्रूर आनंद मैं मन ही मन लेता रहा। मुझे इन लड़कियों में रुचि नहीं। इन लड़कियों में जान नहीं होती। ये अपने कहे पर टिकी भी नहीं रह सकतीं। मुझे तो लगता है, मौज-मस्ती के लिए ही ये लोग यहाँ आते हैं, या किसी भी ऐसी शांत जगह पर जाते हैं, जहाँ इनकी चहचहाहट कोई न सुने। फिल्मों ने इनके दिमाग़ का सत्यानाश कर दिया है। हर कोई अपने को फिल्मी नायिका या नायक समझता है। वैसे ही चलते-फिरते हैं। बैठते-उठते हैं। हँसते-रोते हैं। कपड़े पहनते हैं। गाने गाते हैं। इन्हें देश-समाज से कुछ लेना-देना नहीं है। एक-दूसरे को छूने-चूमने-भोगने के अलावा इनके पास कोई विषय नहीं है। टॉकिज के बच्चे!

मैं आगे बढ़ता गया। दूसरे के बाद तीसरा जोड़ा मिला। खै़र हुई चौथा जोड़ा नहीं मिला, फिर भी दो और बरगद छोड़कर मैं सातवें बरगद तक पहुँचा। यह बाग़ीचे का आख़री बरगद है। इसके बाद खेतों का सिलसिला शुरू हो जाता है। इस बरगद के बाद, कुछ जगह छोड़कर, जामून और अमरूद के पेड़ लगे हैं, और साथ में ही मिर्च, धनिया और बैंगन-टमाटर, पुदीना-जैसे पौधे-पत्ते लगे रहते हैं। बाग़ीचे का यह कोना ही मुझे सर्वाधिक पसंद है। इधर तक कोई नहीं आता। मैंने थोड़ी देर में तीनों जोड़ों की सुध लेने की सोची। समाज में बेहयाई मुझे पसंद नहीं। जो करना है विधि-विधान से करो। यह क्या कि आज इसका हाथ पकड़े घुम रहे हैं, कल उसका मुँह चूम रहे हैं! यह सब मुझे लफंगई लगती है। लड़का करे या लड़की। मैंने देखा तीनों यथावत् प्रेम-क्रीड़ा में संलग्न हैं। वे मुझे भूल चुके। एक लड़की की खीं-खीं मेरे तन-बदन में आग लगा गई। झुँझलाकर मैंने एक पत्थर उठाया, और पहले बरगद की ओर फेंका। मुझे अचानक इन लोगों पर गुस्सा आने लगा था। पत्थर सीधे लड़की के सिर पर लगा था। लड़की खून-झार हो गई। लड़का दौड़कर मेरी तरफ़ आने लगा। मैं शांत मूरत बनकर बैठा रहा। एक पल के लिए लड़का रुका, फिर पीछे दौड़कर गया। लड़की को देखने लगा। फिर दौड़कर मेरी तरफ़ आया। लड़की की चीख़ सुनकर बीचवाले दोनों जोड़े भाग गए थे। लड़का मेरे पास पहुँचा, ‘भैया, देखिए न दीदी को किसी ने पत्थर मार दिया है!’। मेरी जान में जान आई, मुझे समझ आया कि उसे मुझ पर नहीं किसी और पर शुब्हा है। मैं उसके साथ दौड़कर उस तरफ़ गया। देखा लड़की प्राण त्याग चुकी थी। उसकी सफ़ेद चुनरी लाल हो गई थी। एकबारगी मेरे शरीर में झुनझुनी दौड़ गई। मैंने बोला, ‘यह तो गई!’। लड़का वहाँ से भाग खड़ा हुआ। मैं चिल्लाता रहा, ‘अबे! कहाँ भाग रहा है? क्या कर दिया लड़की का?’ मैंने देखा अब वहाँ कोई नहीं था। मैंने लड़की का चेहरा ग़ौर से देखा। वह मेरी भाभी थी। अब मैं लड़के का चेहरा याद करने लगा, लेकिन मुझे याद नहीं आ रहा था।

मैं धीरे-धीरे उस जगह से दूर निकल गया। मन फिर शांत होने लगा। मुझे नहीं पता कि मैंने इतनी आसानी से यह फैसला कैसे ले लिया! मुझे अपनी आज की योजना में फेर-बदल करना पड़ा। मैं अब शहर के दूसरे कोने की ओर जाना चाहता था। लेकिन, शहर के अंदर से होकर नहीं। मैंने सोचा था कि एक बजे तक गंगानगर पहुँच जाऊँगा। वहीं कुछ खाऊँगा, और फिर शाम वहीं काटूँगा। गंगानगर शहर का बाहरी ईलाक़ा है। यह नगर अभी बस रहा है। जब सरकार ने ग़रीबों के लिए घर बनाने की सोची, तो शहर के बाहर इस कुड़ेदान को चुना। इसके आगे खेत शुरू हो जाते हैं और फिर उबड़-खाबड़ ज़मीन जो जंगल में बदलती जाती है। गंगानगर भी एक बस-अड्डा है। यह एक छोटा बस-अड्डा है। यहाँ से गाँवों की तरफ़ जाने वाली बसें मिलती हैं। बस-अड्डे से थोड़ी दूर सड़क के किनारे एक दुकान है, जहाँ दिन में आपको खाना मिल सकता है। मैं खाना खाकर झरने तक घूमने भी जाऊँगा, और अगर मन हुआ, तो नहा भी लूँगा।

दुकान तक पहुँचते हुए एक बार मेरे पैर लड़खड़ाए, जैसे मुझे चक्कर आ गया हो। मैंने खुद को संभाला और दुकान के बाहर लगी बेंच पर बैठ गया। दुकानवाला मेरा मुँह ताक रहा था। फिर मेरी ओर देखकर मुस्कुराने लगा। मैंने एक दर्दभरी मुस्कान दी। वह मेरे पास आकर बोला, ‘क्या हुआ?’

मैंने कहा, ‘चक्कर आ गया!’ वह फिर मुस्कुराने लगा। ‘अभी तो गर्मी शुरू भी नहीं हुई, अभी से चक्कर खाकर गिरने लग गए!’ अब मैं मुस्कुराया। मैंने खाना खाया और एक लस्सी पी। जान में जान आई। पर, एक फाँस-सी गले में लग रही थी। बार-बार प्यास लग रही थी। आखिर मैं उठकर झरने की तरफ चल दिया।

इस पगडंडी से मैं कई बार झरने की तरफ गया हूँ। मैं देख रहा था, आसमान एकदम साफ़ था। नील। कुछ एकदम सफ़ेद-झक बादलों के टुकड़े थे, जो इधर-उधर खिसक रहे थे, ऐसा लग रहा था जैसे नीले दवात पर रुई के फाहे इधर-उधर तैर रहे हों। अब इस पगडंडी पर मैं अकेला चला जा रहा हूँ। धीरे-धीरे शहर की सब निशानियाँ गुम होती जा रही हैं। तालखेड़ी आ गया। गाँव के किनारे होते हुए मैं आगे बढ़ता जा रहा हूँ। देखता हूँ, पगडंडी पर कुछ लोग अर्थी लिए जा रहे हैं। मैं धीरे चलने लगता हूँ, ताकि उन लोगों से एक निश्चित दूरी बनाए रख सकूँ। पर, कदम अपनी गति पकड़ लेते हैं। मैं उनके करीब पहुँच गया हूँ। उलझन में हूँ, उन लोगों से आगे निकलना ठीक नहीं जान पड़ रहा, पता नहीं क्या सोचने लगें! कहीं कोई झगड़ा न करने लगे! आखिर, मैं उनके पीछे-पीछे चलने लगा। एक-दो लोगों ने मुझे पलटकर देखा, और फिर अपनी गति से चलने लगे। कुछ देर में वे लोग पगडंडी छोड़कर खेत के रास्ते आगे बढ़ गए। मैं झरने की तरफ बढ़ने लगा। झरने के पास जाकर बैठ गया।

शाम हो चुकी थी। दूर-दूर तक पंछियों के झुंड दिखाई दे रहे थे। झरने के पास कुछ पक्षी-दल उतरते, और दाना-पानी करके आगे बढ़ जाते। कुछ ही मिनटों में वह जगह पंछियों के कलरव से भर गई। झरने की आवाज़ पंछियों के शोर-गुल में दब गई। इन पंछियों को मेरे आस-पास भटकने से डर नहीं लग रहा था। मैं मूर्ति की तरह अचल बैठा था। मेरे कंधे, सिर, गोद सब पर पंछी बैठे थे। मैं आँखें बंदकर उनके नाखुनों और चोंच के वार सह रहा था। मुझे इस काम में अद्भूत आनंद मिल रहा था। जैसे, शरीर और दिमाग़ दोनों एक साथ हलके होते जा रहे थे। जीवन का कौन-सा सुकून था, जो इस रास्ते मिलना था! मेरा मन शांति से सराबोर था। इस तरह ताज़ा महसूस हो रहा था, जैसे शरीर श्मशान का धूँआ खाने के बाद नहाने पर करता है। मेरा रोम-रोम धूल रहा था कि एक आदमी ने हाँका लगाया। वह दौड़कर मेरे पास आ गया। मैंने चौंककर उसे देखा। वह हाँफ रहा था। अचरज से मेरी ओर देखते हुए बोला, ‘क्या हो रहा है?’

मैंने पहले अपनी तरफ़ देखा, मेरे शरीर पर जगह-जगह घाव हो गए थे, पर मुझे दर्द नहीं हो रहा था। मेरा शरीर जैसे सुन्न था। दिमाग़ भी कुछ ग्रहण नहीं कर रहा था। मैं उस आदमी को देखता रहा। उसके पीछे नीला आकाश था। मुझे चक्कर-सा आने लगा।

जब जागा तो देखता हूँ, अपने घर में हूँ, मेरी झाड़-फूँक हो रही है। मेरे शरीर के घाव कसक रहे हैं। मैं आई को आवाज़ देता हूँ। आई मेरे पास आकर बैठ जाती है। मेरी नज़र भाभी की माला चढ़ी तस्वीर पर पड़ती है। मैं रोने लगता हूँ। आई मेरे सिर पर हाथ रखती है, और कहती है, ‘सब ठीक हो जाएगा!’ लेकिन मेरी आँखों से आँसू बहे जा रहे हैं, और मैं लगातार कहे जा रहा हूँ, ‘मैं अब रुपया कमाऊँगा!’। एक साधू मेरे पास आकर खड़ा हो जाता है। मैं अपनी बात दोहराए जा रहा हूँ। वह मेरे सिर पर भभूत मलता है। मुझे पसीना आने लगता है। मैं अपनी बात दोहराए जा रहा हूँ। बाबा मेरे पास आकर खड़ा होता है। थोड़ी देर मुझे देखता रहता है, फिर एक ज़ोरदार तमाचा जमाता है, और मैं चुप हो जाता हूँ, उसका मुँह देखने लगता हूँ।

वह एक ऐसा दिन था, जिसने मेरी ज़िन्दगी बदल दी। मैंने भैया के सामने भाभी के साथ हुई दुर्घटना पर दुःख जताया, और अपनी सफ़ाई में यही कहा कि मुझे पता ही नहीं! किसी आवाज़ के पीछे-पीछे मैं झरने तक चला गया था! और, फिर आगे क्या हुआ, मुझे पता नहीं! बात यही थी कि तालखेड़ी का ही कोई आदमी मुझे झरने के पास से उठाकर लाया था, बाद में, गंगानगरवाले दुकानदार से बात करके पता चला कि उसने ही मेरे मामा को सूचित किया था। वह मेरे मामा का पुराना दोस्त है। फिर, मैं एक दिन अस्पताल में भी बेहोश रहा। घर पर भी एक-दो दिन बदहवासी की हालत में रहा।

धीरे-धीरे मेरे घाव भर गए। कई बार सोचा कि भैया या आई को बता दूँ कि भाभी को पत्थर मैंने ही मारा था। पर इससे बात उलझ जाएगी। वे लोग समझ नहीं पाएँगे, और मैं भी समझा नहीं पाऊँगा। अब मैं बस-अड्डे या त्रिवेणी या गंगानगर या शहर-सराय की तरफ नहीं जाता। इधर-उधर भटकना भी मैंने बंद कर दिया है। मन में एक कचोट रहती है, पर कोई तरीका नहीं सूझता, क्या करूँ? जो मैंने किया है, उसका कोई दोष अपने ऊपर नहीं मानता। आखिर, मैंने जान-बूझकर कुछ नहीं किया। मुझे क्या पता था कि पत्थर सीधा जाकर उसको लगेगा! और, वह मेरी भाभी होगी, और, वह भी इतनी कमज़ोर कि एक पत्थर की चोंट भी नहीं झेल पाएगी! भैया दूसरी शादी के लिए गोटी सेट कर रहे हैं। उनकी एक मुहब्बत थी। पिछले ही साल उसके भी पति का देहावसान हो गया। वह भी गली में ही रहती है। आई ने उसकी मौसी से बात की है। हो सकता है, अगले साल मेरे पास फिर से भाभी हो! आई मेरी भी शादी कराना चाहती है। मैंने भी इनकार नहीं किया। जिन रिश्तेदारों को मैं गाली दिया करता था, उनके साथ भी अब तमीज़ से पेश आता हूँ। भगवान को उलटा-सीधा बकना भी मैंने बंद कर दिया है। सब्ज़ी-मंडी में हिसाब देखने का काम पकड़ा है। काम अच्छा है। सुबह-सबेरे सब्ज़ी-मंडी पहुँच जाता हूँ, दिन-भर वहीं फलों और सब्ज़ियों की गंध में कटता है। शाम को सीधे घर पहुँचता हूँ। टी.वी. देखता हूँ। कभी चौक तक घुम आता हूँ। फिर सो जाता हूँ।

भाभी मेरी शादी करवाना चाहती थी। अगर ज़िंदा रहती, तो कितनी खुश होती कि मैं काम-धंधे से लग गया हूँ, और लड़की देखने के लिए उत्सुक हूँ। पर कौन जाने, तब ऐसा होता भी!

आखिर वह दिन भी आया, मेरी शादी हो गई। मैंने जब करुणा का घूँघट उठाया, मेरा दिल धक् करके रह गया। एकबारगी लगा, भाभी है। मैंने खट् से घूँघट छोड़ दिया। दूसरी बार घूँघट उठाने की मेरी हिम्मत नहीं हुई। आखिर करुणा ने ही घूँघट उठा दिया। मैं उसका चेहरा देखकर फुला नहीं समाया। मेरा वहम था, और कुछ नहीं। मैंने करुणा के कंधों को चूमा।

मेरी शादी हो गई थी, पर मैं करुणा से एक दूरी बनाए रहता था। उसके साथ अकेले रहने में मुझे शंकाएँ घेरने लगती थी। वह मेरे अतीत के बारे में कुछ नहीं जानती! मैंने कहाँ-कहाँ खाक छानी है? कैसे-कैसे पापड़ बेले हैं? वह कुछ नहीं जानती! वह मुझसे कुछ जानना भी नहीं चाहती। वह अपने में खुश है। बस उसे एक बच्चा चाहिए, फिर वह और खुश हो जाएगी। मुझे लगता है, उसकी ज़िंदगी में बस खुश होना ही लिखा है। वह हमेशा प्रसन्नचित्त रहती है। मैं भी उसे देखकर खुश होता हूँ। वह चपल है। चंचल है। जीवन से भरी हुई है। फिर भी, कभी-कभी मुझे डरा देती है। रात को जब वह पानी पीने उठती है, मैं उस पर नज़र रखता हूँ। अगर वह गु़सलख़ाने में जाए और ज़्यादा देर लगाए, मुझे आतुरता होने लगती है कि वह क्या कर रही है?

मेरी शंका ठोस होने लगी जब एक दिन मैंने करुणा को कमरे में अकेले कुछ बुदबुदाते सुना। मैं ऐसी बुदबुद अक्सर सुनता रहता था, पर पहली बार मैंने साफ़-साफ़ सुना। यह करुणा की ही बुदबुदाहट थी। मैंने गुसलख़ाने के दरवाज़े पर कान टिका दिए। वह कुछ मंत्र-सा बुदबुदा रही थी। बीच-बीच में मेरा नाम ले रही थी। गुसलख़ाने से अगरबत्ती की गंध आ रही थी। उसकी बुदबुदाहट तेज़ हो रही थी। मेरे मुँह से आवाज़ नहीं निकल रही थी कि एक हल्की-सी आवाज़ निकली, ‘करुणा!’। अंदर से बुदबुद की आवाज़ बंद हो गई। मेरी साँस में साँस आई कि देखता हूँ करुणा बालकनी से झाडू़ निकालती हुई कमरे में खिसकती आ रही है। वह मेरी ओर देखकर हल्के-से मुस्कुराती है, और अपने काम में मगन हो जाती है। मैं गुसलख़ाने का दरवाज़ा खोलता हूँ, अंदर बाल्टी में बूँद-बूँद पानी चू रहा है। मेरा हलक़ सूख रहा था, मैं गु़सलख़ाने का नल कसके बंद कर रसोई की ओर चला गया। आई और भैया रसोई में बैठे भैया की शादी में लगने वाले सामान की लिस्ट तैयार कर रहे थे। मैंने पानी पीया और आई के घुटने पर सिर रख रोने लगा। आई बोली, ‘क्या हुआ?’। मैं कुछ कह न सका। रोना बंदकर चुपचाप आई की गोद में लेट गया।

मैं सोचता हूँ कि अब समय इस बोझ को बढ़ाता ही जाएगा। मैं कभी यह स्वीकार नहीं कर सकूँगा कि मैंने ही भाभी को मारा है, अनजाने में ही सही। उन दिनों की उदासी और खीझ याद करके अब भी मेरा मन भर आता है। पता नहीं, उन दिनों क्या धुन रहती थी। कहीं मन नहीं लगता था। और अब, मन बीच-बीच में बेवजह हड़बड़ाने लगता है। साँस फूलने लगती है।

भैया की शादी हो गई। मेरे और करुणा के पास एक लड़की है। पता नहीं क्यों, आई ने उसका नाम महिमा रख दिया है! महिमा भैया की पहली पत्नी का नाम था। मेरे जीवन में और एक शाश्वत दुःख इस नाम के साथ आ गया। मैं आई को समझा भी नहीं पाया कि क्यों यह नाम नहीं रखना चाहिए! उल्टा मैंने देखा, आई ने जब मुझसे पूछा कि इसका नाम महिमा रख दें, तो मैंने ऐसे सहर्ष स्वीकृति दी, जैसे मैं ख़ुद यही नाम रखने वाला था।

पर इन दो वर्षों ने मुझे पूरी तरह बदल दिया। मेरे बाल सफेद हो गए हैं। चेहरा झुलसा हुआ लगता है। शरीर के पुराने घाव फिर उभर आए हैं। क्या बीमारी है, कुछ पता नहीं चलता! शरीर से मवाद निकलता रहता है। दर्द होता है। हगन-मूतने से भी मोहताज हो गया हूँ। करुणा दिन-रात मेरी देख-भाल में लगी रहती है। महिमा से ज़्यादा बच्चा मैं हो गया हूँ। देखता हूँ, सबको मेरी फिक्र लगी रहती है। भैया जैसा रुपयों का दास, मेरे ईलाज पर अपना सबकुछ लुटा चुका है। पर, मेरा शरीर छीजता जा रहा है। घावों के आस-पास लगता है माँस खींचा रहा है, जैसे घाव का छेद और बढ़ने वाला है। तेज़ दर्द होता है। मैं चीखता रहता हूँ। महिमा का कमरा अलग कर दिया गया है। उसे आई के कमरे में सुला दिया जाता है। नई भाभी मुझसे घृणा-सी करती है। उसका चेहरा देखकर मुझे अपने जीवन से और निराशा हो जाती है। लगता है, मैं मर ही जाऊँगा!

अब सोचने की क्षमता भी जवाब दे रही है। मैं कुछ बुदबुदाता रहता हूँ। कोई समझ नहीं पाता। करुणा भी रुखी और उदास होती जा रही है। बात-बात पर भाभी से झगड़ पड़ती है। कभी मुझे एक-दो दिन आराम भी रहता है। पर, यह आराम शारीरिक होता है। घाव जैसे टीसना कम कर देते हैं। वह भी आखिर थक जाते हैं। लेकिन, दिमाग़ में ख़यालों का अंबार लग जाता है। करुणा का क्या होगा? महिमा का क्या होगा?

कभी एक लाल चुनरी हवा में लहराती दिखती है।

धीरे-धीरे मैं ख़तम हो रहा हूँ।

एक दिन करुणा महिमा का झूला मेरे पलंग के पास डालकर खाना बनाने रसोई चली गई। महिमा थोड़ी देर हँसती रही, फिर चुप हो गई। मैंने पलंग पर लेटे-लेटे ही महिमा को संबोधित कर अपनी बात शुरू की…मैं नहीं जानता, उस दिन मुझे क्या हुआ था। पर न जाने क्यों, मैं अब भी, खुद को गुनाहगार नहीं मान पाता हूँ! आख़िर, वह एक पल का बहाव था। होनी कौन जानता था?…आदमी किन-किन चीज़ों के वश में नहीं होता! वह सोचता कुछ है, कहता कुछ है, करता कुछ है, और, होता कुछ और है! किसका मनचाहा हुआ है दुनिया में!…हाँ, ठीक है, मैं सच्चे मन से मानता हूँ कि मैंने ही भाभी को मारा है। बस!…मुझे लगा मेरे मन से एक बोझ हट गया।

धीरे-धीरे रात घिर आई। दो साल में मेरा हाल यह हो गया था कि अगर कोई मुझे पहली बार देखता, तो बाबा का भाई ही मानता। मेरे सारे बाल पक गए थे। दवाईयाँ खा-खाकर मुँह का स्वाद बिगड़ गया था। हमेशा थूकते रहने की इच्छा होती थी। धीरे-धीरे चारों ओर सन्नाटा पसर गया था। पूरा शहर इस वक़्त सो रहा है। नहीं, पूरा शहर कभी नहीं सोता! लेकिन, जितना सो रहा है, उतनों के सपने हैं, हाँ, ठीक है, सब लोग सपने भी नहीं देख रहे हैं, लेकिन आज रात जो लोग सपने देख रहे हैं, वे सब सुन लें, ‘मैंने ही अपनी भाभी की जान ली है!’।

हमेशा मैं ऐसा नहीं करता, पर आज मैंने दवाई नहीं ली। मैं चुपचाप लेटा था। कभी नींद का बगुला पलकों पर बैठ जाता था और कभी पंख फड़फड़ाकर उड़ जाता था। मेरी नींदे हराम थीं। इसीलिए मुझे दवाई खाकर सोना पड़ता था, पर कभी-कभी, मैं उसे टाल भी देता था। यानी, खिड़की से बाहर फेंक देता था। यह काम सफाई से करना होता था, वर्ना आई, करुणा सब लोग मुझे पचास बातें समझाने लगते, जिनसे मन और कमज़ोर हो जाता है। चाँदनी का एक टुकड़ा खिड़की से कमरे के अंदर गिरा हुआ था। मैं उसी को देख रहा था। करुणा वहीं लेटी थी। करुणा की देह अब भी आकर्षक है। आखिर वह 23 साल की है। कसी हुई। एक बच्चे की माँ होकर भी वह अभी ढिलमढल्ला नहीं हुई है। उसका हँसना कम हो गया है, लेकिन वह आनंद की मूर्ति है। उसे देखकर मन प्रफुल्ल हो जाता है। अचानक चाँदनी के टुकड़े पर एक साया दिखाई दिया। उसने करुणा को हल्के से हिलाया। करुणा जागी, हड़बड़ाई, और पलंग की ओर देखने लगी। मैंने एक पल के लिए आँखें बंद कर लीं, और फिर पलकों की कोर से देखने लगा। करुणा उठकर मेरे पास आई। दो पल मुझे देखा, और फिर मुझे हल्के से हिलाया। मैं ऐसे पड़ा रहा, जैसे बेहोश हूँ। वह आदमी वहीं चाँदनी के टुकड़े पर लेटा हुआ था। करुणा भी उसके पास जाकर लेट गई। मैं उनकी काम-लीला देखता रहा। पता नहीं, मेरे मन को क्या सुख मिल रहा था! मेरी आत्मा तृप्त हो रही थी। मुझे लग रहा था, जैसे मेरे मन पर बरसों से रखा कोई बोझ हट रहा है। थोड़ी देर में देखा चाँदनी के टुकड़े पर अकेली करुणा रह गई थी। लेकिन अब, उसकी देह देखकर मुझे घिन आ रही थी। सारा आकर्षण मुलम्मे की तरह उतर रहा था। मेरे मन में ईर्ष्या पैदा हुई। बदले की भावना। अब मैं करुणा से बदला लेना चाहता था। आखिर उसने मुझे धोखा दिया है। भाभी भी तो धोखा दे रही थी, अनजाने ही उसे सज़ा मिल गई।

मैं अपने घावों के ठीक होने की दुआ करने लगा। मैं चुप था। करुणा मेरी रोज़ की तरह सेवा कर रही थी। जैसे कुछ हुआ ही नहीं। पर अब, उसके हर स्पर्श में मुझे अजीब झनझनाहट महसूस होती थी, जैसे उसका बदन कोई ग़लीज़ चीज़ हो। कभी-कभी मैं उसके हाथ से अपने को बचाने की कोशिश करता था। मुझे लगता है, करुणा को कुछ भान हुआ था। मैं भी सचेत रहने लगा।

धीरे-धीरे मैं ठीक होने लगा। बाल तो सफेद ही रहे, लेकिन घाव भर गए। करुणा का हँसता चेहरा धीरे-धीरे उदास होने लगा। अब उसके खाट पकड़ने की बारी थी। आई ने कहा, ‘तेरी सेवा ने ही उसे थका दिया है। अब तू उसकी तीमारदारी कर!’ मैंने भी उसकी सेवा का बीड़ा उठा लिया। उसे बुखार आ गया था। काम का बोझ तो उस पर बढ़ा ही था। महिमा को जन्म दिया, और फिर मेरी उपचार-व्यवस्था करती रही। फिर घर के काम-काज अलग! और फिर वह आदमी। मेरे मन ने ईर्ष्यामयी क्रूर अट्ठहास किया। वह भी तो मेहनत का काम है!

मुझे महिमा के अपनी बच्ची होने पर शक होना लाज़मी था। मैं दिन-भर उसके चेहरे से अपना और करुणा का चेहरा मिलाता रहता था। मुझे विश्वास हो गया कि वह मेरी लड़की नहीं है। महीनों बाद मैं बाज़ार गया। जब लौटकर आया तो रात गहरा चुकी थी। घर पर सब लोग सो गए थे। दरवाज़ा अटका हुआ था। मैं दरवाज़ा बंद करके अपने कमरे की ओर चल दिया। कमरे में चाँदनी का टुकड़ा वैसे ही पड़ा था। करुणा सो रही थी और महिमा भी। मैंने पास जाकर दोनों को ग़ौर से देखा। मेरे दिमाग़ में उस रात का दृश्य चलने लगा। धीरे-धीरे दिमाग़ पर एक धुन सवार हुई। मैं गुसलख़ाने में गया और वहाँ से कपड़े पीटने की मोगरी ले आया, और माँ-बेटी दोनों को दुनिया से पार कर दिया। मेरे मन में न हैरानी थी, न डर। मैं चाँदनी का टुकड़ा देख रहा था और दो साए।

इस बार भी मुझे सज़ा नहीं हुई। एक आदमी पकड़ा गया, जिसका नाम मनीष था। मैंने सोचा, मुझे अपना जुर्म क़बूल कर लेना चाहिए। पर मेरा मन फिर एक क्रूर अट्ठहास कर उठा। यह आदमी करुणा का प्रेमी था। मैं अपना काम करके कमरे से निकला, और कुछ देर में वो कमरे में घूसा। कमरे की हालत देखकर उसकी चीख़ निकल गई। सारे लोग दौड़े आए। देखा, तो वह आदमी था, और करुणा और महिमा की लाश थी। उसे पकड़कर पुलिस के हवाले कर दिया गया। उसने भी अपना जुर्म क़बूल कर लिया। तब मैंने सोचा, मैं क्यों दूसरे के फटे में पाँव डालूँ! आख़िर, यह सब उसीका किया-धरा था। अगर वह उस रात न आता, तो मैं एक-दो दिन में मर ही जाता। पर, उसी की मेहरबानी कि मैं ज़िंदा हूँ, और दो बच्चों का बाप हूँ। अब मुझे ईश्वर पर दृढ़ विश्वास है। ईश्वर-विरोधी मुझे फूटी आँख नहीं सुहाते। सोचता हूँ, अगर ईश्वर नहीं है, तो इतनी बड़ी दुनिया का नियंता कौन है? कोई शक्ति, कोई बल तो है, जो मुझसे परे है, जो मेरे माध्यम से अपना काम करता है। मेरी आत्मा भी तो उस परम-आत्मा का ही अंश है। मेरे मुँह से जो शब्द निकलते हैं, वह भी तो उस परमपिता के हैं। मेरे हाथों जो कुछ होता है, वही करवाता है। मैं तो निमित्त मात्र हूँ। कर्ता कोई और है! उसकी लीला अपरम्पार है। वह जैसा सोचता है, वैसा ही होता है। उसकी मर्ज़ी के बिना एक पत्ता भी हिलता हो, तो कोई मुझे बता दे! वह सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ है। मैं उसका दास हूँ। जो वह चाहता है, मुझसे करवाता है। मैं निर्बल हूँ। प्रार्थना के अलावा मैं कर ही क्या सकता हूँ!

हे परमपिता, परमेश्वर, परमात्मा! विकल-पीड़ित आत्माओं को शांति दे, शांति दे, शांति दे!!

usman khanउस्मान ख़ान समकालीन हिंदी साहित्य के अलहदा युवा कवि-कथाकार हैं. चर्चाओं और पुरस्कारों की भीड़ से अलहदा… छपाऊ मानसिकता से भी अलहदा... जे.एन.यू. के हिंदी विभाग से मालवा के लोकसाहित्य पर पीएचडी. इनसे usmanjnu@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

साभार- हंस, मई , 2016

द ग्रेट अमेरिकन सर्कस: संजय सहाय

जैसे-जैसे अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव की चर्चा वैश्विक हो रही है, वैसे-वैसे इसकी प्रक्रिया (चुनाव) के  लोकतांत्रिक होने- न होने को लेकर शक जाहिर किया जाने लगा है.  इस चुनावी प्रक्रिया और इसके नियमों-कानूनों की ओर से लगभग अनभिज्ञ होकर हम टीवी में चुनावी डिबेट देखते हुए खुश-नाखुश होते रहते हैं. संजय सहाय का यह लेख अमेरिकी राष्ट्रपति  की चुनावी-प्रक्रिया के अधिकांश पहलुओं को उनके ऐतिहासिक संदर्भों के साथ रखने का प्रयास किया.

By संजय सहाय

अमेरिकी व्यवस्था से प्रभावित व्यक्तियों और दलों द्वारा अपने देश में भी संसदीय प्रणाली को छोड़ राष्ट्रपति (प्रेसीडेंशियल) प्रणाली को लागू करने की अनुशंसा की जारी रही है. अमेरिकन प्रेसीडेंशियल प्रणाली को समझे बिना ही लोग इसे लेकर अति उत्साहित रहते हैं. उनकी समझ से इसमें जनता राष्ट्रपति को सीधे चुनती है. अतः वह राष्ट्रपति की बढ़ी शक्ति को अधिक वैधता प्रदान करती है फिर इस व्यवस्था में राष्ट्रपति और विधायिका दो समानांतर संस्थाएं हो जाती हैं जिससे कि सत्ता के दुरुपयोग पर अंकुश रहता है. साथ ही सरकार में निर्णय जल्दी हो पाते हैं और महाभियोग जैसी अनोखी परिस्थितियों को छोड़ सत्ता में एक निश्चित काल के लिए खासा स्थायित्व रहता है. जबकि प्रधानमंत्री एक विधेयक के न पास हो पाने से ही अल्पमत में आकर कभी भी सत्ता खो सकता है. उधर प्रेसीडेंशियल प्रणाली के विरोधियों का मानना है कि राष्ट्रपतिवाद चुनाव की बाज़ी और दाम दोनों को ऊपर उठा देता है,  ध्रुवीकरण को बढ़ावा देता है साथ ही उसका विद्रूपीकरण भी करता है और अंततः अधिनायकवाद की ओर ले जा सकता है. फिर दो समानांतर सत्ता केंद्रों (राष्ट्रपति और विधायिका की वजह से बार-बार गतिरोध की स्थिति बन सकती है तथा दोनों समानांतर धाराएं असफलताओं के लिए एक-दूसरे पर दोष डालते हुए अपनी जवाबदेही से बचती रह सकती है. आदि-आदि. हालांकि जहां तक अधिनायक की बात है तो चाटुकारिता भरे अपरिपक्व लोकतंत्रों में प्रधानमंत्री भी बड़ी आसानी से अधिनायकवाद बन जाते हैं ऐसा हम पूर्व और वर्तमान दोनों समय में देख सकते हैं.

यह बात सही है कि प्रेसीडेंशियल प्रणाली के अधिकतर मामलों में जनता सीधे राष्ट्रपति का चुनाव करती है किंतु यह बात संयुक्त राज्य अमेरिका पर कतई लागू नहीं होती. अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव की प्रक्रिया अत्यधिक जटिल, लंबी और विश्व में सबसे खर्चीली है. यह प्रक्रिया संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान में निहित है और 12वें, 22वें और 23वें संशोधन द्वारा सुधारी गई है. साथ ही भिन्न राज्यों के कानूनों की वजह से और स्थानीय रिवाजों के कारण समय के साथ इसमें खासा बदलाव आया है. हर चाल साल बाद होने वाले राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद के इन चुनावों में उम्मीदवारी के लिए कम से कम 35 वर्ष की आयु और जन्मजात अमेरिकी नागरिक होना आवश्यक है जो कि पिछले चौदह वर्षों से लगातार संयुक्त राज्य में रह रहा हो. कोई भी राष्ट्रपति अधिकतम दो बार ही राष्ट्रपति रह सकता है. फ्रैंकलिन डिलानो रूजवेल्ट अपवाद रहे जिन्होंने चार प्रेसीडेंशियल चुनाव जीतने का रिकॉर्ड कायम किया था. अमेरिका में किसी भी राष्ट्रपति के लिए अधिकतम दो मियाद की परंपरा एक अलिखित कानून की तरह तब से लागू थी जब जॉर्ज वाशिंगटन ने 1796 में तीसरी बार राष्ट्रपति बनने से इनकार कर दिया था. हालांकि यूलिसिस ग्रांट ने तीसरी बार के लिए प्रयास किए थे किंतु वे सफल नहीं हो पाए थे और निंदा के पात्र भी बने थे. जबकि प्रेसीडेंट मैकिनले की सितंबर, 1901 में हुई हत्या के बाद उपराष्ट्रपति से राष्ट्रपति बने थियोडोर रूजवेल्ट कुल ढाई मियाद तक राष्ट्रपति रहे. फ्रैंकलिन डी.रूजवेल्ट के 1945 में गुज़र जाने के उपरांत संविधान के 22वें संशोधन से किसी एक राष्ट्रपति के लिए अधिकतम दो मियाद का लिखित कानून बन गया. हालांकि यदि 75 प्रतिशत कांग्रेस का समर्थन मिल जाए तो दो मियाद से अधिक भी मिल सकते हैं.

मूलतः दो दलीय राजनीति (डेमोक्रैट्स और रिपब्लिकन) की इस व्यवस्था में राष्ट्रपति चुनाव के लगभग साल-भर पहले से ही जटिल, उबाऊ और खर्चीली प्रक्रिया की शुरुआत होती है. सबसे पहले दोनों प्रमुख दल अपने-अपने राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों में से किसी एक उम्मीदवार का चयन करने के लिए भिन्न राज्यों में जनमत लेते हैं. जनमत के लिए वे किसी भी राज्य में दो में से कोई एक प्रक्रिया चुन सकते हैं. पहला तरीका छोटी-छोटी जनसभाओं जिसे काकस कहते हैं, में आंतरिक मतदान के जरिए वे अपने उम्मीदवारों की लोकप्रियता माप सकते हैं. दूसरा ज्यादा पसंदीदा तरीका प्राइमरीज का है. प्राइमरीज राज्यों के खर्चे और व्यवस्था पर होने वाला गुप्त मतदान है. प्राइमरीज भी दो प्रकार की होती हैं- एक ‘बंद’ जिसमें दल विशेष के रजिस्टर्ड मतदाता ही भाग ले सकते हैं, दूसरी ‘खुली’ हुई जिसमें कोई भी मतदाता आकर मत डाल सकता है. काकस द्वारा हो या प्राइमरीज द्वारा- भिन्न उम्मीदवारों को प्राप्त मतों के अनुपात में ही हर राजनीतिक दल उनके लिए डेलीगेट्स (प्रतिनिधि) मुकर्रर कर सकता है जो जुलाई में होने वाली राष्ट्रीय दलीय महासभा में अपनी पार्टी के अनेक प्रत्याशियों में से किसी एक की राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी तय करते हैं.

1970 से पहले संयुक्त राज्य के ज्यादातर डेलीगेट्स का आवंटन काकस प्रक्रिया में हुए मतदान के आधार पर ही किया जाता था किंतु 1972 के सुधारों के उपरांत अधिकतर राज्यों ने प्राइमरीज व्यवस्था को अपना लिया है. सिर्फ आयोवा, लुजियाना, मिनेसोटा और गेन सहित चैदह राज्यों और चार सं. रा. टेरिटरिज ने ही 2016 के लिए कॉकसेज के माध्यम से डेलीगेट चुने हैं. दोनों प्रमुख दलों की राज्यों की इकाइयों द्वारा इन तमाम प्रक्रियाओं से गुज़रने के बाद, पार्टी विशेष की केंद्रीय समिति यह निर्णय लेती है किस राज्य से कितने डेलीगेट्स के लिए जाएंगे और किस-किस उम्मीदवार के लिए नत्थी कर दिए जाएंगे. ये डेलीगेट्स अपनी-अपनी पार्टियों के सक्रिय कार्यकर्ता होते हैं. कुछ राज्यों में मतों के अनुपातिक न होकर जीतने वाले उम्मीदवार को ‘विनर टेक ऑल’ की तर्ज पर सारे के सारे डेलिगेट्स मिल जाने की व्यवस्था है और फिर इनके ऊपर सुपर डेलीगेट्स सुपर डेलीगेट्स विशेष तौर पर डेमोक्रेटिक पार्टी में अपनी मनमर्जी के डेलीगेट होते हैं. इन्हें किसी के साथ नत्थी नहीं किया जाता और ये अपनी पार्टी के किसी भी उम्मीदवार के पक्ष में अपना वोट दे सकते हैं. ये मूलतः अपनी पार्टी के कद्दावर नेताओं में से चुने जाते हैं और उम्मीदवार के चयन को उलट-पुलट कर सकते हैं. इसी तरह से रिपब्लिकन पार्टी में सुपर डेलीगेट्स तो नहीं होते किंतु तीन डेलीगेट प्रति राज्य के हिसाब से इनकी जगह तय रहती है.

इस जगह पर पहुंचकर हम पाते हैं कि सुपर डेलीगेट्स या ‘विनर टेक ऑल’ जैसे राज्यों के डेलीगेट भ्रष्टाचार की बड़ी संभावनाएं जगाते हैं. बड़े पैमाने पर पैसे और प्रभाव का खेल आरंभ हो जाता है. प्रत्याशियों के साथ सहभोज में 20-30 लाख रुपये प्रति प्लेट के डिनर बिकने लगते हैं. युद्धास्त्रानिर्माताओं, अन्य उद्योगपतियों और धंधेबाजों के लिए खजाने खुल जाते हैं. ताकि चार सालों में वे अपने चुनावी निवेश पर कई गुना मुनाफा कमा लें. इस बात की संभावना भी बनी रहती है कि राज्यव्यापी चुनावों में ज्यादा मत पाने वाला प्रत्याशी भी राष्ट्रपति पद की दौड़ से बाहर कर दिया जाए और खास लोगों का चहेता उस पार्टी का राष्ट्रपति पद को घोड़ा घोषित कर दिया जाए. हिलेरी क्लिंटन जिनके पक्ष में डेलीगेट ज्यादा हैं और बर्नी सैंडर्स जिनको ज्यादा जन समर्थन है-के मामले में कुछ ऐसा ही होता दिख रहा है.

बहरहाल चुनावी वर्ष की गर्मियों में (जुलाई) दोनों प्रमुख राजनैतिक दलों की राष्ट्रीय महासभा में डेलीगेट्स द्वारा अपने-अपने राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी चुन लिए जाने के उपरांत नए सिरे से इस राष्ट्रव्यापी दंगल की शुरुआत होती है. जिसमें टीवी डिबेट्स, चुनावी रणनीतियां, बड़े-बड़े दावे-वादे, राजनीतिक प्रीतिभोज और प्रलोभन- सबकी भूमिका रहती है. किंतु हमारी जनधारणा के विपरीत तब भी इन अमेरिकी चुनावों में जनता अपने राष्ट्रपति को सीधे नहीं चुनती.

अमेरिकी संविधान में राजनीतिक दलों की भूमिका का प्रावधान नहीं है क्योंकि अमेरिका के संस्थापक पिता (फाउंडिंग फादर) जिनमें जेम्स मैडिसन, एलेक्जेंडर हैमिल्टन, जॉन जे, जॉन ऐडम, थॉमस जेफरसन, बेंजामिन फ्रैंकलिन और जॉर्ज वाशिंगटन प्रमुख थे, अमेरिकन राजनीति को पक्षधरता से दूर रखना चाहते थे. संघीय पत्र संख्या 9 और 10 में एलेक्जेंडर हैमिल्टन और जेम्स मैडिसन ने घरेलू घटकवाद से मुल्क को सावधान किया है. अपने शुरुआती दौर में राष्ट्रपति के चुनाव की प्रक्रिया को लेकर बहुत वाद-विवाद हुए. जेम्स विल्सन और जेम्स मैडिसन जैसे नेता राष्ट्रपति का चुनाव सीधे जनमत से चाहते थे लेकिन अमेरिका के दक्षिणी राज्यों में जहां पर गुलाम अधिक थे और मुक्त मतदाताओं की संख्या उत्तरी राज्यों के मुकाबले बहुत कम थी, उससे समस्या पैदा हो रही थी जेम्स मैडिसन इस बात को महसूस करते हुए लिखते हैं- हालांकि राष्ट्रपति चुनाव के लिए एक लोकप्रिय मतदान आदर्श होता लेकिन इस पर सहमति बन पाना असंभव दिख रहा है क्योंकि दक्षिणी राज्यों को ऐसे राष्ट्रपति चुनावों में अपनी भूमिका प्रभावकारी नहीं दिखती.“ अतः 6 सितंबर, 1787 में संवैधानिक महासभा ने इलेक्टोरल कॉलेज का प्रस्ताव पास कर दिया. इसके पहले 1787 की संविधान सभा में नवनिर्मित सं. रा. की राजव्यवस्था को लेकर बहुत तरह के प्रस्ताव आए जिसमें जेम्स मैडिसन द्वारा लिखित और एडमंड रैन्डॉल्फ द्वारा प्रस्तुत वर्जीनिया प्लान लाया गया जिसमें अन्य व्यवस्थागत बातों के अलावा राज्यों की मुक्त आबादी के अनुपात में प्रतिनिधियों की संख्या रखने का प्रस्ताव था. किंतु इस प्लान पर छोटे राज्यों को घोर आपत्ति थी. इसके बाद न्यूजर्सी प्लान पर चर्चा हुई जिसे उसके प्रस्तुतकर्ता के नाम से पैटर्सन प्लान भी कहा जाता है. इसमें प्रत्येक राज्य से एक प्रतिनिधि का प्रावधान था जो संयुक्त राज्य के पूर्व संविधान ‘आर्टिकल्स ऑफ़ कंफेडरेशन’ की तर्ज पर था और जिसे संयुक्त राज्य के मूल 13 राज्यों ने मान्यता दी थी लेकिन इस पर भी जमकर विरोध हुआ खासकर वर्जीनिया प्लान के प्रस्तुतकर्ताओं द्वारा जिसमें जेम्स मैडिसन और रैन्डॉल्फ प्रमुख थे. इसके बाद कनेक्टिकट सुलह के नाम से सहमति बनी जिसमें दो सदनों का प्रस्ताव था. राज्यों को बराबर प्रतिनिधित्व देने वाला ‘सीनेट’ (सीनेटर का कार्यकाल 6 वर्ष होता है और 1/3 सदन का चुनाव हर दूसरे वर्ष होता है.) और जनसंख्या को अनुपातिक प्रतिनिधित्व देने वाला ‘हाउस ऑफ़ रिप्रजेंटेटिव (चुनाव हर दो वर्ष बाद). इसमें बचे हुए पेंच ‘3/5 की सुलह’ के नाम से सुलझा लिए गए. गुलाम प्रथा के समर्थक खेतिहर दक्षिणी राज्य गुलामों की संख्या को जोड़कर हाउस ऑफ़ रिप्रेजेंटेटिव में अपने अनुपातिक प्रतिनिधित्व पर अड़े हुए थे जबकि गुलाम प्रथा के विरोधियों का मानना था कि चूँकि गुलामों को मतदान का अधिकार नहीं है अतः काले गुलामों की संख्या के बहाने गुलाम समर्थक गोर लोग ही कांग्रेस में अपनी संख्या बढ़ा लेंगे. विडम्बना यह रही कि एक काले गुलाम को 3/5 सामान्य नागरिक मानाने का प्रस्ताव गुलाम प्रथा के विरोधियों की तरफ से ही आया और स्वीकृत हो गया. संविधान से यह प्रावधान अमेरिकी गृहयुद्ध के उपरांत 1865 के तेरहवें संशोधन से गुलाम प्रथा की समाप्ति के उपरान्त निकल दिया गया.

इलेक्टोरल कॉलेज में इलेक्ट्रेट की संख्या पर तय हुआ कि दोनों सदनों की संख्या के बराबर ही राष्ट्रपति को चुनने वाले इलेक्ट्रेट की संख्या होगी. आज के दिन दो सीनेटर प्रति राज्य के हिसाब से सौ सीनेटर, हाउस ऑफ़ रिपे्रजेंटेटिव के 435 सदस्यों- कुल संख्या 535 और डिस्ट्रीक्ट ऑफ़ कोलंबिया (वाशिंगटन डीसी) से आते तीन इलेक्ट्रोरेट को लेकर इलेक्टोरल कॉलेज की संख्या कुल 538 होती है. इसमें से कोई भी इलेक्ट्रेट कांग्रेस का सदस्य नहीं हो सकता और न ही वह किसी भी लाभ के पद पर बना व्यक्ति हो सकता है. राष्ट्रपति चुन लिए जाने के उपरांत इलेक्टोरेट की कोई भूमिका नहीं होती.

अमेरिकन आम चुनाव में मतदाता दरअसल इलेक्टोरेट को चुनते हैं जो अपनी पार्टी के राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति द्वय के उम्मीदवारों के साथ नत्थी (Pledged) किए हुए रहते हैं और सुनने में यह बेशक अटपटा लगेगा किंतु मुख्य उम्मीदवारों के साथ-साथ बैलेट पर इनका नाम लिखा हो भी सकता है या नहीं भी हो सकता है. ये इलेक्टर्स अपने राजनीतिक दल के समर्पित कार्यकर्ता होते हैं और अपने दल की राज्य इकाई अथवा केंद्रीय समिति द्वारा नामित/चयनित किए जाते हैं.

नवंबर में हुए राष्ट्रव्यापी मतदान के नतीजे आ जाने के बाद इलेक्टोरल कॉलेज गठित हो जाता है और उसके इलेक्टर्स जिस भी पार्टी के उम्मीदवार द्वय को 270 या उससे अधिक मत दे देते हैं वह राष्ट्रपति निर्वाचित हो जाता है.

नेब्रेस्का और मेन को छोड़ बाकी राज्यों में राष्ट्रपति चुनाव की दौड़ में आगे निकले प्रत्याशी द्वय को ‘विनर टेक ऑल’ की तर्ज पर सारे इलक्टर्स मिल जाते हैं. सन् 2000 के राष्ट्रपति चुनाव में राष्ट्र-भर में अधिक जनमत प्राप्त करने के बावजूद अल गोर के जॉर्ज बुश जूनियर से हार जाने में अन्य कारणों के साथ यह भी एक बड़ा कारण था. कोई आश्चर्य नहीं कि इलेक्टोरल कॉलेज प्रणाली की आवश्यकता और विश्वसनीयता को लेकर अमेरिका में भी गंभीर सवाल उठते रहे हैं. परत-दर-परत जटिलता से भरी यह प्रणाली संसदीय प्रणाली के मुकाबले कोई खास उत्साह नहीं जगा पाती.

बहरहाल राष्ट्रपति प्रणाली हो या संसदीय प्रणाली- नीयत साफ हो तो सब ठीक रहता है किंतु अमूमन ऐसा हो नहीं पाता. आज के दिन लोकतंत्रों के लिए सबसे बड़ा खतरा धन का बढ़ता हुआ प्रभाव है. संयुक्त राज्य में राजनैतिक चंदे जुगाड़ने और उन्हें चुनावों में खर्च करने का जिम्मा पॉलिटिकल एक्शन कमिटियों (पीएसी) के पास रहता है. कोई भी संस्था जो चुनावों में 2600 डॉलर से अधिक प्राप्त या खर्च करती हो उसे यह हैसियत मिल जाती है. सन् 2002 के मकेन-फीनगोल्ड रिफार्म एक्ट के जरिए अमेरिकी चुनावों को धनिकों का चुनाव बनने से रोकने की चेष्टा की गई थी किंतु सिटिजंस यूनाइटेड बनाम फेडरल इलेक्शन कमीशन के चल रहे मुकदमे पर अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने अपने 2010 के फैसले से 2002 के मकेन-फीनगोल्ड रिफार्म एक्ट की उन धाराओं को उलट दिया है जो कॉरपोरेट जगत् और यूनियन द्वारा चुनावों में खर्च करने पर निषेध लगाता था. इसने पी.ए.सी. के समानांतर सुपर पी.ए.सी. संस्थाओं को जन्म दे दिया है. सिटिजंस यूनाइटेड के पक्ष में आए इस फैसले से कॉरपोरेट घरानों और संघों को छूट मिल गई है कि वह अपने खजाने से, स्वतंत्रा रूप से किसी भी पार्टी या प्रत्याशी के पक्ष में कितनी भी दौलत सुपर पी.ए.सी. के जरिए खर्च कर सकते हैं.

2016 के राष्ट्रपति चुनाव में अब तक दलों और प्रत्याशियों द्वारा पांच हजार करोड़ रुपये के बराबर की राशि जुगाड़ी जा सकी है जबकि सूपर पी.ए.सी. की तरफ से इस चुनाव में अब तक सात हजार करोड़ रुपये डाले जा चुके हैं जिसका बड़ा हिस्सा रिपब्लिकन प्रत्याशियों के पक्ष में गया है और यह तब जब अभी दोनों दलों के मुख्य उम्मीदवारों का तय होना बाकी है. ध्यान रहे कि यह खर्च सिर्फ राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति कुल दो पदों के चुनाव पर हो रहा है.

ये सारी स्थितियां अमेरिका सहित विश्वभर के लोकतंत्रों को किस दिशा में ले जा रही हैं इसमें संदेह की गुंजाइश नहीं बचतीलोकतंत्रों को कुबेरतंत्र में बदलने का षड्यंत्र चल रहा है. भारत में भी पिछला लोकसभा चुनाव हम भूले नहीं हैं. देश की सबसे धनी ‘पारटी’ ने खरबों रुपये खर्च कर अब तक का सबसे महंगा चुनाव लड़ा. 5-6 सौ करोड़ रुपये के स्रोत का हिसाब तो वे आज तक नहीं दे पाए हैं. सावधान रहें- विश्वभर के राज्याध्यक्षों के सिंहासन नितंबों सहित नीलामी पर हैं.

sanjay jee

संजय सहाय

 चर्चित कथाकार, फिल्मकार और हंस के संपादक. चित्रकला और फिल्मों में अद्भुत रूचि. आप उनसे  sanjaysahay1@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

साभार- हंस, मई, 2016.

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