चाँदनी रात में व्हाइट हाउस: वाल्ट ह्विटमैन

चाँदनी रात में व्हाइट हाउस

By वाल्ट ह्विटमैन

कितना सुहावना मौसम है। कभी-कभी रात में, चाँदनी में काफी देर तक विचरण करता रहता हूँ। आज की रात मैंने राष्ट्रपति निवास पर एक दीर्घ दृष्टि डाली। वह प्रासाद तुल्य धवल धौत भवन, ऊंचे गोलाकार स्तम्भ, नितांत निरभ्र, सुच्चिकण प्राचीरें और स्निग्ध ज्योत्सना निष्प्रभ संगमरमर पर प्रवाहित होती हुई और विचित्र धुंधले बिम्ब (परछाइयाँ नहीं) उत्पन्न करती हुई सी। सर्वत्र एक स्निग्ध पारदर्शी नीलाभ चंद्रिका, शुभ्र और प्रचुर गैस की रोशनियां विभिन्न कक्षों, प्राचीरों और मेहराबों पर वायु के साथ हिलोरें खाती हुई। हर एक वस्तु ऐसी शुभ्र-श्वेत, संगमरमर सी शुद्ध और आँखों में चकाचौंध करने वाली, फिर भी अति तरल और सस्मित। भावी कविताओं के स्वप्नों और नाटकों का व्हाइट हाउस उस स्निग्ध और अनुपम चंद्रिका में बहती हुई चाँदनी की धारा में तरुओं के मध्य! उसका जगमगाता हुआ अग्र भाग वास्तविक और छलना से घिरा हुआ। वृक्षों की आकृतियाँ और उनकी शाखाओं के मोड़ और गोलाइयां! तारों और आसमान की छाया में धरती का व्हाइट हाउस! सौन्दर्य का व्हाइट हाउस! रात को जिसके द्वारों पर शांत भाव से चलते हुए, नीले ओवरकोट पहने हुए द्वारपाल जो तुम्हें रोकते नहीं बल्कि जिस ओर भी तुम जाते हो, तीक्ष्ण दृष्टि से तुम्हारी ओर देखते हैं।

अनुवाद: मनोहर प्रभाकर

लिंकन के जमाने की तस्वीर

मूल अंग्रेजी में:

The White House by Moonlight

By Walt Whitman

A SPELL of fine soft weather. I wander about a good deal, sometimes at night under the moon. To-night took a long look at the President’s house. The white portico—the palace-like, tall, round columns, spotless as snow—the walls also—the tender and soft moonlight, flooding the pale marble, and making peculiar faint languishing shades, not shadows—everywhere a soft transparent hazy, thin, blue moon-lace, hanging in the air—the brilliant and extra-plentiful clusters of gas, on and around the facade, columns, portico, &c.—everything so white, so marbly pure and dazzling, yet soft—the White House of future poems, and of dreams and dramas, there in the soft and copious moon—the gorgeous front, in the trees, under the lustrous flooding moon, full of reality, full of illusion—the forms of the trees, leafless, silent, in trunk and myriad-angles of branches, under the stars and sky—the White House of the land, and of beauty and night—sentries at the gates, and by the portico, silent, pacing there in blue overcoats—stopping you not at all, but eyeing you with sharp eyes, whichever way you move.

Source: Specimen Days

Corona is a Crown of Bones, Blurred by Blinding Tears: A 19th Century’s Text

विश्वव्यापी महामारी कोविड-19 के संदर्भ में आज के सबसे अधिक उच्चरित, लिखित शब्दों में से एक शब्द है, कोरोना। बीमारी संबंधी ‘कोरोना’ शब्द की पड़ताल करने पर इतिहास में सामान्यतः यह 1920 से मिलना शुरू होता है।

लेकिन 1898 के इस टेक्स्ट में आश्चर्यजनक रूप से ‘कोरोना’ शब्द बीमारी के संदर्भ में अपने प्रचलित समकालीन अर्थ में मिलता है। बॉम्बे प्लेग महामारी, उसकी विभीषिका और उपचार को संबोधित इस टेक्स्ट गुजरते हुए उसके सारे बिन्दु, संदर्भ, भावनात्मक आयाम परिचित से लगते हैं। पुराने टेक्स्ट से गुजरने के लिए अपरिहार्य श्रम, खास किस्म की योग्यता और धैर्य जैसी अनिवार्यताएं यहाँ अपना स्पर्श भी नहीं मांगती हैं।

बॉम्बे प्लेग महामारी ब्यूबोनिक प्लेग थी जो ‘येर्सिनिया पेस्टिस’ नामक बैक्टीरिया से होने वाली बीमारी थी। यह बीमारी चीन के युन्नान प्रांत से उत्पन्न हो वाया समुद्र बॉम्बे पहुंची थी। इसकी पहचान करने वाले चिकित्सक और विषाणु विशेषज्ञ अलेक्जेंडर यर्सिन थे। इन्होंने प्लेग-रोधी सीरम पर भी काम किया लेकिन परिणाम निराशाजनक ही रहा। इनके पश्चात डब्लू. एम. हाफकीन ने इस पर काम किया और तुलनात्मक रूप से इनका परिणाम बेहतर तो रहा लेकिन सिर्फ आधा ही। इनके द्वारा तैयार वैक्सीन के साइड इफेक्ट के तौर पर उनके एक सहयोगी को नर्वस ब्रैक्डाउन हुआ, दो सहयोगियों ने उनके साथ काम करने से मना कर दिया। वैक्सीन के मानवीय परीक्षण से पहले उन्होंने उसे खुद अपने ऊपर आजमाया। परिणाम के प्रति निश्चिंत हो मानवीय परीक्षण के लिए इसे भायखला जेल के कैदियों पर आजमाया गया। इस वैक्सीन के कारण सात लोगों की जानें गईं लेकिन शेष सभी की स्थिति सामान्य रही। इस तरह प्लेग पर विजय की यह पहली उम्मीद बनी।

स्रोत संदर्भ:

हेनरी मैथ्यू और एबेंजर लैंडल्स के संपादकत्व में 1841 में हंसी-मजाक और व्यंग्य की ब्रिटिश पत्रिका पंच: लंदन चारिवारी निकली। आज की सुपरिचित व्यंग्य-विधा ‘कार्टून’ के लिए यह जो नाम रूढ़ हुआ है, वह इसी पत्रिका का देन है। खैर, यह पत्रिका इतनी लोकप्रिय हुई कि उसी धमक तत्काल हिंदुस्तान के भीतर भी सुनाई देने लगी। देखते ही देखते पंचों की भरमार हो गई जिनमें से प्रमुख थेअवध पंच, बिहार पंच और हिन्दी पंच हिन्दी पंच के दस्तावेजों से गुजरते हुए उन्नीसवीं सदी के मध्य से लेकर उतरार्द्ध के शहरी भारतीय अभिजात/ बौद्धिक जगत के हवा-पानी से वाबस्ता होते हैं। उसी समय के वर्नाकुलर की पत्रिकाओं से इसका मिजाज नितांत भिन्न, और आज के नजरिये से कहें तो सामाजिक दायरे में आधुनिक था।

खैर दस्तावेजी अहमियत से लैस इस टेक्स्ट से गुजरते हुए ऐसा लगता है मानो इतिहास दुहराया जा रहा है। शहरी हल्कों में विद्यमान वही भय, वही कोरांटीन, वही सावधानी, टीका की उम्मीद में आस लगाए वही इंसान।
# Uday Shankar

Its corona is a crown of bones, blurred by blinding tears.

MUNICIPAL NOTES

By A Corporator Faineant

Baffled at every point. The plague is defying us still. We have whitewashed, and phenyled, and fumigated. We have condemned, altered, burned and destroyed. We have turned off water, and turned it on again. We have covered our streets with slush and mud, and we have left them to revel in clouds of dust. We have climbed down from our lofty height, yielding up our purse and ourselves to the Government and their Committee. We have haffkined ourselves, till the blind believer in the preventive serum has come to fancy that he has quaffed the cup of immortality and will endure for ever! We have yersined ourselves, and we have beggared ourselves. All to no purpose. The plague is once more at its murderous work, devouring us with unabated appetite. Like the moon, that, with impudent boldness, attempted to swallow the sun the other day; but unlike her, in that it does not know when and where to stop, and its corona is a crown of bones, blurred by blinding tears. The plague, like the superannuated human plagues that torment us with their eternal buzzing, is no respecter of persons, and its boldness, like theirs, is boundless.

No wonder then that, being so much at a disadvantage, we should, like the drowning man catching at the foam, welcome the tiniest ray of hope with eager eyes. It comes this time from a Florentine savant who, having tried his curative serum on monkeys and men with success, offers to send it on to us on our paying all expenses. This is fair and generous. And the curative serum before the preventive any day. Healthy persons may object to the introduction of poison into their system, all Mr. Seraph’s persuasive pleadings notwithstanding; but who, at death’s door, will turn away from whatever chance there may he of turning back into the realm of light and life? A serum too that has been tried, and found to be efficacious. On monkeys and on men, though the double trial was hardly necessary. We would have taken the monkey alone at his word, for what’s good for him must perforce be good for his lineal descendant. But this comes with a two-fold guarantee, and we snatched at it with eyes closed. It was Yersin last year. It is Lustig now.

But, said the well-meaning Dr. Bahadurji, let us proceed with caution. We have had the serum from Alexandre Yersin, we have had it from Yersin, with not very satisfactory results, and the former had to give it up as it took longer time to prepare than the plague takes to kill, and run its course. Let us find out what quantity we are likely to have at once, and how soon our stock can be replenished. For if we can’t get all we want during the natural life-time of the plague’ it will be money thrown away.

Weighty words of wisdom. But they had no weight with us and we would not wait. We could brook no delay—not even a few hours’ or a couple of days’ delay—we who dawdled over the plague in its early stages for months; we who refused even to recognise it by its right name ; we who allowed our care for the city to give place to care for self ; we who deserted our posts and fled for our own dear lives when we should have remained to counsel and encourage and console ; we who, after the plague was over, went to sleep in fancied security and took no steps to meet the recrudescence which we were warned to expect ! We could brook not a moment’s delay. We who, like the nasty cusses that we were, at one time used to wait till the brook should pass by! But we’ve changed all that now, and the Hon’ble Dr. Bhalchandra, whose idea of the value of time would appear to have altered since his elevation, took us to task for having “wasted” the couple of hours that we took in weighing Dr. Bahadurji’s words. Contradictory as it may sound, the plague, whatever it may be doing outside the House, has inoculated us with new life and fresh energy, and it now only remains to hope that Dr. Bahudurji may prove to be a false prophet, and the new serum the true elixir.

Source: Hindi Punch, February, 1898

नामाकूल मुर्गे और मुर्गियों की कलगी: मिखाईल शोलोखोव

मिखाईल शोलोखोव विश्व साहित्य के बड़े नाम और नोबेल पुरस्कार विजेता हैं.  उनका उपन्यास ‘वर्जिन सॉयल अपटर्नड् ‘ सोवियत प्रयासों से शुरू हुयी  साझेदारी खेती ,पशुपालन और उसके इर्द-गिर्द के संघर्ष  एवं जीवन की कहानी है. इसी उपन्यास का एक एक अंश यहाँ प्रस्तुत है.

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आवरण-पृष्ठ : वर्जिन सॉयल अपटर्नड्

कुंवारी भूमि का जागरण 

By मिखाईल शोलोखोव

सुबह नाश्ता करके वह मुर्गियों के बाड़े की और चल दिया. उसे देखकर बूढ़े अकीम बेसख्लेबनोव ने गुस्से में चिल्लाकर पूछा,

“तू सुबह-सबेरे यहाँ क्या कर रहा है?”

“तुम्हें और मुर्गियों को देखने आया हूँ. क्या हाल-चाल है बाबा?”

“अच्छी-खासी जिन्दगी कट रही थी पर अब मत पूछो.”

“क्यों, क्या हो गया?”

“मुर्गियों ने जीना हरम कर दिया है.”

“यह कैसे?”

“तू एक दिन यहाँ रूककर देख, तब समझ जाएगा! नामाकूल मुर्गे दिन भर आपस में लड़ते रहते हैं, उन्हें अलग करते-करते तो मेरी टांगें टूट गयी. मुर्गियों को ही लो, देखने में लग सकता कि जनानी बात है पर ये भी दिन भर एक-दूसरी की कलगी नोचती रहती है. भाड़ में जाए ऐसी नौकरी. आज ही दवीदोव के पास जाकर छुट्टी करने के लिए बोलूँगा और मधुमक्खियों की देख-रेख के लिए भेजने को कहूँगा.”

“बाबा, धीरे-धीरे वे एक दूसरे के आदी हो जायेंगे.”

“जब तक वे आदी होंगे, बुड्ढा कब्र में उतर चूका होगा. भला यह भी मर्दों का काम है? आखिर को मैं भी तो कज्जाक हूँ. तुर्कों की लड़ाई पर जा चुका हूँ. पर यहाँ मुझे मुर्गियों का कमांडर बना दिया है. नौकरी किये दो दिन ही हुए हैं पर बच्चे मेरा पीछा नहीं छोड़ते. जब घर जाता हूँ तो वे चिल्लाने लगते हैं, ‘बुड्ढा मुर्गी-छेड़! अकीम बाबा मुर्गी-छेड़!’ मुझे सबका मान-सम्मान प्राप्त था, पर बुढ़ापे में मुर्गी-छेड़ की उपाधि लेकर मरूँगा क्या? नहीं, मैं बिलकुल नहीं चाहता!”

“अरे छोड़ो भी, अकीम बाबा. बच्चों से क्या लेना?”

“अरे अगर बच्चे ही कहते तो कोई बात नहीं पर कई लुगाइयां भी उनके साथ हो गयी हैं. कल दोपहर खाना खाने जा रहा था. कुएं पर नास्तेन्का दोनेत्स्कोवा पानी खींच रही थी. पूछती है: ‘बाबा, मुर्गियों को संभाल पा रहे हो न? मैं बोला, ‘हाँ-हाँ.’ – बाबा, मुर्गियां अंडे दे भी रही हैं या नहीं?’ मैं बोला, ‘हाँ, कुछेक दे रही हैं पर ज्यादा नहीं.’ और वह कल्मीक घोड़ी पता है क्या बोली हंसकर? ‘देखना, जुताई तक वे एक टोकरी अंडे दे दे नहीं तो तुमसे करवाएंगे मुर्गे का काम.’ ऐसे मजाक सुनने के लिए मैं बुड्ढा हो गया हूँ. और यह नौकरी मुझे बिलकुल पसंद नहीं.”

बुड्ढा कुछ और भी कहना चाहता था पर बाड़े के पास दो मुर्गे भिड़ गए, एक की कलगी से खून की धारा फूट पड़ी और दूसरे की गल-थैली से मुट्ठी भर पंखों का ढेर उड़ा. बुड्ढा अकीम संटी उठाकर उनकी ओर दौड़ पड़ा.

अनुवाद: विनय शुक्ल 

 

लंचबॉक्स: विदेह के सदेह होने की कथा : अमितेश कुमार

लंचबॉक्स (2013) ने इस धारणा को चोट पहुंचाई है कि कलात्मक स्तर की फिल्म सहजता से संप्रेषित नहीं हो सकती है. इसने हिंदी सिनेमा उद्योग का यह सच भी उजागर किया है कि असली समस्या ऐसी फिल्मों को दर्शकों तक कायदे से नहीं पहुंचाये जाने का है. यदि फिल्में कायदे से दर्शकों तक पहुंचे तो निःसंदेह उसे दर्शक मिलेंगे. वही दर्शक जिनकी मूढ़ता को लेकर हम आश्वस्त हो चुके हैं. लेकिन करोड़ी क्लब के सिनेमा दर्शकों के इतर या उनके भीतर दर्शकों का एक ऐसा वर्ग भी है जो ताजी, संवेदनशील, बेहतर शिल्प में कही गई फ़िल्में भी देखना चाहता है.

‘लंचबॉक्स’ सिनेमाई पाठ के उन उदाहरणों में से एक है जिसे आप जितनी बार पढ़ते हैं एक नवीन अर्थ निकलता है. जितनी बार आप अपनी दृष्टि का परिप्रेक्ष्य बदलते हैं उतनी बार सिनेमा का परिप्रेक्ष्य भी बदलता है. इसके कथ्य में एक ‘मूल्यपरक’ तरलता है और यह किसी कहानी की तरह हमारे जीवन में बहुत तिरछे होकर घूसती है और वहीं अटकी रह जाती है. इसलिये इस फिल्म पर बात करते हुए आप कथ्यपरक बातों के अलावा बहुत सी वागाडंबर वाली भी बात कर सकते हैं क्योंकि आप इस फिल्म के प्रभाव में है. #लेखक 

लंचबॉक्स: विदेह के सदेह होने की कथा

By अमितेश कुमार 

फिल्म का शीर्षक ही वह दरवाजा है जिससे फिल्म के पाठ की अर्थबहुलता में आप आसानी से प्रवेश कर सकते हैं. लंचबॉक्स के गलत पते पर पहुंच जाने का ‘संयोग’ फिल्म की वह केंद्रीय घटना है जिसके इर्द गिर्द पूरा आख्यान रचा गया है. डब्बेवाले के अनुसार लंचबॉक्स के गलत पते पर पहुंचने की संभावना नगण्य है क्योंकि उसे हार्वर्ड, प्रिंस चार्ल्स इत्यादि का प्रमाण पत्र मिल चुका है. फिल्म  के बाहर यदि हम इस तथ्य को जाँचे तो भी इस दावे पर यकीन न करने की कोई गुंजाईश नहीं है. यह ‘संयोग’ वह सिनेमाई युक्ति है जिसे फिल्मकार ने अपनाया है.

फिल्म का बड़ा हिस्सा लंच बनाने, डब्बावालों के लंच पहुंचाने और लंचटाइम के बीच घटित होता है. इस लंच के मायने इन किरदारों के लिये फिल्म के शुरू में जो रहते हैं फिल्म के अंत में वही नहीं रह जाते. इला का अपनी पड़ोसन (फिल्म में जिसकी आवाज भर है) से जुड़ाव का एक स्रोत खाने की रेसेपी है जिससे वह अपने पति को खुश कर उसका ध्यान अपनी ओर खींचना चाहती है जो जीवन की आपाधापी में उससे विमुख हो चुका है. जिससे अपनी पत्नी के बनाये खाने का स्वाद भी पहचाना नहीं जाता. इला की यह कोशिश विफल रहती है क्योंकि लंचबॉक्स गलत पते पर पहुंच गया है, एक रूखे आदमी ‘साजन फर्नांडिस’ के पास, जो खाने के समय भी किताब पढ़ता रहता है, जिसके बारे में उसके कार्यालय में अफवाहें फैली हैं, जिससे उसके मुहल्ले के बच्चे डरते हैं, जो नितांत अपने अकेलेपन में समय से पहले स्वैच्छिक सेवानिवृति लेकर मुंबई से बाहर जाना चाहता है.

इला और साजन की जिंदगी टकराती है और लंचबॉक्स में रखी पर्चियों से दोनों की बातचीत शुरू होती है. साजन की जिंदगी की कठोरता के पीछे का तथ्य और उसके भीतर का कोमल भी सामने आने लगता है. तीसरा मुख्य किरदार असलम शेख है जो साजन की जगह लेने उसी के कार्यालय में आया है. वह खाने की पहचान रखता है, वह ‘लंचबॉक्स’ को आत्मीयता से सूंघ कर उसके स्वाद की टोह लेता है. स्वंय भी खाना बना सकता है, ट्रेन की यात्रा के दौरान सब्जी काटता है. इला के भेजे हुए लंच से साजन की भोजन में दोबारा रूचि जगती है, फिल्म में पहली बार जब लंच साजन की मेज पर आता है वह उसकी तरफ़ आँखे उठा कर भी नहीं देखता लेकिन बाद में रोज वह लंचबॉक्स का इंतजार करने लगता है. इला को अपनी पति का खिंचाव वापस नहीं मिलता लेकिन उसके व्यक्तित्व का एक अलग हिस्सा खुलता है. साजन उसके बनाये खाने में रूचि ले रहा है. खाने में शेख की रूचि ही साजन और उसको लंचटाइम के दौरान एक दूसरे से जोड़ती है.

फिल्म के तीनों ही किरदारों के लिये खाने के मायने अलग अलग हैं. इला के लिये यह उसकी सत्ता का बोध कराने वाला और उसका विश्वास कायम रखने वाला काम है, साजन के लिये यह जरूरत के अलावा कुछ नहीं और शेख इसकी कीमत जानता है इसलिये उसके लिये यह दिव्य है, वह डब्बा सूंघ कर स्वाद बताने की क्षमता रखता है. यह ‘भूख’ ही है जिसका अलग-अलग रूप सामने आता है. इला की मां इस भूख के मायने भूल चुकी है. उसे इसकी याद अपने पति की मौत के तुरंत बाद आती है. वह महसूस करती है कि पति की सेवा में उसने भूख जैसे जरूरी चर्या को भी भूला दिया था. इला के पति का भोजन से कृत्रिम संबंध है. साजन इला को बताता कि मुम्बई में बहुत से लोग लंच में सिर्फ़ केला खाते हैं. शेख के लंच में भी सेब और केला ही रहता है.

‘लंचबॉक्स’ के तीनों मुख्य किरदारों का कथा सरंचना में प्रवेश क्रम से होता है. पहले इला (निमरत कौर) आती है, बच्चे को तैयार करती, पति के लिये खाना बनाती, लंचबॉक्स पैक करती और डब्बे वाले को सौंपती हुई, शाम को अच्छे से तैयार होकर पति का इंतजार करती इला. जिसके पास समय काटने का यंत्र अपनी पड़ोसन से बात करना, मनपसंद गाने सुनना, जो उसकी पड़ोसन कैसेट से इला की ही फरमाइश पर बजाती है, खाना बनाना, कपड़े धोना आदि है. इला की दिनचर्या में एक यांत्रिकता और रोजमर्रापन की एकरसता है. वैवाहिक जीवन भी नीरस है जिसमें साजन की सलाह पर अमल कर कुछ रंग भरना चाहती है. हनीमून के कपड़े में अपनी फ़िगर की मेंटनेस दिखा कर और अपने होने वाले बच्चे की याद दिला कर भी वह पति को हासिल नहीं कर पाती. पति (नकुल वैध) की देह भाषा और अभिनय इला के अभिनय में और दिनचर्या के काम में वह पूरा रसायन अभिव्यक्त होता है जो पति और पत्नी के बीच में है. क्या यह केवल इला का जीवन है? इस फिल्म में दो और ‘औरतें’ हैं. इला की मां और पड़ोसी देशपांडे आंटी. इन दोनों का जीवन अपने अशक्त पति के इर्द गिर्द ही समर्पित है लेकिन इन दोनों को इससे कोई शिकायत नहीं है. लेकिन इला में एक विद्रोह है. वह कम से कम सोचती है कि वह भूटान जाये जहां खुशी उत्पादन से अधिक कीमती है. वह बाहर निकलने का अवसर तलाशती है क्योंकि वह उस रसायन को खोज रही है जो दो लोगों को साथ रखने के लिये जरूरी है. दिनचर्या की एकरसता से वह उब चुकी है. लंचबॉक्स में लिखी चिठ्ठियां उसे रास्ता दिखाती है. लेकिन वह अपने जीवन-चक्र से बाहर नहीं निकल पाती. वह एक विद्रोही चिट्ठी लिख कर उसे भविष्य में दुबारा पढ़ना चाहती है.

सिनेमा का दूसरा किरदार साजन फर्नांडिस (इरफ़ान खान) विधुर है जो क्लेम डिपार्टमेंट में काम करता है. वह एक रूखा आदमी है जिससे मोहल्ले के बच्चे भी गेंद मांगने में डरते हैं. जो एक गलत पते के लंचबॉक्स में धन्यवाद की चिट की बजाये ‘Food was Salty Today’ की चिट लिखता है. पडोस की लड़की उसको देखकर अपने घर की खिड़की बंद कर देती है. वह नितांत अकेलेपन और ठहराव को जी रहा है और इसे तोड़ने में उसकी कोई दिलचस्पी नजर तब तक नहीं आती जबतक उसके जीवन में गलत पते से भटका एक लंचबॉक्स और उसकी ऑफिस में उसकी जगह लेने वाला शेख नहीं आता है. इला से खतो-किताबत के बाद उसके व्यक्तित्व की अंदरूनी सरंचना में परिवर्तन होता है. हम देखते हैं कि वह सहज हास्य बोध भी रखता है, वह शेख को अफ़वाह की सच्चाई न बता कर कि उसने बिल्ली को मारा था, कहता है कि दरअसल वह आदमी था इसलिये शेख भी बच के रहे. साजन की इला को लिखी चिठ्ठियां किसी कविता से कम नहीं है.

 things are never bad as seen

just watched your weight

उसके कठोर और सपाट चेहरे के पीछे का उसका एक सुखद अतीत है. चरित्र की जटिलता और गहराई को इरफ़ान खान ने बड़े सहज अंदज में जिया है. यह वह किरदार है जो जितना बाहर है उतना ही भीतर. जीवन के प्रति आशा रखने के लिये इला को प्रेरित करते हुए वह ट्रेन में एक वृद्धा की मुस्कान का जिक्र करता है. शेख की नौकरी बचाता है. इस किरदार में एक यात्रा है जिसकी सूक्ष्मता को पढ़ा जाना चाहिये. साजन का ठोसपन जैसे जैसे घूलता है वैसे ही उसमें अचानक एक ठहराव लौटता है. अचानक उसे अपने बूढ़े होने का बोध होता है और वह इला से अपने संबंधों के बारे में सोचता है. नासिक जा कर बसने का निश्चय पर अमल कर लेता है. उसके सामने बच्चे हैं, गेंद के लिये, वह उन्हें कहता है कि वह इसलिये वापस आया है ताकि बच्चे किसी का ग्लास न तोड़े और रात में वह लड़की उसे देखकर हाथ हिलाती है, अपनी खिड़की बंद नहीं करती. वह ऐसा आदमी है जिसकी जिंदगी दफ़्तर और घर के बीच सिमट गई है, पत्नी के न होने का अकेलापन उसे रूखा बना गया है. उसका कोई सामुदायिक जीवन नहीं है. वह अपना काम परफ़ेक्शन से करता है और दूसरे भी करें यह उम्मीद भी रखता है. उसका जीवन ट्रेन में, बस में और खड़े खड़े बीत गया है, वह डरता है कि कहीं उसकी कब्र भी ‘वर्टिकल’ न हो जाये. साजन अपने जीवन की नीरसता का अभ्यस्त हो चुका है उसकि दिलचस्पी इसको तोड़ने में भी नहीं है. जबकि वह अपने आस-पास बदलती और बनती हुयी दुनिया से भी बाख़बर है. वह जीवन की मुश्किलों के बारे जानता है लेकिन उसका स्वंय का अलगाव चरम पर है लेकिन मानवीय रिश्ते का स्पर्श जब उसे छूता है तो वह लौटता है और पूरी संवेदना के साथ.

सिनेमा के तीसरा किरदार असलम शेख (नवाजुद्दीन शेख) की गतिविधियां किसी नियमग्रस्तता से बाध्य नहीं है, इला और साजन की तरह. वह अपने लिये रास्ता बनाना जानता है, जिजीविषा से भरा हुआ है. उसे अपने आप पर विश्वास है. वह साजन की उपेक्षा का उसे जवाब देता है ‘सब कुछ खुद से सीखा है यह भी सीख लूंगा’. अनाथ है लेकिन ‘अम्मी कहती है’, उसका तकिया कलाम है, इससे वह अपनी बात का वज़न बनाता है. रिश्ते बनाने में उसकी दिलचस्पी है. इसके लिये वह परेशान करने की हद तक कोशिश करता है कि साजन से रिश्ता बनाये, और उसमें सफ़ल भी होता है. ऑफिस में वह साजन की जगह लेने आया है लेकिन वह उसका विपरीत किरदार है. शेख के किरदार की अलमस्ती को नवाज जीवंत कर देते हैं.

लंचबॉक्स का एक मुख्य किरदार मुंबई शहर है, जो डब्बेवालों की डब्बा पहुंचाने की यात्रा, साजन और शेख के ऑफिस जाने और आने की यात्रा के माध्यम से सिनेमा में दर्ज होती है. ‘लंचबॉक्स’ में मुंबई का सिनेमाई स्टिरीयोटाइप नहीं है बल्कि रोजमर्रा की मुंबई है,  कामकाजी मर्दों, गृहणियों, डब्बोवालों, लोकल ट्रेन, ऑटो, टैक्सी की मुंबई. मुंबई की स्थानिकता को फिल्म गति और ठहराव दोनों ही बिंबों के जरिये पकड़ती है. एक तरफ यह मुंबई के बिलकुल स्थानीय-रूढ़ जीवन और इसमें जूझ रहे व्यक्तियों के जरिये मुंबई की एक अलग, सिनेमा में कम दिखाई जाने वाली पहचान को स्थापित करता है, वहीं दूसरी तरफ मुंबई के बहाने समकालीन महानगरीय जीवन की सार्वभौम छवि को भी उभारता है. मुंबई होते हुए भी यह जीवन कहीं का भी हो सकता है, जहां मर्द कार्यालय में और सड़कों पर हैं, एवं स्त्रियां किचेन में. बच्चे स्कूल जा रहे हैं या खेल रहे हैं.

आज के परिदृश्य में चिठ्ठी के जरिये बातचीत असंभव-सा लगता है. दोनों किरदार एक दूसरे से फोन पर बात करने की कोशिश नहीं करते. कहानी के बाहर इसे अतार्किक माना जा सकता है. मोबाइल का इस्तेमाल सिनेमा में सबसे व्यस्त शख्स इला का पति करता है.

इला की पड़ोसी उसके बगल में नहीं उसके फ्लैट के ऊपर रहती है. दोनों का एक दूसरे से संपर्क आवाजों, आडियो कैसेट और सामान लेन-देन करने वाली टोकरी के जरिये होता है. उनके संपर्क की छवि अमूर्त है. पति-पत्नी, मां-बेटी, सामुदायिक हर प्रकार का रिश्ता प्रभावित हो रहा है. इला के जोर देने पर उसकी मां पैसे लेने की बात जब स्वीकार कर लेती है तब इला खुद असमंजस में पड़ जाती है. पिता की मृत्यु पर इला कह तो देती है कि उसका पति भी आ रहा है लेकिन इसके सच होने के प्रति वह खुद आश्वस्त नहीं है. इला अपनी मां के सामने एक झूठ को जीने के लिये विवश है और उसकी मां भी सच जानते हुए इस झूठ को कायम रखती है. झूठ ही उन दोनों को जीवन के कठोर यथार्थ से सामना करने का हौसला देता है. सामुदायिक रिश्ता शहर में बिलकुल ही दरक चुका है. साजन के ऑफिस और मोहल्ले दोनों जगहों ने साजन को उसके अकेलेपन पर छोड़ दिया है. इसको सायास शेख तोड़ता है जो स्वयं भी अकेला है. इस शहर में सभी लोगो ने अपना एकांत विकसित कर लिया है और अब वे उसी में रहने को अभिशप्त हैं.

फिल्म की पटकथा में छोटी-छोटी बारिकियां भी ओझल नहीं हुई हैं.  इंटरकट संपादन के बीच दृश्यों में तरलता और एक दूसरे में घूल जाने की विशेषता है. रंग, प्रकाश और दृश्य- सज्जा का संयोजन ऐसा है जिससे यथार्थ कभी भंग नहीं होता या अतिरंजित नहीं लगता. इला कपड़े धो रही है, कैमरा स्थिर है, फोन की आवाज आती है. वह फ्रेम से बाहर चली जाती है. फ्रेम स्थिर है फिर आवाज आती है, आ रही हूं. कोई स्पष्ट सूचना नहीं है लेकिन दर्शकों को पता चल जाता है कि घटना क्या घटी है. दृश्यों की यही संवादात्मकता सिनेभाषा को सघन बनाती है. अकेलेपन, निराशा, सूनेपन को रचने में कैमरे की बेहतरीन मदद ली गई है.

इला देशपांडे आंटी के अशक्त पति का जिक्र चिठ्ठी में कर रही है, साजन के ऑफिस सारे पंखें चल चल रहे हैं. चिठ्ठी में देशपांडे आंटी के पंखे का रूकने का जिक्र होते ही साजन ऊपर देखता है, सिर्फ उसके सिर के ऊपर का पंखा नहीं चल रहा है, फिर वह धीरे-धीरे चलने लगता है, ऑफिस के बाकी पंखे सामान्य हैं.

साजन को एक स्त्री के बच्चे समेत आत्महत्या की सूचना मिलती है वह इस कदर आशंकित होता है कि अगले दिन ऑफिस में लंच का इंतजार करता है. कैमरा भी इस इंतजार को चित्रित करता है. दर्शकों की उत्सुकता बढ़ जाती है और अंततः चपरासी के लंच रखे जाने से इस आशंका का शमन होता है. ‘लंचबॉक्स’ हमें यह याद दिलाता है कि सिनेमा मूलतः दृश्य माध्यम है, जिसमें श्रव्य थोड़ा गौण हो तो वो और भी बेहतर संवाद रच सकता है. सिनेमा का एंटी क्लाइमेक्स में जाना कुछ निराश करता है. फिल्म साजन की तलाश और इला के इतंजार पर खतम होती है.

लंचबॉक्स अपने ‘अस्तित्व’ से उचाट हुए दो पात्रों को आमने-सामने रखता है जो अपने विदेहपन को त्याग कर सदेह होते हैं. आज मनुष्य के सामने सबसे बड़ा संघर्ष अपनी अंदरूनी संवेदना को बचाये रखना का है, यह संघर्ष आंतरिक अधिक है. ‘लंचबाक्स’ की सफलता इस संघर्ष के सूक्ष्म चित्रण में है. यह संघर्ष चलते हुए पंखे को साफ करने जैसा है जिसमें अपना हाथ भी सुरक्षित रखना है और पंखा भी साफ रखना है.

 

Amitesh Kumar

 

अमितेश कुमार, दिल्ली विश्वविद्यालय से पीएचडी हैं और इलाहबाद विश्विद्यालय में प्राध्यापक हैं.  रंगमंच संबंधित  ब्लॉग ‘रंगविमर्श’ के मॉडरेटर हैं। अमितेश से amitesh0@gmail.com पर संवाद संभव है। 

 

रामचंद्र शुक्ल और हिन्दी साहित्य का इतिहास: चंदन श्रीवास्तव

रामचंद्र शुक्ल और हिन्दी साहित्य का इतिहास: मकानों का दस्तूर कि मकान बनाने वाला अब बरामदे में रहा

ज्यों प्रेम की रीत त्यों साहित्य वा साहित्य के विवेचना की रीत – यहां उसी को देखके जीते हैं जिस काफिर पर दम निकले ! और जो साहित्य के विवेचना की रीत ऐसी ना हो तो बनायी जानी चाहिए. जो ना हुआ सो आगे भी ना हो — ये कोई सिद्धवाक्य थोड़े है ! सो, प्रियजन शुक्ल के इतिहास विवेचन में पड़े सो ठीक, स्वागत-योग्य! लेकिन ये क्या कि खंडन-मंडन से आगे निकलकर शुक्ल-भंजन, निन्दन-बहिष्करण तक चले जायें. अईसे तो लइका के नहवावन धोवावन के फेरा में पनिये नहीं, कठौती, लोटा और खुद लईकवे गुड़ूही में जा गिरेगा !

लगे कि इहां हम कवनो बुढ़भस कर रहे हैं तो आगे मत पढिएगा लेकिन हमको हर बात पर पहिले बुढ़ऊ लोग लऊकते हैं. जईसे शुक्ल जी के इतिहास(हिन्दी साहित्य) के बारे में फेसबुक पर बात बढ़ी तो जाने कवना तर्क से हमरा हिया चहुंच गया एरिक फ्रॉम के बहुते पुरान-धुरान एगो लेख पर. नाम है इंडिविजुअल एंड सोशल ओरिजन ऑफ न्यूरोसिस. ई लेख एतना पुरान भया कि हियां कवनो मेंशन का हकदार नहीं बाकिर का करें कि जिया में कुछ लाइन एकदमे से कांटा का माफिक घुप के रह गया है एरिक फ्रॉम का. @ लेखक 

By चंदन श्रीवास्तव

एरिक फ्रॉम लिखते हैं कि विज्ञान का इतिहास दोषदार(ना ठीक लगे तो त्रुटिपूर्ण पढ़ें) तथ्यों का इतिहास होता है. तो भी, ये दोषदार तथ्य विचार की प्रगति के पगचिन्ह हैं काहे कि उनमें एगो खास गुण होअत है. गुण ई कि दोष चाहे जेतना हो लेकिन ये तथ्य बंजर ना होते, बड़े उपजाऊ होते हैं. बस इन तथ्यों में निहित सत्य भ्रमपूर्ण धारणाओं के कारण ढंका-छिपा रह जाता है…एक-दो पीढ़ी के अंतराल से इनमें सुधार कर लिया जाता है.

एरिक फ्रॉम आगे लिखते  हैं कि मानवीय विचारों की प्रगति जो इस रास्ते होती है तो ऐसा क्यों होता सो जानना कठिन नहीं. किसी भी मानवीय चिन्तन का उदेश्य संपूर्ण सत्य तक पहुंचना होता है, परिघटनाओं को उनकी पूर्णता में पहिचानना होता है. लेकिन किसी भी मनुष्य को जीवन तो बड़ा छोटा मिला होता है और वो इसी छोटे जीवन में संसार भर के सच की छवि अपनी आंखों देख लेना चाहता है. अब ऐसा तब ही हो सकता है जब किसी मनुष्य की जीवन-अवधि मनुष्य –जाति की जीवन-अवधि के मेल में हो. ऐतिहासिक विकासक्रम में ही मनुष्य पर्यवेक्षण की तकनीक जोगाड़ कर पाता है, नये तथ्य जुटा पाता और तथ्यों के मामले में बेहतर से बेहतर वस्तुनिष्ठता तक पहुंच पाता है जो कि सच को संपूर्णता में जानने के लिए जरुरी है.

इसके तुरत ही बात एरिक फ्रॉम एक सूत्रीकरण करते हैं कि ‘एक अन्तराल होता है सत्यान्वेषक के देखे सत्य और ज्ञान की उस सीमा के बीच जिसमें वो सत्यान्वेषक रह रहा होता है.’ मतलब, युग बढ़े तो ज्ञान-लाभ की दृष्टियां, तथ्य उत्खनन के औजार और पूछे जाने योग्य समझे गये प्रश्नों की काया और अभ्यंतर का विस्तार हो. युग के ज्ञान की सीमा बहुधा उस युग में पैदा ज्ञानी की भी सीमा होती है.

फ्रॉम का निष्कर्ष है कि चूंकि सत्यान्वेषण में निकले लोग अब अपने को किसी अधर में लटका तो नहीं रख सकते ना, सो वे इस अन्तराल को अपने युग में उपलब्ध ज्ञानराशि से जहां तक संभव हो, भरने की चेष्टा करते हैं भले ही इस ज्ञान राशि में वैसी वैधता का अभाव हो जैसी कि उनके देखे सत्य के झलक में समायी हो सकती है.

आप ठीक समझे हमरी पॉलिटिक्स को. निहायते कंजरवेटिव साऊंड करने का खतरा उठाते हुए हियां हमरा प्रस्ताव एरिक फ्रॉम की ऊपरोक्त अंतर्दृष्टि से शुक्लजी के इतिहास-लेखन को भी देखने का है. किन्तु-परन्तु बहुते है ऐसा करने में. एक तो यही कि फ्रॉम विज्ञान के इतिहास का बात कर रहे हैं तो साहित्य का इतिहास पर कईसे लागू कर दें. ऊ सत्य और वस्तुनिष्ठ का फेरा में हैं जबकि हियां जोर सौन्दर्य, संवेदना वा कि चित्तवृत्ति अऊर सब्जेक्टिविटी पर है, आदि-आदि. फिर भी हमको लगता है, एक कोशिश कर ली जाये कहीं के पैना से कहीं का चिऊरा चलाने में.

अगर ऐसा करेंगे तो नजर आयेगा कि शुक्लजी ने ‘शिक्षित समूह की बदलती हुई प्रवृतियों को लक्ष्य करके हिन्दी साहित्य के इतिहास के काल-विभाग और रचना की विभिन्न शाखाओं का एक कच्चा ढांचा खड़ा किया.” (मेरा जोर कच्चा ढांचा पर समझें और जो बन सके तो हम-आप एक पक्का सा जान पड़ता ढांचा बनाने की जुगत करें !)
अब इस कच्चे ढांचे में अगर ये आता है कि जनता की चित्तवृतियों का मेल युगीन साहित्य से बैठाकर इसी सहारे इतिहास तैयार करना है तो फिर कह लेने दीजिए कि शुक्लजी से पहले ऐसा हिन्दी साहित्य पर विचार करने वालों ने सोचा जरुर था(भारतेंदु मंडल के साहित्यकारों ने, बांग्ला में तो खैर हो ही चुका था.) लेकिन सोच को साकार करने का पहला काम शुक्लजी ने ही किया. उनका इतिहास अपने प्रस्ताव के पालन का अद्भुत साक्ष्य है. सो, ठेठ इस एक कारण से भी शुक्ल जी के इतिहास-ग्रंथ का पढ़ना-पढ़ाना सतत जारी रहना चाहिए.

दूसरी बात, हममें से बहुत कम होंगे जो शुक्लजी की पद्धति से इनकार कर सकें: जनता की चित्तवृति में बदलाव के साथ तद्युगीन साहित्य में भी बदलाव. चित्तवृतियों की बदलती परंपरा से साहित्य के बदलाव की परंपरा का सामंजस्य दिखाना. इसके हेतु-स्वरुप राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक परिस्थितियों का अंकन.

चाहूं तो बड़ी आसानी से कहूं कि ये वाली पद्धति शुक्लजी के मन में यों ही नहीं कौंधी – इसके पीछे भारत को उपनिवेश के रुप में गढ़ने-साधने का जो बड़ा ज्ञानकांड है, उसका बड़ा योगदान है. लेकिन इतना मानने के बाद भी क्या इस बात से इनकार कर सकता हूं कि कोई जब आज साहित्य का इतिहास लिखने चलता है, समालोचना में प्रवृत्त होता है तो वो बहुधा शुक्लजी वाली पद्धति का ही पालन कर रहा होता है. खूब गुस्सा कीजिए कि ‘साहित्य चित्तवृत्तियों का संचित रुप’ होता है- इस निष्कर्ष तक वे कैसे पहुंचे भला और आप क्यों मानें भला. आपका सवाल जायज है कि प्रतिनिधि पात्र, प्रतिनिधि परिस्थिति और प्रतिनिधि रचनाकार किसे मानें भला. जो-जो घटित हुआ उसके महत्व-अमहत्व को कैसे खोजें-छांटे भला और ये कैसे मानें कि किसी युग की प्रधानवृत्ति सबही की सब उस युग के साहित्य में चली आई. स्वयं प्रधान प्रवृत्ति और गौण प्रवृत्ति के बीच भेद करने वाली नजर को भी टोहिये-टोकिये लेकिन ये क्या कि चित्तवृत्तियों से साहित्य का रिश्ता मानने से ही इनकार कर दें. नहवावना के पानी के साथ लरिका तो नहीं गुड़ूही में डाल सकते ना.

एक और उदाहरण लीजिए : शुक्लजी का इतिहास साहित्य और कुसाहित्य के बीच भेद करता है तो साहित्य और असाहित्य के बीच भी. जो कुछ लेखन पूर्ववर्ती मौजूद है उसमें बहुत तो नीति-उपदेश है, मत-मतांतर का निरुपण है तो ऐसी ‘बोली-बानी’ को साहित्य के श्रेणी में नहीं रखते शुक्ल जी. हो सकता है, आपको लगे शुक्लजी कुछ बोली-बानी की वेधकता को ना पहिचान सके, सो उसे असाहित्य की श्रेणी में रखा और विवेचन योग्य ना माना या माना तो सम्यक मूल्यांकन ना किया. लेकिन इस सूत्रीकरण से कैसे इनकार करेंगे कि साहित्य के इतिहास का अपना विषय साहित्य ग्रंथ ही होने चाहिए, धर्मग्रंथ वा कि राजनीति के ग्रंथ नहीं. तो फिर शुक्लजी एक सूत्र तो देते हैं ना कि साहित्य का इतिहास लिखना है तो तय कीजिए कि साहित्य का ग्रंथ कौन-सा है, आप उसे साहित्य का ग्रंथ क्यों मानते हैं.

शुक्लजी के साहित्य विषयक इतिहास को पढ़ते हुए मुझे सबसे अच्छा वहां लगता है जहां लिखा मिलता है कि कथा के मर्मस्थलों को पहिचानो. शुक्लजी को कथा का एक मर्मस्थल वन में बैठी सभा में महसूस हुआ. शायद, आपको और मुझे ना लगे ये मर्मस्थल बल्कि वितृष्णा हो कि गजब का वर्णाश्रम है भाई. बात तो ठीक है—लेकिन सूत्रीकरण का क्या करें? क्या इस बात से ही इनकार कर दें कि कथा में कोई मर्मस्थल भी होते हैं, उनकी पहिचान करनी होती है.

जातिवादी-ब्राह्मणवादी आग्रह, अवैज्ञानिकता और सांप्रदायिकता के आरोप नये नहीं. ‘सांचा’ वाले लेख में अस्सी के दशक में ये बात शिक्षाशास्त्री कृष्णकुमार लिख चुके. बाद को कृष्णकुमार को अपने लेख में संशोधित करने लायक ना लगा हो तो उन्होंने ना लिखा (हो सकता है, लिखा हो मैंने ही ना पढ़ा हो) इस टेक पर 19वीं सदी के उत्तरार्ध के हिन्दी साहित्य के बारे में कुछ लेख इतिहासकार सुधीरचंद्र ने भी लिखा. लेकिन उन्हें अपने लिखे में संशोधन करना पड़ा. संशोधन में उन्होंने पूरी किताब लिखी- द ऑप्रेसिव प्रजेन्ट: लिटरेचर एंड सोशल काश्ससनेस इन कॉलोनियल इंडिया.

कहने का मतलब ये नहीं कि नई पीढ़ी नये सवालों, तथ्यों, प्राथमिकता के आलोक में शुक्ल जी के इतिहास लेखन पर प्रश्न ना उठाये, उठाये जरुर लेकिन इतनी विनम्रता जरुर रहे कि जो कुछ सोचा जा रहा है वो भी अपने युगीन अंतर्दृष्टियों और तथ्यों की सीमा से बंधा है, कि वो अंतरिम सच ही है. अंतिम नहीं और इस अंतरिम सच तक पहुंचना इसलिए भी मुमकिन हो सकता है कि एक शुक्लरचित ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ भी है. इतिहास के संग्रहालय में ना रखिये, (चीज पहुंचती संग्रहालय में तब है जब वो मृत हो जाय)- शुक्ल का इतिहास हमारे राष्ट्र होने की खूबियों-खामियों का धड़कता हुआ दस्तावेज है सो इस दस्तावेज से मतभेद और मनभेद रखने के लिए निरंतर जिरह में लगे रहिए और जिरह तब होगी जब ये कितबिया संग्रहालय में नहीं आपकी किताबों की रैक पर एकदम आंखों की सीध में रखी होगी.

चंदन श्रीवास्तव

चंदन श्रीवास्तव

मूलतया छपरा (बिहार) के निवासी, पिछले पंद्रह सालों से दिल्ली में। आईआईएमसी और जेएनयू में पढ़ाई। “उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हिन्दी लोकवृत्त का निर्माण” शीर्षक से पीएचडी, दिल्ली के कॉलेजों में छिटपुट अध्यापन, फिर टीवी चैनल की नौकरी और अब विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सीएसडीएस) की एक परियोजना इंक्लूसिव मीडिया फॉर चेंज से जुड़े  रहे हैं, फिलहाल बिहार में प्राध्यापक हैं। इनसे  chandan@csds.in पर संपर्क संभव है। 

पोएट्री इन द टाइम ऑफ़ कोरोना: उस्मान खान

एक दिन के चार पहलू

usman-khan-poem

स्क्रीनशॉट- L’été (1968)

By उस्मान खान

1.

समय की अधूरी कविताएँ 

सुबह का कुचला दर्द

शाम को फन उठाकर

फूंफकारने लगा

घर की दिशा से

 

वे एक-दूसरे से कटे हुए

एक-दूसरे की थकान में देखते

भूख की लंबी होती परछाइयाँ

सड़क किनारे चुपचाप बैठी हुई

 

कि जाने किस अति पर

ट्रक के टायरों के ख़ुद पर से

गुज़रने के पहले,

समय की अधूरी कविताओं में से एक

बीच सड़क पर खड़ी हो गई –

उनके ही लाचार आक्रोश का घोष बनकर –

 

‘ओ मेरे साथ चीख़ती

उत्पीड़ित आत्माओं,

अपनी ही मूर्खताओं

का दंड भोग रहे हैं  हम

 

हमारी आँतों के खालीपन से निकली प्रार्थनाएँ

हम पर हँस रही हैं निर्लज्ज – बेतहाशा

 

अपनी ही संतानों का वध

नए-नए तरीकों से

बार-बार करने का शाप

हमने ही ख़ुद को दिया है

 

अपनी ही माँ को विष पिलाकर

हम कर रहे हैं उन्मादी-नृत्य

थालियाँ बजा-बजाकर, खिलखिलाकर

 

कीटनाशकों के शाही-स्नान

का यह पवित्र मुहूर्त

हमने ही निकाला है

 

हम ही मोहित

गले में रस्सी डाल

झूल रहे हैं वटवृक्ष की

लटकती जड़ों के बीच

 

हम ही ज़ालिम को ख़ुदा बनाकर

उसके आदेश पर दीये जलाकर

कर रहे हैं आत्मदाह

 

हत्यारों की पूजा का रिवाज

हमने ही शुरू किया है

 

हमने ख़ुशी-ख़ुशी चुनी है

कुत्ते की मौत,

फिर अपने सिर के घाव को

चाटने की अनिवार्य असफल जद्दोजहद क्यों?’

 

अंतिम शब्द की पीड़ा की गूँज मिटने से पहले

वे खाने के पैकेट लुटने में लग गए थे।

 

वह चीख़ थी, चिल्लाहट थी,

शोर थी, झल्लाहट थी,

वह उनकी ही कविता थी बीच सड़क पर –

तार-तार,

अब भी अधूरी-सी।

 

उन्होने इस साल का महाचन्द्रमा

एक-दूसरे की भेड़िया-आँखों में देखा था,

वह रजत अवसाद था

और उनकी जीभ पर रोटी का नहीं

अपने ही ख़ून का स्वाद था।

 

वे अपनी ही हड्डियाँ चबा रहे थे,

ख़ुद को ज़िंदा रखने की

ग़लीज़ दीनता के मातहत।

 

कि इसी बीच, उनके ही बीच से

समय की एक और अधूरी कविता

अपनी ही अवमानना के विरुद्ध

खड़ी हो गई तनकर

एक और चीख़-पुकार बनकर

 

‘ओ मेरे साथ जुझते

भविष्य के सृजनकर्ताओं

आओ, बेहतर दुनिया के ख़ाब देखने वालों,

हमारे युग के कवि-योद्धाओं,

अपनी सोच, अपना ज़मीर,

अपने शस्त्र संभालो।

 

इस महाचन्द्रमा के डूबने से पहले

चलो छिन लाएँ,

इस धरती के आदमखोरों से

अपनी उम्मीद, अपना यक़ीन।

 

काम के बोझ तले दब चुकी

हो चुकी नफ़रत का शिकार

जो आत्माएँ,

उन्हें बाहर निकालें,

उनके रोग की दवा बनाएँ,

पूरी करें

अपने समय की अधूरी कविताएँ…!’

***

2.

जय-जय

उनका नाम जपो दिन-रात

करो उनके मन की बात

उनकी ही सुनो

उनकी ही सुनाओ

अपनी बुद्धि बेच खाओ!

मूर्खता का करो संचय

उनकी भी जय-जय

तुम्हारी भी जय-जय!

 

वे गिने रोकड़ा

वे गिने माल

तुम गिनो उनके झाँट के बाल

अपनी करनी पर रहो डटे

यूँ उनके तुम्हारे दिन कटे

श्रद्धामय रसमय सुखमय

उनकी भी जय-जय

तुम्हारी भी जय-जय!

 

कहे तो मारो

कहे तो मर जाओ

करे ईशारा,

तो तुम नाचो-गाओ

जब वे मदारी बन जाए

करे तमाशा

डुगडुगी बजाए

तुम भी बन जाओ

मरकट महाशय

उनकी भी जय-जय

तुम्हारी भी जय-जय!

 

तुम उन पर अपना तन-मन वारो

सही-ग़लत क्या नहीं विचारो

ताक पर रख दो ज्ञान-विज्ञान

पुलिस के लट्ठ को मानो वरदान

सूजे कूल्हों का क्या भय

उनकी भी जय-जय

तुम्हारी भी जय-जय!

***

3.

वह जहाँ अभी बना नहीं

 

जहाँ दिल पे वक़्त का बोझ न हो

उम्मीद जहाँ ज़मींदोज़ न हो

जहाँ साथ तुम्हारा रहे सदा

जहाँ तनहाई का खौफ़ न हो

वह जहाँ अभी बना नहीं।

 

जहाँ चाँद खिले  तो जाँ खिले

हर रंग के फ़ुल जहाँ खिले

मन मारकर जीना न हो

हर दिल का हर अरमाँ खिले

वह जहाँ अभी बना नहीं।

 

जहाँ सोचने पे न सज़ा मिले

जहाँ बोलने पे न क़ज़ा मिले

जहाँ इन्साँ इन्साँ से डरे नहीं

जहाँ सबको सारा मज़ा मिले

वह जहाँ अभी बना नहीं।

 

अभी तो चेहरे हैं ग़मगीं

अभी तो है खूं-आलूदा ज़मीं

हर आँख में है अभी नमी

मेरे दिल अभी न ठहर कहीं

वह जहाँ अभी बना नहीं।

***

4.

मेरे साथी

 

मेरे साथी  मेरी बात सुन

मिट्टी के ख़ाबों की तामीर

धरती की अदम्य उम्मीद

आने वाले मौसम के ग़ुलाब

हम ही तो हैं।

 

ये रोग, ये नृशंसताएँ

ये हिंसा का नंगा नाच

ये क्रूरता का दौर लंबा

हमारा इम्तिहान ही तो है

हमारी हार नहीं।

 

ये यातना, ये दर्द

ये घुटन, ये दुख

ये अजनबीपन

ये धन का घृणित राज

नहीं है अखंड।

अभी तो भविष्य के प्रेमाख्यान

अपने साहसी धिरोदात्त

नायक-नायिकाओं को जन्म दे रहे हैं

हमारी कश्मकश के बीच

देखो,  रात ढल रही है।

***

usman khanउस्मान खान हिंदी कवि और कथाकार हैं. उन्होंने इधर बीच पर्याप्त काम किया है. इस काम में कविताओं और कहानियों के साथ-साथ आलोचना भी शामिल है.  जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से मालवा के लोक–साहित्य पर पीएचडी की करने के बाद वह फिलहाल रतलाम के एक कॉलेज में पढ़ा रहे हैं. उनसे usmanjnu@gmail.com पर बात की जा सकती है.

कबीर का करघा और मुक्तिबोध का वामपंथी इन्टेलेक्ट: विष्णु खरे

यह बात-चीत इसी साल जनवरी की है. मौका था जयपुर समानांतर साहित्य उत्सव का. विष्णु खरे भी वहां आये हुए थे. बात-चीत में अनिल यादव, रवि प्रकाश, सुधांशु, अविनाश और उदय शंकर भी शामिल थे. # मार्तंड प्रगल्भ

Vishnu-Khare-Hindi-Kavita

साहित्यकार विष्णु खरे. (जन्म: 9 फरवरी 1940 – अवसान: 19 सितंबर 2018) (फोटो साभार: हिंदी कविता/यूट्यूब

 

 

विष्णु खरे के साथ एक अधूरी बातचीत: मार्तंड प्रगल्भ

प्रश्न मुक्तिबोध को लेकर अभी जो उत्सव चल रहा है, और जैसा कि मनमोहन कह रहे थे कि यह उत्सव और विस्मृति दोनों का साथ-साथ चलना है, यह दोनों दरअसल एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, तो इसी सिलसिले में इन सब के बीच मुक्तिबोध को लेकर आपकी अपनी जीवन-प्रक्रिया और रचना-प्रक्रिया में ही जो अनुभव रहे हैं उसे थोड़ा साझा करते हुए, उनसे जो पहली मुठभेड़ है, उसे बताएं!

वि.ख. मुक्तिबोध का जो पहला संग्रह आया था तो मैं शायद उसे पहले पढने वालों में से एक था. बाद में मैंने अपने कॉलेज, रतलाम कॉलेज में एक छात्र से उसपर एम्.फिल. भी करवाया था, हिंदी में. वह मुक्तिबोध पर पहला एम्.फिल. है, पैंसठ में. कहने का मतलब है कि मुक्तिबोध का बहुत गंभीर प्रभाव मुझ पर तभी था. मुक्तिबोध का असर कोई नयी चीज़ नहीं है. मेरे यहाँ तो अभी तक चालू है. अभी कम नहीं हुआ है. उसकी वजह शायद यह है कि मैं खुद लिखने वाला हूँ और मैं एक कमिटेड राइटर भी हूँ, मुक्तिबोध हमारे लेखक हैं. हमलोग वामपंथी लोगों के वे कवि हैं. तब से लेकर अब तक मुक्तिबोध मेरे जीवन में और मेरे लेखन में केन्द्रीय रहे हैं. लेखन माने उनका जो आईडियोलॉजिकल असर है, उनका कमिटमेंट है, वह हमारे लिए एक लाइट हाउस की तरह है. हांलांकि यह भी सच है कि मुक्तिबोध की आमद के पहले ही मैं वामपंथी था. मुक्तिबोध से मेरे वामपंथ को ताकत मिली है. मैं उनको पढ़ कर वामपंथी नहीं हुआ. मैं पहले से था. मुझ पर मैक्सिम गोर्की का असर था. मुक्तिबोध बाद में आते हैं. लेकिन आजतक मुक्तिबोध के बिना मैं कुछ भी साहित्यिक सोच नहीं पाता. यह एक तरह से ऐसी उपस्थिति है जो कभी कम नहीं होती है.

प्र. मुक्तिबोध की राजनीतिक प्रतिबद्धता निश्चित रूप से एक लम्बे ट्रेडीशन में है. वामपंथ एक वैश्विक परम्परा थी जिससे मुक्तिबोध अपने तईं नया रचने की कोशिश कर रहे थे. हिंदी या भारतीय या इस पूरे उपमहाद्विपीय संदर्भ में राजनीतिक प्रतिबद्धता के कवि के रूप में मुक्तिबोध प्रगतिशील आंदोलन में नया पक्ष क्या रख रहे थे?

वि.ख. मुक्तिबोध ऐज़ सच प्रगतिशील आंदोलन में नहीं थे. मुक्तिबोध की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि वे किसी भी इस तरह के मूवमेंट से अलग रहते हुए अपनी केन्द्रीय जगह बनाए हैं. यह बहुत आश्चर्य की बात है. यह हिंदी की ताकत की बात भी है कि मुक्तिबोध को समझने में हिंदी को किसी वामपंथी धारे की ज़रुरत नहीं पड़ी और वह मुक्तिबोध को मुक्तिबोध बनाने में कोई बैसाखी नहीं बनी. यह बहुत बड़ी बात है. मुक्तिबोध अभी भी इंडिपेंडेंट हैं. मुक्तिबोध को आप किसी भी इस तरह के स्कूल में बाँध नहीं सकते. मुक्तिबोध का जो पूरा होना है वह मृत्यु के बाद का है. एक बड़ी विचित्र बात है कि हिंदी में कोई लेखक मृत्यु के इतने दिनों बाद तक बना रहा. मुक्तिबोध मरता नहीं है. मुक्तिबोध की प्रतिष्ठा में, मुक्तिबोध के फेम में, मुक्तिबोध के एक्सेप्टेंस में कोई फ़र्क नहीं आया है बल्कि मुक्तिबोध निर्बाध बढ़ रहा है. आप देखिये न मुक्तिबोध के ज़माने का, और उनके पहले का भी, पूरा प्रगतिशील स्कूल नष्ट हो गया. इनके पहले के बड़े-बड़े कथित प्रगतिशील कवि खत्म हो गए. मुक्तिबोध का मुक्तिबोध होना और इतने बड़े कवि-समुदाय द्वारा स्वीकृत होना अजीब है. हमलोग कह सकते हैं कि हमने मुक्तिबोध को सबसे पहले समझा. मुक्तिबोध अगर हमारे बगैर भी इतना बड़ा हो गया और होता जा रहा है तो मुक्तिबोध की ताकत का वह रेशा ढूंढना चाहिए कि वह क्यों एक्सेप्टेड है. क्योंकि मुक्तिबोध की ईमानदारी टोटली ट्रांसपैरेंट है. टोटली. वहां पर कोई ओपेक्नेस है ही नहीं…ट्रांसपैरेंट है.

प्र. यह जो इंडिपेंडेंट लेफ्ट की बात आप कह रहे हैं कि जितनी भी प्रगतिशील परम्पराएं थीं मुक्तिबोध उनसे अलग रह कर, बिना स्कूल का अनुकरण किये, और बिना किसी स्कूल का पालन किये या बिना किसी मठ में गए और बिना कोई मठ बनाने की प्रक्रिया में शामिल हुए, जिस इंडिपेंडेंट लेफ्ट की धारा को प्रेरणा देते हैं, उनकी प्रतिबद्धता का यह अंश आपको प्रेरणा कैसे देता है?

वि.ख. टोटली.

प्र. अभी के समय में अगर कहें कि इस तरह के किसी इंडिपेंडेंट लेफ्ट की जगह अगर बन रही है तो उसका स्वरुप या उसकी पॉलिटिक्स को हमलोग कैसे समझ पायेंगे?

वि.ख. देखिये जिस तरह आप मुक्तिबोध की पॉलिटिक्स को समझते हैं वैसे ही आपको हमलोगों की भी पॉलिटिक्स समझनी पड़ेगी. अगर आप मुक्तिबोध को समझते हैं और हमलोग उनके आस-पास भी कहीं हैं, तभी आप हमें समझेंगे. अगर हमलोग बेईमान हैं तो आप समझ जायेंगे कि यह बेईमानी है. उसका कोई फ़ॉर्मूला नहीं हो सकता है. यह अजीब बात है कि मुक्तिबोध आपको खुद अपना जज होने के लिए प्रेरित करता है. वह फ़ॉर्मूला नहीं देता. वह कह रहा है कि तुम जज करो…मुझे भी जज करो. तो यह जो अपने प्रशंसकों को भी खुला छोड़ना, चुनाव के लिए, जजमेंट के लिए, यह बहुत बड़ी बात है. अच्छा पर यह ज़रूर कहूँगा कि जो आपने बात की न इंडिपेंडेंट लेफ्ट… तो ऐसा कोई मूवमेंट मुक्तिबोध ने नहीं चलाया, न हमलोग चला रहे हैं. हमलोग टोटली लेफ्ट हैं, ऐसा सोचते हैं. लेकिन बाकी जो अपने आप को लेफ्टिस्ट क्लेम करने वाले लोग हैं उनसे हम अलग हैं.

प्र. यहाँ हम इसी अंतर को थोड़ा और मूर्त तरीके से समझना चाह रहे हैं!

वि.ख. मुक्तिबोध एक तरीके से टोटल आर्टिस्ट था. टोटल आर्टिस्ट. वह यह नहीं देखता कि कौन सुनता है, क्या करता है. वह लिखता था और अपना पूरा लिखता था. इसी तरह आपको यह देखना पड़ेगा कि आज का कौन सा कवि है जो इंडिपेंडेंट लिख रहा है और मुक्तिबोध के वैल्यू से डिग के नहीं. हो सकता है कि हममें से कोई मुक्तिबोध से भी आगे जाय, सोच में. यह पॉसिबल है क्योंकि दुनिया बदल रही है और बदल रही है तो मुक्तिबोध को भी बदलना पड़ेगा. आज जहाँ मुक्तिबोध है, आज से बीस साल बाद मुक्तिबोध रह नहीं सकते. लेकिन कोई आदमी आएगा या कुछ लोग आयेंगे, कई आदमी आयेंगे जिनमें मुक्तिबोध दिखेगा आपको. पूजन के सेन्समें नहीं  , विचारधारा के सेन्स में, कमिटमेंट के सेन्स में, आप ऑलरेडी देखते हैं, और साफ़ है कि हमारे लोग मुक्तिबोध के हैं और कई लोग नहीं हैं. जो हमारे साथ नहीं है, मुक्तिबोध के साथ नहीं है, वे भी बुरे नहीं हैं. यह हम मानते हैं कि मुक्तिबोध के साथ रह कर आप कहीं ज्यादा सीखते हैं, कहीं ज्यादा बड़े होते हैं. हम मुक्तिबोध को छोड़ नहीं सकते अकेले क्योंकि वह हमें नहीं छोड़ता. वह हमारे पीछे पड़ा हुआ है. लगातार. क्योंकि मुक्तिबोध को समझना बाक़ी है. मुक्तिबोध को पूरा पढ़ा जाना बाक़ी है.

प्र. मुक्तिबोध की दो प्रचलित छवियों की बात करें तो एक ओर उनका शहीदी चित्र खींचा जाता है- असद ज़ैदी और कई अन्यों की स्मृति में मुक्तिबोध की शहादत की मुहर है, और दूसरी ओर उन्हें ब्रह्मराक्षस की सीमाओं में बाँधने की कोशिश की जाती है, ब्रह्मराक्षस की छवि गढ़ी जाती है. इन छवियों की आलोचना आप कैसे करते हैं?

वि.ख. देखिये इन दोनों छवियों को मैं सही नहीं मानता. कारण ये है कि मुक्तिबोध शहीद नहीं थे इस तरह से. मुक्तिबोध को शहीद मानकर केवल रफा-दफा किया जा सकता है. मुक्तिबोध की व्याख्या उनके टोटल वर्क पर होनी चाहिए. उनकी शहादत हमें भूलनी पड़ेगी. वरना हम उनके पूजक बन के रह जायेंगे. मुक्तिबोध हमारे पास एक बहुत बड़ी सम्पदा हैं. आज भगत सिंह को कौन मानता है? कोई नहीं मानता. भगत सिंह भगत सिंह बना दिए गए बस. शहीद-ए-आज़म बन गए. मुझे मुक्तिबोध को हिंदी कविता का या हिंदी साहित्य का शहीदे-आज़म नहीं बनाना है. वह जिंदा हैं. अपने वर्क में जिंदा हैं, हमारे जीवन में जिंदा हैं. क्योंकि वह हमारे जीवन के लिए यूजफुल है. आज भगत सिंह यूजफुल नहीं रहे. लेकिन मुक्तिबोध हमारे लिए क़दम-क़दम पर यूजफुल हैं. इसलिए मैं न शहीद और न ही उन्हें ब्रह्मराक्षस मानता हूँ. यह एक तरह से मुक्तिबोध को मिस्टीफाई करने की बात है, बिला वजह. मुक्तिबोध को ब्रह्मराक्षस मानना, उनको भाजपा की गोद में डाल देना है. मुक्तिबोध के साथ कुछ भी मिस्टिक नहीं किया जा सकता. वह मिस्टेरियस आदमी नहीं था. मिस्टिक नहीं था वह. वह तांत्रिक नहीं था. उसके पास सभी अलामतें थीं कि वह दुनिया देख रहा था. अब आप कहेंगे मुक्तिबोध खुद तांत्रिक हो गए थे, यह बेवकूफी है. मैं इन दोनों खेमों को मुक्तिबोध के लिए बहुत हानिकारक मानता हूँ, और मुक्तिबोध के लिए क्या, जो मुक्तिबोध को पढ़ते हैं उनके लिए. मुक्तिबोध पर हमले की कोशिश जो लोग कर रहे हैं, वह मैं समझता हूँ ब्रह्मराक्षस वाला खेमा है. अब दिक्कत क्या है कि बहुत सारे लोग हैं हिंदी कविता के वे मुक्तिबोध को बड़ा मानना नहीं चाहते अपने से. इन्हें लगता है कि अगर मुक्तिबोध ही मुक्तिबोध रहेगा तो हम कहाँ जायेंगे. मुझे लगता है कि असद ज़ैदी वगैरह लोगों में यही ग्रंथि है कि भाई हम भी कुछ हैं. कुछ हमारी बात भी बने. मुक्तिबोध क्या होता है! और कब तक रहोगे मुक्तिबोध के! मेरी बात तो यह है कि मैं मुक्तिबोध से आगे जाते हुए भी उनका गुलाम हूँ. यह सब कुछ उसी से सीखा है. उससे प्रेरित हुए हैं, तो कैसे कह दें कि भाई वह शहीद हो गया. शहीद हो गए? अरे वह जिंदा है. शहीद हुआ होगा तुम्हारे लिए. वह तो हिंदी के लिए भी शहीद नहीं हुआ. क्योंकि वह जिंदा रहना चाहता है भाई, काम करते हुए, तो उसको आप शहादत मत दीजिये. मेरा कहना यह है कि उन्हें कोई शहीद न माने और जो मानता है वह अपराधी है. मुक्तिबोध को शहीद मानना अपराध है. उसको मानो कि वह जिंदा है और हमारे बीच है. हम ज़िंदा हैं. मैं कहता हूँ कि मैं मुक्तिबोध हूँ, चलिए बहस कीजिये. हममें से जो भी फील करता है कि वह मुक्तिबोध का है- उसके अन्दर मुक्तिबोध बैठा है. यह बात है.

प्र. मुक्तिबोध की रचना-प्रक्रिया की विशिष्टता आखिर क्या थी या किस तरीके से वह प्रैक्टिस, वह विश्वदृष्टि हम तक अबाधित चली आ रही है?

वि.ख. मुक्तिबोध एक्चुअली एक विश्वचेता कवि थे. उनको सिर्फ भारतीय कवि मानना बड़ा गलत है. ‘बाचीज़ा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मिरे आगे’. वह तमाशे की बात नहीं करता था. वह अकेला कवि है कबीर के बाद. कबीर ब्रह्मांडीय कवि हैं. मैंने कहा भी है कि कबीर का जो करघा है, माने जुलाहे का जो करघा है एक पूरी कायनात है. तो एक ओर कबीर का जुलाहापन और उसका करघा और फिर उसके बाद मुक्तिबोध का इन्टलेक्ट, वामपंथी इन्टलेक्ट. वामपंथी आदमी पूरी कायनात को इकठ्ठा देखेगा ही. वह अभिशप्त है. वह बिना दुनिया का जायज़ा लिए बल्कि कहिये कि बिना कॉसमॉस का जायज़ा लिए हो ही नहीं सकता.

प्र. कबीर के बाद मुक्तिबोध- अर्थात जिसे आरंभिक आधुनिक काल कहा जाता है वहाँ एक जुलाहे की, दस्तकार की, आर्टीजन कवि की विश्वदृष्टि और उनकी साधना के बाद मुक्तिबोध!

वि.ख. मैं आपसे कह रहा हूँ कि उस ज़माने की सबसे बड़ी टेक्नोलोजी करघा थी, करघे से बड़ी कोई टेक्नोलोजी थी नहीं पूरे विश्व में. कबीर उसका एक्सपर्ट है. वह समझता है सब चीज़.

प्र. लेकिन कबीर की आर्टीजनशिप की दुनिया और मुक्तिबोध की औद्योगिक सभ्यता की दुनिया में जो लीप है, ब्रह्मांडीय दृष्टि में जो यह लीप है, उसी संदर्भ में कि एक श्रमिक-कवि या कवि-कामगार जो अपने चारों ओर की दुनिया में सक्रिय है और इस वक़्त की ‘टेक्नोलोजी’ के सहारे जेनेरिक मनुष्यता की आत्मा को बनाने में लगा है- कॉसमॉस के भीतर, वैसी स्थिति में एक कवि-कामगार की राजनीति को रचनाप्रक्रिया में कैसे स्पष्ट करेंगे?

(यहाँ हमारी बात-चीत रुक जाती है. विष्णु-खरे का कोई पुराना मित्र उनसे मिलने आ चुके थे. आज जब कि खरे हमारे बीच नहीं है इसलिए इस बात-चीत को इसी रूप में आगे जारी रखना संभव नहीं है.)

मार्तण्ड प्रगल्भ

 

छात्र राजनीति और संस्कृति-कर्म में व्यस्त रहने वाले मार्तण्ड प्रगल्भ जे.एन.यू. के भारतीय भाषा केंद्र से पी.एच.डी. हैं. फ़िलहाल  रेडिकल नोट्स कलेक्टिव  के साथ कार्यरत हैं. उनसे mpragalbha1@gmail.com पर संपर्क संभव है            

राजकमल चौधरी, और ज्याँ जेने की आतंरिक समीपता: सुरेंद्र चौधरी

सुरेंद्र चौधरी और राजकमल चौधरी गया कॉलेज, गया के दिनों से दोस्त थे. राजकमल की मृत्यु के तत्क्षण बाद मुक्ति-प्रसंग की समीक्षा लिखने के अतिरिक्त बहुत दिनों तक सुरेंद्र चौधरी ने उनपर लगभग नहीं लिखा. अपनी दुविधा को अपनी एक अप्रकाशित पुस्तक में वे कुछ ऐसे स्पष्ट करते हैं, ” मैंने राजकमल की कहानियों पर अब तक कुछ नहीं लिखा. मेरे मन में उस दोस्त लेखक के लिए एक संशय सदा बना रहा . क्या मैं इस आदमी के द्वारा उसके लेखन को जान सकता हूँ? क्या वह किसी भी अर्थ में पूर्ण होगा? उसके लेखन और समय से काफी दूर आकर मैं अपनी जिज्ञासा दुहरा भर सकता हूँ! मेरा ख्याल है कि वह अपने कथा-साहित्य के लिए याद किया जाय या न किया जाय  मगर मुक्ति-प्रसंग के लिए याद किया जाएगा.”

जहाँ तक मेरी जानकारी है, सुरेंद्र चौधरी ने राजकमल चौधरी की कृति-केन्द्रित एक ही लेख/समीक्षा लिखी है- मुक्ति-प्रसंग: एक और देह गाथा. इसके अतिरिक्त सुरेंद्र चौधरी के आलोचकीय-वृत्त में राजकमल चौधरी अक्सरहां नजर आते हैं. मुक्ति-प्रसंग की समीक्षा के अतिरिक्त अन्य प्रसंगों से दो उद्धरण यहाँ द्रष्टव्य हैं. #उदय शंकर

भावना से परिचालित होने वाले व्यक्ति का वेग तो समझा जा सकता है मगर उसकी को समझना बड़ा कठिन काम है, क्योंकि यह गति दिशा-निरपेक्ष होती है. समकालीन कवियों के एक अच्छे बड़े समूह की दिशाहीनता इसी वेग का परिणाम है. इस भावनात्मक वेग के काव्यात्मक उपकरणों को पहचानना बहुत मुश्किल काम नहीं है. आत्मोद्रेक की काव्य-शैली इसी भावनात्मक वेग से बनती है. उसकी नाटकीयता में आत्मसाक्षात्कार के घनीभूत क्षण बिरले ही होते हैं. राजकमल की आत्मोद्रेकपूर्ण काव्य-शैली के नकलची शायद ही उन घनीभूत क्षणों को पा सकेंगे जिसमें राजकमल का कवि अपने अनुभवों के सम्मुख अकेला था. फिर आत्मोद्रेक की यह काव्य-शैली वेग में जिस स्वाभाविक ढंग से अपने को तोड़ लेती है, आत्मक्षय करती है उसे दूसरे कहाँ से पाएँगे. वे बंदिशों को तोड़कर भी यह स्वाभाविक आत्म-विभाजन पैदा नहीं कर सकेंगे. राजकमल के लिए आत्मोद्रेक काव्य की शैली नहीं है, अनुभव का बंध (Mode of experience) है.

‘मुक्ति-प्रसंग’ में दो स्तरों पर काव्य-भाषा के अलग-अलग रूप मिलते हैं. उसका तंत्र अलग है. उनका व्यावहारिक रूप एक दूसरे से भिन्न है. यह द्विरूपता राजकमल की कविता में विशेष मानसिक तनाव के भीतर की अनिवार्यता अनिवार्यता है जो कि कविता में नहीं थी. ‘मुक्ति-प्रसंग’ में जहाँ एक ओर उपचार्हीं सीधी साहित्यिक संस्कार वाली बोलचाल की भाषा है, दूसरी ओर वही तंत्र के सिद्धपीठ की भाषा भी है, उसी क्षेत्र के रूपक हैं, काव्य-प्रकरण (allusions) हैं. मैं इस विशेष मनःस्थिति के भीतर के उपचारों की चर्चा एक विशेष कारण से कर रहा हूँ. इसी भीतरी-सन्दर्भ की कृच्छता चाहे जितनी संदेहजनक लगे, मगर आज की मानसिक परिस्थिति में यह असम्भाव्य नहीं है. आत्मीयता राजकमल की काव्य भाषा में, सीधी-सादी तेवर वाली भाषा भी है, मुहावरे समकालीन जीवन के पूरे विस्तार से चुने गए हैं.

 

mukti-prasang

मुक्ति-प्रसंग: एक और देह गाथा

By सुरेंद्र चौधरी

ज्याँ जेने पर सार्त्र ने अपनी पुस्तक के मार्फ़त लोगों को चौंकाया था, यों पुस्तक चौंकाने के लिए नहीं लिखी गयी थी जितनी एक विशिष्ट उद्देश्य से, अस्तित्वादी मनोविश्लेषण को उदाहृत-व्यवस्थित करने के लिए लिखी गयी थी. मुक्ति-प्रसंग में अज्ञेय का एक पत्रांश उद्धृत किया गया है और इसका कोई सम्बन्ध इस पुस्तक से नहीं है-कवि से उसके सम्बन्ध की बाबत मैं यहाँ नहीं कह रहा- इसलिए उसे हम चौंकाने, परिभाषित करने या बहलाने वाला वक्तव्य नहीं मान सकते. क्या अज्ञेय जी का यह कथन कि ‘मृत्यु का स्वीकार, मैं मानता हूँ, आत्मा की या यह न पसंद हो तो कहूँ कि चेतना की एक गहरी आवश्यकता है; और उस स्वीकार में एक तरह की स्वस्थता भी मिलती है,’ ‘मुक्ति-प्रसंग’ की रचना का वैचारिक आधार बन सका है? क्या राजकमल चौधरी की प्रस्तुत रचना के सन्दर्भ में उसकी कोई अनिवार्यता है? क्या हम ‘मुक्ति-प्रसंग’ की वस्तु से उसका कोई आत्मिक सम्बन्ध जोड़ सकते हैं?

‘मुक्ति-प्रसंग’ नाम से जैसा कि कुछ दिनों पूर्व तक प्रपद्यवादी मानते रहे हैं, इसकी सार्थकता प्रमाणित हो पाती है कि किन्तु नामों का भ्रम अक्सर व्यवहार में हुआ करता है. तत्काल हम नाम-माहात्म्य पर न जाएँ. चूँकि मृत्यु पूरी कविता की मनःस्थिति को परिभाषित करती है और उसके मानसिक सन्दर्भ में व्याप्त है, इसलिए मृत्यु की वास्तविकता पर बहस नहीं की जा सकती. किन्तु मृत्यु की प्रत्यक्षता से इनकार नहीं कर सकते. यह कहना भी झटके से संभव नहीं है कि ‘मुक्ति-प्रसंग’ में न तो मृत्यु को स्वीकार करने की क्षमता स्पष्ट हो पाती है और न उसे स्वीकार के साथ अलग कर देने की. हाँ, तत्काल ऐसा जरुर लगता है कि मृत्यु के केन्द्रीय मूड में एक ‘ओनानिस्टिक’ ऐन्द्रजालिक श्रृंखला है जो हमें अतिक्रांत करती है- कभी इस आत्मविगलन से हम खीजते हैं, कभी उसकी गहराईयों में झाँकने को विवश होते हैं. कभी-कभी ऐसा भी लगता है कि मृत्यु को स्वीकारने की अपेक्षा जीवन को नकारने में कवि अधिक सक्षम है. क्या राजकमल का देवता ‘मुक्ति’ नहीं है, नकारत्मक स्वतंत्रता, ‘पॉइंटलेस फ्रीडम’ है?  क्या राजकमल मृत्यु के वास्तविक सन्दर्भ में भी अपने पाताल लोक की संवेदना से मुक्त नहीं हो सका?

मृत्यु को स्वीकार कर उसे अलग कर देने की बात अज्ञेय जी ने जिस ‘हाइडेगेरियन’ स्तर से कही थी, लगता है राजकमल उसे ‘मिस’ कर गया. आत्मविषाक्त और आत्मविगलित अल्पनाएँ पूरी कविता के रूप पर इस तरह हावी हो गईं हैं कि मालूम पड़ता है जैसे उनके बीच अच्छी पंक्तियाँ, अच्छे टुकड़े अथवा कोई सशक्त मानस-प्रवाह दब कर रह गया. बहुत हद तक डॉ. माचवे के इस मंतव्य से सहमत हुआ जा सकता है कि कविता का निष्कर्ष न तो अज्ञेय जी की धारणाओं से संभव हो पाया और न कवि के अपने नकारात्मक वेग से ही. कुछ अनिश्चयात्मक स्थिति बनी रह जाती है. यह अनिश्चय मुक्ति और वरण दोनों के लिए नकारात्मक सिद्ध हो सकता है. फलतः राजकमल मुक्ति के रूप में अपने लिए जो मांग रखता है वह निरर्थक है, एक लम्बे और भावनात्मक काव्य-कर्म की यह निरर्थकता क्या बहुतों के लिए दुःखद नहीं होती?

अपने लिए व्यक्तिगत विश्वासों की एक दुनिया गढ़ लेना और उसमें रहते हुए वास्तविकता को पूरे आत्मवेग के साथ नकारते चलना जितना आसान है, मृत्यु के सन्दर्भ में उसका दबाव झेलना उतना ही मुश्किल. इतना ही नहीं, ज्यां जेने की तरह ही राजकमल भी जब विश्वासों की एक दुनिया गढ़ने के साथ अपने लिए कुछ ‘रिचुअल्स’ भी गढ़ने लगता है, तब समीक्षक के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि वह इन क्रियाओं की आत्मिकता को केवल खारिज करने की उतावली न करे. जैन-धर्म-मन्त्रों के साथ गिन्सबर्ग तो आए हैं किंतु जेने नहीं आया, मगर क्या आंतरिक रूप से राजकमल जेने के समीप नहीं है? इसे कुछ लोग दूर की कौड़ी समझ सकते हैं.

राजकमल अपने लिए जिस दुनिया की मांग करता है उसकी कोई व्यवस्थित तस्वीर या नैतिक अनिवार्यता भी उसके दिमाग में है या वह केवल नकारना जानता है? पुस्तक की अंतिम कुछ पंक्तियों का स्वर ‘ऐम्वीवैलेन्ट’ है. वैसे विद्रोह इतना नकारत्मक नहीं होता, और फिर मुक्ति-प्रसंग विद्रोह की कविता कहाँ है? वह तो अनुभव के एक नितांत आतंरिक स्तर पर मृत्यु को स्वीकार कर जाने का दर्शन है! स्पष्ट है कि अज्ञेय का मंतव्य राजकमल की चेतना में प्रवेश करने से रह गया है, शायद उसकी दुनिया में यह मंतव्य है ही नहीं! जब वह कहता है कि ‘ मैं इस शव के गर्भ में हूँ और यह शव मेरे कन्धों पर है’, तब ऐसा लगता है कि अज्ञेय जी के शब्द उसकी चेतना पर ‘फलैट’ पड़ रहे हैं!

नकार के इस अबाध वेग के बावजूद इस प्रसंग में एक आर्द्र करने वाली आन्तरिकता है. यह आन्तरिकता कैसे परिभाषित होती है? क्या राजकमल के विश्वासों में? उसके पास विशवास नहीं है! वरण में? वरण की आत्मक्षमता भी उसमें वैसी उत्कट नहीं है! फिर? इस आन्तरिकता को न तो उसके नकार के दर्शन से परिभाषित किया जा सकता है और न ही उसकी स्वीकारात्मक शाब्दिक भूमिकाओं से ही. यह अनिवार्यता बनती है वस्तुतः जीने की उसकी लालसा से, इसी से वह परिभाषित भी होती है. जिजीविषा और मुमुक्षा तो राजकम के लिए केवल पारिभाषिक शब्द हैं!

मृत्यु की भयावहता का गहराता हुआ रंग पूरी कविता पर तो नहीं, मगर उसके कुछ अंशों पर तो इतना है कि केवल उन अंशों से जीवन के प्रति उसकी निर्लसता का वक्तव्य खंडित हो जाता है. ‘एनेस्थेशिया’ के प्रभाव की तरह यह रंग नीला है, मृत्यु का रंग, कूलक्षय करती हुयी नदी का रंग, असीम आकाश का रंग, अपूर्ण, अपनी कामनाओं से विवश स्त्री का रंग! आत्म-स्वीकृतियों में जरुर इमानदारी और सच्चाई है जो कवि को उनके प्रति मुक्त करती हुई मालूम पड़ती है. मसलन,

नदी के किनारे वापस चले आना, तुम्हारी नियति है,

हर बार प्रत्यागमन

वह आदि वर्ण वह नीलापन

तुम कभी नहीं पाओगे अपराजित कभी.

या…

 

सबके लिये सबके हित में

अस्पताल चला गया राजकमल चौधरी

लिखने-पढ़ने, गाँजा-अफ़ीम-सिगरेट पीने

मरने का अपना एकमात्र कमरा अंदर से बन्द करके

दोपहर दिन के पसीने, पेशाब, वीर्यपात

मटमैले अँधेरे में लेटे हुये

धुँआ, क्रोध, दुर्गंधियाँ पीते रहने के सिवा

जिसने कोई बड़ा काम नहीं किया

अपनी देह

अथवा अपनी चेतना में

इस उम्र तक.

यह आत्म-विवृति कभी आंतरिक अनुभव के स्तर पर गहरे अवसादक प्रभाव उत्पन्न करती है. जैसे इन पंक्तियों में:

जटिल हुए, किन्तु

कोई भी प्रतिमा बनाने योग्य नहीं हुए

उसके अनुभव!

अपने आन्तरिक और निकटतम देश में घूमता हुआ यह व्यक्ति कभी-कभी गहरी आत्मलीनता में गहरे मानवीय अर्थों के प्रति अवाचक सचेत हो गया-सा मालूम पड़ने लगता है. यों उसे अपनी व्यर्थता का पूरा-पूरा बोध है और उस व्यवस्था का भी, जिसने उसे इतना व्यर्थ बना दिया है! इस गहरे आत्मबोध से कवि से स्वर में निजता के साथ वास्तविक गहराई आ जाती है.

नहीं करूँगा औरों के अपराध

मेरे वकील और मेरे न्यायाधीश यहाँ नहीं

उस सफ़ेद ठण्ड कमरे में प्रतीक्षारत हैं मेरे लिए

यहाँ नहीं बोलूँगा

सफाई के वकील, अभी मैं चुप हूँ.

और अभी मैं चिंताग्रस्त हूँ.

इस चिंताग्रस्त मानस के कई मानसिक आयाम हो सकते हैं, वस्तुतः हैं. राजकमल खुद भी एक खुली पुस्तक है, इतिहास-पुरुष चाहे वह न भी हो. इस अर्थ में मुक्ति-प्रसंग का कवि पारदर्शी है, इसे उसकी कविताओं से भी जाना जा सकता है. गहरी होती मृत्यु-छायाओं के बीच भी राजकमल पारदर्शी है, रहस्य के रंग भरना उसे नहीं आता.

राजकमल की आन्तरिक्ता को इन थोड़े-से उदाहरणों से मैंने परिभाषित नहीं किया, वस्तुतः वह परिभाषा की चीज भी नहीं है. मगर हिंदी कविता के समकालीन स्वरुप से वह इस अर्थ में भिन्न है कि उसका त्रास, अकेलापन, मृत्यु से साक्षात्कार और इन सब मनःस्थितियों में जूझता हुआ कवि-मानस ‘फ़ेक’ नहीं है. इसी वास्तविकता ने मुक्ति-प्रसंग को दर्शन की रिक्तता की सीमाओं के बावजूद पठनीय बना दिया है.

***

सर्व-प्रथम, आलोचना, १९६७ के किसी अंक में प्रकाशित. फिर, उदयशंकर द्वारा संपादित सुरेंद्र चौधरी के प्रकाशित लेखों के संकलन के तीसरे भाग, ‘साधारण की प्रतिज्ञा: अँधेरे से साक्षात्कार’ में पुनर्प्रकाशित.

 

‘चांद’, ‘माधुरी’ और हिंदी नवजागरण : अविनाश मिश्र

अपने लेखकीय कर्म की प्रतिबद्धता, मूल्यनिष्ठता और व्यापकता के लिए प्रसिद्ध प्रियंवद का नया काम एक ऐसे वक्त में हमारे सामने आया है जब समता के संघर्ष कमजोर पड़ रहे हैं, न्याय की राह और मुक्ति की इच्छा नए सिरे से दमन के बीच है, राजनीति और पत्रकारिता पतनशीलता के शीर्ष पर हैं और हिंदी की साहित्यिक मेधा की ऊंचाई नापने के लिए ‘दैनिक जागरण’ की मदद ली जा रही है। इस स्थिति में प्रियंवद के संपादन में हिंदी नवजागरण काल (1929 ई. से 1933 ई. तक) की दो प्रमुख पत्रिकाओं — ‘चांद’ और ‘माधुरी’ — से रचना-चयन के सात खंडों का प्रकाशन एक महत्वशाली और प्रासंगिक घटना है। एक बेहद अश्लील सांस्कृतिक शोर और प्राचीनता-प्रेम के दरमियान, बहुत पीछे जाए बगैर यह प्रकाशन यह जानने का अवसर है कि कभी हमारी संस्कृति कैसी थी, हमारी बनावट कैसी थी, हमारे घर कैसे थे, हमारी प्राथमिकताएं और आवश्कताएं कैसी थीं, हमारा रहन-सहन और अन्न कैसा था, हमारी शिक्षा-दीक्षा, हमारी किताबें और पोशाक कैसी थी, हमारे नाटक, हमारी नाटक-मंडलियां और फिल्में कैसी थीं, हमारी पत्रकारिता कैसी थी, अभिव्यक्ति और विचारों की स्वतंत्रता और मूल मानवीय अधिकारों के लिए हमारा कभी न खत्म होने वाला संघर्ष कैसा था। # लेखक 

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तस्वीर सौजन्य: उदय शंकर

सारे सवालों की रोशनी में अंधेरा नजर आया

(‘चांद’ और ‘माधुरी’ चयन के सात खंडों के प्रकाश में एक प्रतिक्रिया और एक प्रसंग)   

 BY अविनाश मिश्र  

मैथिलीशरण गुप्त की ‘आर्य’ शीर्षक कविता की प्रारंभिक पंक्तियां — हम कौन थे, क्या हो गए हैं और क्या होंगे अभी / आओ विचारें आज मिल कर ये समस्याएं सभी — अपनी बहुउद्देशीयता की वजह से कभी पुरानी पड़ती नजर नहीं आती हैं। हमारी समस्याएं बढ़ती-बदलती रहती हैं और यह विचार करने की सामर्थ्य भी कि हम कौन थे, क्या हो गए हैं और क्या होंगे अभी…

‘चांद’ चयन के संपादकीय खंड में राष्ट्रीय शिक्षा पर रामरखसिंह सहगल के किस्तवार संपादकीय शिक्षा में स्त्रियों और दलितों की स्थिति, उसमें व्याप्त वर्ण-व्यवस्था का पक्ष, और उसके जरिए सत्ता के प्रतिकार की तत्कालीन परंपरा बयान करते हैं। मौजूदा राजसत्ता इस वक्त जो हमारे विश्वविद्यालयों और विद्यार्थियों के साथ कर रही है, इसकी जांच के लिए ये संपादकीय एक आधार सरीखे हैं। आधुनिक शिक्षा-प्रणाली के संदर्भ में रामरखसिंह सहगल मेकॉले को उद्धृत करते हैं, ‘‘हमें भारत में ऐसे मनुष्यों की एक श्रेणी पैदा कर देने का शक्ति-भर प्रयत्न करना चाहिए, जो हमारे और उन करोड़ों भारतवासियों के बीच, जिन पर हम शासन करते हैं, दुभाषिए का काम करे। इन लोगों को ऐसा होना चाहिए कि ये केवल रंग और रक्त की दृष्टि से भारतवासी हों, किंतु रुचि, विचार, भाषा और भावों की दृष्टि से अंग्रेज हों।’’ [खंड : 1, पृष्ठ : 93]

‘चांद’ चयन के संपादकीय खंड को पढ़कर बहुत सहज ही इस बात की प्रतीति होती है कि अपने उन बहुत सारे राष्ट्र-निर्माताओं को जो भारतीय मानस को सहेजने-गढ़ने के लिए सचेष्ट रहे, हम कब का भुला चुके हैं। कुछ नाम इस चयन के पन्नों पर जब खुलते हैं, तब यह नजर आता है कि स्वतंत्रता से पूर्व सामाजिक-सुधार के सुदीर्घ संघर्ष में लगे रहे इन नामों का अब कोई नामलेवा नहीं है। हरविलास जी शारदा एक ऐसा ही नाम हैं और सरलादेवी चौधरानी भी। शारदा सामाजिक और राजनीतिक सुधारों में एक गंभीर पारस्परिक संबंध देखते थे। उनके अनुसार एक की ओर ध्यान न देने से दूसरे को गहरा आघात पहुंचता है। सामाजिक और राजनीतिक सुधार साथ-साथ हों, वह इस बात के हामी थे। बाल-विवाह संबंधी लड़ाई, अछूतोद्धार और स्त्री-समानता के लिए हरविलास जी शारदा के यत्न कितने अविस्मरणीय हैं, इसकी सूचना ‘चांद’ के संपादकीय पढ़कर मिलती है।

‘स्त्रियों के जन्मसिद्ध अधिकार’ शीर्षक संपादकीय में धनीराम प्रेम लिखते हैं, ‘‘श्रीमती सरलादेवी चौधरानी भारत की उन थोड़ी-सी महिलाओं में से हैं, जिन्होंने राजनीतिक तथा सामाजिक क्षेत्र में बहुत-कुछ कार्य किया है। उनकी सेवाएं पुरानी हैं और उनका अनुभव बहुत प्रौढ़। वह जो कुछ कहती हैं, वह सारगर्भित तथा गवेषणापूर्ण होता है और उसमें मनन करने योग्य पर्याप्त सामग्री रहती है। अभी हाल ही में उन्होंने ‘बंगाल महिला कांग्रेस’ की सभानेत्री की हैसियत से जो भाषण दिया है, वह बड़ा महत्वपूर्ण है। उस भाषण में भारतवर्ष के सामने तथा भारतवर्ष के द्वारा संसार के सामने उन्होंने बड़े स्पष्ट तथा जोरदार शब्दों में स्त्रियों के जन्मसिद्ध अधिकारों की मांग पेश की है।’’ [खंड : 1, पृष्ठ : 185-186]

सरलादेवी की मांगों में हर आयु और वर्ग की स्त्री के लिए जिन अधिकारों की चर्चा की गई, वे स्त्री को एक नागरिक की तरह देखने की बुनियादी कार्य-योजना को प्रस्तावित करते हैं। सरलादेवी की आवाज तत्युगीन स्त्री-स्थिति को पूर्णतः परिवर्तित करने के पक्ष में थी। इसमें स्त्री-मुक्ति की आकांक्षा का वजन था।

इसके अतिरिक्त ‘मिथिला’ (बहुविवाह की जातिवादी कुप्रथा के संदर्भ में), ‘हिंदू-समाज और तलाक’, ‘ऑर्डिनेंस-युग’, ‘हमारी धार्मिक समस्याएं’, ‘दर्द की तस्वीरें’, ‘वर्तमान राजपूताना’, ‘वे और हम’, ‘हिंदू-समाज और जातिभेद’, ‘हिंदुओं में संयुक्त-कुटुंब-प्रथा’, ‘सामाजिक-क्रांति’, ‘भारतीय स्त्री-समाज’, ‘संसार-संकट’, ‘विश्वव्यापी अर्थ-संकट’, ‘स्वदेशी’, ‘भारत में बेकारी’ ये शीर्षक ही ‘चांद’ के संपादकीयों के — जो रामरखसिंह सहगल, शुकदेव राय, त्रिवेणी प्रसाद, भुवनेश्वर प्रसाद मिश्र ‘माधव’, लक्ष्मीदेवी, धनीराम प्रेम, मथुरा लाल शर्मा, नवजादिकलाल श्रीवास्तव द्वारा लिखे गए — सरोकार और दृष्टि की व्यापकता को बताने के लिए पर्याप्त हैं।

इस पर्याप्तता का प्रभाव समझने के लिए ‘चांद’ और ‘माधुरी’ के चयन-खंडों के संयुक्त प्राक्कथन में व्यक्त प्रियंवद के शब्द उल्लेखनीय हैं, ‘‘1929 में बाल-विवाह के विरोध में ‘शारदा एक्ट’ पारित हुआ और 1929 में ही स्त्रियों की कुछ श्रेणियों को पैतृक संपत्ति में अधिकार मिला। स्त्रियां अब जहाज उड़ा रही थीं, विश्वविद्यालयों में डिग्रियां ले रही थीं, खिलाड़ी बन रही थीं, तैरने की पोशाक पहनकर पानी में छलांगें लगा रही थीं। वे जेल जा रही थीं, शराब की दुकानों पर पिकेटिंग कर रही थीं, सिनेमा के परदे पर निस्संकोच काम कर रही थीं।’’ [खंड : 1, पृष्ठ : 12]

‘चांद’ और ‘माधुरी’ के अंकों से चयनित कहानियों के खंड क्रमशः दो और छह की कहानियां पढ़कर आधुनिक हिंदी कहानी के बनने की प्रक्रिया समझी जा सकती है। नवजागरणकालीनता की वजह से जागरण, गर्व और सुधार इन कहानियों का केंद्रीय पहलू है। ‘चांद’ कहानी खंड में चतुरसेन शास्त्री, विश्वम्भरनाथ शर्मा ‘कौशिक’, जनार्दनप्रसाद झा ‘द्विज’, ‘मुक्त’, धनीराम ‘प्रेम’, ‘रतन’, अनूपलाल मंडल, विष्णुदत्त शर्मा, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, ब्रह्मस्वरूप गुप्त, अंतर्वेदी, टॉल्स्टॉय, गौतमचंद्र त्रिवेदी ‘नीरस’, नर्मदाप्रसाद खरे, पृथ्वीनाथ शर्मा, प्रेमचंद, जीवानंद वात्सायन, जहूरबख्श, रणवीरसिंह ‘वीर’, ललितकिशोरसिंह की कहानियां हैं और ‘माधुरी’ कहानी खंड में केशवदेव शर्मा, के.पी., सुदर्शन, प्रेमचंद, खड्गजीत मिश्र, प्रयाग दास भार्गव, भगवती प्रसाद वाजपेयी, रामेश्वरप्रसाद श्रीवास्तव, चंद्रगुप्त विद्यालंकार, इलाचंद्र जोशी, कालिका प्रसाद चतुर्वेदी, प्रफुल्लचंद्र ओझा, शंभुदयाल सकसेना, मुंशी अलीअब्बास हुसैनी, अवध उपाध्याय, सोमदत्त विद्यालंकार, केदारनाथ अग्रवाल, कन्हैयालाल की कहानियां हैं।

‘चांद’ के लेख, आलोचना एवं पुस्तक परिचय खंड (3) और ‘माधुरी’ के संपादकीय, आलोचना एवं पुस्तक परिचय खंड (4) में भी एक सशक्त स्त्री-पक्ष व्यक्त हुआ है। संसारप्रसिद्ध स्त्रियों की तुलना में भारतीय स्त्री और उसकी सामाजिक स्थिति, गर्भ-निरोध और स्त्रियों के जेल-जीवन पर ‘चांद’ के अंकों में प्रकाशित लेख सटीक अर्थों में एक बड़े सामाजिक सुधार का प्रस्ताव करते प्रतीत होते हैं। ‘चांद’ और ‘माधुरी’ में आलोचना एवं पुस्तक परिचय खंड के अंतर्गत हिंदी किताबों की एक ऐसी दुनिया नुमायां होती है जो अब धूसरित हो चुकी है। अब न इन किताबों का कहीं पता है, न इनके लेखकों, आलोचकों, अनुवादकों और प्रकाशकों का… ये भारत के लगभग सब कोनों में थे और यह होना इस बात की तस्दीक है कि पुस्तक-प्रकाशन तब किसी महानगरीय केंद्रीयता से ग्रस्त नहीं था। इन किताबों के विषय इनके लिए आवश्यक श्रम और दृष्टि की विविधता का आप प्रमाण हैं। ‘काउंट टालस्टाय के उपन्यासों का अनुवाद’ शीर्षक माधुरी में प्रकाशित संपादकीय टिप्पणी बताती है, ‘‘संसार की कोई ऐसी प्रसिद्ध भाषा नहीं, जिसमें टालस्टाय की रचनाओं के सुंदर अनुवाद न हों। हिंदी में भी उनकी कुछ कहानियों और दो-एक नाटकों का अनुवाद हो चुका है, पर उनके बड़े-बड़े उपन्यासों का, जिन्होंने संसार-साहित्य में एक नए युग की सृष्टि कर दी है, अभी तक अनुवाद नहीं हुआ। उनके तीन बड़े उपन्यास उच्चकोटि के हैं— ‘एनी करेनिना’, ‘रिजरेक्रेशन’ और ‘वार एंड पीस’। जिन लोगों ने इन साहित्य-रत्नों को पढ़ा है, वे जानते हैं कि इस जोड़ के उपन्यास संसार में अधिक नहीं हैं— उनके नाम उंगलियों पर गिने जा सकते हैं। इन उपन्यासों से वंचित होकर कोई भी भाषा गर्व से सिर ऊंचा नहीं कर सकती। …इसलिए यह लिखते हुए हम एक गौरव-युक्त हर्ष का अनुभव कर रहे हैं कि इन तीनों पुस्तकों के अनुवाद हिंदी में हो गए हैं, और इसका श्रेय हमारे मित्र श्री रुद्रनारायणजी अग्रवाल को प्राप्त है। लगभग तीन हजार पृष्ठों का अनुवाद करना कोई आसान काम न था, पर आप टालस्टाय के परम भक्त हैं, और भक्ति ही वह वस्तु है, जो पहाड़ों पर कुएं खोदती है, कंदराओं में चित्र बनाती है और शैलश्रृंगों पर मंदिरों का निर्माण करती है।’’ [खंड : 4, पृष्ठ : 29]

सोवियत संघ-विघटन से पूर्व मास्‍को के प्रमुख प्रकाशन गृह प्रगति एवं रादुगा प्रकाशन और भारतीय पीपुल पब्लिशिंग हाउस से आए मदन लाल मधु (‘आन्ना कारेनिना’ और ‘वार एंड पीस’ के अनुवादक) और भीष्म साहनी (‘रिस्रेक्शन’ के अनुवादक) के रूस में क्रमशः रोजगार और प्रवास के दौरान किए गए अनुवादों के लगभग चार दशक पूर्व किए गए रुद्रनारायणजी अग्रवाल कृत तोल्स्तोय के उपन्यासों के अनुवाद क्या हुए, यह प्रश्न यहां विचारणीय है।

‘चांद’ और ‘माधुरी’ से चयन के इन खंडों में कविताओं का चयन नहीं किया गया है। विविध व परिशिष्ट खंड (7) में ‘माधुरी’ के जनवरी-1931 अंक से ‘मारवाड़ के कुछ दोहे’ (रामनरेश त्रिपाठी) जरूर शामिल हैं। इस चयन में कविताओं से दूरी बरतने के प्रियंवद ने दो कारण बताए हैं, ‘‘पहला यह, कि कविताओं में या तो अत्यंत भावुकता भरी, छायावादी, रूमानी भाषायी बाजीगरी थी या फिर स्थूल राष्ट्रवादी उच्छवास या फिर प्राचीन परंपरा में लिखे सवैये, मुक्तक आदि। यद्यपि कवियों में कुछ नाम महत्वपूर्ण थे, जैसे कि महादेवी वर्मा, रामकुमार वर्मा (इनकी कविताएं सबसे अधिक थीं) सोहनलाल द्विवेदी, जगन्नाथ दास रत्नाकर, अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ व कुछ अन्य भी। पर ये कविताएं किसी भी मानक से हमारे चयन के उद्देश्य के पास नहीं पहुंचती थीं। संभव है ये उस समय लोकप्रिय हों, पर ये अपने समय का मुख्य स्वर नहीं थीं। ‘केसर की क्यारी’ ‘चांद’ का एक ऐसा ही स्तंभ था जिसमें उर्दू शाइरी का प्रतिनिधित्व था। पर वह भी बहुत कमजोर था। उर्दू शाइरी इसके पहले ही बहुत ऊंचे मेयार तय कर चुकी थी। इसके अलावा इसमें कुछ भी तत्कालीन मनुष्य से नहीं जुड़ता था।’’ [खंड : 1, पृष्ठ : 15]

प्रो. राजकुमार अपने एक लेख में भारतेंदु युगीन हिंदी नवजागरण में कथित उर्दू परंपरा में लिखे गए साहित्य की चर्चा के सिरे से गायब होने की समस्या को प्रश्नांकित करते हैं। लेकिन ‘चांद’ और ‘माधुरी’ से ये चयन-खंड इस बात का प्रमाण हैं कि यह समस्या द्विवेदी युग में भी कायम रही आई। यहां राजकुमार का यह कथ्य ध्यान देने योग्य है, ‘‘उर्दू को आप हिंदी की शैली मानें या उसकी परिकल्पना को ही अस्वीकार करें, लेकिन सच्चाई है कि हिंदी के नए चाल में ढलने से पहले उर्दू में साहित्य लिखने का सिलसिला शुरू हो चुका था। इसलिए फारसी लिपि या उर्दू में  फारसी-अरबी के शब्दों को जबरदस्ती ठूंसने की आलोचना करने के बावजूद हिंदी जाति के नवजागरण की चर्चा से उर्दू में लिखे गए साहित्य को आप बाहर नहीं कर सकते। ऐसा करने से उसकी सांप्रदायिक परिणिति की संभावनाएं बढ़ जाती हैं और अंततः वही हुआ भी। मुख्य बात यह है हिंदी क्षेत्र की व्यापकता और भाषायी जटिलता के कारण यहां ऐसी स्थितियां उत्पन्न हुईं कि तेलुगू, बांग्ला या मराठी की तरह हिंदी का कोई एक रूप सुनिश्चित करना और बाकी रूपों को बाहर कर देना सभी को स्वीकार्य निर्णय नहीं बन पाया। फारसी और फिर उर्दू की परंपरा के विकास के कारण हिंदी के ही कई रजिस्टर बन गए। कई बार तो एक ही समय में अलग-अलग परंपरा से जुड़े लोग इन रजिस्टरों का अलग-अलग ढंग से उपयोग करते दिखाई पड़ते हैं। समस्या तब उत्पन्न होती है जब हम इनमें से किसी एक रूप के आधार पर हिंदी का स्वरूप स्थिर करने की कोशिश करते हैं। हिंदी, हिंदुस्तानी और उर्दू के बीच खींचतान के समूचे इतिहास को इसी परिप्रेक्ष्य में समझना चाहिए। भारतेंदु युगीन हिंदी नवजागरण की समस्या यह है कि उसने हिंदी का एक सही रूप तय कर बाकी रूपों को प्रकारांतर से अवैध घोषित कर दिया और उनके बारे में किसी भी प्रकार के चिंतन-अध्ययन का ही निषेध कर दिया। उर्दू परंपरा में लिखे गए साहित्य को हिंदी नवजागरण के दायरे से बाहर कर देने के बावजूद भारतेंदु को इस बात का एहसास था कि उर्दू शाइरी की परंपरा से भिन्न खड़ी बोली हिंदी में कविता लिख पाना आसान नहीं होगा।’’

खंड-5 में ‘माधुरी’ में प्रकाशित कुछ लेखों का चयन है। ‘‘यह देखना रोचक है कि समकालीन होते हुए भी, ‘चांद’ और ‘माधुरी’ के लेखों में दृष्टि, चेतना, सरोकार व लेखकों की उपस्थिति, एक दीखने वाला फर्क है। ‘माधुरी’ लगभग मुख्य रूप से साहित्य की पत्रिका थी, जिसमें हिंदी के लगभग सभी बड़े नाम लिखते रहे थे। इसके लेखों में राजनीति से थोड़ी दूरी दिखती है, पर ‘चांद’ के लेखों में स्थिति इससे उलट थी।’’ [खंड : 5, ब्लर्ब से]

इस खंड में प्रकाशित— ‘गुमान मिश्र और उनका आश्रयदाता’ (लाला सीताराम), ‘हिंदी में उच्चकोटि की पुस्तकों का अभाव’ (अवध उपाध्याय), ‘महाकवि भूषण की इतिहास अनुकूलता’ (रामचंद्र-गोविंद काटे), ‘शिवाजी महाराज की वास्तविक जन्म-तिथि’ (गोपाल-दामोदर तामस्कर), ‘प्रयाग की हिंदी नाट्य-समिति’ (शिवपूजन सहाय), ‘प्राचीन भारत में राष्ट्रतंत्र’ (अरविंद घोष), ‘चुंबन’ (छन्नूलाल द्विवेदी), ‘रूस के आदर्श जेलखाने’ (देवव्रत शास्त्री), ‘बरवै-रामायण’ (सद्गुरुशरण अवस्थी), ‘उपाध्यायजी और अद्वैतवाद’ (वासुदेवशरण अग्रवाल), ‘अश्वमेध-यज्ञ’ (इंद्र विद्यालंकार), ‘प्रेमी मोपासां’ (केशवदेव शर्मा), ‘ब्रिटिश-साम्राज्य के पूर्व भारत’ (मंडन मिश्र), ‘कौटिल्य का वस्तु-विज्ञान’ (गोपाल-दामोदर तामस्कर), ‘हिंदी की आधुनिक कविता’ (विनयमोहन शर्मा), ‘भारतीय लिपि और भाषाएं’ (पांडेय रामावतार शर्मा), ‘उर्दू कविता में इस्लाह’ (ब्रजमोहन वर्मा), ‘हिंदी ‘य-श्रुति’ की परीक्षा’ (पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी शास्त्राचार्य) जैसे लेख ‘माधुरी’ की सुघड़, वैश्विक और विषय-वैविध्यपूर्ण संपादकीय दृष्टि का पता देते हैं। लेकिन इस सूची में स्त्री, दलित और मुस्लिम नामों का न होना, इस प्रश्न/विमर्श को जमीन दे सकता है कि क्या उनके नाम किन्हीं अप्रकाशित काली सूचियों में दर्ज थे? इस खंड में ही प्रकाशित सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का लेख ‘वर्णाश्रम-धर्म की वर्तमान स्थिति’ पढ़ते हुए, यह प्रश्न भी बार-बार परेशान करता है कि इक़बाल को सांप्रदायिक मानने वाली नजर निराला को भी सांप्रदायिक क्यों नहीं मानती है। इस खंड में ही कृष्णबिहारी मिश्र का लेख ‘हिंदी-साहित्य का विकास’ इस तथ्य की ओर संकेत करता है कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल की संदिग्ध तुलनात्मक दृष्टि और काव्य-विवेक, उनकी तथ्यात्मक चूकों और अमौलिकता पर विचार बहुत पहले ही किया जा चुका है। हिंदी में ऐसे विचार और विमर्श प्राय: दबी जुबान में होते रहे/रहते हैं, लेकिन इस प्रकार की मुखरताएं यहां घेर कर खत्म कर दी जाती रही हैं। असद ज़ैदी ने 1857 के प्रथम स्वाधीनता-संग्राम के 150 साल पूरे होने पर जो विवादित कविता लिखी थी उसमें प्रतापनारायणों, मैथिलीशरणों और रामचंद्रों के विषय में यों ही नहीं कहा था कि वे खुद एक बेहतर गुलामी से ज्यादा कुछ नहीं चाहते थे। इस प्रकार देखें तो ‘चांद’ और ‘माधुरी’ से रचना-चयन के इन सात खंडों का प्रकाशन इस बात के लिए मजबूर करता है कि हम अपने कथित महान हिंदी-निर्माताओं के ‘हिंदू विवेक’ यानी उनकी उस सांप्रदायिक-दृष्टि को रेखांकित करें जिसकी वजह से वे एक तरफ अंग्रेज शासकों की प्रशंसा में रत थे और दूसरी तरफ हिंदू महासभा के एजेंडे पर भी काम कर रहे थे। यहां ‘वर्णाश्रम-धर्म की वर्तमान स्थिति’ शीर्षक लेख से उद्धृत निराला रचित इस लंबे अनुच्छेद पर गौर करें :

‘‘सृष्टि की साम्यावस्था कभी नहीं रहती, तब अंत्यजों या शूद्रों की ही क्यों रहने लगी। ज्यों-ज्यों परिवर्तन का चक्र घूमता गया, त्यों-त्यों असीरियन सभ्यता के साथ एक नवीन शक्ति एक नवीन वैदांतिक साम्य-स्फूर्ति लेकर पैदा हुई, जिसके आश्रय में देखते-देखते आधा संसार आ गया। भारतवर्ष पर गत हजार वर्षों से उसी सभ्यता का प्रवाह बह रहा है। यहां की दिव्य शक्ति के भार से झुके हुए निम्न-श्रेणियों के लोगों को उसकी सहायता से सिर उठाने का मौका मिला— वे लोग मुसलमान हो गए। यहां की दिव्य सभ्यता आसुर सभ्यता से लड़ते-लड़ते क्रमशः दुर्बल हो गई थी, अंत तक उसने विकारग्रस्त रोगी की तरह विकलांग, विकृत-मस्तिष्क होकर अपने ही घर वालों से तर्क-वितर्क और लड़ाई-झगड़ों पर कमर कस ली। क्रोध अपनी ही दुर्बलता का परिचायक है, और अंत तक आत्मनाश का कारण बन बैठता है, उधर दुर्बल का जीवन भी क्रोध करना ही है, उसकी और कोई व्याख्या भी नहीं। फलतः ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य-शक्ति पराभूत होकर मृत्यु की प्रतीक्षा करने लगी। जब ग्रीक सभ्यता का दानवी प्रवाह गत दो शताब्दियों से आने लगा, दानवी माया अपने पूर्ण यौवन पर आ गई, हिंदुस्तान पर अंग्रेजों का शासन सुदृढ़ हो गया, विज्ञान ने भौतिक करामात दिखाने आरंभ कर दिए, उस समय ब्राह्मण-शक्ति तो पराभूत हो ही चुकी थी, किंतु क्षत्रिय और वैश्य-शक्ति भी पूर्णतः विजित हो गई। शिक्षा जो थी अंग्रेजों के हाथ में गई, अस्त्र-विद्या अंग्रेजों के अधिकार में रही (अस्त्र ही छीन लिए गए, तब वह विद्या कहां रह गई? और वह क्षत्रियत्व भी विलीन हो गया), व्यवसाय-कौशल भी अंग्रेजों के हाथ में। भारतवासियों के भाग्य में पड़ा शूद्रत्व। यहां की ब्राह्मण-वृत्ति में शूद्रत्व, क्षत्रिय-कर्म में शूद्रत्व, और व्यवसायी जो विदेशों का माल बेचने वाले हैं कुछ और बढ़कर शूद्रत्व इख्तियार कर रहे हैं। अदालत में ब्राह्मण और चांडाल की एक ही हैसियत, एक ही स्थान, एक ही निर्णय। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य अपने घर में ऐंठने के लिए ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य रह गए। बाहरी प्रतिघातों ने भारतवर्ष के उस समाज-शरीर को, उसके उस व्यक्तित्व को, समूल नष्ट कर दिया; बाह्य दृष्टि से उसका अस्तित्व ही न रह गया। अंग्रेज-सरकार ने मुसलमान और नान-मुसलमान के दो हिस्से करके हिंदू-समाज की कद्र में एक कदम और बढ़कर अपनी गुणग्राहिता प्रकट की। यहां साफ जाहिर हो रहा है कि ‘न निवसेत् म्लेच्छराज्ये’ का फल क्या होता है, संस्पर्श दोष का परिणाम कितना भयंकर हुआ करता है।’’ [खंड : 5, पृष्ठ : 80-81]

हिंदी-निर्माताओं का हिंदू प्रशिक्षण किस तरह मुल्क के आजाद होने बाद भी परवान चढ़ता रहा है, इसके उदाहरण प्रत्येक दशक में नजर आ जाएंगे। यहां नाम गिनाने में नाम छूटने की आशंकाएं ज्यादा हैं, इसलिए अवकाश और औचित्य दोनों होने बावजूद इससे बचा जा रहा है, लेकिन मौजूदा भारतीय सरकार में हिंदी की नई पीढ़ी से एक हालिया उदाहरण दे ही देना चाहिए। 12 मार्च 2018 के ‘हिंदुस्तान’ के वाराणसी संस्करण की एक खबर का शीर्षक — ‘संकुल में पीएम : मोदी और मैक्रों ने देखा राम-हनुमान का मिलन’ — पढ़कर उसे पूरा पढ़ने की इच्छा हुई :

‘‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रो ने सोमवार को बड़ा लालपुर के दीनदयाल संकुल में रामचरित मानस के प्रमुख प्रसंगों पर आधारित नाटक ‘चित्रकूट’ का मंचन देखा। रूपवाणी संस्था की इस प्रस्तुति में दोनों शासनाध्यक्षों की मौजूदगी के दौरान बाली-सुग्रीव युद्ध और श्रीराम-हनुमान मिलन के प्रसंगों का मंचन हुआ।

संकुल के ओपेन थिएटर में दोनों शासनाध्यक्षों के साथ ब्रिगेटी मैक्रो (फ्रांस की प्रथम महिला) और प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी मौजूद थे। ओपेन थिएटर में दो गद्दे लगाए गए थे। लेकिन मोदी-इमैनुअल मैक्रो एक ही स्थान पर बैठे। वहां जगह कम पड़ने के कारण ब्रिगेटी मैक्रो ने बड़े ही सहज भाव से नीचे सीढ़ियों पर बैठकर रामलीला का मंचन देखा। उन्हें सीढ़ियों पर बैठता देख मोदी ने अफसरों को व्यवस्था करने का इशारा किया, लेकिन ब्रिगेटी मैक्रो ने मना कर दिया। दूसरी तरफ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अकेले बैठे थे।

व्योमेश शुक्ल निर्देशित इस नाटक में छऊ, कथक और भरतनाट्यम नृत्य-शैलियों को आधार बनाया गया। इस प्रस्तुति में राम, सीता, लक्ष्मण और हिरण की भूमिका क्रमशः स्वाति, नंदिनी, काजोल और साखी ने निभाई। अन्य भूमिकाओं में तापस, हेमंत, आकाश, देवांशी, दीपक गुप्त और विशाल थे।’’

यह कहने की इच्छा नहीं है, लेकिन कहना पड़ रहा है कि व्योमेश शुक्ल हिंदी के चर्चित कवि और कभी जन संस्कृति मंच से संबद्ध रहे हैं। एक उम्र तक उन्हें एक साथ हिंदी के महत्वपूर्ण, प्रतिबद्ध, प्रगतिशील व्यक्तित्वों और कथित कलावादियों का स्नेह, सहयोग और समर्थन मिला है। ‘पहल’ और ‘उद्भावना’ सरीखी पत्रिकाओं ने उनके काम की पुस्तिकाएं प्रकाशित की हैं। उन्हें अशोक वाजपेयी ने भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार दिया है। उन्हें श्रीकांत वर्मा पर अब तक नहीं आई किताब लिखने के लिए रज़ा फाउंडेशन की फैलोशिप मिली है। वह रज़ा फाउंडेशन की पत्रिका ‘समास’ के अब तक नहीं आए एक अंक के संपादक रहे हैं… यह व्योमेश का विकास-क्रम है और ये सारी घटनाएं 16 मई 2014 से पूर्व की हैं। इस तारीख से ठीक पूर्व 16वें लोकसभा चुनाव में वह बनारस में नरेंद्र मोदी के विरुद्ध — अरविंद केजरीवाल का नहीं — कांग्रेसी अजय राय का प्रचार कर, उनके पक्ष में हिंदी लेखकों-पत्रकारों और बुद्धिजीवियों को एकजुट कर चुके हैं। लेकिन इस तारीख के बाद से वह आंदोलनात्मक और साहित्यिक व्यर्थताएं तज कर ‘राममय रंगकर्म’ के प्रति पूर्णतः समर्पित और सक्रिय हो गए हैं। वह निराला की लंबी कविता ‘राम की शक्तिपूजा’ पर तैयार की गई नृत्य-नाटिका की देश भर में सौ से ज्यादा प्रस्तुतियां दे चुके हैं। मोदी और योगी को राम-हनुमान का मिलन दिखाना उनकी नाटकीय साधना का महज एक पड़ाव है। 2019 में यानी 17वें लोकसभा चुनाव में किसी फाशिस्ट की ताजपोशी अगर पुन: होती है, तब यकीकन एक हिंदू-राष्ट्र में हम व्योमेश शुक्ल के रंगकर्म का चरमोत्कर्ष देखेंगे और यह न हुआ तब भी अफसरों-अवसरों की कोई कमी थोड़े ही है।

इन घटनाओं की पृष्ठभूमि में वह हिंदू-मानस है जो मूलतः सांप्रदायिक है और जिसे कथित प्रात: स्मरणीय हिंदी-निर्माताओं ने तैयार किया है। इसलिए ही संभवतः रामविलास शर्मा का गढ़ा पद ‘हिंदी नवजागरण’ इतना संदेहास्पद है। संसार का कोई भी नवजागरण इतना अशक्त और अपूर्ण नहीं है जितना कि यह ‘हिंदी नवजागरण’ है। इसका ही नतीजा है कि इस हाहाकारी वक्त में हम सब जगह अपने बहुत नजदीक भयानक हिंदू मानस से घिरे हुए हैं। कोई भी स्थान और माध्यम अब निरापद नहीं है। हमारी शीर्षस्थानीयताएं ईश्वर को याद कर रही हैं (देखें : नामवर सिंह पर केंद्रित एनडीटीवी इंडिया का 4 मई 2018 का प्राइम टाइम)। इस दृश्य में ‘चांद’ और ‘माधुरी’ के चयन-खंडों का प्रकाशन बहुत सारी अवधारणाओं पर पुनर्विचार का प्रस्थान-बिंदु बन सकता है। यह पुनर्विचार ही संभवतः हमारे उन वास्तविक निर्माताओं के अधूरे कार्य और उनकी वेदना के स्रोत को संगतपूर्ण निष्कर्षों तलक पहुंचा सकेगा जो समाज, संस्कृति और साहित्य की सेवा के लिए अथक श्रम करते हुए, अशेष कष्ट सहते हुए, सफलता-असफलता से बेखबर आत्मत्याग की राह पर अपरिमित धन व्यय करते हुए अपने शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को नष्ट करते रहे।

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संदर्भ :

प्रस्तुत आलेख में साल 2018 में वाग्देवी प्रकाशन, बीकानेर से प्रियंवद के चयन और संपादन में प्रकाशित ‘चांद’ और ‘माधुरी’ की रचनाओं के सात खंडों को आधार बनाया गया है। इस खंड से दिए गए उद्धरणों में लेखकों और पुस्तकों के नाम की वही वर्तनी और उच्चारण प्रयोग में लिए गए हैं, जैसे कभी ‘चांद’ और ‘माधुरी’ में प्रयुक्त हुए और इस वजह से इन खंडों में भी। प्रो. राजकुमार का उद्धरण पहले ‘नया ज्ञानोदय’ और बाद में tirchhispelling.wordpress.com पर प्रकाशित उनके लेख ‘हिंदी नवजागरण की परिकल्पना पर पुनर्विचार की जरूरत’ से है। असद ज़ैदी की कविता ‘1857 : सामान की तलाश’ आधार प्रकाशन, पंचकूला से प्रकाशित उनके तीन कविता-संग्रहों के चयन ‘सरे-शाम’ में पढ़ी जा सकती है। इस आलेख की अंतिम पंक्तियों में मुक्तिबोध की कविता ‘ब्रह्मराक्षस’ की अंतिम पंक्तियों की ध्वनि है।

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साभार: पहल 112 

16107461_1328427407221041_632303947667798252_oआभासी पटल (सोशल साइट्स) के बाहर ‘कुंठित मन’ की ‘निर्लज्ज अभिव्यक्तियाँ’ कितनी अमानवीय होती हैं, वह जानी-पहचानी है. अविनाश के पास ‘कूटनीति’ की भाषा नहीं है, जिसका सबसे सजग इस्तेमाल आभासी लोक-वृत्त के दायरे में किया जाता है. जिस दिन उसके पास यह आ जायेगी, वह ख़त्म हो जाएगा.  यह आभासी-व्यवहार और कुछ नहीं, बल्कि हाल-चाल, दुआ-सलाम की भाषा को पाने का ही करतब है. यह भाषा आदमी को दलाल, अवसरवादी, व्यवसायी बना सकती है लेकिन रचनाकार नहीं. यह ‘सर्वधर्म-समभाव’ की सबसे उपजाऊ जमीन है. जहाँ भाषा गूगल-ट्रांसलेट हो जाती है. अविनाश से संपर्क -स्थापित हेतु  darasaldelhi@gmail.com का इस्तेमाल कर सकते हैं.

दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र उर्फ़ अंध-श्रद्धा के राज में समीक्षा का निर्वासन: उस्मान खान

डॉ. अंबेडकर ने सौंदर्यशास्त्र पर सीधे कलम चलाई है, ऐसा हमें ज्ञात नहीं, लेकिन जॉन ड्यूई ने सौंदर्यशास्त्र पर लिखा है। वाल्मीकि जी का सौंदर्यशास्त्र चाहे अनुभव की द्वंद्वात्मकता की उपेक्षा करे, ड्यूई ऐसा नहीं करते। उनकी पुस्तक ‘आर्ट एज़ एक्सपीरिएन्स’[4] १९३४ में प्रकाशित हुई थी। उनके अनुसार, अनुभव स्थानीय-माहौल में कार्य करते हुए अर्जित किए जाते हैं, ये अनुभव स्थानीय-संस्कृति में निर्मित सामुदायिक अनुभव होते हैं। उनके अनुसार ये समुदाय निरंतर टकराव में रहते हैं। वे खंडित और यांत्रिक अनुभव से जन्य कला को असौंदर्य कहते हैं, सुव्यवस्थित पूर्ण अनुभव को ही वे अनुभव मानते हैं। वे कला को उत्पादक/कलाकार का पक्ष मानते हैं और सौंदर्य को उपभोक्ता/सामाजिक का। निश्चित ही कलाकृति का उपभोक्ता केवल उदासीन ग्राहक नहीं होता, वह अपने रिस्पांस से कलाकृति को विभिन्न अर्थ देता है। उनके अनुसार कलाकार एक व्यक्ति की तरह अपने स्थानीय माहौल में कार्य करते हुए अनुभव अर्जित करता है, कला इन अनुभवों का विशेष रूप है। कलाकार के अनुभव विशिष्ट होते जाते हैं, लेकिन सामान्य अनुभवों से एकदम अलग वे नहीं होते। ड्यूई के अनुसार सोचना भी सुंदर होता है। वाल्मीकि जी ने अपने सौंदर्यशास्त्र में, यदि वह डॉ. अंबेडकर के दर्शन से निर्मित हुआ है, अनुभव के सौंदर्य पर सोचने का कष्ट नहीं उठाया।   #लेखक 

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Courtesy:  kractivist.wordpress.com/

                    

‘दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र’ : वाद-विवाद-संवाद[1]

By उस्मान खान

                              फ़रियाद की कोई लै नहीं है,

                              नाला पाबंद-ए-नै नहीं है।[2]

दलित-साहित्य आंदोलनधर्मी-बहसधर्मी है। सन २००१ में प्रकाशित ओमप्रकाश वाल्मीकि की पुस्तक ‘दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र’ दलित-साहित्य की बहसों को समेटने और अंबेडकरवाद को दलित साहित्य के सौंदर्यशास्त्र का केंद्र बनाने का प्रयास है। दलित-साहित्य के सौंदर्यशास्त्र या समीक्षाशास्त्र के निर्माण का यह प्रयास दलित-साहित्य की परिपक्वता और दलित-बहस की अपरिपक्वता दोनों को सामने लाता है।

वाल्मीकि जी अपने सौंदर्यशास्त्र का आधार डॉ. अंबेडकर के जीवन-संघर्षों और विचारों को बताते हैं। डॉ. अंबेडकर का सम्पूर्ण जीवन अगर किसी एक सामान्य कार्य में पूर्ण होता है, तो वह है छुआछूत और जाति-व्यवस्था का विरोध। उन्होंने उच्च-शिक्षा प्राप्त की, बहिष्कृत हितकारिणी सभा का निर्माण किया, मुकनायक, बहिष्कृत भारत और इक्वालिटी जनता जैसे पत्र निकाले, गाँधीवादी राजनीति पर प्रश्न-चिह्न लगाए, महाड़ सत्याग्रह किया, मनुस्मृति जलाई, जाति-प्रश्न को राजनीति का प्रश्न बनाया, कालाराम मंदिर में प्रवेश का प्रयास किया, इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी बनाई, कांग्रेस मंत्रिमंडल में शामिल हुए, बौद्ध हुए, शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन का निर्माण किया। यथा, उनका जीवन-संघर्ष किसी सीधी लकीर की तरह नहीं है, उसमें पर्याप्त पेंच हैं। उनके विचार जाति-व्यवस्था से मुक्ति की राजनीति के सापेक्ष तैयार होते जाते हैं। बने-बनाए ढाँचे में नहीं अनुभव, प्रयोग और व्यवहार के आधार पर बदलते हुए। एक तीखा भाव जो नहीं बदलता, वह है – जाति-भेद का बीजनाश। इस अर्थ में डॉ. अंबेडकर किसी वाद के अनुसरणकर्ता या निर्माता नहीं हैं, अपने गुरु जॉन ड्यूई की तरह अनुभवों से शिक्षा पाते हुए, किसी भी प्रकार की हिंसा से बचते हुए, वे जाति-व्यवस्था के उद्भव, विकास और नाश का अपना सिद्धान्त विकसित करते जाते हैं। अपनी राजनीति के लिए तात्कालिक लाभ प्राप्त करने के प्रक्रम में वे किन्हीं निश्चित आचार-विचार पर टीके नहीं रहते, वे मुख्यतः भौतिक-विकास का पूंजीवादी और आध्यात्मिक विकास का धार्मिक मार्ग सुझाते हैं। वे व्यवहारवाद के आधार पर संघर्ष करते जाते हैं, इन संघर्षों का अंतिम प्रयोग बौद्ध-धर्म अपनाना था और इस संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता कि वे आगे भी नए प्रयोग करने से हिचकते नहीं।

उनके जीवन-संघर्ष और चिंतन-मनन से जो दर्शन प्राप्त होता है उसे परिणामवाद, व्यवहारवाद या अनुभववाद कहा जा सकता है। जॉन ड्यूई से अलग उन्होंने अपनी विशेष समस्या के संबंध में इस दर्शन का प्रयोग और विकास किया। जहाँ ड्यूई अमेरिका की उभरती पूंजीवादी-साम्राज्यवादी-संसदीय-व्यवस्था में कार्यरत थे, वहीं डॉ. अंबेडकर सामंती-पूंजीवादी उपनिवेशी भारत में। उत्तर-उपनिवेशी भारत में डॉ. अंबेडकर की राजनीति का दूसरा रूप दिखाई देता है – तेलंगाना के जन-संहार का विरोध न करना, बौद्ध-धर्म को अपनाना और शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन का निर्माण करना आदि। वे कभी भारत में लोकतन्त्र के विकास और नागरिक-समाज के निर्माण के प्रति आशावान दिखते हैं, तो कभी उनका मोहभंग प्रकट होता है। सिद्धांतों की व्यवस्था उनके चिंतन में नहीं है। वे अपने जीवन-संघर्ष में भी स्थिति-सापेक्ष कोई भी कार्य करते दिखते हैं। हिंसा का पक्ष लेते भी उन्हें देखा जा सकता है। वे मार्क्स के विचारों को जाने बिना ही उनके प्रति घृणा और तिरस्कार प्रदर्शित करते हैं, बौद्ध-धर्म को जाति-व्यवस्था ही नहीं, सम्पूर्ण मानवता की सभी समस्याओं का हल बताते हुए वे मार्क्सवाद को (बिना ठीक से जाने-समझे ही) खारिज कर देते हैं।[3] अवसरानुकूल स्वीकार और त्याग की यह प्रक्रिया चलती रहती है। बौद्ध-धर्म के स्वीकार से जाति-व्यवस्था या उत्पीड़न का अंत संभव नहीं, इतिहास और वर्तमान दोनों इसका सबूत देते खड़े हैं। क्या म्याम्मार और श्रीलंका में बौद्ध-धर्म प्रभावी नहीं, क्या वहाँ सभी प्रकार का उत्पीड़न समाप्त हो चुका है, सभी लोग सुखी हैं, करुणा और मैत्री आधारित जीवन जी रहे हैं?

अंबेडकरवादी राजनीति डॉ. अंबेडकर को फरिश्ता, मसीहा, देवता की तरह प्रस्तुत करती है, इससे डॉ. अंबेडकर एक ऐसे व्यक्तित्त्व के रूप में उभरते हैं, जिनकी जय की जा सकती है या मूर्ति तोड़ी जा सकती है, लेकिन जिनसे संवाद नहीं स्थापित किया जा सकता। उत्तर-उपनिवेशी भारत में अंबेडकरवादी राजनीति कई धाराओं और उप-धाराओं में बंटती चली गई। मुख्यधारा एकालापी या असंवादी है। इस धारा के बौद्धिक डॉ. अंबेडकर को भगवान नहीं, तो उससे कम भी नहीं मानते। वे किसी भी तरह डॉ. अंबेडकर को विश्व का महानतम बौद्धिक सिद्ध करना और मनवाना चाहते हैं। बौद्धिक को बौद्धिक कहने में या क्रांतिकारी को क्रांतिकारी कहने में कोई हर्ज नहीं, लेकिन किसी के जीवन और विचारों का सुव्यवस्थित अध्ययन किए बिना क्या यह उचित है कि हम उसे कुछ कहें? वाल्मीकि जी डॉ. अंबेडकर के जीवन और विचारों को पूर्णता में नहीं देखते। उन्हें सर्वदर्शी सर्वज्ञाता की तरह से प्रस्तुत करने के अतिरिक्त उनके सौंदर्यशास्त्र में डॉ. अंबेडकर के व्यक्तित्त्व और दर्शन के बारे में कोई सही जानकारी नहीं मिलती। अंध-श्रद्धा के राज में समीक्षा निर्वासित रहती है।

निश्चित ही, डॉ. अंबेडकर बौद्ध-धर्म का विशेष उपयोग करते हैं, बौद्ध-दर्शन से अधिक वे बौद्ध-संगठन पर ध्यान देते हैं, उनके बुद्ध आधुनिक राजनैतिक बुद्ध हैं। भारत में जाति-व्यवस्था की समाप्ति के संघर्ष में विकसित हुआ उनका व्यवहारवादी-दर्शन विशिष्ट होकर भी व्यवहारवाद के सामान्य सिद्धांतों से विचलित नहीं होता। इस अर्थ में वे ड्यूई के सच्चे शिष्य हैं। बुद्ध के अनित्यवाद पर वे विशेष ध्यान नहीं देते। वाल्मीकि जी ने भी यही रास्ता पकड़ा है।

डॉ. अंबेडकर ने सौंदर्यशास्त्र पर सीधे कलम चलाई है, ऐसा हमें ज्ञात नहीं, लेकिन जॉन ड्यूई ने सौंदर्यशास्त्र पर लिखा है। वाल्मीकि जी का सौंदर्यशास्त्र चाहे अनुभव की द्वंद्वात्मकता की उपेक्षा करे, ड्यूई ऐसा नहीं करते। उनकी पुस्तक ‘आर्ट एज़ एक्सपीरिएन्स’[4] १९३४ में प्रकाशित हुई थी। उनके अनुसार, अनुभव स्थानीय-माहौल में कार्य करते हुए अर्जित किए जाते हैं, ये अनुभव स्थानीय-संस्कृति में निर्मित सामुदायिक अनुभव होते हैं। उनके अनुसार ये समुदाय निरंतर टकराव में रहते हैं। वे खंडित और यांत्रिक अनुभव से जन्य कला को असौंदर्य कहते हैं, सुव्यवस्थित पूर्ण अनुभव को ही वे अनुभव मानते हैं। वे कला को उत्पादक/कलाकार का पक्ष मानते हैं और सौंदर्य को उपभोक्ता/सामाजिक का। निश्चित ही कलाकृति का उपभोक्ता केवल उदासीन ग्राहक नहीं होता, वह अपने रिस्पांस से कलाकृति को विभिन्न अर्थ देता है। उनके अनुसार कलाकार एक व्यक्ति की तरह अपने स्थानीय माहौल में कार्य करते हुए अनुभव अर्जित करता है, कला इन अनुभवों का विशेष रूप है। कलाकार के अनुभव विशिष्ट होते जाते हैं, लेकिन सामान्य अनुभवों से एकदम अलग वे नहीं होते। ड्यूई के अनुसार सोचना भी सुंदर होता है। वाल्मीकि जी ने अपने सौंदर्यशास्त्र में, यदि वह डॉ. अंबेडकर के दर्शन से निर्मित हुआ है, अनुभव के सौंदर्य पर सोचने का कष्ट नहीं उठाया। उनको यही कह देना काफी लगा – ‘एक दलित जिस उत्पीड़न को भोगकर दुख, वेदना से साक्षात्कार करता है, वह आनंददायक कैसे हो सकता है?’[5] (५०)

पीड़ा से आनंद नहीं उपजता, इस मान्यता के साथ वाल्मीकि जी अपने सौंदर्य-चिंतन में आनंद के पक्ष को नकारते हैं। निश्चित ही, आनंद के पक्ष को सीमित अर्थों में ग्रहण करने से ऐसी मान्यता निर्मित हुई है। आनंद का पक्ष केवल मनोरंजन से नहीं जुड़ा है, अरस्तू द्वारा प्रस्तावित विरेचन से भी सम्बद्ध है। कलाकृति के उपभोग से सम्बद्ध है। सौंदर्यशास्त्र के निर्माण में पहला प्रश्न साधारणीकरण का ही रहा आया है। वाल्मीकि जी इस प्रश्न से पल्ला झाड़ लेते हैं या उपरोक्त प्रश्न उठाकर उस पहले प्रश्न को खारिज मान लेते हैं। पाठक/दर्शक/श्रोता कलाकृति में वर्णित भाव-विचार-अनुभव को अपने भाव-विचार-अनुभव से अनुकूलित करता है, इस प्रक्रिया में अपनी पीड़ा के लिए दवाई पाता है। जिस तरह घाव पर मरहम लगाने से घायल को लाभ मिलता है, उसी तरह पीड़ा के अनुभव पढ़ना पाठक के मन-मस्तिष्क के घावों को, जो उसकी अपनी पीड़ा के अनुभव हैं, भरता है। इसका अर्थ फिर यह नहीं कि पाठक को दूसरे की पीड़ा के अनुभव पढ़कर राहत मिलती है, नहीं, बल्कि उसको अपनी पीड़ा के अनुभव पर सोचने-समझने में सहयोग मिलता है, साथ ही पीड़ा के सामूहिक अनुभव पर सोचने-समझने में भी वह अधिक सक्षम हो पाता है। इससे वह अपनी व समाज की पीड़ा को समाप्त करने की प्रेरणा भी पाता है। यह समझ और प्रेरणा अनुभवों की पूर्णता और संतुष्टि को जन्म देती है, जो पाठक के लिए कलाकृति का भिन्न अर्थ निर्मित करती है। जहाँ ऐसा नहीं होता, वहाँ पाठक के लिए कृति अपूर्ण और असंतुष्टिकर होती है, उसकी सौंदर्य-पीपासा शांत नहीं होती।

कला को एक माध्यम की तरह देखने से यह दृष्टि पैदा होती है कि कला का उद्देश्य केवल शिक्षा देना है, कला को स्वयंपूर्ण मान लेने पर यह दृष्टि पैदा होती है कि कला का उद्देश्य केवल आनंद या मनोरंजन है। ये दोनों ही दृष्टियाँ अधूरी हैं और कला में फाँक पैदा करती हैं। शिक्षा और आनंद का जितना बेहतर संतुलन कोई कलाकृति स्थापित कर पाती है, उतनी ही सुंदर वह कही जाती है – एक स्वयंपूर्ण-माध्यम । लेकिन कला का उद्देश्य यहीं तक सीमित नहीं है, कला का अंतिम उद्देश्य सत्य को पुनर्प्रस्तुत करना है, वास्तविकता का कलात्मक प्रकाशन करना है। वाल्मीकि जी अपने सौंदर्यशास्त्र में कला को एक माध्यम, वह भी सीमित, मानते दिखते हैं। निश्चित ही, वे बाज़ार-केन्द्रित कला-उत्पादन के विरोध में और विचारधारा-केन्द्रित कला-उत्पादन के पक्ष में हैं, लेकिन सत्य और सुंदर की पूर्णता की उपेक्षा करते हैं।

अपनी पुस्तक में उन्होंने ड्यूई द्वारा किए गए विषय और अंतर्वस्तु के भेद की चर्चा की है, लेकिन वे यह नहीं बताते कि अंतर्वस्तु से ड्यूई का अर्थ साहित्यिकता से ही है, शायद इससे वे अपनी इस मान्यता को तुष्ट करना चाहते हैं कि अंतर्वस्तु ही प्रमुख है, रूप नहीं। जबकि ड्यूई के लिए रूप का महत्त्व कम नहीं। फिर वाल्मीकि जी कला की सामान्य अंतर्वस्तु संबंधी ड्यूई के विचार पर भी नहीं सोचते, इसीके परिणामस्वरूप वे दलित-साहित्य और अनुभव की अंबेडकरवादी अनन्यता पर ज़ोर देकर उसकी महत्ता स्थापित करते दिखते हैं। वैज्ञानिक जागरण के अभाव में सौंदर्यशास्त्र का निर्माण किस तरह होता है, इसे समझने के लिए वाल्मीकि जी का सौंदर्यशास्त्र एक उत्तम उदाहरण है। डॉ. अंबेडकर के विचारों और साहित्य दोनों के संबंध में उनका विवेचन धार्मिक-आस्थामय है, दर्शन और विज्ञान से वे दूर हैं। कहीं इसलिए तो नहीं कि दर्शन और विज्ञान धर्म पर संदेह और धर्म के नकार का प्रस्ताव भी रखते हैं!

अंबेडकरवाद विचार, आंदोलन और प्रकार्य की दृष्टि से एक जटिल विचारधारा है। हिन्दी-क्षेत्र में भी दलित-आंदोलन के निर्माण में और प्रकारांतर से दलित-साहित्य के निर्माण में अंबेडकरवाद के प्रचार-प्रसार की मुख्य भूमिका रही है। ८० के दशक में विशेषकर पश्चिमी उत्तरप्रदेश में, अनुसूचित-जाति के सामाजिक राजनैतिक संगठनों के निर्माण, प्रचार-प्रसार और चुनावी विजयों के साथ ही साथ, हिन्दी-दलित-साहित्यिकों के आंदोलन का भी प्रारम्भ होता है। अनुसूचित-जाति के शिक्षित-जन अंबेडकरवाद और वाया अंबेडकरवाद, बौद्ध-धर्म की ओर मुड़ते हैं। ९० के दशक में दलितों की आत्मकथाएँ सामने आने लगती हैं, जो हिन्दी-साहित्य के इतिहास की अभूतपूर्व घटना है। ओमप्रकाश वाल्मीकि, मलखान सिंह, मोहनदास नैमिशराय, कौशल्या बैसन्त्री, सुशीला टाकभौरे दलित-साहित्यिकों की सूची बढ़ती जाती है। वाल्मीकि जी का कहना ठीक है कि सिद्धों, संतों और दलित-साहित्य के विचारों में मूलभूत अंतर है, तब भी हिन्दी-साहित्य के इतिहास में और किसी धारा से इसकी सादृश्यता नहीं खोजी जा सकती। स्वयं वे भी घुम-घूमकर वहीं पहुँचते हैं।

उत्तर-उपनिवेशी भारत में समाज के लोकतांत्रिकरण और पूंजीवादी प्रसार ने भारत की सदियों पुरानी ग्रामीण-व्यवस्था का अधिकाधिक विखंडन किया, साथ ही अनुसूचित-जाति के एक हिस्से की राजनैतिक-आर्थिक उन्नति ने उनके अपने बौद्धिकों के निर्माण में आधारभूत भूमिका निभाई। यह बौद्धिक-वर्ग अंबेडकरवाद का निर्माता बना। अनुसूचित-जाति का यह वर्ग हिन्दी-दलित-साहित्य को जन्म देने वाला भी बना। महाराष्ट्र में दलित-साहित्यिकों के उभार और हिन्दी-क्षेत्र में – विशेषकर पश्चिमी उत्तर-प्रदेश में – कांशीराम और मायावती के बहुजन-आंदोलन और फुले-अंबेडकर-विचार के प्रचार-प्रसार ने हिन्दी-दलित-साहित्य के निर्माण की तात्कालिक भूमिका तैयार की। आज भी, दलित-आंदोलनों के निरंतर प्रचार-प्रसार के बाद भी, दलित-साहित्यिक हिन्दी-क्षेत्र में पूरी तरह सामने नहीं आ पाए हैं। अब भी दलितों के लिए कलम पकड़ना मुश्किल है। दलित शायद निर्बाध घोड़ी चढ़ने भी लग जाएँ, लेकिन ज्ञान-शक्ति अर्जित किए बिना किसी उत्पीड़ित-वर्ग की मुक्ति संभव नहीं, दलितों को भी इस शक्ति को अधिकाधिक सँजोना होगा, अन्यथा विडम्बना बनी रहेगी –

                              बेटा है बजरंगी दल में

                              बाप बना है भगवाधारी

                              भैया हिन्दू परिषद में है

                              बीजेपी में महतारी

                              मंदिर-मस्जिद में गोली

                              इनके कंधे चलती है।

                              यह दलितों की बस्ती है।[6]

ओमप्रकाश वाल्मीकि दलित-साहित्य को अंबेडकरवाद से किसी तरह बाहर नहीं मानते, यही कारण है कि वे दलित-साहित्य की अंबेडकर-पूर्व की रचनाओं को विशेष महत्त्व नहीं देते। उनकी दृष्टि में जो अंबेडकरवाद की चेतना से पूर्ण नहीं, वह दलित-साहित्य नहीं। अपने सौंदर्यशास्त्र में वे दो बातों पर ज़ोर देते हैं – पहली कि अनुसूचित-जाति द्वारा लिखा गया साहित्य ही दलित-साहित्य है, दूसरी कि अंबेडकरवाद की चेतना के बिना दलित-साहित्य नहीं रचा जा सकता। कुल मिलाकर यह कि अनुसूचित-जाति के अंबेडकरवादी व्यक्ति का साहित्य ही दलित-साहित्य है। उनके लिए दलित-साहित्य की प्रामाणिकता अंबेडकरवादी होने पर टिकी है, ना कि सिर्फ़ दलित होने पर। आश्चर्य नहीं, उनके लिए बुद्ध, सिद्ध, संत, फुले (पेरियार) आदि डॉ. अंबेडकर के निर्माण में समाहित हो जाते हैं।

वाल्मीकि जी के अनुसार बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर दलित-साहित्य के केंद्रीय प्रेरणा-स्रोत हैं और दलित-साहित्य की धार्मिक, दार्शनिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक और आर्थिक मान्यताएँ वही हैं, जो अंबेडकरवाद की हैं। लेकिन इन मान्यताओं को केवल प्रकट किया गया है और इन पर आत्म-सत्यापन की मोहर लगा दी गई है। यानी इन मान्यताओं और दलित-साहित्य के अंतर्संबंधों पर विचार नहीं किया गया है। डॉ. अंबेडकर की आर्थिक मान्यताओं पर लिखते हुए उन्होंने ‘अछूत  कौन और कैसे?’ पर आधारित सभ्यता की व्याख्या प्रस्तुत करना ही काफ़ी समझा है। क्या यह व्याख्या भौतिक-इतिहास पर आधारित है? क्या इससे दलित-साहित्य की आर्थिक मान्यताएँ स्पष्ट हो जाती हैं? इस व्याख्या को क्यों सही माना जाए, इसके पीछे कोई तर्क उन्होंने नहीं दिया। ऐसा क्यों? कहीं इसलिए तो नहीं कि इस संबंध में डॉ. अंबेडकर स्वयं सशंकित थे, इसलिए वे भी बिना प्रमाण ही इसे मान लेने की बात कहते हैं – ‘हमारे पास इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि ये छितरे हुए आदमी बौद्ध थे। किन्तु किसी प्रमाण की आवश्यकता भी नहीं है, जबकि उस समय अधिकांश हिन्दू बौद्ध ही थे। हम मान लेते हैं कि वे बौद्ध ही थे।‘[7] हमारे पास प्रमाण नहीं है, लेकिन हम मान लेते हैं, क्या यह वैज्ञानिक-दृष्टि है? डॉ. अंबेडकर ने स्वयं अर्थशास्त्र पर कलम चलाई है, वाल्मीकि जी को आर्थिक मान्यताओं पर बात करते हुए डॉ. अंबेडकर के अपने अर्थशास्त्र को सामने रखना था। अगर वाल्मीकि जी श्रम के शोषण का विचार सामने रखते, तो दलितों के शोषण का (आर्थिक ही सही!) पक्ष अधिक उजागर हो पाता और इस संबंध में डॉ. अंबेडकर के विचार भी अधिक स्पष्ट हो पाते। दलित-साहित्य में वर्णित श्रम के शोषण को समझने में भी पाठक को मदद मिलती। इसी तरह दलित-साहित्य की धार्मिक, सांस्कृतिक मान्यताओं पर लिखते हुए वे कहते हैं कि दलित-साहित्य अंधश्रद्धा, आस्था की जगह विश्लेषण तथा ऐतिहासिक और सामाजिक परिप्रेक्ष्य पर ध्यान देता है, और अंत में बौद्ध-धर्म की दीक्षा लेते समय डॉ. अंबेडकर द्वारा की गई २२ प्रतिज्ञाओं को इसका आधार बताते हैं। एक तरफ़ वे कबीर की अध्यात्मिकता की आलोचना करते हैं और दूसरी तरफ़ डॉ. अंबेडकर की अध्यात्मिकता का पक्ष लेते हैं। क्या इसे संगत माना जा सकता है? कभी वे धर्म को हानिकारक बताते हैं, तो कभी स्वयं दलित-साहित्य की धार्मिक मान्यताएँ बताने लगते हैं। क्या धार्मिक हुए बिना दलित-साहित्य नहीं लिखा जा सकता? वाल्मीकि जी दलित-साहित्य के हर पहलू को डॉ. अंबेडकर से जोड़ते हैं, इससे उनके सौंदर्यशास्त्र में कई असंगतियाँ और भ्रांत धारणाएँ उत्पन्न हुई हैं। वे दलित-चेतना के १३ बिन्दुओं में वैज्ञानिक-दृष्टि को भी शामिल करते हैं, लेकिन दलित-साहित्य के सौंदर्यशास्त्र के निर्माण में वैज्ञानिक-दृष्टि का प्रयोग करते नहीं दिखते। वे लिखते हैं –

‘दलित-साहित्य ‘आशय’ को महत्त्व देता है। अभिव्यक्ति और शिल्प दूसरे स्थान पर आता है। जीवन-अनुभवों की प्रामाणिकता ‘आशय’ को अर्थ-गंभीर बनाती है। यह अर्थ-गाम्भीर्य डॉ. अंबेडकर-दर्शन के विचार तत्त्व पर आधारित होना चाहिए। इसीलिए दलित साहित्य के सौंदर्यशास्त्र का स्वरूप पारंपरिक सौंदर्यशास्त्र से भिन्न है।‘[8]

यहाँ अभिव्यक्ति को सीमित अर्थों में समझा गया है। ड्यूई के अनुसार कलाकार के संपीड़ित या दबाए गए अनुभवों का किसी माध्यम से प्रकट होना अभिव्यक्ति है। उनके अनुसार कला अभिव्यक्त वस्तु है। यह शिल्प या रूप का मामला नहीं, बल्कि सामाजिक यथार्थ में अस्तित्त्व की दखल को, पीड़ा के अनुभव को पुनर्प्रस्तुत करने का कार्य है, एक ऐसा कार्य जो स्वयं सामाजिक यथार्थ में एक दखल बन जाता है। साथ ही वाल्मीकि जी ने अपनी पुस्तक में ‘अंबेडकर-दर्शन के विचार तत्त्व’ के बारे में जो लिखा है, वह भी सम्यक-दृष्टिपूर्ण नहीं कहा जा सकता, वह डॉ. अंबेडकर के विचारों के विश्लेषण-संश्लेषण से अधिक अंबेडकरवादी (बहुजनवादी) आंदोलन द्वारा निर्मित-प्रसारित भावुक-श्रद्धापूर्ण विवेचना है। वे लिखते हैं – ‘दलित साहित्य का वैचारिक आधार डॉ. अंबेडकर का जीवन-संघर्ष एवं ज्योतिबा फुले और बुद्ध का दर्शन उसकी दार्शनिकता का आधार है।‘[9]

लेकिन पूरी पुस्तक में फुले और बुद्ध के विचारों को डॉ. अंबेडकर के विचारों से अलग नहीं किया गया, साथ ही फुले और बुद्ध के अपने दर्शन को डॉ. अंबेडकर के जीवन-संघर्ष से भी नहीं जोड़ा गया। बुद्ध, सिद्ध, कबीर, रैदास, फुले और अंबेडकर सभी को नई दलित-राजनीति – अंबेडकरवाद – की दृष्टि से देखा गया है। बुद्ध के अनीश्वरवाद और अनात्मवाद को – अनित्यवाद की बुद्धवादी व्याख्या को – अनुभववाद में सीमित नहीं किया जा सकता। डॉ. अंबेडकर के बुद्ध विशिष्ट हैं – सर्वज्ञ-सर्वदर्शी भी और आधुनिक राजनैतिक भी – दलितों की भौतिक और आध्यात्मिक समस्याओं का एकमात्र समाधान। बौद्ध-दर्शन अनित्यवाद को अपनी विचारधारा या दर्शन का मूल-तत्त्व मानता है, अंबेडकरवादी-दर्शन अनुभववाद को। वाल्मीकि जी ने बुद्ध, बौद्ध-धर्म, फुले, डॉ. अंबेडकर और अंबेडकरवादी आंदोलन की एक खास छवि निर्मित की है, जिसके आधार पर उनका अंबेडकरवाद तैयार हुआ है, जो कि उनके सौंदर्यशास्त्र का आधार है। यह छवि भौतिक इतिहास के नकार और वास्तविकता के एक अंश के स्वीकार से निर्मित हुई है। भारत का और प्रकारांतर से वर्ण-जाति-धर्म-व्यवस्था का भौतिक इतिहास और यथार्थ की पूर्णता उनके सौंदर्यशास्त्र में उपेक्षित रह गई है। डॉ. अंबेडकर के विचारों को भी पूर्णता में देखने से बचा गया है। वाल्मीकि जी द्वारा दलित-साहित्य में अंबेडकरवादी होने पर ही अधिक ज़ोर दिया गया है। इससे दलित-साहित्य के विस्तार की समीक्षा तो बाधित हुई ही है, साथ ही डॉ. अंबेडकर के विचारों तथा छायावाद और प्रगतिवाद (प्रकारांतर से दक्षिणपंथ और वामपंथ) की सम्यक-आलोचना भी नहीं हो पाई है। अंबेडकरवाद को भी जिस तरह प्रस्तुत किया गया है, वह दलित-साहित्य-समीक्षा के लिए उपयुक्त नहीं, उसमें मुक्ति कम बंधन अधिक है। निश्चित ही, अंबेडकरवाद को समझे बिना दलित-साहित्य की समीक्षा नहीं की जा सकती, तब भी यह याद रखना चाहिए कि अंबेडकरवाद के कई प्रकार हैं, वाल्मीकि जी ने अपने सौंदर्यशास्त्र में मुख्यधारा के अंबेडकरवाद को प्रस्तुत किया है, जो सोचने से अधिक मानने पर ज़ोर देता है, जो सम्पूर्ण दलित-साहित्य को स्वीकार करने में भी समर्थ नहीं, फिर सम्पूर्ण-निम्न-वर्ग तो उनके विवेचन से बाहर ही रह जाता है।

संत-प्रेरणा दलित-साहित्य में महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। वाल्मीकि जी के लिए भी बुद्ध, कबीर आदि नायक हैं, लेकिन डॉ. अंबेडकर के अधिनायकत्त्व में ही। उनके सौंदर्यशास्त्र में डॉ. अंबेडकर को उपास्य बनाने की प्रेरणा सर्वत्र व्याप्त है। डॉ. अंबेडकर के विचारों की सर्वोच्चता सिद्ध करने में ही पुस्तक का अधिक भाग चला गया है। बुद्ध आदि के विचारों के स्वतंत्र अस्तित्त्व की उपेक्षा वाल्मीकि जी के सौंदर्यशास्त्र में प्रकट है। इसी कारण दलित-साहित्य की विरासत को उनका सौंदर्यशास्त्र उचित महत्त्व नहीं देता, जैसे इससे दलित-साहित्य की शुद्धता (अंबेडकरवाद) नष्ट हो जाएगी। वे दलित-साहित्य के विस्तार को भी उचित महत्त्व नहीं देते, जैसे इससे अंबेडकरवाद दूषित हो जाएगा। लेकिन दलित-साहित्य की विरासत और विस्तार को समुचित महत्त्व दिए बिना उसका प्रासंगिक सौंदर्यशास्त्र नहीं निर्मित किया जा सकता। वाल्मीकि जी के डॉ. अंबेडकर अपने में बंद हैं – वे आत्मालाप करते दिखते हैं, संलाप नहीं। ना वे बुद्ध से संवाद कर पाते हैं, ना फुले से और ना ही मार्क्स से।

डॉ. अंबेडकर ने मार्क्स के विचारों के अध्ययन-मनन के अभाव में उनके बारे में कई असंगत स्थापनाएँ प्रस्तुत की हैं। वाल्मीकि जी ने इस संबंध में अलग दृष्टि अपनाई है। वे बुद्ध, मार्क्स और अंबेडकर तीनों को शोषण के विरुद्ध मुक्ति का मार्ग तैयार करने वाला कहते हैं। उनके अनुसार भारत के साम्यवादी नेतृत्त्व और मार्क्सवादी विचारकों ने वर्ग और वर्ण को एक ही मान लिया, इसमें उनके ‘संस्कारों’ या उत्पीड़क-अनुभवों का प्रमुख योगदान रहा, जिससे दलित-मुक्ति के संबंध में उनकी दोहरी मानसिकता का निर्माण हुआ। यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि वर्ग और वर्ण में भेद होते हुए भी दोनों अंतर्ग्रथित हैं और वाल्मीकि जी दोनों को पूर्णतः अलग मानते दिखते हैं। वे वर्ण-आधारित विश्लेषण को ही सही मानते लगते हैं, और जो कोई वर्ग की बात करता है, उसे वे वर्ण को समझने में असमर्थ बताने लगते हैं। उनका कहना गलत नहीं कि साम्यवादी नेतृत्त्व और मार्क्सवादी विचारकों का उच्च-वर्ग दलित-उत्पीड़न की तीव्रता को समझ नहीं पाया। ऐसे मार्क्सवादियों को वे मार्क्सवाद का मुखौटा लगाए ब्राह्मणवादी कहते हैं। निश्चित ही, ऐसे नेताओं और बौद्धिकों ने मार्क्स के विचारों को भोंथरा ही अधिक किया। मार्क्स के विचारों से प्रेरित लेकिन गंभीर स्व-परिवर्तन में असमर्थ व्यक्तियों के कारण यह विडंबनात्मक स्थिति पैदा हुई। मार्क्सवादियों में कथनी-करनी का अंतर पैदा होने लगा। इससे उत्पन्न अंतर्विरोधों ने साम्यवादी आंदोलन में विखंडन की प्रक्रिया प्रारम्भ की, जो अब तक चल रही है। पर विखंडन की इस प्रक्रिया में भारत के साम्यवादी नेतृत्त्व और मार्क्सवादी विचारकों में ऐसे व्यक्तित्त्व आसानी से खोजे जा सकते हैं, जिन्होंने निम्न-वर्ग और उत्पीड़ित वर्ग के लिए सैद्धान्तिक हथियारों का ही निर्माण नहीं किया बल्कि हथियारों से सिद्धान्त भी रचे। मार्क्सवाद अकादमियों और विश्व-विद्यालयों में पलने वाला वाद नहीं है, वह सम्पूर्ण विश्व के निम्न-वर्ग की मुक्ति की इच्छा की तीव्रता और विद्रोह का सिद्धान्त है। वाल्मीकि जी मार्क्स के विचारों पर चर्चा नहीं करते, लेकिन उन्हें भी अपने देवताओं में जगह दे देते हैं। मार्क्स के विचारों को जाने-समझे बिना ही उनका त्याग या स्वीकार दोनों ही का कोई अर्थ नहीं। वे भी प्रकारांतर से वही काम करते दिखते हैं, जो डॉ. अंबेडकर ने किया था, हालाँकि उनका प्रश्न जायज़ है – ‘शोषणविहीन समाज की परिकल्पना को साकार करने के लिए मार्क्सवादी विचारक ‘वर्ग’ के साथ ‘वर्ण’ को अपनी लड़ाई का लक्ष्य बनाने में ढुलमुल क्यों हैं?’[10]

लेकिन इस प्रश्न को उलटकर भी पूछा जा सकता है कि शोषणविहीन समाज की परिकल्पना को साकार करने के लिए अंबेडकरवादी विचारक ‘वर्ण’ के साथ ‘वर्ग’ को अपनी लड़ाई का लक्ष्य बनाने में ढुलमुल क्यों हैं? या वे वर्ग-विहीन समाज के लिए छिड़ी हुई लड़ाई में सचेत-सक्रिय सहयोग कर रहे हैं? कहीं वे भी दोहरी मानसिकता का शिकार तो नहीं!

सामाजिक-यथार्थ और समूहगत अनुभव का संतुलन दलित-साहित्य के समीक्षाशास्त्र का प्रमुख प्रतिमान है, पर वाल्मीकि जी ने इस पर ठीक से ध्यान नहीं दिया। उनका अनुभव पर इतना ज़ोर है कि सामाजिक-यथार्थ फिसलता जाता है। समूहगत या जाति/समुदायगत अनुभव सामाजिक-यथार्थ का एक खंड है, निश्चित ही, पूर्ण यथार्थ उसके बिना संभव नहीं, लेकिन वह पूर्ण यथार्थ भी नहीं। हमे कहना होगा कि सामाजिक यथार्थ पूरे समाज का यथार्थ है और दलित-साहित्य में वर्णित यथार्थ प्रायः समूह-विशेष का यथार्थ है। दलित-साहित्य में प्रायः समाज के अनुभव नहीं, व्यक्ति के अनुभव प्रस्तुत किए गए हैं। पूर्ण नहीं आंशिक सत्य पर ज़ोर दिया गया है। आश्चर्य नहीं, नव-उदारवादी नीतियों, उपभोक्तावादी-सभ्यता, फासीवादी राजनीति और प्रकृति के विनाश के प्रति अंबेडकरवादी आंदोलन की तरह ही दलित-साहित्य प्रायः उदासीन है। जबकि नई स्थितियाँ अंबेडकरवाद को चुनौती देती खड़ी हैं, इन चुनौतियों के प्रति भय या उपेक्षा का भाव रखना दलित-साहित्य और समीक्षा के लिए भी घातक सिद्ध होगा।

जो समीक्षक डॉ. अंबेडकर के संघर्ष और समीक्षा से प्रेरणा लेते हैं, उन्हें नया भगवान बनाकर दलितों की मुक्ति का स्वप्न देख रहे हैं, तो वे उसी जाल में फँस रहे हैं, जिसमें बुद्ध, सरह, कबीर आदि के अनुसरणकर्ता फँसे थे। भारत का इतिहास साक्षी है कि नया ईश्वर, नया धर्म, नया पुराण, नए भजन रचकर जाति-भेद को समाप्त नहीं किया जा सकता। अनुसूचित-जाति में विश्लेषण-संश्लेषण और योजना-निर्माण की क्षमता का विकास किए बिना अनुसूचित-जाति की मुक्ति संभव नहीं और साथ ही भारत की समाज-व्यवस्था में बदलाव संभव नहीं। दलितों के वैज्ञानिक जागरण के बिना दलित-साहित्य का सौंदर्यशास्त्र भी अधूरा ही रहेगा।

लोकायत से लेकर अंबेडकरवाद तक निम्न-वर्ग और उत्पीड़ित-वर्ग की मुक्ति के कई भारतीय-मार्ग रहे हैं, पर सभी ईश्वरवाद, धर्मवाद, पुराणवाद द्वारा ढँक दिए गए। अगर आज भी उत्पीड़ित-वर्ग इन चोंचलों को नहीं समझ पा रहा है, तो इसमें मुख्य रूप से उनके नाम पर राजनीति करने वाले संगठनों और नेतृत्त्व का दोष है। क्रांतिकारी शिक्षा के अभाव में निम्न-वर्ग और उत्पीड़ित-वर्ग के व्यक्ति सामाजिक-यथार्थ की आंशिक व्याख्या में ही सफल हो पाते हैं। यह व्याख्या प्रायः निज-अनुभव और मुख्य-धारा के प्रभाव में विकसित होती है। सामाजिक-यथार्थ की पूर्णता उनके समक्ष प्रकट नहीं हो पाती, और मुक्ति की उनकी खोज प्रायः नए ईश्वर के निर्माण में समाप्त होती है। नेता देवता की तरह हो जाते हैं, भक्त उनका यशोगान करते हैं – निम्न और उत्पीड़ित वर्ग आधुनिक स्थितियों की चमत्कारी दुनिया बना लेता है – मुक्ति का आधुनिक धार्मिक मार्ग, लेकिन न उत्पीड़न रुकता है न अपमान। विचार भोंथरे निकलते हैं, नेता बुज़दिल। उत्पीड़ित-वर्ग का न भौतिक विकास हो पाता है न आत्मिक। आने वाली पीढ़ी देखती है – नया ईश्वर, नए देवता, नया धर्म – लेकिन आत्मविश्वास और साहस का अभाव, समुचित शिक्षा और आनंद का अभाव। विडम्बना और निराशा का एकछत्र राज। कवि रोष प्रकट करता है –

मगर / अब तक तो / यही दिखाई दिया है / कि हमारे संगठनों के / लगभग सारे रहनुमा / वैचारिकता से / नपुंसक हैं / साहस से खाली हैं / इच्छा शक्ति से / बंजर और बाँझ हैं / और / अपने ही / कीचड़ में लथपथ रहकर / अचंभों में / मरने वाले / आत्मघाती जानवर हैं।[11]

मार्क्सवादी हों या अंबेडकरवादी, इस बात को समझा जाना चाहिए कि जिस तरह कर्मरहित चिंतन व्यर्थ है, उसी तरह चिंतनरहित कर्म भी व्यर्थ है। मीडिया और प्रबंधन उत्पीड़ितों को सोचने-समझने से रोकने का ही काम करते आए हैं। शोषक और शोषितों के, उत्पीड़क और उत्पीड़ितों के सदियों के संघर्ष से यह अनिवार्य सीख मिलती है कि शोषितों-उत्पीड़ितों के स्वयंबुद्ध हुए बिना किसी भी सामाजिक-व्यवस्था में कोई भी वास्तविक बदलाव असंभव है। संपूर्ण-निम्न-वर्ग की मुक्ति के बिना किसी क्षेत्र या सामाजिक-वर्ग की मुक्ति भी संभव नहीं। भावुक-श्रद्धा नहीं, क्रांतिकारी शिक्षा ही यह काम कर सकती है।

आत्मकथा दलित-साहित्य की विशेष विधा है। ओमप्रकाश वाल्मीकि ने स्वयं भी आत्मकथा लिखी है और अपने सौंदर्यशास्त्र में भी दलित-साहित्य में आत्मकथा के विशेष महत्त्व को स्वीकार किया है। दलित-आत्मकथा दलित-अनुभव का प्रामाणिक दस्तावेज़ सामाजिक यथार्थ की सापेक्षिकता में ही है, उससे अलग वह अस्तित्त्व में भी नहीं आ सकती थी, और उसकी समीक्षा भी सामाजिक यथार्थ के पक्ष के संतुलन में ही हो सकती है। सामाजिक यथार्थ अनुभव को जन्म देता है, न कि इसका उलट। ओमप्रकाश वाल्मीकि सामाजिक यथार्थ की उपेक्षा पर एक पक्षीय (अंबेडकरवादी) अनुभव के साहित्य के रूप में दलित-साहित्य को स्थापित करते हैं, लेकिन उनकी आत्मकथा, कविताएं और कहानियाँ इस स्थापना का विरोध आप हैं।

समाज और व्यक्ति की पारस्परिकता में अनुभव निर्मित होते हैं, वाल्मीकि जी का सौंदर्यशास्त्र इस मूलभूत बात की उपेक्षा कर अनुभव के स्वामित्व को ही महत्त्वपूर्ण मानता है। फिर अनुभव के स्वामित्व की विविधता भी वे स्वीकार नहीं कर पाते, अंबेडकरवादी अनुभव ही उनके लिए दलित-अनुभव है। निश्चित ही, दलित-अनुभव सामाजिक यथार्थ में एक दलित-व्यक्ति के हस्तक्षेप को प्रस्तुत करता है और दलित-साहित्य दलित-अनुभव के सत्य का प्रकाशन करता है, लेकिन वाल्मीकि जी के अनुभव क्या कौशल्या बैसंत्री के अनुभवों से सादृश्यता दिखलाते हुए भी अलग नहीं हैं? वाल्मीकि जी दलित-आत्मकथाओं के अंतर्संबंधों की भी उपेक्षा करते हैं। आज दलित-साहित्य के विस्तार के साथ हिन्दी में दलित-आत्मकथाओं में भी शुभवृद्धि हुई है, तब भी अभी वह बहुत कम है। आत्मकथा आमतौर पर बुढ़ापे में लिखी जाती है और दलित-साहित्य अभी मुख्यतः युवाओं के हाथ में है। अभी हज़ारों दलित-आत्मकथाओं की भूमिका बन रही है। इन भविष्य की आत्मकथाओं की संगति में इन प्रारम्भिक आत्मकथाओं को और बेहतर समझा जा सकेगा। दलित-आत्मकथाओं और स्व-कथनों ने भारत के निम्न-वर्ग के दलित-अनुभवों को दर्ज कर अभूतपूर्व कार्य किया है। स्व-कथा नहीं, तो स्व-कथन के माध्यम से ही, लेकिन अन्य उत्पीड़ित वर्गों को भी इस कार्य में सहयोग के लिए आगे आना चाहिए। भारत के अन्य उत्पीड़ित-वर्गों के लिए दलित-साहित्य प्रेरणा और बहस का स्रोत है।

कुछ समीक्षक डॉ. अंबेडकर को पूंजीवाद और ब्राह्मणवाद के विरोधी के रूप में प्रस्तुत करने पर ज़ोर देते हैं, जबकि डॉ. अंबेडकर की चिंता और चिंतन का मुख्य विषय पूंजीवाद-विरोध नहीं रहा। अंबेडकरवादी आंदोलन भी पूंजीवाद का सचेत-सक्रिय विरोधी नहीं है। अगर हम डॉ. अंबेडकर के जीवन और विचारों का भावुक-श्रद्धापूर्ण अनुशीलन भर न करें और अंबेडकरवादी आंदोलनों के ज़मीनी कार्यों को देखें, तो हमें ज्ञात होगा कि भारत में ब्राह्मणवाद-विरोधी चेतना के निर्माण में जितना सहयोग डॉ. अंबेडकर और अंबेडकरवाद का है, उतना किसी वामपंथी-संगठन का नहीं, साथ ही यह भी कि पूंजीवाद-विरोधी चेतना के निर्माण में डॉ. अंबेडकर के विचारों और अंबेडकरवादी-संगठनों का सहयोग न के बराबर है। पूंजीवाद और ब्राह्मणवाद  के संयोजित रूप का विरोध अंबेडकरवादी और मार्क्सवादी आंदोलन की नई दिशा है। ऐसे प्रयास अभी अपने प्रारम्भिक दौर में हैं।

भारत का पूंजीवाद विशिष्ट है, वह विभिन्न जातियों-जनजातियों-समुदायों से निर्मित, एक बहुराष्ट्रीय सामाजिक-संरचना में कार्यरत है। भारत में पूंजीवाद उपनिवेशी-शक्तियों, स्थानीय भू-स्वामियों और व्यापारियों के संयोग से निर्मित हुआ है। उच्च-वर्ग की सहभागिता के बिना उपनिवेश का निर्माण असंभव था। यहाँ यह नहीं भूलना चाहिए कि वर्तमान भारत का एक बड़ा भाग कभी सीधे उपनिवेश के अंतर्गत नहीं रहा। भारत का समाज उत्तर-उपनिवेशी-काल में भी पारंपरिक उच्च-वर्ग के नियंत्रण में ही विकसित होता रहा है। पारंपरिक बौद्धिक ही उत्तर-उपनिवेशी भारत में शासक-वर्ग के रूप में उभरे। यह वर्ग ही पूंजीवाद का लाभ लेने में सक्षम था और है, वह अपने रहते उत्पीड़ित-वर्गों को स्वतन्त्रता या लोकतन्त्र का लाभ नहीं लेने देगा, इसी कारण उत्पीड़ित-वर्गों की मुक्ति पूंजीवाद के नाश से सीधे सम्बद्ध  है। भारत के पारंपरिक उच्च-वर्ग के आचार-विचार ही मुख्य-धारा के आचार-विचार हैं। वर्तमान भारत की समाज-व्यवस्था भी इन्हीं पारंपरिक उत्पीड़क-वर्ग के पूँजीपतियों के अधीन है। भारत में पूंजीवाद, फूले से लेकर अंबेडकर के समय तक, वह भी सीमित अर्थों में, दलितों के लिए उपहार था। लेकिन पूंजीवाद के अपने हित थे, जो दलितों के हित के विपरीत थे और हैं, इसी कारण भारत में विकसित पूंजीवादी-साम्राज्यवादी-संसदीय-प्रणाली अनुसूचित-जाति के लिए सुविधा नहीं दुविधा बनती गई। संविधान भारत के निम्न-वर्ग और उच्च-वर्ग के बीच एक ऐसे समझौते के रूप में उभरा, जिसे बोटी देकर बकरा लेना कहा जा सकता है। डॉ. अंबेडकर ने इस स्थिति के संबंध में अपने विचारों को १९५५ में बी.बी.सी. को दिए एक साक्षात्कार में रखा है। वे कहते हैं कि हमारे देश में एक ऐसी सामाजिक संरचना है, जो संसदीय प्रणाली के साथ पूरी तरह असंगत है।[12] उनके अनुसार भारत की आज़ादी के बाद विकसित हो रहा लोकतन्त्र ‘अछूतों’ की मुक्ति में विशेष सहयोगी नहीं हो पाएगा। वे संसदीय-चुनावों में जीत-हार, भाषण और लोकतन्त्र के भरोसे बैठे रहने की बजाय, दलित-मुक्ति के लिए ठोस कार्यक्रम/योजना और संस्थाओं/संगठनों के निर्माण की वकालत करते हैं।

भारत भर के शोषण-उत्पीड़न-विरोधी आंदोलनों का संयोजन और निम्न-वर्ग की एकजुटता इतनी आसान नहीं। भारत के निम्न-वर्ग के खाते में निरंतर विजय दर्ज करते जाने वाली विचारधारा, आंदोलन और नेतृत्त्व अभी तक विकसित नहीं हो सका है। मिज़ोरम और राजस्थान की, कश्मीर और केरल की सामाजिक-व्यवस्था और निम्न-वर्ग की चेतना और संगठन का स्तर एक-से नहीं है, यद्यपि पूरे भारत में शोषण-उत्पीड़न का कारोबार जारी है, पूंजीवाद हावी है। निम्न-वर्ग के पास विचारधारा के नाम पर देसी कट्टे हैं, और शत्रु एके-47 लिए खड़ा है।

हिन्दी-दलित-साहित्य और अंबेडकरवाद नाभिनालबद्ध हैं, लेकिन अंबेडकरवादी आंदोलन की सीमा को दलित-साहित्य की सीमा नहीं माना जा सकता। डॉ. अंबेडकर के विचारों को सभी दलित-साहित्यिकों पर भी नहीं थोपा जा सकता। आज डॉ. अंबेडकर के विचारों और अंबेडकरवादी आंदोलनों को पूर्णता में परखने की ज़रूरत है, साथ ही बुद्ध या कबीर या फुले या पेरियार या अयंकाली के कार्यों-विचारों को डॉ. अंबेडकर के मातहत करने से बचने की भी। दलित-साहित्य का सौंदर्यशास्त्र भौतिक इतिहास के नकार और सामाजिक यथार्थ की उपेक्षा पर नहीं तैयार हो सकता।

बुद्धवाद हो, मार्क्सवाद हो या अंबेडकरवाद, जो निम्न-वर्ग और उत्पीड़ित-वर्ग को बौद्धिक और आत्मिक रूप से नेताओं और विचारकों पर आश्रित रखना चाहता है, वह उनका हितैषी नहीं हो सकता। दलित-आत्मकथाएँ भारत में क्रांतिकारी शिक्षा की आधार पाठ्य-वस्तु है। दलित-साहित्य – विशेषकर आत्मकथा – और समीक्षा ने मेरे सामने जिस दुनिया को खोल दिया है, वह भूख, पीड़ा, रोष, आशा और बहस की दुनिया है। यह दुनिया चीख-चीख कर कह रही है – हमें न नए पवित्र (ब्राह्मण) चाहिए, न नए ‘अछूत’ (दलित), हमें न नए पूंजीपति चाहिए, न नए मज़दूर, हमें ख़ुशी और सम्मान का जीवन चाहिए, हम शोषण, उत्पीड़न और अपमान की समाज-व्यवस्था का विनाश करके ही दम लेंगे – ‘हमारी दासता का सफर / तुम्हारे जन्म से शुरू होता है / और इसका अंत भी / तुम्हारे अंत के साथ होगा।‘[13]

usman khanउस्मान ख़ान समकालीन हिंदी साहित्य के अलहदा युवा कवि-कथाकार-आलोचक हैंचर्चाओं और पुरस्कारों की भीड़ से अलहदा… छपाऊ मानसिकता से भी अलहदा... जे.एन.यूके हिंदी विभाग से मालवा के लोकसाहित्य पर पीएचडीइनसे usmanjnu@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

 

सन्दर्भ: 

[1]  संदर्भ-सूची में आवश्यक संदर्भ ही दिए गए हैं, जबकि विचार कई संदर्भों से लिए गए हैं।

[2]  पूरी ग़ज़ल इस लिंक पर पढ़ें – https://www.rekhta.org/ghazals/fariyaad-kii-koii-lai-nahiin-hai-mirza-ghalib-ghazals?lang=hi

[3]  अधिक जानकारी के लिए देखें – रंगनायकम्मा, ‘जाति’ प्रश्न के समाधान के लिए बुद्ध काफ़ी नहीं, अंबेडकर भी काफ़ी नहीं, मार्क्स ज़रूरी है, राहुल फाउंडेशन, २००८

[4]  जॉन ड्यूई, आर्ट एज़ एक्सपेरियंस, द बर्कले पब्लिशिंग ग्रुप, पेंग्विन ग्रुप, २००५

[5]  ओमप्रकाश वाल्मीकि, दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र, राधाकृष्ण प्रकाशन, २०१४, पृ.-५०

[6]   पूरी कविता इस लिंक पर पढ़ें – https://aavazdo.wordpress.com/2017/10/01/ये-दलितो-की-बस्ती-है/

[7]  डॉ. भीमराव अंबेडकर, अछूत कौन और कैसे, अनुवादक – भदंत आनंद कौसल्यायन, गौतम बूक डिपो, प्रथम प्रकाशन, १९४९, पृ.-८८। ‘सौंदर्यशास्त्र’ में पुस्तक का नाम ‘शूद्र कौन और कैसे?’ छपा है।

[8]   ओमप्रकाश वाल्मीकि, उपरोक्त, पृ.-५०

[9]   ओमप्रकाश वाल्मीकि, उपरोक्त, पृ.-५३

[10]  ओमप्रकाश वाल्मीकि, उपरोक्त, पृ.-९७

[11]  बजरंग बिहारी तिवारी, दलित साहित्य : एक अंतर्यात्रा, नवारुण प्रकाशन, २०१५, पृ.-५८ से उद्धृत। निश्चित ही, ‘नपुंसक’ और ‘बांझ’ जैसे शब्द खलते हैं, लेकिन आशय स्पष्ट है।

[12]   पूरा साक्षात्कार इस लिंक पर देख-सुन सकते हैं – https://www.youtube.com/watch?v=4RcGJtl2nhE

[13]  बजरंग बिहारी तिवारी, उपरोक्त, पृ.-७३ से उद्धृत

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