सुरेन्द्र चौधरी- विराट ऐतिहासिक संदर्भों से समृद्ध आलोचक: मार्तंड प्रगल्भ

सच्ची आलोचना किस कदर गंभीर वैचारिक संघर्ष का परिणाम होती है इसे सुरेन्द्र चौधरी के लेखन में स्पष्ट ही देखा जा सकता है। रचना के प्रति  जिस संवेदनशीलता की जरूरत होती है और असहमति के क्षणों में भी आलोचना की भाषा में  जो विनम्रता होनी चाहिए इसे भी इनके यहाँ देखा जा सकता है। सुरेन्द्र चौधरी पर बहस एक ऐतिहासिक ज़रुरत है। ज़रुरत है हिंदी की प्रगतिशील आलोचना की एक दूसरी परम्परा से संवाद की। बौद्धिक समाज क्या इसके लिए तैयार है? विचारहीनता और तात्कालिकता के दबाव के बीच हिंदी आलोचना की समृद्ध प्रगतिशील परंपरा क्या सुरेन्द्र चौधरी से संवाद नहीं करेगी? ऐतिह्यता का प्रश्न सुरेन्द्र चौधरी के लेखन का मूल प्रश्न है। इसलिए समकालीनता और तात्कालिकता से उनकी मुठभेड़ ही उनकी आलोचना बनाती चलती है। यह अकारण नहीं कि इतिहास के प्रश्नों से उलझने वाला यह आलोचक साहित्य के आख्यान रूपों पर अपनी विशेष दृष्टि रखता है। पर कविता के संबंद्ध में उनका छिटपुट लेखन किसी भी बड़े काव्य आलोचक के लिए इर्ष्या का कारण बन सकते है।  बहरहाल। 

BY मार्तंड प्रगल्भ 

सबसे पहले डॉ॰ चौधरी की पुस्तक ‘इतिहास: संयोग और सार्थकता’ से उनके कुछ निष्कर्षों-स्थापनाओं को उद्धृत करना चाहता हूँ-

  •  ‘‘स्पष्ट है कि हिंदी साहित्य में आधुनिकता दो महायुद्धों के बीच उत्पन्न अवस्था नहीं है और न वह मात्र ‘मूल्यबोध और विराट विघटन’ के तनाव के बीच की उपलब्धि है। हिंदी में आधुनिकता की प्रतिष्ठा इस ‘विराट विघटन’ के नारे से लगभग 80-90 वर्ष पूर्व हो चुकी थी। हिंदी में आधुनिकता बोध का संस्कार आत्मचेता से अधिक वस्तुसत्य चेता है।’’ (पृ.219 खंड1) (ध्यान दें कि आधुनिकतावाद शब्द का इस्तेमाल न करते हुए भी, आधुनिकता, आधुनिकताबोध के अपने आशयों को यहां मिलाकर प्रयोग किया गया है। परंतु महायुद्धों की चर्चा से स्पष्ट है कि आधुनिकतावाद शब्द के अपने अर्थों में ही इसे पढ़ना चाहिए। इन शब्दों के अपने अर्थ पश्चिमी हैं परंतु डॉ॰ चौधरी भारतीय परिस्थितियों में इसे समझने की कोशिश कर रहे हैं।)
  •  ‘‘भारतीय परिस्थितियों में ‘उदारतावादी चेतना’ चूंकि रोमैंटिक दृष्टिविस्तार का परिणाम थी और बौद्धिक उद्बोध की परिणति थी इसलिए आधुनिक इतिहास में वह अपने ढंग की अकेली है। …भारत में आधुनिकता पश्चिमी राज्यसत्ता की क्रांतिकारी भूमिका से नहीं आई और न वह भारत में उनकी शैक्षणिक नीति से आई। वह भारतीय बुद्धिजीवी के उद्बोध से उत्पन्न हुई। …वस्तुतः भारत में आधुनिकता का उत्थापन अंग्रेजों की प्रत्यवस्थान शक्ति से भारतीय पूंजी के प्रतिरोध से होता है। इस अर्थ में भारतीय पूंजीपति की राष्टीय भूमिका अपने उत्थापन युग में क्रांतिकारी जनहितपरक, और राष्टीय स्वार्थ से अनिवार्यतः प्रेरित रही है। भारतेंदु युग का संपूर्ण साहित्य अपने जन चारित्र्य के व्याख्यान के द्वारा यह स्पष्ट करता है कि इस युग में भारतीय बुद्धिजीवी का स्वार्थ अविकल रूप से भारतीय जनता से जुड़ा हुआ था। इस काल का वर्गसंघर्ष चरित्रतः उपनिवेशविरोधी और आभिजात्यविरोधी है। यही कारण है कि संपूर्ण युग की विचार पद्धति में उपनिवेशविरोध और आभिजात्यविरोध की चिंतासरणि प्रधान है।’’ (पृ.219-20-21,खंड1)
  • ‘‘ऐसा लगता है कि ‘भाग्यवती’ के लेखक ने अकेले भाग्यवती से सारी भूमिकाएं संपन्न करवाने का व्रत ले लिया है, फिर भी इतना तो निश्चित है कि हिंदी उपन्यास साहित्य में भाग्यवती आधुनिक युग की यूलिसिस है।’’ (पृ.222, खंड1) (यूलिसिस और जेम्स ज्वाएस की अपनी पश्चिमी उपस्थिति और आयरलैंड की औपनिवेशित दासता जिस ढंग से अंतर्विरोधी साम्राज्यवादी चरित्र का क्रिटिक है, उसे भारतीय संदर्भों में भाग्यवती से तुलना करना एक प्रमुख वैचारिक प्रस्थान है। ‘माडर्निस्ट’ पेपर में संकलित फ्रेडरिक जेमसन के लेखों में इस आधुनिकतावाद के सहारे साम्राज्यवाद के चरित्र को समझने का प्रयास किया गया है।)
  • ‘‘उदारता की चेतना, मेरी छोटी धारणा के अनुसार, एक विशेष वर्ग की जीवन परिस्थितियों की द्वंद्वात्मकता की मांग है। यह वर्ग अपने प्रारंभिक उत्थापन के युग में निश्चित रूप से क्रियाशील, अथवा प्रगतिशील रहता है। भारतेंदु युग अपनी उदारचेता जीवन-विधा के कारण और विचार सरणि के कारण क्रियाशीलता और प्रगति का युग है। इस युग की सबसे बड़ी विशेषता इसका ‘आधुनिकता बोध’ नहीं है, बल्कि आधुनिकता की मांग को क्रियात्मक पूर्णता देने की तत्परता है। यह युग, जहां एक अभावात्मक परिस्थिति का निषेध करता है (निगेशन ऑफ निगेशन) वहीं इसका अंतर्विरोध सार्थक हो जाता है।’’ (पृ.223,खंड1)
  • ‘‘भारतेंदु युग की सारी परिस्थितियां रोमांटिक धारणा के अनुकूल होकर भी रोमैंटिक उद्बोध में असफल रहीं। इसका एकमात्र कारण राजनीतिक सत्ता का अंतर्विरोध था। भारत उस उत्थान विशेष में औपनिवेशिक व्यवस्था के रूप में परिणति ग्रहण कर रहा था, फलतः भारतीय बुद्धिजीवी उस अदम्य असीमित इच्छाशक्ति के बोध को व्यावहारिक परिणति देने में असमर्थ था। राजनीतिक  परतंत्रता ने भारत के प्रथम आत्मोद्बोध को व्यंग्यात्मक परिणति दे दी। किंतु यह राजनीतिक परतंत्रता देश की प्रथम जागृति को बहुत दिनों तक व्यंग्यात्मक दृष्टिकोण के घेरे में बंधे रहने तक विवश नहीं कर सकी। निर्विशेष राष्टीयता बनकर यह जागृति श्रीधर पाठक, राम नरेश त्रिपाठी और मैथिलीशरण गुप्त के साहित्य में उत्थापित हुई। हिंदी में छायावाद इसी निर्विशेष जागृति का परिणाम है। उसकी अवाचकता का यही रहस्य है। (पृ.226, खंड1)
  •  ‘‘कविता के आश्रय पक्ष की जितनी समृद्ध भक्ति काल के पश्चात छायावाद के उत्थान में देखी जा सकती है वह न इन दो कालों के अंतराल में संभव है और न उसके पश्चात ही। व्यक्ति की इच्छाशक्ति जितने विविध धरातलों पर छायावाद युग में बोध (रियलाइजेशन) ढूंढती है, उतनी किसी परवर्ती उत्थान में नहीं।’’ (पृ. 227, खंड1)
  •  ‘‘प्रसाद ने न केवल गुप्त युग की गाथाएं गाईं, बल्कि उस युग की कला, संस्कृति का दैवीकरण किया। उन्होंने भारतीय इतिहास की गति का अतीत की ओर मोड़ना चाहा…। प्रसाद शात्योब्रां की तरह स्वच्छंदतावाद की प्रतिक्रियात्मक सरणि के अनुगामी है। राजनीतिक धारणा के क्षेत्र में साम्राज्य वैभववादी, धर्म के क्षेत्र में सनातनी और दर्शन के क्षेत्र में सांस्कृतिक स्पर्श के साथ प्रसाद स्वच्छंदतावादी हैं।’’ (पृ.228, खंड1)
  •  ‘‘महादेवी इस धारा की सबसे कमजोर कवयित्री हैं क्योंकि उनका उद्बोध न अतीत की भूमि पर संतुलित हो पाता है और न इतिहास की वर्तमान गति का अनुसरण कर पाता है। अतीत से विच्छुरित और वर्तमान में अप्रतिष्ठित कवयित्री की आत्मा संतुलन के लिए मात्र अवाचक का सहारा लेती रह जाती है। उनका दुखवाद इसलिए (मेरी दृष्टि में) उनके व्यक्तिगत कारणों से अधिक दृष्टिकोण की अस्पष्टता का परिणाम है। महादेवी निरर्थक आत्मचेतना का दैवीकरण करती हैं।’’ (पृ.228, खंड1)
  •  ‘‘पंत जी का रोमैंटिक दृष्टिकोण अपनी ही द्विरूपता के कारण उलझ जाता है। ‘गुंजन’ के उपरांत निरंतर वे पश्चिम और पूर्व के बीच अपनी चेतना का समझौता करने को आकुल हैं। भौतिकता और आध्यात्मिकता उनके लिए समस्याएं (इनिग्मा) उलझनें बन जाती हैं। भावसत्ता और वस्तुसत्ता के बीच कृत्रिम विभाजन करने को वे आकुल हैं। ऐसा कृत्रिम विभाजन निराला ने नहीं किया; महादेवी ने भौतिक धरातल का बलात् निषेध-आग्रह रखा, प्रसाद ने ‘कामायनी’ में इस विरोध का संतुलन कल्पित रूप से कर लिया। पंत जी किसी भी कल्पित भूमि पर ऐसा समझौता कर नहीं पाते, अरविंद के सर्वचेतनवाद की शरण में जाकर भी नहीं। (उदाहरणार्थ ‘कला और बूढ़ा चांद’)। वे चेतना के धरातल पर दो बिंदुओं को सरल रेखा से मिलाना चाहते हैं, यथार्थ अंतर्विरोध बन जाता है। फलतः वे प्रसाद की तरह नव्य श्रेण्यता (निओ क्लासिसिज्म) को स्वीकार करने में भी अक्षम रहते हैं और शुद्ध रोमैंटिक उद्बोधों को भी सहेज नहीं पाते। निराला और प्रसाद से वे इसी अर्थ में न्यून सिद्ध होते हैं।’’ (पृ.231, खंड1)
  • ‘‘मेरी दृष्टि में छायावाद के प्रारंभिक उत्थान में नाटकीय संवादी स्वर नहीं है। यह शुरू होती है बच्चन, भगवती चरण वर्मा, दिनकर और नवीन के साथ। इन कवियों में अधिकांश के पास कोई दृष्टि ही नहीं है, उनके पास केवल प्रतिरोधजन्य नाटकीयता है जो कभी दृष्टि बन ही नहीं सकती। उस अर्थ में इनमें जो सहजता है, उसे विशिष्ट मनोभूमि की सहजता मानने का खतरा केवल साही साहब ले सकते हैं। जितना शक्ति प्रवाह बच्चन और वर्माजी की रचनाओं में नहीं है, उतना साही साहब में है जिसके बहाव में वे साहित्य के सहज विकास के सूत्रों को छोड़कर कैलिडोस्कोपिक विविध्ता में खो जाते हैं।’’ (पृ.233, खंड1) (‘लघु मानव के बहाने हिंदी कविता पर एक बहस’ में उल्लिखित छायावादी विजन के टूटने के संदर्भ में पढ़ा जाए।)
  •  ‘‘चाहे प्रगतिवादी आंदोलन ने साहित्य में कोई महान भूमिका न भी पूरी की हो मगर इतना तो मानना पड़ेगा कि उसने क्षयी रोमांस का रचनात्मक धरातल पर विरोध किया और हिंदी नवलेखन को मध्य वर्ग की पतनशीलता की तस्वीर बन जाने से बहुत हद तक बचा लिया। हिंदी नवलेखन अगर ‘गुनाहों के देवता’ की पूजा और ‘अंधा युग’ के विक्षिप्त बोध से बच सका तो इसका कारण मैं यशपाल, अश्क, नागार्जुन, त्रिलोचन और केदारनाथ अग्रवाल के सशक्त रचनात्मक लेखन को मानता हूँ।’’ (पृ.235, खंड1)
  •  ‘‘तृतीय दशक में रोमैंटिक दृष्टि जिस प्रकार अपनी विशिष्ट असंगतियों के कारण पतनशील हो गई थी। उसकी प्रतिक्रिया की जमीन अलग-अलग है, एक ओर अज्ञेय के साथ व्यक्तित्व का उत्थापन और दूसरी ओर मानववाद की परंपरा के विकास की तत्परता। संपूर्ण चतुर्थ दशक और पंचम दशक में व्यक्तिवाद से मानववाद की टकराहट होती रही और उसकी अनुगूंज साहित्य के क्षेत्र में सुनाई पड़ती रही। इस दरम्यान व्यक्तिवाद न बर्गशां से लेकर सार्त्र तक के नकाब बदले, मगर उसका संकट समाप्त नहीं हुआ।’’ (पृ. 236)
  •  ‘‘1950-60 तक नवलेखन ने एक व्यापक आंदोलन का स्वरूप धारण कर लिया लेकिन इससे यह नहीं मान लेना चाहिए कि नवलेखन पर व्यक्तिवाद का प्रभाव शेष ही नहीं रहा था। कवियों का एक समुदाय ऐसा था जो अब भी बदले हुए स्वर में पुराना राग अलाप रहा था। कहानियों में व्यक्तियों की आत्मकेंद्रता के साथ एक समानान्तर स्वर भी उभरता है जिसे प्रकाश में लाने की आवश्यकता है। यह स्वर हमारे स्वातंत्रयोत्तर नवजागरण से जुड़ा हुआ है। (डॉ॰ नामवर सिंह की शब्दावली में)” (पृ.237, खंड1)

    Surendra Choudhary 13 जून 1933- 09 मई 2001

    Surendra Choudhary
    13 जून 1933- 09 मई 2001

क्या आधुनिक हिंदी साहित्य के इतिहास को देखने की एक नयी दृष्टि का उन्मेष इन उद्धरणों से होकर नहीं जाता? बौद्धिक समाज क्या इसके लिए तैयार है? विचारहीनता और तात्कालिकता के दबाव के बीच हिंदी आलोचना की समृद्ध प्रगतिशील परंपरा क्या सुरेन्द्र चौधरी से संवाद नहीं करेगी? ऐतिह्यता का प्रश्न सुरेन्द्र चौधरी के लेखन का मूल प्रश्न है। इसलिए समकालीनता और तात्कालिकता से उनकी मुठभेड़ ही उनकी आलोचना बनाती चलती है। यह अकारण नहीं कि इतिहास के प्रश्नों से उलझने वाला यह आलोचक साहित्य के आख्यान रूपों पर अपनी विशेष दृष्टि रखता है। पर कविता के संबंद्ध में उनका छिटपुट लेखन किसी भी बड़े काव्य आलोचक के लिए इर्ष्या का कारण बन सकते है।  बहरहाल।

 सुरेंद्र चौधरी के लिए भारतीय इतिहास की धारा जातीयता के निर्माण के प्रश्न से तय होती मालूम होती है। जातीय निर्माण की प्रक्रिया संबंधी यह चिंतन हिंदी में राम विलास शर्मा की देन है। जातीय निर्माण की अवधारणा को भाषा से जोड़ते हुए डॉ॰ शर्मा ने एक किताब लिखी थी-‘भाषा और समाज’। इसमें उन्होंने कुछ महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए थे। लघु जातियों के निर्माण संबंधी अवधारणा को प्रस्तुत करते हुए शर्मा ने बताया था कि किस प्रकार जनपदों के विकास से भिन्न वस्तुगत आधार लेकर मध्यकाल में जातियों का निर्माण हुआ। यह निर्माण हिंदी की भिन्न बोलियों के विकास के साथ हुआ था और दोनों में कापफी सारे संबंध सूत्र उन्होंने खोजे थे। स्तालिन के महाजाति की निर्माण संबंधी धारणा और उसके भाषा विषयक चिंतन का प्रभाव यहां स्पष्ट रूप से लक्षित किया जा सकता है। इसे आधुनिक काल में तथा उससे पहले व्यापारिक पूंजीवाद के साथ जोड़ते हुए महाजाति और राष्ट्रभाषा की अवधारणा डॉ॰ शर्मा ने रखी थी। इतिहास की यह अवधारणा दोषयुक्त है परंतु उसके अपने ऐतिहासिक आधार भी हैं। और इसका एक सिरा राष्ट्रवादी इतिहास लेखन और मार्क्सवादी इतिहास लेखन के घालमेल में खोजा जा सकता है। बहरहाल, नवजागरण और जातीय निर्माण संबंधी प्रक्रिया के चिंतन का एक स्वरूप और उसका प्रभाव ग्रहण चौधरी के लेखन में स्पष्टतया देखा जा सकता है। इसी संदर्भ में औपनिवेशिक चिंतन को एक चुनौती भी मिलती रही है। डॉ॰ चौधरी ने 1857 के महाविद्रोह के बाद चलनेवाली जातीयताओं के नवगठन को औपनिवेशिक प्रशासकीय नीति के लिए एक खतरा माना था। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में लिखा कि उर्दू को इलाकाई जबान बताकर अलगाने की कोशिशें हुईं, बंगाल विभाजन हुआ, मराठा क्षेत्र को तोड़ा गया और उड़ीसा के साथ विभाजक नीति अपनाई गई। ‘‘ऐसी स्थिति में भारत की एकता, कौमियतों की नकार से सिद्ध करने के बजाय उसके सहकार में सिद्ध करने का स्तर जनवादी है।’’ (पृ.122, खंड1) इतिहास में जनवादी मूल्यों की पहचान हमेशा एक चुनौती रही है। रेडिकल इतिहास लेखन कई बार अतिवाद का शिकार होता रहा है। इस अतिवाद के मूल में एक ऐसी इतिहास दृष्टि काम करती है जो नितांत समकालीन विमर्शों का प्रक्षेप अतीत के किसी कालखंड में करता है। ठेठ समकालीन विमर्शों को आधार बनाकर इतिहास की व्याख्याएं  गलत निष्कर्षों तक पहुंच जाती हैं। हिंदी नवजागरण संबंधी चिंतन के साथ यही होता रहा है। सांप्रदायिकता के प्रश्नों से जूझते हुए कुछ विचारक हिंदी नवजागरण को नितांत हिंदू नवजागरण सिद्ध करते हैं। ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य की सीमाओं को ध्यान में न रखने के कारण ही ऐसा होता है। भारतेंदुयुगीन नववैष्णवता को पुनरुत्थानवादी बताना भी ऐसी ही दृष्टि का फल है। वास्तविकता यह है कि जिस वैष्णवता को भारतेंदु भारतीयता का आधार बता रहे थे, वह कोई मध्ययुगीन अवधारणा न थी। धर्मांधता और सांप्रदायिकता के बरक्स यह धर्म और लोक में प्रेम की महत्ता को स्वीकार करते हुए अलगाववादी ताकतों के खिलाफ एक मॉडल था। राज्य और जाति संबंधी पश्चिमी अवधारणा के समानांतर यह राष्ट्र-राज्य के अपने निर्धारक तत्वों को पहचानने की कोशिश थी। डॉ॰ चौधरी ने ‘स्वाधीनता संग्राम और हिंदी साहित्य’ नामक लेख में डॉ॰ राम विलास शर्मा की मान्यताओं से सहमति जताई है। बाद में इस नववैष्णवता के जनवादी स्वरूप की पहचान डॉ॰ नामवर सिंह ने ‘हिंदी नवजागरण की समस्याएं’ नामक अपने लेख में की है। अमेरिकी स्वाधीनता आंदोलन के वक्त जिस प्रकार नव ईसाई विचारधारा की नैतिकता कोई बाधक तत्व नहीं थी और मैक्स बेबर से लेकर व्हिटनी ग्रिसगोल्ड तक इसका समर्थन कर रहे थे, उसी प्रकार भारतेंदु मंडल की वैष्णव नैतिकता ‘क्रिस्तान, मुसलमान और ब्राहम धर्मों के प्रेम मार्ग’ को इस विचारधारा से जोड़ने का जनवादी प्रयास था। और यह अकारण न था कि नववैष्णवता की यह धारा गांधी के ‘हिंद स्वराज’ के लोकचिंतन का आधार भी बना था। पश्चिमी आधुनिकता के मूल्यों में छिपे प्राच्यवादी षड्यंत्र के सामने भारतीयता की पहचान एक समस्या है। ‘हिंद स्वराज’ के सौ वर्ष पूरे होने पर जो चिंतन दोबारा भारतीय आधुनिकता की खोज कर रही है, वह इस नववैष्णवता के महत्व को खारिज नहीं कर सकती। डॉ॰ चौधरी ने लिखा था-‘‘बचकाने किंतु उत्साही मार्क्सवादी को इसे संदर्भ से जोड़ने की जरूरत है। स्वाधीनता आंदोलन और साहित्य की प्रेरक परिस्थितियों का यह ताना-बाना बहुत महत्वपूर्ण है और किसी निर्णायक दिशा के लिए आधार का काम करता है। नववैष्णवता न पुनरुत्थानवादी है, न पुराणपंथी और न वह शुद्ध मध्ययुगीन ही है। उसमें वर्तमान के अनुरूप धार्मिक सहिष्णुता, उदारता और प्रेम मार्ग पर चलकर उस एकता की आकांक्षा है जो उसकी मुक्ति का उपनिवेश और पिछड़ेपन का बायस बन सकती है। धर्म बुद्धि साहस की स्वीकृति और आलस्य त्याग के साथ इस नववैष्णवता का वही संबंध हो सकता है जो कॉलविनवादियों का न्यू इंग्लैंड से बना था।’’ (पृ.125, खंड1)

आगे डॉ॰ चौधरी नववैष्णवता के अंतर्विरोधों को पहचानने के लिए ‘इंदु’ और ‘सरस्वती’ के लेखों का हवाला भी देते हैं। हरिऔध, मैथिलीशरण गुप्त और प्रसाद के विचारों की समीक्षा का आग्रह करते हैं। ‘जनमेजय का नागयज्ञ’ में कृष्ण का मानवता की घोषणा और ‘कंकाल’ में गोस्वामीजी के भाषणों में इस नववैष्णवता के अनुगूंज है। ‘‘आज हम धर्म के जिस ढांचे के शव को घेरकर रो रहे हैं, वह उनका (कृष्ण) धर्म नहीं है।’’ पंडित माध्व प्रसाद मिश्र के लेखों में नववैष्णवता के प्रश्नों पर चिंतन है। ग्रियर्सन की क्रिस्टोमायथी से पहले श्री ब्रहमानंद जी 1897 में निबंधावली में क्रिश्चियन विश्वासों का नववैष्णव संदर्भ दिखाया था। स्वदेश भक्ति का भावना के रसात्मक रूप का नववैष्णवता से क्या संबंध हो सकता है, यह भी डॉ॰ चौधरी की चिंता का विषय है। क्या नववैष्णवता का प्रेमचंद पर भी प्रभाव था या फिर निराला का नववेदांत पुनरुत्थानवादी था? ऐसे प्रश्नों पर फिर से विचार की आवश्यकता है।

विचारधारात्मक अंतर्विरोधों के कौन से सूत्र हिंदी नवजागरण के प्रारंभिक चरण को भाषा के सांप्रदायीकरण की ओर ले जाते हैं, इसे डॉ॰ चौधरी नहीं बताते। भारतेंदुयुगीन राजभक्ति बनाम देशभक्ति के द्वैत को व्याख्यायित न कर डॉ॰ चौधरी इतिहास की मौखिक परंपरा के क्रांतिकारी होने के मिथक को तोड़ने के लिए तत्कालीन पत्रिकाओं में छपे लेखों की ओर जाते हैं और शोध कार्य का आहवान करते हैं।

इस संदर्भ में कुछ बिंदुओं की ओर ध्यान दिलाना आवश्यक है। पहला यह कि डॉ॰ चौधरी का लेख ‘स्वाधीनता संग्राम और हिंदी साहित्य’ अक्टूबर-दिसंबर 1986 की आलोचना में प्रकाशित नामवर सिंह के लेख ‘हिंदी नवजागरण की समस्याएं’ में निकाले गए निष्कर्षों की असहमति में लिखा गया है। नामवर सिंह का मानना है कि हिंदी साहित्य का प्रत्यक्षततः संबंध बांग्ला नवजागरण से है जबकि डॉ॰ चौधरी इसे अनिवार्यतः 1857 के साम्राज्यवाद विरोधी-उपनिवेशवाद विरोधी चरित्र से जोड़ते हैं। नवजागरण और भाषा के संबंध पर नामवर सिंह ने ठोस प्रतिक्रिया दी और उसके सांप्रदायिक आधार की ओर इशारा किया है। इसलिए वहां नववैष्णवता की प्रगतिशीलता के अंतर्विरोधों को भाषा की समस्या से समझने पर बल है। यह बात सुरेंद्र चौधरी नहीं करते हैं। हिंदी नवजागरण में राजनीतिक चिंतन या सत्ता परिवर्तन की अनुगूंज मद्धिम हो जाती है और वह मूलतः सांस्कृतिक नवजागरण हो जाता है। इसलिए ‘स्वत्व निज भारत गहै’ (नामवर इसे आधुनिक शब्दावली में आइडेंटिटी से जोड़ते हैं) के स्वत्व प्राप्ति के राजनीतिक स्वाधीनता वाला पक्ष जरूरी होते हुए भी यहां तथ्यात्मक रूप से परोक्ष ही था। नामवर सिंह ने लिखा है-‘‘राजनीतिक स्वाधीनता इस स्वत्व प्राप्ति की पहली शर्त है। नवजागरण के उन्नायक इस आवश्यकता का अनुभव न करते रहे होंगे, यह सोचना कठिन है, फिर भी तथ्य यही है कि नवजागरणकालीन प्रकाशित साहित्य में राजनीतिक स्वाधीनता का स्पष्ट स्वर कम ही सुनाई पड़ता है। पहले ईस्ट इंडिया कंपनी और फिर महारानी विक्टोरिया के शासन काल में राज के विरुद्ध निश्चय ही किसानों के छिटपुट विद्रोह बराबर होते रहे जिनमें सबसे संगठित और सशक्त सन सत्तावन की राज्यक्रांति है फिर भी समकालीन शिष्ट साहित्य में उसकी गूंज सुनाई नहीं पड़ती-लोक साहित्य भले ही प्रचुर मात्र में मौखिक रूप में रचा गया। यह स्थिति सन सत्तावन के पहले तो थी ही, उसके बाद कम से कम तीन दशकों तक बनी रही। आर्थिक शोषण के खिलाफ जरूर लिखा गया, पुलिस तथा अफसरों के अत्याचार और अन्याय की भी शिकायत की गई, पर राजसत्ता पलटने के विचार को जैसे अंतर्गुहावास दे दिया गया।’’ (हिंदी का गद्यपर्व, नामवर सिंह, पृ.87, राजकमल प्रकाशन, 2010) मानो इसी का जवाब देते हुए सुरेंद्र चौधरी ने लिखा-‘‘जनता के चित्त में स्वदेशी-स्वराज का भाव 1857 की देन है, इसे स्वीकार करने में कठिनाई नहीं होनी चाहिए। संभवतः इसी शक्ति संबल को पहचानकर स्वदेशी की भावना के लिए भारतेंदु युग के कवियों को देश निकाला तो न दिया गया, पर वर्नाकुलर प्रेस पर अनेक बंदिशें डाली गईं। स्वदेशी के प्रति इस राज के रुख ने स्वतंत्रता के राग को बल दिया, इस पर बहस नहीं की जा सकती। …सत्ता परिवर्तन की आकांक्षा नारों में अवश्य प्रकट नहीं हुई। ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ जैसा नारा भारतेंदु युग में न लगा था, मगर सत्ता परिवर्तन को भी गुहावास न दिया गया था।’’ और इसके प्रमाण में डॉ॰ चौधरी ने ‘नागरनैया जाला काले पनिया रे ना!’ जैसे गीतों का उदाहरण दिया है। उन्होंने बताया है कि राज-रजवार और विष्णु सिंह के गीत मगध में गाए जाते थे, बाबू कुंअर सिंह की मुसलमान प्रेमिका के गीत सारे भोजपुर में गाए जाते थे। हरेंद्र देव के काव्य में उसकी आवृत्तियां हैं। फिर अवध बुंदेलखंड से निकलकर सुदूर गया जिले तक इसकी अंतरध्वनियों की पहचान वह करते हैं।

तो क्या हिंदी जाति के साहित्य में 1857 के महाविद्रोह का मूल स्वर भारतेंदु युग में सुनाई पड़ता है? और क्या यह नवजागरण उसी चेतना का विस्तार है? क्या सचमुच हिंदी नवजागरण 1857 में व्यक्त जनजागरण की ही अगली ऐतिहासिक अवस्था है और हिंदी नवजागरण के शिष्ट साहित्य में व्यक्त विचार से नामवर सिंह का क्या अभिप्राय है? क्या भारतेंदु मंडल की विचारधारा 1857 की चेतना से भिन्न स्वर अख्तियार करती है तथा जनसमुदाय की संवेदना 1857 के साथ है? क्या मौखिक परंपरा साम्राज्यवाद उपनिवेशवाद विरोध की राजनीतिक आकांक्षा को कायम रखती है और हिंदी (या बांग्ला या मराठी) नवजागरण के नेताओं या उनके लक्ष्यीभूत श्रोता या पाठक जिस नवनिर्मित मध्यवर्ग से थे, उस मध्यवर्ग का मानस 1857 की मूलभूत चेतना से दूर पड़ता है?

डॉ॰ चौधरी और डॉ॰ नामवर सिंह दो भिन्न दृष्टियों से उस काल को देख रहे हैं। मध्यवर्गीय/भद्रलोक के शिष्ट साहित्य के अंतर्विरोधी या नवजागरण के नेताओं की अंतर्विरोधी यह साफ इशारा करती है कि वहां 1857 के दो प्रमुख गुण सांप्रदायिक एकता और औपनिवेशिक सत्ता के प्रति सचेत वैरभाव (कांसस हास्टेलिटी) का अभाव है। रंजीत गुहा मानते हैं कि ‘यह सचेत वैरभाव संघर्ष में हिस्सा लेनेवालों तक ही सीमित नहीं था’ बल्कि एक कन्पेफडरेट नेशनेलिज्म के जरिए हिंदू मुसलिम संघर्ष के सिद्धंत का समाधान भी था। इसके बदले नवजागरण कालीन नेताओं में और इसलिए साहित्य में भी वैरभाव की जगह ‘कांसस लायलिटी ऑफ द टेक्स्ट’ (देखें, रंजीत गुहा, द इंडियन हिस्टोग्रापफी ऑफ इडियाः ए नाइन्टीन्थ सेंचुरी एजेंडा एण्ड इट्स इम्प्लीकेशंस; सीएसएसएस, कलकत्ता, 1987, पृ.54) मिलता है। देशभक्ति और राजभक्ति की यह विभाजित चेतना जितना भद्रवर्गीय हितों से चालित थी, उतनी ही राष्टीय स्वरूप की निर्मिति में अदरनेस को परिभाषित करने में भी थी। डॉ॰ चौधरी लोकचेतना को 1857 का विकास मानते वक्त इस तथ्य को नजरअंदाज करते हैं। लोक की असंबद्ध यद्यपि प्रतिरोधी विचारधारा को हिंदी नवजागरण का प्रमुख स्वर मान लेना ठीक नहीं मालूम पड़ता। लोक साहित्य में 1857 की वीरता के स्मृति चिन्ह शेष थे। गीत गाए जाते थे परंतु वहां राज के प्रति कोई सचेत वैरभाव नहीं रह गया था। इसके बदले अतीत की मोहक स्मृति ही प्रधान थी। इस गौण धारा को प्रमुखता देने से नवजागरण के संष्लिष्ट चरित्र की व्याख्या उसी अतिरेकवादी उत्साही जनवाद से ग्रसित हो जाती है जिसकी खिलाफत डॉ॰ चौधरी लगातार करते रहे थे।

डॉ॰ चौधरी अगर भाषा और नवजागरण के संबंधों की पड़ताल करते तो शायद इस ओर उनका ध्यान जरूर जाता। 19वीं सदी के उतररार्द्ध का पूरा काल भारतीय राष्टीयता के निर्माण का गर्भकाल था। भारतीय राष्टीयता के तमाम अंतर्विरोधों का उत्स भी यही है। 1920 के दशक में रूप लेनेवाली सांप्रदायिकता और 20वीं सदी में लगातार बदलते राष्ट्रवादी चिंतन की रूपरेखा में अपने प्रारंभिक रूप में यहीं दिखाई पड़ती है। हिंदी और उर्दू राष्टीयताओं को उसके धार्मिक प्रतीकों के साथ पढ़ने की कोशिश हमें नवजागरण के पूरे संदर्भ को समझने पर मजबूर करता है। भारतेंदुयुगीन जातीयता हिंदू-मुसलमान भद्रवर्गीय हितों से चालित था, जहां भाषा को लगातार एक हथियार की तरह इस्तेमाल करते हुए पूरे समुदाय की पीडि़त ग्रंथि (विक्टिम कॉम्प्लेक्स) को निर्मित किया गया और इसी के सहारे जातीय गोलबंदी की गई। उस वक्त राष्टीयता का सवाल अंग्रेजों के विरुद्ध अपने आपको किस प्रकार परिभाषित किया जाए-इस प्रश्न से जुड़ी थी। इसलिए भारतेंदु और अन्य हिंदी आंदोलन के नेताओं के साथ कई उदारपंथी नेता जैसे बिशन नारायण डर (लखनऊ के सम्मानित वकील, भारतीय  राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे तथा उर्दू के शाय तथा  मुसलमानों के मित्र के रूप में प्रसिद्ध और बंगाल के आर्थिक इतिहासकार विक्टोरियन उदारपंथी तथा प्रगतिशील राष्ट्रवादी रोमेश चंद्र दत्त ने लगातार हिंदू-मुस्लिम एकता की बात भी की और राष्ट्र की एकता के हिंदुओं की एकता की भी चर्चा की (देखें, ज्ञानेंद्र पांडेय; दी कन्स्ट्रकशन ऑफ कम्युनलिज्म इन कॉलोनियल नॉर्थ इंडिया, आक्सफोर्ड, 2006, पृ.218)। इस दौर की जातीयता में हिंदू जाति के संगठन और उत्थान का महत्व दिया गया तथा अंडरटोन के रूप में यह पहचान की राजनीति मुसलमानों को सामने रखकर निर्मित की गई। परंतु तब राष्ट्र के उत्थान का मतलब था, अलग-अलग समुदायों का उत्थान। हिंदू-मुसलमान-ईसाई-सिख आदि मिलकर राष्ट्र का निर्माण करते हैं, ऐसा माना जा रहा था। (देखें, वही, पृ. 223) भारतेंदु और सर सैयद अहमद खां के वक्तव्यों में भी इसकी अनुगूंज स्पष्ट ही देखी जा सकती है।

साठ के दशक की पूरी पीढ़ी जिस यातना, संत्रस, संशय, सिनिक, नकार विद्रोह आदि से गुजर रही थी, उसका और उसके कारणों की पड़ताल डॉ॰ चौधरी निरंतर अपने लेखन में करते हैं। डॉ॰ चौधरी ने लगातार नई पीढ़ी और बीच की पीढ़ी के अंतर्विरोधों को रेखांकित किया है। बिचली पीढ़ी के अवसरवाद तथा तटस्थता को नकारकर नवलेखन ने ‘प्रतीक्षा’ के मोहभंग के कारण एक निषेध और नकार की मुद्रा अख्तियार की थी। यह मुद्रा केवल एक भंगिमा मात्र न थी। इस नकार के वस्तुगत कारण थे और रचनात्मक मानस को ये उद्वेलित भी कर रहे थे। एक संवादी आलोचक की भांति इस नई पीढ़ी की रचनाशीलता को संभावनाओं के रूप में समझने की जरूरत थी। डॉ॰ चौधरी इसे पूरा करने की कोशिश करते हैं। स्वातंत्रयोत्तर दो दशकों में लगातार वर्ग संघर्ष की शिथिलता के कारण मध्यवर्गीय लेखक सामान्य जनजीवन से दूर होते गए। इस शिथिलता के साथ भारतीय सत्ता तंत्र की नीतियों और जनतंत्र के पीड़ादायी अनुभव ने एक ऐसी पीढ़ी को जिसने अपनी आंखें नए और स्वतंत्र भारत में खोली थीं, उमस से भर दिया। आजादी के बाद जन आंदोलनों का दौर एक तरह से रुक गया था। इसने कहीं न कहीं मध्यवर्गीय अलगाव का जन्म दिया। प्रतीक्षा और अलगाव के अंतर्विरोध में कुछ लोगों ने आत्म समर्पण कर दिया और अपनी राजनीतिक चेतना गिरवी रख दी। नवलेखन जब अलगाव और अस्तित्व के संकट की घोषणा कर रहा था तो इसे हमारे कुछ पुराने आलोचकों ने अंतर्राष्टीय नारों का प्रभाव कहकर खारिज कर दिया था। लेखन के बीज शब्द के रूप में स्वतंत्रता नई पीढ़ी के लिए महज नारा न था। लेकिन इसे मानवीय अस्तित्व की स्वतंत्रता के व्यापक फलक पर देखने के बजाय तत्कालीन प्रगतिशीलों ने भी अमेरिकी कल्चरल प्रफीडम के शीतयुद्धकालीन विचारधारा का प्रभाव माना और इसे भाववाद की इकहरी संकल्पना में ढालने की कोशिश की। दूसरी ओर, लेखक की स्वतंत्रता के नाम पर रूपवादियों खासकर परिमलवादियों और अज्ञेयवादियों ने इसे बल प्रदान किया। सुरेंद्र चौधरी ने ऐसी स्थिति को अधूरा और भ्रामक मानते हुए नवलेखन को एक बंद पद्धति मानने से इनकार किया था। आलोचना को नई पीढ़ी से बातचीत का दरवाजा खोलना चाहिए। इस मान्यता से वह कभी पीछे नहीं रहे। उन्होंने जोर देकर कहा कि नई पीढ़ी का संकट उतना निजी नहीं था जितना वह उपरी दृष्टि से मालूम पड़ता था। ‘नकार’ की दृष्टि किस ऐतिहासिक संकट में पैदा हो रही थी, उसे समझना जरूरी था। स्थिति को केवल नकारते हुए लड़ा नहीं जा सकता। यह सही था लेकिन नकार की भी एक सच्चाई तो होती ही है। इसी सच्चाई और यंत्रणा के दोहरे दबाव के बीच उस वक्त की रचनादृष्टि सार्थकता पाती है। और ‘‘जो लोग इस दुहरे दबाव को नहीं महसूस करते हैं वे या तो मुहावरे चुराते हैं, या फिर पूरी पीढ़ी के साथ एक व्यावसायिक खेल खेल रहे हैं। हमारी पीढ़ी की रचनात्मक लड़ाई का यह एक आंतरिक आयाम है।’’ (खंड तीन, पृ.146)

स्वतंत्रता के बाद की बिचली पीढ़ी ने देह को लेकर नई पीढ़ी की रचनादृष्टि को ‘ऐय्यास प्रेतों’ की तरह ट्रीट किया था। चौधरी ने देह की इस राजनीति को इसकी ऐतिहासिक भूमिका में समझने का प्रयास किया। उन्होंने स्पष्ट किया, ‘‘हम अदेह राजनीति के धर्मवीर नहीं हैं। चूंकि देह हमें देह हमें दुनिया में गोचर करती है, इंद्रियग्राहय अनुभवों से संपन्न करती है और दुनिया के मूर्त रिश्तों के बीच प्रतिष्ठित करती है, इसलिए हमारी राजनीति देह को नकारती नहीं है…। प्रश्न केवल देह की अमूर्त परिभाषा का नहीं, देह और देह के बीच मूर्त रिश्तों का है। हमारे लिए देह की अनेक यातनाएं हैं, वह हमें मूर्त-अमूर्त सभी देशों में आज गति दे रही है, इसलिए देह को हम अस्पृश्य नहीं मानेंगे। देह का दुरुपयोग करने में जैनेंद्र और अज्ञेय से कमलेश्वर और भारती भिन्न नहीं हैं। … बिचली पीढ़ी के आर्यसमाजी आलोचक देह की राजनीति को तो देखते हैं मगर उसके विस्तार को नहीं देख पाते। यह विस्तार हमें जीवन की वास्तविकताओं से जोड़ता है। देह में ही पेट भी है, इसे हम भूले नहीं हैं! आवेश के शुद्ध भावनात्मक रिश्ते आज की दुनिया में बन पाते हैं, इसमें अगर हमें विश्वास नहीं है तो जिम्मेदारी हमारी है…। चेतना अथवा संस्कारजन्य नैतिकता के सारे नियम देह पर ज्यों के त्यों लागू नहीं किए जा सकते…। देह की अपनी समस्याएं हैं, अपने स्वतंत्र नियम हैं। देह की इन ठोस मूर्त समस्याओं को नजरअंदाज कर उस पर टिप्पणी करना मुझे उचित नहीं मालूम पड़ता।’’ (वही, पृ. 147) देह की इस राजनीति को उस वक्त इतने बड़े परिपे्रक्ष्य में और किसी ने देखा हो, ऐसा मुझे मालूम नहीं। नामवर सिंह ने ‘मुक्ति प्रसंग’ के संदर्भ में लिखा था कि उस कविता में ‘‘बीच-बीच में सेक्स के खुले शब्दों से भद्र रुचि को ध्क्का देने की शोखी या शरारत है।’’ लेकिन इस देह की राजनीति का व्यापक आधार क्या है, इसकी बात उन्होंने भी न की। कापफी समय बाद फ्रेडरिक जेमेसन ने देह की इस राजनीति के ठोस द्वंद्वात्मक समझ को एक भिन्न संदर्भ में पेश किया। उत्तर आधुनिक दौर में ‘देह का आना एक वर्चुअल दुनिया में यथार्थ की विजय है। अपनी संकीर्णता और वस्तुपूजा के बावजूद देह की प्रधानता मोहक वर्चुअल रियलिटी के बीच मानवीय संवेदनाओं के हस्तक्षेप की तरह है। क्या मोहभंग से उपजे आक्रोश के दौर में नई पीढ़ी का स्वप्न को नकारकर देह की सत्ता और उसकी चुनौतियों को खुलकर व्यक्त करना इसी प्रकार का एक प्रयास न था!

नई पीढ़ी के बारे में डॉ॰ चौधरी आशान्वित थे और कृत्रिम भावनात्मक सत्य के बरक्स अपने को ही बार-बार तोड़ते, नकारते और लांघते चलने के क्रम में प्राप्त मानवीय वास्तविकता को महत्वपूर्ण मानते थे। ‘हम कुछ न बनाते हुए भी चीखने को विवश हैं’। घटित का यही मर्म कहीं न कहीं स्पर्श भी करता है और धूमिल ने ता लिखा ही था-‘‘मगर यह वक्त घबराए हुए लोगों की शर्म आंकने का नहीं है।’’ अपने को बार-बार तोड़कर अर्जित सत्य के बारे में बात करते हुए डॉ॰ चौधरी के दिमाग में रघुवीर सहाय की ये पंक्तियां जरूर रही होंगी-

‘‘कुछ होगा, कुछ होगा अगर मैं बोलूंगा

न टूटे न टूटे तिलिस्म सत्ता का

मेरे अंदर का एक कायर टूटेगा टूट

मेरे मन टूट एक बार सही तरह

अच्छी तरह टूट मत झूठ-मूठ उफब मत रूठ

मत डूब सिर्पफ टूट’’ (आत्महत्या के विरुद्ध्द्ध

परंतु बड़े आश्चर्य की बात है कि रघुवीर सहाय की इन कविताओं में उन्हें ‘आत्मीयता’ का स्पर्श नहीं मिला। और ये महज ‘रक्तचापहीन पीली पत्रकारिता’ की कविता जान पड़ी। टूटने से ज्ञात मानवीय सत्य दूसरी जगह उन्हें सपाटबयानी लगी। ऐसी सपाटबयानी ‘‘कल्पित दर्द के रिहटोरिक को तोड़ने का सबसे नाटकीय और तात्कालिक माध्यम बन जाती है। समस्या एक दूसरे स्तर पर फिर भी बनी रह जाती है। सपाटबयानी आवेश के निरंतर अंदाज को तोड़कर अगर कहीं स्थिर हो जाती है तो यह उसकी अशक्यता ही होती है। यह अशक्यता पहले रिहटोरिक को तोड़ती है फिर अपने को तोड़ते चलना उसकी नियति हो जाती है। कोई कवि मुहावरे के लंगड़े दरवाजे से आसानी से फैशन में आ जाता है और कविता को अनुभव की प्रामाणिकता से छलने लगता है…। अपने को ही बार-बार तोड़ते रहने की रघुवीर सहाय की नियति है क्योंकि उन्हें किसी शर्त पर उस जंगल से निकलना स्वीकार्य नहीं है…। मुझे लगता है कि ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ की अधिकांश कविताएं एक अजीब रौ में लिखी गई हैं। उनमें न तो विजयदेव नारायण साही की कविताओं की आत्मीयता है और न राजकमल का वेग।’’ (वही, पृ. 63-69) मतलब इन कविताओं में आत्मीयता नहीं है और परिवेश से संपृक्ति भी नहीं है और टूटना एक मुहावरा भर है-एक रेहटोरिक को तोड़कर दूसरा रेहटोरिक गढ़ना-वास्तविक कर्मक्षेत्र की संवेदना से व्यवस्था को तोड़कर विद्रोही बनना और मुहावरों से युग को तोड़कर आततायी कहलाने का जो अंतर है, उसे आत्महत्या के विरुद्ध की कविताएं साथ-साथ व्यक्त करती हैं। आखिर क्या कारण है कि एक जगह सैद्धंतिक रूप से स्वयं को तोड़ने की महत्ता को स्वीकार करने के बावजूद डॉ॰ चौधरी को दूसरी जगह व्यवस्था को तोड़ने की इच्छा उसमें दिखाई नहीं पड़ी। उसमें आत्मीयता नहीं मिली-वह मिली भी तो विजयदेव नारायण साही की कविता में। कहीं ऐसा तो नहीं था कि पत्रकारिता की भाषा के विरोध ने उन्हें सपाटबयानी के विरोध तक पहुंचा दिया था। अनात्मीयता तथा परिवेश असंपृक्ति के अनुभव के पीछे सपाटबयानी संबंधी धारणा काम कर रही थी। काव्य भाषा संबंधी चिंतन मे ही कहीं कोइ दोष तो नही था!

रघुवीर सहाय की कविताओं में आत्मीयता नहीं मिलने पर डॉ॰ चौधरी ने जो आक्षेप लगाए थे, उसका उत्तर ‘कविता के नए प्रतिमान’ में नामवर सिंह ने दिया भी था। परिवेश को रचनात्मक रूप देने के लिए नाटकीयता कैसे काम करती है और वहां कविता के भीतर का नाटकीय नायक, जो प्राइवेट से ज्यादा सामान्य यथार्थ के किसी निजी साक्षात्कार का एक राजनीतिक व्यक्तित्व के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है। नामवर सिंह ने लिखा था कि आत्महत्या के विरूद्ध की कविताएं ऐसे ही आत्मीय राजनीतिक व्यक्तित्व की कविताएं हैं।

निर्वैयक्तिकता की अपनी घोषणाओं के बावजूद ‘प्रगीतात्मक’ आत्मीयता का बोध और तदनुरूप काव्य भाषा का मोह डॉ॰ चौधरी को ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ की कविताओं में ‘रक्तचापहीन पीली पत्रकारिता के मुहावरों के खतरनाक प्रयास को देख लेती है। 1970 में जब ‘कविता के नए प्रतिमान: विसंगति और विडंबना का सौन्दर्यशास्त्र’ शीर्षक आलेख में डॉ॰ चौधरी ने ‘कविता के नए प्रतिमान’ की समीक्षा की तो फिर से अपनी पुरानी धारणा का ही समर्थन करते हुए लिखा-‘‘पत्रकार की नाटकीय आत्मीयता में सबकुछ एक ‘मैं’ के अधीन होता है। इसमें की कीमियागिरी में घुलनशील तत्व: मैं बने की घोल में सारा तथ्य घुल जाता है-उसकी स्वतंत्रता और वास्तविकता समाप्त हो जाती है। ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ में एक नाटकीय ‘मैं’ का ऐसा ही स्फार है जिसमें तथ्यों की वस्तुनिष्ठता घुलती रहती है। सबकुछ ‘मैं’ के गुंजलक में कैद हो जाता है और सारे करतब के साथ यही ‘मैं’ स्थितियों, घटनाओं और संबंधें पर गुंजलक मारकर बैठा शेष रह जाता है। इतिहास को नचाता हुआ, इतिहास के बीच गतिशील इकाई के रूप में नहीं, सर्वतंत्र स्वतंत्र सत्ता के विस्पफोट के रूप में। इस अनात्म ‘मैं’ का यही रहस्य है जिसकी ओर मैंने इशारा किया था। ‘मैं’ के स्पफार की यह मुद्रा आत्मीय नहीं हो सकती।’’ (खंड1, पृ. 211)

‘कविता के नए प्रतिमान’ की आलोचना उन्होंने दो लेखों में की है। ‘समकालीन कविता: अंधेरे से साक्षात्कार’ शीर्षक लेख में यद्यपि उन्होंने ‘कविता के नए प्रतिमान’ का नाम नहीं लिया है लेकिन विसंगति, विडंबना, नाटकीयता, सपाटबयानी और काव्यभाषा संबंधी नामवर सिंह की स्थापनाओं की आलोचना इसमें है जबकि ‘कविता के नए प्रतिमान: विसंगति और विडंबना का सौन्दर्यशास्त्र’ नामवर सिंह की किताब की समीक्षा है। ‘कविता के नए प्रतिमान’ की इससे अच्छी समीक्षा मेरे देखे में नहीं आई। डॉ॰ चौधरी ने शुरू में ही बताया है कि किस प्रकार छायावाद के ऐतिहासिक पतन पर अपनी दृष्टि केंद्रित न करके नामवर सिंह ने विजयदेव नारायण साही की इस स्थापना का समर्थन किया कि छायावाद का अंतर्विरोध उसके नैतिक विजन के टूट जाने तक सीमित था। उन्होंने आरोप लगाया कि नामवर सिंह ने इसे ज्यों का त्यों स्वीकार करते हुए भावना बुद्धि का एक हीगेलियन डाइलेक्टिक्स गढ़ लिया है। इसी का परिणाम है-काव्य संवेदना का विभाजन। डॉ॰ चौधरी ने लिखा कि नामवर सिंह की इस पुस्तक में ‘‘विवाद शैली के आतंक में इतिहास का परिप्रेक्ष्य डूबता नजर आता है… ‘कविता के नए प्रतिमान’ में जो सबसे बड़ा दोष है, वह परिप्रेक्ष्य के खो जाने का नहीं है, इतिहास के अदृश्य रह जाने का है।’’ (खंड 1, पृ. 206)

‘कविता के नए प्रतिमान’ में इतिहास के अदृश्य रह जाने के कारण नागार्जुन, त्रिलोचन, केदार और सुमन जैसे दूसरे कवि प्रतिमानों के निर्माण से गायब हैं। ‘कविता के नए प्रतिमान’ का परिप्रेक्ष्य निश्चित रूप से मुक्तिबोध हैं लेकिन ‘परिवेश और मूल्य’ में जिस इतिहास को दिखाने की कोशिश नामवर सिंह कर रहे थे, वह उन्हीं के शब्दों में अपूर्ण है और जिसकी क्षतिपूर्ति ‘अंधेरे में पुनश्च’ नामक अध्याय भी नहीं कर पाया। डॉ॰ चौधरी ने यह भी बताया है कि नई कविता के अनुभव संसार की वर्गीय संरचना को लक्ष्य करते हुए मुक्तिबोध ने जो कुछ भी लिखा, उसके बावजूद उनकी भावधारा अपनी विचारधारा से संगत न हो पाई। कला के तीसरे क्षण वाला उनका सिद्धांत उनकी अपनी काव्य प्रक्रिया का अंतर्विरोध भी है। ‘‘कला के जिस तीसरे क्षण को वे संपूर्ण रचनात्मक क्षण सिद्ध करते हैं, क्या वह ‘आत्मपूर्ण तात्कालिकता’ का पर्याय नहीं है। क्या यह ‘आत्मपूर्ण तात्कालिकता सारे कला सत्य को अपने भीतर की परिस्थितियों में या परम स्थिति में फ्रीज नहीं कर देती? सारे विकास को अपने भीतर ही नहीं समेट लेती? यह इतिहास का निषेध है और बर्गशैनियन गुणात्मक काल संरचना से मुक्तिबोध की भावधारा पीडि़त रही। इससे इनकार नहीं किया जाना चाहिए।’’ (खंड 1, पृ. 209)

डॉ॰ चौधरी ने यह भी आरोप लगाया कि विसंगति और विडंबना को जब नामवर सिंह समकालीन इतिहास की मूल लाक्षणिकता के रूप में प्रस्तुत करने लगते हैं तो वह विसंगति और विडंबना को गहरे अर्थ से काटकर फ्राइवालस बना देते हैं। बुर्जुआ सौंदर्यशास्त्र से लड़ने के क्रम में जिन रूपवादी औजारों की सहायता नामवर सिंह लेते हैं, कहीं न कहीं उन औजारों के खुद ही शिकार हो जाते हैं। डॉ॰ चौधरी ने खुद ही लिखा-‘‘कविता के मूल्यांकन में संरचनावादी दृष्टि कहां मार्क्सवादी सौंदर्यशास्त्र से टकराती है, इसे जानना हो तो नामवर की यह पुस्तक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकती है। जिस तरह हीगेलियन द्वंद्ववाद विचारों की गत्यात्मकता पर आश्रित है और कालचाप से आपकी प्रत्यवस्थाएं निर्मित कर उन्हें एक उच्च संश्लेष में बदल लेता है, उसी तरह नामवर का संरचनावादी दृष्टिकोण भी एक कल्पित पूर्णता का संश्लेष बनकर रह जाता है जिसका इतिहास, अनुभव और मानवीय कार्य व्यापारों तथा भावनाओं के मूर्त विश्व से कोई सीधा संबंध नहीं है। … ‘कविता के नए प्रतिमान’ वस्तुतः प्रतिमानों की भीड़ है जिसमें सही प्रतिमान दबा पड़ा रह जाता है।’’ (खंड 1, पृ. 213)

नामवर सिंह पर भाववादी चिंतन के प्रभाव के रूप में कहानी आलोचना संबंधी कुछ निष्कर्ष लगातार डॉ॰ चौधरी की आलोचना के केंद्र में रहे हैं। निर्मल वर्मा के कहानी संग्रह ‘परिंदे’ को नई कहानी की पहली कृति कहना और उसे ‘कालातीत कलादृष्टि’ से विभूषित करना ऐसा ही एक प्रयास था। डॉ॰ चौधरी लिखते हैं कि ‘परिंदे’ संग्रह की कहानियों में ताजगी थी मगर यह ताजगी कतई इस कारण नहीं थी कि निर्मल वर्मा ने इन कहानियों में अपने समय के इतिहास की उस विराट नियति को पहचान लिया था जो मनुष्य को अकेला करती है। ‘‘तमाम कुशलता के बावजूद ‘परिंदे’ जैनेंद्र का अतिक्रमण नहीं करती थी। इतना अवश्य था कि लतिका का पिंजरा बड़ा हो गया था, मगर कैच 22 वह तब भी न बन पाया था। फिर भी नई स्थितियों में स्त्री की यह नियति एक पैराडॉक्स खड़ा करती थी। लतिका को पिंजड़े से ज्यादा उसका अपना नैतिक आवेश बांधता है- इसी बिंदु पर उसकी अपनी पहली और आखिरी पहचान संभव है। … यूरोप की पतनशील परंपरा के आघात को नई कहानी का उद्घोष मानना वैचारिक दिवालियेपन के अतिरिक्त कुछ नहीं कहा जा सकता। बिंब, ध्वनियां, रंग ऐंद्रियबोध को गहरा करते हैं, मगर इससे यथार्थ का ऐतिहय ढांचा कालचाप भी प्राप्त कर लेता है-इसे नहीं माना जा सकता। शायद इस महत्वपूर्ण तथ्य की परीक्षा नहीं की जा सकी। ये विचारधाराएं आंतरिकता को तथ्यबद्ध दायरे से निकालकर जिस अगोचर भावभूमि पर ले जाती हैं, उनका सत्य क्या है। उनका सत्य लौकिक भावभूमि के विरोध में प्रकट हुआ है। यह सत्य जो एक लौकिक भावभूमि को तोड़कर प्रकट हुआ था, किसी कालजयी दृष्टि का परिणाम न था। बल्कि कालचाप से निर्वासित मध्यवर्ग की आत्मचेतना का परिणाम था! उस पर बुर्जुआ विचारधारा का ताजा रंग चढ़ आया।’’ (खंड 2, पृ. 26 व 127-28)

डॉ॰ चौधरी समकालीनता के प्रस्थान बिंदु के रूप में आजादी को रखते हैं। उनके लिए यह आजादी कालगत परिवर्तन के बजाय देश में होने वाला एक परिवर्तन था। यह देशगत परिवर्तन न केवल विभाजन की पीड़ा से ग्रसित था वरन भारतीय जीवन को जो वृहत्तर यथार्थ गांव और शहर की सीमा को तोड़कर राष्ट्रीय धारा में एक होना चाहते थे, वहां गांधीजी की परिकल्पना खंडित हुई थी और निश्चित रूप से गांव और शहर दो भिन्न यथार्थ से रूबरू थे। सुरेंद्र चौधरी ने नेहरू युग के अंतर्विरोधें को अलग-अलग तरीकों से लगातार व्याख्यायित करने की कोशिश की और इसके साथ रचनाशीलता की संलग्नता को चिन्हित भी किया। इन अंतर्विरोधें को पाटने की समस्या ही तात्कालिकता के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती थी। स्वातंत्रयोत्तर हिंदी कहानी में जो तथ्य नई कहानी को कहानी से अलग करता था, वह निश्चित रूप से मध्यवर्ग का आत्मकेंद्रण था। ’62 के राष्ट्रीय हादसे से पहले दशक में निश्चित रूप से एक नवरोमैंटिक उत्थान था (नामवर सिंह के शब्दों में)। मगर जिसे पीड़ाभरी प्रतीक्षा कहा जाता है, उसके इतर इस प्रतीक्षा की सीमाओं को तोड़कर मुक्तिबोध वृहत्तर ऐतिहासिक अंतर्विरोधें से जूझ रहे थे। उनका सिनिकल और संशयवादी होना केवल आवेशजन्य नहीं था। ‘विपात्र’ और ‘क्लाड ईथरली’ की पीड़ा  प्रतिरोध, विद्रोह और स्वतंत्रता की एक पूरी दुनिया को रूपकों में ढालने का प्रयास था। अपने प्रयास में मुक्तिबोध जरूर अकेले थे लेकिन वहां निर्मल वर्मा का अकेलापन नहीं था। डॉ॰ चौधरी जोर देकर कहना चाहते हैं कि नई कहानी की संष्लिष्टता और उसका नयापन जिस रास्ते होकर आजादी के बाद की रचनात्मक परिस्थितियों और उसके अंतर्विरोधें को कैच करने की कोशिश कर रहा था, उसकी दुनिया मुक्तिबोध के रूपकों में ही साकार होती है। जिस प्रकार कविता मुक्तिबोध के यहां सारे रोमैंटिक आवेश उतार देती है, उसी प्रकार कहानीकार मुक्तिबोध के यहां भी भावुकता से उठनेवाली टीस और पीड़ाभरी प्रतीक्षा के बदले आहत नैरंतर्य का संकट केंद्रियता पाता है। नई कहानी की रचनाशीलता के केंद्र में व्यतीत होती व्यवस्था और चरित्रों के प्रति एक व्यथा भरा मोह है जो परिवार-समाज के अंतर्विभाजन के कारण पैदा हुई थी। ‘‘मुझे याद है कि पश्चिम में कथा साहित्य की बहस में जहां जॉर्ज स्पाइनर महाकाव्यात्मक और नाटकीय के बहाने दो सदियों की कथा यात्र के रचनात्मक सार पर बहस कर रहे थे, वहीं मार्क स्पिनका ने डिकेंस और काफ्का की आधुनिकता के केंद्र में परिवार-समाज को रखकर देखा था। ऐसे प्रयत्न अपने यहां न दिखाई पड़े। नामवर जी नई कहानी की बहस में परिवार, समाज को विशेष महत्व देते दिखाई न पड़े। (खंड 2, पृ. 28)

परिवार-समाज की इस केंद्रीयता का कोई कहानीकार था तो वो अमरकांत था। छोटे-छोटे क्रियाकलापों में कितने गहरे भावात्मक अर्थ छिपे रहते हैं, अपनी इसी पहचान के कारण अमरकांत की कहानियां अलग पड़ती हैं। परिवार के भीतर के जीवित रेशों से बनी कहानियां और परिवार के भीतर की भयावहता-दोनों कैसे राष्ट्रीय संदर्भ से जुड़कर भय और त्रास के बावजूद अपने संघर्ष को जीवित रखने की जातीय जिजीविषा से लैस हो सकती है- इसका विश्वास केवल अमरकांत की कहानियां देती हैं। ‘अमरकांत: जीवन की संभावनाओं के लिए संघर्ष’ शीर्षक आलेख नई कहानी के सबसे सशक्त कहानीकार को दुबारा देखने की एक कोशिश है। बड़े ताज्जुब की बात है कि अमरकांत पर कोई स्वतंत्र लेख न तो नामवर सिंह ने उस दौर में लिखा, न ही किसी और ने। डॉ॰ चौधरी का यह लेख उस महती आवश्यकता की पूर्ति करता है।

दूसरे खंड में संकलित डॉ॰ चौधरी के लेख एक बार फिर यह साबित करते हैं कि वह हिंदी के शीर्षस्थ कथा आलोचक हैं। ‘हिंदी कहानीः प्रक्रिया और पाठ’ के साथ कहानी के स्थापत्य को समझने का जो प्रयास उन्होंने शुरू किया था, वह उनके बाद के लेखन में भी लक्षित किया जा सकता है। प्रस्तुत संकलन के लेखों से गुजरते हुए हम लगातार उत्तरशती की कथायात्र करते हैं। इस कथायात्र में समकालीन से जूझते हुए कहानियों का भिन्न भिन्न रचना संदर्भ और उन रचना संदर्भों से झांकते हुए कहानी के स्थापत्य की भिन्न भिन्न भंगिमाएं मिलती हैं। प्रेमचंद के संदर्भ में उन्होंने जिस प्रकार कथावाचन को महत्व दिया था, उसी प्रकार बाद के कहानीकारों के यहां कथावाचक का हासिया किस प्रकार कहानी की रचना परिस्थिति को समृद्ध करता है, उसे भी समझने का प्रयास है। कला और जनवाद के रिश्ते भी डॉ॰ चौधरी के लेखन में निरंतर केंद्रीयता पाते रहे हैं। कथ्य की मार्मिक पहचान केवल नारों से तय नहीं होती। कहानी के भीतर जनवादी आंदोलन की अधिकांश कहानियां गढ़े गए यथार्थ की कहानियां हैं जो निश्चित रूप से यथार्थ के आतंक से पलायन है। अभिधत्मक पहचान और सर्वव्यापी चेतना कलारूपों के लिए मिथकों का आश्रय नहीं लेती। व्यापक और जटिल अनुभवों तक पहुंचने का एक रास्ता मिथकों को तोड़कर भी तय किया जा सकता है। इसके अमरकांत लगातार सिद्ध करते रहे।

सुरेंद्र चौधरी की कथा आलोचना पर विस्तृत बहस की जरूरत है। ये बहस हिंदी कथा आलोचना को नई दिशा दे सकती है। प्रस्तुत आलेख में उन सारे बिंदुओं को समाहित करना संभव नहीं है। खंड दो में मुक्तिबोध, भीष्म साहनी, प्रेमचंद और रेणु की कहानियों की विस्तृत समीक्षा के अलावा मार्क्सवादी सौन्दर्यशास्त्र पर भी एक बहस है। ‘हिंदी व्यंग्य की जातीय परंपरा और परसाई’ शीर्षक आलेख में एक विधा के रूप में व्यंग्य की आवश्यकता और शक्ति-दोनों को पहचानने का भी एक प्रयास है। समाज की विडंबना और उसके अंतर्विरोध जब तर्क की संगति से आगे निकलकर सादृश्यमूलक कल्पना का आधार लेती है तो वह व्यंग्य की बनावट में अपनी पहचान बनाती है। यह व्यंग्य दृष्टि परसाई के यहां अपने आलोचनात्मक यथार्थवाद के कारण ही केवल हास्य का माध्यम नहीं रह जाती। परसाई का व्यक्तित्व अपने युग के आत्मसंशय से ऊपर है। इसलिए वह ओजपूर्ण ढंग से अंतर्विरोधी स्थितियों पर प्रतिक्रिया करता है। एक नैतिक ऊर्जा की मद्धिम आंच में परसाई अपने चरित्रों और परिस्थितियों को पकाते हैं जिससे उनकी शैली तो अलग होती ही है, उसमें नया तासीर भी पैदा होता है। परसाई का व्यंग्य और उनकी गद्यशैली ठेठ अर्थों में हिंदी की जातीय परंपरा का निर्वाह करती है।

’90 के बाद की हिंदी कहानियों में घटना संकुलता के बीच से नई परिस्थितियों का कहानी में सार्थक उपयोग किस प्रकार हो- इस पर डॉ॰ चौधरी विस्तृत विवेचन करते हैं। सांप्रदायिकता जैसी थीम को ले करके फैशनपरक कहानियों का दौर भी चला था। डॉ॰ चौधरी कहते हैं कि तात्कालिकता के मोह में बाजार का गुलाम बनना एक बात है और विराट ऐतिहासिक संदर्भ को कहानियों में ढालना दूसरी बात। मानवीय गरिमा को केंद्र में रखकर लिखी गई दो कहानियों को डॉ॰ चौधरी अपनी समीक्षा का आधार बनाते हैं। प्रियंवद की कहानी ‘वे वहां कैद हैं’ एक पूरी पीढ़ी की दुश्चिंताओं और उलझनों को अपने केंद्र में रखती है। यहां उलझन, दुश्चिंताओं का कारण है या परिणाम-ये तो तय नहीं होता, परंतु तर्क और आवेशजन्य अपराध किस प्रकार मानवीय परिस्थितियों को एक मिथक में बदल देता है-वह पफर्क सामने आया है। छोटे-छोटे प्रसंगों से कैसे बड़ी पृष्ठभूमि का निर्माण होता है-प्रियंवद ने इसे अपनी कहानी कला में साधा है। डॉ॰ चौधरी लिखते हैं-‘‘कहानी के गद्य में प्रियंवद की अपनी अलग पहचान है। संवाद और दृश्य-दोनों इस गद्य से सजीव हो उठते हैं। मनुष्य की जटिल भावनाओं को नैतिक आवर्तों में डालकर देखने की एक विशेष कुशलता उनमें दिखाई पड़ेगी। न्याय और करुणा की सरहदों से एक साथ टकराता हुआ उनका गद्य संसार अथक और अक्षय शक्ति की सूचना देता है। अपनी पीढ़ी के वे अकेले गद्य लेखक हैं जिनमें मुझे ये विशेषताएं लक्षित होती हैं। कविता के मुहावरे में वे नहीं उछालते, जैसा उनके कुछ समकालीन उछालते हैं पर गद्य की पूरी काठी में लिरिक का स्पर्श होता है। (खंड 2, पृ. 265)

दूसरी कहानी है उदय प्रकाश की ‘और अंत में प्रार्थना’। व्यक्तिगत और अवांतर प्रसंगों से सार्वजनिक विडंबना को कैसे सामने लाया जाता है-इसे इस कहानी के संदर्भ में समझा जा सकता है। विषय साधारण ही हो, सारे क्रियाकलाप दैनिक जीवन के ही हों परंतु फिर भी उसमें कलात्मक उन्मेष कैसे हो सकता है-इसे प्रस्तुत कहानी से समझा जा सकता है। विभाजन के प्रेतों से लड़ता हुआ वाकणकर का व्यक्तित्व जिस आत्मसाक्ष्य की पीड़ा से गुजरता है, वह आधुनिक इतिहास में राष्ट्रीयता, वर्ण और ध्र्म तथा पूंजीवादी दुष्चक्र के जटिल संबंधें को कथा के भीतर मूर्त करता है। डॉ॰ चौधरी लिखते हैं-‘‘राज्यसत्ता के चरित्र को परोक्ष रूप से कहानी के गठन के साथ इस ऊंचे स्तर पर उजागर करने वाली कुछ ही कहानियां मैंने पढ़ी हैं। हिंदी कहानियों में किया गया ढेर सारा राजनीतिक लेखन इस स्तर तक नहीं उठता, इसके आसपास तक भी नहीं पहुंचता। उनमें क्रांति की उतावली में पूरी प्रक्रिया का सहज विसर्जन देखा जा सकता है।’’ (खंड 2, पृ. 272)

यह आधी अधूरी रूपरेखा मात्र है एक भुला दिए गए आलोचक के विशाल और सजग आलोचना कर्म का।  सच्ची आलोचना किस कदर गंभीर वैचारिक संघर्ष का परिणाम होती है इसे सुरेन्द्र चौधरी के लेखन में स्पष्ट ही देखा जा सकता है। सुरेन्द्र चौधरी पर बहस एक ऐतिहासिक ज़रुरत है। ज़रुरत है हिंदी की प्रगतिशील आलोचना की एक दूसरी परम्परा से संवाद की। बाकी फिर कभी।

(सुरेन्द्र चौधरी से संबंद्धित सारे उद्धरण अंतिका प्रकाशन से तीन खंडों में प्रकाशित उनके रचना संचयन से लिए गए हैं। विवरण नीचे उपलब्ध है। इस लेख का संशोधित-संपादित अंश अकार में प्रकाशित हो चुका है। मैं इसके लिए अकार का आभारी हूँ।)

मार्तंड प्रगल्भ

मार्तंड प्रगल्भ

मार्तंड प्रगल्भ जे.एन.यू. के भारतीय भाषा केंद्र में पी.एच.डी. के लिए शोधरत  हैं। फिलहाल लिडेन (नीदरलैण्ड) में अध्ययन-प्रवास कर रहे हैं। उनसे mpragalbha1@gmail.com पर संपर्क संभव है।

Published Books Of Surendra Chaudhary: 

  •  Hindi Kahani : Prakriya Aur Path (Hindi), Radhakrishna Prakashan, 1963, 1995
  • Phanishwar Nath Renu, Sahitya Academy, 1987
  • Itihas : Sanyaog Aur Sarthakata(I), Antika Prakashan, 2009
  • Hindi Kahani : Rachana Aur Paristhiti(II), Antika Prakashan, 2009
  • Sadharan Ki Pratigya : Andhere Se Sakshatkar(III), Antika Prakashan, 2009

Single Post Navigation

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: