Archive for the month “May, 2017”

‘हिंदी मीडियम’ यानी अपने स्वनिर्मित इमेज के चमकीले नक़ल: तत्याना षुर्लेई

साकेत चौधरी ने अपनी इस नयी फ़िल्म में एस्पायरिंग मिडिल क्लास को दिखाया है. यह तबका भारतीय सिनेमा में शायद सब से कम दिखने वाला तबका है. “हिंदी मीडियम” (2017) एक नवधनाढ्य दंपति की कहानी है, ऐसे चरित्र ज़्यादातर सिर्फ झलक दिखाने के लिए हिंदी फिल्मों में आते थे (जैसे “कल हो ना हो” में रोहित पटेल का बाप था) और अपने गंवारपन से किसी भी तरह के मनोरंजन/फूहड़पन के बहाने बनकर रह जाते थे. चौधरी भी इसी तरीके से अपने चरित्र को सामने लाता है. फ़िल्म का पहला हिस्सा कहानी से ज़्यादा, मनोरंचक रेखाचित्रों का एक संग्रह लगता है. फिर भी, फ़िल्म के ये हास्यप्रद दृश्य ज़्यादा थकाऊ नहीं हैं और इस विशवास से लैश दर्शकों के लिए कि उन्हें पता है कि फ़िल्म किसके बारे में होगी, अचानक से दो ट्विस्टेड प्लाट ऐसे आते हैं जो आश्चर्यचकित कर देते हैं.  #लेखिका 

Hindi Medium- poster

Poster

“हिंदी मीडियम”: यानी हम सब नक़ल हैं!

By तत्याना षुर्लेई

हिंदुस्तान में पॉपुलर रही फिल्मों के लिए पश्चिम में होने वाली सबसे बड़ी आलोचना यही है कि ये वास्तविकताओं से दूर होती हैं. साथ ही साथ ‘भारतीय विषयों’ पर पश्चिम में बनने वाली फिल्में या फिर विदेशी बाजारों के लिए भारत में बनी फिल्में आम भारतीय लोगों को पसंद नहीं आती है, क्योंकि उनमें सिर्फ गरीबी और एक तरह भिन्नता (otherness) का चित्रण होता है. हिन्दुस्तान के बारें ऐसे विषय पश्चिमी फिल्म जगत में बहुत बिकाऊ हैं.

वहीं दूसरी तरफ, जो लोग गरीबी और अमीरी के बीच में पड़े हुए हैं, उन पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया जाता है. कभी-कभी कोई न कोई अपवाद है, ऐसे अपवाद विकास बह्ल की “क्वीन” की नायिका, रानी मेहरा है जो अपरिष्कृत ज़रूर है लेकिन असाधारण भी. एस्पायरिंग मिडिल क्लास के लिए सिनेमा की कहानियों में ही सिर्फ जगह का अभाव नहीं है, बल्कि शायद भारतीय समाज का भी यही यथार्थ है. यह समाज जहाँ आभिजात्य लोगों के समूह के प्रति बहुत ज़्यादा चापलूस और भक्ति की मुद्रा दिखता है, वहीं दूसरी ओर सब से गरीब और हाशिये के लोगों की रक्षा के लिए नियम-कानून बनाने का ढोंग भी करता है.

फ़िल्म की कहानी में यह स्पष्ट है कि मुख्य चरित्र पैसे वाला तो है लेकिन संस्कृति-शून्य (uncultured) अनाड़ी भी है. उसकी स्थिति समाज के एक बाहरी व्यक्ति के रूप में है और कभी-कभी वह गरीब बस्तियों में रहने वालों से खुद को ज़्यादा मुश्किल में पाता है. क्योंकि, उसकी रक्षा के लिए यहाँ कोई स्पष्ट विधान नहीं है और समाज की भंगिमा भी आदरपूर्ण नहीं है. ऐसे आदमी अपने पैसों की मदद से वहाँ तक तो पहुँच सकता है जहाँ दरिद्र लोग कभी नहीं जा पायेंगे, लेकिन इसकी भी अपनी विडम्बनायें हैं. यह फिल्म ऐसी विडम्बनाओं को उभारने का काम करती है.

यद्यपि यह भी सच है कि ऐसे अनाड़ी लोग जब अभिजात्य लोगों (elites) के स्तर पर पहुंचेंगे, तो वे सिर्फ एक धोखेबाज़ ही बने रहेंगे. उन्हें इस बात का ध्यान हमेशा रखना पड़ेगा कि आसपास के लोगों को कभी पता न चल सके कि उसकी जडें कहाँ हैं. यही कारण है कि आज भी भारत में कई काम ऐसे होते हैं जिनको करना अपमानजनक माना जाता है, इसीलिए यहाँ हर किसी के लिए पहले से ही भविष्य (नियति) तय है और समाज में उसका स्थान (स्टेटस) भी. ऐसे में अभिजात्य वाली ऊँचाई चढ़ना बहुत मुश्किल काम है.

फ़िल्म का नायक, राज (इरफ़ान खान) कपड़ों का एक अमीर दुकानदार है. वह किसी न रूप में अपनी दुकान के कपड़ों से मिलता-जुलता है. उसकी दुकान में बड़े-बड़े मॉडल्स, स्टार और डिजाईनर के नक़ल मिलते हैं. ये नक़ल अपने मूल से ज़्यादा चमकीले, रंग-बिरंगे और भड़कीले लगते हैं, फिर भी ये नक़ल वाले कपड़े पुरानी दिल्ली में रहनेवाली औरतों को अच्छे लगते हैं.

अपने ग्राहकों की तरह, जो रंगीन पत्रिकाओं में दर्ज कपड़ों के नकली और सस्ते संस्करण खरीदती हैं, फ़िल्म का नायक भी अपनी ज़िन्दगी से बहुत खुश है और उसको किसी और चीज की ज़रुरत नहीं है. लेकिन, उसकी पत्नी, मीता (सबा कमर) राज से कुछ अलग है. मीता अभिजात्य, सोफिस्टिकेटेड समाज का हिस्सा बनना चाहती है, वह मानती है कि बड़े लोगों के संपर्क से उसकी बेटी का भविष्य अच्छा होगा.

इन सबमें सबसे महत्त्वपूर्ण बात बच्ची को एक अच्छे स्कूल में भेजना है. इसलिए वह निराश माँ अपने पति को चांदनी चौक से वसंत विहार शिफ्ट होने और वहाँ रहनेवाले लोगों से दोस्ती करने के लिए बोलती है, क्योंकि यह कंपनी उसे अपनी  बेटी के लिए ज़्यादा उचित लगती  है.

राज और मीता वसंत विहार शिफ्ट हो जाते हैं, लेकिन यहीं पता चलता है कि सुन्दर घर में रहने मात्र से आप अपनी ‘कमजोरियों’ को नहीं छुपा सकते हैं. अंग्रेजी बोलनेवाले सोसाइटी को भी समझ में आ जाता है कि राज और मीता उनसे कुछ अलग हैं और ये हमारी नक़ल करने की कोशिश में हैं.  जाहिर है कि सोफिस्टिकेटेड समाज  के प्रतिष्ठित स्कूल में बच्ची को प्रवेश नहीं मिलता है. तब दोनों, नायक और नायिका गरीबों के बच्चों के लिए मिलने वाले आरक्षण की मदद से अपनी बेटी को अच्छे स्कूल में भेजने की कोशिश करते हैं. इसके लिए वे फिर वसंत विहार से दूसरी जगह शिफ्ट करते हैं और एक बहुत गरीब इलाके में रहने लगते हैं और इस तरह यहाँ फिर से दूसरे लोगों की नक़ल बन जाते हैं, लेकिन इस बार गरीबों की.

यह बहुत स्पष्ट है कि दूसरा नाटक पहले से ज़्यादा अच्छा है, गरीब इलाके में रहनेवाले लोग राज और मीता को वसंत विहार वालों की तुलना में आसानी से अपनाते हैं. इसके अतिरिक्त, इस बार लगता है कि दोनों, नायक और नायिका, आसपास के लोगों को थोड़ा कम धोखा देते हैं. पहले वाले नाटक में राज और मीता का चमकीला लालित्य (नकली भव्यता) और सामाजिक मेल-जोल के समय उनके द्वारा की गयी गलतियाँ बहुत ज्यादा ही दिखाई देती थीं, लेकिन दूसरे नाटक के समय गरीबों के साथ रहना उनके लिए ज़्यादा आसान लगता है.

ऐसा लगता है कि इस बार नायक और नायिका ऐसी जगह  रहते हैं जो गरीब लोगों की जगह होने के बावजूद उनके पुराने घर से मिलते-जुलते हैं, जहाँ उनके लिए एडजस्ट करना ज्यादा आसान है, लेकिन ऐसा नहीं है. इस नए इलाके में भी राज और मीता गरीब लोगों को धोखा देते हैं. अंतर बस यह है कि पिछली बार आसपास के लोग उनको नीचली नजर से देखते थे और इस बार, गरीबों लोगों से इनको आदर मिलता है. इससे उनका आत्मविश्वास बढ़ जाता है और वे खुद को आदरणीय मानने लगते हैं. इस बार उन्हें अपने किये की चिंता करने की जरुरत नहीं है, वे यहाँ कम गलतियां करते हैं. यहाँ आकर धीरे-धीरे उनका व्यवहार बदल जाता है. उनके कपड़ों का स्टाइल, जिसे पहले-पहल उन्हें सीखना पड़ा, अब नेचुरल लगता है और अमीर इलाके में फिर से वापसी  होने के बाद भी उनका आत्मविश्वास गायब नहीं होता है. प्रतिष्ठित (prestigious) स्कूल के बच्चों के अमीर अभिवावकों के सामने राज को अब अपनी कमज़ोर अंग्रेजी का इस्तेमाल करने से भी बिलकुल डर नहीं है.

भाषा का मामला फ़िल्म में बहुत महत्त्वपूर्ण है. राज सही ही बोलता है कि अगर फ्रेंच या जर्मन को अच्छी अंग्रेजी नहीं आती है तो भी भारतीय लोगों का उनके प्रति आदर कम नहीं होता है. लेकिन खुद भारतीय ही दूसरे भारतीय को अंग्रेजी जानने और न जानने के आधार पर उसकी सामाजिक हैसियत तय कर देते हैं. फिर भी, “हिंदी मीडियम” “इंग्लिश विंग्लिश” (गौरी शिंदे, २०१२) जैसी फ़िल्म नहीं है, यह फिल्म अंग्रेजी के प्रति भारतीय लोगों के अजीब रवैये के साथ-साथ धोखा देने की ज़रुरत और जुगाड़ की प्रवृति के बारे में है.

फ़िल्म का शुरूआती हिस्सा एस्पायरिंग मिडिल क्लास के बहिष्कार (exclusion) की कहानी लगती है, लेकिन बाद में यह गरीबों की झूठी रक्षा और उनके अधिकारों के हनन के बारे में एक नैतिक आख्यान बन जाती है. यह कहना मुश्किल है कि अचानक से आने वाले इस परिवर्तन के कारण क्या हैं? शायद फिल्मवालों को अचानक यह लगा कि वे गरीब लोगों को मिलने वाली सुख-सुविधाओं को नहीं बल्कि मिडिल क्लास की चीड़-फाड़ (operation) दिखाना चाहते हैं. हालाँकि यह परिवर्तन फ़िल्म की कमी बिलकुल नहीं है, उल्टे, स्कूल में राज के फाइनल स्पीच के बाद अमीर-अभिजात्य श्रोताओं का व्यवहार (स्टैंडिंग ओवेशन की कमी)  कहानी का एक मानीखेज केंद्र बन जाता है.

इसने हर दर्शक को यह समझाया कि हम सब लोगों को अपने-अपने जीवन में कुछ छोटे-छोटे नाटक, नक़ल करने हैं, आसपास के लोगों के लिए अपने व्यक्तित्व (image) को खुद ही गढ़ना है. हम सिर्फ अपने घर या परिवार के पास ही ‘सच्चा हम’ हो सकते हैं क्योंकि सिर्फ हमारे अपने लोग ही इस नाटक की सच्चाई जानते हैं या वे खुद भी इस नाटक के हिस्से  हैं.

इस तरह का एप्रोच राज द्वारा नागिन के बारे में एक टीवी सीरियल देखने वाले सीन में स्पष्ट है. यह सीन स्पष्टतः इरफ़ान खान की बाहियात फ़िल्म, और इरफ़ान खान जैसे अभिनेताओं के लिए शर्मनाक भी, “हिस्स्स” (जेनिफर लिंच, २०१०) से संबंधित है. हमें इरफ़ान खान की सिर्फ अच्छी फिल्में देखने की आदत है इसलिए हम यह मानना ही नहीं चाहते हैं कि उसने “हिस्स्स” जैसी फ़िल्म में भी एक्टिंग किया है. वास्तव में हम सभी कभी न कभी अपने स्वनिर्मित इमेज के चमकीले नक़ल होते हैं.

407990_4198265689669_2114788963_nतत्याना षुर्लेई पोलैंड की रहने वाली हैं, एक इंडोलॉजिस्ट (भारतीय उपमहाद्वीपीय भाषा और संस्कृति की जानकार)  और फिल्म आलोचक हैं. हिंदी की मशहूर पत्रिकाओं और ब्लॉग्स के लिए लिखती रही हैं. पोलैंड के शहर क्राकोव स्थित जेगिलोनियन विश्वविद्यालय से “द कोर्टसन फिगर इन इंडियन पॉपुलर सिनेमा: ‘ट्रेडिशन, स्टीरियोटाइप, मैनिपुलेशन” नामक विषय पर पीएचडी हैं. वर्तमान में मनिपाल विश्वविद्यालय, कर्नाटक के यूरोपीय अध्ययन संस्थान में पढ़ाती हैं. 

Advertisements

Post Navigation

%d bloggers like this: