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समाज के हाशिए का सिनेमाई हाशिया: तत्याना षुर्लेई


 सिनेमा के सौ साल के इतिहास में  दलितों  के बारे में ज़्यादा फ़िल्में नहीं हैं। शुरू में ऐसा लगा कि गाँधी जी और उनके तरह के दुसरे सुधारकों की मदद से यह विषय लोकप्रिय होगा लेकिन जल्दी ही ऐसी फ़िल्में मुख्यधारा के विषय से बाहर चली गयीं। क्या भारतीय दर्शक ऐसी फ़िल्मों के लिए तैयार नहीं हैं? मुझे लगता है कि आधुनिक सिनेमा में सब कुछ दिखाया जाता है इसलिए इस विषय से इतना डर ज़्यादा अजीब लगता है। जब हम बॉलीवुड फ़िल्मों की संख्या के बारे में सोचेंगे तो यह देखेंगे कि दलित न सिर्फ़ जाति के वरीयता-क्रम से बाहर हैं बल्कि सिनेमा से भी बाहर हैं। 100 करोड़ से उपर की जनसंख्या वाले देश के सिनेमा में बहुजन-जीवन के स्वाभाविक-चित्रण का अभाव चिंताजनक है और इसका एक बड़ा कारण संभवतः यह है कि बहुजनों का बड़ा हिस्सा अभी भी सिनेमा के उपभोक्ता समुदाय में तब्दील नहीं हुआ है। यह तब तक नहीं बदलेगा जब तक उनकी परिस्थितियों को स्वभाविक तरीके से नहीं दिखाया जाएगा। अगर हम दलित-समस्या पर ही केन्द्रित रहेंगे और सिर्फ़ सुधार के आग्रही के बतौर ही दलितों का चित्रण करेंगे तो वे कभी समाज के स्वाभाविक हिस्से की तरह कभी नहीं दिखेंगे।

अछूत कन्या

अछूत कन्या

समाज के हाशिए का सिनेमाई हाशिया

भारतीय व्यावसायीक फ़िल्मों में दलितों की अनुपस्थिति।

BY तत्याना षुर्लेई

एक पुरानी कहानी है – थाइलैंड में रहनेवाली एक राजकुमारी एक बड़ी नदी में जहाज पर यात्रा करती थी। नदी के किनारे खड़ी भीड़ तालियां बजाकर राजकुमारी और उसके साथ जाने वाले नौकरों का स्वागत करती थी। यह सब देखकर राजकुमारी अतिउत्साह में भीड़ की ओर कुछ ज्यादा ही झुक जाती है और जहाज़ से बाहर गिरकर पानी में डूब जाती है। जहाज़ और किनारे पर खड़े लोगों में से किसी ने उसकी मदद नहीं की। ऐसा क्यों हुआ? इन सारे लोगों में से किसी ने उसकी मदद क्यों नहीं की? राजकुमारी उस जहाज़ में बहुत सारे नौकरों के साथ यात्रा करती थी। उन नौकरों और किनारे पर खड़े लोगों से कोई न कोई तो मछुआरा ज़रूर रहा होगा जिसको अच्छी तरह तैरना भी आता होगा। इसका जवाब बहुत आसान है – राजकुमारी दुसरे लोगों से इतनी ऊपर थी कि किसी को उसको छूना मना था[1]।

अस्पृश्यता के अलग अलग प्रकार होते हैं।  Brian De Palma की फ़िल्म के द्वारा चर्चित ‘अस्पृश्यता’ के अलावा एक और का ज़िक्र करना चाहिए क्योंकि इसके बारे में सब लोगों को पता है। दूसरा मामला भारत से संबंधित है जहाँ एक दुसरे से छू जाना भयावह माना जाता है। दोनों में डर बराबर है मगर आधार अलग। देवी बनी हुई राजकुमारी या खतरनाक माफ़िया से डर और उनकी अस्पृश्यता भारतीय दलितों की अस्पृश्यता से बहुत दूर है।

बहुत सारे सुधारक जो भारत में रहते थे अछूतों की ज़िंदगी को बदलने की कोशिश करते थे लेकिन अजीब बात यह है कि इस काम में उन में से किसी ने फ़िल्म का इस्तेमाल नहीं किया। भारतीय निर्देशकों के लिए भी फ़िल्म अधिप्रचार (PROPAGANDA) के लिए उचित साधन नहीं लगता था। यह भी एक अजीब बात है क्योंकि अधिप्रचार के लिए फ़िल्म सब से अच्छा साधन है। फ़िल्म बनानेवाले लोग समाज सुधारकों के साथ काम नहीं करते थे। इसी प्रकार गाँधी जी जो अछूतों के लिए बहुत काम करना चाहते थे और करते भी थे लेकिन फ़िल्म की मदद से अपने सुधारों के बारे में कुछ नहीं बताते थे। उनके लिए फ़िल्म कभी अच्छी चीज़ नहीं थी और उन्होंने कभी पसंद  भी नहीं किया। उनके लिए फ़िल्में पतनशील पश्चिमी सभ्यता का एक और उदाहरण था या फिर साधारण मनोरंजन का एक छोटा सा साधन जिसका ज़िंदगी में कोई महत्त्व नहीं है। उन्होंने स्वीकार किया कि उन्होंने सिर्फ़ एक फ़िल्म देखी है। यह फ़िल्म 1943 वाली विजय भट्ट की ‘राम राज्य’ थी और शायद इसीलिए उन्होंने कभी नहीं सोचा कि यह मनोरंजन करने वाला, साधारण लोगों का तमाशा अपने पैदाइश से ही वह सब कुछ दिखाता जिसके बारे में वे बताते हैं[2]।

उदाहरण के लिए फ़िल्म की दुनिया में अलग अलग धर्म के लोग साथ साथ रहते हैं और यह बात किसी को कभी अजीब नहीं लगती थी। शुरू से ही ऐसी स्थिति थी कि अक्सर हिंदू धर्म के देवताओं या राजाओं का अभिनय मुसलमान अभिनेता करते थे और मुसलमान के पीरों या सम्राटों का अभिनय हिंदू अभिनेता। यह भी कोई नयी बात नहीं है और न कभी थी कि किसी समय में सब से लोकप्रिय अभिनेता मुसलमान होते हैं और दुसरे समय में हिंदू। ‘तीन खानों’, यानी आमीर खान, शाहरुख़ खान और सलमान खान की लोकप्रियता जो 1990 के दशक में थी, इसका अच्छा उदाहरण हो सकता है। इसी समय में ‘कुछ लोगों’ के लिए ऋतिक रोशन की सम्भावना का हिंदू धर्म से स्पष्ट संबंध था। उन ‘कुछ लोगों’ के लिए ऋतिक तीन खानों से जीतने के लिए आ गया और हिंदू धर्म मुसलमानों से जीतने के लिए[3], लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ऋतिक की लोकप्रियता के अतिरिक्त बाकी तीनों अभिनेता फ़िर भी मशहुर रहे। शाहरुख़ खान के साथ एक ध्यान देने योग्य घटना हुयी जो कि बहुत अच्छा उदहारण है। वह काम करने के बाद बहुत थके होने के कारण एक गाँव के पास गाड़ी में ही सो गया। जब उठा तो उसने गाँववालों की भीड़ देखा। गाँववाले आग्रह कर उसे एक घर में ले गए और वहाँ यज्ञ-वेदी के स्थान पैर  उसने अपनी तस्वीर देखी[4]। एक और ऐसी ही कहानी जिसके बारे में बताना मुझे उचित लगता है अशोक कुमार की है। वह अभिनेता जो विभाजन के बाद अपने स्टुडियो ‘बॉम्बे टाकीज’ में बहुत से मुसलमानों को काम देता था। एक बार वह अपने एक दोस्त के साथ स्टुडियो से घर जा रहा था। रास्ते में मुसलमानों का इलाका पड़ता था, जहाँ एक एक बारत जा रही थी। अशोक के दोस्त को डर लगा की बारत वाले उनके साथ कुछ बुरा बर्ताव करेंगे लेकिन भीड़ के लोगों ने अशोक कुमार को पहचान लिया, उन दोनों को स्वागत किया और उनको सब से अच्छा रास्ता दिखाया। दोस्त आश्चर्यचकित हो गया लेकिन अशोक कुमार ने उसको कहा कि मुझे एक क्षण के लिए भी डर नहीं था क्योंकि कलाकारों की कोई जाति या धर्म नहीं होता है[5]।

स्पष्ट रूप से फिल्मी- दुनिया की स्थिति इतनी अच्छी नहीं थी, जितनी आशोक कुमार के विचार में थी। उदाहरण के लिए देवानन्द धर्म के कारण सुरया से शादी नहीं कर सकता था। सुरया के परिवार ने उसको देव को छोड़ने का हुक्म दिया, क्योंकि देव हिंदु था। कुछ समय बाद सुरया को अफ़सोस हुआ लेकिन फैसला बदलने के लिए देर हो चूका था[6]। इसी तरह जब 1957 में नर्गिस को ‘मदर इंडिया’ में काम मिल गया तो कुछ लोगों को यह अच्छा नहीं लगा। वे नहीं चाहते थे कि देश का प्रतिरूप एक मुसलमान औरत हो[7]। फ़िर भी, हम यह कह सकते हैं कि ये सिर्फ़ छोटे उदाहरण हैं। फ़िल्म की दुनिया में धर्म का उतना महत्त्व नहीं था जैसे मामूली जीवन में।

इन उदाहरणों में हम लोग देख सकते हैं कि फ़िल्म में ‘अनुदारता से लड़ाई और कुछ अलग दुनिया दिखाने की कोशिश’ हमेशा कहानियों की स्तर पर होती थी। फ़िर भी, इसका मतलब यह नहीं है की ऐसी फ़िल्में कभी नहीं बनाई जाती थीं जिनकी कहानियों में अलग-अलग पूर्वाग्रहों से, दुर्गुणों से लड़ाई होती थी (धर्म के क्षेत्र से अलग)! इस तरह हम यह कह सकते हैं कि पहती फ़िल्म जो अस्पृश्यता के बारे में थी जो कि गाँधी जी के सुधार-आन्दोलन से प्रेरित थी Franz Osten की ‘अछूत कन्या’ जो 1936 में बनाई गई। यह फ़िल्म प्रताप नाम के ब्राहमण लड़का और कस्तुरी नाम की अछूत लड़की की एक दारुण प्रेम-कहानी है। कस्तुरी के पिता, जिनका नाम दुखीजा है, एक स्टेशन-मास्टर हैं और प्रताप के पिता की एक दुकान है। दुखीजा ने एक बार प्रताप के पिता की जिन्दगी बचायी और इस घटना से उन दोनों की बहुत अच्छी दोस्ती है। उनका अपने बच्चों की दोस्ती से कोई विरोध नहीं है लेकिन जब प्रताप और कस्तुरी की दोस्ती से प्रेम उत्पन्न होता है तो अचानक उन दोनों की जातियों का अंतर दिखाई देता है। यह अंतर जो पहले बिलकुल प्रकट नहीं था। प्रताप की अपनी जाती की एक लड़की से शादी की जाती है और यह शादी कस्तुरी के लिए कोई चौंकानेवाली या गज़ब बात नहीं है। अछूत लड़की के लिए यह सब इतना स्वाभाविक है कि वह प्रताप की पत्नी – मीरा से दोस्ती करती है। प्रताप के पिता की अछूतों से दोस्ती गाँववालों को पसंद नहीं है और जब इस कारण से उसके साथ दुर्घटना होती है तो दुखीजा उसके लिए जल्दी दवा लाना चाहता है और जाती हुई रेलगाड़ी को रोकता है। दुर्भाग्या से उसको न दवा मिलती है न कोई पुरस्कार मिलता है, बल्कि वह अपने काम से निकाला जाता है। उसके स्थान पर एक जवान लड़का आता है जिसका नाम मनु है। दुखीजा मनु और कस्तुरी की शादी करवाता है। दुर्भाग्यपूर्ण कि लड़की शादी को स्वीकार करती है और कोई फ़रियाद नहीं करती, तब भी जब उसको पता चलता है कि मनु की एक और शादी हो चूकी थी और उसकी पत्नी – कजरी उनके साथ रहने के लिए आ जाती है। कस्तुरी कजरी को दीदी बुलाती है और कभी कोई बुराई नहीं करती है। फ़िर भी मनु की दुसरी पत्नी को बड़ी ईर्ष्या है क्योंकि मनु सिर्फ़ कस्तुरी से प्रेम करता है। मीरा कजरी की सहेली है। पहली मुलाकात में प्रताप की पत्नी कजरी को कहती है कि उसका पति भी सिर्फ़ कस्तुरी से प्यार करता है। कजरी के मन में कस्तुरी को निकलाने की अशुभ राय आती है और दोनों औरतों की चुगली के कारण प्रताप और मनु के बीच बहुत बड़ा झगड़ा होता है। वे दोनों रेल की पटरी पर मार-पीट करते हैं और आनेवाली गाड़ी पैर ध्यान नहीं देते हैं। रेलगाड़ी को रुकवाने के चक्कर में कस्तुरी की मौत होती है। इस लज्जाजनक विषय को दिखाने के लिए, जो पहले किसी से नहीं दिखाया गया, इस फ़िल्म को बहुत सारी प्रशंसाएँ मिली[8]। वास्तव में 1936 में ऐसे विषय के बारे में बताना बहुत बड़ी बहादुरी थी। अफ़सोस की बात सिर्फ़ यह है कि इतने सालों में किसी दुसरे निर्देशक ने कुछ ऐसा नहीं किया। शायद Franz Osten के लिए ऐसी कहानी को दिखाना इतनी मुशकिल बात नहीं थी क्योंकि वह जर्मनी से भारत आया था और जिसके लिए यह विषय कोई बड़ा निषेध नहीं था। हमें फ़िर भी यह स्वीकार करना होगा कि फ़िरंगी होने के बावजूद Osten ने अपने दर्शकों को जो दिखाया उसके लिए उसने भारतीय समाज का बड़ी गहराई से अध्ययन और अनुभव किया। Osten का अनुभव उन स्थानों में अच्छी तरह दिखाई देता है जहाँ फ़िल्म के नायक और नायिका बिना किसी झिझक के अपने उपर आरोपित भाग्य को स्वीकार करते हैं और अपनी खुशी और सन्तुष्ट भविष्य के लिए लड़ाई नहीं करते हैं। दिलचस्प बात यह है कि फ़िल्म अपने दर्शकों को भी बहुत अच्छी लगी। हमें यह भी याद रहना चाहिए कि अच्छी व्यावसायीक फ़िल्म वह होती है जो सब को पसंद हो, सीधे-सादे लोगों को भी जो कि अक्सर बहुत रूढ़िवादी होते हैं। अगर ऐसे दर्शकों को अचानक विवादग्रस्त कहानी देखने की इच्छा होती है और देखने के बाद यह कहानी उनको पसंद है तो इसका मतलब यह है कि वे दर्शक कुछ न कुछ परिवर्तनों के लिए तैयार हैं। हो सकता है कि Osten की फ़िल्म उसी समय में लोगों को इसलिए पसंद थी क्योंकि वे गाँधी जी के दबाव में थे लेकिन यह भी सच है कि फ़िल्म का निषेध बिल्कुल हटा नहीं हुआ। प्रताप और कस्तुरी के बीच में प्रेम है और लड़का अपनी प्रेमिका को अक्सर छूता है। प्रताप के पिता अपनी दुकान की सब चीज़ें कस्तुरी को बेचते हैं। बहुत आश्चर्यचकित बात यह है कि एक क्षण में प्रताप कस्तुरी के साथ गाँव से भागना चाहता है और लड़की के इनकार के बाद भगवान को पूछता है कि उसने उसको भी अछूत क्यों नहीं बनाया! ऐसा उत्कर्षण एकदम नयी बात है जो अक्सर नहीं मिलती है। यह भी बुद्धिमानी वाली बात है जिसकी सहयता से हर दर्शक देख सकता है कि सिर्फ़ अछूत होने से कोई दोष नहीं है, समस्या तब उत्पन्न हो जाती है जहाँ दो जातियों के लोग एक दुसरे से प्रेम करते हैं। शादी के लिए समाज की अनुमति का अभाव फ़िल्म की सिर्फ़ एक कठिनाई है, लेकिन सबसे बहुत महत्त्वपूर्ण कठिनाई तो वह है जो सब को याद दिलाती है कि कई ऐसे निषेध होते हैं जिनको तोड़ना असंभव है। हम देख सकते हैं कि 1936 में भारतीय समाज थोड़े परिवर्तनों के लिए तैयार था लेकिन ज़्यादा नहीं। फ़िल्म में महत्त्वपूर्ण बात यह भी है कि नियमों तोड़ने की सज़ा लड़की को मिलती है। शायद यह उस विचार से संबंधित है कि एक जाति से दुसरी जाति के बीच किसी भी तरह के अतिक्रमण की सज़ा उसको मिलती है जिसकी जाति नीची है।

फिल्म की प्रस्तुतीकरण और पारंपरिक-शैली की परवाह किए बिना ‘अछूत कन्या’ बहुत बहादुर फ़िल्म है। इस बहादुरी का सबुत सबसे पहले यह है कि दुसरी ऐसी फ़िल्म के लिए हमें बहुत इंज़ार करनी पड़ी। 1959 में बिमल राय ने ‘सुजाता’ की फ़िल्म बनाई जो फ़िर से अछूत लड़की और ब्राम्हण लड़के के प्रेम की कहानी है।

उपेन्द्रनाथ चौधरी और उसकी पत्नी चारू की एक छोटी बेटी है जिसका नाम रमा है। जब लड़की की उम्र एक साल की है तो चौधरियों के घर में एक दुसरी लड़की आती है। वह लड़की अनाथ है जिसके माता-पिता आसपास के गाँव में रहते थे। समस्या यह है कि वह लड़की अछूत है इसलिए श्रीमती चौधरी छोटी लड़की की देखभाल के लिए अपनी नौकरानी को हुक्म देती है। श्रीमती चौधरी का डर स्पष्ट है लेकिन इसी समय में आश्चर्य की बात यह है कि उसको अपनी बेटी के अपवित्र हो जाने से डर नहीं है। जबकि अछूत लड़की को वही आया को देती है जो छोटी रामा की देखभाल करती है। आया को भी इस स्थिति में कोई समस्या नहीं है और वह नयी बच्ची की देखभाल करती है यद्यपि छोटी लड़की उसकी जाति से भी नीचे की है, लेकिन ऐसा शायद इसलिए है कि आया को वही करना चाहिए जो मालिक कहते हैं और उसको किसी भी तरह की शिकायत करने का भी अधिकार नहीं है। उपेन्द्रनाथ जल्द ही अपनी पत्नी के व्यवहार से विपरीत अछूत लड़की को स्वीकार करता है और उसका नाम सुजाता रख देता है। चारू को समाज से निकलने का बहुत डर है इसलिए उसको सुजाता से अपने पति के किसी भी तरह के संपर्क बहुत बुरे लगते हैं।

सुजाता को स्वीकार करने में सब से बड़ी बाधा बुढ़ी बुआ – गिरिबाला है। वह बहुत धर्मिक औरत है इसलिए एक पण्डित के साथ चोधरियों के यहाँ आती है। पण्डित के लिए अछूत लड़की से मिलना बड़ा अपमान है। वह समझ नहीं सकता है कि ऐसी बच्ची ऊँची जाति के लोगों को साथ कैसे रह सकती है और वह चौधरियों के घर को छोड़ने का निश्चाय करता है। उसके जाने से पहले जब उपेन्द्रनाथ उसको पूछता है कि उसके विचार में सुजाता और घर के दुसरे लोगों में सचमुच कोई बड़ा अंतर है, पण्डित कहता है कि अछूतों के शरीर से जहरीली हवा निकलती है जो आसपास के लोगों के लिए बहुत खतरनाक है। उपेन्द्रनाथ को यह बहुत मज़ेदार लगता है लेकिन पण्डित कहता है कि विटामिन को भी कोई देख नहीं सकता है पर इसका मतलब नहीं है कि ऐसी कोई चीज़ नहीं होती है।

पण्डित की सोच एक दुसरे पण्डित के विचारों से मिलती-जूलती है। बटुप्रसाद शर्मा शास्त्री बनारस के एक मंदिर में गुरू है और 2007 में बनी स्टालिन कुरूप के एक वृत्तचित्र ‘India Untouched: Stories of a People Apart’ का एक चरित्र। इस पण्डित के मन में भी बहुत सारे अजीब उदहारण होते हैं जिनके अनुसार अछूतों को अपने भाग्ये को स्वीकार करना चाहिए और जीवन को बदलने के बारे में सोचना मना है। पण्डित के अनुसार जिस मनुष्य को हवाई जहाज़ को चलाना नहीं आता है वह उसे नहीं चलाएगा। वैसे ही अछूतों को सिर्फ़ यह करना चाहिए जो परंपरा के अनुसार उनको हमेशा करना था। स्टालिन कुरूप की फ़िल्म में एक और ब्रहमाण है। वह कहता है कि हर व्यक्ति अपने काम करने के लिए पैदा होता है और वह सिर्फ़ वही काम कर सकता है जो उनके पूर्वज शताब्दियों से करते आये हैं। वह ब्राम्हण है, उसको चिंतन करना अच्छी तरह आता है और यह उसके लिए आसान है जब कि दुसरों के लिए असंभव। वैसे ही सफ़ाई करनेवाला या नाई को भी ऐसे ही कौशल आते हैं जिसके बारे में ब्राम्हणों को बिल्कुल ज्ञान नहीं है। कभी कभी पश्चिम के लोगों को यह असंभव लगता है कि 21 शताब्दी में भी लोगों के अंदर इतने पूर्वाग्रह होते हैं! लेकिन, ये दो उदहारण अच्छी तरह दिखाते हैं कि बिमल राय की ‘सुजाता’ का पण्डित कोई अतिरंजित व्यक्ति नहीं है बल्कि भारत में सचमुच में ऐसे लोग हैं जो आज भी इन बेतुकी बातों पर विश्वास करते हैं.

सुजाता चौधरियों के घर में रहकर बड़ी हो जाती है लेकिन यहाँ एक और विरोधाभास दिखाई देता है। चारू लड़की को कभी नहीं छूती और अपने पति को हमेशा घुड़की देती है जब उपेन्द्रनाथ अछूत लड़की के पास जाता है। अजीब बात यह है कि इसी समय में वह अपनी बेटी रामा को सुजाता के साथ खेलने की अनुमति देती है। सुजाता की स्थिति एक उपेक्षिता सी है – वह स्कूल नहीं जाती है, घर पर मता-पिता की देखभाल करती है और उद्यान में फूलों की। सुजाता की इस हालत के बावजूद उसकी सौतेली बहन उसके प्रति कभी बुरा व्यवहार नहीं करती है, फ़िर भी दिलचस्प बात यह है कि रमा को अपनी सौतेली बहन कि स्थिति कभी भी अजीब नहीं लगती है। रमा को मालूम नहीं है कि सुजाता उसकी सौतेली बहन है फ़िर भी वह माता-पिता से कभी नहीं पूछती है कि सिर्फ़ मैं ही स्कूल क्यों जाती हूँ और केवल मेरा ही जन्मदिन क्यों मनाया जाता है! घर के लोग चाहते हैं कि रमा की शादी अधीर से होती। अधीर एक जवान लड़का है जो गिरिबाला के साथ रहता है। जब वह पहली बार चौधरियों के घर आता है तो उसको सुजाता के उपर प्रेम आता है। उसका प्यार बहुत गहरा है और वह तब भी नहीं बदलता है जब उसको पता चलता है कि सुजाता अछूत जाति की लड़की है। अधीर अपने घर को छोड़ने के लिए तैयार है क्योंकि वह सिर्फ़ सुजाता से शादी करना चाहता है। चारू सोचती है कि उसकी सौतेली बेटी ने जानबूझकर अधीर को लुभाया क्योंकि उसको रमा के प्रति ईर्ष्या थी और वह अपनी बहन से प्रतिशोध लेना चाहती थी। सुजाता पर चिल्लाने के समय चारू अचानक सिढ़ियों से गिरती है और उसकी हालत बहुत गंभीर है। चारू के इलाज के लिए रक्त-आधान की ज़रूरत है। दुर्भाग्य से पति, रमा और अधीर का ब्लड-ग्रूप चारू से नहीं मिलता है पर सुजाता का वही है जिसकी जरुरत है। इस तरह सुजाता अपनी सौतेली माँ की जिन्दगी बचा सकती है।

यह दृश्य जहाँ रक्त-आधान चल रहा है बहुत दिलचस्प है क्योंकि हम यहाँ स्पष्ट रूप से देख सकते हैं कि सुजाता के खून के बारे में सुनकर उपेन्द्रनाथ बहुत अश्चार्यचकित हो जाता है। वह आदमी हमेशा सुजाता की रक्षा करता था और पण्डित के पागल विचारों पर हंसता था लेकिन कहीं अंदर में शायद वह भी सचमुच सोचता था कि अलग अलग जातियों के लोगों में ऐसे अंतर होते हैं।

बिमल राय की फ़िल्म अछूतों की पहली फ़िल्म बहुत सालों के बाद बनाई गई लेकिन इसमें भी गाँधी जी के विचारों से स्पष्ट संबंध है। सुजाता अक्सर नदी के किनारे जाती है और वह समय बिताने के लिए उसकी सब से अच्छी जगह है। जब उसको पता चलता है कि वह अछूत जाति की एक लड़की है जिसको चारू और उपेन्द्रनाथ ने गोद में लिया है, वह निराश होकर नदी के पास आती है और तेज़ बारिश में भींग जाती है। वह आत्महत्या करने का निश्चय करती है लेकिन जब पानी की तरफ़ आती है तब उसकी साड़ी का आँचल पास ही खड़ी गाँधी जी की मूर्ती से फँस जाता है। सुजाता मूर्ती की ओर देखती है और बारिश की बूंदें जो गाँधी जी के चेहरे पर बहती हुई आँसू जैसी दिखाई देती हैं।

गाँधी जी एक मात्र सुधारक नहीं है जिनका फ़िल्म में ज़िक्र है। रमा के कॉलेज में एक नाटक दिखाया जाता है जिसे देखने के लिए वह सारे परिवार को बुलाती है। समस्या यह है कि गिरिबाला नहीं चाहती है कि सुजाता भी जाए और वह बेचारी घर पर रहती है। जो नाटक दिखाया जाता है वह रबीन्द्रनाथ ठाकूर का ‘चंदलीका’ है। नाटक देखती हुई गिरिबाला को यह बहुत उचित लगता है कि स्कूल के स्टेज पर खड़े बुद्ध अछूत लड़की के हाथों से पानी लेते हैं और सभी जातियों की बराबरी के बारे में व्याख्यान देते हैं। गिरिबाला यह नहीं देखती है कि नाटक की अछूत लड़की और सुजाता में कोई अंतर नहीं है। यह व्यंग्य ऐसे लोगों के प्रति किया गया जिनके लिए सुधार सिर्फ़ एक प्रचार वाक्य हैं। फ़िर भी फ़िल्म की अंत में गिरिबाला भी यह साबित करती है कि प्यारे अधीर के लिए वह अपने विचारों को छोड़ सकती है। जब अधीर घर को छोड़ना चाहता है तब गिरिबाला सुजाता को स्वीकार करती है और कहती है कि शायद वह सचमुच पुरानी पीढ़ी की मानसिकता की वाहक है, उसे अब युवा विचारों को जगह देनी चाहिए।

अफ़सोस की बात यह है कि वास्तविकता हमको अच्छी तरह दिखाई देती है कि युवा आदर्शवादियों के सब सुधार असफल हुए और बॉलीवुड ने फ़िर से कभी ऐसी कहानी नहीं दिखाई। ‘सुजाता’ ‘अछूत कन्या’ की ही तरह बहुत सुगम फ़िल्म थी इसके बावजूद कि बिमल राय Franz Osten से आगे चला गया और उसने अछूत लड़की का ब्राहमण लड़के से शादी को संभव बनाया। व्यावसायीक सफलता के बावजूद सिनेमा के निर्देशकों को इस विषय से बड़ा डर है। ‘सुजाता’ के समय से भारत में बहुत मजबूत फ़िल्में बनी हैं और बहुत से निषेध टूटे भी हैं। फिर भी, अंतर्जातीय और विधवा विवाह आज भी मामूली दर्शकों को अनुचित लगते हैं।

सिनेमा की मुख्यधारा से अलग रहने वाले निर्देशकों का तरीका कुछ अलग ही होता है इसलिए वे आक्सर व्यावसायीक फ़िल्मों के निर्देशकों से ज़्यादा आज़ाद होते हैं। उनके लिए दर्शकों का ख्याल इतने महत्त्वपूर्ण नहीं हैं लेकिन इसके बावजूद भी हिंदी सिनेमा में, कला फिल्मों, सामानांतर फिल्मों और स्वतंत्र फिल्मों में भी, दलित-समस्याओं के चित्रण का अभाव है। यह बात अजीब लगती है क्योंकि आज़ाद निर्देशकों के लिए औरतों की स्वतन्त्रता, धर्मों के क्षेत्र में लड़ाई या घूसखोरी दिखाने में कोई समस्या नहीं है। जाति के निषेध को तोड़ने की हिम्मत उपर्युक्त सारे क्षेत्रों से ज्यादा चुनौती-पूर्ण है.

बहु-चर्चित निर्देशक श्याम बेनेगल ने, जिन्हें कई-एक राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुके हैं, अपनी पहली फ़िल्म 1974 में बनाई। इस फ़िल्म का नाम ‘अंकुर’ है और यह भी अछूत औरत और ब्राहमण आदमी के रिश्ते की कहानी है। फ़िल्म के नायक सुर्या की शादी बचपन में हो गई है और अब उसे अपनी पत्नी का इंतज़ार करना है। वह अपने पिता जी की जमींदारी के अंतर्गत आने वाले एक छोटे गाँव में जाता है और देखता है कि उसके घर के पास एक सुंदर औरत रहती है। औरत का नाम लक्ष्मी है और वह अछूत है। उसका जीवन बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है क्योंकि उसका पति शराबी है। लक्ष्मी बच्चा चाहती है लेकिन किसी कारण से यह उसके लिए असंभव है। सुर्या चाहता है कि लक्ष्मी उसके लिए काम करे और उसको अपने लिए खाना पकाने की अनुमति देता है जो न सिर्फ़ गाँव वालों के लिए बल्कि लक्ष्मी के लिए भी आश्चर्यजनक है। एक दिन लक्ष्मी का पति कहीं जाता है और लक्ष्मी और सुर्या एक दुसरे के करीब आते हैं। आशिक़ों का संतोष अचानक नष्ट हो जाता है जब सुर्या की पत्नी गाँव में आती है। इसी समय को लक्ष्मी को पता चलता है कि वह माँ बननेवाली है। सुर्या की पत्नी को अच्छी तरह मालूम है कि उसके पति और लक्ष्मी के बीच में क्या है और वह दुसरी औरत को निकलाने की कोशिश करती है। जब सुर्या को बच्चे के बारे में पता चलता है तो वह लक्ष्मी को घर से निकलाता है। इसी समय लक्ष्मी का पति शराब छोड़कर वापस आता है। लक्ष्मी को डर है कि पति बच्चे के बारे में क्या सोचेगा लेकिन बह खुश होकर सुर्या के घर जाता है, यह सोचकर कि शायद उसको काम मिलेगा। ब्राहमण सोचता है कि अछूत आदमी उसको मारने के लिए आ रहा है और मार-पीट शुरू कर देता है। गाँव के दुसरे लोग भी इस मार-पीट में सूर्या को मदद देते हैं। जब लक्ष्मी को पता चलता है तो वह आती है और अपने पति की रक्षा करती है।

यह एक सरल कहानी है जिसमें निरंतर नैतिक शिक्षा नहीं है परन्तु फिल्म-निर्माण के लिहाज से कहानी का बहुत अच्छा चित्रांकन है। फ़िल्म में हम यह देख सकते हैं जो अक्सर पश्चिमी लोगों के लिए समझने में सब से मुश्किल है – क्या भारतीय समाज में अछूतों के प्रति सचमुच इतनी घृणा है जहाँ सेक्स करने और मारने के समय यह अस्पृश्यता खत्म हो जाती है। इस कहानी में सुधार के उपदेश या प्रचार के लिए शायद स्थान नहीं है लेकिन भारतीय समाज के जातिवादी जकड़न और ढोंग पर एक करारे व्यंग्य के कारण, जो कि भारतीय सिनेमा में अक्सर नहीं होता है, इसको याद रखना चाहिए। यह फ़िल्म मामूली दर्शकों के लिए नहीं है लेकिन सिनेमा का एक बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा तो ज़रूर है।

1981 में बनी सत्यजित रायकी ‘सद्गति’ ‘शतरंज के खिलाड़ी के बाद उनकी दुसरी हिंदी फ़िल्म है। दोनों फ़िल्में प्रेमचंद की कहानी पर आधारित हैं। प्रेमचंद की कहानी ‘सद्गति’ ‘चमार’ जाति से आने वाले दुखी नाम के एक व्यक्ति के बारे में है जो अपने बेटी की शादी करवाना चाहता है और इसके लिए ब्राहमण का आशीर्वाद चाहिए ताकि वह घर आकर शुभमुहूर्त निकाल सके। वह अछूत है इसलिए उसको ब्राहमण का बहुत लंबा इंतज़ार करना है। बेचारे आदमी के पास पैसा नहीं है इसलिए ब्राहमण उसको लकड़ी काटने का हुक्म देता है। आदमी भूख के कारण कमज़ोर है इसलिए अच्छी तरह काम नहीं कर सकता है। जब आखिर में ब्राहमण जाने के लिए तैयार है वह देखता है कि दुखी मर गया है। गाँव में रहने वाले अछूत मरे हुए आदमी को लेना नहीं चाहते हैं और ब्राहमण चुपचाप दुखी की लाश को दूर ले जाता है और वापस आने के बाद नहा लेता है और इसी समय जानवर खेत में लेटे हुए लाश को खाते हैं।

फ़िल्म प्रेमचंद की कहानी के बहुत नज़दीक है। अछूत आदमी को अलगअलग हुक्म दिये जाते हैं, इसके बावजूद की उसने भैंसों के लिए घास लाया है। वह सब कुछ करता है बार-बार गाँव के केंद्र में खड़ी हुई रावण की बड़ी मूर्ती के पास जाकर, लेकिन लकड़ी को काटना उसके मौत का कारण बना।

बेचारा दुखी मर जाता है। बाकी अछूतों को इस घटना के बारे में पता चलता है। इसलिए जब ब्राहमण उनके यहाँ आता है और उनको लाश ले जाने की हुक्म देता है तो वे लोग उसको ध्यान नहीं देते हैं। दुखी के समुदाय के लोगों ने लाश नहीं उठाने का फैसला कर एक तरह से ब्राह्मण द्वारा हुए अत्याचार का विरोध करते हैं। यहाँ एक ध्यान देने वाली बात यह है कि दुखी जिस लकड़ी को काट रहा था, वह ऐसी-वैसी लकड़ीनहीं थी। वह ब्राह्मणवाद और जातिवाद का कठोर गट्ठर था और कितने दुखी को उसके लिए मरना पड़ा है।

राय की फ़िल्म और प्रेमचंद की कहानी में असाधारण अनुकूलता है जो थोड़ी सी अश्चार्यजनक है क्योंकि यह लेखक भारत में बहुत लोकप्रिय है। प्रेमचंद की कहानियों के आधार पर फ़िल्म बनाना आसान बात नहीं है क्योंकि वह आमतौर पर समाजिक-दोषों के बारे में लिखता था, लेकिन समाधान नहीं बताता था और ऐसी कहानियां व्यापारिक फ़िल्मों के लिए ज़्यादा अच्छा विषय नहीं है क्योंकि उन फ़िल्मों को स्पष्ट समाधान चाहिए। नायक द्वारा खलनायक का वध जैसी कहानियां।

1991 में बनाई हुई ‘दीक्षा’ एक और बॉलीवुड के बाहर की हिंदी फ़िल्म है जहाँ दलितों का ज़िक्र है। फ़िल्म का आलेख कर्नाटक के लेखक यू. आर. अनंतमूर्ति की कहानी पर आधारित है। 1992 में इस फ़िल्म को हिंदी की सब से अच्छी फ़िल्म के लिए पुरस्कार भी मिला लेकिन फिल्म व्यावसायीक रूप से सफल नहीं हुई। फ़िल्म का नायक एक छोटा ब्राम्हण लड़का है जिसका नाम नानी है। वह गाँव में रहने वाले एक ब्राम्हण का एक बेटा है। नानी के पाँच भाई मर गए हैं इसलिए उसका पिता निश्चय करता है कि उसको पढ़ाई के लिए पण्डित उडूप के यहाँ भेज देगा ताकि भगवान उसको जीवित रखे। पण्डित के दो वरिष्ठ शिष्य हैं जो अक्सर नानी को बहुत कष्ट पहुंचाते हैं, पर पण्डित की एक जवान बेटी यमुना भी है जो विधवा बन गई और वह नानी को अपने बेटे के समान समझती है।

जब पण्डित गाँव से कुछ दिनों के लिए कहीं जाता है तो यमुना और गाँव के अध्यापक के बीच में प्रेम उत्पन्न होता है और विधवा गर्भवती हो जाती है। पण्डित के वरिष्ठ शिष्यों के कारण गाँव के सारे लोगों को पता चलता है कि यमुना माँ बननेवाली है। यमुना पाप से बचने के लिए गर्भपात करवा लेती है। इसके बाद उसका पाप और बड़ा हो जाता है। पण्डित अपने शिष्यों को घर भेज देता है और अपनी जीवित बेटी का अंतिम संस्कार करता है।

यह फ़िल्म विधवाओं की स्थिति के बारे में है लेकिन इसमें अछूतों की स्थिति को भी दर्शाया गया है। पण्डित का नौकर कोगा अछूत है। वह हमेशा ब्राहमण लड़कों की तरह पढ़ना चाहता था। गाँव में रहनेवाले दुसरे अछूत आदमियों के लिए कोगा का व्यवहार उनकी जाति का अपमान है। वे लोग सोचते हैं कि कोगा ब्राहमण बनना चाहता है और यह उनके लिए सब से बड़ा पाप है क्योंकि हर जाति को अपना कर्तव्य करना चाहिए। इसी तरह कोगा दोहरा परित्यक्त बन जाता है, न घर का न घाट का। एक बार अपनी जाति के कारण और दुसरी बार अपने व्यवहार-विचार के कारण जो उसकी जाति के लोगों के विचारों के अनुकूल नहीं है। जब कोगा की बुआ जो उसकी एक ही रिश्तेदार थी मर जाती है अछूत आदमी पण्डित से उसके लिए अंतिम संस्कार की भीख मांगते हैं। शुरू में पण्डित के लिए यह खयाल घृणित लगता है लेकिन बाद में जो कोगा चाहता है वह करता है।

अरुण कौल की इस फ़िल्म में, जैसे पहले बिमल राय की फ़िल्म में, एक बुढ़ी औरत है जो दुसरों को पापी मानती है जबकि अपने व्यवहार में सब से दुराचारी लगती है। जब वह पण्डित को अछूत औरत के लिए अंतिम संस्कार करते हुए देखती है तो इसके बारे में दुसरे ब्राहमणों को बताती है जिसके कारण गाँववाले पण्डित उडूप पैर ध्यान रखना शुरू कर देते हैं। अच्छी बात यह है कि गाँववाले छोटे नानी को नहीं देखते हैं क्योंकि यह लड़का एक मात्र ऐसा व्यक्ति है जिसके लिए कोगा वैसा ही मनुष्य है जैसे गाँव के सब बाकी लोग। नानी के कोगा के प्रति के व्यवहार का आधार बच्चे की ‘दुनियावी अज्ञानता’ है जो अच्छी तरह दिखाता है कि लोगों में अंतर स्वभाविक नहीं होते हैं, बस संस्कृति से संबंधित। नानी कोगा की बुआ के लिए प्रर्थना करता है और नहीं समझता है कि क्यों पण्डित का व्यवहार दुसरों को इतना बुरा लगा! इस छोटे लड़के की संवेदना का एक और बहुत अच्छा उदाहरण है इस दृश्ये में है जब नानी कोगा को लड्डू देता है। अपने काम के लिए कोगा को खाना मिलता है। यमुना उसको चावल देती है ताकि वह भूख से नहीं मरे और काम कर सके लेकिन नौकर को मिठाई देना कुछ और ही इंगित करता है और अच्छी तरह दिखाता है कि छोटा लड़का बड़ों से अच्छी तरह आत्मा की अवश्यकता समझता है। नानी का व्यावहार इसका भी सबूत है कि सब पूर्वाग्रह अंतर्जात नहीं होते हैं पर संस्कृतिक विकास से संबंधित हैं।

छोटे लड़के का खुद से गहरा आकर्षण कोगा के लिए थोड़ा दहशतपूर्ण है। वह वही व्यक्ति है जिसके लिए नियमों के अनुसार व्यवहार करना जरुरी है इसलिए छोटे बच्चों को अधिकारों तोड़ने की अनुमति नहीं देता है। एक दृश्ये में नानी कोगा को तंग करता है और सारा समय उसको छूने की कोशिश करता है। बेचारे कोगा को ऊँचे ताड़ का पेड़ पर चढ़ना चाहिए। कोगा और गाँव के दुसरे अछूतों का व्यवहार यह अच्छी तरह दिखाई देता है कि अछूत लोग खुद से सोचते हैं कि पारंपरिक सोच-विचार से लड़ाई करना उचित बात नहीं है। जिसका कोगा की बुआ की मौत के बाद के दृश्य में ज़िक्र किया गया है, इस में भी कोगा पण्डित से अंतिम संस्कार मांगता है सिर्फ़ इसलिए कि इससे बुआ की आत्मा को शांति मिलेगी। कोगा सोचता है कि उसको यह करना चाहिए क्योंकि वह उसे पुरे जीवन मायूसी देता रहा। इस मायूसी का आधार यह था कि वह अपनी जाति के कर्तव्य नहीं करता था और अलग चीज़ों में दिलचस्पी रखता था। इन सब के कारण वह शायद अच्छा और संवेदनशील आदमी बन गया, लेकिन गाँव में रहनेवाले लोगों के विचार में अच्छा अछूत तो नहीं ही था और इस कारण एक हास्यस्पद व्यक्ति बन गया था।

जैसे पहले ही ज़िक्र किया गया उपर्युक्त तीनों फिल्में पुरस्कारों के बावजूद लोकप्रिय नहीं हुई। लेकिन शायद इन फ़िल्मों के कारण मुख्यधारा विषयक के निर्देशक कुछ सालों के बाद यह सोचने लगे कि इस समस्या को अपने दर्शकों को धीरे-धीरे दिखाना चाहिए। बॉलीवुड फ़िल्मों में उपदेश और नए सवालों को पूछना दो चीजें हैं । कभी पुरी फ़िल्मी कहानी किसी समस्या के बारे में होती है और इस प्रश्न को हल करने के बाद यह दिखाई देती है कि असहिष्णुता से किसनी खत्रा आती है। इसी तरह की फ़िल्म का एक अच्छा उदाहरण अनील शर्मा की ग़दर: एक प्रेम कथा है। यह फ़िल्म भारत-विभाजन के समय एक सिख लड़के और मुसलमान लड़की के प्रेम के बारे में है। लड़की के पिता को इस रिश्ते से तब तक विरोध है जब तक उसकी बेटी की दुर्घटना नहीं होती है। इस के बाद वह सोचने लगता है कि उसके कारण प्यारी बेटी की मौत हो सकती थी और यह सोचने लगता है कि धर्म इतना महत्त्वपूर्ण नहीं है। हम देख सकते हैं कि मुख्य समस्या धर्मों के अंतर का है लेकिन फ़िल्म के अंत में दर्शकों को कहा जाता है कि ऐसे अंतर समाज के लिए ठीक नहीं है।

दूसरी तरह की फ़िल्मों में भी यही होता है जिस में तकरारी बातें बिल्कुल प्राकृतिक होती हैं। ऐसी फ़िल्म का अच्छा उदाहरण मनमोहन देसाई की ‘अमर, अकबर, एंथोनी’ है। इस फ़िल्म की कहानी बॉलीवुड में लोकप्रिय खोया-पाया के सूत्र पर आधारित है। यह बचपन में खोये हुए तीन भाइयों की कहानी है जिन से एक हिंदू परिवार में बड़ा होता है, दुसरा मुसलमान परिवार में और तीसरे को इसाई धर्माचार्य गोद में लेता है। इस फ़िल्म में धर्मों के अंतर के बारे में कोई कुछ नहीं कहता है और सच के प्रकाशन के बाद किसी को अजीब नहीं लगता है कि हर आदमी का अलग धर्म है और अलग धर्म की पत्नी।

कौन सी योजना सही है यह कहना आसान नहीं है इसलिए वे इन दोनों फ़िल्मों में नहीं आती है। लेकिन लगता है कि निषेध को स्वभाविक बनाना तब तक मुमकिन होता है जब तक दर्शक इसके लिए तैयार है इसलिए दलितों के बारे में ऐसी फ़िल्में नहीं होती हैं और उनकी फिल्में तब तक सामने नहीं आएँगी जब तक लोग विशवास नहीं कर लेते कि दलित सचमुच दुसरे लोगों से बराबर हैं।

आशुतोष गोवारिकर की ‘लगान’ की कहानी अवास्तविक दुनिया में चली जाती है लेकिन ऐसी दुनिया बनाकर भी अछूतों को दुसरी जातियों से बराबर होने की अनुमति नहीं दी गई। फ़िल्म एक छोटे गाँव के लोगों के बारे में है जो अंग्रेज़ों से लड़ाई करते हैं। फ़िल्म का नायक – भुवन लगान हटाने के लिए अंग्रेज़ों से क्रिकेट खेल में जीतने की तैयारी करता है। उसका समूह भारतीय समाज का दर्पण है। इसमें अधिकांश हिंदू है लेकिन इसमें भी मुसलमान और सिख हैं। यह और बात है कि इस छोटे गाँव में मुसलमान भी रहते हैं और एक सिख कहीं दूर से अचानक आता है और इसमें कोई आश्चर्य नहीं है क्योंकि फ़िल्म की दुनिया वास्तविक नहीं है। हमको इसके बारे में भी याद करना चाहिए कि सिख और मुसलमान दोनों बहुत अच्छे खिलाड़ी हैं जिनको निकालना बहुत मुश्किल है। उन के द्वारा किए गए दोष उनके कौशल की कमी से नहीं आते हैं बल्कि विरोधियों के छल खेल या अभागी परिस्थितों के परिणाम हैं।

खेल शुरू होने से पहले एक और खिलाड़ी की ज़रूरत है। आसपास के गाँवों में रहनेवाले तैयारी को देखने को लिए आते हैं और उनमें एक अछूत आदमी भी है जिसका नाम कचरा है। एक क्षण में गेंद उसकी तरफ आता है और भुवन कचरा को इसे फेंकने को कहता है। जब कचरा गेंद को फेंकता है तो सब लोग देख सकते हैं कि वह अच्छी तरह गेंद को घुमा सकता है। भुवन कचरा को तुरंत अपने समूह में लेना चाहता है लेकिन जब वह इसके बारे में बताता है तब समूह के बाकी लोग खेलने से इंकार करते हैं। पहले वे भुवन के सब अजीब उद्देश्यों को स्वीकार करते थे लेकिन अछूत के साथ खेलना उनके लिए बहुत बड़ी बात है। भुवन कचरा को छूता है और सब को बताता है कि भारत को इसीलिए इतनी आसानी से उपनिवेश बनाया गया है क्योंकि उनके लोग एक दुसरे को साथ दे नहीं सकते हैं। अंत में कचरा अंतिम खिलाड़ी बन जाता है और खेल में आखिरी दाँव उसे ही खेलना है। उसकी दुगनी ज़िम्मेदारी है – अगर हार जाएगा तो उसका नया स्तर चला जाएगा और वह दुसरों से पहले से ज़्यादा तिरस्कृत होगा। जो गाँववाले हर दुसरे व्यक्ति को माफ़ करते हैं लेकिन कचरा को उसकी जाति के कारण सज़ा मिल सकती है! शायद यह तनाव कचरा के लिए मुश्किल है इसलिए वह असफल हो जाता है। सैभाग्य से भारत को एक और मौका दिया जाता है और इस बार भुवन को आखिरी दाँव खेलना है। भुवन को सफल होने का नसीब मिलना बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। फ़िल्म को बनाने वालों ने अपनी कहानी के बारे में बहुत सोचा और उन्होंने बहुत अच्छी तरह से अछूतों के प्रति आदर दिखाया। भुवन और कचरा दोनों भाग्यशाली थे और इसलिए भारत जीत गया। अगर नायक के कौशल कचरा से बड़े होते तो दर्शक यह सोच सकते थे कि अछूतों को सचमुच विशवास नहीं करना चाहिए क्योंकि मुख्य क्षण में वे निराशाजनक होते हैं!

अंग्रेज़ों से लड़ाई के बारे में बनी फिल्म ‘लगान’ का भुवन आमीर खान बाद में इसी विषय पर बनी एक दुसरी फ़िल्म में भी आ गया। केतन मेहता की ‘मंगल पाण्डे: द राइजिंग’ में अंग्रेज़ लोग सब से पहले जातिवादी हैं। जब एक अंग्रेज़ी दावत के समय भारतीय नौकर से एक गोरी औरत पर शराब छलक जाता है तो उसको बहुत बड़ी सज़ा मिलती है। नौकर को पीटता हुआ अंग्रेज चिल्लाता है कि उसकी गोरी औरत को छूना मना है और उसे कुत्ते कह कर संबोधित करता है। फ़िल्म का नायक मंगल पांडे मार खा रहे नौकर की रक्षा करता है लेकिन बाद की दृश्य में वह भी दुसरों के प्रति तिरस्कार दिखाता है। वह ब्राहमण है जिसको हर सुबह नदी में नहाना है। एक दिन वापस जाने के समय वह सड़क पर सफ़ाई करनेवाले अछूत से टकराता है। मंगल का व्यवहार वैसा ही है जैसा पहले नौकर के प्रति अंग्रेज़ का था और वह भी अछूत को कुत्ते की उपाधि देता है।

हम कह सकते हैं कि फ़िल्म में दिखाए गए अंग्रेज़ लोग गोरी चमड़ी के कारण अक्सर खुद को ज़्यादा अच्छा समझते हैं लेकिन फ़िर भी उनके लिए भारतीय लोगों से सम्पर्क उतना घृणित नहीं है। अंग्रेज़ों के बड़े घरों में सारे भारतीय नौकर काम करते हैं और उनसे खाने या पीने की वस्तु लेने में कभी कोई समस्या नहीं थी।

फ़िल्म सिपाही विद्रोह के बारे में है और इसका मुख्य विषय कारतूस की समस्या है। अंग्रेज़ लोग बड़ी आसानी से भूल जाते थे कि भारतीय सिपाहियों के लिए धर्म कितना महत्त्वपूर्ण है और उनके नियमों की इज्जत नहीं करते थे। 1806 में सिपाही नयी वर्दियों का विरोध करते थे जिनके कारण वे अपनी जाति से निकाल जा सकते थे, 1825 में समुद्र पार करना जो कि समाजिक नियमों के विरुद्ध था और अफगानिस्तान के युद्ध के समय बड़ी समस्या यह थी कि हिंदू सिपाहियों के लिए रोज़ का स्नान असंभव था और उनको मुसलमानों से खाना खरीदना था। कारतूस की समस्या सच में धर्म और संस्कृति के अपराध का सिर्फ़ एक और उदाहरण था।[9]

मंगल का अंग्रेज़ी दोस्त उसको भरोसा दिलाता है कि कारतूस के बारे में जो अफ़वाह होते हैं वे सच नहीं हैं लेकिन जब सब को पता चलता है कि मंगल का अपवित्रीकरण हुआ है तो वह तुरंत अपनी जाति से निकाल जाता है। लगता है कि अंग्रेज़ अच्छी तरह नहीं समझते हैं कि यह बात कितनी महत्त्वपूर्ण है और उनकी अज्ञानता के कारण मनुष्य को समाज के बाहर जीना पड़ता है जो मौत से भी बदतर है। मंगल यह सब कुछ न सिर्फ़ अपने अंग्रेज़ दोस्तों को स्पष्ट करता है बल्कि विदेशी दर्शकों को भी जो कभी इसके बारे में कुछ नहीं जानते हैं या विशवास नहीं करते हैं कि क्या यह सब कुछ सचमुच इतना महत्त्वपूर्ण है!

अपने ऊँचे स्तर को खोने के बाद मंगल हीरा से रिश्ता बनाता है। यह भी स्पष्ट है कि अगर वह शुद्ध ब्राहमण होता तो प्यार के बावजूद वेश्या से करीबी रिश्ता कभी नहीं बनाता। और, यहाँ भी भारत और अंग्रेज़ का अंतर है। विदेशी सिपाहियों के लिए हर वेश्या लालच थामने के लिए होती है, भारतीय या कोई दुसरी वेश्याओं में उनके लिए कोई अंतर नहीं है। केतन मेहता की फ़िल्म अछूतों के प्रति के बुरे व्यवहार का विरोध नहीं करता है और सिर्फ़ यह दिखाता है कि जातियों से अंतर कितने महत्त्वपूर्ण हैं।

इसी साल में बनी हुई आशुतोष गोवारिकर की ‘स्वदेश’ में भी हम पश्चिमी दृष्टि से भारत देख सकते हैं लेकिन यह दृष्टि ‘मंगल पाण्डे: द राइजिंग’ से कुछ अलग है। फ़िल्म के नायक का नाम मोहन है और वह भारत को छोड़कर यू एस ए में रहता है जहाँ नासा में काम करता है। एक दिन वह अपने देश में वापस जाने का निश्चय करता है अपनी आया को ढूढ़ने के लिए। आया एक छोटे गाँव में रहती है जहाँ इंटरनेट नहीं है, बिजली अक्सर चली जाती है और सब लोग वैसे ही जीते हैं जैसे पुराने ज़माने में। गाँव आने के बाद मोहन का व्यवहार पश्चिमी पर्यटक जैसा है – वह काफिले में सोता है, सिर्फ़ बोतल का पानी पीता है और यह नहीं समझ सकता है कि सब लोग इस तरह गाँव में कैसे जी सकते हैं।

गाँववालों में से एक अछूत आदमी – मेला राम रोज़-रोज़ मोहन के लिए खाना लाता है क्योंकि उसको आशा है कि विदेशी मेहमान उसको अपने साथ अमरीका ले जाएगा। मोहन का व्यवहार फ़िर से विदेशी पर्यटक के जैसा है और वह बिना किसी नियंत्रण के गाँव वालों का खाना खाता है। हम यह सोच सकते हैं कि शायद उसको पता नहीं है कि मेला राम कौन-सी जाति से है लेकिन बाद में जब गाँव में रहने वाले बुढ़े लोग मोहन की आलोचना करते हैं फिर भी वह मेला राम से दोस्ती नहीं छोड़ता है। फ़िल्म में अक्सर दिखनेवाले दृश्यों में मोहन, मेला राम और डाकखाने में काम करनेवाला निवारण तीनों एक स्कूटर पर बैठकर कहीं जाते हैं। सच में मोहन बीच में बैठता है जिसके मदद से मेला राम और निवारण का स्पर्श हो नहीं सकता है लेकिन यह फ़िल्म इस उपाय का पहला उदाहरण हो सकता है जिस में कोई समस्या नहीं होता है और फ़िल्म की दुनिया का अनुक्रम प्राकृतिक, स्वाभाविक है। फ़िल्म के गाँव में अछूत दुसरे लोगों से कुछ अलग होते हैं लेकिन इतनी नहीं और अगर कोई उनसे दोस्ती करना चाहता है तो कोई उसका विरोध नहीं करेगा। यह छोटा कदम है लेकिन अच्छी तरह दिखाई देता है कि फ़िल्म वाले धीरे धीरे इस समस्या को दिखाने में साहसी हो रहे हैं।

फ़िल्म में एक और दृश्य है जिस पर हमें ध्यान देना चाहिए। गाँव में सिनेमा आता है और सब अछूत पर्दे की दुसरी ओर में बैठकर दर्पण में प्रतिवर्तन जैसा कुछ देख सकते हैं। यह बड़ी असुविधा नहीं है जब तक कि फ़िल्म को देखने के लिए उपशीर्षकों (Subtitles) की ज़रूरत नहीं है लेकिन ऊँचे और नीचों का ऐसा स्पष्ट विभाजन अपमानजनक है। फिल्म के समय बिजली फिर से चली जाती है और पर्दे के सामने बैठे हुए बच्चे रो पड़ते हैं। मोहन सब को तारे दिखाता है और इस समय गाना गाता है। गाने की पराकाष्ठा में पर्दा हटाया जाता है। मोहन अपना टेलीस्कोप लाता है और सब को तारे और चन्द्र को देखने की अनुमति देता है। सब से महत्त्वपूर्ण बात यह है कि मोहन को जातियों को बराबरी के बारे में कोई भाषण देने की ज़रूरत नहीं है जैसे पहले भुवन को था और सब लोग साथ साथ टेलीस्कोप से देखते हैं बिना किसी शिकायत के। ‘स्वदेश’ अछूतों के बारे में नहीं है लेकिन वो यहाँ भी आ गया है और इस तरह दिखाया गया है कि यह फ़िल्म अब तक की सब से बहादुर फ़िल्म है। यह भी महत्त्वपूर्ण है कि किसी ने इसके लिए फ़िल्म की आलोचना नहीं की और इसका मतलब यह है कि फ़िल्म को बनानेवाले ने कहानी में अच्छी तरह अपने विचार डाल दिए हैं जो मुख्यधारा विषयक फिल्मों के लिए बहुत ही आवश्यक हैं।

चर्चित समाजिक आलोचक, प्रकाश झा ने 1985 में ‘दामूल’ बनाई जिसमें अमीर लोगों द्वारा गरीबों का शोषण दिखाया गया है। फ़िल्म ने उसको मशहूर बनाया और फिल्म को पुरस्कार भी मिले। 2011 में उसने दलितों के बारे में ‘आरक्षण’ बनाई। यह फ़िल्म निचली जातियों की प्रतिरक्षा के बड़े दावों के बावजुद उन्हीं जातियों के बीच में विवादास्पद हो गई।

यह एक युवा– दीपक की कहानी है। बह दलित है इसलिए शिक्षित होते हुए भी उसको काम नहीं मिलता है। प्रतिष्ठित कॉलेज का मुख्य अध्यापक – प्रभाकर अनंद उसको अपने स्कूल में काम देता है क्योंकि वह आदमी सालों से सभी जातियों के गरीब तबके के युवाओं को शिक्षित करने के लिए संघर्षरत है। आरक्षण-निति की मदद से निचली जातियों को स्कूलों और विश्वविद्यालयों में स्थान मिलता है वह प्रभाकर के विचार में बहुत अच्छा समाधान है। फ़िल्म का खलनायक मिथिलेश सिंह है जिसके लिए सिर्फ़ पैसा सबसे महत्वपूर्ण है और जो प्रभाकर को नष्ट करना चाहता है। शुरू में फ़िल्म में आरक्षण की निति के बारे में एक वाद-विवाद है और आरक्षण के फ़ायदे और नुकसान बताये जाते हैं। अफ़सोस की बात यह है कि फिल्म अपने विषय से जल्दी भटक जाती है और हम दुराचार और पैसों से सच्चाई की जीत का अरुचिकर और थकाऊ धर्माचार देखते हैं जिस में ‘दामूल’ की सरलता तो बिलकुल ही नहीं है।

मिथिलेश अपना स्कूल स्थापित करता है और पैसेवाले लोगों को बताता है कि उनके बच्चों को सिर्फ़ उसके स्कूल में ऐसी शिक्षा मिलेगा जिसकी ज़िंदगी में ज़रूरत होगी। धीरे धीरे वह प्रभाकर के स्कूल के अध्यापकों को प्रलोभन देता है। प्रभाकर और दीपक गरीब-बच्चों को गोशाले में पढ़ाते हैं और अंत में जीत जाते हैं क्योंकि परीक्षा में उनके विद्यार्थियों को सब से ऊँचे अंक मिलते हैं। लगता है कि अमिताभ बच्चन ने निश्चय किया है कि अब वह भारीय समाज का अनुभवी परामर्शदाता बन जाए। माननीय अभिनेता का व्यवहार आजकल अक्सर शिष्यों को शिक्षा देनेवाले गुरु जी जैसा है और यह ख़तरनाक बात है क्योंकि इस प्रवृति के कारण उसकी फ़िल्में पहले जैसी अच्छी नहीं हैं। यह बड़ी अफ़सोस की बात है क्योंकि अमिताभ बहुत अच्छा अभिनेता है। ‘आरक्षण’ की चर्चा इसलिए करनी चाहिए क्योंकि फ़िल्म विवादग्रस्त बन गई। अगर लोगों को इस फिल्म में कहानी दिखाने-कहने का तरीका पसंद नहीं आया तो यह आश्चर्य-जनक बात नहीं होती क्योंकि इस क्षेत्र में फ़िल्म बहुत ही खराब है लेकिन दर्शकों की समस्या कुछ और ही थी। दिलचस्प बात यह है कि जिन दर्शकों को इस विषय से सम्बंधित ज़्यादा बहादुर फ़िल्में पहले ही मिल चूकी हैं उन्होंने इस फ़िल्म को देखने के बाद खुद को अपमानित महसूस किया।

निचली जातियों के दर्शकों को सब से खराब यह लगा कि फ़िल्म का नायक सैफ़ अली खान हो गया[10]। ऐसी स्थितियाँ पहले होती थीं और मैंने ‘मदर इंडिया’ का ज़िक्र किया लेकिन इस बार यह कहना मुश्किल है कि दर्शकों को अपमानित क्या लगा? क्या उनको अच्छा लहीं लगा कि अभिनेता मुसलमान है या उसका कुलीन वंश का होना जो कि फ़िल्म के उसके कार्य-भाग से संबंधित नहीं था[11]। सब से दिलचस्प बात यह है कि जिन लोगों को फ़िल्म पसंद नहीं थी वे ऐसे लोग थे जिनकी पक्षधरता का दावा फ़िल्म करती थी। दलितों के विरोध का मतलब यह हो सकता है कि आखिर में उन लोगों को अपनी नीतियों के बारे में पता है और अपनी सुविधा के लिए वे लड़ सकते हैं जो कि अच्छी बात है। फ़िर भी निराशा का कारण थोड़ा सा तकलीफ़देह लगता है अगर हम इस नायक को ध्यान से देखेंगे। दीपक बहुत अच्छा आदमी है लेकिन उसकी एक कमी है और यह ऐसी बात है कि वह बड़ी आसानी से अपना आपा खो सकता है और अकसर निराश होकर अपनी उग्रता का इस्तेमाल करता है। मिथिलेश से टकराना सब के बस की बात नहीं है, दीपक आता है और स्कूल को नष्ट करता है। पहले भी वह अक्सर दुसरों को मार देता है और उसे बोलने का सलीका नहीं है, यह सब नायक का बहुत बड़ा दोष है। दीपक की आक्रामकता का स्पष्टीकरण यह हो सकता है कि पढ़ाई के बावजुद निचली जातियों के लोग हमेशा अपरिष्कृत होंगे और शायद यह अच्छी बात है कि उन लोगों को ऊँचे स्तर का काम नहीं मिलता है क्योंकि वे खतरनाक हैं। दलितों की रक्षा करने के लिए फ़िल्म का ऐसा नायक अजीब लगता है, लेकिन समस्या है कि फ़िल्म के दर्शकों को नायक नहीं, अभिनेता पसंद नहीं था। अगर लोगों को नायक अच्छा नहीं लगता तो उनका क्रोध समझ में आने योग्य होता लेकिन अभिनेता का विरोध करना एक तरह से वही व्यवहार है जैसा दलितों के प्रति वर्षों से हो रहा है।

सब से निराशाजनक यह बात है कि कुछ भारतीय प्रदेशों में फ़िल्म को प्रतिबंधित किया गया और निर्देशक से फ़िल्म के कुछ दृश्यों को काट देने की मांग की गयी जिसका मतलब यह है कि अस्पृश्यता आजकल भी भारत में एक संवेदनशील विषय है। लेकिन अगर अछूतों की रक्षा करने के लिए बनाई हुई फ़िल्म के दृश्ये भी दलितों को अपमानित करते हैं तो दर्शकों का बिगड़ना आश्चर्यजनक बात नहीं है। इस फ़िल्म में प्यार को दिखाने की तरीका भी दिलचस्प है। प्रभाकर की बेटी और दीपक एक दुसरे से कुछ न कुछ प्यार करते हैं लेकिन उनका प्रेम फ़िल्म का मुख्य विषय नहीं है। हम यह बता सकते हैं कि नायक और नायिका की रिश्ता ऐसे उपाय का उदाहरण है जिसके अनुसार फ़िल्म कोई बात इस तरह दिखाता है मानो वे दुनिया के स्वभाविक नियम थे, लेकिन इसमें कुछ ऐसे अंश हैं जो हमको इस तरह से सोचने की इज़ाजत नहीं देती है। सब से पहले दर्शकों को पता नहीं है कि नायक और नायिका के बीच सचमुच प्यार है या सिर्फ़ गहरी दोस्ती, लगता है कि फ़िल्म बनाने वालों को ज़्यादा दिखाने से थोड़ा सा डर था और अगर ऐसा डर इस प्रकार की फ़िल्म में दिखाई देता है तो यह विषय दिखाने से कोई फ़ायदा नहीं है। दीपक और प्रभाकर की बेटी के बीच में अगर प्यार है तो इसे दर्शकों के मन में उतरना चाहिए है नहीं तो इसके होने या न होने से कोई फ़र्क नहीं पड़ता है। व्यभिचार को फ़िल्म में इतना स्थान देना और आरक्षण के बारे में स्पष्ट विचार नहीं दिखाना भी अच्छे सिद्धांत नहीं थे। फ़िल्म का रवैया इतना रक्षात्मक है कि इसे समाजिक समस्याओं में सम्बंधित बताना असंभव है, आप सभी को खुश कर के समस्याओं को संबोधित नहीं कर सकते हैं। निर्देशक को न सिर्फ़ सुधारों के बारे में बताना पर अपनी विचारों को भी दिखाने से डर है। ऐसे ही जगह में वे बहुत गंभीर और आडंबरपूर्ण भाषण डालते हैं जो शुरू में थकाऊ और बाद में हास्यास्पद होते हैं। यह फ़िल्म शायद बॉलीवुड की सबसे बेकार फ़िल्म है और इस कारण सचमुच उसको दिखाने से मना करना चाहिए था।

अंत में एक और विवादास्पद फ़िल्म की ज़िक्र करना उचित लगता है। शेखर कपूर की ‘बैन्डिट क्वीन’ 1994 में बनी हुई है और अछूतों के बारे में नहीं है लेकिन एक और समस्या का अच्छा उदाहरण है। यह फ़िल्म फूलन देवी के जीवन के बारे में माला सेन की किताब पर आधारित है। यह कहानी अच्छी तरह न सिर्फ़ यह दिखाती है कि हर व्यक्ति की ज़िंदगी में समाज की कितनी बड़ी भूमिका होती है लेकिन यह भी कि भारत जैसे देश में जहाँ समाजिक बुनावट इतना उलझा हुआ है कि अपने जीवन को तय करना बहुत मुश्किल है। फ़िल्म की फूलन देवी निचली जाति से है और गरीबी के कारण बचपन में उसकी शादी एक बुढ़े आदमी से हुयी है क्योंकि उसको लड़की के परिवार से बड़े दहेज की ज़रूरत नहीं थी। पति से लुटी हुई लड़की अपने गाँव वापस आती है लेकिन उसकी जीवन पहली जैसी हो नहीं सकती है क्योंकि पति को छोड़ने के बाद बदतहज़ीब हो गई है।

अरुंधती राय[12] एक मजेदार बात कहती है कि शेखर कपूर ने कहा था कि उसने अपने फ़िल्म में सत्य दिखाया फिर भी वह कभी फूलन देवी से मिलने नहीं गया और उस समय फूलन जीवित थी और जब वह अपनी फ़िल्म बनाता था तो उसी समय जेल से आज़ाद भी हुयी थी। निर्देशक अपनी नायिका को नहीं जानता था और उसने फूलन की जीवन की कहानी उससे कभी नहीं सुनी। फूलन की आत्मकथा माला सेन की किताब से कुछ कुछ अलग है और दोनों कपूर की फ़िल्म से बहुत अलग हैं। निर्देशक के लिए बलात्कार, बहुत सारी लूटपाट, गोलियों की आवाज़ सब से महत्त्वपूर्ण लगती हैं। यह सच ज़रूर है कि इन घटनाओं के कारण फूलन के जीवन में बहुत बदलाव आया लेकिन उसके जीवन में आये इन सारे बदलाव के मूल स्रोत इन घटनाओं में नहीं थे। फ़िल्म फूलन के परिवार की समस्याओं के बारे में कुछ नहीं कहता है। उसके जीवन की सारी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं का कारण उसके चाचा का प्रतिशोध था। फ़िल्म देखते हुए कि पश्चिमी दर्शकों के लिए यह समझना मुश्किल है कि फूलन की इन सारी स्थितिओं का मूल उसकी जाति है। जिस गिरोह का नेता निचली जाति में पैदा हुआ विक्रम है और एक तरह से गिरोह की लड़ाइयों का आधार भी है लेकिन लोग सिर्फ़ अलग अलग जातियों के नाम बोलते हैं और इन सब का अर्थ पश्चिमी दर्शकों के लिए स्पष्ट नहीं है। इसी समय दिखाया जाने वाला यौन-शोषण दर्शक का ध्यान मुख्य विषय के विपरीत कर देता है। भारतीय दर्शक के लिए जातियों से संबंधित दुर्व्यवहार को समझना ज़्यादा आसान है लेकिन सिनेमा के इतिहास में पहली बार औरत के प्रति होने वाला क्रूरतम यौन-अपराध दिखाया गया। यह बात गहरी समस्याओं से आगे निकल जाती है और सब से महत्त्वपूर्ण खबर छिप जाती है। भारत में कपूर की फ़िल्म के बारे में लिखने वाले लोग अक्सर इस पर एकाग्र होते हैं कि इस फ़िल्म में पहली बार नंगी औरत दिखाई जाती है। यह सच नहीं है क्योंकि नंगी औरत को हम अंग्रेज़ी वाली गिरीश कर्नाड की ‘उत्सव’ में देख सकते हैं लेकिन निराशाजनक बात यह ज़रूर है कि कपूर की फ़िल्म की लोकप्रियता इसी के कारण हुई है। शायद यह सच है कि ऐसे विवादात्मक दृश्यों को देखने के लिए ही लोग सिनेमा जाते हैं लेकिन कभी कभी याद रखना चाहिए कि अगर ऐसी चीज़ें ज़्यादा होंगी तो दर्शक दुसरे महत्त्वपूर्ण विषय नहीं देख पाएगा और वे विषय नंगे शरीर से शायद ज़्यादा आवश्यक हैं। हिंदी सिनेमा का उदाहरण देकर हमने देखा कि सिनेमा के सौ साल के इतिहास में अछूतों के बारे में ज़्यादा फ़िल्में नहीं हैं। शुरू में ऐसा लगा कि गाँधी जी और उनके तरह के दुसरे सुधारकों की मदद से यह विषय लोकप्रिय होगा लेकिन जल्दी ही ऐसी फ़िल्में मुख्यधारा के विषय से बाहर चली गयीं। क्या भारतीय दर्शक ऐसी फ़िल्मों के लिए तैयार नहीं हैं? मुझे लगता है कि आधुनिक सिनेमा में सब कुछ दिखाया जाता है इसलिए इस विषय से इतना डर ज़्यादा अजीब लगता है। जब हम बॉलीवुड फ़िल्मों की संख्या के बारे में सोचेंगे तो यह देखेंगे कि दलित न सिर्फ़ जाति के वरीयता-क्रम से बाहर हैं बल्कि सिनेमा से भी बाहर हैं। 100 करोड़ से उपर की जनसंख्या वाले देश के सिनेमा में बहुजन-जीवन के स्वाभाविक-चित्रण का अभाव चिंताजनक है और इसका एक बड़ा कारण संभवतः यह है कि बहुजनों का बड़ा हिस्सा अभी भी सिनेमा का उपभोक्ता समुदाय में तब्दील नहीं हुआ है। यह तब तक नहीं बदलेगा जब तक उनकी परिस्थितियों को स्वभाविक तरीके से नहीं दिखाया जाएगा। अगर हम दलित-समस्या पर ही केन्द्रित रहेंगे और सिर्फ़ सुधार के आग्रही के बतौर ही दलितों का चित्रण करेंगे तो वे कभी समाज के स्वाभाविक हिस्से की तरह कभी नहीं दिखेंगे। उपर्युक्त वर्णित सारी फ़िल्मों में से ‘स्वदेश’ और ‘अंकुर’ ने सब से अच्छा काम किया है क्योंकि इन फ़िल्मों में दलितों के प्रति कोई बड़ा पूर्वाग्रह नहीं दिखाया गया है।’अछूत कन्या’ और ‘सुजाता’ में भी दलितों का जैसा चित्रण किया गया है वैसा आज दिखाना असंभव लगता है, इसलिए हमको शायद पुराने जानकारों से फ़िर से ज्ञान लेना पड़ेगा क्योंकि वे अधुनिक निर्देशकों से ज़्यादा बहादुर थे।

[1] http://whatismatt.com/thailand-urban-legends/ (13.01.2012).

[2] U. Woźniakowska, Bollywood, Pragnienie prawdy i tęsknota za    mitem, Kraków 2010, p. 48.

[3] A. Chopra, King of Bollywood, Shah Rukh Khan and the Seductive World of Indian Cinema, New York, Boston 2007, p.     187.

[4] S. Mehta, Pociąg do Bollywood, „National Geographic”, 2, 2005, p. 79.

[5] N. Ghosh, Ashok Kumar. His Life and Times, New Delhi 1995,     p. 67-68.

[6] A. Chowdhury, Dev Anand. Dashing Debonair, New Delhi, 2004,    p. 17-18.

[7] M. Bose, Bollywood. A History, Glouceshire, 2006, p. 205.

[8] R. Dwyer, 100 Bollywood Films, London 2005, p. 12-13.

[9] J. Kieniewicz, Historia Indii, Wrocław 1980, p. 608-610.

[10] http://timesofindia.indiatimes.com

[11] http://www.hindustantimes.com

[12] http://www.sawnet.org/books/writing/roy_bq1.html

Tatiana Szurlej

Tatiana Szurlej

तत्याना षुर्लेई एक Indologist और फिल्म-आलोचक हैं। फिलहाल पोलैंड के शहर क्राकोव सिथत Jagiellonian University में The Courtesan Figure in the Iconography on Indian Popular Cinema:Tradition, Stereotype, Manipulation.   नामक विषय पर पीएचडी के लिए शोधरत हैं।

साभार- हंस फरवरी 2013, सिनेमा के सौ साल 

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फिल्मी दुनिया की सीख: इब्राहीम जलीस

By इब्राहीम जलीस

पाकिस्तान और भारत में जहां गरीबी और मुफ़लिसी, दुनिया के सारे देशों से कई गुना अधिक है, वहां साधारण आदमियों के लिए सब से अधिक सस्ते प्रकार का मनोरंजन, सिनेमा है। दिन-भर के कामकाज और मेहनत मशक्कत के बाद लोग-बाग जब थके हारे अपने घर वापस लौटते हैं तो घर में एक बीमार और कुरूप बीबी और रोनी सूरत के कुछ बच्चे उनकी दिन-भर की कोफ्त और थकान में और अधिक वृद्धि कर देते हैं। इसी वजह से आम लोग यह चाहते हैं कि वे अपनी बीमार और मरियल बीवी से दूर और मधुबाला के अधिक समीप रहें। ठंडे चूल्हे वाले घर के बजाय आरमदायक फर्नीचर वाले एअरकंडीशन्ड सिनेमाघर में अपना समय किल करें। यदि आप दोपहर से लेकर आधी रात तक पाकिस्तान और भारत के सिनेमाघर पर विहंगम दृष्टि डालें, तो आपको यह महसूस होगा कि सिनेमा घर किसी मुर्दा चूहे की लाश है जिस पर असंख्य चीटियां चिपटी हुई हैं।mughal-e-azam-800

    मैंने न केवल फिल्म बनाने वाले आदमियों-फिल्म निर्माताओं को बहुत समीप से देखा है अपितु फिल्म देखनेवालों का भी बड़ा गहरा मनोवैज्ञानिक अध्ययन किया है और मुझे विश्वास है कि कई अवसरों पर फिल्म देखने वाले फिल्म बनाने वालों से अधिक दिलचस्प और आश्चर्यजनक सिद्ध हुए हैं। मैंने एक बार बड़ी गम्भीरता से विचार किया कि हमारे साधारण गरीब नागरिक सिनेमा के इतने ज्यादा शौकिन क्यों है? वे जब अपने छोटे वेतनों और सीमित आय में अपने दैनिक जीवन के खर्चे पूरे नहीं कर सकते, तो सिनेमा क्यों देखते हैं और सिनेमा देखना उनके लिए क्यों इतना आवश्यक है? क्या यह खेदपूर्ण नहीं है? इन प्रश्नों पर बड़ी देर तक विचार करने के पश्चात में इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि दिनभर कठोर परिश्रम करने के बाद आदमी आराम और मनोरंजन चाहता है। हमारे इन दोनों देशों में साधारण आदमियों के लिए न तो फ्री क्लब हैं और न मुफ्त खेलों के स्टेडियम हैं। ले-दे के पब्लिक गार्डन हैं जहां जाते हुए साधारण आदमी इसलिए डरते हैं कि पुलिस के सिपाही उन्हें जेबकतरे या औरतों का पीछा करने वाले बदमाश घोषित करके पकड़ लेते हैं! रही सड़कें, तो उन पर घूमना-फिरना इसलिए भी मुसीबत बन जाता है कि पुलिस उनका धारा 106 के अंतर्गत आवारगर्दी में चालान कर देती है। क्योंकि उनके कपड़े मैले होते हैं और शक्ल सूरत से वे साफ गरीब आदमी मालूम होते हैं और पुलिस की दृष्टि में हर गरीब आदमी आवारा होता है! अब रहा जाता है घर। घर भला क्या मनोरंजन-स्थल बन सकता है? जबकि घर में और काल कोठरी में यूं भी तनिक सा अन्तर होता है। घर में बीवी का बिस्तर एकमात्र मनोरंजक स्थल है किन्तु इसके भावी परिणाम बड़े भयंकर होते हैं अर्थात हर साल एक बच्चा!

फिर दूसरी बात यह है कि साधारण आदमियों की बीवियां अधिकतया सुन्दर नहीं होतीं। वे अधिकतया काली या सांवली, चेचक-ग्रस्त, गन्दी और कुरूप होती हैं। और इन औरतों की खातिर उन्हें हर महीने कम से कम पचास रूपयों से लेकर अधिकाधिक ढाई सौ रूपयो तक कमाने और उनके इलाज व रख-रखाव पर व्यय करने पड़ते हैं। इसके विपरीत हर रोज केवल नौ आने खर्च करके वह ढाई घन्टे तक हसीन से हसीन एक्ट्रेस को खरीद लेते हैं। कामिनी कौशल केवल नौ आने में अपना सारा सौन्दर्य और कान्ति उनकी सेवा में प्रस्तुत कर देती हैं। नर्गिस अपनी सारी प्रेम कहानी उन के हवाले कर देती है। निम्मी अपने संगीत से उन्हें आनन्दित कर देती है। गीतावाली और कुक्कू उन को प्रसन्न करने के लिए ठुमुक ठुमुक कर और थिरक थिरक कर पर्दे पर नाचती हैं। महमूद,  जानीवाकर उन्हें हँसा-हँसा कर अधमुआ कर देते हैं।

         यह सब केवल ढाई घन्टों के लिए होता है मगर होता है केवल नौ आने में!

    लेकिन दिन भर के सख्त कामकाज और कठोर परिश्रम के बाद ढाई घन्टे का यह हुस्न व इश्क, नाच-रंग और हंसी, दिल्लगी से भरपूर मनोरंजन, उनकी थकी हुई तबियतों और उदास मन को नये सिरे से तर-ओ-ताजा कर देता है। और वह अपने बीवी बच्चों के लिए तो नहीं, कम से कम गीताबाली की खातिर जिन्दा रहने के लिए आत्महत्या करने के उस विचार को त्याग देता है। जो सूदखोर पठान या खानदानी सेठ के कर्जे के लगातार तकादों से तंग आकर सुबह उनके मन में उत्पन्न हुआ था। सिनेमा घर से बाहर निकलते हुए वे मन ही मन में पठान और सेठ को दुत्कारते हैं-

    ‘इन साले की ऐसी की तैसी। आत्महत्या करके क्यों हराम मौत मरें। कर्जा कभी न कभी अदा कर ही देंगे। अगर इस जलील कर्जे की वजह से बेमौत मर गये तो कामिनी कौशल और नर्गिस का हुस्न वहां कहां नजर आएगा। निम्मी और गीतावाली के प्रभावशाली एवं कामोत्तेजक शरीर के मोड़-तोड़ वहां कहां हम देख सकेंगे। लता मंगेशकर किसके लिए नगमों का जादू जगाएगी और रीहाना किसके लिए थिरक-थिरककर नाचा करेगी?’

    हमारी जनता को नित्य कि मुसीबतों और दुखों से भरपूर जिन्दगी को सहारा देने में हमारी फिल्में बड़े आश्चर्यजनक कारनामे अंजाम देती है। मुझे याद है कि मेरा दोस्त रशीद खां ‘गमे-जानां और गमे-दौरां’ दोनो से तंग आकर एक दिन अपने जीवन को खत्म कर देने का पक्का इरादा कर चुका था, किन्तु जब मुझे इस का ज्ञान हुआ तो मैं उस का ‘गम गलत’ करने के लिए उसे एक फिल्म दिखाने को ले गया और उस फिल्म ने उस बेचारे की जान बचा ली। वह फिल्म संयोगवश उसकी जिन्दगी के उतार चढ़ाव से बड़ी मिलती जुलती थी। विषेशतयः इस फिल्म में एक गीत था। जिसके बोल थे-

         इन्सान क्या जो ठोकरें नसीब की न सह सके।

    यह गीत सुनते ही मेरा दोस्त आंखों में आंसू छलकाकर बोला-यार। मैंने मरने का इरादा अब बदल दिया है। अब जिन्दा रहूँगा और जिन्दगी की कठोरताओं के साथ अनवरत रूप से लड़ता रहूंगा। इसके बाद से वह नित्य नसीब की ठोकरे खाता चला जा रहा है, परन्तु चेहरे से बड़ा संतुष्ट प्रतीत होता है और हरदम गुनगुनाता रहता है-

         इन्सान क्या जो ठोकरें नसीब की सह न सके।

    इसके इलावा जब वह अपने आसपास अपने जैसे शोषित-पीड़ित लोगों को रोता और सिसकता हुआ देखता है तो उनकी पीठ पर हाथ मारकर गाते हुए उन्हें परामर्श देता है-

         गाये चला जा, गाये चला जा,

         एक दिन तेरा भी जमाना आएगा।

    मैं अपने यहां के सिनेमाघरों को एक ऐसा स्कूल समझता हूं जहां इन्सान को बड़ी से बडी मुसीबतें बर्दाश्त करने के ओर उसके साथ ही साथ किसी औरत का चुनाव करके उससे मुहब्बत करते रहने, मालदार प्रतिद्वन्द्वि को नीचा दिखाने और अन्त में अपनी प्रेमिका से शादी करने के लाभदायक और रामबाण सबक पढ़ाये और सिखाए जाते हैं!

    किसी की यह आपत्ति बिलकुल ठीक है कि हमारे सिनमा घर, हमारी जनता को एक प्रकार के ‘गुनाह बेलज्जत’ की ओर आकृष्ट कर रहे हैं। लेकिन मेरे ख्याल में यह गुनाह बेलज्जत उस गुनाह बालज्जत के मुकाबले में अधिक बेहतर गुनाह है! यदि हमारे सिनेमाघर न होते, मो मुझे विश्वास है कि हमारी गरीब जनता में शराबखोरी, बलात्कार और शीलहरण जैसी गंदी बीमारियां अधिकता से फैल जातीं। इसका स्पष्ट प्रमाण है कि पिछले दिनों कराची के सिनमा मालिकों ने हड़ताल कर दी थी और सारे सिनेमाघर बन्द हो गये थे, तो उस समय कराची के सारे शराबखाने, ताड़ीघरों और रंडियों के कोठों पर तिल धरने के लिए भी जगह नहीं मिलती थी। उन दिनों शराब-फरोश होटलवालों, ताड़ी विक्रेता और रंडियां दिन-रात अल्लाह मियां से दुआएं मांग रही थीं कि खुदा करे कि सिनेमाघर हमेशा के लिए बंद हो जाएं और हमारे मदिरालय और कोठे इसी तरह दिन होली रात दिवाली मनाते रहे। उन्हीं दिनों की एक घटना मैं आपको बता दूं कि उन दिनों शराबखानों में यह कथन बड़े-बड़े बोड़ों पर लिखकर लगवाये गये थे कि-

         सुबह का भूला शाम को घर लौट आए तो उसे भूला नहीं कहते।

और कोठेवालियां इस तरह की गजल और गीत गा रही थीं-

         वह आयें घर में हमारे खुदा की कुदरत है।

         कभी हम उन को, कभी अपने घर को देखते हैं।

         घर आया मोरा परदेसी,

प्यास मिटी मोरी अंखियन की।

इसके बाद अचानक यह हड़ताल खत्म हो गई। सिनेमा खुल गये तो शराबखाने भी खाली हो गये और रंडियों के कोठे भी विरान हो गये। रंडिया बड़ा चीख चीखकर गाती रहीं-

         रात है तारों भरी छिटकी हुई चांदनी

         ऐसे में आ बालमा प्यार की बातें करें…

         हो प्यार की बातें करें।

लेकिन निम्मी, बीनाराय, सबीहा, नूरजहां, शम्मी, गुलशन आरा, यहां तक की बूढ़ी लीला चिटनिस तक ने लोगों का दामन न छोड़ा और उन्हें बुरी राह पर न जाने दिया, पथ-भ्रष्ट न होने दिया। लोग बाग ‘गुनाह बालज्जत‘  से फिर ‘बाल-बेलज्जत’ की ओर लोट आये। इस प्रकार उनका चरित्र और नैतिकता बुराई की ओर जाते जाते फिर अच्छाई की ओर लौट आई। यह सही है कि सिनेमा देखना साधारण आदमी के लिए और विषेशतया गरीब आदमी के लिए एक फिजूलखर्ची ही है। लेकिन यह उस फिजूलखर्ची से लाख गुना बेहतर है, जो शराब बनकर बह जाती है या फिर ‘बाजार ए हुस्न’ से खरीदी हुई बीमारियों का इंजेक्शन बन जाती है। साधारणतया यदि हम फिल्म देखने के परिणामों को देखे तो ज्ञात होता है कि सिनेमा देखने के इस रोग ने हमारी जनता को एक हल्की सी फिजूलखर्ची में फंसाकर दूसरी कई बड़ी महंगी और तबाह कर देनेवाली बुराइयों से बचा लिया है। कराची के सिनमा-मालिकों ने कुछ दिनों के लिए सिनेमाघरों पर ताले लगाकर हमारी आपकी आंखे खोल दीं और बता दिया कि सिनेमाघरों का अस्तित्व जनता के चरित्र को खराब होने से बचाने के लिए कितना आवश्यक है। यूं तो सिनेमाघर भी जनता के लिए एक झक मारने का स्थान है, किन्तु सिनेमाघरों की हड़ताल के समाप्त होते ही जनता ने ‘शाम ढले खिड़की तले सीटी बजाना छोड़ दिया।’ और उस मार्ग पर आ गई जो रीगल, इरोज, नाज, ताजमहल, प्लाजा, रैक्स, पैराडाइज, निशांत, यहां तक कि बाजार ए हुस्न में से गुजरता हुआ सुपर, राक्सी और नूरमहल सिनेमा तक चला जाता है। लेकिन कोई महबूब-नौरोजी रास्ता नहीं भटकता और सारे महबूब-नौरोजी श्यामा को देख-देख कर केवल आँखें सेंकने पर ही संतोष किए लेते हैं।

हमारे सिनेमाघर दूसरा जो लाभदायक सबक इन्सानों को सिखाते हैं, वह है ‘मुहब्बत का सबक’ या प्रेम का पाठ! हमारे सिनेमाघर इन्सानों को कभी नफरत का सबक या घृणा का पाठ नहीं सिखाते। वर्तमान यूग में जबकि एक इंसान को दूसरे इंसान की मुहब्बत की नितांत आवश्यकता है, हमारे सिनेमाघर बहुत बड़े इंसानी कर्तव्य का पालन कर रहे हैं। यह और बात है कि वहाँ मर्द को सिर्फ औरत से और औरत को सिर्फ मर्द से मुहब्बत करने का सबक सिखाया जाता है। लेकिन यह भी तो खालिस इंसानी मुहब्बत ही हुई। इसके अलावा अगर मर्द औरत से नहीं तो क्या गाय-बकरी से, और औरत मर्द से नहीं तो क्या हाथी-घोड़े से मुहब्बत करेगी!Hum Dono Rangeen - Front

हमारे सिनेमाघरों में मुहब्बत का कोई लंबा, पेचीदा और सब्र की आजमाइश करने वाला सबक नहीं सिखाया जाता बल्कि बहुत संक्षिप्त और बहुत आसान अर्थात ‘चट मुहब्बत पट ब्याह!’ परिणामस्वरूप इन सिनेमाघरों से निकलने के बाद एक मुहल्ले के आमने-सामने घरों में रहने वाली लड़की और लड़का जब बाहर की ओर खुलने वाली खिड़कियाँ खोलती या खोलता है तो दोनों एक-दूसरे को दिलीप कुमार और मधुबाला की तरह बस देखते ही फिदा हो जाते हैं, या एक-दूसरे पर आसक्त हो जाते हैं। इसके एक-दो महीने बाद दोनों में शादी हो जाती है। और यदि शादी नहीं भी हो सकती तो वे दोनों रात्रि के अंधकार में गीतबाली और देवानंद की तरह घर से भाग खड़े होते हैं और लाहौर या दिल्ली में पकड़े जाते हैं और फिर फिल्म ‘दिल की बात’ या ‘हम दोनों’ की तरह दोनों का विवाह हो जाता है। हमारे सिनेमाघरों में चट मुहब्बत और पट ब्याह की सीख इसलिए दी जाती है कि कहीं लोग-बाग क्रोध में आकार सिनेमाघर का फर्नीचर ही न तोड़ दें कि क्यों तुमने संतोष कुमार की शादी सबीहा से नहीं कराई। हमारी जनता न्यायप्रिय होती है। और हर मामले में न्याय चाहती है। इसके अलावा शुरू का एक इस्लामी पहलू यह भी निकलता है कि कुँवारे मर्द और कुँवारी औरत को जन्नत में जगह नहीं मिल सकती। इसलिए हमारे सिनेमाघर जो साधारण गरीब आदमियों को उनकी नित्य की ज़िंदगियों के जहन्नुमों से निकालकर ढाई घंटे के लिए सिनेसंसार के स्वर्ग में ले जाते हैं। वे यह चाहते हैं कि उनके सारे दर्शकगण फिल्मी तर्ज की मुहब्बत और शादियाँ करके दुनिया से सीधे जन्नत चले जाएँ! इस सिलसिले की अंतिम बात यह है कि यदि फिल्म के अंत में शादी न हो तो फिर ‘मजा’ नहीं आता और लोग ‘मजे’ के लिए ही फिल्म देखते हैं! अब भला यह भी क्या बात हुई कि दिलीप कुमार छः बजे शाम से सवा आठ बजे रात तक श्यामा से मुहब्बत करता रहा और आठ बज कर बीस मिनट पर उसको छोड़कर हिमालय पर्वत पर जाकर साधु बन गया–? भला क्या मजा आया! मजा तो तब जब ही है कि नूरजहां और संतोष कुमार रिट्ज़ सिनेमा में शादी करें और हम और आप अपने घर जाकर दाल-रोटी का ‘वलीमा’ खाएँ!Aankhen-7

हमारे सिनेमाघर हमारी जनता को सबसे अधिक महत्वपूर्ण जो सबक पढ़ाते हैं वह है वर्ग-घृणा का सबक अर्थात गरीब का गरीब की मदद करना और अंत में दौलतमंद आदमी को नीचा दिखाने का सबक। आपने हर फिल्म में देखा होगा कि एक गरीब किन्तु स्वस्थ और सुंदर नवयुवक होता है, उस पर एक अमीर और दौलतमंद आदमी की नौजवान लड़की फिदा हो जाती है। इस अमीर लड़की का बाप गरीबों पर बड़ा जुल्म ढाता है तो गरीब नवयुवक उस लड़की से, छेड़खानियाँ कर करके खूब बदला चुकता है और अंत में जब अमीर लड़की मालदार बाप की दौलत को ठोकर मार्कर गरीब नवयुवक की तंग, अंधेरी और गंदी ‘चाल’ में बैठी चूल्हा फूंकते-फूंकते रोने-बिसुरने लगती है तो सिनेमाघर में बैठे हुये सारे दर्शक प्रसन्न होकर ज़ोर-ज़ोर से तालियाँ बजाते हैं, सीटियाँ बजाते हैं और चीखने लगते हैं:-

“वह पट्ठे प्रेमनाथ! खूब बदला लिया है। और मजा चखा साली को।”

और जब अमीर लड़की का बाप अपनी भागी हुई लड़की को ढूँढता-ढूँढता गरीब नौजवान की चाल पर पहुंचता है तो उस चाल के गरीब लौंडे उसकी कार पर पथराव आरंभ कर देते हैं और सिनेमा में सीखिए हुई गालियों की बौछार करते हैं। और जब अमीर बाप अपनी नाज-व-नखरों में पली हुई लड़की को गरीब नौजवान का गंदा अंडर-वेयर और लूँगी ढोते देखता है तो उस पर बरस पड़ता है। लेकिन अमीर लड़की साफ-साफ कह देती है—

‘‘पिता जी! मुझे प्रेम हो गया है। (अर्थात प्रेमनाथ हो गया है।) प्रेम आलीशान कोठियों में अनहीन रहता। प्रेम गरीबों की कुटियाओं में रहता है।”

इस डायलाग पर सिनेमा देखने वाले ‘माजे-गामे’ चीख पड़ते हैं-

“वाह पट्ठी जीवन्द रह।”

इसके बाद जब उसका अमीर बाप सिर झुकाए वापिस जाने लगता है तो सिनेमा के दर्शक लोग घृणा से पुकारते हैं-

“धत्त- हात तेरी पापड़ वाले!”

“नस जा ऐथूँ कमीनियाँ।”

“ढर्रर्र….!”

दरवाजे से बाहर निकलते हुये उसकी भिड़ंत हीरो- गरीब नौजवान से होती है तो अमीर आदमी उसे दस हजार रूपये के नोट देता है। दस हजार रुपया ले ले और लड़की वापिस दे दे! किन्तु स्वाभिमानी गरीब नौजवान (जो केवल दस हजार के बदले में फिल्म के हीरो की भांति काम कर रहा है।) दस हजार रूपये अमीर आदमी के मुँह पर दे मारता है। इस पर गरीब दर्शकों के हर्ष का ठिकाना नहीं रहता। बस उनका कुर्सियाँ तोड़ना शेष रह जाता है।

अब इस सिलसिले में एक रहस्य की बात यह है कि अमीरों के विरुद्ध गरीबों के मन में फिल्मों द्वारा घृणा उत्पन्न करना भी स्वयं अमीरों और सेठों का एक लाभदायक व्यवसाय है। फिल्में केवल अमीर लोग बनाते हैं और एक-एक फिल्म पर लाखों रूपये खर्च करते हैं। ये फिल्मों में अमीर और गरीब की टक्कर और अमीर को गालियाँ और गरीब को विजय इसलिए दिलवाते हैं कि ऐसा करने से लोग अधिक-से-अधिक संख्या में फिल्म देखते हैं और इन्हें खूब मुनाफा होता है। अब इस मुनाफे की खातिर यदि अमीरों को नित्य ढाई घंटे के तीन शो के हिसाब से साढ़े साथ घंटे टक्क गालियाँ पड़ती रहें तो क्या हर्ज है! दौलतमंद आदमी यूँ भी दौलत के मामले में बड़े बेगैरत होते हैं!!

यह आंतरिक रहस्य चाहे कुछ भी क्यों न हो, यह तो एक तथ्य और वास्तविकता है कि हमारे सिनेमाघर शनैः शनैः हमारी जनता में वर्ग-चेतना उत्पन्न करते जा रहे हैं और गरीब इन्सानों को उत्साहित कर रहे हैं कि घबराने की कोई बात नहीं है। एक दिन तुम्हारा भी जमाना आएगा इसलिए गाये चला जा, गाये चला जा! टैक्सी ड्राइवर है तो क्या हुआ, सेठ जी की लड़की को भगा ले आ और अपना मैला-कुचैला लंगोट उससे धुलवा। उससे अपना वर्षों का ठंडा चूल्हा गर्माया करो और फिर खटिया पर लेट कर बड़े आराम से अपनी दौलतमंद महबूबा से कहो-

“मान मेरा एहसान अरी नादान कि मैंने तुझसे किया है प्यार!”

और सिनेमाघर को धन्यवाद दो जिसने तुम्हें जीवन का इतना महत्वपूर्ण सबक सिखाया है, पाठ पढ़ाया है।

मुहब्बत ज़िंदाबाद!

सिनेमा ज़िंदाबाद!

सेठ की लड़की ज़िंदाबाद!

हमारा इश्क़ ज़िंदाबाद!

हम दोनों—ज़िंदाबाद

हमारी  गरीबी….ज़िंदा…नहीं यह गलत हो गया!

Ibrahim Jaleesइब्राहीम जलीस उर्दू के बड़े तरक्कीपसंद अफसानानिगार और व्यंग्यकार रहे हैं। उर्दू में इनका स्थान वही है जो हिन्दी में हरिशंकर परसाई जी का है। इब्राहीम जलीस मूलतः हैदराबाद के रहने वाले थे। लेकिन आज़ादी-विभाजन के समय पाकिस्तान चले गए। पाकिस्तान में उनका ज़्यादातर समय लाहौर और कराची में बीता। वहाँ भी वे तरक्कीपसंद जमात के ही हिस्सेदार रहे । उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं- उल्टी कब्र, नेकी कर थाने में जा, ऊपर शेरवानी अंदर परेशानी, हँसे और फंसे, शगुफ्ता शगुफ्ता और काला चोर आदि। 

अनुवादक- अख्तर वागेश्वरी

नई कहानियाँ , मई 1967 से  साभार 

हिन्दी सिनेमा की भाषा- एक के भीतर अनेक: चन्दन श्रीवास्तव

By चन्दन श्रीवास्तव 

Hans-Cover-February-2013

हंस फरवरी-2013- हिन्दी सिनेमा के सौ साल

मौका हिन्दी-दिवस का था, चूंकि हिन्दी-दिवस पर दस्तूर ‘हिन्दी-हित-चिन्ता’ का है सो एक मशहूर दैनिक(हिन्दुस्तान) ने अपने वेबपेज पर‘हिन्दी फिल्में, कितनी हिन्दी’ शीर्षक से एक पोस्ट लगायी। जैसा कि शीर्षक से ही जाहिर है, अख़बार ने इस पोस्ट में बड़े संताप के स्वर में जानना चाहा कि हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री में ‘हिन्दी से भरपूर नाम-दाम कमाने वाले अपने कामकाज और जीवन में हिन्दी को कितना सम्मान देते हैं, कितना अपनाते हैं ? ”

अख़बार की इस ‘हिन्दी-चिन्ता’ में जावेद अख्तर यह कहते हुए शामिल हुए कि “ इधर हमारी फिल्म इंडस्ट्री में अंग्रेजी का बोलबाला है।..ज्यादातर हिंदी फिल्मों में स्क्रिप्ट की जो हालत हो रही है, उससे मैं बहुत दुखी हूं। ” जावेद साहब ने अपने दुःख के दो कारण गिनवाये। एक तो यह कि “आज अंग्रेजी के लोग हिंदी फिल्मों के पटकथा लेखन में अपना योगदान दे रहे है ” जबकि  हिंदी या उर्दू का उन्हें “समुचित ज्ञान” नहीं है। दूसरे, जावेद साहब के हिसाब से हिन्दी फिल्मों की स्क्रिप्ट की दुर्दशा के लिए आज के अभिनेता “ज्यादा जिम्मेदार” हैं क्योंकि “उनकी(सिने-अभिनेता की) सबसे बड़ी परेशानी यह है कि वो हिंदी या उर्दू साहित्य के जरा भी नजदीक नहीं है। उर्दू की बात जाने दें, हिंदी पढ़ने में भी उन्हें खासी दिक्कत होती है। इसका सीधा असर अच्छी स्क्रिप्ट पर पड़ता है।” इन दो वजहों से जावेद अख्तर को लगता है कि बॉलीवुड में “हिंदी फिल्में सही हिंदी में कम ही लिखी जाती हैं। सरल हिंदी में लिखी पटकथा में भी बीच-बीच में अंग्रजी शब्दों का उपयोग जम कर किया जाता है। ऐसी स्क्रिप्ट यहां कम ही देखने को मिलती है, जिसमें अंग्रेजी शब्दों के मोह से बचते हुए शुद्ध हिंदी या उर्दू के शब्दों का उपयोग किया जाता हो।”

जैसे आज कुछ लोगों को ‘हिन्दी सिनेमा’ की ‘हिन्दी’ पर अंग्रेजी का बोलबाला नजर आता है वैसे ही बीते वक्त में कुछ लोगों को हिन्दी सिनेमा के साथ ‘उर्दू’ का जिक्र गवारा ना था। पोस्ट में कही गई जावेद अख्तर की बातों को पढ़कर सिने-इतिहास के गंभीर अध्येता रविकांत(सीएसडीएस स्थित सराय वाले) का वह आलेख याद आया जिसे उन्होंने कभी शिमला स्थित भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान की एक संगोष्ठी में पढ़ा था। “सिनेमा, भाषा, रेडियो: एक त्रिकोणीय इतिहास” शीर्षक इस लेख में छोटा-सा जिक्र आता है कि हिन्दी फिल्मों को बेशुमार अमर गीत देने वाले साहिर लुधियानवी सन् 1960 के दशक में एक दफे बिहार गए थे और किसी मुशायरे में कह दिया था कि हिन्दी फिल्मों की भाषा 97 फीसदी उर्दू है। फिल्मों से जुड़ी पत्रकारिता के मामले में जिस “माधुरी’ ( इसका शुरुआती नामी सुचित्रा था, माधुरी नाम बाद में पडा) पत्रिका को मील का पत्थर माना जाएगा वही साहिर लुधियानवी के पीछे पड़ गई।

पत्रिका के  ‘चले पवन की चाल’ नाम के पन्ने पर एक चिट्ठी छपी। इसके लिखने वाले ने अपना नाम लिखा था ‘फिल्मेश्वर’ और चिट्ठी का शीर्षक था- ‘ हिन्दी और उर्दू के नाम पर नफरत के शोले भड़काने वाले अवसरवादी साहिर के नाम एक खुला पत्र ।’ चिट्ठी दिलचस्प है क्योंकि उसके मुताबिक साहिर फारसी लिपि में लिखे होने के कारण जिसे उर्दू समझ रहे हैं वह दरअसल हिन्दी ही है। इस चिट्ठी का एक अंश है- “यह जानकर वाकई बड़ा आश्चर्य हुआ कि आप समझते हैं कि आपने एक फिल्म में हिन्दी गीत लिखे हैं। लेकिन आपने हिन्दी पर यह अहसान पहली ही बार नहीं किया है। आप इससे पहले भी हिन्दी में ही लिखते रहे हैं। आपने फिल्मों में आने से पहले भी जो कुछ लिखा था, वह हमारी निगाह में तो हिन्दी ही थी..यह जरुर है कि आपने जब वह सब कलमबंद किया था जो फारसी लिपि इस्तेमाल की थी। यूं देखा जाय तो अपनी चितरलेखा के गीत भी आपने अपनी तरफ से चाहे हिन्दी में लिखे हों लेकिन कागज पर उतारा उन्हें फारसी लिपि में ही था।इतनी छोटी सी बात का मतलब आप जैसा बड़ा और दानिशमंद शायर शायद फौरन समझ गया होगा- दो लिपियों से भाषा दो नहीं हो जाती और एक ही लिपि में कई भाषाएं भी लिखी जा सकती हैं। ” वैसे साहिर लुधियानवी को फिल्मेश्वर का यह तर्क गले उतरा होगा ऐसा नहीं लगता क्योंकि भाषा के मामले में साहिर का पक्ष बड़ा साफ है। आजादी के बाद के वक्त में जिस वक्त सरकार को गालिब के मजार के जीर्णोद्धार की फिक्र हुई थी उन दिनों साहिर लुधियानवी ने लिखा था-

जिन शहरों में गूंजी थी गालिब की नवा बरसों- उन शहरों में अब उर्दू बे-नामो निशां ठहरी

आजादि-ए-कामिल का ऐलान हुआ जिस दिन- मातूब जबां ठहरी, गद्दार जबां ठहरी।

जिस अहद-ए-सियासत ने ये जिन्दा जबां कुचली- उस अहद-ए-सियासत को मरहूमों का गम क्यों है

गालिब जिसे कहते हैं उर्दू ही का शायर था- उर्दू पे सितम ढाकर गालिब पर करम क्यों है।

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साहिर लुधियानवी

और साहिर ही क्यों, हिन्दी-सिनेमा को केंद्र में रखकर हुए अंग्रेजी-लेखन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यही मानकर चलता है कि हिन्दी-सिनेमा की भाषा मुख्य रुप से उर्दू रही है। इस सोच की एक मिसाल मुकुल केशवन का बहुउद्धृत आलेख- उर्दू, अवध एंड तवायफ- द इस्लामिकेट रुटस् ऑव हिन्दी सिनेमा- है। यह आलेख यही साबित करने के लिए लिखा गया है कि- “ हिन्दी-सिनेमा का महल बहुमंजिला तो है लेकिन इसका स्थापत्य इस्लामी रुपाकारों से प्रेरित है। इन इस्लामी रुपकारों का सबसे प्रकट उदाहरण है उर्दू। विडंबनापूर्ण लेकिन सच बात यह है कि आजाद भारत में उर्दू का आखिरी मजबूत मकाम हिन्दी-सिनेमा ही साबित हुआ, भाषाई हठधर्मिता के सागर में उर्दू का आखिरी स्वर्ग। और जो ऐसा हुआ तो यह सही ही है क्योंकि हिन्दी सिनेमा की काया उर्दू की जबांदानी और लोकाचारी संस्कारों से बनी है। ” इसी बात का एक विस्तार नसरीन मुन्नी कबीर की किताब ‘टॉकिंग फिल्मस्: कॉन्वर्सेशनस् ऑन हिन्दी सिनेमा विद् जावेद अख्तर’  में मिलता है। इसमें जावेद अख्तर एक जगह कहते हैं- “भारत की बोलती फिल्मों ने अपना बुनियादी ढांचा उर्दू फारसी थियेटर से हासिल किया। इसलिए बोलती फिल्मों की शुरुआत उर्दू से हुई। यहां तक कि कलकत्ता का नया थियेटर भी उर्दू के लेखकों का इस्तेमाल करता था। बात यह है कि उत्तर भारत के शहरी इलाके में उर्दू देश के बंटवारे से पहले बोल-चाल की जबान थी और इसे ज्यादातर लोग समझते थे और यह पहले की तरह आज भी बड़ी नफीस जबान है जिसके भीतर हर तरह के जज्बात और ड्रामे की तर्जुमानी की सलाहियत है।”

ऐसा कहते हुए मुकुल केशवन या फिर जावेद अख्तर कुछ बातों की अनदेखी करते हैं। एक तो यही कि हिन्दी-सिनेमा के भीतर एक लंबी कड़ी हिन्दू-धर्मकथाओं पर आधारित फिल्मों की रही है और उनकी संवाद-भाषा आजादी से पहले और बाद में भी संस्कृत की तरफ झुकी रही। इसके लिए ज्यादा उदाहरण ना देते हुए जिस दशक में फिल्म शोले(1975) बनी थी उसी दशक की दो फिल्मों हरिदर्शन(1972) और जय़ संतोषी मां(1975) को याद कर लेना काफी होगा। फिल्म हरिदर्शन में लक्ष्मी विष्णु के वाराह रुप धारण करने पर अचरज में पड़े नारद से कहती हैं- “  प्रभु तो जैसा कारण हो वैसा ही रुप लेकर पापियों के पास जाते हैं। आप उनके प्रिय प्रतिनिधि होकर भी ये नहीं जान पाये।’’ और ‘जय संतोषी मां’ फिल्म की शुरुआती पंक्ति ही है- “संतोषी मां की महिमा अपार है। हर भक्त ने उनकी महिमा का गुणगान अपने अपने ढंग से किया है।इस चित्र की कथा भी कुछ धार्मिक पुस्तकों और लोककथाओं के आधार पर है। आशा है, आप इसे सच्ची भावना से स्वीकार करेंगे।”

दूसरी बात पारसी थियेटर से हिन्दी फिल्मों के रिश्ते से जुड़ी है। हरीश त्रिवेदी ने अपने आलेख- ऑल काईंड ऑव हिन्दी: द इवॉल्विंग लैंग्वेज ऑव हिन्दी सिनेमा- में ध्यान दिलाया है कि पारसी थियेटर के लिए नाटक लिखने वालों में सिर्फ आगा हश्र कश्मीरी का ही नाम नहीं आता, नारायण प्रसाद ‘बेताब’ और पंडित राधेश्याम कथावाचक का भी आता है। नारायण प्रसाद ‘बेताब’ ने अपने नाटकों के लिए जो भाषा नीति बनायी वह उन्हीं के शब्दों में कुछ ऐसी थी-“ना ठेठ हिन्दी ना खालिस उर्दू,जुबान गोया मिली जुली हो- अलग रहे दूध से ना मिश्री, डली-डली दूध में घुली हो । ” बहरहाल, नारायण प्रसाद बेताब की भाषा का एक छोर फारसीनिष्ठ था तो दूसरा छोर संस्कृतिनिष्ठ। वे ‘रुस्तम व सोहराब’के लिए  यह लिख सकते थे- “अगर तुम मादरे-ईरान के फरजंद होते तो मैं कनीज बनकर तुम्हारी खिदमत में अपनी जिंदगी..” तो भीष्म-प्रतिज्ञा के लिए ऐसी भाषा भी गढ़ सकते थे- “जिस स्त्री के पास रुप है हृदय नहीं है, सेवा है प्रेम नहीं है, पुत्र की लालसा है किन्तु पुत्र की ममता नहीं है- उसके पास दया !”  और तीसरी बात थोड़ी महीन है, जिसकी तरफ इतिहासकार विनय लाल ने अपने लेख हिन्दुईज्म एंड बॉलीवुड- अ फ्यू नोटस् में ध्यान दिलाया है। विनय लाल की मानें तो हिन्दी सिनेमा का एक बड़ा हिस्सा हिन्दू-मानस और संस्कृति का झरोखा है। ‘अमर अकबर एंथोनी’, ‘कुली’ और ‘मर्द’ सरीखी हिट फिल्मों के निर्देशक मनमोहन देसाई को विनयलाल ने यह कहते हुए उद्धृत किया है कि मेरी फिल्में महाभारत की कथाओं पर आधारित हैं। विनयलाल की मान्यता है कि हिन्दी फिल्में हिन्दू-धर्म के मिथकों का पुनराख्यान हैं। वे इस कोटि में श्याम बेनेगल की फिल्म कलयुग(1980) को भी ऱखते हैं (क्योंकि इसमें महाभारत की ही कथा के समान दो व्यवसायी घरानों की दुश्मनी को दिखाया गया है) तो  “हम पाँच” (1980) को भी( क्योंकि इसमें पांडव सरीखे पाँच भाइयों की टक्कर दुर्योधन सरीखे जमींदार वीरप्रताप और शकुनि सरीखे उसके लाला मामा की कुटिल चालों से होती है)। और हिन्दी-फिल्मों के कथा-काया के भीतर हिन्दू मिथकों की आत्मा खोजने वाले अकेले विनय लाल ही नहीं हैं, उनसे मिलती-जुलती बात संस्कृति-मनोविज्ञानी सुधीर कक्कड़ भी कहते हैं। सुधीर कक्कड़ की मानों तो हिन्दी फिल्मों के नायकों का छलिया और खिलंदड़ रुप( जैसे फिल्म राजा बाबू में गोविन्दा) कृष्ण के चरित्र पर गढ़ा गया वैसे ही धीरोदात्त रुप( जैसे फिल्म जंजीर में अमिताभ) राम के चरित्र पर।

बात आज के जावेद अख्तर की हो या कल के साहिर लुधियानवी अथवा किसी छद्मनामधारी ‘फिल्मेश्वर’ की – सभी मानकर चलते हैं कि नाम अगर ‘हिन्दी सिनेमा’ है तो जो कथा दर्शक को दिखाई जा रही है उसमें बोली जाने वाली भाषा का रुप जरुरी तौर पर कोई एक ही होगा।‘फिल्मेश्वर’ की नजर में यह भाषा हिन्दी है, साहिर लुधियानवी की नजर में उर्दू और जावेद अख्तर के हिसाब से हिन्दी/उर्दू। हिन्दी फिल्मों के संवाद-पक्ष बारे में प्रगतिशील इदारे में ज्यादातर बातें इसी मान्यता की छांव में होती हैं। बस अन्तर इतना रहता है कि नफासत की नोंक चूंकि वहां ज्यादा ही बारीक होती है इसलिए हिन्दी फिल्मों की भाषा को ‘हिन्दुस्तानी’ कह दिया जाता है, यानि एक ऐसी भाषा जो चले हिन्दी-व्याकरण की पटरियों पर और शब्द ना तो संस्कृत के लादे और ना ही फारसी के। इस भाषा को इंगित करने के लिए कभी इसे ‘आम-फहम’ कहा जाता है तो कभी ‘बोल-चाल’ की भाषा और जोर यह दिखाने पर रहता है कि यह भाषा तद्भव-प्रेमी है- उन्हीं शब्दों को अपने भीतर समेटती है जिसके नक्काशीदार कोने जनता की जुबान पर घिस गए हों, चाहे ये शब्द पूरबिया गांवों के हों, संस्कृत और फारसी के या फिर अंग्रेजी के।

‘हिन्दी फिल्मों के संवाद हिन्दुस्तानी में लिखे जाते हैं या उन्हें हिन्दुस्तानी में होना चाहिए’- यह बात जैसे ही कोई कहता है, बात भाषा से उठकर भारतीय राष्ट्रवाद के मनचीते स्वरुप पर चली आती है। भारत के सेकुलरवाद की कुश्ती ज्यादातर धर्मगत(हिन्दू-मुसलमान) पहचानों से रही और इसी के अनुकूल ‘देश के बंटवारे’ की लहुलुहान चादर ओढ़कर आजादी के शुरुआती दशकों में देश के भावी नागरिक से चाहा यह गया कि- तू हिन्दू बनेगा ना मुसलमान बनेगा, इंसान की औलाद है, इंसान बनेगा-  और इस मुकाम तक पहुंचने के पहले के सोपान के तौर पर सोचा गया कि- हिन्दू-मुसलिम-सिक्ख ईसाई- आपस में हैं भाई-भाई। पीछे से चला आ रहा भाषाई इतिहास-बोध कहता था कि हिन्दी संस्कृत से निकली है, वेद संस्कृत में हैं और वेद चूंकि हिन्दुओं का आदिग्रंथ है इसलिए हिन्दी हिन्दुओं की भाषा है।इस सोच का एक और संस्करण था (और यह ज्यादातर मौन रहा क्योंकि पाकिस्तान बन चुका था और उस राष्ट्र की भाषा उर्दू घोषित हो चुकी थी) जो मन ही मन मानता था कि उर्दू का रिश्ता अरबी से, अरबी का रिश्ता कुरान से और कुरान का अनिवार्य रिश्ता मुसलमान से है। हिन्दू-हिन्दी बनाम मुसलिम-उर्दू के इस तनाव को कैसे साधा जाय- भारतीय सेकुलरवाद की बड़ी चिंता तो यह थी। विकल्प के तौर पर तान अंग्रेजी पर जाकर टूटी क्योंकि पश्चिमी काट की ‘आधुनिकता’ ने पहले से स्थापित कर रखा था कि सारे पौराणिक पहचानों से परे वह जो एक ‘इंसान’ होता है- वह सिर्फ तर्कबुद्धि की भाषा बोलता-लिखता है और तर्कबुद्धि की भाषा अगर कोई है तो अंग्रेजी। नए आजाद देश में यह बात धमाके से कही नहीं जा सकती थी क्योंकि मान्यता यह रही कि राष्ट्र बनना है तो राष्ट्रभाषा होनी ही चाहिए। विकल्प के तौर पर एक प्रत्यय गढ़ा गया ‘साझी संस्कृति’ का और इस साझी संस्कृति को बाकी बातों के अलावा भाषा में भी खोजा गया- एक ऐसी भाषा जिसमें अपनी-अपनी ‘रुढियां’ यानि संस्कृत और अरबी-फारसी खोकर, हिन्दू-मुसलमान दोनों अपनी अभिव्यक्तियों के लिए एक नया घर बना सकें। यह खोज आखिर को जिस भाषा पर खत्म हुई उसे 1930 के दशक में हिन्दुस्तानी कहा जा चुका था और महात्मा गांधी की मेहरबानी से उसकी चाल-ढाल भी तय की जा चुकी थी। आजादी के बाद के शुरुआती दशक में चूंकि बड़ी तेजी से संस्कृतनिष्ठ सरकारी हिन्दी का प्रचलन हुआ, इसलिए हिन्दुस्तानी के कंधे पर एक तमगा और जुड़ा कि यह  हिन्दू-वर्चस्व वाली प्रतिगामी भाषा नहीं है- बल्कि सत्ता के विरोध की भाषा है। सेकुलरवादी सोच की इसी भाषाई प्रसंग के भीतर हिन्दी फिल्मों की भाषा को प्रगतिशील इदारों में ‘हिन्दुस्तानी’ कहकर याद किया गया।

हिन्दी फिल्मों में चलने वाली इस हिन्दुस्तानी भाषा के उदाहरण बहुतेरे हैं, मिसाल के लिए याद करें फिल्म दीवार का वह यादगार संवाद जिसमें शिव की मूर्ति के आगे अमिताभ बच्चन को यह कहते हुए दिखाया गया है- “आज, खुश तो बहुत होगे तुम। देखो, जो आज तक तुम्हारें मंदिर की सीढियां नहीं चड़ा। जिसने आज तक तुम्हारे सामने सर नहीं झुकाया। जिसने आज तक कभी तुम्हारे सामने हाथ नहीं जोड़े। वो आज तुम्हारे सामने हाथ फ़ैलाए खड़ा है। बहुत खुश होगे तुम। बहुत खुश होगे कि आज मैं हार गया। लेकिन तुम जानते हो कि जिस वक्त मैं यहाँ खड़ा हूँ, वो औरत जिस के माथे से तुम्हारे चौखट का पत्थर घिस गया, वो औरत जिस पर ज़ुल्म बढ़े तो उसकी पूजा बढ़ी, वो औरत जो ज़िंदगी भर जलती रही लेकिन तुम्हारे मंदिर में दीप जलाती रही, वो औरत। वो औरत आज ज़िंदगी और मौत के सरहद पर खड़ी है। और.. ये तुम्हारी हार है…।” इस संवाद में जुल्म और जिंदगी सरीखे उर्दू-परंपरा के शब्द आते हैं तो मंदिर और दीप सरीखे हिन्दी-परंपरा के शब्द भी। आगे इसी संवाद में जुर्म और सज़ा जैसे शब्द आते हैं तो सुहागन और विधवा जैसे शब्द भी।

हिन्दी फिल्मों के संवादों की भाषा को हिन्दी-उर्दू-हिन्दुस्तानी अथवा अंग्रेजी के झगड़े से दूर ले जाकर सोचें तो नजर आएगा कि यह एक बहुलस्वरी दुनिया है, नजर आएगा कि ‘हिन्दी फिल्म’ शब्द एक व्युत्तपत्तिमूलक शब्द(जेनरिक टर्म) भर है- एकभाषा के आवरण में बहुभाषा को समेटने वाला शब्द।। हम यह देख पायेंगे कि हिन्दी-सिनेमा के संवाद ‘साझी संस्कृति’ के तकाजे से ही नहीं गढ़े जाते बल्कि कथा में आये पात्र को विश्वसनीय बनाने के लिए भी गढ़े जाते हैं और कथा के पात्रों को गढ़ा जाता है उस ‘औसत दर्शक’ की कल्पना से जो कालक्रम में हमेशा बदलते रहा है। इस कोने से देखें तो पता चले कि फिल्म मुगले-आजम में दिलीप कुमार का अगर उर्दूं-छौंक वाला यह संवाद है कि-‘मुझ पे जुल्म ढाते हुए आपको जरा ये सोचना चाहिए कि मैं आपके जिगर का टुक़ड़ा हूं कोई गैर या कोई गुलाम नहीं’ तो उसके सामने खड़ी दुर्गा खोटे का संस्कृत की कुरुणा से सना यह वाक्य भी – ‘नहीं सलीम नहीं..तुम हमारी बरसों की प्रार्थनाओं का फल हो।’ याद आएगा कि मुगले-आजम की बहुलस्वरी दुनिया में सिर्फ यही नहीं गाया गया कि- ‘जब रात है ऐसी मतवाली तो सुबह का आलम क्या होगा’ बल्कि उसमें किसी का यह स्वर भी शामिल था- ‘मोहे पनघट पर नंदलाल छेड़ गयो रे..। ’ बहुभाषिकता के कोने से देख सकें तो तुलना कर पायेंगे मुगले-आजम में बोले हुए दिलीप कुमार के संवाद( ‘तकदीरें बदल जाती हैं, जमाना बदल जाता है..मगर इस बदलती दुनिया में मोहब्बत जिस इनसान का दामन थाम लेती है वो इनसान नहीं बदलता’) की फिल्म ‘गंगा-जमुना’ में उन्हीं पर फिल्माये हुए गीत से( ‘रुप को मन मा बसई ब त बुरा का होईहैं, कोहू सो प्रीत लगईब त बुरा का होईहैं’)। याद आएगा कि अमिताभ ने अपनी फिल्मों अगर यह कहा है कि ‘मर्द को दर्द नहीं होता’  तो ‘माई नेम ईज एंथोनी गॉनसाल्विस’ भी। हम देख पायेंगे कि हिन्दी फिल्मों में अगर ‘फिरऔनों के गरुर’ को उनके ही महल में अपने पाँव के खून से कुचलती हुई एक ‘पाकीजा’ औरत है तो वह ‘टोपोरी’ भी जो कहता है- ‘आती क्या खंडाला’।

हमें बीते वक्त का अफसोस चाहे जितना हो लेकिन इस अफसोस से हिंदी-सिनेमा की भाषा(ओं) को नहीं पढ़ा जा सकता क्योंकि इस विधा को हमेशा अपने औसत दर्शक का अनुमान ठीक-ठीक लगाना पड़ता है।1990 के दशक के आते-आते हिन्दी-सिनेमा ने ठीक पहचाना कि उसका औसत दर्शक बदल चुका है। मध्यवर्ग का आकार ही नहीं बढ़ा साथ-साथ उसके स्वाद बढ़े हैं और वह अपने स्वाद को महत्वाकांक्षा की भाषा हिंग्लिश में पहचानता है, उस हिंग्लिश को जिसे अख़बारों के समाचार से लेकर टीवी पर चलने वाले विज्ञापनों तक ने गढ़ा है। ऐसे में यह अफसोस क्यों कि ‘हिन्दी फिल्मों पर अंग्रेजी का बोलबाला’ है ?

हिन्दी और उर्दू के नाम पर नफरत के शोले भड़काने वाले अवसरवादी साहिर के नाम एक खुला पत्र

शायरे इन्कलाब,

साहिर लुधियानवी

सबसे पहले आपको इस बात का धन्यवाद कि आपको अपने राष्ट्र की भाषा हिन्दी से प्यार है और इस बात का भी आप हिन्दी साहित्य से प्यार करते हैं। आपने बड़े गर्व के साथ यह फरमाया कि जरुरत पड़ने पर आप हिन्दी में गीत भी लिखते हैं और अपने चित्रलेखा(वह चित्रलेखा जिसे लोगों ने चितरलेखा समझा) के गीतों का उदाहरण भी दिया। यह जानकर वाकई बड़ा आश्चर्य हुआ कि आप समझते हैं कि आपने एक फिल्म में हिन्दी गीत लिखे हैं। लेकिन आपने हिन्दी पर यह अहसान पहली ही बार नहीं किया है। आप इससे पहले भी हिन्दी में ही लिखते रहे हैं। आपने फिल्मों में आने से पहले भी जो कुछ लिखा था, वह हमारी निगाह में तो हिन्दी ही थी..यह जरुर है कि आपने जब वह सब कलमबंद किया था जो फारसी लिपि इस्तेमाल की थी। यूं देखा जाय तो अपनी चितरलेखा के गीत भी आपने अपनी तरफ से चाहे हिन्दी में लिखे हों लेकिन कागज पर उतारा उन्हें फारसी लिपि में ही था।इतनी छोटी सी बात का मतलब आप जैसा बड़ा और दानिशमंद शायर शायद फौरन समझ गया होगा- दो लिपियों से भाषा दो नहीं हो जाती और एक ही लिपि में कई भाषाएं भी लिखी जा सकती हैं। हिन्दुस्तान के जिस प्रदेश में आपका जन्म हुआ उस पंजाब के वारिस ने अपनी पंजाबी भाषा की हीर फारसी लिपि में  लिखी थी, यह भी आप जानते ही होंगे क्योंकि आप जैसे धरती के शायर अपनी संस्कृति की इतनी बात तो जानते ही हैं। जिसे आप आज उर्दू कहते हैं उसके महान कवि गालिब अपने आपको हिन्दी में लिखने वाला कहते थे, यह भी आप उस मुशायरे में  भूले नहीं होंगे जहां आपने हिन्दी साम्राज्यवाद की भयावनी तस्वीर खींची थी

आपने जनता को इस दिन यह भी बताया था कि हिन्दी नाम से जानी-जाने वाली 97 फीसदी फिल्में उर्दू की होती हैं। तो भाईजान, झगड़ा कहां रहा? जिसे आप उर्दू कहते हैं उसे 99.9 फीसदी लोग हिन्दी कहते हैं। तो दोनों एक ही चीज रही न? उन फिल्मों की नामावली अंग्रेजी में होती है तो आपको अंग्रेजी का साम्राज्यवाद नजर नहीं आता? आपको- यानी उस महान आदमी को जिसने साम्राज्यवाद के प्रति विद्रोह का परचम उठा रखा था। नागरी लिपि में आते ही वह साम्राज्यवाद हो गया। उस नागरी लिपि में जिसमें आपके कविता-संग्रह उर्दू लिपि से भी ज्यादा बिके हैं।जब आपके संग्रह नागरी लिपि में छपे थे तो क्या उनका हिन्दी में अनुवाद किया गया था या हू-ब-हू आपके लिखे जैसे ही छापे गए थे और उन्हें हिन्दी के पाठकों ने पूरी तरह समझकर भरपूर रस नहीं लिया था? उनका हिन्दी में प्रकाशन हिन्दी का साम्राज्यवाद नहीं था?

आखिर बात क्या है? हिन्दी और उर्दू की? या हिन्दी और उर्दू के नाम पर संप्रदाय की? इस धर्मनिरपेक्ष राज्य में आजादी के बीस सालों ने इतना तो करिश्मा किया ही है कि हमारे अंदर ही अंदर जो संकुचित भावनाओं की आग फूट रही है, हमने उसे उसके सही नाम से पुकारना बंद कर दिया है और उसे हिन्दी-उर्दू का नाम देकर हम उसे छुपाने की कोशिश करते करते हैं।

आप अपनी भावुक शायरी में कितनी लफ्फाजी करते रहते हों, यह भी सही है यह भी सही है कि आपके दिल में एक दिन इंसान के प्रति प्रेम भरा था।आप सब दुनिया के लोगों को एकसाथ कंधे से कंधा मिलाकर खुशहाली की मंजिल की तरफ बढ़ते हुए देखना चाहते थे। लेकिन दोस्त, आज ये क्या हो गया? इनसान को इनसान के करीब लाने के बजाय आप हिन्दी-उर्दू की आड़ में किस नफरत के शोले से खेलने लगे? सच कहूं तो आज आपकी आवाज से जमाते-इस्लामी की घिनौनी बू आती है। आपने पिछले दिनों वह शानदार गीत लिखा था-

नीले गगन के तले,

धरती का प्यार पले।

यह पत्र लिखते लिखते मुझे उस गीत की याद हो आई। इसलिए आपको देशद्रोही कहने को मन नहीं होता पर मुशायरे में आपकी तकरीर को पढ़कर आपको क्या कहूं यह समझ में नहीं आता। पूरे हिन्दुस्तान की एक पीढ़ी जिसमें पाकिस्तान की भी वही पीढ़ी शामिल की जा सकती है, आपकी कलम पर नाज करती थी, आपके खयालों से( खयालों उर्दू का नहीं हिन्दी का शब्द है, उर्दू में इसे खयालात कहते हैं हुजूरेवाला) प्रभावित थी। आपने उस पीढ़ी की तमाम भावनाओं को अपनी सांप्रदायिकता की एख झलक दिखाकर तोड़ दिया।

जिस भाषा को आप उर्दू कहते हैं और जिसके लिए आज आंध्र, बंगाल,महाराष्ट्र, मैसूर और केरल- सब जगह दूसरी भाषा का दर्जा दिलवाना चाहते हैं वह इन जगहों में भी उतनी ही परदेशन है जितनी पश्चिमी पाकिस्तान में। उर्दू संस्कृति में अपने बच्चों को पालने के लालच में हिन्दुस्तान छोड़ने वाले महान कवि जोश मलीहाबादी तक खुद मानते हैं कि पाकिस्तान में उर्दू का भविष्य डांवाडोल है क्योंकि वह वहां की भाषा नहीं है। पर वे खुश हैं। क्यों?  इसलिए नहीं कि वहां उर्दू पनप रही है बल्कि इसलिए कि वे एक सांप्रदायिक संस्कृति के बीच में पहुंच गए हैं(हालांकि वे अपने को अनीश्वरवादी कहते हैं)। है न कमाल की बात। आपने एक बार लिखा था-

तू हिन्दू बनेगा ना मुसलमान बनेगा

इनसान की औलाद है इनसान बनेगा

लेकिन आपकी आजकल की गतिविधि देखते हुए तो ऐसा लगता है ये आपकी अपनी भावनाएं नहीं थी, आप सिर्फ फिल्म के एक पात्र की भावनाएं लिख रहे थे। आप एक जमाने में वक्त को बदलने की बात लिखा करते थे। फिर भी फिल्मी आवश्यकता के वशीभूत आपने लिखा था-

कल जहां बसती थीं खुशियां-आज है मातम वहां

वक्त लाया था बहारें- वक्त लाया है खिजां

आदमी को चाहिए वक्त से डरकर रहे

कौन जाने किस घड़ी वक्त का बदले मिज़ाज

सारे हिन्दुस्तान में फिल्मोद्योग कम से कम एक ऐसी जगह थी जहां जाति प्रदेश और धर्म का भेदभाव काम के रास्ते में नहीं आता था, मेलजोल के रास्ते में नहीं आता था। और आप इनसानियत के हामी थे। पर आपने इस वातावरण में सांप्रदायिकता का जहर घोल दिया।

लगता है इनसान की औलाद का भविष्य आपकी नजरों में सिर्फ यह है-

तू हिन्दू बनेगा तू मुसलमान बनेगा

शैतान की औलाद है शैतान बनेगा

मैं आखिर में इतनी ही दुआ करना चाहता हूं: खुदा उर्दू को आप जैसे हिमायतियों से बचाये।

फिल्मेश्वर

( यह चिट्ठी माधुरी के 30 जुलाई 1965 के अंक में छपी। चिट्ठी सिने-इतिहासकार रविकांत जी की सहायता से हासिल हुई। प्रस्तुतकर्ता इसके लिए उनका कृतज्ञ है)

5205826_photo3चन्दन श्रीवास्तव,  मूलतया छपरा(बिहार) के निवासी, पिछले पंद्रह सालों से दिल्ली में। पहले आईआईएमसी और फिर जेएनयू में पढ़ाई। “उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हिन्दी लोकवृत्त का निर्माण” शीर्षक से पीएचडी के बाद दिल्ली के कॉलेजों में छिटपुट अध्यापन, फिर टीवी चैनल की नौकरी और अब विकासशील समाज अध्ययन पीठ(सीएसडीएस) की एक परियोजना इंक्लूसिव मीडिया फॉर चेंज से जुड़े हैं। इनसे  chandan@csds.in पर संपर्क संभव है। 

साभार- हंस- फरवरी- 2013- हिन्दी सिनेमा के सौ साल

Hrishikesh Mukherjee’s Parallel Cinema: A fraternal critique of Nehruvian socialism- Dhiraj K Nite

By Dhiraj K Nite

hrishikesh

Hrishikesh Da (1922-2006) was a cinematic craftsman known for pioneering a middle-path between the melodrama and extravagance of mainstream cinema, on the one hand, and, on the other, the shrieking realism of art cinema. He was the most successfulpractitioner of the product of this variously called middle cinema or parallel cinema in the Bollywood. The following commentary briefly surveys his cinematic expression with a view to question the conventional wisdom that parallel cinema was an expression of the Nehruvian socialist ethics on celluloid. It reveals the extent ofHrishiDa’s cinematic efforts as a fraternal critique of the claim made by such ethics, and his technical improvisation in achieving this on celluloid.

Nehruvian socialism, the popular assumption suggests, informed and inspired a variant of cinematic craft, called Parallel cinema. The latter chose the realsocial issue(opposed to melodramatic fantasy) and its socio-political context asa subject of its narrative; adopted a socialist perspective; and minimised crash commercialism in its presentation. Unlike the so-called art cinema, parallel cinema kept an eye open to the demand of Box office. Its cast, location and screenplay, therefore, charged higher costs.

 

The cinemagoer saw HrishiDa continuously developing this particular craft by directing and editing a large number of Hindi movies from the late 1950s and in the subsequent four decades. The prestigious Dada SahebPhalke Award, awarded to him in 1999, was the recognition of his mettle. The popular assumption about his endeavour does not help us understand how distinctive was HrishiDa as a practitioner of this craftsmanship? Nehruvian socialism inspired only certain content of his story. What about his cinematography, narrative style, screenplay, and other aspects of cinema production? He was after all not dependent on theNational Film Development Corporation. He looked out for producers, and took into account the box office. He worked with a specific principle and improvised a specific technique in doing so. What were these?

Narrative strategy

The story often unfolded in flash-back in his presentation. It was only a small element of his narrative strategy in his earliest directorial venture Anuradha (1960). Soon it was to become a hallmark of his craft. It marked a break from his contribution as an assistant to the production by directors,like Bimal Roy. He effectively harnessed the power of this technique in acclaimed movies, like Satyakam (1969: a righteous person), Anand (1970: a wholesome life taller than astronomical time), NamakHraam (1973: a phenomenological path of self-realisation), and Bemisal (1982: the significance of platonic love and inter-subjectivity). His presentation of story in flash-back generated curiosity between viewers. It did not have much emphasis on thrill at the cost of explanation offered for the main plot, and of an idealised resolution prescribed by the director for the problem which the plot concerned itself with. His details related to explanation and resolution, avoided all possibility of turning out preachy. These drew viewers to a secular logic of social development and human action. There, the divine intervention or pursuit did not have constitutive role to perform: which was contrary to the hallmark of commercial cinema. Hrishi Da was at his best in delivering this in movies, like Satyakam and NamakHraam. He lost this touch in his last directorial venture, Jhooth Bole KauwaKaate (1998). The latter appeared as a critique of the new love story of the defiant adolescenton celluloid. Here, Hrishi Da underscored the decision of two adult girl and boy to persuade their parents for the recognition of affectionate relationship between the couple. Here, no explanation was offered for such engaging behaviour of protagonists as opposed to those of defiant adolescents. Hence, viewers found the movie preachy and lacking details. What accounted for this slippage in his technique? Seemingly, the Bollywood saw a shift in favour of functionalism in the 1990s. The ageing Hrishi Da seems to have been a victim of it.

His narrative worked on wholesome comedy in family movies, like Bawarchi(1972), ChupkeChupke (1975) and GolMaal (1979).In his other movies the comedy was a subplot. These movies were acclaimed for noticeable absence of double-meaning dialogue. The latter has taken sway in many current comedy ventures.

Screenplay

His screenplay concerned itself with the main pursuit of Hrishi Da, i.e., explanation for and characterisation of protagonists in his movies. He was at par excellence in Anupama (1966) and Bemisal.The former movie depicted the meaning of life lived through by a reticent, traumatised girl in the midst of plenty. The statement was that pecuniary opulence does not amount to spiritual elevation. In the latter, the sources of vice and virtue in humankind were under his scanner. In his couple of early movies some houses, dwellings and most actors were the same. Locales were as per story and modest budget. Dialogue was sharp, focused, straightforward and Poetic. Lyrics received greater attention than the accompanying instrumental composition. Stories drove lyrics and songs. Therefore, listeners have not remembered songs of his particularly 60s’ movies. On top of everything, he eschewed from absorbing the new pulse of viewers for expensive scenic locale in the 90s, in his comedy venture Jhooth Bole…

Cinematography and film-editing

Cinematography is usually the shoddiest feature in Bollywood. Hrishi Da began his career as a cameraman in the 1940s. Unlike many of his colleagues, he relied on close-up shots, still and straight-angled camera. The former necessitated the fact that the director persuades actors to mould themselves in his frame. Hence, actors were able to exude emotion through facial contortion, voice modulation, and body gesture. He was remarkable in his effort. He worked with actors, like Dharmendra, Sharmila, Amitab, and AmolPalekar. All of them later became well known for their superlative talent. At the stage they joined in the venture of Hrishi Da, they were between the youngsters and bereft of stardom.Notably, Amitab performed some of his socially memorable roles in HrishiDa’s company. One can readily recall Anand, NamakHaraam, Abhiman (1973), Mili (1975), and Bemisal, where Amitab was shore off of his image of angry young man.

Hrishikesh Mukherjee was indisputably the ablest cinematic editor of his time. He performed this job in a large number of movies, including those of Bimal Roy from the 1950s. Here, he was succinct. Once again, his concern for explanation and characterisation defined his editing. His all filmfare awards recognised this particular skill, including for Do BighaZamin(1953: the everyday ways of resistance to depeasantisation and land enclosure) andMadumati(1959) and his greatest directorial venture Anand.

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Ideological Bent

Let’s see how far Nehruvian socialist he was in his details and plot!The characters invariably belonged to the professional class in his narrative. His characters embodied the spirit of new, enterprising, advancing humankind. The latter were a social, public person. Their ideal was an attachment to social progress. Indeed, the latter defined national progress.Such ideal meant in daily life the ethics of social service, fraternal relationship between classes and gender, welfare of underprivileged, and a pleasant contented life for everyone. His movie Anuradha epitomised all of these. Seemingly, Hrishi Da lost this touch in his commercially successful venture Bemisal. Here, Amitab (Dr Sudhir Roy) committed murder of an honest nurse to save dignity of the family of his friend cum well-wisher. But, his image was extenuated from it, and the soul turned out pious without any remorse. Sudhir’s crime was bracketed, like melodramatic revenge committed upon an anti-social person. This was a singular preposterous lapse in his directorial venture. One can see it as his vulnerability to viewers’ appreciation for a hero in negative character on the celluloid in the 1970s on.

The resolution proposed in his movies was pre-eminently an individualist initiative of the protagonist. The character appeared as uniquely eccentric on this front in the movie Satyakam.NamakHraam was possibly an exception, where the source of change lied in social collectivity and ideological awareness. The latter was a schema in his work. Hence, one finds characters evolving, and this very process stands out as the main plot.

He was far from being any propagandist and apologist of Nehruvian socialism. He zeroed in on exposing the perpetuation of many of those problems, which the Nehruvian polity claimed to uproot. Viewers readily remember Anuradhafor the missing medical service in the countryside; Anupamafor bourgeois parental authoritarianism; Satyakamfor the persistence of rotten administrative and cultural life in the form of corruption and ostracization; NamakHraamfor the perpetuation of class exploitation and bourgeois chicanery. His protagonists were dialectical antithesis of those problems, and of the limitation of Nehruvian polity. His characters in Anand and Mili (1975) represented the extraordinary human spirit how to live a full life and radiate envious charm in the surrounding.In this sense, it is folly to reduce HrishikeshDa’s parallel cinema to the alter-ego of Nehruvian socialism. Nor the latter can help us appreciate the craft of parallel cinema and distinctiveness of HrishiDa’s craftsmanship in the very terrain. 

 Dhiraj k NiteDhiraj Kumar Nite, A Social Scientist, an emerging film critic,  University of Johannesburg,  Ambedkar Univeristy Delhi.

फिल्मी जादू, फिल्मी धोखा, फिल्मी वास्तविकता -तत्याना षुर्लेई

By तत्याना षुर्लेई

सौ साल के बाद भारतीय सिनेमा अपने बारे में क्या कहता है!!

भारतीय और पश्चिमी सिनेमा में सिद्धांततः कोई बड़ा अंतर नहीं है। दुनिया के हर कोने में सिनेमा का जन्म एक ही चीज के लिए हुआ है- मनोरंजन के लिए। चलती हुई तस्वीरें, जो दुनिया के चित्र खींचने के लिए खोजी गयी, जल्द ही नयी-नयी कहानियाँ बुनने-कहने का बहुत अच्छा औजार बन गयी। भारतीय और पश्चिमी सिनेमा के इतिहास के बीच एक बड़ा अंतर सिनेमा के जन्म के साल को लेकर है। पश्चिम में सिनेमा के सौ साल के वर्षगाँठ की गणना पहली फिल्म दिखाने के बाद से ही हो गयी, जो की एक डाक्यूमेंट्री थी,  यही गणना भारत में पहली काल्पनिक कहानी दिखाने के बाद से होती है। इसका मतलब यह है कि भारतीय सिनेमा अपने दर्शकों के लिए सब से पहले एक मजेदार झूठ है, जिसके लिए वास्तव से बिलकुल अलग दुनिया दिखाना उसका पहला कर्तव्य है। जैसे मैं लिख चुकी हूँ, ‘चलती हुई तस्वीरें या सपनों का कारखानाः सिनेमा क्या है?’ लेख में मैंने बताया था, पश्चिम के लिए, जिनके लिए सिनेमा प्लेटो (Plato का गुफा होता है। उनके लिए फिल्म की दुनिया वास्तव से थोड़ी बेकार होती है। तथापि भारतीय, ‘जिनके लिए वास्तव सिर्फ माया होता है’, सिनेमा में सच ढूँढ़ते हैं। जो भी कारण हो इस साल सिनेमा के वर्षगाँठ को मनाने का, कुछ सारकथन कहने के लिए भारतीय सिनेमा का यह सौंवा साल एक बहुत ही अच्छा मौका है। सिनेमा का त्योहार और शताब्दी-वर्ष ऐसे ही मौके हैं जिनके बहाने सौ साल के निष्पादनों के बारे में सोचने की जरूरत है। पर सिर्फ इन्हीं बारे में नहीं, सिनेमा के भविष्य के बारे में भी। सिनेमा ही बार-बार नहीं बदला है, सारा समय ही बदल रहा है – न सिर्फ नए-नए आविष्कारों के साथ, जिनकी मदद से वह चलता है, बल्कि अपने नए-नए दर्शकों की सहायता से भी, जो कभी भी कुछ नया और अक्सर साहसिक भी देखने के लिए तैयार रहते हैं। लगता है कि सिनेमा आजकल खुद अपने विकास के बारे में सोच रहा है और अपने दर्शकों पर हुए प्रभाव के बारे में भी। सिनेमा का इतिहास लंबा नहीं है लेकिन जो है वह बहुत ही विविधतापूर्ण है इसलिए यह कोई संयोग नहीं है कि सौ साल की वर्षगाँठ के करीब कई ऐसी फिल्में बनाई र्गइं जो अपने बारे में कुछ महत्त्वपूर्ण बातें कहना चाहती हैं।roadmovie

अपने बारे में बताना कोई नई चीज नहीं है – पश्चिम में ही नहीं, भारतीय सिनेमा में भी। फिर भी, आजकल इस विषय को हम पिछले सालों के मुकाबले से ज्यादा देख सकते हैं। आत्मालाप सिनेमा के शुरू में काल्पनिक विषयों के साथ पैदा हुआ लेकिन सच यह है कि इसका विकास आधुनिक समय से संबंधित है। पुराने जमाने में इस पर इतना ध्यान नहीं दिया जा रहा था, क्योंकि एक प्रकार का आत्मालाप सिनेमा के आसपास कहीं हमेशा मौजूद रहता था। शायद सिनेमा के शुरू में आत्मालाप के लिए इसलिए स्थान नहीं था कि इतिहास लंबा न होने के कारण किसी सारकथन की जरूरत नहीं थी। आत्मालाप अलग-अलग रूपों में होता है और इसका अच्छा इस्तेमाल सिर्फ अग्रणी सिनेमा जान-बूझकर कर रहा था। शेष सिनेमा को हमेशा यह बात अच्छी तरह मालूम थी कि उसके द्वारा बनाई हुईं फिल्मों की दुनिया को यथार्थ से अलग नहीं होना चाहिए। इसलिए इन दोनों दुनियाओं के अंतर, जो कभी-कभी होता था, और इनके बीच में जो उसका हस्तक्षेप किया जा रहा था, इसे हमेशा छुपाने की कोशिश की जाती थी। दर्शकों को देखी हुई दुनिया वास्तविक लगती है लेकिन इस वास्तव में कोई न कोई धोखा तो होता ही है। और इस धोखे के मदद से देखी हुई इमारत कभी सिर्फ स्टुडियो में बनाई हुई एक दीवार का टुकड़ा है और कोई सच्ची जगह नहीं है – जैसे पोलैंड के पहाड़ कुणाल कोहली की ‘फना’ में कश्मीर में बदल गए या संजय लीला भंसाली की ‘हम दिल के चुके सनम’ में बुदापेस्त को इटली के एक शहर की भूमिका निभानी पड़ी। उन फिल्मों में ऐसी ही स्थिति होती है जो सिर्फ फिल्मों के बारे में एक कहानी दिखाते हैं और उनकी सच्चाई भी अधूरी होती है। वे कभी कुछ ज्यादा दिखाते हैं लेकिन उतना नहीं और अपने बारे में एक प्रकार के धोखे में रखते हैं। भारतीय सिनेमा के इतिहास में ऐसी फिल्मों की बहुतायत है पर इनमें से तीन मुझे दिलचस्प लगती हैं – देव बेनेगल की ‘रोड मूवी’, पुनीत मल्होत्रा की ‘आइ हेट लव स्टोरीज’ और मिलान लूथरा की ‘डर्टी पिक्चर’। इस चुनाव का पहला कारण यह है कि तीनों फिल्में सौवीं वर्षगाँठ के आसपास बनाई गई हैं (2009, 2010 और 2011 में), तीनो फिल्में सिनेमा के बारे में है और हर एक में दिखाया हुआ सिनेमा कुछ अलग है। इसमें आश्चर्यचकित होने की कोई बात नहीं है – इसलिए कि हर व्यक्ति के लिए सिनेमा कुछ अलग है। किसी को कोई फिल्म अच्छी लगती है, तो किसी को कोई और निर्देशक या अभिनेता पसंद है। इसलिए यह कहना बहुत मुश्किल है कि सिनेमा में सबसे महत्त्वपूर्ण क्या है और फिल्मों का सौ साल में कैसा विकास हुआ। तथापि संभवतः इन तीन फिल्मों के मदद से हमको पता चल जाएगा कि फिल्मों के विचार में भारतीय सिनेमा में सबसे महत्त्वपूर्ण क्या है।

सिनेमा के शुरू में किसी को विश्वास नहीं था कि यह नया आविष्कार, जो चलती हुई तस्वीरें दिखा सकता है, इतना प्रचलित हो जाएगा कि दुनिया के सारे कोनों में पहुँच जाएगा। आज इसमें कोई शक नहीं है कि सिनेमा के बिना हमारी जिंदगी कुछ अधूरी लगती है। दुनिया में शायद कई लोग ऐसे मिल जाएंगे जिन्होंने कभी कोई अखबार या किताब नहीं पढ़ी हो, लेकिन ऐसा व्यक्ति ढूँढ़ना बहुत मुश्किल है जिसने कभी कोई फिल्म नहीं देखी हो। फिर भी शुरू में, जब सिनेमा का विकास मेलों में सस्ते सर्कस के तंबुओं में हो रहा था, पढ़े-लिखे लोग सिर्फ चोरी-चुपके फिल्में देखते थे। पोलैंड के फिल्म सिद्धांतकार करोल इजिकोवस्की (Karol Irzykovsky) ने इस समय पर लिखा था कि सभी लोग फिल्में देखने जाते हैं, लेकिन इसके बारे में बात करने में उनको शर्म आती है। क्यों? इसलिए कि इस समय के सिनेमा के दर्शक सीधे-सादे, अनपढ़ लोग थे जो फिल्मों की मदद से अपने दुख-निराशा को कुछ समय के लिए भूल सकते थे। असल में फिल्मों की शुरुआत ऐसी अद्भुत स्थिति ढ़ूँढने से ही संबंधित है जो वास्तविक दुनिया में कभी नहीं मिलती है। भारत में फिल्मों के जनक दादा साहेब फाल्के और यूरोप में जॉर्ज मेलिएस ऐसे ही जादूगर थे जिन्होंने अपनी फिल्में बड़े-बड़े सपनों की तरह बनाईं। ऐसे सपने जहाँ सच्चा प्यार होता है, सत्य हमेशा जीतता है, लोग चांद के पास जा सकते हैं और लोगों की मदद करने के लिए भगवान जमीन पर आते हैं।

देव बेनेगल की फिल्म देखते हुए ऐसा लगता है जैसे आप सिनेमा के दर्शकों के बीच पहुँच जाते हैं, जैसे सिनेमा के दर्शक ही विषय हैं। ‘रोड मूवी‘ का नायक, जिसका नाम विष्णु है, रेगिस्तान में ट्रक चलाता है। वह जानता है कि उसकी गाड़ी एक गतिशील सिनेमा है लेकिन यह उसके लिए इतना महत्त्वपूर्ण नहीं है। विष्णु के पास आईपॉड है, मोबाइल फोन भी है; घर पर उसके पास कंप्यूटर होगा और उसमें होगी दुनिया की सारी फिल्में। ऐसा पुराना और बेकार सिनेमा उसको शायद थोड़ा हास्यास्पद भी लगता है लेकिन विष्णु का विचार बदलेगा जब वह रेगिस्तान में रहनेवाले लोगों से मिलेगा। उन लोगों से जिनका हर दिन का काम पानी ढूँढ़ना है। विष्णु अपनी गाड़ी की खिड़की से और फिल्म के दर्शक अपनी जगहों से गाँव वालों के थके हुए चेहरे देख सकते हैं। जब नायक के रास्ते में मेला ढूँढ़ने वाला अजनबी आदमी आता है, तो विष्णु को उस आदमी के मदद से पता चलता है कि उसकी पुरानी फिल्में कुछ समय के लिए गरीब लोगों के जीवन को बदल सकती हैं। सब चेहरे जो पहले उदास और थके थे अब बिल्कुल अलग लगते हैं। फिल्म का जादू सब लोगों को प्रभावित करता है।

फिल्म के सबसे सुंदर दृश्य में बूढ़े आदमी की मेले के बारे में भविष्यवाणी सच हो जाती है और जिस जगह पर ट्रक फिल्मों को दिखाने के लिए तैयार है, वहाँ मेला का रेला भी आता है। रेगिस्तान का यह मेला एक बड़ी मरीचिका का रूप ले लेता है, पता नहीं यह सच है या विष्णु और उसके दोस्त नशे में और शायद प्यास से बेहोश हैं। मेला रेगिस्तान में रहने वालों का एक बड़ा सपना है जिसकी शुरुआत विष्णु की फिल्मों ने की है। रूसी दर्शनशास्त्री मिखाइल बाख्तिन (Mikhail Bakhtin) ने मध्ययुगीन यूरोप के कार्निवाल के बारे में लिखते समय अनुभव किया कि बड़े त्योहारों-महोत्सवों के समय रोजमर्रा के सारे नियम-कायदों की हालत पतली हो जाती हैं। साहित्य और फिल्म भी कभी-कभी इसी स्थिति का, इस नियमबदल का इस्तेमाल करते हैं। जिससे इनकी दुनिया की हालत भी उलटी हो जाती है, जैसे  रोड मूवी में। पागल रंगरेलियों की शुरुआत तो सिनेमा से होती है लेकिन बाख्तिन  वाले आनंदोत्सव की तरह सुबह को खत्म नहीं हो जाती है, सिनेमा और मेले के कारण सब लोग बदलते हैं। गाँव वाले ही नहीं, रेगिस्तान वाले डाकू भी। वे अपराधी, जिनके कारण बाकी लोगों के पास पानी नहीं है आनंदोत्सव के समय में जानवरों से मनुष्य हो जाते हैं। जब तक विष्णु का ट्रक रेगिस्तान पर चलेगा और अपनी फिल्में दिखाएगा, तब तक मेला चलता ही रहेगा। आनंदोत्सव के बाद शायद डाकू फिर से जानवर बन जाएँगे, पुलिस किसी को भी मार देगी, लेकिन मेले के अंत से पहले, फिल्मों के जादू के कारण, सब कुछ ‘उल्टा’ और सुरक्षित है।road movie 2

पढ़े-लिखे लोगों को शायद सामान्य सिनेमा में यह बात अच्छी नहीं लगती है कि फिल्मों के जादू के कारण सभी दर्शकों का व्यवहार कभी-कभी बच्चों का जैसा होता है। सामान्य सिनेमा अपने दर्शकों के भावों से अच्छी तरह खेलता है इसलिए फिल्म देखने के समय जोर से हँसना या रोना बहुत आसान होता है। सभी तरह की फिल्मों के दर्शकों को सिर्फ मनोरंजन चाहिए जोकि हर व्यक्ति के लिए अलग हो सकता है। जैसा कि मैंने जिक्र किया है, किसी को रोना अच्छा लगता है तो किसी को हँसना और किसी को डरना भी सबसे अच्छा लग सकता है। और सिनेमा के पास इन सारे दर्शकों के लिए कुछ न कुछ दिलचस्प है ही। तथापि इसी समय पर ज्यादा लोग बोलेंगे कि सिनेमा उनके लिए सिर्फ कला है और बड़े-बड़े निर्देशकों की फिल्मों के अलावा वे कुछ सामान्य नहीं देखते हैं। ऐसा क्यों होता है? क्या इसमें शर्म की बात है कि कभी-कभी हम सबको सामान्य फिल्म की सरल कहानी की जरूरत होती है? आजकल की स्थिति करोल इजिकोवस्की के समय से कुछ अलग है। आज फिल्मों को देखने में कोई शर्म नहीं है – सिर्फ सामान्य फिल्म के अलावा। शायद समस्या यह है कि पढ़े-लिखे दर्शकों को मालूम होता है कि फिल्म की कहानी एक झूठ है, फिर भी यह झूठ उनको इतना धोखा दे सकता है कि वे भी साधारण दर्शकों की तरह आसानी से रोते हैं और डरते हैं कि नायक मर जाएगा।

फिल्म का जादू यह भी है कि बहुत लोग मानते हैं कि पर्दे पर देखी हुई कहानी सच होती है, और अगर नहीं मानते हैं तो देखते समय इसके बारे में अचेत हो जाते हैं क्योंकि फिल्म बहुत अच्छी तरह वास्तविकता को धोखा दे सकती है। फ्रांस के फिल्म सिद्धांतकार, आंद्रे बाजें (Andre Bazin) ने लिखा कि अपने दर्शकों के लिए फिल्म एक खिड़की की तरह होती है, ऐसी खिड़की जिसे खोलने के बाद बाहर की दुनिया दिखाई जा रही हो। इसलिए दर्शकों को लगता है कि फिल्म की कहानी सच है और इसलिए भी आंद्रे बाजें के लिए सबसे अच्छी फिल्में वही थीं जिनकी दुनिया वास्तव से उतनी अलग नहीं थी। लेकिन यह दुनिया कभी कुछ और भी है जो वास्तविकता से अलग होती है। फिर भी दर्शकों के लिए इसमें और यथार्थ में कोई अंतर नहीं है और स्वप्न-चित्र देखने के समय वह उसी तरह प्रतिक्रिया दर्शाता है जैसी यथार्थवादी फिल्म देखने के समय। एक अन्य फिल्म सिद्धांतकार एडगर मोरें (Edgar Morin) ने इसके बारे में लिखा। उसके विचार में ऐसी प्रतिक्रिया इसलिए होती है कि कोई भी फिल्म देखने के समय लोग उसके नायक को अपना परिवर्तित रूप समझते हैं। तथापि इसके लिए एक चीज की जरूरत है – खिड़की पर देखी हुई दुनिया में रहने वालों को पता चलना नहीं चाहिए कि उनको कोई देख रहा है। और यह बात सिनेमा और उसके दर्शकों के लिए भी बहुत महत्त्वपूर्ण है।

फिल्म के दर्शकों को सबसे अधिक मजा झाँकने में आता है। सिनेमा घर के अँधेरे में बैठे हुए लोग एक-दूसरे को नहीं देख सकते हैं, लेकिन वास्तविक दुनिया के लोगों से अदृश्य होकर फिल्म के नायकों की जीवन में घुस जाते हैं। फिल्मों के दर्शक खुद से देखे हुए लोगों के सारे रहस्यों के बारे में जानते हैं, और फिल्म देखते समय यह सब जान लेना सबसे मजेदार क्षण होता है। इसलिए हर सामान्य सिनेमा में सबसे पहले एक नियम की बहुत बड़ी जरूरत है। फिल्म की कहानी के नायकों को ऐसा व्यवहार करना चाहिए जैसे उनको मालूम नहीं था कि उनको कोई देख रहा है। हर फिल्म के अभिनेता-अभिनेत्री को मालूम है कि उनकी फिल्में लोगों के मनोरंजन के लिए बनाई जाती हैं, लेकिन इस जानकरी को पर्दे पर दिखाना फिल्म का सबसे बड़ा पाप है। साथ ही, जब कोई फिल्म अपने बारे में कुछ बताना चाहती है, तब भी यह नियम महत्त्वपूर्ण है, इसलिए ऐसी स्थिति वहाँ ज्यादा प्रचलित है जहाँ फिल्म की दुनिया यथार्थ से दूर नहीं है और दर्शकों को वास्तविक लगती है। ऐसे ही एक पाप का बहुत अच्छा उदाहरण मनोज कुमार की फिल्म ‘पूरब और पश्चिम’ है। फिल्म के शुरू के दृश्य में जब फिल्म का नायक भारत लंदन जाता है तो वह ऑर्फन नाम के हिप्पी से मिलता है, और यह लड़का जब अपने अजीब नाम के बारे में बोलता है तब सीधे कैमरा की तरफ देखता है। उसकी इस भंगिमा को देखकर ऐसा लगता है जैसे वह भारत से नहीं, दर्शकों से बात करना चाहता है। और अगर वह दर्शकों से बात कर सकता है तो इसका मतलब यह भी है कि उसको पता है कि कोई उसे देख रहा है और सारे दृश्य का मतलब यह है कि पर्दे पर चल रही कहानी सच नहीं है। सब भ्रम बर्बाद हो जाता है। कोई निर्देशक अवश्य ही इस भंगिमा का बहुत अच्छा इस्तेमाल कर सकता है, और कभी-कभी इसकी जरूरत भी होती है, जैसे कि डरावनी फिल्मों में। वहाँ जब कोई राक्षस या किसी तरह का विरूप प्राणी सीधे दर्शक की ओर देखता है तो डर से मिलने वाले मनोरंजन में इजाफा हो जाता है क्योंकि इस भंगिमा का मतलब कोई चेतावनी है और दर्शक को लगता है कि अगला बलि-पशु वह हो सकता है।

झाँकने से मजा लेने (दर्शनरति) के बारे में मनोविश्लेषण का सिद्धांत, जिसका जिक्र लउरा मल्वे (Laura Mulvey) ने किया है, डर्टी पिक्चर में अच्छी तरह दिखाई दिया। फिल्म की नायिका, जिसका नाम रेशमा है, अभिनेत्री बनना चाहती है और इसके लिए सब कुछ करने को तैयार है। अभिनेत्री होने के बदले में रेशमा, जिसका नया नाम सिल्क है, नाचती हुई ऐसी लड़की बन जाती है जिसके नृत्य में बहुत ही साहसिक रत्यात्मक मुद्राओं की जरूरत होती है। वह अपनी ख्याति से बहुत खुश है लेकिन इस तरह की ख्याति वास्तव में बहुत कड़वी होती है। अफसोस की बात यह है कि सिल्क और उस प्रकार की सारी औरतों की ऐसी ख्याति सच्ची ख्याति न होकर भी सिनेमा के लिए कोई नई चीज नहीं है। मनोविश्लेषण के आधार पर लउरा मल्वे ने न सिर्फ देखने से आने वाले मजे के बारे में लिखा बल्कि उस शक्ति के बारे में भी लिखा जो देखने से पैदा होती है। कैमरे की आँखें पुरुष की आँखें होती हैं इसलिए औरत का शरीर सिनेमा में महज देखने की वस्तु है। औरत को कुछ करना नहीं चाहिए, सिर्फ अच्छी तरह दिखाई देना चाहिए। भारतीय सिनेमा यह रत्यात्मक मजा भी अपने दर्शकों को देता है, अपनी नायिकाओं को देखने की अनुमाति देता है। यहाँ भी सिनेमाघर के अँधेरे में बैठे हुए आदमी को लगता है कि उसे कुछ ऐसा देखना है जो सभी लोगों के लिए नहीं है, जिसे सामान्य जीवन में देखना अनैतिक है। और कोई नाचती हुई औरत अगर कभी सीधे कैमरे की ओर देखेगी तो इस बार यह कोई फिल्म का पाप नहीं होगा क्योंकि सिनेमाघर में बैठा हुआ हर आदमी सोचेगा कि पर्दे पर दिख रही लड़की सिर्फ उसके लिए नाच रही है। झाँकने से मिलने वाले मनोरंजन का स्थानांतरण हो जाएगा और हर आदमी यह सोच सकेगा कि वह शो का एक हिस्सा है और उसमें भी कामविषयक शक्ति है।the-dirty-picture-wallpaper-06

स्त्री-शरीर को दिखाने का उपक्रम सबसे अच्छी तरह गानों में संभव है। पश्चिम के लोगों को ज्यादातर भारतीय फिल्मों में मौजूद गानों की इतनी उपस्थिति बड़ी अजीब लगती है क्योंकि खास तौर से यूरोप में सांगीतिक फिल्में कभी इतनी लोकप्रिय नहीं थीं, और जो सांगीतिक फिल्में थीं भी, उनकी दुनिया भारतीय फिल्मों से अलग होती थी। यूरोप की अधिकांश सांगीतिक फिल्में किसी न किसी संगीत-नाट्य प्रदर्शन के बारे में होती हैं, संगीत की उपस्थिति ‘तार्किक’ होती हैं, इसलिए फिल्मों का ऐसा नुस्खा, जहाँ हर कहानी में गानों की जरूरत है, पश्चिमी दर्शकों के लिए अस्वीकार्य है। वे लोग नहीं जानते हैं कि कामविषयक मजे के लिए गानों की कितनी बड़ी जरूरत है! पुराने जमाने से ही फिल्मों की अलग, कभी-कभी बहुत दिलचस्प योजनाएँ होती थीं औरतों के शरीर दिखाने के लिए। भारतीय सिनेमा के इतिहास में कभी-कभी ऐसे निर्देशक भी हुए जो नायिकाओं के शरीर को दिखाने के मामले में गानों के मुहताज नहीं थे – और उनमें सबसे प्रसिद्ध नाम शायद राज कपूर का था। उसकी ‘बॉबी’ एक नई और चुस्त कहानी थी लेकिन कुछ दर्शकों को वह सिर्फ डिंपल कपाडिया की बिकनी के कारण अच्छी लगती थी। तथापि कभी औरत का शरीर दिखाना फिल्म को कुछ नुकसान भी पहुँचा सकता है। शेखर कपूर की बैंडिट क्वीन एक बहुत महत्त्वपूर्ण फिल्म थी जो स्त्री-हिंसा को सबको दिखाना चाहती थी। अफ्सोस की बात यह है कि ज्यादा दर्शक सिर्फ सीमा बिस्वास के नंगे शरीर को देखने के लिए सिनेमाघर आ जाते थे और फिल्म जिसका विरोध करना चाहती थी उसने यही सब दर्शकों को दिया। ज्यादा फिल्में सतर्कतापूर्वक अलग-अलग तरीके ढूँढ़ती हैं जो शरीर दिखाने के लिए सबसे उचित हों। सबसे आसान तरीका है वेश्या को नायिका बनाना क्योंकि वेश्याओं के साथ सब कुछ करना उचित है। निस्सन्देह सभी नायिकाएँ वेश्या नहीं हो सकती हैं इसलिए कई फिल्मों में मोहिनी आ गई जोकि बहुत अच्छी योजना थी। इस तरह फिल्म की नायिका बहुत भोली, अच्छी लड़की हो सकती थी लेकिन नायक दूसरी औरत को भी पसंद था जो अच्छी थी पर सुंदर और खतरनाक थी, शराब और सिगरेट पीती थी और नाइट क्लबों में नाचती थी। इस योजना से आइटम नंबर पैदा हुआ जो कामविषयक मजे के लिए भारतीय फिल्मों का शायद सबसे अच्छा आविष्कार भी था। आइटम नंबर वाली औरतें सिर्फ देखने के लिए होती हैं और फिल्म की कहानी से उनका कोई संबंध नहीं होता है। वे शुद्ध मजे के लिए उतारी जाती हैं। नायिका का इस तरह नाचना हमेशा अनुचित था, पर कभी-कभी इसकी जरूरत भी थी इसलिए ड्रीम सिक्वेंस बन गया। इसकी मदद से दर्शक वह सब कुछ देख पाता है जो सिनेमाघर में आकर देखना चाहता है, और नायिका की इज्जत भी सुरक्षित रहती है क्योंकि हर ऐसा दृश्य सिर्फ सपना होता है।The Dirty Picture

डर्टी पिक्चर स्त्री-शरीर को सिनेमा में देखने-दिखाने की योजना को अच्छी तरह निभाती है। डर्टी पिक्चर एक ऐसी स्त्री की कहानी है जो फिल्मों में नाचने का काम करती है, अपने शरीर की खूबसूरती के बल पर दिनों-दिन सफलता की बुलंदियों पर चढ़ती जाती है। लेकिन बढ़ती उम्र की तो शरीर की ‘खूबसूरती’ से जैसे दुश्मनी है। इस तरह एक दिन वह खुद को पराजित महसूस करती है, ठगी सी महसूस करती है। लेकिन यह विडंबना भी दर्शकों के देखने के नजरिए में कोई बदलाब नहीं ला सका। इस फिल्म की कहानी दो स्तरों पर चल रही है। एक स्तर सिल्क का जीवन और उसकी अश्लील फिल्में हैं, दूसरा यह फिल्म है जो सिल्क के बारे में बता रही है। सिल्क के फिल्मों के गानों के हिस्से को देखकर दर्शक बहुत उत्तेजित होते हैं। हम सिनेमाघर में बैठे पुरुषों के चेहरों पर एक खास किस्म की लालसा देख सकते हैं। लेकिन इसी समय डर्टी पिक्चर में दर्शकों के लिए भी वही मजा है और सिनेमाघर के अँधेरे में बैठे दर्शकों के चेहरे पर वही लालसा फिर से वापस आ जाएगी। यह फिल्म एक भोली-भाली नायिका के बारे में है जिसको फिल्मी पेशे ने नष्ट कर दिया। जब तक जवानी और सुंदरता थी, तब तक सारे सपने पूरे लगते थे लेकिन जब जवानी चली गई और शरीर उतना खूबसुरत नहीं रह गया, तब सिल्क ने देखा कि वह सिर्फ शरीर थी। फिल्म वालों के लिए सुंदर शरीर में रहती हुई औरत को ढूँढ़ना महत्त्वपूर्ण नहीं था क्योंकि दर्शकों के लिए सुंदर शरीर ही काफी है। देखने की, झाँकने की इच्छा कितनी मजबूत होती है हम इस फिल्म के ड्रीम सिक्वेंस में भी देख सकते हैं। इसमें सिल्क अपनी फिल्म की नायिका है और उसे अपने शरीर को पहले सी दिखाने की जरूरत नहीं है, लेकिन पता चलता है कि नायिका की यह भूमिका भी उसे इसीलिए प्रदान की गई है कि वह देह-प्रदर्शन की योग्यता रखती है।

भारतीय फिल्में नायिका की इज्जत के बारे में सोचकर भी ड्रीम सिक्वेंस की मदद से इस इज्जत को नष्ट करती हैं। भोग की इच्छा, दर्शनरति की इच्छा इज्जत से बड़ी है और फिल्में अपने दर्शकों पर  निर्भर हैं। अगर कोई सिनेमाघर नहीं आएगा फिल्म देखने के लिए तो नई फिल्में बनाने के लिए पैसा भी नहीं होगा। इसलिए सामान्य फिल्में अपने दर्शकों को वह देती हैं जो उनको सबसे अच्छा लगता है। निस्संदेह, इसका मतलब यह नहीं है कि जिन लोगों के लिए फिल्म में झाँकने का मजा सबसे महत्त्वपूर्ण है वे सब के सब कोई  विकृत लोग हैं। फिर भी, ऐसी स्थिति, जब किसी के लिए फिल्म का सबसे महत्त्वपूर्ण क्षण नंगे शरीर से संबंधित है, खतरनाक हो सकती है। इसलिए मुझे अच्छा लगता है कि आधुनिक फिल्मों में आइटम नंबर धीरे-धीरे गायब हो जाता है और आज की अभिनेत्रियों की साहसिकता नंगे शरीर को दिखाने से नहीं, कहानी के व्यक्तित्व से संबंधित होती है।

अधुनिक दर्शकों की दुनिया फिल्मों से संबंधित है। एक तरफ, फिल्मों की मदद से वे वास्तविकता को भूलना चाहते हैं तो दूसरी तरफ, आज के लोगों की वास्तविकता फिल्म की वास्तविकता है। आइ हेट लव स्टोरीज में ऐसी ही स्थिति है। फिल्म का नायक, जिसका नाम जय है, प्यार से नफरत करता है। ऐसा वह फिल्म स्टुडियो में काम करने के कारण ही सोचता है क्योंकि फिल्में अपने दर्शकों को झूठ दिखाती हैं। जय को अपना विचार बदलना पड़ता है जब धीरे-धीरे उसे पता चलता है कि उसकी जिंदगी में भी कुछ ऐसी चीजें हैं जो फिल्मों से मिलती-जुलती हैं। फिल्म के अंत में एक मजेदार दृश्य में जय सिनेमाघर में आता है और हाथ में फूल पकड़कर अपनी प्रेमिका  को बुलाता है। इसी समय उसको पता चलता है कि पर्दे का नायक यही कर रहा है। संयोग है? नहीं। बहुत फिल्में देखने के बाद ढेर सारे लोग अक्सर बिना किसी इरादे के अपना जीवन फिल्मी बनाने की कोशिश करते हैं। फिल्म में देखी हुई रोमांस वाली छवि अच्छी लगी तो लोग इसे दुहराएँगे, कभी कुछ कहने के लिए फिल्मी संवादों का इस्तेमाल करेंगे क्योंकि उनको लगता है कि शायद उनकी कहानी के अंत में भी वही होगा जो फिल्म के अंत में हुआ। I_Hate_Love_Stories_Movie_BollywoodSargam_talking_491333

आई हेट लव स्टोरीज की मदद से हम भारतीय फिल्मों के भविष्य के बारे में भी सोच सकते हैं। यह फिल्म फिल्म-निर्माण के बारे में है और इसमें उन फिल्मों का जिक्र है जो प्रेम कहानियों के लिए चर्चित रही हैं। फिल्म का निर्माता करन जोहर है जो अपने फिल्मों में स्टार अभिनेताओं के साथ काम करता था जबकि इस फिल्म में उस तरह से स्टार कोई नहीं है – स्टार फिल्म के मुख्य-पात्र के सपने में आता है। एक दृश्य में जब सेट पर गाने की शुटिंग की जा रही है, नायक और नायिका को देखकर मुख्य पात्र सपने में खुद को गाते हुए देख रहा है। गाता हुआ जय और उसकी प्रेमिका वैसी ही दिखाई देती है जैसी करन जोहर की फिल्मों के सारे नायक और नायिकाएँ। लेकिन अंतर यह है कि इस फिल्म का नायक शहरुख खान नहीं है और फिल्म भी थोड़ी सी अलग है। मेरे विचार में यह गाना परिवर्तनों का रूपक है। अब नए-नए अभिनेताओं का समय आ गया है और नई फिल्मों का भी। ऐसी फिल्मों का समय जिसकी नायिका अपने होने वाले पति को छोड़ सकती है – इसलिए नहीं कि वह बुरा है या उसने कुछ उसको किया, वरन इसलिए कि उसकी जिंदगी में कोई नया आ गया है। नए-नए दर्शकों को नई कहानियाँ चाहिए और ऐसा परिवर्तन स्वाभाविक है। फिल्म में शायद सब कुछ हो चुका है और कुछ नया हो नहीं सकता है लेकिन आज भी टीवी या कंप्यूटर जैसे व्यसन के सारे आविष्कारों और इसके विकास के बावजूद फिल्म की जरूरत है और बनी रहेगी। फिल्मों की कला दूसरे कलाओं से जल्दी पुरानी हो जाती है इसलिए नहीं कि नए आविष्कारों से उसका गहरा संबंध है – सबसे पहले इसलिए कि फिल्म खुद के इरादों के दर्शक को पैदा करती है और इसके बाद उसको कहानी देती है। इसके कारण संग्राम देखने के बाद लोगों को विश्वास था कि अशोक कुमार वास्तव में पुलिस वालों को मार देंगे, अमिताभ बच्चन एक कॉमिक्स में सुपर-हीरो बन गए या प्राण के जमाने में कोई माँ अपने बेटे को प्राण का नाम देना नहीं चाहती थी। ‘आई हेट लव स्टोरीज’ के एक दृश्य में ‘रोड मूवी’ की तस्वीर दिखाई देती है जो कि सिनेमा का सबसे अच्छा सारकथन है। फिल्में अलग होती हैं जैसे उनके दर्शक, लेकिन एक चीज वही है जो शुरू में भी थी: अंधेरे में इंतजार करने का यह अद्भुत अहसास दुनिया के सब कोने में एक जैसा है और मुझे आशा है कि यह कभी नहीं बदलेगा।

पहल-91 से साभार

Tatiana szurlejतत्याना षुर्लेई लोकप्रिय हिंदी सिनेमा की शोधार्थी और समीक्षक के रूप में पोलैंड में ख्यात। सिनेमा विषयक तीन लेख हिंदी में लिख  चुकी हैं। इन्होंने  यह लेख विशेष रूप से पहल-91 के लिए लिखा है। केन्द्रीय हिंदी संसथान, आगरा से हिंदी का प्रशिक्षण। फिलहाल पोलैंड के शहर क्राकोव सिथत Jagiellonian University में The Courtesan Figure in the Iconography on Indian Popular Cinema:Tradition, Stereotype, Manipulation. नामक विषय पर पीएचडी के लिए शोधरत हैं। इनसे  tatianaszurlej@yahoo.com पर संपर्क सम्भव है।

चलती हुई तस्वीरें या सपनों का कारखाना : सिनेमा क्या है? : तत्याना षुर्लेई

(भारतीय सिनेमा के सौ साल की अभी खूब चर्चाएँ हैं. लेकिन यह सौ साल इसी साल क्यूँ? जबकि यूरोप में तो यह १९९५ में मनाया जा चुका है. इसके सैद्धांतिक आधार क्या रहे हैं/ क्या हैं? हिंदी में इसकी चर्चा नहीं के बराबर है. सिनेमा यथार्थ है या कल्पना? दस्तावेज है या रूपक? इन्हीं सवालों  को तत्याना बहुत ही बारीकी से इस संक्षिप्त से नोट में हमें बताने की कोशिश करती हैं. तिरछी स्पेल्लिंग इस अंतर-दृष्टि-परक लेख  के लिए उनका आभारी है. साथ ही साथ यह उम्मीद भी कि तत्याना के द्वारा उठाये गए प्रश्नों के आलोक में यह बहस आगे भी चले!)
By तत्याना षुर्लेई
सिनेमा बहुत पुराना आविष्कार नहीं है, उसका जन्म 28 दिसम्बर 1895 को हुआ, जब लिमिएर (Lumière) -बंधु ने पेरिस में अपना नया मशीन दिखाया। एक दिलचस्प बात यह है कि पहला शो ग्रैंड होटल के ‘इंडियन रूम’ मे किया गया। शायद यह जगह एक संकेत था कि आगे चलकर भारत फिल्मों का सब से बड़ा व्यावसायिक केंद्र बन गया। पहले शो के बाद लोगों को पता चला कि यह आविष्कार कितना अच्छा है और सारी दुनिया बंधुओं की चलती हुर्इ तस्वीरें देखना चाहती थी। आस्ट्रेलिया (Australia) जाते हुए लिमिएर-बंधुओं के सहयोगियों ने मुंबई में रुककर, 7 जून 1896 को पहली बार भारत में फिल्मों का शो किया।

 इस शो के बाद पशिचम देशों की ही तरह भारत में भी यह नया आविष्कार लोगों को बहुत अच्छा लगा। कुछ सालों बाद पहली भारतीय फिल्म 19वीं शताब्दी के अंत से पहले बनायी गयी (अलग-अलग स्त्रोतों में पहली भारतीय फिल्म बनने का काल अलग-अलग लिखा जाता है। (1897 साल से 1900 तक)। भारतीय सिनेमा के जनक सखाराम भाटवाडेकर उर्फ सवे दादा  हैं जो महाराष्ट्रा में रहने वाले एक फोटोग्राफर थे. लिमिएर-बंधुओं के मशीन से मोहित होकर उन्होनें एक कैमरा खरीदा और आस-पास में जो भी दिलचस्प लगा उसे अपने कैमरे में कैद करने लगे । इस समय की भारतीय फिल्में पश्चिम से मिलती-जुलती थीं जो कि सिर्फ वास्तविकता दिखा रही थीं।

तथापि भारत और पशिचम के देशों में एक बड़ा अंतर है। यूरोप और इंग्लैंड में सिनेमा का सौ साल  1995 को मनाया जा रहा था। जिसका मतलब यह है कि पशिचम के विचार से पहली फिल्म  लिमिएर-बंधुओं की चलती हुई तस्वीर थी। भारत की सिथति बिल्कुल अलग है। राजा हरिश्चंद्र  के पहले की किसी भी फिल्म को, जिसे सखाराम भाटवाडेकर उर्फ सवे दादा ने या दादा  साहेब  फाल्के ने बनाया था, फिल्म नहीं मानी जाती है. सिनेमा का सौ साल राजा हरिश्चंद्र का सौ साल है  जिसमें पहली बार एक कहानी दिखाया गया. ऐसा अंतर क्यों?  इस सवाल का जवाब ढूँढ़ने के लिए  हमें सब से पहले फिल्म के तत्त्वों के बारे में सोचना चाहिए। अपने इतिहास के आरंभ में फिल्म, सभी  लोगों के लिए , तस्वीर उतारने का नया तरीका माना जाता था। चलती हुई तस्वीरें इसलिए  महत्त्वपूर्ण  मानी गयीं क्योंकि वह दर्शकों को फोटो से ज्यादा वास्तविक लगती थीं। ऐसी तस्वीरें जीवन के प्रलेख मानी जाती थीं, जो सालों बाद पुराने जमाने के बारे में अगली पीढियों को सब कुछ बोलेंगी। इसीलिए, लोग मानते थे कि फिल्मों का भविष्य सिर्फ दस्तावेजीकरण से संबंधित है। आज भी कभी न कभी कहा जाता है कि फिल्मों में दस्तावेजीकरण बहुत आवश्यक है और कुछ लोगों के लिए यह सिनेमा का आधार भी है। फिर भी यहाँ एक समस्या पैदा हो जाती  है, और हम यह सवाल पूछ सकते हैं कि फिल्मों में यथार्थ है क्या? और, ऐसी चीज संभव है? हर फिल्म अपने रचयिता की दृष्टि के आधार पर बनती है और निर्देशक के भावना को दिखाती है। सवे दादा को अपनी पहली फिल्म बनाने से पहले शायद ही किसी कहानी के बारे में सोचना था, या फिर जो कुश्ती दंगल उन्होंने दिखाया, वे दोनों वास्तविक और उनकी –दृष्टि की थीं, कोई यथार्थवाद नहीं। और, इसी तरह  सारी फिल्में  बनाई जाती हैं। वे दर्शकों को सिर्फ वह देखने की अनुमति देती हैं जो उनको दिखाई जाती हैं। लोगों की आँखें वास्तव में फिल्म की आँखें हैं, निर्देशक की आँखें हैं.

सिनेमा के इसी शुरूआती दौर में, एक दूसरा विचार पैदा हुआ, भारत और पशिचम दोनों जगहों पर, जो लिमिएर-बंधु द्वारा बनी फिल्मों से बिल्कुल अलग था। यूरोप के फ्रांस में रहते हुए जॉर्ज मेलियेस(Gorges Méliès s) सिनेमा का एक जादूगर बन गया और भारत में दादा साहब फाल्के ने वही काम किया जो मेलियेस ने फ्रांस में किया। दोनों के लिए फिल्म इसलिए महत्त्वपूर्ण थी कि इसकी मदद से वे अपने दर्शकों को सपने दिखा सकते थे। इसी विचार से यूरोप में भी कुछ लोगों के लिए लिमिएर-बंधू सिर्फ कैमरे का आविष्कारक था,  जबकि असल फिल्में मेलियेस के काम से संबंधित थीं। फिल्म की शुरूआत तब हुई जब इसमें कहानी आ गयी और इस तरह फिल्म का विकास बिलकुल नए रास्ते से होने लगा। सिनेमा के इन शुरूआती महारथिओं ने कभी नहीं सोचा था कि फिल्मों की यह योग्यता सब से महत्त्वपूर्ण हो जायेगी। फिल्में लोगों के लिए सबक भी है तो यथार्थ भी, लेकिन सब से पहले दर्शकों को सपनों की एक दुनिया में ले जाने वाली वह नानी है, जिसकी उम्र सौ साल या उससे ज्यादा हो गयी है, साथ ही साथ सपनों की दुनिया में ले जाने के उसके कौशल में भी इजाफा हुआ है। फिल्मों में कुछ चीजें ऐसी हो सकती हैं जो आसपास वास्तव में नहीं होती हैं और यह सब करतब दर्शकों के लिए कभी-कभी यर्थाथ से ज्यादा आकर्षक होता है। हमने देखा कि चलती हुर्इ तस्वीरें हमेशा कोई न कोई कहानी दिखाती हैं, तो शायद भारत में फिल्मों का इतिहास इसलिए राजा हरिश्चंद्र  के समय से शुरू होता है क्योंकि पहली बार, इसमें दिखाई गयी कहानी लोगों को अदभुत लगी। क्या यही कहानीपन महत्त्वपूर्ण फिल्मों की प्रवीणता है? क्या हमारे प्रश्न का उत्तर यहाँ है?

नहीं। दादा साहब फल्के ने राजा हरिश्चंद्र से पहले भी कुछ ऐसी फिल्में बनायीं थीं, जहाँ जादूगरी से भरी कतरबें थीं जिन्हें लोग वास्तविक दुनिया में नहीं देख पाते। उन सब में शायद कोई कहानी नहीं थी लेकिन अदभुत चीजें थीं इसलिए हम पूछ सकते हैं कि उनकी कोई और फिल्म पहली भारतीय फिल्म क्यों नहीं कही जाती? मुझे लगता है कि ऐसा इसलिए हुआ कि दर्शकों के लिए आज भी इन दो चीजों की अवश्यकता है, पहला कोई अदभुत कहानी, और इसके अतिरिक्त ऐसी दुनिया जो हमारे आसपास नहीं है। अगर भारत में फिल्मों का सौ साल, पहली फीचर फिल्म का सौ साल माना जा रहा है तो इसका मतलब यह भी हो सकता है कि भारतीयों के लिए फिल्म में जो बात सब से महत्त्वपूर्ण है वह यह कि इसमें सपना बुनने की शक्ति है.

यूरोप में कुछ लोगों के लिए सिनेमा का आधार पुराने जमाने के दर्शन से संबंधित है जो प्लेटो की गुफा की तरह है। प्लटो ने जीवन और दुनिया की वास्तविकता के बारे में लिखकर एक ऐसी सिथति का वर्णन किया जहाँ कुछ लोग गुफे में बैठे हैं। वे प्रवेश-द्वार से विमुख होकर बाहर नहीं दीवार को देखते हैं। उन लोगों के पीछे कुछ हो रहा है, वास्तविक दुनिया है, वास्तविक चीजें और वास्तविक जीवन भी। लेकिन लोग जो देख पाते हैं वह केवल इस यर्थाथ की छाया है जो दीवार पर दिखायी जाती है।  यर्थाथ लोगों के पीछे है। और, जिसे वे देख सकते हैं वह यर्थाथ से मिलता-जुलता होकर भी उससे अलग ही है। सिनेमा घर कुछ लोगों के लिए ऐसी ही गुफा है। चित्रपट पर कुछ न कुछ तो दिख जाता है जो सच्चाई जैसा है। लेकिन वास्तव में, दर्शक सिनेमा के परदे पर वैसे ही देख सकते हैं जैसे गुफा में लोग दीवार पर देख सकते हैं, जो कि सच्चाई से बहुत दुर है। फिर भी यूरोप में फिल्म के दर्शकों के लिए यह सब से महत्त्वपूर्ण है कि फिल्म जिंदगी से मिलती-जुलती चीज है। जो फिल्म सपनों की तरह कहानी दिखाती है बहुत लोगों के विचार में वह कोई कला नहीं है। फिल्मों के इतिहास की शुरूआत से ही यह सब से बड़ी समस्या थी। दो तरह के विचारों के बीच टकराहट थी। आज भी उन दोनों विचारों में से एक ऐसा है जो यह मानता है कि फिल्मों को सिर्फ यर्थाथ दिखाना चाहिए और दुसरा यह कि फिल्मों में सब से अच्छी वह दूसरी दुनिया है जो वास्तविक दुनिया से बहुत अलग है।
प्लटो का विचार लेकर हम फिल्मों के बारे में यह कह सकते हैं कि वह दुनिया जो चित्रपट दिखाई जाती है सही नहीं है और वास्तव से कुछ बेकार भी है क्योंकि वास्तव से अच्छा कुछ नहीं हो सकता। भारतीय फिल्मों की सिथति यूरोप से अलग है क्योंकि इसका दर्शनिक आधार भी कुछ और है। भारतीय सिनेमा का दर्शनिक आधार जो कि प्लेटो के गुफे से मिलता-जुलता भी है और अलग भी है। हम कह सकते हैं कि अगर यह सब कुछ जो आसपास है सिर्फ माया है और फिल्मों का यर्थाथ, दुनिया से इतना अलग होता है तो शायद सिनेमा में रचा गया यर्थाथ ही मूल यर्थाथ है। शायद, सिनेमा लोगों के लिए इतना मजेदार इसलिए है क्योंकि जो वे फिल्मों में देखते हैं वह यथार्थ है, माया नहीं। यह तो सिर्फ रूपक है लेकिन इसका एक छोटा दार्शनिक आधार तो हो ही सकता है। भारत का सिनेमा जब सपनों का कारखाना बन गया तब इसे सिनेमा माना गया।

जैसे पहले बताया सब फिल्मों की कोई कहानी होती है और कोई फिल्म शुद्ध यर्थाथ दिखा नहीं सकती। अगर सारी दुनिया माया है तो वास्तविकता ढूंढने के लिए कुछ ऐसा चाहिए था जो लोगों के आसपास से बिलकुल अलग था। इसलिए फिल्मों का इतिहास फाल्के के फिल्म से शुरू हुआ। क्योंकि, सच्चा यर्थाथ सिर्फ कुछ ऐसा ही हो सकता है जिसे दर्शकों के आसपास से विरोध हो। मुझे आशा है कि इस तरह के फिल्मों का अंत कभी नहीं आएगा क्योंकि मनोरंजन और चमत्कार आज भी सिनेमा में बहुत महत्त्वपूर्ण हैं।

 तत्याना षुर्लेई एक Indologist और फिल्म-आलोचक हैं। फिलहाल पोलैंड के शहर क्राकोव सिथत Jagiellonian University में The Courtesan Figure in the Iconography on Indian Popular Cinema:Tradition, Stereotype, Manipulation.    नामक विषय पर पीएचडी के लिए शोधरत हैं।

आभार: प्रकाश के.रे , क्योंकि यह लेख उनके द्वारा शीघ्र सम्पादित स्मारिका/पुस्तक हिदुस्तानी सिनेमा के सौ बरस से उधार माँगा गया है और पत्रिका नेशन फर्स्ट ,जहाँ यह प्रकाशित  हो चुका है .

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