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‘हिंदी मीडियम’ यानी अपने स्वनिर्मित इमेज के चमकीले नक़ल: तत्याना षुर्लेई

साकेत चौधरी ने अपनी इस नयी फ़िल्म में एस्पायरिंग मिडिल क्लास को दिखाया है. यह तबका भारतीय सिनेमा में शायद सब से कम दिखने वाला तबका है. “हिंदी मीडियम” (2017) एक नवधनाढ्य दंपति की कहानी है, ऐसे चरित्र ज़्यादातर सिर्फ झलक दिखाने के लिए हिंदी फिल्मों में आते थे (जैसे “कल हो ना हो” में रोहित पटेल का बाप था) और अपने गंवारपन से किसी भी तरह के मनोरंजन/फूहड़पन के बहाने बनकर रह जाते थे. चौधरी भी इसी तरीके से अपने चरित्र को सामने लाता है. फ़िल्म का पहला हिस्सा कहानी से ज़्यादा, मनोरंचक रेखाचित्रों का एक संग्रह लगता है. फिर भी, फ़िल्म के ये हास्यप्रद दृश्य ज़्यादा थकाऊ नहीं हैं और इस विशवास से लैश दर्शकों के लिए कि उन्हें पता है कि फ़िल्म किसके बारे में होगी, अचानक से दो ट्विस्टेड प्लाट ऐसे आते हैं जो आश्चर्यचकित कर देते हैं.  #लेखिका 

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“हिंदी मीडियम”: यानी हम सब नक़ल हैं!

By तत्याना षुर्लेई

हिंदुस्तान में पॉपुलर रही फिल्मों के लिए पश्चिम में होने वाली सबसे बड़ी आलोचना यही है कि ये वास्तविकताओं से दूर होती हैं. साथ ही साथ ‘भारतीय विषयों’ पर पश्चिम में बनने वाली फिल्में या फिर विदेशी बाजारों के लिए भारत में बनी फिल्में आम भारतीय लोगों को पसंद नहीं आती है, क्योंकि उनमें सिर्फ गरीबी और एक तरह भिन्नता (otherness) का चित्रण होता है. हिन्दुस्तान के बारें ऐसे विषय पश्चिमी फिल्म जगत में बहुत बिकाऊ हैं.

वहीं दूसरी तरफ, जो लोग गरीबी और अमीरी के बीच में पड़े हुए हैं, उन पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया जाता है. कभी-कभी कोई न कोई अपवाद है, ऐसे अपवाद विकास बह्ल की “क्वीन” की नायिका, रानी मेहरा है जो अपरिष्कृत ज़रूर है लेकिन असाधारण भी. एस्पायरिंग मिडिल क्लास के लिए सिनेमा की कहानियों में ही सिर्फ जगह का अभाव नहीं है, बल्कि शायद भारतीय समाज का भी यही यथार्थ है. यह समाज जहाँ आभिजात्य लोगों के समूह के प्रति बहुत ज़्यादा चापलूस और भक्ति की मुद्रा दिखता है, वहीं दूसरी ओर सब से गरीब और हाशिये के लोगों की रक्षा के लिए नियम-कानून बनाने का ढोंग भी करता है.

फ़िल्म की कहानी में यह स्पष्ट है कि मुख्य चरित्र पैसे वाला तो है लेकिन संस्कृति-शून्य (uncultured) अनाड़ी भी है. उसकी स्थिति समाज के एक बाहरी व्यक्ति के रूप में है और कभी-कभी वह गरीब बस्तियों में रहने वालों से खुद को ज़्यादा मुश्किल में पाता है. क्योंकि, उसकी रक्षा के लिए यहाँ कोई स्पष्ट विधान नहीं है और समाज की भंगिमा भी आदरपूर्ण नहीं है. ऐसे आदमी अपने पैसों की मदद से वहाँ तक तो पहुँच सकता है जहाँ दरिद्र लोग कभी नहीं जा पायेंगे, लेकिन इसकी भी अपनी विडम्बनायें हैं. यह फिल्म ऐसी विडम्बनाओं को उभारने का काम करती है.

यद्यपि यह भी सच है कि ऐसे अनाड़ी लोग जब अभिजात्य लोगों (elites) के स्तर पर पहुंचेंगे, तो वे सिर्फ एक धोखेबाज़ ही बने रहेंगे. उन्हें इस बात का ध्यान हमेशा रखना पड़ेगा कि आसपास के लोगों को कभी पता न चल सके कि उसकी जडें कहाँ हैं. यही कारण है कि आज भी भारत में कई काम ऐसे होते हैं जिनको करना अपमानजनक माना जाता है, इसीलिए यहाँ हर किसी के लिए पहले से ही भविष्य (नियति) तय है और समाज में उसका स्थान (स्टेटस) भी. ऐसे में अभिजात्य वाली ऊँचाई चढ़ना बहुत मुश्किल काम है.

फ़िल्म का नायक, राज (इरफ़ान खान) कपड़ों का एक अमीर दुकानदार है. वह किसी न रूप में अपनी दुकान के कपड़ों से मिलता-जुलता है. उसकी दुकान में बड़े-बड़े मॉडल्स, स्टार और डिजाईनर के नक़ल मिलते हैं. ये नक़ल अपने मूल से ज़्यादा चमकीले, रंग-बिरंगे और भड़कीले लगते हैं, फिर भी ये नक़ल वाले कपड़े पुरानी दिल्ली में रहनेवाली औरतों को अच्छे लगते हैं.

अपने ग्राहकों की तरह, जो रंगीन पत्रिकाओं में दर्ज कपड़ों के नकली और सस्ते संस्करण खरीदती हैं, फ़िल्म का नायक भी अपनी ज़िन्दगी से बहुत खुश है और उसको किसी और चीज की ज़रुरत नहीं है. लेकिन, उसकी पत्नी, मीता (सबा कमर) राज से कुछ अलग है. मीता अभिजात्य, सोफिस्टिकेटेड समाज का हिस्सा बनना चाहती है, वह मानती है कि बड़े लोगों के संपर्क से उसकी बेटी का भविष्य अच्छा होगा.

इन सबमें सबसे महत्त्वपूर्ण बात बच्ची को एक अच्छे स्कूल में भेजना है. इसलिए वह निराश माँ अपने पति को चांदनी चौक से वसंत विहार शिफ्ट होने और वहाँ रहनेवाले लोगों से दोस्ती करने के लिए बोलती है, क्योंकि यह कंपनी उसे अपनी  बेटी के लिए ज़्यादा उचित लगती  है.

राज और मीता वसंत विहार शिफ्ट हो जाते हैं, लेकिन यहीं पता चलता है कि सुन्दर घर में रहने मात्र से आप अपनी ‘कमजोरियों’ को नहीं छुपा सकते हैं. अंग्रेजी बोलनेवाले सोसाइटी को भी समझ में आ जाता है कि राज और मीता उनसे कुछ अलग हैं और ये हमारी नक़ल करने की कोशिश में हैं.  जाहिर है कि सोफिस्टिकेटेड समाज  के प्रतिष्ठित स्कूल में बच्ची को प्रवेश नहीं मिलता है. तब दोनों, नायक और नायिका गरीबों के बच्चों के लिए मिलने वाले आरक्षण की मदद से अपनी बेटी को अच्छे स्कूल में भेजने की कोशिश करते हैं. इसके लिए वे फिर वसंत विहार से दूसरी जगह शिफ्ट करते हैं और एक बहुत गरीब इलाके में रहने लगते हैं और इस तरह यहाँ फिर से दूसरे लोगों की नक़ल बन जाते हैं, लेकिन इस बार गरीबों की.

यह बहुत स्पष्ट है कि दूसरा नाटक पहले से ज़्यादा अच्छा है, गरीब इलाके में रहनेवाले लोग राज और मीता को वसंत विहार वालों की तुलना में आसानी से अपनाते हैं. इसके अतिरिक्त, इस बार लगता है कि दोनों, नायक और नायिका, आसपास के लोगों को थोड़ा कम धोखा देते हैं. पहले वाले नाटक में राज और मीता का चमकीला लालित्य (नकली भव्यता) और सामाजिक मेल-जोल के समय उनके द्वारा की गयी गलतियाँ बहुत ज्यादा ही दिखाई देती थीं, लेकिन दूसरे नाटक के समय गरीबों के साथ रहना उनके लिए ज़्यादा आसान लगता है.

ऐसा लगता है कि इस बार नायक और नायिका ऐसी जगह  रहते हैं जो गरीब लोगों की जगह होने के बावजूद उनके पुराने घर से मिलते-जुलते हैं, जहाँ उनके लिए एडजस्ट करना ज्यादा आसान है, लेकिन ऐसा नहीं है. इस नए इलाके में भी राज और मीता गरीब लोगों को धोखा देते हैं. अंतर बस यह है कि पिछली बार आसपास के लोग उनको नीचली नजर से देखते थे और इस बार, गरीबों लोगों से इनको आदर मिलता है. इससे उनका आत्मविश्वास बढ़ जाता है और वे खुद को आदरणीय मानने लगते हैं. इस बार उन्हें अपने किये की चिंता करने की जरुरत नहीं है, वे यहाँ कम गलतियां करते हैं. यहाँ आकर धीरे-धीरे उनका व्यवहार बदल जाता है. उनके कपड़ों का स्टाइल, जिसे पहले-पहल उन्हें सीखना पड़ा, अब नेचुरल लगता है और अमीर इलाके में फिर से वापसी  होने के बाद भी उनका आत्मविश्वास गायब नहीं होता है. प्रतिष्ठित (prestigious) स्कूल के बच्चों के अमीर अभिवावकों के सामने राज को अब अपनी कमज़ोर अंग्रेजी का इस्तेमाल करने से भी बिलकुल डर नहीं है.

भाषा का मामला फ़िल्म में बहुत महत्त्वपूर्ण है. राज सही ही बोलता है कि अगर फ्रेंच या जर्मन को अच्छी अंग्रेजी नहीं आती है तो भी भारतीय लोगों का उनके प्रति आदर कम नहीं होता है. लेकिन खुद भारतीय ही दूसरे भारतीय को अंग्रेजी जानने और न जानने के आधार पर उसकी सामाजिक हैसियत तय कर देते हैं. फिर भी, “हिंदी मीडियम” “इंग्लिश विंग्लिश” (गौरी शिंदे, २०१२) जैसी फ़िल्म नहीं है, यह फिल्म अंग्रेजी के प्रति भारतीय लोगों के अजीब रवैये के साथ-साथ धोखा देने की ज़रुरत और जुगाड़ की प्रवृति के बारे में है.

फ़िल्म का शुरूआती हिस्सा एस्पायरिंग मिडिल क्लास के बहिष्कार (exclusion) की कहानी लगती है, लेकिन बाद में यह गरीबों की झूठी रक्षा और उनके अधिकारों के हनन के बारे में एक नैतिक आख्यान बन जाती है. यह कहना मुश्किल है कि अचानक से आने वाले इस परिवर्तन के कारण क्या हैं? शायद फिल्मवालों को अचानक यह लगा कि वे गरीब लोगों को मिलने वाली सुख-सुविधाओं को नहीं बल्कि मिडिल क्लास की चीड़-फाड़ (operation) दिखाना चाहते हैं. हालाँकि यह परिवर्तन फ़िल्म की कमी बिलकुल नहीं है, उल्टे, स्कूल में राज के फाइनल स्पीच के बाद अमीर-अभिजात्य श्रोताओं का व्यवहार (स्टैंडिंग ओवेशन की कमी)  कहानी का एक मानीखेज केंद्र बन जाता है.

इसने हर दर्शक को यह समझाया कि हम सब लोगों को अपने-अपने जीवन में कुछ छोटे-छोटे नाटक, नक़ल करने हैं, आसपास के लोगों के लिए अपने व्यक्तित्व (image) को खुद ही गढ़ना है. हम सिर्फ अपने घर या परिवार के पास ही ‘सच्चा हम’ हो सकते हैं क्योंकि सिर्फ हमारे अपने लोग ही इस नाटक की सच्चाई जानते हैं या वे खुद भी इस नाटक के हिस्से  हैं.

इस तरह का एप्रोच राज द्वारा नागिन के बारे में एक टीवी सीरियल देखने वाले सीन में स्पष्ट है. यह सीन स्पष्टतः इरफ़ान खान की बाहियात फ़िल्म, और इरफ़ान खान जैसे अभिनेताओं के लिए शर्मनाक भी, “हिस्स्स” (जेनिफर लिंच, २०१०) से संबंधित है. हमें इरफ़ान खान की सिर्फ अच्छी फिल्में देखने की आदत है इसलिए हम यह मानना ही नहीं चाहते हैं कि उसने “हिस्स्स” जैसी फ़िल्म में भी एक्टिंग किया है. वास्तव में हम सभी कभी न कभी अपने स्वनिर्मित इमेज के चमकीले नक़ल होते हैं.

407990_4198265689669_2114788963_nतत्याना षुर्लेई पोलैंड की रहने वाली हैं, एक इंडोलॉजिस्ट (भारतीय उपमहाद्वीपीय भाषा और संस्कृति की जानकार)  और फिल्म आलोचक हैं. हिंदी की मशहूर पत्रिकाओं और ब्लॉग्स के लिए लिखती रही हैं. पोलैंड के शहर क्राकोव स्थित जेगिलोनियन विश्वविद्यालय से “द कोर्टसन फिगर इन इंडियन पॉपुलर सिनेमा: ‘ट्रेडिशन, स्टीरियोटाइप, मैनिपुलेशन” नामक विषय पर पीएचडी हैं. वर्तमान में मनिपाल विश्वविद्यालय, कर्नाटक के यूरोपीय अध्ययन संस्थान में पढ़ाती हैं. 

‘रंगून’ वंडरलैंड से वंडरलैंड की यात्रा है: तत्याना षुर्लेई

विशाल भारद्वाज की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘रंगून’ दर्शकों के समक्ष आ चुकी है. बहुप्रतीक्षित इसलिए भी कि भारद्वाज हिंदी सिनेमा के सबसे प्रतिभाशाली निर्देशक हैं और एक कला-रूप के साथ-साथ लोकप्रियता के पैमाने पर भी उनका स्ट्राइक रेट अन्य निर्देशकों के बनिस्पत अधिक रहा है. यह समीक्षा उनके लिए है जो फिल्म देख चुके हैं, उनके लिए नहीं जो इसे पढ़कर फिल्म देखने जाएँ या न जाएँ का फैसला करें. विशाल की फिल्म लोगों द्वारा देखे जाने और उस पर गंभीर प्रतिक्रिया के लिए लोगों को उकसाती हैं. विशाल दर्शकों के साथ-साथ फिल्म आलोचकों के भी प्रिय फिल्मकार रहे हैं. फिल्म आलोचक तत्याना षुर्लेई की यह तात्कालिक-प्रतिक्रया इसी की एक कड़ी है. #तिरछीस्पेल्लिंग

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‘रंगून’: वंडरलैंड से वंडरलैंड की यात्रा 

By  तत्याना षुर्लेई

विशाल भारद्वाज की नयी फ़िल्म ‘रंगून’ युद्ध के बारे में है. शुरुआत में दर्शकों को लड़ाई के दो रास्तों के बारे में बताया जाता है, एक महात्मा गाँधी का अहिंसा वाला और दूसरा सुभाष चन्द्र का हिंसा वाला. ऐसा लगता है जैसे फ़िल्म की कहानी कुछ दार्शनिक होने वाली है और इसका आधार ‘युद्ध की वैधता’ होगी. लेकिन फ़िल्म के दुसरे भाग में पता चलता है कि यह देशभक्ति-श्रृंखला वाली फ़िल्म है, जिसमें इतनी सारी चीज़ें डाल दी गई हैं कि नायकों के चरित्र और उनके चारित्रिक बदलाव को दिखाने के लिए ज़्यादा स्थान बचा ही नहीं है. फलस्वरूप फ़िल्म न तो देशभक्ति और गद्दारी के बारे में कोई दिलचस्प कहानी कह पाती है और न ही एक कठिन और नामुमकिन प्यार के बारे में. फिर भी,‘रंगून’ की बुनियाद में एक खुबसूरत आईडिया दिखाई देता है.

फ़िल्म की नायिका, मिस जूलिया (कंगना रानौत) ऐलिस की तरह एक वंडरलैंड जानेवाली है, जहाँ आम दुनिया के नियम बिलकुल नहीं चलते हैं. जंगल के कैम्प में रहनेवाले सिपाहियों को दिलासा देने और उनका मनोरंजन करने के लिए वह सुरक्षित और आरामदेह (कम्फर्टेबल) बॉम्बे से बर्मा जा रही है. यद्यपि लेविस कैरोल की ऐलिस और मिस जूलिया में यही अंतर है कि विशाल भारद्वाज की नायिका वंडरलैंड (बर्मा) जाने से पहले भी एक दुसरे तरह की वंडरलैंड (बॉम्बे) की निवासी है. बम्बइया सपनों का कारखाना वास्तविकता से बहुत अलग है, लेकिन यह अलगाव ही वह कारण है जिसके चलते मिस जूलिया और वहाँ काम करने वाले अन्य लोगों के लिए यह वंडरलैंड सुरक्षित है. फ़िल्म वाले फ़िल्म के सब से अच्छे गाने, ‘जूलिया’ के सीक्वेंस में दिखाते हैं. उनका सिर्फ एक प्यार है, मिस जूलिया और चिंता भी सिर्फ एक है कि मिस जूलिया का नेक्स्ट शॉट और अच्छा हो सकता था. इस दुनिया में बुराइयाँ तो ज़रूर होती हैं लेकिन सब को पता है कि अंत में मास्क पहननेवाली फीयरलेस हीरोइन आ जाएगी और सब को बचा लेगी, पर नए वंडरलैंड में ऐसा नहीं होगा.

विशाल भारद्वाज उन दो अजीब दुनियाओं पर खुद को ज़्यादा केन्द्रित नहीं कर पाया है. यह बात अजीब इसलिए भी है कि ‘रंगून’ की कहानी में यह अच्छी तरह दिखाई देता है कि जूलिया के फ़िल्म या फिल्म-शूटिंग वाले सारे दृश्य क़ुरबानी और देशभक्ति वाले प्लॉट से ज़्यादा अच्छे हैं, ऐसा लगता है जैसे भारद्वाज खुद ही असमंजस में है कि उसको अपनी कहानी से क्या-क्या अपेक्षाएं हैं! फ़िल्म का दूसरा भाग पहले से कमज़ोर है. दुसरे भाग में ट्रेजेडी तो है लेकिन इसके बावजूद भी ये सारी मौतें और डिस्टर्बिंग सीन्स वास्तव में कुछ ख़ास डिस्टर्बिंग नहीं हैं, और ‘तलवार’ वाले प्लॉट में कोई थ्रिल ही नहीं है. सच्चाई यह है कि इस तलवार वाली कहानी में कोई बड़ा सरप्राइज आता ही नहीं है.

‘जूलिया’ गाने के अलावा फ़िल्म में और भी अच्छे गाने हैं जिनमें से खास तौर पर ‘टिप्पा’ और इसका ट्रेन सीक्वेंस बहुत सुन्दर है. इस गाने में लार्स वॉन ट्रायर की ‘डांसर इन द डार्क’ फ़िल्म का बड़ा प्रभाव है लेकिन कहा जाता है कि लार्स वॉन ट्रायर खुद ‘दिल से’ (1998) के ‘चल छैंया छैंया’ गाने के दृश्य से प्रेरित था. जब तक लोग कुछ नया और आर्टिस्टिक वैल्यू निकालते रहेंगे, तब तक प्रेरणा नक़ल नहीं कहलायेगा. और, ‘टिप्पा’ गाना इसी तरह का है. सुंदर दृश्यों के अलावा भी इसका एक अलग महत्व है, दर्शकों को अच्छी तरह से दो वंडरलैंड्स दिखाई देते हैं. बर्मा-यात्रा के पर्यटकीय अंदाज की सुंदरता और चाक-चौबंद सुरक्षा अचानक से खतरे में तब्दील हो जाते हैं. युद्ध की दुनिया में स्वागत आफत की दुनिया में फंसने जैसा है; बर्मा आए हुए लोगों पर लड़ाकू विमानों का हमला शुरू हो जाता है. इस दृश्य के बाद सभी को पता चलता है कि वे अब बिलकुल अलग दुनिया में आ गए हैं. एक ऐसी दुनिया, जहाँ कोई सुपर, फीयरलेस हीरोइन किसी को बचा नहीं सकती है. फिर भी, कुछ समय बाद अपने प्रेमी, नवाब मलिक (शाहिद कपूर) की जान बचाने वाली मिस जूलिया के फ़िल्मी स्टंट वाले सीन यहाँ फिर से बहुत अच्छा और ताजा लगने लगता है और यह फ़िल्म के दुसरे भाग का सब से अच्छा सीक्वेंस है, जिसमें दो वंडरलैंड्स मिल जाते हैं. सपनों की दुनिया में रहनेवाली जूलिया को इसके बावजूद भी हारना था जबकि वह मिशन में शुरू में ही सफल हो गयी थी. मिस जूलिया और क्रूर मेजर हार्डिंग (रिचर्ड मकेब) ने एक क्षण के लिए एक-दुसरे की दुनिया की अदलाबदली कर लेते हैं. मिस जूलिया सुपर-हीरोइन के कपड़े पहनकर नवाब को बचाने की कोशिश करती है, और मेजर हार्डिंग एक्टिंग का इस्तेमाल कर उसको धोखा देता है क्योंकि युद्ध युद्ध होता है, युद्ध के बारे में एक हैप्पी एंड वाली फ़िल्म नहीं. बहरहाल फ़िल्म इंडस्ट्री के बारे में एक फ़िल्म बनाकर भी विशाल भारद्वाज इस टॉपिक का पूरा इस्तेमाल नहीं कर पाया है, हालाँकि उसकी कहानी में यह स्पष्ट है कि फिल्मवाले फ़िल्मी तत्व उसको सब से अच्छे लगते हैं.

जूलिया, नवाब और जापानी सिपाही की जंगल-यात्रा भी फ़िल्म का एक अच्छा हिस्सा है, जिसमें न सिर्फ जूलिया और नवाब का प्यार होता है बल्कि दर्शकों को भी पता चलता है कि युद्ध कितना क्रूर और अमानवीय होता है, साथ ही साथ दोस्त और दुश्मन का विभाजन भी आसान नहीं होता है. लोग अपनी मर्ज़ी से सिपाही नहीं बनते हैं, वे देशभक्त होने के बावजूद भी अपने परिवारों के साथ रहना चाहते हैं. अफ़सोस की बात यह है कि कैम्प में आने के बाद ये सारी दिलचस्प बातें कहीं गायब हो जाती हैं और फ़िल्म में बिलकुल नयी कहानी आ जाती है जिससे भारद्वाज खुद थोड़ा-सा परेशान लगता है. देशभक्ति वाला भाग फ़िल्म का सब से कमज़ोर भाग है और इसमें कई ऐसे तत्व, टुकड़े हैं जो विशाल भारद्वाज के स्टैण्डर्ड से बहुत नीचे के हैं. उदहारण के लिए नवाब के राष्ट्रगीत गाने वाला दृश्य इसी तरह के एक बैड-टेस्ट का उदाहरण है, ऐसा लगता है जैसे यह विशाल भारद्वाज ने नहीं किसी और ने बनाया है. यहीं पुल वाला अंतिम सीक्वेंस भी अच्छा नहीं है. फ़िल्म के तीनों नायक-नायिका इस सीक्वेंस में कागज़ के कठपुतली लगते हैं, इसीलिए इन्हें देखते समय दया नहीं, बल्कि शर्मिंदगी का अहसास होता है.

जिनकी फ़िल्म में बिलकुल ही ज़रुरत नहीं थी, उन सारी चीजों को फिल्म में डालने के कारण कहानी में दिलचस्प और ताजे विचारों के लिए जगह ही नहीं बची थी और यह अफ़सोस की बात भी है क्योंकि ‘रंगून’ में बहुत अच्छे और दिलचस्प चरित्र हैं. मिस जूलिया दो आदमियों के रिश्ते में है जिनमें से एक, रुसी बिलीमोरिया (सैफ अली खान), बॉम्बे वाले, सुरक्षित वंडरलैंड का हिस्सा है, और दूसरा, नवाब मलिक नए और खतरनाक वंडरलैंड का. उनमें से एक का चुनाव करना एक खास ज़िन्दगी का चुनाव करना भी होता, इसलिए मिस जूलिया के लिए यह चयन इतना मुश्किल लगता है.

दुर्भाग्य से मिस जूलिया के चरित्र को विकसित करवा पाने की जगह फ़िल्म में बिलकुल ही नहीं थी, इसलिए वह फिल्म के अंत में वैसे ही भोली लगती है जैसे फिल्म के शुरू में लगती थी. अगर स्क्रिप्ट थोड़ा-सा बेहतर होता तो कंगना रानौत का प्रदर्शन और भी अच्छा होता. यहीं पर सवाल उठता है कि अभिनय-प्रतिभा को दिखाने के लिए अगर स्क्रिप्ट में कोई जगह नहीं है, तो फ़िल्म में अच्छे अभिनेता-अभिनेत्रियों की फिर क्या ही ज़रुरत है? शाहिद कपूर और सैफ अली खान को एक्टिंग के लिए कंगना रानौत से थोड़ा-सा ज़्यादा मौका मिला है, साथ ही यहीं पर एक समस्या भी दिखाई देती है. वे तीनों परदे पर बस आते हैं और बातचीत करते हैं, चरित्र के निर्माण और विकास में योगदान देने वाले स्क्रिप्ट और अभिनय के अभाव में दर्शकों को उन्हें अच्छी तरह पहचानने और समझने का मौका नहीं मिलता है. यही कारण है कि फ़िल्म देखनेवालों के लिए यह कोई बात नहीं है कि वे जीते हैं या मर जाते हैं, क्योंकि उनसे दर्शकों का कोई गहरा संबंध स्थापित ही नहीं हो पाता है.

तीनों मुख्य पात्रों के अतिरिक्त एक बहुत दिलचस्प पात्र मेजर हार्डिंग भी है. वह बिलकुल ताजातरीन और नया खलनायक है, जिसको भारतीय संस्कृति से प्यार है और जो साथ ही साथ भारतीय लोगों के प्रति नस्लवादी व्यवहार भी करता है. लेकिन यहाँ भी उसके चरित्र को दिखाने के लिए फिर से जगह नहीं है. बस अचानक से वह एक क्रूर इंग्लिशमैन बन जाता है, जो सिर्फ यह कहता है कि मैं गोरा हूँ इसलिए हमेशा सही हूँ, या फिर भारतीय लोगों को अपमानित करता है. युद्ध का विषय विशाल भारद्वाज के लिए सहज नहीं था इसलिए जो तत्व देश की आज़ादी की लड़ाई से सम्बंधित हैं, वे सब से कमज़ोर हैं. अगर युद्ध सिर्फ एक पृष्ठभूमि (बैकग्राउंड) होती या भारद्वाज इसे फ़िल्म इंडस्ट्री के परिप्रेक्ष्य में देखता (जो बार-बार कई एक दृश्यों में बहुत अच्छी तरह दिखाता भी है), तो ‘रंगून’ सचमुच बहुत अच्छी हो सकती थी, और उसके एक्टर्स भी यह साबित कर सकते थे कि वे सचमुच में कितने प्रतिभाशाली लोग हैं.

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तत्याना षुर्लेई पोलैंड की रहने वाली हैं, एक इंडोलॉजिस्ट (भारतीय उपमहाद्वीपीय भाषा और संस्कृति की जानकार)  और फिल्म आलोचक हैं. हिंदी की मशहूर पत्रिकाओं और ब्लॉग्स के लिए लिखती रही हैं. पोलैंड के शहर क्राकोव स्थित जेगिलोनियन विश्वविद्यालय से द कोर्टसन फिगर इन इंडियन पॉपुलर सिनेमा: ट्रेडिशन, स्टीरियोटाइप, मैनिपुलेशननामक विषय पर पीएचडी हैं. वर्तमान में मनिपाल विश्वविद्यालय, कर्नाटक के यूरोपीय अध्ययन संस्थान में पढ़ाती हैं.

‘रईस’ की तुलना में ‘काबिल’ अच्छी फिल्म है: तत्याना षुर्लेई

 

“रईस” की तुलना में मैं “काबिल” की ओर हूँ. यह फ़िल्म “रईस” से अच्छी इसलिए है कि “काबिल” यह दिखावा नहीं करता है कि वह कुछ नया और आर्टिस्टिक दिखानेवाला है. दोनों फिल्मों को देखकर फिर से यह दोहराना पड़ेगा कि अगर किसी को बारीक सिनेमा बनाना नहीं आता है तो उसे मुख्यधारा में ही रहना चाहिए. मुख्यधारा और मनोरंजन कोई कमतर जगह नहीं है और ऐसी फिल्मों की बड़ी ज़रुरत है. “काबिल” में कुछ न कुछ कमियां तो हैं लेकिन “रईस” से अच्छी इसलिए लगती है कि यह अपने दर्शकों के प्रति फेयर और फ्रैंक है. इसका ट्रेलर भी किसी को धोखा नहीं देता है. सब को पता है कि यह मनोरंजन के लिए बनी एक व्यावसायिक फ़िल्म है और जिसकी कहानी उम्मीद के मुताबिक ही है. #लेखक

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काबिल  पोस्टर

काबिल: मनोरंजन कोई बुरी बात नहीं है

By तत्याना षुर्लेई

फ़िल्म की कहानी रोमांटिक और मासूम प्यार से शुरू होती है, फिर इसमें दारुण दुःख पहुंचाने वाली क्रूरता, हिंसा और अन्याय आते हैं, और अंततः राहत देनेवाला बदला. फ़िल्म का नायक, रोहन भटनागर (ऋतिक रोशन) एक अँधा जवान आदमी है जो एक सुन्दर लड़की, सुप्रिया (यमी गौतम) से प्यार और शादी करता है. सिनेमा में दिखने वाले विकलांग लोगों में अक्सर किसी एक कमी की जगह उन्हें कई असाधारण क्षमताएं दी जाती हैं (न सिर्फ भारतीय फिल्मों में – ऐसा स्टीरियोटाइप दुनिया की बहुत सारी फिल्मों में प्रभुत्व रखता है). रोहन भी इसी तरह का आदमी है – उसको दिखाई नहीं देता है लेकिन इस विकलांगता के प्रतिउत्तर में वह दुसरे लोगों की आवाज़ों को अच्छी तरह नक़ल करता है. रोहन कार्टून का डबिंग करता है और इस काम में इतना प्रतिभावान है कि अकेले ही फ़िल्म के सारे नायकों की अलग-अलग आवाजें देता है. उसकी यह योग्यता बाद में बदला लेने वाले दृश्यों में उनकी बहुत मदद करेगा.

आसपास में रहनेवाले दो अपराधी, अमित (रोहित रॉय) और उसका दोस्त माधव (रोनित रॉय) बार-बार रोहन और सुप्रिया की ख़ुशी के आड़े आते हैं. इनके लिए इस जोड़ी की विकलांगता मजाक उड़ानेवाली बात है. एक दिन वे छेड़-छाड़ से आगे चले जाते हैं और सुप्रिया का बलात्कार करते हैं. अमित का भाई शहर का बड़ा आदमी है इसलिए वह आसानी से भ्रष्ट पुलिस को अपने पक्ष में कर लेता है. भ्रष्ट पुलिस हिंदी सिनेमा का सब से पसंदीदा टॉपिक है जिससे फिल्मवाले अभी तक थके नहीं हैं. लेकिन विषयों का दुहराव और दर्शकों के उम्मीदों पर खरा उतरने वाला प्लॉट मुख्यधारा की सिनेमा के सबसे जरुरी हिस्से हैं.

अपनी पत्नी की मौत के बाद, यह देखकर कि पुलिस कुछ नहीं करेगा, रोहन खुद बदला लेता है और भ्रष्ट पुलिस इंस्पेक्टर से जीतता है. यह प्लॉट बहुत टिपिकल और आसान है – ऐसी फिल्में तो बार-बार बनती हैं, फिर भी हमेशा की तरह वे अपने दर्शकों को अंत में बड़ी राहत देती हैं. “काबिल” में नयी बात यह है कि फ़िल्म की कहानी एक ही तरह के दो दृश्यों से अच्छी तरह खेलती है. उदहारण के लिए रोहन की पत्नी के बलात्कार के केस में इंस्पेक्टर बार-बार बोलता है कि सबूत के बिना वह कुछ नहीं कर सकता है, लेकिन बाद में, बदले वाले दृश्य में, फ़िल्म का नायक भी पुलिस से अपने क्राइम के सारे सबूत छुपाता है. सुप्रिया ने फँसी लगा ली तो रोहन ने माधव को भी फांसी पर लटकाया. सुप्रिया का बलात्कार करने से पहले उसको बिस्तर से बांधा और उसके मुँह में कपड़ा लगाया गया था ताकि वह कुछ बोल न सके, तो ऐसी ही स्थिति लेटाकर अमित की भी हत्या होती है. इस तरह के अलग-अलग आइने में प्रतिबिंबित होने वाले दृश्यों की तरह सारी उल्टी परछाईयाँ फ़िल्म में दिखाई गईं हैं.

रुसी लेखक, अन्तोन चेखव ने एक बार लिखा की नाटक के शुरू में दर्शकों को अगर दीवार में लटकी बन्दुक दिखाई देती है तो इसका मतलब यह है कि कहानी में इसका इस्तेमाल जरुरी है. “काबिल” में इस नियम का प्रयोग बहुत हुआ है. लगभग हर छोटे दृश्य, जैसे साईकिल वाला, या रोहन का पत्नी को घड़ी गिफ्ट करना इत्यादि. पहले तो इन सब का कोई बड़ा मतलब नहीं दिखता है, लेकिन बाद में ये सारे दृश्य वापस आते हैं और नायक अपने बदले वाले दृश्य में इन सब का कोई न कोई प्रयोग करता है.

सबसे अच्छी बात यह है कि मुख्यधारा की दूसरी फिल्मों के विपरीत “काबिल” में जब भी  किसी ऑब्जेक्ट का दुबारा इस्तेमाल है तो दर्शकों को याद दिलानेवाला बोरिंग फ्लैशबैक या ऑफ-स्क्रीन से झुंझला देने वाली आवाजें नहीं आती हैं (बस फ़िल्म के अंत में अंधे लोगों के बारे में रोहन के शब्द दोबारा आए हैं). साथ ही साथ “काबिल” अपने दर्शकों की बुद्धिमत्ता का सम्मान करता है जो कि पॉपुलर फिल्मों में अक्सर नहीं होता है.

ऋतिक रोशन ने “काबिल” से पहले भी विकलांग आदमी का अभिनय किया है. मगर इस बार उसने अच्छी तरह से अपने सबसे बड़े हुनर को अपने नायक की विकलांगता से जोड़ दिया है. ऋतिक का सब से बड़ा कौशल उसका नाच है जो इस बार ड्रीम सीक्वेंस का हिस्सा नहीं है. डांस स्कूल के सीन में ऋतिक फिर से दर्शकों को यह दिखाता है कि वह बॉलीवुड का सब अच्छा डांसर है. पुराने थिएटर में लड़ाई के सीन में नायक के अंधापन के साथ अँधेरा का भी दिलचस्प इस्तेमाल है. यह जरुर है कि नायक का कौशल कभी-कभी कुछ ज़्यादा ही दिखाया गया है जो कि विकलांग आदमी में नहीं होते हैं.

अंधे लोगों की ज़िन्दगी में जो कुछ भी अजीब चीजें, हरकतें सामान्यतः दिखती हैं, फिल्मवालों ने भरसक कोशिश की है कि उनकी व्याख्या प्रस्तुत की जाएँ. शादी की रात, नायक और नायिका के कमरे में जली हुई सारी मोमबत्तियाँ, जो ट्रेलर में भी दिखाई गईं हैं, किसी को अजीब लग सकती हैं. इसीलिए फ़िल्म में उसकी व्याख्या है कि वे क्यों आईं! यहाँ मोमबत्ती फ़िल्म में चेखव वाली चीज़ बन गयी. दिलचस्प बात यह भी है कि इस फ़िल्म में ऋतिक रोशन की दूसरी फिल्मों से अलग दर्शकों को उसके दोनों अंगूठे पुरे समय दिखाई देते हैं. यह निशान कोई विकलांगता नहीं है, बल्कि नायक के भाग्यशाली होने की निशानी है, फिर भी अपनी पुरानी फिल्मों में ऋतिक इसे छुपाता था. चूँकि “काबिल” सामन्य लोगों से अलग दिखने वाले लोगों के शांति से जीने के अधिकार और उनके प्रति होने वाले भेद-भाव के बारे में फ़िल्म है, इसीलिए दूसरों से अपनी भिन्नता दिखाना विकलांगता के पक्ष में एक मज़बूत आवाज़ है. विकलांग नायक का अभिनय करना और खुद दूसरों से कुछ अलग होना अलग-अलग बातें हैं और यहाँ ऋतिक ने फिर से अपनी एक और खासियत का अच्छा इस्तेमाल किया.

फ़िल्म में कमियां ज़रूर हैं और उनमें सब से बड़ी शायद फ़िल्म का आइटम नंबर है. इसकी ज़रुरत बिलकुल नहीं थी, क्योंकि यह गाना और परफॉरमेंस अच्छा नहीं हैं. शायद फिल्मवाले आगे आने वाली अपने नायक की अलग-अलग लड़ाइयों से पहले दर्शकों को थोडा-सा आराम देना चाहते थे, फिर भी अगर ज़रुरत थी तो इसे ज़्यादा अच्छी तरह से करना चाहिए था. सुप्रिया का भूत वाला आईडिया भी ज़्यादा अच्छा नहीं था, इससे फ़िल्म बस ज़्यादा दयनीय बन जाती. नायिका की मौत और उससे पहले उसके प्रति घटित अपराध ही इतने कष्टप्रद हैं कि इससे ज़्यादा कुछ डालने की जरुरत नहीं थी.

फ़िल्म में एक चिंताजनक बात माधव की बहन के प्रति रोहन का व्यवहार है. माधव और उसका दोस्त अमित जब सुप्रिया को छेड़ते थे तो रोहन को मालूम था कि यह महसूस करना कितना कष्टप्रद है. फिर भी अपने बदले वाले क्षण में रोहन माधव की बहन को छेड़ता है. यह ज़रूर है कि रोहन का व्यवहार उतना ख़राब नहीं है जितना अमित और माधव का था. वह बस अमित की आवाज़ का नक़ल करता है और यह दिखाने की कोशिश करता है कि यह सब बुराइयाँ अमित ही करता है. लेकिन, बाद में वह माधव को स्पष्ट करता है कि यह आईडिया उसे यह महसूस करवाने के लिए था कि जब कोई तुम्हारी प्यारी बहन को छेड़ता है तो तुम्हें कैसा लगता है. इस तरह की सोच पूरी दुनिया में बहुत पॉपुलर है– जब एक आदमी दुसरे आदमी की औरत से बदतमीजी करता है तो बदले में उसकी औरत से भी यही बदतमीजी करनी चाहिए. जबकि दोनों मामलों में औरतें एक तरह से बेकसूर होती हैं. इसीलिए आदमियों के झगड़े में उनको घसीटने और दंडित करने का यह आईडिया बहुत खतरनाक है.

अगर फ़िल्म में एक छोटा-सा स्पष्टीकरण यह होता कि अपराधी क्यों यह सब अपराध करते हैं तो यह भी कहानी के लिए और भी अच्छा होता, और आखिर में इतनी लड़ाइयों के बाद नायक के चेहरे पर ज़्यादा निशान दिखने चाहिए थे. मेनस्ट्रीम सिनेमा का हीरो सुपर हीरो की तरह होता है लेकिन फिर भी इतनी पिटाई के बाद हीरो के चेहरे में भी कोई न कोई चोट तो आता ही है. इन कमियों के बावजूद “काबिल” वीकेंड के शाम के लिए बहुत अच्छी फ़िल्म है जिसे देखते समय दर्शक रो सकते हैं, हंस सकते हैं और अंत में राहत महसूस कर सकते हैं.

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तत्याना षुर्लेई पोलैंड की रहने वाली हैं, एक इंडोलॉजिस्ट (भारतीय उपमहाद्वीपीय भाषा और संस्कृति की जानकार)  और फिल्म आलोचक हैं. हिंदी की मशहूर पत्रिकाओं और ब्लॉग्स के लिए लिखती रही हैं. पोलैंड के शहर क्राकोव स्थित जेगिलोनियन विश्वविद्यालय से “द कोर्टसन फिगर इन इंडियन पॉपुलर सिनेमा: ‘ट्रेडिशन, स्टीरियोटाइप, मैनिपुलेशन” नामक विषय पर पीएचडी हैं. वर्तमान में मनिपाल विश्वविद्यालय, कर्नाटक के यूरोपीय अध्ययन संस्थान में पढ़ाती हैं.

The Postmodern mores and Cinematic Expression: Dhiraj Kumar Nite

Tanu Weds Manu Returns (TWMR) is a commercial movie, and all signs are to make it a big money-grossing of this year. That said, let’s proceed. All commercial movies are necessarily an expression of socio-cultural and political proclivity of the movie maker. The logic of Investment shapes technological inputs; but the narrative strategy, cinematography and the conceptualisation of characters are, equally, the product of cultural and political locus of film makers. Let’s call this non-economic aspect of film making as the ethico-political logic and craft logic. The sexist form of cinematic characters are as much guided by the image of target audience shared by film makers as by the sexist discourse i.e., ethico-political logic, which the former often entertains. The movie of our discussion presents an enchanting ethico-political logic; the craft logic and the economic logic accompany the former to make it commercially viable. A superb combination of three distinguishes it from the so-called art movie.@Author

TWMR (2015)

TWMR (2015)

By Dhiraj Kumar Nite

Ethico-Political Logic of Cinematic Expression

TWMR brings two enamouring female characters who do share as much similarity as contrasting attributes. Both are women-in-rebellion in their own rights. They defy the tradition of cultural restraints set on the women by patriarchy. Tanu [Trivedi] embodies as much self-seeking modern conceit as, I suggest, a post-modern autonomist self. She seeks to freely flow in pursuit of a boyishly unrestrained, hedonistically rich and thrilling newness. However, she is bereft of any wishes for financial self-sufficiency. The financial foundation of her sparking adventurous life is the wealth of her parents, the boyfriend and the husband. She recognises dignity in labour, but she keeps herself away from such demanding fact of human life. As a whole her character is altogether novel imagination. She is not Anita (Praveen Boby) of Deewar, who was an equally infectious, iconoclastic discovery of the 1970s. She neither satisfies the definition of modern [bourgeois] womanhood, who is a companion of her male member to support his productive life and perform the role of an emotional anchor. Nor does she fit with the image of a modern female antithesis, who relishes financial self-sufficiency and transformative womanhood. I tempt to look at her as a post-modern womanhood in her status as a female thesis. The refusal to productivist paradigm of modernity is her distinguishing attribute. Abundance of necessaries of humankind to life is conducive to her refusal. At the same time, she does not regardthe female’s virtue in her reproductive function for the manly world. For any association with such considerationwould be a hindrance to realisation of her exploratory self. Marriage is a means than an end in-itself.

Datto, alias Kusum is one of the strongest female characters ever imagined in the Bollywood. She is distant from the retrogressive feudal tradition and the self-seeking moderns [bourgeois] conceit. She is at the cusp of refreshing transcendence. She seeks to win the world that is competitive. She takes pride in her ability of financially supporting the family or socially dependent kith & kin; relishes her agenda [rather than any burden of responsibility] of fostering a web of social relations/network; and commits to resist the latter when it attempts to overwhelm her autonomist, exploratory self. She nurtures the ethic of care, cooperation, and progressive transformation. For instance, in the course of seventh round of the Brhamanical ritual of marriage she enquires on her groom, her beloved if he is well-disposed to the final step. She decides to walk out, for she was not simply reluctant to marry to someone who is still emotionally attached to his first wife. She is careful of and cooperative towards a possibility of consolidation of love between self-deprecating Tanu and unsure Manu. She represents an image of, I tempt to suggest, a post-modern female antithesis. The latter transcends the self of feminist or socialist female antithesis, which was born in modern world and contributed to its progress. She is anyone but Indrani Sinha (Raakhee of Tapasya).

TWMR is decidedly neither a naturalist feature film nor realist. Damn, what to celebrate! It is in the league of some movies made in the recent times, which explore the grey areas of their characters. Dabang’s inspector, Piku’s daughter, Haider’s mother and son, Queen’s Rani: all of them perform their social functions with certain peculiarities. The villains are also grey characters; the hero and heroine also pleasingly indulge in the necessary ‘social vice’. Different classes intersect – at times collide with – eachother here and there. Tanu as a distraught person stumbles across a quiet beggar; the latter kisses her outreached palm and intends to offer a price for such weird thrill that visited him. Disconcerted Tanu moves on. It reminds the penultimate episode of Manto’s story A Woman’s life. In the latter Saugandhi was flustered at her rejection by the customer. Tanu is taken aback by her own realisation of the extent of dissolute condition, of acceptance by a destitute man. All this orchestrates something as much palpably earthly, which one would believe that a natural course of life witnesses; as fantasy for the world to entertain, even if not in the sight to descend soon.Needless to say, the realm of imagining of social characters is perilously fraught with the logic of investment. What is saleable sets the circumference, the limit. Therefore, Tanu and Manu return to each other to produce not just a happy ending, so notoriously characteristics of the Bollywood, but to satisfy the moral compass of the target audience. No explanation is sought for the change of hearts and minds between Tanu and Manu, who were so reasonably disposed to undertake separate strayed journeys till the previous moment. Here, TWMR loses an opportunity to lend us a cult movie. This is a recurrent feature of the story authored by Himanshu Sharma. There was no explanation on offer for the appearance of an uncommon lady, TanuTrivedi, known as batman, in Kanpur city in the prequel movie (TWM). Hobsbawm writes (On History: chapter, Postmodernity and History) that there is an increased tendency of exploring the meaning at the cost of explanation, which we find as a defining trait of the postmodernist literature.

The anti-foundationalist and anti-essentialist approach presents the aesthetics of meaning; of the politics;of the form; of the hierarchy. Let me digress to support my observation with what I borrow from a recent article of a cultural theorist,Fredrick Jameson, ‘The Aesthetics of Singularity’, New Left Review, vol. 92, March-April 2015.1. In our postmodern age we not only use technology, we consume it, and we consume its exchanges, value; its price along with its purely symbolic overtones. Similarly, the form of the work has become the content; and that we consume in such works is the form itself. In the modernist texts the effort is to identify form and content so completely that we cannot really distinguish the two; whereas in the postmodern ones an absolute separation must be achieved before form is folded back into content. Further, there is centrality of the postmodern economy, which is characterised as the displacement of old-fashioned industrial production by finance capital. 2.Only thing capital cannot subsume is the human entity itself, for which the attractive theoretical terms excess and remainder are reserved. The post-human is the final effort to absorb even this indivisible remainder.3.We have not yet entered a whole new era rather a new age of third, globalised stage of capitalism as such. Here, postmodern philosophy is associated with anti-foundationalism and anti-essentialism. This is characterised as the repudiation of any ultimate system of meaning in nature or the universe; and as the struggle against any normative idea of human nature. 4. What further distinguishes it from the old critiques of modernity is the disappearance of all anguish and pathos. Nobody seems to miss god any longer, and alienation in a consumer society does not seem to be a particularly painful or stressful prospect. No one is surprised by the operations of a globalised capitalism. This is called as cynical reason. Even increasing immiseration, and the return of poverty and unemployment on a massive world-wide scale, are scarcely matters of amazement for anyone. So clearly are they the result of our own political and economic system and not of the sins of the human race or the fatality of life on earth. We are so completely submerged in the human world, heideggerian ontic, that we have little time any longer for what he liked to call the question of being. 5. In our time all politics is about real estate. Postmodern politics is essentially a matter of land grabs. … Not to surprise,one protagonist of TWMR is a builder, another is a squatter, and the third is the issue of the location of housing in London between Tanu and Manu than the condition of house.

The craft logic of TWMR is scintillating. Every character is well chiselled. Every cast moulds herself/himself into the concerned social character. The use of close-up camera, not so popular in the Bollywood, demandingly tests calibre of actors. The narrative maintains suspense and well-proportioned subplots till the end. Editing carries pace of the narrative at an enjoyable and captivating scale. Cinematography weaves locales, which the audience would identify with and also chew it. The content, dialogue and body language successfully present a refreshing social drama rather than an electrifying comedy, for which it had immense spice to grow into at the hand of a director like Priyadarshan. Music and the songs are as much to bring out glittering, tormented or repenting inner self as to advance the story line. Finally, Kangana’s dancing effort is the rare occasion,where she bursts out as one actor involved in double roles.

Dhiraj k NiteDhiraj Kumar Nite, A Social Scientist, University of Johannesburg, Ambedkar Univeristy Delhi. You can contact him through dhirajnite@gmail.com

बूढ़ों का वसंत और लोलितागिरी: डॉ. विनय कुमार

सत्तर पार का एक बूढ़ा ‘सुपरस्टार’ है, उसे विश्वास है कि उसे सप्तर्षियों में से एक मान लिया गया है,सो मृत्यु उसे नहीं व्यापेगी।यह बूढ़ा हालांकि मुंह के भीतर नकली दाँत और माथे के ऊपर नकली केश लगाता है, जब तब बीमार पड़ते रहता है, तो भी सोलह साल की लड़की से प्रेम का नाटक करने के लिए हमेशा तैयार रहता है। बूढ़ा प्रयोगों का शौकीन है। उसे लगता है, प्रयोग करते रहने से आदमी हमेशा जवान बना रहता है। अपनी उम्र को जीत लेने का नाटक करते-करते इस बूढ़े ने साबित किया है कि सचमुच उम्र को जीता जा सकता है। वैसे अपनी उम्र को जीतने के लिए यह बूढ़ा एक खास किस्म का शहद भी खाता है। यह शहद पुणे के एक बाग़ में तैयार होता है। यह शहद या तो सिर्फ यह बूढ़ा खाता है या फिर मधुमक्खियों पर राज करने वाली रानी मधुमक्खी, बाकी जो कोई इस शहद को खाना चाहता हो उसे उस क्लब में शामिल होना पड़ेगा जो कि रानी मधुमक्खी का क्लब होता है। यह क्लब अकसर आईपीएल की टीमों के खरीदारों और उनके दोस्तों से बनता है। साठ पार कर चुका एक और बूढ़ा है। यह बूढ़ा ‘सर्वशक्तिमान’ है। इस बूढ़े के पास एक नुस्खा है। बूढ़ा रानी मधुमक्खी के क्लब में शामिल होने का नुस्खा बताता है। इस बूढ़े ने भी उम्र को जीत लिया है।यह बूढ़ा अपने शरीर को सोने से मढ़वा देना चाहता है। सोना मढ़वाये सूट को धारण करने वाला बूढ़ा अपने को रॉकस्टार कहलवाने का शौकीन है, उसे रॉकस्टार कहा भी जा रहा है। साठ साल के इस लोकतंत्र पर इक्कीसवीं सदी में बरस इक्कीसवे बरस की जवानी छा रही है। सारे बूढ़े जवान हो गये हैं, सारे बच्चे भी जवान हो गये हैं, और जो जवान हैं, उनसे कहा जा रहा है कि अब आप चिरयौवन की अनंत आकाशगंगा में टहल लगाने को तैयार हैं। यंगिस्तान कहलाने वाले इस देश में अब कोई नहीं मरता। यहां रोग-शोक-दुःख-मृत्यु कुछ भी नहीं है। यह सब उस दौर की बातें हैं जब ग्रोथ-रेट के साथ किसी पुछल्ले की तरह हिन्दू शब्द जुड़ा होता था। यह ‘हिन्दू’ शब्द उस युग की इकॉनॉमी में इस देश के आदमी को आदिमानव बताने के लिए प्रयोग किया जाता था। आदिमानव ने छलांग लगायी है, अब वह महामानव है या फिर महामानव बनने को तैयार खड़ा है। महामानवत्व के सुखसागर में डूबते उतराते इस माहौल में यह लेख कह रहा है कि भाई साहेब, ये तो एक रोग है…! यह तो सिर्फ एक भूमिका है, पृष्ठभूमि है..आख्यान आगे है। डॉ. विनय कुमार की लेखनी में नयापन क्या है? नयापन वही है जो हिंदी के समकालीन रचनात्मक परिदृश्य से गायब है। नई सूचनाएं, नए ज्ञान ताकि हम बाकी संसार के साथ कदमताल कर सकें! अंग्रेजी या विदेशी साहित्य-लेखन से सहज लोगों के लिए विनय कुमार का लेखन नया नहीं बल्कि एक तरह का दुहराव भी लग सकता है, लेकिन इसे एक तरह की शुरुआत माननी चाहिए। समकालीन हिंदी कथेत्तर गद्य हिंदी का सबसे गरीब संस्करण हो गया है। डॉ. विनय की पुस्तक ‘एक मनोचिकित्सक के नोट्स’ इस गरीबी को कुछ कम ही करता है। प्रस्तुत है इसी पुस्तक से छोटे-छोटे दो गद्यांश। @चंदन श्रीवास्तव 

Sugar Daddy (1976)-Poster

Sugar Daddy (1968)-Poster


By डॉ. विनय कुमार

 चीनी कम होने की निःशब्दता

 
चीनी कम

मादरे-वतन में अगर मनमोहनॉमिक्स की इन्द्रधनुषी छटा का नूर न होता तो हमें ‘प्रिविलेज्ड बूढ़ों के वसंत’ और ‘लोलितागिरी’ पर चर्चा की जरुरत महसूस न होती… ‘निःशब्द’ और ‘चीनी कम’ पर चर्चाएँ कहाँ हो रही हैं? क्या उस भारत में जो अनुसरण करता है या उस छोटे भारत में जो नेतृत्व करता है. जो भारत ‘भूख-भय-भ्रष्टाचार’ की मार से खुद ‘निःशब्द’ है और जिसकी किस्मत में यूँही ‘चीनी कम’ है उसे यह विलासितापूर्ण सहूलियत कहाँ कि प्रेम और विवाह की तरह-तरह की रेसिपि को चटखारे लेकर पढ़े. वृद्ध और युवती के प्रेम, साहचर्य और विवाह का मुद्दा गर्म हो रहा है या गरमाया जा रहा है? सोचने की बात है. सोचने का फैशन न रहने के बावजूद इस पर सोचने की जरुरत है.

वृद्ध का युवती से विवाह भारत के लिए कोई नई बात नहीं है. दक्षिणभोगी नीतिकार कह गए ‘वीरभोग्या वसुंधरा’ और सेनाओं के सहारे वीरता सिद्ध करने वाले सत्तावान हत्यारों को भोग का सिद्धांत मिल गया. महलों के भीतर रानियों के मोहल्ले से लेकर नगर तक बसने लगे. जरा सोचकर देखिये कि कृष्ण की साथ हजार रानियों का खर्चा कैसे चलता होगा. सिर्फ इच्छा की पूर्ति के लिए कृष्ण को प्रजा से कितना वसूलना पड़ता होगा. सत्ता और धन की गोटियों से खेला जाने वाले यह खेल नन्द और यशोदा की विरासत के बूते तो कतई संभव न था.

अब इस मुद्दे को स्त्रियों की दृष्टि से देखें. तरह-तरह के स्वाभाविक और आरोपित सीमाओं के बावजूद स्त्रियाँ सभ्यता-यात्रा में बराबर की भागीदार रही हैं. कल से आज तक जीवन और वर्चस्व की लड़ाइयों में वे अपनी तरह से शरीक रही हैं. हल और हथियार भले ही कम उठाती रही हैं, मगर श्रम के स्वेद और युद्धों के आँसूं और रक्त से कम नहीं भींगती रही हैं. नर और मादा की तरह जंगलों में भटकती मानवजाति ने जब ‘घर’ बनाया तो उनकी भूमिका इस कदर बदली कि उनका मनोविज्ञान पुरुषों से काफी अलग हो गया. घर और तन से चिपके बच्चों ने उन्हें सुरक्षा की आवश्यकता का पाठ पढ़ाया. अन्न और मांस कमाकर लौटे पुरुष को जब भूख और थकान से राहत मिलने लगी तो वह स्त्री को पहले ‘जरुरत’ फिर ‘जायदाद’ की तरह प्यार करने लगा. परिणाम यह हुआ कि स्त्रियाँ ‘कृपाकांक्षिणी’ और ‘सुरक्षाकामिनी’ हो गईं. शायद यही कारण है कि स्त्रियाँ पुरुषों की उम्र से अधिक उनकी सामर्थ्य को अहमियत देने लगीं.

स्त्री के मनोविज्ञान की इस विशिष्ट पहचान के पक्ष में सबसे बड़ा जैविक प्रमाण (बायोलॉजिकल एविडेंस) यह है कि स्त्रियों की यौनिक उत्तेजना का सबलतम कारक है—पुरुष प्रदत्त देखभाल और सुरक्षा. याद करें प्रकाश झा की फिल्म ‘दिल क्या करे’. इस फिल्म की नायिका चलती ट्रेन में बलात्कार की कोशिश करने वाले गुंडों से बचाने वाले अजनबी को थोड़ी ही देर के बाद बेहद ‘निःशब्द’ तरीके से अपनी देह सौंप देती है और यात्रा के अंत में अजनबी के प्रति आँखों से आभार प्रकट करते हुए विदा हो जाती है. इतना कुछ हो जाने के बावजूद अजनबियत बरकरार रहती है. ऐसा क्यों? क्योंकि सिलसिले खतरनाक भी हो सकते हैं. अजनबियत अपने आप में एक सुरक्षा कवच है. इस प्रसंग को सुरक्षा के प्रति स्त्री के मनोवैज्ञानिक (सायकोबायोलॉजिकल) प्रतिक्रिया के रूप में देखें.

अगर स्वतंत्रता पूर्व के भारत की बात करें तो मुग्धाओं के प्रेम की सुविधा सामंतों, सेठों और वाग्वीर ज्ञानिओं के ही भाग्य में थी. लोकतांत्रिक भारत में इसमें ‘प्रिविलेज्ड क्लास’ के नेता और आला अफसर भी शामिल हो गए. अब जबकि उदारीकरण की मीठी छुरी से अच्छी-बुरी पुरानी मान्यताएं हँस-रोकर हलाल हो रही हैं, एक नए सोशल आर्डर को मान्यता दिलाने की कोशिश सर उठा रही हैं. एक फिल्म में सुबह की दौड़ लगाते हुए अमिताभ आते हैं ‘जब तक जाँ में है जाँ तब तक रहे जवां, रोज सुबह से माँगें नई-नई खुशियाँ.’ इस फिल्म में बुढ़ाते जाने के बावजूद वे विवाह नहीं करते. मगर उदार भारत में शताब्दी के महानायक कामनाओं के नदी में ‘निःशब्द’ बहते नज़र आए. ‘निःशब्द’ में थोडा अपराधबोध हुआ और ख्याल-ए-ख़ुदकुशी से उबरे तो तय किया कि तीस पार की कुड़ी से कुड़माई की जाये. इस ढीठ बदलाव के मनोविज्ञान की व्याख्या वैश्वीकरण और उदारीकरण की रोशनी में ही संभव है.

जब पश्चिम में औद्योगिक क्रान्ति हुई तो सत्ता और अर्थ के समीकरण बदले. पुराने सामन्तों और सेठों की जगह उद्यम से उभरे नवधनाढ्यों ने ली. उद्योगों ने पूंजी के नए पहाड़ बनाए, ऐश्वर्य और सुख की नई परिभाषाएँ विकसित कीं और एकदम नए किस्म की कुलीनों की जमात खाड़ी की. उद्यम और उत्पादन बहादुरों की जमात पूंजी के नशे में ‘जब तक है जाँ तब तक लुटें मजा’ की राह पर चल पड़ी. तबसे आज तक यूरोप और उसके सारे उपनिवेश में ‘एन्जॉय योर सेल्फ’ का नारा गूंज रहा है. भोग के प्रयोग ने स्त्रियों के सामने भी यह विकल्प प्रस्तुत किया कि वे चाहें तो अमीर बूढ़ों की सहचरी बन सकती हैं. धन और सत्ता का सुख किसे नहीं चाहिए. स्त्रियाँ अपवाद नहीं हैं. उनमें से कुछ को लगा कि अमीर बूढ़ों के प्रति आकर्षित होना एक सुरक्षित, आरामदेह और शक्ति एवं ऐश्वर्य प्रदान करने वाला बेहतर विकल्प है. यहीं से खड़ी हुई प्रिविलेज्ड प्रेमियों की एक नई जमात. अमेरिका में इस जमात को ‘शुगर डैडीज’ कहा जाता है. अब तो आप मानेगें कि बूढ़ों का यह वसंत ‘ग्लोबलाइजेशन का बाई प्रोडक्ट’ है और उसे फैशन शो की तरह प्रायोजित किया जा रहा है, भारत के नए उद्यम-वीरों के लिए. कुल मिलाकर वृद्ध-युवती साहचर्य का यह फैशन पूंजी के पहाड़ों से उठने वाली पुरानी पछुआ हवा का यह पुरवैया झोंका है.

जो पश्चिम में हो चूका वह भारत में हो रहा है. मगर जो जो भारत में हो रहा है वह पश्चिम में नहीं हो रहा है. पश्चिम में स्त्री-पुरुष संबंधों के समीकरण बदल गये हैं. वहाँ स्त्री सशक्तिकरण का दौर सफल हो चुका है. काफी तादात में स्त्रियाँ ज्ञान, धन, शासन-सत्ता की स्वामिनी हो चुकी हैं. नई रायशुमारियाँ बताती हैं कि अब समृद्ध और सत्तावान प्रौढ़ाएँ भींगती मसों के युवक से प्रेम और विवाह करने लगी हैं. आज नहीं तो कल भारत में यह हो सकता है. ‘चीनी कम’ की सफलता की कामना करने वाले शुगर डैडीज सोच लें.

निःशब्द

हमारे समय में शहरी और कस्बाई भारत में प्रेम पर चर्चा कोई अजूबा नहीं है. महामायावी मीडिया की कृपा से हम तरह-तरह के प्रेम पर होने वाली तरह-तरह की चर्चाओं के अनिवार्य घेरे में हैं. मोनिका-क्लिंटन और जूली-मटुकनाथ जैसी कथाएँ चाट मसाले की तरह हमरे खाने की प्लेटों में अनिवार्य रूप से छिड़की जा रही है और चूँकि हम भूखे नहीं रह सकते इसीलिए उसे चखने को विवश हैं. प्रेम का हो या न हो यह ‘प्रेम’ के अहर्निश उच्चारण से उठने वाले शोर का समय अवश्य है और ऐसे समय में आई है एक फिल्म ‘निःशब्द’. एक ‘टीन’ (युवती) और एक वक्त की मार से छीजे हुए ‘टिन’ (वृद्ध) की प्रेमकथा को लेकर.

इस फिल्म के पहले इस पर चर्चाएँ आईं और खूब आईं, जिनका लब्बोलुआब यह था कि भारत बदल रहा है- इंडिया प्वायज्ड टु बिकम बोल्ड एंड ब्यूटीफुल, देखो तो सही क्या मणिकांचन संयोग है- ओल्ड बिग बी और कमसिन ब्यूटीफुल जिया. सुपरस्टार की लोलितागिरी. जिया देखोगे तो जिया धड़क-धड़क जाएगा. तो ‘निःशब्द’ से पहले आई शब्दों की भीड़ इश्तेहार की तख्तियां उठाये. और जब फिल्म आई तो आई और आकर चली गयी. पटना में मटुक-जूली का तड़का भी भीड़ न बटोर पाया.

दरअसल ‘निःशब्द’ आकर्षण और प्रेम से अधिक त्रासदियों की कथा है. नायिका खंडित परिवार से आती है. पिताओं से भरे समाज में वह पिता के प्रेम से वंचित है. यह अभाव उसके मनोयौनिक (सायकोसेक्सुअल) विकास में अपनी भूमिका निभाता है. चूँकि किसी चीज की इच्छा उसकी कमी से ही पैदा होती है इसलिए उसके अचेतन में पितृपुरुष के लिए चाह का मौजूद होना कोई अजूबा नहीं. यहाँ प्रश्न उठता है कि उसने सहेली के पिता को पिता की तरह क्यों नहीं चाहा. ऐसा इसलिए कि वह पिता-पुत्री के संबंधों के व्याकरण से अनभिज्ञ थी. हर शिशु नर या मादा पैदा होता है. संबंधों की समझ तो परिवार और परिवेश के साथ ‘इंटरएक्शन’ से विकसित होती है. नायिका की समस्या यह है कि जब संयोग उसे अबाधित एकांत में नायक को समझने का अवसर प्रदान करता है और उसके अचेतन में पितृपुरुष को पाने की इच्छा सिर उठाती है तो वह स्वयं को एक पुत्री की तरह अभिव्यक्त नहीं कर पाती क्योंकि उसे वह मनोवैज्ञानिक भाषा ही नहीं पता जिसमें एक पुत्री अपने पिता से बात करती है. उसकी इच्छा उसके बचपन के अभाव से उठती है, मगर व्यक्त होती है युवा भाषा में. यह त्रासदी नहीं तो और क्या है! नायक अपनी तरह की त्रासदी का शिकार है, विवाहित होकर दाम्पत्य प्रेम से वंचित. दाम्पत्य की विडंबना यह है कि वह प्रेमहीन होकर भी संतानवान हो सकता है. नायक तृप्त पिता है मगर एक अतृप्त पुरुष. फिल्म में संयोग उसके अतृप्त पुरुष का कद इतना बढ़ा देता है कि पिता बौना हो जाता है. अतृप्त पुरुष की भाषा के शोर में पिता की भाषा खो जाती है. अगर सही-गलत के पारंपरिक और समाजसम्मत नजरिये से सोचें तो यह दायित्व नायक का ही था कि वह नायिका के हित में सही भाषा में बात करता. क्योंकि नायिका भले ही पुत्री की भाषा नहीं जानती थी, नायक तो पिता की भाषा जानता था. वह निःशब्द की ‘जिया’ के मोह को गुड्डी की ‘जया’ के मोह की तरह भंग कर सकता था. मगर इच्छाओं को बहकाते-दहकाते ग्लोबलाइज्ड समाज में यही, शायद यही हो सकता था. यह त्रासदी नहीं तो और क्या है?

अगर मिथकों पर रत्ती भर भी यकीन करें तो मानना होगा कि भारत शांतनु और ययाति का देश है. स्मरण है कि कमसिन कायालोलुप राजाओं की वासना की वासना को सैद्धांतिक आधार प्रदान करने के लिए लोभी शास्त्रकारों ने सोलह की उम्र को अक्षत सौन्दर्य के भोग का प्रवेशद्वार घोषित कर दिया था. ‘स्वीट सिक्सटीन’ का जूमला तो बहुत बाद की चीज है. आज चिकित्सा विज्ञान सोलह की उम्र को मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से अपरिपक्व मानता है. सोलह और अठारह में फासला ही कितना है. ‘निःशब्द’ के बहाने से ही सही, यहाँ यह कहना होगा कि अठारह वर्षीय युवती के लिए साठ वर्ष के पुरुष के मन में उमड़ा प्रेम उस कंगन की तरह होता है, जिसके सहारे वह पंचतंत्र के बूढ़े शेर की तरह अपने शिकार को फंसाने की कोशिश करता है. मीडिया और जूली को मटुक जी भी ‘निःशब्द’ के नायक की तरह अपने दाम्पत्य-जीवन को असफल बताते हैं. यहाँ उनसे यह पूछना दिलचस्प होगा कि जूलिगिरी उनकी आदत तो नहीं.

‘सठियाना’ एक फब्ती भर नहीं है. बढ़ती उम्र के लोगों की रक्त-नलिकाएं संकरी हो जाती हैं, इस कारन मस्तिष्क में रक्त-संचार कम हो जाता है. कभी-कभी मस्तिष्क में फैली रक्त-नलिकाओं में थक्का बन जाता है और मस्तिष्क के किसी ख़ास हिस्से को रक्त मिलना बंद हो जाता है. अगर यह दुर्घटना मस्तिष्क के ‘फ्रंटल लोब’ नामका हिस्से में घटित होती है, तो ग्रसित व्यक्ति वर्जनाहीन/अनैतिक व्यवहार कर सकता है. ‘जूलियों’ को ‘मटुकों’ से प्यार करने के पहले उनके मस्तिष्क का सीटी स्कैन कराकर देख लेना चाहिए कि ‘फ्रंटल लोब’ सिकुड़ तो नहीं रहा. सनद रहे की छाती में धडकने वाला दिल एक पम्पिंग सेट-भर है, वह दिल जो भावनाओं का केंद्र है, उसका निवास मस्तिष्क में ही होता है.

…साठ और अठारह का अंतराल सिर्फ उम्र का अंतराल नहीं होता, यह उर्जा, क्षमता और भविष्य का अंतराल भी होता है. टेस्टोस्टेरोन नामक पुरुष हार्मोन पच्चीस वर्ष में अपने शिखर पर होता है जबकि साठ वर्ष की उम्र में घाटी में घसीटता दीखता है. प्लैटोनिक प्रेम तो हार्मोन के मदद के बगैर भी शिखर पर पहुँच सकता है, मगर प्लैटोनिक फेज ख़त्म होने के बाद क्या- क्या होगा- यह भी सोचना चाहिए. अब आयें भविष्य पर.

अठारह की उम्र के भविष्य का अर्थ है सुबह के आठ आठ बजे और साठ का समय है शाम के पांच बजे. साठ वाला डूब जाएगा अठारह वाली के दिन कैसे कटेंगें! इसे भी सोचा जाना चाहिए!

vinay kumar

डॉ. विनय कुमार मनोवेद माइंड हॉस्पिटल, पटना में मनोचिकित्सक हैं.  हिंदी साहित्य से लेकर साहित्येत्तर सांस्कृतिक रुचियों तक को बहुत नजदीक से परखते हैं. नॉन फिक्शनल हिंदी की अकाल वेला में अद्भुत चमक के अधिकारी हैं. हाल ही आई पुस्तक ‘एक मनोचिकित्सक के नोट्स’ से खासे चर्चित. उनसे dr.vinaykr@gmail.com पर संपर्क संभव है. 

विडंबनात्मक परिवेश की रूपक-कथा है ‘आस्था’: प्रणय कृष्ण

अगर आधुनिकता की यह विडंबना आधारभूत है, तो कोई न कोई तबका हर समाज में ऐसा होगा जो इस विडम्बना को सबसे पहले और सबसे ज़्यादा गहराई से अभिव्यक्त करेगा। हिंदुस्तान में यह तबका कौन-सा है? ‘आस्था’ फिल्म का जवाब है कि यह तबका है महानगरों में रहनेवाली मध्यवर्गीय युवा औरतें। फिल्म की नायिका उन्हीं का प्रतिनिधित्व करती है। ऐसा नहीं कि दूसरे सभी तबके इस विडंबना से अछूते हैं, लेकिन इतिहास का निरंकुश चुनाव इसी तबके का है। मध्यवर्ग के महानगरीय आदमी की पितृसत्तात्मक सुरक्षा इस विडंबना से बचने की एक ढाल है। उसके तरकश में आदर्शवाद के तीर इस विडंबना से निपटने के लिए अभी बाकी हैं। लेकिन एक स्त्री जरूर तैयार होती गई है जिसकी परिभाषा परिवार, परंपरा और आदर्शवाद के दायरे में संभव नहीं है। # लेखक 04257290

फिल्म ‘आस्था’ से गुज़रते हुए

1. कहानी– मानसी एक सुन्दर-सी बेटी की मां और एक नेकदिल प्रोफेसर पति का प्रेम पाने वाली पत्नी है। घर की ज़़रूरतें पति की आय से पूरी हो जाती हैं, लेकिन ख्वाहिशें नहीं। बेटी को जूते की ज़रूरत है। मानसी जूते खरीदने जाती है, लेकिन जो जूता पसंद आता है वह उसके बजट से बाहर है। दुकान में उपस्थित एक महिला रीता जूते बंधवा देती है और बाकी के पैसे चुकता कर देती है। फिर वह उसे अपनी गाड़ी में बिठा कर होटल लाती है और एक पुरुष के हवाले कर देती है, इस हिदायत के साथ कि नई है। इस पुरुष से मानसी को मिलता है ढेर सारा रुपया और (प्रतिरोध के बाद) संतुष्टि। घर लौटती हुई मानसी में आत्मग्लानि है। घर लौटने पर बेटी जूते पाकर खुश है, पति से वह सब कुछ बताना चाहती है, लेकिन कह नहीं पाती और बात बदल देती है। फिर तो ना-नुकुर करते हुए भी बिज़नेस का यह सिलसिला शुरू हो जाता है। सहेली के घर देखी गई ब्लू फिल्म के नाम पर वह पति को भी नए तरीकों से सुखी करती है। अंततः एक छात्रा के सामने पोल खुलने पर उसी छात्रा के माध्यम से और कहानी के रूप में पति को सारी बात बताती है। पति एक ऐसे आदर्श पति की भूमिका निभाता है जो पत्नी के हालात को समझने की कोशिश करे और इस तरह वह बाज़ार से मुक्त होकर घर की होकर रह जाती है।

 2. कहानी का पाठ (या शायद अतिपाठ): इस कहानी को हम आधुनिकता के विडंबनात्मक परिवेश की रूपक-कथा के रूप में देखने की कोशिश करें। पहले कुछ कविताओं के टुकड़े-

(अ) मिट्टीपन मिटाए नहीं मिटता/ आकाशपन हटाए नहीं हटता/आकाश और मिट्टी के इस संघर्ष के बीच/ मेरे ज़ख्मों का कजऱ् चुकाए नहीं चुकता

-मराठी कवि कुसुमाग्रज की कविता का एक अंश

(आ) कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता

कभी ज़मीं तो कभी आस्मां नहीं मिलता।

-हिंदवी कवि ‘शहरयार’

ऊपर के दोनों उद्धरण आधुनिकता की आधारभूत विडंबना पेश करते हैं- यहां ज़मीन या मिट्टी का अर्थ है सुरक्षा (भौतिक और मनोवैज्ञानिक), जुड़े होने की इच्छा (बिलांगिंगनेस), निरंतरता (कन्टीन्यूटी) और अस्मिता (आइडेंटिटी)। आसमान का अर्थ है- अभिलाषाओं का संसार, ख्वाहिशों की उड़ान, फैल जाने की इच्छा। प्राक्-आधुनिक इंसान को परिवार, समुदाय, परंपरा और धर्म के रूप में ज़मीन मिली हुई थी। उसकी जड़े पुख्ता थीं, उसकी संवेदना स्थानीकृत थी, आकाशधर्मा नहीं, सभ्यता के विकास ने उसकी उत्पादन क्षमता को कल्पनातीत ढंग से बढ़ा दिया और उसकी इच्छाओं को उड़ने के लिए आसमान दिया।

‘हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले‘ -गालिब

आधुनिक मनुष्यता में जड़ों और इच्छाओं, ज़मीन और आसमान का विभेद पैदा हुआ। भौतिक विकास ने इच्छाओं को कल्पना से बाहर निकालकर वास्तविकता में पूरा करने का आश्वासन दिया। आधुनिक मनुष्य के चार आर्य सत्य है- (1) इच्छाएं हैं। (2) इच्छाओं का कारण है। (3) इच्छाओं की पूर्ति है। (4) इच्छाओं की पूर्ति का मार्ग है।

लेकिन दिक्कत ये है कि इच्छाओं की पूर्ति का मार्ग बाज़ार से होकर जाता है। बाज़ार यानि भौतिक प्रगति के वितरण का तरीका। इस वितरण पर जिन शक्तियों का नियंत्रण है, वे वितरण को असमान बनाती है, लेकिन इच्छाओं की भौतिक पूर्ति संभव है, इस संभावना का सार्वभौम असर होता है। आधुनिक विकासक्रम में समाज को संगठित करने की पुरानी सभी संस्थाओं में जो कुछ नहीं था, वह सब बाज़ार में उपलब्ध है, लेकिन बाज़ार खुद, सबको सब कुछ नहीं दे सकता।

कविता में ज़मीन और आसमान एक साथ न मिल जाने की आधुनिक विडंबना कविता में एक बोध के रूप में व्यक्त हुई है, जबकि फिल्म ‘आस्था’ इस जटिल यथार्थ को फिल्म माध्यम के सारे ही संसाधनों की सहायता से उसके सारे वस्तुगत आयामों में घटनाओं का आधार देकर विकसित करती है। हालांकि आधुनिकता का यह द्वंद्व अनेकशः रूमानी कविताओं, मनोविश्लेषण और अस्तित्ववाद के माध्यम से व्यक्त होता रहा है। भारत में यह द्वंद्व अब अधिक वयस्क हुआ है, ’80 और ’90 के दशक में। पूंजीवाद की आयु दुनिया के स्तर पर बढ़ी है और इसी अनुपात में आधुनिक चेतना का विभाजन गहराता गया है।

हमने ज़मीन और आसमान के ये प्रतीक लिए ही नहीं होते यदि ‘आस्था’ फिल्म में नायिका ने एक संवाद में अपनी व्यथा इन्हीं प्रतीकों में व्यक्त न की होती। शायद इसलिए भी कि ये प्रतीक सार्वभौम हैं।

3. इस विडंबना का वाहक कौन है?

अगर आधुनिकता की यह विडंबना आधारभूत है, तो कोई न कोई तबका हर समाज में ऐसा होगा जो इस विडम्बना को सबसे पहले और सबसे ज़्यादा गहराई से अभिव्यक्त करेगा। हिंदुस्तान में यह तबका कौन-सा है? ‘आस्था’ फिल्म का जवाब है कि यह तबका है महानगरों में रहनेवाली मध्यवर्गीय युवा औरतें। फिल्म की नायिका उन्हीं का प्रतिनिधित्व करती है। ऐसा नहीं कि दूसरे सभी तबके इस विडंबना से अछूते हैं, लेकिन इतिहास का निरंकुश चुनाव इसी तबके का है। मध्यवर्ग के महानगरीय आदमी की पितृसत्तात्मक सुरक्षा इस विडंबना से बचने की एक ढाल है। उसके तरकश में आदर्शवाद के तीर इस विडंबना से निपटने के लिए अभी बाकी हैं। लेकिन एक स्त्री जरूर तैयार होती गई है जिसकी परिभाषा परिवार, परंपरा और आदर्शवाद के दायरे में संभव नहीं है। ‘रोज़ा’ फिल्म का गीत याद आता है-

दिल है छोटा सा, छोटी सी आशा

मस्ती भरे मन की, भोली सी आशा

चांद तारों को छूने की आशा

आसमानों में उड़ने की आशा-

इस उड़ने की आशा को भला कौन-सा मध्यवर्गीय आदर्शवाद समेट पाएगा? कौन-सा परिवार और कौन-सी परंपरा इस चांद सितारों को छूने की इच्छा को पचा पाएंगे? एक तरफ सीता-सावित्री का कैंप है, दूसरी ओर मिस इंडिया, मिस यूनिवर्स का। बीच में एक लंबा दायरा है इतिहास, समाज और पीढि़यों का जिसमें एक बड़ा काफिला युवा स्त्रियों का चला जा रहा है- सीता के कैंप से मिस यूनिवर्स के कैंप की तरफ, एक तीसरे कैंप की तलाश में तमाम आंवागार्द लोग, महिलाओं के जनसंगठन, समाजवादी राजनीति करने वाले, सभ्यता समीक्षक, कलाकार और विचारवंत चले जा रहे हैं, लेकिन हैरत है कि सीता-सावित्री वाले कैंप और मिस वर्ल्ड वाले कैंप में फिर भी एक संवाद है, तीसरे कैंप के अन्वेषी तो कहीं संवाद में ही नहीं।

बाज़ार ने बोतल में बंद एक जिन्न को आज़़ाद कर दिया है- वह जिन्न जो मनुष्य की दमित आज़ादी है,  उसका अपूर्ण संसार है। यह जिन्न उस पर ज़्यादा चढ़ेगा जिसकी चेतना में वह सर्वाधिक कैद था।

इस फिल्म का एक दृश्य है जो दर्शकों की समूची सांस्कारिकता को तेज़ आघात देकर विजड़ित कर देता है। एक तरफ पति अपने मित्र के साथ किसी गांव में पंचायत की कार्यवाही देख रहा है जहां औरत विक्रय की वस्तु है, लेकिन पेट में बच्चा होने के नाते पंचायत उसकी भी राय जानना चाहती है कि वह किसके पास जाना चाहेगी। दूसरी ओर पत्नी को फुसलाकर एक दलाल महिला एक धनी व्यक्ति के बिस्तर में पहुंचा देती है। एक ओर पंचायती न्याय में तन्मय पति, दूसरी ओर परपुरुष की वासना का प्रतिरोध करती, छटपटाती पत्नी, दोनों ही दृश्य तेज़ी से एक दूसरे के समानांतर दिखाए जाते हैं। नेपथ्य में तेज़ संगीत बज रहा है। मानो कि उसी के शोर से पति को पत्नी का आर्तनाद नहीं सुनाई पड़ रहा। ज़रा सोचिए दर्शक की हालत।यह दृश्य उसके सांस्कारिक मन की पीड़ा को गहराता चला जाता है।

वे जो ‘आस्था’ फिल्म का ‘जलती जवानी’ टाइप पोस्टर देखकर फिल्म देखने चले आते हैं, इस दृश्य संयोजन से वे भी स्तब्ध थे। लेकिन वास्तविक आघात तो तब लगता है जब चरमोत्तेजन की ओर अग्रसर वह घरेलू पत्नी प्रतिरोध करना बंद करके, आनंद लेने लगती है। एक आनंद जो उसके वैवाहिक जीवन में उसे कभी नहीं मिला था, एक परपुरुष ने उसे दे दिया था। हिंदी फिल्मों में इतना तनावयुक्त शायद ही कोई दूसरा दृश्यांकन हुआ होगा। पूरे हॉल में स्तब्धता छा जाती है। यहां यह कह देना आवश्यक है कि चरमोत्तेजन (Orgasm) को एक नितांत जैविक तथ्य के रूप में लेना घातक है। यहां चरमोत्तेजन एक रूपक है उस मुक्ति का जो उसे एक नीरस पारिवारिकता से मिलती है। यहां गौरतलब है कि यह परिवार कोई संयुक्त परिवार नहीं, जिसका बोझा औरतें ढोती हैं। पति भी कोई सामंत नहीं, बल्कि आधुनिक सोच बरतने वाला पढ़ा-लिखा समझदार व्यक्ति है। फिर वह क्या है जो नायिका को एक अलगाव में ले जाता है? उसके पति की पुस्तकें, उसकी विद्वता और लोकप्रियता, उसका हंसमुख और मिलनसार स्वभाव सभी कुछ पत्नी से यह अपेक्षा करता है कि पत्नी अपने व्यक्तित्व को उसी में लय कर दे। जब पत्नी कहती है कि ‘इनकी मर्जी के बगैर इस घर में सूई भी इधर से उधर नहीं हो सकती’, तो वह अपने इसी भयानक अलगाव को व्यक्त कर रही होती है। असल में यह औरत अपने जि़ंदा हस्ती के लिए स्वायत्त लिविंग स्पेस खोज रही है। पति का सारा आदर्शवाद जो इस स्त्री के स्वाधीन व्यक्तित्व की अवहलेना पर टिका है; वह आदर्शवाद स्त्री की संवेदना, उसके भावनात्मक संसार, स्वप्न और अभिलाषाओं के प्रति अंधा है। पुरुष होने के नाते परिवार के बाहर भी उसकी एक दुनिया है, लेकिन स्त्री के लिए छत, दीवार, घरेलू काम, भोजन, बच्ची और पति मिलकर उसके अस्तित्व के अधूरेपन का गायन करते हैं, उसे सेलेबे्रट करते हैं; यहीं आकर यह फिल्म आदर्शवाद पर टिके मध्यवर्गीय एकल परिवार (न्यूक्लियर फैमिली) के खोखले स्त्री-पुरुष संबंधों का भाष्य बन जाती है। इन संबंधों में बहुत-सा आदर्शवाद, आवेग (पैशन) और अनुभव की साहसिकता (एडवेंचर) के ज़बर्दस्त अभाव पर पर्दा नहीं डाल पाता। यही कारण है कि यह परिवार बाज़ार के सामने इतना असहाय है।

4. तुम्हीं से जनमूं तो शायद मुझे पनाह मिले-

इस फिल्म के आखीर में एक खूबसूरत गीत फिल्माया गया है जिसकी टेक है- ‘तुम्हीं से जनमूं तो शायद मुझे पनाह मिले।’ इस फिल्म की नायिका ने बाज़ार में ज़रूरतों से आगे ख्वाहिशों के एक संसार को अपना इंतज़ार करते पाया, लेकिन इन ख्वाहिशों की पूर्ति को वैधता नहीं प्राप्त है। बाजार उसके व्यक्तित्व की न पाई गई अभिव्यक्ति को स्वायत्त करता है, लेकिन जड़ों से उसे उखाड़कर, उसकी संबंध भावना की विशिष्टता छीनकर, उसके निरंतरताबोध को विघटित करके। उसकी नई पाई गई आज़ादी वैधता के लिए भटकती है। अजीब दयनीय है यह आज़ादी जिसने उसके व्यक्तित्व को विभाजित कर दिया है। एक तनी हुई रस्सी पर विभाजित व्यक्तित्व के दोनों हिस्से एक दूसरे से मिलने के लिए दिन-रात चलते हैं। भटकती हुई आत्मा अपनी मुक्ति का स्तोत्र पढ़ती है- ‘‘तुम्हीं से जनमूं तो शायद मुझे पनाह मिले…’’ क्या यह प्रेतमुक्ति संभव हो पाएगी?

इस गीत के दृश्यांकन में आदमी-औरत के पारंपरिक रिश्तों का इतिहास बजता है। गीत के दौरान ओमपुरी की भंगिमा हिंदी फिल्मों के न जाने कितने आदर्शवादी नायकों को एक साथ उपस्थित कर देती है। अपनी ही ज्वाला में धधकती भटकन को रेखा उतनी ही खूबसूरती के साथ चेहरे में उतार देती है। सब्र और ज़ब्त का प्रतीक बना नायक नायिका के समूचे आवेग को अपने हिमालय जैसे मजबूत कंधे पर सांत्वना की ठंडी थपकी देता है। अजीब विडंबना है कि आवेग और साहसिकता की ज्वाला बर्फ जैसे ठंडे और धैर्ययुक्त आदर्शवाद से मांग करती है- ‘तुम्हीं से जनमूं तो शायद मुझे पनाह मिले’- इस गीत का पुरुष पहाड़-सा धीरज है और औरत है बहाव से युक्त सरिता। पहाड़ से नदी निकलती है, इस युग-युग की स्वाभाविकता को फिर से पाने की कोशिश है, लेकिन प्रतीक बदल गए हैं- पहले जो पहाड़ था, वह आज भी बर्फ है। किंतु पहले जो नदी थी, आज वह ज्वाला है। इस गीत के फिल्मांकन से लगता है कि ज़मीन फिर पंरपरा में खोजी जा रही है, लेकिन ‘शायद’ नहीं। ‘तुम्हीं से जनमूं तो शायद मुझे पनाह मिले’- इस पंक्ति का भेद खोलने वाला शब्द है ‘शायद’, जो कि पूरे दृश्यांकन में नायक और नायिका की पूरी संकल्पना के बीच दरार की तरह सक्रिय है। आधुनिकता ने ज़मीन और आसमान, ज़रूरत और अभिलाषा, परिवार और बाज़ार, आदर्शवाद और आवेग, तर्कसम्मत और अतक्र्य के बीच जो विभाजन पैदा किया है, वह किसी उच्चतर क्रांतिकारी रूपांतरण में हल होगा, अथवा वापसी संभव है? कुछ लोग परिवार को पवित्र गाय मानते हैं। उनसे इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि एकल परिवार खुद बाज़ार के दबाव से पैदा हुई है। संयुक्त परिवार बाज़ार के दबाव में ही टूटा था। इसलिए एकल परिवार को बाज़ार के ऊपर कोई नैतिक व्यवस्था मानना गलत है।

अपने ही जीवन की कथा, पति की कहानी में सुनने के बाद एक दृश्य में जब बिस्तर में नायिका उससे पूछती है कि यदि यह कहानी सचमुच सही हो, और कहानी की नायिका वास्तविकता में वह स्वयं हो, तो क्या उसी विशालहृदयता के साथ वह उसे समझने की कोशिश करेगा? ओमपुरी का जवाब है- ‘कुछ भी हो सकता है।’ जी हां! कुछ भी हो सकता है। जिन्न को पकड़कर वापस बोतल में भेजने की कोशिश भी हो सकती है। विकसित पूंजीवादी देशों के नेता परंपरा और परिवार को बचाने की चीख पुकार मचा ही रहे हैं। लेकिन, दूसरी ओर आदर्शवाद की खोल उतारकर इंसान और जिन्न अर्थात् इंसान और उसका ही सद्यःमुक्त रूप जो जिन्न की तरह उसकी चेतना में कैद था, उन दोनों का मिला-जुला रूप भी पैदा हो सकता है। रास्ता खुला है। रास्ता फिल्म में नहीं, जि़ंदगी और इतिहास की गतियों में है। शुक्र है कि ‘इतिहास’ का अभी तक ‘अंत’ नहीं हुआ है।

प्रणय कृष्‍ण। इलाहाबाद युनिवर्सिटी और जेएनयू से अध्‍ययन। प्रखर हिंदी आलोचक। जन संस्‍कृति मंच के महासचिव।  देवीशंकर अवस्‍थी सम्‍मान  से सम्मानित ।

प्रणय कृष्ण की सद्य प्रकाशित पुस्तक ‘प्रसंगवश: साहित्य और समाज की चंद बहसें’ से साभार
(लोकयुद्ध , 16 मार्च -17 अप्रैल, 1997)

हैदर और बर्फ के अंगारे: तत्याना षुर्लेई 

कलाकार की रचना-प्रक्रिया से वास्ता रखना सिर्फ एक बौद्धिक शगल नहीं होता है बल्कि इसका सीधा संबंध पाठ-प्रक्रिया से भी होता है. पाठ-प्रक्रिया को ज्यादा दूर तक खींचने की जरुरत नहीं है बल्कि इसे अभी समीपी-अध्ययन (Close Reading) तक ही सीमित रखा जाय तो बेहतर है. विशाल भारद्वाज ‘हैदर’ क्यों बनाना चाहता था? क्या इस सवाल को ढूंढें बिना ‘हैदर’ की ‘क्लोज रीडिंग’ की जा सकती है !! इसे बहुत सरल शब्दों में कहा जाए तो वह यह कि विशाल भारद्वाज शेक्सपीयर के तीन नाटकों पर फिल्म बनाना चाहता था. ‘मैकबेथ’ और ‘ऑथेलो’ पर क्रमशः ‘मकबूल’ और ‘ओमकारा’ बना चूका था. इसी प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए उसने ‘हैमलेट’ को ‘हैदर’ के रूप में परदे पर रूपांतरित किया है. ‘हैदर’ की परिवेश विषयक ‘असंगतियों’ पर अथाह चर्चाएँ हो चुकी हैं और ऐसी तमाम चर्चाएँ कहीं न कहीं ‘फिल्म’ को कला के एक विधा के रूप में, एक प्रसिद्द नाटक के दृश्य में रूपांतरण के सन्दर्भ में और एक निदेशक की रचना-प्रक्रिया के सन्दर्भ में देखने में अक्षम रही हैं. तत्याना ने इन्हीं अछूते मुद्दों को बारीकी से देखने की कोशिश की है.

हैदर (२०१४)- पोस्टर

हैदर (२०१४)- पोस्टर

 By तत्याना षुर्लेई 

50 अलग अडॉप्टेशन के बाद नया और इतना अच्छा हैमलेट सिर्फ एक जीनियस बना सकता था।

हैमलेट का अभिनय करना न सिर्फ हर अभिनेता का ख्वाब होता है, बल्कि यह वह नाटक भी है जिसकी अलग-अलग व्याख्याएं हर दौर में संभव होती रहेंगी और शायद इसलिए इसका संयोजन आसान नहीं है। ‘हैदर’ विशाल भारद्वाज की ऐसी तीसरी फिल्म है जो शेक्सपीयर के नाटकों पर आधारित है और यह भी लगता है कि यह अब तक की उनकी सबसे अच्छी फिल्म है।

‘हैदर’ की कहानी कश्मीर में चल रही है, इससे अच्छी और प्रासंगिक बात कुछ और हो नहीं सकती थी। शेक्सपीयर के नाटक में कहा जाता है कि देश की स्थिति ठीक नहीं है और वह देश अक्सर जेल जैसा दिखाया जाता है। भारत में कश्मीर के अलावा वह कौन-सा प्रदेश हो सकता था जहां की स्थिति नाटक की तरह ही गड़बड़ है और जिसके नागरिक कैदी की तरह जीवन बिताते हैं? बहुत से आलोचक इस फिल्म की राजनीतिक स्थिति के बारे में लिखते हैं, लेकिन सबसे पहले यह स्पष्ट करना जरूरी है कि विशाल भारद्वाज चाहते क्या थे? वह चाहते थे कि फिल्म के दर्शक न सिर्फ ‘हैदर’ के दुःख को समझें बल्कि यह भी देखें कि वह अपने पिता की तरह ही विक्टिम बन गया है। फिल्म के निर्देशक को इतनी जटिल परिस्थितियों की तलाश इसलिए भी थी ताकि वे वास्तव में शेक्सपीयर के नाटक से मिलती-जुलती लगें। दि ट्रेजेडी ऑफ हैमलेट, प्रिंस आफ डेनमार्क में डेनमार्क न सिर्फ नायकों का देश है बल्कि पूरी दुनिया का एक निचोड़ भी पेश करता है जहां बुराई का राज है और बुरे लोग हमेशा जीतते हुए पाए जाते हैं। विशाल भारद्वाज की फिल्म में यह वक्तव्य-विवरण (statement) भी बहुत अच्छी तरह दिखाया गया है। आजकल कोई नहीं बोलेगा कि अगर धरती पर कहीं स्वर्ग है तो वह यहीं है यहीं है यहीं है, क्योंकि आज का कश्मीर एक नर्क है जहां के लोग भयरहित नहीं हैं और वहां किसी को नहीं मालूम है कि कौन दोस्त है और कौन दुश्मन। नर्क जैसे भयावह और भयानक समय-समाज में मनोरंजन (बॉलीवुड/सिनेमा) एक ख्याली पुलाव है, जहां सलमान खान के नकलची/प्रशंसक भी हत्यारे निकलते हैं और सिनेमा-घर का इस्तेमाल लोगों को मौत की सजा देने के लिए होता है। संघर्ष के दोनों पक्ष समान रूप से जालिम हैं और यह दयाहीनता हैदर और उसके पिता के अंदर भी घुसपैठ बढ़ा रही है। नायक का पिता, डॉक्टर हिलाल इंतकाम चाहता है और हैदर भी सचमुच में मानने लगता है कि इंसाफ पाने का यही एकमात्र विकल्प है, लेकिन अंत में वह समझ जाता है कि यही वह इंतकाम है जिसके चलते उसमें, कश्मीर में और पूरी दुनिया में दयाहीनता और निर्ममता या कहें कि बुराई हमेशा के लिए विद्यमान रहेगी। क्या कश्मीर के अलावा इतना प्रासंगिक कोई दूसरा उदाहरण संभव था? यह स्थान इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि फिल्म के परिवेश में व्याप्त ठंडापन और सख्ती भी शेक्सपीयर के डेनमार्क से मिलती-जुलती है जो इस बात के लिए भी उकसाती है कि विशाल भारद्वाज का रूपांतरण दि ट्रेजेडी ऑफ हैमलेट, प्रिंस ऑफ डेनमार्क से एक मायने में अलग भी है और बहुत समान भी। फिल्म में ज्यादा रंग नहीं दिखाए जाते हैं और जो हैं भी, वे धीरे-धीरे गायब हो जाते हैं। अंत में बस एक तेज रंग, लाल, ही बाकी रह जाता है जिसे फिल्म में बर्फ से भरपूर एकवर्णी दृश्य में अलग से चटखता हुआ दिखाया जाता है।

अत्यधिक ठंडे माहौल के कारण संघर्ष और खतरे का एहसास और भी जोरदार बन जाता है। विशाल भारद्वाज की इस फिल्म में कहीं भी वातानुकूल या गर्म माहौल नजर नहीं आता है। जब लोग अपने घरों में हैं तब भी उनके मुंह से भाप निकलती है। बस प्रेम-दृश्यों में यह ठंड थोड़ी-सी कम हो जाती है, और यह सिर्फ हैदर और अर्शिया के प्रेम-प्रसंगों में ही नहीं दीखता है बल्कि गजाला और खुर्रम के प्रेम-प्रसंगों में भी दर्शनीय है। इस फिल्म में नाटक से जो सबसे बड़ा अंतर दीखता है, वह यह है कि फिल्म में हैदर का चाचा उसके पिता और अपने भाई को राज्य के लिए नहीं बल्कि उसकी बीवी को पाने के लिए फंसाता है और बाद में मरवा देता है। यह बड़ा अंतर भी कुछ आलोचकों को पसंद नहीं है, लेकिन शेक्सपीयर के नाटक के आधुनिक रूपांतरण में राज्य को हड़पना दिखाना थोड़ा मुश्किल है और यह अजीब भी लग सकता है, क्योंकि वह आज के समय में बड़ी कंपनियों में चलने वाली हैमलेट की कहानी बन चुकी है… (Hamlet, Michael Almereyda, 2000) गजाला अपने पति से ज्यादा खुर्रम को प्यार करने लगती है और शायद इसलिए कि डॉक्टर हिलाल अपने काम में ज्यादा व्यस्त रहता है और खुर्रम के लिए सिर्फ गजाला सबसे महत्वपूर्ण है। यद्यपि यहां फिल्म नाटक से अलग है। एक औरत के लिए किसी को मार देना या युद्ध तक करना कोई नई बात नहीं है, न सिर्फ यूरोपीय साहित्य में बल्कि भारतीय साहित्य में भी इसे आसानी से चिन्हित किया जा सकता है। फिर भी, जो नई और दिलचस्प बात विशाल भारद्वाज की फिल्म में है, वह यह है कि मेच्योर औरत को दिखाने के इस नए तरीके के लिए बॉलीवुड के दर्शकों को ‘हैदर’ तक बहुत इंतजार करना पड़ा है। हैदर की मां अपनी ढलती उम्र के बावजूद एक सुंदर और आकर्षक औरत होने के एहसास को महसूस कर सकती है, उसे अपने प्रति एक आदमी को पागल बनाने के लिए होमर वाले ‘दी इलियड’ की हेलेन ऑफ ट्रॉय या रामायण की सीता की तरह जवान होने की आवश्यकता नहीं है, और ऐसी नायिकाएं भारतीय सिनेमा से अक्सर गायब ही दिखती हैं। फिल्म की शुरुआत में गजाला को दूसरी मुसलमान औरतों की तरह ही दिखाया जाता है, लेकिन खुर्रम के घर जाने के बाद उसके कपड़े बदल जाते हैं, बाल वह हमेशा खुले रखती है और वह सचमुच में एक लुभावनी (सिडक्टिव) औरत में तब्दील हो जाती है। गजाला को सिर्फ खुर्रम से ही प्यार नहीं है, बल्कि सबसे पहले उसे अपने बेटे से प्यार है, इसलिए उसकी आत्महत्या अर्शिया की खुदकुशी से अलग है। पिफल्म की ये दो औरतें ‘गलत प्यार’ में पड़ जाने या पिफर परिस्थितिगत विपर्यय के कारण खुद को मार लेती हैं। अर्शिया अपने पिता के खूनी से प्यार करती है, गजाला अपने पति के हत्यारे से, और यह उनके लिए असहनीय है। गजाला की मौत में क्रोध्, हलचल और नाटकीयता भी है क्योंकि वह न सिर्फ खुद को मारना चाहती है, बल्कि अपने बेटे को बचाना भी चाहती है। अर्शिया की मृत्यु अपेक्षाकृत उत्तेजनाविहीन और शांत है। अपने पिता की मौत के बाद वह नाटक की नायिका की तरह पागल हो जाती है, लेकिन दूसरों को फूल देने के बदले वह अपने पिता के लाल स्कार्फ को रेशा-रेशा बर्बाद करती हुई दिखती है। यह स्कार्फ उसने खुद ही बनाकर अपने पिता को भेंट किया था और हैदर को पकड़ते समय अर्शिया का पिता इसी स्कार्फ से हैदर की गर्दन को अपने काबू में लेता है। आज उसी स्कार्फ के रेशे-रेशे हो गए, रेशम उसके जख्मों को प्रतिबिंबित करता हुआ जान पड़ता है। इस दृश्य को विशाल भारद्वाज ने एक काव्यात्मक ऊंचाई दी है।

दि ट्रेजेडी ऑफ हैमलेट, प्रिंस ऑफ डेनमार्क को देखने वाले हमेशा दो दृश्यों का इंतजार करते हैं : पहला नायक द्वारा उच्चरित, टू बी ऑर नॉट टू बी वाला आत्मालाप और दूसरा नायक द्वारा खोपड़ी से बातचीत। फिल्म में टू बी ऑर नॉट टू बी, टू गो ऑर नॉट टू गो हो गया है जो इसे व्यंग्यात्मक और थोड़ा-सा निराशाजनक भी बनाता है, हालांकि यह शेक्सपीयर से मिलता-जुलता भी है क्योंकि उसके नाटक में बहुत सारे हास्यप्रद तत्व मिलते हैं, लेकिन खोपड़ी वाला दृश्य एक मास्टरपीस है। नाटक में कब्रिस्तान में काम करने वाले हैमलेट की प्रेमिका के लिए कब्र बना रहे हैं और फिल्म में तीन बूढ़े अपने लिए कब्र बना रहे हैं। कब्रिस्तान में गाने वाले बूढ़े प्राचीन ग्रीस के नाटकों के कोरस की तरह पूरी कहानी का समाहार पेश करते हैं। उनकी तीन कब्रें ऊपर से एक खोपड़ी जैसी दिखाई जाती हैं। वह खोपड़ी, कब्रिस्तान और थके हुए लोग, जो सोना चाहते हैं और जिनके लिए उम्मीद सिर्फ अंधेरा ही अंधेरा है, पूरे कश्मीर का रूपांतरण भी बन जाते हैं, गजाला और हुसैन मीर के शब्दों से ज्यादा मजबूत। हैदर की मां और उससे पहले हुसैन मीर कहता है कि इंतकाम से आजादी नहीं मिलती है, लेकिन वह शायद इसलिए नहीं मिलती है क्योंकि लोग सचमुच ही ज्यादा थक गए हैं।

फिल्म की संरचना को अगर बारीकी से देखें तो इसकी बुनावट में निर्देशकीय रचनात्मकता का एक सचेत प्रयास स्पष्ट ही दिखता है। इसमें बहुत से दृश्य बार-बार जोडि़यों में दिखाए जाते हैं। फिल्म की शुरुआत में डाॅक्टर के घर को बारूद से उड़ाकर धूल में मिला दिया जाता है और अंत में कब्रिस्तान में ऐसे ही एक दूसरे घर को इसी तरह से नष्ट किया जाता है। अपने घर के खंडहर में हैदर जब पहली बार अर्शिया के साथ होता है, तब लड़की का भाई आता है, जब दूसरी बार वहीं वह अपनी मां से मिलता है, तब अर्शिया का पिता आता है। मरे हुए लोगों की लाशों के ढेर से एक लड़का उठ जाता है, कब्रिस्तान में जीवित लोग कब्र में लेट जाते हैं। डॉक्टर के घर में इबादत करने वाले एक आदमी को मार दिया जाता है, बाद में खुर्रम को उसका इबादत करना ही उसे मरने से बचा लेता है। गजाला अपने शाल के नीचे छिपाए रिवाल्वर से अपने बेटे को इमोशनली ब्लैकमेल करती है और बाद में शाल के नीचे छिपाए हुए ग्रेनेडों से खुदकुशी करती है। दूसरी दिलचस्प बात फिल्म में गाने का इस्तेमाल है जो बहुत ही अच्छा बन पड़ा है। सब से जीनियस दृश्य कब्रिस्तान में होने वाला कार्य-व्यापार है जिसकी चर्चा ऊपर की गई है। हैदर द्वारा गजाला और खुर्रम को, संकेत में ही सही, संबोधित नाटकीय और कहानीनुमा गाना भी बहुत ही खास है और उसका नृत्य और चेहरे पर रंगों की लकीरें न सिर्फ जनजातीय लोगों में प्रचलित युद्ध वाले नाच जैसा है, बल्कि एक तरह से तांडव-दृश्य को रचता हुआ मालूम पड़ता है।

शुरू में मैंने लिखा कि हैमलेट का अभिनय करना हर अभिनेता का ख्वाब है और इस फिल्म में शाहिद कपूर ने न सिर्फ इस ख्वाब को निभाया है बल्कि उसने और तब्बू ने पूरी फिल्म को ही लगभग चुरा लिया है।

साभार- पाखी, नवम्बर, २०१४ 

Tatiana Szurlej

Tatiana Szurlej

तत्याना षुर्लेई एक Indologist और फिल्म-आलोचक हैं। हंस, पहल, अकार आदि हिन्दी पत्रिकाओं के लिए लिखती रही हैं। फिलहाल पोलैंड के शहर क्राकोव स्थित Jagiellonian University में The Courtesan Figure in Indian Popular Cinema:Tradition, Stereotype, Manipulation. नामक विषय पर पीएचडी के लिए शोधरत हैं। 

Haider: Is Vishal Bhardwaj the new Laurence Olivier? By Tatiana Szurlej

Engaging with the creative-process of an artist isn’t merely an intellectual hobby but it is also directly related to the textual-reading. It is not necessary to overstretch this textual-reading but it is preferable to limit it to close-reading. Why did Vishal Bhardwaj want to create ‘Haider’? Is a close-reading of ‘Haider’ possible without answering this question!! To put it very simply, Vishal Bharadwaj wanted to make films on three plays of Shakespeare. He had already made ‘Maqbool’ and ‘Omkara’, respectively on Macbeth and Othello. Taking forward this journey, he has adapted Hamlet as ‘Haider’. There have been countless discussions on the ‘discrepancies of Haider’s milieu’ and all these discussions, somewhere fail to see ‘film’ as a form of artistic expression, as a screen  adaptation of a classic play and to locate it in the context the creative-process of a director. Tatiana has tried to examine these untouched aspects closely. A Hindi version of the present critique is also available, which will be shortly published in the November issue of a monthly print magazine; we will try to present it here as soon as the issue actualises. 

Haidar (2014)- Poster

Haidar (2014)- Poster

By Tatiana Szurlej

It is hurculean task to act Hamlet, but it’s also a prized dream of many ambitious actors. May be that’s why there have been so many screen adaptations of one of the best and at the same time one of the most difficult of Shakespeare’s plays. We’ve already seen many variations of it, from routine conventional and traditional interpretations to unorthodox adaptations. Vishal Bhardwaj’s Haider is one of those adaptations, where the director tries to narrate an old story in a new context, like he did earlier with two other plays of Shakespeare, Macbeth and Othello. And this time Bhardwaj showcased not only the best of his Shakespearean plays, but also the best of his works so far. With this film he clearly demonstrates that Shakespeare can be read in different historical and cultural contexts. But to do so, meticulous reading and understanding of Shakespear is a must. Sure Bhardwaj makes certain changes in the story, but at the same time he stays as much Shakespearean as he can possibly, and this puts him in the same league with Kenneth Branagh or Laurence Olivier.

Haider is set in Kashmir, the idyllic panorama abandoned not only by Indian filmmakers, who opt for Switzerland instead, but even by God himself, a denouement similar to the kingdom of Denmark, described by Shakespeare as a place where everything rots. Is there any better location in India with similar denouement? The tragedy of Hamlet lays not only in the fact that his father is murdered, but, mostly in the situation that gets more and more complicated with the consequence that Hamlet becomes everybody’s enemy, a boy who is (at least in the beginning) all innocent like any one else. To reveal this mechanism at work, it is important to put in some political bacdrop in the screen story and to throw up a live and palpable conflict, this alone can help the viewer to understand the protagonist’s situation. Denmark, as presented by Shakespeare, is a metaphor for a world where the power that reigns is Evil and where to survive means to be Machiavellian. Bhardwaj toes the line, showing Kashmir as a place where nobody is comfortable and safe, and where even a madman is not allowed to pour out his heart. Kashmir is no more the heaven on the earth, it has turned into a hell, where even an entertainment such as Bollywood cinema is in fact a camouflage, hiding murderers and their criminalities. There are no good and bad sides of the conflict shown in the film; both are cruel and heartless. Even the protagonist’s father loses his great humanity, clearly shown in the beginning of the story, and becomes a wicked person who wants revenge. For a while heartbroken Haider really thinks that this is the best way to fight for justice, but in the end he changes his mind, realizing that looking for vengeance is not the way to fight for freedom. At the same time, however, Haider becomes murderer too, who kills and causes death of his beloved ones which makes him a different, wounded person, and his victory a bitter one.

Kashmir is an important setting not only because of political background, but also for visual aspect of the film. Monochromatic and cold places again associate the story of Bhardwaj with unadorned medieval Denmark of Shakespeare’s play. There are not many colours in the film, and those which appear in the beginning gradually vanish along with the announcement of the “new Kashmir” and subsequent snow-fall, making the environment more and more frigid. Finally there is only sombreness left, with some strong red elements, which emphasizes not only the blood, but also show-cases the exact theme of the story, the anger of the protagonist and his mother’s strong sexuality. The red patch on the face of dancing Haider intimates the fact that his mother becomes sexual attraction and gratification for another man, and his cpnsequent rage of vengeance.

The biggest difference between the film and the play lays in the fact that Haider’s father was killed by his brother not for the kingdom, but because of his beautiful wife. This change in ploy is natural, since it is rather difficult to depict the contemporary tale in which two brothers fight for the kingdom, especially if the story supposes to be original (there is already a version of the play in which Hamlet’s father is an owner of the big company – a film made by Michael Almereyda in 2000, and there was no point of repeating this idea). Haider’s mother, Gazala, seems to love her brother-in-law Khurram more than her husband, may be because doctor Hilal was so busy with his job and unmindful of putting his family in danger from time to time, on the other hand Khurram cares only for her. The feelings of Gazala and other characters are clearly visible in many scenes, because, as already mentioned, there is not much warm in the film, and even when protagonists stay inside their houses their breaths are often frozen. Only love makes the environment a bit warmer, the one that Haider feels toward Arshya, toward his mother, and also those which Gazala has for Khurram. Here, even if there is a little difference between the film and the play, a strong Shakespearean spirit remains intact with its strong influence of the ancient Greek and Roman culture which clearly appears in Gazala motif, being another example of the stories in which a woman inevitably is the reason of war. What is, however, new in the adaptation of Bhardwaj, and probably shocking for Indian cinema, is the fact that spectators finally can see a mature woman, who still is so attractive that she can smite her brother-in-law. Gazala doesn’t have to be young to become as much desirable as the best known heroines, like, Helen of Troy from The Iliad or Sita from Ramayana. And Tabu could play the real, eye-catching woman, and not only a suffering mother, so much characteristic of Indian cinema, proving the point and rightly so that it is possible to cast mature actresses in interesting roles. In the beginning of the film Gazala is depicted in a very conventional way, as many Muslim wives, but after she moves to Khurram’s house she starts wearing different clothes and dissolves her hair, which makes her more and more seductive. Despite her sexuality, however, she remains a mother, that’s why her suicide is different from the one committed by Arshya. Both heroines, the only women in film, become victims of their “wrong love” which cause their death. Arshya loves a man, who killed her father, Gazala marries a murderer of her husband, but as already mentioned, Gazala is not only a lover, but also a mother, that’s why her suicidal death is full of anger and thirst for blood of those who want to hurt her son. To the opposite, Arshya’s death is calm and almost unnoticeable. She doesn’t distribute flowers to other people like Shakespeare’s Ophelia, but destroys her father’s red scarf, which she had made and given to him earlier. Bhardwaj doesn’t show her committing suicide, but lying on the bed covered with red wool, which looks like wounds, and which becomes an interesting counterpoint with real wounds covering Haider’s face in the final sequence of the film.

The Tragedy of Hamlet, Prince of Denmark is widely known for the hero’s famous “to be or not to be” monologue, and his conversation with the skull of jester. Bhardwaj decides to present the monologue in a rather comical way, two Salmans ask each other if they should go or should not, but this change also stays in the spirit of the play, in which we can also find many humorous elements. The second scene, however, appears a masterpiece, becoming one of those rare moments in the film, which stays with the viewer even long after the show. There are two gravediggers in the play who prepare the grave for Ophelia singing obscene songs. Bhardwaj shows three old men, who dig graves for themselves while singing a haunting song of tired people, who want to sleep. Their dark figures presented on the snow not only look like a chorus from ancient Greek theatre, who comments what is going on in the tragedy, but, in fact, becomes one. The bird’s-eye view shot shows the three holes made by old men look like a huge skull as well. This skull-like ground, graveyard, and tired people become another metaphor of Kashmir, much stronger than Gazala’s and Hussain Mir’s statement about meaninglessness of vengeance. They both say that revenge would never bring freedom to anyone, but maybe people are still forced to live in hell because they are too tired to try to escape.

There are many elements in the film, which, even if they don’t play big part in the story, are clear reference to the play, like the hobby-horse mentioned by Hamlet and shown in the scene in which the birth of new Kashmir is announced. There are also, apart from the counterpoint mentioned above, many other scenes, which become complemented with each other. The demolished house of the doctor Hilal in the beginning comes back in the climax as another building, this time the one on the graveyard, destroyed in similar way. Arshya’s brother disturbs his sister, when she accompanies Haider to the ruined house, and when the protagonist comes back to the remains of the building, this time to meet his mother, the person who disturbs again is Arshya’s father. There is a boy getting up from the heap of dead bodies and alive people who lay in the graves. There is also a man, who is killed while praying in doctor Hilal’s house, and another pray which saves Khurram’s life. The revolver, by which Gazala tries to blackmail her son is hidden under her shawl just like the grenades, which will help her to save him at the end, and so on. Another interesting thing is the use of music with few songs, being rather a background than a real performance. The only exceptions are the mentioned scene in the graveyard, and the show revealing Khurram’s crime which are both very important parts of the film. The dance of Haider, by which he shows his anger and despair, is not only similar to a tribal war dance, but also to destructive rage of tandava, and as such is one of the most intriguing part of the movie.

As mentioned in the beginning, playing Hamlet is a dream chance for many actors, but not many of them can put the chance to good use. Shahid Kapoor’s performance, however, upstaged all the other, maybe except Tabu’s, which is outstanding as well. Of course the other characters were not so expressive, however, still extraordinary, like, the ghostly white figure played by Irrfan Khan, or Kay Kay Menon begging for death, but Kapoor and Tabu simply stole the whole show. In my private rating I give the film 9/10, not 10/10 because of the unnecessary use of the voice-over, repeating the statements about vengeance in the last scene, where Haider puts the gun to Khurram’s head and then leaves him. There was no need of such literalism, typical rather for simple mainstream stories, which sometimes make viewers bored and distracted. Still, even knowing that Vishal Bhardwaj never disappoints, I haven’t seen such a good film for a long time.

Tatiana Szurlej

Tatiana Szurlej

Tatiana Szurlej is a young Indologist and film critic. She also contributes about Bollywood in Hindi journals more often. Currently, she is working on “Tradition, Stereotype, Manipulation: The Courtesan Figure in Indian Literature and Popular Cinema” for her Ph.D from Faculty of Philology, Jagiellonian University, Krakow. She can be contacted on tatiana.szurlej@gmail.com.

A ‘Third Way’ in the Hills: Bela Negi’s Film Daayen Ya Baayen(2010)

By Dhiraj kr. Nite

 It has been a refreshing feel of watching a movie Daayen Ya Baayen, directed by Bela Negi. I share my opinion over this two-year old movie at a time when the cinematic technique, storytelling, and plot of Gangs of Wasseypur (directed by Anurag Kashyap) have successfully drawn rave reviews from the viewer. This discursive backdrop of Gangs of Wasseypur urges me to present my commentary on Daayen Ya Baayen (hereafter DYB), which appears in a certain way an antidote to the former movie. Take an example. The plot of DYB could have perfectly combined a few fight scenes. Instead, Bela Negi gracefully concentrated on two different orders of violence and fight. One relates to the ecological violence committed by new mining activity on the Himalayan hills. Second concerns itself with the emergence of fighting awareness regarding the on-going calamitous path of opulence; and the resolution adopted to move away from such an anomaly.

The story prima facie narrates the desire, dream, and initiatives of a city-returned man – a schoolteacher (Ramesh Majila) – who is disillusioned with the life in Bombay and returns to the Uttrakhand hills. He intends to do something in the village itself for a descent, free life. By sheer coincidence he receives a red car to become locally popular. The red car also invites jealousy of others to its owner. He is interested in getting opened a Kala – Kendra in the hill village with a view to have opportunities for local artists to nurture and express their talent. They would not migrate to and face a rough tide in the un-embracing cities.

The subscripts of DYB illuminate more shades of collective hill life than its main plot. As a whole its delivery of plot and cinematic presentation are finesse and enjoyable. Like the movie ‘Om Dar Badar’ directed by Kamal Swaroop, DYP is a cinematic representation of a space. Or, to put it in other words a space (Uttrakhand hills) is the character itself than a passive backdrop in the movie. The movie captures varieties of physical and human activities, voices, emotions, and exchanges taking place in that space. It engages with their manners of manifestation. The fleeting appearance of forest fires and captivating presence of the TV serials between the women serve that intent. Likewise is the transient appearance of a sedate, beguiling woman clad in the red sari on a bus. The characters are rooted in the intersection of time and space; hence are there a number of sub-scripts harmoniously interwoven. The hill, the forest fires, and the buffalo – calf are as much symbolic representatives of the space as the rest of social being.

The plot embodies the narrative realism. The non-linear progress of life course characterises both the large trope and other sub-tropes. There are incidental happenings, like the lottery of a red car won through submission of a jingle. At times, the protagonist regresses in his life course. Liquor embraces him like other hill youth. Such a moment is as ordinary incidence as the effort of the protagonist to bounce back on the path of a hope in a new rise of the red son in the hills. There is no extraordinariness either with the moment of regression or the recovery from it.

The movie interweaves the director’s critical message about the development path seen in the hills. It argues in favour of the ecological sustainable path of betterment. The message impressively comes through, for the storytelling does not become preachy. The message remains interwoven with the life course of the protagonist and the hills. Not ironically, whenever the protagonist’s attempt to preach his new vision and judgment invariably draws flak from other characters. Two significant messages come along in an understated way. The Ramesh Majila submits to the charm of a beguiling woman clad in a red sari who is always on move. She refuses to accommodate the kid of Ramesh on her bus-seat. The facial reaction of Ramesh conveys his dismal with the reality: the beguiling physical appearance does not necessarily incubate a humane, pleasant inner-self. The latter should receive more attention and regard than the former one which could be misleading. At one point, Ramesh agrees to campaign for the incumbent chief minister of the state. In return, he hopes to materialise his dream of a Kala – Kendra in his village. He explains this bargain to his inquisitive son: he is making a small sacrifice in favour of an important, big thing to come. There is not much time spent on making his statement exemplary. The director undertakes a rapid movement of scenes towards the protection of a buffalo – calf at the expense of a popular car. This is tantamount to a virtual protection of the hill life and its environ.

The deployment of symbolism and frames of the camera immensely enriches the plot and comes out smoothly to convey the message of the director. Two examples are worth to note. The sedate, pretty woman on the bus was effectively beguiling. But, she embodied the misleading superficial goodness. Her nasty treatment of the child (Baju Majila) exposes her ugly inner spiritual being, and thus, functions as repellent to Ramesh. The latter saves his buffalo-calf by putting at stake his life and car. He installs the gate of a new Kala – Kendra next to the place where his jettisoned car has been irrevocably hanging. The car initially appeared as a means to attain community respect. The calf was presumed as a burden. Towards the end, this equation undergoes a turn upside down.

The title of the movie Daayen Ya Baayen refers to the right and left paths of development or social change. Bela Negi does not intend to resolve the conflict between the two models of development by showing her any simplistic prejudice for one against the other. The third way suggested in the movie bursts forth as a case by case choice. The people in Uttrakhand hills need a Kala – Kendra, but the mining appears destructive and undesirable. DYB is possibly only one movie in the recent time where the Ramesh returns to the village with intent of discovering an opportunity of descent, free life. Only the malefic spirit moves away from the village to a town. Urbanisation and industrialisation are no longer universal signs of social progress as per Bela Negi’s third way. Accolade!

 Dhiraj Kumar Nite, A Social Scientist, University of Johannesburg,  Ambedkar Univeristy Delhi.

गैंग्स ऑफ शंघाई का नॉस्टेल्जिया है वासेपुर: कुमार सुन्दरम

(गैंग्स ऑफ़ वासेपुर की इधर खूब चर्चाएँ हैं, प्रशंसकों की एक लम्बी कतार भी खड़ी हुई, लेकिन प्रशंसा के आधार को स्पष्ट करती हुई कोई समीक्षा अभी गुजरी नहीं है. जैसी स्पष्टता और तेवर सुन्दरम की इस आलोचना में है, प्रशंसकों के यहाँ से अभी आना बाकी है.)

By कुमार सुन्दरम
पत्रकारिता एक मिशन है या रोज़गार? आरएसएस एक सांस्कृतिक संगठन है या राजनीतिक परिवार और गैंग्स ऑफ वासेपुर कुछ नया गढने का एक प्रयोग है या एक मुम्बईया फिल्म, ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब भाई लोग अपनी सुविधा और मौके के हिसाब से कुछ भी दे डालते हैं। जहाँ तक चला ले जाएँ वहाँ तक मिशन, जब पकड़ में आने लगें तो बोलेंगे भाई हम भी तो एक धंधा ही कर रहे हैं, इतनी उम्मीद ही कैसे लगाते हैं..

फिल्म का प्रचार इसके रियलिस्टिकखुरदरेपन के लिए किया जाता रहा लेकिन अगर जब किसी ने यह पूछा कि भाई इसमें कोयला मजदूरों का संघर्ष सिरे से गायब है और यूनियनों का सिर्फ वसूली वाला चेहरा ही सामने आता है तो जवाब मिला भाई अब ये कोई डाक्यूमेंट्री थोड़े ही है। शंघाईके बारे में कुछ ऐसा ही पूछे जानेपर दिबाकर बनर्जी ने कहा कि तब तो ये प्रोपगंडा फिल्म हो जाती। और मुंबई में हाल के हिंसक विस्थापनों के लिए जिम्मेदार देशमुखखानदान को खास धन्यवाद जब इस फिल्म के टाइटल्स पर आता है तब?

फिल्म को समझने का शायद एक तरीका शायद यह भी होता है कि परदे के उल्टी तरफ देखा जाय. जब हम बच्चे थे तो कौतूहल से उस जगह देखते थे जहां से रंगबिरानी रौशनियाँ निकलती हैं. लेकिन उस तरफ नहीं, फिल्म को देख रहे दर्शकों की नज़रों में.

दिल्ली के उस एक मॉलस्थित सिनेप्लेक्स के अंदर जहां मैं वासेपुर देख रहा था, वासेपुर भागतीन के किरदार अच्छी तादाद में थे. वासेपुर के तीसरे भाग में, जो शायद अनुराग कश्यप ना बनाएँ, रामाधीर सिंह के पोतों से लेकर सुल्ताना डाकू की चौथी पीढ़ी तक सब उपस्थित थे. ज़्यादातर बिहार के जातिवाद‘ ‘जंगलराजइत्यादि से परेशान होकर दिल्ली आये. कारपोरेट से लेकर कॉलसेंटरों तक में नौकरियाँ करते हैं, मुखर्जी नगर में यूपीएससी की तैयारी करते हैं, मीडिया में हैं, कई तो ब्लॉग भी चलाते हैं. दिल्ली में अपने उन सभी प्यारे लोगों को पीछे छोडकर अपने आदरणीय पिताजी, गजब के वो चाचा और उनके दोस्त जो अब भी छुट्टियों में मजे करवाते हैं जब हम दिल्ली से उनके लिए विदेशी ब्रांडेड दारू बैग में छुपाकर पहुंचते हैं. इस फिल्म को ऐसी कई दर्जन सोफिस्टिकेटेड आँखें देख रही थीं और वर्तमान की उधेडबुन के बीच उन तीन घंटों में अपनी नास्टेल्जिया को जी रही थीं. सारे नहीं, लेकिन कई दर्जन लोग तो उस हॉल के अंदर बाकायदा हर फ्यूडल संवाद, मनोज वाजपेयी की हर लुच्ची नज़र और कलात्मक ambiguity के उस understated टेक्सचर पर सीटियाँ बजा रहे थे और फब्तियां कस रहे थे. इंटरवल के बाद तो मॉल वालों ने बकायदा बाउंसरों को बुलाया इनको काबू करने के लिए.

क्या अनुराग ने यह फिल्म ऐसे दर्शकों को ध्यान में रख कर बनाई है? सीटियाँ बजाते तो लोगों को बैंडिट क्वीनके दौरान भी देखा गया था. बासु चटर्जी की आख़िरी फिल्म आस्थाके पोस्टर भी लोकल वितरकों ने बाकायदा रेखा की हॉट फ़िल्म के बतौर बनवाए थे. लेकिन फेसबुक पर वासेपुर के ऑफिशियल फैन पेज पर न सिर्फ पचानबे प्रतिशत कमेंट्स ऐसे ही चटाखेदार हैं, बल्कि खुद इस पेज के मॉडरेटर ने भी वासेपुरतीन के ग्लोबल बाशिंदों को सहलाने वाली ऐसे ही स्टेटस और तस्वीरें साझा की थीं। फेसबुक पर एक जगह अपील की गई है क्या आप मानते हैं एक अनुराग कश्यप एक राइजिंग स्टारहैं? तो फिर वोट कीजिये, नहीं तो सरदार खान आपकी कह के ले लेगा ! यहाँ दर्शकों से पूछा गया है कि बताइये वासेपुर का सबसे अच्छा डायलाग कौन सा है और पढ़िए वासेपुरतीन के लोगों ने क्या क्या लिखा है। इस बातचीत में शामिलफ्यूडल नॉस्टेल्जिया से ग्रस्त ज़्यादातर ऊंचीजात के लड़के ही शामिल हैं, भले ही कोई इस फिल्म के स्त्रीकिरदारों को मजबूत बताता फिरे।

यह बिलकुल वाजिब बात है कि एक ही टेक्स्ट के कई पाठ हो सकते हैं और लोग आखिर अपने हिसाब से ही हर सीन को डीकोड करेंगे. लेकिन अनुराग, दिबाकर और विशाल भारद्वाज जैसे लोगों की फिल्मों सचेत रूप से इन सभी पाठों को, इन सभी दर्शकों को ध्यान में रखती हैं. देवडी में अच्छे गाने हैं, वेबकैम के ऐसे रेफेरेंस जिनपर खूब सीटियाँ बजीं वह भी हैं और जिनको कुछ विमर्श ढूँढना ही है उनके लिए पुरानी नई पारो के बीच तुलनात्मक अध्ययन का भी पूरा स्कोप है. यह सबकुछ सचेत है. कश्यप जैसे लोगों ने न सिर्फ हमारी फिल्मों का नया क्राफ्ट गढा है बल्कि इसके लिए नया बाज़ार, नया अर्थशास्त्र और प्रमोशन के नए तरीके भी ढूंढें हैं. लेकिन इन सबका मूल्यांकन करते समय सन 90 के बाद के उस सामाजिक बैकग्राउंड को भी ध्यान में रखना होगा आखिर जिसके चलते ही यह सब संभव हुआ है.

कहने को तो हाल की इन सारी फिल्मों ने हिन्दी सिनेमा को ज़मीनी टच दिया है, शायद पहली दफा डीटेल्सऔर टेक्सचर पर इतना काम हुआ है. लेकिन गौर से देखें तो सच को, उस खुरदरे टेक्सचर को एक निर्लिप्त artifact बना देना क्या एक ट्रेजेडी नहीं है? इश्किया की देहाती विद्या बालन में वह बिलकुल शहराती विटऔर sensuousness हो, शंघाई में मुंबई की बस्तियों के संघर्षों को लेकर यह सब चलता रहता है, बहुत क्रूर है यहाँ सबटाइप अवसरवादी सिनिकल निर्लिप्तता हो या वासेपुर के मजेदार माफिया हों, इन सबमें सच के कुछ हिस्सों को लकड़ी की हूहू मूर्ति में तब्दील कर आपके सामने ऐसे रख दिया गया है जिसे आप प्रशंसा और हसरतों से देखते रहे. रियलिटी का यह सिनेमाई रिप्रोडक्शन इतना जबरदस्त है कि वासेपुर के लोग भी उतना ही विरोध करते हैं जिससे दुनिया को पता चल जाय कि वासेपुर असल में कोई जगह है, और फिर फिल्म देखने बैठ जाते हैं. मैं भी दूसरा हिस्सा देखने के लिए टिकट कटाऊंगा ही.

ज़मीन की खुशबू और खुरदरापन लिए ये फिल्में इतनी ही ज़मीनी हैं कि वासेपुर और इश्क्रिया के ज़माने में मेरे कसबे के हॉलों में लोग या तो मिथुन/अमिताभ की पुरानी फिल्में देखते हैं या फिर भोजपुरी की. ये नई ज़मीनी फिल्में ज़मीन के लोगों पर बनी हो सकती हैं, उनके लिए नहीं बनी हैं. क्योंकि मल्टीप्लेक्स से लेकर संगीत के अधिकार तक इनका अर्थशास्त्र पूरा हो जाता है. कमसेकम उन पुरानी फिल्मों के प्रोड्यूसरों को मेरे गाँव के दर्शकों के बारे में सोचना पडता था. अब ये दिक्कत खत्म हो गई है. तो सिनेमा की दुनिया में दो धड़े हैं एक जो अपने दर्शकों को उन्ही की दुनिया की कहानियां सुनाता है, और दूसरा उस दुनिया की जो अब वो पीछे छोड़ आए हैं. और नास्टेल्जिया की ताकत इतनी ज़्यादा होती है कि कमसेकम अभी के लिए तो यश चोपडा ने भी इसके आगे घुटने टेक दिए हैं और इश्कज़ादे बनाने में लग गए हैं. एक समूचा टीवी चैनल बस सरोकारों के बाज़ार पर ही टिका है. सब दरअसल मध्यवर्ग के इस संक्रमण काल की उपज है, एक और कुछ समय बाद हम इन छिछले इमोशंस को भी झिडक देंगे. मसाला फिल्मों की ताकत चूकी नहीं है. यह सिर्फ संयोग है लेकिन कितना सटीक कि वासेपुर और दबंग बनाने वाले सगे भाई हैं और उन्होंने बाज़ार के दो हिस्सों को आपस में बाँट लिया है.

यह सब लिखने का मतलब मध्यवर्ग के सर्षकों को गरियाना नहीं है. ना ही उस संभावना को जिसमें मुख्यधारा की सीमाओं के बीच अलग तरह का कुछ कहने की गुंजाइश बने. लेकिन जिरह यह है कि आप उस भाषा का, उस संभावना का उपयोग कर किसलिए रहे हैं.

हिन्दी के वर्चुअल स्पेस का, जे.एन.यू के मेस का आप अपने प्रचार के लिए उपयोग तो करें लेकिन जब सवाल पूछ लिए जाएँ तो आप अपना एरोगेंस दिखायें, यह कमसेकम आपके लिए तो अच्छे आसार नहीं ही हैं। अनिल जी की इस बात पर ध्यान दें – “शुरूआती गुबार थमने के बाद यह फिल्म अपने निर्देशक की कह के नहीं ‘कस के लेगी’ इसमें कोई दो राय नहीं है।

कुमार सुन्दरम जे.एन.यू. में निरस्त्रीकरण अध्ययन के शोधार्थी हैं. इनकी वेबसाईट DiaNuke.org परमाणु ऊर्जा को लेकर चल रहे संघर्षों पर ज़रूरी बहसों, दस्तावेजों और जानकारियों का अच्छा ठिकाना है.

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