Archive for the month “September, 2014”

उर्दू का आरम्भिक युग और अंदाज गुफ्तगू के: चंदन श्रीवास्तव

Byचंदन श्रीवास्तव

गो कि गालिब को बराबर ख्याल रहा कि उनका अंदाज-ए-बयां कुछ और है फिर भी अपने को यह कहने से कहां रोक सके कि अगले जमाने में कोई मीर भी था। मीर खुद भी अपने फन, खासकर, अपनी काव्य-भाषा की महीनी को लेकर बहुत आश्वस्त थे वरना यह ना कहते कि –

बुलबुल ग़ज़ल सराई आगे हमारे मत कर-सब हमसे सीखते हैं, अंदाज़ गुफ़्तगू का ।।

मीर को गुफ्तगू का जो अंदाज नापसंद था उसके बारे में अंदाजा उनके एक शेर से होता है। शेर कुछ कुछ इस तरह है कि

यों पुकारते हैं मुझे कू-ए-जानां वाले – ऐबे, अबे वो चाक-गरीबां वाले।।

 मीर के वक्तों में दिल्ली के मिर्जाओं के बीच शाहजहानाबाद की यही खास महीन जबान जो लोगों को गुफ्तगू के अंदाज सिखाने की भावना से प्रेरित थी, उर्दू कहलायी। इस जबान की हैसियत के बारे में समीक्ष्य पुस्तक उर्दू का आरम्भिक युग में एक किस्सा आब-ए-हयात के लेखक मौलाना मुहम्मद हुसैन आजाद के हवाले से दर्ज है। किस्सा कुछ यों है कि दिल्ली में एक कवि मीर कमरुद्दीन मिन्नत नाम से हुए। ये मीर तकी मीर के समकालीन थे और पारंपरिक विद्याओं के ज्ञान के कारण सरकारी दरबार के खेमे में थे। आजाद के अनुसार मिन्नत साहब को शाइरी का बड़ा शौक था, सो मीर के पास इस्लाह के लिए उर्दू की गजल ले गए। “ मीर साहब ने वतन पूछा तो, उन्होंने सोनीपत(पानीपत) बताया। आप ने फरमाया कि सैयद साहब उर्दू ए मुअल्ला खास दिल्ली की जबान है और इसमें तकलीफ ना कीजिए, अपनी फारसी-वारसी कह लीजिए…(पृष्ठ-124)। ”

Early Urdu Literary Culture and History

Early Urdu Literary Culture and History

 इस किस्से के बाद उर्दू का आरंभिक युग के लेखक शम्सुर्रहमान फारुकी साहब अपनी राय इन शब्दों में दर्ज करते हैं- ‘यह कहानी काल्पनिक ही सही लेकिन ऐसे लतीफे का वजूद हमें अठाहरवीं शती की साहित्यिक संस्कृति और उसके जेहन में बसी अपनी छवि के बारे में कुछ बताता है..कमरुद्दीन मिन्नत हजार सैयदजादे हों, प्रतिष्ठित दरबारियों में हों, फारसी खूब जानते हों, लेकिन मृदुलता, नफासत और शुद्धता में वे दिल्ली के रेख्तावालों की धूल को भी न पहुंच सकते थे. 1750 की दहाई शुरु होते-होते उर्दू के पक्ष में वातावरण इतना हमवार हो चुका था कि उर्दू जानना, उर्दू में शेर कहना, उर्दू बोलना ये सब बाते लोकप्रिय व्यक्तित्व का भाग बन गई थीं..और ऐसा दिल्ली में ना था बल्कि मुगल राज्य के सभी क्षेत्रों में यही स्थिति पैदा हो गई..(पृष्ठ-125)। ”

 मतलब यह कि “दिल्ली के रेख्तावालों” की जबान में “मृदुलता, नफासत और शुद्धता” का जोर सन् 1750 यानी गिलक्राईस्ट के फोर्ट विलियम कॉलेज के करीब पाँच दशक पहले ही बढ़ चुका था और वह हिन्दुस्तान के एक बड़े हिस्से में पहुंच चुकी थी। किताब की राजनीतिक योजना के भीतर यह अत्यंत महत्वपूर्ण स्थापना है। इस स्थापना को मानते ही एक साथ कई बातें होती हैं।एक तो यह कहना संभव हो जाता है कि हिन्दी के पुरानेपन का कोई भी दावा बेतुका है। दरअसल आज की हिन्दी अंग्रेजों(फोर्ट विलियम कॉलेज) की गढ़ी हुई चीज है, सो उर्दू की तुलना में वह बिल्कुल ही एक नई भाषा है। दूसरे, 19 वीं सदी के उत्तरार्ध के हिन्दी-आंदोलन के पैरोकार अंग्रेजों द्वारा भाषा के बारे में फैलायी गई विषवेल(हिन्दी हिन्दुओं की और उर्दू मुसलमानों की) को आगे और पुष्पित-पल्लवित करने के दोषी हैं। और तीसरे, यह कि उर्दू को हिन्दी की एक शैली कहने का प्रचलन दरअसल सांप्रदायिक अहम्मन्यता का सूचक है क्योंकि 19 वीं सदी के उत्तरार्ध में हिन्दी नाम की जो नई भाषा बनी, दरअसल तो वह 18 वीं सदी के उत्तरार्ध से चली रही उर्दू ही थी जिसके भीतर चुन-चुनकर संस्कृत के शब्द और मुहावरे भर दिए गए।

 छोटे-छोटे सात अध्याय में विभक्त कुल 151 पन्नों की किताब ‘उर्दू का आरंभिक युग’ के अनुसार चूंकि हिन्दी-उर्दू के सम्बन्धों को सुलझाए बिना आरंभिक उर्दू का पद अर्थहीन है इसलिए अपनी बात कहने के लिए किताब के लेखक शम्सुर्रहमान फारुकी को जरुरी लगा कि “आधुनिक हिन्दी के आरंभ और उसकी छुपी (और प्रत्यक्ष) राजनीति और उर्दू साहित्य संस्कृति पर उसके प्रभाव” को समझने से किताब की शुरुआत की जाय। किताब की हिन्दी विषयक समझ की परिणति उपर्युक्त तीन बातों में होती है। अध्येता वसुधा डालमिया के हवाले से समीक्ष्य पुस्तक में जार्ज ग्रियर्सन की हिन्दी के बारे में बहुउद्धृत बात एक बार फिर से दोहरायी गई है कि “वह अजीबो-गरीब मजेदार मिलवां भाषा, जिसे युरोप के लोग हिन्दी के नाम से जानते हैं अस्ल में स्वयं युरोपीय लोगों की आविष्कार की हुई है। ” किताब डालमिया के कथन से सहमति जताती है कि बीती सदी की 1861-1870 वाली दहाई आते-आते हिन्दी के जातीय समर्थक जो हिन्दी के आरंभ के बारे में मिथ और वंशावली सृजन करने में लीन थे अपनी भाषा को बनावटी मानने के पक्ष में ना थे। उन्हें इस पर विश्वास था कि हिन्दी उत्तर भारत के क्षेत्रों में सभी घरों में बोली जाती है और यह स्थिति मुसलमानों के हमले से पहले से चली आ रही है।(पृष्ठ-33).

 समीक्ष्य पुस्तक में डालमिया( द नेशनलाइजेशन ऑफ हिन्दू ट्रेडिशन् : भारतेन्दु एंड नाइन्टीन्थ सेंचुरी बनारस) के हिन्दी विषयक विचार का सारांश इन शब्दों में लिखा गया है- “ राष्ट्रवादियों और साम्राजियों में कम से कम इस बात पर सहमति थी कि हिन्दुओं की अपनी एक भाषा है और यह भाषा उन्हें आज ही के मुसलमानों से नहीं बल्कि भूतकालीन मुसलमानों से अलग करती है। दोनों में विभिन्नता थी तो बस इस बात की कि अंग्रेजों का दावा और जोर अपने बारे में था कि हमने यह भाषा पैदा की। यह हमीं थे जिसने इसको मुसलमानी मलबे से निकाला, वह सारा मलबा जो इसके अन्दर और चारों और जमा हो गया था। इसके विपरीत हिन्दुओं को यद्यपि यह बात मान्य थी कि इस आधुनिक हिन्दी भाषा में कोई साहित्य न था लेकिन वे यह भी दावा करते कि इस भाषा की क्रमबद्धता प्राचीन काल से थी। ”(पृष्ठ-34)

 फारुकी साहब की मान्यता है कि हिन्दी प्रेमियों ने वसुधा डालमिया की किताब को प्रशंसा की निगाह से नहीं देखा.(पृष्ठ34)। किन लोगों को वसुधा डालमिया की बात नागवार गुजरी और अगर नागवार गुजरी तो उन्होंने क्या तर्क प्रस्तुत किए, किताब में इसका कोई जिक्र नहीं है। बहरहाल, अगर ऐसा हुआ तो क्यों हुआ इसका एक प्रच्छन्न उत्तर समीक्ष्य पुस्तक में यह मिलता है कि 19 वीं सदी के हिन्दी-समर्थकों के अपनी जातीय भाषा विषयक भ्रांत विचार अब हिन्दी बोलने-लिखने वालों के लिए एक विश्वास में बदल गये हैं। फारुकी साहब लिखते हैं- “आज के आम हिन्दी बोलने वाले के लिए 19 वीं सदी के हिन्दी के जातीय समर्थकों का यह विचार अब विश्वास में बदल चुका है कि जिस भाषा को वह हिन्दी के नाम से जानता है, वह प्राचीन समय से मौजूद है और इसके साहित्य का श्रीगणेश(अगर और पहले नहीं भी तो) कम से कम खुसरो(1253-1325) से होता है। और चूंकि ऐसे बहुत से लोगों का मानना है कि कभी अठारहवीं शताब्दी में पुराने जमाने की यह असली हिन्दी या हिन्दवी उस समय उर्दू बन गई जब मुसलमानों ने फैसला लिया कि वे अपने समय की प्रचलित हिन्दी की राह से हटकर एक भारी-भरकम फारसीयुक्त भाषा अपनाएंगे और यह भाषा हिन्दुस्तानी मुसलमानों की पहचान बन गई। ”(पृष्ठ-11)

 किताब में वसुधा डालमिया का जिक्र एक दफे आया है लेकिन इतिहासकार ताराचंद का कई बार, हर बार यह बताने या फिर संकेत करने के लिए कि उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध से पहले की “तमाम सदियों में हिन्दी(अर्थात फारसीयुक्त हिन्दुस्तानी) हिन्दुस्तान की लिंग्वाफ्रांका और सभ्य समाज की भाषा थी, चाहे हिन्दू हो या मुसलमान ” (पृष्ठ 49)।  आखिर को आज की हिन्दी के बनने के बारे में अंतिम फैसला भाषाविद् सुनीति कुमार चटर्जी के सहारे सुनाया गया है कि “ऐतिहासिक एतबार से उर्दू उस चीज की रुपान्तरित मुसलमानियाई हुई शक्ल नहीं जो आज हिन्दी(अर्थात संस्कृतयुक्त खड़ी बोली) के नाम से जानी जाती है। बल्कि मामला इसका उल्टा ही है। वह फारसी मिश्रित हिन्दुस्तानी जो अठारहवीं शताब्दी के मुगल दरबार में विकसित हुई(और जो उससे पहले दकनी बोली में मिलती है)..उसे हिन्दुओं ने अपनाया..फिर देशी नागरी को अपनाया और बड़ी गाढ़ी संस्कृत युक्त शब्दावली का प्रयोग आरंभ कर दिया..और इस प्रकार उन्होंने हिन्दी का स्वरुप निर्धारित किया। यह काम 1800 के आसपास हुआ और विशेषकर कलकत्ता में। ” (पृष्ठ 43)

 आज की हिन्दी की उत्पत्ति , उसकी राजनीति(साम्राज्यवादी) तथा चरित्र(सांप्रदायिक) की कथा सुनाने के क्रम में ही किताब आरंभिक उर्दू के जन्म, विकास, विस्तार और आखिर के कुछ पन्नों में विकासमान उर्दू की राह में आई उन रुकावटों का जिक्र छेड़ती है जिनकी वजह से उर्दू अखिल भारतीय लिंग्वाफ्रांका और साझी संस्कृति की वाहक होते-होते रह गई। किताब इसके लिए एक दिलचस्प तरकीब ईजाद करती है, कुछ इस तरह कि जिस भाषा को आज उर्दू कहा जाता है उसके बारे में साबित करने की कोशिश करती है कि उसका पुराना नाम हिन्दी था। किताब की आधार स्थापनाओं में से एक यह है कि “पुराने जमाने में उर्दू नाम की कोई भाषा नहीं थी। जो लोग अर्ली उर्दू पद का इस्तेमाल करते हैं वे भाषाविज्ञान और इतिहास की दृष्टि से गलत शब्द बरतते हैं ”(पृष्ठ-11)। लेखक किताब के शुरुआती पन्नों में ही याद दिलाता है कि जिस भाषा को आज हम उर्दू कहते हैं, पुराने जमाने में उसी भाषा को हिन्दवी, हिन्दी, देहलवी गुजरी दकनी और फिर रेख्ता कहा गया। ये नाम लगभग उसी क्रम से प्रयोग में आए, जिस क्रम मे उन्हें दर्ज किया गया है। यह जरुर है कि इस भाषा का जो रुप दकन में बोला और लिखा जाता था, उसे सत्रहवीं शताब्दी से लेकर उन्नीसवीं शताब्दी के लगभग मध्य तक दकनी ही कहते थे और उत्तर भारत में एक बड़े समय तक रेख्ता और हिन्दी दोनों ही इस भाषा के नाम की हैसियत से साथ-साथ इस्तेमाल होते थे। अंग्रेजों ने इस भाषा के लिए अपनी ईजाद या पसंद के नाम का इस्तेमाल किया।

 जाहिर है, इस याददहानी के बाद किताब में उर्दू का नाम हिन्दी/हिन्दवी के रुप में लिखा गया है और उसका संक्षिप्त विकास-क्रम इन शब्दों में बयान किया गया है-

1 गुजरात में और फिर जल्दी ही दकन में सूफियों ने हमारी भाषा(यानी हिन्दवी) को अपनाया। इससे पहले इस भाषा की कोई साहित्यिक हैसियत न थी।

2 मसऊद साद सलमान(लेखक के अनुसार हिन्दवी के प्रथम लेखक) और इसके बाद अमीर खुसरो ने हिन्दी/हिन्दवी में जो लिखा वह केवल तात्कालिक और प्रासंगिक(कैजुअल) था इसके पीछे कोई परंपरा न थी।

3 चौदहवीं सदी की अवधी में साहित्यिक गतिविधियों(मुल्ला दाऊद की चंदायन 1379) का होना इस बात का प्रमाण है कि हिन्दी/हिन्दवी उस समय तक साहित्यिक भाषा न बनी थी वरना संभव है कि मुल्ला दाऊद उसे ही अपनाते। उनके समय में तो आलम यह है कि वे अपनी अवधी को ही हिन्दी यानी नर्मदा के ऊपर वाले भाग की भाषा कह रहे हैं। उनकी नजर में हमारी हिन्दवी/हिन्दी का वजूद ना था.

4 उर्दू के प्राचीनतम साहित्यिक आलेख गुजरात और फिर खास दकन में वजूद में आए और एक के सिवा बाकी सब सूफियाना हैं।

5 चूंकि सूफी लोगों के श्रोताओं में उनके मानने वाले मुरीद(शिष्य) और श्रद्धालु अधिक संख्या में होते थे, अतः यह स्वाभाविक था कि सूफियों के मुरीद अपने पीर (धर्मगुरु) की बातों और मूल पाठ को विशेष प्रकार से सुरक्षित कर लेते थे।

6 शेख अब्दुल कुद्दुस गंगोही(1455-1538) और संत कबीर(देहान्त 1518) के पहले किसी सूफी ने हिन्दी /हिन्दवी को उत्तर भारत में साहित्यिक अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं बनाया। लेकिन ना तो गंगोही ना ही कबीर ने उस खालिस खड़ीबोली में रचना की जो विकास करके आज की उर्दू बनी। शेख गंगोही की भाषा में ब्रज की बहुलता है और कबीर की भाषा में अवधी और भोजपुरी के तत्व दिखाई देते हैं। इससे महत्वपूर्ण बात यह है कि दोनों ही दिल्ली से दूर थे और दिल्ली ही उन दिनों हिन्दू-मुस्लिन सभ्यता की राजधानी थी।

7 उत्तर भारत में सूफियों की हिन्दी/हिन्दवी के इतने देर से आने का कारण इस बात में छिपा है कि उत्तर भारत में सूफियों ने इस भाषा को अपना अभिव्यक्ति माध्यम बनाने में विलंब किया.

8 इस विलंब का एक कारण यह समझ में आता है कि उस जमाने में दिल्ली, पंजाब और निकटवर्ती क्षेत्रों में फारसी की जनसाधारण की भाषा नहीं तो लिंग्वाफ्रांका की स्थिति अवश्य थी।( पृष्ठ-89-90)

 पुस्तक के अनुसार इस विकासक्रम में एक निर्णायक मोड़ आता है वली दकनी के साथ। वली दकनी का जन्म 1665-1667 का है और मृत्यु 1707-08 की है। इन वली दकनी ने तत्कालीन उत्तर भारत(जहां फारसी बहैसियत लिंग्वाफ्रांका विराजती थी) के सांस्कृतिक ठिकाने दिल्ली की काव्य-भाषा को नया संस्कार दिया। वे सूफी ना थे, दुनियावी आदमी थे और उनकी कविता भी दुनियावी मिज़ाज की है। सो, सूफियों के माध्यम से धार्मिक बातों के इर्द-गिर्द अबतक होती आई हिन्दवी(प्रकारांतर से दकनी और गुजरी) की काव्य-परंपरा के भीतर उन्होंने एक उलटफेर किया। वे महान कवि थे और पुस्तक के अनुसार अपने वक्त के तमाम रेख्ता कवियों को खुद से कमतर मानते थे। यहां तक कि उन्होंने फारसी के बड़े कवियों को अपना प्रतिद्वन्द्वी या अपने से कमतर माना है। किताब के अनुसार वली खुद ब खुद ही वली दकनी न बन गये थे..हर बड़े कवि का कोई ना कोई पथप्रदर्शक होता है और वली ने अपना पथ-प्रदर्शक हसन शौकी(मृत्यु 1633) को माना है..इसके अतिरिक्त वली ने  गुजरी और दकनी दोनों साहित्यिक संस्कृतियों और परंपराओं से फायदा उठाया है…(पृष्ठ 113)। फारुकी साहब सविस्तार इस बात का जिक्र करते हैं कि वली की भाषा दरअसल “ वही भाषा है जो वली के समय में दिल्ली में बोली जाती थी..” (पृष्ठ 113-114) क्योंकि औरंगजेब और उसकी विशाल सेना ने औरंगाबाद को अपना अड्डा बनाया तो दिल्ली में बोली जाने वाली भाषा अपने साथ ले गई। ऐसे में दकनी/हिन्दी/हिन्दवी का एक नया रुप औरंगाबाद और उसके चारो और विकसित होने लगा..औरंगाबाद या दकन में औरंगजेब की उपस्थिति उसके राज्यारोहण से पहले की है और देश के इन क्षेत्रों में उसका अभियान उसके पचास वर्षीय शासनकाल(1658-1707) में लगातार जारी रहा। सो, दिल्लीवालों को वली ने दरअस्ल जो भाषा सौंपी वह उन्हीं की भाषा थी, अन्तर यह कि वली की कविता ने उसे काव्यात्मक ऊँचाई दे दी थी।

 किताब के अनुसार दकनी होकर भी उन्होंने दिल्लीवालों को उर्दू काव्य-रचना का पाठ पढ़ाया यह बात दिल्ली के मिर्जाओं को जहर से भी अधिक कड़वी रही होगी। यह घूँट वे पी तो गये परन्तु इसका स्वाद अपने मष्तिष्क से भुलाने का उन्होंने पूरा प्रयत्न किया और यह प्रयत्न अबतक सफल रहा है…मीर और काईम ने वली के कारनामे की महत्ता कम करने का पूरा प्रयत्न किया और शाह शाद उल्ला गुलशन वाली घटना गढ़ी…(पृष्ठ 109) कि दिल्ली के शाह गुलशन ने वली से कहा कि फारसी तर्ज की कविता उर्दू में कहो वरना शाह गुलशन वाली घटना एक अफसाना भर है। समीक्ष्य पुस्तक उर्दू का आरंभिक युग वली के कारनामें को इन शब्दों में दर्ज करती है- “वली का कारनामा यह है कि उन्होंने निश्चित तौर पर और हमेशा के लिए साबित कर दिया कि गुजरी और दकनी की तरह रेख्ता-हिन्दी में भी यह शक्ति है कि वह सब्के हिन्दी(भारतीय शैली) की फारसी कविता से आगे बढ़ सकती है. उपमा एवं रुप-वर्णन हो या रुपकों का विस्तार, परिशुद्धता या जटिलता, विषयगत सुन्दरता हो या अर्थगत, हिन्दी-रेख्ता फारसी से हरगिज कम नहीं..”(पृष्ठ 116-117)

 इस पुस्तक की समीक्षा के शुरुआती अनुच्छेद में इशारा किया गया था दिल्ली के मिर्जाओं को अपनी काव्य-भाषा की ऊँचाई पर बड़ा नाज था और इस अदबी एतबार से वे ‘अबे-तबे’ बोलने वाले के “गुबार से भी दूर बैठना” बैठना चाहते थे और इन्हीं लोगों ने, समीक्ष्य पुस्तक के अनुसार पहले से चली आ रही लोक-प्रचलित हिन्दवी को फारसी की तरफ झुकाया। वली दकनी की कविता ने दिल्ली के तत्कालीन अदबी इदारे में सक्रिय शायरों को बल प्रदान किया और एक “परायी भाषा”  यानी फारसी से पीछा छुड़ाने में मदद की, तो भी, दिल्लीवालों के दिल पर फारसी का असर कायम था। सो, सत्रहवीं सदी के अंतिम समय में जो युवा साहित्यकार रेख्ता(मतलब हिन्दवी/उर्दू) को अपना रहे थे वे फारसी में शेर कहना रेख्ता की बनिस्पत कहीं ज्यादा आसान समझते थे। किताब के अनुसार चूंकि रेख्ता में शेर कहना उनके लिए एक ऐसे महाद्वीप में यात्रा करने सरीखा था जिसका पूरा मानचित्र अज्ञात था, सो जरुरत ऐसे व्यक्तियों की थी जो उन्हें रेख्ता में शाइरी के गुर सिखाये। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए शागिर्दी-उस्तादी की संस्था अस्तित्व में आई। इस संस्था ने दिल्ली में “नयी हिन्दी/रेख्ता ” शाइरी की नींव रखी और इस तरह दिल्ली की कविता लोकप्रचलित हिन्दवी से अपनी यात्रा शुरु करके अशराफी यानी फारसीनिष्ठ होती गई। सो, आज की उर्दू को लोकप्रचलित हिन्दवी से अलगाकर अशराफी उर्दू बनाने का सारा दोष दिल्लीवालों का है। किताब के अनुसार “ अठारहवीं सदी के अंत में उर्दू की साहित्यिक संस्कृति में एक खेदजनक रुचि का आविर्भाव होता है। भाषाशुद्धि के नाम पर एक तरह के मूलतत्ववाद का प्रचार किया जाने लगा। भाषा के सुधार और भाषा के विकृत/अप्रिय तत्व के विरेचन की बात होने लगी..।”(पृष्ठ 130)

 किताब इस निष्कर्ष पर समाप्त होती है, भले ही आगे कुछ शब्दों में उर्दूभाषा के भीतर दिल्ली स्कूल और लखनऊ स्कूल के अस्तित्व में आने का जिक्र है। विचित्र यह कि लेखक आखिर-आखिर तक उर्दू के फारसीनिष्ठ होने को लेकर कोई स्पष्ट निष्कर्ष नहीं निकाल पाया है। उर्दू का फारसीनिष्ठ होते जाना उसे खेदजनक तो लगता है लेकिन साथ ही वह यह भी लिखता है कि अठारहवीं सदी के अंत में फारसीवालों के अनुकरण का जो “प्रतिक्रियावादी” दौर-दौरा शुरु हुआ वह “ उर्दू की साहित्यिक संस्कृति के इतिहास की ऐसी पहेली है जिसका समाधान अभी तक नहीं हुआ है बल्कि यों कहें तो गलत ना होगा कि इस पहेली के अस्तित्व से ही हम अनभिज्ञ रहे हैं तो फिर इसका समाधान कहां से ढूंढ़ते..”। (पृष्ठ126)  भाषाशुद्धि के प्रयासों को प्रतिक्रियावादी कहने के बावजूद उसके कारणों को एक पहली कहना दरअसल किताब की राजनीतिक योजना की अनिवार्य परिणति है।

 याद करें कि किताब की शुरुआत कैसे होती है। शुरुआत में ही आरंभिक उर्दू के साहित्येतिहास पर छाये घटाटोप को रेखांकित करते हुए किताब को इसे हटाने के लिए हिन्दी-उर्दू के संबंधों को सुलझाना सबसे ज्यादा अहम लगता है और रिश्ते के उलझाव इस निष्कर्ष से सुलझाया जाता है कि दरअसल पुराने वक्तों में हिन्दी(आधुनिक) थी ही नहीं, जो कुछ था उसे आधुनिक उर्दू का पूर्वज यानी हिन्दवी कहा जा सकता है। जब किताब का अंत होता है तो निष्कर्ष यह निकलता है कि चली आ रही हिन्दवी में खेदपूर्ण रुचि यानी उसके फारसीनिष्ठ होने की शुरुआत 18 वीं सदी के आखिर में दिल्ली में हुई। इस तरह किताब हिन्दवी के बरअक्स दोहरे अन्य की रचना करती है। एक तो स्वयं 19 वीं सदी के उत्तरार्ध में अंग्रेज हाकिम के भाषाई-विवेक से पैदा हिन्दी और दूसरा स्वयं फारसी। लेखक इस बात को लेकर आगाह है कि अमृत राय की पुस्तक (अ हाऊस डिवाइडेड-ऑरिजिन एंड डेवलपमेंट ऑव हिन्दी-उर्दू) राष्ट्रवादी आख्यान के भीतर हिन्दी-उर्दू झगड़े को पढ़ती और इस भाषाई झगड़े के भीतर देश के विभाजन के झगड़े की झलक देखती है। अमृत राय की नजर में फारसीनिष्ठ उर्दू का बनना स्वयं में एक त्रासदी से कम नहीं और पहले से चली आ रही एक मिलवां भाषा के बीच बंटवारे की वजह अंग्रेज हाकिम नहीं बल्कि 18 वीं सदी के पतनोन्मुख मुगल-दरबार से जुड़े लोग( मिसाल के लिए शाह हातिम और इनसे पहले दिल्ली के शाह गुलशन की फारसी सलाह को मानकर नये तर्ज की कविता करने वाले वली दकनी) हैं। आश्चर्य नहीं कि किताब में अमृत राय की इस स्थापना का जिक्र चंद लफ्जों में आया है और अफसोस के स्वर में कहा गया है कि “ शाह हातिम की कार्यसूची का नकारात्मक पहलू ही भविष्य के इतिहासकारों को नजर आया। इस तरह हातिम की सकारात्मक कोशिश को, जो एक इहलौकिक, आधुनिक, सभ्य समाज की मुहावरेदार भाषा(अर्थात एक ऐसी भाषा जो शिक्षण के स्तर पर पूरी उतरे, लेकिन बोझिल ना हो) के पक्ष में थी इस्लाह जबान(भाषा सुधार) का अभियान बताया गया और हातिम को बैठे-बैठाए भाषा का संशोधक मान लिया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि अमृत राय जैसे लोगों ने एक कदम आगे बढ़कर इसे हातिम बल्कि तमाम उर्दू साहित्यिक संस्कृति के बहिष्कारवाद का द्योतक माना । ”

 पुस्तक वली दकनी के बारे में कह आई है कि उन्होंने रेख्ता की शाइरी को एक परायी भाषा(फारसी) से मुक्ति दिलाने का काम किया, सो उत्तर भारत में उर्दू के फारसीनिष्ठ होने का कारण वली दकनी की कविता में नहीं खोजा जा सकता। लेकिन उस्तादी-शागिर्दी की संस्थाओं के जन्म लेने के बाद इस्लाह के नाम पर उर्दू भाषा के भीतर जो प्रयास हुए, उनके बारे में लेखक की राय है कि यह तो दरअस्ल सभ्य समाज की जरुरतों के लायक भाषा को गढ़ने की कोशिश थी, सो दोष शाह हातिम जैसों का भी नहीं क्योंकि वे वली की भाषा से दिल्ली की भाषा का अन्तर तो स्थापित करना चाहते थे लेकिन उनकी कोशिश यह भी थी कि शेर की जबान को दिल्ली के मिर्जाओं से स्वतंत्र और सामान्य लोगों की भाषा के अनुरुप किया जाय (मजेदार यह भी है कि समीक्ष्य पुस्तक शाह हातिम की कोशिश को सभ्य समाज की जरुरतों के लायक भाषा गढ़ने की कोशिश मानती है लेकिन भारतेन्दु-मंडल द्वारा गढ़ी जा रही हिन्दी को यही छूट देने के लिए तैयार नहीं है)। सवाल उठता है, शाह हातिम की यह सकारात्मक कोशिश क्योंकर कामयाब ना हुई ? किताब का उत्तर है- ‘यह अनसुलझी पहेली है।’

 ‘अनसुलझी पहेली ’ कहते ही एक साथ दो बातें होती हैं – वली दकनी और शाह हातिम जैसे पात्र अगर किन्हीं कारणों से अमृत राय की किताब में भाषाई झगड़े के भीतर ‘खलनायक’ हैं तो ‘उर्दू का आरम्भिक युग’ में इसके उलट नायक बन जाते हैं। यह बात तनिक भी नहीं आने पाती कि दिल्ली के मिर्जाओं को क्योंकर हिन्दवी का फारसीनिष्ठ रुप अपनी आत्मछवि के अनुकूल लगा या फिर आगे 19वीं सदी में क्यों यही फारसीनिष्ठ उर्दू मुसलिम-मानस के भीतर अपने को एक कौम के रुप में देखने का सहारा बनी। दूसरे, चूंकि किताब की मंशा आज की हिन्दी को उसकी प्राचीनता के दावे से अलगाकर अनुकरण में तैयार(इसलिए नकली) की गई भाषा के रुप में स्थापित करने की है, सो यह काम समीक्ष्य पुस्तक में उर्दू के फारसीनिष्ठ के बारे में यह बताकर किया गया है कि आधुनिक हिन्दी इसी की नकल है।

 किताब में हिन्दी की प्राचीनता के खंडन की ऐसी हड़बड़ी है कि वह ताराचंद की पुस्तक द प्रॉब्लम हिन्दुस्तानी के सहारे हिन्दी को फारसीनिष्ठ उर्दू की अनुकृति बताते हुए (और इसी क्रम में उर्दू को एक स्वतंत्र भाषा और उसका पुराना नाम हिन्दी अथना हिन्दवी साबित करते हुए) ताराचंद की इस जरुरी बात का उल्लेख करना जायज नहीं समझती कि हिन्दी अथवा हिन्दवी का प्रयोग कई अर्थों में होता था जिसमें तीन प्रमुख हैं (1) हिन्दी अथवा हिन्दवी का प्रयोग अभारतीय चीजों के बरक्स भारतीय चीजों को अलगाने के लिए, जैसे मुहम्मद औफी का अपने कविता-संकलन में ख्वाजा मसूद साद सलमान को हिन्दी(फारसी के बरक्स) का कवि बताना। (2) हिन्दी शब्द का प्रयोग बुन्देली, कन्नौजी, ब्रजभाषा, बंगारु, खड़ीबोली, अवधी, बघेली और छत्तीसगढ़ी के साथ-साथ राजस्थानी और मगही जैसी नवीन इंडो-आर्यन भाषाओं के लिए, और (3) हिन्दुस्तानी, खड़ी बोली अथवा देहलवी बोली के आधुनिक साहित्यिक रुप के अर्थ में। हिन्दी शब्द के ये तीन प्रयोग बताने के बाद ही ताराचंद लिखते पाते हैं कि “ हिन्दी पश्चिमी हिन्दी तथा पूर्वी हिन्दी में शामिल बहन-बोलियों(सिस्टर स्पीचेज) से आधुनिक हिन्दी अलग और उर्दू के समान(आइडेंटिकल) है। ”

 उपर्युक्त तीन तरह के प्रयोगों में से ऊपरले दो प्रयोगों पर ध्यान रखें तो मुल्ला दाऊद के चंदायन के बारे में यह कहना कि वे अपने समय में सचेत रुप से अवधी में लिख रहे थे ना कि हिन्दी में और कबीर तथा अब्दुल कुद्दूस गंगोही के बारे में यह कहना कि उनकी रचना हिन्दी की नहीं क्योंकि उसमें ब्रज, अवधी और भोजपुरी की बहुलता दिखायी देती है।(जैसा कि उर्दू का आरम्भिक युग में कहा गया है), मुश्किल हो जाएगा। ऐसे में पुस्तक की आधार-स्थापना कि उर्दू का पुराना नाम हिन्दी या हिन्दवी है, सो प्राचीनता का दावा उर्दू का बनता है ना कि आधुनिक हिन्दी का, खतरे में पड़ जाती है। ध्यान रखने की बात यह है कि आधुनिक हिन्दी का साहित्येतिहास लेखक(जैसे रामस्वरुप चतुर्वेदी) हिन्दी शब्द के उपर्युक्त बहुविध प्रयोगों को ध्यान में रखकर हिन्दी साहित्य की प्राचीनता का दावा करता है। वह पुराने वक्तों की हिन्दी को प्राकृत, पालि या अपभ्रंश से अलगाने के लिए ‘परसर्गों के उदय’ का प्रस्ताव करता है- “ परसर्गों का रुप नाथों की बानियों में दिखाई देने लगता है- पिण्ड तैं ब्रह्नण्ड, मनवा नैं, कहां सूं, नग्री मैं, हम कौं। इन बानियों का समय हजारी प्रसाद द्विवेदी ने 1000 ईस्वी के आसपास स्थिर किया है.. ”( रामस्वरुप चतुर्वेदी- हिन्दी साहित्य और संवेदना का विकास) । परसर्ग के उदय के आधार पर ही आधुनिक हिन्दी साहित्य के इतिहास का लेखक ताराचंद द्वारा बतायी तमान बोलियों में हुई रचनाओं को हिन्दी की रचना मानता है। हिन्दी की प्राचीनता के दावे के खंडन के लिए इस प्रस्ताव का खंडन जरुरी है ना कि यह देखना कि उसमें फारसीनिष्ठ उर्दू की तर्ज संस्कृत की शब्द और मुहावरे कितने हैं, जैसा कि ताराचंद या फिर फारुकी साहब के लेखन की अंतर्निहित मान्यता है।

 समीक्ष्य पुस्तक पहले से ही हिन्दवी वा हिन्दी के ऊपर यह अतिरिक्त जिम्मेदारी आयद करके चलती है कि वह सांप्रदायिक एकता की भाषा थी और लोक-प्रचलित थी। मिसाल के लिए पुस्तक की यह पंक्ति -“गुजरी शताब्दियों में क्या हिन्दू क्या मुसलमान सभ्य समाज की भाषा और सारे देश की लिंग्वाफ्रांका(सामान्य भाषा) हिन्दी अर्थात फारसीमिश्रित हिन्दुस्तानी(खड़ी बोली) थी न कि वह आधुनिक हिन्दी जो संस्कृतयुक्त हिन्दुस्तानी(खड़ी बोली) है।” ऐसी मान्यता के कारण समीक्ष्य पुस्तक इस ऐतिहासिक तथ्य की अनदेखी करती है कि अंग्रेजों के आने के पहले भी हिन्दी/हिन्दवी का वह साहित्यिक रुप जो सूफियों की बानियों के रुप में फारसी लिपि में लिखा था रहा था और जिसे फारुकी साहब उर्दू की पूर्वजा बताना चाहते हैं, स्वयं सांप्रदायिक अलगाव का भी एक साक्ष्य हो सकती है। हिन्दी साहित्य के इतिहास का एक तथ्य यह भी है कि जिस वक्त वली दकनी की मृत्यु होती है तकरीबन उसी वक्त कवि भूषण अपने शिवराज भूषण में खड़ी बोली( समीक्ष्य पुस्तक के अनुसार वह भाषा जिसमें सूफियों की बानी लिखी गई है) से आगाह होने का साक्ष्य देने के बावजूद ब्रजभाषा में कविता करते है। क्या यह तथ्य संकेत नहीं देता कि कवि भूषण के वक्त तक हिन्दी/हिन्दवी का एक रुप मुसलमानी मान लिया गया था और हिन्दी की विभिन्न बोलियों में लिखने वाले कुछ कवि, जो आज हिन्दी के कवि कहलाते हैं, इस रुप से स्वयं को अलगा रहे थे। इस संदर्भ में भूषण की कविता का एक उदाहरण गौर करने लायक है –

                             पंज हजारिन बीच खड़ा किया मैं उसका कुच्छ भेद ना पाया।

                             भूषण यों कहि औरंगजेब उजीरन सों बेहिसाब रिसाया।।

                            कम्मर की न कटारी दई इस्लाम ने गोसलखाना बचाया।

                             और सिवा करता अनरत्थ भली भई हत्थ हथियार न आया।।

 हिन्दी/हिन्दवी का वह रुप जो सूफियों की बानियों के भीतर तैयार हुआ उससे हिन्दी/हिन्दवी की शेष कविता(ब्रज, अवधी आदि) को अलग रखने की वजह भाषा के भीतर नहीं बल्कि तत्कालीन सांस्कृतिक संघर्ष में है। चाहे आज के संदर्भों में बात राजनीतिक रुप से जितनी नाजायज लगे लेकिन हिन्दी साहित्य के इतिहास में इस संघर्ष को दर्ज करती पंक्ति बड़े विवादों के बावजूद आजतक मौजूद है- ‘मलेच्छाक्रांतेषु देशेषु पापैकनिलयेषु, सत्पीड़ा व्यग्र लोकेषु, कृष्णएव गतिर्मम..।’ समीक्ष्य पुस्तक यह नोट करती है कि “हिन्दी हिन्दवी देहलवी का सौभाग्य था कि उसे शुरु से ही फारसी लिपि उपलब्ध थी। यह इसलिए हुआ कि इस भाषा का साहित्यिक प्रयोग सबसे पहले मुसलमानों ने किया। ” फारुकी साहब द्वारा प्रयुक्त शब्दावली का इस्तेमाल करते हुए पूछें तो क्या जो लोग देश को मलेच्छाक्रांत मानते थे उनके लिए हिन्दवी को ना अपनाने के लिए यही कारण पर्याप्त ना था कि उसका पहला प्रयोग मुसलमानों ने किया, और यह अलगाव फारसी लिपि को अपनाने के कारण और भी ज्यादा देखार था ? विचार इस बात पर भी किया जाना चाहिए कि क्या पुराने समय में जिन कवियों ने अपने को हिन्दवी से अलग रखा उनके लिए यह बात कहीं से मानीखेज और निर्धारक नहीं रही होगी कि हिन्दवी का तत्कालीन साहित्य धार्मिक प्रेरणाओं(इस्लाम) की ऊपज है। उर्दू का आरम्भिक युग में इस तथ्य को नोट किया गया है कि हिन्दी/ हिन्दवी में “साहित्य रचना आरंभ होने के लिए किसी प्रकार की धार्मिक भावना की प्रेरणा शायद हमेशा आवश्यक रही है.. ” पृष्ठ(91)

 कुछेक ब्राह्नणों और कायस्थों के फारसी पढ़ने-लिखने के तथ्य से यह सिद्ध नहीं होता कि धर्मगत विभाजन का भाव पुराने वक्तों में समाज के हर गोशे में मिट चला था और हिन्दवी(फारसी लिपि में लिखी) के भीतर हिन्दी-मुस्लिम दोनों के लिखत-पढ़त की मौजूदगी साझी संस्कृति के बनने का अकाट्य प्रमाण है।‘ उर्दू का आरम्भिक युग ’ की अंतर्निहित मान्यता का कमजोर पक्ष यही है। एक विवादपरक स्थापना को स्वीकार करके चलने के कारण पुस्तक उर्दू के आरम्भिक युग के संधान में निकलती तो बड़ी तैयारी के साथ है, लेकिन’ भाषाई इतिहास की जटिलताओं के साथ किताब में इंसाफ होते-होते रह जाता है।

  पुस्तक—उर्दू का आरम्भिक युग- साहित्यिक संस्कृति एवं इतिहास के पहलू

  लेखक- शम्सुर्रहमान फारुकी

  अनुवाद- रहील सिद्दीकी/गोविन्द प्रसाद

  संपादन- कृष्णमोहन/ दीपक रुहानी

  प्रकाशक- राजकमल प्रकाशन, पहला संस्करण- 2007, पहली आवृति- 2008

  पृष्ठ संख्या-151, मूल्य-175 रुपये

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव,  मूलतया छपरा(बिहार) के निवासी, पिछले पंद्रह सालों से दिल्ली में। पहले आईआईएमसी और फिर जेएनयू में पढ़ाई। “उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हिन्दी लोकवृत्त का निर्माण” शीर्षक से पीएचडी के बाद दिल्ली के कॉलेजों में छिटपुट अध्यापन, फिर टीवी चैनल की नौकरी और अब विकासशील समाज अध्ययन पीठ(सीएसडीएस) की एक परियोजना इंक्लूसिव मीडिया फॉर चेंज से जुड़े हैं। इनसे  chandan@csds.in पर संपर्क संभव है। 

साभार- प्रतिमान 

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