गीता प्रेस के कैलेंडर जैसा है केदारजी का ‘बनारस’: कृष्ण कल्पित

छवियों से मोहग्रस्त कवि कब ख़ुद एक छवि बन जाता है और ‘पाठकों’ से भरा-पूरा रहने वाला हिंदी समाज कैसे ख़ुद मोहग्रस्त हो जाता है, यह हिंदी की एक समकालीन घटना है.

छवि-निर्माण के इस सायास-अनायास प्रयास को तोड़ने का यह पहला प्रयास हिंदी में (सुविधानुसार, अगर आप इसे तात्कालिक भी कहना चाहें तब भी) कृष्ण कल्पित के कारण संभव हुआ.

रामविलास शर्मा को ‘फ़ासिस्ट’ क़रार देने का जैसा संगठित प्रयास नामवर-नेतृत्व में ‘आलोचना’ द्वारा हुआ था. साहित्य संसार की उस समय की चुप्पी याद आती है, लेकिन केदारनाथ सिंह प्रसंग में आलोचना के कुछ बिंदुओं को उभारना भर कृष्ण कल्पित को कोप-भाजन का शिकार बना देता है.

केदार-संदर्भ में उन्होंने कोई नयी बात की है, ऐसा भी नहीं है, बल्कि उन्होंने तो हिंदी-बौद्धिकों का कान पकड़ उन्हें हिंदी-आलोचना की परंपरा की ओर मुखातिब करने का काम ही किया है.

कृष्ण कल्पित के हस्तक्षप दूरगामी होते हैं. पहले वह एक कंकड़ फेंकते हैं, हलचल होती है और फिर जाल सहित नदी में कूदते हैं. कृष्ण कल्पित को कभी नदी किनारे जाल सुखाते नहीं देखा गया है. वैसे भी रेगिस्तान के एक कवि को नदी मिल जाए और वह किनारे बैठे जाल सुखाएगा, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती.

केदारनाथ सिंह कृत ‘बनारस’ कविता पर कृष्ण कल्पित का यह लेख एक शोध-प्रस्ताव (synopsis) है, या कह सकते हैं कि abstract है. नयी समीक्षा और एफ़.आर. लीविस के स्क्रूटिनी ग्रुप की आलोचना को भी देखें तो वे शोध-प्रबंध नहीं होकर abstract लगते हैं, नामवर सिंह की कहानी-कविता आलोचना का एक बड़ा हिस्सा इसे दायरे का ही है.

कृष्ण कल्पित केदारनाथ सिंह की कविता के संदर्भ में ‘काव्य-बिम्ब की प्रासंगिकता और सार्थकता’ का सवाल उठा रहे हैं, यह सवाल भी नया नहीं है. नामवर सिंह ने कहीं लिखते हुए केदारनाथ सिंह के ‘सप्तक रूप’ को ऐसे याद करते हैं, “ बिम्बों की लड़ी देखकर लगता है कि यह चरखे से निकले सूत की तरह चाहे जितनी लम्बी हो सकती थी. इसका आकस्मिक अंत अनिवार्य नहीं, बल्कि सुविधाजन्य है… कविता में अंतर्निहित कोई तर्क नहीं, बल्कि और अधिक चमत्कारपूर्ण बिम्बों को ढूंढ़ने के प्रयास से उपराम ही प्रतीत होता है. यदि बिम्ब-विधायक वस्तुओं की प्रकृति का विश्लेषण करें तो वास्तविक और काल्पनिक, भयावह और प्रीतिकर गुण-धर्मों का अद्भुत संयोग दिखाई पड़ता है. निस्संदेह इसके अनागत के भय-आशा—मिश्रित रूप की व्यंजना होती है. किंतु यह मिश्रण इतना अनिश्चित और अस्पष्ट है कि अभीष्ट से अधिक अनायासलभ्य प्रतीत होता है. कहना न होगा कि ये बिम्बधर्मी असंगतियां कविता के मूल कथ्य की असंगतियां हैं, जो अंततः कवि-कर्म की कमजोरी प्रकट करती हैं.”

नामवर तो शुरुआती केदार के बारे में ऐसी बातें कह रहे थे, लेकिन कृष्ण कल्पित इसे केदार के समूचे काव्य-व्यक्तित्व की सच्चाई मानते हैं.

दुःख है कि जो काम हिंदी-आलोचना और आलोचकों का है, वह भार भी एक कवि ढो रहा है. और यह मानने में शायद ही गुरेज होना चाहिए कि कृष्ण कल्पित का यह abstract ‘बनारस’ के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण प्रस्थान साबित होगा. #तिरछी spelling 

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Photo By Marcin Ryczek

केदार जी का बनारस: अर्धक अस्ति अर्धक नास्ति

By कृष्ण कल्पित

केदारनाथ सिंह की कविता बनारस  रिपोर्ताज़ (Riportage) शैली में लिखी गई कविता है, जो मोहक बिम्बों (Romantic imagery) से लदी हुई है।

फ़ारसी के महाकवि हाफ़िज़ का कहना था कि जब भी रेगिस्तान पर लिखो तो इस बात का ध्यान रहे कि उसमें ऊँट न आये। अगर केदारजी की ‘बनारस’ कविता को रेगिस्तान समझा जाये तो यहाँ ऊँट ही ऊँट नज़र आते हैं।

बनारस के जितने भी प्रतीक हैं, वे यहाँ अपनी पूरी सज-धज के साथ मौज़ूद हैं – जल, नाव, घाट, शँख, गंगा, शव, खाली कटोरा, सूर्य, अर्घ्य, मडुआडीह इत्यादि। केदारजी इस कविता में आज के बनारस को नहीं बल्कि कालातीत बनारस की खोज करते हैं।

एक बार केदारजी अमेरिका में कविता-पाठ के लिए गये तो उन्होंने बनारस  कविता का पाठ किया। यह कविता सुनकर एक वृद्ध महिला रोने लगी। इस घटना का केदारजी के शिष्य किसी चमत्कार की तरह वर्णन करते हैं। जैसे कि मंगलेश डबराल अपने एक साक्षात्कार में इस बात की पुष्टि करते हैं कि उनकी कविता पढ़कर गुजरात के किसी व्यक्ति ने आत्महत्या का इरादा बदल लिया।

यह सही है कि भारतदेश में किसी चमत्कार के बिना किसी को बड़ा कवि नहीं समझा जाता। मध्यकाल के सभी बड़े कवियों के साथ किसी न किसी चमत्कार की कथा जुड़ी हुई है। लेकिन इस घटना के बारे में ख़ुद केदारजी ने लिखा है कि मैंने तो सिर्फ़ शीर्षक ही पढ़ा था – बनारस – कि वह बुज़ुर्ग महिला रोने लगी। ज़ाहिर है कि वह महिला कविता सुनकर नहीं बल्कि बनारस शहर की प्राचीनता, रहस्यमयता और आध्यात्मिकता को याद करके रोने लगी थी।

बनारस  कविता का उत्कर्ष (Climax) यह है कि यह आधा जल में है, आधा मंत्र में है और आधा है और आधा नहीं। क्या ये पंक्तियां आपको किसी संस्कृत श्लोक का भावानुवाद नहीं लगतीं? यह भी सम्भव है कि यह मंत्र ख़ुद केदारजी ने रचा हो क्योंकि बिना किसी श्लोक के बनारस पर विश्वसनीय कविता लिखना असम्भव है।

बनारस एक रहस्यमय नगर है। पुराने से भी पुराना। दो पुराने से भी पुराना। इसकी प्राचीनता और रहस्यमयता प्राचीनकाल से आज तक रचनाकारों के लिये आकर्षण का केंद्र रही है। मिर्ज़ा ग़ालिब भी इस आकर्षण से बच नहीं सके, जो इसे आदि से अंत तक मस्त-मलंगों की राजधानी कहते हैं।

आधुनिक हिंदी साहित्य में बनारस को लेकर जिन उल्लेखनीय रचनाओं का सृजन हुआ है उनमें शिवप्रसाद मिश्र ‘रुद्र’ की ‘बहती गंगा’, जयशंकर प्रसाद की कहानी ‘गुंडा’, शिवप्रसाद सिंह की उपन्यास त्रयी, जिसमें सिर्फ़ ‘गली आगे मुड़ती है’ ही पठनीय है। काशीनाथ सिंह का बहुचर्चित उपन्यास या रिपोर्ताज़ ‘काशी का अस्सी’, जहाँ भदेस ही कथ्य है। इन तमाम गद्य कृतियों में रुद्र काशिकेय की ‘बहती गंगा’ सर्वश्रेष्ठ है – एक मॉडर्न क्लासिक।

आधुनिक हिंदी कविता में धूमिल के यहाँ बनारस के चमकते हुये घाट दिखाई पड़ते हैं, जहाँ स्त्रियाँ योनि की सफलता के बाद गीत गा रही हैं। ज्ञानेन्द्रपति भी पिछले तीस बरसों से अपनी कविताओं में बनारस की अक्कासी कर रहे हैं। ज्ञानेन्द्रपति प्राचीन बनारस की तरफ़ देखते भी नहीं। वे पटना क़लम के कलाकार की तरह साधारण मनुष्यों और बनारस के जनजीवन के चित्र उकेर रहे हैं। केदारजी की संस्तुति पर जब ज्ञानरंजन ने ज्ञानेन्द्रपति को ‘पहल’ सम्मान देते हुये कहा था – अभी ज्ञानेन्द्रपति बनारस में और धँसेंगे। देखिये!

बनारस पर केदारजी की सिर्फ़ यही एक कविता है, जो श्लोकों, प्रतीकों, बिंबों और मिथकों से जड़ित है। इस कविता में कोई आंतरिक प्रवाह नहीं है, कोई दीर्घ-आलाप नहीं। यहाँ सब कुछ जड़ित है। ‘बनारस’ कविता में केदारजी कवि कम और एक कुशल शिल्पी दिखाई पड़ते हैं।

बनारस  की तरह केदारजी की कविता में केवल एक मुसलमान है – नूर मियाँ। नूर मियाँ केदारजी का सिकन्दर बख़्त है।

बनारस जैसे प्राचीन नगर से टकराकर आधुनिक हिंदी कविता में कोई बड़ी रचना सम्भव हुई है तो वह श्रीकांत वर्मा की ‘मगध’ है। सुनते हैं कि ‘मगध’ की रचना से पूर्व श्रीकांत वर्मा तीन महीनों तक अपनी पहचान छुपाकर बनारस की गलियों में भटकते रहे थे। ‘मगध’ निसन्देह एक क्लासिक रचना है जहाँ प्राचीन जनपदों, नगरों, प्रतीकों के जरिये आधुनिक सभ्यता के हाहाकार को बहुत मार्मिक ढंग से व्यक्त किया गया है।

इसके बरक्स केदारजी का बनारस  कालातीत बनारस है, जो शताब्दियों से अपनी एक टांग पर खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य दे रहा है। केदारजी लगता है बनारस पर कविता नहीं लिख रहे बल्कि कोई पेंटिंग बना रहे हैं और इस चक्कर में वे इतनी सारी चीज़ें कैनवास पर अंकित कर देते हैं कि उसका प्रभाव बिखर जाता है।

कोई करुणा, कोई वेदना, कोई विडम्बना, कोई केंद्रीय कथ्य ‘बनारस’ कविता में नज़र नहीं आता।

न यह सत्यजित रे का बनारस है, न मक़बूल फ़िदा हुसेन का, न रामकुमार का, न एलन गिन्सबर्ग का। यह केदारजी का बनारस है – गीता प्रेस गोरखपुर के यथार्थवादी कैलेंडर जैसा।

इस कविता की शुरुआत में जब मडुआडीह की तरफ़ से बनारस की तरफ़ जो धूल का जो बवंडर आता है और बनारस कंठ किरकिराने लगता है तो पाठक की आशा जगती है लेकिन अंत तक आते-आते शताब्दियों से एक टांग पर खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देता बनारस कविता को मटियामेट कर देता है ।

केदारजी कहते हैं कि बनारस में सब कुछ धीरे-धीरे होता है। मुझे लगता है कि धीरे-धीरे केदारजी के इस अति प्रशंसित (Over rated) आधुनिक शाहकार को भुला दिया जायेगा!

यह ऐसा ही है कि पेरिस पर लिखी कविता का अंत एफिल टॉवर से किया जाये । किसी शहर पर कैसे कविता लिखी जाती है वह हम फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की पेरिस पर लिखी कविता पढ़कर जान सकते हैं ।

बनारस  कविता केदारजी की बाघ सीरीज़ की तरह महत्वाकांक्षी पर असफल कविता है ।

 

कृष्ण कल्पित

अपने तरह का अकेला-बेबाक और विवादित कवि । कृष्ण कल्पित का जन्म 30 अक्टूबर, 1957 को रेगिस्तान के एक कस्बे फतेहपुर शेखावटी में हुआ। अब तक कविता की तीन किताबें और मीडिया पर समीक्षा की एक किताब छप चुकी है। एक शराबी की सूक्तियां  के लिए खासे चर्चित। ऋत्विक घटक के जीवन पर एक पेड की कहानी नाम से एक वृत्तचित्र भी बना चुके हैं।  अभी  हाल ही में बाग़-ए-बेदिल नाम से  एक विलक्षण  और विशाल  काव्य-संकलन  के साथ-साथ ‘कविता-रहस्य ‘ नामक पुस्तक प्रकाशित । 

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4 thoughts on “गीता प्रेस के कैलेंडर जैसा है केदारजी का ‘बनारस’: कृष्ण कल्पित

  1. आशुतोष कुमार on said:

    अगर छवि निर्माण के सायास-अनायास प्रयास को तोड़ने का यह पहला प्रयास है, तो नामवर जी का वह कथित प्रयास दूसरा प्रयास होगा! खैर, बनारस कविता पर इस पर्चे में दो आरोप जड़े गए हैं. पहला यह कि कविता यथार्थपरक बिंबों से निर्मित है. गोया प्रतीकात्मक, प्रभाववादी या रहस्यात्मक बिम्बों से रचा जाना ही कविता के कविता होने की शर्त हो ! रेगिस्तान पर लिखी कविता में ऊँट दिख जाएं तो कविता ख़राब मान ली जानी चाहिए!! दूसरा यह कि यह कालातीत बनारस है , समकालीन नहीं. जैसे गीताप्रेस के कैलेंडर होते हैं. यहाँ पठन की किंचित चूक है. तनिक ध्यान से पढने पर कोई भी देख सकता है कि बनारस कविता में एक ऐसे शहर की विडम्बना की ओर इशारा है, जो कालातीत होने के भौकाल को ही अपनी समकालीनता की पूंजी बना कर जीने को अभिशप्त जान पड़ता है. और अपने इस अभिशाप से उसी तरह बेख़बर है, जैसे एक पैर पर खडा साधू बेकार हो चुके अपने दूसरे पैर से होता है. बनारस आधुनिक हिन्दी कविता की महानतम उपलब्धियों में भले शामिल न हो, लेकिन उसकी निकटता हुसैन के चित्रों से ही है, गीता प्रेस के कैलेंडरों से नहीं.

    • आपकी सुविधा के लिए दोनों पैराग्राफ जोड़ देता हूँ. फिर नामवर-प्रसंग की जरुरत नहीं रह जायेगी.
      “छवियों से मोहग्रस्त कवि कब ख़ुद एक छवि बन जाता है और ‘पाठकों’ से भरा-पूरा रहने वाला हिंदी समाज कैसे ख़ुद मोहग्रस्त हो जाता है, यह हिंदी की एक समकालीन घटना है. छवि-निर्माण के इस सायास-अनायास प्रयास को तोड़ने का पहला प्रयास हिंदी में (सुविधानुसार, अगर आप इसे तात्कालिक भी कहना चाहें तब भी) कृष्ण कल्पित के कारण संभव हुआ.”
      शेष बहसतलब है, उम्मीद है कि मुक्कमिल तरीके से इस बहस को आप आगे बढ़ाएंगे!

  2. Ravi Ranjan on said:

    इस टिप्पणी से गुजरने के बाद दोबारा ‘बनारस’ कविता पढ़ते हुए अचानक प्रेमचंद याद आए,जिन्होंने संभवत: सज्जाद ज़हीर / बन्ने भाई को लिखित किसी पत्र में बनारस को ‘रूढ़िवाद की राजधानी’ कहा था.केदार जी की ‘बनारस’ कविता में बनारस का महिमा मंडन अधिक है.जबकि भारतेंदु हरिश्चंद्र के यहाँ ‘परदेसी’ का गीत ‘देखी तुम्हरी कासी’ पाठक को बनारस के प्रति आलोचनात्मक रुख अख्तियार करने के लिए प्रेरित करता है.

  3. Pingback: धर्म-दर्शनवादी और उदारवादी राजनीतिक चेतना के कवि केदारनाथ सिंह: उस्मान खान |

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