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दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र उर्फ़ अंध-श्रद्धा के राज में समीक्षा का निर्वासन: उस्मान खान

डॉ. अंबेडकर ने सौंदर्यशास्त्र पर सीधे कलम चलाई है, ऐसा हमें ज्ञात नहीं, लेकिन जॉन ड्यूई ने सौंदर्यशास्त्र पर लिखा है। वाल्मीकि जी का सौंदर्यशास्त्र चाहे अनुभव की द्वंद्वात्मकता की उपेक्षा करे, ड्यूई ऐसा नहीं करते। उनकी पुस्तक ‘आर्ट एज़ एक्सपीरिएन्स’[4] १९३४ में प्रकाशित हुई थी। उनके अनुसार, अनुभव स्थानीय-माहौल में कार्य करते हुए अर्जित किए जाते हैं, ये अनुभव स्थानीय-संस्कृति में निर्मित सामुदायिक अनुभव होते हैं। उनके अनुसार ये समुदाय निरंतर टकराव में रहते हैं। वे खंडित और यांत्रिक अनुभव से जन्य कला को असौंदर्य कहते हैं, सुव्यवस्थित पूर्ण अनुभव को ही वे अनुभव मानते हैं। वे कला को उत्पादक/कलाकार का पक्ष मानते हैं और सौंदर्य को उपभोक्ता/सामाजिक का। निश्चित ही कलाकृति का उपभोक्ता केवल उदासीन ग्राहक नहीं होता, वह अपने रिस्पांस से कलाकृति को विभिन्न अर्थ देता है। उनके अनुसार कलाकार एक व्यक्ति की तरह अपने स्थानीय माहौल में कार्य करते हुए अनुभव अर्जित करता है, कला इन अनुभवों का विशेष रूप है। कलाकार के अनुभव विशिष्ट होते जाते हैं, लेकिन सामान्य अनुभवों से एकदम अलग वे नहीं होते। ड्यूई के अनुसार सोचना भी सुंदर होता है। वाल्मीकि जी ने अपने सौंदर्यशास्त्र में, यदि वह डॉ. अंबेडकर के दर्शन से निर्मित हुआ है, अनुभव के सौंदर्य पर सोचने का कष्ट नहीं उठाया।   #लेखक 

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Courtesy:  kractivist.wordpress.com/

                    

‘दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र’ : वाद-विवाद-संवाद[1]

By उस्मान खान

                              फ़रियाद की कोई लै नहीं है,

                              नाला पाबंद-ए-नै नहीं है।[2]

दलित-साहित्य आंदोलनधर्मी-बहसधर्मी है। सन २००१ में प्रकाशित ओमप्रकाश वाल्मीकि की पुस्तक ‘दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र’ दलित-साहित्य की बहसों को समेटने और अंबेडकरवाद को दलित साहित्य के सौंदर्यशास्त्र का केंद्र बनाने का प्रयास है। दलित-साहित्य के सौंदर्यशास्त्र या समीक्षाशास्त्र के निर्माण का यह प्रयास दलित-साहित्य की परिपक्वता और दलित-बहस की अपरिपक्वता दोनों को सामने लाता है।

वाल्मीकि जी अपने सौंदर्यशास्त्र का आधार डॉ. अंबेडकर के जीवन-संघर्षों और विचारों को बताते हैं। डॉ. अंबेडकर का सम्पूर्ण जीवन अगर किसी एक सामान्य कार्य में पूर्ण होता है, तो वह है छुआछूत और जाति-व्यवस्था का विरोध। उन्होंने उच्च-शिक्षा प्राप्त की, बहिष्कृत हितकारिणी सभा का निर्माण किया, मुकनायक, बहिष्कृत भारत और इक्वालिटी जनता जैसे पत्र निकाले, गाँधीवादी राजनीति पर प्रश्न-चिह्न लगाए, महाड़ सत्याग्रह किया, मनुस्मृति जलाई, जाति-प्रश्न को राजनीति का प्रश्न बनाया, कालाराम मंदिर में प्रवेश का प्रयास किया, इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी बनाई, कांग्रेस मंत्रिमंडल में शामिल हुए, बौद्ध हुए, शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन का निर्माण किया। यथा, उनका जीवन-संघर्ष किसी सीधी लकीर की तरह नहीं है, उसमें पर्याप्त पेंच हैं। उनके विचार जाति-व्यवस्था से मुक्ति की राजनीति के सापेक्ष तैयार होते जाते हैं। बने-बनाए ढाँचे में नहीं अनुभव, प्रयोग और व्यवहार के आधार पर बदलते हुए। एक तीखा भाव जो नहीं बदलता, वह है – जाति-भेद का बीजनाश। इस अर्थ में डॉ. अंबेडकर किसी वाद के अनुसरणकर्ता या निर्माता नहीं हैं, अपने गुरु जॉन ड्यूई की तरह अनुभवों से शिक्षा पाते हुए, किसी भी प्रकार की हिंसा से बचते हुए, वे जाति-व्यवस्था के उद्भव, विकास और नाश का अपना सिद्धान्त विकसित करते जाते हैं। अपनी राजनीति के लिए तात्कालिक लाभ प्राप्त करने के प्रक्रम में वे किन्हीं निश्चित आचार-विचार पर टीके नहीं रहते, वे मुख्यतः भौतिक-विकास का पूंजीवादी और आध्यात्मिक विकास का धार्मिक मार्ग सुझाते हैं। वे व्यवहारवाद के आधार पर संघर्ष करते जाते हैं, इन संघर्षों का अंतिम प्रयोग बौद्ध-धर्म अपनाना था और इस संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता कि वे आगे भी नए प्रयोग करने से हिचकते नहीं।

उनके जीवन-संघर्ष और चिंतन-मनन से जो दर्शन प्राप्त होता है उसे परिणामवाद, व्यवहारवाद या अनुभववाद कहा जा सकता है। जॉन ड्यूई से अलग उन्होंने अपनी विशेष समस्या के संबंध में इस दर्शन का प्रयोग और विकास किया। जहाँ ड्यूई अमेरिका की उभरती पूंजीवादी-साम्राज्यवादी-संसदीय-व्यवस्था में कार्यरत थे, वहीं डॉ. अंबेडकर सामंती-पूंजीवादी उपनिवेशी भारत में। उत्तर-उपनिवेशी भारत में डॉ. अंबेडकर की राजनीति का दूसरा रूप दिखाई देता है – तेलंगाना के जन-संहार का विरोध न करना, बौद्ध-धर्म को अपनाना और शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन का निर्माण करना आदि। वे कभी भारत में लोकतन्त्र के विकास और नागरिक-समाज के निर्माण के प्रति आशावान दिखते हैं, तो कभी उनका मोहभंग प्रकट होता है। सिद्धांतों की व्यवस्था उनके चिंतन में नहीं है। वे अपने जीवन-संघर्ष में भी स्थिति-सापेक्ष कोई भी कार्य करते दिखते हैं। हिंसा का पक्ष लेते भी उन्हें देखा जा सकता है। वे मार्क्स के विचारों को जाने बिना ही उनके प्रति घृणा और तिरस्कार प्रदर्शित करते हैं, बौद्ध-धर्म को जाति-व्यवस्था ही नहीं, सम्पूर्ण मानवता की सभी समस्याओं का हल बताते हुए वे मार्क्सवाद को (बिना ठीक से जाने-समझे ही) खारिज कर देते हैं।[3] अवसरानुकूल स्वीकार और त्याग की यह प्रक्रिया चलती रहती है। बौद्ध-धर्म के स्वीकार से जाति-व्यवस्था या उत्पीड़न का अंत संभव नहीं, इतिहास और वर्तमान दोनों इसका सबूत देते खड़े हैं। क्या म्याम्मार और श्रीलंका में बौद्ध-धर्म प्रभावी नहीं, क्या वहाँ सभी प्रकार का उत्पीड़न समाप्त हो चुका है, सभी लोग सुखी हैं, करुणा और मैत्री आधारित जीवन जी रहे हैं?

अंबेडकरवादी राजनीति डॉ. अंबेडकर को फरिश्ता, मसीहा, देवता की तरह प्रस्तुत करती है, इससे डॉ. अंबेडकर एक ऐसे व्यक्तित्त्व के रूप में उभरते हैं, जिनकी जय की जा सकती है या मूर्ति तोड़ी जा सकती है, लेकिन जिनसे संवाद नहीं स्थापित किया जा सकता। उत्तर-उपनिवेशी भारत में अंबेडकरवादी राजनीति कई धाराओं और उप-धाराओं में बंटती चली गई। मुख्यधारा एकालापी या असंवादी है। इस धारा के बौद्धिक डॉ. अंबेडकर को भगवान नहीं, तो उससे कम भी नहीं मानते। वे किसी भी तरह डॉ. अंबेडकर को विश्व का महानतम बौद्धिक सिद्ध करना और मनवाना चाहते हैं। बौद्धिक को बौद्धिक कहने में या क्रांतिकारी को क्रांतिकारी कहने में कोई हर्ज नहीं, लेकिन किसी के जीवन और विचारों का सुव्यवस्थित अध्ययन किए बिना क्या यह उचित है कि हम उसे कुछ कहें? वाल्मीकि जी डॉ. अंबेडकर के जीवन और विचारों को पूर्णता में नहीं देखते। उन्हें सर्वदर्शी सर्वज्ञाता की तरह से प्रस्तुत करने के अतिरिक्त उनके सौंदर्यशास्त्र में डॉ. अंबेडकर के व्यक्तित्त्व और दर्शन के बारे में कोई सही जानकारी नहीं मिलती। अंध-श्रद्धा के राज में समीक्षा निर्वासित रहती है।

निश्चित ही, डॉ. अंबेडकर बौद्ध-धर्म का विशेष उपयोग करते हैं, बौद्ध-दर्शन से अधिक वे बौद्ध-संगठन पर ध्यान देते हैं, उनके बुद्ध आधुनिक राजनैतिक बुद्ध हैं। भारत में जाति-व्यवस्था की समाप्ति के संघर्ष में विकसित हुआ उनका व्यवहारवादी-दर्शन विशिष्ट होकर भी व्यवहारवाद के सामान्य सिद्धांतों से विचलित नहीं होता। इस अर्थ में वे ड्यूई के सच्चे शिष्य हैं। बुद्ध के अनित्यवाद पर वे विशेष ध्यान नहीं देते। वाल्मीकि जी ने भी यही रास्ता पकड़ा है।

डॉ. अंबेडकर ने सौंदर्यशास्त्र पर सीधे कलम चलाई है, ऐसा हमें ज्ञात नहीं, लेकिन जॉन ड्यूई ने सौंदर्यशास्त्र पर लिखा है। वाल्मीकि जी का सौंदर्यशास्त्र चाहे अनुभव की द्वंद्वात्मकता की उपेक्षा करे, ड्यूई ऐसा नहीं करते। उनकी पुस्तक ‘आर्ट एज़ एक्सपीरिएन्स’[4] १९३४ में प्रकाशित हुई थी। उनके अनुसार, अनुभव स्थानीय-माहौल में कार्य करते हुए अर्जित किए जाते हैं, ये अनुभव स्थानीय-संस्कृति में निर्मित सामुदायिक अनुभव होते हैं। उनके अनुसार ये समुदाय निरंतर टकराव में रहते हैं। वे खंडित और यांत्रिक अनुभव से जन्य कला को असौंदर्य कहते हैं, सुव्यवस्थित पूर्ण अनुभव को ही वे अनुभव मानते हैं। वे कला को उत्पादक/कलाकार का पक्ष मानते हैं और सौंदर्य को उपभोक्ता/सामाजिक का। निश्चित ही कलाकृति का उपभोक्ता केवल उदासीन ग्राहक नहीं होता, वह अपने रिस्पांस से कलाकृति को विभिन्न अर्थ देता है। उनके अनुसार कलाकार एक व्यक्ति की तरह अपने स्थानीय माहौल में कार्य करते हुए अनुभव अर्जित करता है, कला इन अनुभवों का विशेष रूप है। कलाकार के अनुभव विशिष्ट होते जाते हैं, लेकिन सामान्य अनुभवों से एकदम अलग वे नहीं होते। ड्यूई के अनुसार सोचना भी सुंदर होता है। वाल्मीकि जी ने अपने सौंदर्यशास्त्र में, यदि वह डॉ. अंबेडकर के दर्शन से निर्मित हुआ है, अनुभव के सौंदर्य पर सोचने का कष्ट नहीं उठाया। उनको यही कह देना काफी लगा – ‘एक दलित जिस उत्पीड़न को भोगकर दुख, वेदना से साक्षात्कार करता है, वह आनंददायक कैसे हो सकता है?’[5] (५०)

पीड़ा से आनंद नहीं उपजता, इस मान्यता के साथ वाल्मीकि जी अपने सौंदर्य-चिंतन में आनंद के पक्ष को नकारते हैं। निश्चित ही, आनंद के पक्ष को सीमित अर्थों में ग्रहण करने से ऐसी मान्यता निर्मित हुई है। आनंद का पक्ष केवल मनोरंजन से नहीं जुड़ा है, अरस्तू द्वारा प्रस्तावित विरेचन से भी सम्बद्ध है। कलाकृति के उपभोग से सम्बद्ध है। सौंदर्यशास्त्र के निर्माण में पहला प्रश्न साधारणीकरण का ही रहा आया है। वाल्मीकि जी इस प्रश्न से पल्ला झाड़ लेते हैं या उपरोक्त प्रश्न उठाकर उस पहले प्रश्न को खारिज मान लेते हैं। पाठक/दर्शक/श्रोता कलाकृति में वर्णित भाव-विचार-अनुभव को अपने भाव-विचार-अनुभव से अनुकूलित करता है, इस प्रक्रिया में अपनी पीड़ा के लिए दवाई पाता है। जिस तरह घाव पर मरहम लगाने से घायल को लाभ मिलता है, उसी तरह पीड़ा के अनुभव पढ़ना पाठक के मन-मस्तिष्क के घावों को, जो उसकी अपनी पीड़ा के अनुभव हैं, भरता है। इसका अर्थ फिर यह नहीं कि पाठक को दूसरे की पीड़ा के अनुभव पढ़कर राहत मिलती है, नहीं, बल्कि उसको अपनी पीड़ा के अनुभव पर सोचने-समझने में सहयोग मिलता है, साथ ही पीड़ा के सामूहिक अनुभव पर सोचने-समझने में भी वह अधिक सक्षम हो पाता है। इससे वह अपनी व समाज की पीड़ा को समाप्त करने की प्रेरणा भी पाता है। यह समझ और प्रेरणा अनुभवों की पूर्णता और संतुष्टि को जन्म देती है, जो पाठक के लिए कलाकृति का भिन्न अर्थ निर्मित करती है। जहाँ ऐसा नहीं होता, वहाँ पाठक के लिए कृति अपूर्ण और असंतुष्टिकर होती है, उसकी सौंदर्य-पीपासा शांत नहीं होती।

कला को एक माध्यम की तरह देखने से यह दृष्टि पैदा होती है कि कला का उद्देश्य केवल शिक्षा देना है, कला को स्वयंपूर्ण मान लेने पर यह दृष्टि पैदा होती है कि कला का उद्देश्य केवल आनंद या मनोरंजन है। ये दोनों ही दृष्टियाँ अधूरी हैं और कला में फाँक पैदा करती हैं। शिक्षा और आनंद का जितना बेहतर संतुलन कोई कलाकृति स्थापित कर पाती है, उतनी ही सुंदर वह कही जाती है – एक स्वयंपूर्ण-माध्यम । लेकिन कला का उद्देश्य यहीं तक सीमित नहीं है, कला का अंतिम उद्देश्य सत्य को पुनर्प्रस्तुत करना है, वास्तविकता का कलात्मक प्रकाशन करना है। वाल्मीकि जी अपने सौंदर्यशास्त्र में कला को एक माध्यम, वह भी सीमित, मानते दिखते हैं। निश्चित ही, वे बाज़ार-केन्द्रित कला-उत्पादन के विरोध में और विचारधारा-केन्द्रित कला-उत्पादन के पक्ष में हैं, लेकिन सत्य और सुंदर की पूर्णता की उपेक्षा करते हैं।

अपनी पुस्तक में उन्होंने ड्यूई द्वारा किए गए विषय और अंतर्वस्तु के भेद की चर्चा की है, लेकिन वे यह नहीं बताते कि अंतर्वस्तु से ड्यूई का अर्थ साहित्यिकता से ही है, शायद इससे वे अपनी इस मान्यता को तुष्ट करना चाहते हैं कि अंतर्वस्तु ही प्रमुख है, रूप नहीं। जबकि ड्यूई के लिए रूप का महत्त्व कम नहीं। फिर वाल्मीकि जी कला की सामान्य अंतर्वस्तु संबंधी ड्यूई के विचार पर भी नहीं सोचते, इसीके परिणामस्वरूप वे दलित-साहित्य और अनुभव की अंबेडकरवादी अनन्यता पर ज़ोर देकर उसकी महत्ता स्थापित करते दिखते हैं। वैज्ञानिक जागरण के अभाव में सौंदर्यशास्त्र का निर्माण किस तरह होता है, इसे समझने के लिए वाल्मीकि जी का सौंदर्यशास्त्र एक उत्तम उदाहरण है। डॉ. अंबेडकर के विचारों और साहित्य दोनों के संबंध में उनका विवेचन धार्मिक-आस्थामय है, दर्शन और विज्ञान से वे दूर हैं। कहीं इसलिए तो नहीं कि दर्शन और विज्ञान धर्म पर संदेह और धर्म के नकार का प्रस्ताव भी रखते हैं!

अंबेडकरवाद विचार, आंदोलन और प्रकार्य की दृष्टि से एक जटिल विचारधारा है। हिन्दी-क्षेत्र में भी दलित-आंदोलन के निर्माण में और प्रकारांतर से दलित-साहित्य के निर्माण में अंबेडकरवाद के प्रचार-प्रसार की मुख्य भूमिका रही है। ८० के दशक में विशेषकर पश्चिमी उत्तरप्रदेश में, अनुसूचित-जाति के सामाजिक राजनैतिक संगठनों के निर्माण, प्रचार-प्रसार और चुनावी विजयों के साथ ही साथ, हिन्दी-दलित-साहित्यिकों के आंदोलन का भी प्रारम्भ होता है। अनुसूचित-जाति के शिक्षित-जन अंबेडकरवाद और वाया अंबेडकरवाद, बौद्ध-धर्म की ओर मुड़ते हैं। ९० के दशक में दलितों की आत्मकथाएँ सामने आने लगती हैं, जो हिन्दी-साहित्य के इतिहास की अभूतपूर्व घटना है। ओमप्रकाश वाल्मीकि, मलखान सिंह, मोहनदास नैमिशराय, कौशल्या बैसन्त्री, सुशीला टाकभौरे दलित-साहित्यिकों की सूची बढ़ती जाती है। वाल्मीकि जी का कहना ठीक है कि सिद्धों, संतों और दलित-साहित्य के विचारों में मूलभूत अंतर है, तब भी हिन्दी-साहित्य के इतिहास में और किसी धारा से इसकी सादृश्यता नहीं खोजी जा सकती। स्वयं वे भी घुम-घूमकर वहीं पहुँचते हैं।

उत्तर-उपनिवेशी भारत में समाज के लोकतांत्रिकरण और पूंजीवादी प्रसार ने भारत की सदियों पुरानी ग्रामीण-व्यवस्था का अधिकाधिक विखंडन किया, साथ ही अनुसूचित-जाति के एक हिस्से की राजनैतिक-आर्थिक उन्नति ने उनके अपने बौद्धिकों के निर्माण में आधारभूत भूमिका निभाई। यह बौद्धिक-वर्ग अंबेडकरवाद का निर्माता बना। अनुसूचित-जाति का यह वर्ग हिन्दी-दलित-साहित्य को जन्म देने वाला भी बना। महाराष्ट्र में दलित-साहित्यिकों के उभार और हिन्दी-क्षेत्र में – विशेषकर पश्चिमी उत्तर-प्रदेश में – कांशीराम और मायावती के बहुजन-आंदोलन और फुले-अंबेडकर-विचार के प्रचार-प्रसार ने हिन्दी-दलित-साहित्य के निर्माण की तात्कालिक भूमिका तैयार की। आज भी, दलित-आंदोलनों के निरंतर प्रचार-प्रसार के बाद भी, दलित-साहित्यिक हिन्दी-क्षेत्र में पूरी तरह सामने नहीं आ पाए हैं। अब भी दलितों के लिए कलम पकड़ना मुश्किल है। दलित शायद निर्बाध घोड़ी चढ़ने भी लग जाएँ, लेकिन ज्ञान-शक्ति अर्जित किए बिना किसी उत्पीड़ित-वर्ग की मुक्ति संभव नहीं, दलितों को भी इस शक्ति को अधिकाधिक सँजोना होगा, अन्यथा विडम्बना बनी रहेगी –

                              बेटा है बजरंगी दल में

                              बाप बना है भगवाधारी

                              भैया हिन्दू परिषद में है

                              बीजेपी में महतारी

                              मंदिर-मस्जिद में गोली

                              इनके कंधे चलती है।

                              यह दलितों की बस्ती है।[6]

ओमप्रकाश वाल्मीकि दलित-साहित्य को अंबेडकरवाद से किसी तरह बाहर नहीं मानते, यही कारण है कि वे दलित-साहित्य की अंबेडकर-पूर्व की रचनाओं को विशेष महत्त्व नहीं देते। उनकी दृष्टि में जो अंबेडकरवाद की चेतना से पूर्ण नहीं, वह दलित-साहित्य नहीं। अपने सौंदर्यशास्त्र में वे दो बातों पर ज़ोर देते हैं – पहली कि अनुसूचित-जाति द्वारा लिखा गया साहित्य ही दलित-साहित्य है, दूसरी कि अंबेडकरवाद की चेतना के बिना दलित-साहित्य नहीं रचा जा सकता। कुल मिलाकर यह कि अनुसूचित-जाति के अंबेडकरवादी व्यक्ति का साहित्य ही दलित-साहित्य है। उनके लिए दलित-साहित्य की प्रामाणिकता अंबेडकरवादी होने पर टिकी है, ना कि सिर्फ़ दलित होने पर। आश्चर्य नहीं, उनके लिए बुद्ध, सिद्ध, संत, फुले (पेरियार) आदि डॉ. अंबेडकर के निर्माण में समाहित हो जाते हैं।

वाल्मीकि जी के अनुसार बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर दलित-साहित्य के केंद्रीय प्रेरणा-स्रोत हैं और दलित-साहित्य की धार्मिक, दार्शनिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक और आर्थिक मान्यताएँ वही हैं, जो अंबेडकरवाद की हैं। लेकिन इन मान्यताओं को केवल प्रकट किया गया है और इन पर आत्म-सत्यापन की मोहर लगा दी गई है। यानी इन मान्यताओं और दलित-साहित्य के अंतर्संबंधों पर विचार नहीं किया गया है। डॉ. अंबेडकर की आर्थिक मान्यताओं पर लिखते हुए उन्होंने ‘अछूत  कौन और कैसे?’ पर आधारित सभ्यता की व्याख्या प्रस्तुत करना ही काफ़ी समझा है। क्या यह व्याख्या भौतिक-इतिहास पर आधारित है? क्या इससे दलित-साहित्य की आर्थिक मान्यताएँ स्पष्ट हो जाती हैं? इस व्याख्या को क्यों सही माना जाए, इसके पीछे कोई तर्क उन्होंने नहीं दिया। ऐसा क्यों? कहीं इसलिए तो नहीं कि इस संबंध में डॉ. अंबेडकर स्वयं सशंकित थे, इसलिए वे भी बिना प्रमाण ही इसे मान लेने की बात कहते हैं – ‘हमारे पास इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि ये छितरे हुए आदमी बौद्ध थे। किन्तु किसी प्रमाण की आवश्यकता भी नहीं है, जबकि उस समय अधिकांश हिन्दू बौद्ध ही थे। हम मान लेते हैं कि वे बौद्ध ही थे।‘[7] हमारे पास प्रमाण नहीं है, लेकिन हम मान लेते हैं, क्या यह वैज्ञानिक-दृष्टि है? डॉ. अंबेडकर ने स्वयं अर्थशास्त्र पर कलम चलाई है, वाल्मीकि जी को आर्थिक मान्यताओं पर बात करते हुए डॉ. अंबेडकर के अपने अर्थशास्त्र को सामने रखना था। अगर वाल्मीकि जी श्रम के शोषण का विचार सामने रखते, तो दलितों के शोषण का (आर्थिक ही सही!) पक्ष अधिक उजागर हो पाता और इस संबंध में डॉ. अंबेडकर के विचार भी अधिक स्पष्ट हो पाते। दलित-साहित्य में वर्णित श्रम के शोषण को समझने में भी पाठक को मदद मिलती। इसी तरह दलित-साहित्य की धार्मिक, सांस्कृतिक मान्यताओं पर लिखते हुए वे कहते हैं कि दलित-साहित्य अंधश्रद्धा, आस्था की जगह विश्लेषण तथा ऐतिहासिक और सामाजिक परिप्रेक्ष्य पर ध्यान देता है, और अंत में बौद्ध-धर्म की दीक्षा लेते समय डॉ. अंबेडकर द्वारा की गई २२ प्रतिज्ञाओं को इसका आधार बताते हैं। एक तरफ़ वे कबीर की अध्यात्मिकता की आलोचना करते हैं और दूसरी तरफ़ डॉ. अंबेडकर की अध्यात्मिकता का पक्ष लेते हैं। क्या इसे संगत माना जा सकता है? कभी वे धर्म को हानिकारक बताते हैं, तो कभी स्वयं दलित-साहित्य की धार्मिक मान्यताएँ बताने लगते हैं। क्या धार्मिक हुए बिना दलित-साहित्य नहीं लिखा जा सकता? वाल्मीकि जी दलित-साहित्य के हर पहलू को डॉ. अंबेडकर से जोड़ते हैं, इससे उनके सौंदर्यशास्त्र में कई असंगतियाँ और भ्रांत धारणाएँ उत्पन्न हुई हैं। वे दलित-चेतना के १३ बिन्दुओं में वैज्ञानिक-दृष्टि को भी शामिल करते हैं, लेकिन दलित-साहित्य के सौंदर्यशास्त्र के निर्माण में वैज्ञानिक-दृष्टि का प्रयोग करते नहीं दिखते। वे लिखते हैं –

‘दलित-साहित्य ‘आशय’ को महत्त्व देता है। अभिव्यक्ति और शिल्प दूसरे स्थान पर आता है। जीवन-अनुभवों की प्रामाणिकता ‘आशय’ को अर्थ-गंभीर बनाती है। यह अर्थ-गाम्भीर्य डॉ. अंबेडकर-दर्शन के विचार तत्त्व पर आधारित होना चाहिए। इसीलिए दलित साहित्य के सौंदर्यशास्त्र का स्वरूप पारंपरिक सौंदर्यशास्त्र से भिन्न है।‘[8]

यहाँ अभिव्यक्ति को सीमित अर्थों में समझा गया है। ड्यूई के अनुसार कलाकार के संपीड़ित या दबाए गए अनुभवों का किसी माध्यम से प्रकट होना अभिव्यक्ति है। उनके अनुसार कला अभिव्यक्त वस्तु है। यह शिल्प या रूप का मामला नहीं, बल्कि सामाजिक यथार्थ में अस्तित्त्व की दखल को, पीड़ा के अनुभव को पुनर्प्रस्तुत करने का कार्य है, एक ऐसा कार्य जो स्वयं सामाजिक यथार्थ में एक दखल बन जाता है। साथ ही वाल्मीकि जी ने अपनी पुस्तक में ‘अंबेडकर-दर्शन के विचार तत्त्व’ के बारे में जो लिखा है, वह भी सम्यक-दृष्टिपूर्ण नहीं कहा जा सकता, वह डॉ. अंबेडकर के विचारों के विश्लेषण-संश्लेषण से अधिक अंबेडकरवादी (बहुजनवादी) आंदोलन द्वारा निर्मित-प्रसारित भावुक-श्रद्धापूर्ण विवेचना है। वे लिखते हैं – ‘दलित साहित्य का वैचारिक आधार डॉ. अंबेडकर का जीवन-संघर्ष एवं ज्योतिबा फुले और बुद्ध का दर्शन उसकी दार्शनिकता का आधार है।‘[9]

लेकिन पूरी पुस्तक में फुले और बुद्ध के विचारों को डॉ. अंबेडकर के विचारों से अलग नहीं किया गया, साथ ही फुले और बुद्ध के अपने दर्शन को डॉ. अंबेडकर के जीवन-संघर्ष से भी नहीं जोड़ा गया। बुद्ध, सिद्ध, कबीर, रैदास, फुले और अंबेडकर सभी को नई दलित-राजनीति – अंबेडकरवाद – की दृष्टि से देखा गया है। बुद्ध के अनीश्वरवाद और अनात्मवाद को – अनित्यवाद की बुद्धवादी व्याख्या को – अनुभववाद में सीमित नहीं किया जा सकता। डॉ. अंबेडकर के बुद्ध विशिष्ट हैं – सर्वज्ञ-सर्वदर्शी भी और आधुनिक राजनैतिक भी – दलितों की भौतिक और आध्यात्मिक समस्याओं का एकमात्र समाधान। बौद्ध-दर्शन अनित्यवाद को अपनी विचारधारा या दर्शन का मूल-तत्त्व मानता है, अंबेडकरवादी-दर्शन अनुभववाद को। वाल्मीकि जी ने बुद्ध, बौद्ध-धर्म, फुले, डॉ. अंबेडकर और अंबेडकरवादी आंदोलन की एक खास छवि निर्मित की है, जिसके आधार पर उनका अंबेडकरवाद तैयार हुआ है, जो कि उनके सौंदर्यशास्त्र का आधार है। यह छवि भौतिक इतिहास के नकार और वास्तविकता के एक अंश के स्वीकार से निर्मित हुई है। भारत का और प्रकारांतर से वर्ण-जाति-धर्म-व्यवस्था का भौतिक इतिहास और यथार्थ की पूर्णता उनके सौंदर्यशास्त्र में उपेक्षित रह गई है। डॉ. अंबेडकर के विचारों को भी पूर्णता में देखने से बचा गया है। वाल्मीकि जी द्वारा दलित-साहित्य में अंबेडकरवादी होने पर ही अधिक ज़ोर दिया गया है। इससे दलित-साहित्य के विस्तार की समीक्षा तो बाधित हुई ही है, साथ ही डॉ. अंबेडकर के विचारों तथा छायावाद और प्रगतिवाद (प्रकारांतर से दक्षिणपंथ और वामपंथ) की सम्यक-आलोचना भी नहीं हो पाई है। अंबेडकरवाद को भी जिस तरह प्रस्तुत किया गया है, वह दलित-साहित्य-समीक्षा के लिए उपयुक्त नहीं, उसमें मुक्ति कम बंधन अधिक है। निश्चित ही, अंबेडकरवाद को समझे बिना दलित-साहित्य की समीक्षा नहीं की जा सकती, तब भी यह याद रखना चाहिए कि अंबेडकरवाद के कई प्रकार हैं, वाल्मीकि जी ने अपने सौंदर्यशास्त्र में मुख्यधारा के अंबेडकरवाद को प्रस्तुत किया है, जो सोचने से अधिक मानने पर ज़ोर देता है, जो सम्पूर्ण दलित-साहित्य को स्वीकार करने में भी समर्थ नहीं, फिर सम्पूर्ण-निम्न-वर्ग तो उनके विवेचन से बाहर ही रह जाता है।

संत-प्रेरणा दलित-साहित्य में महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। वाल्मीकि जी के लिए भी बुद्ध, कबीर आदि नायक हैं, लेकिन डॉ. अंबेडकर के अधिनायकत्त्व में ही। उनके सौंदर्यशास्त्र में डॉ. अंबेडकर को उपास्य बनाने की प्रेरणा सर्वत्र व्याप्त है। डॉ. अंबेडकर के विचारों की सर्वोच्चता सिद्ध करने में ही पुस्तक का अधिक भाग चला गया है। बुद्ध आदि के विचारों के स्वतंत्र अस्तित्त्व की उपेक्षा वाल्मीकि जी के सौंदर्यशास्त्र में प्रकट है। इसी कारण दलित-साहित्य की विरासत को उनका सौंदर्यशास्त्र उचित महत्त्व नहीं देता, जैसे इससे दलित-साहित्य की शुद्धता (अंबेडकरवाद) नष्ट हो जाएगी। वे दलित-साहित्य के विस्तार को भी उचित महत्त्व नहीं देते, जैसे इससे अंबेडकरवाद दूषित हो जाएगा। लेकिन दलित-साहित्य की विरासत और विस्तार को समुचित महत्त्व दिए बिना उसका प्रासंगिक सौंदर्यशास्त्र नहीं निर्मित किया जा सकता। वाल्मीकि जी के डॉ. अंबेडकर अपने में बंद हैं – वे आत्मालाप करते दिखते हैं, संलाप नहीं। ना वे बुद्ध से संवाद कर पाते हैं, ना फुले से और ना ही मार्क्स से।

डॉ. अंबेडकर ने मार्क्स के विचारों के अध्ययन-मनन के अभाव में उनके बारे में कई असंगत स्थापनाएँ प्रस्तुत की हैं। वाल्मीकि जी ने इस संबंध में अलग दृष्टि अपनाई है। वे बुद्ध, मार्क्स और अंबेडकर तीनों को शोषण के विरुद्ध मुक्ति का मार्ग तैयार करने वाला कहते हैं। उनके अनुसार भारत के साम्यवादी नेतृत्त्व और मार्क्सवादी विचारकों ने वर्ग और वर्ण को एक ही मान लिया, इसमें उनके ‘संस्कारों’ या उत्पीड़क-अनुभवों का प्रमुख योगदान रहा, जिससे दलित-मुक्ति के संबंध में उनकी दोहरी मानसिकता का निर्माण हुआ। यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि वर्ग और वर्ण में भेद होते हुए भी दोनों अंतर्ग्रथित हैं और वाल्मीकि जी दोनों को पूर्णतः अलग मानते दिखते हैं। वे वर्ण-आधारित विश्लेषण को ही सही मानते लगते हैं, और जो कोई वर्ग की बात करता है, उसे वे वर्ण को समझने में असमर्थ बताने लगते हैं। उनका कहना गलत नहीं कि साम्यवादी नेतृत्त्व और मार्क्सवादी विचारकों का उच्च-वर्ग दलित-उत्पीड़न की तीव्रता को समझ नहीं पाया। ऐसे मार्क्सवादियों को वे मार्क्सवाद का मुखौटा लगाए ब्राह्मणवादी कहते हैं। निश्चित ही, ऐसे नेताओं और बौद्धिकों ने मार्क्स के विचारों को भोंथरा ही अधिक किया। मार्क्स के विचारों से प्रेरित लेकिन गंभीर स्व-परिवर्तन में असमर्थ व्यक्तियों के कारण यह विडंबनात्मक स्थिति पैदा हुई। मार्क्सवादियों में कथनी-करनी का अंतर पैदा होने लगा। इससे उत्पन्न अंतर्विरोधों ने साम्यवादी आंदोलन में विखंडन की प्रक्रिया प्रारम्भ की, जो अब तक चल रही है। पर विखंडन की इस प्रक्रिया में भारत के साम्यवादी नेतृत्त्व और मार्क्सवादी विचारकों में ऐसे व्यक्तित्त्व आसानी से खोजे जा सकते हैं, जिन्होंने निम्न-वर्ग और उत्पीड़ित वर्ग के लिए सैद्धान्तिक हथियारों का ही निर्माण नहीं किया बल्कि हथियारों से सिद्धान्त भी रचे। मार्क्सवाद अकादमियों और विश्व-विद्यालयों में पलने वाला वाद नहीं है, वह सम्पूर्ण विश्व के निम्न-वर्ग की मुक्ति की इच्छा की तीव्रता और विद्रोह का सिद्धान्त है। वाल्मीकि जी मार्क्स के विचारों पर चर्चा नहीं करते, लेकिन उन्हें भी अपने देवताओं में जगह दे देते हैं। मार्क्स के विचारों को जाने-समझे बिना ही उनका त्याग या स्वीकार दोनों ही का कोई अर्थ नहीं। वे भी प्रकारांतर से वही काम करते दिखते हैं, जो डॉ. अंबेडकर ने किया था, हालाँकि उनका प्रश्न जायज़ है – ‘शोषणविहीन समाज की परिकल्पना को साकार करने के लिए मार्क्सवादी विचारक ‘वर्ग’ के साथ ‘वर्ण’ को अपनी लड़ाई का लक्ष्य बनाने में ढुलमुल क्यों हैं?’[10]

लेकिन इस प्रश्न को उलटकर भी पूछा जा सकता है कि शोषणविहीन समाज की परिकल्पना को साकार करने के लिए अंबेडकरवादी विचारक ‘वर्ण’ के साथ ‘वर्ग’ को अपनी लड़ाई का लक्ष्य बनाने में ढुलमुल क्यों हैं? या वे वर्ग-विहीन समाज के लिए छिड़ी हुई लड़ाई में सचेत-सक्रिय सहयोग कर रहे हैं? कहीं वे भी दोहरी मानसिकता का शिकार तो नहीं!

सामाजिक-यथार्थ और समूहगत अनुभव का संतुलन दलित-साहित्य के समीक्षाशास्त्र का प्रमुख प्रतिमान है, पर वाल्मीकि जी ने इस पर ठीक से ध्यान नहीं दिया। उनका अनुभव पर इतना ज़ोर है कि सामाजिक-यथार्थ फिसलता जाता है। समूहगत या जाति/समुदायगत अनुभव सामाजिक-यथार्थ का एक खंड है, निश्चित ही, पूर्ण यथार्थ उसके बिना संभव नहीं, लेकिन वह पूर्ण यथार्थ भी नहीं। हमे कहना होगा कि सामाजिक यथार्थ पूरे समाज का यथार्थ है और दलित-साहित्य में वर्णित यथार्थ प्रायः समूह-विशेष का यथार्थ है। दलित-साहित्य में प्रायः समाज के अनुभव नहीं, व्यक्ति के अनुभव प्रस्तुत किए गए हैं। पूर्ण नहीं आंशिक सत्य पर ज़ोर दिया गया है। आश्चर्य नहीं, नव-उदारवादी नीतियों, उपभोक्तावादी-सभ्यता, फासीवादी राजनीति और प्रकृति के विनाश के प्रति अंबेडकरवादी आंदोलन की तरह ही दलित-साहित्य प्रायः उदासीन है। जबकि नई स्थितियाँ अंबेडकरवाद को चुनौती देती खड़ी हैं, इन चुनौतियों के प्रति भय या उपेक्षा का भाव रखना दलित-साहित्य और समीक्षा के लिए भी घातक सिद्ध होगा।

जो समीक्षक डॉ. अंबेडकर के संघर्ष और समीक्षा से प्रेरणा लेते हैं, उन्हें नया भगवान बनाकर दलितों की मुक्ति का स्वप्न देख रहे हैं, तो वे उसी जाल में फँस रहे हैं, जिसमें बुद्ध, सरह, कबीर आदि के अनुसरणकर्ता फँसे थे। भारत का इतिहास साक्षी है कि नया ईश्वर, नया धर्म, नया पुराण, नए भजन रचकर जाति-भेद को समाप्त नहीं किया जा सकता। अनुसूचित-जाति में विश्लेषण-संश्लेषण और योजना-निर्माण की क्षमता का विकास किए बिना अनुसूचित-जाति की मुक्ति संभव नहीं और साथ ही भारत की समाज-व्यवस्था में बदलाव संभव नहीं। दलितों के वैज्ञानिक जागरण के बिना दलित-साहित्य का सौंदर्यशास्त्र भी अधूरा ही रहेगा।

लोकायत से लेकर अंबेडकरवाद तक निम्न-वर्ग और उत्पीड़ित-वर्ग की मुक्ति के कई भारतीय-मार्ग रहे हैं, पर सभी ईश्वरवाद, धर्मवाद, पुराणवाद द्वारा ढँक दिए गए। अगर आज भी उत्पीड़ित-वर्ग इन चोंचलों को नहीं समझ पा रहा है, तो इसमें मुख्य रूप से उनके नाम पर राजनीति करने वाले संगठनों और नेतृत्त्व का दोष है। क्रांतिकारी शिक्षा के अभाव में निम्न-वर्ग और उत्पीड़ित-वर्ग के व्यक्ति सामाजिक-यथार्थ की आंशिक व्याख्या में ही सफल हो पाते हैं। यह व्याख्या प्रायः निज-अनुभव और मुख्य-धारा के प्रभाव में विकसित होती है। सामाजिक-यथार्थ की पूर्णता उनके समक्ष प्रकट नहीं हो पाती, और मुक्ति की उनकी खोज प्रायः नए ईश्वर के निर्माण में समाप्त होती है। नेता देवता की तरह हो जाते हैं, भक्त उनका यशोगान करते हैं – निम्न और उत्पीड़ित वर्ग आधुनिक स्थितियों की चमत्कारी दुनिया बना लेता है – मुक्ति का आधुनिक धार्मिक मार्ग, लेकिन न उत्पीड़न रुकता है न अपमान। विचार भोंथरे निकलते हैं, नेता बुज़दिल। उत्पीड़ित-वर्ग का न भौतिक विकास हो पाता है न आत्मिक। आने वाली पीढ़ी देखती है – नया ईश्वर, नए देवता, नया धर्म – लेकिन आत्मविश्वास और साहस का अभाव, समुचित शिक्षा और आनंद का अभाव। विडम्बना और निराशा का एकछत्र राज। कवि रोष प्रकट करता है –

मगर / अब तक तो / यही दिखाई दिया है / कि हमारे संगठनों के / लगभग सारे रहनुमा / वैचारिकता से / नपुंसक हैं / साहस से खाली हैं / इच्छा शक्ति से / बंजर और बाँझ हैं / और / अपने ही / कीचड़ में लथपथ रहकर / अचंभों में / मरने वाले / आत्मघाती जानवर हैं।[11]

मार्क्सवादी हों या अंबेडकरवादी, इस बात को समझा जाना चाहिए कि जिस तरह कर्मरहित चिंतन व्यर्थ है, उसी तरह चिंतनरहित कर्म भी व्यर्थ है। मीडिया और प्रबंधन उत्पीड़ितों को सोचने-समझने से रोकने का ही काम करते आए हैं। शोषक और शोषितों के, उत्पीड़क और उत्पीड़ितों के सदियों के संघर्ष से यह अनिवार्य सीख मिलती है कि शोषितों-उत्पीड़ितों के स्वयंबुद्ध हुए बिना किसी भी सामाजिक-व्यवस्था में कोई भी वास्तविक बदलाव असंभव है। संपूर्ण-निम्न-वर्ग की मुक्ति के बिना किसी क्षेत्र या सामाजिक-वर्ग की मुक्ति भी संभव नहीं। भावुक-श्रद्धा नहीं, क्रांतिकारी शिक्षा ही यह काम कर सकती है।

आत्मकथा दलित-साहित्य की विशेष विधा है। ओमप्रकाश वाल्मीकि ने स्वयं भी आत्मकथा लिखी है और अपने सौंदर्यशास्त्र में भी दलित-साहित्य में आत्मकथा के विशेष महत्त्व को स्वीकार किया है। दलित-आत्मकथा दलित-अनुभव का प्रामाणिक दस्तावेज़ सामाजिक यथार्थ की सापेक्षिकता में ही है, उससे अलग वह अस्तित्त्व में भी नहीं आ सकती थी, और उसकी समीक्षा भी सामाजिक यथार्थ के पक्ष के संतुलन में ही हो सकती है। सामाजिक यथार्थ अनुभव को जन्म देता है, न कि इसका उलट। ओमप्रकाश वाल्मीकि सामाजिक यथार्थ की उपेक्षा पर एक पक्षीय (अंबेडकरवादी) अनुभव के साहित्य के रूप में दलित-साहित्य को स्थापित करते हैं, लेकिन उनकी आत्मकथा, कविताएं और कहानियाँ इस स्थापना का विरोध आप हैं।

समाज और व्यक्ति की पारस्परिकता में अनुभव निर्मित होते हैं, वाल्मीकि जी का सौंदर्यशास्त्र इस मूलभूत बात की उपेक्षा कर अनुभव के स्वामित्व को ही महत्त्वपूर्ण मानता है। फिर अनुभव के स्वामित्व की विविधता भी वे स्वीकार नहीं कर पाते, अंबेडकरवादी अनुभव ही उनके लिए दलित-अनुभव है। निश्चित ही, दलित-अनुभव सामाजिक यथार्थ में एक दलित-व्यक्ति के हस्तक्षेप को प्रस्तुत करता है और दलित-साहित्य दलित-अनुभव के सत्य का प्रकाशन करता है, लेकिन वाल्मीकि जी के अनुभव क्या कौशल्या बैसंत्री के अनुभवों से सादृश्यता दिखलाते हुए भी अलग नहीं हैं? वाल्मीकि जी दलित-आत्मकथाओं के अंतर्संबंधों की भी उपेक्षा करते हैं। आज दलित-साहित्य के विस्तार के साथ हिन्दी में दलित-आत्मकथाओं में भी शुभवृद्धि हुई है, तब भी अभी वह बहुत कम है। आत्मकथा आमतौर पर बुढ़ापे में लिखी जाती है और दलित-साहित्य अभी मुख्यतः युवाओं के हाथ में है। अभी हज़ारों दलित-आत्मकथाओं की भूमिका बन रही है। इन भविष्य की आत्मकथाओं की संगति में इन प्रारम्भिक आत्मकथाओं को और बेहतर समझा जा सकेगा। दलित-आत्मकथाओं और स्व-कथनों ने भारत के निम्न-वर्ग के दलित-अनुभवों को दर्ज कर अभूतपूर्व कार्य किया है। स्व-कथा नहीं, तो स्व-कथन के माध्यम से ही, लेकिन अन्य उत्पीड़ित वर्गों को भी इस कार्य में सहयोग के लिए आगे आना चाहिए। भारत के अन्य उत्पीड़ित-वर्गों के लिए दलित-साहित्य प्रेरणा और बहस का स्रोत है।

कुछ समीक्षक डॉ. अंबेडकर को पूंजीवाद और ब्राह्मणवाद के विरोधी के रूप में प्रस्तुत करने पर ज़ोर देते हैं, जबकि डॉ. अंबेडकर की चिंता और चिंतन का मुख्य विषय पूंजीवाद-विरोध नहीं रहा। अंबेडकरवादी आंदोलन भी पूंजीवाद का सचेत-सक्रिय विरोधी नहीं है। अगर हम डॉ. अंबेडकर के जीवन और विचारों का भावुक-श्रद्धापूर्ण अनुशीलन भर न करें और अंबेडकरवादी आंदोलनों के ज़मीनी कार्यों को देखें, तो हमें ज्ञात होगा कि भारत में ब्राह्मणवाद-विरोधी चेतना के निर्माण में जितना सहयोग डॉ. अंबेडकर और अंबेडकरवाद का है, उतना किसी वामपंथी-संगठन का नहीं, साथ ही यह भी कि पूंजीवाद-विरोधी चेतना के निर्माण में डॉ. अंबेडकर के विचारों और अंबेडकरवादी-संगठनों का सहयोग न के बराबर है। पूंजीवाद और ब्राह्मणवाद  के संयोजित रूप का विरोध अंबेडकरवादी और मार्क्सवादी आंदोलन की नई दिशा है। ऐसे प्रयास अभी अपने प्रारम्भिक दौर में हैं।

भारत का पूंजीवाद विशिष्ट है, वह विभिन्न जातियों-जनजातियों-समुदायों से निर्मित, एक बहुराष्ट्रीय सामाजिक-संरचना में कार्यरत है। भारत में पूंजीवाद उपनिवेशी-शक्तियों, स्थानीय भू-स्वामियों और व्यापारियों के संयोग से निर्मित हुआ है। उच्च-वर्ग की सहभागिता के बिना उपनिवेश का निर्माण असंभव था। यहाँ यह नहीं भूलना चाहिए कि वर्तमान भारत का एक बड़ा भाग कभी सीधे उपनिवेश के अंतर्गत नहीं रहा। भारत का समाज उत्तर-उपनिवेशी-काल में भी पारंपरिक उच्च-वर्ग के नियंत्रण में ही विकसित होता रहा है। पारंपरिक बौद्धिक ही उत्तर-उपनिवेशी भारत में शासक-वर्ग के रूप में उभरे। यह वर्ग ही पूंजीवाद का लाभ लेने में सक्षम था और है, वह अपने रहते उत्पीड़ित-वर्गों को स्वतन्त्रता या लोकतन्त्र का लाभ नहीं लेने देगा, इसी कारण उत्पीड़ित-वर्गों की मुक्ति पूंजीवाद के नाश से सीधे सम्बद्ध  है। भारत के पारंपरिक उच्च-वर्ग के आचार-विचार ही मुख्य-धारा के आचार-विचार हैं। वर्तमान भारत की समाज-व्यवस्था भी इन्हीं पारंपरिक उत्पीड़क-वर्ग के पूँजीपतियों के अधीन है। भारत में पूंजीवाद, फूले से लेकर अंबेडकर के समय तक, वह भी सीमित अर्थों में, दलितों के लिए उपहार था। लेकिन पूंजीवाद के अपने हित थे, जो दलितों के हित के विपरीत थे और हैं, इसी कारण भारत में विकसित पूंजीवादी-साम्राज्यवादी-संसदीय-प्रणाली अनुसूचित-जाति के लिए सुविधा नहीं दुविधा बनती गई। संविधान भारत के निम्न-वर्ग और उच्च-वर्ग के बीच एक ऐसे समझौते के रूप में उभरा, जिसे बोटी देकर बकरा लेना कहा जा सकता है। डॉ. अंबेडकर ने इस स्थिति के संबंध में अपने विचारों को १९५५ में बी.बी.सी. को दिए एक साक्षात्कार में रखा है। वे कहते हैं कि हमारे देश में एक ऐसी सामाजिक संरचना है, जो संसदीय प्रणाली के साथ पूरी तरह असंगत है।[12] उनके अनुसार भारत की आज़ादी के बाद विकसित हो रहा लोकतन्त्र ‘अछूतों’ की मुक्ति में विशेष सहयोगी नहीं हो पाएगा। वे संसदीय-चुनावों में जीत-हार, भाषण और लोकतन्त्र के भरोसे बैठे रहने की बजाय, दलित-मुक्ति के लिए ठोस कार्यक्रम/योजना और संस्थाओं/संगठनों के निर्माण की वकालत करते हैं।

भारत भर के शोषण-उत्पीड़न-विरोधी आंदोलनों का संयोजन और निम्न-वर्ग की एकजुटता इतनी आसान नहीं। भारत के निम्न-वर्ग के खाते में निरंतर विजय दर्ज करते जाने वाली विचारधारा, आंदोलन और नेतृत्त्व अभी तक विकसित नहीं हो सका है। मिज़ोरम और राजस्थान की, कश्मीर और केरल की सामाजिक-व्यवस्था और निम्न-वर्ग की चेतना और संगठन का स्तर एक-से नहीं है, यद्यपि पूरे भारत में शोषण-उत्पीड़न का कारोबार जारी है, पूंजीवाद हावी है। निम्न-वर्ग के पास विचारधारा के नाम पर देसी कट्टे हैं, और शत्रु एके-47 लिए खड़ा है।

हिन्दी-दलित-साहित्य और अंबेडकरवाद नाभिनालबद्ध हैं, लेकिन अंबेडकरवादी आंदोलन की सीमा को दलित-साहित्य की सीमा नहीं माना जा सकता। डॉ. अंबेडकर के विचारों को सभी दलित-साहित्यिकों पर भी नहीं थोपा जा सकता। आज डॉ. अंबेडकर के विचारों और अंबेडकरवादी आंदोलनों को पूर्णता में परखने की ज़रूरत है, साथ ही बुद्ध या कबीर या फुले या पेरियार या अयंकाली के कार्यों-विचारों को डॉ. अंबेडकर के मातहत करने से बचने की भी। दलित-साहित्य का सौंदर्यशास्त्र भौतिक इतिहास के नकार और सामाजिक यथार्थ की उपेक्षा पर नहीं तैयार हो सकता।

बुद्धवाद हो, मार्क्सवाद हो या अंबेडकरवाद, जो निम्न-वर्ग और उत्पीड़ित-वर्ग को बौद्धिक और आत्मिक रूप से नेताओं और विचारकों पर आश्रित रखना चाहता है, वह उनका हितैषी नहीं हो सकता। दलित-आत्मकथाएँ भारत में क्रांतिकारी शिक्षा की आधार पाठ्य-वस्तु है। दलित-साहित्य – विशेषकर आत्मकथा – और समीक्षा ने मेरे सामने जिस दुनिया को खोल दिया है, वह भूख, पीड़ा, रोष, आशा और बहस की दुनिया है। यह दुनिया चीख-चीख कर कह रही है – हमें न नए पवित्र (ब्राह्मण) चाहिए, न नए ‘अछूत’ (दलित), हमें न नए पूंजीपति चाहिए, न नए मज़दूर, हमें ख़ुशी और सम्मान का जीवन चाहिए, हम शोषण, उत्पीड़न और अपमान की समाज-व्यवस्था का विनाश करके ही दम लेंगे – ‘हमारी दासता का सफर / तुम्हारे जन्म से शुरू होता है / और इसका अंत भी / तुम्हारे अंत के साथ होगा।‘[13]

usman khanउस्मान ख़ान समकालीन हिंदी साहित्य के अलहदा युवा कवि-कथाकार-आलोचक हैंचर्चाओं और पुरस्कारों की भीड़ से अलहदा… छपाऊ मानसिकता से भी अलहदा... जे.एन.यूके हिंदी विभाग से मालवा के लोकसाहित्य पर पीएचडीइनसे usmanjnu@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

 

सन्दर्भ: 

[1]  संदर्भ-सूची में आवश्यक संदर्भ ही दिए गए हैं, जबकि विचार कई संदर्भों से लिए गए हैं।

[2]  पूरी ग़ज़ल इस लिंक पर पढ़ें – https://www.rekhta.org/ghazals/fariyaad-kii-koii-lai-nahiin-hai-mirza-ghalib-ghazals?lang=hi

[3]  अधिक जानकारी के लिए देखें – रंगनायकम्मा, ‘जाति’ प्रश्न के समाधान के लिए बुद्ध काफ़ी नहीं, अंबेडकर भी काफ़ी नहीं, मार्क्स ज़रूरी है, राहुल फाउंडेशन, २००८

[4]  जॉन ड्यूई, आर्ट एज़ एक्सपेरियंस, द बर्कले पब्लिशिंग ग्रुप, पेंग्विन ग्रुप, २००५

[5]  ओमप्रकाश वाल्मीकि, दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र, राधाकृष्ण प्रकाशन, २०१४, पृ.-५०

[6]   पूरी कविता इस लिंक पर पढ़ें – https://aavazdo.wordpress.com/2017/10/01/ये-दलितो-की-बस्ती-है/

[7]  डॉ. भीमराव अंबेडकर, अछूत कौन और कैसे, अनुवादक – भदंत आनंद कौसल्यायन, गौतम बूक डिपो, प्रथम प्रकाशन, १९४९, पृ.-८८। ‘सौंदर्यशास्त्र’ में पुस्तक का नाम ‘शूद्र कौन और कैसे?’ छपा है।

[8]   ओमप्रकाश वाल्मीकि, उपरोक्त, पृ.-५०

[9]   ओमप्रकाश वाल्मीकि, उपरोक्त, पृ.-५३

[10]  ओमप्रकाश वाल्मीकि, उपरोक्त, पृ.-९७

[11]  बजरंग बिहारी तिवारी, दलित साहित्य : एक अंतर्यात्रा, नवारुण प्रकाशन, २०१५, पृ.-५८ से उद्धृत। निश्चित ही, ‘नपुंसक’ और ‘बांझ’ जैसे शब्द खलते हैं, लेकिन आशय स्पष्ट है।

[12]   पूरा साक्षात्कार इस लिंक पर देख-सुन सकते हैं – https://www.youtube.com/watch?v=4RcGJtl2nhE

[13]  बजरंग बिहारी तिवारी, उपरोक्त, पृ.-७३ से उद्धृत

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धर्म-दर्शनवादी और उदारवादी राजनीतिक चेतना के कवि केदारनाथ सिंह: उस्मान खान

हिन्दी-साहित्य के इतिहास में केदारनाथ सिंह की स्थिति पर सोचता रहा हूँ। हिन्दी-साहित्य-जगत में उन्होने अपनी अलग पहचान बनाई। वे मुझे विचार-मुक्त कवि लगते रहे हैं। उनके साहित्य की अंतर्धारा – बिम्ब, कल्पना, कथा, स्मृति, परंपरा आदि- किस दिशा में बह रही है, इस पर दोबारा मनन किया तो एक विचारधारा निकल आई, कोई भी साहित्यिक अकेला नहीं होता। केदारनाथ सिंह की भी परंपरा है, घराना है। शायद लोग मेरे इस प्रयास को दूर की कौड़ी मारने का प्रयास समझें, पर कौड़ी खेलने वाले जानते हैं कि कभी-कभी दूर की कौड़ी भी लग जाती है। केदारनाथ सिंह की पहली पुस्तक जो मैंने पढ़ी, वह थी – ‘हिन्दी-कविता में बिम्ब-विधान’। फिर केदारनाथ सिंह की प्रतिनिधि कविताएं पढ़ीं, और उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के बारे में सुनता-पढ़ता रहा। अब उनकी मृत्युपरांत पत्र-पत्रिकाओं, ब्लॉग, इंटरनेट पर टिप्पणियाँ और विचार पढ़ रहा हूँ। पर उन पर कभी लिखूंगा ऐसा सोचा नहीं था। संपादक-मित्र उदय शंकर ने सुझाया या बरगलाया; मैं सोचने लगा… #लेखक

kedarnath singh

साभार : साहित्य  अकादमी  आर्काइव्ज  वाया  यूट्यूब

केदारनाथ सिंह की मृत्यु पर….

By उस्मान खान

हिन्दी-साहित्य-जगत में केदारनाथ सिंह किसी परिचय के मोहताज नहीं। उन्हें १९८९ में साहित्य अकादमी सम्मान और २०१३ में भारतीय ज्ञानपीठ सम्मान मिला। केदारनाथ सिंह का मान है, सम्मान है, घराना है, परंपरा है, पर ऐसे व्यक्ति की मृत्यु पर भी छींटाकशी करने वाले कहाँ चूकते हैं। इंटरनेट के इस दौर में भावभीनी विदाई देने वाले बहुत दिखे – पता चला वे कईयों के प्रिय कवि थे। पाठक-समीक्षक अक्सर ही अपने प्रिय कवियों की सूची बनाते चलते हैं।

भावुक समर्थकों ने उनकी महानता और काव्य-वैभव पर वैसे ही लिखना शुरू कर दिया, जैसा कुँवर नारायण की मृत्यु पर लोगों ने लिखा था या जैसा मुक्तिबोध की जन्म-शताब्दी पर लोग लिख रहे हैं। पाठक-समीक्षक में कुछ लिखने-कहने का भावनात्मक-उन्माद पैदा होना अचरज नहीं, अपने प्रिय कवि की मृत्यु या जन्म-मृत्यु-शताब्दी वगैरह ऐसे अवसरों को बढ़ा देती हैं। पर वहीं केदारनाथ सिंह पर छींटाकशी भी होने लगी। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व का विश्लेषण तेज़ हुआ, तर्क-वितर्क चलने लगा। युवा कवि-समीक्षक अविनाश मिश्र का लिखा पढ़ा, फिर कवि-समीक्षक कृष्ण कल्पित का लिखा पढ़ा। दोनों ने ही अपने मन की गुत्थी ही सामने रखी है। केदारनाथ सिंह के व्यक्तित्व के बारे में अलग जानकारी इस लिखे में मिल सकती है, लेकिन उनके कृतित्व की उपेक्षा की गई है।

कृष्ण कल्पित ने बनारस कविता को केंद्र में रखकर अपनी बात कही है, उन्हें कविता शायद इसलिए पसंद नहीं कि वे बनारस पर और भी अच्छी रचनाएँ पढ़ चुके हैं, उन्होंने बनारस पर अपना पसंदीदा साहित्य भी बताया है। उनके लिखे का मूल यह है कि केदारनाथ सिंह की कविता में वर्णित बनारस गीता प्रेस के कैलेंडर की तरह है। बात ताने की तरह लगती है, लेकिन फ़िलहाल इसे ही उनकी कविताओं में घुसने का प्रारम्भ-बिन्दु बनाते हैं।

साहित्य में बिम्ब एक भाव-विचार या चरित्र या दृश्य होता है, साथ ही यह भाव-विचार या चरित्र या दृश्य गतिशील होता है। प्रत्येक बिम्ब भाव-विचार-श्रंखला या दृश्यावली होता है। बिम्ब से अर्थ उस कला-उत्पाद से है, जो विशेष दृश्य-बोध को प्रस्तुत करता है। केदारनाथ सिंह की कविताओं में ‘बिम्ब की अवधारणा’ का केंद्रीय महत्त्व है, बिम्ब-विधान पर उन्होंने लिखा भी है, लेकिन उनकी अधिकांश कविताओं में कोई बिम्ब-विधान दिखाई ही नहीं देता, शायद एक समय के बाद वे भाषा-शैली और कथाओं पर अधिक ध्यान देने लगे थे, बिम्ब-विधान के निर्माण का प्रयास वे करते रहे, उन्होने लंबी कविताएं भी साधीं, लेकिन तब भी बहुत कम कविताओं में वे कोई नया बिम्ब-विधान प्रस्तुत कर पाए हैं। कविता में कथा कह देना एक बात है और बिंबों के माध्यम से कथा कहना दूसरी बात। केदारनाथ सिंह ने ‘मंच और मचान’ में एक कथा प्रस्तुत की है, यह कथा स्वयं में एक बिम्ब हो सकती है, लेकिन यह बिंबों से रची कविता नहीं है। उनकी कविताओं में बिम्ब अलबत्ता हैं, पर छिन्न-भिन्न या ढीले-ढाले ढंग से जुड़े हुए। उन्हें अगर मजबूती से जोड़ा जाए, तो एक धारा प्रवाहित होती दिखती है। अगर आप उन्हें जोड़ने में असमर्थ रहे तो आप उनकी धर्म-दर्शनवादी उदारवादी राजनीतिक चेतना को नहीं जान पाएँगे न ही यह देख पाएँगे कि वे बिम्ब-निर्माण में कुशल नहीं थे।

अपनी विशेष भाषा-शैली के निर्माण में भी वे असमर्थ रहे। आधुनिक बिम्ब-विधान भाव-विचार के तनाव पर स्थिर रहता है। एक दृश्य, जिसमें विचार और प्रति-विचार का खिंचाव स्थिर हो जाता है। केदारनाथ सिंह के बिंबों में चित्रित भाव-विचार लचर हैं, लाचार हैं – व्यवस्था और शक्ति वहाँ नहीं। आधुनिक अंग्रेजी कविता को एजरा पाउंड और टी. एस. इलियट ने जैसे शक्तिशाली बिम्ब दिए या जिस तरह मुक्तिबोध, शमशेर और राजकमल चौधरी ने हिन्दी-कविता को पूंजीवादी भारत की शहरी सभ्यता के ठोस बिंबों से समृद्ध किया, वहीँ केदारनाथ सिंह जीवन भर बिम्ब-साधना करते हुए भी नए बनते भारत को कविता में प्रस्तुत करने में असमर्थ रहे। उनकी कविता प्राक-पूंजीवादी युग में ही शरण ढूंढती रही, मामला तुलसीदास का हो या कबीरदास का। वे आधुनिक युग की जीवन-स्थितियों से कतराते रहे। साहित्य में बिम्ब-निर्माण नया नहीं है, साहित्य भाव-विचार या चरित्र या दृश्य निरूपण का कार्य ही तो करता आ रहा है। सवाल है इन बिंबों की गति का, संकरी ही सही, पर इनकी धारा का, इन बिंबों में व्याप्त विविधरंगी फूलों की माला तैयार करने का।

बनारस कविता भी अस्त-व्यस्त बिंब ही प्रस्तुत करती है। मैंने गीता प्रेस का कैलेंडर नहीं देखा, उसमें भी बनारस होगा, पर केदारनाथ सिंह की कविता का बनारस, बनारस के टूटे-फूटे दृश्य दिखाता है। किसी दृश्य में कोई आंतरिक संघर्ष नहीं, हर दृश्य जैसे जड़ है, लेकिन प्रत्येक दृश्य अगले दृश्य से जुड़ जाता है, इन दृश्यों या दृश्यावली का कोई आंतरिक संघर्ष नहीं दिखता, संबंध ज़रूर दिखता है। बनारस कविता इस लिहाज से अच्छी है कि इन टूटे-फूटे दृश्यों को तार्किकता से जोड़ने पर एक विचार-श्रंखला, एक दृश्यावली प्रस्तुत होती है, जो केदारनाथ सिंह के समूचे साहित्य को अपने में समेट लेती है। वह बात जो अनकही रह गई। इस कविता में केदारनाथ सिंह के साहित्य की अंतर्धारा, उनकी साहित्य-परंपरा आसानी से दिखाई देती है। इस कविता का बनारस पूंजीवादी शहरीकरण की चपेट से बाहर खड़ा है, वह यथार्थ है, लेकिन ऐसा यथार्थ जिसे ‘तुलसीदास’, ‘धीरे-धीरे’, ‘आधा’, ‘स्तम्भ’, ‘अर्घ्य’ के बिंबों, स्मृतियों से रचा गया है। प्रेमचंद भी बनारस से अनजान नहीं थे, लेकिन उनके उपन्यासों में शहर का नक़्शा कुछ और है। रंगभूमि में वे लिखते हैं–

शहर अमीरों के रहने और क्रय-विक्रय का स्थान है। उसके बाहर की भूमि उनके मनोरंजन और विनोद की जगह है। उसके मध्य भाग में उनके लड़कों की पाठशालाएँ और उनके मुक़दमेबाज़ी के अखाड़े होते हैं, जहाँ न्याय के बहाने गरीबों का गला घोंटा जाता है। शहर के आस-पास गरीबों की बस्तियाँ होती हैं।[i]

हो सकता है प्रेमचंद एक आदर्श पूंजीवादी नगर की बात कर रहे हों, लेकिन बनारस भी शहर है, जो आधुनिक-काल में निरंतर विस्तार पाता गया है, प्रेस और विश्वविद्यालय हों या नए कटते प्लॉट और कॉलोनियाँ; और उसका एक हिस्सा पुराना होने के नाते कई स्मृतियाँ अपने में सँजोए है। हिन्दी-क्षेत्र का एक प्रमुख साहित्यिक केंद्र बनारस रहा है। मामला स्मृतियों का नहीं, स्मृतियों को छांटने का है, चुनने का है। स्मृतियों के आपसी संघर्ष का है। केदारनाथ सिंह स्मृति के बिम्ब तैयार करते जाते हैं, लेकिन यह स्मृति विशेष है। इसमें उनका चुनाव है। केदारनाथ सिंह के लिए बनारस का धार्मिक महत्त्व अधिक है। बनारस एक नहीं कई सभ्यताओं का केंद्र रहा है, ढोंग और पाखंड की सभ्यता के भव्य-बिम्ब वे तैयार करते हैं, लेकिन बाह्याडंबर और अन्याय के विरोध की सभ्यता का कोई बिम्ब इस कविता में नहीं। तुलसीदास के साहित्य का महत्त्व अपनी जगह, पर क्या बनारस में तुलसीदास से बहुत पहले कबीर नाम का जुलाहा नहीं था और उसी समय का एक रैदास नाम का ‘खालिस चमार’ नहीं था। इन्हें उनकी कविता छूती भी नहीं। क्या इस शहर में विशेष धर्म-दर्शन का संगम ही इन बिंबों का विधान है, अगर है, तो क्या केदारनाथ सिंह रूमानी-यथार्थवादी धारा में नहीं हैं?

रूमानी-यथार्थवाद रूमानवाद और आधुनिकतावाद के साथ यथार्थवाद के वाद-विवाद-संवाद में जन्मा था, और अंततः हिटलर के प्रचार-प्रमुख गोएबेल ने उसका आदर्श रूप प्रस्तुत किया था। उसने रेडियो और सिनेमा को फासीवादी राजनीति के प्रचार का माध्यम बनाया। यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि उसने वर्ष १९२१ में अपनी पीएच.डी. रूमानवादी नाटककार क्रिश्चियन विल्हेल्म फॉन शुत्स पर की थी। तब तक रूमानवाद का साहित्यिक धारा के रूप में अंत हो चुका था और आधुनिकतावाद के नाम पर धर्मशास्त्रों का आधुनिक-साहित्यिक पुनर्पाठ चालू हो चुका था। रूमानवाद और आधुनिकतावाद की धार्मिक-दर्शनवादी धारा का संयोजन फासीवादी रूमानी-यथार्थवाद के रूप में सामने आया था।

रूमानवादी साहित्य-धारा १८००-१८५० तक प्रभावी रही, इसके बाद १८५० से यथार्थवादी साहित्य-धारा का पदार्पण हुआ, इसने रूमानवादी साहित्य-धारा के विरोध में अपने कई सिद्धान्त तैयार किए थे, १९०० से आधुनिकतावादी साहित्य-धारा का प्रवेश होता है। इन तीनों ही धाराओं को यूरोप के पूंजीवादी शहरों के प्रति-साहित्य के रूप में देखा जा सकता है। पूंजीवादी-व्यवस्था का विरोध तीनों धाराओं में है। लेकिन इस व्यवस्था के अंत और नए समाज के निर्माण का संकल्प प्रायः मार्क्सवादी साहित्यिकों में ही देखा जा सकता है। केवल मार्क्सवादी साहित्यिक ही ऐसे कहे जा सकते हैं, जिनहोने इन शहरों में नई आशा और भविष्य-स्वप्न देखा।

रूमानवादी साहित्यिक आधुनिकता-विरोधी थे, उद्योगिकरण और आधुनिक शहर उसके लिए अभिशाप थे, प्रकृति और लोक-जीवन उसके पूज्य थे और कल्पना (बिम्ब, फेंटेसी, आख्यान आदि इसमें सम्मिलित होते चले गए) वरदान। वे नई जीवन-स्थितियों से भागते थे। यथार्थवादी साहित्य रूमानवाद के विरोध में खड़ा था। यथार्थवादी साहित्यिक समाज का ‘वास्तविक’ चित्रण करने पर ज़ोर देते थे। वर्ग-स्थिति और वर्ग-व्यवहार का निरूपण उसका प्रमुख कार्य था। नई जीवन-स्थितियों ने उसके पुराने बंधन खोल दिए थे। एक तरफ़ भाव-विचार-अनुभव की कल्पना थी, तो दूसरी तरफ़ भाव-विचार-अनुभव की मांसलता। रूमानवाद के प्रचारक प्रायः धर्म-दर्शन शास्त्री थे, यथार्थवाद के प्रायः मार्क्सवादी। यथार्थवाद के प्रभावी होने के साथ ही, रुमानवादी धारा का एक तरह से अंत हुआ और आधुनिकतावादी-साहित्य के भी बीज पड़े।

२०वीं सदी के प्रारम्भ में एज़रा पाउंड और टी.एस. इलियट आधुनिकतावादी-साहित्य के प्रमुख प्रचारक के रूप में उभरते हैं। बिम्ब की अवधारणा साहित्य-चर्चा के केंद्र में उपस्थित होती है, साथ ही धर्मशास्त्र और पुराणों का आधुनिक स्थितियों के अनुकूल पाठ करने का प्रयास शुरू होता है, फोकलोर में विशेष दार्शनिक संकल्पनाएँ खोजी जाने लगती हैं। कल्पना और फंतासी, परंपरा और प्रतिभा, प्रकृति और लोक-जीवन पर चर्चा को नई दिशा मिलती है। आधुनिकतावाद का यथार्थवाद से संघर्ष शुरू होता है, इस संघर्ष ने दुनिया भर के साहित्यिकों को दो खेमों में बाँट दिया था– ‘काफ्का या थॉमस मान’। लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि २०वीं सदी में आधुनिकतावाद भी दो प्रबल धाराओं में विभक्त होता चला गया– धर्म-दर्शनवादी और मार्क्सवादी। आधुनिकतावादी धर्म-दर्शनवादी कवि प्राक-पूंजीवादी युग में अपना आदर्श खोजता है, आधुनिकतावादी मार्क्सवादी कवि वैज्ञानिक समाजवाद में। विचार दोनों के यथार्थवादी हैं। जहाँ आधुनिकतावादी-साहित्य अपने यथार्थवादी-मूल से उखड़ जाता है, वह रुमानवादी साहित्य बन जाता है, या कभी प्राक-पूंजीवादी साहित्य में तब्दील हो जाता है। आधुनिकतावादी-साहित्यिक यथार्थ को नकारता नहीं, वरन उसकी विशेष कल्पना करता है। व्यक्ति और समाज का उपचेतन स्तर उसकी फैन्टेसी का मुख्य विषय है। वास्तव में, यथार्थ की कल्पना कैसी हो? इस प्रश्न पर ही आधुनिकतावादी साहित्य में भेद पैदा होता है। धर्म-दर्शनवादी कल्पना और मार्क्सवादी कल्पना पूंजीवादी शहरों के यथार्थ का एक-सा रूप प्रस्तुत नहीं करती।

इस संबंध में लुकाच-ब्रेख्त-चर्चा उल्लेखनीय है। लुकाच आधुनिकतावादियों के धर्मदर्शनवादी उपचेतन पर ज़ोर देते हैं, तो ब्रेख्त उनकी तकनीकों के मार्क्सवादी प्रयोग की संभावना पर। जहाँ यथार्थवादी-साहित्य में बाह्य-स्थितियों या वस्तु-जगत के वर्णन पर अधिक ध्यान होता था, वहीं आधुनिकतावादी-साहित्य ने मन:स्थितियों को साहित्य-उत्पादन के केंद्र में ला खड़ा किया। औद्योगिक शहरों के निर्माण और पूंजीवादी विकास से उभरे भय और संताप ने, धर्म-हानि के प्रचार ने आधुनिकतावादी-साहित्य के निर्माण की भूमिका बनाई। मानव-अस्तित्त्व का नई सभ्यता से सामना ‘ईश्वर की मृत्यु’, ‘सभ्यता का पतन’ जैसे फ़िकरों को पैदा करने लगा। लेकिन कुछ ही समय में इन नई स्थितियों से जन्मी आशा और उत्साह ने भी साहित्य में स्थान पाया। ‘नई सभ्यता’ और ‘नए मनुष्य’ की चर्चा होने लगी। यांत्रिक पुनरुत्पादन की व्यवस्था और उपभोक्तावादी सभ्यता के उदय ने प्राचीन-साहित्य की दुर्लभता को नष्ट किया और इस प्रक्रिया में उसकी पवित्रता को भी। प्राचीन का पतन और नए का उदय साहित्यिकों को सभ्यता-समीक्षा की ओर ले गया, अभिव्यक्ति के नए तरीकों और आधुनिक ‘सौंदर्य-मूल्यों’ की खोज की ओर। यह स्थिति १९वीं सदी के अंतिम दशकों और २०वीं सदी के प्रारम्भिक दशकों के यूरोप की थी। हिन्दी-कविता में आधुनिकतावादी-धर्म-दर्शनवादी-साहित्य-धारा और आधुनिकतावादी-मार्क्सवादी-साहित्य-धारा का संघर्ष ४० के दशक में शुरू होता है। ‘तार-सप्तक’ इसका प्रारम्भ-बिन्दु है।

साहित्य में यथार्थ का वर्णन एक विशेष स्थिति में क्रांतिकारी था, जब यूरोप १९वीं सदी के उत्तरार्द्ध में था। २०वीं सदी के प्रारम्भ में आधुनिक शहरों में बदलते सामाजिक-संबंध साहित्यिक को भी नए भाव-विचारों, बिंबों के संपर्क में ले आए। दुनिया भर में नई इमारतों, मशीनों और लोकतान्त्रिक तथा वैज्ञानिक सोच के विकास ने एक ऐसे समाज को जन्म दिया, जो पहले कभी नहीं था। यह पूंजीवादी सभ्यता के संपर्क में आने पर पूरी पृथ्वी पर हुआ। निश्चित ही २१वीं सदी में भी यह परिवर्तन जारी है, भारत के करीबी नेपाल में राजशाही का अंत २१वीं सदी में जाकर ही हो पाया है, कुर्दिस्तान के लोग अब भी एक नए वि-राज्य की संकल्पना के लिए लड़ रहे हैं। १९वीं और २०वीं सदी में भी इन नए भाव-विचारों और बिंबों ने नई कल्पना और भाषा की खोज की थी। आज भी नए भाव-विचार साहित्यिकों को नई कल्पना और भाषा की खोज में लगाए हुए हैं। सवाल तब भी यथार्थ का था, आज भी यथार्थ का है – साहित्य में यथार्थ के पुनर्प्रस्तुतिकरण का है।

यथार्थ को स्वीकारते हुए भी, अद्भुत, अकल्पनीय और शक्तिशाली रचना आधुनिकतावादियों की विशेष पहचान बनी। इसने साहित्य-रचना की नई समझ तैयार की। आधुनिकतावादी-धर्म-दर्शनवादी-साहित्य मानव-मूल्यों के पतन के दृश्य निरूपित कर, सर्वशक्तिशाली-पुरुष में आस्था की ओर ले जाता है। वह पूंजीवादी-सभ्यता के सामने असहाय खड़े व्यक्ति की सर्व-शक्तिमान-पुरुष के सामने की गई प्रार्थनाएँ हैं। इससे अलग आधुनिकतावादी मार्क्सवादियों का ध्यान इस पर रहता था कि कल्पना, पुराण, स्मृति आदि के प्रयोग से वर्णन में रुचि पैदा हो, साहित्य सरस बना रहे साथ ही वर्गीय-वास्तविकता और साहित्य की परिवर्तनकारी शक्ति का ह्रास न हो। उनको आशा थी कि नई जीवन-स्थितियों से उभरा, नई और प्रभावशाली तकनीकों से निर्मित साहित्य वर्ग-संघर्ष को तेज़ करने में अधिक सहयोगी होगा। उनका मत था कि साहित्य राजनीति के रण-क्षेत्र में प्रवेश करे, लेकिन अपनी सेना के साथ। साहित्य में राजनीति का सहयोग करने की शक्ति होनी चाहिए। साहित्य में प्रभावित करने की क्षमता होनी चाहिए, लेकिन प्रभाव के लिए यथार्थ का रहस्यीकरण करना साहित्यिक को धर्म-दर्शनवादी धारा में ला खड़ा करता है। समीक्षक की भी यही स्थिति होती है, यदि वह जड़-सौंदर्यबोध से ग्रसित है। समस्या रूमानियत या यथार्थ से नहीं, बल्कि विशेष राजनैतिक दृष्टि से होती है, जो मानव-मूल्यों के ह्रास से जन्म लेती है, हिंसा और उपभोग की संस्कृति के प्रभावी होने से सामने आती है। समस्या आधुनिकता से नहीं, पूंजीवादी आधुनिकता से है, शहरों से नहीं पूंजीवादी शहरों से है, धर्म-दर्शन से नहीं, धर्म-दर्शन के अफ़ीम से है।

यहाँ यह नहीं भूलना चाहिए की उपरोक्त साहित्यिक वाद और आंदोलन शहरों में साहित्यिकों के संगठित होने के कारण पैदा हुए थे, कई साहित्यिक अपने को वाद और आंदोलन से मुक्त कहते रहे, पर आधुनिक शहरों में जीवन-यापन करना और उनमें पैदा हो रही नई स्थितियों और सौंदर्य-मूल्यों से मुक्त रहकर साहित्य-उत्पादन करना असंभव था। केदारनाथ सिंह भी विचार-मुक्त कवि लगते हैं, लेकिन यह असंभव था कि उनका साहित्य नई उत्पादन-स्थितियों से भी बचकर निकल जाता। उस पर भी विभिन्न वादों और आंदोलनों का प्रभाव है। उपरोक्त तीनों प्रमुख वाद साहित्य के अतिरिक्त अन्य कला-माध्यमों में भी प्रारम्भ और प्रभावी हुए। १९वीं और २०वीं सदी में विश्व-भर में रूमानवाद, यथार्थवाद और आधुनिकतावाद के वाद-विवाद-संवाद में प्रचुर साहित्य-उत्पादन हुआ। हिन्दी का आधुनिक-साहित्य भी इसका अपवाद नहीं। यह वाद-विवाद-संवाद  सर्रियलिज़्म, फ्यूचरिज़्म और एंटी-पोएट्री से लेकर सिचूएशनिस्ट, जादुई यथार्थवाद और उत्तर-आधुनिकतवाद तक विभिन्न नई साहित्य-धाराओं के निर्माण में सहयोगी बनी, हिन्दी में भी नई कविता, अकविता, जादुई प्रभाववादी, अस्मितावादी आदि साहित्य-धाराओं के निर्माण में इस संघर्ष ने सहयोग किया।

आधुनिक-साहित्य के अंतर्गत यथार्थ का रहस्यीकरण और यथार्थ का पुनर्प्रस्तुतिकरण दोनों कार्य हुए। जबकि ये दोनों एकदम भिन्न प्रक्रियाएँ हैं। यथार्थ के वर्णन में, कल्पना और भाषा-शैली का महत्त्व नकार देने पर साहित्य अपनी साहित्यिकता खो देता है, लेकिन यह याद रखना चाहिए कि आधुनिक-साहित्य का मूल विषय पूंजीवादी-सामाजिक-संबंध हैं, उससे अलग होते ही वह प्राचीन साहित्य की नकल भर रह जाता है। पुराण का साहित्यिक-प्रयोग पुराण रचने से अलग है। लू शुन ने इस प्रक्रिया पर लिखा है। उन्होने चीन की पौराणिक कहानियों का आधुनिक पुनर्प्रस्तुतिकरण भी किया है।

केदारनाथ सिंह २०वीं सदी के उत्तरार्द्ध के प्रारम्भ से प्रायः अब तक साहित्य-उत्पादन करते रहे थे। उन पर इन विभिन्न वादों और आंदोलनों का असर पड़ना आश्चर्य की बात नहीं। उनकी पुस्तक ‘हिन्दी-कविता में बिम्ब-विधान’ जब प्रकाशित हुई, तब तक हिन्दी-साहित्य में बिम्ब, फेंटेसी, कल्पना, परंपरा, पुराण, स्मृति, भविष्य-कल्पना आदि यूरोपीय आधुनिकतावादी-साहित्यिक-अवधारणाएँ चर्चा का विषय बन चुकी थी। केदारनाथ सिंह ने ‘तीसरा सप्तक’ के अपने वक्तव्य में ज़ोर देकर कहा कि कविता में मैं सबसे अधिक ध्यान देता हूँ बिम्ब-विधान पर, लेकिन न तो ‘तीसरा सप्तक’ में न ही बाद में वे अपनी बात पर खरे उतरते हैं। बिंबों की शिथिलता उनके साहित्य में जीवन भर बनी रही। वे कोई बिम्ब-विधान नहीं रच पाए। ‘बाघ’ कविता में भी बिंबों और वक्तव्यों का बिखराव ही लक्षित होता है। कोई विधान है क्या वहाँ? और अगर है, तो क्या वह रूमानी-यथार्थवादी विधान ही नहीं है? बुद्ध-कथा पढ़कर कोई भी समझ सकता है कि विद्वान-प्राध्यापक-कवि किस युग में जी रहा है। बुद्ध-संबंधी उसकी कल्पना क्या है? वह आज से भय खाकर कल के वीर को देखते हैं। बुद्ध उन्हें ठीक ही दिखाई देते हैं, लेकिन वे गर्दन झुकाकर निकल जाते हैं, आश्चर्य! ये कौन-से बुद्ध हैं? बुद्ध हैं या कोई आधुनिक आरामतलब साहित्यिक, जो ख़तरा देखते ही दुम दबाने लगता है? माना कि बुद्ध-संबंधी साहित्य का अध्ययन-मनन २०वीं सदी में जाकर ही ठीक से शुरू हुआ, लेकिन जब तक केदारनाथ सिंह ‘बाघ’ लिखते, बुद्ध-साहित्य का पर्याप्त अध्ययन-मनन हिन्दी में भी उपलब्ध हो चुका था, दिल्ली में तो और आसानी से उपलब्ध हो जाता होगा। देखने वालों को तो ‘मुँह नज़र आते हैं दीवारों के बीच’।

थे या नहीं, मैं नहीं जानता, लेकिन उनके साहित्य का बहुलांश उसी धारा को समृद्ध करता है। वे यथार्थवादी स्थितियों में रूमानी भाव-विचार तैयार करते हैं। कल्पना-भावना, स्मृति-परंपरा के नाम पर यथार्थ का रहस्यीकरण करते हैं। केदारनाथ सिंह ऐसा क्यों करते हैं? क्या नाम, सम्मान, परंपरा, घराने के लिए? अपनी परंपरा की खोज में उनकी कविताएं बनारस और दिल्ली के आभिजात्य-वर्ग की स्मृति से अधिक कुछ और नहीं निर्मित करती। उन्हें जो चुनना था, उन्होने चुना और उनकी कविताओं पर इसका असर पड़ा, उनकी कवितायें रूमानी यथार्थवाद की शिकार होती चली गईं। मैं यह नहीं कहता कि वे सड़क पर भूखों मरते या मार्क्सवादी होते तो उनकी कविताएं महान हो जातीं, या वे मेरे प्रिय कवि हो जाते। पर क्या कारण है कि ८३ वर्ष के जीवन में लिखा गया उनका अधिकांश साहित्य एक-सा है? केदारनाथ सिंह की प्रतिबद्धता बिम्ब के प्रति है, लेकिन एक साहित्य-उत्पादक के रूप में वे रूमान और यथार्थ के तनाव के बिम्ब ही निर्मित कर पाते हैं और दया और भीरुता के भाव-विचार। वे कभी-कभी ही अपनी बात स्पष्ट करते हैं, वह भी कथा या स्मृति के बिम्ब खींचते वक़्त। यह कहने का एक ढंग हो सकता है, लेकिन वह जो कहते हैं, उसमें एक दिशा निर्मित होती जाती है। और वह दिशा मानव-मूल्यों के ह्रास की उपेक्षा की है, मानव-मूल्यों की उच्चता से सहम जाने की है। साहस और सृजनशीलता के बिना साहित्यिक भय और जड़ता से ग्रस्त हो जाता है। भय और जड़ता उसके समक्ष अतीत-गौरव-गान और प्रकृति-वर्णन के अतिरिक्त कोई रास्ता नहीं छोडते। उनकी प्रतिबद्धता वर्तमान समाज या राजनीति के प्रति क्यों नहीं है? क्या साहित्य और समाज के सम्बन्धों को वे नहीं जानते? या जान-बुझकर उपेक्षित करते हैं? उनकी रचनाओं में समाज और साहित्य का संबंध अगर है तो अवैध है, अपवित्र है। ऐसे अवैध सम्बन्धों से जन्मे बिम्ब देखकर उनकी कविताओं का डी.एन.ए. टेस्ट न करें, वे उन्हीं की संतान हैं लेकिन अवांछित। यथार्थ रूमान के आवरण में क्या बाघ कविता जैसा नहीं लगता?

साहित्यिक जब तक जीवित होता है, वह विश्व में अपनी भूमिका और साहित्य-रचना के विषय और रूप में बदलाव कर सकता है। बदलाव की यह संभावना या आशंका मृत साहित्यिक खो देता है। साहित्यिक की मृत्यु उसके किए और कहे-लिखे पर पुनर्विचार के लिए प्रेरित करती है। साहित्यिक अपने जीवन में भी बदलता है। उसके भाव-विचार, कल्पना-क्षमता, भाषा-शैली आदि बदलते हैं। मृत्यु साहित्यिक के व्यक्तित्व और कृतित्व में बदलाव को रोक देता है। लेकिन कुछ साहित्यिक जीवन में ही अपने साहित्यिक विकास को रोक देते हैं, उनके लिखने-सोचने का एक ढर्रा बन जाता है। इसे उनकी मृत्यु भी कहा जा सकता है। इससे लिखने का काम आसान हो जाता है, साथ ही विशेष लेखन में कुशलता हासिल हो जाती है, लेकिन इससे विषय और रूप की एकतानता निर्मित होती जाती है, साहित्यिक प्रयोग सीमित होता जाता है। लेखन की यह खास प्रक्रिया रूढ़िवाद कही जा सकती है, इसे साहित्यिक-हठ भी कहा जा सकता है। केदारनाथ सिंह भी साहित्यिक-हठी हैं। साहित्य का यह संकीर्ण घेरा साहित्यिक के लिए एक सुरक्षा-कवच की तरह होता है। वह इसे जीत की गारंटी समझने लगता है। वह जहाँ प्रसिद्धि पाता है, एक-सा, वैसा ही जैसा प्रसिद्ध हुआ, लिखता जाता है। विषय-संकीर्णता और प्रयोग से भय साहित्यिक में जड़ सौंदर्यबोध का निर्माण करते हैं। जीते-जी मरना और क्या है कि अब आप अपनी सृजन-क्षमता का विस्तार नहीं कर सकते, यांत्रिक पुनरुत्पादन के अतिरिक्त और कुछ नहीं कर सकते। नए को रचने की शक्ति आप में नहीं। नए को समझने का सामर्थ्य आपमें नहीं है। ज़रूरी तो नहीं कि कवि हो गए, तो अब ज़िंदगी भर कवि ही बने रहना है, ‘राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा’। पर साहित्यिक ऐसी स्थितियों में भी फँस जाता है। अपने काव्य को माँजने में वह ऐसा रूप प्राप्त करता है, जो दूसरों के लिए असाध्य है, वह अनन्य साहित्य की रचना करता है, इस अनन्य रूप को पुनरुत्पादित करने में ही वह काव्य-कौशल समझने लगता है। यहीं उसकी मौत है, अपनी ही साहित्य की फैक्टरी में।

साहित्य प्रांसगिक होना चाहता है। प्रासंगिक होकर ही साहित्य जीवित रह सकता है। लेकिन प्रासंगिकता युग-सापेक्ष होती है। कल का प्रासंगिक आज अप्रासंगिक लग सकता है और आज का प्रासंगिक कल अप्रासंगिक हो सकता है। केदारनाथ सिंह का साहित्य भी अपनी गति को प्राप्त होगा। मेरी दृष्टि में केदारनाथ सिंह की कविताओं में शिथिल बिंबों की भरमार है, धर्म, प्रकृति और लोक-जीवन के बिम्ब अधिक है, अन्याय-अत्याचार, अंधविश्वास की मुखालफत के बिम्ब कम। उनकी कविताओं में उदारवादी राजनीतिक-दिशा है, प्रयोगशीलता की निरंतर उपेक्षा है। हिन्दी-साहित्य के गुणात्मक विकास में उनकी कविताओं का कोई महत्त्व नहीं। वे नई बनती जीवन-स्थितियों के प्रति अचेत हैं, परिणामस्वरूप नई कल्पना और भाषा-शैली के निर्माण के प्रति भी जागरूक नहीं हैं। केदारनाथ सिंह की कविताओं में प्रस्तुत बिंबों का प्रमुख विचार और प्रतिविचार रूमान और यथार्थ है। रूमानी यथार्थवाद उनकी कविता का अंधेरा पक्ष है। उनके साहित्यिक का राजनैतिक उपचेतन है। ज्ञान-विज्ञान की उपेक्षा, अध्ययन-मनन का आलस्य और नए को स्वीकारने की असमर्थता केदारनाथ सिंह की कविताओं की विशेषता है। वे १९४७ यानी भारत-पाकिस्तान-विभाजन को एक रूमानी स्मृति में तब्दील कर देते हैं, उनका प्रश्न कि ‘क्यों चले गए थे नूर मियाँ’ ऐसे उभर कर आता है जैसे उनका नौकर शहर छोडकर चला गया हो और अब खाना कौन बनाएगा, घर कौन साफ करेगा! नूर मियाँ का इससे अधिक क्या महत्त्व है कि वे सुरमा बेचते थे? पाकिस्तान में पत्ते कैसे गिरते हैं! यह विस्मय नासिर काजमी के लिए उचित था, केदारनाथ सिंह जब आधी सदी गुज़र जाने के बाद वैसे ही विस्मित होते हैं, वही सवाल दोहराते हैं, तो वह रूमानी स्मृति से अधिक कुछ नहीं लगता। केदारनाथ सिंह का गणित तो कमज़ोर नहीं, लेकिन इतिहास में वे उत्तीर्ण नहीं हो पाते। ८० के दशक का उत्तरार्द्ध दक्षिणपंथी राजनीति के भारत और विश्व-भर में प्रभावी होने का समय है। ऐसे समय में भारत-पाकिस्तान विभाजन को एक भावुक स्मृति बनाकर पेश करना केदारनाथ सिंह द्वारा यथार्थ का रुमानीकरण, वस्तु-जगत का रहस्यीकरण नहीं तो और क्या है! यह एक खास राजनैतिक दृष्टि नहीं तो और क्या है? यह नहीं भुलना चाहिए कि जब केदारनाथ सिंह ४७ के बारे में लिख रहे थे, हिन्दी-साहित्यिकों का बहुलांश जाति-धर्म आधारित दंगों, हिंसा-उन्माद का तीखा विरोध कर रहा था। यह भारत में फासीवादी शक्तियों के प्रभावी होने का समय है, साथ ही अस्मितावादी-समुदायवादी बहुरंगी-प्रतिवादी शक्तियों के तैयार होने का भी, आश्चर्य नहीं केदारनाथ सिंह के साहित्यिक का अंतर्संघर्ष भी तेज़ हो जाता है। मण्डल-कमंडल और बाबरी-मस्जिद के ठोस-बिम्ब केदारनाथ सिंह देख नहीं पाए, या देखते ही पीछे भागे, तो उन्हें नूर मियाँ दिखाई दे गए, थोड़ा और पीछे जाते तो कोई ‘डोम’ या कोई ‘मुंडा’ भी दिख सकता था। क्या उनकी स्मृति एक जगह जाकर रुक नहीं जाती? क्या वे यथार्थ का एक खास नक्शा नहीं बनाते? बाहर की कोमलता अंदर की कठोरता पर बहुत मोटी चढ़ी हुई है। केदारनाथ सिंह ईश्वर को बार-बार धन्यवाद देते रहे हैं। शायद हिन्दी-भाषा को भी ईश्वर का वरदान मानते रहे थे। क्या ‘देव-भाषा’ का आधुनिक रूप ही हिन्दी है, और इसीलिए हिन्दी भाषा ईश्वरीय कृपा है? तो फिर बुद्ध की करुणा का क्या होगा? अल्लाह की रहमत का क्या होगा? और जीसस की दया का? और फिर कबीर और नानक का क्या होगा? हिन्दी-कवि के लिए कई परम्पराएँ खुली हैं, केदारनाथ सिंह ने अपनी मति से चुनाव किया। उन्होने कुछ अपनी सुमति और कुछ भगवान भरोसे ही जीवन काटा और साहित्य-उत्पादन किया। जानने वाले जानते हैं कि सर्रियलिस्ट फ़िल्मकार लुई बुनुएल ने भी ईश्वर को धन्यवाद दिया है, वे अपने अंदाज़ में, जैसे पूछने वाले पर ही व्यंग्य करते हुए, कहते हैं – “ईश्वर का धन्यवाद कि मैं नास्तिक हूँ!” धन्यवाद के पात्र केदारनाथ सिंह भी हैं कि उन्होने अपनी कुछ कविताओं में अपनी परंपरा और उपचेतन को स्पष्ट रूप से सामने रख दिया है। उनके साहित्य की अंतर्धारा की दिशा यहाँ साफ है। ‘मुक्ति’, ‘मेरी भाषा के लोग’, ‘नए कवि का दुख’ ऐसी कई कविताएं हैं। पर मैं केवल उनकी एक कविता की ओर ध्यान दिलाना चाहूँगा, ‘बनारस’ में जिस बात के लिए बिंबों को जोड़ना पड़ता है, वह मशक़्क़त यहाँ नहीं, अपनी बात को बच्चों सी सरल ज़बान में तैयार बिंबों के माध्यम से उन्होंने रखा है –

जब ट्रेन चढ़ता हूँ

तो विज्ञान को धन्यवाद देता हूँ

वैज्ञानिक को भी

 

जब उतरता हूँ वायुयान से

तो ढेरों धन्यवाद देता हूँ विज्ञान को

और थोड़ा सा ईश्वर को भी

 

पर जब बिस्तर पर जाता हूँ

और रोशनी में नहीं आती नींद

तो बत्ती बुझाता हूँ

और सो जाता हूँ

 

विज्ञान के अंधेरे में

अच्छी नींद आती है। (विज्ञान और नींद)

यहाँ विरोध स्पष्ट है, कुछ अनकहा नहीं। विचार और प्रति-विचार आमने-सामने हैं। पर अब भी सोच में सवाल नाच रहे हैं। केदारनाथ सिंह की यथार्थ की कल्पना कैसी है? क्या वे रूमानी यथार्थवादी धारा के कवि हैं? आज उनकी क्या प्रासंगिकता है, जबकि इसी साल उन्होने अपनी आखरी साँसे लीं? इन प्रश्नों को पाठक-समीक्षक के ध्यानार्थ रखता हूँ। केदारनाथ सिंह के साहित्य का मूल्यांकन होना अभी शुरू ही हुआ है, आशा है उनकी रचनावली प्रकाशित होगी, और बेहतर मूल्यांकन किया जाएगा। उनके साहित्य की अंतर्धारा और हिन्दी-साहित्य में उनकी परंपरा भी अधिक स्पष्ट होगी। तब शायद अधिक स्पष्ट होगा कि केदारनाथ सिंह की राजनीति क्या रही? मुझे विश्वास है हिन्दी-साहित्य-समीक्षक अधिक गंभीरता से केदारनाथ सिंह के व्यक्तित्व और कृतित्व पर सोचेंगे। ‘विज्ञान के अंधेरे में’ सोए उनके उपचेतन को टटोलेंगे। वे भी मशक़्क़त से भागेंगे तो हिन्दी-साहित्य का क्या होगा! यूँ आराम-तलब बौद्धिक-साहित्यिक हिन्दी-साहित्य-चर्चा का नया विषय तो नहीं है। इस पर बात होती आई है। चलती चर्चा चलती चले…

***

[i] प्रेमचंद, ‘रंगभूमि’, हंस प्रकाशन, इलाहाबाद, १९९९, पृ.-९

usman khan

उस्मान ख़ान समकालीन हिंदी साहित्य के अलहदा युवा कवि-कथाकार हैंचर्चाओं और पुरस्कारों की भीड़ से अलहदा… छपाऊ मानसिकता से भी अलहदा... जे.एन.यूके हिंदी विभाग से मालवा के लोकसाहित्य पर पीएचडीइनसे usmanjnu@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

हिंदी साहित्यिक की विकट जीवटता: उस्मान ख़ान

विश्व-साहित्य की अवधारणा अभी हिन्दी में चर्चित नहीं है। इंग्लिश के विश्व-भाषा बनते जाने, पुस्तकों, पत्रिकाओं के ‘सॉफ्ट’ रूप आ जाने, इंटरनेट के विकास आदि ने विश्व-स्तर पर साहित्य-उत्पादन में वृद्धि की है। विश्व-साहित्य ने समीक्षकों का ध्यान फिर से आकर्षित किया है। हिन्दी-क्षेत्र में भी साहित्य-महोत्सव, रंग-महोत्सव, संगीत-महोत्सव, सिनेमा-महोत्सव आदि का चलन हो गया है। सुस्त और निराश हिन्दी साहित्यिकों के लिए इवेंट क्रिएट किए जाते हैं। ऐसे लोग हैं, जो शहरों में इश्तेहार लिए फिरते हैं – ‘निराश साहित्यिक मिलें’। थोड़ा खर्चा करना पड़ता है, पर उत्साह पैदा हो सकता है। हिन्दी का साहित्य-उत्पादक ठेके पर काम करता है, दिहाड़ी भी कर लेता है, अनियमित और मुक्त साहित्यिकों की भी कमी नहीं। कुछ ही को आराम है। हिन्दी कवि त्रिलोचन ने यूँ ही नहीं कहा – ‘हिन्दी की कविता उनकी कविता है जिनकी साँसों को आराम नहीं था’। #लेखक 

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College of Arts and Sciences houses 

 

विश्व-साहित्य और हिंदीयत

By उस्मान ख़ान

विश्व-साहित्य की अवधारणा १९वीं सदी के जर्मन साहित्यिक, राजनेता और विज्ञान-अनुसंधानी जोहान वोल्फ़्गेन फोन गेटे के लेखन में पहली बार प्रकट होती है। विश्व-साहित्य तब एक संभावना की बात थी। जर्मनी के ही क्रांतिकारी, समीक्षक, मज़दूर-नेता कार्ल मार्क्स और फ्रेडेरिक एंगेल्स ने साम्यवादी घोषणापत्र में आने वाले समय में असंख्य देशज और स्थानीय साहित्य से विश्व-साहित्य के उदय की संभावना जताई थी। २०वीं सदी में प्रिंटिंग-प्रेस और अनुवाद-कला के उत्तरोत्तर विकास ने विश्व-साहित्य के निर्माण को तेज़ किया। २१वीं सदी में मुक्त-बाज़ार और इंटरनेट के विश्व-व्यापी प्रभाव में विश्व-साहित्य के निर्माण और वैश्विक-सौंदर्य-मूल्यों के निर्माण की ओर साहित्यिकों और समीक्षकों का ध्यान तेज़ी से जा रहा है।

आज विश्व के कई देशों में तुलनात्मक साहित्य और विश्व-साहित्य विश्व-विद्यालयों, अध्ययन-केन्द्रों आदि के पाठ्यक्रमों में शामिल किया जा रहा है। अभी इस प्रश्न को हल नहीं किया जा सकता है कि विश्व-साहित्य में किन किताबों को शामिल किया जाना चाहिए! साहित्य के विभिन्न माध्यमों में विस्तार को देखते हुए यह काम और भी कठिन होता जा रहा है। लेकिन भविष्य में रास्ता अधिक साफ़ होगा। स्थानीयता का रूप भी अधिक स्पष्ट होगा। हिंदीयत क्या है? यह भी अधिक स्पष्ट होगा।

विश्व-साहित्य-समीक्षा अपने प्रारम्भ में यानी साम्राज्यवाद के विस्तार के समय यूरोप-केन्द्रित थी, आज साम्राज्यवाद की स्थिति भी बदल गई है और ग़ैर-यूरोपीय देशों और भाषाओं में भी विश्व-साहित्य-समीक्षा का प्रयास हो रहा है। डॉलर की सत्ता को वेनेजुएला और चीन जैसे देशों ने चुनौती दी है। पूंजीवाद-साम्राज्यवाद एक-रंगी विश्व-संस्कृति को प्रसारित करता है, एक-सा जीने, सोचने और खाने-पीने-पहनने पर ज़ोर देता है। विकासाधीन देशों में एक समय की प्रगतिशील कही जाने वाली पहलकदमी ने अपनी भूमिका खो दी है।

आज का समय लोकतन्त्र और विज्ञान की ओर बढ़ने का रास्ता छोड़ ३०-४० के दशक में पश्चिम-यूरोप के देशों द्वारा सुझाए फासीवाद की ओर बढ़ गया है। उत्पादन-पुनरुत्पादन की नीरस ज़िंदगी से अधिक वह अब और कुछ नहीं दे सकता। इसी कारण हिंसा-उन्माद-विकृति को ही ख़ुशी और अच्छाई मानने का प्रचार किया जाता है। बहू-रंगी संस्कृति से निर्मित विश्व-संस्कृति को वह स्वीकार नहीं कर पाता। रोज़गार और युद्ध के कारण बढ़ता पलायन विभिन्न संस्कृतियों के संयोजन का प्रमुख कारण है।

यह बहु-रंगी सांस्कृतिक स्थिति जीवन को रसपूर्ण बनाने में अभी असमर्थ है। यह कोलाहल किसी सरस गीत को जन्म देगा। विभिन्न संस्कृतियों का यह संयोजन पूंजीवाद-साम्राज्यवाद के सांस्कृतिक प्रभाव को कैसे कम या खत्म करेगा, यह इस पर निर्भर करता है कि निम्न-वर्गीय संस्कृतिकर्मी की क्या स्थिति है, क्या योजनाएँ हैं, वह कितना साहसी और सृजनशील है। विश्व की बदलती राजनैतिक-आर्थिक स्थितियों से विश्व-साहित्य के निर्माण में तेज़ी आई है। आज संस्कृतिकर्मी मुक्त-बाज़ार में फासीवाद और समाजवाद के संघर्ष की नई मंज़िल पर खड़ी है। मार्क्स और एंगेल्स ने आभिजात्य-वर्ग के साहित्यिक-उत्पादन के कॉस्मोपोलिटन या सर्वदेशीय चरित्र की बात कही है, आज निम्न-वर्गीय साहित्यिकों की भी ऐसी लंबी सूची बन चुकी है, जिनके साहित्य को कॉस्मोपोलिटन साहित्य कहा जा सकता है। सर्वदेशीय साहित्य या विश्व-साहित्य की अवधारणा ग़ैर-यूरोपीय देशों में प्रायः मार्क्सवादी विचारों के प्रचार-प्रसार के साथ ही पहुँचीं। विश्व की एकता पूंजीवादी-साम्राज्यवाद के पक्ष-विपक्ष में देखी जाने लगी। साम्यवादी घोषणापत्र को विश्व-साहित्य की पहली कृति कहा जाना अतिशयोक्ति नहीं है।

कम्युनिस्ट घोषणा पत्र का हिन्दी में अनुवाद क्रांतिकारी अयोध्या प्रसाद ने जेल में रहते हुए १९३३ में किया। उर्दू में इसके पहले घोषणापत्र के दो अध्याय मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के साप्ताहिक अल-हिलाल में १९२७ में प्रकाशित हुए थे, लेकिन उर्दू में इसका पूर्ण अनुवाद १९४६ में ही संभव हो सका। बोलियों में अब तक इसका अनुवाद उपलब्ध नहीं है। सर्वदेशीय साहित्य बाज़ार और अनुवाद-कला के विशेष विकास की माँग करता है। सामंतकाल में भी ऐसे बाज़ार थे, अनुवाद भी होते थे, तब भी विश्व-स्तर पर एक से बाज़ार नहीं थे, बग़दाद हो या बनारस, अमेरिका के अस्तित्त्व से भी विद्वान तब अपरिचित थे।

पूंजीवादी-साम्राज्यवाद के प्रसार के साथ ही ऐसे शहरों, बाज़ारों और साहित्य का आविर्भाव संभव हो सका, जिन्हें सर्वदेशीय कहा जा सके। तब भी आज स्थिति और बदल गई है। भारतेन्दु, महावीर प्रसाद द्विवेदी और प्रेमचंद के नाम पर आधुनिक साहित्य के युगों का नाम कर देने के बाद भी ये साहित्यिक सर्वदेशीय प्रवृत्ति के उचित परिचायक नहीं हैं। अकबर इलाहाबादी, इक़बाल, प्रेमचंद आदि का लेखन हिन्दी-उर्दू में सर्वदेशीय साहित्य का आधार बनाता है। सर्वदेशीय साहित्य के उत्पादन में १९४० का दशक विशेष महत्त्व रखता है। ब्रिटिश-शासन का विरोध, व्यंग्य और उपन्यास का लिखा जाना आधुनिकता के लक्षण हैं, तब भी आधुनिक जीवन-स्थितियों के विकास के बिना आधुनिक साहित्य अपने उत्कृष्ट रूप में प्रकट नहीं हो सकता था। हिन्दी क्षेत्र में यह स्थिति १९४० के दशक में ही बन पाई। प्रगतिशील-लेखक-संघ का उदय (१९३६, लखनऊ अधिवेशन) सर्वदेशीय-साहित्य के निर्माण की वास्तविक भूमिका बना। ‘तार-सप्तक’ (१९४२) का प्रकाशन हिन्दी-कविता में आधुनिकता का वास्तविक प्रवेश है। हिन्दी-क्षेत्र में प्रेमचंद पहले हैं जो निम्न-वर्गीय सर्वदेशीय-साहित्य के निर्माण की ओर बढ़ते हैं। उन्हें प्रगतिशील-लेखक-संघ के पहले अधिवेशन का अध्यक्ष बनाया जाना अचरज की बात नहीं है। उनका साहित्य उस समय के लेखकों के लिए भी प्रेरणा-स्रोत था। ‘महाजनी सभ्यता’ को, धर्म और जाति के नाम पर चल रहे अन्याय-अत्याचार को सामने रखने का साहस और किसमे था? तब भी यशपाल, भुवनेश्वर, मंटो और मुक्तिबोध जैसे साहित्यिक ही हिन्दी-उर्दू भाषा में कॉस्मोपोलिटन साहित्य के उत्कृष्ट उत्पादक कहे जा सकते हैं। इन सभी का साहित्य लगभग एक ही समय में सामने आने लगता है, तब भी रूप-संयोजन और भाव-विचार की विविधता बनी रहती है। राहुल सांकृत्यायन का साहित्य भी इसी समय तेज़ी से सामने आता है। भारत में मुंबई और कोलकाता प्रारम्भिक कॉस्मोपोलिटन हैं। हिन्दी-क्षेत्र में ऐसे शहर १९वीं सदी के अंतिम दशकों में उभरने लगे थे। इनके समुचित विकास के बाद ही हिन्दी क्षेत्र में सर्वदेशीय साहित्यिक तेज़ी से उभरते हैं। हिंदीयत का विश्व-साहित्य से पहला सही मुक़ाबला १९४० के दशक से शुरू होता है। हजारीप्रसाद द्विवेदी, रांगेय राघव, अज्ञेय, मज़ाज, फैज, फ़िराक़, शमशेर, इस्मत चुगताई, कृशनचंदर समवेत हिंदीयत की एक पहचान बनती जाती है। विश्व-साहित्य और हिंदीयत का निर्माण एक-दूसरे के पूरक हैं। विश्व-साहित्य और हिंदीयत की अवधारणा को आज के साहित्यिक के ध्यानार्थ सामने रखना ही इस पर्चे का उद्देश्य है। दुनिया भर में पूंजीवाद-साम्राज्यवाद के विस्तार के क्रम में विश्व-साहित्य का निर्माण हुआ है, हिन्दी में भी अभिजात्य-वर्गीय और निम्न-वर्गीय साहित्य-धाराएँ इसी विस्तार में स्पष्ट होती चली गई हैं। मंटो ने चचा सेम को तब ही ख़त लिख डाले थे। अफ़सोस, आज हिन्दी-उर्दू के साहित्यिक उन खतों को भूल गए।

हिन्दी का साहित्यिक विकट जीव है – उसे एक साथ हिन्दी-उर्दू-इंग्लिश और हिन्दी-क्षेत्र की बोलियों को साधना पड़ता है। यही अच्छा है कि अब संस्कृत और फ़ारसी का दबाव जाता रहा है। फिर भी हिन्दी के निम्न-वर्गीय साहित्यिक को बाज़ार में भी ठीक भाव नहीं मिल पाता। इतनी साधना, और फायदा कोड़ी का भी नहीं। तब भी निम्न-वर्गीय साहित्यिक का उत्पादन किसी को भी हैरान कर सकता है। अनगढ़ ही सही, उसकी मेहनत और आशा-उत्साह से इनकार नहीं किया जा सकता। आज ऐसे निम्न-वर्गीय साहित्यिकों की संख्या हज़ारों-लाखों में हैं, जो विश्व-साहित्य का हिस्सा बनते जा रहे हैं। पारंपरिक महत्व प्राप्त साहित्य को भी फिर से जाँचा जा रहा है। विभिन्न देशों और भाषाओं के साहित्य का ‘सामान्य सौन्दर्यशास्त्र’ निर्मित करने का प्रयास किया जा रहा है। विश्व-स्तर पर साहित्यिक रूपों – यथा उपन्यास, सिनेमा आदि – के उद्भव, विकास और प्रकार्य का अध्ययन किया जा रहा है। विश्व साहित्य समीक्षा मानवीय और साहित्यिक मूल्यों को विश्व-स्तर पर जाँचकर देखने की कोशिश करती है। आज ऐसे समीक्षकों की कमी नहीं है, जो कई देशों और भाषाओं के साहित्य के गंभीर अध्ययन का अपने लेखन में उपयोग करते हैं। हिन्दी-साहित्य-समीक्षा भी इस स्थिति से लाभान्वित हो रही है। साहित्य के आंतरिक-पठन के साथ ही बाह्य-पठन का संश्लेषण इन समीक्षकों की विशेषता है।

विनोद कुमार शुक्ल ने लिखा है कि ‘मैं छत्तीसगढ़ी में वैश्विक हूँ’। ठीक बात, लेकिन यह छत्तीसगढ़ के समाज और लोगों के आंतरिक विरोध को छुपाकर नहीं, उजागर कर ही हो सकता है कि कोई छत्तीसगढ़ी में ही वैश्विक हो जाए। निम्न-वर्ग का प्रश्न हर कवि से सीधा है – साहित्यिक ने निम्न-वर्ग के लिए क्या किया? एक उत्पादक के रूप में निम्न-वर्ग की मुक्ति के लिए वह सचेत सक्रिय प्रतिबद्धता कैसे प्रदर्शित करता है? करता भी है या नहीं? मुक्तिबोध कविता में पुछते हैं – ‘बताओ तो किस-किस के लिए तुम दौड़ गए?’ स्थानीयता देशज शब्दों या प्राचीन और सामंतकालीन कथा-रूपों के प्रयोग से नहीं, बल्कि स्थानीय राजनीति में सक्रिय सहयोग से उत्पन्न होती है। इसमें साहित्यिकों के अपने समूह हो सकते हैं, सहमतियाँ-असहमतियाँ हो सकती हैं, लेकिन राजनीति को समझे बिना स्थानीयता को समझना नामुमकिन है। क्या अचरज अगर आज हबीब जालिब और विद्रोही जैसे कवि हिन्दी-क्षेत्र में प्रसिद्धि पा रहे हैं। स्थानीयता का निर्माण विशेष सामाजिक-पारस्परिकता में होता है। आभिजात्य-वर्ग और निम्न-वर्ग के संघर्ष और संवाद में स्थानीयता जन्म लेती है। ब्रिटिश-साम्राज्यवाद के अंतर्गत हमारी ज़ंजीरें साफ़ दिखाई देती थी, सुनाई देती थी, छुई जा सकती थी – आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। आज साहित्यिक के जीवन-मूल्य भी उपभोक्तावाद, एकरंगी संस्कृति के प्रभाव में है। हिन्दी साहित्यिक प्रायः निम्न-वर्गीय पक्षधरता से दूर है। जन-अलगाव से ग्रसित है। उसके सामने साम्राज्यवाद का बदला रूप स्पष्ट नहीं है। आभिजात्य-वर्ग और निम्न-वर्ग का संघर्ष और संवाद नए स्तर पर पहुँच गया है। निम्न-वर्ग की साधना वैश्विक होने की है, आभिजात्य-वर्ग की स्थानीय होने की।

विश्व में दो ही साहित्यिक-वर्ग रहे हैं – पूँजीपति और सर्वहारा, मालिक और नौकर, आभिजात्य और निम्न-वर्ग। हिन्दी का साहित्यिक भी इसका अपवाद नहीं। हिंदीयत छत्तीसगढ़ी या देहलवी होने से अलग चीज़ है। हिंदीयत हैदराबाद और मुंबई का भी अंश है। लाहौर और इस्लामाबाद का भी। जयपुर और पटना का भी। जबकि इनमें से हर जगह की अपनी स्थानीयता है। बनारसी भोजपुरी होकर भी बनारसी है। साहित्य की विविधता और विस्तार से भयभीत, मुक्त-बाज़ार से बढ़ी रोज़गार की अनिश्चितता से शंकित हिन्दी-समीक्षक विश्व-साहित्य और हिंदीयत के संबंध को समझने में प्रायः असमर्थ है। वह स्थानीयता के नाम पर देशज शब्द या शहरी चालू फिकरे या जगहों के नाम ही समझ पाते हैं। स्थान की अपनी वैश्विक बनावट को समझने की ओर वे झुक ही नहीं पाते हैं।

हिंदीयत भारतीयता से भी अलग है, विशेष है। हिंदीयत हिन्दी, उर्दू, इंग्लिश और बोलियों के लोगों से मिलकर तैयार होती है तथा हिन्दी-क्षेत्र में सर्वदेशीय नगरों के निर्माण से पहले इसका आस्तित्त्व नहीं था। पूंजीवाद-साम्राज्यवाद के विरोध में हिंदीयत का भी निर्माण हुआ और सर्वदेशीय साहित्य का भी। विभिन्न विचारधाराओं और व्यक्तित्वों के संघर्ष में हिंदीयत की अवधारणा का निर्माण होता आ रहा है। उसके उद्भव, विकास और प्रकार्य को समझने का काम अभी अधूरा है। प्रारम्भ में हिंदीयत की अवधारणा भी बड़े शहरों से संबद्ध थी, आज वह छोटे शहरों, कस्बों और गाँव तक प्रसारित हो चुकी है। विभिन्न धर्मों, जातियों-जनजातियों, समुदायों के लोग, विभिन्न राजनैतिक और सामाजिक संगठन, आभिजात्य-वर्ग और निम्न-वर्ग मिलकर हिंदीयत का निर्माण करते हैं। विभिन्न विचारधाराओं के समीक्षकों ने हिंदीयत की अलग-अलग व्याख्या की है। कभी इसे भारतीय कहा गया, कभी देशज तो कभी स्थानीय। हिंदीयत एक बहु-संस्कृतिपूर्ण क्षेत्र-भावना है। आज का साहित्यिक और समीक्षक भी बदली हुई स्थितियों में भारतीय, देशज या स्थानीय होने का अर्थ खोज रहा है। हिंदीयत का नया रूप विश्व-साहित्य की पूर्णता में प्रकट होगा। हिंदीयत की पहचान बनने के लिए आभिजात्य-वर्ग और निम्न-वर्ग निरंतर संघर्षरत हैं। दोनों अपनी-अपनी तरह की हिंदीयत के हामी हैं।

२१वीं सदी का हिन्दी साहित्यिक विश्व-साहित्य के संपर्क में है, हिंदीयत की पहचान भी उसे है। लेकिन आज हिन्दी के दोनों संघर्षरत वर्गों के साहित्यिक अपने वर्गीय उपचेतन को प्रकट करने में, उसका निस्संकोच, साहसिकता से चित्रण करने में प्रायः असमर्थ हैं। उनके मन में शंका है, डर है। दोनों ही अपने उपचेतन में नहीं उतरना चाहते – जहाँ हिंसा-उन्माद-विकृति का कोहराम मचा है। निम्न-वर्ग की आर्थिक-स्थिति से उसके साहित्यिकों का विश्व-साहित्य के संपर्क में न आ पाना समझा जा सकता है, वह अभी भी इंटरनेट पर उपलब्ध साहित्य के संपर्क में नहीं है, उसकी जेब प्रायः खाली है, विश्व-साहित्य की उसकी समझ का अभी निर्माण होना है, पर आभिजात्य-वर्ग की समस्या कुछ और है – सुस्ती और निराशा, शंका और भय, बाह्याडंबर और वाक्जाल से लगाव आदि। इस संबंध में दलित-साहित्य ही उल्लेखनीय है, जहाँ भारतीय उप-महाद्वीप के निम्न-वर्ग के उपचेतन का सुंदर चित्रण हुआ है। हिन्दी-साहित्यिक भी इस कार्य में पीछे नहीं रहे हैं। आज भारत का दलित-साहित्य अपने निजी अनुभवों का प्रायः उपभोग कर चुका है। अब उसे निम्न-वर्ग के अन्य-अनुभवों से खुद का संबंध बनाना होगा, अन्यथा वह भी नीरस जीवन का अंश बनकर रह जाएगा। दलित-साहित्य में भी आभिजात्य-वर्गीय-प्रेरणाएँ प्रकट होती रही हैं, जो दलित-साहित्य-विरोधी है। निम्न-वर्गीय स्त्री-साहित्य की संख्या पर अभी मुझे शोध करने की आवश्यकता है।

नई सदी की स्त्री साहित्यिकों में साहस और विचारधारात्मक प्रतिबद्धता का विकास आशापूर्ण है। वास्तव में वर्ग-संघर्ष और वर्गीय चेतन और उपचेतन स्तरों के अंतर्संबंधों की पूर्णता को देख पाने में आज का हिन्दी साहित्यिक प्रायः असमर्थ है। हिंदीयत की खोज का प्रारम्भ आधुनिक धार्मिक आंदोलनकारियों की छत्र-छाया में हुआ था, उसकी हिंसक-धर्मवादी व्याख्याएँ नई नहीं हैं। फ़ासीवाद की प्रेरणा हिन्दी-साहित्यिकों में गहरी पैठ बना चुकी है। हिन्दी का अभिजात्य-वर्ग संस्कृति और सभ्यता का जानकार और रक्षक होने का दावा करता है, यह वर्ग हिंसक-धर्मवादी व्याख्याओं को निर्मित और प्रचारित करता आया है। मुक्तिबोध ‘दिमाग़ी गुहान्धकार का औरांग-ऊटांग’ कविता में इस वर्ग के उपचेतन में उतरते हैं, वे पुछते हैं – ‘किसके लिए हैं बाघ-नख ये?’। उत्तर साफ़ है – निम्न-वर्ग के लिए। आज हिन्दी के लोकप्रिय साहित्य और कला पर उपभोक्तावाद और उससे जन्मे हिंसक-धर्मवाद का प्रभाव और भी स्पष्ट है। इन व्याख्याओं और हिंसा-उन्माद की कार्यवाहियों के बीच हिंदीयत की निम्न-वर्गीय प्रेरणाएँ निरंतर कुचली जा रही हैं। निम्न-वर्ग के साहित्यिकों पर भी इन व्याख्याओं का दबाव और दमन तथा बहिष्कार का भय व्याप्त है। हिन्दी के निम्न-वर्गीय साहित्यिक की वर्ग-चेतस-सक्रियता से ही इस स्थिति में बदलाव आ सकता है। हिन्दी के निम्न-वर्गीय साहित्यिकों के लिए आज जरूरी है कि वे विश्व-साहित्य को, हिंदीयत को समझें, पूंजीवाद-साम्राज्यवाद के विरुद्ध एकजुट हों, अपने उपचेतन को समझें, निम्न-वर्गीय-एकजुटता बनाएँ, नए सौंदर्यशास्त्र का निर्माण करें और विश्व-साहित्य के निर्माण में सक्रिय सहयोग दें!
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उस्मान ख़ान समकालीन हिंदी साहित्य के अलहदा युवा कवि-कथाकार हैंचर्चाओं और पुरस्कारों की भीड़ से अलहदा… छपाऊ मानसिकता से भी अलहदा... जे.एन.यूके हिंदी विभाग से मालवा के लोकसाहित्य पर पीएचडीइनसे usmanjnu@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

 

 

एक साम्यवादी के साहित्यिक पर्चे: उस्मान ख़ान

कथा-साहित्य के एक विधा के रूप में ‘व्यंग्य’ को व्याख्यायित करने का पहला गंभीर प्रयास हिंदी में सुरेंद्र चौधरी द्वारा संपन्न हुआ है. वे व्यंग्य को ‘आत्मतंत्र-स्वतंत्र’ विधा के रूप में चिन्हित करते हैं. चौधरी जी मानना है कि व्यंग्य के लिए माकूल संयोजन सर्वप्रथम मध्यवर्गीय जीवन और दूसरी, संक्रमणशील परिस्थितियाँ  द्वारा संपन्न होता है. वे कहते हैं, “मध्यवर्ग की जीवनदृष्टि में जो समझौता परस्ती है वह व्यंग्य के लिए गुंजाइश पैदा कर देती है. व्यापक रूप से मध्यवर्ग का जीवन ही व्यंग्य का विषय रहा है.” संक्रमणशील परिस्थितियाँ यही है कि पुराना युग ख़त्म हो रहा है, नया युग आ रहा है। पारंपरिक और रूढ़िवादी मान्यताएँ टूट रही हैं और आधुनिक जीवन शैली आ रही है। धार्मिक जीवन मूल्यों का  ह्रास और सेक्युलर जीवन-मूल्यों की संभावना का उभार आदि संक्रमणशील परिस्थितियों के कुछ उदाहरण हैं। लेकिन, पुराने और नए में टकराहट, सामंजस्य और नहीं तो एक अजीब तरह की खिचड़ी, सामने नज़र  आती है। सुरेंद्र चौधरी इसी ‘खिचड़ी’ का एक उदाहरण प्रेमचंद की कहानी ‘आँसुओं की होली’ से देते हैं- ” बेचारे  सिलबिल सचमुच सिलबिल थे। दफ्रतर जा रहे हैं, मगर पायजामे का इजारबंद नीचे लटक रहा है, सिर पर पफेल्ट कैप है मगर लंबी-सी चुटिया पीछे झाँक रही हैं…।” 

व्यंग्य पर विचार करते हुए जो चीज़ परेशान कर रही है, वह है समकालीन कहानियों से व्यंग्य की भंगिमा का ही गायब हो जाना। सुरेंद्र चौधरी ने  था – “मात्र चमत्कारिक और आश्चर्य प्रदान करने के झटके व्यंग्य की कोटि में आज नहीं आ सकते। दूसरी चीज़ यह है कि आज हमने बहुत हद तक अंतर्विरोधों से समझौता कर लिया है और मानने लगे हैं कि मानव-जीवन में अंतर्विरोध कोई पाप नहीं है। यदि कोई इस अंतर्विरोध को अपने व्यक्तित्व का संप्रसार; (व्हिट्मैन  – आई एम वास्ट, आई कंटेन मल्टिट्यूड्स) मान लेता है तो फिर उस पर व्यंग्य करने का प्रश्न ही कहाँ उठता है।”

फ़िलहाल परसाई, व्यंग्य और लेखकों के राजनीतिक कार्यभार से संबंधित उस्मान खान का यह लेख पढ़ें! #तिरछीspelling 

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‘आवारा भीड़ के ख़तरे’ और संकट की निरंतरता

By उस्मान खान 

अधिकांश आधुनिक सामाजिक क्रांतियों में साहित्यिक नेतृत्वकारी भूमिका में रहे हैं। आज भी ऐसे साहित्यिक हैं, जो समाज की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। मशीनों और तकनीक के उत्तरोत्तर विकास, मुनाफ़े की अंधी दौड़ और अतिउत्पादन ने साहित्य और साहित्यिक का समाजीकरण किया। आज हर कोई कवि है, लेखक है। साहित्य का ऐसा उत्पात भारत में कभी नहीं हुआ था। इन बदलावों ने साहित्य के समाज का विस्तार तो किया ही, साथ ही उसकी प्राचीनकाल से बनी रही पवित्रता को भी नष्ट कर दिया। सामंतकालिन भारत में साहित्य मनोरंजन का साधन था, शिक्षा का माध्यम था, साथ ही साथ पवित्र भी। उपनिवेशी-पूंजीवाद के मजबूत होने के साथ भारत में साहित्यिक की स्थिति में बदलाव हुआ। वे राजनीति में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने लगे। इस प्रक्रिया में नए ढंग का साहित्य निर्मित होने लगा। उपन्यास जैसी पूंजीवादी युग में जन्मी विधा ने हिन्दी-साहित्यिकों को भी अपने प्रभाव में ले लिया।

हिन्दी-साहित्य के इतिहास में सामंतकाल में भी साहित्यिकों और राजनीति के अंतर्संबंध देखे जा सकते हैं, लेकिन पूंजीवादी युग के प्रारम्भ के साथ ही नई राजनीति का भी जन्म होता है, यह लोकतन्त्र की राजनीति थी, इसीने दक्षिणपंथ और वामपंथ जैसी आधुनिक राजनैतिक धाराओं का विकास किया। हिन्दी के साहित्यिक भी इन दो खेमों में बंटते चले गए।

यहाँ यह नहीं भूलना चाहिए कि राजनीति कला के तीनों स्तरों – शास्त्रीय, लोकप्रिय और लोक – पर अपना असर डालती है। साहित्य के भी तीनों स्तरों पर राजनीति ने अपना प्रभाव डाला है। पूंजीवादी युग का साहित्य राजनीति को समझे बिना नहीं समझा जा सकता। राजनीति पूंजीवादी युग के साहित्य का प्रमुख संदर्भ है। प्रेमचंद इस संदर्भ को समझते थे, साथ ही साहित्य का मूल्य उनके लिए राजनीति की दिशा तय करने में था। साहित्य पर ऐसा विश्वास कम लोगों का होता है।

हरीशंकर परसाई प्रेमचंद और वामपंथ की परंपरा के साहित्यिक हैं। वे राजनीति को साहित्य के लिए अपवित्र क्षेत्र नहीं मानते। और उनके साहित्य पर प्रमुख आक्षेप भी यही है कि वे राजनीति के संदर्भ का अत्यधिक प्रयोग करते हैं, इसी कारण वे तात्कालिक लेखन करते हैं, उनका लेखन कालजयी नहीं है। बल्कि वे साहित्यिक ही नहीं हैं। वास्तव में, कुछ समीक्षक साहित्य के अनंत क्षेत्र-विस्तार से डरते हैं। वे यह नहीं मान पाते कि साहित्य निरंतर अपना क्षेत्र-विस्तार करता जाता है। यही साहित्य का स्वभाव है। क्या कबीर को कवि मानने में समीक्षक लंबे समय तक बाधा नहीं बनते रहे?

पूंजीवादी युग ने साहित्य के क्षेत्र-विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इंटरनेट-मोबाईल, रोबोट और अत्यधिक भारी मशीनें, बुलेट-ट्रेन और पॉर्न… साहित्य अपना क्षेत्र-विस्तार करता जा रहा है। इसे स्वीकार ना करना ख़ुद को धोखा देना है।

व्यंग्य एक विधा की तरह पूंजीवादी युग में ही विकसित हुआ। कविता, निबंध, लेख, कथा, उपन्यास आदि विधाओं से अंतर्संबंध स्थापित कर व्यंग्य विधा विकसित होती रही है। हिन्दी-साहित्य में व्यंग्य विधा के प्रमुख निर्माताओं में हरीशंकर परसाई का नाम लिया जाता है, यह निश्चित ही उन समीक्षकों के कारण नहीं, जो परसाई को लेखक ही नहीं मानते। परसाई ने उन समीक्षकों की उपेक्षा कर बुरा नहीं किया।

व्यंग्य-विधा के विकास में राजनीति की भूमिका और भी स्पष्ट हो जाती है। व्यंग्य का प्रधान विषय अफसरशाही, भ्रष्टाचार और बाह्याडंबर रहे हैं। आश्चर्य है कि स्वस्थ हास्य-व्यंग्यकारों ने वामपंथी धारा को ही मज़बूत किया। दक्षिणपंथी राजनीति के पैरोकार हास्य-व्यंग्य से परहेज़ करते हैं। परसाई ने ‘वनमानुष नहीं हँसता’ में इस ओर संकेत किया है। इस संग्रह में अक्तूबर १९८८ से नवंबर १९९४ तक की रचनाएँ शामिल हैं। १० अगस्त १९९५ को उनकी मृत्यु हो गई। इस संग्रह में शामिल रचनाएँ उनकी प्रौढ़तम रचनाएँ हैं।

इस संग्रह के लेखों के लिखे जाने का समय भारत में आर्थिक नीतियों, सामाजिक-सम्बन्धों और राजनीति के क्षेत्र में तेज़ बदलावों का समय था। इसे संक्रमण-काल कहा जा सकता है। इसने वर्तमान भारत के निर्माण को निश्चित किया। भारतीय समाज और साहित्य में तब से अब तक निरंतर बने रहने वाले संकट को परसाई ने अपनी इन रचनाओं में विश्लेषित करने की कोशिश की है। सभ्यता का संकट सदी या साल देखकर शुरू नहीं होता। वर्तमान साहित्य के संकट की जड़ें इसी संक्रमण-काल में हैं।

संग्रह का पहला लेख ‘आवारा भीड़ के ख़तरे’ है, इसे संग्रह का सबसे उत्तेजक लेख कहा जा सकता है। यह लेख यूँ शुरू होता है – “एक अंतरंग गोष्ठी-सी हो रही थी युवा असंतोष पर। इलाहाबाद के लक्ष्मीकांत वर्मा ने बताया – पिछली दीपावली पर एक साड़ी की दुकान पर काँच के केस में सुंदर साड़ी से सजी एक सुंदर मॉडल खड़ी थी। एक युवक ने एकाएक पत्थर उठाकर उस पर दे मारा। काँच टूट गया। आसपास के लोगों ने पूछा कि तुमने ऐसा क्यूँ किया? उसने तमतमाए चेहरे से जवाब दिया – हरामजादी बहुत खूबसूरत है।

हम ४-५ लेखक चर्चा करते रहे कि लड़के के इस कृत्य का क्या कारण है? क्या अर्थ है? यह कैसी मानसिकता है? यह मानसिकता क्यों बनी? बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में ये सवाल दुनिया भर में युवाओं के बारे में उठ रहे हैं – पश्चिम के सम्पन्न देशों में भी और तीसरी दुनिया के गरीब देशों में भी।

“क्या यही मानसिकता आज हत्या और बलात्कार के विडियो बनाने तक नहीं ले आई है? परसाई इसके लिए युवाओं को दोष नहीं देते, उनके अनुसार बड़े-बूढ़ों की कथनी-करनी में अंतर देखकर युवा भ्रमित होते हैं, निराश होते हैं, और इस तरह के कदम उठाते हैं। पूंजीवादी सभ्यता के विस्तार और प्रभाव को युवाओं के संदर्भ में समझने का प्रयास करते हुए वे पिता, गुरु, समाज के नेता और फासीवाद के अंतर्संबंधों को भी स्पष्ट करते जाते हैं। वे इसे युवाओं में आस्था का संकट भी कहते हैं क्यूंकी “सब बड़े उनके सामने नंगे हैं।“

यह लेख एक अपील की तरह है। समाज और राजनीति के विद्रुप को उजागर करते हुए परसाई युवाओं से विचारधारा, संकल्पशीलता, सकारात्मक उत्साह, संगठित संघर्ष की आशा करते हैं। साथ ही वे यह तथ्य भी दर्शा देते हैं – “पर मैं देख रहा हूँ, एक नई पीढ़ी अपने से ऊपर की पीढ़ी से अधिक जड़ और दक़ियानूसी हो गई है।“ युवाओं की हताश-नकारवादी स्थिति का प्रमुख कारण बेरोज़गारी है। ये बेरोज़गार युवा धार्मिक उन्मादियों के पीछे चलने लगते हैं। फासीवादी राज्य के निर्माण की प्रबल शक्ति ये बेरोज़गार हैं।

अब आप सोचिए कि बढ़ता हुआ शहर है, शहर में बाज़ार है, बाज़ार में भीड़ है, भीड़ में साहित्यिक भी है, वह एक व्यक्ति को खुले में पेशाब करने से रोकता है, वह व्यक्ति साहित्यिक की पिटाई कर देता है। उस व्यक्ति ने साहित्यिक की पिटाई क्यूँ की? वह चाहता तो अपने इस काम पर शर्मिंदा हो सकता था, चाहता तो आगे ऐसा न करने की बात कह सकता था, चाहता तो कह सकता था, ‘अपना काम देखो भाईसाब!’। मैं कहता हूँ, अगर कवि में लड़ने की क्षमता नहीं थी, तो कवि विरोध करने क्यूँ गया? हमारा कवि सिर्फ बातों से क्यूँ लड़ना चाहता है, हाथों से क्यूँ नहीं? यह २०१७ की घटना है। परसाई की बताई घटना और हमारी बताई घटना के बीच हिंसा-उन्माद की हज़ारों नहीं लाखों घटनाएँ भारत में घट चुकी हैं। क्या संक्रमण-काल इतना लंबा होता है?

हिन्दी का साहित्यिक भारत-विभाजन के समय भड़की सांप्रदायिक-हिंसा और फ़साद में लगभग उदासीन बना रहा था, लेकिन ८० के दशक में शुरू हुए जाति-धर्म आधारित मानव-संहारों से वह उदासीन नहीं रह सका। उसने सभ्यता के संकट को, मानव-गरीमा को नए सिरे से पहचानना शुरू किया। इसका प्रारम्भ आवारा भीड़ के ख़तरे पहचानने से हुआ। यह भीड़ किसी तानाशाही शक्ति से सम्मोहित होती है। अंध-विश्वास इस भीड़ की विचारधारा है। यह भीड़ लोकतांत्रिक और वैज्ञानिक मूल्यों के विध्वंस से जन्म लेती है। तानाशाह एक ऐसा व्यक्ति दिखाई देता है, जो जादूगर है, वह छड़ी घुमाएगा और सारी समस्याएँ हल हो जाएँगी। वह ईश्वर है, ईश्वर का वारिस है, भीड़ में पैदा किए गए काल्पनिक भय का भंजक, अतीत के आभासी अपमानों का बदला लेने वाला – सर्वाधिक हिंसक।

दक्षिणपंथ और वामपंथ के अपने-अपने मूल्य हैं। जहाँ दक्षिणपंथ तानाशाही और अंध-विश्वास को अपना जीवन-मूल्य मानता है, वहीं वामपंथ लोकतन्त्र और विज्ञान को। जिस समय परसाई ये लेख लिख रहे थे, वामपंथ कमज़ोर होता जा रहा था और दक्षिणपंथ मज़बूत। दुनिया-भर में समाजवाद के अंत की बात की जा रही थी। वैज्ञानिक सोच पर प्रश्न-चिन्ह लगाए जा रहे थे। इतिहास का अंत, विचारधारा का अंत, कला का अंत आदि धारनाएँ प्रचलित हो चली थी। लेनिनवाद, सामाजिक-जनतंत्र, कल्याणकारी राज्य आदि के संकट की चर्चाएँ होने लगी थीं। इस स्थिति को अमेरिका और यूरोप के बौद्धिकों ने उत्तर-आधुनिकता कहा, इसे फ़्रेडरिक जेमसन ने ‘प्रौढ़ पूंजीवाद का सांस्कृतिक तर्क’ कहा। अमेरिका और यूरोप में इसकी शुरुआत ५०वें और ६०वें दशक से मानी जाती है, पर इस स्थिति के प्रभावी होने का समय ८० और ९० का दशक है। भारत में ९० के दशक में इस स्थिति के साथ ही उत्तर-उपनिवेश, अस्मितावाद-समुदायवाद, निम्न-वर्गीय इतिहास आदि धारनाएँ भी प्रचलित होने लगी थी। हिन्दी का साहित्यिक इन संकटों और धारणाओं के मध्य लिख रहा था।

भारत में इन संकटों का समाधान दक्षिणपंथी जीवन-मूल्यों के हावी होने के साथ हुआ। भारत पूंजीवादी विकास की नई मंज़िल पर पहुँच गया। परसाई इंटरनेट-मोबाइल का ज़माना नहीं देख सके, लेकिन टेलीविज़न, मीडिया आदि के बढ़ते प्रभाव को वे देख पा रहे थे। उन्होने लिखा, ‘टेलीविज़न का निजी यथार्थ होता है’। आज हम ‘ब्लू-व्हेल’ जैसे खेलों से परिचित हैं। आभासी दुनिया और वास्तविक दुनिया में अंतर समाप्त होता जा रहा है। कृत्रिम बुद्धि, क्लोन और रोबोट समाज को एक नई मंज़िल पर ले जाने के लिए खड़े हैं। परसाई तकनीकी विकास के विरोधी नहीं हैं। उन्हें टेलीविज़न से शिकायत है, क्यूंकी कोलाहल बढ़ता है। हमें मीडिया से शिकायत है, क्यूंकी वह झूठ और अफ़वाह का कारोबार करती है। दक्षिणपंथ के पौधे के लिए झूठ और अफ़वाह खाद और पानी की तरह है।

सोवियत समाजवाद के बिखरने के साथ ही संकटों का यह नया दौर शुरू होता है। साहित्य और साहित्यिकों के लिए इन स्थितियों ने नए संकट पैदा किए। आज साहित्य का मूल्य और साहित्यिक की प्रतिबद्धता प्रकाशन-व्यापार पर आश्रित है, न कि जनता की पसंद-नापसंद पर। कला के अन्य क्षेत्रों में भी यही स्थिति देखी जा सकती है। परसाई जैसे लेखक जो जनता के भरोसे लिखते थे, लगातार कम होते चले गए। जैसे परसाई के साथ हिन्दी का व्यंग्य-लेखन शुरू हुआ, वैसे ही परसाई के साथ ख़तम भी हो गया। हिन्दी में व्यंग्यकार कम ही हुए। हास्य-व्यंग्य को प्रायः निचले दर्जे की रचना माना जाता है। आमतौर पर गंभीर आलोचक ऐसी रचनाओं की उपेक्षा करते हैं। वास्तव में हास्य-व्यंग्य साहित्य की सर्वाधिक कठिन विधा है। यही कारण है कि हिन्दी में ही नहीं, दुनिया भर में हास्य-व्यंग्य की रचना कम ही हुई है। शास्त्रीय साहित्य गंभीरता की माँग करता है, वह उदात्त को साहित्य मानता है। लोकप्रिय साहित्य इस क्षेत्र में आगे है। विकृति या भोंडापन वहाँ हो सकता है, लेकिन हँसने की क्षमता को बचाए रखने की कोशिश वहीं दिखाई देती है।

शिक्षा और आनंद का संतुलन साहित्य का चरित्र है। वास्तव में, परसाई की इन रचनाओं का समाज और आज का समाज भी शिक्षात्मक मनोरंजन के अभाव से ग्रसित है। अनिश्चित भविष्य और मानसिक-विकृतियाँ गूँथी हुई हैं। हास्य-व्यंग्य का अभाव समाज की बीमारी का लक्षण है। हिन्दी का साहित्यिक समाज भी बीमार है। वह भी लोकतन्त्र और विज्ञान का शत्रु है।

कुछ दिनों पहले त्रिपुरा में लेनिन की मूर्ति गिराए जाने के साथ ही भारत में भी लेनिनवाद का संकट और तीखे रूप में सामने आ गया। वास्तव में ८० और ९० के दशक के साहित्य का मुख्य संकट भी लेनिनवाद ही था। दुख की बात यह है कि लेनिनवाद के समर्थक भी नई स्थितियों में लेनिनवाद को देखने से भय खाते हैं। वे संकट को बनाए रखना चाहते हैं। हरीशंकर परसाई इस समस्या का हल ‘अध्यात्म’, ‘धर्म’, ‘मानवता’, ‘आत्मा’ आदि की वामपंथी पुनःव्याख्या करने में समझते हैं। लेनिनवाद का संकट उनके सामने स्पष्ट नहीं था। यद्यपि भारत के वामपंथी-आंदोलन में यह संकट ६० के दशक में ही स्पष्ट हो गया था।

सोवियत रूस में धार्मिक-पुनरुत्थान ने उनके मन में संशय पैदा कर दिया था, भारत में हिंसात्मक-धर्मवाद की स्थापना होते वे देख रहे थे। ऐसी स्थिति में उनका मुख्य ध्यान धर्म में उपस्थित मानवता की ओर जाना अचरज की बात नहीं थी। यूँ भी उग्र-वामपंथ के समर्थक वे कभी नहीं रहे थे। लेकिन इस संग्रह में उनकी उग्रता भी देखने योग्य है। उनका संशय और उग्रता से ग्रसित मस्तिष्क व्यंग्य के माध्यम से अपनी ही स्थिति पर रोता है। त्रासदी व्यंग्यात्मक होती है और व्यंग्य भी कभी त्रासदी बन जाता है। ‘आवारा भीड़ के ख़तरे’ भारत में लोकतन्त्र और समाजवाद की त्रासदी है, पर व्यंग्य का भेस धारण किए हुए।

इस संग्रह को आज पढ़ते हुए लगता है कि लेनिनवाद के संकट का समाधान किए बिना आज के वामपंथी-साहित्यिक की मुक्ति भी संभव नहीं। लेनिनवाद का संकट ऊपर बताए संकटों से स्वतंत्र नहीं है। उपभोक्तावाद, उत्तर-आधुनिकतावाद, अस्मितावाद, समुदायवाद, फासीवाद, लोकतन्त्र और समाजवाद इन सभी से लेनिनवाद जुड़ा हुआ है।

साहित्य के इस लेनिनवादी संकट का समाधान दक्षिण-अमेरिका के कुछ साहित्यिकों ने प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। आज हिन्दी के साहित्यिकों के बीच भी इन नए समाधानों पर चर्चा है। दक्षिण-अमेरिकी साहित्यिकों का अनुवाद हो रहा है। उन्हें पसंद किया जा रहा है। एक नई दुनिया और नए मनुष्य के निर्माण के लिए प्रतिबद्ध दक्षिण-अमेरिका के साहित्यिक हिन्दी-साहित्यिकों के लिए भी आदर्श बन रहे हैं। गरीब और पिछड़े देशों के इन साहित्यकारों ने हिन्दी-साहित्यिकों के सामने नए सिद्धान्त और जीवन जीने का ढंग प्रस्तुत किया है। परसाई की मृत्यु होने तक हिन्दी के साहित्यिक के लिए विकल्प का यह पक्ष इतना स्पष्ट नहीं था। परसाई के संशय और साधारण समाधान सुझाने से भी पता चलता है कि सोवियत समाजवाद कितने लंबे समय तक भारत की वामपंथी धारा पर हावी रहा था। पूंजीवाद-विरोधी सामाजिक-शक्तियों की पहचान, संगठन के नए तरीके, मीडिया का अपने पक्ष में इस्तेमाल, राजनीति के निर्णयों में जन-भागीदारी की उपेक्षा ने भारत में वामपंथी धारा को पुनः मज़बूत होने से रोका हुआ है। दक्षिण-अमेरिकी साहित्यिकों ने स्थानीयता के महत्त्व को, साम्राज्यवाद-विरोध को कभी कमज़ोर नहीं होने दिया। हिन्दी का साहित्यिक इस मामले में कमज़ोर निकला। हिन्दी-साहित्यिक की यूरोप-केन्द्रित मानसिकता आज भी उसे नए को अपनाने से रोके हुए है। भारत के वामपंथियों को रूस और चीन की क्रांति और प्रतिक्रांति से सबक लेना चाहिए, साथ ही दक्षिण-अमेरिका या अफ्रीका या अन्य किसी भी जगह के आंदोलनों और क्रांतियों को अपने विशेष संदर्भ में जाँच-परख कर ही व्याख्या करनी चाहिए, और आवश्यकता होने पर अपनाने से भी नहीं हिचकना चाहिए, वर्ना लेनिनवाद का संकट बना रहेगा। लेनिन स्वयं क्रांति करने का कोई फॉर्मूला नहीं बताते। उनके लेखन में रूस की विशेष स्थिति सर्वत्र दिखाई देती है। मार्क्सवाद के सामान्य क्रांतिकारी सिद्धांतों को वे रूस में सामाजिक परिवर्तन के लिए उपयोगी बनाते हैं। भारत के वामपंथी प्रायः इस संघर्ष में नहीं पड़ना चाहते। मार्क्स, लेनिन, माओ, चे, शावेज़ – वे अपनी हार का ठीकरा दूसरे के सर फोड़ना चाहते हैं। वामपंथी नेतृत्व विश्लेषण करने और योजना बनाने में असमर्थ है। उन्हें फॉर्मूला चाहिए। और इसी कारण वामपंथी संगठन क्षीण से क्षीणतर होते जा रहे हैं। परसाई ने जिस संकट को पाठकों के सामने रखा था, हिन्दी-साहित्यिकों के लिए वह संकट आज भी बना हुआ है।

ऐसे में यह लगता है कि सभ्यता का यह संकट अभी दशकों बने रहना है। आवारा भीड़ के ख़तरों के मध्य जीने और मरने के लिए तैयार रहना है। यह संकट कब ख़त्म होगा नहीं कहा जा सकता। परसाई ने भी शुभ-कामना की है, भविष्यवाणी नहीं। वे वास्तविकता को सामने रखना अपना कर्तव्य समझते हैं, लेकिन संकट का कोई बना-बनाया समाधान नहीं है, इसे भी वे जानते हैं। परसाई के इन लेखों के बाद से आज तक विश्व में कई बड़े आर्थिक और राजनैतिक बदलाव हो चुके हैं। इन लेखों में वे जिस भविष्य की आशंका से चिन्तित दिखाई देते हैं, वह भविष्य आज वर्तमान है। निश्चित ही, हर संकट समाप्त होता है। पूंजीवाद-साम्राज्यवाद का विनाश ही इस संकट का अंत करेगा। हिन्दी-साहित्य की भूमिका भी नई दुनिया में नए मनुष्य द्वारा फिर से लिखी जाएगी।

 

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उस्मान ख़ान समकालीन हिंदी साहित्य के अलहदा युवा कवि-कथाकार हैंचर्चाओं और पुरस्कारों की भीड़ से अलहदा… छपाऊ मानसिकता से भी अलहदा... जे.एन.यूके हिंदी विभाग से मालवा के लोकसाहित्य पर पीएचडीइनसे usmanjnu@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

निमित्त: उस्मान ख़ान

एक भविष्य-दृष्टि के साथ देखें या मौजूदा वक्त की निगाह से देखें या बहुत दूर नहीं गए व्यतीत के साये में देखें… कैसे भी देखें यह कहते हुए अफसोस होता है कि हिंदी कहानी बहुत देर से खुद को संदेहास्पद बनाने के आयोजन में मुब्तिला है। कहानी एक सुंदर विधा है और अगर उसे एक स्त्री मानें तब यह कह सकते हैं कि वह इन दिनों अपने रचयिता की जबरदस्ती से आजिज है। यहां मौजूद कवि उस्मान खान का गद्य इस औरत को उसकी आजिजी से आजाद कराने की एक इंकलाबी कोशिश है। गद्य इसे यूं कहा जा रहा है क्योंकि कहानी के मानकों पर यह कहानी पूरी नहीं उतरती। इसकी जिंदगी इसके उन्वान को सही नहीं ठहराती। ‘निमित्त’ का मतलब शब्दकोशों में ‘कारण’, ‘लक्ष्य’, ‘मकसद’ वगैरह बतलाया गया है। इस गद्य में जो घट रहा है, उसका निमित्त जाहिर तौर पर इस गद्य में नहीं मिलेगा। यहां गद्यकार के पास वक्त बहुत कम है और घटनाएं बहुत ज्यादा। जैसे एक छोटे से सफर में कोई हमसफर जब पूरी जिंदगी का सफर जानना चाहता है, तब बयान करने वाली कोशिश ‘क्या घटनाएं हुईं’ यह बताने की होती है, यह बताने की नहीं कि ‘घटनाएं क्यों हुईं’। इस प्रक्रिया में वाग्जाल और विस्तार कम होता है। सुनने वाला इसे संदेह से नहीं देखता, उसे सोचने का रोजगार मिल चुका होता है। संदेहास्पद कहानियों के दौर में ‘निमित्त’ एक ऐसी ही कहानी है— सोचने का रोजगार सौंपती हुई। इसने वह शिल्प नहीं चुना है जो मानकों को पूरा करने के लिए अपनी असलियत से अलग हो जाता है। यह कहानी उन कहानियों की तरह नहीं है, एक पैराग्राफ तक चलकर पढ़ने वाले जिनकी उंगली छोड़ देते हैं। #अविनाश मिश्र 

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Snap Shot from Titas Ekti Nodir Naam (1973)


निमित्त

 By उस्मान ख़ान

‘जी नहीं, आपके कहने से मैं इश्वर या धर्म पर विश्वास नहीं कर सकता! आपका ख़ुदा कैसा जीव है! न सुनता है, न देखता है, न बोलता है। उसे कुछ महसूस नहीं होता। वह खुश नहीं होता, नाराज़ नहीं होता। न्याय-अन्याय से उसे कुछ लेना-देना नहीं। फ़िर भी आपने अपनी ख़ुशी के लिए एक कल्पना-लोक बनाया है, जिसमें आप जो चाहें, हो सकता है। आपको अपनी कमज़ोरियों और कमअक़्ली को छुपाने के लिए एक खोल चाहिए, आपने अपने बाहर एक शक्ति को मान लिया, जो आपकी कमज़ोरी और कमअक़्ली को दूर कर सकती है, आप उसकी शरण में जाते हैं, उससे गुहार करते हैं, उसकी मनुहार करते हैं, वह नहीं सुनता, नहीं ही सुनता। वह हो तो सुने!’

इतना सुनने की देर थी कि बाबा ने मुझे धक्का मारकर घर से बाहर किया। ‘बदतमीज़! हरामख़ोर! भगवान को गाली देता है!’। मैं भी चुपचाप निकल गया। बाबा खुद भी जानता है कि उसने रो-रोकर, गिड़गिड़ाकर भगवान से अपनी पहली बीबी की जान की भीख माँगी थी, और भगवान ने उसकी अनसुनी कर दी थी। बाबा जब भी पहली माँ की बात करता है, भगवान को एक-दो गाली ज़रूर देता है। लेकिन मैं कैसे गाली दे सकता हूँ? भगवान का ठेका तो बाबा का है। बाबा भी ढकोसलेबाज़ है।

मुँह-अँधेरे मैं घर की दीवार से चिपककर सिर झुकाए ऐसे गली पार करता हूँ जैसे कोई उल्का-पिण्ड। तुरंत। मेरे पैर इतनी तेज़ी से उठते हैं जैसे रेल चल रही हो। मैं पूरी कोशिश करता हूँ कि घर में किसी के भी जागने से पहले घर से निकल जाऊँ। पहली बार जब आई ने दरवाज़ा खुला देखा था, तो क्या सोचा होगा! उसने मुझे कुछ कहा नहीं। मुझे पता है, मेरे बाद वही जागती है और सबसे पहला काम दरवाज़ा बंद करने का करती है। रात को भी वह दरवाज़ा अटकाकर सोती है, मैं जब चाहूँ घर आ सकता हूँ!

घर में सब लोग इस बारे में जानते हैं। कोई कुछ कहता नहीं। सबने मेरे इस रूप को स्वीकार कर लिया है। पहले-पहल बाबा कुछ कहते थे, बाद में उन्हें भी कोई फर्क नहीं रह गया। बाबा कभी-कभी मुझे परेशान करने के लिए दरवाज़ा बंद कर देते हैं, मैं भी दरवाज़ा नहीं बजाता। चुपचाप लौट जाता हूँ।

लौट जाता हूँ! कहाँ लौट जाता हूँ? कहीं भी! घर मेरे लिए मजबूरी है, जैसे सोना। मुझे नींद आने लगती है, तो मैं घर आ जाता हूँ। सोता हूँ और फिर निकल जाता हूँ। कहाँ? कहीं भी!

असल में, घर मेरे लिए एक सराय का काम देता है। जश्न हमारे घर में वैसे भी नहीं मनाया जाता और कभी कुछ हँसी-खुशी का मौका होता है, तो मैं अपनी तथाकथित मनहूस सूरत नहीं दिखाता। त्यौहारों पर भी यही स्थिति होती है। सब मुझे भूल गए हैं, ऐसा भी नहीं। पर कोई मुझे याद करना चाहता है, ऐसा भी नहीं। मैं उन्हें कुछ दे नहीं पाया। यानी अपने परिवार को। आई हैं, बाबा है, भैया है, भाभी हैं और उनसे जुड़े तमाम रिश्तेदार हैं। रिश्तेदार अक्सर आते-रहते हैं और अक्सर ही मैं इधर-उधर भटकता अपनी नींद को बहलाता रहता हूँ। भैया की स्थिति भी ऐसी ही है, वह भी घर से भागा फिरता है, जबकि वह कमाता है और कमाना अपने-आप में एक जादू है, जो लोगों को आपकी ओर आकर्षित करता है, आप जितना कमाते हैं, लोग उतना ही आपकी तरफ खींचते चले आते हैं और जहाँ आपने कमाना बंद किया लोगों को आपसे चिढ़ होने लगती है, आई भी जली-कटी सुना देती है, फिर और किसी का क्या कहूँ। हालाँकि मैं भिड़ जाता हूँ, ख़ासतौर पर रिश्तेदारों के साथ, उनसे मुझे और भी कुछ लेना-देना नहीं रहता। मैं उन्हें खरी-खोटी सुनाता हूँ। उनके मुँह पर उनके काले धंधे और धुर्तताओं की बात करता हूँ। वे मुझसे ख़ार खाते हैं। मैं उनसे मज़ा पाता हूँ।

आप सोच रहे होंगे मैं कोई काम क्यों नहीं करता। दरअसल, मैं कोई काम करना नहीं चाहता। काम करने से क्या होता है? काम करने से आज तक किसी को कोई फायदा हुआ है! कुल मिलाकर रुपया कमाने के अलावा काम करने का कोई और मकसद मुझे नज़र नहीं आता। और मैं रुपया कमाना नहीं चाहता। जी नहीं! ऐसा नहीं कि मैं निठल्ला हूँ। मैं पूरा दिन और कभी-कभी पूरी रात भी घुमता रहता हूँ। इस गली से उस गली, इस मुहल्ले से उस मुहल्ले, इस चौक से उस चौक। मैं दिन-भर चलता रहता हूँ। इस शहर का एक-एक हिस्सा मैं माप चुका हूँ। अब यह तो कोई काम नहीं है, और इस काम का कोई रुपया भी नहीं देता। और अगर देता भी, तो मैं लेता नहीं।

फिर आप कहेंगे मैं खाता-पीता कहाँ से हूँ? मैं कुछ छोटे-मोटे काम करता हूँ। फ्री-लांसिंग समझिए! तब भी मुझे घर से लगाव है। पता नहीं मेरा मन यहाँ अटका रहता है। सोने को तो मैं कहीं भी सो सकता हूँ। पर कहीं भी सोने पर बाबा घर ले आते हैं। कभी मुझे समझ नहीं आता कि ये लोग मुझसे चाहते क्या हैं? रुपया! बस यही एक चीज! क्या रुपये के बाहर आदमी का कोई काम नहीं! भैया बोलता है कि मैं अव्यवहारिक हूँ। मैं ध्यान नहीं रखता किसके सामने क्या बोलना चाहिए। मैं मूढ़मगज हूँ। ऐसा भैया का कहना है। मेरा मानना है वह एक हाफ-फ्राई ऑमलेट है, जिसे वास्कोडिगामा ने बनाया था और अब फफूँदा चुका है। वह इन्सान नहीं है। रुपये का भक्त है। एक-एक रुपये का नफ़ा-नुकसान जोड़ता रहता है। उसने अपनी एक दुकान डाल ली है। उसी पर ऐंठता है। और कुछ नहीं। बाबा जानता है कि भैया मकान के चक्कर में उसकी देख-रेख कर रहा है। अगर आज वो मकान भैया के नाम करा दे, तो भैया कल ही उसे घर से निकाल दे। या कम से कम ऊपरवाली कोठरी में डाल दे, जिसमें अभी मैं डला हुआ हूँ!

बाबा मुझे ठीकाने से लगाना चाहता है, लेकिन हार चुका है, एक वह समझ चुका है कि मुझे नहीं समझाया जा सकता। भाभी अब भी समझती है कि मुझे दुनियादारी के काम में लगा सकती है, पर मेरा ख़याल है वह ग़लत समझती है, बल्कि मेरा मानना है कि वह मुझे समझती ही नहीं। उसे मेरी शादी के अलावा कुछ नहीं सूझता। उसे लगता है शादी ही मेरे मर्ज़ का ईलाज है। वैसे मेरा मर्ज़ है क्या?

मैंने कहा कि मैं रुपया नहीं कमाता, इधर-उधर घुमता रहता हूँ, कभी कोई काम मिल जाए तो कर लेता हूँ, वह भी मनमाफिक, मन नहीं हो तो कोई मुझसे काम नहीं करवा सकता, कोई कितना ही बड़ा तीसमारख़ाँ क्यों न हो, कितनी ही नौकरियाँ मैंने ऐसे ही गँवाई है। बाबा ने अब किसी से मेरी नौकरी के बारे में बात करना भी बंद कर दिया है। कभी-कभी अच्छा लगता है कि सभी लोगों ने मेरे इस रूप को स्वीकार कर लिया है।

खै़र! जब मैं सुबह दीवार से चिपककर तेज़कदम गली पार करता हूँ, तो मेरा मकसद सीधे बस-अड्डे की तरफ जाना होता है। बस-अड्डे पर भाई लोग खड़े रहते हैं। इनमें से अधिकतर लड़के अख़बार का इंतज़ार कर रहे होते हैं। अलग-अलग बसों में अख़बारों के बंडल रख दिए जाते हैं और फिर भाई लोग फ्री हो जाते हैं। वे सब मुझे जानते हैं। मैं कभी-कभी उनके साथ भी बैठता हूँ, ख़ासकर ठंड के वक़्त, जब वे लोग टायर जलाकर हाथ तापते हैं। ज़्यादातर लड़के कॉलेज में हैं, एक-दो अनपढ़ हैं और दो, जिन्हें मैं पहले जुड़वा भाई समझता था, पिछले पाँच साल से दसवीं पास करने की कोशिश कर रहे हैं। यही आठ-दस लड़कों का झूंड हर सुबह यहाँ पहुँचता है। ये लोग शोर-गुल मचाते हैं। बसों में सवारियाँ बैठाते हैं, सामान लादते हैं, ग़रज़ कि दिन-भर बस-अड्डे पर अपना टाईम काटते हैं और रुपया कमाते हैं। मुझे पढ़ा-लिखा और सीधा-सादा आदमी समझते हैं, सोचते हैं मुझे दुनिया की ज़्यादा ही फिक्र है। लेकिन जैसा कि उस दिन महेश कह रहा था, मैं कुछ नहीं कर सकता। सोचने से कुछ नहीं होता। शायद उस दिन वह किसी से नाराज़ होगा, और अपना गुस्सा मुझ पर निकाल रहा होगा। वर्ना वह ऐसा क्यों कहता!

मैं हर सुबह दो घंटे इसी बस-अड्डे पर बिताता हूँ। अब ये लोग मुझे हर रोज़ देखने के आदी हो गए हैं। जब शुरू में मैं यहाँ आता था, तो ये लोग मुझे हैरत और शक की नज़र से देखते थे। धीरे-धीरे मुझे जानने लगे, और मुझे अहानीकारक जानकर मेरी उपेक्षा करने लगे। मुझे उनकी उपेक्षा से कोई फर्क नहीं पड़ता।

बसों की आवाज़, लोगों के शोर-गुल के बीच यहाँ सुबह होती है। अलग-अलग दिशाओं में जाने वाले लोग इकट्ठा होने लगते हैं। कुछ लोग रोज़ के मुसाफ़िर हैं, उन्हें भी मैं पहचानता हूँ। फिर भी एक अनजानापन सबके चेहरे पर दिखाई देता है। वे लड़के भी मुझे नहीं जानते, दुकानवाले भी नहीं, मुसाफ़िर भी नहीं। वे सब असल में मुझे सनकी समझते हैं।

वैसे मैं मृदुभाषी हूँ। लेकिन मैं उनकी हाँ में हाँ नहीं मिला सकता। ख़ासतौर पर बुढ़ों में मैं यह बीमारी पाता हूँ। वे चाहते हैं कि मैं उनकी बातें सिर हिलाकर स्वीकार करता जाऊँ, लेकिन ये मुझसे नहीं होता। मैं कैसे काले को सफेद मान सकता हूँ, फिर चाहे कोई महात्मा ही यह बात मुझे क्यों न कहे! पर लोग जब अपने से ही जुदा हैं, तो फिर मुझसे कैसे मिलेंगे! हो ही सकता है, ऐसा मैं सोचता हूँ, क्योंकि कभी-कभी मुझे यह भी लगता है कि यह मेरी हताशा है, जो मुझे ऐसा सोचने पर मजबूर करती है, वर्ना ये लोग तो खुश हैं। अपना काम करते हैं, रुपया कमाते हैं, घर-परिवार देखते हैं, मान-सम्मान पाते हैं। इन्हें बेवजह दुःखी क्यों माना जाए!

हर रोज़ सूरज उस कचरे के ढेर के पीछे से उगता है। कुत्ते उस ढेर पर लोटते रहते हैं। सुअर चरने के लिए आते हैं। ढेर से कचरा निकालकर ठंड में लड़के जलाते हैं।

इस दीवार की टेक लगाए मैं हर रोज़ की योजना तैयार करता हूँ, यानी आज मुझे कहाँ जाना है? किधर घुमना है? मैं झूठ नहीं बोलूँगा, कभी-कभी अपनी धुन में मैं शहर से बाहर भी निकल जाता हूँ। आस-पास के देहातों में चक्कर मारता हूँ। मैंने चाय पी, पोहा खाया और त्रिवेणी की तरफ़ चल दिया। आज का दिन उधर ही गुज़ारने का विचार था। त्रिवेणी उस जगह का नाम क्यों है? मेरी जानकारी में इसीलिए कि कभी वहाँ तीन नालों का संगम होता था, पर समय के कचरे-गंदगी ने उन नालों में बहते प्रसाद जल को काला-बदबूदार बना दिया था और दो नालों पर बस्तियाँ बन चुकी थी। एक नाला बचता था, जो अब भी वहीं स्थिर है, काला-बदबूदार जल बहाता हुआ। पर तब जब ये नाले साफ़ पानी से भरे रहते थे कुछ जोगियों ने अपना मठ इनके किनारे बनाया। आज वह मठ बस्ती के बीच आ गया है। लेकिन मठ की बावड़ी बस्ती से थोड़ी दूर है। मठ के पास काफ़ी जगह है। जिसमें कुछ खेत हैं, दुकाने हैं और एक बाग़ीचा और एक बड़ी बावड़ी है। असल में, त्रिवेणी की तरफ जाने का मतलब इस बावड़ी की तरफ जाना ही है। गर्मियों में बावड़ी के आस-पास इतनी शीतलता रहती है कि सो जाने को मन करता है, पर पूजारी या कभी दुकानवाले आकर उठा देते हैं। और फिर उनसे कौन चिक-चिक करे! पर वे भी मुझे जानते हैं, और अक्सर टोकते नहीं, पर जानते हैं कि मेरी जेब में माताजी के दान-पात्र में डालने के लिए कुछ भी नहीं रहता है; बल्कि भोग वगैरह के वक़्त मैं अक्सर उपस्थित रहता हूँ। शायद इसीलिए उनके मन में मेरे लिए कुछ कलुष है! पर मैं वहाँ पहुँच ही गया।

अभी आठ ही बजे थे। एक माशूक-आशिक पहले ही बरगद के नीचे बैठे थे। मुझे देखकर थोड़ा संभल गए। किताब लेकर ऐसे देखने लगे, जैसे इतिहास या विज्ञान की सबसे गंभीर समस्या पर चिंतामग्न हों। मैंने उनकी उपेक्षा की, और आगे बढ़ गया। देखता क्या हूँ, दूसरे बरगद के नीचे एक और जोड़ा बैठा है। उफ़! इन तोता-मैनाओं ने हर दृश्य ख़राब कर रखा है। कभी-कभी सोचता हूँ नौजवानों की उस मुहिम से जुड़ जाऊँ, जिसमें ऐसे जोड़ों को देखते ही उनके घर फोन कर दिया जाता है, और हीर-राँझे की अच्छी-ख़ासी बेइज़्ज़ती की जाती है। पर, यह क्रूर आनंद मैं मन ही मन लेता रहा। मुझे इन लड़कियों में रुचि नहीं। इन लड़कियों में जान नहीं होती। ये अपने कहे पर टिकी भी नहीं रह सकतीं। मुझे तो लगता है, मौज-मस्ती के लिए ही ये लोग यहाँ आते हैं, या किसी भी ऐसी शांत जगह पर जाते हैं, जहाँ इनकी चहचहाहट कोई न सुने। फिल्मों ने इनके दिमाग़ का सत्यानाश कर दिया है। हर कोई अपने को फिल्मी नायिका या नायक समझता है। वैसे ही चलते-फिरते हैं। बैठते-उठते हैं। हँसते-रोते हैं। कपड़े पहनते हैं। गाने गाते हैं। इन्हें देश-समाज से कुछ लेना-देना नहीं है। एक-दूसरे को छूने-चूमने-भोगने के अलावा इनके पास कोई विषय नहीं है। टॉकिज के बच्चे!

मैं आगे बढ़ता गया। दूसरे के बाद तीसरा जोड़ा मिला। खै़र हुई चौथा जोड़ा नहीं मिला, फिर भी दो और बरगद छोड़कर मैं सातवें बरगद तक पहुँचा। यह बाग़ीचे का आख़री बरगद है। इसके बाद खेतों का सिलसिला शुरू हो जाता है। इस बरगद के बाद, कुछ जगह छोड़कर, जामून और अमरूद के पेड़ लगे हैं, और साथ में ही मिर्च, धनिया और बैंगन-टमाटर, पुदीना-जैसे पौधे-पत्ते लगे रहते हैं। बाग़ीचे का यह कोना ही मुझे सर्वाधिक पसंद है। इधर तक कोई नहीं आता। मैंने थोड़ी देर में तीनों जोड़ों की सुध लेने की सोची। समाज में बेहयाई मुझे पसंद नहीं। जो करना है विधि-विधान से करो। यह क्या कि आज इसका हाथ पकड़े घुम रहे हैं, कल उसका मुँह चूम रहे हैं! यह सब मुझे लफंगई लगती है। लड़का करे या लड़की। मैंने देखा तीनों यथावत् प्रेम-क्रीड़ा में संलग्न हैं। वे मुझे भूल चुके। एक लड़की की खीं-खीं मेरे तन-बदन में आग लगा गई। झुँझलाकर मैंने एक पत्थर उठाया, और पहले बरगद की ओर फेंका। मुझे अचानक इन लोगों पर गुस्सा आने लगा था। पत्थर सीधे लड़की के सिर पर लगा था। लड़की खून-झार हो गई। लड़का दौड़कर मेरी तरफ़ आने लगा। मैं शांत मूरत बनकर बैठा रहा। एक पल के लिए लड़का रुका, फिर पीछे दौड़कर गया। लड़की को देखने लगा। फिर दौड़कर मेरी तरफ़ आया। लड़की की चीख़ सुनकर बीचवाले दोनों जोड़े भाग गए थे। लड़का मेरे पास पहुँचा, ‘भैया, देखिए न दीदी को किसी ने पत्थर मार दिया है!’। मेरी जान में जान आई, मुझे समझ आया कि उसे मुझ पर नहीं किसी और पर शुब्हा है। मैं उसके साथ दौड़कर उस तरफ़ गया। देखा लड़की प्राण त्याग चुकी थी। उसकी सफ़ेद चुनरी लाल हो गई थी। एकबारगी मेरे शरीर में झुनझुनी दौड़ गई। मैंने बोला, ‘यह तो गई!’। लड़का वहाँ से भाग खड़ा हुआ। मैं चिल्लाता रहा, ‘अबे! कहाँ भाग रहा है? क्या कर दिया लड़की का?’ मैंने देखा अब वहाँ कोई नहीं था। मैंने लड़की का चेहरा ग़ौर से देखा। वह मेरी भाभी थी। अब मैं लड़के का चेहरा याद करने लगा, लेकिन मुझे याद नहीं आ रहा था।

मैं धीरे-धीरे उस जगह से दूर निकल गया। मन फिर शांत होने लगा। मुझे नहीं पता कि मैंने इतनी आसानी से यह फैसला कैसे ले लिया! मुझे अपनी आज की योजना में फेर-बदल करना पड़ा। मैं अब शहर के दूसरे कोने की ओर जाना चाहता था। लेकिन, शहर के अंदर से होकर नहीं। मैंने सोचा था कि एक बजे तक गंगानगर पहुँच जाऊँगा। वहीं कुछ खाऊँगा, और फिर शाम वहीं काटूँगा। गंगानगर शहर का बाहरी ईलाक़ा है। यह नगर अभी बस रहा है। जब सरकार ने ग़रीबों के लिए घर बनाने की सोची, तो शहर के बाहर इस कुड़ेदान को चुना। इसके आगे खेत शुरू हो जाते हैं और फिर उबड़-खाबड़ ज़मीन जो जंगल में बदलती जाती है। गंगानगर भी एक बस-अड्डा है। यह एक छोटा बस-अड्डा है। यहाँ से गाँवों की तरफ़ जाने वाली बसें मिलती हैं। बस-अड्डे से थोड़ी दूर सड़क के किनारे एक दुकान है, जहाँ दिन में आपको खाना मिल सकता है। मैं खाना खाकर झरने तक घूमने भी जाऊँगा, और अगर मन हुआ, तो नहा भी लूँगा।

दुकान तक पहुँचते हुए एक बार मेरे पैर लड़खड़ाए, जैसे मुझे चक्कर आ गया हो। मैंने खुद को संभाला और दुकान के बाहर लगी बेंच पर बैठ गया। दुकानवाला मेरा मुँह ताक रहा था। फिर मेरी ओर देखकर मुस्कुराने लगा। मैंने एक दर्दभरी मुस्कान दी। वह मेरे पास आकर बोला, ‘क्या हुआ?’

मैंने कहा, ‘चक्कर आ गया!’ वह फिर मुस्कुराने लगा। ‘अभी तो गर्मी शुरू भी नहीं हुई, अभी से चक्कर खाकर गिरने लग गए!’ अब मैं मुस्कुराया। मैंने खाना खाया और एक लस्सी पी। जान में जान आई। पर, एक फाँस-सी गले में लग रही थी। बार-बार प्यास लग रही थी। आखिर मैं उठकर झरने की तरफ चल दिया।

इस पगडंडी से मैं कई बार झरने की तरफ गया हूँ। मैं देख रहा था, आसमान एकदम साफ़ था। नील। कुछ एकदम सफ़ेद-झक बादलों के टुकड़े थे, जो इधर-उधर खिसक रहे थे, ऐसा लग रहा था जैसे नीले दवात पर रुई के फाहे इधर-उधर तैर रहे हों। अब इस पगडंडी पर मैं अकेला चला जा रहा हूँ। धीरे-धीरे शहर की सब निशानियाँ गुम होती जा रही हैं। तालखेड़ी आ गया। गाँव के किनारे होते हुए मैं आगे बढ़ता जा रहा हूँ। देखता हूँ, पगडंडी पर कुछ लोग अर्थी लिए जा रहे हैं। मैं धीरे चलने लगता हूँ, ताकि उन लोगों से एक निश्चित दूरी बनाए रख सकूँ। पर, कदम अपनी गति पकड़ लेते हैं। मैं उनके करीब पहुँच गया हूँ। उलझन में हूँ, उन लोगों से आगे निकलना ठीक नहीं जान पड़ रहा, पता नहीं क्या सोचने लगें! कहीं कोई झगड़ा न करने लगे! आखिर, मैं उनके पीछे-पीछे चलने लगा। एक-दो लोगों ने मुझे पलटकर देखा, और फिर अपनी गति से चलने लगे। कुछ देर में वे लोग पगडंडी छोड़कर खेत के रास्ते आगे बढ़ गए। मैं झरने की तरफ बढ़ने लगा। झरने के पास जाकर बैठ गया।

शाम हो चुकी थी। दूर-दूर तक पंछियों के झुंड दिखाई दे रहे थे। झरने के पास कुछ पक्षी-दल उतरते, और दाना-पानी करके आगे बढ़ जाते। कुछ ही मिनटों में वह जगह पंछियों के कलरव से भर गई। झरने की आवाज़ पंछियों के शोर-गुल में दब गई। इन पंछियों को मेरे आस-पास भटकने से डर नहीं लग रहा था। मैं मूर्ति की तरह अचल बैठा था। मेरे कंधे, सिर, गोद सब पर पंछी बैठे थे। मैं आँखें बंदकर उनके नाखुनों और चोंच के वार सह रहा था। मुझे इस काम में अद्भूत आनंद मिल रहा था। जैसे, शरीर और दिमाग़ दोनों एक साथ हलके होते जा रहे थे। जीवन का कौन-सा सुकून था, जो इस रास्ते मिलना था! मेरा मन शांति से सराबोर था। इस तरह ताज़ा महसूस हो रहा था, जैसे शरीर श्मशान का धूँआ खाने के बाद नहाने पर करता है। मेरा रोम-रोम धूल रहा था कि एक आदमी ने हाँका लगाया। वह दौड़कर मेरे पास आ गया। मैंने चौंककर उसे देखा। वह हाँफ रहा था। अचरज से मेरी ओर देखते हुए बोला, ‘क्या हो रहा है?’

मैंने पहले अपनी तरफ़ देखा, मेरे शरीर पर जगह-जगह घाव हो गए थे, पर मुझे दर्द नहीं हो रहा था। मेरा शरीर जैसे सुन्न था। दिमाग़ भी कुछ ग्रहण नहीं कर रहा था। मैं उस आदमी को देखता रहा। उसके पीछे नीला आकाश था। मुझे चक्कर-सा आने लगा।

जब जागा तो देखता हूँ, अपने घर में हूँ, मेरी झाड़-फूँक हो रही है। मेरे शरीर के घाव कसक रहे हैं। मैं आई को आवाज़ देता हूँ। आई मेरे पास आकर बैठ जाती है। मेरी नज़र भाभी की माला चढ़ी तस्वीर पर पड़ती है। मैं रोने लगता हूँ। आई मेरे सिर पर हाथ रखती है, और कहती है, ‘सब ठीक हो जाएगा!’ लेकिन मेरी आँखों से आँसू बहे जा रहे हैं, और मैं लगातार कहे जा रहा हूँ, ‘मैं अब रुपया कमाऊँगा!’। एक साधू मेरे पास आकर खड़ा हो जाता है। मैं अपनी बात दोहराए जा रहा हूँ। वह मेरे सिर पर भभूत मलता है। मुझे पसीना आने लगता है। मैं अपनी बात दोहराए जा रहा हूँ। बाबा मेरे पास आकर खड़ा होता है। थोड़ी देर मुझे देखता रहता है, फिर एक ज़ोरदार तमाचा जमाता है, और मैं चुप हो जाता हूँ, उसका मुँह देखने लगता हूँ।

वह एक ऐसा दिन था, जिसने मेरी ज़िन्दगी बदल दी। मैंने भैया के सामने भाभी के साथ हुई दुर्घटना पर दुःख जताया, और अपनी सफ़ाई में यही कहा कि मुझे पता ही नहीं! किसी आवाज़ के पीछे-पीछे मैं झरने तक चला गया था! और, फिर आगे क्या हुआ, मुझे पता नहीं! बात यही थी कि तालखेड़ी का ही कोई आदमी मुझे झरने के पास से उठाकर लाया था, बाद में, गंगानगरवाले दुकानदार से बात करके पता चला कि उसने ही मेरे मामा को सूचित किया था। वह मेरे मामा का पुराना दोस्त है। फिर, मैं एक दिन अस्पताल में भी बेहोश रहा। घर पर भी एक-दो दिन बदहवासी की हालत में रहा।

धीरे-धीरे मेरे घाव भर गए। कई बार सोचा कि भैया या आई को बता दूँ कि भाभी को पत्थर मैंने ही मारा था। पर इससे बात उलझ जाएगी। वे लोग समझ नहीं पाएँगे, और मैं भी समझा नहीं पाऊँगा। अब मैं बस-अड्डे या त्रिवेणी या गंगानगर या शहर-सराय की तरफ नहीं जाता। इधर-उधर भटकना भी मैंने बंद कर दिया है। मन में एक कचोट रहती है, पर कोई तरीका नहीं सूझता, क्या करूँ? जो मैंने किया है, उसका कोई दोष अपने ऊपर नहीं मानता। आखिर, मैंने जान-बूझकर कुछ नहीं किया। मुझे क्या पता था कि पत्थर सीधा जाकर उसको लगेगा! और, वह मेरी भाभी होगी, और, वह भी इतनी कमज़ोर कि एक पत्थर की चोंट भी नहीं झेल पाएगी! भैया दूसरी शादी के लिए गोटी सेट कर रहे हैं। उनकी एक मुहब्बत थी। पिछले ही साल उसके भी पति का देहावसान हो गया। वह भी गली में ही रहती है। आई ने उसकी मौसी से बात की है। हो सकता है, अगले साल मेरे पास फिर से भाभी हो! आई मेरी भी शादी कराना चाहती है। मैंने भी इनकार नहीं किया। जिन रिश्तेदारों को मैं गाली दिया करता था, उनके साथ भी अब तमीज़ से पेश आता हूँ। भगवान को उलटा-सीधा बकना भी मैंने बंद कर दिया है। सब्ज़ी-मंडी में हिसाब देखने का काम पकड़ा है। काम अच्छा है। सुबह-सबेरे सब्ज़ी-मंडी पहुँच जाता हूँ, दिन-भर वहीं फलों और सब्ज़ियों की गंध में कटता है। शाम को सीधे घर पहुँचता हूँ। टी.वी. देखता हूँ। कभी चौक तक घुम आता हूँ। फिर सो जाता हूँ।

भाभी मेरी शादी करवाना चाहती थी। अगर ज़िंदा रहती, तो कितनी खुश होती कि मैं काम-धंधे से लग गया हूँ, और लड़की देखने के लिए उत्सुक हूँ। पर कौन जाने, तब ऐसा होता भी!

आखिर वह दिन भी आया, मेरी शादी हो गई। मैंने जब करुणा का घूँघट उठाया, मेरा दिल धक् करके रह गया। एकबारगी लगा, भाभी है। मैंने खट् से घूँघट छोड़ दिया। दूसरी बार घूँघट उठाने की मेरी हिम्मत नहीं हुई। आखिर करुणा ने ही घूँघट उठा दिया। मैं उसका चेहरा देखकर फुला नहीं समाया। मेरा वहम था, और कुछ नहीं। मैंने करुणा के कंधों को चूमा।

मेरी शादी हो गई थी, पर मैं करुणा से एक दूरी बनाए रहता था। उसके साथ अकेले रहने में मुझे शंकाएँ घेरने लगती थी। वह मेरे अतीत के बारे में कुछ नहीं जानती! मैंने कहाँ-कहाँ खाक छानी है? कैसे-कैसे पापड़ बेले हैं? वह कुछ नहीं जानती! वह मुझसे कुछ जानना भी नहीं चाहती। वह अपने में खुश है। बस उसे एक बच्चा चाहिए, फिर वह और खुश हो जाएगी। मुझे लगता है, उसकी ज़िंदगी में बस खुश होना ही लिखा है। वह हमेशा प्रसन्नचित्त रहती है। मैं भी उसे देखकर खुश होता हूँ। वह चपल है। चंचल है। जीवन से भरी हुई है। फिर भी, कभी-कभी मुझे डरा देती है। रात को जब वह पानी पीने उठती है, मैं उस पर नज़र रखता हूँ। अगर वह गु़सलख़ाने में जाए और ज़्यादा देर लगाए, मुझे आतुरता होने लगती है कि वह क्या कर रही है?

मेरी शंका ठोस होने लगी जब एक दिन मैंने करुणा को कमरे में अकेले कुछ बुदबुदाते सुना। मैं ऐसी बुदबुद अक्सर सुनता रहता था, पर पहली बार मैंने साफ़-साफ़ सुना। यह करुणा की ही बुदबुदाहट थी। मैंने गुसलख़ाने के दरवाज़े पर कान टिका दिए। वह कुछ मंत्र-सा बुदबुदा रही थी। बीच-बीच में मेरा नाम ले रही थी। गुसलख़ाने से अगरबत्ती की गंध आ रही थी। उसकी बुदबुदाहट तेज़ हो रही थी। मेरे मुँह से आवाज़ नहीं निकल रही थी कि एक हल्की-सी आवाज़ निकली, ‘करुणा!’। अंदर से बुदबुद की आवाज़ बंद हो गई। मेरी साँस में साँस आई कि देखता हूँ करुणा बालकनी से झाडू़ निकालती हुई कमरे में खिसकती आ रही है। वह मेरी ओर देखकर हल्के-से मुस्कुराती है, और अपने काम में मगन हो जाती है। मैं गुसलख़ाने का दरवाज़ा खोलता हूँ, अंदर बाल्टी में बूँद-बूँद पानी चू रहा है। मेरा हलक़ सूख रहा था, मैं गु़सलख़ाने का नल कसके बंद कर रसोई की ओर चला गया। आई और भैया रसोई में बैठे भैया की शादी में लगने वाले सामान की लिस्ट तैयार कर रहे थे। मैंने पानी पीया और आई के घुटने पर सिर रख रोने लगा। आई बोली, ‘क्या हुआ?’। मैं कुछ कह न सका। रोना बंदकर चुपचाप आई की गोद में लेट गया।

मैं सोचता हूँ कि अब समय इस बोझ को बढ़ाता ही जाएगा। मैं कभी यह स्वीकार नहीं कर सकूँगा कि मैंने ही भाभी को मारा है, अनजाने में ही सही। उन दिनों की उदासी और खीझ याद करके अब भी मेरा मन भर आता है। पता नहीं, उन दिनों क्या धुन रहती थी। कहीं मन नहीं लगता था। और अब, मन बीच-बीच में बेवजह हड़बड़ाने लगता है। साँस फूलने लगती है।

भैया की शादी हो गई। मेरे और करुणा के पास एक लड़की है। पता नहीं क्यों, आई ने उसका नाम महिमा रख दिया है! महिमा भैया की पहली पत्नी का नाम था। मेरे जीवन में और एक शाश्वत दुःख इस नाम के साथ आ गया। मैं आई को समझा भी नहीं पाया कि क्यों यह नाम नहीं रखना चाहिए! उल्टा मैंने देखा, आई ने जब मुझसे पूछा कि इसका नाम महिमा रख दें, तो मैंने ऐसे सहर्ष स्वीकृति दी, जैसे मैं ख़ुद यही नाम रखने वाला था।

पर इन दो वर्षों ने मुझे पूरी तरह बदल दिया। मेरे बाल सफेद हो गए हैं। चेहरा झुलसा हुआ लगता है। शरीर के पुराने घाव फिर उभर आए हैं। क्या बीमारी है, कुछ पता नहीं चलता! शरीर से मवाद निकलता रहता है। दर्द होता है। हगन-मूतने से भी मोहताज हो गया हूँ। करुणा दिन-रात मेरी देख-भाल में लगी रहती है। महिमा से ज़्यादा बच्चा मैं हो गया हूँ। देखता हूँ, सबको मेरी फिक्र लगी रहती है। भैया जैसा रुपयों का दास, मेरे ईलाज पर अपना सबकुछ लुटा चुका है। पर, मेरा शरीर छीजता जा रहा है। घावों के आस-पास लगता है माँस खींचा रहा है, जैसे घाव का छेद और बढ़ने वाला है। तेज़ दर्द होता है। मैं चीखता रहता हूँ। महिमा का कमरा अलग कर दिया गया है। उसे आई के कमरे में सुला दिया जाता है। नई भाभी मुझसे घृणा-सी करती है। उसका चेहरा देखकर मुझे अपने जीवन से और निराशा हो जाती है। लगता है, मैं मर ही जाऊँगा!

अब सोचने की क्षमता भी जवाब दे रही है। मैं कुछ बुदबुदाता रहता हूँ। कोई समझ नहीं पाता। करुणा भी रुखी और उदास होती जा रही है। बात-बात पर भाभी से झगड़ पड़ती है। कभी मुझे एक-दो दिन आराम भी रहता है। पर, यह आराम शारीरिक होता है। घाव जैसे टीसना कम कर देते हैं। वह भी आखिर थक जाते हैं। लेकिन, दिमाग़ में ख़यालों का अंबार लग जाता है। करुणा का क्या होगा? महिमा का क्या होगा?

कभी एक लाल चुनरी हवा में लहराती दिखती है।

धीरे-धीरे मैं ख़तम हो रहा हूँ।

एक दिन करुणा महिमा का झूला मेरे पलंग के पास डालकर खाना बनाने रसोई चली गई। महिमा थोड़ी देर हँसती रही, फिर चुप हो गई। मैंने पलंग पर लेटे-लेटे ही महिमा को संबोधित कर अपनी बात शुरू की…मैं नहीं जानता, उस दिन मुझे क्या हुआ था। पर न जाने क्यों, मैं अब भी, खुद को गुनाहगार नहीं मान पाता हूँ! आख़िर, वह एक पल का बहाव था। होनी कौन जानता था?…आदमी किन-किन चीज़ों के वश में नहीं होता! वह सोचता कुछ है, कहता कुछ है, करता कुछ है, और, होता कुछ और है! किसका मनचाहा हुआ है दुनिया में!…हाँ, ठीक है, मैं सच्चे मन से मानता हूँ कि मैंने ही भाभी को मारा है। बस!…मुझे लगा मेरे मन से एक बोझ हट गया।

धीरे-धीरे रात घिर आई। दो साल में मेरा हाल यह हो गया था कि अगर कोई मुझे पहली बार देखता, तो बाबा का भाई ही मानता। मेरे सारे बाल पक गए थे। दवाईयाँ खा-खाकर मुँह का स्वाद बिगड़ गया था। हमेशा थूकते रहने की इच्छा होती थी। धीरे-धीरे चारों ओर सन्नाटा पसर गया था। पूरा शहर इस वक़्त सो रहा है। नहीं, पूरा शहर कभी नहीं सोता! लेकिन, जितना सो रहा है, उतनों के सपने हैं, हाँ, ठीक है, सब लोग सपने भी नहीं देख रहे हैं, लेकिन आज रात जो लोग सपने देख रहे हैं, वे सब सुन लें, ‘मैंने ही अपनी भाभी की जान ली है!’।

हमेशा मैं ऐसा नहीं करता, पर आज मैंने दवाई नहीं ली। मैं चुपचाप लेटा था। कभी नींद का बगुला पलकों पर बैठ जाता था और कभी पंख फड़फड़ाकर उड़ जाता था। मेरी नींदे हराम थीं। इसीलिए मुझे दवाई खाकर सोना पड़ता था, पर कभी-कभी, मैं उसे टाल भी देता था। यानी, खिड़की से बाहर फेंक देता था। यह काम सफाई से करना होता था, वर्ना आई, करुणा सब लोग मुझे पचास बातें समझाने लगते, जिनसे मन और कमज़ोर हो जाता है। चाँदनी का एक टुकड़ा खिड़की से कमरे के अंदर गिरा हुआ था। मैं उसी को देख रहा था। करुणा वहीं लेटी थी। करुणा की देह अब भी आकर्षक है। आखिर वह 23 साल की है। कसी हुई। एक बच्चे की माँ होकर भी वह अभी ढिलमढल्ला नहीं हुई है। उसका हँसना कम हो गया है, लेकिन वह आनंद की मूर्ति है। उसे देखकर मन प्रफुल्ल हो जाता है। अचानक चाँदनी के टुकड़े पर एक साया दिखाई दिया। उसने करुणा को हल्के से हिलाया। करुणा जागी, हड़बड़ाई, और पलंग की ओर देखने लगी। मैंने एक पल के लिए आँखें बंद कर लीं, और फिर पलकों की कोर से देखने लगा। करुणा उठकर मेरे पास आई। दो पल मुझे देखा, और फिर मुझे हल्के से हिलाया। मैं ऐसे पड़ा रहा, जैसे बेहोश हूँ। वह आदमी वहीं चाँदनी के टुकड़े पर लेटा हुआ था। करुणा भी उसके पास जाकर लेट गई। मैं उनकी काम-लीला देखता रहा। पता नहीं, मेरे मन को क्या सुख मिल रहा था! मेरी आत्मा तृप्त हो रही थी। मुझे लग रहा था, जैसे मेरे मन पर बरसों से रखा कोई बोझ हट रहा है। थोड़ी देर में देखा चाँदनी के टुकड़े पर अकेली करुणा रह गई थी। लेकिन अब, उसकी देह देखकर मुझे घिन आ रही थी। सारा आकर्षण मुलम्मे की तरह उतर रहा था। मेरे मन में ईर्ष्या पैदा हुई। बदले की भावना। अब मैं करुणा से बदला लेना चाहता था। आखिर उसने मुझे धोखा दिया है। भाभी भी तो धोखा दे रही थी, अनजाने ही उसे सज़ा मिल गई।

मैं अपने घावों के ठीक होने की दुआ करने लगा। मैं चुप था। करुणा मेरी रोज़ की तरह सेवा कर रही थी। जैसे कुछ हुआ ही नहीं। पर अब, उसके हर स्पर्श में मुझे अजीब झनझनाहट महसूस होती थी, जैसे उसका बदन कोई ग़लीज़ चीज़ हो। कभी-कभी मैं उसके हाथ से अपने को बचाने की कोशिश करता था। मुझे लगता है, करुणा को कुछ भान हुआ था। मैं भी सचेत रहने लगा।

धीरे-धीरे मैं ठीक होने लगा। बाल तो सफेद ही रहे, लेकिन घाव भर गए। करुणा का हँसता चेहरा धीरे-धीरे उदास होने लगा। अब उसके खाट पकड़ने की बारी थी। आई ने कहा, ‘तेरी सेवा ने ही उसे थका दिया है। अब तू उसकी तीमारदारी कर!’ मैंने भी उसकी सेवा का बीड़ा उठा लिया। उसे बुखार आ गया था। काम का बोझ तो उस पर बढ़ा ही था। महिमा को जन्म दिया, और फिर मेरी उपचार-व्यवस्था करती रही। फिर घर के काम-काज अलग! और फिर वह आदमी। मेरे मन ने ईर्ष्यामयी क्रूर अट्ठहास किया। वह भी तो मेहनत का काम है!

मुझे महिमा के अपनी बच्ची होने पर शक होना लाज़मी था। मैं दिन-भर उसके चेहरे से अपना और करुणा का चेहरा मिलाता रहता था। मुझे विश्वास हो गया कि वह मेरी लड़की नहीं है। महीनों बाद मैं बाज़ार गया। जब लौटकर आया तो रात गहरा चुकी थी। घर पर सब लोग सो गए थे। दरवाज़ा अटका हुआ था। मैं दरवाज़ा बंद करके अपने कमरे की ओर चल दिया। कमरे में चाँदनी का टुकड़ा वैसे ही पड़ा था। करुणा सो रही थी और महिमा भी। मैंने पास जाकर दोनों को ग़ौर से देखा। मेरे दिमाग़ में उस रात का दृश्य चलने लगा। धीरे-धीरे दिमाग़ पर एक धुन सवार हुई। मैं गुसलख़ाने में गया और वहाँ से कपड़े पीटने की मोगरी ले आया, और माँ-बेटी दोनों को दुनिया से पार कर दिया। मेरे मन में न हैरानी थी, न डर। मैं चाँदनी का टुकड़ा देख रहा था और दो साए।

इस बार भी मुझे सज़ा नहीं हुई। एक आदमी पकड़ा गया, जिसका नाम मनीष था। मैंने सोचा, मुझे अपना जुर्म क़बूल कर लेना चाहिए। पर मेरा मन फिर एक क्रूर अट्ठहास कर उठा। यह आदमी करुणा का प्रेमी था। मैं अपना काम करके कमरे से निकला, और कुछ देर में वो कमरे में घूसा। कमरे की हालत देखकर उसकी चीख़ निकल गई। सारे लोग दौड़े आए। देखा, तो वह आदमी था, और करुणा और महिमा की लाश थी। उसे पकड़कर पुलिस के हवाले कर दिया गया। उसने भी अपना जुर्म क़बूल कर लिया। तब मैंने सोचा, मैं क्यों दूसरे के फटे में पाँव डालूँ! आख़िर, यह सब उसीका किया-धरा था। अगर वह उस रात न आता, तो मैं एक-दो दिन में मर ही जाता। पर, उसी की मेहरबानी कि मैं ज़िंदा हूँ, और दो बच्चों का बाप हूँ। अब मुझे ईश्वर पर दृढ़ विश्वास है। ईश्वर-विरोधी मुझे फूटी आँख नहीं सुहाते। सोचता हूँ, अगर ईश्वर नहीं है, तो इतनी बड़ी दुनिया का नियंता कौन है? कोई शक्ति, कोई बल तो है, जो मुझसे परे है, जो मेरे माध्यम से अपना काम करता है। मेरी आत्मा भी तो उस परम-आत्मा का ही अंश है। मेरे मुँह से जो शब्द निकलते हैं, वह भी तो उस परमपिता के हैं। मेरे हाथों जो कुछ होता है, वही करवाता है। मैं तो निमित्त मात्र हूँ। कर्ता कोई और है! उसकी लीला अपरम्पार है। वह जैसा सोचता है, वैसा ही होता है। उसकी मर्ज़ी के बिना एक पत्ता भी हिलता हो, तो कोई मुझे बता दे! वह सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ है। मैं उसका दास हूँ। जो वह चाहता है, मुझसे करवाता है। मैं निर्बल हूँ। प्रार्थना के अलावा मैं कर ही क्या सकता हूँ!

हे परमपिता, परमेश्वर, परमात्मा! विकल-पीड़ित आत्माओं को शांति दे, शांति दे, शांति दे!!

usman khanउस्मान ख़ान समकालीन हिंदी साहित्य के अलहदा युवा कवि-कथाकार हैं. चर्चाओं और पुरस्कारों की भीड़ से अलहदा… छपाऊ मानसिकता से भी अलहदा... जे.एन.यू. के हिंदी विभाग से मालवा के लोकसाहित्य पर पीएचडी. इनसे usmanjnu@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

साभार- हंस, मई , 2016

बाकी प्रेम कविताएँ: उस्मान खान

By उस्मान खान

लाल धधकते लोहे के टुकड़े

तुम्हारी आंखें,

आंखों के नीचे हड्डी की टेढ़ी-उभरी लकीर। (नज़्र-ए-शमशेर)

Snap shot from'Would You Be Mine'

Snap shot from’Would You Be Mine’

बाकी प्रेम कविताएं

1.

वहां बारिश होती है

पुरानी लकड़ी की पाट भींगती है

उसकी दरारों से दीमक चूने लगते हैं

माथे पर खिड़की के लोहे की ठंडक महसूस करता हूं

भाप जैसे बूंद-बूंद कर टपक रही है दिमाग़ में

मैं आंखें बंद कर लंबी सांस खींचता हूं

जैसे सकल विस्तार को अपनी श्वास-नलिका में घूमता महसूस करता हूं

बिंदु-बिंदु प्रकाश छिटका है

प्रकाश वर्ष दूर एक-एक बिंदु

कोई मासूम नहीं होता

न तू थी, न मैं था

तू भूल भी गई शायद

या याद भी रहा तो क्या मुझे पता नहीं!

पर एक इच्छा है जागी हुई

कि एक दिन उस खिड़की के लोहे पर माथा रख

हम दोनों बारिश देखें!

मैं तुझे जिस उम्र में छोड़ आया था

असल में, वहीं से तुझे अपने साथ लाया था

जिस दिन बारिश हो रही थी

रसायनों की हल्की गंध के बीच

मैं खड़ा था अकेला अपने में

तुम मुस्कुराई

जैसे, आज कहूं, वसंतसेना!

इसीलिए चाहता था बहुत तुम्हें

कि बक़ौल बेदिल सच सच को ढूंढ़ता है।

जिस दिन बारिश हो रही थी

मैंने एक पल के लिए ब्रह्माण्ड को सुंदर रूप दिया

आत्मसात किया

जैसे एक ठोस वस्तु तरंग बन जाती है

देखते ही देखते विचार बदले कि बस!

एक पल के लिए मैं कितनी दूर बह चला

जैसे ये पल भी उस पल का विस्तार है

जिस दिन बारिश हो रही थी।

2.

मैं बहता जा रहा था

आगे, आगे, बहुत आगे

कि तुमने मुझे श्मशान की याद दिला दी

दोपहर वह मई की

वह झरबेरियों से उलझना

पर तुमने क्यों कहा कि मैं बदल गया हूं,

मुझसे बात भी नहीं की

मिली भी नहीं!

क्या मैं ऐसा बदल गया था

कि हम बात भी नहीं कर सकते थे।

शायद मैंने तुम्हारे मन में बसी

अपनी ही छवि तोड़ दी थी।

3.

तुम ही थी, जिसने मुझसे कहा,

किसी का मज़ाक उड़ाना नहीं अच्छा!

मैंने मन में बसा ली वो तरलता।

कोई कितना इंसान हो सकता!

और कौन सिखाता?

4.

मैं तुम्हें अपनी शक्ल देना चाहता था

तुम मुझे अपनी

समुद्र की लहरों को मैं बाहों में समेट लेना चाहता था

तुम किनारे-किनारे थोड़ी दूर जाना चाहती थी

नाव में ठहरे जल में

हमने देखा अपना बिम्ब

तुम अलग- मैं अलग- बहुत

दूसरी नाव में लेटा मैं

अलग हो गया अचानक

तुमसे – समुद्र से – सबसे

ये सबसे ध्वंसक पल था

मैं बाद में आत्मसात कर पाया

बहुत बाद में बात कर पाया

वह समुद्री खोह का कालापन

मांसल एकदम ठोस

मांस का लोथड़ा

समुद्र में गहरे-गहरे डूबते जाने जैसा

सुबह अचानक रात का नशा उतरा लगे जैसे

तूफ़ान में मिले हम, तूफ़ान में बिछड़े।

5.

उस रात मैं दुःखी था

दुःख से टूटा था

दुःख से भरा हुआ

वंचना का दाह

उपेक्षा की कड़ुआहट

क्रूरता का दर्शन

विश्वासघात का डर जैसे

मैं तुम्हारे सामने इतना बच्चा हो गया

कि खुद डर गया।

6.

जुनूं का एक पल वो अगर जिंदगी बदलता

मैं खींच लाता आज तक वो दोपहर, वो गली

तुम्हारी एड़ियों के ऊपर जो दूज का चांद रखा है

तुम्हारे कंधे के ठोसपन ने जो लरज़ मुझे दी है

लगता है आज भी उस गली में तुम्हारी एड़ियों पर

दूज का चांद रखा हो जैसे

मैंने एक घर चुन लिया था

एक जिंदगी

एक शहर चुन लिया था

एक नदी वहां बहती थी

रेल के पुल के नीचे

जहां हम शाम को घूमने जाया करते थे

मैं खूब मेहनत करता था

तुम खूब खुश होती थीं

तुम खूब मेहनत करती थीं

मैं खूब खुश होता था

वहां गाड़ियां तेज़ चलती थीं

शाम को बाज़ार में खाने-पीने की

तमाम तरह की चीज़ें मिलती थीं

वहीं एक गली में मैदान के पास

मैंने घर ले लिया था

(मुझे और अच्छे से याद नहीं!)

मैं तुम्हारे इतने पास होना चाहता था

कि मेरा दिल फटने लगता था

सांसे तेज़ होने लगती थी

इतने पास के खयाल से ही

मैं इतनी तेज़ दौड़ा

तेज़, और तेज़

मेरी सांस फूलने लगी

सीना फटने लगा

मैं और, और लंबे डग भरने लगा

थंबे, नाले, नदियां, पुल कूदने लगा

मैदान-पहाड़-देश-ग्रह-नक्षत्र

मैं तारों के महासमुद्र में तैरने लगा

तेज़-तेज़-और तेज़- मैं पार करता गया

एक महासमुद्र से दूसरे महासमुद्र से तीसरे महासमुद्र

मैं साइकिल से गिर पड़ा

और मैंने महसूस किया

मेरे सिर पर तुम्हारी हंसी

जुनून बनकर खड़ी है।

7.

वह रहस्य जन्म का जीवन का

रसमयी लालसा, विस्मयी वासना

उष्ण द्रव वसीय वह

मध्यमिका जैसे शरीर से परे किसी ताप में

प्रथम आविष्कार

वह न गंध न रूप न आकार

केवल एक उष्ण तरल एहसास

वाष्प की तरह अब भी जमा जैसे छाती मैं।

8.

मैंने ठुकराया तुम्हारा प्यार

मैंने तुम्हें छीज-छीजकर मरते देखा

मैंने तुम्हारी देह को गलते देखा

मैंने बहुत कामना की

तुम्हें गले लगाने की

पर जब सब कुछ छुट गया

तुम एक दिन विलीन हो गईं

किस वक़्त पता नहीं

मुझे तुम्हारी लाश से क्या मतलब!

मैं तुम्हारा प्यार ठुकरा चुका था

पर एक इच्छा थी

तुम्हें गले लगाता

और हम लोग मगरे तक घूमने चलते एक बार।

9.

दोपहर है

नीम-नील, नीम-सफ़ेद दीवार है

मैं एक पल के लिए उसके इतने नज़दीक़ हूं

कि उसकी सांसें अपनी गर्दन पर महसूस कर सकता हूं

एक उसी पल में

मैं घबरा जाता हूं

अपने-आप से

पीछे हट जाता हूं

अचानक एक आवाज़, दोपहर खींच लेती है।

आगे नहीं…

मैं पीछे हटता जाता हूं!

इसके आगे क्या…

10.

फिर बारिश हुई नदी पर

रात के आखरी-आखरी पहर

सांय-सांय में घुल गई

बूंद-बूंद फिर लहर-लहर

– – –

मैं मिट्टी के इतने पास

तुम्हारे इतने पास

आम की जड़ के इतने पास

जैसे यहीं मिलनी मुझे

युगों से मुझे ढूंढ़ती : तस्क़ीन!

– – –

मैं फिर तुमसे प्यार करना चाहता हूं,

मैं तुम्हारी लासानी मूर्ति बना रहा हूं।

मैं कल इसे तोड़ने का वादा करता हूं,

मैं फिर तुमसे प्यार करना चाहता हूं।

– – –

वहां एक नदी है

गरजती हुई

सफ़ेद

वो एक चट्टान को सदियों से विलीन करने में लगी है

वो चट्टान अब भी है वहां

उस पर हमारे पांव के निशां

वे आत्म-आहुतियां

घुलती जाती हैं एक समग्र इतिहास में

एक पल में

दरवाज़े बनते

रंगाई होती है

सदियों की रुकी चर्चाएं जैसे चल पड़ती हैं

हवा चलने लगती है

प्लास्टिक की बोतल

एक झटके में

जमीन से सौ फुट ऊपर घूमने लगती है

जमने लगती है

फिर धीरे-धीरे ज़मीन पर धूल

बगुले छिप जाते हैं ईमली की कोटरों में

हरी घास के साथ भींगते हैं झींगुर

मैं दूर तक देख सकता हूं अनाकुल मन से

बारिश और सिर्फ बारिश

भींगना और सिर्फ भींगना

मक़बरों की टूटी हुई ईंटें

परित्यक्त मीलों में मशीनें

ट्रकों के टायर – भींगते हैं

भींगती हैं झरबेरियां और मेंहदी

भींगते हैं अंजीर और बबूल

भींगते हैं मैं और तुम

और अपराजिता के फूल!

usman khan

उस्मान ख़ान समकालीन हिंदी कविता के अलहदा और युवा कवि हैं. चर्चाओं और पुरस्कारों की भीड़ से अलहदा… छपाऊ मानसिकता से भी अलहदा... जे.एन.यू. के हिंदी विभाग से मालवा के लोकसाहित्य पर पीएचडी. इनसे usmanjnu@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

श्रीनगर उर्फ काहे का स्वर्ग: उस्मान ख़ान

विश्वविद्यालय की दीवार के किनारे-किनारे मैं चलता रहा। रुमी गेट के थोड़ा ही आगे दीवार पर किसीने मोटे मोटे हरुफ़ में ‘वेलकम तालीबान’ लिखा हुआ था। पढ़कर पहले तो अजीब लगा, फिर उतना भी अजीब नहीं रहा। नौजवान लड़के-लड़कियाँ विश्वविद्यालय की तरफ जा रहे थे। मैं एक झील के किनारे बने बागीचे में जाकर बैठ गया। देखता रहा चीनार, औरतें, आदमी, बच्चे, पहाड़ी।

……यहाँ और भी खराब

BY उस्मान ख़ान

“What is “there” becomes “here” when you reach it; likewise your today disguises itself in the form of tomorrow”. – Bedil[1]

A snap shot from a film by Majid Majidi

A snap shot from a film by Majid Majidi

दिल्ली

पसीने से तरबतर हम दोनों ऑटो  में ही बैठे रहे। लम्पट लड़कों का एक दल मुमताज़ भाई का अभिवादन कर मैदान की ओर चला गया। मुमताज़ भाई ने सिगरेट एक लड़के की ओर बढ़ाई, जो उस दल से कटकर रुक गया था। ‘सादिक कहाँ हैं?’ मुमताज़ भाई ने उस लड़के से पुछा। लड़के ने इतना लम्बा कश खींचा कि एक चैथाई सिगरेट फर से राख हो गई, उसने मैदान की तरफ जाते लड़कों की तरफ देखा। ‘स्टेशन पर ‘काम’ करने गया है।’ उसने जवाब दिया। ‘ये क्या हुआ?’ उसके चोंट खाए दाएं हाथ की तरफ देखते हुए एक मुस्कान उसी के चेहरे पर उभर आई। ‘साले ने खिड़की से कुचल दिया।’ ‘कैसे?’ मुमताज़ भाई ने हैरत और चुटकी लेने के अन्दाज़ में पुछा। ‘चैन खींच रहा था। इतने में पास वाले हरामी ने खिड़की नीचे कर दी। दो-तीन बार ज़ोर-ज़ोर से पटक दी। बहिनचैद!’ मुमताज़ भाई ने धीरे से मुसकुराते हुए, अपने मुँह में जीभ फेरी और आखरी कश के लिए सिगरेट उसकी तरफ बढ़ा दी। ‘वो लोग क्या दारु पीने गए हैं?’ लड़के ने हामी में सिर हिलाया। ‘सादिक भी उनके साथ ही है क्या?’ मुझे लगा मुमताज़ भाई को उसकी बात पर यकीन नहीं हुआ था। ‘पता नहीं।’ कहते हुए लड़के ने सिगरेट का सुलगता ठूँठ नाली में फेंक दिया और मुमताज़ भाई का अभिवादन करता हुआ, मैदान की ओर चल पड़ा। शायद उसे भी कोई फर्क नहीं पड़ा कि पहले उसने क्या कहा था।

हम दोनों गर्मी के मौसम को गाली देते हुए बैठे रहे। लोगों के दल के दल स्टेशन की ओर बढ़े जा रहे थे। कोई किसीको नहीं जानता और सब एक जैसे थे। मुमताज़ भाई के लिए सब सवारी, मेरे लिए सब चरित्र। शहरी, कस्बाई, ग्रामीण। तमील, बंगाली, पंजाबी, बिहारी। धोती, पाजामा, जिंस, फ्रॉक, साड़ी, सलवार। सब अलग और सब एक जैसे। यात्री! मैं भी इसी रेले में उतरने वाला था।

मैं सोचने लगा, उस लड़के के दाएं हाथ के पहुँचे की हड्डी टूट गई थी। कितना भयानक दृष्य रहा होगा। एक लड़का किसी रेल में बैठी औरत के गले से चैन खींच रहा है, उसका हाथ अचानक खिड़की से दबता है, और फिर लगातार खिड़की के प्रहार सहता है। लेकिन अपनी बात कहते वक़्त लड़के के चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी। रिस्क में ही बरकत है, बिना रिस्क लिए बिहार से दिल्ली पहुँचे ये लड़के, जो दिन-रात नशा और चोरी करते हैं, अपना जीवन नहीं बिता सकते। सच, रिस्क में ही बरकत है। ये लड़के हर रोज़ नए रोमांचों से दो-चार होते हैं। मैंने सोचा कि मुमताज़ भाई से पुछूँ, क्या वो लड़का स्कूल जाता है? और फिर अपने ही बेमानी सवाल से लज्जित होकर चुप मार गया। स्कूल! थू!

रेल आने में अभी भी आधा घंटा बाकी था। मैंने सोचा एक सिगरेट और पी जाए। मैं सिगरेट लेने के लिए ऑटो  से निकला। ‘किधर।’ मुमताज़ भाई की आवाज़ थी। ‘सिगरेट ले आता हूँ!’ ‘आँहाँ, रुकिए!’ और खुद आॅटो से निकलकर वह सिगरेट वाले के पास गया और बोला, ‘ओरिजिनल देना हो भाई!’ और उस लड़के ने मुस्कुराकर नीचे रखे एक डिब्बे से सिगरेट निकालकर उसे दी। हम दोनों ने सिगरेट खतम की और मैं, अपना बेग जिसमें मेरे एम.फिल., पीएच.डी. के पोथे रखे थे, लेकर स्टेशन की तरफ चल दिया।

रेल प्लेटफॉर्म पर खड़ी थी। उत्तर संपर्क क्रांति। वही अनजाने चेहरे, जो बाहर हड़बड़ाहट और आष्चर्य का भाव लिए चले जा रहे थे, प्लेटफॉर्म पर भी चले जा रहे हैं। रेल के आगे वाले जनरल डिब्बे में मैं घुस गया। वही हमेशा का हाल, पैर रखने की भी जगह नहीं थी। मैं प्लेटफॉर्म के दूसरी तरफ वाले दरवाजे़ पर जाकर खड़ा हो गया। देखा एक आदमी पास वाले ट्रैक पर बैठा पेप्सी में व्हिस्की मिला रहा है। उसने मेरी ओर देखा। ‘लोगे।’ मैंने मुस्कुराते हुए उसे टाल दिया। ‘कहाँ तक जाना है?’ ‘जम्मू-तवी!’ मैंने कहा। ‘अच्छा जम्मू।’ ‘और आप?’ मैंने पूछा। ‘जहाँ तक ट्रेन जाएगी।’ उसने कहा। ‘उधमपुर।’ मैंने उसकी ओर देखा। उसने सशंकित नज़रों से मेरी ओर देखा। मैंने भी उसकी उपेक्षा की।

मैं रात-भर दरवाज़े के पास सिकुड़कर बैठा रहा और आस-पास वालों के लिए तकिए का काम करता रहा। सुबह होते-होते सिट का एक कोना बैठने के लिए मिल गया। एक स्टेशन पर रेल रुकी और धड़-धड़ करती हुई बुढ़ी औरतों की एक टोली उस डिब्बे में घुस गई। सभी यात्री, जो पहले से आराम की भंगिमा को प्राप्त कर रहे थे। हड़बड़ाने लगे। ये औरतें उड़ीसा की थीं। तीर्थ के लिए जा रही थीं। दो तो इतनी बुढ़ी कि लौटेंगी यह भी कहना मुश्किल लग रहा था। खैर!

जम्मू

रेल ने ठीक समय पर जम्मू उतार दिया। स्टेशन के बाहर जाते ही लगा मैं किसी आर्मी कैम्प में आ गया हूँ, स्टेशन के बाहर बने बागीचे के पास आर्मी के जवान बन्दूक लिए बैठे थे। उनमें से दो चाय पी रहे थे, एक अधेड़ और एक 25-26 साल का जवान। उनके आगे कँटीले तार की फेंस थी। जैसे ही उधर से कुछ हो, इधर से गोली चलाने को मुस्तैद सैनिक।

मैंने स्टेशन के इस आशंका भरे माहौल को पार किया और स्टेशन के बाहर नाले पर लगी चाय की दुकान पर चाय पीने लगा। 7 रुपये की चाय। जैसे-तैसे अपनी भूख दबाते हुए, मैं श्रीनगर जाने वाली गाड़ी के बारे में पुछने लगा। पुछते-पाछते एक गाड़ी मिली – 800 रुपये, इससे कम में भी गाड़ी मिल सकती थी, ये मुझे बाद में पता चला। तो, मैं श्रीनगर की ओर चल दिया। गाड़ी में दो आर्मी कैम्प में काम करने वाले जवान बैठे थे। सादे कपड़े, पहचानना भी मुश्किल कि ये उन्हीं बन्दूकधारियों के हमजोली हैं, जिन्हें देखकर आशंका होती है – अब क्या होगा!

गाड़ी का चालक एक सिक्ख था। मैंने अपनी सिगरेट पीने की इच्छा को गाड़ी रुकने तक दबा देना ही उचित समझा। रास्ते में एक जगह उसने गाड़ी खड़ी की, बाकी लोग खाने लगे, लेकिन अपनी जेब तो हल्की थी। सो, मैंने एक चाय ली और सिगरेट पीने लगा। गाड़ी चालक मुझे घुर कर देखने लगा। ‘जल्दी करलो।’ उसने कहा। जैसे मेरी ही वजह से गाड़ी रुकी हुई थी। ‘दूसरे लोगों को भी आ जाने दीजिए।’ मैंने कहा। वह दुकान के अंदर बैठी सवारियों की ओर बढ़ गया।

जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते जा रहे थे, पंजाबी बोलने वालों से दूर होते जा रहे थे और एक मिश्रित भाषा, जिसमें पंजाबी के शब्द बीच-बीच में उछल आते थे, मेरे कानों में पड़ रही थी। कुछ शब्दश् समझ आते थे, बाकि भाव से काम चलाना पड़ रहा था।

गाड़ी में मेरे दोनों ओर आर्मी के जवान थे। उनमें से एक से बात होने लगी। यह व्यक्ति बंगाल का था, उसे जैसे ही पता चला मैं, प्राध्यापक के साक्षात्कार के लिए जा रहा हूँ। उसने अपने दोस्त का किस्सा सुनाना षुरू कर दिया, कैसे दोनों साथ खेलते थे, साथ पढ़ते थे, फिर उसे रुपया कमाने का शौक हो गया और वह आर्मी में आ गया, उसका दोस्त पढ़ता रहा और आज प्राध्यापक है। उसकी बातों से साफ था कि वह रीतिकालिन कवियों से भी अधिक अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन करने में माहिर था। उसने खुब रुपया कमाया और उड़ाया है, उसका कहना था। हालाँकि मैं देख चुका था, कि वह गाड़ी-चालक से 50 रुपये को लेकर हुज्जत कर रहा था। वह कहने लगा कि उसने वायुयान में भी यात्रा की है, और वो तो आज इस जीप में जा रहा है, जबकि वह चाहता तो आज भी वायुयान में जा सकता था। लेकिन इच्छा ही नहीं हुई। खैर, उसे संतुष्टि थी, कि उसका प्राध्यापक दोस्त आज भी उसकी गालियाँ हँसकर सुनता है।

फिर वही जवाहर टनल, घुप्प अँधेरी टनल, जिसमें घुसते ही कुरोसावा के ड्रिम्स की टनल याद आने लगी। पता नहीं कब वह सैनिक टनल पार कर निकलेगा और फिर पिछे मुड़कर देखेगा – टनल का घुप्प अँधेरा और सुनेगा – फौजी बुटों की टाप। पता नहीं जब इस टनल से आखरी सैनिक बाहर होगा तो वह क्या सोचेगा! इस टनल के उस पार वह क्या कर रहा था?

सड़क गाडि़यों से भरी हुई थी, लग रहा था, लोगों का एक रेला श्रीनगर की ओर जा रहा है। हमारी गाड़ी में पीछे चार लड़के बैठे हुए थे। उम्र – 14-15 साल। उनमें से एक को उलटी हो गई। ये चारों लड़के मध्यप्रदेश से कश्मीर मज़दूरी करने के लिए जा रहे थे। दो पहले से वहाँ काम कर रहे थे और दो पहली बार जा रहे थे। अपने बारे में कुछ भी बोलते हुए वे हिचक रहे थे, जैसे कुछ अनहोनी होने वाली हो। उन लड़कों को देख मेरा मन एक बार और आशंका से भर गया। उलटी करने वाला लड़का सीट पर लेटे-लेटे सो गया था।

पास बैठा जवान भारत के विभिन्न इलाकों में अपनी पोस्टिंग और अनुभव बताता चल रहा था। मैं भी हाँ-हूँ कर रहा था, ताकि मेरा ध्यान बँटा रहे। रास्ते में एक जगह ट्राफिक जाम था। आर्मी के जवान चारों और घुम रहे थे। पहले मुझे लगा कुछ दुर्घटना हो गई है। फिर पता चला, सड़क बनाने के लिए रास्ता साफ किया जा रहा है, जिसके लिए एक बड़ा पेड़ काटा जा रहा था। आर्मी के जवान सड़क साफ करने में मदद कर रहे थे। ज़्यादातर इतने काले कि वहाँ की स्थानीय आबादी से फूल कांट्रास्ट में।

सड़क साफ हुई तो हमारी गाड़ी भी धीरे-धीरे खिसकने लगी। हमारा गाड़ी-चालक वैसे भी बहुत धीरे गाड़ी चला रहा था। पंजाबी पॉप संगीत चलाकर वह धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था। क़ाज़ीगुंड में एक जगह गाड़ी खड़ी कर चालक मेवों की एक दूकान पर चला गया और चाय पीने लगा। पहले ही इतना धीरे-धीरे वह हमें ले जा रहा था, कि लग रहा था ये सफर खतम ही नहीं होगा। किसी अनजाने रास्ते पर चलते हुए यह अक्सर ही लगता है, कि सफर बहुत लम्बा है। हर शहरनुमा जगह पर मुझे लगता था, अब आ गया श्रीनगर, लेकिन नहीं। बाहर रुई के फाहों की तरह की कोई चीज़ उड़ रही थी। बंगाली हमसफर ने कहा, ये अगर नाक में चली गई तो चार घंटे छिंकते रहोगे। मैंने अपनी दूसरी ओर बैठे सैनिक से खिड़की के शीशे ऊपर कर लेने को कहा। उसने शीशा चढ़ा लिया। तब भी एक दो फाहे अंदर आ चुके थे और गाड़ी में बेमुरव्वती से गष्त लगा रहे थे।

एक गाँव में उसने गाड़ी फिर रोक दी। इस बार उसने बिना उतरे ही पिछे मुड़कर दोनों सैनिकों को सलाह दी। यही आखरी गाँव है। इस गाँव में भी चारों तरफ सैनिक खड़े और घुमते दिखाई दे रहे थे। मुझे समझ नहीं आया, वह क्या कहना चाह रहा था। मेरे दाईं तरफ वाला सैनिक नीचे उतर गया और थोड़ी देर में हँसता हुआ अपनी जेब पर हाथ रखे लौट आया। इसके आगे शराब नहीं मिलती है। बंगाली सैनिक ने कहा। मुझे लगा वह मज़ाक कर रहा है। अब तक मुझे गुजरात के बारे में ही यह पता था, कि वहाँ शराब नहीं मिलती है। दूसरा सैनिक कहने लगा, पहले मिलती थी, अभी सब दूकाने तोड़-ताड़ दी है। मुझे बस्ती का वह दृष्य याद आ गया, जब पाकिस्तान में शराब की दूकाने तोड़कर गैलनों शराब नालियों में बहा दी गई थी। बेचारे मण्टो का पाकिस्तान!

धीरे-धीरे गाड़ी फिर खिसकने लगी। देखा एक और टनल लगभग बनकर तैयार हो चुकी है, ये नई टनलें 90 कि.मी. का फासला कम कर देंगी। और सुना रेल के लिए भी एक नया ट्रैक बिछाया जा रहा है, जो सफर को आसान और ट्राफिक को कम कर देगा। और टूरिस्ट और सैनिक।

अपने बंगाली हमसफ़र की बातें सुनते-सुनते, जिसमें पंजाबी पाॅप खुद-ब-खुद घुलता जा रहा था। चालक महोदय को अचानक जाने क्या सुझी, वो कहने लगा, ‘ये झेलम है।’ मुझे उस पर पुरा शक हुआ। और उसके पॉप संगीत को सुनते-सुनते मैं मन ही मन झल्ला चुका था, मुझे लगा कि कहूँ, तो मैं क्या करूँ, कुद जाऊँ, झेलम है! हँह!! मैंने देखा एक नदी है, झेलम ही होगी।

 खै़र, आखिरकार गाड़ी ने मुझे एक चैराहे पर छोड़ा। मैंने एटीएम तलाश किया और कुछ रुपया निकाला, ताकि आगे का काम आराम से चल सके। और एक मिनी बस में बैठ गया, जो मुझे डल गेट उतारने वाली थी।

श्रीनगर

गोधूली बेला का समय था। मैं मिनी बस से एक चैराहे पर उतरकर खड़ा था। एक सिगरेट वाले की दूकान पर पहुँचा, सिगरेट ली और उससे पुछा, ‘यहाँ रात भर रुकने के लिए सस्ता कमरा कहाँ मिलेगा।’ उसने कहा, ‘रुकिए, अभी दिखा देते हैं।’ मैं रुका रहा, 5-7 मिनट में ही एक अधेड़ मोटा-सा आदमी आया, और मुझसे कहने लगा, ‘कितने दिन के लिए चाहिए?’ मैंने कहा, ‘बस रात भर के लिए, इंटरव्यू देने आया हूँ, देकर कल ही चला जाऊँगा।’ उसने एक लड़के को बुलाया, और मेरी तरफ देखकर कष्मीरी में कुछ कहा, पता नहीं वह कश्मीरी भी थी या नहीं।

                रात पुलिया पर उतर आई थी और मैं उस लड़के के साथ पुलिया पर चले जा रहा था। मैंने उससे कहा, ‘सिगरेट पिते हो!’ उसने कहा ‘नहीं, मैं कोई भी नशा नहीं करता।’ ‘ठीक है।’ मैंने कहा। उसका नाम गुलज़ार था। वह एक शिकारे पर मुझे लेकर गया, जो उसी पुलिया के नीचे लगा हुआ था। मैंने देखा शिकारा ठीक है, कमरा भी रहने लायक। फिर वही किराये को लेकर हुज्जत। आखिरकार 300 रुपये में रात भर रहना तय पाया गया।

गुलज़ार को जब पता चला कि मैं विश्वविद्यालय में पढ़ाने के लिए इंटरव्यू देने आया हूँ, तो पहले तो उसे विश्वास नहीं हुआ। वह हैरत से मेरा मुँह देखने लगा। फिर बोला, ‘तुमको तो लड़के पीट देंगे।’ मैंने कहा ‘क्यों?’ बोला, ‘यूनिवर्सिटि के लड़के खराब हैं।’ मैंने कहा, ‘अच्छा!’ फिर उसने बताया कि वह भी 8वें दर्जे में अपने मास्टर को पीट चुका है। और उसके बाद से उसने पढ़ाई भी छोड़ दी अब शिकारा चलाता है और मज़दूरी करता है। उसकी छोटी बहन और भाई पढ़ रहे हैं, लेकिन उसे विश्वास था कि उसका भाई भी किसी मास्टर को पीटकर एक दिन उसके साथ ही काम करने लगेगा। कहने लगा, ‘हमारा भाई हमसे भी ज़्यादा गुस्से वाला है।’

गुलज़ार को चाय पीने का बहुत शौक था। उसने ग्लास भर के चाय बनाई और पीने लगा। मैं लम्बे सफ़र की थकान से चुर था, साबुन, तैल ढुँढ़ने बाज़ार की तरफ जाना चाहता था, लेकिन देखा कि गुलज़ार मुझे जाने नहीं देना चाहता, पहले तो मुझे शक हुआ, पुरा वातावरण ही आशंकापूर्ण था, फिर वह बोला, ‘यहाँ बाज़ार जल्दी बंद हो जाता है, यहाँ का माहौल नहीं पता है तुमको।’ मैंने उसकी बात अनसुनी कर दी और यह कहते हुए कि मैं थोड़ी ही देर में आ जाऊँगा, मैं बाज़ार की तरफ चल दिया। पुलिया पार कर मैं एक चैराहे पर पहुँचा, जहाँ कुछ दूकाने थी। लेकिन तैल का पाउच कहीं नहीं मिला। मैं साबुन लेकर लौट आया। नहाया तो कुछ ताज़गी महसूस हुई। मैंने कहा, ‘खाने के लिए कहाँ जाना चाहिए।’ वह बोला, ‘यहीं रुको, खाना हम लेकर आएगा। क्या खाएगा तुम?’ मैंने कहा, ‘कुछ भी, सादा-सा, चावल-दाल।’ उसने कहा, ‘चटनी भी लेगा।’ मैंने कहा, ‘हाँ, मिल जाए तो।’ बोला, ‘अस्सी रुपये दे दो।’ मैंने उसे सौ रुपये दिये और कहा, ‘अगर तैल का पाउच मिले तो लेते आना।’ वह रुपये लेकर मुझे शिकारे पर ही रहने की हिदायत देता हुआ चला गया। मैं शिकारे के एक कोने में लेटकर, जो बाहर की तरफ खुलता था, सिगरेट जलाकर झील में जलती हुई बत्तियों का प्रतिबिंब देखता रहा। थोड़ी देर में तीन आदमी एक नाव लिए जाल बटोरते हुए पास से गुज़रे। तीनों ही हड्डी के ढाँचे।

गुलज़ार लौटा तो मैंने खाना खाया। और फिर वह भी खाना खाकर जाने लगा। मैंने पुछा ‘कहाँ?’ तो कहने लगा, ‘मज़दूरी।’ मैंने कहा, ‘रात को।’ उसने कहा, ‘हाँ रात भर सवारियाँ आती रहती है, हम काम करता है, नहीं तो घर नहीं चलेगा।’ मुझे लगा, वह मुझ पर ही व्यंग्य कर रहा है।

सुब्ह हुई, सब कुछ रौशन हुआ, तो देखा झील बहुत दूर तक खींची हुई है। मैंने कहा, ‘मैं 2 बजे तक लौट आऊँगा।’ गुलज़ार कहने लगा, ‘रजिस्टर में साइन कर दो, और हमको 4 सौ रुपये और दे दो।’ मैंने ज़्यादा हुज्जत न करते हुए, उससे कहा कि मैं अपना सामान लेकर ही चला जा रहा हूँ, अगर आज ही नहीं लौटा, तो फिर तुम्हारे पास आ जाऊँगा। लेकिन वह लड़का बड़ा हुज्जती था। मैंने उसे टालते हुए अपना बैग उठाया और शिकारा छोड़ दिया।

मैं फिर उसी चैराहे पर पहुँच गया, जहाँ कल मुझे मिनी बस ने उतारा था। पुछने पर पता चला, यहीं से बस मिलेगी, जो सीधे कश्मीर विश्वविद्यालय उतार देगी। मैं बस का इंतज़ार करने लगा। कुछ नौजवान लड़के बस-स्टॉप पर बैठे सिगरेट पी रहे थे। वहीं पास में खड़ा होकर मैं भी सिगरेट पीने लगा। बस आई और मैं उसमें बैठ गया। बस श्रीनगर में घुमती हुई चलने लगी। झील और बागीचों के बीच होटलें, रेस्टोरेंट, घर, दफ़्तर और सैनिक। बस ने मुझे रुमी गेट पर उतार दिया। यह यूनिवर्सिटी का मुख्य द्वार नहीं था। मैंने अंदर जाकर पुछा, तो पहरेदार ने बताया, ‘अभी तो 9 बजा है, 10 बजे तक इंटरव्यू षुरू होगा।’

तब तक मैंने इधर-उधर घुमने की योजना बनाई और निकल पड़ा। विश्वविद्यालय की दीवार के किनारे-किनारे मैं चलता रहा। रुमी गेट के थोड़ा ही आगे दीवार पर किसीने मोटे मोटे हरुफ़ में ‘वेलकम तालीबान’ लिखा हुआ था। पढ़कर पहले तो अजीब लगा, फिर उतना भी अजीब नहीं रहा। नौजवान लड़के-लड़कियाँ विश्वविद्यालय की तरफ जा रहे थे। मैं एक झील के किनारे बने बागीचे में जाकर बैठ गया। देखता रहा चीनार, औरतें, आदमी, बच्चे, पहाड़ी।

फिर देखा 10 बज गई है। तो रुमी गेट से ही फिर विश्वविद्यालय में दाखिल हुआ। साक्षात्कार वाइस चांसलर के दफ़्तर के पास प्रशासन भवन में होना था। वहाँ पहुँचा, तो देखा साक्षात्कार देने के लिए मेरे अलावा और 11 लोग बैठे थे। अलीगढ़ विश्वविद्यालय, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, ग़रज़ कि देश भर से इस विश्वविद्यालय में हिंदी पढ़ाना चाहने वाले नौजवान और अधेड़। कुछ के पास किताबों और लेखों का ऐसा ज़खीरा कि देखते ही लगे कि इन्होंने अपनी उमर इसी काम में झोंक दी है। मैं समझ गया, बेटा तेरी दाल यहाँ नहीं गलनी है। अलीगढ़ से पढ़े एक साहब ने मेरे करीब बैठते हुए मुझसे बड़ी ही शाइस्तगी से हाथ मिलाया और धीरे से पुछा, ‘कहाँ के रहने वाले हैं खान साहब!’ मैंने कहा, ‘मध्यप्रदेश!’ ‘हम जे.एन.यू. गए थे एक बार, लेकिन अपना वाला कोई मिला नहीं।’ मेरे कान में धीरे-धीरे ज़हर घुलने लगा। ‘अब आप से मिलेंगे अगर कभी आए तो!’ मैंने कहा, ‘ठीक है!’ और वहाँ से उठने लगा। उन्होंने फिर अपने नरम हाथों से मेरा हाथ पकड़कर रोका, ‘अपना कांटैक्ट नंबर दीजिए।’ मैंने उन्हें एक फर्जी नंबर थमाया और उठकर दूसरी जगह बैठ गया। देखा मेरे सामने एक सज्जन बैठे हुए थे। साफ़ सफ़ेद कुर्ता-पाजामा, जिस पर भूरे रंग की बंडी। चुटियाधारी ये सज्जन अपने सामने अपनी प्रकाशित सामग्री का ढेर लिए बैठे थे। और ख़ालिस हिंदी में बात कर रहे थे। हजारीप्रसाद द्विवेदी पर उनका शोध-प्रबंध था। मेरे पास बैठे एक व्यक्ति ने बताया कि वह उनके साथ पहले भी एक साक्षात्कार दे चुका है। कहने लगा, ‘उस इंटरव्यू में तो ये धोती-कुर्ता पहनकर आए थे। तब उनसे बात कर एक्सटर्नल ने कहा था, लगता है साक्षात् द्विवेदीजी से ही बात कर रहे हैं।’ सच में, लगता भी होगा। अंतर्वस्तु का पता नहीं, रूप तो वही था।

इंटरव्यू खत्म होते-होते पता चला कि कल श्रीनगर बंद रहेगा। किसने ‘कॉल’ दिया है, पुछने पर कोई कुछ बोला नहीं। तो उसी शाम गाड़ी से जम्मू के लिए निकलना था। इस बीच मैंने खाना खाया और एक बागीचे में जाकर बैठ गया। देखा कुछ लड़कियाँ फूटबॉल खेल रही थीं। दूर से उन्हें देखता मैं सिगरेट पीने लगा। अब जाकर मुझे लग रहा था मैं श्रीनगर में हूँ। सोचने लगा इस जगह के बारे में क्या-क्या सुनता आया था और ये जगह कुछ अलग तो नहीं है। वही परेशानियाँ यहाँ के नौजवानों की आँखों में भी घुम रही हैं, जो दिल्ली के नौजवानों की आँखों में तैरती रहती हैं। फिर ये काहे का अलग से स्वर्ग! दिमाग़ में लगातार एक शेर का मिसरा ए सानी घुमता रहा – ‘चारों तरफ खराब यहाँ और भी खराब।’ ‘चारों तरफ खराब यहाँ और भी खराब।’ लेकिन दिमाग़ पर बहुत ज़ोर देने के बाद भी मिसरा ए उला याद नहीं आ रहा था। शायद मैदान में फूटबॉल खेलती हुई किसी कमसीन को याद था! पर मैं पुछ नहीं पाया…


[1]  डॉ. इक़बाल का अनुवाद

उस्मान ख़ान

उस्मान ख़ान

उस्मान ख़ान समकालीन हिंदी कविता के अलहदा कवि हैं. चर्चाओं और पुरस्कारों की भीड़ से अलहदा…छपाऊ मानसिकता से भी अलहदा..जे.एन.यू. के हिंदी विभाग से मालवा के लोक-साहित्य पर शोधरत हैं. इनसे usmanjnu@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

डायरी कविता

By   उस्मान खान

 
1 नवंबर

एक समय
कविता की अंतिम पंक्ति से पहले
हम देखेंगे
जूता पॉलिश जूता पॉलिश हो गई है

2 नवंबर

आशंका है
छत पकड़कर
झूल रहा बन्दर की तरह
सौ वाट का बल्ब
खीं खींयाता दुःस्वप्न
जहाँ राबिया तुम
रौशनदान तोड़कर
अभी अभी भागी हो
और गाँव गोईरे
ईमली की डाल पर
चमगादड़ सी लटक गई हो
क्या हुआ था ?
जिन्दगी इतनी कठिन तो नहीं थी
कि एक शांत धूसर आभा ओढ़ ली जाए !

3 नवंबर

मीरा तुम अपना जिस्म लिए
घुग्घू के पर तौलने में डूबी
ठहरी हुई सड़क पर ठहरी
जा चुकी कार का सुँघती
धुआं
. . . . . . . . . . . . .
कुछ ठिठुरती नींदों की तरफ
ईशारा करती स्ट्रीट लाईट साथ
एका कर सुअरों के भटकती
सुँघती फिरती फूटपाथ
मृत्यु
. . . . . . . . . . . .
मौसम की कसमसाहट
घड़ी नहीं बताएगी
सरकारी दफ़्तर भी नहीं

4 नवंबर

मृत्यु !
एक शहर में भटकते हम दोनों
एक दिन टकराएँगे ही!

5 नवंबर

जेबें इतनी खाली हैं
कि अलीफ  लैला का आखिरी किस्सा भी
सल्फास की गोलियों को सुनाया जा चुका है

6 नवंबर

मेरे पास
एक लाश है
एक दुःस्वप्न
और शिशिर की निःशेष रात

                                                             और कोई जवाब नहीं है !

7 नवंबर

नीम-बुझी गलियों की दीवारों के
अँधेरे उजाले पर
बोध की सारी पीड़ा और क्रोध
उभारता चला जा रहा है
अंडरग्राउंड का गुलमोहर का फूल

10 नवंबर

जैसे आईना टूटता है
और नींद पीड़ाओं का सिलसिला हो जाती हैं
सीपियों में मिली कविताएँ
मेरी साँसों में
अश्वत्थामा के कपाल सी
मैं सूरज को अपने सर में रख लेता हूँ
और कुर्सी को छतपंखे की जगह टाँग देता हूँ

11 नवंबर

तुम घोड़ों से आए
और तुमने सिर्फ दो स्वाद हमारे लिए शाश्वत बना दिए
एक कड़वा
और एक कसैला
तुम घोड़ों से आए
और तुमने सिर्फ दो चीज़ें हमें दीं .
नाल
और लगाम।

12 नवंबर

फ्लायओवर के नीचे
हैंगओवर में …..जाम।
चाँद और फैंटेसी
सड़क पर बिखरे जा रहे हैं
और ऑटो में चेता है
सौ वाट का बल्ब।

13 नवंबर

हल्के.हल्के
तय करके
कई सदियों का सफ़र
एक राग!
अपनी कोमल ऊँगलियों में
ठंडी मिजराबें संभाले
मेरे बालों में पिरो रही है
शहरज़ाद !
. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .
मेरे भाईयों का नाम बताओ ! जो मुझे अंधेरे कुँए में फेंक गए थे !! और जैसे रात हो गई थी  रेगिस्तान में !!!

14 नवंबर

फ्लाय ओवर के नीचे
कुत्ते पोस्टमार्टम करते हैं !!
रात के तीन !!!

17 नवंबर

विक्षिप्त अफवाहें
आईने और आँखों के बीच
आँखें दरकती हैं
आईना कोढ़ाता है
घर से न लाश मिलती है
न आईना

18 नवंबर

कुछ इंजेक्शन
और गर्भाशय कुछ
लँगड़ाते फिरते हैं
शहर में

19 नवंबर

इस व्यवस्था की पूर्वशर्त है
कि तुम्हारी आत्महत्या की जाएगी
और साबूत खड़े लोग वे भाँड
हटाते रहेंगे ऊँगलियों के पोरों से घी की गंध
और देखते रहेंगे अपनी वीर्यसनी गाँड

23 नवंबर

असंगता थी
उदासी थी
घर के कोने धूसर थे
लैम्पपोस्ट उदास थे
प्रसव-पीड़ा से बिल्लियाँ चिल्लाती थीं
सड़क पर उड़ते काग़ज़ के टुकड़ों की आवाज़ मनहूस थी
चाकू लिए एक आदमी घुमता था
क्षिप्रा के तट पर सन्नाटा था
मगर इतना तो नहीं था कभी !
जंगलों पर
और बस्तियों पर
ये अपशकुन सा क्या मँडरा रहा है !

24 नवंबर

तुम आते
जैसे शबे विसाल चाँद पर बादल आता है
जैसे सही वक्त पर मानसून आता है
जैसे यादों के शहर में वह मोड़
जहाँ अपने महबूब से मिलना हुआ था
जैसे गोंद आता है बबूल में
और नदी में मछलियाँ
. . . . . . . . . .
इस तरह नहीं
जैसे रतौंधी
जैसे घाव पर मक्खियाँ
जैसे घर पर पुलिस
जैसे इमरजेंसी !
जैसे हत्या !!
जैसे ब्लेकआउट….

26 नवंबर

मेरी कहानियों की सौ सौ नायिकाएँ और नायकों को
जो महुए की चूअन सीने पर महसूस करते थे।
जो जिन्दगी को भरपूर जीना चाहते थे।
जो बेनाम गलियों के मोड़ों पर
घरों के साफ सूथरे कमरों में
सड़कों की भरी पूरी छातियों पर
झाडियों में
और पहाडियों पर
क़त्ल हुए।
और जिनके बरसाती गीतों की धुन पर
डोला करते थे साँची के स्तूप
रात की व्याकुलता में
बिडियाँ सुलगाते देखा मैंने
और देखा गुस्से से दाँत पिसते उन्हें !

28 नवंबर

जीवन
साँझ सा निःशब्द
शेष हो जाए
श्वास निःश्वास के क्रम में
दुःख कठिन हो जाए जमकर
पर
तुम प्यार नहीं हो
तुमको प्यार नहीं लिखूँगा !

3 दिसंबर
     निषिद्ध इतिहासों में लेकिन दर्ज

  मेंढकों कनखजूरों फुद्दियों की हत्याएँ

4 दिसंबर

प्रेम में
निषिद्ध
मृत्यु का मौन
आवाज़ खोजता है।

5 दिसंबर

रात को एक बजे
पेपरवेट के नीचे दबाए गए
यातना के इतिहास के सेंसर्ड पन्ने
बस्ती से मसान तक
घुग्घूओं के परों से झड़ते हैं
. . . . . . . . . . .
जब्तशुदा गाडियों पर जमी धूल
रातगश्त पर भेज चुकी है
पुलिसवालों को
. . . . . . . . . . .
दो ट्यूबलाईटों के बीच खड़े
आदमक़द आईने में
एक केंचूआ रेंग रहा है

उस्मान खान समकालीन हिंदी कविता के अलहदा कवि हैं. चर्चाओं और पुरस्कारों की भीड़ से अलहदा…छपाऊ मानसिकता से भी अलहदा..जे.एन.यू. के हिंदी विभाग से मालवा के लोक-साहित्य पर शोधरत हैं. इनसे usmanjnu@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

उस्मान खान की कवितायें –उदासीनता नहीं उदासी

By आशुतोष कुमार

तुम घोड़ों से आए
और तुमने सिर्फ दो स्वाद हमारे लिए शाश्वत बना दिए –
एक कड़वा
और एक कसैला
तुम घोड़ों से आए
और तुमने सिर्फ दो चीज़ें हमें दीं –
नाल
और लगाम।घोड़ा शानदार और सुन्दर पशु है .घोड़ों और मनुष्य का साथ बहुत पुराना है.घोड़े जब साथ  आये ,प्रगति की  गति बहुत तेज हो गयी. इतिहास अश्वारोही योद्धाओं की विजयगाथाओं का एक अटूट सिलसिला है.  शायद यही वज़ह हो कि   मशीनों का ज़माना आया तो उन की ताकत मापने का पैमाना भी अश्वशक्ति ही मानी  गयी. मध्ययुग से ले कर आधुनिक समय तक सभ्यता के उत्तरोत्तर विकास में घोड़ों की केन्द्रीय भूमिका है. मनुष्य  के मन में घोड़ों की गहरी स्मृति है. घोड़ों और मनुष्य ने एक दूसरे को किस तरह बदला   ?क्या मनुष्य ने घोड़ों को मनुष्यवत बनाया ?या घोड़ों ने मनुष्य को पशुवत  ?क्या घोड़ों ने  मनुष्य की दुनिया को घोड़ों की दुनिया में तब्दील कर दिया?इस  दुनिया में कुछ तो  हैं लड़ाकू हमलावर घोड़े और बहुत सारे लगाम पहने नाल ठुंके घोड़े ?उस्मान खान की डायरी श्रृंखला की कविताओं से चुनी गयी यह छोटी सी कविता मनुष्यता के इतिहास की हमारी आमफहम समझ को ही नहीं झकझोरती ,हमारी स्मृतियों को भी बेतरह उलट पलट देती है. स्मृतियों का अन्धेरा  अतल सतह पर  आ जाता है .स्मृतियों का स्वाद बदल जाता है . वे कडवी और कसैली हो जाती हैं. स्मृतियों को सहेजना  दरअसल दुनिया को समझने का एक ढंग है . सिर्फ मीठी यादों को सहेजने वाल हमारा मन एक ऐसी विश्वदृष्टि का निर्माण करता है , जिस में मनुष्य की एक गरिमामय छवि उभरती है .कड़वी और कसैली यादें इस छवि को छिन्नभिन्न कर देती हैं. लेकिन हमें खुद के अधिक करीब भी .

कविता स्मृतिधर्मा होती है .  कविता में स्मृति अनेक रूपों में आती है. एक रूप वह है , जिस में कड़वाहट भारी स्मृतियों को छांट दिया जाता है. दूसरा वह है , जिस में उन्हें संशोधित कर दिया जाता है . कई बार  आमूलचूल बदल दिया जाता है.  कपोलकल्पनाओं को स्मृतियों में खपाने की कोशिश की जाती है. इस तरह स्मृतियों को कलात्मक बनाया जाता है . स्मृति स्वयं एक ‘कला’ बन जाती है.  एक रूप वह  भी  है , जिस में समकालीनता को स्मृतिहीनता का पर्याय समझ लिया जाता है. उस्मान की कविता में स्मृति की भूमिका  इन सब रूपों से अलग है . सब से पहले तो यह कि वह कविता में प्रवाहित होते समय को अतीत , वर्तमान और भविष्य के तीन  अलग अलग खांचों में विभाजित करने से बचती है . वह  वर्तमान में जीवित है .भविष्य में  ताकती झांकती है. अतीतमोह बिल्कुल  नहीं  है.

स्मृति की यह सक्रिय भूमिका असल में विस्मृति  के खिलाफ एक मुहिम है .  विस्मृति को प्रोत्साहन देना मनुष्य की सजग चेतना को नियंत्रित करने का सब से कारगर तरीका  है .उस्मान की एक और छोटी सी कविता इसे यों रेखांकित करती है —
आप मुझे मूर्ख कह सकते हैं , पर

मैं सचमुच भूल गया हूँ कि

मेरी जान

 फिलिस्तीन की उस सड़क में है

जिस पर एक भी फिलिस्तीनी नहीं चलता

या मैं मर गया हूँ

 मनोरमा के साथ.

उस्मान की कविता में जीव- जंतुओं का एक समूचा जीवित संसार है. केंचुए , कनखजूरे ,उल्लू , शैवाल , गिद्ध , मकड़ियां , सियार , ऊँट ,चूहे .वे सब निरीह प्राणी , जिन्हें हम देख कर भी नहीं देखते.  उस्मान हिंदी कविता को ‘फूल -बच्चा – चिड़िया – लड़की ‘ की समकालीन दुनिया से आगे ले गए हैं. यहाँ ऐसी कविता है , जिस में  में ” दुःस्वप्न हुई गलियों में थिरकती है ईश्वर की परछाईं/चाँद सबसे फ़ज़ूल चीज़ों में से हो जाता है/ग़ुलाब और ओस और जलेबी की तरह/और मिट्टी-सना एक केंचुआ/धीरे-धीरे सड़क पार करता है/जेठ की धूप  में..” इन पंक्तियों की व्याख्या करने की कोशिश फ़िज़ूल है. जेठ की धूप में सड़क पार करता मिट्टी-सना केंचुआ ईश्वर  की परछाइयों  को चुनौती  देता हुआ दुःस्वप्न-  गलियों में   जीवन के अंतिम स्वप्न को जिस तरह जीवित रखता है , वह हिंदी कविता की एक अविस्मर्णीय घटना है. लेकिन वही  केंचुआ जब दो ट्यूब लाइटों के बीच खड़े  ‘आदमकद  ‘  आईने में रेंगता हुआ नज़र  आता है , तब कविता के आईने में दिखती आदमी की कायांतरित शक्ल  स्तब्ध   और उदास करती है.

उस्मान की कविता में गाढ़ी  उदासी   है. बहुत दिनों से उदासी हिंदी कविता से बहिष्कृत रही  है. उदास होना कुछ गुनाह जैसा हो गया. उदास मौसमों के हर ज़िक्र के साथ उन से लड़ने का संकल्प घोषित करना लाजिमी मान  लिया गया. समकालीन हिंदी कविता साथ के दशक की कथित  चरम नकारवादी कविता  को विस्थापित  करती हुयी आयी थी. ‘अकविता ‘ में निराशा का कुछ ऐसा उत्सव मनाया गया कि वह समकालीन कवियों के लिए एक निषिद्ध वस्तु  हो गयी. कविता को आशावादी होना चाहिए. उसे विकृति और विद्रूप में रस लेने की जगह जीवन की सहजता , सुन्दरता , गतिशीलता और संघर्ष- भावना को देखने और दिखाने पर बल देना चाहिए. इस काव्य- सिद्धांत को कविता की जीवनधर्मिता  के रूप में इतनी  लोकप्रियता मिली कि अब वह हिंदी कविता के कॉमन सेन्स  का हिस्सा है. इस कॉमन सेन्स में जनवादी और ‘गुणीजनवादी’ ( अभिजनवादी ?) दोनों समान रूप से शरीक हैं .जाहिर है यह जीवन में व्याप्त निराशा को कविता के आशावाद से परास्त करने  का काव्य- संकल्प था . सो अंत- पन्त पलट कर  गहनतम निराशा में तब्दील हो जाना इस के लिए लाजिमी था. प्रमुख समकालीन  कवियों के यहाँ  ऐसे उदाहरण प्रचुर हैं.

‘निराशाद’ और ‘आशावाद’ से अलग उस्मान की कविताओं में हमारे समय की गहरी उदासी सहज रूप से मौजूद है. उस की कविता प्राचीन सभ्यताओं के दफ़न नगरो से ले कर आधुनिक सभ्यता के उजाड़े गए गाँव तक में भटकती हुयी त्रासदियों की गवाह बनने का माद्दा रखती है .उस की कविता में ‘देश का उदास चेहरा नाजी यातना शिविरों पर झुकी किसी चुप शाम की तरह’ उस की ‘मज्जा में टंकित करता है यातनाओं का उपन्यास’. उस की कविता में उन औरतों की उदासी है , जो ‘रात भर एक रुपये  को डेढ़ रुपया बना देने वाला जिन्न ढूँढती हुयी सडकों से जूझती’ हैं. ‘उदास रतजगों के मोड़ पर खड़ी’ उस की कविता ‘मेजों पर धूल की तरह जमी उदासी’ साफ़ करती है.

इन उदासियों को देख कर कविता को उदासी के आदाब सिखाने वाले नासिर काज़मी की याद आना सहज है. ” हमारे घर की दीवारों पे   नासिर / उदासी बाल खोले सो रही है. ” नासिर की शायरी में भी उन के जमाने की उदासी थी. एक देश , एक संस्कृति ,एक सभ्यता का विभाजन   और उस से उपजा   भोगौलिक  और मनोवैज्ञानिक  विस्थापन उन की उदासी का सबब था. उस्मान के समय तक आते विभाजन और विस्थापन के आयाम और भी विकट हुए हैं.

इस व्यवस्था की पूर्वशर्त है
        कि तुम्हारी आत्महत्या की जाएगी
       और साबूत खड़े लोग – वे भाँड
                             हटाते रहेंगे ऊँगलियों के पोरों से – घी की गंध
                    और देखते रहेंगे अपनी वीर्य-सनी गाँड

जब कि  गाँव शहरों में व्यापक आत्महत्याओं की खबरें बासी पड़ चुकी हैं , कविता उस विभाजन को दर्ज करती है , जिस के ओर  साबुत भांड खड़े हैं , और दूसरी तरफ वे लोग हैं , जिन की आत्महत्याए जनसंहार की तरह व्यवस्था की पूर्वशर्त बन जाती हैं. ‘ तुम्हारी आत्महत्या की जायेगी ‘ जैसी पंक्ति अद्भुत तीक्ष्णता      से उस झूठ   को उद्घाटित  कर देती  है , जिस में प्रायोजित  जनसंहार को ‘ आत्महत्याओं का नाम दिया जाता है. जल , जंगल और जमीन की खुली  ग्लोबल लूट ने इस विभाजन के दोनों ओर खड़े समूहों को मनुष्यता की उन जड़ों से विस्थापित कर दिया है , जिन से जुड़े रहना मनुष्यता   की परिभाषा   और भाषा   की गरिमा को बचाए रखने की पूर्वशर्त है.

कविता को सरलता , सुन्दरता  , शांति और  सुकून का अंतिम शरण्य समझने वाले रसिकजन इस कविता में ‘मौर्बिदिती ‘ या रुग्णता के दर्शन कर सकते हैं. लेकिन रोग से बेखबर रहना सब से बड़ी रुग्णता है. जब जीवन के उनियादी मूल्य , विचार और संवेदनाये हमले की ज़द में हों , तब उदासीनता सब से बड़ा रोग है. उस्मान की कविता में मनुष्यता की तमाम दुस्साध्य  बीमारियों की जागरूकता है . यह जागरूकता उदास करती है . लेकिन  इस  गहरी उदासी के चलते ही उदासीनता असंभव हो जाती है. इस उदासी को नकार कर आशावाद और निराशावाद के झूले में झूलने वाली कविता एक बनावटी आत्मतोष में स्खलित होती है .इस तरह कविता के भीतर बड़े हो हल्ले के साथ लड़ी जाने वाली लडाइयां अक्सर जिन्दगी की असली लड़ाइयों के प्रति  एक काव्यात्मक उदासीनता निर्मित करती है.अकारण नहीं है कि ऐसी तमाम कवितायें मुखर रूप से राजनीतिक न दिखने को कविता के एक मूल्य की तरह स्थापित करती हैं. इस के बरक्श   उस्मान को यह कहने में कोई झिझक नहीं है कि उन की कवितायें ‘ कतई राजनैतिक ‘ हैं  .क्योंकि ” कविता  में संभव  है उदासी / उदासीनता बिल्कुल नहीं. 

समकालीन हिंदी कविता पर बारीक नज़र रखने वाले युवा आलोचक आशुतोष  कुमार दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक हैं. इनसे  ashuvandana@gmail.com  पर संपर्क कर सकते हैं.

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