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निमित्त: उस्मान ख़ान

एक भविष्य-दृष्टि के साथ देखें या मौजूदा वक्त की निगाह से देखें या बहुत दूर नहीं गए व्यतीत के साये में देखें… कैसे भी देखें यह कहते हुए अफसोस होता है कि हिंदी कहानी बहुत देर से खुद को संदेहास्पद बनाने के आयोजन में मुब्तिला है। कहानी एक सुंदर विधा है और अगर उसे एक स्त्री मानें तब यह कह सकते हैं कि वह इन दिनों अपने रचयिता की जबरदस्ती से आजिज है। यहां मौजूद कवि उस्मान खान का गद्य इस औरत को उसकी आजिजी से आजाद कराने की एक इंकलाबी कोशिश है। गद्य इसे यूं कहा जा रहा है क्योंकि कहानी के मानकों पर यह कहानी पूरी नहीं उतरती। इसकी जिंदगी इसके उन्वान को सही नहीं ठहराती। ‘निमित्त’ का मतलब शब्दकोशों में ‘कारण’, ‘लक्ष्य’, ‘मकसद’ वगैरह बतलाया गया है। इस गद्य में जो घट रहा है, उसका निमित्त जाहिर तौर पर इस गद्य में नहीं मिलेगा। यहां गद्यकार के पास वक्त बहुत कम है और घटनाएं बहुत ज्यादा। जैसे एक छोटे से सफर में कोई हमसफर जब पूरी जिंदगी का सफर जानना चाहता है, तब बयान करने वाली कोशिश ‘क्या घटनाएं हुईं’ यह बताने की होती है, यह बताने की नहीं कि ‘घटनाएं क्यों हुईं’। इस प्रक्रिया में वाग्जाल और विस्तार कम होता है। सुनने वाला इसे संदेह से नहीं देखता, उसे सोचने का रोजगार मिल चुका होता है। संदेहास्पद कहानियों के दौर में ‘निमित्त’ एक ऐसी ही कहानी है— सोचने का रोजगार सौंपती हुई। इसने वह शिल्प नहीं चुना है जो मानकों को पूरा करने के लिए अपनी असलियत से अलग हो जाता है। यह कहानी उन कहानियों की तरह नहीं है, एक पैराग्राफ तक चलकर पढ़ने वाले जिनकी उंगली छोड़ देते हैं। #अविनाश मिश्र 

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Snap Shot from Titas Ekti Nodir Naam (1973)


निमित्त

 By उस्मान ख़ान

‘जी नहीं, आपके कहने से मैं इश्वर या धर्म पर विश्वास नहीं कर सकता! आपका ख़ुदा कैसा जीव है! न सुनता है, न देखता है, न बोलता है। उसे कुछ महसूस नहीं होता। वह खुश नहीं होता, नाराज़ नहीं होता। न्याय-अन्याय से उसे कुछ लेना-देना नहीं। फ़िर भी आपने अपनी ख़ुशी के लिए एक कल्पना-लोक बनाया है, जिसमें आप जो चाहें, हो सकता है। आपको अपनी कमज़ोरियों और कमअक़्ली को छुपाने के लिए एक खोल चाहिए, आपने अपने बाहर एक शक्ति को मान लिया, जो आपकी कमज़ोरी और कमअक़्ली को दूर कर सकती है, आप उसकी शरण में जाते हैं, उससे गुहार करते हैं, उसकी मनुहार करते हैं, वह नहीं सुनता, नहीं ही सुनता। वह हो तो सुने!’

इतना सुनने की देर थी कि बाबा ने मुझे धक्का मारकर घर से बाहर किया। ‘बदतमीज़! हरामख़ोर! भगवान को गाली देता है!’। मैं भी चुपचाप निकल गया। बाबा खुद भी जानता है कि उसने रो-रोकर, गिड़गिड़ाकर भगवान से अपनी पहली बीबी की जान की भीख माँगी थी, और भगवान ने उसकी अनसुनी कर दी थी। बाबा जब भी पहली माँ की बात करता है, भगवान को एक-दो गाली ज़रूर देता है। लेकिन मैं कैसे गाली दे सकता हूँ? भगवान का ठेका तो बाबा का है। बाबा भी ढकोसलेबाज़ है।

मुँह-अँधेरे मैं घर की दीवार से चिपककर सिर झुकाए ऐसे गली पार करता हूँ जैसे कोई उल्का-पिण्ड। तुरंत। मेरे पैर इतनी तेज़ी से उठते हैं जैसे रेल चल रही हो। मैं पूरी कोशिश करता हूँ कि घर में किसी के भी जागने से पहले घर से निकल जाऊँ। पहली बार जब आई ने दरवाज़ा खुला देखा था, तो क्या सोचा होगा! उसने मुझे कुछ कहा नहीं। मुझे पता है, मेरे बाद वही जागती है और सबसे पहला काम दरवाज़ा बंद करने का करती है। रात को भी वह दरवाज़ा अटकाकर सोती है, मैं जब चाहूँ घर आ सकता हूँ!

घर में सब लोग इस बारे में जानते हैं। कोई कुछ कहता नहीं। सबने मेरे इस रूप को स्वीकार कर लिया है। पहले-पहल बाबा कुछ कहते थे, बाद में उन्हें भी कोई फर्क नहीं रह गया। बाबा कभी-कभी मुझे परेशान करने के लिए दरवाज़ा बंद कर देते हैं, मैं भी दरवाज़ा नहीं बजाता। चुपचाप लौट जाता हूँ।

लौट जाता हूँ! कहाँ लौट जाता हूँ? कहीं भी! घर मेरे लिए मजबूरी है, जैसे सोना। मुझे नींद आने लगती है, तो मैं घर आ जाता हूँ। सोता हूँ और फिर निकल जाता हूँ। कहाँ? कहीं भी!

असल में, घर मेरे लिए एक सराय का काम देता है। जश्न हमारे घर में वैसे भी नहीं मनाया जाता और कभी कुछ हँसी-खुशी का मौका होता है, तो मैं अपनी तथाकथित मनहूस सूरत नहीं दिखाता। त्यौहारों पर भी यही स्थिति होती है। सब मुझे भूल गए हैं, ऐसा भी नहीं। पर कोई मुझे याद करना चाहता है, ऐसा भी नहीं। मैं उन्हें कुछ दे नहीं पाया। यानी अपने परिवार को। आई हैं, बाबा है, भैया है, भाभी हैं और उनसे जुड़े तमाम रिश्तेदार हैं। रिश्तेदार अक्सर आते-रहते हैं और अक्सर ही मैं इधर-उधर भटकता अपनी नींद को बहलाता रहता हूँ। भैया की स्थिति भी ऐसी ही है, वह भी घर से भागा फिरता है, जबकि वह कमाता है और कमाना अपने-आप में एक जादू है, जो लोगों को आपकी ओर आकर्षित करता है, आप जितना कमाते हैं, लोग उतना ही आपकी तरफ खींचते चले आते हैं और जहाँ आपने कमाना बंद किया लोगों को आपसे चिढ़ होने लगती है, आई भी जली-कटी सुना देती है, फिर और किसी का क्या कहूँ। हालाँकि मैं भिड़ जाता हूँ, ख़ासतौर पर रिश्तेदारों के साथ, उनसे मुझे और भी कुछ लेना-देना नहीं रहता। मैं उन्हें खरी-खोटी सुनाता हूँ। उनके मुँह पर उनके काले धंधे और धुर्तताओं की बात करता हूँ। वे मुझसे ख़ार खाते हैं। मैं उनसे मज़ा पाता हूँ।

आप सोच रहे होंगे मैं कोई काम क्यों नहीं करता। दरअसल, मैं कोई काम करना नहीं चाहता। काम करने से क्या होता है? काम करने से आज तक किसी को कोई फायदा हुआ है! कुल मिलाकर रुपया कमाने के अलावा काम करने का कोई और मकसद मुझे नज़र नहीं आता। और मैं रुपया कमाना नहीं चाहता। जी नहीं! ऐसा नहीं कि मैं निठल्ला हूँ। मैं पूरा दिन और कभी-कभी पूरी रात भी घुमता रहता हूँ। इस गली से उस गली, इस मुहल्ले से उस मुहल्ले, इस चौक से उस चौक। मैं दिन-भर चलता रहता हूँ। इस शहर का एक-एक हिस्सा मैं माप चुका हूँ। अब यह तो कोई काम नहीं है, और इस काम का कोई रुपया भी नहीं देता। और अगर देता भी, तो मैं लेता नहीं।

फिर आप कहेंगे मैं खाता-पीता कहाँ से हूँ? मैं कुछ छोटे-मोटे काम करता हूँ। फ्री-लांसिंग समझिए! तब भी मुझे घर से लगाव है। पता नहीं मेरा मन यहाँ अटका रहता है। सोने को तो मैं कहीं भी सो सकता हूँ। पर कहीं भी सोने पर बाबा घर ले आते हैं। कभी मुझे समझ नहीं आता कि ये लोग मुझसे चाहते क्या हैं? रुपया! बस यही एक चीज! क्या रुपये के बाहर आदमी का कोई काम नहीं! भैया बोलता है कि मैं अव्यवहारिक हूँ। मैं ध्यान नहीं रखता किसके सामने क्या बोलना चाहिए। मैं मूढ़मगज हूँ। ऐसा भैया का कहना है। मेरा मानना है वह एक हाफ-फ्राई ऑमलेट है, जिसे वास्कोडिगामा ने बनाया था और अब फफूँदा चुका है। वह इन्सान नहीं है। रुपये का भक्त है। एक-एक रुपये का नफ़ा-नुकसान जोड़ता रहता है। उसने अपनी एक दुकान डाल ली है। उसी पर ऐंठता है। और कुछ नहीं। बाबा जानता है कि भैया मकान के चक्कर में उसकी देख-रेख कर रहा है। अगर आज वो मकान भैया के नाम करा दे, तो भैया कल ही उसे घर से निकाल दे। या कम से कम ऊपरवाली कोठरी में डाल दे, जिसमें अभी मैं डला हुआ हूँ!

बाबा मुझे ठीकाने से लगाना चाहता है, लेकिन हार चुका है, एक वह समझ चुका है कि मुझे नहीं समझाया जा सकता। भाभी अब भी समझती है कि मुझे दुनियादारी के काम में लगा सकती है, पर मेरा ख़याल है वह ग़लत समझती है, बल्कि मेरा मानना है कि वह मुझे समझती ही नहीं। उसे मेरी शादी के अलावा कुछ नहीं सूझता। उसे लगता है शादी ही मेरे मर्ज़ का ईलाज है। वैसे मेरा मर्ज़ है क्या?

मैंने कहा कि मैं रुपया नहीं कमाता, इधर-उधर घुमता रहता हूँ, कभी कोई काम मिल जाए तो कर लेता हूँ, वह भी मनमाफिक, मन नहीं हो तो कोई मुझसे काम नहीं करवा सकता, कोई कितना ही बड़ा तीसमारख़ाँ क्यों न हो, कितनी ही नौकरियाँ मैंने ऐसे ही गँवाई है। बाबा ने अब किसी से मेरी नौकरी के बारे में बात करना भी बंद कर दिया है। कभी-कभी अच्छा लगता है कि सभी लोगों ने मेरे इस रूप को स्वीकार कर लिया है।

खै़र! जब मैं सुबह दीवार से चिपककर तेज़कदम गली पार करता हूँ, तो मेरा मकसद सीधे बस-अड्डे की तरफ जाना होता है। बस-अड्डे पर भाई लोग खड़े रहते हैं। इनमें से अधिकतर लड़के अख़बार का इंतज़ार कर रहे होते हैं। अलग-अलग बसों में अख़बारों के बंडल रख दिए जाते हैं और फिर भाई लोग फ्री हो जाते हैं। वे सब मुझे जानते हैं। मैं कभी-कभी उनके साथ भी बैठता हूँ, ख़ासकर ठंड के वक़्त, जब वे लोग टायर जलाकर हाथ तापते हैं। ज़्यादातर लड़के कॉलेज में हैं, एक-दो अनपढ़ हैं और दो, जिन्हें मैं पहले जुड़वा भाई समझता था, पिछले पाँच साल से दसवीं पास करने की कोशिश कर रहे हैं। यही आठ-दस लड़कों का झूंड हर सुबह यहाँ पहुँचता है। ये लोग शोर-गुल मचाते हैं। बसों में सवारियाँ बैठाते हैं, सामान लादते हैं, ग़रज़ कि दिन-भर बस-अड्डे पर अपना टाईम काटते हैं और रुपया कमाते हैं। मुझे पढ़ा-लिखा और सीधा-सादा आदमी समझते हैं, सोचते हैं मुझे दुनिया की ज़्यादा ही फिक्र है। लेकिन जैसा कि उस दिन महेश कह रहा था, मैं कुछ नहीं कर सकता। सोचने से कुछ नहीं होता। शायद उस दिन वह किसी से नाराज़ होगा, और अपना गुस्सा मुझ पर निकाल रहा होगा। वर्ना वह ऐसा क्यों कहता!

मैं हर सुबह दो घंटे इसी बस-अड्डे पर बिताता हूँ। अब ये लोग मुझे हर रोज़ देखने के आदी हो गए हैं। जब शुरू में मैं यहाँ आता था, तो ये लोग मुझे हैरत और शक की नज़र से देखते थे। धीरे-धीरे मुझे जानने लगे, और मुझे अहानीकारक जानकर मेरी उपेक्षा करने लगे। मुझे उनकी उपेक्षा से कोई फर्क नहीं पड़ता।

बसों की आवाज़, लोगों के शोर-गुल के बीच यहाँ सुबह होती है। अलग-अलग दिशाओं में जाने वाले लोग इकट्ठा होने लगते हैं। कुछ लोग रोज़ के मुसाफ़िर हैं, उन्हें भी मैं पहचानता हूँ। फिर भी एक अनजानापन सबके चेहरे पर दिखाई देता है। वे लड़के भी मुझे नहीं जानते, दुकानवाले भी नहीं, मुसाफ़िर भी नहीं। वे सब असल में मुझे सनकी समझते हैं।

वैसे मैं मृदुभाषी हूँ। लेकिन मैं उनकी हाँ में हाँ नहीं मिला सकता। ख़ासतौर पर बुढ़ों में मैं यह बीमारी पाता हूँ। वे चाहते हैं कि मैं उनकी बातें सिर हिलाकर स्वीकार करता जाऊँ, लेकिन ये मुझसे नहीं होता। मैं कैसे काले को सफेद मान सकता हूँ, फिर चाहे कोई महात्मा ही यह बात मुझे क्यों न कहे! पर लोग जब अपने से ही जुदा हैं, तो फिर मुझसे कैसे मिलेंगे! हो ही सकता है, ऐसा मैं सोचता हूँ, क्योंकि कभी-कभी मुझे यह भी लगता है कि यह मेरी हताशा है, जो मुझे ऐसा सोचने पर मजबूर करती है, वर्ना ये लोग तो खुश हैं। अपना काम करते हैं, रुपया कमाते हैं, घर-परिवार देखते हैं, मान-सम्मान पाते हैं। इन्हें बेवजह दुःखी क्यों माना जाए!

हर रोज़ सूरज उस कचरे के ढेर के पीछे से उगता है। कुत्ते उस ढेर पर लोटते रहते हैं। सुअर चरने के लिए आते हैं। ढेर से कचरा निकालकर ठंड में लड़के जलाते हैं।

इस दीवार की टेक लगाए मैं हर रोज़ की योजना तैयार करता हूँ, यानी आज मुझे कहाँ जाना है? किधर घुमना है? मैं झूठ नहीं बोलूँगा, कभी-कभी अपनी धुन में मैं शहर से बाहर भी निकल जाता हूँ। आस-पास के देहातों में चक्कर मारता हूँ। मैंने चाय पी, पोहा खाया और त्रिवेणी की तरफ़ चल दिया। आज का दिन उधर ही गुज़ारने का विचार था। त्रिवेणी उस जगह का नाम क्यों है? मेरी जानकारी में इसीलिए कि कभी वहाँ तीन नालों का संगम होता था, पर समय के कचरे-गंदगी ने उन नालों में बहते प्रसाद जल को काला-बदबूदार बना दिया था और दो नालों पर बस्तियाँ बन चुकी थी। एक नाला बचता था, जो अब भी वहीं स्थिर है, काला-बदबूदार जल बहाता हुआ। पर तब जब ये नाले साफ़ पानी से भरे रहते थे कुछ जोगियों ने अपना मठ इनके किनारे बनाया। आज वह मठ बस्ती के बीच आ गया है। लेकिन मठ की बावड़ी बस्ती से थोड़ी दूर है। मठ के पास काफ़ी जगह है। जिसमें कुछ खेत हैं, दुकाने हैं और एक बाग़ीचा और एक बड़ी बावड़ी है। असल में, त्रिवेणी की तरफ जाने का मतलब इस बावड़ी की तरफ जाना ही है। गर्मियों में बावड़ी के आस-पास इतनी शीतलता रहती है कि सो जाने को मन करता है, पर पूजारी या कभी दुकानवाले आकर उठा देते हैं। और फिर उनसे कौन चिक-चिक करे! पर वे भी मुझे जानते हैं, और अक्सर टोकते नहीं, पर जानते हैं कि मेरी जेब में माताजी के दान-पात्र में डालने के लिए कुछ भी नहीं रहता है; बल्कि भोग वगैरह के वक़्त मैं अक्सर उपस्थित रहता हूँ। शायद इसीलिए उनके मन में मेरे लिए कुछ कलुष है! पर मैं वहाँ पहुँच ही गया।

अभी आठ ही बजे थे। एक माशूक-आशिक पहले ही बरगद के नीचे बैठे थे। मुझे देखकर थोड़ा संभल गए। किताब लेकर ऐसे देखने लगे, जैसे इतिहास या विज्ञान की सबसे गंभीर समस्या पर चिंतामग्न हों। मैंने उनकी उपेक्षा की, और आगे बढ़ गया। देखता क्या हूँ, दूसरे बरगद के नीचे एक और जोड़ा बैठा है। उफ़! इन तोता-मैनाओं ने हर दृश्य ख़राब कर रखा है। कभी-कभी सोचता हूँ नौजवानों की उस मुहिम से जुड़ जाऊँ, जिसमें ऐसे जोड़ों को देखते ही उनके घर फोन कर दिया जाता है, और हीर-राँझे की अच्छी-ख़ासी बेइज़्ज़ती की जाती है। पर, यह क्रूर आनंद मैं मन ही मन लेता रहा। मुझे इन लड़कियों में रुचि नहीं। इन लड़कियों में जान नहीं होती। ये अपने कहे पर टिकी भी नहीं रह सकतीं। मुझे तो लगता है, मौज-मस्ती के लिए ही ये लोग यहाँ आते हैं, या किसी भी ऐसी शांत जगह पर जाते हैं, जहाँ इनकी चहचहाहट कोई न सुने। फिल्मों ने इनके दिमाग़ का सत्यानाश कर दिया है। हर कोई अपने को फिल्मी नायिका या नायक समझता है। वैसे ही चलते-फिरते हैं। बैठते-उठते हैं। हँसते-रोते हैं। कपड़े पहनते हैं। गाने गाते हैं। इन्हें देश-समाज से कुछ लेना-देना नहीं है। एक-दूसरे को छूने-चूमने-भोगने के अलावा इनके पास कोई विषय नहीं है। टॉकिज के बच्चे!

मैं आगे बढ़ता गया। दूसरे के बाद तीसरा जोड़ा मिला। खै़र हुई चौथा जोड़ा नहीं मिला, फिर भी दो और बरगद छोड़कर मैं सातवें बरगद तक पहुँचा। यह बाग़ीचे का आख़री बरगद है। इसके बाद खेतों का सिलसिला शुरू हो जाता है। इस बरगद के बाद, कुछ जगह छोड़कर, जामून और अमरूद के पेड़ लगे हैं, और साथ में ही मिर्च, धनिया और बैंगन-टमाटर, पुदीना-जैसे पौधे-पत्ते लगे रहते हैं। बाग़ीचे का यह कोना ही मुझे सर्वाधिक पसंद है। इधर तक कोई नहीं आता। मैंने थोड़ी देर में तीनों जोड़ों की सुध लेने की सोची। समाज में बेहयाई मुझे पसंद नहीं। जो करना है विधि-विधान से करो। यह क्या कि आज इसका हाथ पकड़े घुम रहे हैं, कल उसका मुँह चूम रहे हैं! यह सब मुझे लफंगई लगती है। लड़का करे या लड़की। मैंने देखा तीनों यथावत् प्रेम-क्रीड़ा में संलग्न हैं। वे मुझे भूल चुके। एक लड़की की खीं-खीं मेरे तन-बदन में आग लगा गई। झुँझलाकर मैंने एक पत्थर उठाया, और पहले बरगद की ओर फेंका। मुझे अचानक इन लोगों पर गुस्सा आने लगा था। पत्थर सीधे लड़की के सिर पर लगा था। लड़की खून-झार हो गई। लड़का दौड़कर मेरी तरफ़ आने लगा। मैं शांत मूरत बनकर बैठा रहा। एक पल के लिए लड़का रुका, फिर पीछे दौड़कर गया। लड़की को देखने लगा। फिर दौड़कर मेरी तरफ़ आया। लड़की की चीख़ सुनकर बीचवाले दोनों जोड़े भाग गए थे। लड़का मेरे पास पहुँचा, ‘भैया, देखिए न दीदी को किसी ने पत्थर मार दिया है!’। मेरी जान में जान आई, मुझे समझ आया कि उसे मुझ पर नहीं किसी और पर शुब्हा है। मैं उसके साथ दौड़कर उस तरफ़ गया। देखा लड़की प्राण त्याग चुकी थी। उसकी सफ़ेद चुनरी लाल हो गई थी। एकबारगी मेरे शरीर में झुनझुनी दौड़ गई। मैंने बोला, ‘यह तो गई!’। लड़का वहाँ से भाग खड़ा हुआ। मैं चिल्लाता रहा, ‘अबे! कहाँ भाग रहा है? क्या कर दिया लड़की का?’ मैंने देखा अब वहाँ कोई नहीं था। मैंने लड़की का चेहरा ग़ौर से देखा। वह मेरी भाभी थी। अब मैं लड़के का चेहरा याद करने लगा, लेकिन मुझे याद नहीं आ रहा था।

मैं धीरे-धीरे उस जगह से दूर निकल गया। मन फिर शांत होने लगा। मुझे नहीं पता कि मैंने इतनी आसानी से यह फैसला कैसे ले लिया! मुझे अपनी आज की योजना में फेर-बदल करना पड़ा। मैं अब शहर के दूसरे कोने की ओर जाना चाहता था। लेकिन, शहर के अंदर से होकर नहीं। मैंने सोचा था कि एक बजे तक गंगानगर पहुँच जाऊँगा। वहीं कुछ खाऊँगा, और फिर शाम वहीं काटूँगा। गंगानगर शहर का बाहरी ईलाक़ा है। यह नगर अभी बस रहा है। जब सरकार ने ग़रीबों के लिए घर बनाने की सोची, तो शहर के बाहर इस कुड़ेदान को चुना। इसके आगे खेत शुरू हो जाते हैं और फिर उबड़-खाबड़ ज़मीन जो जंगल में बदलती जाती है। गंगानगर भी एक बस-अड्डा है। यह एक छोटा बस-अड्डा है। यहाँ से गाँवों की तरफ़ जाने वाली बसें मिलती हैं। बस-अड्डे से थोड़ी दूर सड़क के किनारे एक दुकान है, जहाँ दिन में आपको खाना मिल सकता है। मैं खाना खाकर झरने तक घूमने भी जाऊँगा, और अगर मन हुआ, तो नहा भी लूँगा।

दुकान तक पहुँचते हुए एक बार मेरे पैर लड़खड़ाए, जैसे मुझे चक्कर आ गया हो। मैंने खुद को संभाला और दुकान के बाहर लगी बेंच पर बैठ गया। दुकानवाला मेरा मुँह ताक रहा था। फिर मेरी ओर देखकर मुस्कुराने लगा। मैंने एक दर्दभरी मुस्कान दी। वह मेरे पास आकर बोला, ‘क्या हुआ?’

मैंने कहा, ‘चक्कर आ गया!’ वह फिर मुस्कुराने लगा। ‘अभी तो गर्मी शुरू भी नहीं हुई, अभी से चक्कर खाकर गिरने लग गए!’ अब मैं मुस्कुराया। मैंने खाना खाया और एक लस्सी पी। जान में जान आई। पर, एक फाँस-सी गले में लग रही थी। बार-बार प्यास लग रही थी। आखिर मैं उठकर झरने की तरफ चल दिया।

इस पगडंडी से मैं कई बार झरने की तरफ गया हूँ। मैं देख रहा था, आसमान एकदम साफ़ था। नील। कुछ एकदम सफ़ेद-झक बादलों के टुकड़े थे, जो इधर-उधर खिसक रहे थे, ऐसा लग रहा था जैसे नीले दवात पर रुई के फाहे इधर-उधर तैर रहे हों। अब इस पगडंडी पर मैं अकेला चला जा रहा हूँ। धीरे-धीरे शहर की सब निशानियाँ गुम होती जा रही हैं। तालखेड़ी आ गया। गाँव के किनारे होते हुए मैं आगे बढ़ता जा रहा हूँ। देखता हूँ, पगडंडी पर कुछ लोग अर्थी लिए जा रहे हैं। मैं धीरे चलने लगता हूँ, ताकि उन लोगों से एक निश्चित दूरी बनाए रख सकूँ। पर, कदम अपनी गति पकड़ लेते हैं। मैं उनके करीब पहुँच गया हूँ। उलझन में हूँ, उन लोगों से आगे निकलना ठीक नहीं जान पड़ रहा, पता नहीं क्या सोचने लगें! कहीं कोई झगड़ा न करने लगे! आखिर, मैं उनके पीछे-पीछे चलने लगा। एक-दो लोगों ने मुझे पलटकर देखा, और फिर अपनी गति से चलने लगे। कुछ देर में वे लोग पगडंडी छोड़कर खेत के रास्ते आगे बढ़ गए। मैं झरने की तरफ बढ़ने लगा। झरने के पास जाकर बैठ गया।

शाम हो चुकी थी। दूर-दूर तक पंछियों के झुंड दिखाई दे रहे थे। झरने के पास कुछ पक्षी-दल उतरते, और दाना-पानी करके आगे बढ़ जाते। कुछ ही मिनटों में वह जगह पंछियों के कलरव से भर गई। झरने की आवाज़ पंछियों के शोर-गुल में दब गई। इन पंछियों को मेरे आस-पास भटकने से डर नहीं लग रहा था। मैं मूर्ति की तरह अचल बैठा था। मेरे कंधे, सिर, गोद सब पर पंछी बैठे थे। मैं आँखें बंदकर उनके नाखुनों और चोंच के वार सह रहा था। मुझे इस काम में अद्भूत आनंद मिल रहा था। जैसे, शरीर और दिमाग़ दोनों एक साथ हलके होते जा रहे थे। जीवन का कौन-सा सुकून था, जो इस रास्ते मिलना था! मेरा मन शांति से सराबोर था। इस तरह ताज़ा महसूस हो रहा था, जैसे शरीर श्मशान का धूँआ खाने के बाद नहाने पर करता है। मेरा रोम-रोम धूल रहा था कि एक आदमी ने हाँका लगाया। वह दौड़कर मेरे पास आ गया। मैंने चौंककर उसे देखा। वह हाँफ रहा था। अचरज से मेरी ओर देखते हुए बोला, ‘क्या हो रहा है?’

मैंने पहले अपनी तरफ़ देखा, मेरे शरीर पर जगह-जगह घाव हो गए थे, पर मुझे दर्द नहीं हो रहा था। मेरा शरीर जैसे सुन्न था। दिमाग़ भी कुछ ग्रहण नहीं कर रहा था। मैं उस आदमी को देखता रहा। उसके पीछे नीला आकाश था। मुझे चक्कर-सा आने लगा।

जब जागा तो देखता हूँ, अपने घर में हूँ, मेरी झाड़-फूँक हो रही है। मेरे शरीर के घाव कसक रहे हैं। मैं आई को आवाज़ देता हूँ। आई मेरे पास आकर बैठ जाती है। मेरी नज़र भाभी की माला चढ़ी तस्वीर पर पड़ती है। मैं रोने लगता हूँ। आई मेरे सिर पर हाथ रखती है, और कहती है, ‘सब ठीक हो जाएगा!’ लेकिन मेरी आँखों से आँसू बहे जा रहे हैं, और मैं लगातार कहे जा रहा हूँ, ‘मैं अब रुपया कमाऊँगा!’। एक साधू मेरे पास आकर खड़ा हो जाता है। मैं अपनी बात दोहराए जा रहा हूँ। वह मेरे सिर पर भभूत मलता है। मुझे पसीना आने लगता है। मैं अपनी बात दोहराए जा रहा हूँ। बाबा मेरे पास आकर खड़ा होता है। थोड़ी देर मुझे देखता रहता है, फिर एक ज़ोरदार तमाचा जमाता है, और मैं चुप हो जाता हूँ, उसका मुँह देखने लगता हूँ।

वह एक ऐसा दिन था, जिसने मेरी ज़िन्दगी बदल दी। मैंने भैया के सामने भाभी के साथ हुई दुर्घटना पर दुःख जताया, और अपनी सफ़ाई में यही कहा कि मुझे पता ही नहीं! किसी आवाज़ के पीछे-पीछे मैं झरने तक चला गया था! और, फिर आगे क्या हुआ, मुझे पता नहीं! बात यही थी कि तालखेड़ी का ही कोई आदमी मुझे झरने के पास से उठाकर लाया था, बाद में, गंगानगरवाले दुकानदार से बात करके पता चला कि उसने ही मेरे मामा को सूचित किया था। वह मेरे मामा का पुराना दोस्त है। फिर, मैं एक दिन अस्पताल में भी बेहोश रहा। घर पर भी एक-दो दिन बदहवासी की हालत में रहा।

धीरे-धीरे मेरे घाव भर गए। कई बार सोचा कि भैया या आई को बता दूँ कि भाभी को पत्थर मैंने ही मारा था। पर इससे बात उलझ जाएगी। वे लोग समझ नहीं पाएँगे, और मैं भी समझा नहीं पाऊँगा। अब मैं बस-अड्डे या त्रिवेणी या गंगानगर या शहर-सराय की तरफ नहीं जाता। इधर-उधर भटकना भी मैंने बंद कर दिया है। मन में एक कचोट रहती है, पर कोई तरीका नहीं सूझता, क्या करूँ? जो मैंने किया है, उसका कोई दोष अपने ऊपर नहीं मानता। आखिर, मैंने जान-बूझकर कुछ नहीं किया। मुझे क्या पता था कि पत्थर सीधा जाकर उसको लगेगा! और, वह मेरी भाभी होगी, और, वह भी इतनी कमज़ोर कि एक पत्थर की चोंट भी नहीं झेल पाएगी! भैया दूसरी शादी के लिए गोटी सेट कर रहे हैं। उनकी एक मुहब्बत थी। पिछले ही साल उसके भी पति का देहावसान हो गया। वह भी गली में ही रहती है। आई ने उसकी मौसी से बात की है। हो सकता है, अगले साल मेरे पास फिर से भाभी हो! आई मेरी भी शादी कराना चाहती है। मैंने भी इनकार नहीं किया। जिन रिश्तेदारों को मैं गाली दिया करता था, उनके साथ भी अब तमीज़ से पेश आता हूँ। भगवान को उलटा-सीधा बकना भी मैंने बंद कर दिया है। सब्ज़ी-मंडी में हिसाब देखने का काम पकड़ा है। काम अच्छा है। सुबह-सबेरे सब्ज़ी-मंडी पहुँच जाता हूँ, दिन-भर वहीं फलों और सब्ज़ियों की गंध में कटता है। शाम को सीधे घर पहुँचता हूँ। टी.वी. देखता हूँ। कभी चौक तक घुम आता हूँ। फिर सो जाता हूँ।

भाभी मेरी शादी करवाना चाहती थी। अगर ज़िंदा रहती, तो कितनी खुश होती कि मैं काम-धंधे से लग गया हूँ, और लड़की देखने के लिए उत्सुक हूँ। पर कौन जाने, तब ऐसा होता भी!

आखिर वह दिन भी आया, मेरी शादी हो गई। मैंने जब करुणा का घूँघट उठाया, मेरा दिल धक् करके रह गया। एकबारगी लगा, भाभी है। मैंने खट् से घूँघट छोड़ दिया। दूसरी बार घूँघट उठाने की मेरी हिम्मत नहीं हुई। आखिर करुणा ने ही घूँघट उठा दिया। मैं उसका चेहरा देखकर फुला नहीं समाया। मेरा वहम था, और कुछ नहीं। मैंने करुणा के कंधों को चूमा।

मेरी शादी हो गई थी, पर मैं करुणा से एक दूरी बनाए रहता था। उसके साथ अकेले रहने में मुझे शंकाएँ घेरने लगती थी। वह मेरे अतीत के बारे में कुछ नहीं जानती! मैंने कहाँ-कहाँ खाक छानी है? कैसे-कैसे पापड़ बेले हैं? वह कुछ नहीं जानती! वह मुझसे कुछ जानना भी नहीं चाहती। वह अपने में खुश है। बस उसे एक बच्चा चाहिए, फिर वह और खुश हो जाएगी। मुझे लगता है, उसकी ज़िंदगी में बस खुश होना ही लिखा है। वह हमेशा प्रसन्नचित्त रहती है। मैं भी उसे देखकर खुश होता हूँ। वह चपल है। चंचल है। जीवन से भरी हुई है। फिर भी, कभी-कभी मुझे डरा देती है। रात को जब वह पानी पीने उठती है, मैं उस पर नज़र रखता हूँ। अगर वह गु़सलख़ाने में जाए और ज़्यादा देर लगाए, मुझे आतुरता होने लगती है कि वह क्या कर रही है?

मेरी शंका ठोस होने लगी जब एक दिन मैंने करुणा को कमरे में अकेले कुछ बुदबुदाते सुना। मैं ऐसी बुदबुद अक्सर सुनता रहता था, पर पहली बार मैंने साफ़-साफ़ सुना। यह करुणा की ही बुदबुदाहट थी। मैंने गुसलख़ाने के दरवाज़े पर कान टिका दिए। वह कुछ मंत्र-सा बुदबुदा रही थी। बीच-बीच में मेरा नाम ले रही थी। गुसलख़ाने से अगरबत्ती की गंध आ रही थी। उसकी बुदबुदाहट तेज़ हो रही थी। मेरे मुँह से आवाज़ नहीं निकल रही थी कि एक हल्की-सी आवाज़ निकली, ‘करुणा!’। अंदर से बुदबुद की आवाज़ बंद हो गई। मेरी साँस में साँस आई कि देखता हूँ करुणा बालकनी से झाडू़ निकालती हुई कमरे में खिसकती आ रही है। वह मेरी ओर देखकर हल्के-से मुस्कुराती है, और अपने काम में मगन हो जाती है। मैं गुसलख़ाने का दरवाज़ा खोलता हूँ, अंदर बाल्टी में बूँद-बूँद पानी चू रहा है। मेरा हलक़ सूख रहा था, मैं गु़सलख़ाने का नल कसके बंद कर रसोई की ओर चला गया। आई और भैया रसोई में बैठे भैया की शादी में लगने वाले सामान की लिस्ट तैयार कर रहे थे। मैंने पानी पीया और आई के घुटने पर सिर रख रोने लगा। आई बोली, ‘क्या हुआ?’। मैं कुछ कह न सका। रोना बंदकर चुपचाप आई की गोद में लेट गया।

मैं सोचता हूँ कि अब समय इस बोझ को बढ़ाता ही जाएगा। मैं कभी यह स्वीकार नहीं कर सकूँगा कि मैंने ही भाभी को मारा है, अनजाने में ही सही। उन दिनों की उदासी और खीझ याद करके अब भी मेरा मन भर आता है। पता नहीं, उन दिनों क्या धुन रहती थी। कहीं मन नहीं लगता था। और अब, मन बीच-बीच में बेवजह हड़बड़ाने लगता है। साँस फूलने लगती है।

भैया की शादी हो गई। मेरे और करुणा के पास एक लड़की है। पता नहीं क्यों, आई ने उसका नाम महिमा रख दिया है! महिमा भैया की पहली पत्नी का नाम था। मेरे जीवन में और एक शाश्वत दुःख इस नाम के साथ आ गया। मैं आई को समझा भी नहीं पाया कि क्यों यह नाम नहीं रखना चाहिए! उल्टा मैंने देखा, आई ने जब मुझसे पूछा कि इसका नाम महिमा रख दें, तो मैंने ऐसे सहर्ष स्वीकृति दी, जैसे मैं ख़ुद यही नाम रखने वाला था।

पर इन दो वर्षों ने मुझे पूरी तरह बदल दिया। मेरे बाल सफेद हो गए हैं। चेहरा झुलसा हुआ लगता है। शरीर के पुराने घाव फिर उभर आए हैं। क्या बीमारी है, कुछ पता नहीं चलता! शरीर से मवाद निकलता रहता है। दर्द होता है। हगन-मूतने से भी मोहताज हो गया हूँ। करुणा दिन-रात मेरी देख-भाल में लगी रहती है। महिमा से ज़्यादा बच्चा मैं हो गया हूँ। देखता हूँ, सबको मेरी फिक्र लगी रहती है। भैया जैसा रुपयों का दास, मेरे ईलाज पर अपना सबकुछ लुटा चुका है। पर, मेरा शरीर छीजता जा रहा है। घावों के आस-पास लगता है माँस खींचा रहा है, जैसे घाव का छेद और बढ़ने वाला है। तेज़ दर्द होता है। मैं चीखता रहता हूँ। महिमा का कमरा अलग कर दिया गया है। उसे आई के कमरे में सुला दिया जाता है। नई भाभी मुझसे घृणा-सी करती है। उसका चेहरा देखकर मुझे अपने जीवन से और निराशा हो जाती है। लगता है, मैं मर ही जाऊँगा!

अब सोचने की क्षमता भी जवाब दे रही है। मैं कुछ बुदबुदाता रहता हूँ। कोई समझ नहीं पाता। करुणा भी रुखी और उदास होती जा रही है। बात-बात पर भाभी से झगड़ पड़ती है। कभी मुझे एक-दो दिन आराम भी रहता है। पर, यह आराम शारीरिक होता है। घाव जैसे टीसना कम कर देते हैं। वह भी आखिर थक जाते हैं। लेकिन, दिमाग़ में ख़यालों का अंबार लग जाता है। करुणा का क्या होगा? महिमा का क्या होगा?

कभी एक लाल चुनरी हवा में लहराती दिखती है।

धीरे-धीरे मैं ख़तम हो रहा हूँ।

एक दिन करुणा महिमा का झूला मेरे पलंग के पास डालकर खाना बनाने रसोई चली गई। महिमा थोड़ी देर हँसती रही, फिर चुप हो गई। मैंने पलंग पर लेटे-लेटे ही महिमा को संबोधित कर अपनी बात शुरू की…मैं नहीं जानता, उस दिन मुझे क्या हुआ था। पर न जाने क्यों, मैं अब भी, खुद को गुनाहगार नहीं मान पाता हूँ! आख़िर, वह एक पल का बहाव था। होनी कौन जानता था?…आदमी किन-किन चीज़ों के वश में नहीं होता! वह सोचता कुछ है, कहता कुछ है, करता कुछ है, और, होता कुछ और है! किसका मनचाहा हुआ है दुनिया में!…हाँ, ठीक है, मैं सच्चे मन से मानता हूँ कि मैंने ही भाभी को मारा है। बस!…मुझे लगा मेरे मन से एक बोझ हट गया।

धीरे-धीरे रात घिर आई। दो साल में मेरा हाल यह हो गया था कि अगर कोई मुझे पहली बार देखता, तो बाबा का भाई ही मानता। मेरे सारे बाल पक गए थे। दवाईयाँ खा-खाकर मुँह का स्वाद बिगड़ गया था। हमेशा थूकते रहने की इच्छा होती थी। धीरे-धीरे चारों ओर सन्नाटा पसर गया था। पूरा शहर इस वक़्त सो रहा है। नहीं, पूरा शहर कभी नहीं सोता! लेकिन, जितना सो रहा है, उतनों के सपने हैं, हाँ, ठीक है, सब लोग सपने भी नहीं देख रहे हैं, लेकिन आज रात जो लोग सपने देख रहे हैं, वे सब सुन लें, ‘मैंने ही अपनी भाभी की जान ली है!’।

हमेशा मैं ऐसा नहीं करता, पर आज मैंने दवाई नहीं ली। मैं चुपचाप लेटा था। कभी नींद का बगुला पलकों पर बैठ जाता था और कभी पंख फड़फड़ाकर उड़ जाता था। मेरी नींदे हराम थीं। इसीलिए मुझे दवाई खाकर सोना पड़ता था, पर कभी-कभी, मैं उसे टाल भी देता था। यानी, खिड़की से बाहर फेंक देता था। यह काम सफाई से करना होता था, वर्ना आई, करुणा सब लोग मुझे पचास बातें समझाने लगते, जिनसे मन और कमज़ोर हो जाता है। चाँदनी का एक टुकड़ा खिड़की से कमरे के अंदर गिरा हुआ था। मैं उसी को देख रहा था। करुणा वहीं लेटी थी। करुणा की देह अब भी आकर्षक है। आखिर वह 23 साल की है। कसी हुई। एक बच्चे की माँ होकर भी वह अभी ढिलमढल्ला नहीं हुई है। उसका हँसना कम हो गया है, लेकिन वह आनंद की मूर्ति है। उसे देखकर मन प्रफुल्ल हो जाता है। अचानक चाँदनी के टुकड़े पर एक साया दिखाई दिया। उसने करुणा को हल्के से हिलाया। करुणा जागी, हड़बड़ाई, और पलंग की ओर देखने लगी। मैंने एक पल के लिए आँखें बंद कर लीं, और फिर पलकों की कोर से देखने लगा। करुणा उठकर मेरे पास आई। दो पल मुझे देखा, और फिर मुझे हल्के से हिलाया। मैं ऐसे पड़ा रहा, जैसे बेहोश हूँ। वह आदमी वहीं चाँदनी के टुकड़े पर लेटा हुआ था। करुणा भी उसके पास जाकर लेट गई। मैं उनकी काम-लीला देखता रहा। पता नहीं, मेरे मन को क्या सुख मिल रहा था! मेरी आत्मा तृप्त हो रही थी। मुझे लग रहा था, जैसे मेरे मन पर बरसों से रखा कोई बोझ हट रहा है। थोड़ी देर में देखा चाँदनी के टुकड़े पर अकेली करुणा रह गई थी। लेकिन अब, उसकी देह देखकर मुझे घिन आ रही थी। सारा आकर्षण मुलम्मे की तरह उतर रहा था। मेरे मन में ईर्ष्या पैदा हुई। बदले की भावना। अब मैं करुणा से बदला लेना चाहता था। आखिर उसने मुझे धोखा दिया है। भाभी भी तो धोखा दे रही थी, अनजाने ही उसे सज़ा मिल गई।

मैं अपने घावों के ठीक होने की दुआ करने लगा। मैं चुप था। करुणा मेरी रोज़ की तरह सेवा कर रही थी। जैसे कुछ हुआ ही नहीं। पर अब, उसके हर स्पर्श में मुझे अजीब झनझनाहट महसूस होती थी, जैसे उसका बदन कोई ग़लीज़ चीज़ हो। कभी-कभी मैं उसके हाथ से अपने को बचाने की कोशिश करता था। मुझे लगता है, करुणा को कुछ भान हुआ था। मैं भी सचेत रहने लगा।

धीरे-धीरे मैं ठीक होने लगा। बाल तो सफेद ही रहे, लेकिन घाव भर गए। करुणा का हँसता चेहरा धीरे-धीरे उदास होने लगा। अब उसके खाट पकड़ने की बारी थी। आई ने कहा, ‘तेरी सेवा ने ही उसे थका दिया है। अब तू उसकी तीमारदारी कर!’ मैंने भी उसकी सेवा का बीड़ा उठा लिया। उसे बुखार आ गया था। काम का बोझ तो उस पर बढ़ा ही था। महिमा को जन्म दिया, और फिर मेरी उपचार-व्यवस्था करती रही। फिर घर के काम-काज अलग! और फिर वह आदमी। मेरे मन ने ईर्ष्यामयी क्रूर अट्ठहास किया। वह भी तो मेहनत का काम है!

मुझे महिमा के अपनी बच्ची होने पर शक होना लाज़मी था। मैं दिन-भर उसके चेहरे से अपना और करुणा का चेहरा मिलाता रहता था। मुझे विश्वास हो गया कि वह मेरी लड़की नहीं है। महीनों बाद मैं बाज़ार गया। जब लौटकर आया तो रात गहरा चुकी थी। घर पर सब लोग सो गए थे। दरवाज़ा अटका हुआ था। मैं दरवाज़ा बंद करके अपने कमरे की ओर चल दिया। कमरे में चाँदनी का टुकड़ा वैसे ही पड़ा था। करुणा सो रही थी और महिमा भी। मैंने पास जाकर दोनों को ग़ौर से देखा। मेरे दिमाग़ में उस रात का दृश्य चलने लगा। धीरे-धीरे दिमाग़ पर एक धुन सवार हुई। मैं गुसलख़ाने में गया और वहाँ से कपड़े पीटने की मोगरी ले आया, और माँ-बेटी दोनों को दुनिया से पार कर दिया। मेरे मन में न हैरानी थी, न डर। मैं चाँदनी का टुकड़ा देख रहा था और दो साए।

इस बार भी मुझे सज़ा नहीं हुई। एक आदमी पकड़ा गया, जिसका नाम मनीष था। मैंने सोचा, मुझे अपना जुर्म क़बूल कर लेना चाहिए। पर मेरा मन फिर एक क्रूर अट्ठहास कर उठा। यह आदमी करुणा का प्रेमी था। मैं अपना काम करके कमरे से निकला, और कुछ देर में वो कमरे में घूसा। कमरे की हालत देखकर उसकी चीख़ निकल गई। सारे लोग दौड़े आए। देखा, तो वह आदमी था, और करुणा और महिमा की लाश थी। उसे पकड़कर पुलिस के हवाले कर दिया गया। उसने भी अपना जुर्म क़बूल कर लिया। तब मैंने सोचा, मैं क्यों दूसरे के फटे में पाँव डालूँ! आख़िर, यह सब उसीका किया-धरा था। अगर वह उस रात न आता, तो मैं एक-दो दिन में मर ही जाता। पर, उसी की मेहरबानी कि मैं ज़िंदा हूँ, और दो बच्चों का बाप हूँ। अब मुझे ईश्वर पर दृढ़ विश्वास है। ईश्वर-विरोधी मुझे फूटी आँख नहीं सुहाते। सोचता हूँ, अगर ईश्वर नहीं है, तो इतनी बड़ी दुनिया का नियंता कौन है? कोई शक्ति, कोई बल तो है, जो मुझसे परे है, जो मेरे माध्यम से अपना काम करता है। मेरी आत्मा भी तो उस परम-आत्मा का ही अंश है। मेरे मुँह से जो शब्द निकलते हैं, वह भी तो उस परमपिता के हैं। मेरे हाथों जो कुछ होता है, वही करवाता है। मैं तो निमित्त मात्र हूँ। कर्ता कोई और है! उसकी लीला अपरम्पार है। वह जैसा सोचता है, वैसा ही होता है। उसकी मर्ज़ी के बिना एक पत्ता भी हिलता हो, तो कोई मुझे बता दे! वह सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ है। मैं उसका दास हूँ। जो वह चाहता है, मुझसे करवाता है। मैं निर्बल हूँ। प्रार्थना के अलावा मैं कर ही क्या सकता हूँ!

हे परमपिता, परमेश्वर, परमात्मा! विकल-पीड़ित आत्माओं को शांति दे, शांति दे, शांति दे!!

usman khanउस्मान ख़ान समकालीन हिंदी साहित्य के अलहदा युवा कवि-कथाकार हैं. चर्चाओं और पुरस्कारों की भीड़ से अलहदा… छपाऊ मानसिकता से भी अलहदा... जे.एन.यू. के हिंदी विभाग से मालवा के लोकसाहित्य पर पीएचडी. इनसे usmanjnu@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

साभार- हंस, मई , 2016

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बाकी प्रेम कविताएँ: उस्मान खान

By उस्मान खान

लाल धधकते लोहे के टुकड़े

तुम्हारी आंखें,

आंखों के नीचे हड्डी की टेढ़ी-उभरी लकीर। (नज़्र-ए-शमशेर)

Snap shot from'Would You Be Mine'

Snap shot from’Would You Be Mine’

बाकी प्रेम कविताएं

1.

वहां बारिश होती है

पुरानी लकड़ी की पाट भींगती है

उसकी दरारों से दीमक चूने लगते हैं

माथे पर खिड़की के लोहे की ठंडक महसूस करता हूं

भाप जैसे बूंद-बूंद कर टपक रही है दिमाग़ में

मैं आंखें बंद कर लंबी सांस खींचता हूं

जैसे सकल विस्तार को अपनी श्वास-नलिका में घूमता महसूस करता हूं

बिंदु-बिंदु प्रकाश छिटका है

प्रकाश वर्ष दूर एक-एक बिंदु

कोई मासूम नहीं होता

न तू थी, न मैं था

तू भूल भी गई शायद

या याद भी रहा तो क्या मुझे पता नहीं!

पर एक इच्छा है जागी हुई

कि एक दिन उस खिड़की के लोहे पर माथा रख

हम दोनों बारिश देखें!

मैं तुझे जिस उम्र में छोड़ आया था

असल में, वहीं से तुझे अपने साथ लाया था

जिस दिन बारिश हो रही थी

रसायनों की हल्की गंध के बीच

मैं खड़ा था अकेला अपने में

तुम मुस्कुराई

जैसे, आज कहूं, वसंतसेना!

इसीलिए चाहता था बहुत तुम्हें

कि बक़ौल बेदिल सच सच को ढूंढ़ता है।

जिस दिन बारिश हो रही थी

मैंने एक पल के लिए ब्रह्माण्ड को सुंदर रूप दिया

आत्मसात किया

जैसे एक ठोस वस्तु तरंग बन जाती है

देखते ही देखते विचार बदले कि बस!

एक पल के लिए मैं कितनी दूर बह चला

जैसे ये पल भी उस पल का विस्तार है

जिस दिन बारिश हो रही थी।

2.

मैं बहता जा रहा था

आगे, आगे, बहुत आगे

कि तुमने मुझे श्मशान की याद दिला दी

दोपहर वह मई की

वह झरबेरियों से उलझना

पर तुमने क्यों कहा कि मैं बदल गया हूं,

मुझसे बात भी नहीं की

मिली भी नहीं!

क्या मैं ऐसा बदल गया था

कि हम बात भी नहीं कर सकते थे।

शायद मैंने तुम्हारे मन में बसी

अपनी ही छवि तोड़ दी थी।

3.

तुम ही थी, जिसने मुझसे कहा,

किसी का मज़ाक उड़ाना नहीं अच्छा!

मैंने मन में बसा ली वो तरलता।

कोई कितना इंसान हो सकता!

और कौन सिखाता?

4.

मैं तुम्हें अपनी शक्ल देना चाहता था

तुम मुझे अपनी

समुद्र की लहरों को मैं बाहों में समेट लेना चाहता था

तुम किनारे-किनारे थोड़ी दूर जाना चाहती थी

नाव में ठहरे जल में

हमने देखा अपना बिम्ब

तुम अलग- मैं अलग- बहुत

दूसरी नाव में लेटा मैं

अलग हो गया अचानक

तुमसे – समुद्र से – सबसे

ये सबसे ध्वंसक पल था

मैं बाद में आत्मसात कर पाया

बहुत बाद में बात कर पाया

वह समुद्री खोह का कालापन

मांसल एकदम ठोस

मांस का लोथड़ा

समुद्र में गहरे-गहरे डूबते जाने जैसा

सुबह अचानक रात का नशा उतरा लगे जैसे

तूफ़ान में मिले हम, तूफ़ान में बिछड़े।

5.

उस रात मैं दुःखी था

दुःख से टूटा था

दुःख से भरा हुआ

वंचना का दाह

उपेक्षा की कड़ुआहट

क्रूरता का दर्शन

विश्वासघात का डर जैसे

मैं तुम्हारे सामने इतना बच्चा हो गया

कि खुद डर गया।

6.

जुनूं का एक पल वो अगर जिंदगी बदलता

मैं खींच लाता आज तक वो दोपहर, वो गली

तुम्हारी एड़ियों के ऊपर जो दूज का चांद रखा है

तुम्हारे कंधे के ठोसपन ने जो लरज़ मुझे दी है

लगता है आज भी उस गली में तुम्हारी एड़ियों पर

दूज का चांद रखा हो जैसे

मैंने एक घर चुन लिया था

एक जिंदगी

एक शहर चुन लिया था

एक नदी वहां बहती थी

रेल के पुल के नीचे

जहां हम शाम को घूमने जाया करते थे

मैं खूब मेहनत करता था

तुम खूब खुश होती थीं

तुम खूब मेहनत करती थीं

मैं खूब खुश होता था

वहां गाड़ियां तेज़ चलती थीं

शाम को बाज़ार में खाने-पीने की

तमाम तरह की चीज़ें मिलती थीं

वहीं एक गली में मैदान के पास

मैंने घर ले लिया था

(मुझे और अच्छे से याद नहीं!)

मैं तुम्हारे इतने पास होना चाहता था

कि मेरा दिल फटने लगता था

सांसे तेज़ होने लगती थी

इतने पास के खयाल से ही

मैं इतनी तेज़ दौड़ा

तेज़, और तेज़

मेरी सांस फूलने लगी

सीना फटने लगा

मैं और, और लंबे डग भरने लगा

थंबे, नाले, नदियां, पुल कूदने लगा

मैदान-पहाड़-देश-ग्रह-नक्षत्र

मैं तारों के महासमुद्र में तैरने लगा

तेज़-तेज़-और तेज़- मैं पार करता गया

एक महासमुद्र से दूसरे महासमुद्र से तीसरे महासमुद्र

मैं साइकिल से गिर पड़ा

और मैंने महसूस किया

मेरे सिर पर तुम्हारी हंसी

जुनून बनकर खड़ी है।

7.

वह रहस्य जन्म का जीवन का

रसमयी लालसा, विस्मयी वासना

उष्ण द्रव वसीय वह

मध्यमिका जैसे शरीर से परे किसी ताप में

प्रथम आविष्कार

वह न गंध न रूप न आकार

केवल एक उष्ण तरल एहसास

वाष्प की तरह अब भी जमा जैसे छाती मैं।

8.

मैंने ठुकराया तुम्हारा प्यार

मैंने तुम्हें छीज-छीजकर मरते देखा

मैंने तुम्हारी देह को गलते देखा

मैंने बहुत कामना की

तुम्हें गले लगाने की

पर जब सब कुछ छुट गया

तुम एक दिन विलीन हो गईं

किस वक़्त पता नहीं

मुझे तुम्हारी लाश से क्या मतलब!

मैं तुम्हारा प्यार ठुकरा चुका था

पर एक इच्छा थी

तुम्हें गले लगाता

और हम लोग मगरे तक घूमने चलते एक बार।

9.

दोपहर है

नीम-नील, नीम-सफ़ेद दीवार है

मैं एक पल के लिए उसके इतने नज़दीक़ हूं

कि उसकी सांसें अपनी गर्दन पर महसूस कर सकता हूं

एक उसी पल में

मैं घबरा जाता हूं

अपने-आप से

पीछे हट जाता हूं

अचानक एक आवाज़, दोपहर खींच लेती है।

आगे नहीं…

मैं पीछे हटता जाता हूं!

इसके आगे क्या…

10.

फिर बारिश हुई नदी पर

रात के आखरी-आखरी पहर

सांय-सांय में घुल गई

बूंद-बूंद फिर लहर-लहर

– – –

मैं मिट्टी के इतने पास

तुम्हारे इतने पास

आम की जड़ के इतने पास

जैसे यहीं मिलनी मुझे

युगों से मुझे ढूंढ़ती : तस्क़ीन!

– – –

मैं फिर तुमसे प्यार करना चाहता हूं,

मैं तुम्हारी लासानी मूर्ति बना रहा हूं।

मैं कल इसे तोड़ने का वादा करता हूं,

मैं फिर तुमसे प्यार करना चाहता हूं।

– – –

वहां एक नदी है

गरजती हुई

सफ़ेद

वो एक चट्टान को सदियों से विलीन करने में लगी है

वो चट्टान अब भी है वहां

उस पर हमारे पांव के निशां

वे आत्म-आहुतियां

घुलती जाती हैं एक समग्र इतिहास में

एक पल में

दरवाज़े बनते

रंगाई होती है

सदियों की रुकी चर्चाएं जैसे चल पड़ती हैं

हवा चलने लगती है

प्लास्टिक की बोतल

एक झटके में

जमीन से सौ फुट ऊपर घूमने लगती है

जमने लगती है

फिर धीरे-धीरे ज़मीन पर धूल

बगुले छिप जाते हैं ईमली की कोटरों में

हरी घास के साथ भींगते हैं झींगुर

मैं दूर तक देख सकता हूं अनाकुल मन से

बारिश और सिर्फ बारिश

भींगना और सिर्फ भींगना

मक़बरों की टूटी हुई ईंटें

परित्यक्त मीलों में मशीनें

ट्रकों के टायर – भींगते हैं

भींगती हैं झरबेरियां और मेंहदी

भींगते हैं अंजीर और बबूल

भींगते हैं मैं और तुम

और अपराजिता के फूल!

usman khan

उस्मान ख़ान समकालीन हिंदी कविता के अलहदा और युवा कवि हैं. चर्चाओं और पुरस्कारों की भीड़ से अलहदा… छपाऊ मानसिकता से भी अलहदा... जे.एन.यू. के हिंदी विभाग से मालवा के लोकसाहित्य पर पीएचडी. इनसे usmanjnu@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

श्रीनगर उर्फ काहे का स्वर्ग: उस्मान ख़ान

विश्वविद्यालय की दीवार के किनारे-किनारे मैं चलता रहा। रुमी गेट के थोड़ा ही आगे दीवार पर किसीने मोटे मोटे हरुफ़ में ‘वेलकम तालीबान’ लिखा हुआ था। पढ़कर पहले तो अजीब लगा, फिर उतना भी अजीब नहीं रहा। नौजवान लड़के-लड़कियाँ विश्वविद्यालय की तरफ जा रहे थे। मैं एक झील के किनारे बने बागीचे में जाकर बैठ गया। देखता रहा चीनार, औरतें, आदमी, बच्चे, पहाड़ी।

……यहाँ और भी खराब

BY उस्मान ख़ान

“What is “there” becomes “here” when you reach it; likewise your today disguises itself in the form of tomorrow”. – Bedil[1]

A snap shot from a film by Majid Majidi

A snap shot from a film by Majid Majidi

दिल्ली

पसीने से तरबतर हम दोनों ऑटो  में ही बैठे रहे। लम्पट लड़कों का एक दल मुमताज़ भाई का अभिवादन कर मैदान की ओर चला गया। मुमताज़ भाई ने सिगरेट एक लड़के की ओर बढ़ाई, जो उस दल से कटकर रुक गया था। ‘सादिक कहाँ हैं?’ मुमताज़ भाई ने उस लड़के से पुछा। लड़के ने इतना लम्बा कश खींचा कि एक चैथाई सिगरेट फर से राख हो गई, उसने मैदान की तरफ जाते लड़कों की तरफ देखा। ‘स्टेशन पर ‘काम’ करने गया है।’ उसने जवाब दिया। ‘ये क्या हुआ?’ उसके चोंट खाए दाएं हाथ की तरफ देखते हुए एक मुस्कान उसी के चेहरे पर उभर आई। ‘साले ने खिड़की से कुचल दिया।’ ‘कैसे?’ मुमताज़ भाई ने हैरत और चुटकी लेने के अन्दाज़ में पुछा। ‘चैन खींच रहा था। इतने में पास वाले हरामी ने खिड़की नीचे कर दी। दो-तीन बार ज़ोर-ज़ोर से पटक दी। बहिनचैद!’ मुमताज़ भाई ने धीरे से मुसकुराते हुए, अपने मुँह में जीभ फेरी और आखरी कश के लिए सिगरेट उसकी तरफ बढ़ा दी। ‘वो लोग क्या दारु पीने गए हैं?’ लड़के ने हामी में सिर हिलाया। ‘सादिक भी उनके साथ ही है क्या?’ मुझे लगा मुमताज़ भाई को उसकी बात पर यकीन नहीं हुआ था। ‘पता नहीं।’ कहते हुए लड़के ने सिगरेट का सुलगता ठूँठ नाली में फेंक दिया और मुमताज़ भाई का अभिवादन करता हुआ, मैदान की ओर चल पड़ा। शायद उसे भी कोई फर्क नहीं पड़ा कि पहले उसने क्या कहा था।

हम दोनों गर्मी के मौसम को गाली देते हुए बैठे रहे। लोगों के दल के दल स्टेशन की ओर बढ़े जा रहे थे। कोई किसीको नहीं जानता और सब एक जैसे थे। मुमताज़ भाई के लिए सब सवारी, मेरे लिए सब चरित्र। शहरी, कस्बाई, ग्रामीण। तमील, बंगाली, पंजाबी, बिहारी। धोती, पाजामा, जिंस, फ्रॉक, साड़ी, सलवार। सब अलग और सब एक जैसे। यात्री! मैं भी इसी रेले में उतरने वाला था।

मैं सोचने लगा, उस लड़के के दाएं हाथ के पहुँचे की हड्डी टूट गई थी। कितना भयानक दृष्य रहा होगा। एक लड़का किसी रेल में बैठी औरत के गले से चैन खींच रहा है, उसका हाथ अचानक खिड़की से दबता है, और फिर लगातार खिड़की के प्रहार सहता है। लेकिन अपनी बात कहते वक़्त लड़के के चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी। रिस्क में ही बरकत है, बिना रिस्क लिए बिहार से दिल्ली पहुँचे ये लड़के, जो दिन-रात नशा और चोरी करते हैं, अपना जीवन नहीं बिता सकते। सच, रिस्क में ही बरकत है। ये लड़के हर रोज़ नए रोमांचों से दो-चार होते हैं। मैंने सोचा कि मुमताज़ भाई से पुछूँ, क्या वो लड़का स्कूल जाता है? और फिर अपने ही बेमानी सवाल से लज्जित होकर चुप मार गया। स्कूल! थू!

रेल आने में अभी भी आधा घंटा बाकी था। मैंने सोचा एक सिगरेट और पी जाए। मैं सिगरेट लेने के लिए ऑटो  से निकला। ‘किधर।’ मुमताज़ भाई की आवाज़ थी। ‘सिगरेट ले आता हूँ!’ ‘आँहाँ, रुकिए!’ और खुद आॅटो से निकलकर वह सिगरेट वाले के पास गया और बोला, ‘ओरिजिनल देना हो भाई!’ और उस लड़के ने मुस्कुराकर नीचे रखे एक डिब्बे से सिगरेट निकालकर उसे दी। हम दोनों ने सिगरेट खतम की और मैं, अपना बेग जिसमें मेरे एम.फिल., पीएच.डी. के पोथे रखे थे, लेकर स्टेशन की तरफ चल दिया।

रेल प्लेटफॉर्म पर खड़ी थी। उत्तर संपर्क क्रांति। वही अनजाने चेहरे, जो बाहर हड़बड़ाहट और आष्चर्य का भाव लिए चले जा रहे थे, प्लेटफॉर्म पर भी चले जा रहे हैं। रेल के आगे वाले जनरल डिब्बे में मैं घुस गया। वही हमेशा का हाल, पैर रखने की भी जगह नहीं थी। मैं प्लेटफॉर्म के दूसरी तरफ वाले दरवाजे़ पर जाकर खड़ा हो गया। देखा एक आदमी पास वाले ट्रैक पर बैठा पेप्सी में व्हिस्की मिला रहा है। उसने मेरी ओर देखा। ‘लोगे।’ मैंने मुस्कुराते हुए उसे टाल दिया। ‘कहाँ तक जाना है?’ ‘जम्मू-तवी!’ मैंने कहा। ‘अच्छा जम्मू।’ ‘और आप?’ मैंने पूछा। ‘जहाँ तक ट्रेन जाएगी।’ उसने कहा। ‘उधमपुर।’ मैंने उसकी ओर देखा। उसने सशंकित नज़रों से मेरी ओर देखा। मैंने भी उसकी उपेक्षा की।

मैं रात-भर दरवाज़े के पास सिकुड़कर बैठा रहा और आस-पास वालों के लिए तकिए का काम करता रहा। सुबह होते-होते सिट का एक कोना बैठने के लिए मिल गया। एक स्टेशन पर रेल रुकी और धड़-धड़ करती हुई बुढ़ी औरतों की एक टोली उस डिब्बे में घुस गई। सभी यात्री, जो पहले से आराम की भंगिमा को प्राप्त कर रहे थे। हड़बड़ाने लगे। ये औरतें उड़ीसा की थीं। तीर्थ के लिए जा रही थीं। दो तो इतनी बुढ़ी कि लौटेंगी यह भी कहना मुश्किल लग रहा था। खैर!

जम्मू

रेल ने ठीक समय पर जम्मू उतार दिया। स्टेशन के बाहर जाते ही लगा मैं किसी आर्मी कैम्प में आ गया हूँ, स्टेशन के बाहर बने बागीचे के पास आर्मी के जवान बन्दूक लिए बैठे थे। उनमें से दो चाय पी रहे थे, एक अधेड़ और एक 25-26 साल का जवान। उनके आगे कँटीले तार की फेंस थी। जैसे ही उधर से कुछ हो, इधर से गोली चलाने को मुस्तैद सैनिक।

मैंने स्टेशन के इस आशंका भरे माहौल को पार किया और स्टेशन के बाहर नाले पर लगी चाय की दुकान पर चाय पीने लगा। 7 रुपये की चाय। जैसे-तैसे अपनी भूख दबाते हुए, मैं श्रीनगर जाने वाली गाड़ी के बारे में पुछने लगा। पुछते-पाछते एक गाड़ी मिली – 800 रुपये, इससे कम में भी गाड़ी मिल सकती थी, ये मुझे बाद में पता चला। तो, मैं श्रीनगर की ओर चल दिया। गाड़ी में दो आर्मी कैम्प में काम करने वाले जवान बैठे थे। सादे कपड़े, पहचानना भी मुश्किल कि ये उन्हीं बन्दूकधारियों के हमजोली हैं, जिन्हें देखकर आशंका होती है – अब क्या होगा!

गाड़ी का चालक एक सिक्ख था। मैंने अपनी सिगरेट पीने की इच्छा को गाड़ी रुकने तक दबा देना ही उचित समझा। रास्ते में एक जगह उसने गाड़ी खड़ी की, बाकी लोग खाने लगे, लेकिन अपनी जेब तो हल्की थी। सो, मैंने एक चाय ली और सिगरेट पीने लगा। गाड़ी चालक मुझे घुर कर देखने लगा। ‘जल्दी करलो।’ उसने कहा। जैसे मेरी ही वजह से गाड़ी रुकी हुई थी। ‘दूसरे लोगों को भी आ जाने दीजिए।’ मैंने कहा। वह दुकान के अंदर बैठी सवारियों की ओर बढ़ गया।

जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते जा रहे थे, पंजाबी बोलने वालों से दूर होते जा रहे थे और एक मिश्रित भाषा, जिसमें पंजाबी के शब्द बीच-बीच में उछल आते थे, मेरे कानों में पड़ रही थी। कुछ शब्दश् समझ आते थे, बाकि भाव से काम चलाना पड़ रहा था।

गाड़ी में मेरे दोनों ओर आर्मी के जवान थे। उनमें से एक से बात होने लगी। यह व्यक्ति बंगाल का था, उसे जैसे ही पता चला मैं, प्राध्यापक के साक्षात्कार के लिए जा रहा हूँ। उसने अपने दोस्त का किस्सा सुनाना षुरू कर दिया, कैसे दोनों साथ खेलते थे, साथ पढ़ते थे, फिर उसे रुपया कमाने का शौक हो गया और वह आर्मी में आ गया, उसका दोस्त पढ़ता रहा और आज प्राध्यापक है। उसकी बातों से साफ था कि वह रीतिकालिन कवियों से भी अधिक अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन करने में माहिर था। उसने खुब रुपया कमाया और उड़ाया है, उसका कहना था। हालाँकि मैं देख चुका था, कि वह गाड़ी-चालक से 50 रुपये को लेकर हुज्जत कर रहा था। वह कहने लगा कि उसने वायुयान में भी यात्रा की है, और वो तो आज इस जीप में जा रहा है, जबकि वह चाहता तो आज भी वायुयान में जा सकता था। लेकिन इच्छा ही नहीं हुई। खैर, उसे संतुष्टि थी, कि उसका प्राध्यापक दोस्त आज भी उसकी गालियाँ हँसकर सुनता है।

फिर वही जवाहर टनल, घुप्प अँधेरी टनल, जिसमें घुसते ही कुरोसावा के ड्रिम्स की टनल याद आने लगी। पता नहीं कब वह सैनिक टनल पार कर निकलेगा और फिर पिछे मुड़कर देखेगा – टनल का घुप्प अँधेरा और सुनेगा – फौजी बुटों की टाप। पता नहीं जब इस टनल से आखरी सैनिक बाहर होगा तो वह क्या सोचेगा! इस टनल के उस पार वह क्या कर रहा था?

सड़क गाडि़यों से भरी हुई थी, लग रहा था, लोगों का एक रेला श्रीनगर की ओर जा रहा है। हमारी गाड़ी में पीछे चार लड़के बैठे हुए थे। उम्र – 14-15 साल। उनमें से एक को उलटी हो गई। ये चारों लड़के मध्यप्रदेश से कश्मीर मज़दूरी करने के लिए जा रहे थे। दो पहले से वहाँ काम कर रहे थे और दो पहली बार जा रहे थे। अपने बारे में कुछ भी बोलते हुए वे हिचक रहे थे, जैसे कुछ अनहोनी होने वाली हो। उन लड़कों को देख मेरा मन एक बार और आशंका से भर गया। उलटी करने वाला लड़का सीट पर लेटे-लेटे सो गया था।

पास बैठा जवान भारत के विभिन्न इलाकों में अपनी पोस्टिंग और अनुभव बताता चल रहा था। मैं भी हाँ-हूँ कर रहा था, ताकि मेरा ध्यान बँटा रहे। रास्ते में एक जगह ट्राफिक जाम था। आर्मी के जवान चारों और घुम रहे थे। पहले मुझे लगा कुछ दुर्घटना हो गई है। फिर पता चला, सड़क बनाने के लिए रास्ता साफ किया जा रहा है, जिसके लिए एक बड़ा पेड़ काटा जा रहा था। आर्मी के जवान सड़क साफ करने में मदद कर रहे थे। ज़्यादातर इतने काले कि वहाँ की स्थानीय आबादी से फूल कांट्रास्ट में।

सड़क साफ हुई तो हमारी गाड़ी भी धीरे-धीरे खिसकने लगी। हमारा गाड़ी-चालक वैसे भी बहुत धीरे गाड़ी चला रहा था। पंजाबी पॉप संगीत चलाकर वह धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था। क़ाज़ीगुंड में एक जगह गाड़ी खड़ी कर चालक मेवों की एक दूकान पर चला गया और चाय पीने लगा। पहले ही इतना धीरे-धीरे वह हमें ले जा रहा था, कि लग रहा था ये सफर खतम ही नहीं होगा। किसी अनजाने रास्ते पर चलते हुए यह अक्सर ही लगता है, कि सफर बहुत लम्बा है। हर शहरनुमा जगह पर मुझे लगता था, अब आ गया श्रीनगर, लेकिन नहीं। बाहर रुई के फाहों की तरह की कोई चीज़ उड़ रही थी। बंगाली हमसफर ने कहा, ये अगर नाक में चली गई तो चार घंटे छिंकते रहोगे। मैंने अपनी दूसरी ओर बैठे सैनिक से खिड़की के शीशे ऊपर कर लेने को कहा। उसने शीशा चढ़ा लिया। तब भी एक दो फाहे अंदर आ चुके थे और गाड़ी में बेमुरव्वती से गष्त लगा रहे थे।

एक गाँव में उसने गाड़ी फिर रोक दी। इस बार उसने बिना उतरे ही पिछे मुड़कर दोनों सैनिकों को सलाह दी। यही आखरी गाँव है। इस गाँव में भी चारों तरफ सैनिक खड़े और घुमते दिखाई दे रहे थे। मुझे समझ नहीं आया, वह क्या कहना चाह रहा था। मेरे दाईं तरफ वाला सैनिक नीचे उतर गया और थोड़ी देर में हँसता हुआ अपनी जेब पर हाथ रखे लौट आया। इसके आगे शराब नहीं मिलती है। बंगाली सैनिक ने कहा। मुझे लगा वह मज़ाक कर रहा है। अब तक मुझे गुजरात के बारे में ही यह पता था, कि वहाँ शराब नहीं मिलती है। दूसरा सैनिक कहने लगा, पहले मिलती थी, अभी सब दूकाने तोड़-ताड़ दी है। मुझे बस्ती का वह दृष्य याद आ गया, जब पाकिस्तान में शराब की दूकाने तोड़कर गैलनों शराब नालियों में बहा दी गई थी। बेचारे मण्टो का पाकिस्तान!

धीरे-धीरे गाड़ी फिर खिसकने लगी। देखा एक और टनल लगभग बनकर तैयार हो चुकी है, ये नई टनलें 90 कि.मी. का फासला कम कर देंगी। और सुना रेल के लिए भी एक नया ट्रैक बिछाया जा रहा है, जो सफर को आसान और ट्राफिक को कम कर देगा। और टूरिस्ट और सैनिक।

अपने बंगाली हमसफ़र की बातें सुनते-सुनते, जिसमें पंजाबी पाॅप खुद-ब-खुद घुलता जा रहा था। चालक महोदय को अचानक जाने क्या सुझी, वो कहने लगा, ‘ये झेलम है।’ मुझे उस पर पुरा शक हुआ। और उसके पॉप संगीत को सुनते-सुनते मैं मन ही मन झल्ला चुका था, मुझे लगा कि कहूँ, तो मैं क्या करूँ, कुद जाऊँ, झेलम है! हँह!! मैंने देखा एक नदी है, झेलम ही होगी।

 खै़र, आखिरकार गाड़ी ने मुझे एक चैराहे पर छोड़ा। मैंने एटीएम तलाश किया और कुछ रुपया निकाला, ताकि आगे का काम आराम से चल सके। और एक मिनी बस में बैठ गया, जो मुझे डल गेट उतारने वाली थी।

श्रीनगर

गोधूली बेला का समय था। मैं मिनी बस से एक चैराहे पर उतरकर खड़ा था। एक सिगरेट वाले की दूकान पर पहुँचा, सिगरेट ली और उससे पुछा, ‘यहाँ रात भर रुकने के लिए सस्ता कमरा कहाँ मिलेगा।’ उसने कहा, ‘रुकिए, अभी दिखा देते हैं।’ मैं रुका रहा, 5-7 मिनट में ही एक अधेड़ मोटा-सा आदमी आया, और मुझसे कहने लगा, ‘कितने दिन के लिए चाहिए?’ मैंने कहा, ‘बस रात भर के लिए, इंटरव्यू देने आया हूँ, देकर कल ही चला जाऊँगा।’ उसने एक लड़के को बुलाया, और मेरी तरफ देखकर कष्मीरी में कुछ कहा, पता नहीं वह कश्मीरी भी थी या नहीं।

                रात पुलिया पर उतर आई थी और मैं उस लड़के के साथ पुलिया पर चले जा रहा था। मैंने उससे कहा, ‘सिगरेट पिते हो!’ उसने कहा ‘नहीं, मैं कोई भी नशा नहीं करता।’ ‘ठीक है।’ मैंने कहा। उसका नाम गुलज़ार था। वह एक शिकारे पर मुझे लेकर गया, जो उसी पुलिया के नीचे लगा हुआ था। मैंने देखा शिकारा ठीक है, कमरा भी रहने लायक। फिर वही किराये को लेकर हुज्जत। आखिरकार 300 रुपये में रात भर रहना तय पाया गया।

गुलज़ार को जब पता चला कि मैं विश्वविद्यालय में पढ़ाने के लिए इंटरव्यू देने आया हूँ, तो पहले तो उसे विश्वास नहीं हुआ। वह हैरत से मेरा मुँह देखने लगा। फिर बोला, ‘तुमको तो लड़के पीट देंगे।’ मैंने कहा ‘क्यों?’ बोला, ‘यूनिवर्सिटि के लड़के खराब हैं।’ मैंने कहा, ‘अच्छा!’ फिर उसने बताया कि वह भी 8वें दर्जे में अपने मास्टर को पीट चुका है। और उसके बाद से उसने पढ़ाई भी छोड़ दी अब शिकारा चलाता है और मज़दूरी करता है। उसकी छोटी बहन और भाई पढ़ रहे हैं, लेकिन उसे विश्वास था कि उसका भाई भी किसी मास्टर को पीटकर एक दिन उसके साथ ही काम करने लगेगा। कहने लगा, ‘हमारा भाई हमसे भी ज़्यादा गुस्से वाला है।’

गुलज़ार को चाय पीने का बहुत शौक था। उसने ग्लास भर के चाय बनाई और पीने लगा। मैं लम्बे सफ़र की थकान से चुर था, साबुन, तैल ढुँढ़ने बाज़ार की तरफ जाना चाहता था, लेकिन देखा कि गुलज़ार मुझे जाने नहीं देना चाहता, पहले तो मुझे शक हुआ, पुरा वातावरण ही आशंकापूर्ण था, फिर वह बोला, ‘यहाँ बाज़ार जल्दी बंद हो जाता है, यहाँ का माहौल नहीं पता है तुमको।’ मैंने उसकी बात अनसुनी कर दी और यह कहते हुए कि मैं थोड़ी ही देर में आ जाऊँगा, मैं बाज़ार की तरफ चल दिया। पुलिया पार कर मैं एक चैराहे पर पहुँचा, जहाँ कुछ दूकाने थी। लेकिन तैल का पाउच कहीं नहीं मिला। मैं साबुन लेकर लौट आया। नहाया तो कुछ ताज़गी महसूस हुई। मैंने कहा, ‘खाने के लिए कहाँ जाना चाहिए।’ वह बोला, ‘यहीं रुको, खाना हम लेकर आएगा। क्या खाएगा तुम?’ मैंने कहा, ‘कुछ भी, सादा-सा, चावल-दाल।’ उसने कहा, ‘चटनी भी लेगा।’ मैंने कहा, ‘हाँ, मिल जाए तो।’ बोला, ‘अस्सी रुपये दे दो।’ मैंने उसे सौ रुपये दिये और कहा, ‘अगर तैल का पाउच मिले तो लेते आना।’ वह रुपये लेकर मुझे शिकारे पर ही रहने की हिदायत देता हुआ चला गया। मैं शिकारे के एक कोने में लेटकर, जो बाहर की तरफ खुलता था, सिगरेट जलाकर झील में जलती हुई बत्तियों का प्रतिबिंब देखता रहा। थोड़ी देर में तीन आदमी एक नाव लिए जाल बटोरते हुए पास से गुज़रे। तीनों ही हड्डी के ढाँचे।

गुलज़ार लौटा तो मैंने खाना खाया। और फिर वह भी खाना खाकर जाने लगा। मैंने पुछा ‘कहाँ?’ तो कहने लगा, ‘मज़दूरी।’ मैंने कहा, ‘रात को।’ उसने कहा, ‘हाँ रात भर सवारियाँ आती रहती है, हम काम करता है, नहीं तो घर नहीं चलेगा।’ मुझे लगा, वह मुझ पर ही व्यंग्य कर रहा है।

सुब्ह हुई, सब कुछ रौशन हुआ, तो देखा झील बहुत दूर तक खींची हुई है। मैंने कहा, ‘मैं 2 बजे तक लौट आऊँगा।’ गुलज़ार कहने लगा, ‘रजिस्टर में साइन कर दो, और हमको 4 सौ रुपये और दे दो।’ मैंने ज़्यादा हुज्जत न करते हुए, उससे कहा कि मैं अपना सामान लेकर ही चला जा रहा हूँ, अगर आज ही नहीं लौटा, तो फिर तुम्हारे पास आ जाऊँगा। लेकिन वह लड़का बड़ा हुज्जती था। मैंने उसे टालते हुए अपना बैग उठाया और शिकारा छोड़ दिया।

मैं फिर उसी चैराहे पर पहुँच गया, जहाँ कल मुझे मिनी बस ने उतारा था। पुछने पर पता चला, यहीं से बस मिलेगी, जो सीधे कश्मीर विश्वविद्यालय उतार देगी। मैं बस का इंतज़ार करने लगा। कुछ नौजवान लड़के बस-स्टॉप पर बैठे सिगरेट पी रहे थे। वहीं पास में खड़ा होकर मैं भी सिगरेट पीने लगा। बस आई और मैं उसमें बैठ गया। बस श्रीनगर में घुमती हुई चलने लगी। झील और बागीचों के बीच होटलें, रेस्टोरेंट, घर, दफ़्तर और सैनिक। बस ने मुझे रुमी गेट पर उतार दिया। यह यूनिवर्सिटी का मुख्य द्वार नहीं था। मैंने अंदर जाकर पुछा, तो पहरेदार ने बताया, ‘अभी तो 9 बजा है, 10 बजे तक इंटरव्यू षुरू होगा।’

तब तक मैंने इधर-उधर घुमने की योजना बनाई और निकल पड़ा। विश्वविद्यालय की दीवार के किनारे-किनारे मैं चलता रहा। रुमी गेट के थोड़ा ही आगे दीवार पर किसीने मोटे मोटे हरुफ़ में ‘वेलकम तालीबान’ लिखा हुआ था। पढ़कर पहले तो अजीब लगा, फिर उतना भी अजीब नहीं रहा। नौजवान लड़के-लड़कियाँ विश्वविद्यालय की तरफ जा रहे थे। मैं एक झील के किनारे बने बागीचे में जाकर बैठ गया। देखता रहा चीनार, औरतें, आदमी, बच्चे, पहाड़ी।

फिर देखा 10 बज गई है। तो रुमी गेट से ही फिर विश्वविद्यालय में दाखिल हुआ। साक्षात्कार वाइस चांसलर के दफ़्तर के पास प्रशासन भवन में होना था। वहाँ पहुँचा, तो देखा साक्षात्कार देने के लिए मेरे अलावा और 11 लोग बैठे थे। अलीगढ़ विश्वविद्यालय, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, ग़रज़ कि देश भर से इस विश्वविद्यालय में हिंदी पढ़ाना चाहने वाले नौजवान और अधेड़। कुछ के पास किताबों और लेखों का ऐसा ज़खीरा कि देखते ही लगे कि इन्होंने अपनी उमर इसी काम में झोंक दी है। मैं समझ गया, बेटा तेरी दाल यहाँ नहीं गलनी है। अलीगढ़ से पढ़े एक साहब ने मेरे करीब बैठते हुए मुझसे बड़ी ही शाइस्तगी से हाथ मिलाया और धीरे से पुछा, ‘कहाँ के रहने वाले हैं खान साहब!’ मैंने कहा, ‘मध्यप्रदेश!’ ‘हम जे.एन.यू. गए थे एक बार, लेकिन अपना वाला कोई मिला नहीं।’ मेरे कान में धीरे-धीरे ज़हर घुलने लगा। ‘अब आप से मिलेंगे अगर कभी आए तो!’ मैंने कहा, ‘ठीक है!’ और वहाँ से उठने लगा। उन्होंने फिर अपने नरम हाथों से मेरा हाथ पकड़कर रोका, ‘अपना कांटैक्ट नंबर दीजिए।’ मैंने उन्हें एक फर्जी नंबर थमाया और उठकर दूसरी जगह बैठ गया। देखा मेरे सामने एक सज्जन बैठे हुए थे। साफ़ सफ़ेद कुर्ता-पाजामा, जिस पर भूरे रंग की बंडी। चुटियाधारी ये सज्जन अपने सामने अपनी प्रकाशित सामग्री का ढेर लिए बैठे थे। और ख़ालिस हिंदी में बात कर रहे थे। हजारीप्रसाद द्विवेदी पर उनका शोध-प्रबंध था। मेरे पास बैठे एक व्यक्ति ने बताया कि वह उनके साथ पहले भी एक साक्षात्कार दे चुका है। कहने लगा, ‘उस इंटरव्यू में तो ये धोती-कुर्ता पहनकर आए थे। तब उनसे बात कर एक्सटर्नल ने कहा था, लगता है साक्षात् द्विवेदीजी से ही बात कर रहे हैं।’ सच में, लगता भी होगा। अंतर्वस्तु का पता नहीं, रूप तो वही था।

इंटरव्यू खत्म होते-होते पता चला कि कल श्रीनगर बंद रहेगा। किसने ‘कॉल’ दिया है, पुछने पर कोई कुछ बोला नहीं। तो उसी शाम गाड़ी से जम्मू के लिए निकलना था। इस बीच मैंने खाना खाया और एक बागीचे में जाकर बैठ गया। देखा कुछ लड़कियाँ फूटबॉल खेल रही थीं। दूर से उन्हें देखता मैं सिगरेट पीने लगा। अब जाकर मुझे लग रहा था मैं श्रीनगर में हूँ। सोचने लगा इस जगह के बारे में क्या-क्या सुनता आया था और ये जगह कुछ अलग तो नहीं है। वही परेशानियाँ यहाँ के नौजवानों की आँखों में भी घुम रही हैं, जो दिल्ली के नौजवानों की आँखों में तैरती रहती हैं। फिर ये काहे का अलग से स्वर्ग! दिमाग़ में लगातार एक शेर का मिसरा ए सानी घुमता रहा – ‘चारों तरफ खराब यहाँ और भी खराब।’ ‘चारों तरफ खराब यहाँ और भी खराब।’ लेकिन दिमाग़ पर बहुत ज़ोर देने के बाद भी मिसरा ए उला याद नहीं आ रहा था। शायद मैदान में फूटबॉल खेलती हुई किसी कमसीन को याद था! पर मैं पुछ नहीं पाया…


[1]  डॉ. इक़बाल का अनुवाद

उस्मान ख़ान

उस्मान ख़ान

उस्मान ख़ान समकालीन हिंदी कविता के अलहदा कवि हैं. चर्चाओं और पुरस्कारों की भीड़ से अलहदा…छपाऊ मानसिकता से भी अलहदा..जे.एन.यू. के हिंदी विभाग से मालवा के लोक-साहित्य पर शोधरत हैं. इनसे usmanjnu@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

डायरी कविता

By   उस्मान खान

 
1 नवंबर

एक समय
कविता की अंतिम पंक्ति से पहले
हम देखेंगे
जूता पॉलिश जूता पॉलिश हो गई है

2 नवंबर

आशंका है
छत पकड़कर
झूल रहा बन्दर की तरह
सौ वाट का बल्ब
खीं खींयाता दुःस्वप्न
जहाँ राबिया तुम
रौशनदान तोड़कर
अभी अभी भागी हो
और गाँव गोईरे
ईमली की डाल पर
चमगादड़ सी लटक गई हो
क्या हुआ था ?
जिन्दगी इतनी कठिन तो नहीं थी
कि एक शांत धूसर आभा ओढ़ ली जाए !

3 नवंबर

मीरा तुम अपना जिस्म लिए
घुग्घू के पर तौलने में डूबी
ठहरी हुई सड़क पर ठहरी
जा चुकी कार का सुँघती
धुआं
. . . . . . . . . . . . .
कुछ ठिठुरती नींदों की तरफ
ईशारा करती स्ट्रीट लाईट साथ
एका कर सुअरों के भटकती
सुँघती फिरती फूटपाथ
मृत्यु
. . . . . . . . . . . .
मौसम की कसमसाहट
घड़ी नहीं बताएगी
सरकारी दफ़्तर भी नहीं

4 नवंबर

मृत्यु !
एक शहर में भटकते हम दोनों
एक दिन टकराएँगे ही!

5 नवंबर

जेबें इतनी खाली हैं
कि अलीफ  लैला का आखिरी किस्सा भी
सल्फास की गोलियों को सुनाया जा चुका है

6 नवंबर

मेरे पास
एक लाश है
एक दुःस्वप्न
और शिशिर की निःशेष रात

                                                             और कोई जवाब नहीं है !

7 नवंबर

नीम-बुझी गलियों की दीवारों के
अँधेरे उजाले पर
बोध की सारी पीड़ा और क्रोध
उभारता चला जा रहा है
अंडरग्राउंड का गुलमोहर का फूल

10 नवंबर

जैसे आईना टूटता है
और नींद पीड़ाओं का सिलसिला हो जाती हैं
सीपियों में मिली कविताएँ
मेरी साँसों में
अश्वत्थामा के कपाल सी
मैं सूरज को अपने सर में रख लेता हूँ
और कुर्सी को छतपंखे की जगह टाँग देता हूँ

11 नवंबर

तुम घोड़ों से आए
और तुमने सिर्फ दो स्वाद हमारे लिए शाश्वत बना दिए
एक कड़वा
और एक कसैला
तुम घोड़ों से आए
और तुमने सिर्फ दो चीज़ें हमें दीं .
नाल
और लगाम।

12 नवंबर

फ्लायओवर के नीचे
हैंगओवर में …..जाम।
चाँद और फैंटेसी
सड़क पर बिखरे जा रहे हैं
और ऑटो में चेता है
सौ वाट का बल्ब।

13 नवंबर

हल्के.हल्के
तय करके
कई सदियों का सफ़र
एक राग!
अपनी कोमल ऊँगलियों में
ठंडी मिजराबें संभाले
मेरे बालों में पिरो रही है
शहरज़ाद !
. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .
मेरे भाईयों का नाम बताओ ! जो मुझे अंधेरे कुँए में फेंक गए थे !! और जैसे रात हो गई थी  रेगिस्तान में !!!

14 नवंबर

फ्लाय ओवर के नीचे
कुत्ते पोस्टमार्टम करते हैं !!
रात के तीन !!!

17 नवंबर

विक्षिप्त अफवाहें
आईने और आँखों के बीच
आँखें दरकती हैं
आईना कोढ़ाता है
घर से न लाश मिलती है
न आईना

18 नवंबर

कुछ इंजेक्शन
और गर्भाशय कुछ
लँगड़ाते फिरते हैं
शहर में

19 नवंबर

इस व्यवस्था की पूर्वशर्त है
कि तुम्हारी आत्महत्या की जाएगी
और साबूत खड़े लोग वे भाँड
हटाते रहेंगे ऊँगलियों के पोरों से घी की गंध
और देखते रहेंगे अपनी वीर्यसनी गाँड

23 नवंबर

असंगता थी
उदासी थी
घर के कोने धूसर थे
लैम्पपोस्ट उदास थे
प्रसव-पीड़ा से बिल्लियाँ चिल्लाती थीं
सड़क पर उड़ते काग़ज़ के टुकड़ों की आवाज़ मनहूस थी
चाकू लिए एक आदमी घुमता था
क्षिप्रा के तट पर सन्नाटा था
मगर इतना तो नहीं था कभी !
जंगलों पर
और बस्तियों पर
ये अपशकुन सा क्या मँडरा रहा है !

24 नवंबर

तुम आते
जैसे शबे विसाल चाँद पर बादल आता है
जैसे सही वक्त पर मानसून आता है
जैसे यादों के शहर में वह मोड़
जहाँ अपने महबूब से मिलना हुआ था
जैसे गोंद आता है बबूल में
और नदी में मछलियाँ
. . . . . . . . . .
इस तरह नहीं
जैसे रतौंधी
जैसे घाव पर मक्खियाँ
जैसे घर पर पुलिस
जैसे इमरजेंसी !
जैसे हत्या !!
जैसे ब्लेकआउट….

26 नवंबर

मेरी कहानियों की सौ सौ नायिकाएँ और नायकों को
जो महुए की चूअन सीने पर महसूस करते थे।
जो जिन्दगी को भरपूर जीना चाहते थे।
जो बेनाम गलियों के मोड़ों पर
घरों के साफ सूथरे कमरों में
सड़कों की भरी पूरी छातियों पर
झाडियों में
और पहाडियों पर
क़त्ल हुए।
और जिनके बरसाती गीतों की धुन पर
डोला करते थे साँची के स्तूप
रात की व्याकुलता में
बिडियाँ सुलगाते देखा मैंने
और देखा गुस्से से दाँत पिसते उन्हें !

28 नवंबर

जीवन
साँझ सा निःशब्द
शेष हो जाए
श्वास निःश्वास के क्रम में
दुःख कठिन हो जाए जमकर
पर
तुम प्यार नहीं हो
तुमको प्यार नहीं लिखूँगा !

3 दिसंबर
     निषिद्ध इतिहासों में लेकिन दर्ज

  मेंढकों कनखजूरों फुद्दियों की हत्याएँ

4 दिसंबर

प्रेम में
निषिद्ध
मृत्यु का मौन
आवाज़ खोजता है।

5 दिसंबर

रात को एक बजे
पेपरवेट के नीचे दबाए गए
यातना के इतिहास के सेंसर्ड पन्ने
बस्ती से मसान तक
घुग्घूओं के परों से झड़ते हैं
. . . . . . . . . . .
जब्तशुदा गाडियों पर जमी धूल
रातगश्त पर भेज चुकी है
पुलिसवालों को
. . . . . . . . . . .
दो ट्यूबलाईटों के बीच खड़े
आदमक़द आईने में
एक केंचूआ रेंग रहा है

उस्मान खान समकालीन हिंदी कविता के अलहदा कवि हैं. चर्चाओं और पुरस्कारों की भीड़ से अलहदा…छपाऊ मानसिकता से भी अलहदा..जे.एन.यू. के हिंदी विभाग से मालवा के लोक-साहित्य पर शोधरत हैं. इनसे usmanjnu@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

उस्मान खान की कवितायें –उदासीनता नहीं उदासी

By आशुतोष कुमार

तुम घोड़ों से आए
और तुमने सिर्फ दो स्वाद हमारे लिए शाश्वत बना दिए –
एक कड़वा
और एक कसैला
तुम घोड़ों से आए
और तुमने सिर्फ दो चीज़ें हमें दीं –
नाल
और लगाम।घोड़ा शानदार और सुन्दर पशु है .घोड़ों और मनुष्य का साथ बहुत पुराना है.घोड़े जब साथ  आये ,प्रगति की  गति बहुत तेज हो गयी. इतिहास अश्वारोही योद्धाओं की विजयगाथाओं का एक अटूट सिलसिला है.  शायद यही वज़ह हो कि   मशीनों का ज़माना आया तो उन की ताकत मापने का पैमाना भी अश्वशक्ति ही मानी  गयी. मध्ययुग से ले कर आधुनिक समय तक सभ्यता के उत्तरोत्तर विकास में घोड़ों की केन्द्रीय भूमिका है. मनुष्य  के मन में घोड़ों की गहरी स्मृति है. घोड़ों और मनुष्य ने एक दूसरे को किस तरह बदला   ?क्या मनुष्य ने घोड़ों को मनुष्यवत बनाया ?या घोड़ों ने मनुष्य को पशुवत  ?क्या घोड़ों ने  मनुष्य की दुनिया को घोड़ों की दुनिया में तब्दील कर दिया?इस  दुनिया में कुछ तो  हैं लड़ाकू हमलावर घोड़े और बहुत सारे लगाम पहने नाल ठुंके घोड़े ?उस्मान खान की डायरी श्रृंखला की कविताओं से चुनी गयी यह छोटी सी कविता मनुष्यता के इतिहास की हमारी आमफहम समझ को ही नहीं झकझोरती ,हमारी स्मृतियों को भी बेतरह उलट पलट देती है. स्मृतियों का अन्धेरा  अतल सतह पर  आ जाता है .स्मृतियों का स्वाद बदल जाता है . वे कडवी और कसैली हो जाती हैं. स्मृतियों को सहेजना  दरअसल दुनिया को समझने का एक ढंग है . सिर्फ मीठी यादों को सहेजने वाल हमारा मन एक ऐसी विश्वदृष्टि का निर्माण करता है , जिस में मनुष्य की एक गरिमामय छवि उभरती है .कड़वी और कसैली यादें इस छवि को छिन्नभिन्न कर देती हैं. लेकिन हमें खुद के अधिक करीब भी .

कविता स्मृतिधर्मा होती है .  कविता में स्मृति अनेक रूपों में आती है. एक रूप वह है , जिस में कड़वाहट भारी स्मृतियों को छांट दिया जाता है. दूसरा वह है , जिस में उन्हें संशोधित कर दिया जाता है . कई बार  आमूलचूल बदल दिया जाता है.  कपोलकल्पनाओं को स्मृतियों में खपाने की कोशिश की जाती है. इस तरह स्मृतियों को कलात्मक बनाया जाता है . स्मृति स्वयं एक ‘कला’ बन जाती है.  एक रूप वह  भी  है , जिस में समकालीनता को स्मृतिहीनता का पर्याय समझ लिया जाता है. उस्मान की कविता में स्मृति की भूमिका  इन सब रूपों से अलग है . सब से पहले तो यह कि वह कविता में प्रवाहित होते समय को अतीत , वर्तमान और भविष्य के तीन  अलग अलग खांचों में विभाजित करने से बचती है . वह  वर्तमान में जीवित है .भविष्य में  ताकती झांकती है. अतीतमोह बिल्कुल  नहीं  है.

स्मृति की यह सक्रिय भूमिका असल में विस्मृति  के खिलाफ एक मुहिम है .  विस्मृति को प्रोत्साहन देना मनुष्य की सजग चेतना को नियंत्रित करने का सब से कारगर तरीका  है .उस्मान की एक और छोटी सी कविता इसे यों रेखांकित करती है —
आप मुझे मूर्ख कह सकते हैं , पर

मैं सचमुच भूल गया हूँ कि

मेरी जान

 फिलिस्तीन की उस सड़क में है

जिस पर एक भी फिलिस्तीनी नहीं चलता

या मैं मर गया हूँ

 मनोरमा के साथ.

उस्मान की कविता में जीव- जंतुओं का एक समूचा जीवित संसार है. केंचुए , कनखजूरे ,उल्लू , शैवाल , गिद्ध , मकड़ियां , सियार , ऊँट ,चूहे .वे सब निरीह प्राणी , जिन्हें हम देख कर भी नहीं देखते.  उस्मान हिंदी कविता को ‘फूल -बच्चा – चिड़िया – लड़की ‘ की समकालीन दुनिया से आगे ले गए हैं. यहाँ ऐसी कविता है , जिस में  में ” दुःस्वप्न हुई गलियों में थिरकती है ईश्वर की परछाईं/चाँद सबसे फ़ज़ूल चीज़ों में से हो जाता है/ग़ुलाब और ओस और जलेबी की तरह/और मिट्टी-सना एक केंचुआ/धीरे-धीरे सड़क पार करता है/जेठ की धूप  में..” इन पंक्तियों की व्याख्या करने की कोशिश फ़िज़ूल है. जेठ की धूप में सड़क पार करता मिट्टी-सना केंचुआ ईश्वर  की परछाइयों  को चुनौती  देता हुआ दुःस्वप्न-  गलियों में   जीवन के अंतिम स्वप्न को जिस तरह जीवित रखता है , वह हिंदी कविता की एक अविस्मर्णीय घटना है. लेकिन वही  केंचुआ जब दो ट्यूब लाइटों के बीच खड़े  ‘आदमकद  ‘  आईने में रेंगता हुआ नज़र  आता है , तब कविता के आईने में दिखती आदमी की कायांतरित शक्ल  स्तब्ध   और उदास करती है.

उस्मान की कविता में गाढ़ी  उदासी   है. बहुत दिनों से उदासी हिंदी कविता से बहिष्कृत रही  है. उदास होना कुछ गुनाह जैसा हो गया. उदास मौसमों के हर ज़िक्र के साथ उन से लड़ने का संकल्प घोषित करना लाजिमी मान  लिया गया. समकालीन हिंदी कविता साथ के दशक की कथित  चरम नकारवादी कविता  को विस्थापित  करती हुयी आयी थी. ‘अकविता ‘ में निराशा का कुछ ऐसा उत्सव मनाया गया कि वह समकालीन कवियों के लिए एक निषिद्ध वस्तु  हो गयी. कविता को आशावादी होना चाहिए. उसे विकृति और विद्रूप में रस लेने की जगह जीवन की सहजता , सुन्दरता , गतिशीलता और संघर्ष- भावना को देखने और दिखाने पर बल देना चाहिए. इस काव्य- सिद्धांत को कविता की जीवनधर्मिता  के रूप में इतनी  लोकप्रियता मिली कि अब वह हिंदी कविता के कॉमन सेन्स  का हिस्सा है. इस कॉमन सेन्स में जनवादी और ‘गुणीजनवादी’ ( अभिजनवादी ?) दोनों समान रूप से शरीक हैं .जाहिर है यह जीवन में व्याप्त निराशा को कविता के आशावाद से परास्त करने  का काव्य- संकल्प था . सो अंत- पन्त पलट कर  गहनतम निराशा में तब्दील हो जाना इस के लिए लाजिमी था. प्रमुख समकालीन  कवियों के यहाँ  ऐसे उदाहरण प्रचुर हैं.

‘निराशाद’ और ‘आशावाद’ से अलग उस्मान की कविताओं में हमारे समय की गहरी उदासी सहज रूप से मौजूद है. उस की कविता प्राचीन सभ्यताओं के दफ़न नगरो से ले कर आधुनिक सभ्यता के उजाड़े गए गाँव तक में भटकती हुयी त्रासदियों की गवाह बनने का माद्दा रखती है .उस की कविता में ‘देश का उदास चेहरा नाजी यातना शिविरों पर झुकी किसी चुप शाम की तरह’ उस की ‘मज्जा में टंकित करता है यातनाओं का उपन्यास’. उस की कविता में उन औरतों की उदासी है , जो ‘रात भर एक रुपये  को डेढ़ रुपया बना देने वाला जिन्न ढूँढती हुयी सडकों से जूझती’ हैं. ‘उदास रतजगों के मोड़ पर खड़ी’ उस की कविता ‘मेजों पर धूल की तरह जमी उदासी’ साफ़ करती है.

इन उदासियों को देख कर कविता को उदासी के आदाब सिखाने वाले नासिर काज़मी की याद आना सहज है. ” हमारे घर की दीवारों पे   नासिर / उदासी बाल खोले सो रही है. ” नासिर की शायरी में भी उन के जमाने की उदासी थी. एक देश , एक संस्कृति ,एक सभ्यता का विभाजन   और उस से उपजा   भोगौलिक  और मनोवैज्ञानिक  विस्थापन उन की उदासी का सबब था. उस्मान के समय तक आते विभाजन और विस्थापन के आयाम और भी विकट हुए हैं.

इस व्यवस्था की पूर्वशर्त है
        कि तुम्हारी आत्महत्या की जाएगी
       और साबूत खड़े लोग – वे भाँड
                             हटाते रहेंगे ऊँगलियों के पोरों से – घी की गंध
                    और देखते रहेंगे अपनी वीर्य-सनी गाँड

जब कि  गाँव शहरों में व्यापक आत्महत्याओं की खबरें बासी पड़ चुकी हैं , कविता उस विभाजन को दर्ज करती है , जिस के ओर  साबुत भांड खड़े हैं , और दूसरी तरफ वे लोग हैं , जिन की आत्महत्याए जनसंहार की तरह व्यवस्था की पूर्वशर्त बन जाती हैं. ‘ तुम्हारी आत्महत्या की जायेगी ‘ जैसी पंक्ति अद्भुत तीक्ष्णता      से उस झूठ   को उद्घाटित  कर देती  है , जिस में प्रायोजित  जनसंहार को ‘ आत्महत्याओं का नाम दिया जाता है. जल , जंगल और जमीन की खुली  ग्लोबल लूट ने इस विभाजन के दोनों ओर खड़े समूहों को मनुष्यता की उन जड़ों से विस्थापित कर दिया है , जिन से जुड़े रहना मनुष्यता   की परिभाषा   और भाषा   की गरिमा को बचाए रखने की पूर्वशर्त है.

कविता को सरलता , सुन्दरता  , शांति और  सुकून का अंतिम शरण्य समझने वाले रसिकजन इस कविता में ‘मौर्बिदिती ‘ या रुग्णता के दर्शन कर सकते हैं. लेकिन रोग से बेखबर रहना सब से बड़ी रुग्णता है. जब जीवन के उनियादी मूल्य , विचार और संवेदनाये हमले की ज़द में हों , तब उदासीनता सब से बड़ा रोग है. उस्मान की कविता में मनुष्यता की तमाम दुस्साध्य  बीमारियों की जागरूकता है . यह जागरूकता उदास करती है . लेकिन  इस  गहरी उदासी के चलते ही उदासीनता असंभव हो जाती है. इस उदासी को नकार कर आशावाद और निराशावाद के झूले में झूलने वाली कविता एक बनावटी आत्मतोष में स्खलित होती है .इस तरह कविता के भीतर बड़े हो हल्ले के साथ लड़ी जाने वाली लडाइयां अक्सर जिन्दगी की असली लड़ाइयों के प्रति  एक काव्यात्मक उदासीनता निर्मित करती है.अकारण नहीं है कि ऐसी तमाम कवितायें मुखर रूप से राजनीतिक न दिखने को कविता के एक मूल्य की तरह स्थापित करती हैं. इस के बरक्श   उस्मान को यह कहने में कोई झिझक नहीं है कि उन की कवितायें ‘ कतई राजनैतिक ‘ हैं  .क्योंकि ” कविता  में संभव  है उदासी / उदासीनता बिल्कुल नहीं. 

समकालीन हिंदी कविता पर बारीक नज़र रखने वाले युवा आलोचक आशुतोष  कुमार दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक हैं. इनसे  ashuvandana@gmail.com  पर संपर्क कर सकते हैं.

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