Archive for the month “April, 2017”

हंस में ‘घुसपैठिये’ के दो साल: पीयूष राज

‘घुसपैठिये’ स्तंभ की कहानियाँ न तो भाव-शिल्प की जटिलता में फंसती हैं और न ही इनके सरलीकरण में. उनके समाज में जितने तरह के अन्तर्विरोध हैं, उन्हें ये रचनाएँ सहजता से उनके स्वाभाविक रूप में पूरी डिटेलिंग के साथ रखती हैं. यही कारण है कि भाव और भाषा का दुहराव इनके यहाँ नहीं है. यहाँ भले ही इन कहानियों के कुछ उद्धरणों को उदाहरण के रूप में दिया गया है, लेकिन इन कहानियों की एक विशेषता यह भी है कि इनको पूरा पढ़कर ही इसके समग्र प्रभाव को समझा जा सकता है. # लेखक 

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प्यास और पानी, सौजन्य: अंकुर

‘घुसपैठिये’ के दो साल 

By पीयूष राज

हंस में ‘घुसपैठिये’ नामक स्तम्भ के दो साल पूरे हो गए हैं. इस स्तंभ में मजदूर बस्तियों में रहने वाले किशोर उम्र के बच्चों की कहानियाँ छप रही हैं. इन ‘अभी-अभी जवान हुए या हो रहे’ बच्चों की किसी खास तरह की साहित्यिक या वैचारिक ट्रेनिंग नहीं है. इनकी कहानियाँ देखे और भोगे गए जीवनानुभव की रचनात्मक अभिव्यक्ति हैं. लगभग 60 के दशक से ही ‘भोगे हुए यथार्थ’ के नाम पर लिखी गई रचनाओं को कभी किसी साहित्यिक आन्दोलन या किसी अस्मितावादी साहित्यिक आन्दोलन के नाम पर हिन्दी साहित्य में सराहना मिलती रही है. 80 के दशक के बाद तो ‘अनुभव या अनुभूति  की प्रामाणिकता’ अस्मितामूलक साहित्य का पर्याय बन गई. आलोचना की हर तरह की धारा ने इन अस्मितामूलक साहित्य को अब स्वीकार कर लिया है. इन विमर्शों की रचनाओं के साहित्यिक मूल्यांकन हेतु नए तरह के सौंदर्यशास्त्र और सौन्दर्यबोध को गढ़ने का आग्रह किया जाता है खासकर रचनात्मक उत्कृष्टता के सन्दर्भ में. अगर किसी को शिल्प या भाव के दृष्टिकोण से इन विमर्शों की रचनाएँ कमजोर लगती हैं तो यह तर्क दिया जाता है कि अभी-अभी तो इन्होंने लिखना शुरू किया है, अब तक ये हाशिये के लोग कहानियों में पात्र ही रहे हैं, अभी तक तो कोई और इनकी कहानी लिख रहा था, अब इन्होंने अपनी कहानी अपनी जुबानी लिखना शुरू किया है तो इनसे भाव और शिल्प की प्रगाढ़ता एवं विविधता की बहुत अधिक उम्मीद ठीक नहीं है आदि-आदि. मेरा सवाल यह है कि क्या ‘घुसपैठिये’ स्तम्भ के कहानीकारों के सन्दर्भ में इनमें से कई बातें लागू नहीं होती हैं? ‘घुसपैठिये’ की कहानियों के भाव और शिल्प पर मैं आगे अपने विचार रखूँगा. लेकिन क्या जो मानदण्ड विमर्शों को हिन्दी साहित्य या साहित्य में स्थान देने के लिए अपनाए गए हैं क्या वो ‘घुसपैठिये’ पर लागू नहीं होता? क्या कारण है कि विमर्श के नाम पर किसी भी तरह की रचना की वाहवाही करने वाले आलोचक इन कहानियों पर कुछ नहीं बोल रहे?

‘हंस’ जैसी प्रसिद्ध हिन्दी पत्रिका जिसे मेरी जानकारी के अनुसार हिन्दी साहित्य के साधारण पाठक से लेकर वरिष्ठ आलोचक तक पढ़ते हैं. ऐसी स्थिति में ‘घुसपैठिये’ पर हिन्दी समाज की चुप्पी आश्चर्य का विषय है. ऐसा इसीलिए भी है कि ‘हंस’ द्वारा इससे पहले इस तरह के किए गए प्रयासों को हिन्दी समाज और हिन्दी आलोचकों ने हाथों-हाथ लिया है. कामगार बस्तियों के इन किशोर रचनाकारों की रचनाओं पर चर्चा के लिए मैंने अन्य विमर्शों का जिक्र इसीलिए किया क्योंकि ‘घुसपैठिये’ की हिन्दी आलोचना द्वारा उपेक्षा उसके दोहरे मानदण्ड की परिचायक है. अन्य विमर्शों के तहत एक ही तरह की भाव और भाषा में लिखी जाने वाली रचनाओं की ‘स्वानुभूति’ के नाम पर जरूरत से अधिक प्रशंसा और ठीक उसी वक्त में भाव और भाषा की विविधता से परिपूर्ण अपनी स्वानुभूति को रचनात्मक अभिव्यक्ति देती रचनाओं पर दो शब्द तक नहीं कहना उपर्युक्त बात की पुष्टि के लिए पर्याप्त है. आखिर ‘साहित्य के आरक्षित डब्बों में घुस आए’ इन घुसपैठियों से किन्हें खतरा है? मेरा साफ-साफ़ मानना है कि विमर्श और समकालीनता के नाम पर एक ही तरह की भावबोध वाली रचनाओं को इनसे खतरा है. ऐसा नहीं है कि विमर्श के नामपर लिखी लिखी जा रही सभी रचनाओं में कोई विविधता नहीं है. लेकिन अधिकांश रचनाएँ एक ही तरह की हैं. इसका कारण यह दिया जाता है कि इन रचनाकारों की सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि एक ही तरह की है इसीलिए इनकी रचनाओं में भाव और शिल्प की समानता देखने को मिलती है. अब अगर ‘घुसपैठिये’ के रचनाकारों की के सन्दर्भ में देखें तो इनकी भी सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक पृष्ठभूमि एक ही है. यहाँ तक कि ये रचनाकार कमोबेश एक ही उम्र के हैं. लेकिन इनकी रचनाओं में अनुभव को अभिव्यक्त करने का तरीका बिल्कुल भिन्न है. भाव और भाषा दोनों स्तरों पर. इसका कारण यह है कि वे एक साथ इन कामगार बस्तियों के जीवन के भोक्ता भी हैं और दर्शक भी. भोक्ता इस अर्थ में कि वे इन कामगार बस्तियों में रहते हैं और दर्शक इस अर्थ में कि वे स्वयं श्रमिक नहीं हैं. श्रमिक उनके माता-पिता या सम्बन्धी हैं. इस कारण वे इस जीवन में लिप्त रहने के बावजूद रचना करते समय एक तटस्थ दृष्टिकोण रखने में सफल हैं. उनकी रचनाओं में विविधता का मूल स्रोत यही तटस्थ दृष्टिकोण है.

इनकी रचनाओं के बारे में यह बिल्कुल सही मूल्यांकन है कि ‘साहित्य के उत्पादक और उपभोक्ता, अभिलेखन/रिकॉर्डिंग और सृजन, किस्सा और तथ्य के बीच के अंतर यहाँ धुंधले पड़ जाते हैं.’ इनका जीवनानुभव कृत्रिम, बनावटी या अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं है. शोषित-पीड़ित होते हुए इनकी रचना का लक्ष्य आत्मपीड़ा का प्रकाशन नहीं है. ऐसा नहीं है कि जीवन की विसंगतियां और बिडम्बना इनकी रचनाओं में नहीं है लेकिन वे रचना करने से पहले ऐसा पूर्व निश्चय करके नहीं चलते कि उन्हें इस पहलू को हरहाल में उजागर करना है. उनका जीवन ही ऐसा है कि उनके इस जीवन की विसंगतियाँ और बिडम्बनाएं स्वतः ही उनकी रचनाओं का हिस्सा बन जाती हैं. ऐसा इसलिए भी है कि उनका जीवन घटनापूर्ण है. कामगार बस्तियों में रहने वाले लोगों के दैनिक जीवन में ही तेजी से घटनाएँ घटती हैं. सुबह उठकर दैनिक क्रियाकर्म से ही इन घटनाओं की शुरुआत हो जाती है-

‘सुबह के साढ़े पाँच बजे, जब अँधेरा भूरा होने लगता है और सपाट आसमान में हल्के नीले बादल दरारें बनाकर उभरने लगते हैं तब अंसारी जी के मोहल्ले में सब कुछ रोज़ाना वाली एक-सी धुन में शुरू हो जाता है। घुर्र-घुर्र करती पानी की मोटरों से घरों की दीवारें और ज़मीन झन्नाटें लेने लगती हैं। चबूतरों पर पानी की बाल्टियाँ उड़ेल दी जाती हैं, नहीं तो पाइप से छूटती ताजे पानी की दूधिया धार सारा आँगन भिगोती हुई गली में उतर आती हैं और सींक वाली झाडुओं का ज़बरदस्त संगीत एक साथ नहीं तो एक के बाद एक सुनाई देने लगता। इस बीच अंसारी जी उबासियाँ लेते हुए अपने पुराने, जर्जर मकान की बालकनी पर खड़े होकर मोहल्ले भर को निहारते हैं।’ (अंसारी जी )

मध्यवर्ग और उच्चवर्ग का जीवन इतना अधिक घटनापूर्ण नहीं होता. यह वर्ग  अपने जीवन में घटनाओं को अंजाम देने की कोशिश करता है जबकि कामगार बस्तियों में घटनाएँ ही श्रमिक-जीवन को संचालित करती हैं. इसी कारण ‘घुसपैठिये’ के रचनाकारों की एक बड़ी विशेषता है- छोटी-छोटी घटनाओं की भी सूक्ष्मता से विस्तृत वर्णन. घटनाएँ इतनी तेजी से घटित होती हैं कि साधारण किस्म के अभिलेखन से इसे रचनात्मक तौर पर सम्भालना नामुमकिन है. इसके संतुलन के लिए ये अपनी कहानियों के लिए फैंटसी, डायरी-लेखन या रिपोर्ताज की शैली अपनाते हैं. कामगार-बस्तियों की जीवन शैली अपने-आप में व्यवस्था की आलोचना है. जब इस जीवन शैली को फैंटसी, डायरी-लेखन या रिपोर्ताज शैली में ये रचनाकार अभिव्यक्त करते हैं तो उसमें व्यवस्था की आलोचना समाहित होती है. रचना की शैली कुछ भी हो पर व्यंग्य का सटीक प्रयोग इनके यहाँ व्यवस्था की विद्रूपता के लिए देखा जा सकता है. उदाहरण के लिए इन कहानियों के कुछ कथनों को देखिए– “ अरे तूने मुझे कहाँ पाला है? मुझे तो अमेरिकन कुत्ते ने पाला था और उस एहसान का कर्ज मैं अभी तक चुका रहा हूँ.’ तिहाई लाल ने पूछा ने पूछा ‘कैसे’? ‘अरे क्या तुझे याद नहीं जब तेरे अमेरिकन कुत्ते की नई-नई शादी हुई थी तो वह मेरी लूँगी चुराकर भाग गया था. बदले में मैंने उसकी बीबी की पाँच रुपये वाली साड़ी फाड़ दी थी, बाद में पता चला कि वह पाँच रुपये की नहीं पाँच हजार की थी. उस साड़ी का कर्ज मैं अभी तक चुका रहा हूँ.”  (‘नींबू-पानी पैसा’)

–“अरे छोड़, जो कभी रामभक्त नहीं बना वो देशभक्त कैसे बनेगा?” (‘नींबू-पानी पैसा’)

–“‘सरकारी नौकर हैं’ कहकर ख़ुद को देश की सेवा में लगा बताते हैं और अंसारी जी पाँच बजे तक की ड्यूटी पूरी लगन से निपटाकर दो बजे ही लौट आते हैं.” (सुबह वाकई बेनकाब थी उर्फ अंसारी जी)

उपर्युक्त उद्धरणों से स्पष्ट है कि व्यवस्था और समाज की विसंगतियों को इतनी सूक्ष्मता से ये रखते हैं कि पाठक को कहीं से ये ऊपर से लादा हुआ या किसी वैचारिक बोझ से लदा हुआ नहीं लगता है. ऐसा आजकल की रचनाओं में बहुत कम देखने को मिलता है.

फैंटसी या कल्पना की सहायता से अभी तक ‘अँधेरे’ का प्रयोग व्यवस्था की सच्चाई को बयान करने के लिए किया जाता रहा है. लेकिन ‘घुसपैठिये’ के रचनाकारों ने ‘अंधेरे’ को सकारात्मक रूप में दिखाया है. इसका कारण यह है कि वर्किंग क्लास की इच्छाएँ-आकांक्षाएँ दिनभर के काम के बाद अंधेरे में ही आकार लेती हैं-

‘रोजान की आदत से सभी जग तो रहे थे लेकिन अंधेरा होने की वजह से सभी आँख बंद करके दोबारा से सो जाते थे, अरे अभी अंधेरा है, एक नींद और मार लेते हैं। आज तो सभी की मम्मियाँ और घरवालियाँ अगड़ाइयाँ लेकर सो रही थीं। बच्चों के तो मजे आ गए थे। सावदा मे पढ़ाने वाले टीचर ने जब सावदा मे इंट्री लिया तो पता चला कि यहाँ तो अभी रात है, सभी ने अपनी-अपनी घड़ी पर नजर गड़ाया और देखा कि उनका टाइम तो सही है पर चौकीदार अभी तक सोया पड़ा है। सावदा से जाने वाली बसें लाईट जलाए खड़ी हैं। भटटू के पापा ने अपनी बीबी को जगाया, ‘अरे भगवान, अब तो जग जाइए, सुबह हो गई है।’ ‘अरे कैसी बात करते हैं, आप भी सो जाइए रात काफी बची है। आपको नींद क्यों नहीं आ रही है।’ ‘आप को रात लग रही है बाहर के लोग सावदा में आने लगे हैं।’

बाहर के लोग भी यहाँ आकर चक्कर मे फंस गए हैं, अरे सावदा को क्या हो गया है? सावदा के बच्चे अभी अपने घरो में सोये हुए पड़े हैं। रोज ड्यूटी जाने वाले लोग भी बेखबर सोये पड़े हैं।’ (अंधेरा)

यहाँ अंधेरा इसलिए खास है क्योंकि यही इनके जीवन का ऐसा पल है, जहाँ ये थोड़े बेफिक्र हो पाते हैं. भागदौड़ भरी जिंदगी जहाँ ठहर जाती है और इन्हें लगता है कि काश ‘इस रात की कोई सुबह न हो’।

दिन की शुरुआत उनके लिए युद्ध जैसी होती है. जहाँ पानी जैसी चीज के लिए ‘जलविद्रोह’ होता है और वैसी ‘दोस्ती’ जिसे धार्मिक-आस्था नहीं तोड़ पाती उसे पानी की धार तोड़ देती है.

“बन्नो बाजी को पाइप खोले पानी भरते देख उन दोनों को मानो चपेट पड़ गया। दोनों आंटियां बन्नो बाजी पर बरस पड़ी। अपनी बहन को दो जंगली कुत्तियों की भांति आंटियों के बीच अकेले जूझते देख बन्नो बाज़ी की दो बहनें पीछे रह सकती थीं क्या? वह भी तीनों के बीच घुस गईं। ये वही तीन हमशक्ल बहनें हैं जिनका ज़िक्र मैंने पहले किया था और जो कुछ मैंने कहा था काफ़ी हद तक इन बहनों ने उसे साकार कर दिखाया। इन तीनों बहनों ने मिलकर उन दोनों आंटियों को बैकफुट पर धकेल दिया। इसी के साथ बहुत सी औरतें इन पांचों की मौजूदगी के कारण अपने ख़ाली डिब्बे लिए लौट रही थीं।”

आस्था और जेंडर-सम्बन्धी प्रश्न किसी भी समाज के मूलभूत प्रश्न हैं. ‘घुसपैठिये’ की कहानियाँ बहुत ही बारीकी से आस्था और जेंडर के प्रश्नों को उठाती है. ‘रात और दिन’ और ‘नींबू-पानी पैसा’ जैसी कहानियाँ आस्था की जड़ों को हिलाने वाली हैं. दूसरी ओर ‘सुबह वाकई बेनकाब थी उर्फ अंसारी जी’, ‘लड़की की डायरी’, ‘पहचान’, ‘वंश’ जैसी कहानियाँ जेंडर-सम्बन्धों के अन्तर्विरोधों को बारीकी से रखती हैं.

‘सुबह वाकई बेनकाब थी उर्फ अंसारी जी’ के इन दो उद्धरणों में वर्किंग क्लास के भीतर जेंडर की समझ के पहलू को पकड़ा जा सकता है.

‘अम्मी, अब्बू अच्छा शौहर कहाँ से लायेंगे? ये अच्छा शौहर क्या होता है?’

‘नहीं मिलेगा अच्छा शौहर! क्योंकि तुम्हारे अब्बू उसे पहचानते ही नहीं है इसलिए तुम सिर्फ़ तरकारी काटो, तुम्हें ही अच्छी बेगम बनना पड़ेगा।’ कहकर शबनम फिर से चूल्हा जलाने लगी, पर अंदर से जैसे भभक उठी थी। (अंसारी जी)

अपनी हँसी को विराम और गले को आराम देकर उन्होंने कुछ दम भरते हुए कहा, ‘हाँ, हाँ, ज़रूर! क्यों नहीं! अच्छा शौहर भी ले आयेंगे हम!’ सुनकर मासूमा ने अगला सवाल किया, ‘पर अब्बू, पहले बताइये कि अच्छा शौहर होता क्या है?’ मासूमा की आँखों में जिज्ञासा साफ़ नज़र आ रही थी। अब्बू ने उसकी कलाई पकड़कर पास खिसकाते हुए उसे बोले, ‘अच्छा शौहर वह होता है जो हमारी मासूमा को बेइंतहा मोहब्बत करे। उसकी सारी ख्वाहिशें पूरी करे। उसका अपने से भी ज़्यादा ध्यान रखे और हमेशा उसे खुश रखे।’ जवाब सुनकर खामोश मासूमा जैसे अब्बू की आँखों में कुछ टटोलने लगी पर अंसारी जी तो इस बेहद सच्चे जवाब के साथ ख़ुद को ख़ाली कर चुके थे। ज्ञान और धर्म की कोई अनमोल बात किसी को बताते हुए जैसा आनंद कोई गुरू महसूस करता है कुछ वैसे ही फक्र का अहसास अंसारी जी के चेहरे पर नज़र आ रहा था। मासूमा एकटक अपने अब्बू की आँखों में झाँक रही थी कि तभी उसने फिर से अब्बू को पुकारा और कहा, ‘अब्बूजान क्या आप भी एक अच्छे शौहर हैं?’ सवाल सुनकर अंसारी जी के मुँह से निकलने वाली ‘हाँ’ अंदर ही कहीं घुट कर रह गई और स्तब्ध से मासूमा को देखते रहे। चाहकर भी अपना जवाब बुनने के लिए शब्द नहीं खोज पाए। (अंसारी जी)

एक तरफ मासूमा की माँ शबनम का खुद के अनुभव के आधार पर कहना है कि क्योंकि अंसारी जी खुद अच्छे शौहर नहीं है तो वह उसके लिए कैसे अच्छा शौहर ढूंढ पाएंगे. यह अनुभव अधिकतर औरतों का है. लेकिन जब यही सवाल मासूमा ने अंसारी जी से किया तब वे असहज हो गए. अंसारी जी अभी तक स्त्री-पुरुष संबंध को सिर्फ पति-पत्नी के संबंध के रूप में ही देखते आए थे, जहाँ उन्हें कुछ भी करने की स्वतन्त्रता थी. लेकिन जब संदर्भ उनकी बेटी का आया तब उन्हें इस संबंध में औरत की पीड़ा का अंदाजा हुआ. अंसारी जी के माध्यम से यह पाठकों को भी इस संबंध में सोचने को विवश करता है.

‘अच्छा शौहर कैसा होता है?’ या ‘क्या आप अच्छे शौहर हैं?’ या ‘वो बेटा है या बेटी?’ या ‘अगर बेटा है तो क्यों है और बेटी है तो क्यों है?’ या ‘दोनों में फर्क क्या है?’ या ‘कपड़े अलग क्यों हैं?’ या ‘खेल अलग क्यों हैं?’ जैसे कौतूहलपूर्ण प्रश्नों से ये कहानियाँ, किसी आम पाठक को भी जेंडर सम्बन्धित सम्बन्धों पर सोचने को विवश कर देती हैं. इसका मूल कारण है कि इन रचनाओं में ये प्रश्न बहुत ही सहज और स्वाभाविक रूप से आए हैं और पाठक के भीतर भी उसी सहजता से पैठ जाते हैं.

उदारीकरण, बाजारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण के समाज पर पड़े प्रभावों खासकर ‘वर्किंग क्लास’ पर पड़े प्रभावों के बारे में अभी तक जितना भी साहित्य में लिखा गया है वो ज्यादातर बाहर से साफ़-साफ़ दिखने वाले प्रभावों के बारे में है. इस परिप्रेक्ष्य में ‘घुसपैठिये’ की रचनाएँ व्यक्ति नहीं समाज की मानसिक अवस्था को रचनात्मक अभिव्यक्ति देती हैं. ‘निरुमा’ और ‘माल की महफिल’ जैसी कहानियों में  वर्किंग क्लास सामाजिक मनोदशा को जितने बेहतर ढंग से रखा गया है वो उदारीकरण को केन्द्र में रखकर लिखी जा रही समकालीन रचनाओं में दुर्लभ है. इस सामाजिक मनोदशा के साथ सबसे खास तथ्य यह है कि नई पीढ़ी की का मानसिक विकास किस दिशा में हो रहा है, इसके बारे में ये कहानियाँ संकेत देती हैं. ‘वंश’ , ‘पहचान’, ‘एक लड़की की डायरी’, ‘मुस्कान’ जैसी कहानियाँ जहाँ बच्चों और किशोरों के भीतर जेंडर संबंधी समझ के अंतरविरोधों को बड़ी बारीकी से पेश करती हैं. इन कहानियों में सिर्फ उन बच्चों या किशोरों के मन में चलने वाले अंतरविरोधों को एकांगी रूप से नहीं वर्णित किया गया है बल्कि इस मानसिक टकराहट को सामाजिक अंतरविरोधों के बरक्स रखने का प्रयास इन कहानियों में है, जो  जेंडर संबंधी एक भिन्न किस्म के संघर्ष की स्थिति को पैदा करता है.

इसके अलावा ‘घुसपैठिये’ की कहानियाँ इस उदारीकरण के दौर में दम तोड़ते सहज मानवीय संबंधों के बीच नए तरह के मानवीय संबंधों की भी खोज करते हैं. इसका मुख्य कारण यह है कि इसके रचनाकार अभी किशोर हैं जो अपने आसपास खत्म होते मानवीय संबंधों को देख रहे हैं. ‘जन्मदिन’, ‘ख्याली मूर्ति’, ‘लंहगा’, ‘मातारानी’ जैसी कहानियाँ तेजी से सिमटती जा रही दुनिया के भीतर भावनाओं के एक नए संसार की तलाश हैं. पीड़ा, दुःख, गरीबी और शोषण इस दुनिया में भी है लेकिन इससे जूझने और मानवीय संबंधों को हर-हाल में बचाने की जीवटता भी है.

‘घुसपैठिये’ स्तंभ की कहानियाँ न तो भाव-शिल्प की जटिलता में फंसती हैं और न ही इनके सरलीकरण में. उनके समाज में जितने तरह के अन्तर्विरोध हैं, उन्हें ये रचनाएँ सहजता से उनके स्वाभाविक रूप में पूरी डिटेलिंग के साथ रखती हैं. यही कारण है कि भाव और भाषा का दुहराव इनके यहाँ नहीं है. यहाँ भले ही इन कहानियों के कुछ उद्धरणों को उदाहरण के रूप में दिया गया है, लेकिन इन कहानियों की एक विशेषता यह भी है कि इनको पूरा पढ़कर ही इसके समग्र प्रभाव को समझा जा सकता है. इस प्रभाव की थोड़ी-बहुत तुलना ‘औदात्य’ की परिभाषा से भी की जा सकती है. यानी कब रचना आपको अपने प्रभाव में ले लेती है आपको इसका भान नहीं होता. इस स्तंभ के सभी रचनाकारों का अपना कलेवर है. यह भिन्नता कामगार बस्तियों के जीवन के विविध पहलुओं को ही हिन्दी समाज के सामने रखने का एक सफल माध्यम है. ये अपनी बात ऐसी भाषा में कह रहे हैं जो निःसंदेह इनके बारे में एक बार सोचने को मजबूर करता है.

पीयूष राज. भारतीय भाषा केंद्र, जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय से पीएचडी. फिलहाल फर्स्टपोस्ट हिंदी में पोस्टेड हैं. उनसे , मोबाइल नंबर -09868030533 , ईमेल आईडी – piyushraj2007@gmail.com पर संपर्क सम्भव है.

साभार: हंस, अप्रैल, 2017

 

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सदा: एक आर्मीनियाई कहानी

मुशेग़ गाल्शोयान आर्मीनियाई साहित्य के एक महान विभूति,लोकप्रिय कहानीकार, निबंधकार तथा पत्रकार थे. उनका जन्म 13 दिसंबर 1933 को सोवियत आर्मीनिया के थालिन प्रांत के मेहरिबान (काथनाग़ब्यूर) शहर में हुआ.

सन् 1915 में युवा तुर्क सरकार द्वारा आयोजित आर्मीनियाईयों के नरसंहार में इनके पिता के परिवार में कोई नहीं बच पाया था. पिता की अथाह पीड़ा ने बालक मुशेग़ पर अमिट छाप छोड़ी. बाद के दिनों में उन्होंने अपनी कलम अपने देश के नाम समर्पित कर देने का फैसला लिया.  

इनके प्रथम लघु उपन्यास ‘द्ज़ोरी मीरो’ ने उन्हें परिपक्व लेखक की पहचान दिलाई. उनकी कहानी ‘सदा’ ‘मारुता पहाड़ के बादल’ कहानी-संग्रह में से एक है जो सन् 1981 में प्रकाशित हुई थी. सोवियत संघ ने इस पुस्तक के लिए उन्हें मरणोपरांत राज्य पुरुस्कार से नवाज़ा. यह कहानी उन्होंने 1915 में आर्मीनियाई नरसंहार की पृष्ठभूमि पर लिखी थी. # अनुवादक माने मक्रतच्यान

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एक  आर्मीनियाई कहावत

सदा

By मुशेग़ गाल्शोयान

“आले…आले, मेरी रूह, आले…”

वह भीमकाय और रोएंदार बूढ़ा आदमी लाठी के सहारे खड़ा लय में पुकारे जा रहा था. पहाड़ी की ढलान पर भेड़ों का झुण्ड इत्मिनान से चर रहा था. ज़ोरो…बूढ़ा ज़ोरो कोई पेशेवर चरवाहा नहीं था. दरअसल गांव में कोई भी चरवाहा नहीं था. सभी बारी-बारी से पशुओं को चराने ले जाते थे. उस दिन ज़ोरो की बारी थी और ज़ोरो लाठी के सहारे खड़ा गाते हुए अपनी प्रेमिका की यादों में था.

“आले…आले, मेरी जान, आले…”

सूर्योदय से सूर्यास्त तक उस पगले की जुबान पर आले का ही नाम रहता था.

***

आह! बात भी कब की! एक नीले वसंत की…एक नीली और नर्म-सी सुबह, नीली-सी दुनिया… नीले आवरण से ढका माराथुक पर्वत, नीले आकाश से भरी घाटियां और वादियां, पहाड़ों की गोद में बसे गांवों की साँसें भी नीली ही थी, उन्मुक्त घोड़ों की धौंकनी से घाटी में नीलिमा उफ़न रही थी. मारुता पर्वत की तलहटी में पसरे मवेशी वसंती कायनात की खुशबू से सराबोर थे. मेमने अपनी थूथन सटाए पत्थरों पर जमी कोमल शैवाल को चाट रहे थे. जोंकमारी और नागफनी के कांटों से बचते, चिड़ियों की फरफराहट पर चौकन्ने हो उछल-कूद कर रहे थे.

उसी वक्त दस-ग्यारह साल का ज़ोरो एक ढलवी चट्टान पर खड़ा ढेलवांस को वेग से घुमाता जा रहा था…..ज़ज़ज़ज़…घूमते-सनसनाते पत्थर अचानक अपनी दिशा बदल लेते थे और उड़ते कौओं को छेड़ते घाटी में गिर जाते थे.

नीचे फूल-पौधों को बीनती रंग-बिरंगी अल्हड़ लड़कियों का तारक-पुंज चमक रहा था. छोटी काली आँखों वाली और पतली चोटियों की जोड़ी लहराती सात साल की आले, सुंदर तहबंद में लिपटी, आग का शोला दिखती आले उनमें से एक थी. हाँ..हाँ..अपने ज़ोरो के मासूम धवल मेमनों की तरह ही इधर-उधर कुलांचे भर रही थी- फूलों की माला सिर पर ओढ़े- मानो हवा के झोंकों से बना एक रंगीन गुल्दस्ता हो…

नन्ही, प्यारी आले…ओह…ज़ोरो को एकाएक महसूस हुआ था कि आले उसकी है…किसी और की नहीं…सिर्फ उसकी!

यह नीली दुनिया उसकी है, ये खेत, यह सुबह, यह रेशमी घूँघट में छुपा माराथुक पर्वत उसका है. गिरजाघर पर टंगा आशीर्वाद सरीखा वह उजले बादल का टुकड़ा भी उसका है. घुमावदार ताल्वोरिक नदी की कलकल, गांव पर तिरता धुआं, वो अधीर बकरियां और मेमने सब उसके ही हैं. सूरज, आकाश, खुबसूरत पत्थर व चट्टान और उसपर खड़ा वह- हाथ में ज़ज़ज़ज़…करता तूफ़ानी-सा ढेलवांस उसका है और आले…रंग-बिरंगे फूलों में दमकती, उछलती-कूदती मासूम आले भी उसकी है, किसी और की नहीं, सिर्फ उसकी है.

वसंत की वह मधुर सुबह ज़ोरो की स्मृति में चिरकाल के लिए अंकित हो गई थी. ज़ोरो फिर उसे भूल नहीं पाया. ज़ोरो ने उसे पाया था बस खो देने के लिए!

उस्मानी ग्रहण लगनेवाला था.

***

बूढ़े ज़ोरो के घर में शादी थी. उसने तय किया था कि शादी के लिए मदिरा लाने वह खुद जाएगा और लाएगा तो आरारात पर्वत की वादियों की दुर्लभ मदिरा. बड़े और मंझले बेटे की शादी करवा चुका था. तब हालत खस्ता थी. छोटी-सी दावत कर शादी के जश्न जैसा कुछ मनाया था. पर इधर किस्मत मेहरबान है! इस बार सारे गांव के लिए, नजदीक-दूर के रिश्तेदारों के लिए बड़ी वाली दावत की मेज़ सजा सकता है, तरह-तरह के पकवान और बेहतरीन मदिरा परोस सकता है. बड़े बेटे का परामर्श कि किसी भी अच्छी दुकान से मदिरा मंगवाई जा सकती है नाकाम रहा. बुढ़े ने ठान लिया था कि वह खुद चुनकर आरारात पर्वत की वादियों से अंगूरी लाएगा.

अगले दिन सुबह-सवेरे गाड़ी में बेटे को बिठा कर अपनी तलाश में निकला. जाने कितने गांवों में गया, जाने कितने पीपों की मदिरा चखी, पर कुछ भी पसंद न आया.

शाम की सुनहरी किरणों के तह में घने पेड़ों से अच्छादित चौड़ी सड़क पर गाड़ी वेग से उड़ रही थी कि अचानक पेड़ों के दरमियान एक रास्ता दिखा. ज़ोरो के दिल में न जाने क्यों हलचल-सी मची.

“इधर चलो” और हाथ से स्टीयरिंग मोड़ दिया. गाड़ी बेलगाम सड़क से उतर गई. जाकर झाड़ियों में उलझ गई. बड़ी दुर्घटना नहीं थी. दरवाजे़ पर छोटी-सी खरोंच भर थी, पर बेटा बुरी तरह छिल गया था.

“मनहूस-सी शकल मत बनाओ. जो होता है भले के लिए होता है” ज़ोरो ने उसे शांत किया- “मुझे तो यह गांव बहुत पसंद आ रहा है” बूढ़े ने गांव के बीचोबीच गाड़ी रुकवाई- “अब अच्छी या बुरी, जो भी मिले यहीं से ले लेंगे.”

भीड़ उसकी गाड़ी के इर्द-गिर्द जम गई. सब अपने-अपने घर की बनी लाल मदिरा की तारीफ़ में लगे थे और अपने शराब के तहखानों में चलने का न्योता दे रहे थे. सिर्फ एक दुबला पतला-सा आदमी शांत खड़ा हुआ था. ज़ोरो उसी के पास गया.

“…क्यों नहीं है?” उस आदमी ने आश्चर्य से बूढ़े को देखा- “अंगूर के बगानवाले के पास मदिरा ना होगी?”

“खुदा कसम, पसंद आ गई तो बेटे की शादी तुम्हारी मदिरा से ही मीठी कर दूंगा. चलो, चखवाओ…!”

खुशनुमा अंगूर की लताओं से घिरा खुबसूरत घर था. घर के बगीचे में खूबानी की शाखा से जमीन तक लटकी मोटी लाल मिर्चें सूख रही थीं. एक छोटी चंचल-सी बुढ़िया मिर्चों को एक-एक कर उतार रही थी.

“बड़ी अच्छी गृहस्थी है तुम्हारी.” घर बगीचे ने ज़ोरो का मन मोह लिया था- “तुम्हारा घर आबाद रहे!”

बुढ़िया ने पीछे घूमकर देखा. सोचा कि उठकर आगंतुक का स्वागत करे किंतु बैठी रही और उत्सुकता से बूढ़े को देखती रही.

“तुम्हारी घरवाली है?” ज़ोरो ने पूछा.

“हां, तुम्हारे तरफ की है.”

“मेरे तरफ की?! अरे वाह..! इधर आओ तो बहन.” ज़ोरो खिल उठा- “अपना परिचय तो दो.”

बुढ़िया छोटे-छोटे कदमों से चलती नजदीक आई और मुस्कुराते हुए उसने हाथ बढ़ाया. उसके हाथ में सुखी हुई लाल मिर्चें टकराकर सरसराती-सी आवाज़ निकाल रही थीं. बुढ़िया को अचानक शर्म आई कि अपने देस के इस आदमी का स्वागत वह लाल मिर्चों से कर रही है.

“किस गांव से हो, बहन?”

जवाब सुनकर ज़ोरो का दिल धक से उछला- “सारेकान?” बड़ी मुश्किल से वह बोल पाया- “सारेकान?” यूं तो बुढ़िया उसके नज़दीक ही खड़ी थी लेकिन उत्तेजना में ज़ोरो उससे लगभग सट गया था और उसकी आँखों में टुकुर-टुकुर ताके जा रहा था.

समय की चोट से थकी और उदास थी बुढ़िया की आँखें… जैसी कि तब वहां के तमाम लोगों की हुआ करती थीं. लेकिन उसकी आँखों की गहराई में शरारती चिंगारियां बची हुई थीं. ज़ोरो सिर झुकाकर उसे घूरता रहा. उसने बुढ़िया के हाथ में लटकी सूखी लाल मिर्चों को देखा और कहीं दूर से आती एक मुस्कान उसके होठों पर तिर गई. उसकी बूढ़ी मूंछों के जाले में न जाने कितनी स्मृतियां उलझने लगी थीं!- तबाही, भगदड़, हिजरत, कत्लेआम, खो गया बचपन…और गुम चुकी वह!- “आले…” वह फुसफुसाया. बुढ़िया ने कुछ सुना नहीं.

“आले.” ज़ोरो ने दोहराया और तनकर खड़ा हो गया. इतना सीधा कि उसके बेटे ने भी उसे ऐसा पहले कभी नहीं देखा था. उसने बुढ़िया को ऊपर से नीचे तक फिर से देखा, बुढ़िया के पीछे घर को देखा और उसके भी पीछे की धुंधली-सी उस पर्वतमाला को जिसकी एक चट्टान पर वह कभी ढेलवांस घुमाया करता था. उसने अपनी साँसें बटोरी और पूरी ताकत से चीखा- “आले…आले…”

बुढ़िया ज़ोरो को पहचानने की कोशिश करने लगी. उसके लबों से अपना नाम सुनकर वह चौंकी थी पर बूढ़े का चीखना उसे मधुर प्रतीत हुआ. उन गर्म-नर्म आत्मीय पलों ने बुढ़िया को भीतर तक भींगो दिया. दोनों एक-दूसरे को ठगे से देखते रहे.

“अरे मैं ज़ोरो हूँ…” उसने आले का हाथ जकड़ लिया, उसे अपने झुके सर से लगाया और फिर चूम लिया.

बुढ़िया स्तब्ध रह गई. मेहमानवाज़ी के कायदे से तो पहले उसे ही अतिथि का हाथ चूमना था, उसने जल्दी से वही किया. न जाने कब से उसके भीतर दफन आंसुओं ने अपना रास्ता तलाश लिया और ज़ोरो की कांपती हथेलियां भीगने लगीं.

इस लाड़-प्यार के दरमियान हाथ में टंगी सूखी मिर्चों की गंध से अचानक आले छींक पड़ी फिर एक मासूम हंसी के साथ उसने अपनी आँखें मसली, जिससे उसके बहते आंसू आँखों की कोटर में पसर गए. इस भावुक आवेग के गुजर जाने के बाद वह हल्का महसूस करने लगी थी. दोनों बच्चों की तरह मुट्ठियों से अपनी आँखें पोंछे जा रहे थे और विभोर हो रहे थे.

“बाबो (पिता जी) देरी हो रही है! अब निकला जाए.” बेटा इस स्वांग से ऊब चुका था.

ज़ोरो की तन्द्रा टूटी. नज़र बेटे पर गई फिर गृहस्वामी पर. गर्दन डुलाते आले से कुछ कहना चाहता था पर कह नहीं पाया.

“अच्छा, तुम्हारी घरवाली है?” आदमी को देखते हुए वह बोला- “खुशनसीब हो!… मदिरा कहां है?” उसने जल्दी से जोड़ा.

गृहस्वामी तहखाने से एक तांबे के पात्र में शराब चखाने के लिए लाया जिसे ज़ोरो ने एक ही सांस में गटक लिया.

“वाह, उम्दा है!” हथेली से अपनी मूंछों को पोंछते हुए उसने कहा- “इतनी मीठी शराब तो इन होठों ने पहले कभी नहीं चखी, दिव्य…!” बेटे की ओर मुड़कर जोड़ा- “अब समझे रे, क्यों सुबह से शाम तक इतना भटके? आखिर खजाना यहीं पर जो मिलना था! इन सबको भर दो.” उसने साथ लाई खाली सुराहियां दिखाते हुए कहा.

“क्या सारा का सारा?” आदमी ने पूछा.

“बिलकुल, पूरा पीपा मेरा है.” ज़ोरो उतावला होकर बोला- “सारा डालो, दाम की मत सोचो. यह मदिरा अनमोल है.”

गृहस्वामी तहखाने से पीपा लेकर आ गया और तांबे के प्याले से सुराहियां भरने को बढ़ा कि ज़ोरो ने टोक दिया.

“किसी और बर्तन से निकालो. यह प्याला मेरा है.”

गृहस्वामी ने बहुत आरजू की कि भईया इत्मीनान से बैठक में चलकर पीते हैं, बतियाते हैं, तुम तो ससुरालिए ही निकले. आले ने भी कहा पर ज़ोरो बाहर ही जमा रहा. बेटे ने चिकोटी काटी. चलने का इशारा किया लेकिन ज़ोरो बेपरवाह तांबे के प्याले से आत्मा तृप्त करता रहा.

            उसकी वहीं रहने की जिद्द देखकर बुढ़िया अंदर से रोटियां लेकर आई जिसे उसने एक छोटी-सी मेज़ पर रख दिया. ज़ोरो ने उसे छुआ तक नहीं. ज़ोरो ने पीपे पर अपना पीठ टिका दी थी और शराब की चुस्कियां लेता जाता था और कराहता जा रहा था.

“हाय, आले!”

बुढ़िया मेज़ पर झुकी, कुहनियां टिकाए ख़यालों में खोई हुई थी एक नन्ही गठरी-सी बनकर. आंसुओं की लहर ज़ोर मार रही थी जिसे बुढ़िया ने किसी तरह रोक रखा था.

“तुम्हारे आदमी को तो देख लिया और बाल बच्चे?”

“हां, हैं न, बेटे हैं, बेटियां हैं, सबके बाल-बच्चे हैं, बहुए हैं…और तुम्हारे घर में कौन-कौन है भईया ज़ोरो?”

“बेटे हैं, बहुए हैं, सुशिल बेटियां हैं और ढेर सारे नाती-पोते, आले! यह सब मेरे हैं और यह मदिरा भी.” ज़ोरो ने प्याला फिर से भरा- “मेरे छोटे बेटे की शादी का, खुशियों भरा जाम! आले, मेरी जान आले!”

बूढ़े ने अपनी भारी आवाज़ में गाना शुरू कर दिया. गृहस्वामी ने बुढ़िया को कुहनी मारी और ज़ोरो की तरफ कनखियाते हुए मुस्कराया- उसकी शराब वाकई दमदार है.

बेटे ने गृहस्वामी के साथ शराब का हिसाब-किताब निपटाया. ज़ोरो गाता रहा. बेटे ने शराब गाड़ी में ला दी. गृहस्वामी ने इत्मिनान से पाइप जलाया और आले की बगल में बैठ गया. ज़ोरो तब भी अपने में मगन गाता रहा. बेटे ने उसके हाथ से प्याला ले लिया और बांहों में हाथ डालकर ले जाने की कोशिश की.

“चलो बाबो, चलते हैं.”

ज़ोरो ने हाथ झटक दिया. और बाहर के दरवाजे पर टिका रहा.

“माराथुक की कसम, मेरा पैर यहां से नहीं खिसकेगा.” ज़ोरो को पूरी तरह चढ़ गई थी.

गृहस्वामी ने पेशकश की कि ज़ोरो चलकर घर में आराम करें.

“हाय हाय, क्या इस वक्त आँखें बंद हो सकती हैं.” ज़ोरो ने आँखें मसली- “अरे तुम कहां खो गई, आले?”

बेटे ने बिगड़कर चलने को कहा. ज़ोरो ने एक मोटी-सी गाली दी- “चुप कर, हरामज़ादे.”

फिर एक गाली गृहस्वामी की तरफ उछाली- “तू भी फूट ले बछिया के ताऊ!”

“मुझको मेरे ही घर से निकाल रहे हो?” गृहस्वामी हंसकर बोला. शराब के असर को उससे बेहतर कौन जानता था. जाना तो तुमको ही होगा भईया.

“अबे सिर फोड़ दूंगा…तुम्हारे सारे पीपे तोड़ दूंगा, पूरी शराब बरबाद कर दूंगा. साले मुझको निकाल रहे हो घर से, मुझको? आले…!”

बेटे और गृहस्वामी ने उसे टांगकर उठाया और उसे घसीटते हुए बाहर ले गए. पूरे रास्ते ज़ोरो की आँखें आले को तलाशती रहीं. उधर बुढ़िया उसकी हालत देख बुरी तरह सहम गई थी और सिसकने लगी थी. फिर भी इतने प्यार से लिया जाता अपना नाम उसने पहले नहीं सुना था. ज़ोरो के दिल की गहराईयों से निकली सदा उसे उदास कर रही थी.

ज़ोरो की आवाज़ उससे दूर होती चली गई.

***

उस दिन ज़ोरो का मन भिन्नाया हुआ था. कुछ देर तक चट्टान पर खड़ा नाती-पोतों की बातें सुनता रहा, पर दिमाग तो वही लगा हुआ था, आले के पास. झूठमूठ में हां-हूं करता रहा फिर घर की तरफ बढ़ गया. आख़िर अब तक दोबारा क्यों नही गया उसके पास, क्या गाड़ी नहीं थी? क्या समय की किल्लत थी? बीमार पड़ गया था या हाथ-पैर काम नहीं कर रहे थे? या क्या…? उसने खुद को जी भरकर कोसा. चलते-चलते उसने तय कर लिया कि इन सबके पीछे असली मुजरिम कौन है! हां, बिलकुल! उसकी घरवाली. उसपर ज़ोरो को ज़ोर से गुस्सा आया!

“तेरे हाथ का खाना हराम है.” घर में घुसते ही वह बोला- “तूने दाहिने हाथ से खाना दिया और बाएं हाथ से मेरी आत्मा छीन ली.” बोलते-बोलते ज़ोरो ने अपनी ही लाठी अपने सिर दे मारी और लगा मानो दिमाग में रोशनी कौंध गई.

“धत तेरे की, इतना परेशान होने की जरूरत क्या थी, कितना आसान-सा हल है! जाऊंगा और लेकर चला आऊंगा”.

उसकी घरवाली मुंह बाए उसे देखे जा रही थी- “सनक गया है बुड्ढा” वह सोच रही थी.

“मेरे पैरों की बेड़ी हो तुम!” ज़ोरो की आवाज़ ऊंची हो गई.

“हम साले हैं ही गधे. आख़िर मेरा आर्मीनियाई जज़्बा कहां खो गया था, बताओ दिमाग में उस वक्त क्यों नहीं घुसा – जब गया था आले के घर, तब क्यों नहीं उसे साथ ले आया…” मन ही मन सोचा.

“मेरे गले की रस्सी हैं तेरी औलादें.” ज़ोरो लड़ने के मूड में था.

“उस दिन उसे गाड़ी में बिठा तो लेता, पर यह ससुरा बेटा लाने देता क्या”

“शनिचरा है तुम्हारा छोटा बेटा, दूध में गिरी मक्खी. और यह घर तो नरक का कैदखाना है. अब मैं यहां सांस नहीं ले सकता. मैं अलग हो रहा हूँ.” ज़ोरो ने तय कर लिया था.

“घर के सामने वाला वह जो झोंपड़ा है, आज चुपचाप उसे सजा लूंगा और तड़के निकलकर उसे ले आऊंगा….राजी नहीं हुई तो जबरन उठाकर ले आऊंगा…. देखें तो कोई क्या करता है!…” बाहर निकला और भड़ाक से दरवाजा बंद कर दिया.

झोंपड़ा पहले उनका घर हुआ करता था. उसके दरवाजे़ का ताला टूटा हुआ था. किसी तरह उसे तार से बांधकर रखा गया था. आलतू-फालतू पुरानी चीज़ों से घर भरा हुआ था. एक पुराना पालना, घर को गर्म करनेवाला चूल्हा, उसकी चिमनी, हसुआ, हल, खर-पतवार साफ करने वाले पंजे जैसे कृषि के औजार बिखरे पड़े थे. चूल्हा और दो कुर्सियों को छोड़ उसने बाकी सामान एक तरफ़ कर दिया. फर्श की सफ़ाई की, दीवारों को पोंछा और दरवाजे की चूलों को कसा. उसकी समझ से घर रहने लायक हो गया था.

जब तक बेटे शाम को लौटे तब तक ज़ोरो ने अपना पलंग, तोसक, चादर आदि झोपड़े में सजा दिया था. कुछ काम के बर्तन और एक कनस्तर आटा भी पहुंचा चुका था. अब आराम से घर के सामने बैठा धुंआ उड़ा रहा था.

घर में कोहराम मच गया. आखिर किसने बाबो का दिल दुखा दिया? सब एक दूसरे से जवाब तलब करने लगे. मां से पूछा और फिर सीधे बाप से जानने की कोशिश की. ज़ोरो ने टका-सा जवाब दे दिया.

“सबने…सबने ज़ोरो का दिल दुखाया है…ज़ोरो इस दुनिया से खफ़ा है…(सिर्फ आले को छोड़कर).” और फिर फैसला सुना दिया- “अलग रहूंगा.” कहकर वह झोंपड़े में चला गया.

            अगली दोपहर वह आले के गांव में पहुंच गया था. काफी देर तक आले के घर के इर्द-गिर्द चक्कर काटता रहा इस उम्मीद में कि आले से मुलाकात हो जाएगी. घर के अंदर जाने में संकोच हो रहा था- पता नहीं कौन-कौन बैठा होगा वहां. आले की खिड़की पर दस्तक दी और फिर उसे चूमते शहतूत के तने के पीछे छिपकर खड़ा रहा- क्या नहीं आएगी आले? “अगर आ गई तो हाथ से चुपके से अपने पास बुला लूंगा.” उसने फिर दस्तक दी- “एक बार घुसने में हर्ज ही क्या है.” उसने सोचा और चहारदीवारी में घुस गया. इधर-उधर ताकने-झांकने के बाजवूद आले नहीं दिखी. वह वापस सड़क पर निकल आया. बाहर बच्चे खेल रहे थे, कोई और नहीं दिखा. वसंत का समय था, सब अपने-अपने कामों में लगे हुए होंगे.

ज़ोरो के पास अब कोई चारा नहीं बचा था  वह घिरे हुए बगीचे में घुस गया.

बगिया में घुसते ही उसे आले दिखाई दी. वह उसी खूबानी के पास खड़ी थी जहां पिछली बार मिली थी. हाथों में कुदाल लिए क्यारियां बना रही थी. बहुत नाजुक नन्ही-सी थी बुढ़िया. उसके कंधे और गर्दन कुदाल पर झुके हुए थे. ज़ोरो को लगा कि वह कुछ गुनगुना रही है, अपनी जगह का ही कोई गीत. हां-हां! वह वह तो वही गीत गुनगुना रही थी जिसे पहली मुलाकात में ज़ोरो ने गाया था.

ज़ोरो की आहट पर बुढ़िया अस्वाभाविक चपलता से मुड़ी.

“मेरी जान आले.” ज़ोरो ने आले से कुदाल ले उसे खूबानी पर टिका दिया और उसका हाथ अपनी हथेलियों में समेट लिया- “सब खैरियत है?… मुट्ठी भर रह गई हो, उस बच्ची आले की तरह” उसने पहाड़ों की तरफ गर्दन उचकाते हुए बोला- “उस नन्ही-सी आले की तरह…याद है न? खुदा कसम आज तक आँखों में बसी हो. तुम्हारे सिर पर फूलों की माला थी और तुम मेमने की तरह इस पत्थर से उस पत्थर पर कूद रही थी, कुछ याद है? उन विलक्षण पलों में मेरा दिल चुराकर ले गई, आले!” ज़ोरो पहले जैसे तनकर खड़ा हो गया. बुढ़िया उसकी अधखुली आँखों को देख रही थी.

“चलो, घर में चलते हैं ज़ोरो भईया.”

“नहीं, घर में नहीं, मेरी जिगर.” उत्साह से बोला ज़ोरो- “वो…वहां बगीचे में जो सेब का पेड़ है, आओ, उसके नीचे बैठते हैं.” आले से तांबे के प्याले में अंगूरी लाने को कहा और लाठी लेकर सेब के नीचे एक पत्थर पर बैठ गया. ऊनी टोपा उतारकर घुटने पर पहनाया- “मेरा प्यार सच्चा है, माराथुक का आशीर्वाद मेरी रक्षा करेगा.”

“जो करने जा रहा हूं, वह जायज है आले!” बुढ़िया के हाथ से जाम लेकर बोला- “माराथुक का आशीर्वाद भी है मेरे साथ!” प्याला खाली कर डाला और गंभीर मुद्रा में आ गया.

“पूछो कि ज़ोरो यहां क्यों आया है?”

“एक ही देस के हैं हम भईया ज़ोरो. घर आना-जाना तो बनता ही है.”

“ब..ब…बस? इतना ही, आले?” ज़ोरो ने खूबानी की ओर उगंली से इशारा किया- “अभी थोड़ी देर पहले तुमको क्या बता रहा था? वह दिन भी आज के दिन जैसा ही मधुर था जब मेरा दिल तुम पर आ गया था.”

ज़ोरो उत्तर की आस में कुछ पल ठिठका. बुढ़िया विस्मय से उसे ताक रही थी.

“रोटियां लाऊं भइया?”

“रोटी? अरे, मदिरा नहीं बची है क्या?”

“हाय मेरे माराथुक, तेरी पवित्र बांहों में ही यह आग लगी थी, उन्हीं बांहों से कलेजे पर ठंडक बक्श दें!” ज़ोरो ने मन ही मन प्रार्थना की.

“उस दिन.” -बुढ़िया सुराही सहित प्रकट हुई, ज़ोरो फिर चालू हो गया- “वसंत के उस दिन, आले, पहाड़ की चोटी पर बने गिरजाघर के नीचे माराथुक ने मुझे प्यार का तोहफा दिया था. इतनी सी आले.” उसने हाथ से समझाया- “नन्हे-नन्हे नंगे पैरों वाली आले, फूलों से लिपटी आले मेरी थी, बस मेरी! समझी? लेकिन हैवानों ने तुम्हें मुझसे छीन लिया. उस्मानी लकड़बग्घे तबाही मचाते मेमनों के झुण्ड में घुस गए थे. कैसी लूटपाट मची थी. गांव के गांव जल रहे थे.. खून का दरिया बह रहा था और किस्मत को ग्रहण लग गया. मैंने तुम्हें खो दिया. मेरी बात सच्ची है मेरी जान.”

“क्या तुम नरसंहार के बारे में बोल रहे हो भइया ज़ोरो?” बुढ़िया ने भोलेपन से पूछा.

“नरसंहार के भी और अपने खोए प्यार के भी!”

बूढ़े ने शराब चखी, पाइप सुलगाया और बुढ़िया से जवाब की प्रतीक्षा करने लगा. वह चुप रही और एक ओर झुककर अपनी घिसी सूखी उंगलियों से घास के साथ खेलती रही.

“वह क्षण अभी भी नहीं खोया है आले.” ज़ोरो फुसफुसाया- “उस दिन से मैं प्यार में पूरी तरह डूब गया था…चलो, अपनी कमर कसो, चलते हैं मेरी जान.”

“अरे, कहां?” अचंभित होकर आले ने पूछा.

“पूछ रही हो कहां? अरे, तबसे इतनी कहानी काहे सुना रहा हूं? चल उठ आले, चलते हैं अपने गांव. घर-बार छोड़ दिया है मैंने, थोड़ा-सा जीवन बचा है, एक साथ बिताते हैं न, आगे जो माराथुक की इच्छा हो.”

“पक्का पगला गए हो.”  आले ने निचले होंठ को दांत से भींचा और ज़ोरो के सामने से प्याला उठाने की कोशिश की.

“नहीं, यह नहीं…इस कमबख्त शराब का क्या कुसूर? इसका है, इसका आले.” हाथ दिल पर रख समझाया ज़ोरो ने- “बात इसकी है…मेरा दिल, मेरी रूह…क्या वह हसीन सुबह इसीलिए हुई थी कि हम कभी एक तकिए पर अपनी अंतिम सांसे ले न सकें? जब साथ में होना नहीं लिखा था, तो क्यों…आख़िर क्यों उस नीली सुबह ज़ोरो को उसकी प्यारी आले मिली थी जिसे शाम होने से पहले ही उसने खो दिया था, बताओ आले. इस पहले से ही अन्यायी दुनिया में एक और अन्याय कर भाग जाना था उस सुबह को? आकर ज़ोरो की रूह को गहरा डंक मारकर चले जाना था उसे? आकर ज़ोरो को ललचाना था कि कुदरत का इतना खूबसूरत उपहार भी है इस दुनिया में…और उसे छीन, मुझे बरबाद कर भाग जाना था उसे? क्या वह महज एक सपना था?…सिर्फ एक हसीन कहानी? न…कतई नहीं..वह सुबह थी, है और सदा रहेगी.”

“उठो जान, सामान बांधो, चलते हैं.” ज़ोरो उतावला हो रहा था.

“ज़ोरो भइया, खुदा कसम, तुम्हारी मति मारी गई है.” आले ने शिकायती लहजे में कहा.

“उठाकर ले जाऊंगा.” ज़ोरो ने मुट्ठी को घुटने पर मारा. बुढ़िया हथेली से मुंह ढककर हंसने लगी.

“उठाकर कैसे ले जाओगे ज़ोरो भइया?”

“इ..इतनी सी…मुट्ठी भर हो. बोरी में डालकर कंधे पर लाद लूंगा….बस, गांव से निकलना ही थोड़ा मुश्किल है…फिर दुनिया कुत्तों की तरह पीछे भी पड़ जाए, तो परवाह नहीं. फिर आले मेरी होगी!!! सोच लो, उठाकर ले जाऊंगा. राजी हो जा मेरी जान.”

उधर घर के आंगन से मर्दाना आवाज़ आई. कोई आले को बुला रहा था.

“मेरा आदमी है” बुढ़िया ने उठने में देरी नहीं की.

“तेरा आदमी भलामानुस है, पर तुझको तो ले ही जाऊंगा, तू देखती जा..बस रात होने दे.” बुढ़िया के तहबंद को खींचता ज़ोरो दबी जुबान से बोला- “अच्छा-अच्छा, चुप रहना ठीक, किसी को पता न चले.”

बुढ़िया तहबंद के कोने से मुंह ढक हंसती रही पर दिखाया मानो गाल पोंछ रही हो.

“चलो, भइया ज़ोरो, घर में चलते हैं.”

“घर में मेरा क्या काम? अभी चलता हूं, अंधेरा होने पर आ जाऊंगा, तुम तैयार रहना. एक बार जो ठान लिया तो ठान लिया.”

अंदर से फिर आवाज़ आई. ज़ोरो ने बुढ़िया का आंचल खींचा, अपने भौहें सिकोड़कर मुट्ठी दिखाई.

“उठाकर ले जाऊंगा” वह फुसफुसाया- “चाहो न चाहो, ले जाऊंगा.”

“अच्छा…तुम हो.” गृहस्वामी प्रकट हो गया- “सब खैरियत तो है न? मदिरा चाहिए थी क्या?” वह हंसते हुए बोला.

“हां, चाहिए तो थी!” ईमानदारी से स्वीकारा ज़ोरो ने और मुस्कराकर जोड़ा- “तेरे घर की अंगूरी जैसी अंगूरी दुनिया में कहीं भी नहीं मिलती. और पिछली बार जो किया मैंने तो मेरा सिर फोड़ने का पूरा अधिकार है तुझको!”

इस बीच ज़ोरो के आने की खबर आग की तरह घर में फैल गई. दो बेटे, एक जोड़ी बहुएं, नाती-पोते सबके लिए बड़ी वाली मेज लगा दी गई.

“वाह! क्या खूब सजा दिया है!” मन ही मन तारीफ़ की ज़ोरो ने- “जश्न मना रहे हैं. माराथुक की कसम….मेरी और आले की शादी का जश्न!”

घर वाले बेहद खुश थे. पिछली बार ज़ोरो से मुलाकात नहीं हो पाई थी. इतना ही पता चला था कि जो आए थे वह मां के देस के थे- “गज़ब के जिंदादिल आदमी…कैसे मस्ती से पीते और गाते रहे थे. हां, वापस भेजने में थोड़ी मुश्किल जरूर हुई थी. शायद टांगकर ले जाना पड़ा था. खैर, कैसी सफेद घनी मूछें हैं और गहरी झुर्रियां! कितने जोश में बात करते हैं और उतने ही जोश से गिलास भरते हैं. क्या सौभाग्य है, वह फिर आज मेहमान है.”

“अब आप हमारे मामा हो, – छोटा बेटा उत्साह में था- “मां की ओर से कोई बचा नहीं मामू जान.”

“मामा समझो या काका, तुम जानो.” ज़ोरो ने मन ही में जवाब दिया- “मेरा नाम ज़ोरो है और अपना नाम बदल लूंगा अगर तेरी मां को आज उठाकर न ले गया…हां बेटा, कोई मुरव्वत नहीं.”

छोटा बेटा मां पर गया था. “बिलकुल आले जैसा है.” सोचा ज़ोरो ने और पूछा- “तेरी बहू कौन-सी है, मेरे मेमने?”

उसकी पत्नी सामने आई. वह ज़ोरो को बहुत अच्छी लगी.

“यह जाम तुम्हारे नाम.” ज़ोरो ने एक के बाद एक, दो प्याले खाली कर दिए. फिर उसने लड़के पर नजर दौड़ाई. उसे लगा लड़के की आँखों में अनोखी-सी चमक थी. ज़ोरो जानता था यह संगीत की चमक है. ऐसे युवक सुरीले होते हैं.

“कुछ गाओ, मेरे प्यारे.”

गीत सुनते हुए उसने पाया कि उसकी आँखें धुंधलाने लगी हैं. “अभी से? इस छोटे से प्याले से इतना तो पीया नहीं.” उसे ताज्जुब हुआ- “मैं यहाँ जश्न मनाने नहीं आया हूं.” उसने खुद को गरियाया- “अब एक बूंद भी न लूंगा. बाकियों को पीने दो. पीए और जल्दी सो जाएं…अरे, आले कहां है?”

आले भोजन परोसने में लगी हुई थी. उसके होठों पर दबी हुई मुस्कुराहट तैर रही थी.

“शाबाश बेटा. क्या ख़ूब गाते हो!” ज़ोरो ने यंत्रवत् प्याला होठों से लगाया और ठिठक गया- “पीऊं या न पीऊं?” फिर पी गया- “आबाद रहो बेटा. अब तुम सुनो, मैं गाता हूं.”

ज़ोरो ने आँखें बंद की और तन्मय होकर गाने लगा. बूढ़े की कर्कश आवाज कांप रही थी.

गीत प्रकृति और प्यार के बारे में था. पत्थरों और रंगीन फूलों के, पहाड़ों पर चढ़ते हांफते बैलों और बैलगाड़ियों के, पहाड़ के सीने पर बने सीढ़ीदार बाजरे के खेतों के बारे में था. झूमकर गाते ज़ोरो का हाथ एक बोतल से टकरा गया. बोतल गिर पड़ी. बहू ने ज़ोरो के फैलते हाथों के लिए और जगह बना दी. वह थोड़ा किनारे हट गई.

ज़ोरो गाना खत्म कर चुका था पर वैसे ही लहराता रहा. आँखे बंद किए ही अंत में अलापा- “आले!”

यह गीत का हिस्सा था या कि वह अपनी घरवाली का नाम ले रहा था, गृहस्वामी समझ नहीं पाया. आले काम निपटाकर मेज के एक कोने से चिपकी हुई थी. पहला वाला उत्साह जाता रहा था, उसकी होठों की मुस्कान भी मिट चुकी थी.

“आले” ज़ोरो ने खिड़की के बाहर झांका, पहाड़ों के ऊपर डूबते सूरज को देखा और लहराते हुए कहा- “काश सूर्योदय न होता इस दुनिया में! न दोपहर होती, न सूर्यास्त, न शाम और न ही रात! न गर्मी होती और न सर्दी होती…महज एक वसंत होता! न ही उम्र की बंदिश होती, आले! बच्चा बच्चा ही रहता. मैं उस चट्टान पर, तुम उन खुबसूरत वादियों में और तुम्हारे सिर पर फूलों की माला होती, हे आले!”

“वे तुमसे बोल रहे हैं, मां”. सब चुपचाप बूढ़े के एकालाप को सुन रहे थे. सिर्फ आले का छोटे बेटा इस संगीत को महसूस कर पा रहा था. उसकी आँखें नम हो गई थीं- “मामू ज़ोरो तुम्हें बुला रहे हैं, मां!…आओ, इनकी बगल में बैठो!”

पर मां खड़ी नहीं हो पा रही थी.

बेटे ने मां को उठाने में मदद की और ज़ोरो की बगल में बैठा दिया.

“हे माराथुक.” ज़ोरो उठ खड़ा हुआ और बुढ़िया को आलिंगन में जकड़ लिया.

बुढ़िया का सिर उसके सीने से सट गया था. ज़ोरो ने अपना सिर बुढ़िया के सिर पर झुकाया. उसके कोमल बाल ज़ोरो के गाल को छू रहे थे. ज़ोरो की नजर खिड़की की तरफ मुड़ी- माराथुक की तरफ़- और ज़ोरो लय में पुकारे जा रहा था.

“आले…आले, मेरी जान, आले…”

*** *** ***

अनुवादक माने मकर्तच्यान मूलतः आर्मेनिया से आती हैं , फिलहाल  जेएनयू में  इंडोलॉजी की शोधार्थी  हैं. आप उनसे  mane.nare@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

 साभार- हंस, अप्रैल, 2016

गंदगी से लाचार लिबास एवं अन्य कवितायें: रॉबर्तो बोलान्यो

“सत्तर के शुरू की बात है शायद। मेक्सिको शहर में, या शायद कोई और लातिन अमेरिकी शहर रहा होगा, एक कवि सम्मलेन हो रहा था. कवि आते जा रहे थे, कविता कभी निलंबित, कभी ज़लील  होती जा रही थी. तमाशे के आदी लोग, जो कुछ सुनाई दे रहा था उसे कविता जान खुश थे.  अचानक सभा में एक बरगलाया सा लौंडा ऐसे घुसा मानो अभी अपने बस्ते से बन्दूक निकाल सब कवियों का मुँह वन्स एंड फॉर आल बंद कर देगा। जैसे ही लौंडे ने हाथ बस्ते में डाला चूहों और कवियों में फर्क में करना कठिन हो गया. थैंकफुल्ली चूहे मौका देख फरार हो गए. लौंडे की आँखों में खून था — कुछ नशे के कारण कुछ नींद के.  उसने बस्ते में हाथ डाला और एक कागज़ का परचा निकाल उसे से जोर जोर से पढ़ने लगा. लौंडा कवि निकला। चीख चीख कर लौंडा जिसे पढ़ रहा था वह उसकी कविता नहीं, बल्कि भविष्य की  उसकी कविताओं का घोषणापत्र था. लौंडा पढ़ता रहा, लोग सुनते रहे. फिर अंतरिक्ष के किसी दूर कोने से आये धूमकेतु की तरह अपना प्रकाश बाँट लौंडा अंतर्ध्यान हो गया. वह लौंडा बोलान्यो था. ” मयंक तिवारी की कही इन्हीं पंक्तियों के साथ लीजिये प्रस्तुत है  उदय शंकर द्वारा अनुदित रॉबर्तो  बोलान्यो की  तीन  कवितायें .

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Snap Shot- Endless Poetry (2016)

By रॉबर्तो  बोलान्यो

लिजा उवाच

मेरी दुनिया वहीं,

टेप्याक के पुराने गोदाम वाले टेलीफोन बूथ में

ख़त्म हो गई,

जब लिजा ने बताया कि वह किसी और के साथ सोयी.

लंबे बाल और बड़े लंड वाला वह दुबला-पतला लौंडा

उसे चोदने के लिए एक और डेट की भी मोहलत नहीं ले सका.

उसने बताया कि इसमें इतना गंभीर होने वाली बात कुछ भी नहीं है, लेकिन

तुझे अपने जीवन से निकालने के लिए इससे बेहतर कोई और उपाय भी नहीं है.

पारमेनीडेस गार्सिया साल्दाना लंबे बाल रखता था

उसमें लिजा के प्रेमी होने की संभावनाएं थीं

सालों बाद पता चला कि वह एक पागलखाने में मर गया

या खुद से ही खुद को मार डाला.

लिजा अब किसी भी गांडू के साथ सोना नहीं चाहती थी.

कभी-कभी वह सपने में आती है

और मैं देखता हूँ कि

लवक्राफ्टियन मैक्सिको में

वह खुश और शांत है.

हमने संगीत सुना (टैंड हीट, जो कि पारमेनीडेस गार्सिया साल्दाना का प्रिय बैंड था)

और तीन बार सम्भोग किया.

पहली बार वह मेरे भीतर उतर आया

फिर मुँह में

और तीसरी बार पानी के धागे से बंधी बंसी की तरह

मेरी छातियों के बीच फंस गया.

यह सब हुआ सिर्फ दो घंटों में, लिजा ने कहा.

मेरी जिन्दगी के बदतरीन दो घंटे,

मैंने फ़ोन के दूसरी छोर से कहा.

लिजा की याद

रात के अंधेरों से छनती

लिजा की यादें फिर से झरती हैं.

एक जंजीर, उम्मीद की एक किरण:

मैक्सिको का एक आदर्श गाँव,

बर्बरता के समक्ष लिजा की मुस्कान,

लिजा की एक स्थिर तस्वीर,

लिजा के खुले फ्रिज से एक धुंधली रौशनी

बेतरतीब कमरे में झड़ रही है,

जब कि मैं चालीस का हो रहा हूँ,

वह बरबस चिल्लाती है

मैक्सिको फ़ोन करो, शहर मैक्सिको फ़ोन करो,

अराजकता और सौंदर्य के बीच बड़बड़ाते

अपनी  एक मात्र सच्ची प्रेमिका से बात करने के लिए

फ़ोन बूथ के चक्कर लगाने वाले

रॉबर्टो बोलानो को फ़ोन करो.

गंदगी से भरपूर लाचार लिबास

कुत्तागिरी के दिनों में,

मेरी आत्मा मेरे दिल से पसीज गयी.

तबाह, लेकिन जीवित,

गंदगी से भरपूर लाचार लिबास,

फिर भी, प्यार से भरपूर.

कुत्तागिरी, जहाँ कोई भी अपनी

उपस्थिति दर्ज कराना नहीं चाहता.

जब कवि कुछ भी करने लायक नहीं रह जाते हैं

तब कुत्तागिरी की उपस्थिति-पंजि में

सिर्फ उनके ही नाम अंकित होते हैं.

लेकिन मेरे लिए अभी भी बहुत कुछ करना शेष था!

फिर भी, उजाड़ गाँवों से गुजरते हुए

मैं वहां गया,

लाल चींटियों, और तो और काली चींटियों द्वारा

अपनी मृत्यु के लिए अभिशप्त:

यह डर बढ़ता ही गया,

जब तक कि उसने तारों को चूम नहीं लिया.

मैक्सिको में पढ़ा एक चिलीयन

कुछ भी झेल सकता है,

मेरी समझ से यह सच नहीं है.

रात के अंधेरों में मेरा हृदय विलाप किया करता था.

एक रूहानी नदी तपते होठों को गुनगुनाती थी,

बाद में पता चला कि वह मैं था-

रूहानी नदी, रूहानी नदी,

इस बुद्धत्त्व ने इन उजाड़ गाँवों के किनारों से

खुद को एकमेक कर लिया.

धातुई यथार्थ के बीच

तरल वास्त्विकाताओं की तरह

उभरते हैं,

गणितज्ञ और धर्माचार्य

ज्योतिषी और डाकू.

सिर्फ जोश और कविता,

सिर्फ प्रेम और स्मृति ही दृष्टि देती है,

न कि यह कुत्तागिरी

न ही सामान्य राहगीरी.

न ही यह भूलभुलैया.

यह मैं तभी तक मानता रहा जब तक

मेरी आत्मा मेरे दिल से पसीज नहीं गयी थी.

यह सच है कि यह बीमार मानसिकता थी,

लेकिन फिर भी जिन्दादिली इसी में थी.

उदय शंकर द्वारा अनुदित ये कवितायें लोरा हेल्ली के अंग्रेजी अनुवादों पर आधृत हैं.

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