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बाकी प्रेम कविताएँ: उस्मान खान

By उस्मान खान

लाल धधकते लोहे के टुकड़े

तुम्हारी आंखें,

आंखों के नीचे हड्डी की टेढ़ी-उभरी लकीर। (नज़्र-ए-शमशेर)

Snap shot from'Would You Be Mine'

Snap shot from’Would You Be Mine’

बाकी प्रेम कविताएं

1.

वहां बारिश होती है

पुरानी लकड़ी की पाट भींगती है

उसकी दरारों से दीमक चूने लगते हैं

माथे पर खिड़की के लोहे की ठंडक महसूस करता हूं

भाप जैसे बूंद-बूंद कर टपक रही है दिमाग़ में

मैं आंखें बंद कर लंबी सांस खींचता हूं

जैसे सकल विस्तार को अपनी श्वास-नलिका में घूमता महसूस करता हूं

बिंदु-बिंदु प्रकाश छिटका है

प्रकाश वर्ष दूर एक-एक बिंदु

कोई मासूम नहीं होता

न तू थी, न मैं था

तू भूल भी गई शायद

या याद भी रहा तो क्या मुझे पता नहीं!

पर एक इच्छा है जागी हुई

कि एक दिन उस खिड़की के लोहे पर माथा रख

हम दोनों बारिश देखें!

मैं तुझे जिस उम्र में छोड़ आया था

असल में, वहीं से तुझे अपने साथ लाया था

जिस दिन बारिश हो रही थी

रसायनों की हल्की गंध के बीच

मैं खड़ा था अकेला अपने में

तुम मुस्कुराई

जैसे, आज कहूं, वसंतसेना!

इसीलिए चाहता था बहुत तुम्हें

कि बक़ौल बेदिल सच सच को ढूंढ़ता है।

जिस दिन बारिश हो रही थी

मैंने एक पल के लिए ब्रह्माण्ड को सुंदर रूप दिया

आत्मसात किया

जैसे एक ठोस वस्तु तरंग बन जाती है

देखते ही देखते विचार बदले कि बस!

एक पल के लिए मैं कितनी दूर बह चला

जैसे ये पल भी उस पल का विस्तार है

जिस दिन बारिश हो रही थी।

2.

मैं बहता जा रहा था

आगे, आगे, बहुत आगे

कि तुमने मुझे श्मशान की याद दिला दी

दोपहर वह मई की

वह झरबेरियों से उलझना

पर तुमने क्यों कहा कि मैं बदल गया हूं,

मुझसे बात भी नहीं की

मिली भी नहीं!

क्या मैं ऐसा बदल गया था

कि हम बात भी नहीं कर सकते थे।

शायद मैंने तुम्हारे मन में बसी

अपनी ही छवि तोड़ दी थी।

3.

तुम ही थी, जिसने मुझसे कहा,

किसी का मज़ाक उड़ाना नहीं अच्छा!

मैंने मन में बसा ली वो तरलता।

कोई कितना इंसान हो सकता!

और कौन सिखाता?

4.

मैं तुम्हें अपनी शक्ल देना चाहता था

तुम मुझे अपनी

समुद्र की लहरों को मैं बाहों में समेट लेना चाहता था

तुम किनारे-किनारे थोड़ी दूर जाना चाहती थी

नाव में ठहरे जल में

हमने देखा अपना बिम्ब

तुम अलग- मैं अलग- बहुत

दूसरी नाव में लेटा मैं

अलग हो गया अचानक

तुमसे – समुद्र से – सबसे

ये सबसे ध्वंसक पल था

मैं बाद में आत्मसात कर पाया

बहुत बाद में बात कर पाया

वह समुद्री खोह का कालापन

मांसल एकदम ठोस

मांस का लोथड़ा

समुद्र में गहरे-गहरे डूबते जाने जैसा

सुबह अचानक रात का नशा उतरा लगे जैसे

तूफ़ान में मिले हम, तूफ़ान में बिछड़े।

5.

उस रात मैं दुःखी था

दुःख से टूटा था

दुःख से भरा हुआ

वंचना का दाह

उपेक्षा की कड़ुआहट

क्रूरता का दर्शन

विश्वासघात का डर जैसे

मैं तुम्हारे सामने इतना बच्चा हो गया

कि खुद डर गया।

6.

जुनूं का एक पल वो अगर जिंदगी बदलता

मैं खींच लाता आज तक वो दोपहर, वो गली

तुम्हारी एड़ियों के ऊपर जो दूज का चांद रखा है

तुम्हारे कंधे के ठोसपन ने जो लरज़ मुझे दी है

लगता है आज भी उस गली में तुम्हारी एड़ियों पर

दूज का चांद रखा हो जैसे

मैंने एक घर चुन लिया था

एक जिंदगी

एक शहर चुन लिया था

एक नदी वहां बहती थी

रेल के पुल के नीचे

जहां हम शाम को घूमने जाया करते थे

मैं खूब मेहनत करता था

तुम खूब खुश होती थीं

तुम खूब मेहनत करती थीं

मैं खूब खुश होता था

वहां गाड़ियां तेज़ चलती थीं

शाम को बाज़ार में खाने-पीने की

तमाम तरह की चीज़ें मिलती थीं

वहीं एक गली में मैदान के पास

मैंने घर ले लिया था

(मुझे और अच्छे से याद नहीं!)

मैं तुम्हारे इतने पास होना चाहता था

कि मेरा दिल फटने लगता था

सांसे तेज़ होने लगती थी

इतने पास के खयाल से ही

मैं इतनी तेज़ दौड़ा

तेज़, और तेज़

मेरी सांस फूलने लगी

सीना फटने लगा

मैं और, और लंबे डग भरने लगा

थंबे, नाले, नदियां, पुल कूदने लगा

मैदान-पहाड़-देश-ग्रह-नक्षत्र

मैं तारों के महासमुद्र में तैरने लगा

तेज़-तेज़-और तेज़- मैं पार करता गया

एक महासमुद्र से दूसरे महासमुद्र से तीसरे महासमुद्र

मैं साइकिल से गिर पड़ा

और मैंने महसूस किया

मेरे सिर पर तुम्हारी हंसी

जुनून बनकर खड़ी है।

7.

वह रहस्य जन्म का जीवन का

रसमयी लालसा, विस्मयी वासना

उष्ण द्रव वसीय वह

मध्यमिका जैसे शरीर से परे किसी ताप में

प्रथम आविष्कार

वह न गंध न रूप न आकार

केवल एक उष्ण तरल एहसास

वाष्प की तरह अब भी जमा जैसे छाती मैं।

8.

मैंने ठुकराया तुम्हारा प्यार

मैंने तुम्हें छीज-छीजकर मरते देखा

मैंने तुम्हारी देह को गलते देखा

मैंने बहुत कामना की

तुम्हें गले लगाने की

पर जब सब कुछ छुट गया

तुम एक दिन विलीन हो गईं

किस वक़्त पता नहीं

मुझे तुम्हारी लाश से क्या मतलब!

मैं तुम्हारा प्यार ठुकरा चुका था

पर एक इच्छा थी

तुम्हें गले लगाता

और हम लोग मगरे तक घूमने चलते एक बार।

9.

दोपहर है

नीम-नील, नीम-सफ़ेद दीवार है

मैं एक पल के लिए उसके इतने नज़दीक़ हूं

कि उसकी सांसें अपनी गर्दन पर महसूस कर सकता हूं

एक उसी पल में

मैं घबरा जाता हूं

अपने-आप से

पीछे हट जाता हूं

अचानक एक आवाज़, दोपहर खींच लेती है।

आगे नहीं…

मैं पीछे हटता जाता हूं!

इसके आगे क्या…

10.

फिर बारिश हुई नदी पर

रात के आखरी-आखरी पहर

सांय-सांय में घुल गई

बूंद-बूंद फिर लहर-लहर

– – –

मैं मिट्टी के इतने पास

तुम्हारे इतने पास

आम की जड़ के इतने पास

जैसे यहीं मिलनी मुझे

युगों से मुझे ढूंढ़ती : तस्क़ीन!

– – –

मैं फिर तुमसे प्यार करना चाहता हूं,

मैं तुम्हारी लासानी मूर्ति बना रहा हूं।

मैं कल इसे तोड़ने का वादा करता हूं,

मैं फिर तुमसे प्यार करना चाहता हूं।

– – –

वहां एक नदी है

गरजती हुई

सफ़ेद

वो एक चट्टान को सदियों से विलीन करने में लगी है

वो चट्टान अब भी है वहां

उस पर हमारे पांव के निशां

वे आत्म-आहुतियां

घुलती जाती हैं एक समग्र इतिहास में

एक पल में

दरवाज़े बनते

रंगाई होती है

सदियों की रुकी चर्चाएं जैसे चल पड़ती हैं

हवा चलने लगती है

प्लास्टिक की बोतल

एक झटके में

जमीन से सौ फुट ऊपर घूमने लगती है

जमने लगती है

फिर धीरे-धीरे ज़मीन पर धूल

बगुले छिप जाते हैं ईमली की कोटरों में

हरी घास के साथ भींगते हैं झींगुर

मैं दूर तक देख सकता हूं अनाकुल मन से

बारिश और सिर्फ बारिश

भींगना और सिर्फ भींगना

मक़बरों की टूटी हुई ईंटें

परित्यक्त मीलों में मशीनें

ट्रकों के टायर – भींगते हैं

भींगती हैं झरबेरियां और मेंहदी

भींगते हैं अंजीर और बबूल

भींगते हैं मैं और तुम

और अपराजिता के फूल!

usman khan

उस्मान ख़ान समकालीन हिंदी कविता के अलहदा और युवा कवि हैं. चर्चाओं और पुरस्कारों की भीड़ से अलहदा… छपाऊ मानसिकता से भी अलहदा... जे.एन.यू. के हिंदी विभाग से मालवा के लोकसाहित्य पर पीएचडी. इनसे usmanjnu@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

हिन्दी सिनेमा की भाषा- एक के भीतर अनेक: चन्दन श्रीवास्तव

By चन्दन श्रीवास्तव 

Hans-Cover-February-2013

हंस फरवरी-2013- हिन्दी सिनेमा के सौ साल

मौका हिन्दी-दिवस का था, चूंकि हिन्दी-दिवस पर दस्तूर ‘हिन्दी-हित-चिन्ता’ का है सो एक मशहूर दैनिक(हिन्दुस्तान) ने अपने वेबपेज पर‘हिन्दी फिल्में, कितनी हिन्दी’ शीर्षक से एक पोस्ट लगायी। जैसा कि शीर्षक से ही जाहिर है, अख़बार ने इस पोस्ट में बड़े संताप के स्वर में जानना चाहा कि हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री में ‘हिन्दी से भरपूर नाम-दाम कमाने वाले अपने कामकाज और जीवन में हिन्दी को कितना सम्मान देते हैं, कितना अपनाते हैं ? ”

अख़बार की इस ‘हिन्दी-चिन्ता’ में जावेद अख्तर यह कहते हुए शामिल हुए कि “ इधर हमारी फिल्म इंडस्ट्री में अंग्रेजी का बोलबाला है।..ज्यादातर हिंदी फिल्मों में स्क्रिप्ट की जो हालत हो रही है, उससे मैं बहुत दुखी हूं। ” जावेद साहब ने अपने दुःख के दो कारण गिनवाये। एक तो यह कि “आज अंग्रेजी के लोग हिंदी फिल्मों के पटकथा लेखन में अपना योगदान दे रहे है ” जबकि  हिंदी या उर्दू का उन्हें “समुचित ज्ञान” नहीं है। दूसरे, जावेद साहब के हिसाब से हिन्दी फिल्मों की स्क्रिप्ट की दुर्दशा के लिए आज के अभिनेता “ज्यादा जिम्मेदार” हैं क्योंकि “उनकी(सिने-अभिनेता की) सबसे बड़ी परेशानी यह है कि वो हिंदी या उर्दू साहित्य के जरा भी नजदीक नहीं है। उर्दू की बात जाने दें, हिंदी पढ़ने में भी उन्हें खासी दिक्कत होती है। इसका सीधा असर अच्छी स्क्रिप्ट पर पड़ता है।” इन दो वजहों से जावेद अख्तर को लगता है कि बॉलीवुड में “हिंदी फिल्में सही हिंदी में कम ही लिखी जाती हैं। सरल हिंदी में लिखी पटकथा में भी बीच-बीच में अंग्रजी शब्दों का उपयोग जम कर किया जाता है। ऐसी स्क्रिप्ट यहां कम ही देखने को मिलती है, जिसमें अंग्रेजी शब्दों के मोह से बचते हुए शुद्ध हिंदी या उर्दू के शब्दों का उपयोग किया जाता हो।”

जैसे आज कुछ लोगों को ‘हिन्दी सिनेमा’ की ‘हिन्दी’ पर अंग्रेजी का बोलबाला नजर आता है वैसे ही बीते वक्त में कुछ लोगों को हिन्दी सिनेमा के साथ ‘उर्दू’ का जिक्र गवारा ना था। पोस्ट में कही गई जावेद अख्तर की बातों को पढ़कर सिने-इतिहास के गंभीर अध्येता रविकांत(सीएसडीएस स्थित सराय वाले) का वह आलेख याद आया जिसे उन्होंने कभी शिमला स्थित भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान की एक संगोष्ठी में पढ़ा था। “सिनेमा, भाषा, रेडियो: एक त्रिकोणीय इतिहास” शीर्षक इस लेख में छोटा-सा जिक्र आता है कि हिन्दी फिल्मों को बेशुमार अमर गीत देने वाले साहिर लुधियानवी सन् 1960 के दशक में एक दफे बिहार गए थे और किसी मुशायरे में कह दिया था कि हिन्दी फिल्मों की भाषा 97 फीसदी उर्दू है। फिल्मों से जुड़ी पत्रकारिता के मामले में जिस “माधुरी’ ( इसका शुरुआती नामी सुचित्रा था, माधुरी नाम बाद में पडा) पत्रिका को मील का पत्थर माना जाएगा वही साहिर लुधियानवी के पीछे पड़ गई।

पत्रिका के  ‘चले पवन की चाल’ नाम के पन्ने पर एक चिट्ठी छपी। इसके लिखने वाले ने अपना नाम लिखा था ‘फिल्मेश्वर’ और चिट्ठी का शीर्षक था- ‘ हिन्दी और उर्दू के नाम पर नफरत के शोले भड़काने वाले अवसरवादी साहिर के नाम एक खुला पत्र ।’ चिट्ठी दिलचस्प है क्योंकि उसके मुताबिक साहिर फारसी लिपि में लिखे होने के कारण जिसे उर्दू समझ रहे हैं वह दरअसल हिन्दी ही है। इस चिट्ठी का एक अंश है- “यह जानकर वाकई बड़ा आश्चर्य हुआ कि आप समझते हैं कि आपने एक फिल्म में हिन्दी गीत लिखे हैं। लेकिन आपने हिन्दी पर यह अहसान पहली ही बार नहीं किया है। आप इससे पहले भी हिन्दी में ही लिखते रहे हैं। आपने फिल्मों में आने से पहले भी जो कुछ लिखा था, वह हमारी निगाह में तो हिन्दी ही थी..यह जरुर है कि आपने जब वह सब कलमबंद किया था जो फारसी लिपि इस्तेमाल की थी। यूं देखा जाय तो अपनी चितरलेखा के गीत भी आपने अपनी तरफ से चाहे हिन्दी में लिखे हों लेकिन कागज पर उतारा उन्हें फारसी लिपि में ही था।इतनी छोटी सी बात का मतलब आप जैसा बड़ा और दानिशमंद शायर शायद फौरन समझ गया होगा- दो लिपियों से भाषा दो नहीं हो जाती और एक ही लिपि में कई भाषाएं भी लिखी जा सकती हैं। ” वैसे साहिर लुधियानवी को फिल्मेश्वर का यह तर्क गले उतरा होगा ऐसा नहीं लगता क्योंकि भाषा के मामले में साहिर का पक्ष बड़ा साफ है। आजादी के बाद के वक्त में जिस वक्त सरकार को गालिब के मजार के जीर्णोद्धार की फिक्र हुई थी उन दिनों साहिर लुधियानवी ने लिखा था-

जिन शहरों में गूंजी थी गालिब की नवा बरसों- उन शहरों में अब उर्दू बे-नामो निशां ठहरी

आजादि-ए-कामिल का ऐलान हुआ जिस दिन- मातूब जबां ठहरी, गद्दार जबां ठहरी।

जिस अहद-ए-सियासत ने ये जिन्दा जबां कुचली- उस अहद-ए-सियासत को मरहूमों का गम क्यों है

गालिब जिसे कहते हैं उर्दू ही का शायर था- उर्दू पे सितम ढाकर गालिब पर करम क्यों है।

sahir-ludhyanvi

साहिर लुधियानवी

और साहिर ही क्यों, हिन्दी-सिनेमा को केंद्र में रखकर हुए अंग्रेजी-लेखन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यही मानकर चलता है कि हिन्दी-सिनेमा की भाषा मुख्य रुप से उर्दू रही है। इस सोच की एक मिसाल मुकुल केशवन का बहुउद्धृत आलेख- उर्दू, अवध एंड तवायफ- द इस्लामिकेट रुटस् ऑव हिन्दी सिनेमा- है। यह आलेख यही साबित करने के लिए लिखा गया है कि- “ हिन्दी-सिनेमा का महल बहुमंजिला तो है लेकिन इसका स्थापत्य इस्लामी रुपाकारों से प्रेरित है। इन इस्लामी रुपकारों का सबसे प्रकट उदाहरण है उर्दू। विडंबनापूर्ण लेकिन सच बात यह है कि आजाद भारत में उर्दू का आखिरी मजबूत मकाम हिन्दी-सिनेमा ही साबित हुआ, भाषाई हठधर्मिता के सागर में उर्दू का आखिरी स्वर्ग। और जो ऐसा हुआ तो यह सही ही है क्योंकि हिन्दी सिनेमा की काया उर्दू की जबांदानी और लोकाचारी संस्कारों से बनी है। ” इसी बात का एक विस्तार नसरीन मुन्नी कबीर की किताब ‘टॉकिंग फिल्मस्: कॉन्वर्सेशनस् ऑन हिन्दी सिनेमा विद् जावेद अख्तर’  में मिलता है। इसमें जावेद अख्तर एक जगह कहते हैं- “भारत की बोलती फिल्मों ने अपना बुनियादी ढांचा उर्दू फारसी थियेटर से हासिल किया। इसलिए बोलती फिल्मों की शुरुआत उर्दू से हुई। यहां तक कि कलकत्ता का नया थियेटर भी उर्दू के लेखकों का इस्तेमाल करता था। बात यह है कि उत्तर भारत के शहरी इलाके में उर्दू देश के बंटवारे से पहले बोल-चाल की जबान थी और इसे ज्यादातर लोग समझते थे और यह पहले की तरह आज भी बड़ी नफीस जबान है जिसके भीतर हर तरह के जज्बात और ड्रामे की तर्जुमानी की सलाहियत है।”

ऐसा कहते हुए मुकुल केशवन या फिर जावेद अख्तर कुछ बातों की अनदेखी करते हैं। एक तो यही कि हिन्दी-सिनेमा के भीतर एक लंबी कड़ी हिन्दू-धर्मकथाओं पर आधारित फिल्मों की रही है और उनकी संवाद-भाषा आजादी से पहले और बाद में भी संस्कृत की तरफ झुकी रही। इसके लिए ज्यादा उदाहरण ना देते हुए जिस दशक में फिल्म शोले(1975) बनी थी उसी दशक की दो फिल्मों हरिदर्शन(1972) और जय़ संतोषी मां(1975) को याद कर लेना काफी होगा। फिल्म हरिदर्शन में लक्ष्मी विष्णु के वाराह रुप धारण करने पर अचरज में पड़े नारद से कहती हैं- “  प्रभु तो जैसा कारण हो वैसा ही रुप लेकर पापियों के पास जाते हैं। आप उनके प्रिय प्रतिनिधि होकर भी ये नहीं जान पाये।’’ और ‘जय संतोषी मां’ फिल्म की शुरुआती पंक्ति ही है- “संतोषी मां की महिमा अपार है। हर भक्त ने उनकी महिमा का गुणगान अपने अपने ढंग से किया है।इस चित्र की कथा भी कुछ धार्मिक पुस्तकों और लोककथाओं के आधार पर है। आशा है, आप इसे सच्ची भावना से स्वीकार करेंगे।”

दूसरी बात पारसी थियेटर से हिन्दी फिल्मों के रिश्ते से जुड़ी है। हरीश त्रिवेदी ने अपने आलेख- ऑल काईंड ऑव हिन्दी: द इवॉल्विंग लैंग्वेज ऑव हिन्दी सिनेमा- में ध्यान दिलाया है कि पारसी थियेटर के लिए नाटक लिखने वालों में सिर्फ आगा हश्र कश्मीरी का ही नाम नहीं आता, नारायण प्रसाद ‘बेताब’ और पंडित राधेश्याम कथावाचक का भी आता है। नारायण प्रसाद ‘बेताब’ ने अपने नाटकों के लिए जो भाषा नीति बनायी वह उन्हीं के शब्दों में कुछ ऐसी थी-“ना ठेठ हिन्दी ना खालिस उर्दू,जुबान गोया मिली जुली हो- अलग रहे दूध से ना मिश्री, डली-डली दूध में घुली हो । ” बहरहाल, नारायण प्रसाद बेताब की भाषा का एक छोर फारसीनिष्ठ था तो दूसरा छोर संस्कृतिनिष्ठ। वे ‘रुस्तम व सोहराब’के लिए  यह लिख सकते थे- “अगर तुम मादरे-ईरान के फरजंद होते तो मैं कनीज बनकर तुम्हारी खिदमत में अपनी जिंदगी..” तो भीष्म-प्रतिज्ञा के लिए ऐसी भाषा भी गढ़ सकते थे- “जिस स्त्री के पास रुप है हृदय नहीं है, सेवा है प्रेम नहीं है, पुत्र की लालसा है किन्तु पुत्र की ममता नहीं है- उसके पास दया !”  और तीसरी बात थोड़ी महीन है, जिसकी तरफ इतिहासकार विनय लाल ने अपने लेख हिन्दुईज्म एंड बॉलीवुड- अ फ्यू नोटस् में ध्यान दिलाया है। विनय लाल की मानें तो हिन्दी सिनेमा का एक बड़ा हिस्सा हिन्दू-मानस और संस्कृति का झरोखा है। ‘अमर अकबर एंथोनी’, ‘कुली’ और ‘मर्द’ सरीखी हिट फिल्मों के निर्देशक मनमोहन देसाई को विनयलाल ने यह कहते हुए उद्धृत किया है कि मेरी फिल्में महाभारत की कथाओं पर आधारित हैं। विनयलाल की मान्यता है कि हिन्दी फिल्में हिन्दू-धर्म के मिथकों का पुनराख्यान हैं। वे इस कोटि में श्याम बेनेगल की फिल्म कलयुग(1980) को भी ऱखते हैं (क्योंकि इसमें महाभारत की ही कथा के समान दो व्यवसायी घरानों की दुश्मनी को दिखाया गया है) तो  “हम पाँच” (1980) को भी( क्योंकि इसमें पांडव सरीखे पाँच भाइयों की टक्कर दुर्योधन सरीखे जमींदार वीरप्रताप और शकुनि सरीखे उसके लाला मामा की कुटिल चालों से होती है)। और हिन्दी-फिल्मों के कथा-काया के भीतर हिन्दू मिथकों की आत्मा खोजने वाले अकेले विनय लाल ही नहीं हैं, उनसे मिलती-जुलती बात संस्कृति-मनोविज्ञानी सुधीर कक्कड़ भी कहते हैं। सुधीर कक्कड़ की मानों तो हिन्दी फिल्मों के नायकों का छलिया और खिलंदड़ रुप( जैसे फिल्म राजा बाबू में गोविन्दा) कृष्ण के चरित्र पर गढ़ा गया वैसे ही धीरोदात्त रुप( जैसे फिल्म जंजीर में अमिताभ) राम के चरित्र पर।

बात आज के जावेद अख्तर की हो या कल के साहिर लुधियानवी अथवा किसी छद्मनामधारी ‘फिल्मेश्वर’ की – सभी मानकर चलते हैं कि नाम अगर ‘हिन्दी सिनेमा’ है तो जो कथा दर्शक को दिखाई जा रही है उसमें बोली जाने वाली भाषा का रुप जरुरी तौर पर कोई एक ही होगा।‘फिल्मेश्वर’ की नजर में यह भाषा हिन्दी है, साहिर लुधियानवी की नजर में उर्दू और जावेद अख्तर के हिसाब से हिन्दी/उर्दू। हिन्दी फिल्मों के संवाद-पक्ष बारे में प्रगतिशील इदारे में ज्यादातर बातें इसी मान्यता की छांव में होती हैं। बस अन्तर इतना रहता है कि नफासत की नोंक चूंकि वहां ज्यादा ही बारीक होती है इसलिए हिन्दी फिल्मों की भाषा को ‘हिन्दुस्तानी’ कह दिया जाता है, यानि एक ऐसी भाषा जो चले हिन्दी-व्याकरण की पटरियों पर और शब्द ना तो संस्कृत के लादे और ना ही फारसी के। इस भाषा को इंगित करने के लिए कभी इसे ‘आम-फहम’ कहा जाता है तो कभी ‘बोल-चाल’ की भाषा और जोर यह दिखाने पर रहता है कि यह भाषा तद्भव-प्रेमी है- उन्हीं शब्दों को अपने भीतर समेटती है जिसके नक्काशीदार कोने जनता की जुबान पर घिस गए हों, चाहे ये शब्द पूरबिया गांवों के हों, संस्कृत और फारसी के या फिर अंग्रेजी के।

‘हिन्दी फिल्मों के संवाद हिन्दुस्तानी में लिखे जाते हैं या उन्हें हिन्दुस्तानी में होना चाहिए’- यह बात जैसे ही कोई कहता है, बात भाषा से उठकर भारतीय राष्ट्रवाद के मनचीते स्वरुप पर चली आती है। भारत के सेकुलरवाद की कुश्ती ज्यादातर धर्मगत(हिन्दू-मुसलमान) पहचानों से रही और इसी के अनुकूल ‘देश के बंटवारे’ की लहुलुहान चादर ओढ़कर आजादी के शुरुआती दशकों में देश के भावी नागरिक से चाहा यह गया कि- तू हिन्दू बनेगा ना मुसलमान बनेगा, इंसान की औलाद है, इंसान बनेगा-  और इस मुकाम तक पहुंचने के पहले के सोपान के तौर पर सोचा गया कि- हिन्दू-मुसलिम-सिक्ख ईसाई- आपस में हैं भाई-भाई। पीछे से चला आ रहा भाषाई इतिहास-बोध कहता था कि हिन्दी संस्कृत से निकली है, वेद संस्कृत में हैं और वेद चूंकि हिन्दुओं का आदिग्रंथ है इसलिए हिन्दी हिन्दुओं की भाषा है।इस सोच का एक और संस्करण था (और यह ज्यादातर मौन रहा क्योंकि पाकिस्तान बन चुका था और उस राष्ट्र की भाषा उर्दू घोषित हो चुकी थी) जो मन ही मन मानता था कि उर्दू का रिश्ता अरबी से, अरबी का रिश्ता कुरान से और कुरान का अनिवार्य रिश्ता मुसलमान से है। हिन्दू-हिन्दी बनाम मुसलिम-उर्दू के इस तनाव को कैसे साधा जाय- भारतीय सेकुलरवाद की बड़ी चिंता तो यह थी। विकल्प के तौर पर तान अंग्रेजी पर जाकर टूटी क्योंकि पश्चिमी काट की ‘आधुनिकता’ ने पहले से स्थापित कर रखा था कि सारे पौराणिक पहचानों से परे वह जो एक ‘इंसान’ होता है- वह सिर्फ तर्कबुद्धि की भाषा बोलता-लिखता है और तर्कबुद्धि की भाषा अगर कोई है तो अंग्रेजी। नए आजाद देश में यह बात धमाके से कही नहीं जा सकती थी क्योंकि मान्यता यह रही कि राष्ट्र बनना है तो राष्ट्रभाषा होनी ही चाहिए। विकल्प के तौर पर एक प्रत्यय गढ़ा गया ‘साझी संस्कृति’ का और इस साझी संस्कृति को बाकी बातों के अलावा भाषा में भी खोजा गया- एक ऐसी भाषा जिसमें अपनी-अपनी ‘रुढियां’ यानि संस्कृत और अरबी-फारसी खोकर, हिन्दू-मुसलमान दोनों अपनी अभिव्यक्तियों के लिए एक नया घर बना सकें। यह खोज आखिर को जिस भाषा पर खत्म हुई उसे 1930 के दशक में हिन्दुस्तानी कहा जा चुका था और महात्मा गांधी की मेहरबानी से उसकी चाल-ढाल भी तय की जा चुकी थी। आजादी के बाद के शुरुआती दशक में चूंकि बड़ी तेजी से संस्कृतनिष्ठ सरकारी हिन्दी का प्रचलन हुआ, इसलिए हिन्दुस्तानी के कंधे पर एक तमगा और जुड़ा कि यह  हिन्दू-वर्चस्व वाली प्रतिगामी भाषा नहीं है- बल्कि सत्ता के विरोध की भाषा है। सेकुलरवादी सोच की इसी भाषाई प्रसंग के भीतर हिन्दी फिल्मों की भाषा को प्रगतिशील इदारों में ‘हिन्दुस्तानी’ कहकर याद किया गया।

हिन्दी फिल्मों में चलने वाली इस हिन्दुस्तानी भाषा के उदाहरण बहुतेरे हैं, मिसाल के लिए याद करें फिल्म दीवार का वह यादगार संवाद जिसमें शिव की मूर्ति के आगे अमिताभ बच्चन को यह कहते हुए दिखाया गया है- “आज, खुश तो बहुत होगे तुम। देखो, जो आज तक तुम्हारें मंदिर की सीढियां नहीं चड़ा। जिसने आज तक तुम्हारे सामने सर नहीं झुकाया। जिसने आज तक कभी तुम्हारे सामने हाथ नहीं जोड़े। वो आज तुम्हारे सामने हाथ फ़ैलाए खड़ा है। बहुत खुश होगे तुम। बहुत खुश होगे कि आज मैं हार गया। लेकिन तुम जानते हो कि जिस वक्त मैं यहाँ खड़ा हूँ, वो औरत जिस के माथे से तुम्हारे चौखट का पत्थर घिस गया, वो औरत जिस पर ज़ुल्म बढ़े तो उसकी पूजा बढ़ी, वो औरत जो ज़िंदगी भर जलती रही लेकिन तुम्हारे मंदिर में दीप जलाती रही, वो औरत। वो औरत आज ज़िंदगी और मौत के सरहद पर खड़ी है। और.. ये तुम्हारी हार है…।” इस संवाद में जुल्म और जिंदगी सरीखे उर्दू-परंपरा के शब्द आते हैं तो मंदिर और दीप सरीखे हिन्दी-परंपरा के शब्द भी। आगे इसी संवाद में जुर्म और सज़ा जैसे शब्द आते हैं तो सुहागन और विधवा जैसे शब्द भी।

हिन्दी फिल्मों के संवादों की भाषा को हिन्दी-उर्दू-हिन्दुस्तानी अथवा अंग्रेजी के झगड़े से दूर ले जाकर सोचें तो नजर आएगा कि यह एक बहुलस्वरी दुनिया है, नजर आएगा कि ‘हिन्दी फिल्म’ शब्द एक व्युत्तपत्तिमूलक शब्द(जेनरिक टर्म) भर है- एकभाषा के आवरण में बहुभाषा को समेटने वाला शब्द।। हम यह देख पायेंगे कि हिन्दी-सिनेमा के संवाद ‘साझी संस्कृति’ के तकाजे से ही नहीं गढ़े जाते बल्कि कथा में आये पात्र को विश्वसनीय बनाने के लिए भी गढ़े जाते हैं और कथा के पात्रों को गढ़ा जाता है उस ‘औसत दर्शक’ की कल्पना से जो कालक्रम में हमेशा बदलते रहा है। इस कोने से देखें तो पता चले कि फिल्म मुगले-आजम में दिलीप कुमार का अगर उर्दूं-छौंक वाला यह संवाद है कि-‘मुझ पे जुल्म ढाते हुए आपको जरा ये सोचना चाहिए कि मैं आपके जिगर का टुक़ड़ा हूं कोई गैर या कोई गुलाम नहीं’ तो उसके सामने खड़ी दुर्गा खोटे का संस्कृत की कुरुणा से सना यह वाक्य भी – ‘नहीं सलीम नहीं..तुम हमारी बरसों की प्रार्थनाओं का फल हो।’ याद आएगा कि मुगले-आजम की बहुलस्वरी दुनिया में सिर्फ यही नहीं गाया गया कि- ‘जब रात है ऐसी मतवाली तो सुबह का आलम क्या होगा’ बल्कि उसमें किसी का यह स्वर भी शामिल था- ‘मोहे पनघट पर नंदलाल छेड़ गयो रे..। ’ बहुभाषिकता के कोने से देख सकें तो तुलना कर पायेंगे मुगले-आजम में बोले हुए दिलीप कुमार के संवाद( ‘तकदीरें बदल जाती हैं, जमाना बदल जाता है..मगर इस बदलती दुनिया में मोहब्बत जिस इनसान का दामन थाम लेती है वो इनसान नहीं बदलता’) की फिल्म ‘गंगा-जमुना’ में उन्हीं पर फिल्माये हुए गीत से( ‘रुप को मन मा बसई ब त बुरा का होईहैं, कोहू सो प्रीत लगईब त बुरा का होईहैं’)। याद आएगा कि अमिताभ ने अपनी फिल्मों अगर यह कहा है कि ‘मर्द को दर्द नहीं होता’  तो ‘माई नेम ईज एंथोनी गॉनसाल्विस’ भी। हम देख पायेंगे कि हिन्दी फिल्मों में अगर ‘फिरऔनों के गरुर’ को उनके ही महल में अपने पाँव के खून से कुचलती हुई एक ‘पाकीजा’ औरत है तो वह ‘टोपोरी’ भी जो कहता है- ‘आती क्या खंडाला’।

हमें बीते वक्त का अफसोस चाहे जितना हो लेकिन इस अफसोस से हिंदी-सिनेमा की भाषा(ओं) को नहीं पढ़ा जा सकता क्योंकि इस विधा को हमेशा अपने औसत दर्शक का अनुमान ठीक-ठीक लगाना पड़ता है।1990 के दशक के आते-आते हिन्दी-सिनेमा ने ठीक पहचाना कि उसका औसत दर्शक बदल चुका है। मध्यवर्ग का आकार ही नहीं बढ़ा साथ-साथ उसके स्वाद बढ़े हैं और वह अपने स्वाद को महत्वाकांक्षा की भाषा हिंग्लिश में पहचानता है, उस हिंग्लिश को जिसे अख़बारों के समाचार से लेकर टीवी पर चलने वाले विज्ञापनों तक ने गढ़ा है। ऐसे में यह अफसोस क्यों कि ‘हिन्दी फिल्मों पर अंग्रेजी का बोलबाला’ है ?

हिन्दी और उर्दू के नाम पर नफरत के शोले भड़काने वाले अवसरवादी साहिर के नाम एक खुला पत्र

शायरे इन्कलाब,

साहिर लुधियानवी

सबसे पहले आपको इस बात का धन्यवाद कि आपको अपने राष्ट्र की भाषा हिन्दी से प्यार है और इस बात का भी आप हिन्दी साहित्य से प्यार करते हैं। आपने बड़े गर्व के साथ यह फरमाया कि जरुरत पड़ने पर आप हिन्दी में गीत भी लिखते हैं और अपने चित्रलेखा(वह चित्रलेखा जिसे लोगों ने चितरलेखा समझा) के गीतों का उदाहरण भी दिया। यह जानकर वाकई बड़ा आश्चर्य हुआ कि आप समझते हैं कि आपने एक फिल्म में हिन्दी गीत लिखे हैं। लेकिन आपने हिन्दी पर यह अहसान पहली ही बार नहीं किया है। आप इससे पहले भी हिन्दी में ही लिखते रहे हैं। आपने फिल्मों में आने से पहले भी जो कुछ लिखा था, वह हमारी निगाह में तो हिन्दी ही थी..यह जरुर है कि आपने जब वह सब कलमबंद किया था जो फारसी लिपि इस्तेमाल की थी। यूं देखा जाय तो अपनी चितरलेखा के गीत भी आपने अपनी तरफ से चाहे हिन्दी में लिखे हों लेकिन कागज पर उतारा उन्हें फारसी लिपि में ही था।इतनी छोटी सी बात का मतलब आप जैसा बड़ा और दानिशमंद शायर शायद फौरन समझ गया होगा- दो लिपियों से भाषा दो नहीं हो जाती और एक ही लिपि में कई भाषाएं भी लिखी जा सकती हैं। हिन्दुस्तान के जिस प्रदेश में आपका जन्म हुआ उस पंजाब के वारिस ने अपनी पंजाबी भाषा की हीर फारसी लिपि में  लिखी थी, यह भी आप जानते ही होंगे क्योंकि आप जैसे धरती के शायर अपनी संस्कृति की इतनी बात तो जानते ही हैं। जिसे आप आज उर्दू कहते हैं उसके महान कवि गालिब अपने आपको हिन्दी में लिखने वाला कहते थे, यह भी आप उस मुशायरे में  भूले नहीं होंगे जहां आपने हिन्दी साम्राज्यवाद की भयावनी तस्वीर खींची थी

आपने जनता को इस दिन यह भी बताया था कि हिन्दी नाम से जानी-जाने वाली 97 फीसदी फिल्में उर्दू की होती हैं। तो भाईजान, झगड़ा कहां रहा? जिसे आप उर्दू कहते हैं उसे 99.9 फीसदी लोग हिन्दी कहते हैं। तो दोनों एक ही चीज रही न? उन फिल्मों की नामावली अंग्रेजी में होती है तो आपको अंग्रेजी का साम्राज्यवाद नजर नहीं आता? आपको- यानी उस महान आदमी को जिसने साम्राज्यवाद के प्रति विद्रोह का परचम उठा रखा था। नागरी लिपि में आते ही वह साम्राज्यवाद हो गया। उस नागरी लिपि में जिसमें आपके कविता-संग्रह उर्दू लिपि से भी ज्यादा बिके हैं।जब आपके संग्रह नागरी लिपि में छपे थे तो क्या उनका हिन्दी में अनुवाद किया गया था या हू-ब-हू आपके लिखे जैसे ही छापे गए थे और उन्हें हिन्दी के पाठकों ने पूरी तरह समझकर भरपूर रस नहीं लिया था? उनका हिन्दी में प्रकाशन हिन्दी का साम्राज्यवाद नहीं था?

आखिर बात क्या है? हिन्दी और उर्दू की? या हिन्दी और उर्दू के नाम पर संप्रदाय की? इस धर्मनिरपेक्ष राज्य में आजादी के बीस सालों ने इतना तो करिश्मा किया ही है कि हमारे अंदर ही अंदर जो संकुचित भावनाओं की आग फूट रही है, हमने उसे उसके सही नाम से पुकारना बंद कर दिया है और उसे हिन्दी-उर्दू का नाम देकर हम उसे छुपाने की कोशिश करते करते हैं।

आप अपनी भावुक शायरी में कितनी लफ्फाजी करते रहते हों, यह भी सही है यह भी सही है कि आपके दिल में एक दिन इंसान के प्रति प्रेम भरा था।आप सब दुनिया के लोगों को एकसाथ कंधे से कंधा मिलाकर खुशहाली की मंजिल की तरफ बढ़ते हुए देखना चाहते थे। लेकिन दोस्त, आज ये क्या हो गया? इनसान को इनसान के करीब लाने के बजाय आप हिन्दी-उर्दू की आड़ में किस नफरत के शोले से खेलने लगे? सच कहूं तो आज आपकी आवाज से जमाते-इस्लामी की घिनौनी बू आती है। आपने पिछले दिनों वह शानदार गीत लिखा था-

नीले गगन के तले,

धरती का प्यार पले।

यह पत्र लिखते लिखते मुझे उस गीत की याद हो आई। इसलिए आपको देशद्रोही कहने को मन नहीं होता पर मुशायरे में आपकी तकरीर को पढ़कर आपको क्या कहूं यह समझ में नहीं आता। पूरे हिन्दुस्तान की एक पीढ़ी जिसमें पाकिस्तान की भी वही पीढ़ी शामिल की जा सकती है, आपकी कलम पर नाज करती थी, आपके खयालों से( खयालों उर्दू का नहीं हिन्दी का शब्द है, उर्दू में इसे खयालात कहते हैं हुजूरेवाला) प्रभावित थी। आपने उस पीढ़ी की तमाम भावनाओं को अपनी सांप्रदायिकता की एख झलक दिखाकर तोड़ दिया।

जिस भाषा को आप उर्दू कहते हैं और जिसके लिए आज आंध्र, बंगाल,महाराष्ट्र, मैसूर और केरल- सब जगह दूसरी भाषा का दर्जा दिलवाना चाहते हैं वह इन जगहों में भी उतनी ही परदेशन है जितनी पश्चिमी पाकिस्तान में। उर्दू संस्कृति में अपने बच्चों को पालने के लालच में हिन्दुस्तान छोड़ने वाले महान कवि जोश मलीहाबादी तक खुद मानते हैं कि पाकिस्तान में उर्दू का भविष्य डांवाडोल है क्योंकि वह वहां की भाषा नहीं है। पर वे खुश हैं। क्यों?  इसलिए नहीं कि वहां उर्दू पनप रही है बल्कि इसलिए कि वे एक सांप्रदायिक संस्कृति के बीच में पहुंच गए हैं(हालांकि वे अपने को अनीश्वरवादी कहते हैं)। है न कमाल की बात। आपने एक बार लिखा था-

तू हिन्दू बनेगा ना मुसलमान बनेगा

इनसान की औलाद है इनसान बनेगा

लेकिन आपकी आजकल की गतिविधि देखते हुए तो ऐसा लगता है ये आपकी अपनी भावनाएं नहीं थी, आप सिर्फ फिल्म के एक पात्र की भावनाएं लिख रहे थे। आप एक जमाने में वक्त को बदलने की बात लिखा करते थे। फिर भी फिल्मी आवश्यकता के वशीभूत आपने लिखा था-

कल जहां बसती थीं खुशियां-आज है मातम वहां

वक्त लाया था बहारें- वक्त लाया है खिजां

आदमी को चाहिए वक्त से डरकर रहे

कौन जाने किस घड़ी वक्त का बदले मिज़ाज

सारे हिन्दुस्तान में फिल्मोद्योग कम से कम एक ऐसी जगह थी जहां जाति प्रदेश और धर्म का भेदभाव काम के रास्ते में नहीं आता था, मेलजोल के रास्ते में नहीं आता था। और आप इनसानियत के हामी थे। पर आपने इस वातावरण में सांप्रदायिकता का जहर घोल दिया।

लगता है इनसान की औलाद का भविष्य आपकी नजरों में सिर्फ यह है-

तू हिन्दू बनेगा तू मुसलमान बनेगा

शैतान की औलाद है शैतान बनेगा

मैं आखिर में इतनी ही दुआ करना चाहता हूं: खुदा उर्दू को आप जैसे हिमायतियों से बचाये।

फिल्मेश्वर

( यह चिट्ठी माधुरी के 30 जुलाई 1965 के अंक में छपी। चिट्ठी सिने-इतिहासकार रविकांत जी की सहायता से हासिल हुई। प्रस्तुतकर्ता इसके लिए उनका कृतज्ञ है)

5205826_photo3चन्दन श्रीवास्तव,  मूलतया छपरा(बिहार) के निवासी, पिछले पंद्रह सालों से दिल्ली में। पहले आईआईएमसी और फिर जेएनयू में पढ़ाई। “उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हिन्दी लोकवृत्त का निर्माण” शीर्षक से पीएचडी के बाद दिल्ली के कॉलेजों में छिटपुट अध्यापन, फिर टीवी चैनल की नौकरी और अब विकासशील समाज अध्ययन पीठ(सीएसडीएस) की एक परियोजना इंक्लूसिव मीडिया फॉर चेंज से जुड़े हैं। इनसे  chandan@csds.in पर संपर्क संभव है। 

साभार- हंस- फरवरी- 2013- हिन्दी सिनेमा के सौ साल

डायरी कविता

By   उस्मान खान

 
1 नवंबर

एक समय
कविता की अंतिम पंक्ति से पहले
हम देखेंगे
जूता पॉलिश जूता पॉलिश हो गई है

2 नवंबर

आशंका है
छत पकड़कर
झूल रहा बन्दर की तरह
सौ वाट का बल्ब
खीं खींयाता दुःस्वप्न
जहाँ राबिया तुम
रौशनदान तोड़कर
अभी अभी भागी हो
और गाँव गोईरे
ईमली की डाल पर
चमगादड़ सी लटक गई हो
क्या हुआ था ?
जिन्दगी इतनी कठिन तो नहीं थी
कि एक शांत धूसर आभा ओढ़ ली जाए !

3 नवंबर

मीरा तुम अपना जिस्म लिए
घुग्घू के पर तौलने में डूबी
ठहरी हुई सड़क पर ठहरी
जा चुकी कार का सुँघती
धुआं
. . . . . . . . . . . . .
कुछ ठिठुरती नींदों की तरफ
ईशारा करती स्ट्रीट लाईट साथ
एका कर सुअरों के भटकती
सुँघती फिरती फूटपाथ
मृत्यु
. . . . . . . . . . . .
मौसम की कसमसाहट
घड़ी नहीं बताएगी
सरकारी दफ़्तर भी नहीं

4 नवंबर

मृत्यु !
एक शहर में भटकते हम दोनों
एक दिन टकराएँगे ही!

5 नवंबर

जेबें इतनी खाली हैं
कि अलीफ  लैला का आखिरी किस्सा भी
सल्फास की गोलियों को सुनाया जा चुका है

6 नवंबर

मेरे पास
एक लाश है
एक दुःस्वप्न
और शिशिर की निःशेष रात

                                                             और कोई जवाब नहीं है !

7 नवंबर

नीम-बुझी गलियों की दीवारों के
अँधेरे उजाले पर
बोध की सारी पीड़ा और क्रोध
उभारता चला जा रहा है
अंडरग्राउंड का गुलमोहर का फूल

10 नवंबर

जैसे आईना टूटता है
और नींद पीड़ाओं का सिलसिला हो जाती हैं
सीपियों में मिली कविताएँ
मेरी साँसों में
अश्वत्थामा के कपाल सी
मैं सूरज को अपने सर में रख लेता हूँ
और कुर्सी को छतपंखे की जगह टाँग देता हूँ

11 नवंबर

तुम घोड़ों से आए
और तुमने सिर्फ दो स्वाद हमारे लिए शाश्वत बना दिए
एक कड़वा
और एक कसैला
तुम घोड़ों से आए
और तुमने सिर्फ दो चीज़ें हमें दीं .
नाल
और लगाम।

12 नवंबर

फ्लायओवर के नीचे
हैंगओवर में …..जाम।
चाँद और फैंटेसी
सड़क पर बिखरे जा रहे हैं
और ऑटो में चेता है
सौ वाट का बल्ब।

13 नवंबर

हल्के.हल्के
तय करके
कई सदियों का सफ़र
एक राग!
अपनी कोमल ऊँगलियों में
ठंडी मिजराबें संभाले
मेरे बालों में पिरो रही है
शहरज़ाद !
. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .
मेरे भाईयों का नाम बताओ ! जो मुझे अंधेरे कुँए में फेंक गए थे !! और जैसे रात हो गई थी  रेगिस्तान में !!!

14 नवंबर

फ्लाय ओवर के नीचे
कुत्ते पोस्टमार्टम करते हैं !!
रात के तीन !!!

17 नवंबर

विक्षिप्त अफवाहें
आईने और आँखों के बीच
आँखें दरकती हैं
आईना कोढ़ाता है
घर से न लाश मिलती है
न आईना

18 नवंबर

कुछ इंजेक्शन
और गर्भाशय कुछ
लँगड़ाते फिरते हैं
शहर में

19 नवंबर

इस व्यवस्था की पूर्वशर्त है
कि तुम्हारी आत्महत्या की जाएगी
और साबूत खड़े लोग वे भाँड
हटाते रहेंगे ऊँगलियों के पोरों से घी की गंध
और देखते रहेंगे अपनी वीर्यसनी गाँड

23 नवंबर

असंगता थी
उदासी थी
घर के कोने धूसर थे
लैम्पपोस्ट उदास थे
प्रसव-पीड़ा से बिल्लियाँ चिल्लाती थीं
सड़क पर उड़ते काग़ज़ के टुकड़ों की आवाज़ मनहूस थी
चाकू लिए एक आदमी घुमता था
क्षिप्रा के तट पर सन्नाटा था
मगर इतना तो नहीं था कभी !
जंगलों पर
और बस्तियों पर
ये अपशकुन सा क्या मँडरा रहा है !

24 नवंबर

तुम आते
जैसे शबे विसाल चाँद पर बादल आता है
जैसे सही वक्त पर मानसून आता है
जैसे यादों के शहर में वह मोड़
जहाँ अपने महबूब से मिलना हुआ था
जैसे गोंद आता है बबूल में
और नदी में मछलियाँ
. . . . . . . . . .
इस तरह नहीं
जैसे रतौंधी
जैसे घाव पर मक्खियाँ
जैसे घर पर पुलिस
जैसे इमरजेंसी !
जैसे हत्या !!
जैसे ब्लेकआउट….

26 नवंबर

मेरी कहानियों की सौ सौ नायिकाएँ और नायकों को
जो महुए की चूअन सीने पर महसूस करते थे।
जो जिन्दगी को भरपूर जीना चाहते थे।
जो बेनाम गलियों के मोड़ों पर
घरों के साफ सूथरे कमरों में
सड़कों की भरी पूरी छातियों पर
झाडियों में
और पहाडियों पर
क़त्ल हुए।
और जिनके बरसाती गीतों की धुन पर
डोला करते थे साँची के स्तूप
रात की व्याकुलता में
बिडियाँ सुलगाते देखा मैंने
और देखा गुस्से से दाँत पिसते उन्हें !

28 नवंबर

जीवन
साँझ सा निःशब्द
शेष हो जाए
श्वास निःश्वास के क्रम में
दुःख कठिन हो जाए जमकर
पर
तुम प्यार नहीं हो
तुमको प्यार नहीं लिखूँगा !

3 दिसंबर
     निषिद्ध इतिहासों में लेकिन दर्ज

  मेंढकों कनखजूरों फुद्दियों की हत्याएँ

4 दिसंबर

प्रेम में
निषिद्ध
मृत्यु का मौन
आवाज़ खोजता है।

5 दिसंबर

रात को एक बजे
पेपरवेट के नीचे दबाए गए
यातना के इतिहास के सेंसर्ड पन्ने
बस्ती से मसान तक
घुग्घूओं के परों से झड़ते हैं
. . . . . . . . . . .
जब्तशुदा गाडियों पर जमी धूल
रातगश्त पर भेज चुकी है
पुलिसवालों को
. . . . . . . . . . .
दो ट्यूबलाईटों के बीच खड़े
आदमक़द आईने में
एक केंचूआ रेंग रहा है

उस्मान खान समकालीन हिंदी कविता के अलहदा कवि हैं. चर्चाओं और पुरस्कारों की भीड़ से अलहदा…छपाऊ मानसिकता से भी अलहदा..जे.एन.यू. के हिंदी विभाग से मालवा के लोक-साहित्य पर शोधरत हैं. इनसे usmanjnu@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

उस्मान खान की कवितायें –उदासीनता नहीं उदासी

By आशुतोष कुमार

तुम घोड़ों से आए
और तुमने सिर्फ दो स्वाद हमारे लिए शाश्वत बना दिए –
एक कड़वा
और एक कसैला
तुम घोड़ों से आए
और तुमने सिर्फ दो चीज़ें हमें दीं –
नाल
और लगाम।घोड़ा शानदार और सुन्दर पशु है .घोड़ों और मनुष्य का साथ बहुत पुराना है.घोड़े जब साथ  आये ,प्रगति की  गति बहुत तेज हो गयी. इतिहास अश्वारोही योद्धाओं की विजयगाथाओं का एक अटूट सिलसिला है.  शायद यही वज़ह हो कि   मशीनों का ज़माना आया तो उन की ताकत मापने का पैमाना भी अश्वशक्ति ही मानी  गयी. मध्ययुग से ले कर आधुनिक समय तक सभ्यता के उत्तरोत्तर विकास में घोड़ों की केन्द्रीय भूमिका है. मनुष्य  के मन में घोड़ों की गहरी स्मृति है. घोड़ों और मनुष्य ने एक दूसरे को किस तरह बदला   ?क्या मनुष्य ने घोड़ों को मनुष्यवत बनाया ?या घोड़ों ने मनुष्य को पशुवत  ?क्या घोड़ों ने  मनुष्य की दुनिया को घोड़ों की दुनिया में तब्दील कर दिया?इस  दुनिया में कुछ तो  हैं लड़ाकू हमलावर घोड़े और बहुत सारे लगाम पहने नाल ठुंके घोड़े ?उस्मान खान की डायरी श्रृंखला की कविताओं से चुनी गयी यह छोटी सी कविता मनुष्यता के इतिहास की हमारी आमफहम समझ को ही नहीं झकझोरती ,हमारी स्मृतियों को भी बेतरह उलट पलट देती है. स्मृतियों का अन्धेरा  अतल सतह पर  आ जाता है .स्मृतियों का स्वाद बदल जाता है . वे कडवी और कसैली हो जाती हैं. स्मृतियों को सहेजना  दरअसल दुनिया को समझने का एक ढंग है . सिर्फ मीठी यादों को सहेजने वाल हमारा मन एक ऐसी विश्वदृष्टि का निर्माण करता है , जिस में मनुष्य की एक गरिमामय छवि उभरती है .कड़वी और कसैली यादें इस छवि को छिन्नभिन्न कर देती हैं. लेकिन हमें खुद के अधिक करीब भी .

कविता स्मृतिधर्मा होती है .  कविता में स्मृति अनेक रूपों में आती है. एक रूप वह है , जिस में कड़वाहट भारी स्मृतियों को छांट दिया जाता है. दूसरा वह है , जिस में उन्हें संशोधित कर दिया जाता है . कई बार  आमूलचूल बदल दिया जाता है.  कपोलकल्पनाओं को स्मृतियों में खपाने की कोशिश की जाती है. इस तरह स्मृतियों को कलात्मक बनाया जाता है . स्मृति स्वयं एक ‘कला’ बन जाती है.  एक रूप वह  भी  है , जिस में समकालीनता को स्मृतिहीनता का पर्याय समझ लिया जाता है. उस्मान की कविता में स्मृति की भूमिका  इन सब रूपों से अलग है . सब से पहले तो यह कि वह कविता में प्रवाहित होते समय को अतीत , वर्तमान और भविष्य के तीन  अलग अलग खांचों में विभाजित करने से बचती है . वह  वर्तमान में जीवित है .भविष्य में  ताकती झांकती है. अतीतमोह बिल्कुल  नहीं  है.

स्मृति की यह सक्रिय भूमिका असल में विस्मृति  के खिलाफ एक मुहिम है .  विस्मृति को प्रोत्साहन देना मनुष्य की सजग चेतना को नियंत्रित करने का सब से कारगर तरीका  है .उस्मान की एक और छोटी सी कविता इसे यों रेखांकित करती है —
आप मुझे मूर्ख कह सकते हैं , पर

मैं सचमुच भूल गया हूँ कि

मेरी जान

 फिलिस्तीन की उस सड़क में है

जिस पर एक भी फिलिस्तीनी नहीं चलता

या मैं मर गया हूँ

 मनोरमा के साथ.

उस्मान की कविता में जीव- जंतुओं का एक समूचा जीवित संसार है. केंचुए , कनखजूरे ,उल्लू , शैवाल , गिद्ध , मकड़ियां , सियार , ऊँट ,चूहे .वे सब निरीह प्राणी , जिन्हें हम देख कर भी नहीं देखते.  उस्मान हिंदी कविता को ‘फूल -बच्चा – चिड़िया – लड़की ‘ की समकालीन दुनिया से आगे ले गए हैं. यहाँ ऐसी कविता है , जिस में  में ” दुःस्वप्न हुई गलियों में थिरकती है ईश्वर की परछाईं/चाँद सबसे फ़ज़ूल चीज़ों में से हो जाता है/ग़ुलाब और ओस और जलेबी की तरह/और मिट्टी-सना एक केंचुआ/धीरे-धीरे सड़क पार करता है/जेठ की धूप  में..” इन पंक्तियों की व्याख्या करने की कोशिश फ़िज़ूल है. जेठ की धूप में सड़क पार करता मिट्टी-सना केंचुआ ईश्वर  की परछाइयों  को चुनौती  देता हुआ दुःस्वप्न-  गलियों में   जीवन के अंतिम स्वप्न को जिस तरह जीवित रखता है , वह हिंदी कविता की एक अविस्मर्णीय घटना है. लेकिन वही  केंचुआ जब दो ट्यूब लाइटों के बीच खड़े  ‘आदमकद  ‘  आईने में रेंगता हुआ नज़र  आता है , तब कविता के आईने में दिखती आदमी की कायांतरित शक्ल  स्तब्ध   और उदास करती है.

उस्मान की कविता में गाढ़ी  उदासी   है. बहुत दिनों से उदासी हिंदी कविता से बहिष्कृत रही  है. उदास होना कुछ गुनाह जैसा हो गया. उदास मौसमों के हर ज़िक्र के साथ उन से लड़ने का संकल्प घोषित करना लाजिमी मान  लिया गया. समकालीन हिंदी कविता साथ के दशक की कथित  चरम नकारवादी कविता  को विस्थापित  करती हुयी आयी थी. ‘अकविता ‘ में निराशा का कुछ ऐसा उत्सव मनाया गया कि वह समकालीन कवियों के लिए एक निषिद्ध वस्तु  हो गयी. कविता को आशावादी होना चाहिए. उसे विकृति और विद्रूप में रस लेने की जगह जीवन की सहजता , सुन्दरता , गतिशीलता और संघर्ष- भावना को देखने और दिखाने पर बल देना चाहिए. इस काव्य- सिद्धांत को कविता की जीवनधर्मिता  के रूप में इतनी  लोकप्रियता मिली कि अब वह हिंदी कविता के कॉमन सेन्स  का हिस्सा है. इस कॉमन सेन्स में जनवादी और ‘गुणीजनवादी’ ( अभिजनवादी ?) दोनों समान रूप से शरीक हैं .जाहिर है यह जीवन में व्याप्त निराशा को कविता के आशावाद से परास्त करने  का काव्य- संकल्प था . सो अंत- पन्त पलट कर  गहनतम निराशा में तब्दील हो जाना इस के लिए लाजिमी था. प्रमुख समकालीन  कवियों के यहाँ  ऐसे उदाहरण प्रचुर हैं.

‘निराशाद’ और ‘आशावाद’ से अलग उस्मान की कविताओं में हमारे समय की गहरी उदासी सहज रूप से मौजूद है. उस की कविता प्राचीन सभ्यताओं के दफ़न नगरो से ले कर आधुनिक सभ्यता के उजाड़े गए गाँव तक में भटकती हुयी त्रासदियों की गवाह बनने का माद्दा रखती है .उस की कविता में ‘देश का उदास चेहरा नाजी यातना शिविरों पर झुकी किसी चुप शाम की तरह’ उस की ‘मज्जा में टंकित करता है यातनाओं का उपन्यास’. उस की कविता में उन औरतों की उदासी है , जो ‘रात भर एक रुपये  को डेढ़ रुपया बना देने वाला जिन्न ढूँढती हुयी सडकों से जूझती’ हैं. ‘उदास रतजगों के मोड़ पर खड़ी’ उस की कविता ‘मेजों पर धूल की तरह जमी उदासी’ साफ़ करती है.

इन उदासियों को देख कर कविता को उदासी के आदाब सिखाने वाले नासिर काज़मी की याद आना सहज है. ” हमारे घर की दीवारों पे   नासिर / उदासी बाल खोले सो रही है. ” नासिर की शायरी में भी उन के जमाने की उदासी थी. एक देश , एक संस्कृति ,एक सभ्यता का विभाजन   और उस से उपजा   भोगौलिक  और मनोवैज्ञानिक  विस्थापन उन की उदासी का सबब था. उस्मान के समय तक आते विभाजन और विस्थापन के आयाम और भी विकट हुए हैं.

इस व्यवस्था की पूर्वशर्त है
        कि तुम्हारी आत्महत्या की जाएगी
       और साबूत खड़े लोग – वे भाँड
                             हटाते रहेंगे ऊँगलियों के पोरों से – घी की गंध
                    और देखते रहेंगे अपनी वीर्य-सनी गाँड

जब कि  गाँव शहरों में व्यापक आत्महत्याओं की खबरें बासी पड़ चुकी हैं , कविता उस विभाजन को दर्ज करती है , जिस के ओर  साबुत भांड खड़े हैं , और दूसरी तरफ वे लोग हैं , जिन की आत्महत्याए जनसंहार की तरह व्यवस्था की पूर्वशर्त बन जाती हैं. ‘ तुम्हारी आत्महत्या की जायेगी ‘ जैसी पंक्ति अद्भुत तीक्ष्णता      से उस झूठ   को उद्घाटित  कर देती  है , जिस में प्रायोजित  जनसंहार को ‘ आत्महत्याओं का नाम दिया जाता है. जल , जंगल और जमीन की खुली  ग्लोबल लूट ने इस विभाजन के दोनों ओर खड़े समूहों को मनुष्यता की उन जड़ों से विस्थापित कर दिया है , जिन से जुड़े रहना मनुष्यता   की परिभाषा   और भाषा   की गरिमा को बचाए रखने की पूर्वशर्त है.

कविता को सरलता , सुन्दरता  , शांति और  सुकून का अंतिम शरण्य समझने वाले रसिकजन इस कविता में ‘मौर्बिदिती ‘ या रुग्णता के दर्शन कर सकते हैं. लेकिन रोग से बेखबर रहना सब से बड़ी रुग्णता है. जब जीवन के उनियादी मूल्य , विचार और संवेदनाये हमले की ज़द में हों , तब उदासीनता सब से बड़ा रोग है. उस्मान की कविता में मनुष्यता की तमाम दुस्साध्य  बीमारियों की जागरूकता है . यह जागरूकता उदास करती है . लेकिन  इस  गहरी उदासी के चलते ही उदासीनता असंभव हो जाती है. इस उदासी को नकार कर आशावाद और निराशावाद के झूले में झूलने वाली कविता एक बनावटी आत्मतोष में स्खलित होती है .इस तरह कविता के भीतर बड़े हो हल्ले के साथ लड़ी जाने वाली लडाइयां अक्सर जिन्दगी की असली लड़ाइयों के प्रति  एक काव्यात्मक उदासीनता निर्मित करती है.अकारण नहीं है कि ऐसी तमाम कवितायें मुखर रूप से राजनीतिक न दिखने को कविता के एक मूल्य की तरह स्थापित करती हैं. इस के बरक्श   उस्मान को यह कहने में कोई झिझक नहीं है कि उन की कवितायें ‘ कतई राजनैतिक ‘ हैं  .क्योंकि ” कविता  में संभव  है उदासी / उदासीनता बिल्कुल नहीं. 

समकालीन हिंदी कविता पर बारीक नज़र रखने वाले युवा आलोचक आशुतोष  कुमार दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक हैं. इनसे  ashuvandana@gmail.com  पर संपर्क कर सकते हैं.

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