Archive for the month “June, 2014”

बना रहे गंगा ढाबा: संदीप सिंह

आज-कल जे.एन.यू. के गंगा ढाबा की जबर्दस्त चर्चा चल रही है. उसके कारणों के विस्तार में जाने का यहाँ समय नहीं है. ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि गंगा ढाबा की उपस्थिति के क्या मायने हैं उसे समझा जाय. उन्हीं मायनों से आज की चर्चा प्रासंगिक होती है. कभी-कभी यह जरुर लगता है कि जेएनयू  वालों के लिए गंगा ढाबा एक ‘फेटिश’ तो नहीं है, जिन्हें सहलाना उन्हें बहुत पसंद है. या फिर एक ऐसी जगह जहाँ की कुछ यादें जीवन भर के लिए एक टीस की तरह बजती है. मौसम ख़ुशगवार हो तो यह दर्द मीठी-मीठी सुइयों की तरह चुभता है और मौसम ने साथ नहीं दिया तो खुद भी सुई बन जाने से नहीं हिचकते हैं.

खैर, संदीप सिंह द्वारा लिखित यह  छोटा सा टुकड़ा  ‘गंगा ढाबा’ के मायनों को समझने में नजदीक की एक  दृष्टि देता है.

गंगा ढाबा (फोटो- विकास कुमार)

गंगा ढाबा (फोटो- विकास कुमार)

By संदीप सिंह 

जेएनयू से कम नाम जेएनयू के ‘गंगा ढाबा’ का नहीं है।  जब हम लोग इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंडर ग्रैजूएशन के छात्र थे तभी से दिल्ली गए सीनियर्स से जेएनयू के किसी गंगा ढाबा का नाम सुना करते थे जो ‘सुबह चार बजे तक खुला रहता था और जहाँ लोग चाय के कप के साथ गर्मागर्म बहसें किया करते हैं’। इलाहाबाद जैसे शहर में हॉस्टल में रहते हुए, जहाँ देर रात गए चाय पीने के लिए हमें प्रयाग रेलवे स्टेशन जाना पड़ता था, हमारे मन में गंगा ढाबा की एक बड़ी ही रोमांटिक छवि उभरती थी।

जेएनयू में एडमिशन वाली भागदौड़ के बाद हम तीन-चार इलाहाबादी दोस्त जो उस साल अलग-अलग विषयों में वहां दाखिल हुए थे, बाकायदा तैयार होकर ‘गंगा ढाबा देखने’ निकले थे। संभवतः हम चारों के लिए ढाबे का पहला दर्शन ‘दृश्यभंग’ जैसा था। हमारी कल्पना में जो एक व्यवस्थित, रोशनी से भरपूर और अब तक हमारे देखे-जाने ढाबा-कैंटीनों की तस्वीर थी, टूट गयी. अजीब झाड-झंखाड़ से भरी हुई एक उबड़-खाबड़ जगह, जहाँ चलने में आपके पैरों को आँखें रखनी पड़ती हैं। बैठने के लिए कुर्सियां न मेजें बल्कि टेढ़े-मेढ़े पत्थर। ऊपर खुला आकाश और बबूल की लगातार गिरती रहने वाली पत्तियों  की कांटेदार शाखाएं, जिनसे कब आपकी चाय में चींटा गिर पड़ेगा इसका ख्याल हमेशा रखना पड़ता है।

इस शुरुआती झटके के बाद थोडा गौर करने पर हमने पाया कि थोड़ी-थोड़ी दूरी  पर बने स्टूलंनुमा पत्थरों पर बैठे लोग अँधेरे और रोशनी के बीच वाली स्थिति में सच में कुछ बतियाये जा रहे थे। दूसरा झटका हमें ढाबे के काउंटर पर लगा। न नानवेज  न वेज! सिर्फ चाय, शुरू में एकदम अच्छा न लगने वाला पराठा, आलू के एकाध तैरते टुकड़े के साथ पानी से पतली ‘आलू मटर’ की सब्जी और आमलेट जैसी एक दो चीजें, और बस! समझ में नहीं आया कि आखिर ढाबा इतना फेमस क्यों है?

कैम्पस में थोडा व्यवस्थित होने के बाद जब पूरी लाइब्रेरी ‘पढ़’ जाने का जोश अपने उफान पर था, 11.30 पर लाइब्रेरी बंद होने के बाद गंगा ढाबा जाकर घंटा डेढ़ घंटा बैठना हमारी आदतों में कब शामिल हुआ, ये मैं कभी ठीक से जान नहीं पाया। धीरे-धीरे उस ‘अँधेरे-उजाले’ में बिखरे हुए उबड़-खाबडपन के भीतर से बनने वाले ‘स्पेस’ का अहसास होने लगा था। यह ‘स्पेस’ जेएनयू की खासियत है। गंगा ढाबा के ‘स्पेस’ का एबनार्मल या अनप्लांड स्ट्रक्चर उसकी विशेषता है। इसका अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि किसी भी किस्म की कितनी भी प्राइवेट बात जितने निश्चिन्त तरीके से आप गंगा ढाबा पर कर सकते हैं उतनी निश्चितता से संभवतः जेएनयू के किसी और पब्लिक स्पेस में नहीं, लाइब्रेरी कैंटीन और आजकल के 24*7 ढाबा पर तो बिलकुल ही नहीं। पार्थसारथी चट्टानों के बाद जेएनयू में सबसे ज्यादा प्रेम प्रस्ताव संभवतः गंगा ढाबा के ही स्टूलनुमा पत्थरों के बीच उपस्थित अँधेरे-उजाले में स्वीकारे या ठुकराए जाते हैं, ऐसा मैं सिर्फ दूसरों के अनुभव से नहीं कह रहा हूँ। गंगा ढाबा की यह संरचना उसके ‘स्पेस’ को  एक खास किस्म की ‘वैयक्तिक्त्ता/पहचान’ देती है जिसमें आप बहुत सहज महसूस करते हैं। अगर आप गौर से देखें तो पायेंगे के ढाबे की इस ‘व्याप्ति’ के किसी कोने में बैठा एक लड़का या लडकी सबकी नजरों में आये बगैर सबको या किसी एक को ताके जा रहा है।

खैर, इसी ढाबे से हमने छात्र संगठनों के नेताओं/कार्यकर्ताओं को ‘आइडेंटीफाई’ करना शुरू किया। 2004 के उस ज़माने में मौर्याजी की दुकान के बगल में देर रात तक लगने ‘आइसा के लोगों का अड्डा काफी विजिबल हुआ करता था। एसएफआई के लोग वहां कम दिखते थे, उनका मुख्य अड्डा उस समय छात्रसंघ का ऑफिस ही हुआ करता था जिसको हम लोग अक्सर बाहर से झाँककर लौट आया करते थे। ऐसे ही किसी एक दिन जब मैं अपने कुछ मित्रों के साथ देर रात गंगा ढाबा पर बैठा हुआ था हमें आइसा के किसी कार्यकर्ता ने अगले दिन दिखाई जा रही फिल्म ‘एक मिनट का मौन’ की पर्ची दी जिसमें उस क्रांतिकारी छात्र नेता के जीवन और संघर्ष को  देखने के बाद रवि यादव और क्लास के ‘बाबा’ अमरेन्द्र त्रिपाठी के साथ मैं काफी खराब मनःस्थिति में चला गया था।

उस समय हम अभिषेक सर जो हाल ही में फुलब्राईट स्कालरशिप पूरी कर लौटे थे और आजकल बोस्टन विश्वविद्यालय में अध्यापक हैं, की शागिर्दगी में उनके शब्दों में ‘गंगा ढाबा’ करते थे। उनके हिसाब से ‘गंगा ढाबा करना’ सही में जेएनयूआइट होना है। यह भी सच है कि सबसे पहले ठीक ठीक से ऋत्विक घटक, सबाल्टर्न स्टडीज, रणधीर सिंह, फ्रेंचेस्का के पब्लिक स्फेयर, पाल ब्रास, पाल रिकर, फूको और हैबरमास के बारे में वहीँ और उन्ही से सुना।

बाद में छात्र सक्रियता के दौर में जब अक्सर हमारा मेस का खाना छूट जाया करता था या देर रात कैम्पेन ख़त्म होती थी, हमारी भूख वही ढाबा वाला पराठा ही मिटाता था जिससे हमारी शिकायतें कभी ख़त्म नहीं हुईं। जुलूस ख़त्म हुआ है और रात के 1 बज चुके हैं। 10-15 रूपये में अगर पेट भरना है तो चलो गंगा ढाबा। संगठन की कमेटी की बैठक देर रात ख़त्म हुई है, अगले दिन की प्लानिंग का तनाव साफ़ दिख रहा है, भूख लगी है, चलो गंगा ढाबा। युनियन की काउंसिल की तल्ख़ बैठक ख़त्म हुई है, मूड ऑफ़ है, चाय पीनी है, चलो गंगा ढाबा। मालूम है कोई दोस्त/कामरेड या अच्छा लगने वाला मिल ही जायेगा जिसको देखकर आप खुश हो जाते हैं. आप अकेले हैं, मन नहीं लग रहा है, चलो गंगा ढाबा।

जेएनयू का अघोषित पोलिटिकल सेंटर है गंगा ढाबा। सब कुछ वहीँ से शुरू होता है, जुलूस भी और चुनावी अफवाह भी। आजकल के नए ढाबे/कैंटीन  अपनी संरचना में काफी सीमित और संकुचित है जिन पर इस बाजारू समय का असर साफ़ दिखता है. और दिखता है कि कैसे इस ‘समय’ में दीक्षित होने वाले हमारे नौजवान गंगा ढाबा की अहमियत को शायद कम समझ रहे हैं। बावजूद इसके गंगा ढाबा इस ‘समय’ के दबाव में नहीं आता है, अपनी पहचान के साथ खड़ा रहता है, सर नहीं झुकाता। चमक-दमक भरे इस ‘बाजारू’ समय का एक तरह से क्रिटीक है गंगा ढाबा।
जेएनयू में गंगा ढाबा  का होना आश्वस्तिदायक है। वो कहता है कि तुम आओ, मैं हूँ और वहीँ मिलूंगा। बना रहे, बचा रहे गंगा ढाबा।

sandeep singhसंदीप सिंह जेएनयू  छात्रसंघ के अध्यक्ष  और छात्र संगठन आइसा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके हैं . आजकल अध्ययन-चिंतन  में निमग्न हैं . उनसे संपर्क जरिया उनका गुल्लक , sandeep.gullak@gmail.com है. 

पोलिश मिथक और अधमताएँ: तत्याना षुर्लेई

पोलैंड में तत्याना की ख्याति भारत-विज्ञ के साथ-साथ फिल्म-आलोचक के रूप में है। वे बॉलीवुड की फिल्मों को पैशन के साथ देखती हैं । उनके शोध-विषय का एक हिस्सा बॉलीवुड के साथ जुड़ा हुआ है। उनके द्वारा मूल रूप से हिन्दी में लिखे गए पूर्व प्रकाशित लेख भी बॉलीवुड-भारतीय सिनेमा से ही संदर्भित रहे हैं । हमने उनसे आग्रह किया कि पोलिश सिनेमा के बारे में भी कुछ नयी जानकारियाँ हिन्दी के पाठकों को मिलनी चाहिए । तत्याना का यह लेख इसी आग्रह की पहली कड़ी है। यह लेख दो हिस्सों में विभक्त है । पहला हिस्सा पोलिश सिनेमा के पृष्ठभूमि को संक्षेप में सारगर्भित तरीके से स्पष्ट करता है और दूसरा पोलैंड के एक महत्वपूर्ण समकालीन फिल्मकार वोइचेह स्मजोव्स्कि की फिल्मों को विश्लेषित करता है ।

अपनी समस्याओं के जिम्मेवार तत्व के रूप में अक्सर रूस और जर्मनी और आस्ट्रिया आदि को चिन्हित करना, विश्वयुद्धों की विभिषकाओं को अपनी त्रासदियों का उत्स मानना, अधिकतर पोलिश सिनेमा के विषय-व्यवहार का हिस्सा रहा है । इसके चलते पोलिश फिल्मों में जो विविधता परिलक्षित होनी चाहिये थी, वह नहीं हो पायी । एकरसता मानों स्थायी भाव सा हो गया था । वोइचेह स्मजोविस्क की फिल्में उस एकरसता को भंग करती हैं ।

कैथोलिक चर्च के प्रभामंडल में सबसे ज्यादा आलोकित होने वाले देशों में मुख्यत: चार को उद्धृत  किया जा सकता है : इटली, स्पेन, आयरलैंड और पोलैंड । इटली पूरी तरह से और स्पेन लगभग चर्च के प्रभावशाली दुर्ग से बाहर निकल चुका है । आयरलैंड और पोलैंड अभी भी सबसे मजबूत दुर्ग के बतौर विद्यमान हैं, ये दोनों देश कहीं न कहीं जनांदोलन के भी केन्द्र रहे हैं । पोलैंड जहाँ तथाकथित कम्युनिस्ट अधिकृत शासन-व्यवस्था के विरूद्ध संघर्षरत रहा है वहीं आयरलैंड पूंजीवादी राय-व्यवस्था के प्रतिनिधि ग्रेट ब्रिटेन के विरूद्ध। विडंबना यह है कि आंदोलन के इन दोनों पहलुओं की निष्पत्ति सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवहारों में कैथोलिक चर्च के प्रभुत्व के रूप में हुयी । चर्च के इस प्रभुत्व का असर पोलिश सिनेमा पर भी होना तय ही था, जिसके परिणामस्वरूप पोलिश फिल्मों में एक अध्यात्मिक माहौल का रचाव दिखता है, परम्परा और धार्मिक-संस्कार अनुष्ठानों का महिमा गान भी परिलक्षित होता है। वोइचेह स्मजोव्स्कि शायद पहला पोलिश निदेशक होगा जिसने पोलैंड में रहते हुए बहुत ही सफाई के साथ पोलिश-समाज की आत्मलोचना को दृश्यांकित किया है । फिल्मकार वेलरियन ब्रौव्चेक की याद आती है जो पचास के दशक में ही सीधे-सीधे चर्च से भिड़ गया था और जल्द ही निर्वासित होकर फ्रांस चला गया था । तत्याना ने बहुत ही विस्तार से उपर्युक्त सन्दर्भ-बिन्दुओं को विश्लेषित किया है ।

By तत्याना षुर्लेई

वोइचेह स्मजोव्स्कि (Wojciech Smarzowski) की फ़िल्मों में पोलिश मिथक और अधमताएँ

भारत-प्रवास के समय बहुत लोग मुझसे पोलिश सिनेमा और उसके निर्देशकों के बारे में पूछ रहे थे। इस कारण मैंने सोचा कि शायद यह विषय गैर पोलिश लोगों के लिए सचमुच दिलचस्प हो सकता है। पोलिश सिनेमा को समझना आसान नहीं है क्योंकि इसके लिए पोलैंड के बारे में थोड़ी सी जानकारी की ज़रूरत है। दूसरे महायुद्ध के बाद पोलिश सिनेमा जो युद्ध से पहले बहुत अच्छा था, बिलकुल ध्वस्त हो गया और स्टालिन की मौत तक अधिकांश फ़िल्में प्रचार (Propaganda) के लिए बनाई जाती थीं। 1953 के बाद फ़िल्मों के ऊपर नियन्त्रण (Censorship) थोड़ा कम हो गया जिसके कारण पोलिश सिनेमा अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोहों में जा पहुंची। इसी समय में पोलिश फ़िल्म स्कूल नाम की एक संस्था बनी। इस संस्था की फ़िल्मों के मुख्य विषय होते थे – युद्ध की घातक यादें, और इसके दो रूप थे: एक बहुत विलक्षण और वीरतापूर्ण जैसे अंजेई वइदा (Andrzej Wajda) की फ़िल्मों में और दुसरा, ज़्यादा कठोर और अवसादात्मक, जो कि अंजेई मुँक (Andrzej Munk) की फिल्मों में उपलब्ध है। येजि कवालेरोविच (Jerzy Kawalerowicz), कज़िम्येष कुत्स (Kazimierz Kutz), तदेउष कोन्वित्स्कि (Tadeusz Konwicki) और वोइचेह येजी हस (Wojciech Jerzy Has) पोलिश फ़िल्म स्कूल के दूसरे अन्य बहुत अच्छे निर्देशक थे। कुछ ऐसे भी निर्देशक थे जो पोलिश फ़िल्म स्कूल से संबंधित नहीं थे लेकिन वे भी दिलचस्प और प्रसिद्ध हैं जैसे: चेसुअव पेतेल्स्कि (Czesław Petelski), तदेउष ह्म्येलेव्स्कि (Tadeusz Chmielewski) और विदेशों में ज़्यादा मशहूर: रोमन पोलञ्स्कि (Roman Polański) और येजि स्कोलिमोव्स्कि (Jerzy Skolimowski).

60 और 70 के दशक में पोलिश फ़िल्म स्कूल की प्रासंगिकता धीरे-धीरे खत्म होनेवाली थी क्योंकि दूसरे महायुद्ध का ज़माना और उस समय की अवसादात्मक यादें पुरानी बात हो गई थी। आधुनिक समय इन सबसे ज़्यादा दिलचस्प लगने लगा था क्योंकि इस समय में भी बहुत सारी महत्त्वपूर्ण घटनाएँ घट रही थीं। अफ़सोस की बात यह है कि 1968 के बाद फिल्मों पर नियन्त्रण फ़िर से तीखा हो गया। इस साल में कज़िम्येष देइमेक (Kazimierz Dejmek) के निर्देशन वाले अदम मित्स्क्येविच (Adam Mickiewicz) के नाटक को पूर्वजों के त्योहार (Dziady) के पहले दिन ही नाट्यशालों में रोक दिया गया। पोलैंड के सारे विद्यार्थियों ने बड़े शहरों के सड़कों पर इस फैसले का विरोध किया। यह नाटक पोलिश संस्कृति के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है। मित्स्क्येविच ने इसे तब लिखा जब पोलैंड का बंटवारा किया गया। 1772, 1793 और 1795 में तीन बार पोलैंड का विभाजन हो चुका था और देश का एक हिस्सा रूस, दूसरा प्रशिया और तीसरा ऑस्ट्रीया के पास चला गया। रूस और प्रशिया पोलिश संस्कृति और भाषा को नष्ट करना चाहते थे जबकि ऑस्ट्रीया वाले हिस्से में जीवन इतना मुश्किल नहीं था और वहाँ कला का विकास संभव था। अदम मित्स्क्येविच का नाटक रूस के विरोध में है इसलिए 1968 में उसको दिखाना साम्यवादी सरकार को अच्छा नहीं लगा। विद्यार्थियों के प्रतिवादों के बाद सिनेमा की स्थिति फ़िर से मुश्किल हो गई और इसके कारण स्कोलिमोव्स्कि, पोलञ्स्कि और फ़ोर्द (Ford) पोलैंड को छोड़कर विदेश चले गये। इसी समय ऐतिहासिक सिनेमा प्रसिद्ध हो गया क्योंकि अतीत में घटित राजनीति वर्तमान को बहुत ज्यादा प्रभावित नहीं करती थी और ऐसी फ़िल्में सरकार के लिए कुशल भी थीं। इस समय में भी ऐसे निर्देशक अवश्य थे जिनकी फ़िल्में आधुनिक घटनाओं पर आधारित थीं, लेकिन ज़्यादा नहीं। इस समय में ऐसी फ़िल्में भी बनाई गईं जो रूस की सेना के दृष्टिकोण से अपनी कहानी कह जाती थीं।

70 और 80 के दशक के बीच के सिनेमा को सात्विक उत्सुकता का सिनेमा कह सकते हैं, जो कि पोलैंड के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। अंजेई वइदा इस दौर का भी बहुत महत्त्वपूर्ण निर्देशक था और उसके अलावा क्षिष्तोफ़ ज़नुस्सी (Krzysztof Zanussi), क्षिष्तोफ़ क्येश्लोव्स्कि (Krzysztof Kieślowski), फ़ेलिक्स फ़ल्क (Feliks Falk), फ़िलिप बयोन (Filip Bajon) और अग्ञेष्का होलांद (Agnieszka Holland)। इस समय जो फ़िल्में बनाई जाती थीं वे बहुत दुःखद और कठोर थीं इसलिए इनमें से ज़्यादातर को दिखाना उस समय में मना था। कान (Cannes) में ग्रैंड प्रिक्स जीतने वाली पहली पोलिश फिल्म को भी पोलैंड में कोई नहीं देख सकता था। ऐसी स्थितियों में पोलिश सिनेमा फ़िर से बिखर गया। कुछ निर्देशकों ने, जैसे अग्ञेष्का होलांद, पोलैंड छोड़ने का निश्चय किया। इस समय पोलैंड में प्रहसन और भावोत्तेजक फ़िल्में बनाई गईं क्योंकि इनमें तात्कालिक राजनीति की ज़रूरत नहीं थी। उन फ़िल्मों के मूल विषय धार्मिक-सांस्कृतिक रिवाज थे, जो आज भी बहुत प्रचलित प्रसंग है।

90 के दशक में फ़िल्मों के आर्थिक प्रबन्ध का तरीका बदल गया और पैसा देनेवाले अन्य स्रोत उपलब्ध नहीं थे । इस समय में बहुत ऐसी फ़िल्में बनीं जिनका विषय साम्यवाद और सैनिक कानून से संबंधित था और जो अपने समय की अलोचना प्रस्तुत करती थीं। कुछ ऐसे निर्देशक भी थे जिनके लिए राजनीति महत्त्वपूर्ण नहीं था लेकिन उनकी फ़िल्में शानदार हैं; जैसे यन यकुब कोल्स्कि (Jan Jakub Kolski) की फ़िल्में, जो भारत में भी काफ़ी लोकप्रिय हैं और अंजेई कोन्द्रत्युक (Andrzej Kondratiuk) की। उस समय में की फ़िल्में बहुत ही कठोर और निराशा भरी वास्तविकता को दिखाते हैं और जिनमें पोलैंड का चित्रण अच्छा नहीं है। उन फ़िल्मों में पोलैंड एक ऐसा देश है जो नयी जनतन्त्रीय रीति के लिए तैयार नहीं है और जहां ह्रासोन्मुख प्रवृतियाँ और अपराध हुकुमत करता है।

21 शताब्दी की शुरु में भी पोलिश सिनेमा के लिए बहुत अच्छा समय नहीं था क्योंकि ज़्यादातर फ़िल्में पोलिश साहित्य पर आधारित थीं। स्कूल में हर बच्चे को जिन किताबों को पढ़नी चाहिए थीं, उन सब पर फ़िल्में बन गईं और मज़ाक में लोग कहने लगे थे कि अब तो स्कूल के बच्चे न किताबें पढ़ते हैं न अच्छी फ़िल्में देखते हैं। कभी-कभी अच्छी फ़िल्में भी जरूर बनाई जाती थीं लेकिन वे भी खराब फ़िल्मों में डूब जाती थीं। 2005 में पोलिश फ़िल्मों का एक संस्थान बन गया जो कलात्मक फ़िल्में बनानेवालों को आर्थिक मदद देता है और जिसकी मदद से आजकल अच्छी फ़िल्में बनाई जाती हैं। मैं एक आधुनिक निर्देशक के बारे में कुछ लिखना चाहती हूँ जिसका नाम वोइचेह स्मजोव्स्कि है क्योंकि वह मुझे बहुत ही दिलचस्प लगता है। स्मजोव्स्कि बहुत अच्छी तरह से उस रीति का पालन करता है जिसमें इतिहास का मूल्यांकन संभव है और यह सब पोलैंड के लिए प्रतीकात्मक है, साथ ही साथ उसकी फ़िल्में बहुत ही ज्याद निष्ठुर और निराशावादी हैं जो कि एक नयी बात है। निराशावादी होना पोलिश सिनेमा में कोई नयी बात नहीं है लेकिन स्मजोव्स्कि की फ़िल्मों में किसी भी तरह की आशा नहीं है। स्मजोव्स्कि पोलैंड की सारी राष्ट्रीय पवित्र बातें और वर्जनाएँ दिखाता है और उनकी बहुत गहरी अलोचना करता है और इस कारण उसकी फ़िल्मों का असर बहुत तेज़ है। उसकी फ़िल्मों को अच्छी तरह समझने के लिए सब से पहले पोलिश लोकाचार को समझना चाहिए। पोलिश संस्कृति में कुछ बहुत ही बड़े घाव/निशान हैं जो साम्यवाद, युद्ध और बंटवारे से संबंधित हैं और जिनको हमेशा याद रखना चाहिए क्योंकि ये तत्व पोलिश संस्कृति के आधार हैं।

स्मजोव्स्कि की पहली फ़िल्म 1998 की है और इसका नाम है – बहिकर्ण (Małżowina) है। यह फ़िल्म एक कवि की रचनात्मक कमजोरी के बारे में है। फ़िल्म के नायक का नाम म. है और वह एक लेखक है जो किताब लिखने के लिए क्राकोव शहर (Kraków) के एक पुरानी इमारत में एक कमरा किराये पर लेता है। अफ़सोस की बात यह है कि यहाँ उसका लिख पाना असंभव है क्योंकि आसपास हमेशा कुछ ऐसा होता है जिससे वह परेशान हो जाता है। सब से बड़ी परेशानी पड़ोसियों के द्वारा खड़ी की जाती है, क्योंकि पति के शराब पीने के कारण पति-पत्नी रोज़ लड़ाई करते हैं। म. के पड़ोसी इतने आततायी हैं कि वह इस समस्या का समाधान कड़ाई से करता है। यह फ़िल्म नाटक की शैली में बनाई गई है इसलिए पूरी कहानी एक छोटे कमरे में चल रही है। फ़िल्म के नायक के अंधेरे, गंदे कमरे में दोस्त, लेनदार, मालकीन, पड़ोसी और अंत में पुलिस आते हैं। लेकिन इन सब लोगों के बावजूद फ़िल्म देखनेवालों को लगता है कि बहिकर्ण, जिसका नाम फ्रैंज काफ्का (Franz Kafka) की डायरी 1910-1923 के अवतरण से लिया गया है, के नायक ने न सिर्फ़ अपने पड़ोसियों को ईज़ाद किया बल्कि अपने पूरे अपराध को भी। चूँकि, परेशान करनेवाले लोग उसके दिमाग में घर कर गए लोग लगते हैं। इस फ़िल्म का मूल विषय कलाकर की ज़िम्मेदारी है और कलाकर का काम चरित्र और घटनाओं को उत्पन्न करने जैसा है, वह जन्मदाता है। किताबों, कविताओं, संगीत या तस्वीरों में जो लोग आते हैं वे अपना जीवन जी रहे हैं इसलिए हर कलाकर को उनके बारे में सोचना चाहिए और हर की ज़िम्मेदारी स्वयं कलाकार की ज़िम्मेदारी है। स्मजोव्स्कि की फ़िल्म एक दूसरी फ़िल्म, मार्क फोर्स्टर (Mark Forster) की स्ट्रैन्जर दैन फिक्शन (2006) से मिलती-जुलती है, और जिसका नायक एक दिन में समझता है कि वह वास्तविक आदमी नहीं है, सिर्फ़ एक किताब का नायक जिसे एक लेखिका ने अविष्कृत किया है। हालांकि बहिकर्ण में कष्टदायी पड़ोसियों का होना या न होना इतना स्पष्ट नहीं है लेकिन जब अंत में फ़िल्म का नायक अपने टंकण मशीन को फेंक देता है तो इसका मतलब यह हो सकता है कि उसने प्रतीकात्मक रूप में सचमुच अपने कल्पनाशील पड़ोसियों को मार दिया या ऐसा ही कुछ।

म. के चरित्र का अभिनय कोई पेशेवर अभिनेता नहीं करता है; इस भूमिका को मर्चिन श्व्येत्लित्स्कि (Marcin Świetlicki) ने किया और यह फ़िल्म के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण व्यक्ति है, क्योंकि पोलिश संस्कृति में श्व्येत्लित्स्कि का योगदान बहुत ही महत्वपूर्ण है। मर्चिन श्व्येत्लित्स्कि लेखक और कवि है जिसका काम क्राकोव शहर से संबंधित है। क्राकोव पोलिश संस्कृति का केन्द्र है और वह 1795 तक पोलैंड की राजधानी थी। बाद में, बंटवारे के समय जब पोलैंड 123 सालों के लिए यूरोप से गायब हो गया; क्राकोव में, जो ऑस्ट्रीया का हिस्सा था, पोलिश संस्कृति का सब से ज्यादा विकास हुआ क्योंकि, जैसा कि मैंने ज़िक्र किया था, यह राज्य दूसरे दोनों राज्यों से ज्यादा उदार था। फिर भी, मर्चिन श्व्येत्लित्स्कि का क्राकोव बिलकुल अलग शहर है, जिसमें बहादुरी के लिए स्थान नहीं है, और वह कवि अक्सर राष्ट्रीय मिथकों और भक्तिभावना से परिपूर्ण रचनाओं की हंसी उड़ाता है। भूमिगत और साम्यवाद-विरोधी संस्थाओं से संबंध के बावजूद वह सोचता है कि सही और अच्छी कविता को हमेशा रीति-रिवाजों-परिपाटी के विरुद्ध होना चाहिए। हर तरह के रिवाज और किसी भी तरह के कानून के विरुद्ध। अपनी एक प्रसिद्ध कविता में, जिसका नाम यान पोल्कोव्स्कि के लिए है, उसने लिखा कि भक्तिभावना की रचनाएँ गुलाम की कविता है जिसके हर वृक्ष के अंदर काँटेदार तारों से बने होली क्रॉस (ईसाई धर्म-चिन्ह) छिपे होते हैं।

फ़िल्म का नायक विद्रोही कलाकर है और फिल्म में इस बात पर ज़ोर दिया गया है। जब फ़िल्म के एक प्रसंग में म. की सहेली कहती है कि अंजेई बुर्सा (Andrzej Bursa) उसके टाइपराइटर का इस्तेमाल करता था। अंजेई बुर्सा एक जवान विद्रोही कवि था। उसकी कविताओं में बहुत ही ज्यादा निराशा का माहौल था और जो अक्सर पाठकों को झटका देती थीं। क्राकोव भी, जो पोलैंड की संस्कृति का केन्द्र है इस फ़िल्म में अनजान शहर लगता है, पर्यटकों के चहेते-सुंदर स्थान से बिलकुल अलग। लगता है कि फ़िल्म के शहर में सिर्फ़ गंदे पिछवाड़े के अहाते और छोटे अँधेरे कमरे हैं और वहाँ रहनेवाले लोग सिर्फ़ वोदका और सिगरेट पीते हैं। एकरंगा दृश्य और अनाड़ी कैमरे के इस्तेमाल से फ़िल्म ज़्यादा ही निराशात्मक लगती है और यह वोइचेह स्मजोव्स्कि फिल्मों की एक लाक्षणिक विशेषता है।

निर्देशक की दूसरी फ़िल्म का नाम शादी (Wesele) है। यह फ़िल्म 2004 की है। यह फ़िल्म थोड़ी सी अलग है और दूसरे आगामी फिल्मों की तुलना में आशावादी। फ़िल्म की कहानी दक्षिण पूर्व पोलैंड में रहने वाले एक अमीर व्यापारी की बेटी की शादी के बारे में है। गाँव की शादी धुमधाम से चल रही है। जबकि दुल्हन पहले से ही गर्भवती है। गर्भवती दुल्हन से जो बच्चा होगा उसका ‘असली’ पिता विश्वविद्यालय में लड़की का दोस्त था। इसीलिए, दुल्हन का पिता गाँव में रहनेवाले एक लड़के को शादी करने के लिए रिश्वत देता है क्योंकि बिना शादी के बच्चा पैदा करना छोटे पोलिश गाँवों में आज भी बड़ी शर्म की बात है। शादी की रिश्वत जर्मनी से लायी गई एक बहुत महंगी गाड़ी है। लेकिन जल्दी ही यह पता चलता है कि गाड़ी चोरी हो गई है, जो कि पोलैंड में अक्सर ही होता है। जिन डाकुओं ने गाड़ी की चोरी की है, वे पैसे के अलावा ज़मीन भी चाहते हैं, जिसके मालिक दुल्हन के नाना जी हैं। बुढ़ा आदमी अपना ज़मीन किसी को देना नहीं चाहता है। डाकू व्यापारी की उँगली को काट देते हैं। इसके अलावा दुल्हन के बच्चे का बाप यानी दुल्हन के विश्वविद्यालय वाला दोस्त भी शादी में आता है। मेहमानों के पेट खराब हो जाते हैं क्योंकि व्यापारी ने गाँव के नज़दीकवाले शहर सनोक से सस्ता और बासी माँस खरीदा। नाना जी मर जाते हैं। अनुपयोगी पुलिस गाड़ी के नकली कागजात बनाते हैं। एक वकील जो व्यापारी का दोस्त है, प्रलोभन में आ जाता है और ज़मीन को अपने नाम हस्तांतरित करवा लेता है। फ़िल्म के अंत में व्यापारी के सारे गंदे कारनामों की पोल खुलती है। उसकी बेटी और पत्नी उसको छोड़ देती है।

शादी ऐसा नाम है जो पोलिश दर्शकों के लिए महत्त्वपूर्ण है और उनको आकर्षित करता है। क्योंकि, यह पोलैंड के राष्ट्रीय नाटक का नाम भी है जिसे स्तञिसुअव विस्प्याञ्स्कि (Stanisław Wyspiański) ने लिखा और जिसे 1901 में पहली बार दिखाया गया। विस्प्याञ्स्कि लेखक होने के अलावा मशहूर चित्रकार भी था। उसने अपना नाटक तब लिखा जब पोलैंड आज़ाद देश नहीं था। यह नाटक क्राकोव के पास एक गाँव में शादी के बारे में है। जहाँ गाँव में रहनेवाले मेहमानों के अलावा वे ऐतिहासिक व्यक्ति भी आते हैं जिनका पोलिश संस्कृति से बड़ा संबंध है। वे लोग मेहमानों को लड़ाई के लिए उत्तेजित करने की कोशिश करते हैं लेकिन उनकी चेष्टा असफल हो रही है। नाटक में जमींदार लोगों के हत्याकांड का संदर्भ है जिसे 1846 में ऑस्ट्रिया के हिस्से में रहते हुए गाँववालों ने अंजाम दिया था। ऑस्ट्रिया की सरकार को पोलिश लोगों की बगावत से डर था इसलिए उसने गाँववालों को बताया कि अमीर लोग उनको मार देना चाहते हैं। यह सब सुनकर गाँववालों ने अपने जमींदारों को मार दिया। विस्प्याञ्स्कि के नाटक में यह बात स्पष्ट है कि देशी जमींदारों और उनकी प्रजा के बीच समझौते-साझेदारी के बिना पोलैंड अपनी अज़ादी के लिए कभी लड़ाई नहीं कर सकेगा। गाँव की शादी में वेर्निहोड़ा नाम का एक भविष्यवक्ता आता है। कहावत है कि पोलैंड के बंटवारे और आज़ादी की भविष्यवाणी उसी की है। विस्प्याञ्स्कि का वेर्निहोड़ा गाँववालों को सोने का रण-सिंगा (युद्ध में बजने वाला वाद्ययंत्र) देता है, जिसमें पुरे देश को लड़ाई के लिए बुलाने की शक्ति है। अफ़सोस की बात यह है कि रण-सिंगा को एक जवान लड़का लेता है जिसका नाम यशेक है और वह थोड़ा सा चंचल है। यशेक रण-सिंगा के बारे में ज़्यादा नहीं सोचता है क्योंकि उसके लिए क्राकोव की अपनी परम्परागत, सुंदर लाल टोपी (फ़ोटो 1), जिसमें मोर के पंख हैं और जिसे उसने शादी के लिए बनवाया है, ज़्यादा महत्त्वहूर्ण है।

फ़ोटो 1.

फ़ोटो 1.

सोने का रण-सिंगा हमेशा के लिए खो जाता है। शादी के मेहमान किसी कठपुतली की तरह नाच में मतिभ्रमित हैं, व्यस्त हैं और अपने देश के बारे में नहीं सोचते हैं। शादी में पुआल की एक मूर्ति भी आती है। उस मूर्ति का रूप-आकार वैसा ही है, जैसे सर्दी के मौसम में गुलाब के पौधे को ठंड से बचाने उसमें पुआल लपेट दिया गया हो और विस्प्याञ्स्कि ने जिसका एक चित्र भी बनाया (फ़ोटो 2)। नाटक में, पुआल वाली मूर्ति गाँववालों के लिए संगीत बजाती है।

फ़ोटो 2.

फ़ोटो 2.

विस्प्याञ्स्कि का नाटक- शादी फ़िल्म के लिए बहुत ही अनुकूल विषय बन गया और जिसे अंजेई वइदा ने 1972 में चित्रित किया। स्मजोव्स्कि की फ़िल्म नाटक पर आधारित नहीं है लेकिन यहाँ भी, बिलकुल अलग कहानी होने के बावजूद बहुत ऐसे अंश हैं जो राष्ट्रीय नाटक से संबंधित हैं। फ़िल्म की कहानी आधुनिक समय में चलती है, जब पोलैंड न सिर्फ़ साम्यवाद से बाहर आया बल्कि यूरोपीय संघ का सदस्य भी बन गया। दुल्हन का बाप एक ठेठ निष्ठुर कारोबारी है जिसको मुक्त बाज़ार के लेनदेन की मदद से इतना पैसा मिला कि वह गाँव का सब से अमीर आदमी हो गया है। अपनी धन-दौलत और नई पहचान के बावजूद वह आदमी मानसिक रूप से पुराने ज़माने के परम्परागत पोलिश समाज के अनुसार सोचता है, इसलिए उसके लिए सब से महत्त्वपूर्ण बात दिखावट है और उसकी बेटी बिना शादी बच्चा पैदा नहीं कर सकती है। उसके लिए बेटी की खुशी महत्त्वपूर्ण नहीं है, क्योंकि सबसे विशिष्ट बात यह है कि पड़ोसियों और गाँव के पुजारी उसके परिवार के बारे में क्या राय रखते हैं। उसे प्रतिष्ठा खोने का डर इतना बड़ा है कि वह हर व्यक्ति को पैसे देने के लिए तैयार है ताकि प्रतिष्ठा पर आंच न आये। यह व्यवहार इसका अच्छा उदाहरण है कि राजनीतिक व्यवस्था बदलने के बावजूद पोलिश गाँवों में आज भी पैसे और वोदका के बदले सब कुछ करवाना संभव है। यह बात विस्प्याञ्स्कि के नाटक से मिलती-जूलती है क्योंकि पुराने शादी में सब लोग आज़ादी के लिए लड़ाई कर नहीं सकते थे और स्मजोव्स्कि के नायक सिर्फ़ सोचते हैं कि उनको आज़ादी मिल गई। स्वतन्त्रता और राष्ट्रीय आदर्श केवल प्रचार-वाक्य हैं जिसका कोई अर्थ नहीं है और जिसे सिर्फ़ नशे में गाया जा रहा है। एक क्षण में शादी के शराबी मेहमान प्रसिद्ध स्वदेशानुरागपूरित गाना गाते हैं जो कि पोलिश संस्कृति के एक लाक्षणिक व्यवहार के रूप व्यंजित हो चुका है। गाने में सोने के रण-सिंगा और उसके आह्वान के इंतज़ार का संदर्भ है। आह्वान के इंतज़ार के बारे में नशे की हालत में गाते सभी मेहमान ऐसे लगते हैं मानो नाटक के ही पात्रों को चरितार्थ कर रहे हों। फ़िल्म में भी विस्प्याञ्स्कि की प्रसिद्ध तस्वीर (फ़ोटो 3) दिखाई गई जो इसका सबूत हो सकता है कि स्मजोव्स्कि नाटक से बहुत अभिप्रेरित था और अपने दर्शकों को यह बताना चाहता है कि उसकी शादी ज़्यादा स्वतंत्र फ़िल्म नहीं है और उसे नाटक से जोड़ना चाहिए (फ़ोटो 4)। फ़िल्म के अंत में वोइचेह कुचोक (Wojciech Kuczok) के गोबर (Gnój) नाम के उपन्यास को प्रेरणास्रोत के बतौर दिखाया गया है जिसके अंत में सब कुछ गोबर में डूब जाता है और दुख स्मृतियों का नाश करता है।

फ़ोटो 3.

फ़ोटो 3.

फ़ोटो 4.

फ़ोटो 4.

स्मजोव्स्कि की फ़िल्म में सब लोग गोबर में नहीं फँसते हैं। लेकिन, यहाँ जो शौचालय की बदइंतजामी है, यह भी बड़ा संकेत है। बाहर में जो निकालते हैं वे भी परिवार और राष्ट्र की सारी गंदगी से ही संबंधित हैं क्योंकि वे बहुत बुरी तरह और अचानक शादी के समय में ही बाहर निकलते हैं। इस फ़िल्म में भी स्मजोव्स्कि अनाड़ी कैमरे का इस्तेमाल करता है क्योंकि शादी में फोटोग्राफर उपस्थित है। अनजाने में ही इस फोटोग्राफर की फ़िल्म में बहुत सारे धोखेबाज़ उसके फिल्म में रेकॉर्ड हो जाते हैं और दुल्हन को पता चलता है कि उसका पति उससे नहीं, गाड़ी से प्यार करता है और इसीलिए उसने यह शादी की है। नाना जी की ज़मीन के बारे में भी सच निकलता है और दुल्हन को यह भी पता चलता है कि ज़मीन इतनी महंगी इसलिए है क्योंकि वहाँ यूरोपीय संघ के पैसों के मदद से राजमार्ग बन जाएगा। शादी इतनी कठोर फ़िल्म नहीं, ज़्यादा व्यंग्यपूर्ण है। लेकिन राष्ट्रीय नाटक से स्पष्ट संबंध होने के कारण पोलिश संस्कृति के लिए बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। साथ ही साथ इसको कुशलतापूर्वक आधुनिक समय में डालना स्टीरियोटाइप्ड पोलैंड का बहुत अच्छा चित्रण है।

स्मजोव्स्कि की तीसरी फ़िल्म का नाम डार्क हाउस (Dom zły) है और यह 2009 की है। यह बहुत ही डार्क (Dark) कहानी है जो 1982 के दक्षिणी पोलैंड के पहाड़ों में चलती है। कहानी साम्यवादी पोलैंड के ज़माने की है। वर्णन के दो स्तर हैं: एक अपराध के स्थान के निरीक्षण की प्रक्रिया है, और दुसरा, एक अवलोकन जिसके मदद से दर्शक देख सकता है कि क्या हुआ। अपराध एक छोटे घर में हुआ है जहाँ नागरिक सेना (Peoples Army) आती है, संदिग्ध अपराधी के साथ। फ़िल्म का नायक जिसका नाम एद्वर्द श्रोदोञ है। वह काम करने के लिए पहाड़ों में आया है और एक रात तेज़ बारिश में फंस कर एक दम्पति के पास पहुँच जाता है। वे लोग उसको रात को सोने के लिए अपने यहाँ शरण देते हैं और साथ में खाने-पीने का दौर चलता है। पास ही चीनी का एक करखाना है जहाँ एडवर्ड को काम मिल जाता है। उसके पहले वहाँ एक और आदमी काम करता था जिसके बारे में ज्यादा कुछ मालूम नहीं पड़ता है। आसपास के लोग कहते हैं कि उस आदमी को कारखाने के वैसे बहुत सारे बड़े भ्रष्ट लोगों के बारे में पता था, जो बड़े-बड़े भ्रष्टाचार में लिप्त थे। जब वह इन सब चीजों के बारे में लोगों को बताने लगा, तुरंत लापता हो गया। एडवर्ड को शरण देने वाले दंपति का मानना है कि यह दुर्घटना कारखाने में काम करने वालों के लिए कोई अप्रत्याशित घटना नहीं थी क्योंकि उसकी मृत्यु करखाने में चोरी करनेवालों के लिए फायदेमंद थी। घर का मालिक और उसका मेहमान शराब पीकर बहुत ही दिलचस्प बात करते हैं। घर में रहनेवाले आदमी की पहली पत्नी का एक बेटा है, जो अक्सर पूरे रात के लिए कहीं जाता है। बेटा बहुत बड़ा शराबी है और अपने पिता का बहुत सारा पैसा शराब पर खर्च करता है। अलग-अलग बातों के बारे में बतियाते हुए दोनों आदमी निश्चय करते हैं कि वे दोनों साथ-साथ काम करेंगे और घर में वोदका बनाकर स्थानीय लोगों को बेचेंगे। घर का मालिक एद्वर्द को अपना पैसा दिखाता है और यह देखकर एद्वर्द भी, जो नशे में है, उसको कहता है कि उसके पास भी बहुत पैसा है। बाद में एद्वर्द नागरिक सेना वालों को कहता है कि घर का मालिक उसके पैसे को देखने के बाद उसको मार देना चाहता था, पैसों को चुराने के लिए। मालिक का पागलपन कुछ ज्यादा ही बढ़ता जा रहा है और एडवर्ड वहाँ से भगता है। लगता है कि सारे नागरिक सेना वाले अभियुक्त की कहानी पर विश्वास नहीं करते हैं लेकिन उनमें से एक प्रतिनिधि जिसका नाम म्रुज़ है, इस मामले की जाँच अच्छी तरह करना चाहता है। सब से पहले वह चीनी के कारखाने के बारे में सोचता है और उसको वे दस्तावेज मिलते हैं, जो गाँव के पूजारी के पास थे, जिनमें इस बात सबूत है कि जो एडवर्ड और गाँववालों ने कहा वह सब कुछ सच है। म्रुज़ का काम पुरा हो नहीं सकता है क्योंकि इसी समय में अपराध के स्थान में शासक पार्टी का एक बड़ा नेता बार-बार आता है, जो म्रुज़ को बताता है कि सब लोगों के लिए यह अच्छा होगा कि वह इन जानकारियों को छुपाए क्योंकि इन सच्चाईयों को बताना उचित नहीं है। वह बड़ा नेता देख सकता है कि म्रुज़ को यह राय पसंद नहीं है इसलिए वह कुछ फ़ोटो दिखाकर, जो विवाहित औरत के साथ म्रुज़ के प्रेम सम्बन्ध के सबूत हैं, उसको ब्लैकमेल करना चाहता है। फ़ोटो देखने के बावजूद म्रुज़ कारखाने के बारे में भूलना नहीं चाहता है लेकिन ये हालात उसके लिए बहुत ही तकलीफ़देह है और वह भी दूसरों की तरह शराब पीने लगता है, जिनको इस सुनसान और सर्दी के मौसम में काम करना चाहिए (फ़ोटो 5)।

फ़ोटो 5.

फ़ोटो 5.

फ़िल्म के अंत में दिखता है कि नागरिक सेनावाले अपराध-स्थल पर कैमरे से ‘फ़िल्म’ बनाते हैं, वे म्रुज़ के लाश के पास भयभीत खड़े हुए एडवर्ड का फ़ोटो खिंचते हैं और इस तरह पूरी जांच-पड़ताल सम्पन्न होती है (फ़ोटो 6)। इसका मतलब यह हुआ कि अब पार्टी के नेता/जनप्रतिनिधि कुछ नहीं बोलेगा क्योंकि उनके पास पहले से ही एक अभियुक्त आदमी है, जिसके ऊपर एक और अपराध का दोषारोपण बड़ी समस्या नहीं होगी।

फ़ोटो 6.

फ़ोटो 6.

यह फ़िल्म शायद पोलिश की सबसे अधिक निराशाजनक और डार्क फ़िल्मों में से एक है और एक चौंकानेवाली फ़िल्म जिसे एक बार देखने के बाद दुबारा देखने की इच्छा नहीं होती है। फ़िल्म जहां अपने बहुत ही अच्छे स्क्रिप्ट के कारण उत्तम है, वहीं इसके छायांकन (Cinematography) का पक्ष बहुत ही रूखा और भद्दा है जिसमें बर्फ़ के कारण सब से प्रमुख रंग सफ़ेद है। चमचमाते अपराध-स्थल और अंधेरे घर (जहां एडवर्ड दंपति के साथ रुका था) के बीच कैमरा आवाजाही करता है। अवलोकन के दृश्यों का रंग डार्क होने के बावजूद ज़्यादा स्नेही और मानवीय है और इस अंतर्विरोध को यह फिल्म अच्छी तरह दिखलाता है कि किसी एक क्षण में जीवन कितना बदल सकता है। एडवर्ड और घर में रहनेवाला परिवार दारू पीकर नाचते हैं, हंसते हैं और साथ साथ काम करना चाहते हैं लेकिन दर्शकों को पता है कि इस घर में अपराध होगा इसलिए मासूम उत्सवी माहौल के बावजूद वह जानता है कि कुछ अनहोनी होगी। यह शायद इसलिए क्योंकि वृद्ध पति में थोड़ा सा अवहेलना का भाव है और अपनी पत्नी को देखकर अनुमान लगाता है कि वह एडवर्ड को शायद पसंद है। इस फिल्म में भूगोल फ़िर से महत्त्वपूर्ण है। कहानी ब्येष्चादि (Bieszczady) नाम के पहाड़ों में चलती है और दक्षिण-पूर्व पोलैंड के छोटे छोटे पहाड़ वे खास जगह हैं जो हमेशा से देश का सब से जंगली हिस्सा रहा है। इस स्थान में खो जाना बहुत आसान है और यहाँ की घटनाओं के बारे में कोई कभी नहीं पूछता है। यहाँ अव्यवसायी/अनाड़ी कैमरे का इस्तेमाल भी दिलचस्प है, जिसके बारे में पहले ही कहा गया और जो निर्देशक के लिए खास बात है। हालाँकि स्मजोव्स्कि ऐसे कैमरे का इस्तेमाल अक्सर करता है, लेकिन यहाँ इसका मतलब थोड़ा अलग दिखता है। पहली दोनों फ़िल्मों में, खास तौर पर शादी में अनाड़ी कैमरे की मदद से सच का बखान किया गया था। यहाँ की स्थिति अलग है और डार्क हाउस में यह कैमरा झूठ बोलता है और नागरिक सेनावाले जानबुझकर नकली फ़ोटो खींचते हैं क्योंकि ऐसा ‘सच’ उनके लिए ज़्यादा सुविधाजनक है। वे अच्छी तरह जानते हैं कि उन्होंने अगर ऐसा नहीं किया तो शायद उनकी मौत भी हो सकती है। जबकि फरमाबरदारी के परिणाम अच्छे पुरस्कार होते हैं: किसी को समृद्धि मिल जाएगी, किसी को पैसा और एक आदमी विदेश जा सकेगा क्योंकि उसको पासपोर्ट मिल जाएगी।

फ़िल्म के नाम का घर देश की स्थिति का रूपकालंकार लगता है और जैसे साम्यवादी पोलैंड के समय में पुरा देश एक बड़ा पिंजरा था। जहाँ से भागना मुश्किल है और आप लाख चाह कर भी स्वतंत्रता और सच नहीं पा सकते हैं। धोखेबाजी और सच को छुपाना वे मूख्य चीज़ें हैं जिनकी फ़िल्मों में आलोचना होती है, जो साम्यवादी पोलैंड के बहुव्यापी लक्षण थे। फ़िर भी दिलचस्प बात यह है कि अपनी अंतीम फ़िल्म में स्मजोव्स्कि इसके बारे में फ़िर से कुछ बोलना चाहता है। 2013 की फ़िल्म का नाम यातायात-पुलिस (Drogówka) है और यह कहानी डार्क हाउस से बहुत मिलती-जुलती है। इस बार सारी घटनाएँ पोलांड की राजधानी, वार्सा (Warsaw) और माजूदा समय में चलती हैं। यह फ़िल्म पुलिस के बारे में है जो यातायात की बातों के विशेषज्ञ हैं। उन लोगों को किसी को सज़ा देने का अवसर अक्सर नहीं मिलता है क्योंकि जो भी गाड़ी-चालक कोई नियम तोड़ता है वह हमेशा किसी न किसी बड़े आदमी का नजदीकी निकलता है और एक फ़ोन की मदद से सज़ा से वंचित हो सकते हैं। इस खराब स्थिति के कारण असंतुष्ट पुलिसवाले सब से गरीब लोगों पर अपना गुस्सा निकालते हैं जिनके ऐसे प्रतापी दोस्त नहीं होते हैं।

एक दिन, पता नहीं क्यों एक पुलिसवाला मर जाता है और उसकी मौत का दोष उसके दोस्त पर डाला जाता है। फ़िल्म का नायक सब को दिखाना चाहता है कि उसने यह अपराध नहीं किया और सबूत खोजने की प्रक्रिया में वह एक बड़े भ्रष्ट अधिकारी को ढूंढ निकालता है। इस भ्रष्टाचार में सरकार के लिए काम करनेवाले लोग भी संलिप्त हैं और वे यूरोपीय संघ से राजमार्ग बनाने के लिए जो पैसा आता है, उसमें उलट-फेर करते हैं। यहाँ भी, जैसे पिछली फ़िल्म में नायक अपने पार्टी के बड़े नेता द्वारा ब्लैकमेल के प्रयास को अनसुना करता है और उससे नहीं डरता है इसलिए फ़िल्म के अंत में उसको मौत मिलती है । यातायात-पुलिस डार्क हाउस जैसी अच्छी फ़िल्म नहीं है, सम्भवतः इसलिए कि ऐसी कहानी एक बार बताई जा चुकी है। इसके अतिरिक्त यातायात-पुलिस का आलेख भी उतना अच्छा नहीं, ज़्यादा आसान है और नायक को फंसाने वाला षडयंत्र बिल्कुल ही आश्चर्यचकित नहीं करता है। इस फिल्म में शायद अश्लीलता ज़्यादा है और कैमरा इतना अनाड़ी है कि देखनेवालों को थका देते हैं। ऐसा होने पर भी दोनों फ़िल्मों के बारे में साथ साथ सोचना बहुत अच्छी बात है क्योंकि इसमें, दो शादियों (स्मजोव्स्कि की शादी नामक फिल्म और इसी नाम से स्तञिसुअव विस्प्याञ्स्कि का नाटक) में जैसे बहुत स्पष्ट है कि स्मजोव्स्कि द्वारा प्रस्तुत आलोचना सिर्फ़ समकालीन समय की आलोचना नहीं है। उसकी फिल्में दुसरे पोलिश फिल्मों के विपरित हैं और फिल्मों में प्रस्तुत आलोचना सभी के प्रति निष्ठुर है। फ़िल्म का निर्देशक एक और बार यह दिखाता है कि जैसे शादी के लोग जिनको सिर्फ़ लगता है कि वे स्वतंत्र हैं और वास्तव में वे पिंजड़े में रहते हैं, यातायात-पुलिस के लोगों में भी यही समस्या है, साम्यवाद और पूंजीवाद उनके लिए एक ही है और जो वे पहले करते थे, वही हमेशा करेंगे।

अंत में एक और फ़िल्म के बारे में ज़िक्र करना चाहिए जिसका नाम रोज़ा (Róża) है और जो यातायात-पुलिस से पहले, 2011 की है। इस बार स्मजोव्स्कि युद्ध के बारे में कुछ बताना चाहता है जो पोलिश सिनेमा के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है और जो अक्सर फ़िल्मों की विषय-वस्तु रही है। दूसरा महायुद्ध एक ऐसी बात है जिसके बारे में पोलैंड में रहनेवाला हर व्यक्ति बार-बार कुछ कह सकता है और कभी थकता भी नहीं है। अगर इन बतकहियों के दौरान थोड़ी सी शराब हो, जो कि अक्सर होता है, तब पोलिश लोग हमेशा खुद को युद्ध के विशेषज्ञ समझते हैं। ऐसी सारी बातें युद्ध के दौरान उपजे मानसिक आघात और पोलैंड की दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं के बारे में हैं। स्टालिन से डरे उन मित्र देशों के बारे में जिन्होंने इस देश को तब छोड़ दिया जब उनकी सब से ज्यादा ज़रूरत थी और सोवियत संघ को बेच दिया। युद्ध के बाद सोवियत संघ ने पोलैंड का बहुत बड़ा हिस्सा ले लिया जो आजकल यूक्रेन और लिथुआनिया में हैं। यह सच है कि देश को पश्चिमी हिस्सा मिल गया जो युद्ध से पहले जर्मनी के कब्जे में था लेकिन यह हिस्सा खो चुके पूर्वी हिस्से से काफी छोटा था।

पोलैंड के सबसे लोकप्रिय एक प्रहसन फिल्म, जो कि तीन भागों में बनी है, से पोलैंड के खोये हुए पूर्वी हिस्से में रहनेवाले लोगों के बारे में सब लोग जानते हैं, जिसमें पात्रों को अपने घरों को छोड़कर रहने के लिए पश्चिमी हिस्से में आना है। यह फ़िल्म आज भी बहुत प्रचलित है और टीवी में अक्सर दिखाई जाती है। स्मजोव्स्कि की फ़िल्म भी इतिहास के इसी खण्ड के बारे में है लेकिन उसकी कहानी को फ़िर से अलग दृष्टी से दिखाई जाती है और फ़िल्म में जिसकी बहुत ही कटू अलोचना की गई है। इस बार फ़िल्म की कहानी उत्तर पोलैंड में चलती है, एक ऐसे प्रदेश में जहाँ युद्ध से पहले अलग-अलग स्थानों पर मज़ूर्या (Mazuria) नाम का जातीय अल्पसंख्यक रहता था। उन लोगों की भाषा जर्मन थी लेकिन अपने विचार के अनुसार वे न पोलिश थे और न ही जर्मन। यहाँ यह भी स्मरण कर लेना चाहिये कि दूसरे महायुद्ध के पहले पोलैंड में रहनेवाले लोग एक समान जातीय समूह के लोग नहीं थे जैसे आजकाल हैं। वहाँ न सिर्फ़ यहूदी, बल्कि दूसरे धर्मिक और जातीय अल्पसंख्यक भी थे जो युद्ध के समय मारे गए और जो बच गए उन्हें बाद में दूसरी जगहों पर से फिर से बसना था।

फ़िल्म एक औरत के बारे में है जिसका नास रोज़ा है और जो मज़ूर्या जाति से संबद्ध है। युद्ध के बाद उसके घर में एक पोलिश फ़ौजी आता है, जिसका नाम तदेउष है, जो रोज़ा के पति के साथ युद्ध में था। चूँकि रोज़ा का पति और तदेउष की पत्नी मर गई है, वह अकेली औरत को मदद करने का निश्चय करता है और उसके साथ रहने लगता है। यह समय औरतों के लिए खूंखार-समय है क्योंकि आसपास बहुत सारे फ़ौजी हैं जो औरतों का बलात्कार करते हैं। सब से खतरनाक सोवियत सेना है जो सिर्फ़ फ़िल्म की वास्तविकता नहीं, ऐतिहासिक सच है। रोज़ा के साथ इतनी बार बलात्कार हो चुका है कि उसकी हालत अच्छी नहीं है। उसके मेहमान को भी पता चलता है कि उस औरत के साथ उसकी बेटी रहती है जिसे वह लोगों से छुपाती है ताकि उसके साथ कुछ बुरा न हो जाए। कुछ समय बाद रोज़ा के बगल वाले घर में पूर्वी ज़मीन से भागे हुए लोग आते हैं। धीरे धीरे यह स्पष्ट होता है कि रोज़ा सुरक्षित नहीं है क्योंकि पोलिश लोग मज़ूर्या लोगों को उनकी भाषा और धर्म के कारण जर्मन समझते हैं। रुजा के अलावा आसपास के दूसरे मज़ूर्या लोग भी रहते हैं लेकिन उनके लिए रोज़ा एक पापी औरत है क्योंकि अनगिनत बार उसका बलात्कार हुआ है और उसने सोवियत फ़ौज़ियों को रोकने के लिए ज़्यादा प्रतिरोध नहीं किया। यह सब सही बात है लेकिन रोज़ा ने इसलिए ज़्यादा मना नहीं करती थी क्योंकि वह नहीं चाहती थी कि उन आदमियों को उसकी बेटी के बारे में पता चले, लेकिन युद्ध के बाद उसकी स्थिति बहुत खराब है क्योंकि वह न पोलिश है, न जर्मन, न मज़ूर्या के लोग ही उसे मान्यता देने को तैयार हैं। पोलिश फ़ौजी तदेउष सिर्फ़ एक आदमी है जिसके लिए रोज़ा बस मनुष्य है। मौत से पहले तदेउष की पत्नी के साथ भी बलात्कार किया गया था और फ़ौजी ने यह सब कुछ देखा इसलिए वह इसे कभी पाप या औरत की गलती नहीं समझता है। जब रोज़ा के नये पड़ोसी की पत्नी के साथ भी बलात्कार होता है तो उसका पति उसको मार नहीं सकता है, जो बहुत अच्छी तरह यह भी दिखाता है कि औरतों की स्थिति कितनी मुश्किल थी। तदेउष की स्थिति भी अच्छी नहीं है क्योंकि युद्ध के बाद राजनीतिक व्यवस्था बदल गई। युद्ध के समय पोलैंड में दो सेनाएँ थीं – एक, जो सोवियत संघ वाले हिस्से में बनी और दूसरी जो पश्चिम में(जहां वह जर्मनी से लड़ रही थी)। दोनों में पोलिश लोग थे और दोनों अपने देश के लिए संघष करना चाहती थीं। लेकिन, युद्ध के बाद पश्चिम देशों से संबंधित सेना को नये राजनीतिक परिदृश्य में देश के लिए खतरनाक मान लिया गया और वे लोग अक्सर बिना कारण से जेल जाते थे। फ़िल्म का नायक राजनीतिक कारण से अचानक पोलैंड गणराज्य के लिए काँटा बन जाता है और उसकी स्थिति के लिए यह भी अच्छी बात नहीं है कि वह एक “जर्मन” औरत के साथ रहता है इसलिए उसको गिरफ़्तार करने के बाद बहुत यातनाएँ मिलती हैं।

रोज़ा आसान फ़िल्म नहीं है क्योंकि उसको अच्छी तरह समझने के लिए पोलिश इतिहास और उसकी राजनीतिक स्थिति को जानना चाहिए, इसलिए लगता है कि यह फ़िल्म सब से पहले पोलिश दर्शकों के लिए है जो खोई हुई पूर्वी हिस्से के कारण बार-बार रोता था और कभी इसके बारे में नहीं सोचता है कि पश्चिमी हिस्से में भी युद्ध से पहले कुछ ऐसे लोग रहते थे जिनकी जन्मभूमि खो गई है। व्यक्ति, राष्ट्र, इतिहास, राजनीति, जाति आदि के बिम्ब या रूपक के बतौर उभरे पोलैंड की निष्ठुर आलोचना स्मजोव्स्कि एक बार और करता है, इस मायने में वह पक्षपाती नहीं है। ऐसी स्थिति में फ़िल्म में दिखाये गए सब लोग सही हैं और सब गलत। हर इनसान के लिए इतिहास अलग है क्योंकि हर की दृष्टी अलग है। स्मजोव्स्कि की फ़िल्म में कोई जवाब नहीं मिलता है कि कौन सही है और कौन नहीं। ज़रूर, यहाँ कुछ लोग हैं जो सिर्फ़ खलनायक लगते हैं लेकिन वे लोग इतने महत्त्वपूर्ण नायक नहीं हैं और लगता है कि वे सिर्फ़ इसलिए फ़िल्म में आते हैं कि निर्देशक अपने दर्शकों को दिखाना चाहता था कि परिस्थिति कितनी मुश्किल और उलझनदार थी। वह कोई जवाब नहीं देता है और फ़िल्म के दर्शक फ़िर से उत्तेजित होते हैं क्योंकि इस बार युद्ध के बारे में होने के बावजूद इस फ़िल्म में पोलिश लोग न तो वीरता से भरपूर हैं न ही हताहत। पोलिश फ़ौजी तदेउष स्मजोव्स्कि की सारी फ़िल्मों में एक मात्र व्यक्ति है जिसमें कोई बुराई नहीं है, बाकी सब लोग अक्सर गलतियाँ करते हैं और यह शायद इस निर्देशक की सब से बड़ी मज़बूती है और इसलिए मुझे लगता है कि उसकी फ़िल्मों के मदद से पोलिश सिनेमा के बारे में कुछ दिलचस्प कहना हो सकता है।

स्मजोव्स्कि की फ़िल्में दूसरी पोलिश फ़िल्में जैसी हैं जिनको अच्छी तरह समझने के लिए पोलिश बेचैनियों, मिथकों और अभिघातों को जानना चाहिए। स्मजोव्स्कि पोलिश सिनेमा का लाक्षणिक, इतिहास में डूबा हुआ निर्देशक है लेकिन इसी समय में वह उन सभी मिथकों की इतनी कड़ी आलोचना करता है मानो पूछना चाहता है कि पोलिश लोकाचार पर आधारित सिनेमा आज भी जीवित क्यों है!? स्मजोव्स्कि के नायकों का अधिकांश अनुपयोगी, शराबी, चोर हैं जो पोलिश लोगों का सब से पारंपरिक चित्रण है। इसी समय में भी वह बार बार पोलिश मनोभाव की विसंरचना करता है इसलिए उनकी फ़िल्मों के दर्शक हर फ़िल्म की याद करते हैं और अपने बारे में कुछ न कुछ सोच-कर सकते हैं।

तत्याना षुर्लेई

तत्याना षुर्लेई

तत्याना षुर्लेई एक Indologist और फिल्म-आलोचक हैं। हंस, पहल, अकार आदि हिन्दी पत्रिकाओं के लिए लिखती रही हैं। फिलहाल पोलैंड के शहर क्राकोव स्थित Jagiellonian University में The Courtesan Figure in Indian Popular Cinema:Tradition, Stereotype, Manipulation. नामक विषय पर पीएचडी के लिए शोधरत हैं। उनसे tatiana.szurlej@gmail.com पर संपर्क संभव है।

साभार- अकार 

 

बोलान्यो दि बाप: मयंक तिवारी

By मयंक तिवारी 

जैसा मैं दिखता  हूँ, वैसा मैं लिखता हूँ. जी चाहे पढ़ लो, जी चाहे लड़ लो. पहले ऐसा कहते कुछ संकोच होता था. मैं लेखक हूँ कि नहीं? हूँ तो कैसा हूँ?  मगर बोलान्यो पढने के पश्चात हाल कुछ  ऐसा है मानो सीने  में  किसी ने तरस खा कर हिम्मत का इन्जेक्शन ठोंक दिया हो. वाकई,  बोलान्यो  बाप  है. और मेरे जैसे कुंठित, अपनी सड़ती जड़ो से पीठ फेरे, अपने इतिहास से अनभिज्ञ, अंग्रेजी में अपने आप को तोलने वाले लेखक के लिए तो बोलान्यो बाप से भी बढ़ कर है.

कितना आसान है किसी लेखक पर बकैती झाड़ना। दो चार किताबे पढ़ो, थोड़ा पकाओ, थोड़ा पचाओ, और उगल दो. आजकल सुनते है बकैती के लिए किताब की भी आवश्यकता नहीं है. लड़की से भी काम चल जाता है. साहित्य और सेक्स में फर्क केवल फॉर्म का रह गया है. अंग्रेजी साहित्य का तो यही हाल है.  हिंदुस्तान मे अंग्रेजी साहित्य मेट्रो का वह डब्बा है जिसमें  बैठकर कनॉट प्लेस ट्राफलगर स्क्वायर लगता है. यही कारण है कि अपने लेखको पर लिखने की मेरी कभी हिम्मत नहीं हुई. बोलान्यो की बात और है. बोलान्यो जवानी में अपनी तरह ही नशेबाज था. मर चुका है अब. शायद इसलिए अब बिलकुल बकवास नहीं करता। ईमानदार जिया, ईमानदार मरा. roberto

सत्तर के शुरू की बात है शायद। मेक्सिको शहर में, या शायद कोई और लातिन अमेरिकी शहर रहा होगा, एक कवि सम्मलेन हो रहा था. कवि आते जा रहे थे, कविता कभी निलंबित, कभी ज़लील  होती जा रही थी. तमाशे के आदी लोग, जो कुछ सुनाई दे रहा था उसे कविता जान खुश थे.  अचानक सभा में एक बरगलाया सा लौंडा ऐसे घुसा मानो अभी अपने बस्ते से बन्दूक निकाल सब कवियों का मुँह वन्स एंड फॉर आल बंद कर देगा। जैसे ही लौंडे ने हाथ बस्ते में डाला चूहों और कवियों में फर्क में करना कठिन हो गया. थैंकफुल्ली चूहे मौका देख फरार हो गए. लौंडे की आँखों में खून था — कुछ नशे के कारण कुछ नींद के.  उसने बस्ते में हाथ डाला और एक कागज़ का परचा निकाल उसे से जोर जोर से पढ़ने लगा. लौंडा कवि निकला। चीख चीख कर लौंडा जिसे पढ़ रहा था वह उसकी कविता नहीं, बल्कि भविष्य में उसकी कविताओं का घोषणापत्र था. लौंडा पढ़ता रहा, लोग सुनते रहे. फिर अंतरिक्ष के किसी दूर कोने से आये धूमकेतु की तरह अपना प्रकाश बाँट लौंडा अंतर्ध्यान हो गया. वह लौंडा बोलान्यो था.  मगर मैं भी हो सकता था.  इसलिए कहता हूँ, बोलान्यो बाप है.

अचानक कलम रुक गई.
कभी कभी रुकनी चाहिए कलम को.
लेट जानी चाहिए सफ़ेद पृष्ठ पे निढाल।
केवल ताड़े, कलम कवि को, कवि कलम को.

२०१३ की एक सितम्बरी शाम. एक बुकशॉप. मैं वक़्त को, वक़्त मुझे ज़ाया कर रहा था. मैं किताब चुराने आया था. ऐसा पहले दो बार कर चुका था. ‘फूको’ और ‘स्चोपेन्हौरेर’. तीसरी किताब खोज रहा था. मिली, मगर साली को खरीदना पड़ा. बोलान्यो की सैवेज डिटेक्टिव. उस दिन कोई ढंग की किताब मिल नहीं रही थी. फिलॉसोफी का खाना खाली सा था. वहां अमिश त्रिपाठी की किताबों का ढेर जमा था. चुराने लायक किताब कोई नज़र नहीं आ रही थी. कॉलेज की लड़कियों ने ऊधम मचा रखा था. तब अचानक याद आया कुछ दिन पहले फ़ोन पर उदय शंकर किसी लेखक के बारे में कह रहे थे. मैं उन्हें डेविड फोस्टर वॉलेस के किस्से सुना रहा था, वह मुझे विनोद कुमार शुक्ल पड़ने को उकसा रहे थे.  उस दिन गांजा ज्यादा हो गया था. अक्षर मुँह फांद फूट पड़े. क्या रखा है साहित्य में? क्यों पढ़े हम शुक्ल को, काफ्का को, हज़ारी परसाद द्विवेदी को, डेविड फोस्टर वॉलेस को.… जवाब में भाईजी ने गूगली फ़ेंक दी. “बोलान्यो पढ़ो समझ आ जाएगा।” बुकशॉप  से मैंने भाईजी को फिर फ़ोन किया. “… नाम भूल गया था.…” “बोलान्यो,” भाईजी ने प्रेम पूर्वक याद कराया। अगले दो घंटे मैंने बुकशॉप छान मारा मगर बोलान्यो न मिला। आखिर थक कर जब मैं जा रहा था तब बुकशॉप की एक महिला कार्यकरता  पास आई और कहने लगी की अक्सर जो कोई और नहीं ढूंढ पाता, मैं खोज लेती हूँ. सैवेज डेटेक्टिवेस, मैं बोला। महिला दफा हो गई. दो मिनट बाद बोलान्यो और बिल दोनों थमा दिये। खर्चा करके मैं कई अरसे बाद खुश हुआ था. सैवेज डेटेक्टिवेस का  सीधा सीधा अनुवाद दो जाहिल जासूस हो सकता है। अगर मुझे हिंदी में अनुदित करने को मिले तो मेरा टाइटल होगा: जवानी ज़िंदाबाद. किताब पड़ते पड़ते मैं कई बार रोया। ऐसा क्यों है आप किताब पड़कर ही समझ सकते है. किताब ख़त्म होते ही मैंने फ्लिपकार्ट पे दे दना दन बोलान्यो का सारा साहित्य जो कि अंग्रेजी मैं मौजूद था आर्डर कर दिया। पैसे कम थे इसलिए अगले ही दिन 2666 छोड़ सभी आर्डर रद्द कर दिये। 2666. उस झटके से मैं अब तक नहीं उबार पाया हूँ. मैंने साहित्य से आज तक जो जो सवाल किये, उन सब का जवाब 2666 में मौजूद है.

पठन-पाठन की दुनिया में ज्यादातर सभी मेरे दुश्मन है. मुझे भक्ति नहीं आती द्वेष भक्ति आती है. अंग्रेजी में लिखता हूँ और गुस्सा होने के लिए इतना काफी है. अंग्रेजी साहित्य गुंडा साहित्य है. मैं अंग्रेजी साहित्य को गुंडा इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि मैं उससे डरता हूँ. इतना डरता हूँ की टट्टी लगने पे लैट्रिन कहना छोड़, लू लू करता फिर रहा हूँ. अंग्रेजी साहित्य गुंडा है क्योंकि इससे पहले हम उससे बदले वह हमें बदल देता है. अंग्रेजी साहित्य जितना खोखला होता गया उतना और फैल गया, चौड़ा हो गया.  शायद इसी लिए भारत में वह बहुत मशहूर है. मैं साहित्य की बात कर रहा हूँ, भाषा की नही. (भाषा में इतनी हिम्मत होती तो प्रसून जोशी को कौन नौकरी देता?) आज के अपराधी समय में साहित्य गुंडागर्दी न करे तो करे क्या, इस तर्ज़ पर भी बहस की जा सकती है. मगर ऐसा करने में मेरी कोई रूचि नहीं है. जिनकी हो उन्हें मेरी शुभकामनाएं। वह इस पठन को स्थगित कर गुंडे साहित्य पर क्राइम रिपोर्टिंग करे.

बोलान्यो पढ़ मेरा गुस्सा कुछ कुछ शांत सा होने लगा है. एक दिशा सी दिखने लगी. कविता फिर चालू हो गई है. सिर्फ ईमानदार रहना चाहता हूँ. किसके प्रति, अपने, आपके, या साहित्य के, यह अभी तय नहीं कर पाया हूँ. मगर लिखूंगा। जब तक दम है कलम चलेगी। मुश्किल वक़्त, कमांडो सख्त. अभी बोलान्यो मिले साल भर भी नहीं हुआ है और यह हाल है. इसीलिए कहता हूँ, बोलान्यो बाप है.

मयंक तिवारी

मयंक तिवारी

मयंक तिवारी अद्भुत पढ़ाकू आदमी हैं. अंग्रेजी अखबार डीनए में कॉलम और फिल्मों के लिए पटकथा लिखते हैं, फिल्म रागिनी एमएमएस से चर्चित. अंग्रेजी की मंचीय कविताओं वाले जमात में भी इनकी अच्छी खासी घुसपैठ है. फिल्म ‘सुलेमानी कीड़ा’ के मार्फ़त अभिनय की भी शुरुआत कर चुके हैं और कॉमेडी के कार्यक्रमों में भी अपना जलवा दिखा चुके हैं. उनसे mayankis@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है

आज की चीख़ पुकार में एक बहुत कोमल तान खो गयी है: उदय शंकर

By उदय शंकर

 राजेंद्र यादव को नजदीक से जानने का मेरा कोई दावा नहीं है। उनसे मिलना संयोगवश ही रहा है। ये संयोग मेरे जीवन के अद्भुत यादगार क्षण रहे हैं। उनसेकुल जमा चार मुलाकातों की याद है मुझे। शायद मैं इंटरमीडिएटअंतिम वर्ष का छात्र था, जब उन्हें पहली बार साक्षात देखने-सुनने का मौका मिला, गया में। वे कहानी की रचनाशीलता से संबन्धित किसी विषय पर बोल रहे थे। मैंने उनसे कुछ सवाल किए थे। उनका वक्तव्य और अपना सवाल कुछ भी याद नहीं है। सिर्फ कुछ दृश्य ही दिमाग में टंगे रह गए। बाद में मैं जेएनयू आ गया और आते ही छात्र-राजनीति और संस्कृति-कर्म के बारीक सीमांतों पर सक्रिय रहने लगा। मुझे प्रेमचंद के ऊपर एक जनसभा करने और वक्ताओं को तलाशने की जिम्मेवारी सौंपी गई थी। मैंने राजेन्द्र जी से फोन पर बात की, वे सहर्ष ही आने के लिए राजी हो गए और साफ-साफ कहा कि मैं अपनी गाड़ी से आऊँगा लेकिन पेट्रोल के पैसे देने पड़ेंगे। मैंने हाँ कह दिया। वे नियत समय से पहले ही जेएनयू आ गए थे। नियत समय तक के लिए क्या किया जाय यह उनकी फौरी चिंता थी, तो उन्होंने तपाक से कहा कि पाण्डेय जी (मैनेजर पाण्डेय) से मिलने चला जाय। मीटिंग खत्म हुयी और जाते समय पेट्रोल-खर्च के पैसे मैंने उनके हाथ में दिये तो उन्होंने उसे लौटा दिया और बोले कि तुमलोग विद्यार्थी हो, इसे अन्य मद में खर्च करना।

जब बोलने वाले ज्यादा होते हैं तब मैं खामोश रहना ही पसंद करता हूँ और जब बोलने वाला कोई नहीं हो तो सिर्फ मैं ही बोलता हूँ, ऐसी मेरी आदत बन गई है। राजेन्द्र जी अक्सर लोगों से घिरे रहने वाले व्यक्ति थे। ऐसे में उनके नजदीक पहुँचने के तीन ही तरीके बचते थे, जिन्हें अक्सर नवांकुर लोग आजमाते थे- एक आप वाचालपन के शिखर को प्राप्त हों, सुंदर-‘अवांगार्द’ कन्या हों या आप बेचारगी को प्राप्त हो चुके अस्मिता-लोलुपहों। मैं इन तीनों कसौटियों पर खरा नहीं उतर पाता था। इसलिए ये मुलाकातें आगे की नजदीकियों में तब्दील नहीं हो सकीं।

इधर 2013 के शुरुआती महीनों में उनसे मिलना-जुलना फिर से शुरू हुआ और इन संयोगों को संभव बनाने का काम अक्सर कहानीकार-फ़िल्मकार मित्र संजय सहाय जी ने किया। एक मुलाक़ात काफी रंगीन और लंबी भी रही। प्रेसक्लब के खुले आसमान में करीब 3-4 घंटे की बैठकी। उन्होंने जिस ड्रिंक का ऑर्डर दिया था वह भी याद है- वर्जिन मैरी या ब्लडी मैरी। वे शायद सालों बाद प्रेस क्लब आए थे। यह शाम किसी भी साहित्यिक समाज के लिए गौरवान्वित होने वाली शाम थी। प्रेस क्लब के सचिव को जब पता चला कि यहाँ राजेन्द्र यादव आए हुये हैं, तो वे खुद हमारे टेबल के पास आए। राजेंद्र यादव की उपस्थिती को स्वयं और प्रेस क्लब के लिए सम्मान की बात कहते हुये विनम्रता से धन्यवाद ज्ञापित करते रहे। हमलोग राजेन्द्र जी के नेतृत्व में जब वहाँ से उठे तो ऐसा लगा मानो दो-तीन सौ लोगों से भरा-पूरा प्रेस क्लब उठ खड़ा हुआ हो; वे जहां से गुजरते लोग उठ खड़े होते, उनके गुजरते ही खुसफुसाहट शुरू हो जाती- अरे नहीं जानते राजेन्द्र यादव को,हंस के संपादक हैं। राजेन्द्र जी के प्रति सोचने-समझने के मेरे नजरिये को इस एक वाकये ने लगभग बदल दिया था। राजेन्द्र यादव के public-intellectual होने के ‘पाठकीय’/भावकीय प्रतिक्रिया का मैं साक्षी बना था। हिन्दी के बुद्धिजीवी जगत से अतिपरिचित किसी भी व्यक्ति के लिए यह एक विलक्षण और पराभौतिक अनुभव था। हिन्दी का लेखक और इतना सम्मान!! हिन्दी में सम्मान की अजीब स्थिति है। जब से वैचारिक प्रतिबद्धताओं की लेखनी थोड़ी उल्लंग हुयी है तब से हिन्दी वाले सिर्फ हिंदीतर लोगों का ही सम्मान कर पाते हैं। लेन-देन की एक सामान्य प्रक्रिया के अतिरिक्त सम्मान का कोई खास महत्व आजकल नहीं रह गया है। नुकसान करने की क्षमता रखना ही सम्मान पाने की योग्यता है। हिन्दी के अध्यापकों के पीछे चलने वाले भीड़नुमा चेला-चाकरों को देखकर यह अंदाज लगाना मुश्किल नहीं है। राजेन्द्र जी किसी को क्या नुकसान पहुंचा सकते थे, और किसी को फायदा भी क्या पहुंचा सकते थे, खासकर उनलोगों को जिनके पास प्रेस क्लब में बैठ सकने का सामर्थ्य हो।

राजेन्द्र जी को हिन्दी में सत्ता के एक केंद्र के बतौर प्रचारित किया जाता है। मैं सत्ता के किसी वायवीय संकल्पना में अभी भी विश्वास नहीं कर पाता हूँ। सत्ता को मैं अभी भी आर्थिक-राजनीतिक परिप्रेक्ष्यों में ही समेटने का हामी हूँ। राजेन्द्र यादव को जितना भी जान पाया हूँ, मुझे वे कभी भी आर्थिक-राजनीतिक रूप से किसी को लाभान्वित करने वाली स्थिति में नज़र नहीं आए, नुकसान तो छोड़ ही दीजिये। राजेन्द्र जी अगर सत्ता के केंद्र थे भी तो उस केंद्र को मैं एक वायवीय केंद्र से ज्यादा कुछ नहीं मानता हूँ। राजेन्द्र जी ने इस सत्ता केंद्र को अपने आस-पास एक ‘नो लॉस नो प्रॉफ़िट ज़ोन’ की तरह विकसित किया था। यह उनका औरा था और कुछ नहीं। उनके संगी-साथी क्या-क्या कर गुजरे, इसका इशारा नामवर सिंह ने अभी हाल ही में किया है- “राजेन्द्र के मन में कहीं भीतर तक यह बात बैठ गई थी कि वे मोहन राकेश और कमलेश्वर से कम महत्वपूर्ण न मान लिए जाएं।” नई कविता-नई कहानी वाले दौर के जिन भी लोगों ने सत्ता-नवीसी नहीं की या सत्ता का एक वायवीय औरा बनाने में सफल नहीं हुये वे कब से कहाँ हैं या कवलित हुये किसी को पता नहीं है। बहुत पहले ही एक उदाहरण बन चुके भुवनेश्वर को हम भलीभाँति जानते हैं। बहुत दिनों तक लापता रहे और फिर रेलवे ट्रैक पर भिखारियों की दशा में मरे हुये पाये गए। स्वदेश दीपक लापता हैं। सतीश जमाली असाध्य बीमारियों से घिर कर अपने घर में ही कैद हैं। अमरकान्त अपनी दीन-हीन दशाओं के साथ कभी-कभी खबर बन जाते हैं। कुछ लोगों की बदौलत मधुकर सिंह भी अभी खबर बने थे। राजेन्द्र यादव में ही यह कौशल और सामर्थ्य था कि ऐसी खबरों से वे वाबस्ता बचे रहे और रंगीन-खुशमिजाज़ विषमयोगी तिग्गी के दिग्गी बने रहे।

विजय सोनी

विजय सोनी

यह सब मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि राजेन्द्र जी के अन्त्येष्टि कार्यक्रम के साथ ही साथ एक और कलाकार की अन्त्येष्टि हुयी थी उस दिन। मेरे लिए यह लगभग कॉस्मिक अनुभव था। राजेंद्र जी के साथ-साथ जिस कलाकार की अन्त्येष्टि उस दिन सम्पन्न हुयी थी, वे विजय सोनी (1937-2013) थे। मेरे लिए यह कॉस्मिक अनुभव क्यों था, इसके लिए थोड़ा पीछे जाना पड़ेगा। साल भर पहले ही दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान के सभागार में मुक्तिबोध के ऊपर आयोजित कार्यक्रम में वरिष्ठ कवि मंगलेश डबराल बोल रहे थे। उन्होंने याद दिलाया कि सत्तर के दशक में मुक्तिबोध की लंबी कविता ‘अंधेरे में’ का प्रयोगधर्मी मंचन विजय सोनी के निर्देशन में सम्पन्न हुआ था। साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा कि उनकी विदुषी पत्नी अग्नेष्का सोनी थी। उस समय के बाद से वे दोनों लापता हैं, किसी को नहीं पता है कि वे आज-कल कहाँ हैं। अग्नेष्का नाम सुना-सुना लग रहा था, थोड़ा प्रयास किया तो याद आया कि अरे यह तो वही अग्नेष्का हैं जिन्हें मुक्तिबोध लंबी-लंबी चिट्ठियाँ लिखा करते थे। मैं उन चिट्ठियों को दुबारा पढ़ गया। उन चिट्ठियों में विजय सोनी का भी जिक्र है। अग्नेष्का की पसंद की मुक्तिबोध दाद देते हैं। विजय सोनी को वे अपना नया मित्र कहते हैं। अग्नेष्का मुक्तिबोध के काफी करीब थीं। मुक्तिबोध के जन्म के 50 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष में आलोचना ने एक विशेषांक निकाला था उसमें अग्नेष्का जी का भी एक लेख शामिल है, यह लेख मुक्तिबोध के सद्य प्रकाशित कहानी-संकलन काठ का सपना का बहुत ही सटीक मूल्यांकन करता है। बहुत ही मेहनत से लिखी गई समीक्षा थी यह। अग्नेष्का कोवल्स्का-सोनी नाम से हिन्दी कविता के ऊपर स्वतंत्र रूप से दो पुस्तकें पोलिश में लिख चुकी हैं- एक का नाम है 1947 के बाद हिन्दी कविता की नई राहें और दूसरे का, समकालीन हिन्दी कविता और हिन्दी की साहित्यिक परंपरा । इसी नाम से इनका एक पर्चा फ़िलॉसफ़ी की एक अङ्ग्रेज़ी पत्रिका में है, जिसका शीर्षक है- नेचर एंड फ्रीडम: सम रिफ़्लेक्संस । इसका प्रकशन वर्ष 1976 है। मुक्तिबोध की चिट्ठियों में ही नहीं बल्कि मलयज की डायरियों में भी अग्नेष्का और विजय सोनी का जिक्र पचासों बार मिलता है। अग्नेष्का मलयज की शिक्षिका थीं, पोलिश भाषा पढ़ाती थीं और मलयज से उनकी दोस्ती भी थी। बाद में जब अग्नेष्का जी ने विजय सोनी के साथ शादी कर ली तो मलयज भी इस दंपति के दोस्त हो गए। मलयज ने बहुत ही अपनापे के साथ इन लोगों का जिक्र किया है। मलयज लिखते हैं- “अग्नेष्का के मनोभाव उनके चेहरे पर उतने खुलकर नहीं आते, किन्हीं और चीजों में घुले-मिले रहते हैं। तब विजय को चित्रकारी के प्रति अपने नए-नए रुझान से काफी स्फूर्ति और उत्साह मिलता था। वे कुछ न कुछ पेंट कर रहे होते और लोगों की उनके चित्रों के बारे में क्या प्रतिक्रिया है यह जानने के लिए उत्सुक रहते।” विजय सोनी चित्रकारी की दुनिया में विको सोनी के नाम से जाने जाते थे। उनके चित्रों की प्रदर्शनी के समाचार/रिपोर्ट उस समय के अखबारों में छपते थे। मलयज की एक पुस्तक जख्म पर धूल के आवरण-चित्र और साज-सज्जा की जिम्मेवारी भी विजय सोनी ने संभाली थी। शमशेर भी चित्रकार विको सोनी/विजय सोनी के प्रशंसक थे। शमशेर की एक पूरी की पूरी कविता विजय सोनी के लिए है-

 विजय सोनी के चित्र

(नयी दिल्ली में विजय सोनी के चित्रों की प्रदर्शनी का उद्घाटन करते हुए दो शब्द)

जिस्म जहां घुलता है/ रंगों की कोमलता में खो जाने/ पावन आवेश दुख और दर्द का/ सुख की झांकियों का/ जहां रोशनी और अंधेरे की/ शतरंज बिछाता है/ जहां दूरियों में हम हैं/ और नज़दीकियों में तुम/ और जहां मिलते हैं वह/ एक कैनवस है/ जिसे हम छू नहीं सकते/ क्योंकि उसे हम जी रहे हैं/ यह एक माध्यम है/ जिसे रंग मिल-मिल के पकड़ने के लिए/ खोये जा रहे हैं/ यहां जो कुछ ठोस है/ वह धड़क रहा है/ और जहां धड़कन है वहां ख़ामोशी है/ दम साधे हुए। आज की चीख़ पुकार में/ एक बहुत कोमल तान/ खो गयी है। उसे पाना है। विजय सोनी, तुम डेनमार्क जाओ /स्वीडन पोलैण्ड में /कोई नया रूप /जन्म ले रहा है /अनपहचाने शायद/ उसकी परछाईं मैं यहां /पकड़ रहा हूं/ “शिल्प चक्र” में। शायद मुक्तिबोध आज/ यहीं खड़ा है*./वह ऊंचा व्यक्ति /जो हम सब के पीछे है, और /हम सब को ऊपर से/ देख रहा है। हम पीछे मुड़ कर न देखें। सामने ही देखें। शायद उसकी नज़र/आईना बने। हम सब की नज़र/उसका आईना बने। और हम उसको देखें /जो हमारा /आने वाला व्यक्ति है.

 विजय सोनी चित्रकार के रूप में दिल्ली में काफी लोकप्रिय थे। कम से कम हिन्दी बुद्धिजीवियों की बीच इनकी चर्चा ज़ोरों पर थी। लेकिन इनके चित्रकार वाले रूप से अलग भी इनका एक रूप था और वह था उनका रंगकर्म। वे विश्वविख्यात पोलिश रंगकर्मी येजि ग्रोतोव्स्कि के ‘थियेटर लैब’ से पूअर थियेटर में बाकायदा प्रशिक्षित थे। येजि ग्रोतोव्स्कि के नजदीकी लोगों का मानना है कि उनका हिंदुस्तान के प्रति अद्भुत लगाव था, 1960 में उन्होंने ‘शकुंतला’ का मंचन पोलैंड में किया था। एक बार एक एक्टर की तलाश में भारत भी आ चुके थे। ऐसे में विजय सोनी का येजि ग्रोतोव्स्कि के प्रति आकर्षित होना और उनके पास थियेटर सीखने चले जाना उस समय के लिहाज से बहुत बड़ी बात थी। प्रशिक्षण समाप्त कर वापस लौटते ही उन्होंने ‘अंधेरे में’ का आशंका के द्वीप नाम से मंचन किया। यह अपने-आप में एक जटिल टेक्स्ट का चुनाव था लेकिन बहुत ही कम संसाधनों की मदद से उन्होंने इसे सम्पन्न किया। जयदेव तनेजा लिखते हैं- ‘काली पैंट पहने छः अभिनेताओं ने मंच पर, अपनी देह भंगिमाओं और समूहनों से अन्याय और शोषण के कुछ धारावाहिक बिम्ब उभारे।’ महादेवी बुद्धिजीवी वर्ग के बारे कहती हैं कि ‘उसके एक शरीर में दो प्रेतात्माएँ रहती हैं- धन-लिप्सा और अभाव। इसी की उछल-कूद उसके भीतर मची रहती है।’ दूधनाथ सिंह इस संदर्भ में विजय सोनी को याद करते हुये लिखते हैं- ‘एक बार बहुत पहले श्री विजय सोनी ने यहाँ इलाहाबाद में मुक्तिबोध की कविता ‘अंधेरे में’ का एक नृत्य-नाट्य प्रस्तुत किया था। उसमें हर पात्र सिर्फ लंगोटी लगाए हुये नंगा था। सबकी नसें और पसलियाँ और चेहरे ऐंठे हुये थे। महादेवी की उन्हीं प्रेतात्माओं का प्रतीकात्मक नृत्य था वह।’ आशंका के द्वीप के अलावा उनके द्वारा निर्देशित एक और नाटक की जानकारी मिलती है- लंकाधिराज। इन नाटकों का मंचन उन्होंने दिल्ली के बाहर अन्य शहरों में भी किया था। कहने का तात्पर्य यह है कि विजय सोनी और अग्नेष्का सोनी अपने दौर के लेखकों-बुद्धिजीवियों के बीच में बहुत ही जाने-पहचाने नाम थे।

उस दिन विजय सोनी की गुमनामी/लापता हो जाने वाले वक्तव्य ने मुझे काफी चौंकाया था। मुझे यह भी लगा कि शायद वे पोलैंड में जाकर बस गए होंगे। मैंने अपने जान-पहचान के कुछ पोलिश दोस्तों को भी (जो हिन्दी पब्लिक स्फियर में रुचि भी रखते हैं) इस बारे में कई-एक बार बताया, लेकिन वे भी कुछ बता पाने सफल नहीं रहे। हिन्दी के किन्हीं लोगों से पूछने की कोई जरूरत ही बाकी नहीं रह गई थी क्योंकि हिन्दी के बुद्धिजीवियों की सभा में ही मंगलेश यह बोल रहे थे। मैंने इंटरनेट पर भी बहुत कुछ ढूँढने की कोशिश की लेकिन कुछ हाथ नहीं आया। धीरे-धीरे इसे भूलता ही जा रहा था कि राजेन्द्र जी वाले अन्त्येष्टि कार्यक्रम में मैं युवा आलोचक संजीव कुमार के साथ खड़ा था, तभी उन्होंने एक वृद्ध विदेशी महिला की ओर इशारा किया जिनके गले में एक रुद्राक्ष की माला पड़ी हुयी थी। वे उस वृद्ध महिला की फुर्ती और इस उम्र में भी इतने स्वस्थ चाल पर आश्चर्य व्यक्त कर रहे थे। मेरी तरह संजीव भी उस महिला से अपरिचित थे और सिर्फ उत्सुक निगाहों के आसरे थे। थोड़ी देर में ही पता चला कि यह अग्नेष्का सोनी हैं जो वह अपने पति विजय सोनी के शव के साथ अंतेयष्टि के लिए यहाँ आयी हैं। थोड़ी देर के लिए अपने पति के शव को छोडकर वे राजेंद्र जी को भी श्रद्धांजली देने आयीं। जैसा कि मैंने पहले भी कहा कि यह दुर्योग मेरे लिए लगभग कॉस्मिक था। जिस कलाकार-विदुषी दंपति को लगभगलापता-गुमनाम समझ लिया गया था उसका प्रकटीकरण क्या ऐसे ही होना था! वे कौन सी स्थितियाँ होती हैं जिनमें लोग गुमनाम हो जाते हैं। जबकि वे होते हैं, उसी जगह होते हैं जहां हम उनकी गुमनामी की चर्चाएँ करते हैं। वे दोनों इसी शहर में पिछले 30 वर्षों से थे। उनकी बेटी चारु सोनी अङ्ग्रेज़ी की बड़ी पत्रकार हैं। (मलयज ने अपनी डायरी लिखा है- “चारु तब बहुत छोटी थी शायद दो साल की। मैं घर की सीढ़ियाँ चढ़ने के पहले पहले सड़क पार वाली दुकान से कैडवरी की रंग-बिरंगी चाकलेटी गोलियों का पैकेट खरीदना नहीं भूलता…” ऐसी ही कई-एक पंक्तियाँ चारु के लिए भी हैं) इंडिया टुडे, मेल टुडे, आउटलुक जैसी अङ्ग्रेज़ी की राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में लिखती रही हैं। लेकिन हम हिन्दी वाले एकदम से उपराम हो जाते हैं और इसी तरह कितने लोग गुमनाम हो जाते हैं। विजय सोनी की मृत्यु की खबर सिर्फ एक अङ्ग्रेज़ी अखबार के अलावा कहीं छपा हुआ नहीं दिखा। अगर उनके अन्त्येष्टि का समय राजेन्द्र यादव के समय से अनायास नहीं टकराया होता तो हम आज भी यही मानते रहते कि वे लापता हैं। मैं इसे सिर्फ एक घटना नहीं मानता हूँ बल्कि एक प्रवृति के बतौर देखता हूँ। हिन्दी साहित्य समाज के भीतर कुछ तो बदला है जिसके सूचक के बतौर इसे देखने कोशिश करता हूँ।

क्या हिन्दी में आधुनिकता समकालीनता का द्योतक हुआ करती थी, जिसे हम आज कहीं न कहीं खो चुके हैं। मुक्तिबोध, शमशेर, मलयज, विजय सोनी, राजेंद्र यादव, मोहन राकेश, कमलेश्वर तो दूसरी तरफ रेणु, मार्कन्डेय, शिव प्रसाद सिंह, अमरकांत, शेखर जोशी जैसे लेखकों द्वारा जिस भी रचना परिवेश का निर्माण हो रहा था क्या वह एक समकालीन रचना-समाज को निर्मित करता था। समकालीनता से तात्पर्य यह कि अपने समय और समाज के बृहत्तर/बहुयामी यथार्थ को व्यक्त करने वाला परिवेश। यह हुआ विषय-रूपों की समकालीनता। मैं इसी को विधा-रूपों की समकालीनता तक खींचने की कोशिश करता हूँ तो लगता है कि मुक्तिबोध, शमशेर, मलयज, विजय सोनी, राजेंद्र यादव,मोहन राकेश, कमलेश्वर इत्यादि लेखक –कलाकार विधारूपों के संदर्भ में समकालीनता का एक नया ही परिवेश गढ़ रहे थे। चित्रकार, फ़िल्मकार, रंगकर्मी, पत्रकार आदि पहली बार हिन्दी साहित्यिक-समाज की मुख्य धारा में पहचाने जाने लगे थे। एक तरह की आवाजाही दिखने लगती है और प्रगाढ़ होती है। यह आवाजाही साहित्य-रूपों को प्रभावित करने लगती है। कविता-कहानी आदि पर चित्रकला, रंगकर्म और सिनेमा के असर दिखने शुरू होते हैं। पहली बार एक भरापूरा हिन्दी बुद्धिजीवी तबके का निर्माण होता हुआ दिखता है। राजेन्द्र जी के अन्त्येष्टि कार्यक्रम में जो इतनी भीड़ उमड़ी थी क्या वह सिर्फ हिन्दी लेखकों की भीड़ थी। नहीं, उसमें उन सारे विधाओं के लोग थे जिनसे एक बुद्धिजीवी तबका का निर्माण होता है और इस तबके के साथ राजेन्द्र जी के आवयविक संबंध ने भी उन्हें पब्लिक इंटेलेक्चुअल का दर्जा दिया है। यह उनका अपना कौशल था। अपने समय में विजय सोनी इसी भरेपूरे बौद्धिक समाज में चमक उठते हैं। इस प्रक्रिया को स्वाभाविक गति से आगे बढ़ना था लेकिन स्वाभाविकता अक्सर जालों-जंजालों के हाथों परास्त होती रही। फिर हम इस पराजय को ही स्वाभाविक मान लेते हैं। अगर यह उस स्वाभाविक प्रक्रिया का पराजय नहीं तो और क्या है कि अपने समय के लोकप्रिय-चर्चित-हुनरमंद और विद्वत दंपति से हमारा साक्षात्कार सिर्फ दैवीय दुर्योगों या संयोगों पर ही क्यों निर्भर था!! कुछ तो ऐसा चल रहा है जो सीधा नहीं है। टेढ़ा है पर मेरा है वाले समाज में सीधे की चिंता ही कहीं लोगों को टेढ़ा न लगने लगे!!

 उदय शंकर

उदय शंकर

जेएनयू से पीएचडी के लिए शोधरत। तीन खंडों में आलोचक सुरेंद्र चौधरी के रचना संचयन का संपादन। सांस्‍कृतिक आंदोलनों से जुड़ाव। उनसे udayshankar151@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

साभार- अकार 

ओपन एयर तड़बन्ना: ज्ञानेश बब्बू

ज्ञानेश बब्बू पेशे से दारू के दारोगा के रूप में सुख्यात हैं और अपने बौद्धिक स्पार्क्स के लिए लोकोक्तियों के हवाले हो चुके हैं। अगर फेसबूक नहीं होता तो उनके ये स्पार्क्स हम तक नहीं पहुंचते।  फेसबूक  पर उनके 159 दोस्त  हैं  और जिस सरगर्मी से वे वहां जूझे रहते  हैं  उससे बहुत लोग अछूते हैं.  हिंदी में जब से  कवि , कहानीकार  और आलोचक  होना बेरोजगारी  का पर्याय और सबसे सस्ता काम हो गया है  वैसे समय में ज्ञानेश बब्बू की ये फेसबूकिया  रचनाएँ  कहीं ज्यादा मार्मिक और रचनात्मक हैं. 

courtesy: dsource

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By ज्ञानेश बब्बू

हमको काहे घसीटे तुम लोग ? धरती पर आख़िरी अत्याचारी हमी बचे हैं ? अब हम इन्टरनेट पर लिखा-पढी बंद कर न्यू वेव या अवाँ गार्द फिल्म, पोलंस्की, गोदार्द जैसों की फिल्म या हॉलीवुड की मार-धाड़,सेक्स एंड वायलेंस से भरपूर फिल्म से मतलब रखना चाहते हैं. अपने या दूसरे के दीवार पर चढ़ कर चालू कुत्ता-युद्ध में शामिल होने से यह बेहतर है. बंधुवर लोग भी ट्राई करें. जिन्दगी को समझाने वाली नजर बेहतर होगी.

ताड़ी विशुद्ध प्राकृतिक पेय है जिसमें इंसान की कमीनी फितरत शामिल नहीं होती है. ताड़ी प्रायः घर के बाहर ही पीया जाता है. प्रायः जहां पिया जाता है उसे ताड़ीघर, तड़बन्ना, पसियाना कहते है. ज़माना हिन्दी पेपर के रंगीन पन्ने वाली भाषा की है तो बार भी कह सकते है. बार में पेय के साथ अन्य सहायक चीजों— गिलास, पानी, बैठने का इन्तेजाम, चिखना-नमकीन, म्यूजिक-फूजिक वगैरह उपलब्ध करवाया जाता है. उक्त तस्वीर में दृष्टिगत होता है कि ये तमाम सुविधाएँ प्रदत्त हैं. और प्राकृतिक पेय के पान में प्रकृति का साथ भी उपलब्ध है. अतः यह बार से भी ज्यादा दिव्य है. इस तरह के पेय में प्रकृति के साथ का अनुभव अनोखा होता है. ताड़ी का बार खुली जगह को ताड़ और खजूर के पत्ते को बांस के खपच्चियों से बाँध कर बनाए गए टाट से घेरकर बनाया जाता है इसलिए तड़बन्ना कहलाता है.

ताड़ी और नीरा में फर्क है. पासी पत्ते के जड़ को छील कर कट मार देता है और लबनी सटा के टांग देता है. यह काम सूरज डूबने के बाद किया जाता है. और अलसुबह जब उसे उतार लिया जाता है तो लबनी में जमा द्रव/द्रव्य नीरा कहलाता है. इसमें नशा नहीं होता है. स्वाद में bitterness होता है, झनझनाहट होती है. पेट को कूल रखना है, ठीक रखना है तो यह अचूक द्रव्य है. डॉक्टर से बचने के लिए सेब नहीं रोज सुबह खाली पेट 250 मि.ली. नीरा पीजिये.  जब उसी द्रव्य को धूप लगाने के लिए छोड़ दिया जाता है तो द्रव्य में निहित शर्करा किण्वित( fermented) होकर एथेनोल में टूट जाता है और नशीला हो जाता है. यह झागदार हो जाता है.यह ताड़ी है– विशुद्ध प्राकृतिक पेय, इंसानी फितरत से अछूता !!

यह गजब की चीज होती है. अपने छोटे से कसबे में मैंने इसके कद्रदानों को देखा है और आश्चर्यचकित भी हुआ कि इतने पैसे वाले सब यहाँ जमीन पर बैठ कर मैला उठाने वालों के साथ ताड़ी पी रहे हैं, धौल-धप्पा कर रहे हैं, शायरी भूंक रहे हैं. ”संगत से गुण होत है, संगत से गुण जात” जैसे कथन मैंने टाट से छान-छान कर आती आवाजों के साथ ही पहली बार सुना था. लेकिन वह आश्चर्य बचपन की आँखों ने दी थी. बड़ा होने पर यह बड़ा मार्क्सवादी पेय लगने लगा

बचपन में ताड़ी, ताड़ीघर को नजदीक से देखने का मौका मिला. घर के अगल-बगल में ही कई पसियाने थे. इस व्यवसाय में लगे कुछ निहायत उज्जड थे तो कुछ बेहद शरीफ. ऐसे ही एक शरीफ का बेटा था बिन्दु जिससे मेरी यारी थी. पता नहीं अब कहाँ है. पसियाने में जमीन पर बैठने के लिए ताड़ के पत्ते से बना 2 x2 फुट की चटाई होती थी. जो कांच का गिलास प्रयुक्त होता था वह वैसा ही था जो चाय की दुकानों में देखने को मिल जाता है. घुघनी, भिंगोये चने में प्याज वगैरह मिला कर बनाया गया द्रव्य ही मुख्य चिखना होता था. कुछ शौक़ीन पापड़ का भी इस्तेमाल करते थे. बीड़ी, सिगरेट अपरिहार्य तत्त्व हुआ करता था.पीते-पीते ताश का खेल भी चलता रहता था. पॉपुलर खेल था —-28, ब्रे, कोट-पीस, रमी. और झाम-झगडा भी. 8-10 दिनों में एक बार हल्लागुल्ला, मार देने ,काट देने की धमकीयुक्त चिल्लाहट सुनाई देने लगता था. महीने में एक बार सर फूटने, खून बहने की घटना हो जाती थी. बेचने वाले सभी पासी गोतिया-दायाद ही थे. अतः आपसी वैमनस्य, जलन, प्रतिद्वंदिता की वजह से वे लोग भी आपस में भिड जाते थे.

सबसे ज्यादा झगडा जिस दूकान पर होता था उस दूकान की मुख्य करता-धर्ता एक महिला थी, जवानी और अधेड़ावस्था के बीच. तुर्श स्वभाव वाली जो किसी के दो गाली पर दस गाली बोल देती थी. तुरंत ही कचिया या दबिया हाथ में ले लेती थी. लबनी में जमा ताड़ी को एक बड़े घड़े में जमा किया जाता था. उसी में से ताड़ी निकाल कर ग्राहकों को दिया जाता था. ग्राहकों को जिस मिटटी के बर्तन में दिया जाता था उसे चुक्कड़ कहते थे और वह सपाट पेंदे वाले लोटे के आकार का होता था. उसने 4-5 गिलास ताड़ी आता होगा. जब वह महिला देखती थी कि पियक्कड़ नशा खा चूका है तो चुक्कड़ में ताड़ी की अगली खेप में डंडी मार देती थी. लेकिन पी लेने के बाद इंसान पैसे और दारू में अपने हिस्से के बारे और ज्यादा चौकन्ना हो जाता है. भुक्तभोगी भांप जाता था और झाम शुरू हो जाता था. झगडा और भी कई कारणों से होता था मगर जब भी होता था बड़ा अतियथार्थवादी सीन पैदा हो जाता था. भुक्तभोगी क्रेता और विक्रेता के बीच के झगड़े के अलावा पीने वाले अन्य फरीक भी पता नहीं किन-किन वजहों से आपस में भी भिड़ना शुरू कर देते थे. फिर यह समझ पाना मुश्किल हो जाता था कि कौन किस से झगड़ रहा है, कौन किसको गरिया रहा है.बिलकुल भारतीय चुनाव वाला सीन बन जाता था. लेकिन इस भयानक उथल- पुथल में भी एकाध ग्रुप ऐसा भी होता था जो आप-पास के कोलाहल से निस्संग,तटस्थ अपने दिव्यतम कर्म में तल्लीन रहते थे. यह जिन्दगी का बड़ा सबक था- जहां मन रमे, बेपरवाह हो उसी में तल्लीन रहिये. वे महापुरुष थे.

एक भयानक पियांक था. दिन भर वह अड्डे पर ही जमा दिखता था. नाम भूल रहा हूँ. वह सर्दियों के मौसम में किसी बड़े शहर में रास्ते के किनारे बड़ा सा छाता लगाकर पेन बेचता था. पैसा जमाकर वापस कसबे में लौट आता था और पीता था. वह भी नायाब टुकड़ा था. अकेले पीता था. किसी से झाम में नहीं जाता था. पीकर कर के दुनिया भर की वजहों से पूरी की पूरी दुनिया को ही गरियाता था, किसी को व्यक्तिगत रूप से नहीं. मैं आजकल फेसबुक पर ऐसे ही गरिया रहा हूँ. ( लगता है उसी वक्त का यह अनुभव मेरे अवचेतन में बैठा और आज चेतन में आ गया है.) तड़बन्ना ओपन एयर होता था. बारिश की वजह से जब पीने का कर्म बाधित हो जाता था तो वह सीधे भगवान को ही चैलेन्ज करने लगता था, फैटम-फैटी के लिए. उसी के मुंह से मैंने पहली बार यह कथन सुना था कि जिसको भी थोडा सा पॉवर मिल जाता है, रंगबाजी दिखाने लगता है. (हाल की आंधी, बारिश में फंस जाने पर मैं भी भगवान को ऐसे ही गरिया रहा था, बिना पिये.)मैंने उसे एक ही बार औरों से झगडा करते देखा था. गुस्से में वह वह छाते का नुकीला डंडा ले आया और पसियाने की रणभूमि में अकेले 4-5 को थाम लिया. कभी-कभी लगता है वह मेरी जिन्दगी का सबसे प्रेरक आदमी रहा हो.

उस वक्त ताड़ी का दाम क्या था, नहीं पता. मुझे लगता है 10-20 पैसे में एक चुक्कड़ ताड़ी मिलता होगा.सस्ती का ज़माना था. 1 रुपये में पनामा सिगरेट का पैकेट मिल जाता था. पसियाने का जो हिस्सा टाटरहित होता था उधर से देखने पर मामला बड़ा जादूभरा लगता था, एक ही वक्त खुला भी और रहस्यमय भी, पवित्र भी और पापमय भी. पीने वाले ऐसे तल्लीन बैठे दीखते थे जैसे कोई दैविक अनुष्ठान संपन्न किया जा रहा हो और अचानक झगडा भभक उठता था. टाट से छन-छान कर गालियाँ भी,अश्लील वचन भी सुनाई देते थे और प्रेरणास्पद सूक्तवाक्य भी. माहौल एक ही वक्त जादुई यथार्थवादी भी होता था और अतियथार्थवादी(surrealist) भी.

हमलोग एक पसियाने के टाट के बगल में खाली जमीन पर रबर की गेंद से ”पिट्टो” खेलते थे. गेंद 15 या 25 पैसे में मिलती थी. इस खेल में गेंद से किसी दूसरे खिलाड़ी को मारा जाता था. इस मारा-मारी में गेंद कभी-कभी टाट को चीर कर पसियाने में चली जाती थी. अगर गेंद से टकराकर कोई भरा गिलास लुढ़क जाता था तो गेंद वापस नहीं मिलती थी. कोई नुकसान नहीं होने पर बहुत उदारता से गेंद को टाट के उस तरफ से फेंक दिया जाता था. कुछ लडके ऐसे थे जो पेड़ पर टंगे लबनी को नीचे से ढेला मार कर चनका देते थे. लबनी में जमा ताड़ी बूंद-बूंद टपकने लगता था वे लौंडे नीचे चातक की तरह मुंह फाड़ कर खड़े हो जाते थे. अब समझ में आता है कि उस बूँद-बूँद से नशा तो खैर क्या होता होगा,वे बस यह दिखलाना चाहते थे कि वे शरीफ नहीं हैं, हरामी हैं. जल्दी ही बिहार का हरेक इंसान यही साबित करने पे तुल गया. अब यह यू.पी. में हो रहा है. शराफत की चाहत घटती गयी. यह शर्मिन्दगी की निशानी बन गयी है.

समय बहुत बदल गया. अब ताड़ी प्रचलन से गायब है या गायब हो रहा है. दारू का ज़माना आ गया है. विकास, खगोलीकरण की मारा-मारी में ऐसे ही अन्य कई चीजें हमारे जीवन से गायब हो गयी या तेजी से विलुप्त होती जा रही हैं जिनसे हमारा होना निर्मित हुआ है. लेकिन यह भी लगता है कि यह दुःख हमसे पहले की पीढी को भी हुआ होगा और आने वाली पीढ़ियों को भी होता रहेगा.

अयेन्दे को क्यों मरना पड़ा: मार्केज (अनु. अशोक कुमार)

चालीस साल पहले चिली की राजधानी सैंतिआगो के ला मोनेदा पैलेस में वहाँ के वामपंथी राष्ट्रपति सल्वादोर अयेन्दे को सैन्य तख्तापलट के दौरान मौत के घाट उतार दिया गया था. अयेन्दे फिदेल कास्त्रो से भेंट में मिलीएके-47 रायफल से अपनी जान बचाने की नाकाम कोशिश करते हुए मारे गए. उस पूरे घटनाक्रम पर मार्च 1974 में उपन्यासकार गैब्रिएल गार्सिया मार्केज ने यह लेख लिखा था जो ‘न्यूस्टेट्समैन’में प्रकाशित हुआ था. इसमें उन्होंने चिली में अयेन्दे के कार्यों, अमेरिका के साथ तख्तापलट के साजिशकर्ताओं की साठगाँठ और उनके उत्तराधिकारी जनरल आगुस्टो पिनोशे के उदय की छानबीन की है. यह लेख सिर्फ अयेन्दे के जुझारू जज्बे का नहीं बल्कि वृहत्तर लैटिन अमेरिकी समाज और जिंदगी पर मार्केज की नजर और एक नागरिक के रूप में उससे उनके गहरे जुड़ाव का भी उदाहरण है. # अशोक कुमार 

सल्वादोर अयेन्दे

सल्वादोर अयेन्दे

By ग्रैब्रिएल गार्सिया मार्केज

यह सन 1969के अंतिम दिनों की बात है जब वाशिंगटन के एक उपनगर के एक घर में पेंटागन (अमेरिकी रक्षा मंत्रालय) के तीन जनरलों ने चिली की सेना के पाँच अफसरों के साथ दावत की. मेजबान थे अमेरिका में चिली सैन्य मिशन के सहायक एयर अटैची लेफ्टिनेंट कर्नल जेरार्दो लोपेज अंगुलो. उनके चिली-मेहमान थे सेना के अन्य विभागों के उनके सहकर्मी. वह दावत चिली वायुसेना अकादमी के नए डायरेक्टर कार्लोस तोरो माज़ोते के सम्मान में थी. माज़ोते एक अध्ययन मिशन पर एक दिन पहले वहाँ पहुँचे थे. उन आठ अफसरों ने फलों का सलाद, बछड़े का भुना गोश्त और मटर खाया और सुदूर दक्षिण में स्थित अपने देश से लाई दिलकश शराबें पीं, जहाँ तब समुद्रतटों पर पक्षियों के चहचहाने का मौसम था, जबकि वाशिंगटन में उन दिनों बर्फ गिर रही थी. उन्होंने ज्यादातर बातें अंग्रेजी में कीं. उसी एकमात्र विषय को लेकर जिसमें उन दिनों चिलीवासियों की खास दिलचस्पी थी- आने वाले सितंबर में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव. खाने के बाद मीठे के दौरान  पेंटागन के एक जनरल ने पूछा कि अगर सल्वादोर अयेन्दे जैसा कोई वामपंथी उम्मीदवार चुनाव जीत जाएगा तो चिली-सेना क्या करेगी. जनरल तोरो ने जवाब दिया, ‘‘हम आधे घंटे में मोनेदा पैलेस को कब्जे में ले लेंगे,  भले ही हमें इसके लिए उसे आग लगाकर ध्वस्त ही क्यों न कर देना पड़े.’’

मेहमानों में जनरल अर्नेस्तो बाएजा भी थे जो अभी (1974 में) चिली के राष्ट्रीय सुरक्षा के निदेशक हैं. उन्होंने ही गत सितंबर में तख्तापलट के दौरान प्रेसिडेंशियल पैलेस पर हुए आक्रमण का नेतृत्व किया था और उसे फूँक देने का हुक्म दिया था. उन शुरुआती दिनों में उनके जिन दो मातहतों को भी तख्तापलट के इस अभियान में मशहूर होना था, वे थे- जनरल आगुस्टो पिनोशे जो सैनिक परिषद (junta) के अध्यक्ष थे और दूसरे, जनरल हाविएर पैलासिओज. दावत की मेज पर वायुसेना के ब्रिगेडियर जनरल सर्जिओ फिगुएरोआ गुतिएरेज भी थे, जो अभी लोक निर्माण विभाग में मंत्री हैं, और सैनिक परिषद के दूसरे सदस्य वायुसेना के जनरल गुस्तावो लेह के घनिष्ठ मित्र हैं. गुस्तावो ने ही राष्ट्रपति भवन पर रॉकेटों से हमले का हुक्म दिया था. अंतिम मेहमान थे- एडमिरल आर्तूरो ट्रोंकोसो, जो अभी वाल्पाराइसो के नौसैनिक गवर्नर हैं; जिन्होंने प्रगतिशील नौसैनिक अफसरों के सफाए को अंजाम दिया था और उन लोगों में से एक थे जिन्होंने 11 सितंबर के सैनिक विद्रोह की अगुआई की थी.

वह दावत चिली-सेना के उच्चाधिकारियों और पेंटागन के बीच ऐतिहासिक बैठक साबित हुई. उसके बाद वाशिंगटन और सैन्तिआगो में हुई कई बैठकों में एक संभाव्य योजना पर सहमति बनी,जिसके तहत वैसे चिली सैनिक अधिकारी जो दिलोदिमाग से अमेरिकी हितों से बँधे हैं, अयेन्दे के ‘पॉपुलर यूनिटी कोअलिशन’ के द्वारा चुनाव जीतते ही सत्ता पर कब्जा कर लेंगे.

योजना पूरी तरह बेरहम थी. वह एक सीधी सैनिक कार्रवाई थी और ‘इंटरनेशनल टेलीफोन एंड टेलीग्राफ’ के दबाव का परिणाम नहीं थी. उस योजना के बीजारोपण में विश्व राजनीति के गहरे हेतुक छिपे थे. उत्तरी अमेरिका की तरफ जिसे इस कार्य का प्रभार मिला वह थी पेंटागन की सुरक्षा खुफिया एजेंसी; लेकिन व्यावहारिक रूप में यह भार नौसैनिक खुफिया एजेंसी को मिला जो सीआईए तथा नेशनल सिक्युरिटी काउंसिल के उच्चतर राजनीतिक नियंत्रण के अधीन थी. इस पूरे प्रोजेक्ट को थलसेना के बदले नौसेना के अधीन रखना एक सहज योजना थी, क्योंकि चिली के तख्तापलट की कार्रवाई को ऑपरेशन यूनिटास के साथ संपन्न होना था. यह नाम प्रशांत महासागर में अमेरिका और चिली के संयुक्त नौसैनिक अभ्यासों को दिया गया था. ऐसे अभ्यास प्रत्येक सितंबर के अंत में होते थे–यह वही महीना था जब चुनाव होने थे तथा चिली की जमीन और आकाश में युद्धास्त्रों और मौत की कला और विज्ञान में माहिर सैनिकों का जमावड़ा होना बिल्कुल स्वाभाविक लगता.

उस दौरान हेनरी किसिंजर ने चिली के एक ग्रुप के साथ व्यक्तिगत बातचीत में कहा था-‘‘पाइरेनीज की पहाड़ियों से नीचे दुनिया के दक्षिणी हिस्से में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है और ना ही मैं उसके बारे में कुछ जानता हूँ.’’उस समय तक वह संभाव्य योजना पूरे विस्तार में आकार ले चुकी थी और यह मानना असंभव है कि किसिंजर या खुद राष्ट्रपति निक्सन को इसकी जानकारी न थी.

चिली एक लंबाई में फैला देश है– 2260 मील लंबा और औसतन 119 मील चौड़ा, जिसमें एक करोड़ खुशहाल चिलीवासी रहते हैं और करीब तीस लाख लोग राजधानी सैंतिआगो के मेट्रोपोलिटन क्षेत्र में रहते हैं. इस देश की महानता इसके अंतर्निहित सद्गुणों की तादाद में नहीं है बल्कि इसकी कुछ खास विशिष्टताओं में है. यह देश एक ही चीज का उत्पादन गंभीरता से करता है, वह है तांब्र अयस्क और यह ताँबा दुनिया में बेहतरीन है. इसकी मात्रा रूस और अमेरिका के उत्पादन से थोड़ी ही कम है. यह देश अंगूर की शराब भी बनाता है, जो यूरोप की किसी ऐसी शराब से गुणवत्ता में कम नहीं है लेकिन इसका बहुत थोड़ी मात्रा में ही निर्यात होता है. चिली की प्रति व्यक्ति आय 650डालर है, जो लैटिन अमेरिका में उच्चतम है, लेकिन परम्परागत रूप से इसके कुल राष्ट्रीय उत्पाद का आधा हिस्सा सिर्फ़ तीन लाख लोगों में सिमटा है.

1932में चिली पूरे अमेरिकी महाद्वीप में पहला समाजवादी देश बना और मजदूरों के समर्थन से सरकार ने ताँबे और कोयले के राष्ट्रीयकरण का प्रयास किया. यह प्रयोग मात्र 13दिनों तक ही टिक सका. चिली में औसतन हर दो दिनों में एक बार और हर राष्ट्रपति चुनाव के समय एक विध्वंसकारी भूकंप अवश्य आता है. कुछ भूगर्भ वैज्ञानिकों के अनुसार चिली इस महाद्वीप का देश नहीं बल्कि कोहरेदार समुद्र में एंडीज पर्वतमाला का छज्जा है और उनका विश्वास है कि यह पूरा भूभाग भविष्य में आने वाली किसी प्रलय में विलीन हो जाएगा.

चिली के लोग अपने देश की तरह ही हैं. वे इस महाद्वीप में सबसे खुशमिजाज लोग हैं. वे जिंदादिली के साथ रहना पसंद करते हैं और जानते हैं कि जहाँ तक संभव हो या उससे कुछ अधिक ही बेहतरीन तरीके से कैसे जिया जाए. लेकिन उनमें संशयवाद और बौद्धिक चिंतन के प्रति एक खतरनाक रुझान है. एक सोमवार को एक चिलीवासी ने मुझसे कहा,‘‘किसी भी चिलीवासी को यह यकीन नहीं कि कल मंगलवार होगा.’’ और वह खुद भी उन्हीं में से था. फिर भी इस गहन अविश्वास के बावजूद, या शायद इसके कारण ही चिलीवासियों ने एक प्राकृतिक सभ्यता, राजनीतिक परिपक्वता और सांस्कृतिक स्तर को उस सीमा तक हासिल किया है जो उन्हें औरों से अलग कोटि में रखता है. साहित्य के तीन नोबेल पुरस्कार जो लैटिन अमेरिका ने जीते हैं,में से दो चिलीवासियों के खाते में गए हैं. उनमें से एक पाब्लो नेरूदा इस शताब्दी के महानतम कवि थे. किसिंजर को संभवतः यह सब मालूम रहा होगा जब उन्होंने कहा था कि मैं दुनिया के दक्षिणी भाग के बारे में कुछ नहीं जानता. जो भी हो,अमेरिका का खुफिया विभाग इससे बहुत आगे की जानकारियाँ रखता था. 1965 में चिली असामान्य सामाजिक और राजनीतिक जासूसी कार्रवाई ‘प्रोजेक्ट कैमेलौत’का केंद्रीय मंच बन गया. यह एक गुप्त अनुसंधान था जिसमें सटीक प्रश्नावलियाँ जनता के हर तबके,हर पेशे और हर संगठन के सामने रखी गई थीं और उसका प्रसार लैटिन अमेरिका के सुदूर हिस्से तक था. उसका उद्देश्य था- वैज्ञानिक तरीके से विभिन्न सामाजिक संगठनों के राजनीतिक विकास और सामाजिक रुझानों को चिन्हित करना. सेना के लिए तैयार की गई प्रश्नावली में वही सवाल थे जिन्हें वाशिंगटन की दावत में चिली के अधिकारियों ने फिर से सुना : ‘‘आपकी स्थिति क्या होगी अगर साम्यवाद सत्ता में आ जाएगा?’’ तब यह एक ख्याली जिज्ञासा भर थी.

चिली लंबे समय से अनुसंधान के लिए उत्तरी अमेरिका के सामाजिक वैज्ञानिकों का पसंदीदा क्षेत्र रहा है. इसके जनआंदोलन की उम्र और ताकत,इसके नेताओं की दृढ़ता तथा बुद्धिमता और खुद इसकी आर्थिक एवं सामाजिक परिस्थितियाँ इस देश की किस्मत लिखती थीं. यह बात यकीन से कहने के लिए कि चिली लैटिन अमेरिका में क्यूबा के बाद दूसरा समाजवादी गणराज्य होने की काबिलियत रखता है, किसी प्रोजेक्ट कैमेलौत के निष्कर्षों की जरूरत नहीं थी. इसलिए अमेरिका का लक्ष्य अयेन्दे को सत्ता में आने से रोकना भर नहीं था ताकि अमेरिका के निवेशों की सुरक्षा की जा सके; इससे भी बड़ा लक्ष्य यह था कि उस लाभदायक कार्यविधि को दुहराया जाए जिसे साम्राज्यवाद ने ब्राजील में सफलतापूर्वक अंजाम दिया था.

4 सितंबर 1970 को जैसा कि अनुमान था, समाजवादी डॉ. अयेन्दे चिली गणराज्य के राष्ट्रपति चुन लिए गए. हालाँकि तख्तापलट की वह संभाव्य योजना तब अमल में नहीं लाई गई. इसका सबसे बहुचर्चित और हास्यास्पद स्पष्टीकरण भी है : पेंटागन में किसी ने गलती कर दी और एक तथाकथित नौसेनिक-कोरस (समूहगान) के लिए 200 लोगों के वीजा का आवेदन दिया गया जो असल में सैनिक सत्तापलट के लिए विशेषज्ञों की एक टोली थी; हालाँकि उनमें कई एडमिरल ऐसे थे जो एक सुर भी नहीं लगा सकते थे. उस भारी भूल ने, ऐसा समझा जाता है, उस खतरनाक खेल को स्थगित करने में बड़ी भूमिका निभाई. सच यह है कि उस प्रोजेक्ट का गहराई से मूल्यांकन किया गया था : अमेरिका की दूसरी एजेंसियों ने,खासकर सीआईए और चिली में अमेरिका के राजदूत ने महसूस किया कि वह संभाव्य योजना  मूलतः एक सैनिक कार्रवाई थी और उस योजना में वर्तमान राजनीतिक एवं सामाजिक परिस्थितियों को अनदेखा कर दिया गया था.

वास्तव में पॉपुलर यूनिटी की जीत से वैसी कोई सामाजिक उथल-पुथल नहीं दिखाई दी जैसी अमेरिका को उम्मीद थी. अंतर्राष्ट्रीय मामलों में नई सरकार की स्वतंत्र नीतियाँ एवं आर्थिक मुद्दों पर उसकी दृढ़ता ने सामाजिक उत्सव का वातावरण पैदा कर दिया.

पहले वर्ष बैकिंग व्यवस्था के साथ-साथ 47 औद्योगिक कंपनियों का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया. कृषि सुधार कार्यक्रम में बड़े जमींदारों की साठ लाख एकड़ जमीन जब्त कर ली गई और वे जमीनें सामुदायिक संपत्ति में तब्दील हो गईं. मुद्रास्फीति की दर घट गई, संपूर्ण रोजगार का लक्ष्य प्राप्त हो गया और मजदूरी में 30 फीसदी की बढ़ोतरी हुई.

ताँबे का राष्ट्रीयकरण

क्रिस्टियन डेमोक्रेट एडुआर्डो फ्री की पिछली सरकार ने ताँबे के राष्ट्रीयकरण की दिशा में कदम उठाने शुरू किए थे. हालाँकि उन्होंने इसे ‘चिलीकरण’की संज्ञा दी थी. उस योजना ने यही किया कि अमेरिकी खनन संपत्तियों के 51 फीसदी अंश खरीद लिए और सिर्फ एल तेनिएन्ते की खानों के एवज में उसके कुल लिखित मूल्य (बुक वैल्यू) से ज्यादा कीमत अदा कर दी.

पॉपुलर यूनिटी ने सिर्फ एक अधिनियम के द्वारा, जिसे कांग्रेस में सभी लोकप्रिय दलों का समर्थन मिला,बिना क्षतिपूर्ति किए अमेरिकी कंपनी अनाकौंडा और केनेकॉट की अधीनस्थ कंपनियों के ताँबे के सारे स्टॉक जब्त कर लिए. सरकार ने हिसाब लगाया कि 15 वर्षों में इन दो कंपनियों ने 80 करोड़ डालर से ज्यादा मुनाफा कमाया था.

निम्न पूँजीपति वर्ग और मध्यवर्ग दो बड़ी सामाजिक शक्तियाँ थीं जो उस समय सैन्य तख्ता-पलट को समर्थन दे सकती थीं लेकिन इस नई सरकार में उनके पौ बारह हो गए थे. उनका यह अभूतपूर्व उत्कर्ष मजदूर वर्ग की कीमत पर नहीं था जैसा पहले हुआ करता था, बल्कि वित्तीय कुलीन तंत्र एवं विदेशी पूँजी की कीमत पर था. एक सामाजिक संगठन के रूप में सेना के लोगों का उद्गम और उनकी महत्त्वाकांक्षाएँ भी मध्यवर्ग के समान थीं;इसलिए उनके पास कोई ऐसी वजह नहीं थी कि  वे मुट्ठी भर बगावती अफसरों का साथ देते. इस सच्चाई का बोध क्रिस्टियन डेमोक्रेट्स को था,इसीलिए उन्होंने उस वक्त सैनिक षड्यंत्र का साथ नहीं दिया. इतना ही नहीं, उसका दृढ़ता से विरोध किया, क्योंकि वे जानते थे कि ऐसा नहीं करने पर वे सामान्य जनता की नजरों में गिर जाएँगे.

उनका उद्देश्य भिन्न था : हर संभव तरीके से सरकार की लोकप्रियता में बट्टा लगाना, ताकि मार्च 1973के चुनावों में कांग्रेस में दो-तिहाई बहुमत हासिल किया जा सके. इतने बहुमत की बदौलत वे गणतंत्र के राष्ट्रपति को संवैधानिक रूप से पद्च्युत कर सकते थे.

क्रिस्टियन डेमोक्रेट्स का संगठन इतना बड़ा था कि वह वर्गीय सीमाओं को लाँघता था. आधुनिक औद्योगिक मजदूर वर्ग,निम्न और मध्यम ग्रामीण भूस्वामी,शहरों का निम्न पूँजीपति वर्ग और मध्यवर्ग- इन सभी में उनका व्यापक प्रामाणिक जनाधार था. हालाँकि पॉपुलर यूनिटी का जनाधार भी अंतर्वर्गीय था फिर भी उसका मुख्य जनाधार कृषि मजदूरों और शहरी निम्न मध्यम वर्ग में था.

क्रिस्टियन डेमोक्रेट्स का उग्र दक्षिणपंथी नेशनल पार्टी के साथ गठबंधन था और इस गठबंधन का कांग्रेस तथा न्यायपालिका पर नियंत्रण था. पॉपुलर यूनिटी का कार्यपालिका पर नियंत्रण था. इन दो पार्टियों के ध्रुवीकरण का मतलब देश का ध्रुवीकरण था. विचित्र बात यह है कि कैथोलिक एडुआर्डो फ्री का मार्क्सवाद में विश्वास नहीं था फिर भी उन्होंने वर्ग संघर्ष का भरपूर फायदा उठाया और इस आग में खूब घी डाला ताकि सरकार को अस्थिर किया जा सके और इस देश को पतन एवं आर्थिक संकट के गर्त में डुबाया जा सके.

क्षतिपूर्ति के बिना संपत्तिहरण के परिणामस्वरूप अमेरिका द्वारा आर्थिक नाकेबंदी ने बाकी काम कर दिया. चिली में हर प्रकार का माल उत्पादित होता है- मोटरकार से लेकर टूथपेस्ट तक, लेकिन यह इस औद्योगिक आधार की मिथ्या पहचान है. 160सबसे महत्त्वपूर्ण फर्मों में 60 फीसदी पूँजी विदेशी थी और 80 प्रतिशत आधारभूत वस्तुएँ आयातित थीं. इसके अतिरिक्त देश को उपभोक्ता सामग्रियों के आयात के लिए प्रतिवर्ष 30 करोड़ डालर की जरूरत थी और 45 करोड़ डालर विदेशी कर्जों पर सूद को चुकाने के लिए भी.

लेकिन चिली की तात्कालिक जरूरतें असाधारण थीं और उनकी जड़ें गहरी थीं. उच्चवर्गीय खुशमिजाज औरतें राशनिंग, बढ़ती मुद्रास्फीति और गरीबों की दुर्दशा के खिलाफ आवाज उठाने के बहाने अपने खाली हाँडी-बरतन पीटते हुए सड़कों पर उतर गईं. यह संयोगवश नहीं था बल्कि इसके उलट बहुत अर्थगर्भित था, क्योंकि इन बनी-ठनी श्रीमतियों का वह तमाशा उसी दिन प्रदर्शित किया गया जिस दोपहर फिदेल कास्त्रो अपनी 30 दिवसीय यात्रा का अंत कर रहे थे. इसने सरकार के समर्थकों में सामाजिक लामबंदी का एक भूचाल बरपा दिया था.

विनाश का बीज

राष्ट्रपति अयेन्दे तब समझते थे और उन्होंने ऐसा कहा भी था कि जनता के पास सरकार है पर सत्ता नहीं है. यह उक्ति जितनी कटु प्रतीत होती थी उससे कहीं ज्यादा कटु थी और चेतावनी भरी थी क्योंकि अयेन्दे के भीतर एक कानूनवादी कीड़ा पलता था जिसमें उनके स्वयं के विनाश का बीज भी छिपा था– एक आदमी जिसने वैधानिकता की रक्षा में लड़ते-लड़ते मृत्यु का वरण किया. वे अपना सर ऊँचा करके ला मोनेदा पैलेस से बाहर चले जाने में सक्षम थे अगर कांग्रेस ने उन्हें संविधान के दायरे में पद्च्युत कर दिया होता.

इतालवी पत्रकार और राजनीतिज्ञ रोस-साना-रोजांदा, जिन्होंने उस दरमियान अयेन्दे से मुलाकात की थी, ने उन्हें थका हुआ और विषादपूर्ण आशंकाओं से भरा पाया था जब वे पीले सोफे पर बैठे उनसे बातें कर रहे थेजिसपर सात महीनों बाद गोलियों से छलनी और रायफल के कुंदे से कुचला उनका शव रखा जाने वाला था.मार्च 1973 के चुनावों में, जब उनकी तकदीर दाँव पर लगी थी,अगर पॉपुलर यूनिटी को 36 फीसदी मत भी मिले होते तो उनके लिए संतुष्टि की बात होती. किंतु चढ़ती मुद्रास्फीति,सख्त राशनिंग और उच्चवर्गीय खुशमिजाज औरतों के हाँडी-बरतन सहगान के बावजूद उन्हें 44 फीसदी मत मिले. यह ऐसी भव्य और निर्णायक जीत थी कि जब अयेन्दे अपने मित्र और हमराज पत्रकार अगूस्तो ओलिवारेस के साथ अपने कार्यालय में अकेले थे, तब उन्होंने दरवाजा बंद किया और क्यूएका नृत्य करने लगे थे.

क्रिस्टियन डेमोक्रेट्स के लिए यह सबूत था कि पॉपुलर यूनिटी गठबंधन द्वारा शुरू की गई सामाजिक न्याय की प्रक्रिया अब कानूनी उपायों द्वारा पीछे नहीं खींची जा सकती थी. लेकिन उनमें अपने कदमों के अंजाम को मापने की दृष्टि नहीं थी. अमेरिका के लिए यह चुनाव गंभीर चेतावनी था और महज उसके आर्थिक हितों के नुकसान से परे जा चुका था. यह शांतिपूर्ण परिवर्तन और सामाजिक बदलाव के निमित्त दुनिया के लोगों, खासकर फ्रांस और इटली, के लिए एक नजीर थी जहाँ मौजूदा परिस्थितियाँ चिली की तर्ज पर प्रयोग करने का आह्वान कर रही थीं. लेकिन उन्हें यह मंजूर नहीं  था. आंतरिक और बाह्य प्रत्याक्रमण की सारी शक्तियाँ एक ठोस गुट में एकजुट हो गईं.

सीआईए ने अंतिम प्रहार का खर्च उठाया

ट्रक मालिकों की हड़ताल अंतिम प्रहार थी. देश के विस्तृत भूगोल के कारण चिली की अर्थव्यवस्था उसके परिवहन पर निर्भर है. परिवहन को ठप्प करना देश को ठप्प करना है. विरोधी पार्टियों के लिए हड़ताल को समन्वित करना आसान था क्योंकि ट्रक मालिकों का संघ अपने कल-पुर्जों की दुर्लभता से परेशान था. इसके अतिरिक्त राष्ट्र के दक्षिणी हिस्से में ट्रक परिवहन को सरकार द्वारा अपने हाथ में लेने के कारण उनका व्यवसाय खतरे में पड़ गया था. यह हड़ताल अंत तक टिकी रही और इसने एक क्षण की भी राहत नहीं दी,और ऐसा इसलिए हो सका कि इसे बाहर से आर्थिक खुराक मिल रही थी. पाब्लो नेरूदा ने अपने एक दोस्त को लिखा था,‘‘हड़ताल को थामे रखने के लिए देश को डालरों से पाट दिया गया और…विदेशी पूँजी काला बाजार के रास्ते देश में प्रवेश करती रही.’’सैनिक सत्ता पलट के एक सप्ताह पहले तेल,दूध और रोटी के लाले पड़ गए.

पॉपुलर यूनिटी के अंतिम दिनों में जब अर्थव्यवस्था अस्त-व्यस्त हो चुकी थी. और देश गृहयुद्ध के कगार पर पहुँच चुका था, सरकार और विपक्षी दलों का प्रयास एक ही बिन्दु पर केंद्रित हो गया कि कैसे सेना में शक्ति संतुलन को अपने-अपने पक्ष में किया जाए. अंतिम चाल भ्रांतिपूर्ण थी : तख्तापलट के 48 घंटे पहले विपक्ष ने ऐसी चालें चलीं कि अयेन्दे का समर्थन करने वाले सारे उच्चपदस्थ अफसरों को बर्खास्त कर दिया गया और उनकी जगह एक-एक कर उन सारे अफसरों को दे दी गई जो वाशिंगटन की दावत में शामिल थे.

उस क्षण राजनीतिक शतरंज का खेल खिलाड़ियों के हाथ से निकल चुका था. वे एक ऐसे द्वंद्ववाद के दुष्चक्र में घसीट लिए गए थे जिससे पीछे लौटना असंभव था. खिलाड़ी खुद ही एक वृहत्तर शतरंज के खेल में मोहरे बन चुके थे. यह ऐसा खेल था जो साम्राज्यवाद और सरकार विरोधियों के निरे सम्मिलित षड्यंत्र के मुकाबले कहीं अधिक पेचीदा और राजनीतिक रूप से कहीं ज्यादा महत्त्वपूर्ण था. यह वर्गों के बीच का भयानक मुकाबला था जो उन्हीं के हाथों से फिसला जा रहा था जिन्होंने इसे हवा दी थी. यह स्वार्थों की क्रूर और खूँखार छीना-झपटी थी जिसकी परिणति एक विभीषिका में होनी थी;जिसकी अमेरिकी महाद्वीप के इतिहास में इससे पहले कोई मिसाल नहीं थी.

उन परिस्थितियों में सैनिक तख्तापलट की कार्रवाई रक्तहीन नहीं हो सकती थी. अयेन्दे यह जानते थे. चिली की सशस्त्र सेना ने, जब-जब उसके वर्गीय हित खतरे में पड़े हैं, आम धारणा के विपरीत राजनीति में हमेशा हस्तक्षेप किया है,और उसने यह काम बहुत निर्दयता से किया है. पिछले सौ वर्षों में देश ने दो-दो संविधान देखे हैं और वे दोनों संविधान हथियारों की ताकत से थोपे गए हैं और पिछली सैनिक कार्रवाई 50वर्षों की अवधि में छठी सैनिक कार्रवाई है.

चिली सेना की खूँरेजी उसका जन्मसिद्ध अधिकार है, जिसे उसने अराडकैनियन इंडियंस (दक्षिणी अमेरिका के मूल निवासी, जिनकी बची-खुची तादाद बाद में दक्षिण-मध्य चिली में केंद्रित हो गई) के विरुद्ध 300 वर्षों की भयानक मुठभेड़ों के जरिए उत्तराधिकार में प्राप्त किया है. इसके अग्रदूतों में से एक ने डींग मारी थी कि मैंने 1620 में एक लड़ाई में 2000 लोगों को अपने हाथों से मारा था. होआक्विन एडवर्ड बेलो ने अपने इतिवृत्त में लिखा है कि प्लेग की महामारी के दौरान सेना ने बीमार लोगों को उनके घरों से बाहर घसीटा और विषस्नान देकर मौत की नींद सुला दिया ताकि प्लेग का उन्मूलन किया जा सके. 1891 में सात माह के गृहयुद्ध के दौरान 10,000 लोग रक्तरंजित मुठभेड़ों में मार दिए गए. पेरूवियन लोगों का दावा है कि प्रशांत युद्ध में लिमा के कब्जे के दौरान चिली सैनिकों ने डॉन रिकार्डो पालमा का पुस्तकालय लूट लिया और वे सारी किताबें अपने साथ लेते गए–पढ़ने के लिए नहीं बल्कि चूतड़ पोंछने के लिए.

पाशविकता का इतिहास

लोकप्रिय आन्दोलनों को इसी तरह पाशविकता से कुचला गया है. 1906 के वालपाराइसो भूकंप के बाद नौसेना ने 8000 मजदूरों के संगठन का सफाया कर दिया था. शताब्दी के प्रारंभ में इफिके में, जब हड़ताली मजदूरों ने सैनिकों से बचने की कोशिश की तब उन्हें दस मिनटों के अंदर मशीनगनों से भून दिया गया और 2000 लोग मारे गए. 2 अप्रैल 1957 को सेना ने सैन्तिआगो के व्यापारिक क्षेत्र में एक नागरिक प्रतिरोध को कुचल दिया और मृतकों की संख्या का इसलिए पता नहीं चला क्योंकि लोगों को गुप्त रूप से दफना दिया गया. एडुआर्डो फ्री सरकार के कार्यकाल में एल सल्वादोर की एक खान में एक हड़ताल के दौरान एक सैनिक गश्ती दल ने एक प्रदर्शन पर गोलियाँ चलाईं और छह लोगों को मौत के घाट उतार दिया,उनमें कुछ बच्चे और गर्भवती औरतें भी थीं. उस गश्ती दल का कमांडर 52 साल का एक अज्ञात जनरल था जो पाँच बच्चों का पिता था,भूगोल का शिक्षक था,उसने सैनिक विषयों पर कई पुस्तकें लिखी थीं : और उसका नाम ऑगुस्टो पिनोशे था.

उस नृशंस सेना की कानूनसम्मतता और भद्रता का मिथक चिली के पूँजीपति वर्ग ने अपने फायदे के लिए गढ़ा था. पॉपुलर यूनिटी ने उस मिथक को जिंदा रखा क्योंकि उन्हें आशा थी कि सेना के उच्चपदस्थ अफसरों के वर्गीय गठन को अपने पक्ष में मोड़ा जा सकता है. लेकिन अयेन्दे को कैराबिनेरोस पर ज्यादा भरोसा था जो एक लोकप्रिय सैनिक टुकड़ी थी और मूलतः कृषक वर्ग से आती थी और गणराज्य के राष्ट्रपति के सीधे नियंत्रण में थी. वास्तव में बगावती गुट को उस वरीय अफसर को ढूँढ़ने के लिए सेना की वरीयता सूची में छह पायदान नीचे उतरना पड़ा जो तख्तापलट को सपोर्ट कर सकता था. नौजवान अफसरों ने सैन्तिआगो के कनिष्ठ अफसरों के क्लब में अपनी स्थिति सुदृढ़ कर ली और वे चार दिनों तक टिके रहे जब तक उनका सफाया नहीं कर दिया गया.

तख्तापलट की पूर्वसंध्या पर सेना के भीतर छिड़ा वह गुप्त युद्ध वास्तव में एक सर्वविदित संग्राम था. वे अफसर जिन्होंने उस कार्रवाई में साथ नहीं दिया और वे भी जिन्होंने दमन की आज्ञाओं का समुचित पालन नहीं किया,मार डाले गए. सैन्तिआगो में तथा प्रांतों में पूरी रेजीमेंट्स ने विद्रोह कर दिया लेकिन उन्हें निर्दयता से दबा दिया गया ताकि सैनिक इससे सबक लें.

विना देल मार में बख्तरबंद यूनिटों के कप्तान कर्नल कान्तुरिआस को उनके अधीनस्थों ने मशीनगन से भून दिया. सुदूर भविष्य में ही पता लग पाएगा कि उस बूचड़खाने में कितने लोग मारे गए क्योंकि लाशों को गुप्त रूप से सेना के कचरा ट्रकों में भरकर कहीं दूर दफन कर दिया गया. कुल मिलाकर सिर्फ 50 अफसर ही भरोसे के लायक समझे गए जो नेतृत्व कर सकते थे.

विदेशी एजेंटों की भूमिका

इस षड्यंत्र की पूरी तस्वीर बनाने के लिए कई स्रोतों से टुकड़े जुटाने पड़ेंगे. उनमें से कुछ विश्वसनीय हैं और कुछ अविश्वसनीय. लगता है उस कार्रवाई में कई विदेशी एजेंटों ने भाग लिया होगा. चिली के गुप्त स्रोतों से हमें पता चला है कि ला मोनेदा पैलेस पर हुई बमबारी-जिसकी तकनीकी सटीकता ने विशेषज्ञों को अचम्भे में डाल दिया- अमेरिकी हवाई कलाबाजों की एक टोली द्वारा अंजाम दी गई थी जो ऑपरेशन यूनिटास (अमेरिका और चिली का संयुक्त युद्धाभ्यास) की आड़ में देश में प्रवेश कर चुकी थी, और जिसे आगामी 18 सितंबर को चिली के राष्ट्रीय स्वतंत्रता दिवस पर उड़न सर्कस प्रदर्शित करना था. इसका भी साक्ष्य मिला है कि पड़ोसी देशों की खुफिया पुलिस के कई सदस्य बोलीविया की सीमा से प्रवेश कर चुके थे और सत्तापलट के दिन तक छिपे रहे थे, जब उन्होंने लैटिन अमेरिका के अन्य देशों के राजनीतिक शरणार्थियों का खूनी उत्पीड़न किया था.

ब्राजील, जो प्रमुख गोरिल्लाओं की अपनी भूमि है,ने उन सेवाओं का बीड़ा उठाया था. दो साल पहले ब्राजील ने बोलीविया में प्रतिक्रांतिकारी तख्तापलट को अंजाम दिया था, जिसका मतलब था चिली के लिए बहुत बड़े समर्थन का लोप और इसने हर तरीके और साधन से विध्वंसक कार्रवाइयों को सरल बना दिया. अमेरिका द्वारा ब्राजील को दिए गए कर्जों का एक हिस्सा गुप्त रूप से बोलीविया को स्थानांतरित कर दिया गया ताकि चिली में विध्वंसक कार्रवाइयों को आर्थिक मदद पहुँचाई जा सके. 1972में अमेरिका के एक सैनिक सलाहकार ग्रुप ने ला पाज की यात्रा की, जिसका उद्देश्य अज्ञात है. हो सकता है यह एक आकस्मिक घटना हो. जो भी हो,उस यात्रा के थोड़े ही दिनों बाद चिली की सीमा पर सैनिकों और सैनिक साजोसामान का जमावड़ा शुरू हो गया, जिसने चिली सेना को अतिरिक्त मौका दिया कि वे अपनी स्थिति को मजबूत करें और आसन्न तख्तापलट के नेतृत्व के अनुकूल मनचाहे तबादले और पदोन्नतियाँ करें.

अंत में, 11 सितंबर को, जब ऑपरेशन यूनिटास प्रगति पर था,वाशिंगटन की दावत में तैयार की गई योजना को कार्यान्वित कर दिया गया– नियत समय से तीन साल बाद, लेकिन ठीक उसी तरह जिस तरह विचार किया गया था : बैरकों  के अंदर एक पारंपरिक सैनिक विद्रोह की तरह नहीं बल्कि एक विध्वंसक युद्ध की तरह.

इसे ऐसा ही होना था, क्योंकि यह मामला सिर्फ किसी को सत्ताच्युत करने का नहीं था बल्कि ब्राजील से आयातित शैतानी सोच को थोपने का था, ताकि उस राजनीतिक और सामाजिक ढाँचे का, जिसने पॉपुलर यूनिटी को संभव बनाया था,कोई चिह्न भी न बचे. सबसे निष्ठुर चरण शुरू हो गया था.

उस अंतिम मुठभेड़ में, जब देश विध्वंस की बेकाबू और अदृश्य शक्तियों के रहम पर था, अयेन्दे तब भी वैधानिकता से बँधे थे. उनके जीवन का सबसे नाटकीय अंतर्विरोध यह था कि वे एक ही समय में हिंसा के जन्मजात शत्रु और उत्कट क्रांतिकारी एक साथ थे. उनका विश्वास था कि उन्होंने अंतर्विरोध का समाधान कर दिया है. यह विश्वास इस परिकल्पना पर आधारित था कि चिली के हालात पूँजीवादी कानूनों के दायरे में समाजवाद की ओर शांतिपूर्ण विकास की इजाजत देंगे. अनुभव ने उन्हें बहुत देर से सिखाया कि व्यवस्था को वैसी सरकार से नहीं बदला जा सकता जिसके पास सत्ता न हो.

देर से ही सही लेकिन उनका मोहभंग अवश्य हुआ अन्यथा वे मौत का प्रतिरोध नहीं करते. वे उस जलते पैलेस को बचाने का प्रयास नहीं करते जो उनका अपना नहीं था. वह एक ऐसा गमजदा घर था जिसे एक इतालवी वास्तुकार ने टकसाल के लिए बनाया था और जो अंत में एक सत्ताविहीन राष्ट्रपति का शरणस्थल बना. उन्होंने 6 घंटों तक एक सब-मशीनगन से, जिसे कास्त्रो ने उन्हें दिया था, प्रतिरोध किया. वह पहला हथियार था जिससे अयेन्दे ने कभी फायर किया हो.

शाम 4 बजे मेजर जनरल हाविएर पालासिओस अपने सहयोगी कैप्टन गालार्दो एवं अन्य अफसरों के साथ दूसरी मंजिल पर पहुँचने में कामयाब हुआ. वहाँ लाल बैठकखाने में नकली लुई पंद्रहवीं कुर्सियों,चीनी ड्रैगन फूलदानों और रूगेन्दास चित्रों के बीच अयेन्दे उनका इंतजार कर रहे थे. उन्होंने बिना टाई की कमीज और सर पर खदानों में काम करने वाले मजदूरों का हेलमेट पहना हुआ था और उनके कपड़े खून से रंगे थे. उनके हाथ में सब-मशीनगन थी, लेकिन गोलियाँ खत्म होने को थीं.

अयेन्दे जनरल पालासिओस को अच्छी तरह जानते थे. कुछ दिन पहले उन्होंने आगुस्टो ओलिवारेज से कहा था कि यह खतरनाक आदमी है जिसके अमेरिकी दूतावास से गहरे रिश्ते हैं. जैसे ही उन्होंने उसे सीढ़ियों पर चढ़ते देखा, वे जोर से चिल्लाए : ‘‘गद्दार!’’ और उसके हाथ पर गोली मारी.

अंत तक लड़े

नाम न बताने की शर्त पर एक गवाह ने मुझे बताया कि अयेन्दे उस गिरोह की गोलियों का जवाब गोलियों से देते हुए मरे. तब सारे अफसरों ने धार्मिक अनुष्ठान की तरह उनके शरीर पर गोली दागीं. अंत में एक कनिष्ठ अफसर ने अपनी रायफल के कुंदे से उनके चेहरे को कुचल दिया.

उनकी एक तस्वीर है—‘एल मर्कुरिओ’ समाचारपत्र के एक फोटोग्राफर हुआन एनरिक लिरा ने वह तस्वीर खींची थी. वही एकमात्र व्यक्ति था जिसे लाश की तस्वीर खींचने की इजाजत मिली. वह इतनी क्षत-विक्षत थी कि जब उन्होंने ताबूत में रखी लाश उनकी पत्नी सेनोरा होर्टेनासिया अयेन्दे को दिखाई तो चेहरे से कपड़े को हटाने नहीं दिया.

वे आगामी जुलाई में 64 वर्ष के हो जाते. उनका सबसे बड़ा गुण था- मरते दम तक हार नहीं मानना. लेकिन किस्मत ने उन्हें शहीद होने की दुर्लभ और त्रासद महानता ही बख्शी, जो उनके हिस्से आई पूँजीवादी कानून के एक पुराने छल की हिफाजत के लिए,सुप्रीम कोर्ट को बचाने के लिए- जिसने उनके बजाय उनके हत्यारों को सही ठहराया, एक कमबख्त कांग्रेस को बचाने के लिए जिसने उन्हें अवैध घोषित किया लेकिन जो अपने अपहर्ताओं की मरजी के आगे खुद फरामोशी में निहुर गई, विरोधी दलों की आजादी को बचाने के लिए जिन्होंने अपनी आत्माएँ फासीवाद को बेच दीं, औरएक बेहूदी व्यवस्था- जिसे बगैर खून बहाए समाप्त करने का बीड़ा उन्होंने उठाया था- के कुतर खाए गए साजोसामान को बचाने के लिए.

चिलीवासियों के दुर्भाग्य से यह नाटक चिली में खेला गया; लेकिन यह इतिहास के पन्नों में ऐसे दर्ज होगा जैसे यह हम सबों के साथ- इस युग के बच्चों के साथ- घटित हुआ हो,और यह हमेशा के लिए हमारी जिंदगी में बना रहेगा.

मार्केज के इस लेख का अनुवाद करने वाले अशोक कुमार कम्युनिस्ट आंदोलन से गहरे रूप से जुड़े रहे हैं। मार्क्सवादी दर्शन-साहित्य के अद्भुत अध्येता। फिलहाल  सिविल कोर्ट, गया,  बिहार में अधिवक्ता। गया के ही शास्त्री नगर कॉलोनी में रहते हैं। इनसे +919973046066 और ashokjpn@gmail.com पर संपर्क संभव है।

आभार- हंस जून 2014 

शापित नस्लों के एकांत और यूटोपिया: गैब्रिएल गार्सिया मार्केज (अनु. संदीप सिंह)

 19 अप्रैल को अंग्रेजी अखबार ‘द हिन्दु’ में जिस रोज मार्केज की मृत्यु की खबर प्रकाशित हुयी उसी रोज एक खबर ‘क्राइम वेव इन सल्वादोर’ के नाम से छपी थी. दोनों घटनाएं अद्भुत तरीके से एक दुसरे से जुडी हुई थीं. मार्खेज के बारे में लोग जानते ही हैं. मैं यहाँ सल्वादोर की बात करूँगा जो कि खबर के मुताबिक लूट लिया गया था.  ये संभवतः दुनिया की सबसे बड़ी गैंग थी असाधारण और अनौपचारिक. बच्चे, औरतें और मर्दों के जत्थे निकले, कई जगह जुलूसों की शक्ल में, रोमांच, डर और उन्मादी मस्ती से भरे हुए और जो कुछ भी लूट सकते थे, ले जा सकते थे, ले गए. ब्राजील का शहर साल्वाडोर जो 19 अप्रैल के दो रोज पहले लुट गया. इस लूटपाट में तकरीबन चालीस लोग मारे गए. यहाँ फ़ुटबाल विश्वकप के कुछ मैच भी होने हैं. हुआ ये कि शहर की पुलिस वेतन वगैरा को लेकर हड़ताल पर चली गयी थी सो लोग संभवतः किसी आप्त प्रेरणा से संचालित होकर पूरा शहर लूट ले गए. अगर आपने फिल्म ‘सिटी ऑफ़ गोल्ड’ देखी होगी तो क्या हुआ होगा, इस दृश्य की कल्पना कर सकते हैं. कल्पना कीजिये कि शहर की बस्तियों से लोग झुण्ड के झुण्ड बनाकर निकल रहे हैं हाथों में हथौड़ियाँ, चाकू, लोहे की रॉड और छोटी-बड़ी पिस्तौलें लेकर दुकानों को, मॉल्स को लूट लेने के लिए. वे चीख रहे हैं, हंस रहे हैं, भाग रहे हैं, कईयों के हाथों में सिगार या शराब की बोतलें हैं, इसमें कईयों के सिर फटेंगे, कईयों की टांगों, बाहों और मुंह पर घाव होंगें, क्या पता एक किसी की आँखें किसी मुठभेड़ की भेंट चढ़ जाये और कुछ कभी नहीं लौटेंगें. अगर यह दृश्य साहित्य या कला में आये तो कैसा लगेगा- यथार्थ, जादुई यथार्थ या अति यथार्थ! ये है लैटिन अमेरिका! मार्केज़ का लैटिन अमेरिका!

पर ठहरिये, मास्टरस्ट्रोक तो पढ लीजिए. इस घटना पर बयान  सरकार के प्रतिनिधि ने कहा ‘हाँ, मौतें औसत से थोड़ा ज्यादा हुई हैं, पर इतनी भी ज्यादा नहीं की एब्सर्ड कहा जा सके’. पिछली बार जब पुलिस हड़ताल पर गयी थी तो तकरीबन 156 मौतें हुई थीं!! 

कभी मार्केज़ ने कहा भी था कि पता नहीं क्यों लोग उनके लेखन को ‘जादुई’ वगैरह कहते हैं क्योंकि उनके हिसाब से लैटिन अमेरिका का यथार्थ अपने आप में इतना विकट, विषम और कई बार मायावी होने जैसा है कि वह अन्य आख्यानों, मूलतः अंग्रेज़ी साहित्य परंपरा द्वारा उपलब्ध, स्थापित और बहुप्रचारित साहित्यिक रूपकों, बिम्बों, प्रतीकों और आख्यानात्मक संरचनाओं से पूरापूरी अभिव्यक्त ही नहीं किया जा सकता. इस समाज के इतिहास और संस्कृति को समझने के लिए आपको माच्चू-पिच्चू की ऊँचाइयों पर मिलने वाले अनन्त सन्नाटे को सुनना होगा, इंका और अजोर सभ्यताओं की जीवाश्मित अस्थियों की कहानियां सुननी होंगी, महाद्वीप के रहस्यमयी जंगलों में भूलना-भटकना होगा, सोने, चांदी, चीनी, केले और कॉफ़ी के क्रूर दस्तावेजों की ऐय्यारी को फिर फिर पढना होगा जिसकी गवाह एडूअर्दो गैलिआनो के शब्दों में इस महाद्वीप की छितरायी हुई नसें हैं. #  संदीप सिंह

Courtesy:  Newsweek

Courtesy: Newsweek

 लैटिन अमेरिका का एकांत   

By गैब्रिएल गार्सिया मार्केज

मैग्लेन के साथ दुनिया का पहला चक्कर लगा रहे फ्लोरेंस के जहाजी अंतोनियो पिगाफेटा (स्पेन के बादशाह चार्ल्स प्रथम के आदेश पर खोजकर्ता फ़र्दिनांद मैग्लेन को 1519 में समुद्री मार्ग की खोज के लिए भेजा गया था. पिगाफेटा इस समुद्री यात्रा में उसका सहायक था) ने हमारे दक्षिणी छोर से गुजरते हुए अमेरिका के बारे में जो लिखा वह चीजों का कमोबेश सटीक विवरण होते हुए भी फैंटेसी के करीब पड़ताहै. वह लिखता है कि उसने ऐसे सुअर देखे जिनकी नाभियाँ उनके चूतडों पर थीं, बिना पंजों वाली मादा पक्षियाँ जो अपने साथी की पीठ पर अंडे सेती थीं, और भी ऐसे कई जीव; बिना जीभों वाले पेलिकन (जलसिंह) जिनकी चोंचें चम्मच जैसी थीं. वह लिखता है कि उसने एक ऐसे जीव को देखा जिसके सिर और कान खच्चर के थे, शरीर ऊंट का, पैर हिरन के और जिसकी आवाज में घोड़े की हिनहिनाहट थी. वह बताता है कि पैटागोनिया में एक नेटिव बन्दे ने जब अपनी शक्ल आईने में पहली बार देखी तो वह मुस्टंडा अपनी ही छवि के आतंक से बेहोश हो गया.

यह छोटी और दिलचस्प किताब, जिसमें हमारे आज के उपन्यासों के बीज छुपे हुए हैं, हमारे यथार्थ का किसी भी मायने में चकित करने वाला विवरण नहीं है. ‘एंडीज़ के किस्सों’ में हमारे लिए ऐसी और भी कहानियां हैं. रहस्यमयी और भ्रमित करने वाली हमारे सपनों की भूमि ‘अल डराडो’ (शाब्दिक अर्थ- सोने का राजा. स्पेनियों के आक्रमण से पहले कोलंबिया की एक जनजाति का मुखिया परंपरा के अनुसार अपने बदन पर सोने की गर्द लपेटे रहता था. बाद में यह विशेषण स्पेनी दंतकथा की लुप्त स्वर्णनगरी के नाम के तौर पर प्रयोग किया जाने लगा.), सदियों से कई सारे नक्शों में नक्शानवीसों की फंतासियों के मुताबिक, अपना रंग-रूप और स्थान बदलती रही है. चिर युवा बना देने वाले झरने की तलाश में मिथकीय आलवार तुनेस वेजा डे वाका (1527 में अमेरिकी अभियान पर निकले स्पेनी दल का सदस्य, जो जहाज के टूट जाने और साथियों के भटक जाने के बाद कुछ कबीलों का सदस्य रहा. उन कबीलों के रहन-सहन और परम्पराओं पर उसके लिखे ब्योरे यूरोपियनों के आगमन से पहले के अमेरिकी जनजीवन का प्रमाणिक दस्तावेज माने जाते हैं.) आठ सालों तक मैक्सिको के उत्तरी इलाके को छानता रहा. इस भ्रामक अभियान के सदस्यों ने एक दूसरे को भकोस लिया और अभियान में शामिल छः सौ लोगों में से केवल पांच जीवित लौटे. उस युग की अनेकों रहस्यमयी कहानियों में से एक यह है कि हरेक खच्चर पर सौ पोंड सोने से लदे हुए 11 हज़ार खच्चर, जब कुज्को (प्राचीन इंका राज्य का एक शहर, जिसका यह नाम उसके अठारह साल के शासक के नाम पर पड़ा.) से रंगदारी पहुंचाने अताहुआल्पा (इंका साम्राज्य के संप्रभु राज्य वातान्तिन्सुयु का शासक) के लिए चले पर कभी नहीं पहुंचे. आगे चलकर औपनिवेशिक काल में कार्टाजेना द इंडियाज़ (उत्तरी कोलंबिया का एक शहर) में कछारी जमीन में पाली मुर्गियां बेची जाती थीं जिनके पेषणी में सोने के छोटे-छोटे कण मिलते थे. एक औपनिवेशिक का स्वर्ण-प्रेम अभी तक हमें घेरे हुए है. 19वीं सदी में पनामा के इस्थ्मस (उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका को जोड़ने वाली संकरी पट्टी.) के आर-पार समुद्रों के बीच रेल बिछाने की संभावना का अध्ययन कर रहे जर्मन मिशन के मुताबिक यह योजना एक ही शर्त पर संभव हो सकती थी कि रेल की पटरिययाँ लोहे की न होकर सोने की हों- क्योंकि लोहा वहां बहुत दुर्लभ था.

स्पेनी गुलामी से आज़ादी ने हमारे पागलपन को कम नहीं किया है. तीन बार तानाशाह रह चुके मैक्सिको के जनरल एतोनियो नोपेन डे सान्ताना ने तथाकथित पेस्ट्री युद्ध (1839 में मेक्सिको और फ्रांस के बीच हुआ युद्ध) में गँवाई अपनी दाहिनी टांग का भव्य अंतिम संस्कार आयोजित किया. 16 साल तक इक्वाडोर पर एक निरंकुश राजा की तरह राज करने वाले जनरल ग्रेब्रियल गर्सिया मोरलेनो (जो उदारपंथियों की घृणा का शिकार बना, और जिसने 1875 में अपनी हत्या से पहले तत्कालीन पोप को लिखे एक पत्र में इसकी आशंका जताई थी.) के मरने के उपरान्त तमगों से सजे-धजे उसके शव को पूरी वेशभूषा में राष्ट्रपति की कुर्सी पर बिठाया गया. जनरल मैक्सिमिलियानो हारनान्डेज़ मार्टिनेज़ ने, जो अल सल्वाडोर का धार्मिक निरंकुश शासक था और जिसने तीस हज़ार किसानों का कत्लेआम करवाया था, अपने खाने में जहर का पता लगाने के लिए एक पेंडुलम का आविष्कार किया तथा लाल बुखार से बचने के लिए लैम्पपोस्टों को लाल कागज़ से ढँकवा दिया था. जनरल फ्रांसिस्को मोराज़ की प्रतिमा जो तेगूसिगाल्पा के मुख्य चौराहे पर लगी है वह वस्तुतः ‘मार्शल ने’ की है जिसे पेरिस के पुरानी–धुरानी और दोयम दर्जे के कबाड़खाने से खरीदा गया था.

11 साल पहले, जब हमारे समय के महान चिली कवि पाब्लो नेरुदा ने अपने जादुई शब्दों से इस हॉल में बैठे श्रोताओं को चमत्कृत किया तबसे अच्छी-बुरी मंशा वाले यूरोपीय, लातिन अमेरिका की दन्तकथाओं की तरफ और किंवदंती की हद तक जिद्दी उसके अभिशापित मर्दों और ऐतिहासिक औरतों की तरफ, और ज्यादा आवेग से आकर्षित हुए. तब से हमें एक पल का चैन नहीं है. अपने जलते महल में घिरा हुआ एक प्रोमेथियन राष्ट्रपति (चिली के राष्ट्रपति सल्वादोर अयेंदे) एक पूरी सेना से अकेले लड़ते हुए मारा गया; और वे दो रहस्यमयी हवाई दुर्घटनाएं, जिनका सच हम अभी भी नहीं जानते,  जिन्होंने अपने लोगों के आत्मसम्मान को वापस लौटने वाले एक महान ह्रदय वाले राष्ट्रपति (1981 में एक हवाई दुर्घटना में मारे गए इक्वेडोर के राष्ट्रपति जाईमे रोल्डोस अगिलेरा; इस दुर्घटना को अमेरिका की साजिश बताया गया था.) और लोकतान्त्रिक सिपाही (पानं के सैन्य शासक ओमर टोरिहो, जिनकी मौत भी अगिलेरा से मिलती-जुलती हवाई दुर्घटना में हुई.) के जीवन का अंत कर दिया गया. हमारे यहाँ अब तक पांच बड़े युद्ध और सत्रह तख्तापलट हो चुके हैं; इसी बीच एक ऐसा पैशाचिक तानाशाह (अयेंदे ड=के बाद सत्ता संभालने वाला चिली का तानाशाह आगुस्टो पिनोशे, जिसने हजारों वामपंथियों का संहार करवाया. ) उभरा है जो पहली बार ईश्वर के नाम पर लैटिन अमेरिका में हमारे समय का नरसंहार रच रहा है. इस बीच, यूरोप में सन 1970 से अब तक जितने बच्चे पैदा हुए उससे ज्यादा, 21 लाख लातिन अमेरिकी बच्चे अपनी उम्र के एक साल पूरा होने से पहले ही मर गए. दमन के चलते गायब लोगों की संख्या एक लाख बीस हज़ार है, मानों उप्पस्ला के लोगों के लिए कोई जवाबदेह नहीं है. अर्जेंटीना की सलाखों के पीछे पैदा हुए उन असंख्य गर्भवती महिलाओं के बच्चे जिनकी कोई शिनाख्त नहीं हो सकी और जिन्हें फ़ौजी हुकूमत के फरमानों के तहत चुपचाप गोद ले लिया गया या अनाथालयों में भेज दिया गया. पूरे महाद्वीप में तकरीबन दो लाख औरतें और मर्द मार दिए गए क्योंकि उन्होंने इन परिस्थितियों को चुनौती देने की कोशिश की; और तकरीबन एक लाख लोग तीन दुर्भाग्यशाली देशों – निकारागुआ, अल सल्वाडोर और ग्वाटेमाला में. फ़र्ज़ कीजिए कि यही घटना संयक्त राज्य अमेरिका में हुई होती तो चार सालों में 16 लाख लोग हिंसक मौतों के शिकार होते.

अपनी मेहमाननवाजी के लिए मशहूर चिली के दस लाख लोगों को, जो पूरी आबादी का दस फीसदी है, मजबूरन अपना देश छोड़ना पड़ा. 25 लाख लोगों का एक छोटा सा देश उरुग्वे, जो महाद्वीप का सबसे सभ्य देश माना जाता है, अपने हर पांच में से एक व्यक्ति को निर्वासन में खो चुका है. अल सल्वाडोर, 1979 से जारी गृहयुद्ध के चलते हर बीस मिनट में एक रिफ्यूजी पैदा कर रहा है. इन निष्कासित और जबरिया शरणार्थी बना दिए गए लैटिन अमेरीकियों का अगर कोई देश बनाया जाय तो वह नार्वे की आबादी से बड़ा होगा.

 मैं हिमाकत के साथ यह कह सकता हूँ कि जिसने स्वीडिश अकेडमी ऑफ़ लेटर्स का ध्यान खींचा है वह हमारा बेढंगा यथार्थ है न कि उसका साहित्यिक निरूपण. वह यथार्थ जो सिर्फ कागजों पर नहीं है बल्कि हमारे अन्दर जीवित है बल्कि हमारी रोज की जिन्दगी में हर लम्हे होने वाली असंख्य मौतों को तय करता है, जिसने हमारे भीतर एक ऐसी अतृप्त रचनात्मकता को पैदा किया है जो दर्द और ख़ूबसूरती से भरी हुई है और जिसका यह घुमंतू और स्मृत्याभासी(nostalgic) कोलंबियाई एक नगण्य लेखक है. कवि और फ़कीर, संगीतज्ञ और पैगंबर, योद्धा और बदमाश, इस बेलगाम यथार्थ के इन सारे प्राणियों की हमें बहुत कल्पना नहीं करनी पड़ती. और यही हमारी समस्या है कि जीवन को विश्वास योग्य तरीके से बताने के लिए हमारे पास पारंपरिक उपकरण नहीं हैं. मेरे दोस्तों, यही हमारे एकांत का सार है.

यही वे मुश्किलें हैं जिनका अभिप्राय हम बताते हैं और जो हमारे आड़े आती हैं. इसीलिये यह बात समझ में आती है कि अपनी संस्कृतियों की श्रेष्ठता के बखान में जुटे  दुनिया के इस हिस्से (यूरोप) के अक्लमंद लोग हमारे बारे में बताते वक़्त खुद को सक्षम महसूस नहीं करते. यह स्वाभाविक है कि वे उन्हीं प्रतिमानों से हमें देखते हैं जिनसे वे खुद को मापते हैं और यह भूल जाते हैं कि जिंदगियों की बरबादियाँ सबके लिए एक जैसी नहीं हैं, और अपनी अस्मिता की खोज हमारे लिए भी उतनी ही कठिन और रक्तरंजित है जितनी उनके लिए. हमारे यथार्थ को बयान करने के वे तरीके जो हमारे अपने नहीं हैं हमारी शिनाख्त को और भी गुमनामी में धकेल देते हैं- पहले से कहीं अधिक कम आज़ाद, पहले से कहीं ज्यादा एकाकी. आदरणीय यूरोप शायद और अधिक अंतर्दृष्टि प्राप्त करेगा यदि वह अपने अतीत में हमें देख सके. मैं याद दिलाना चाहूँगा कि अपने शहर की दीवार बनाने में लन्दन को तीन सौ साल लगे और अपना बिशप पाने में तीन सौ और साल लगे. बीस शताब्दियों तक रोम अनिश्चितता के गर्भ में घूमता रहा जब तक कि इट्रस्कन (इतालवी सभ्यता का प्राचीन केंद्र) राजा ने उसे इतिहास का रास्ता नहीं दिखाया. और आज के शांतिप्रिय स्विस नागरिक जो अपनी बेहतरीन पनीर (चीज़) और भावशून्य घड़ियों से हमें लुभाते हैं, 16वीं सदी तक तकदीर के सिपाही बनकर यूरोप को खून में नहलाते रहे. यहाँ तक कि पुनर्जागरण के स्वर्णिम दौर में भी स्विस दरबार से पैसा पाते 12 हज़ार भाड़े के सिपाहियों ने रोम को लूट कर तबाह कर दिया और इसके आठ हज़ार वासियों को अपनी तलवारों से मौत के घाट उतार दिया.

मेरा इरादा तोनियो क्रागर (1903 में प्रकाशित टॉमस मान का उपन्यास, जिसका केन्द्रीय पात्र उत्तरी जर्मनी के व्यापारी पिटा और इतालवी कलाकार माँ की संतान है और उन दोनों के आनुवांशिक गुणों को लिए हुए है.) के भ्रम को साकार करने का नहीं है जिसके पवित्र उत्तर और जज्बाती दक्षिण को एक करने की भव्य कल्पना थामस मान ने की थी. लेकिन, मुझे यकीन है कि साफ़ दृष्टि वाले यूरोपीय, जो यहाँ भी न्यायोचित और मानवीय सरजमीं के लिए संघर्ष कर रहे हैं, हमें और बेहतर मदद कर सकते हैं; बशर्ते वे हमें देखने के अपने नजरियों पर पुनर्विचार करें. हमारे सपनों के साथ आपकी एकजुटता इस अकेलेपन को तब तक कम नहीं करेगी जब तक वह दुनिया के बंटवारे में अपना जीवन ढूँढने का भ्रम पाले हुए लोगों के लिए उचित मदद के ठोस कार्यक्रमों के तौर पर पर नहीं बदलती.

लैटिन अमेरिका नहीं चाहता और न ही ऐसा कोई कारण है कि वह इच्छाशक्ति रहित एक प्यादा हो, न ही उसे चाहत है कि उसकी आज़ादी की चाह और मौलिकता पश्चिम के लिए कोई मिसाल बने. हालांकि, परिवहन की उपलब्धियों ने लैटिन अमेरिका और यूरोप की दूरियाँ तो कम की हैं पर हमारी सांस्कृतिक दूरी और बढ़ी है. आखिर ऐसा क्यों है कि साहित्य में हमारी मौलिकता को तत्परता से कबूल किया जाता है, पर सामजिक बदलाव के हमारे कठिन प्रयासों को अविश्वासपूर्वक नकार दिया जाता है? आखिर प्रगतिशील यूरोपियों द्वारा उनके अपने देशों में सामाजिक न्याय (Social Justice) की  तलाश लैटिन अमेरिका के लिए भिन्न परिस्थितियों में अलग तरीकों से-एक लक्ष्य क्यों नहीं हो सकती है? नहीं, यह अथाह हिंसा और हमारे इतिहास की पीड़ा कई सदी पुराने पक्षपात और अनकही कटुता का परिणाम है, न कि हमारे घर से तीन हज़ार मील दूर रची गयी कोई शाजिश. लेकिन बहुत सारे यूरोपीय नेता और विचारक, जो बूढ़े लोगों की तरह अपनी जवानी की उर्वर अतियों को भूल चुके हैं, ऐसा ही सोचते हैं, कि दुनिया के इन दो आकाओं (सोवियत संघ और संयुक्त राज्य अमेरिका) के रहमोकरम के अलावा किसी और नियति के साथ जीना असंभव है. दोस्तों, यही हमारे एकांत का पैमाना है.

 इस दमन, लूट और अकेले छोड़ दिए जाने के बावजूद हमारा  जिन्दगी का जज्बा वैसा ही है. न बाढ़, न प्लेग, न अकाल, न आपदा, न ही सदी दर सदी तक चलने वाले अंतहीन युद्ध-मौत के बरक्स जिन्दगी की निरंतर बढ़त को कोई भी कम नहीं कर सके हैं. एक ऐसी बढ़त जिसमें हर साल और तेजी से इजाफा हो रहा है- हर साल होने वाली मौतों की तुलना में हर साल सात करोड़ चालीस लाख जन्म हो रहे हैं, ये संख्या न्यूयार्क की आबादी से सात गुना ज्यादा है. इनमें से अधिक़तर जन्म संसाधनरहित उन देशों में हो रहे हैं जिनमें लैटिन अमेरिका के देश भी शामिल हैं. इसके विपरीत, सबसे संपन्न देशों ने विनाश की ऐसी शक्तियों को अर्जित करने में सफलता पाई है जो दुनिया का अस्तित्व ख़त्म करने की हद तक सैकड़ों बार उसे तबाह कर सकती हैं- उन इंसानों का ही अस्तित्व नहीं जो आज की तारीख तक इस धरती पर रहे, बल्कि उन सभी जीवित चीजों को जिन्होंने कभी भी बदनसीबी के इस अभागे ग्रह पर सांसें ली होंगी.

आज के ही दिन जैसे किसी दिन मेरे गुरु विलियम फाकनर ने कहा था- “मैं इंसान के अंत को मानने से इनकार करता हूँ.” मैं इस जगह पर खड़े होने के लिए अपात्र समझा जाऊँगा अगर मैं उस विराट त्रासदी से पूरी तरह वाकिफ न रहूँ जिसे 32 साल पहले फाकनर ने मानने से इनकार कर दिया था- मनुष्यता के इतिहास में पहली दफे ‘इंसान का अंत’ अब एक सामान्य वैज्ञानिक संभावना से ज्यादा कुछ नहीं है. आज का यह विस्मय्कारी यथार्थ मनुष्यता के अब तक के इतिहास में महज यूटोपिया (संकल्पना) ही प्रतीत होता था. हम किस्से गढ़ने वाले लोग, जो हर चीज पर यकीन करते हैं, इस यथार्थ का सामना करते हुए पुरे हक के साथ इस यकीन को महसूस करते हैं कि एक विपरीत यूटोपिया (आदर्श जगत) की रचना के लिए जुटने में अभी बहुत देर नहीं हुई है. जीवन का एक नया और व्यापक आदर्श जगत, जहाँ कोई दूसरों के मरने के ढंग को तय करने की हैसियत में नहीं होगा; जहाँ प्यार सच साबित होगा और खुशियाँ मुमकिन; और जहाँ सौ बरस का एकांत भोगने के लिए शापित नस्लों को आखिरकार इस धरती पर  हमेशा के लिए दूसरा मौका मिलेगा.

मार्खेज़ 1982

मार्केज के नोबेल भाषण का  अनुवाद करने वाले संदीप सिंह जेएनयू  छात्रसंघ के अध्यक्ष  और छात्र संगठन आइसा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके हैं . आजकल अध्ययन-चिंतन  में निमग्न हैं . उनसे संपर्क जरिया उनका गुल्लक , sandeep.gullak@gmail.com है. 

साभार:  हंस, जून 2014 

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