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आत्महंता की डायरी और बेकशिंस्कि का घर: मग्दालेना जेबाउकोव्स्का

बीसवीं-इक्कीसवीं सदी के विश्वस्तरीय, चर्चित, पोलिश चित्रकार ज़्जिसुअव बेकशिंस्कि का जीवन उनकी कृतियों की तरह ही सर्रियलिस्ट-स्पर्श लिए हुए अविश्वसनीय जान पड़ता है. उन्नीस सौ अंठानवे में उनकी पत्नी की मृत्यु की होती है. उन्नीस सौ निन्यानवे के क्रिसमस की पूर्वसंध्या के अवसर पर उनका इकलौता पुत्र तोमष, जो कि बहुत ही लोकप्रिय रेडियो उद्घोषक, संगीत-पत्रकार और अनुवादक था, आत्महत्या कर लेता है. सत्रह बार चाक़ू से गोदा गया बेक्शिन्स्कि का मृत शरीर इक्कीस फ़रवरी, दो हजार पाँच को उनके ही फ्लैट में पाया जाता है. यह धत् कर्म उनके ही केयरटेकर के नाबालिग पुत्र द्वारा किया गया था. मग्दालेना जेबाउकोव्स्का ने अपनी पुस्तक बेक्शिन्स्कि: एक दोहरी तस्वीर‘ (The Beksinskis: Double Portrait[i]) में बखूबी इन दृश्यों को जगह दी है. पोलिश इंडोलॉजिस्ट तत्याना षुर्लेई ने इसी किताब के शुरूआती हिस्से को यहाँ अनुदित की है.

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बेकशिंस्कि के परिवार के चित्र

By मग्दालेना जेबाउकोव्स्का 

आत्महंता की डायरी और बेकशिंस्कि का घर

एक चिट्ठी 

प्रिय एवा! एक बुरी खबर है। तोमेक[ii] मर गया। क्रिसमस की पूर्व संध्या पर उसने आत्महत्या कर ली और क्रिसमस के दोपहर, करीब तीन बजे मुझे उसकी लाश मिली। मैं पहले ही तुमको इस संबंध में लिख चुका हूँ कि अगस्त या इससे पहले से ही रेड अलर्ट था, और अब इस तरह इसकी समाप्ति हुयी।

अभियोजन पक्ष के कार्यालय के समक्ष जाने से पहले ही मैंने सारे भौतिक सबूतों को छुपा दिया है। क्योंकि, कागज़ के एक टुकड़े पर तोमेक ने लिखा कि मेरे लिए कंप्यूटर में एक चिट्ठी और डिक्टाफोन में एक मैसेज है।  डॉक्टर के आने से पहले ही मैंने कॉपी को सुरक्षित रख कंप्यूटर से चिट्ठी को हटाया, फिर कागज़ के टुकड़े और डिक्टाफोन को जेब में छुपाया। क्योंकि, मुझे डर था कि पुलिस सब कुछ अपने कब्जे में ले लेगा और बाद में अलग-अलग अंजान लोग इसे सुनेंगे, पढ़ेंगे और इसके बारे में पीएचडी लिखेंगे। मुझे लगता है कि मैंने जो किया अच्छा किया। हालांकि, पुलिस और अभियोजन पक्ष वाली औरत यह समझ नहीं सकती थी कि उसने क्यों कोई चिट्ठी नहीं छोड़ा। उन लोगों के बीच सब से बड़ा शक इसी एक बात से पैदा हुआ।

वास्तव में, इस चिट्ठी से मुझे अधिक वस्तुगत जानकारी मिली। जैसे कि, किसको क्या देना चाहिए और कौन-से काम पुरे करने हैं। मैं यह चिट्ठी उनको दिखा सकता था, लेकिन इसे पढ़ने के लिए मेरे पास समय नहीं था। और, टेप इतना व्यक्तिगत था कि इसे सिर्फ मैंने सुना, शायद एक और बार सुनकर इसको नष्ट करूंगा, जैसी उसकी इच्छा थी। उसकी यह भी प्रार्थना थी कि उसकी टेप वाली डायरी को (सुनने या न सुनने के बाद), जिसमें बहुत सारे टेप हैं, भी नष्ट करूँ।

जोशा की मौत के बाद, पहली बार मुझे एक अजीब-सी खुशी का अहसास हुआ कि यह सब होने के पहले ही वह मर गई, क्योंकि यह उसके लिए असहनीय होता। मैं ज़्यादा सहनशील हूँ, वैसे भी अंत में यहाँ किसी का रहना जरुरी है।

सिर्फ़ मुझे मालूम था कि तोमेक के लिए जीवन मुश्किल था। अहंवादी और अहंकारी होने के बावजूद, कोई अपनी नियति खुद नहीं चुनता। लेकिन, मुझे लगता है कि यह जो कुछ भी हुआ, अच्छा हुआ।

टेप पर दर्ज उसका अंतिम संदेश यही था कि जिस दुनिया में उसको जीना पड़ता है इससे वह कितना निराश है। उसे हमेशा एक अलग दुनिया चाहिए थी, जहां के नियम सीधे होते हैं, दोस्ती हमेशा सही होती है या ऐसा कुछ…।

इस मैसेज का अंत लगभग इस तरह था, “मैं जानता हूँ कि मेरी दुनिया कल्पना की दुनिया है, लेकिन उन इकतालीस सालों में मैं भी शायद एक कल्पना था। मैं कल्पना की दुनिया में जा रहा हूँ, क्योंकि मैं सिर्फ़ वहाँ ही खुश रह सकता हूँ। हाथ जोड़कर तुमसे विनती करता हूँ कि मुझे जगाना मत।”

उसने याकूब की सीढ़ी वाला टीशर्ट पहना था, और मुझे नहीं मालूम कि इसका कोई प्रतीकात्मक अर्थ था या नहीं!

उसे डर था कि नींद की गोलियां जब तक उसे मारेगी, उससे पहले मैं आ जाऊंगा! इसलिए, उसने टेप के संदेश में कहा कि तेईस दिसम्बर से उसने कुछ नहीं खाया है ताकि गोलियां जल्दी से अपना काम करें, और गोलियों के डिब्बे को बाहर के कूड़ेदान में फेंका ताकि डॉक्टर को पता न चल सके  कि उसने क्या खाया है!

वह तेईस तारीख की शाम को ही यह करना चाहता था। लेकिन, उसे याद आया कि वह हर शुक्रवार को घर आकर अखबार में छपे टीवी-कार्यक्रम के विवरणों में से पसंदीदा फिल्मों को चिन्हित करता है। ताकि, बाद में उसे देख सके और इसके लिए प्रसारण के समय उन्हें रिकॉर्ड करना चाहिए। वह जानता था कि इस दिन अगर वह नहीं आएगा तो मैं परेशान होकर चेक करूंगा कि क्या हुआ। इसलिए चौबीस दिसम्बर को दोपहर दो बजे मेरे पास आ गया और ऐसी फिल्मों को मार्क किया जो सिर्फ उसके लिए दिलचस्प हो सकती थीं, क्योंकि मुझे वेस्टर्न पसंद नहीं हैं। यह सब कुछ मुझे दिलासा देने के लिए था ताकि मैं कुछ अनुमान न करने लगूँ, और सच में उसका यह प्रयास सफल हुआ।

गोलियाँ खाने के बाद रिकॉर्ड हुए टेप से पता चला कि उसने गोलियों को चौबीस तारीख को दोपहर के तीन बजकर पाँच मिनट पर खाया। मैं चौबीस घंटे बाद वहाँ पहुँचा। वहाँ पहुँचने से पहले मैं कुछ परेशान था क्योंकि उसकी अच्छी दोस्त, अनया ओर्तोदोक्स[iii] ने फोन की और बतायी कि जब वह मेरे घर से अपने घर वापस गया था तभी अनया ने तोमेक से बात की थी और उसे लगा कि तोमेक की तबियत ठीक नहीं है। इसलिए वह बोली कि मैं उसके पास जाऊँ या उसको अपने यहाँ बुलाऊँ।

चूँकि, तोमेक ने मुझसे कहा था कि बीमार होने की वजह से वह दो दिनों के लिए फोन को स्विच ऑफ करेगा, ताकि उसकी तबीयत में सुधार हो। शुरू में मुझे लगा कि सच में उसने यह किया। अनया से बातचीत करने के बाद मैंने तोमेक को फोन किया लेकिन सिर्फ ऑटोमेटिक और रिकॉर्ड स्वर ही सुनाई देते थे, उसका मोबाइल फोन बंद था। मैं वहाँ गया और बार-बार दरवाजे की घंटी बजाता रहा। अब मुझे याद नहीं है, लेकिन यह शायद दोपहर चार बजकर पचास मिनट या पाँच बजकर दस मिनट था। उसने दरवाजा नहीं खोला और मेरे पास चाभी नहीं थी (अगले दिन मुझे पता चला कि उसने मेरे घर में अपनी चाभियों को दिनुव[iv] से खरीदी गयी एक चीनी मिट्टी के गमले में रखा है, अन्य दूसरी चीजों के नीचे) तो मैंने सोचा कि उसने नींद की गोली खाकर और कानों में इअरफ़ोन लगा सो रहा है। दरवाजे तोड़ना मैंने ज़रूरी नहीं समझा। दूसरे दिन मुझे उसकी चाभियाँ मिली और जब मैं तोमेक के पास पहुंचा तो वह बहुत समय से मरा हुआ था। हाँ, ऐसा ही था। ठीक है, अगर तुमको कुछ और जानना चाहिए तो लिखो! सभी को नमस्कार।

ज़्जिसुअव।

वारसा: रविवार, 26 दिसम्बर, 1999, दोपहर 4:07।

***

घर

हर किसी को यह घर धोखा देता था, जो उसे पूरी तरह जानने और समझने की कोशिश करता था। उसने किसी को भी घर की पूरी तस्वीर उतारने की अनुमति नहीं दी। सिर्फ अहाते की ओर से अंदर प्रवेश पाने वाली टूटी हुई सीढ़ियों की, या बगीचे की ओर से झाड़ियों के बीच से ऊँचे उठे हुए सड़े बरामदे की, या एक दीवार पर लकड़ी के हिले हुए रेलिंग की और उपेक्षित अहाते की ही, जहाँ ऊँची छत वाला एक छोटा कुआँ था, तस्वीर खींचना संभव था। एसेनबह की दवाई की दुकान के पीछे छुपा यह घर सड़क से दिखाई नहीं देता था और पेड़ों के पीछे होने के कारण पुओव्येत्स्कि नदी की ओर से भी दिखाई नहीं देता था। शुरू-शुरू में यह घर बॉयलर के वर्कशॉप होने के रहस्य की रक्षा करता था।

हेनरिक वनिएक, ज़्जिसुअव बेकशिंस्कि का दोस्त, को यकीन है कि यह घर, बीच में एक छोटे अहाते के साथ, एक वर्ग की संकल्पना पर आधृत है; जिसमें बाहर से कोई सीधा प्रवेश-द्वार नहीं था। इसे देखकर उसे एन्फ़िलैड की याद आती है जिसमें एक कमरे से दूसरे कमरे तक जाने का रास्ता घुमावदार होता है।

लेकिन यह असम्भव है क्योंकि लकड़ी का यह घर, जिसके छत धातु के प्लेटों से बने थे, अन्य इमारतों के बगल में U आकार में खड़ा था। जो, सामने या अन्दर से एक मंजिली हवेली जैसा था और ऊपर-ऊपर से देखने पर किसी ग्रामीण घर जैसा आभासित होता था।

अतिथियों को यह घर अव्यवस्थित लगता था। मेहमान अंधेरे गलियारे में पहुँचते ही जगह और समय के बारे में भूल जाते थे। लोग स्टूडियो से बाथरूम जाना चाहते थे तो बरामदे में पहुँचते थे। बच्चे के कमरे में जाना चाहते थे और ज़ोफ़िया के कमरे में पहुँच जाते थे। रसोईघर से कोठार जाने या तोमष के कमरे से स्तनिसुआवा दादी के कमरे जाने की प्रक्रिया अक्सर घर के सभी सदस्यों को परेशान करती थी। स्टूडियो के दरवाजे को ढूँढने की प्रक्रिया में अचानक एक आलमारी सामने आ जाती थी, जिसमें प्लास्टर की ढेर सारी खोपड़ियाँ होती थीं।

बाथरूम जाने के रास्ते को ज़्जिसुअव ने छोटी-छोटी बल्बों से सजाया था, रात के समय यह सजावट मदद करने की बजाय परेशानी का सबब बन जाती थी। एक बार बेकशिंस्कि ने वनिएक को बताया कि गलियारे में लगे बल्ब उसके सपनों के जटिल मामले का एक हिस्सा है।

घर के लिए नवीनीकरण कोई मतलब नहीं रखता था, जैसे, दीवारों को अंदर और बाहर से रंगना, बरामदे के टूटे हुए रेलिंग को ठीक करना। घर को इसकी परवाह नहीं थी कि लिविंग रूम को स्टूडियो, और बेडरूम को तोड़कर दो नए कमरे बना दिए गए थे, दूर के कमरों में किरायेदार रहते थे। धीरे-धीरे झड़ते प्लास्टर के कारण दीवारें अपनी नंगी होती लकड़ियों को गोचर करती हुयीं घर की अगोचरता को लगभग नष्ट कर रही थीं।

सनोक शहर के इसी घर में बेकशिंस्कि परिवार की पाँच पीढ़ियाँ रहती थीं। सिर्फ सड़क के नाम अलग-अलग थे। गलिसिया (ऑस्ट्रियन-हंगरियन कब्जे के समय) के ज़माने में  सड़क का नाम ‘ल्वोव्सका’ था, दूसरे गणतन्त्र में ‘यागिएलोनियन’ हो गया, इसी तरह जर्मनी के कब्जे के समय इसका नाम ‘एडोल्फ हिटलर मार्ग’ और साम्यवादी ज़माने में ‘श्वियेरचेव्स्कि[v] मार्ग’।

बेकशिंस्कि परिवार का घर अब नहीं है। बीसवीं शताब्दी के सत्तर के दशक के अंत में उसे नष्ट कर दिया गया।

बेकशिंस्कि परिवार भी अब नहीं है। परिवार के अंतिम सदस्य ज़्जिसुअव की 2005 में हत्या कर दी गयी।

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Tatiana Szurlej

अनुवादक तत्याना षुर्लेई ,  एक  Indologist और फिल्म-आलोचक हैं। हंस, पाखी, पहल, अकार आदि हिंदी-पत्रिकाओं के लिए लिखती रही हैं। पोलैंड के शहर क्राकोव स्थित Jagiellonian University से  ‘The Courtesan Figure in Indian Popular Cinema : Tradition, Stereotype, Manipulation’ विषय पर पीएचडी की हैं। इनसे  tatiana.szurlej@gmail.com पर संपर्क संभव है.

 

[i] Magdalena Grzebałkowska, Beksińscy. Portret podwójny, Wydawnictwo Znak, Kraków 2014

[ii] पोलिश भाषा में लोगों के मूल नाम के अलग-अलग प्रकार हो सकते हैं जिनका इस्तेमाल परिवार या दोस्तों से किया जाता है। इसलिए मूल नाम तोमष (Tomasz) से तोमेक (Tomek) या तोमेचेक (Tomeczek) के प्रकार होते हैं, ज़ोफ़िया (Zofia) से ज़ोशा (Zosia), ज़्जिसउअव (Zdzisław) से ज़्जिसेक (Zdzisek), आदि।

[iii] अनया ओर्तोदोक्स (Anja Orthodox) क्लोस्तेर्केलर (Closterkeller) नाम के पोलिश बैंड की गायिका है।

[iv] दिनुव (Dynów) दक्षिण-पूर्व पोलैंड का छोटा शहर है।

[v] जनरल करोल श्वियेरचेव्स्कि (Karol Świerczewski) रेड आर्मी और पोलिश आर्मी का सैनिक, कम्युनिस्ट कार्यकर्ता।

The Dismeasure of Art. An Interview with Paolo Virno

(A Precarious Existence Vulnerability in the Public Domain For a few years now there has been an international discourse surrounding  the notion of ‘precarity’ or ‘precariousness’, boosted by European social movements and philosophers such as Paolo Virno. Precarity   refers to the relationship between temporary and flexible labour arangements and an existence without predictability and security, which is determining the living conditions of increasingly larger groups in society. Precarity occurs simultaneously at many places within society as a consequence of the neoliberal, post-Fordist economy with its emphasis on the immaterial production of information and services and continuous flexibility. The same is true of the creative sector: flexible production and outsourcing of work, typical aspects of the service economy, can also be seen in businesses devoted to art, culture and communication.

This issue of Open addresses precariousness in a cultural and social context and deals with such matters as the functioning of the art scene and the conditions of the precarious city and public space.
With contributions by Nicolas Bourriaud, Brian Holmes, Ned Rossiter/Brett Neilson, Jan Verwoert, Paolo Virno, Pascal Gielen/Sonja Lavaert, Gerald Raunig, Recetas Urbanas en Merijn Oudenampsen.)

जय भीम कॉमरेड: अम्बेडकरवादी आन्दोलन की सांस्कृतिक भव्यता और राजनीतिक विपन्नता के अंतर्द्वंद की पड़ताल: उदय शंकर

By उदय शंकर
मैं. जय भीम कॉमरेड देखने बहुत उम्मीद के साथ नहीं गया था। मैं आनंद की लगभग सारी फिल्मों से गहरे रूप से परिचित हूं और फिल्म का नाम इस परिचय के ऊपर एक झटके सा ही देता रहा था। झटके का एक मुख्य कारण जो मैं अनुभूत कर रहा था, वह यह कि हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं, जब मार्क्सवादी खेमे में एक खास तरह की निराशा देखने को मिल रही है और ऐसे दौर से आनंद भी अछूते रहेंगे इसकी उम्मीद तो थी लेकिन फिल्म के नाम से यह उम्मीद भी डगमगाने लगी थी। खैर, धन्यवाद अपने एक करीबी का, जिसके लगभग दबाव के कारण मैं इस फिल्म का साक्षी बन पाया। ‘जय भीम कॉमरेड’ आनंद के मित्र और प्रख्यात क्रांतिकारी-दलित गायक विलास घोगरे को एक रचनात्मक श्रद्धांजलि भी है। विलास घोगरे को मैंने पहली बार आनंद की ही फिल्म बॉम्बे: हमारा शहर में ‘एक कथा सुनो रे लोगो… एक व्यथा सुनो रे लोगों… हम मजदूर की करुण कहानी, आओ करीब से जानो!!’ गाते हुए देखा-सुना था। आनंद इस फिल्म (जय भीम कॉमरेड) में एक ऐसे ही फिल्म निर्देशक के रूप में सामने आते हैं, जो गरीब की ‘करुण’ कथा को करीब से जानने की कोशिश करते हैं और सफल भी होते हैं। इसके पहले कि उनकी सारी फिल्में एक तरह से ‘राजनीतिक’ हैं। ’जय भीम कॉमरेड’ शायद आनंद की पहली फिल्म है, जिसमें राजनीति तो है ही लेकिन इसके अलावा वे सांस्कृतिक और सामाजिक कथाओं-व्यथाओं को भी प्रमुखता से सामने लेकर आये हैं। विलास के उपर्युक्त चर्चित गीत के शब्दों को ध्यान से देखें, तो ‘गरीब की करुण कथा’ कोई सपाट पद नहीं है। इसमें सामाजिक-सांस्कृतिक पहलू को भी देखने का एक प्रबल आग्रह है। सिने-संसार में ‘जय भीम कॉमरेड’ अपने तईं इसी प्रबल आग्रह की पूर्ति करता है।
16 जनवरी, 1997 को लोकप्रिय ट्रेड यूनियन एवं कम्युनिस्ट नेता दत्ता सामंत की हत्या होती है और इसी के साथ मिल-मजदूरों के संगठन-संघर्ष का एक इतिहास खत्म होता है। बाल ठाकरे की मराठा-मान की राजनीति इस समय अपने चरम पर जाती है। 1 जुलाई, 1997 को बांबे के रमाबाई कालोनी में अंबेडकर की प्रतिमा के अपमान का विरोध दर्ज करा रहे दलितों पर पुलिसिया दमन होता है और उसमें दसियों प्रदर्शनकारी पुलिस की गोली से मारे जाते हैं और इसी घटना के बाद कवि विलास घोगरे आत्महत्या करके अपना प्रतिकार दर्ज करते हैं। इस ‘विडंबनात्मक’ आत्महत्या ने ही आनंद को इस फिल्म के लिए उकसाया है। ‘विडंबना’ कहने का तात्पर्य मेरा इससे है कि जो कवि जीवन भर मार्क्सवाद का अनुयायी बनकर जीवन का करुण गीत गाता रहा और अंत समय में खुद एक करुण कहानी बन गया, लेकिन विडंबना का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि आत्महत्या करते समय विलास ने अपने सिर पर लाल झंडा नहीं बल्कि नीला रिबन लपेट रखा था। विचारधारा का यह सांकेतिक स्थानापन्न लगभग संदेश और सीख की तरह प्रेषित होता है। संदेश उनके लिए जो गरीबी की करुण कहानी जीते हैं और सीख उनके लिए जो सर्वहारा के हितैषी तो हैं लेकिन भारतीय सर्वहारा की सामाजिक-सांस्कृतिक अवस्थितियों के बजाय वर्ग-संघर्ष के आर्थिक आधारों पर ही टिके रहे।
फिल्म का पहला भाग रमाबाई कालोनी की घटनाओं और दलित-अंबेडकरवादी राजनीति के चरम फैलाव को अपने आपमें समेटता है। किसी भी तरह की अस्मितावादी राजनीति की मजबूती और अपने समाज पर उसकी पकड़ को जानने के लिए उनके सांस्कृतिक उत्सव एक उम्दा औजार के रूप में काम करते हैं। अकारण नहीं है कि आनंद ने इस औजार का भरपूर इस्तेमाल किया है और फिल्म को रोचक, नाटकीय तथा संगीतमय बनाने में इस औजार का काफी योगदान है। नहीं तो इस तरह के विषयों पर documentary बनाना एक तरह का दस्तावेजी शगल मात्र रह जाता है। Documentary सिनेमा का एक मनोरंजन-प्रद रूप भी होता है और आनंद इसका भरपूर ख्याल रखते हैं। महाराष्ट्र में दलित-आंदोलन की जड़ें बहुत गहरी हैं। इसका पैमाना वहां के उत्सवों में, मसलन अंबेडकर-जयंती, महापरिनिर्वाण-दिवस आदि के दिन होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों को बनाया जा सकता है। इन कार्यकर्मों को देख कर यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि यह संस्कृति और इसी से जुड़ा उत्सव-मनोरंजन उनके विचारों और जीवन से ज्यादा अलग नहीं हैं। एक बड़े दलित नेता फिल्म में कहते हैं कि यहां दो तरह के अंबेडकरवादी हैं, एक जो अंबेडकर के भक्त हैं और दूसरे जो अंबेडकर के अनुयायी हैं। अंबेडकर अनुयायीपसंद हैं, न कि भक्ताहंकारी। लेकिन, मुझे लगता है कि किसी भी विचारधारा की सांस्कृतिक जड़ को मजबूत करने में, उसे एक ‘जातीय’ रूप देने में, ‘भक्तों’ की सबसे बड़ी भूमिका होती है और महाराष्ट्र के भीतर दलित-आंदोलन की मजबूती में, उसकी सांस्कृतिक जड़ों को गहरे तक जमाने में भक्तों की भूमिका से इनकार करना असंभव होगा। ‘भक्त’ आचरण और वाणी में फर्क नहीं करता है। लेकिन अनुयायी और भक्त के अनुपात में खाई खतरनाक साबित होती है। अंबेदकरवादियों में भक्तों की संख्या अनुयायियों के अनुपात में पहाड़ हो गयी है और मार्क्सवादियों में भक्त इक्‍का-दुक्‍का ही हुए होंगे।
भाजपा और शिवसेना के मोर्चेबंदी वाली सरकार के समय रमाबाई कालोनी में पुलिसिया दमन हुआ था। मनोहर जोशी तब मुख्यमंत्री हुआ करते थे। उनका मानना था कि ये अंबेडकर का नाम लेने वाले कोई अंबेडकरवादी नहीं हैं बल्कि नक्सलाइट हैं। पांच साल बाद सत्ता में कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस आती है और उसका भी व्यवहार कोई अलग नहीं था। खैरलांजी की जाति-उत्पीड़न और यौन-हिंसा की घटना कांग्रेसी शासन-काल में ही घटित होती है। तब के अंबेडकरवादी नेताओं के भीतर भारतीय राजनीति के इन दो दक्षिणपंथी पालों को लेकर कोई गलतफहमी नहीं थी, इसलिए किसी भी तरह की खुशफहमी का सवाल ही नहीं उठता है। फिल्म का पहला भाग एक तरह से विलास भोगरे की पीढ़ी के अंबेडकरवादियों के क्रांतिकारी व्यवहारों को सामने लाता है। दलित आंदोलन का जो क्रांतिकारी पक्ष है, मसलन छुआछूत विरोधी आंदोलन, धार्मिक अंधविश्वास का नकार और उसके रचनात्मक प्रतिकार के साथ ही साथ अंबेडकर के विचारों को सांस्कृतिक-व्यवहार के धरातल पर अमल में ले आना आदि, उसको बहुत ही उम्दा ढंग से पर्दे पर ले आना आनंद की सफलता है। महाराष्ट्र के दलित-आंदोलन की सबसे बड़ी सफलता यह है कि उसने बड़े पैमाने पर जन-गायकों और सांस्कृतिक टोलियों को सामने आने का मौका दिया, जो कि मार्क्सवादियों के अलावा कहीं और नहीं दिखता था और मार्क्सवाद में यह परंपरा इतनी कमजोर हुई कि इप्टा की सौवीं जयंती के अवसर पर उसको इतिहास की एक गौरवशाली थाती के बतौर ही याद कर पा रहे हैं। फिल्म का यह भाग आज के किसी भी ‘पेशेवर’ दलित चिंतक के लिए उत्साहजनक साबित होता है। साथ ही साथ मार्क्सवादियों को बगलें झांकने को मजबूर करता है। लेकिन फिल्म के एक दर्शक के नाते यह भाग मुझे कहीं से भी विचार के स्तर पर पेशेवर होने का मौका नहीं देता है। क्योंकि, प्रथमतया मैं फिल्म देखने गया था और मैं उससे संतुष्ट था। ‘पेशेवर’ विचारकों की तरह न हताश और न ही अति उत्साहित। बस संतुष्ट। बेशक, आनंद का कैमरा और संपादन-दृष्टि का योगदान तो इसमें है ही, साथ ही साथ नुआन्सेस लिए गुदगुदाते व्यंग्यबाण और अंधविश्वास से लबरेज हिंदू धर्मं के रीतिरिवाजों को फिर से जिलाने या तेज करने की संगठित कोशिशों और उसमें ‘सबसे तेज’ बन रहे मीडिया के योगदानों को हास्य से हास्यास्पद बना देने की कला आनंद के अलावा कहां है, मैं नहीं जानता।
फिल्म का दूसरा भाग पेशेवर विचारकों के लिए पलटमार का काम करता है। इसमें अंबेडकर के विचारों से किनाराकशी और निज-हित साधन हेतु दलित नेताओं के पतनशील व्यवहारों को केंद्रित किया गया है। कैसे वे अपनी जड़ों से कटते चले गये और वोट-बैंक की राजनीति में social engineering करते हुए निजी हितों को ही समुदाय का हित बता कर थोपने लगे। बहुजन से सर्वजन की राजनीति में स्थानापन्न इसी social engineering का उदहारण है। रमाबाई कालोनी में हत्या-कांड मचाने वाली भाजपा-शिवसेना कैसे उसी कालोनी में नरेंद्र मोदी का कार्यक्रम करने में सफल हो जाती है। अंबेडकरवादी युवाओं को एक समय आकर्षित करने वाली, मनुवाद और ब्राह्मणवाद को ठेंगे पर रखने वाली पार्टी RPI भाजपा-शिवसेना के साथ गठजोड़ में कैसे चली जाती है। कैसे दलित पैंथर के संस्थापकों में विचलन आता है आदि-आदि।
अंबेडकरवादी नेता या पार्टी भले दलाल हो गये हों, लेकिन अंबेडकर और ज्योतिबा फुले के विचार दलित युवकों को अभी भी आंदोलित करने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं। इन युवाओं को संगठित होना है और ऐसे ही युवाओं का एक सांस्कृतिक संगठन है कबीर कला मंच। कबीर कला मंच विलास भोगरे के बाद वाली पीढ़ी के दलित युवकों का सांस्कृतिक संगठन है। यह संगठन न तो कॉर्पोरेट और न ही एनजीओ पोषित है। इसे किसी पार्टी का सांस्कृतिक मंच भी नहीं कह सकते हैं। यह सांस्कृतिक संगठन ‘जय भीम कॉमरेड’ के दूसरे भाग का बड़ा हिस्सा बनता है। दलित युवकों और युवतियों का यह मंच अंबेडकर और ज्योतिबा फुले के विचारों को अपने गीतिनाट्यों में पिरोकर उसे गांवों में, मोहल्लों में प्रदर्शित करता है। आज जहां दलित विचारकों का एक तबका इंग्लिश देवी के मंदिर के निर्माण की बात करते-करते औपनिवेशिक भूत को और आज के अमेरिकी साम्राज्यवादी विस्तार को न्यायोचित ठहरा रहे हैं, वहीं महाराष्ट्र के भीतर अंबेडकरवादी दलित युवकों-युवतियों का ‘कबीर कला मंच’ अपने नाटकों और गीतों के जरिये पश्चिम की सांस्कृतिक गुलामी को अपने कटाक्ष का विषय बना रहा है, बाजारवादी व्यवस्था और संस्कृति को नकारने की हिम्मत को रचनात्मक तेवर दे रहा है। ‘जय भीम कॉमरेड’ कॉमरेड इस नोट के साथ खत्म होती है कि अभी सात महीने पहले कबीर कला मंच को भूमिगत होना पड़ गया है, क्योंकि महाराष्ट्र पुलिस ने उस पर माओवादी और नक्सलाइट होने का लेबल चस्‍पां कर दिया है। गीत, कविता, ढोल, ढपली और मंजीरा स्टेट के लिए शस्त्र बन गया है। आप भले कभी बंदूक छुए भी न हों लेकिन अगर आपकी ढपली पुलिस की गोली से तेज चलेगी तो आप नक्सलाइट हों जाएंगे। इसीलिए अगर नक्सलाइट कहलाने से बचना है तो मंदिर में जाएं और घंटा बजाएं, सुबह शाम आरती में शामिल हों और लड्डू खाएं।
फिल्म इस अंतर्दृष्टिपरक ‘संदेश’ के साथ खत्म होती है कि भारतीय मार्क्सवादी, भारतीय सर्वहारा के सामाजिक एवं सांस्कृतिक पहलू को revisit करें। अंबेडकर के विचारों के क्रांतिकारी पहलुओं को समाहित करें। ‘मार्क्सवाद-लेनिनवाद और माओ की विचारधारा’ नामक पद भारतीय राजनीति में संभव है, तो इसमें अंबेडकर की विचारधारा को क्यों नहीं जोड़ा जा सकता है! लब्बोलुआब यह है कि दोनों धाराओं की ‘आत्मालोचना’ भी है यह फिल्म। हम जैसों के लिए फिल्म का यह ‘प्रस्ताव’ उत्साहजनक है और ‘पेशेवरों’ के लिए निराशाजनक। स्क्रीनिंग के बाद संवाद वाले सत्र में कुछ ‘पेशेवर’ फिल्म पर निराशाजनक समाप्ति का आरोप लगाते पाये गये। फिल्म में मार्क्सवादी राजनीति को बहुत विस्तार से नहीं देखा गया है और इससे जुड़ी आलोचनाएं क्रांतिकारी-दलित युवा संस्कृतिकर्मियों के द्वारा ही सामने आती हैं। अंत में यह कहते हुए समाप्त करूंगा कि अंबेडकरवाद के व्यावहारिक धरातल की सांस्कृतिक भव्यता और राजनीतिक विपन्नता के द्वंद्व को इतनी सूक्ष्मता से कोई सामने लाया हो, मुझे पता नहीं, कम से कम सिने-संसार में तो कोई नहीं। उम्मीद करूंगा कि वे कभी इतने ही विस्तार से मार्क्सवादियों की बौद्धिक भव्यता और सांस्कृतिक विपन्नता को भी अपने आयोजन में शामिल करेंगे। इतनी भव्य योजना को पर्दे पर लाने के लिए आनंद पटबर्द्धन के लिए एक ही अभिवादन – जय भीम कॉमरेड।

3 घंटे 20 मिनट की इस फिल्म को एक बार देखकर अभी यही तात्कालिक प्रतिक्रिया संभव थी, कभी एकाध बार और देख कर विस्तार से लिखने का भी मन है। एक फिल्म-दर्शक की तात्कालिक प्रतिक्रिया से अधिक तबज्जो की दरकार नहीं है और गुंजाइश भी नहीं। 

(उदय शंकर। जेएनयू से ही पीएचडी के लिए शोधरत। तीन खंडों में आलोचक सुरेंद्र चौधरी के रचना संचयन का संपादन। सांस्‍कृतिक आंदोलनों से जुड़ाव। उनसे udayshankar151@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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